Home Blog Page 215

गवाही की कीमत – चुकती और मिलती

1984 में हुए सिखों के कत्लेआम के मामले में आज से करीब 15 साल पहले हर किशन लाल भगत और सज्जन कुमार के खिलाफ आपराधिक मामले चलाने की सिफारिश कर चुके डी के अग्रवाल (रिटायर्ड उप पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश) को आज इस मामले पर बोलना ही बेमतलब जान पड़ता है. वे कहते हैं, ‘फैसला तो नेताओं को करना है.’ थोड़ा और कुरेदने पर वे कहते हैं, ‘उनकी मिलीभगत साफ दिखती है. लेकिन हमारा न्याय तंत्र ऐसा है कि एक बार लंबा समय बीता नहीं कि सबूत कमजोर पड़ जाते हैं या उनमें फेरबदल किये जाने से उनकी विश्वसनीयता जाती रहती है.’

दंगों में अपने पति को खो चुकीं अनेक कौर ने एक शपथपत्र दाखिल करके सज्जन कुमार और उनके दो सहयोगियों जय सिंह और जय किशन के खिलाफ तमाम जानकारियां दी थी

अग्रवाल और दिल्ली हाईकोर्ट के सेवा निवृत्त जज जेडी जैन को 1990 में सिख नरसंहार मामले की जांच के लिए गठित एक समिति का मुखिया बनाया गया था. दंगों के बाद ये छठवीं जांच समिति थी जिसने अपनी रिपोर्ट 1993 में सरकार को सौंप दी थी जिसके बाद इस रपट का जो होना था वही हुआ यानी ये अपनी परमगति को प्राप्त हो गई.

अगस्त 2005 में जीटी नानावती आयोग (इस मामले की दसवीं जांच) की सिफारिशों के बाद कहीं जा कर सज्जन कुमार के खिलाफ तीन मामले दर्ज हुए. पहला मामला दिल्ली छावनी इलाके के राजनगर में 18 सिखों की हत्या के मामले में दर्ज हुआ. इस मामले में पांच गवाहों ने सीबीआई के समक्ष ये बयान दिया कि उन्होंने सज्जन कुमार को भीड़ की अगुवाई करते हुए देखा था. सीबीआई के  सामने सज्जन कुमार के खिलाफ गवाही दे चुकी निरप्रीत कौर तहलका को बताती हैं कि 2 नवंबर की सुबह उसने देखा कि सज्जन कुमार पुलिस की जीप में सवार होकर एलान कर रहे थे- ‘कोई भी सिख जिंदा नहीं रहना चाहिए. किसी ने अगर सिखों को अपने घर में छिपाया तो उसे जला दिया जाएगा.’

दूसरा मामला उत्तर पश्चिम दिल्ली के सुल्तानपुरी का है, यहां छह लोगों ने सज्जन कुमार की पहचान भीड़ की अगुवाई करने वाले के तौर पर की. लेकिन पुलिस अभी तक दोनों मामलों में चार्जशीट तक दाखिल नहीं कर सकी है. तीसरे मामले की जांच ही रोक दी गई. ‘पुलिस किस चीज का इंतजार कर रही है? सज्जन कुमार को सजा दिलाने के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं’ पीड़ितों के वकील एचएस फूल्का कहते हैं.

8 अक्टूबर 2005 के अंग्रेजी संस्करण में तहलका ने उन बिचौलियों का खुलासा किया था जो सज्जन कुमार और एचकेएल भगत की तरफ से चश्मदीद गवाहों और पीड़ितों के परिजनों को बहला-फुसला और धमका रहे थे.

दंगों में अपने पति को खो चुकीं अनेक कौर ने एक शपथपत्र दाखिल करके सज्जन कुमार और उनके दो सहयोगियों जय सिंह और जय किशन के खिलाफ तमाम जानकारियां दी थी. उनके शपथपत्र के मुताबिक पुलिस भी भीड़ को सिखों की हत्या के लिए उकसा रही थी. लेकिन 1994 में अनेक ने सज्जन कुमार के खिलाफ दिया अपना बयान वापस ले लिया.

सतनामी बाई और दर्शन कौर ने भगत की पहचान की थी लेकिन उनके खिलाफ मामला 1995 में औंधे मुंह गिर पड़ा क्योंकि सतनामी कोर्ट में अपने बयान से पलट गईं 

बाद में उनकी सास साहिबजादी ने तहलका के एक स्टिंग ऑपरेशन में स्वीकार किया कि राठी नाम का कोई आदमी किसी कागजात पर अनेक के अंगूठे का निशान ले गया था. इसके बाद अनेक की ननद मिशरी कौर भी छिपे हुए कैमरे पर ये कहते हुए पाई गईं कि सज्जन कुमार ने अनेक के आरोप वापस लेने की सूरत में उसे फ्लैट दिलाने का प्रस्ताव दिया था. उसने ये भी कहा कि सज्जन कुमार ने उनका जीवन भर का खर्च उठाने का प्रस्ताव भी दिया था. दो साल तक परिवार को ये खर्च मिला भी. ‘2001 में अपनी मृत्यु से पहले अनेक ने मुझसे और अपनी बेटी से कहा कि सज्जन कुमार से पैसा लेते रहना वरना पुलिस में गवाही दे देना,’ मिशरी याद करके बताती है. अनेक ने उनसे ये भी कहा- ‘याद रखना वो तुम्हारे बाप का कातिल है.’ दर्जन भर के करीब समितियां बनाने के बावजूद सबकी सिफारिशें राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में ठंडे बस्ते में डाल दी गईं.

समय-समय पर सरकार ने जांच में सामने आए तथ्यों को झुठलाने की कोशिश भी की. उदाहरण के तौर पर नानावती आयोग ने खेर सिंह नाम के एक आदमी का नाम लिया था जो 84 के एक मामले का गवाह था. खेर सिंह ने अपने शपथ पत्र में कहा था, ‘स्थानीय सांसद सज्जन कुमार भीड़ को संबोधित करते हुए कह रहे थे सिखों ने हमारी मां को मार डाला इसलिए इस इलाके में एक भी सिख बचने न पाए.’

लेकिन तहलका ने अपने खुफिया जांच में पाया कि सरकार की कार्रवाई रिपोर्ट में बिल्कुल उल्टी बात कही गई है ‘कोई भी ऐसा चश्मदीद गवाह सामने नहीं आया जिसके पास घटना से संबंधित कोई विशिष्ट सबूत या सुराग हो. लिहाजा मामले को रद्द करने के लिए भेज दिया गया और संबंधित कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया.’

सतनामी बाई और दर्शन कौर ने भगत की पहचान की थी लेकिन उनके खिलाफ मामला 1995 में औंधे मुंह गिर पड़ा क्योंकि सतनामी कोर्ट में अपने बयान से पलट गईं. दर्शन आपनी जान का खतरा होने के बावजूद भी अपने बयान पर अटल रही और भगत का नाम लेती रही. लेकिन जो नुकसान होना था वो हो चुका था. नानावती ने कहा कि सिर्फ एक गवाह के आधार पर एक पूर्व केंद्रीय मंत्री को आरोपी नहीं ठहराया जा सकता. उन्हें सजा दिलवाने के लिए ये पर्याप्त नहीं है.

तहलका के स्टिंग ऑपरेशन में साफ हुआ कि पश्चिमी दिल्ली के तिलक विहार इलाके के  प्रतिष्ठित सिख नेता आत्मा सिंह लुभाना ने सतनामी को बयान बदलने के एवज में 12 लाख रूपए देने का सौदा किया था. 1996 में तिलक विहार स्थित शहीदगंज गुरुद्वारे में एक पंचायत के दौरान सतनामी से इस लेन देन से संबंधित सवाल भी पूछे गए थे.

इसके दस्तावेज सिखों के धार्मिक मामलों की प्रभावशाली संस्था दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (डीएसजीएमसी) के पास आज भी मौजूद हैं. 1984 नरसंहार की तमाम पीड़ित विधवाओं की उपस्थिति में उसने गुरु ग्रंथ साहिब की शपथ लेकर स्वीकार किया कि डीएसजीएमसी के पूर्व सदस्य लुभाना ने उसे 12 लाख रूपए देने का प्रस्ताव दिया था जिसके चलते वो अपने बयान से पलट गई. बाद में तहलका के खुफिया कैमरे पर सतनामी ने माना कि उसने अपना बयान इसलिए बदला क्योंकि उसे जान का खतरा था, लेकिन उसने पैसा लेने से इनकार किया. ‘भगत के गुंडो ने मुझे धमकाया कि अगर मैंने अपना बयान नहीं बदला तो वो मेरे भाई और बच्चों को मार देंगे’ उसने कहा, ‘हम पहले से ही डरे हुए थे, इस दबाव के आगे मैं झुक गई.’

दूसरी पीड़िता दर्शन कौर ने तहलका को बताया कि लुभाना ने उसे बयान से पलटने के एवज में 25 लाख रूपए देने का प्रस्ताव दिया था. जब उसने इनकार किया तो लुभाना ने उसकी पिटाई की (इस आरोप के बाद सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अमृतसर की अकाल तख्त ने 1998 में लुभाना को सम्मन जारी किया था). तहलका के खुफिया कैमरे पर लुभाना ने स्वीकार किया कि उसने पंचायत द्वारा लगाए गए 5.28 लाख रूपए का दंड भुगता है लेकिन उसने दर्शन कौर को धमकाने के आरोप को नकार दिया.

29 अक्टूबर 2005 को भगत अपनी मृत्यु के साथ ही पूर्वी दिल्ली के अपने निर्वाचन क्षेत्र में सिखों के सबसे बड़े नरसंहार से जुड़ी तमाम जानकारियां भी हमेशा के लिए अपने साथ लेते गए. शायद 1984 के सिख नरसंहारों की स्मृतियां दिनोंदिन और धूमिल ही पड़ती जाती अगर पत्रकार जरनैल सिंह ने जगदीश टाइटलर को सीबीआई की क्लीनचिट के विरोध में गृहमंत्री पी चिदंबरम के ऊपर अपना जूता न उछाला होता.

टाइटलर और सज्जन कुमार के लोकसभा टिकट आनन-फानन में काटने के कांग्रेस के फैसले से सिखों में उत्साह फैला है लेकिन पीड़ितों के वकील फूल्का चेतावनी देते हैं कि टिकट काटना एक वक्ती राहत भर है. ‘ये कोई निर्णायक अंत नहीं है. लड़ाई जारी है क्योंकि मूल मुद्दे पर ध्यान दिया जाना अभी बाकी है’ वे चेताते हैं.      

जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है…

कुछ बातें ऐसी होती हैं जो कई दशक बीतने के बाद भी स्मृतियों में धुंधली नहीं पड़तीं बल्कि शक्तिशाली प्रतीक बन जाती हैं. 1984 में सिख विरोधी दंगों के दौरान राजीव गांधी ने भी कुछ ऐसी ही बात कही थी -जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है.

सवाल उठता है कि जब गवाही इतनी मजबूत थी तो फिर टाइटलर को क्लीन चिट कैसे मिल गई? 

पिछले दिनों धरती फिर हिली, मगर अब ये कांग्रेस के कदमों तले हिल रही थी. एक पत्रकार ने गृहमंत्री पी चिदंबरम की तरफ जूता क्या उछाला एक बार फिर से 1984 के सिख विरोधी दंगे सुर्खियों में आ गए. इस बार  इस हलचल की वजह ये थी कि जूता फेंकने की ये घटना उस महत्वपूर्ण आम चुनाव के दौरान हुई जिसमें कांग्रेसनीत यूपीए अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए जी-तोड़ कोशिश कऱ रहा है.

हालांकि ये दंगे पहले भी चुनावों का मुद्दा रहे हैं. सोनिया गांधी और राहुल गांधी, दोनों ही अतीत में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर गुरुद्वारे में जाकर सिख समुदाय से माफी मांग चुके हैं. जूता प्रकरण ने एक बार फिर ये ध्यान दिलाया कि ये मुद्दा अभी भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने का माद्दा रखता है.

इस घटना के सुर्खियों में आते ही कांग्रेसी नेताओं को पार्टी की पंजाब और दिल्ली की राज्य इकाइयों से घबराहट भरे फोन आने लगे. दरअसल पंजाब की सभी 13 लोकसभा सीटों में सिख वोटों की अहम भूमिका है. कांग्रेस हाईकमान उस समुदाय को नाराज करने का जोखिम मोल नहीं ले सकता था जो राज्य की जनसंख्या का लगभग साठ फीसदी है. 84 के दंगों में अपनी कथित भूमिका के लिए कुख्यात जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को मैदान में उतारने से होने वाले नुकसान की उपेक्षा करना मुमकिन नहीं था. दिल्ली की लोकसभा सीटों के लिए भी जो कुल वोट पड़ने हैं उनका एक चौथाई सिख समुदाय से ही आना है.

जरनैल के जूता फेंकने से पहले हर तरफ सिर्फ जीत की जुगत भिड़ाई जा रही थी, जवाबदेही का ख्याल तक किसी को नहीं था. तब तक कांग्रेस सिख वोट बैंक को अलग तरह से देख रही थी. टाइटलर दिल्ली सदर सीट लगातार चार बार जीत चुके थे. 2004 में उन्होंने भाजपा के विजय गोयल को 16,000 वोट से हराया था और वैसे भी इस सीट पर सिख वोट कुल वोटों का महज 1.20 फीसदी ही थे जो दिल्ली में सबसे कम है. सज्जन कुमार भी जिस सीट से लड़ते हैं वहां पर सिख वोट महज दो फीसदी हैं. ऊपर से उन्होंने पिछली बार बाहरी दिल्ली की इस सीट पर हुए मुकाबले में अपने प्रतिद्वंदी और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत साहिब सिंह वर्मा को दो लाख वोटों के विशाल अंतर से हराया था. इस तरह से देखा जाए तो टाइटलर और कुमार को लेकर कांग्रेस पूरी तरह से निश्चिंत थी.

नानावती कमीशन के सामने दिए गए बयान में सिंह ने माना भी था कि टाइटलर ने 10 नवंबर 1984 को उनसे संपर्क किया था और दो कागजों पर दस्तखत करने को कहा था

मगर जूते ने सारे समीकरण हिला दिए. दिल्ली और पंजाब में सिखों के विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और टाइटलर के खिलाफ मामला एक बार फिर से चर्चा का केंद्र बन गया. टाइटलर ने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई और उम्मीदवारी छोड़ने की घोषणा की. मगर जैसी कि उन्होंने घोषणा की थी ऐसा उन्होंने पार्टी को शर्मिंदा होने से बचाने की मंशा से हर्गिज नहीं किया बल्कि इसलिए क्योंकि आधी रात को उनके पास ऐसा करने का फरमान पहुंच गया था. सूत्र बताते हैं कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता ऑस्कर फर्नाडिस ने रात में ही उन्हें बता दिया था कि अगर उन्होंने खुद इसकी घोषणा नहीं की तो मजबूरन ये फैसला पार्टी को लेना होगा और ये उनके लिए और भी शर्मिंदगी की बात हो जाएगी.

टाइटलर के साथ सज्जन कुमार को भी अपनी उम्मीदवारी छोड़नी पड़ी इधर, सीबीआई ने टाइटलर को क्लीनचिट दी उधर 84 का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर निकल आया. पीड़ितों की आवाजें एक बार फिर से अपनी कहानी बयां करते हुए गूंजने लगीं. टाइटलर पर सबसे गंभीर आरोप लगाए थे दिल्ली के आजाद मार्केट के नजदीक स्थित गुरुद्वारा पुल बंगश के मुख्य ग्रंथी सुरिंदर सिंह ने. अपने एक बयान में सिंह का कहना था, ‘एक नवंबर 1984 को सुबह नौ बजे लाठी, सरिया और केरोसीन से लैस एक विशाल भीड़ ने गुरुद्वारे पर हमला किया. भीड़ की अगुवाई हमारे इलाके के सांसद जगदीश टाइटलर कर रहे थे. उन्होंने भीड़ को गुरुद्वारा फूंकने और सिखों को मारने के लिए उकसाया. भीड़ में कुछ लोगों के हाथ में कांग्रेस पार्टी के झंडे थे और वे खून का बदला खून, सिख गद्दार हैं, उन्हें मार डालो, जला डालो जैसे नारे लगा रहे थे. भीड़ के साथ पांच-छह पुलिसवाले भी थे. जगदीश टाइटलर के उकसावे पर भीड़ ने गुरुद्वारे पर हमला कर उसमें आग लगा दी. दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड इंस्पेक्टर और गुरुद्वारा मैनेजिंग कमेटी के कर्मचारी ठाकुर सिंह को भीड़ ने मार डाला. गुरुद्वारे के सेवादार बादल सिंह की गर्दन में जलता टायर डालकर उन्हें जिंदा जला दिया गया. मैं गुरुद्वारे की ऊपरी मंजिल पर असहाय खड़ा इस पूरी घटना को देख रहा था. गुरुद्वारे में आग लग गई थी मगर ये आग ऊपरी तल तक नहीं पहुंची.’

