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आम का कौन मर्द-ए-मैंदा है…

यों तो वो एक आम आदमी हैं. लेकिन आम होते हुए भी वो बेहद खास हैं. खास इसलिए कि उनके लिए आम महज आम नहीं, खासुल खास हैं. आम उनकी इबादत हैं. आम उनका सपना है, जुनून हैं, आम उनकी दिल की धड़कन हैं. दिमाग की हलचल हैं. असल में आम उनकी जिन्दगी हैं. 1957 से उनके लिए जिन्दगी में जो चीज सबसे बढ़कर है वो है आम. आम की इसी दीवानगी के चलते कुछ लोग उन्हें आम इंसान कहते हैं तो कुछ उन्हें आम का दीवाना. कुछ तो उन्हें आम का खब्ती तक कहने में भी नहीं चूकते हालांकि उनकी इसी खब्त ने उन्हें पद्मश्री बना डाला है और उनकी जुबान को इतना मीठा कि गोया सारे बागों का रस उसी में धुल गया हो.

सचिन कलीमुल्ला द्वारा विकसित आम की एक ऐसी नई नस्ल है जिसे वे क्रिकेट के बादशाह सचिन तेंदुलकर को समर्पित कर चुके हैं. नौ साल से वे इस खास नस्ल को तैयार करने में जुटे थे

आधी सदी से भी ज्यादा समय से आम की काश्तकारी करते करते कलीमुल्लाह खान आम के डाक्टर भी बन चुके हैं और इंजीनियर भी. अपनी नर्सरी में एक पेड़ पर कलमें बांध कर 300 से ज्यादा किस्म के आम पैदा करके बना उनका अपना अनूठा रिकार्ड आज उनके ही दूसरे कारनामों में कहीं खो चुका है. 72 साल की उम्र में भी लखनऊ के करीब के मलीहाबाद कस्बे के हाजी कलीमुल्लाह खान की आम के प्रति दीवानगी में कोई कमी नहीं आई है. आधी सदी से भी ज्यादा समय से आम की काश्तकारी करते करते कलीमुल्लाह खान आम के डाक्टर भी बन चुके हैं और इंजीनियर भी. अपनी नर्सरी में एक पेड़ पर कलमें बांध कर 300 से ज्यादा किस्म के आम पैदा करके बना उनका अपना अनूठा रिकार्ड आज उनके ही दूसरे कारनामों में कहीं खो चुका है.

कलीमुल्लाह खान का सबसे नया कारनामा है सचिन. सचिन उनके द्वारा विकसित आम की एक ऐसी नई नस्ल है जिसे वे क्रिकेट के बादशाह सचिन तेंदुलकर को समर्पित कर चुके हैं. नौ साल से वे इसको तैयार करने में जुटे थे. इस साल पहली बार इसमें फल आया तो उन्होंने इसका नाम सार्वजनिक कर दिया. लगभग 800 ग्राम तक आकार वाले इस आम की गुठली बहुत छोटी है, गूदा बेहद स्वादिष्ट और यह देखने में भी बहुत सुन्दर है.

कलीमुल्लाह खेलों के शौकीन हैं इसलिए उनके पास इस खास आम को सचिन नाम देने के पीछे भी एक खास वजह है. वे कहते हैं हमारा सचिन तेंदुलकर ऐसा है कि पूरी दुनिया में उसका एक अलग मुकाम है. वो एक अजूबा है और जो बात उसमें है वो किसी दूसरे में नहीं. ठीक इसी तरह हमारा ये जो सचिन आम है वो भी सबसे अलग है. अपने रंग स्वाद आकार और वजन से यह पूरी दुनिया में वैसा ही नाम कमाएगा जैसा सचिन तेंदुलकर ने कमाया है. हर जानदार चीज को एक दिन चले जाना है. हम भी नहीं रहेंगे. लेकिन फल-फूलों की नस्लें हमेशा रहेंगी. इस सचिन आम के जरिए हमारे सचिन का नाम रहती दुनिया तक बना रहे ऐसी हमारी ख्वाहिश है.

इसे पेटेंट करवाने के साथ ही उन्होंने सचिन तेंदुलकर को मलीहाबाद आने का न्योता भी भेजा है. सचिन के खाने के लिए भी वो इस आम को भिजवाना चाहते हैं. आम की कई दर्जन नस्लें विकसित कर चुके कलीमुल्लाह अब एक ब्रांड नेम बन चुके हैं. उनकी नर्सरी की पौध में उनके नाम की गारंटी जो जुड़ी होती