सवाल उठता है कि जब गवाही इतनी मजबूत थी तो फिर टाइटलर को क्लीन चिट कैसे मिल गई? तहलका संवाददाता ने लगातार तीन दिन तक उनसे बात करने की कोशिश की मगर उन्होंने बस इतना ही कहा, ‘आपने मेरे खिलाफ झूठ छापा है. मैं आपके किसी सवाल का जवाब नहीं दूंगा.’

जिस ‘झूठ’ या कहें कि असहज कर देने वाले सच की तरफ टाइटलर इशारा कर रहे हैं वह तहलका द्वारा 2005 में की गई एक महीने लंबी तहकीकात है. इस दौरान हमने सच पर पड़े झूठ के पर्दे को हटा दिया था. इस तहकीकात से ये सच्चाई निकलकर सामने आई थी कि किस तरह टाइटलर, सज्जन कुमार और एचकेएल भगत ने इस मामले में इंसाफ नहीं होने दिया.

तहलका ने साबित किया था कि इस मामले में गवाहों को  अपनी तरफ करने के लिए डर और लालच दोनों चीजों का इस्तेमाल किया गया. उन्हें बिचौलियों के एक नेटवर्क द्वारा डराया और धमकाया गया. इन बिचौलियों ने गवाहों के साथ सौदेबाजी की, सच्चाई को तार-तार कर इंसाफ की गाड़ी को पटरी से उतार दिया. तहलका की तहकीकात से पता चला कि लगभग सभी मामलों में गवाहों के साथ सौदेबाजी की गई. भगत के मामले में एक गवाह को 25 लाख रुपये की पेशकश की गई थी. टाइटलर के मामले में अपना बयान बदलने के बाद मुख्य गवाह एक साल के लिए विदेश चला गया. इस मामले का दूसरा गवाह अब भी अमेरिका में है. पता चला कि गवाहों पर दबाव डालकर उनसे ये कहलवाने में कि टाइटलर भीड़ की अगुवाई नहीं कर रहे थे, एक प्रमुख सिख नेता भी शामिल था. एक और सनसनीखेज सच ये भी था कि सज्जन कुमार के खिलाफ अपने बयान से पलटने वाले एक मुख्य गवाह को उनके घर ले जाया गया था.

जब नानावती ने 2005 में सरकार को सौंपी रिपोर्ट में पाया कि टाइटलर के खिलाफ साक्ष्य मजबूत हैं तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मजबूर होकर उन्हें कैबिनेट से हटने के लिए कहना पड़ा

मगर ये कहानी मुख्य रूप से टाइटलर और राजनीति के रिक्टर स्केल पर उनके असर के बारे में है. इसलिए फिर से सुरिंदर सिंह पर लौटते हैं जो इस मामले के मुख्य गवाह थे और जिन्होंने टाइटलर के खिलाफ बयान दिया था. दूसरे पीड़ितों को तरह सिंह पर भी बिचौलियों और उनके आकाओं का दबाव था. जब सिंह के हलफनामे पर नानावती आयोग ने जगदीश टाइटलर को सम्मन भेजा तो सुनवाई के दिन साफ नजर आ रहा था कि मुख्य ग्रंथी का मिजाज बदला-बदला सा था. टाइटलर ने आयोग का ध्यान सिंह द्वारा दाखिल एक दूसरे हलफनामे की तरफ खींचा जो पांच अगस्त 2002 का था और इसमें सिंह उस बात से पलट गए थे जो उन्होंने पहले कही थी. उनका कहना था कि उन्हें तो पता तक नहीं कि पहले दाखिल किए गए हलफनामे में था क्या क्योंकि वे अंग्रेजी पढ़-लिख नहीं सकते हैं. सिंह ने ये भी कहा कि उन्होंने टाइटलर को पुलबंगश गुरुद्वारे पर हमला करने वाली भीड़ की अगुवाई करते हुए नहीं देखा था. ये हलफनामा अक्टूबर 22, 2002 को दाखिल किया गया था और ये एक साल बाद तब प्रकाश में आया जब टाइटलर को आयोग के सामने पेश होने का नोटिस दिया गया. आयोग इससे हैरान था कि टाइटलर को इस तरह के किसी हलफनामे की जानकारी कैसे है क्योंकि 17 जनवरी 2002 को सिंह ने जो बयान दिया था उसमें उन्होंने टाइटलर का नाम लिया था.

टाइटलर सुरिंदर सिंह को अपने पाले में करने की कोशिश कर रहे थे. नानावती कमीशन के सामने दिए गए बयान में सिंह ने माना भी था कि टाइटलर ने 10 नवंबर 1984 को उनसे संपर्क किया था और दो कागजों पर दस्तखत करने को कहा था. उन्होंने हालांकि ऐसा करने से इनकार कर दिया था मगर लगता है कि टाइटलर लगातार सिंह को खरीदने की कोशिश करते रहे और आखिरकार उन्हें कामयाबी मिल ही गई. सिंह के बदले हुए हलफनामे पर जस्टिस नानावती का कहना था, ‘इस सबसे लगता है कि बाद में दिया गया हलफनामा शायद दबाव के तहत दिया गया. अगर इस गवाह ने वास्तव में भीड़ में टाइटलर को नहीं देखा होता या फिर उससे टाइटलर ने संपर्क नहीं किया होता तो वह सबूत देने के लिए खुद आयोग के सामने नहीं आता या आयोग को ये नहीं बताता कि हमला इस तरह से हुआ. सच्चाई बताने के लिए उसे पांच अगस्त 2002 तक इंतजार करने और एक अतिरिक्त हलफनामा देने की जरूरत नहीं थी.’

इसलिए जब नानावती ने 2005 में सरकार को सौंपी रिपोर्ट में पाया कि टाइटलर के खिलाफ साक्ष्य मजबूत हैं तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मजबूर होकर उन्हें कैबिनेट से हटने के लिए कहना पड़ा. एक भावुक भाषण में प्रधानमंत्री का कहना था, ‘मुझे माफी मांगने में कोई झिझक नहीं है, न सिर्फ सिख समुदाय से बल्कि पूरे देश से क्योंकि ये दंगे राष्ट्र की अवधारणा पर चोट हैं. जो हुआ उस पर मेरा सिर शर्म से झुका है..मगर ये किसी देश के इतिहास में आने वाले ज्वार-भाटे हैं.’ ये मानते हुए कि अतीत को बदला नहीं जा सकता मनमोहन ने कहा था, ‘मगर हमारे पास एक बेहतर भविष्य लिखने की इच्छाशक्ति है और हमें ये सुनिश्चित करना चाहिए कि इस तरह की घटनाएं दोहराई न जाएं.’

एक भावुक सिख प्रधानमंत्री के इन कठोर शब्दों ने उस समय मरहम का काम किया था, मगर उसके बाद जो हुआ वह शर्मनाक है. दो साल के अंतराल के बाद सीबीआई ने दिल्ली की एक निचली अदालत को बताया कि वह ये मामला बंद करना चाहती है मगर अदालत ने आदेश दिया कि टाइटलर के खिलाफ मामले की फिर से जांच की जाए. मजबूर होकर सीबीआई फिर से सुरिंदर सिंह के पास गई जिन्होंने फिर से एक नया हलफनामा दिया. इसमें उनका कहना था, ‘अगर मेरी मौत हो जाती है तो इसके लिए जगदीश टाइटलर जिम्मेदार होंगे. जगदीश टाइटलर ने मुझ पर काफी दबाव डाला था और दो कोरे कागजों पर मेरे दस्तखत करवा लिए थे..उन्होंने मुझे धमकी दी थी कि अगर भविष्य में मैंने उनके खिलाफ बयान दिया तो मुझे मेरे परिवार सहित खत्म कर दिया जाएगा.’

दरअसल सीबीआई तो सुरिंदर तक पहुंचती ही नहीं अगर अदालत उसे ऐसा करने को नहीं कहती. जांच एजेंसी ने अदालत से मामला बंद करने को कहा था क्योंकि टाइटलर मामले में वह और कोई गवाह नहीं ढूंढ़ पाई थी. नानावती आयोग के सामने दिए गए एक हलफनामे में जसबीर सिंह ने कहा था कि उन्होंने तीन नवंबर 1984 की रात किंग्सवे कैंप के पास टाइटलर को देखा था जो एक भीड़ को सिखों के कत्लेआम के लिए उकसा रहे थे. जसबीर पिछले छह साल से अमेरिका में है और सीबीआई का कहना था कि उसका पता-ठिकाना मालूम नहीं चल पा रहा. इससे इस जांच एजेंसी के काम करने के तरीके पर सवाल खड़े होते हैं क्योंकि सीबीआई कह रही थी कि वह जसबीर को ढूंढ नहीं पा रही और उधर जसबीर एक टीवी चैनल पर हो रहे सीधे प्रसारण में अपनी बात कह रहा था.

टाइटलर का कहना है कि जसबीर एक अपराधी है और उनके शब्दों में ‘वह भारत वापस इसलिए नहीं आ रहा क्योंकि वह जानता है कि यहां एक गिरफ्तारी वारंट उसका इंतजार कर रहा है.’विडंबना देखिए कि टाइटलर उसे अपराधी कह रहे हैं जिसने उनके खिलाफ बयान दिया है. वे खुलेआम ये भी कह रहे हैं कि सुरिंदर के पिता और भाई उनसे मिलने आए थे और उन्होंने उन्हें बताया था कि सुरिंदर झूठ बोल रहा है. मगर अहम सवाल ये है कि इस मामले के आरोपी टाइटलर आखिर एक अहम गवाह, जिसने उनके खिलाफ हलफनामा दिया है, के रिश्तेदारों से क्यों मेलजोल रख रहे हैं? एक आंख वोट बैंक पर रखे कांग्रेस ने भले ही आफत को थोड़ा टाल दिया हो मगर 1984 की जवाबदेही अब तक तय नहीं हो पाई है.

पीड़ित अब भी न्याय के इंतजार में हैं. 

पार्टी के टेकों पर मजबूत नेता

मजबूत नेता को आजकल जो देखो राष्ट्रभक्त पार्टी में टेका लगा रहा है. कभी आपने देखा और सुना कि बीच चुनाव में किसी पार्टी ने कहना शुरू किया हो कि इस बार तो प्रधानमंत्री के हमारे उम्मीदवार फलांचंद जी हैं और अगली बार दुलाचंद जी होंगे. चुनाव लड़ती और सत्ता में आने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा चुकी पार्टी न तो ऐसी शानदार प्लानिंग कर सकती हैं न बीच धार में कह सकती है कि इस बार तो यह ठीक है लेकिन अगली बार पार लगाने वाला हमारी वह नौका होगी. भैया इस बार तो लाल कृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री बना लो फिर कहना कि हमारा अगला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी होगा.

संघ परिवार के ये नैष्ठिक प्रचारक संगठक अब भी मानते हैं कि लालकृष्ण आडवाणी से हिंदुत्व की सेवा नहीं होगी. नरेन्द्र मोदी यह बेहतर कर सकते हैं

कांग्रेस ऐसी अनोखी लोकतांत्रिक पार्टी है जिसमें प्रधानमंत्री एक ही परिवार में पैदा होते हैं. जैसे पहले राजा एक ही वंश में पैदा हुआ करते थे. मोतीलाल नेहरू के घर जवाहरलाल हुए. फिर जवाहरलाल नेहरू के घर इंदिरा हुईं. उनने विवाह भले ही फीरोज गांधी नाम के पारसी से कर लिया हो पर वह बेटी तो प्रधानमंत्री नेहरू की थीं इसलिए प्रधानमंत्री बनीं. उनके बेटे राजीव को राजनीति से खटक पड़ती थी. लेकिन वे बेटे तो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के थे इसलिए प्रधानमंत्री बने. अब सारी दुनिया जानती है उनके बेटे राहुल प्रधानमंत्री होंगे. लेकिन अभी उनकी राजनैतिक ट्रेनिंग चल रही है. राजतिलक रुका हुआ है. राजमाता सोनिया गांधी ने मुनीम मनमोहन सिंह को कामकाज चलाने के लिए खड़ाऊं दे कर बैठा रखा है.

सब जानते हैं कि राज सिंहासन सूना है और प्रतीक्षा में है. लेकिन कांग्रेस जैसी राजतंत्रिक पार्टी को कोई छोटा-मोटा चोबदार भी नहीं कहता कि इस बार तो मनमोहन सिंह ठीक हैं लेकिन अगले प्रधानमंत्री राहुल गांधी होंगे. तो फिर भैया भारतीय जनता पार्टी जैसी संघनिष्ठ और करिश्माई सर्वोच्च नेतृत्व में विश्वास न करने वाली पार्टी के चाणक्य अरुण शौरी को अमदाबाद में क्यों कहना पड़ गया कि नरेन्द्र मोदी अगले भाजपाई प्रधानमंत्री होंगे? और मान लो कि मोदी को प्रधानमंत्री बनाने को उतावले गुजरातियों को संतुष्ट करने के लिए अरुण शौरी ने कह भी दिया तो अरुण जेटली, रविशंकर प्रसाद जैसे दूसरे कागजी नेताओं ने इस गलती पर पानी डालने के बजाए इस आग को और हवा क्यों दे दी? बीच चुनाव में ऐसी हालत क्यों पैदा कर दी कि मजबूत नेता की जोरदार उम्मीदवारी को छोड़ कर लोग नरेन्द्र मोदी की बात करने लगे? अभियान को तो सफल होने के लिए एक ही फोकस करना पड़ता है. फिर लालकृष्ण आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने के पहले ही अगले प्रधानमंत्री की बात क्यों चलाई गई?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी राजनैतिक बेटी भारतीय जनता पार्टी को अंदर बाहर से जानने वाले लोग कहते हैं कि संघ और भाजपा में ऐसे तत्वनिष्ठ हिंदुत्ववादियों की कमी नहीं है जो मानते हैं कि लालकृष्ण आडवाणी के बजाए नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना कर चुनाव में उतरा जाता तो भाजपा के सत्ता में आने और मोदी के प्रधानमंत्री बनने की बेहतर संभावना होती. ये वे लोग हैं जिनके दबाव के कारण जिन्ना को सेकुलर कहने वाले लालकृष्ण आडवाणी को भाजपा के अध्यक्ष पद से उतरना पड़ा था. यही वे लोग हैं जिनने विश्वास कर रखा था कि भाजपा की सरकार में आडवाणी गृह और उप प्रधानमंत्री हुए तो अयोध्या में राम मंदिर बनने का रास्ता निकल आएगा. लेकिन जो आडवाणी के सत्ता में बने रहने के मोह से बहुत निराश हुए थे और मानने लगे थे कि उनने हिंदुत्व को सत्ता में आने की सीढ़ी बना कर उसे फेंक दिया है.

आतंक से निपटने की इस ‘मजबूती’ में भी लालकृष्ण आडवाणी का लोहा पिघला हुआ दिखाई दिया. तो खुद जसवंत सिंह मजबूत नेता को टेका लगाने आगे आए

संघ परिवार के ये नैष्ठिक प्रचारक संगठक अब भी मानते हैं कि लालकृष्ण आडवाणी से हिंदुत्व की सेवा नहीं होगी. नरेन्द्र मोदी यह बेहतर कर सकते हैं और उन्हीं को प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए. संघ और पार्टी के लाख कहने पर भी ये लोग उत्साहित हो कर चुनाव में नहीं लगे हैं. उनका रवैया ठंडा है. गुजरात में तो मोदी के आसपास घूमने-फिरनेवालों ने मान ही लिया है कि वही प्रधानमंत्री होने चाहिए. वे अपनी उतावली बताने में शरमाते या हिचकते भी नहीं. इन लोगों को आडवाणी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए लड़े जा रहे चुनाव में सक्रिय करने के लिए मान लिया गया है कि भाजपा के अगले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी होंगे. यानी राजनाथ सिंह और दूसरी पीढ़ी के कई नेताओं का कोई जिक्र ही नहीं है. भाजपा में आडवाणी के बाद मोदी हैं. अरुण शौरी और अरुण जेटली जैसी अमरबेल ‘नेतागीरी’ को भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिस पर वे चढ़ें. वह अटल बिहारी नाम का वटवृक्ष है या लालकृष्ण आडवाणी नाम का खजूर या नरेन्द्र मोदी नाम का बबूल.

इसलिए अगला भाजपाई प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी है ऐसा सार्वजनिक ऐलान कर के मजबूत नेता को संघ परिवार में टेका लगाया गया है. ऐसा ही एक टेका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भूतपूर्ण सरसंघचालक सुदर्शन ने लगाया. मुंबई में मनमोहन सिंह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में लिखित बयान में कहा था कि जब लुच्चे लफंगे और गुंडे बाबरी मसजिद गिरा रहे होंगे तो मैं लालकृष्ण आडवाणी की तरह कोने में बैठ कर रोता नहीं रहूंगा. कुछ करूंगा. क्योंकि नेताई, भाषण बहादुरी  करने में नहीं सही और मजबूत कार्रवाई करने में है. मनमोहन सिंह ने मुंबई में ऐसा कहा लेकिन सोनिया गांधी और उनकी बेटी प्रियंका और बेटा राहुल तो बाबरी मसजिद के ध्वंस में मजबूत नेता की असहायता और निपट कर्महीनता को लगातार निशाना बनाए ही हुए थे. मजबूत नेता की मजबूती बाबरी ध्वंस पर तार-तार हो रही थी.

इस खस्ता हालत में मजबूत नेता को टेका लगाने के लिए अपने संन्यास से बाहर निकले सुदर्शन जी ने विस्तार से बताया कि बाबर मसजिद के ध्वंस के लिए लालकृष्ण आडवाणी कतई जिम्मेदार नहीं थे. उसे गिरवाना तो कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरसिंह राव चाहते थे. लालू प्रसाद यादव ने कहा कि बाबरी के गिरने में कांग्रेस भी जिम्मेदार है. नहीं, कांग्रेस ही जिम्मेदार है. क्योंकि नरसिंह राव ने बाबरी मसजिद को बचाने के लिए हमारी इतनी बात तक नहीं मानी कि सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दें कि वह लखनऊ हाईकोर्ट को कहे कि विचाराधीन मामले पर जल्दी फैसला दे दें. अब यही सुदर्शन पहले कह चुके हैं कि बाबरी मसजिद सरकार की तरफ से आए लोगों की बारूद से गिरी. कारसेवकों का उसमें कोई पराक्रम नहीं था. लेकिन यहां सुदर्शन जी को लालकृष्ण आडवाणी को बाबरी ध्वंस की किसी भी जिम्मेदारी से बरी करना था. सब जानते हैं कि बाबरी मसजिद के ध्वंस की अध्यक्षता तो संघ परिवार का पितृ संगठन संघ ही कर रहा था. इसलिए सुदर्शन जी को टेका लगाने के लिए आना पड़ा. वे उस समय संघ में सह कार्यवाह थे.

मनमोहन सिंह, राहुल, प्रियंका और सोनिया गांधी ने इंडियन एअरलाइंस के विमान के काठमांडो से काबुल अपहरण और उसे यात्रियों समेत छुड़ाने में तीन दुर्दांत आतंकवादियों की रिहाई में लालकृष्ण आडवाणी की भूमिका को भी उनके मजबूत नेता होने के सबूत की तरह देश को दिखाया. आडवाणी जी ने अपनी किताब और एक इंटरव्यू में कह रखा है कि तब के विदेश मंत्री जसवंत सिंह के आतंकवादियों को ले कर कंधार जाने की उन्हें कोई स्पष्ट जानकारी नहीं थी. इसी पर पूछा गया कि ये कैसे लौह पुरुष गृह मंत्री थे जिन्हे मालूम नहीं था कि विदेश मंत्री आतंकवादियों के साथ कंधार जा रहे हैं. या तो वे अपना काम ठीक से कर नहीं रहे थे या प्रधानमंत्री का उनमें विश्वास नहीं था कि बताते कि सरकार क्या कर रही है.

आतंक से निपटने की इस ‘मजबूती’ में भी लालकृष्ण आडवाणी का लोहा पिघला हुआ दिखाई दिया. तो खुद जसवंत सिंह मजबूत नेता को टेका लगाने आगे आए. वे दार्जीलिंग से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं. उनने एक्सप्रेस के संवाददाता को बुला कर कहा कि लालकृष्ण आडवाणी तो  दरअसल आतंकवादियों की रिहाई के विरुद्ध थे. इस मामले में उनकी राय कैबिनेट और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को मालूम थी. लेकिन कैबिनेट की राय अलग थी. आडवाणी और अरुण शौरी ही असहमत थे. इसलिए प्रधानमंत्री वाजपेयी ने उन्हें (यानी जसवंत सिंह को) आडवाणी को समझने और मान लेने के लिए भिजवाया. मैंने उन्हें सब बताया और पार्टी के वफादार और समर्पित नेता की तरह उनने सब मान लिया.

दस साल चुप रहने के बाद जसवंत सिंह अब कह रहे हैं कि आतंकवादियों को रिहा करने का फैसला तो कैबिनेट और प्रधानमंत्री वाजपेयी का था. लालकृष्ण आडवाणी तो उससे सहमत भी नहीं थे. उन्हें तो हमने मनाया. यानी कंधार से अपने विमान और यात्रियों को आतंकवादियों के बदले छुड़ाने के लिए लालकृष्ण आडवाणी नहीं – अटल बिहारी वाजपेयी जिम्मेदार थे. यानी कंधार के लिए भी लालकृष्ण आडवाणी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. वे एक महज एक असहमत गृह मंत्री थे जिन्हें प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल की इच्छा के सामने झुकना पड़ा. पार्टी का समर्पित और वफादार नेता क्या करता?

यानी पार्टी बता रही है कि लालकृष्ण आडवाणी बाबरी मसजिद के ध्वंस के लिए जिम्मेदार नहीं है. उनके लिए तो वह जीवन का सबसे दुखद दिन था. दस साल पहले एनडीए की सरकार में गृह मंत्री रहते हुए तीन दुर्दात आतंकवादियों की रिहाई हुई थी. विदेश मंत्री जसवंत सिंह खुद उन्हें विमान में अपने साथ कंधार ले कर गए थे. गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी नहीं. यानी मजबूत नेता सचमुच मजबूत हैं. जो संघ परिवारी मानते हैं कि वे नहीं नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री होना चाहिए उन्हें अरुण शौरी ने समझा दिया है कि अगले प्रधानमंत्री वही होंगे. अभी तो लालकृष्ण आडवाणी को बनाओ.

टेकों के बिना लालकृष्ण आडवाणी जैसा लौह पुरुष भी मजबूत नेता नहीं होता. यही राम नाम का सत्य है.  

मजबूर और निर्णायक

आडवाणी जब भी आतंकवाद को लेकर खुद के मबूत और विरोधियों के नरम होने की बात करते हैं तो कांग्रेस और सहयोगी कांधार के भूत को जीवित कर देते हैं. उलटवार ये होता है कि आज से एक दशक पहले जब आईसी 814 का अपहरण कर अफगानिस्तान के कांधार ले जाया गया था तब वाजपेयी सरकार ने तीन खूंख्वार आतंकियों को अपह्रत विमानयात्रियों के बदले छोड़ दिया था और लानत वाली बात ये है कि तब के विदेशमंत्री जसवंत सिंह खुद इन तीनों को अपने साथ लेकर कांधार गए थे.

आडवाणी ने अपनी किताब में ये श्रेय लिया है कि अपहर्ताओं से इतनी बढ़िया सौदेबाजी की गई कि वो 36 आतंकियों को रिहा कराने की मांग से नीचे आकर केवल 3 पर राजी हो गए

भाजपा कहती है कि ऐसा उसे डेढ़ सौ भारतीयों की जान बचाने के लिए करना पड़ा था. गुजरात के मुख्यमंत्री इसके लिए मीडिया को जिम्मेदार ठहराते हैं जिसने इतना दबाव बना दिया था कि सरकार कुछ और कर ही नहीं सकती थी. भाजपा के प्रवक्ता ये उलाहना देना भी नहीं भूलते कि जो इतने लोगों के लिए तीन आतंकियों को छोड़ने पर शोर मचाते हैं वो रूबिया सईद के बदले पांच आतंकियों को छोड़ने पर कुछ क्यों नहीं बोलते.

ये बात सही है कि किसी भी चुनी हुई सरकार द्वारा, दस साल पहले की परिस्थितियों में, अंतिम उपाय के तौर पर तीन आतंकियों को छोड़ के डेढ़ सौ नागरिकों की जान बचाना बिल्कुल गलत तो कतई ही नहीं होगा. मगर  इस विकल्पहीनता तक पहुंचने-पहुंचाने की जिम्मेदारी किस के सर है.

अपह्रत विमान करीब पौन घंटे तक अमृतसर हवाईअड्डे पर खड़ा रहा मगर हम न तो उसे निष्क्रिय कर पाए और न देश से बाहर जाने से ही रोक पाए. और तो और जिन यात्रियों की सुरक्षा के लिए आतंकियों को छोड़ा गया इस दौरान उनसे भी 25 ज्यादा – 25 महिलाओं और बच्चों को अपहर्ताओं ने यूएई में छोड़ दिया था- की जान जाते-जाते बची थी क्योंकि अमृतसर से उड़ान भरते समय समय विमान में लाहौर तक पहुंचने के लिए भी ईंधन नहीं था और वो वहां उतरते समय नष्ट होते-होते बचा था.

आडवाणी ने अपनी किताब में ये श्रेय लिया है कि अपहर्ताओं से इतनी बढ़िया सौदेबाजी की गई कि वो 36 आतंकियों को रिहा कराने की मांग से नीचे आकर केवल 3 पर राजी हो गए. मगर आतंकियों की शुरुआती मांग तो केवल मसूद अजहर को छोड़ने की थी. तो बाद में उनकी मांग बढ़ने और फिर घटने के बाद भी पहले से ज्यादा होने का श्रेय कौन लेगा? आडवाणी ने ये भी लिखा है कि जब विमान यूएई में था तो अमेरिकी राजदूत को तो हवाईअड्डे में जाने दिया गया मगर भारतीय को नहीं और अमेरिका ने भारत के इस अनुरोध पर ध्यान ही नहीं दिया कि वह यूएई में अपनी ताकत का इस्तेमाल कर किसी तरह विमान को न उड़ सकने की स्थिति में पहुंचा दे. तो इस कूटनीतिक विफलता का श्रेय किसके सर मढ़ा जाए?

विमान का अपहरण 24 दिसंबर को हुआ था और सरकार के मुताबिक प्रक्रियागत समस्याओं के चलते, जिनपर भारत का कोई जोर नहीं था, पहला बातचीत और राहत दल कांधार 27 दिसंबर को यानी करीब 60 घंटे बाद पहुंचा. अब सरकार की ऐसी असहायता को क्या कहा जाए?

रहा सवाल मीडिया का तो अगर शुरू से ही कोई सरकार लड़खड़ाती दिखाई दे और मसला 8 दिन लंबा खिंच जाने पर भी यदि देश और मीडिया कुछ न कहें, तो उस देश का चरित्र कुछ और तो होगा, लोकतांत्रिक नहीं.

संजय दुबे  

क्या सबसे पचनीय?

चक्र सुदर्शन

काजू ताजा नारियल, किशमिश और बदाम,

रोट बने अखरोट के, लीची ललित ललाम,

लीची ललित ललाम बताओ क्या-क्या खाएं?

व्यंजन जो पच जायं, हमें तत्काल बताएं!

चक्र सुदर्शन, किस व्यंजन में कितना बूता

सबसे जल्दी पचता, पत्रकार का जूता.

                                                   अशोक चक्रधर

इस वर्ग की अन्य रचनायें

विरासत की सियासत

फ्रांसीसी लेखक आंद्रे मलरॉक्स ने एक बार जवाहर लाल नेहरू से पूछा था कि भारत की आजादी के बाद उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या रही है. नेहरू का जवाब था, ‘न्यायसंगत तरीकों से एक न्यायसंगत समाज का निर्माण.’ फिर आगे जोड़ते हुए वे बोले थे, ‘शायद, एक धार्मिक देश के भीतर एक धर्मनिरपेक्ष देश का निर्माण भी.’विडंबना देखिए कि उन्हीं नेहरू के एक प्रपौत्र ने साबित कर दिया है कि भले ही इस बात को लगभग आधी सदी बीतने को आई हो पर आज भी इन दोनों चुनौतियों की दुरूहता उसी तरह कायम है.

नेहरू के प्रपौत्र, इंदिरा गांधी के पोते और संजय गांधी के पुत्र वरुण के लिए ये सोचना हमेशा से स्वाभाविक ही रहा होगा कि उनकी नियति औरों से खास है

गुमनामी के अंधेरों से जूझ रहे 29 साल के वरुण गांधी पिछले महीने अचानक कुख्याति की रोशनी से सराबोर हो गए. मार्च के मध्य में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक चुनावी सभा में दिए गए उनके भाषण के कुछ अंश टीवी चैनलों पर क्या आए पूरा देश स्तब्ध रह गया. काला कुरता पहने और लाल टीका लगाए वरुण मुस्लिम समुदाय के खिलाफ जहर उगलते दिख रहे थे.

देश में राजनीति का स्तर गिरता जा रहा है इसके उदाहरण वैसे तो अब अक्सर देखने को मिलने लगे हैं मगर ये एक नई गिरावट थी. शायद कोई और होता तो उसकी ऐसी बातों से इतना भूचाल खड़ा नहीं होता मगर ऐसा वह शख्स कह रहा था जिसके नाम के आगे गांधी लगा था. हर किसी को हैरत थी कि आखिर वरुण को क्या हो गया? आखिर क्यों वे अपने परिवार की विरासत को धोखा देने पर उतर आए?

कुछ दिलचस्प सवाल और भी हैं. मसलन जिस पारिवारिक विरासत को धोखा देने के लिए वरुण की आलोचना हो रही है क्या वह विरासत उनके पास कभी रही भी? और कहीं इसकी अनुपस्थिति ने ही तो वरुण को इस रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित नहीं किया?

नेहरू के प्रपौत्र, इंदिरा गांधी के पोते और संजय गांधी के पुत्र वरुण के लिए ये सोचना हमेशा से स्वाभाविक ही रहा होगा कि उनकी नियति औरों से खास है, वे भी इतिहास का एक पन्ना हैं जिसे कभी पलटा जाएगा. आखिर सारी दुनिया मानती थी कि इंदिरा गांधी की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाले संजय गांधी ही होंगे जिनमें अपनी मां की छाप है. वरुण के ताऊ राजीव की तो राजनीति में कोई दिलचस्पी ही नहीं थी.

मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था. वरुण चार महीने के थे जब उनके पिता संजय गांधी की एक हवाई दुर्घटना में मौत हो गई. उनकी मां मेनका गांधी ने जब अपनी सास और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से खटपट होने के बाद घर छोड़ा तो बुखार से तप रहे वरुण की उम्र महज दो साल थी. तब से अपने पैतृक परिवार से कटा हुआ ये भाई अब चोट खाए कर्ण की तरह भीतर ही भीतर सुलग रहा है.

प्रधानमंत्री आवास से बाहर आने या जैसा कि कुछ लोग कहते हैं, धकियाए जाने के बाद मेनका पहले गोल्फ क्लब रोड, फिर जोरबाग, उसके बाद महारानी बाग और आखिर में उस फ्लैट में रहीं जो संजय गांधी ने उनके लिए खरीदा था. 27 साल की एक महिला, जिसकी गोद में दो साल का बच्चा हो, के लिए ये काफी बुरा समय था. पति के परिवार से बिछड़ने के बाद उन्होंने भावनात्मक सहारे के लिए अपने परिवार से फिर से संपर्क साधा. मगर यहां भी हालात अच्छे नहीं थे. जैसा कि उनके एक करीबी मित्र याद करते हैं, ‘उनका परिवार हमेशा बिखरने के कगार पर लगता था, वहां हमेशा कुछ न कुछ होता ही रहता था.’ मेनका के पिता का शव एक दिन संदिग्ध परिस्थितियों में खेत में पड़ा मिला था. ये गोलियों से छलनी था. फिर एक दिन उनका भाई गायब हो गया और कभी नहीं लौटा. मेनका की मां अमतेश्वर आनंद पशुपालन के क्षेत्र में योगदान के लिए मशहूर सर दत्तार सिंह की चार संतानों में एक थीं. भाई-बहनों में संपत्ति को लेकर तीखा विवाद हुआ जो अगली पीढ़ी तक भी चलता रहा. कहा जा सकता है कि पारिवारिक दरारें भी वरुण गांधी की जिंदगी का एक पहलू रही हैं.

2004 में जब वरुण भारत आए थे तो कहा जाता है कि ब्रिटिश एयरवेज की उस फ्लाइट में उनके साथ राहुल भी थे. दोनों भाई 10 जनपथ पहुंचे थे और उन्होंने रात साथ ही बिताई थी

बचपन से वरुण को जानने वाले सभी लोग उन्हें एक शांतचित्त और एकांतप्रिय बालक के तौर पर याद करते हैं जो लोगों से मिलने-जुलने से ज्यादा किताबों में दिलचस्पी रखता था. उनकी पढ़ाई के शुरुआती कुछ साल आंध्र प्रदेश स्थित ऋषि वैली बोर्डिंग स्कूल में गुजरे. बताया जाता है कि आठवीं क्लास में वरुण को उनके किसी गैरजिम्मेदाराना बर्ताव के कारण स्कूल छोड़ने के लिए कह दिया गया था. हालांकि दिल्ली स्थित ब्रिटिश स्कूल की पूर्व प्रधानाचार्य श्रीमती प्रभु याद करती हैं कि वरुण जितने समय तक उनके स्कूल में रहे उनसे किसी को कोई परेशानी नहीं हुई. प्रभु के शब्दों में, ‘वह बुद्धिमान था और क्लास में सबसे अलग लगता था. दिखता था कि उसमें नेतृत्व की क्षमता है क्योंकि वह हमेशा अपने विचारों को बेहद दिलचस्प तरीके से सामने रखता था.’

स्कूली पढ़ाई खत्म होने के बाद वरुण कुछ साल के लिए इंग्लैंड चले गए. वापस आने तक उनमें काफी बदलाव आ चुके थे. इतिहास में उनकी गहरी दिलचस्पी पैदा हो गई थी, वे साधारण कविताओं की एक किताब द अदर साइड ऑफ साइलेंस लिख चुके थे, लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स और द स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज (एसओएएस), यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से उन्हें मास्टर डिग्री मिल चुकी थी. हालांकि बाद में पता चला कि ये दोनों बातें झूठी थीं. वरुण ने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में फुल टाइम कोर्स के लिए दाखिला ही नहीं लिया था और एसओएस में एम (फिल) कोर्स से भी उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया था.

तो फिर ये एकांतप्रिय पाठक, पीलीभीत में नफरत उगलने वाले नेता में कैसे तब्दील हो गया?

जवाब है अपनी शक्तिशाली विरासत को खोने का बोध. नेहरू-इंदिरा की राजनीतिक विरासत के असली दावेदार संजय गांधी के पुत्र वरुण तो अपनी साधारण युवावस्था जी रहे थे और उधर, अनिच्छा से ये विरासत संभालने वाले राजीव गांधी के बच्चों राहुल और प्रियंका की जिंदगी हर मायने में असाधारण थी, है. राहुल और प्रियंका पर हर तरफ से राजनीति में आने का दबाव बन रहा था. इससे उपजा नुकसान का बोध वरुण की सोच को चलाने वाला कारक बन गया.

इस कहानी का एक मर्मस्पर्शी पहलू ये भी है कि चचेरे भाई-बहन हमेशा एक-दूसरे से कटे नहीं रहे. 2004 में जब वरुण भारत आए थे तो कहा जाता है कि ब्रिटिश एयरवेज की उस फ्लाइट में उनके साथ राहुल भी थे. दोनों भाई 10 जनपथ पहुंचे थे और उन्होंने रात साथ ही बिताई थी. जैसाकि उनके एक करीबी दोस्त कहते हैं, ‘उनके दरवाजे वरुण के लिए कभी बंद नहीं थे. प्रियंका की शादी में उनके सबसे नजदीक वरुण ही खड़े थे. बाद में उन्हें सुल्तानपुर से चुनाव लड़ने की पेशकश की गई. मगर वरुण को लगा कि वे अपनी मां की पीठ में छुरा नहीं भोंक सकते जिनकी जिंदगी तमाम मुश्किलों से भरी रही थी. उन्होंने हमसे कहा कि मैं राजनीति को मां से ज्यादा तरजीह नहीं दे सकता. मुझे उनके साथ ही जाना होगा.’मगर इससे उनके लिए स्थिति बड़ी अजीब हो गई. अब उनके पास परिवार की विरासत नहीं थी और इसके बिना वे रह नहीं सकते थे. विकल्पहीनता की स्थिति में वे भाजपा में चले गए. इसलिए नहीं कि भाजपा में उनका विश्वास था बल्कि इसलिए कि उन्हें जल्दी से जल्दी कोई फैसला करना था.

इस सूत्र के मुताबिक वरुण मानते हैं कि नेहरू एक कमजोर व्यक्ति थे और उनके मुताबिक भारत के इतिहास में काम करने वाले दो ही लोग थे-उनके पिता और उनकी दादी

समझने वाली अहम बात ये है कि पीलीभीत में वरुण ने जो किया वह अपनी विरासत को धोखा देने जैसा नहीं था. बल्कि ये तो उस विरासत को फिर से हासिल करने की दिशा में उठाया गया पहला कदम था. दरअसल वरुण, नेहरू नहीं बल्कि सही मायनों में संजय गांधी के वारिस हैं. वे खुद भी ऐसा ही मानते हैं. वरुण नेहरू-गांधी परिवार की चकाचौंध से नहीं बल्कि अंधेरी छाया से आते हैं. उनके पास अपनी दादी जैसी परिपक्व और अपने पिता जैसी असैंवधानिक बुद्धि है. इतिहास की सबसे प्रखर हस्तियों में से एक के पोते संजय गांधी गुंडों की तरह जोर जबर्दस्ती पर उतर आते थे क्योंकि औचित्य के लिए उनके मन में कोई सम्मान ही नहीं था. वरुण भी इसी विरासत का हिस्सा लगते हैं. राजनीतिक लाभ के लिए इस देश में असल मुद्दों पर काम करने की बजाय लोगों की भावनाएं भड़काना अक्सर ज्यादा आकर्षक विकल्प लगता है और वरुण आसानी से इस लालच के आगे घुटने टेक देने वाले लगते हैं.

कई साल से मेनका और वरुण के करीबी रहे प्रीतिश नंदी इसकी पुष्टि करते हैं, ‘वरुण अपने पिता की तरह हैं. भावावेश में काम करने वाले और अधीर, वे एक अहम भूमिका अदा करना चाहते हैं. वे कोई कामयाबी हासिल करना चाहते हैं. मैं ये मानना पसंद करूंगा कि ये एक अल्पकालिक और सोचीसमझी पैंतरेबाजी थी’

विवादित भाषण के सुर्खियों में आने के बाद तहलका ने वरुण के बेहद करीबी एक सूत्र से बात की. बातचीत में वरुण के व्यक्तित्व की कुछ दिलचस्प बारीकियों के बारे में पता चला. ‘कृपया इसे वरुण के कायांतरण जैसा मत लिखियेगा’ सूत्र का कहना था, ‘वरुण को इस बात की समझ है कि वे क्या कर रहे हैं. वे अपने पिता की तरह बनना चाहते हैं. हमारे देश में जो समस्याएं हैं जरूरी नहीं कि उनके समाधान जटिल ही हों. लोग कहते हैं कि संजय ज्यादा ही सख्तमिजाज थे मगर उनके जैसी छवि राजीव कभी हासिल नहीं कर पाए. लोग कहते हैं कि अगर संजय आज होता तो देश का ये हाल नहीं होता. हर मनुष्य अपने अंदर के राक्षसों से लड़ता है. वरुण भी उन से लड़ रहे हैं जिनसे कभी उनके पिता लड़े थे–क्या उन्हें राजनीतिक रुप से सही दिखकर बेअसर हो जाना चाहिए या फिर सच बोलने और आलोचना झेलने की हिम्मत दिखानी चाहिए और काम हो ऐसा सुनिश्चित करना चाहिए?’

इस सूत्र के मुताबिक वरुण मानते हैं कि नेहरू एक कमजोर व्यक्ति थे और उनके मुताबिक भारत के इतिहास में काम करने वाले दो ही लोग थे-उनके पिता और उनकी दादी. वरुण को लगता है कि नैतिक आदर्शवाद का वक्त अब खत्म हो चुका है. नैतिकता के साथ अब ताकत के डर को भी जोड़ा जाना चाहिए. सूत्र के शब्दों में ‘वरुण हिंसा के खिलाफ हैं, क्या आपको लगता है कि वरुण किसी के खिलाफ सेना लेकर चढ़ बैठेंगे? पीलीभीत में उनका भाषण सिर्फ एक तरह का चेतावनी संदेश था. महात्मा गांधी ने अपनी ताकत का इस्तेमाल कर सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस से बाहर करवा दिया. तो क्या वह एक तरह की नैतिक बदमाशी नहीं थी? दुनिया बदल चुकी है, हम डरे हुए लोग बन चुके हैं. वरुण इस डर को आवाज देना चाहते थे, इसे शांत करना चाहते थे. लोगों को संविधान पढ़ाने से वे शांत नहीं होने वाले. वरुण अपनी उम्र के शक्तिहीन नेताओं की तरह नहीं बनना चाहते जिनका जनता पर कोई असर नहीं है. उनके चचेरे भाई राहुल की उत्तर प्रदेश में क्या उपलब्धि है? अरुंधती राय और मेधा पाटकर ने क्या हासिल कर लिया है? वरुण को इस बात का गर्व है कि वे अकेले ऐसे युवा नेता हैं जिसने राष्ट्रीय स्तर पर एक बहस छेड़ दी है.’

वैसे 2004 में जब वरुण भारत वापस आए थे तो शुरुआत में उनमें नेहरू के विचारों की झलक दिखी थी. मालेगांव में भाजपा की एक चुनावी रैली में उन्होंने आम नेताओं की तरह सरकार की खिंचाई करने से इनकार कर दिया था. उनके शब्द थे, ‘बहुत से लोगों ने मुझसे ये बोलने के लिए कहा है कि इस सरकार (कांग्रेस-एनसीपी) ने कोई काम नहीं किया. मगर मैं ऐसा नहीं करूंगा. आरोपों और प्रत्यारोपों से किसी का भला नहीं होता. सिर्फ जनता का नुकसान ही होता है. मैं दूसरी तरह की राजनीति का सूत्रपात करना चाहता हूं.’

हालांकि वरुण के भाषण की निंदा करने वाले हिंदुओं की कमी नहीं थी मगर साफ नजर आ रहा था कि हवा में बदलाव की आहट है और इस बार पीलीभीत में वोट हिंदू-मुसलमान के आधार पर पड़ने वाले हैं

तो सवाल उठता है कि इतने भले विचार अचानक बदल कैसे गए?

वरुण के करीबी इस सूत्र का कहना है, ‘शहरों में सारी सुविधाओं से संपन्न अपने घरों में बैठकर दूसरों को खलनायक कहना आसान है. दिल्ली से 50 किलोमीटर दूर जाइए और आपको एक दूसरी ही हकीकत के दर्शन होंगे. इस हकीकत से निपटने के लिए आपको एक दूसरी जबान की जरूरत होती है.’

ऐसा लगता है कि वरुण में ये बदलाव उत्तर प्रदेश में राजनीति की जमीनी हकीकतों से वाकिफ होने के बाद आए. सूत्र के शब्दों में ‘वहां पर अगर कुछ हकीकत है तो वोहै धर्म, जाति और गुंडागर्दी. उदाहरण के लिए मुलायम सिंह की समूची राजनीति पुलिस तंत्र के प्रबंधन से चलती है. शहरों की सुविधाओं में जीकर देश की एक सुखद तस्वीर देखना और दिखाना आसान है.’ कहा जाता है कि दुविधा की स्थिति में लिए गए फैसलों से किसी इंसान की सही पहचान होती है. भाजपा के भीतर वरुण हमेशा एक अनिश्चितता की स्थिति में रहे हैं. हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी और कुछ हद तक लालकृष्ण आडवाणी भी उनके शुभचिंतक रहे हैं मगर पार्टी के दूसरे लोगों को वे जरा भी पसंद नहीं. नरेंद्र मोदी के करीबी भाजपा के एक अंदरुनी सूत्र के शब्दों में, ‘वे बस तीन दिन का टीवी तमाशा हैं. वे स्वभाव से ही झूठे हैं और उन्हें तो भाजपा की विचारधारा तक में विश्वास नहीं है. उनकी तुलना तो योगी आदित्यनाथ से भी नहीं हो सकती. आप देखिएगा कल किसी शहरी क्षेत्र में भाषण देते हुए उनका लहजा बदल जाएगा.’

बात सही है. जब वरुण को मध्य प्रदेश में मुस्लिम बहुल सीट विदिशा से संभावित उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा चल रही थी तो उन्होंने अपने शुरुआती नाम फीरोज पर जोर देना शुरू कर दिया था. हालांकि फिर आखिरी वक्त पर उन्हें टिकट न दिए जाने का फैसला हुआ. बीते वर्षों के दौरान कई बार उन्हें राष्ट्रीय सचिव और पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई का अध्यक्ष पद देने की पेशकश की गई मगर हर बार पार्टी के भीतर मौजूद दूसरी पांत ने ऐसा नहीं होने दिया. साफ है कि वरुण बड़ा खेल खेलने के लिए अधीर हो रहे थे.

वरुण की कहानी में कई दिलचस्प मोड़ हैं. चार बार उनकी मां को लोकसभा भेज चुके पीलीभीत संसदीय क्षेत्र से जब उनके खड़े होने की बारी आई तो परिसीमन के चलते वहां के चुनावी समीकरण उनके खिलाफ हो गए. पोवाया, जहां के अधिकांश वोट परंपरागत रूप से उन्हें मिलते रहे हैं शाहजहांपुर संसदीय क्षेत्र में चला गया तो हिंदुओं और मुसलमानों की मिली-जुली आबादी वाला बहेरी पीलीभीत से जुड़ गया. उनके लिए चिंता का एक और कारण था. स्थानीय आबादी का सिर्फ 30 फीसदी हिस्सा मुस्लिम होने के बावजूद पिछले विधानसभा चुनावों में इस इलाके की पांच में तीन सीटें मुस्लिम उम्मीदवारों की झोली में गई थी. शायद यही वजह थी कि वरुण को अचानक लगने लगा कि पीलीभीत से सांसद बनना आसान नहीं है.

वरुण को चुनौती देने वाले मुख्य रूप से तीन उम्मीदवार हैं. सपा के रियाज अहमद, बसपा के बुद्ध सेन वर्मा और कांग्रेस के वीएम सिंह. विडंबना देखिए कि वीएम सिंह, रिश्ते में उनके मामा लगते हैं. अकूत संपत्ति के मालिक सिंह पीलीभीत में सबसे पहले मेनका के सहायक के तौर पर आए थे. मगर संपत्ति विवाद, मेनका के तथाकथित भ्रष्टाचार और उनके व्यवहार के चलते वे उनसे अलग हो गए. सिंह के मुताबिक मेनका से किनारा करने के बारे में उन्होंने तब सोचना शुरू किया जब उन्हें ये अहसास हुआ कि मेनका ने स्थानीय विकास के लिए मिलने वाले एमपी फंड में से काफी कमीशन खाया है. हालांकि वे फिर भी काफी समय तक अपनी बहन के साथ खड़े रहे. पर जब बाद में मेनका सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्री बन गईं और कुछ समय बाद उन पर मौलाना आजाद एजुकेशनल फाउंडेशन में से 50 लाख रुपए निकालकर अपनी बहन अंबिका शुक्ला द्वारा चलाए जा रहे एक एनजीओ को देने के आरोप पर सीबीआई जांच शुरू हो गई तो सिंह का धैर्य जवाब दे गया. सिंह का इस इलाके में काफी सम्मान है. गन्ना किसानों को बेहतर कीमत दिलाने की मांग को लेकर वे सुप्रीम कोर्ट तक गए हैं. उन्होंने चर्चित केशवपुर बलात्कार मामले, जिसमें पुलिसकर्मियों ने दो नाबालिग सिख लड़कियों का रात भर बलात्कार किया था, में दखल देकर इस मामले को दिल्ली स्थानांतरित करवाया. अर्धसैनिक बलों की एक बटालियन के लिए जमीन के अवैध अधिग्रहण के खिलाफ भी सिंह किसानों के साथ खड़े रहे हैं.

इन तीन उम्मीदवारों और भारत में होने वाले हर चुनाव की स्वाभाविक जटिलताओं के चलते वरुण को अहसास हो गया कि 13 लाख वोटरों की आबादी वाले इस इलाके के साढ़े आठ लाख हिंदू वोट बिखरे हुए हैं. उन्होंने फैसला किया कि ऐसे में सिर्फ यही एक रणनीति बचती है कि हिंदुओं का जाति की बजाय धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण कर दिया जाए. हालांकि वरुण इससे साफ इनकार करते हैं. वे ये भी नहीं मानते कि अपने भाषण में इस तरह की बातें कहकर उन्होंने कोई गलत काम किया है. वे कहते हैं, ‘मेरी मां के कार्यकाल में इस क्षेत्र में एक भी सांप्रदायिक घटना नहीं हुई. मेरे भाषण के बाद भी कोई सांप्रदायिक तनाव नहीं फैला. तो फिर आप कैसे कह सकती हैं कि मैं हिंसा भड़का रहा था.’

बरेली से 50 किलोमीटर दूर स्थित पीलीभीत शांत और उपजाऊ इलाका है. वरुण गांधी के गिरफ्तार होने से पहले जब हम धूल और गड्ढों से भरी यहां की सड़कों से गुजरे तो दो चीजों ने हमें चौंकाया. पहली ये कि 18 साल से मेनका गांधी को चुनकर संसद में भेजने के बावजूद पीलीभीत में विकास के कोई चिन्ह नजर भले ही न आते हों मगर गांधी नाम का आकर्षण अब भी यहां बरकरार है. दूसरी ये कि पीलीभीत सांप्रदायिक सौहार्द से भरी जगह है. चंदोई, भिखारीपुर, कूरी, नकुल, बारखेड़ा. कितने ही गांवों से हम गुजरे और हमने पाया कि हिंदू और मुसलमान यहां भाईचारे और मेलजोल के साथ रहते हैं. काफी पूछने पर भी कभी-कभार होने वाली छिटपुट घटनाओं के सिवाय सांप्रदायिक तनाव की कोई बड़ी घटना के बारे में पता नहीं चलता. जिस एक घटना में थोड़ा-बहुत दम लगता है वह बिसालपुर से बसपा विधायक अनीस अहमद से संबंधित है. कहा जाता है कि अनीस के लोगों ने कुछ महीने पहले एक मेले में रुपयों के लेन-देन को लेकर सोनू नाम के एक चाटवाले की हत्या कर दी. जब भाजपा नेता राम सरन वर्मा ने इस मुद्दे को उठाने की कोशिश की तो मायावती सरकार ने उन पर रासुका लगाकर उन्हें जेल भेज दिया. वे अब भी जेल में हैं. अगर वरुण इस घटना को चुनावी मुद्दा बनाते तो उन्हें सही कहा जा सकता था मगर फिर भी क्या इससे पूरे समुदाय के खिलाफ उनके जुबानी आक्रोश को न्यायोचित ठहराया जा सकता है.

वरुण की शैतानी राह और इसके असर को उस माहौल से अच्छी तरह से समझा जा सकता है जो 29 मार्च, 2009 को पीलीभीत में था. अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद वरुण के अदालत में आत्मसमर्पण करने की खबर क्या आई आमतौर पर शांत रहने वाला पीलीभीत ध्रुवीकरण से तपते एक चुनावी क्षेत्र में तब्दील हो गया. अदालत के सामने वाली गली दस हजार से भी ज्यादा लोगों की भीड़ से खचाखच भर गई. जय श्रीराम, ये वरुण गांधी नहीं आंधी है, जो हमसे टकराएगा चूर चूर हो जाएगा, जैसे नारे गूंजने लगे. हर तरफ भगवा झंडे नजर आ रहे थे. हालांकि भाजपा के झंडे गायब थे जिसका मतलब ये था कि वरुण पर अपने नजरिए को लेकर पार्टी अभी असमंजस की स्थिति में थी.

पुलिस भीड़ पर काबू पाने की कोशिश कर ही रही थी कि तभी बालीवुड की किसी फिल्म के दृश्य की तरह हरे रंग की एक कार आकर रुकी और इसकी छत से लाल कुर्ता पहने और लंबा लाल तिलक लगाए वरुण प्रकट हुए. लोगों का अभिवादन करते हुए उनके चेहरे पर किसी विजेता जैसे भाव नजर आ रहे थे. उन्हें देखकर भीड़ बेकाबू होने लगी. अदालत पहुंचकर वरुण कार से बाहर निकले और धक्कामुक्की के बीच शांत भाव से भीतर दाखिल हो गए. उधर, पुलिस भीड़ को बाहर रोके रखने के लिए संघर्ष कर रही थी.

एक घंटे बाद चीखते-चिल्लाते समर्थकों के हंगामे के बीच वरुण को जेल भेज दिया गया. धर्म के आधार पर लोगों में दुश्मनी भड़काने के के लिए उन पर भारतीय दंड संहिता की धाराएं 295(ए), 505(दो), 153(ए) और 188 लगाई गई थी जिनके तहत आरोपी शख्स की जमानत नहीं हो सकती. जब वरुण को जेल ले जाया जा रहा था तो हंगामा और भी तेज हो गया. उनके समर्थकों ने जेल में घुसने की कोशिश की. हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस ने गोलियां चलाईं जिसमें 25 लोग बुरी तरह घायल हो गए. बाद में मीडिया से बात करते हुए मेनका ने एक घातक हथियार चलाया. उन्होंने कहा कि भीड़ पर गोली चलाने की शुरुआत एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी परवेज असलम ने की.

पीलीभीत के गांव-गांव में इस घटना की चर्चा फैल गई. हालांकि वरुण के भाषण की निंदा करने वाले हिंदुओं की कमी नहीं थी मगर साफ नजर आ रहा था कि हवा में बदलाव की आहट है और इस बार पीलीभीत में वोट हिंदू-मुसलमान के आधार पर पड़ने वाले हैं. नकुल गांव के एक किसान हर प्रसाद कहते हैं, ‘वरुण जनता के साथ हैं इसलिए जनता उनके साथ है.’ गौर करने वाली बात ये है कि ये वह इलाका है जिसने पिछले विधानसभा चुनाव में सपा के मुस्लिम प्रत्याशी को वोट देकर जिताया था. ‘आज से पहले कोई नहीं जानता था कि पीलीभीत पीली है या काली. वरुण गांधी ने इसे चर्चा में ला दिया है. क्यों शब्बीर भाई?’, चंदोई गांव में मिठाई की दुकान चलाने वाले राजकुमार अपनी दुकान में काम करने वाले एक कारीगर से कहते हैं. जिस सहजता से वे शब्बीर से ये बात कहते हैं उससे इस इलाके के दोनों समुदायों के आपसी मेलजोल की झलक भी मिल जाती है. बारखेड़ा में साइकिल रिपेयर की दुकान चलाने वाले दंबार सिंह से हम पूछते हैं कि क्या कभी भी उन्हें अपने मुसलमान पड़ोसी से डर लगा है. जवाब आता है, ‘नहीं, मगर वरुण गांधी ने उस भावना को जुबान दी है जो हम दिल में महसूस करते हैं.’

इससे पहले ये संवाददाता एक दीवार फांदकर अदालत परिसर में घुसने में कामयाब हो गई थी. वरुण के इर्दगिर्द मच रहे हंगामे के बीच अचानक मुझे उनसे बातचीत का मौका मिला. वरुण एक कुर्सी पर बैठे थे.

‘क्या आप इस सबसे अभिभूत हैं?’, मैंने पूछा

‘हां, थोड़ा सा, उन्होंने कहा, मैं बिल्कुल अलग माहौल में पला-बढ़ा हूं.’

‘जो कुछ हुआ है अगर आप उसे पूरी तरह बदल सकते तो क्या ऐसा करते?’

‘अगर मैं ऐसा कर सकता तो जरूर. मैं नहीं चाहता कि देश के 25 करोड़ लोग ये सोचें कि मेरी राजनीति का आधार उनका विरोध करना या उनमें डर पैदा करना है. मैं सांप्रदायिक नहीं हूं.’

‘तो आपने मीडिया को दिए अपने बयानों में ये बात क्यों नहीं कही?’, मैं पूछती हूं.

‘किसी ने मुझसे ये सवाल पूछा ही नहीं.’

पर अगली ही बात से विरोधाभास झलकता है, ‘मैं उन बातों पर कायम हूं जो मैंने अपने भाषण में कहीं थीं, मगर मैं एक स्थानीय स्थिति पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहा था. मेरे विचार एक समुदाय के लिए नहीं थे.’साफ लगता है कि उनके भीतर मौजूद संजय गांधी और नेहरू के हिस्से आपस में टकरा रहे हैं.

मैं पूछती हूं, ‘आपने बहुत गलत भाषा का इस्तेमाल किया और लगता है कि आप इस विवाद से खुश हैं.’

जवाब आता है, ‘आठ दिन से मैं घर से बाहर नहीं निकला हूं. मैं हर दूसरे चैनल पर इंटरव्यू देता नजर नहीं आ रहा हूं. क्या इससे आपको लगता है कि मैं इस विवाद से खुश हूं. मुझे इस सबसे गहरा दुख पहुंचा है.’

मगर आपने मजरूल्ला और करीमुल्ला का नाम लेकर जो बातें कहीं उनका क्या?

‘मेरा आशय दो खास मुस्लिम नेताओं से था. पूरे समुदाय से नहीं, पूरनपुर और अमरैया से ताल्लुक रखने वाले दो भाई’, बिना पलक झपकाए वे जवाब देते हैं.

मगर पता चल जाता है कि वरुण लोगों को भरमाने में माहिर हैं. दरअसल ऐसे किन्हीं भाइयों का कोई अस्तित्व है ही नहीं. संजय और नेहरू के बीच के अंर्तद्वंद में जीत संजय की हुई. आकस्मिकता जीत गई. बाहर भीड़ उनके नाम का नारा लगा रही है. विरासत की दौड़ का उनका पहला फेरा शुरू हो गया है.

पीलीभीत की उस सुबह के बाद से वरुण जेल में हैं. उत्तर प्रदेश की सरकार ने उन पर रासुका लगा दिया है जिसे उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. अफवाहें हैं कि छोटा शकील उनकी हत्या करवाना चाहता है. हर गुजरते दिन के साथ वे पहले से ज्यादा कुख्यात होते जा रहे हैं और हिंदुत्व के हीरो के रूप में उनका कद बढ़ रहा है. अवसरवादिता में माहिर भाजपा भले ही उनके विवादित भाषण से खुद को अलग कर रही हो मगर समर्थन के मामले में वो पूरी तरह से उनके साथ ही. जेल से बाहर आने के बाद वरुण की योजना उत्तर प्रदेश के हर जिले में 100 स्वयंसेवकों का एक दल बनाने की है ताकि वे अपने विचारों का प्रसार कर सकें. उधर, उनके चचेरे भाई राहुल पुनरुत्थान के एक ऐसे ही अभियान पर हैं मगर उनका मकसद ज्यादा धर्मनिरपेक्ष है.

फ्रांसीसी लेखक आंद्रे मलरॉक्स ने एक बार जवाहर लाल नेहरू से पूछा था कि भारत की आजादी के बाद उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या रही है. नेहरू का जवाब था, ‘एक धार्मिक देश के भीतर धर्मनिरपेक्ष देश का निर्माण.’ साठ साल बाद उनके दो पड़पोते इस बहस को जारी रखे हुए हैं.  

‘आवारा मसीहा’ के संत लेखक का प्रस्थान

11 अप्रैल 2009 के पूर्वाह्न् में, दिल्ली से जब डॉ रमेश सक्सेना ने मुझे हिंदी के वरिष्ठतम साहित्यकार और आखिरी बड़े गांधीवादी लेखक विष्णु प्रभाकर के पिछली रात निधन की दुखद सूचना दी तो मैं बीकानेर में था. इस सूचना से मैं स्तब्ध ही नहीं था बल्कि दिल्ली से दूर होने के कारण उन्हें श्रंद्धांजलि न दे पाने के अपराध-बोध से ग्रस्त भी हुआ. पुरानी स्मृतियां पंख लगाकर उड़ने लगीं और बीकानेर जंक्शन से सटे डाक बंगले के अपने एकांत कमरे में मैं स्मृतियों में डूबा मोहन सिंह पैलेस कॉफी हाउस पहुंच गया. इस कॉफी हाउस में दिल्ली के लेखक प्राय: शनिवार को मिलते थे. और कोई आए या न आए विष्णु जी निश्चित रूप से जब तक वे समर्थ थे, जरूर आया करते थे. वे कॉफी हाउस में हिंदी लेखकों के सिरमौर थे. हम लोग कॉफी पीते हुए मजाक में विष्णु जी से कहते थे कि आप कॉफी हाउस विश्वविद्यालय के कुलपति हैं और हम लोग आपके छात्र. इस टिप्पणी पर विष्णु जी मुस्कुराते हुए अपनी गांधी टोपी ठीक करते थे. पंकज बिष्ट हमसे सहमति जताते कॉफी का आर्डर देते थे. भीष्म साहनी इस लीला को देखते हुए मुस्कुराते थे.

अकारण नहीं है कि बांग्ला के प्रसिद्ध साहित्यकार सुनील गंगोपाध्याय भी मानते हैं कि उन्होंने बांग्लाभाषी समाज को शरत् चंद्र से परिचित कराया

विष्णु जी के लेखन से पहले मेरा परिचय हुआ, बाद में कॉफी हाउस में उनसे व्यक्तिगत परिचय. मई 1960 में भैरव प्रसाद गुप्त के संपादन में ‘नई कहानियां’ का प्रकाशन शुरू हुआ था जिसमें डॉ नामवर सिंह कहानी पर नियमित ‘हाशिए पर’ स्तंभ लिखा करते थे. इसी पत्रिका में उन्होंने विष्णु प्रभाकर की कहानी ‘धरती अब घूम रही है’ पर टिप्पणी की थी. उनकी टिप्पणी से ही आकर्षित होकर पहली बार मैंने विष्णु जी की यह कहानी पढ़ी थी. 1974 में राजपाल एंड संस, दिल्ली से उनके द्वारा लिखित अमर कथा शिल्पी शरत् चंद्र चटर्जी का संपूर्ण जीवन चरित्र ‘आवारा मसीहा’ शीर्षक से छपा था. चूंकि 14 वर्षो के अथक परिश्रम से उन्होंने यह जीवनी लिखी थी, इसकी चर्चा तो होनी ही थी. कॉफी हाउस के उनके फैन का अनुमान था कि उनकी इस कालजयी कृति पर उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिलना चाहिए. लेकिन हुआ उल्टा. 1975 में साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ को. इस पुरस्कार से विचलित कॉफी हाउस के लेखकों ने विष्णु प्रभाकर की कृति ‘आवारा मसीहा’ को पाब्लो नेरूदा पुरस्कार से नवाजा. चिली के कवि पाब्लो नेरूदा को उनके कविता संग्रह पर 1971 में नोबेल पुरस्कार मिला था और हिंदी समाज में वे समादृत थे. यह कॉफी हाउस के लेखकों का एक बड़ा प्रतिरोध था.

लेकिन साहित्य अकादमी, दिल्ली ने अपनी ‘भूल-गलती’ का सुधार करते हुए उन्हें पुरस्कृत किया उनके उपन्यास ‘अर्धनारीश्वर’ पर, 1993 में. फिर भी हिंदी-समाज में ‘आवारा मसीहा’ को ओझल करने की कचोट बनी रही. विष्णु जी नियमित पहले की तरह ही अनुमानत: 2003 तक कॉफी हाउस आते रहे और हिंदी लेखकों को दीक्षित करते रहे अपने सौम्य आचरण, संवाद और आत्मीयता से. इसी कॉफी हाउस में उन पर कई वृत्तचित्र बनाए गए.

21 जून 1978 को मैं बिहार से एक विभागीय काम के सिलसिले में दिल्ली आया था. मेरे साथ एक नवोदित कवि सुधांशु त्रिवेदी भी थे. उनके साथ मैं कॉफी हाउस गया जहां उन्होंने विष्णु जी से उनका ऑटोग्राफ चाहा. विष्णु जी ने लिखा – ‘न लिखना सीख – शरत् – नीचे उनका हस्ताक्षर. हम हक्का-बक्का रह गए. ‘आवारा मसीहा’ फिर हमारी चेतना में कौंधने लगी. विष्णु जी से यह मेरी पहली मुलाकात थी.

अब जब मैं विष्णु जी पर यह श्रंद्धांजलि लिख रहा हूं, मुझे याद आता है कि उन्होंने कॉफी हाउस में अपनी दो पुस्तकें मुङो भेंट की थीं  – ‘अर्धनारीश्वर’ उपन्यास पर मेरा नाम लिखकर और दूसरी ‘आवारा मसीहा’. तब मैं समझ नहीं पाया था कि विष्णु जी जैसे वरिष्ठ लेखक ने मुझे कैसे इस योग्य समझ. अभी ‘आवारा मसीहा’ पलटते मैंने देखा. इस पुस्तक पर लिखा है – ‘विष्णु प्रभाकर जी के सौजन्य से, हस्ताक्षर और तिथि: 10 जुलाई 1993.

अब जब पूरा हिंदी समाज विष्णु जी के शतायु होने की उम्मीद कर रहा था, 97 वर्ष के सार्थक जीवन और लेखन के बीच वे चले गए. संतराम बी.ए., और बच्चन के बाद संभवत: हिंदी के वे ऐसे तीसरे लेखक हैं जिन्हें लंबी उम्र मिली. ‘आवारा मसीहा’ की भूमिका में उन्होंने लिखा है – ‘सन् 1959 में मैंने अपनी यात्रा आरंभ की थी और अब 1973 है. 14 वर्ष लगे मुझे ‘आवारा मसीहा’ लिखने में.’ शरत् चंद्र पर जीवनी लिखने की चुनौती को उन्होंने जिस तरह स्वीकार किया वह विरल है. यह अकारण नहीं है कि बांग्ला के प्रसिद्ध साहित्यकार सुनील गंगोपाध्याय भी मानते हैं कि उन्होंने बांग्लाभाषी समाज को शरत् चंद्र से परिचित कराया. हमें हिंदी प्रकाशन के भीष्म पितामह श्री नाथूराम प्रेमी (हिंदी ग्रंथ रत्नाकर, बम्बई के स्वामी) का स्मरण भी जरूरी लगता है, जिनकी प्रेरणा से ‘आवारा मसीहा’ लिखा गया. साहित्यकार कभी नहीं मरता और विष्णु प्रभाकर ‘आवारा मसीहा’ जैसे कालजयी कृति के रूप में जीवित रहेंगे भले प्रो. नंदकिशोर नवल हिंदी की कालजयी कृतियां’ में उन्हें शामिल करें या नहीं.

इस प्रभविष्णु साहित्यकार को हमारी हार्दिक श्रंद्धांजलि!

  

असमंजस में बॉलीवुड

मम्मी ने अपनी सबसे बढ़िया सिल्क की साड़ी पहनी थी और उनके बालों का जूड़ा बहुत खूबसूरत लग रहा था. मैंने भी 1970 के दशक के फैशन से मेल खाते कपड़े पहने थे. मुझे ये तो याद नहीं कि वो दिन इतना खास क्यों था पर इतना याद है कि पापा उस दिन जल्दी घर आ गए थे. तैयार होकर हम सब उस सिनेमा हॉल पहुंचे थे जहां राजकपूर की फिल्म बॉबी लगी हुई थी. वैसे तो इसे लगे कई हफ्ते हो चुके थे मगर शो अब भी हाउसफुल जा रहा था.

फिल्म इंडस्ट्री में अब ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो कांटेट के मामले में जोखिम उठाने से झिझकते नहीं. ये बदलाव बड़े बजट वाली फिल्मों में भी दिख रहा है

सिनेमा का ये मेरा पहला अनुभव था. सैकड़ों लोगों और शोर-शराबे से भरी उस अंधेरी गुफा में मुझ जैसे किसी भी बच्चे को बेचैन हो जाना चाहिए था मगर अगले कुछ घंटों तक मेरी नजरें स्क्रीन से हिली तक नहीं. इस दौरान मेरे लिए सिनेमा के परदे पर आती तस्वीरों के अलावा किसी और चीज की कोई अहमियत नहीं थी. ऋषि कपूर के दर्द और डिंपल कपाड़िया की तड़प को मैं भी महसूस कर पा रही थी.

ये पहला मौका था जब मुझे अहसास हुआ कि दुनिया सिर्फ वही नहीं है जिसके केंद्र में मैं हूं बल्कि न जाने कितनी दूसरी दुनियाएं भी हैं जिनमें जिंदगी अनगिनत तरीके से खुद को जी रही है. हिंदी फिल्मों से मेरे जुनूनी लगाव की ये शुरुआत थी. मेरी किशोरावस्था के दौरान फिल्म इंडस्ट्री अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही थी. हालांकि तब भी फिल्मों के प्रति लोगों की दीवानगी कम नहीं हुई थी. उस दौर में वीडियो लाइब्रेरीज का बोलबाला था जहां फिल्मों के शौकीनों के लिए पायरेटेड वीडियो कैसेट्स किराए पर मिलते थे. मि. इंडिया  और परिंदा जैसी इक्का-दुक्का फिल्मों को छोड़ दिया जाए तो ये वो दौर था जब ज्यादातर फिल्मों को देखना एक बोझिल अनुभव हो जाता था. फिल्मउद्योग के बारे में माना जाता था कि इसमें लगा ज्यादातर पैसा अंडरवर्ल्ड का है और जो इसके हिसाब से नहीं चलता उसका अंजाम बुरा होता है.

अभिनेता, स्क्रिप्ट लेखक और निर्देशक सौरभ शुक्ला कहते हैं, ‘80 का दशक हिंदी सिनेमा का सबसे बुरा दौर था. मेरे हिसाब से ऐसा अपराध की दुनिया के साथ इसके रिश्ते की वजह से हुआ. जब माफिया इस धंधे में दाखिल हुए तो वैसी ही फिल्में बनीं जैसी वे देखना चाहते थे.’ शुक्ला ने रामगोपाल वर्मा की बहुचर्चित फिल्म सत्या में कल्लू मामा का चर्चित किरदार तो निभाया ही था, साथ ही उन्होंने अनुराग कश्यप के साथ मिलकर इस फिल्म की पटकथा भी लिखी थी. वे कहते हैं, ‘सत्या  ने कई सांचे तोड़े. इस पर आर्ट फिल्म का ठप्पा नहीं लगा और इसने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़ दिए. ये फिल्म मील का पत्थर थी.’

आज 60 फीसदी कारोबार मल्टीप्लेक्सेज के जरिए हो रहा है. वहां जाने वाले लोगों को दुनिया भर के सिनेमा की खबर रहती है और वे नियमित रूप से टीवी देखते रहते हैं

11 साल बाद आज आर्ट और कमर्शियल जैसे शब्द अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं. एक जमाना था जब हिंदी फिल्में फॉर्मूलों के हिसाब से बनती थी मगर अब वे फॉर्मूले किनारे रख दिए गए हैं. शुक्ला के शब्दों में ‘90 के दशक के मध्य में कॉरपोरेट्स इस धंधे में कूदे, पैसे का लेनदेन कानूनी तरीके से होने लगा और हमें इंडस्ट्री का दर्जा मिल गया.’ आज शुक्ला, कश्यप और रजत कपूर जैसे फिल्मकार ऐसी फिल्में बनाने में जुटे हैं जो कांटेंट के मामले में तो अलग हैं ही, साथ ही उनका बजट भी दूसरी फिल्मों की बनिस्बत कम है.

शुक्ला, जिनकी तीन कॉमेडी फिल्में जल्द ही रिलीज होने वाली हैं, कहते हैं, ‘रजत की भेजा फ्राई की रिकॉर्डतोड़ सफलता के बाद अब नई कहानियां सुनाना थोड़ा आसान हो गया है. भेजा फ्राई  ने अपार सफलता हासिल की और लोगों को लगा कि संभावनाएं दूसरी तरह के सिनेमा में भी हैं. मेरी फिल्म आई एम 24, 42 साल के एक व्यक्ति के बारे में है जो इंटरनेट पर एक लड़की को अपनी उम्र 24 साल बताता है. मेरी दूसरी फिल्म एक रात के रिश्ते पर आधारित है जिसमें आदमी को इस बारे में कुछ भी याद नहीं रहता कि रात को हुआ क्या था. मैंने पहले भी ये आइडिया कमर्शियल सिनेमा के कुछ बड़े नामों को दिया था मगर उनकी प्रतिक्रिया अच्छी नहीं रही. उनका मानना था कि ये भूमिकाएं हीरो के परंपरागत खांचों में कहीं भी फिट नहीं होती थीं.

जानकार मानते हैं कि फिल्म इंडस्ट्री में अब ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो कांटेट के मामले में जोखिम उठाने से झिझकते नहीं. ये बदलाव बड़े बजट वाली फिल्मों में भी दिख रहा है जहां कहानी के मामले में नए प्रयोग देखने को मिल रहे हैं. चक दे इंडिया और दिल्ली 6 जैसी फिल्में इसका उदाहरण हैं.

जानकारों का ये भी कहना है कि अलग तरह की फिल्मों की सफलता में मल्टीप्लेक्सेज का भी योगदान रहा है. जैसा कि यूटीवी मोशन पिक्चर्स के सीईओ सिद्धार्थ रॉय कपूर कहते हैं, ‘आज 60 फीसदी कारोबार मल्टीप्लेक्सेज के जरिए हो रहा है. वहां जाने वाले लोगों को दुनिया भर के सिनेमा की खबर रहती है और वे नियमित रूप से टीवी देखते रहते हैं. यही वजह है कि उनका सामना इस तरह की चीजों से होता रहता है जिन्हें भारतीय सिनेमा के लिहाज से अपारंपरिक कहा जा सकता है.’

यूटीवी, इरोज, टीवी18, बिग और अष्टविनायक जैसे कॉरपोरेट्स के फिल्म उद्योग में आने का असर ये हुआ है कि फॉर्मूले की तर्ज पर फिल्में बनाने वाले लोगों के दिन लद चुके हैं. नतीजा ये हुआ है कि आरके फिल्म्स, मनमोहन देसाई की एमकेडीफिल्म्स और सुभाष घई की मुक्ता आर्ट्स का जलवा अब पहले जैसा नहीं रहा. अब वह जमाना भी नहीं रहा जब कभी-कभार एक तरफ तो अमर अकबर एंथनी जैसी बेमिसाल फिल्म बन जाती थी और उसी वक्त नागिन जैसी कोई उबाऊ फिल्म भी रिलीज हो रही होती थी. अब काम कॉरपोरेट शैली में होने लगा है जहां अनुशासन की अहमियत पहले से कहीं ज्यादा हो गई है.

दसविदानिया  के लिए भी आप दर्शक से 250 रुपए मांग रहे हैं और गजनी के लिए भी. ये ठीक बात नहीं है क्योंकि पहली फिल्म दो करोड़ में बनी है जबकि दूसरी के बनने में 50 करोड़ मेंरॉक ऑन और लक बाय चांस जैसी चर्चित फिल्मों के निर्माता एक्सेल फिल्म्स के रितेश सिधवानी कहते हैं, ‘अब आप सिर्फ ये नहीं सोच सकते कि ठीक है, मेरे पास ये कहानी है और मैं इस पर फिल्म बनाऊंगा. कुछ साल पहले तक आलम ये था कि डायलॉग्स और सीन्स भी शूटिंग के दिन ही लिखे जाते थे. अब हर अभिनेता आपसे स्क्रिप्ट मांगता है. इसीलिए पुराने फिल्मकार, जिन्हें इसकी आदत नहीं है, परेशानी महसूस कर रहे हैं. अब दर्शक कूड़ा हजम नहीं कर सकता. फिल्मों की सफलता अकेले उनके कांटेंट की मजबूती पर निर्भर करती है. रॉक ऑन के साथ यही हुआ! जनता कहानी में गहराई चाहती है. बड़ा मुद्दा यही है.’ ये बात अक्षय कुमार को शायद ठोकर खाकर समझ में आई. कहा जाता है कि निखिल आडवाणी की चांदनी चौक टू चाइना  के लिए अक्षय ने इस फिल्म से जुड़ा एक आकर्षक पोस्टर देखकर ही हां कर दी थी.

आईनॉक्स लेजर लिमिटेड में वाइस प्रेसीडेंट (प्रोग्रामिंग एंड डिस्ट्रीब्यूशन) उत्पल आचार्य भी इससे सहमत हैं कि आज कांटेंट की अहमियत सबसे ज्यादा है. वे कहते हैं, ‘अगर निर्माता अच्छे अभिनेता लेता है पर अच्छे कांटेंट की उपेक्षा करता है तो उसे नाकामयाबी ही मिलती है. टशन, चांदनी चौक टू चाइना, दिल्ली 6 और द्रोणा जैसी फिल्में इसका उदाहरण हैं.’ आचार्य के मुताबिक निर्माताओं-वितरकों और थियेटर मालिकों के बीच चल रहे टकराव की जड़ दरअसल वह अवास्तविक मेहनताना है जो स्टार्स को दिया जा रहा है. वे कहते हैं, ‘आर्थिक तेजी के वक्त जब सिंग इज किंग और वेलकम जैसी फिल्में हिट हुईं तो स्टार्स को मुंहमांगा पैसा मिलने लगा. अब यशराज फिल्म्स को छोड़कर सारे कॉरपोरेट्स शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं इसलिए उन्हें हर तिमाही अपने नतीजे घोषित करने होते हैं. इसके लिए उन्हें मजबूत कांटेंट की जरूरत होती है. उस समय हर कोई अक्षय कुमार या शाहरुख खान के पीछे भाग रहा था इसलिए उनकी कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ गईं. अगर फिल्म की लागत 50 करोड़ थी तो अकेले अभिनेता ही 35 करोड़ ले रहा था! अब वे ये पैसा थियेटर मालिकों से वसूलना चाहते हैं.’ आचार्य के मुताबिक इसका सबसे बढ़िया हल है निर्देशक या अभिनेता के मेहनताने को लाभ के साथ जोड़ देना.

हालांकि ऐसा करना इतना आसान नहीं है. आचार्य कहते हैं, ‘इंड्स्टी में एक ही अक्षय कुमार है और एक ही शाहरुख खान भी. अगर कोई प्रोड्यूसर कहे कि वह इतना पैसा नहीं दे सकता तो उनके लिए कोई समस्या नहीं होती. उन्हें पता है कि कोई दूसरा इतना पैसा दे ही देगा. मुझे नहीं लगता कि हॉलीवुड के सितारे इकट्ठा इतना पैसा लेते हैं. रंग दे बसंती के लिए आमिर खान ने नाममात्र का पैसा लिया था और इसके बाद उनका मेहनताना फिल्म के प्रदर्शन पर तय हुआ था. केवल वही एक स्टार हैं जो आखिर तक फिल्म के साथ रहते हैं और कांटेंट के प्रति बेहद गंभीर रहते हैं. जब फिल्म सफल हो जाती है तब जाकर वे अपने हिस्से के फायदे की मांग करते हैं.’ आचार्य के मुताबिक इन सब दबावों का ही नतीजा ये है कि पिछले दो साल में फिल्म इंडस्ट्री के कॉरपोरेट्स को कोई खास फायदा नहीं हुआ है. बल्कि कहा जाए तो वे बस किसी तरह खुद को नुकसान से बचा पा रहे हैं.

आदर्श स्थिति तो ये है कि बॉक्स ऑफिस यानी सिनेमाघरों में होने वाली कमाई निर्माताओं-वितरकों और थियेटर मालिकों में बराबर-बराबर बंटे. मगर तब विवाद इस बात पर फंस जाता है कि छोटे बजट वाली उन फिल्मों के मामले में आनुपातिक बंटवारा कैसे हो जिनकी अच्छी ओपनिंग की गारंटी नहीं होती. आचार्य कहते हैं, ‘जब आप कूड़ा बनाते हैं तो यही होता है. थियेटर मालिकों ने अपने न्यूनतम खर्चे तय कर दिए हैं. लाभ का बंटवारा तो तभी हो सकता है जब दर्शक फिल्म देखने आएं. बतौर प्रोड्यूसर आप अपना पैसा सैटेलाइट, ओवरसीज और म्यूजिक राइट्स के जरिए कमा सकते हैं. ज्यादा मामलों में छोटी फिल्में मार्केटिंग कवायदों की तरह होती हैं. मैं चल चला चल जैसी फिल्म देखने के लिए ढाई सौ रुपए खर्च नहीं करूंगा. कांटेंट सही मायने में अलग होना चाहिए. ऐसे में सारी मार थियेटर मालिक पर पड़ती है.’

जैसा कि संभावित था निर्माता-वितरक भी अपनी जिद पर अड़े हैं. रॉय कपूर कहते हैं, ‘हमें एक-दूसरे का सहारा बनने की जरूरत है. 50-50 की हिस्सेदारी सही हल है और हम उम्मीद कर रहे हैं कि थियेटर मालिक इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेंगे ताकि हम हर गुरुवार की रात को आपस में लड़ने की बजाय इंडस्ट्री के विस्तार के लिए मिलकर काम कर सकें.’

फिलहाल हालात इतने खराब हैं कि निर्माताओं-वितरकों ने अप्रैल से कोई भी फिल्म रिलीज न करने का फैसला किया है. मगर थियेटर मालिक भी अपने रुख से हटने को तैयार नहीं. रॉय कपूर कहते हैं, ‘वास्तव में देखा जाए तो परीक्षाओं और आईपीएल की वजह से अप्रैल में कुछ भी नहीं होगा. मई के बाद से ये मसला सुलझ जाएगा. मेरे हिसाब से ये फिल्म के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा. यदि ऐसा हो जाता है तो कांटेट की समस्या खुद ही सुलझ जाएगी.’ संबंधों में कितनी कड़वाहट आ गई है इसका उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि अक्सर तीसरा हफ्ता आते-आते फिल्में मल्टीप्लेक्सेज से उतार दी जाती हैं.  

हैडमेंड फिल्म्स के सुनील दोशी, जिनकी भेजा फ्राई के बनने में अहम भूमिका रही है, का मानना है कि इंडस्ट्री को अपनी सोच का दायरा बड़ा करने की जरूरत है. वे कहते हैं, ‘हालात पर गौर कीजिए, दसविदानिया  के लिए भी आप दर्शक से 250 रुपए मांग रहे हैं और गजनी के लिए भी. ये ठीक बात नहीं है क्योंकि पहली फिल्म दो करोड़ में बनी है जबकि दूसरी के बनने में 50 करोड़ की लागत आई है. उधर, टिकटों की कीमतों के मामले में भी आपने एक वर्ग को फिल्म देखने से पूरी तरह वंचित कर दिया है. फिलहाल हालात बहुत खराब हैं. यूरोप और अमेरिका की तरह हमें भी डेस्टिनेशन सिनेमाज की जरूरत है जहां कम कीमत पर छोटी फिल्में दिखाई जाएं.’ दोशी मानते हैं कि आजकल चल रहे इस टकराव की एक वजह ऐसे थियेटरों का अभाव भी है. कॉरपोरेट्स के फैलते दायरे को लेकर उनमें कोई उत्साह नजर नहीं आता. वे कहते हैं, ‘हिंदी फिल्म उद्योग में कॉरपोरेट्स के बढ़ते प्रभाव का नतीजा ये होगा कि अमेरिकी स्टूडियोज के लिए देश में घुसना आसान हो जाएगा और वे यहां की कंपनियों को खरीद लेंगे.’

दोषी का मानना है कि इंडस्ट्री को अपने काम के तरीके में निश्चित रूप से बदलाव लाने की जरूरत है. वे कहते हैं, ‘कई फिल्मों के डीवीडी और टेलीविजन पर रिलीज होने से हालात में बहुत से बदलाव आएंगे. हमारी फिल्मों की एडवरटाइजिंग और प्रोमोशन के तरीके को भी फिर से परिभाषित किए जाने की जरूरत है. बांबे, दिल्ली और सीपीसीआई जैसी पुरानी टेरिटरीज खत्म हो रही हैं. हमें नई टेरेटरीज पर ध्यान देने की जरूरत है जो काल सेंटर्स और आईटी उद्योग में काम करने वाले लोगों और स्कूल और कालेजों के छात्रों से मिलकर बनती हैं. हमें इस नए बाजार की तरफ ध्यान देना होगा.’

आज बॉलीवुड में हर तरह की फिल्में बन रही हैं. दर्शकों ने गजनी को भी पसंद किया है और इससे बिल्कुल अलग देव-डी को भी. पक्के तौर पर कोई भी नहीं कह सकता कि फिल्म-निर्माण की कौन सी शैली ज्यादा सफल रहेगी. न ही कोई ये बता सकता है कि मौजूदा विवाद में जीत निर्माता-वितरक गुट की होगी या थियेटर मालिकों की. मगर ये पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि हिंदी सिनेमा का जादू पहले की तरह ही लोगों के सिर चढ़कर बोलता रहेगा.

गावस्कर को शाहरुख की नसीहत

सुनील गावस्कर उन विरले खिलाड़ियों में से हैं जो पैसे का खेल खूब समझते हैं. लेकिन बॉलीवुड के सुपर स्टार शाहरुख खान ने उन्हें कहा कि बीसमबीस का खेल आप नहीं खेले हैं. यह नया खेल है. कोलकाता नाइट राइडर्स की टीम खरीदने में मैंने खूब पैसा लगाया है. अगर इसे चलाने के तरीके से किसी को कोई समस्या है तो वह अपनी टीम खरीदे और उसे जैसा चाहे चलाए. मैं तो चलाने की कोशिश किए बिना इसे नहीं छोड़ूंगा.

गावस्कर न सिर्फ क्रिकेट इतिहास के सबसे महान ओपनर हैं बल्कि सब जानते हैं कि उनने इस खेल और इसके प्रशासन पर बहुत विचार किया है

अब बीसमबीस नया खेल है और गावस्कर इसे नहीं खेले हैं. ये दोनों ही बातें सही हैं. लेकिन शाहरुख खान तो न टैस्ट खेले हैं न वन डे न बीसमबीस. वे तो प्रथम श्रेणी का क्रिकेट भी नहीं खेले हैं. और उनकी टीम के कोच जॉन बुकानन ऑस्ट्रेलिया टीम के कोच जरूर रहे हैं लेकिन वे भी टैस्ट, वन डे और बीसमबीस नहीं खेले हैं. दरअसल बीसमबीस को अभी जुम्मा-जुम्मा सात दिन भी नहीं हुए हैं. इसलिए उस पर बड़े जानकार की तरह बात करने का अधिकार किसी को नहीं है.

जो भी बात कही जाएगी वह कुल क्रिकेट के अनुभव और ज्ञान पर ही होगी और इस हालत में दुनिया में कहीं भी शाहरुख खान और जॉन बुकानन की तुलना में सुनील गावस्कर की ही बात को ज्यादा अहमियत दी जाएगी. गावस्कर न सिर्फ क्रिकेट इतिहास के सबसे महान ओपनर हैं बल्कि सब जानते हैं कि उनने इस खेल और इसके प्रशासन पर बहुत विचार किया है. वे क्रिकेट के बहुत सम्मानित कमेंटेटर और बहुत पढ़े जाने वाले लेखक हैं.

शाहरुख खान भी इस बात को जानते हैं. लेकिन यह कि बीसमबीस नया खेल है और गावस्कर इसे खेले नहीं हैं जैसी बात वे इसलिए कह गए हैं कि वे नहीं चाहते कि कोलकाता नाइट राइडर्स में जो अनेक कप्तान बनाने का प्रस्ताव आया है उसे क्रिकेट की कसौटी पर परखा जाए. शाहरुख का कहना है कि इस टीम को खरीदने में मैंने बहुत पैसा लगाया है. इसे मैं कैसे चलाता हूं यह मेरी मर्जी है. अगर आपको मेरे इसे चलाने से कोई एतराज है तो मैं उसे नहीं मानूंगा. गावस्कर पैसे लगाएं टीम खरीदें और उसे जैसा चाहे चलाएं. मेरे चलाने में दखल न दें.

यानी गावस्कर साब बीसमबीस का आईपीएल नया खेल है. इसमें क्रिकेट के खेल की नहीं चलेगी. इसमें पैसे की चलेगी. इसमें पैसे की ही लाठी चलेगी और जिसकी लाठी चलेगी वही भैंस को हकाल ले जाएगा. मैं कोलकाता नाइट राइडर्स की भैंस को अपनी लाठी से हकालूंगा. इस लाठी और भैंस को मैंने खूब पैसा लगा कर खरीदा है. बीसमबीस का जो आईपीएल इस पखवाड़े दक्षिण अफ्रीका में शुरू हो रहा है उसका यही सत्य शाहरुख खान ने समझा है. जो जितना पैसा लगाता है वैसी ही उसकी समझ बनती है.

सुनील गावस्कर चूंकि जीवन भर क्रिकेट खेले हैं इसलिए अनेक कप्तान रखने के कोलकाता नाइट राइडर्स की टीम के प्रस्ताव पर उनने एक क्रिकेट पंडित की तरह ही लिखा. टीम में यह प्रस्ताव जॉन बुकानन की तरफ से आया है जो कि टीम के कोच हैं. गावस्कर ने लिखा कि अनेक कप्तान प्रस्ताव पर विचार करना जॉन बुकानन को ऐसा महत्व देना है

गावस्कर की शिकायत यह है कि आईपीएल की टीमों के कोच और उनका सहायक स्टाफ सब ज्यादातर विदेशी हैं खास कर ऑस्ट्रेलियाई 

जिसके योग्य वे नहीं हैं. सब जानते हैं कि बुकानन विश्व विजेता ऑस्ट्रेलियाई टीम के कोच थे. लेकिन उन्हें कोई पूछता नहीं था. ऑस्ट्रेलिया में खेल और खिलाड़ी को जितना महत्व दिया जाता है कोच और उसके स्टाफ को नहीं मिलता. गावस्कर ने पूछा है कि कभी आपने वॉर्न, मेकग्रा या गिलक्रिस्ट को कहते सुना है कि हमने ऐसा इसलिए किया कि हमारे कोच ने करने को कहा था? गावस्कर ने यह भी कहा कि बुकानन अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों से वे उम्मीदें करने की खाते रहे जो उनसे खुद से प्रथम श्रेणी क्रिकेट में भी कभी बनी नहीं. बुकानन टैस्ट नहीं खेले हैं और इसलिए इयन चैपल जैसे पुराने कप्तान और महान लेग स्पिनर शेन वॉर्न उनकी बातों को यों ही खारिज कर देते थे. गावस्कर का कहना है कि उस ऑस्ट्रेलियाई टीम में ऐसे और इतने महान खिलाड़ी थे कि बुकानन जैसे कोच की उन्हें जरूरत ही नहीं पड़ती थी. बुकानन के क्रिकेट ज्ञान और ऑस्ट्रेलियाई टीम को उनके योगदान की जाहिर है कि गावस्कर कोई इज्जत नहीं करते. वे मानते हैं और उनने लिखा भी है कि बुकानन को भारतीय मीडिया और प्रशासक नाहक भाव दिए रहते हैं.

गावस्कर ने बुकानन के अनेक कप्तान प्रस्ताव को तो विचार के लायक भी नहीं माना है. लेकिन इसका मूल उनने बुकानन की इस कारगुजारी में माना है जिसमें उनने कोलकाता नाइट राइडर्स की टीम के लिए एक सहायक कोच और सहायक कोच का भी एक सहायक नियुक्त कर लिया है. एक फील्डिंग कोच है, एक बॉलिंग कोच और शायद दो विकेटकीपरों के लिए भी एक कोच है. टीम को शारीरिक ट्रेनिंग दिलवाने के लिए दो ट्रेनर हैं जिनमें एक बुकानन का बेटा है. चौदह खिलाड़ियों की टीम के लिए इस तरह छह कोच और दो ट्रेनर हैं और गावस्कर का कहना है कि ये सब ज्यादातर बुकानन के राज्य क्वींसलैंड के हैं. टीम के मालिकों को अंदाजा भी नहीं है कि उन्हें किस तरह चूना लगाया जा रहा है – गावस्कर ने लिखा है. और यह बात शाहरुख खान को सबसे ज्यादा चुभी होगी क्योंकि इन छह कोचों और दो ट्रेनरों को पैसा तो वही देते हैं. इन अनेकों कोचों से ही क्या अनेक कप्तान का प्रस्ताव निकला है? गावस्कर ने पूछा है और मालिकों पर तरस खाया है.

गावस्कर की शिकायत यह है कि आईपीएल की टीमों के कोच और उनका सहायक स्टाफ सब ज्यादातर विदेशी हैं खास कर ऑस्ट्रेलियाई. अब आईपीएल भारतीय बोर्ड करवाता है और बोर्ड ही बंगलूर में नेशनल क्रिकेट अकादमी भी चलाता है. इस अकादमी से हर साल कई कोच और सहायक स्टाफ ट्रेनिंग ले कर निकलते हैं. इन्हें अगर भारतीय टीमों को कोच करने और टीमों की मदद करने का मौका नहीं मिलेगा तो वे जाएंगे कहां? इन्हें रख कर टीमों के मालिक न सिर्फ अपना पैसा बचा सकते हैं बल्कि भारतीय टीमों की मदद करने और उन्हें बेहतर करने का भी देसी प्रबंध कर सकते हैं. गावस्कर का मानना है कि हमारे टीम मालिक विदेशी के ग्लैमर के चक्कर में न तो खेल की ठीक से सेवा कर रहे हैं न भारतीयों को मौका दे रहे हैं. गावस्कर का यह भी मानना है कि बीसमबीस इतना तेज खेल है कि उसमें कोच और रणनीति की बहुत गुंजाइश ही नहीं है.

गावस्कर का यह लेख दरअसल अनेक कप्तान थ्योरी पर नहीं बुकानन की क्रिकेटीय क्षमता और शाहरुख खान के अपनी टीम को चलाने के तरीके पर है. इसलिए शाहरुख खान और बुकानन का बिदकना समझ जा सकता है. फिर भी शाहरुख का अपनी टीम का मालिक होने का अहंकार और पैसों के बल पर क्रिकेट खेलने के विचार और परंपराओं की कोई परवाह न करना क्रिकेटप्रेमियों को चेताने के लिए काफी होना चाहिए. गए साल भी बंगलूर के रॉयल चैलेंजर्स के मालिक विजय माल्या को शिकायत थी कि क्रिकेट के खेल में कप्तान की बहुत चलती है. वे अपने कप्तान राहुल द्रविड और उनकी बनवाई ‘टैस्ट टीम’ से बहुत दुखी थे. उनने टीम के सीईओ चारू शर्मा की छुट्टी की और राहुल द्रविड़ की आलोचना की. उनकी टीम चौदह में से सिर्फ चार मैच जीती दस में हारी और आठ टीमों में से सातवें नंबर पर रही. इस साल माल्या ने कोच और कप्तान दोनों बदल दिए हैं और सीधे टीम की कमान संभाल ली है.

कोलकाता नाइट राइडर्स में भी कप्तान नाम की संस्था पर ही सीधा हमला किया गया है. क्रिकेट में अब भी कप्तान ही टीम का मुखिया होता है वही सारे फैसले लेता है और उसी का आदेश चलता है. टैस्ट टीम हो या वन डे की या बीसमबीस की. सोच बुकानन के जरिए शाहरुख खान और उनके मार्केटिंग सलाहकार कप्तान को फुटबॉल और बेसबॉल का कप्तान बना देना चाहते हैं जो कोच और मालिक के निर्देशों को मैदान में अमल में लाता है. सौरभ गांगुली के साथ ऐसा बरताव वे कोलकाता में नहीं कर सकते थे इसलिए उनने प्रयोग दक्षिण अफ्रीका में करने का तय किया. वहां सौरभ गांगुली का वैसा समर्थन और दबदबा नहीं होगा जैसा कोलकाता में होता. फिर दक्षिण अफ्रीकी दर्शकों के सामने अलग-अलग कप्तान रखना और कोच को सबसे शक्तिशाली बना देने में टीम के स्थानीय समर्थन खोने का भी कोई खतरा नहीं होगा.

बुकानन क्रिकेट की परंपराओं से खेल करने को तैयार हैं क्योंकि उन्हें नाइट राइडर्स में जो पैसा, मौका और समर्थन मिला है दुनिया में कहीं और, और किसी दूसरी टीम में तो अब मिलेगा नहीं.

गए साल नाइट राइडर्स से कुछ बना नहीं था. ‘चक दे इंडिया’ फिल्म में उनने कोच का रोल किया था और भारत की महिला हॉकी टीम को विश्व कप दिला लाए थे. लेकिन अपना सारा जोर लगा कर भी शाहरुख खान अपनी टीम को सेमी फाइनल भी खेला नहीं पाए. इस साल वे बीसमबीस के नए खेल में अनेक कप्तान का प्रयोग करना चाहते हैं और चाहते हैं कि कोई जानकार, विशेषज्ञ, पंडित उनके प्रयोग में दखल न दे. यानी इस प्रयोग को क्रिकेट के खेल और उसकी परंपरा में न देखे. मैंने पैसे लगाए हैं और टीम को कमाऊ बनाने के लिए जो मुझे करना ठीक लगेगा करूंगा. ऐसा करने में क्रिकेट के कप्तान की संस्था से खिलवाड़ होती है तो हो. मैं क्रिकेट के खेल की गरिमा के लिए नहीं अपने पैसे से कमाई करने के धंधे में आया हूं. और कमाई के लिए मुझे जो भी प्रयोग करने होंगे करूंगा. शाहरुख खान ने यह संदेश गावस्कर और बाकी खिलाड़ियों को दे दिया है. आईपीएल क्रिकेट का धंधा है यह तो सब जानते थे. लेकिन इसमें पैसा क्रिकेट का यह भी करेगा शाहरुख ने बता दिया है.

आईपीएल में गावस्कर क्रिकेट के खेल और उसकी परंपराओं की चिंता न करें. मालिक और कोच खेल को कैसे चलाते हैं इसकी आलोचना करने का उन्हें अधिकार नहीं है. वे चाहें तो पैसा लगा कर टीम खरीदें और उसे चाहे जैसा चलाएं. इस खेल में पैसा ही सब कुछ लाएगा. बोल भी वही सकेगा जो पैसा लगाएगा. आईपीएल का यही खेल है. इसमें क्रिकेट पंडित गावस्कर की नहीं बॉलीवुड के अभिनेता शाहरुख खान की चलेगी. 

रण से जुदा नीति

आज तक किसी अमेरिकी राष्ट्रपति से दुनिया ने इतनी उम्मीदें नहीं पालीं जितनी बराक ओबामा से. ओबामा युवा हैं, उदारवादी हैं और आदर्शों में यकीन रखते हैं. अब तक उन्होंने जो भी कहा और किया है उससे लगता है कि तरह-तरह की उथल-पुथल से जूझ रही इस दुनिया में स्थिरता लौटेगी. ये काफी हद तक इस पर निर्भर करता है कि अपनी कोशिशों में वे कितने सफल हो पाते हैं.

अफगानिस्तान में पहले गुलबुद्दीन हिकमतयार और फिर तालिबान को भेजकर इस देश को जंग के मैदान में तब्दील करने वाली आईएसआई ही थी

मगर लगता है कि अफगानिस्तान, जहां से आतंक के खिलाफ अमेरिका की जंग शुरू हुई थी, में ओबामा नाकामयाबी की तरफ बढ़ रहे हैं. आतंक के खिलाफ युद्ध को लेकर 27 मार्च 2009 को उन्होंने जिस नई रणनीति का ऐलान किया था वह काफी हद तक उनके पूर्ववर्ती जॉर्ज डब्ल्यू बुश की नीति से मेल खाती है. यही वजह है कि इसका भी वही हश्र हो सकता है जो पिछली नीति का हुआ.

बुश की तरह ओबामा भी शिद्दत से ये मानते हैं कि अफगानिस्तान में चल रही लड़ाई तब तक नहीं जीती जा सकती जब तक पाकिस्तान, तालिबान और अलकायदा को उखाड़ फेंकने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध न हो इसलिए पाकिस्तान को ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करना सबसे अहम है.

ओबामा प्रशासन पाकिस्तान के साथ लंबी सामरिक साझेदारी की संभावनाएं तलाश रहा है. इस साझेदारी की शर्त ये होगी कि पाकिस्तान अल कायदा के खिलाफ युद्ध और आंतरिक सुधारों के लिए अमेरिका को पूरा सहयोग देगा. मगर ओबामा ये भी जानते हैं कि पाकिस्तानी सेना को पाकिस्तान के भीतर ही तालिबान और अलकायदा से लड़ने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. इसके लिए पहले उसे ये यकीन दिलाने की जरूरत होगी कि ऐसा करना उसके हित में है. यहीं पर ओबामा की रणनीति सबसे कमजोर लगती है.

एशिया सोसाइटी टास्क फोर्स, जिसमें रिचर्ड होलब्रुक और ओबामा के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जनरल जेम्स जॉन्स भी शामिल हैं, की एक हालिया रिपोर्ट कहती है,‘ये बात सही हो या गलत, मगर पाकिस्तान का सुरक्षा तंत्र ये मानता है कि इसके वजूद पर खतरा है और इस खतरे का सामना करने के लिए इसने जो व्यवस्था विकसित की है उसे खत्म करना तब तक बहुत मुश्किल है जब तक इसकी उस बुनियादी चिंता को दूर नहीं किया जाता – ये है पाकिस्तान के अस्तित्व और इसकी संप्रुभता को खतरा.’

इस उपाय की सरलता देखकर हैरानी होती है. कौन नहीं जानता कि अफगानिस्तान हो या कश्मीर, पिछले दो दशक में यहां जो भी आतंकी कार्रवाई हुई है उसे पाकिस्तानी सेना ने अपनी खुफिया एजेंसी आईएसआई के जरिए अंजाम दिया है. अफगानिस्तान में पहले गुलबुद्दीन हिकमतयार और फिर तालिबान को भेजकर इस देश को जंग के मैदान में तब्दील करने वाली आईएसआई ही थी. मुजफ्फराबाद में यूनाइटेड जिहाद काउंसिल को खाद-पानी देने वाली और इसके मुजाहिदीनों को कश्मीर भेजने के पीछे भी इसी खुफिया एजेंसी का हाथ रहा. लश्कर-ए-तैयबा को भी ये समर्थन देती रही है. अब टास्क फोर्स की रिपोर्ट की मानें तो ऐसा इसने सिर्फ इसलिए किया ताकि पाकिस्तान की सीमाएं सुरक्षित रहें. तो फिर इसका विस्मयकारी निष्कर्ष ये निकलता है कि अलकायदा के खिलाफ युद्ध में पाकिस्तानी सेना अमेरिका का साथ देगी या नहीं ये अफगानिस्तान और भारत पर निर्भर करता है. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो अमेरिका ये मान रहा है कि जो भी पाकिस्तानी सेना को चाहिए उसे दे दीजिए और वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पूरी तरह से उसके साथ होगी.

ओबामा को समझना होगा कि ऐसा नहीं होता कि आप एक हाथ से वार करें और दूसरे हाथ से दोस्त बनाने की कोशिश

बड़ी हैरानी की बात है कि टास्क फोर्स की रिपोर्ट में उन भावनाओं का कोई जिक्र नहीं है जिनसे पाकिस्तानी अखबार भरे पड़े हैं. न्यूयार्क टाइम्स ने भी छह अप्रैल को लिखा कि सभी पाकिस्तानी अब भी मानते हैं कि ये उनकी लड़ाई नहीं है और इसमें अपनी सेना को झोंकना अपने भाइयों की हत्या करने जैसा होगा. टास्क फोर्स की रिपोर्ट में कहीं इसका जिक्र नहीं कि पाकिस्तानी सेना का एक बड़ा हिस्सा भी इस बात से इत्तफाक रखता है. इसलिए रिपोर्ट ये नहीं बता पाती कि अगर क्षेत्रीय संप्रभुता को बनाए रखना ही पाकिस्तानी सेना का एकमात्र लक्ष्य है तो फिर क्यों ये भारतीय सीमा पर तैनात 18 डिविजंस और 20 ब्रिगेड्स में एक को भी हटाने से लगातार इंकार करती रही है और क्यों अफगानिस्तान सीमा पर इसने सिर्फ दो डिविजंस तैनात की हैं. न ही रिपोर्ट ये बता पाती है कि 2007-08 में जब पाकिस्तान में चल रहा गृहयुद्ध दिनों-दिन और भी वीभत्स रूप अख्तियार कर रहा था और नियंत्रण रेखा पर भारत की तरफ से कोई खतरा नहीं था तो भी पाकिस्तान ने वहां तैनात तीन इंफैंट्री डिविजंस और पांच इंफैंट्री ब्रिगेड्स में से किसी को भी हटाकर अफगानिस्तान सीमा पर तैनात नहीं किया.

दरअसल सच्चाई ये है कि भारत से खतरे का हौव्वा सिर्फ इसलिए खड़ा किया गया है कि इसकी आड़ में तालिबान से लड़ने की अनिच्छा को छिपाया जा सके. दरअसल पाकिस्तानी सेना तालिबान से मुकाबला नहीं करना चाहती क्योंकि उसे ये भरोसा नहीं है कि वह इस लड़ाई में जीत जाएगी. इसकी सीधी सी वजह ये हो सकती है कि सूदूर कबायली इलाकों में तालिबान आदिम तरीकों से लड़ रहे हैं जिनमें आम नागरिकों को बलि का बकरा बनाया जाता है. वे छोटी सी बात पर भी लोगों की हत्या कर देते हैं. फिर लोग सरकार से मदद की गुहार लगाते हैं मगर सरकार उन्हें सुरक्षा नहीं दे पाती. ऐसा इसलिए क्योंकि सुरक्षा बल हर समय हर जगह मौजूद नहीं हो सकते. हताशा में लोग या तो उस जगह से भाग जाते हैं या फिर तालिबान की हुकूमत स्वीकार कर लेते हैं. किसी जगह पर अपना नियंत्रण स्थापित करने का ये सबसे पुराना तरीका है.

इस लड़ाई में पाकिस्तानी सेना को जीत तभी मिल सकती है जब वह आम लोगों को सुरक्षा दे सके. मगर वह जानती है कि उसके पास सैनिक इतनी संख्या में नहीं हैं कि वे पूरे इलाके में फैलकर एक ऐसा माहौल तैयार कर सकें जिसमें आम आदमी बिना डर के जी सके. यही वजह है कि तालिबान को लेकर उसने दोहरा रुख अपना रखा है. उसे पता है कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान में शांति की पहली शर्त ये है कि अफगानिस्तान में उदार तालिबान को मुख्य धारा में शामिल करने के लिए कोई राजनीतिक समझौता हो जाए. मगर ओबामा के आने से पहले अमेरिकी प्रशासन में कोई ये बात सुनने के लिए तैयार नहीं था.

पाकिस्तान जानता है कि उसके पास अपनी मर्जी से लड़ाई से पीछे हटने का कोई विकल्प नहीं है. इधर कुआं उधर खाई वाली हालत में इसके पास एक ही विकल्प बचता था और वह था भारत को किसी सैन्य कार्रवाई के लिए उकसाना. पिछले साल काबुल में भारतीय दूतावास और फिर मुंबई पर हुआ हमला इसी की कोशिश थी.

शायद ओबामा भी ये समझने लगे हैं. इसलिए अब वे कट्टर तालिबान को अलग-थलग करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. मगर किसी राजनीतिक हल की उनकी रणनीति दिशाहीन लगती है. ओबामा को समझना होगा कि ऐसा नहीं होता कि आप एक हाथ से वार करें और दूसरे हाथ से दोस्त बनाने की कोशिश. इस मुद्दे के हल के लिए सिर्फ अफगानिस्तान और पाकिस्तान को शामिल करना और अफगानिस्तान के दूसरे पड़ोसियों की उपेक्षा करने से काम नहीं चलने वाला.

जरूरत इस बात की है कि नया राजनीतिक समझौता बनाने की जिम्मेदारी किसी ऐसे तीसरे पक्ष को सौंपी जाए जो लड़ाई में शामिल न हो. जैसा कि हेग में पिछले महीने हुई संयुक्त राष्ट्र की बैठक में ईरान के विदेश मंत्री ने संकेत दिया भी था कि लड़ रहे गुटों को इस बात का भरोसा दिया जाए कि अगर वे अपने मतभेद भुला दें और एक व्यावहारिक संविधान बनाकर सरकार चलाने लगें तो विदेशी फौजें वहां से चली जाएंगी. ईरान और उजबेकिस्तान के साथ पाकिस्तान की भी इस समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए. मगर यदि पाकिस्तान तालिबान से लड़ने लगा तो वह ये अधिकार खो देगा.

सैन्य कार्रवाई तेज किए जाने से पहले राजनीतिक समझौते की पेशकश होनी चाहिए. आदर्श यही रहेगा कि इस समझौते की रूप रेखा अफगानिस्तान के पड़ोसी और भारत से मिलकर बना क्षेत्रीय गुट बनाए. पाकिस्तान भारत को इस मामले में शामिल किए जाने का तीखा विरोध करता है. मगर ओबामा प्रशासन को ये समझना होगा कि अगर शांति प्रक्रिया से भारत को बाहर रखा जाता है तो अफगानिस्तान में कोई शांति समझौता होना मुमकिन नहीं है. इसकी वजह ये है कि ऐसा करने से पाकिस्तानी सेना को पश्चिमी सीमा पर अल कायदा और तालिबान से समझौता कर शांति बहाल करवाने और इसके बदले में पूर्वी सीमा पर जिहाद जारी रखने में उनकी मदद करने का मौका मिल जाएगा. अगर भारत पर हमले जारी रहते हैं तो वह पाकिस्तान में चल रहे आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई करने के लिए मजबूर हो जाएगा. इसका हवाला देकर पाकिस्तानी सेना भारतीय सीमा से एक भी सैनिक नहीं हटाएगी. इस तरह से ओबामा की नई रणनीति अपने मूल में ही असफल हो जाएगी.

प्रेम शंकर झा

वरिष्ठ पत्रकार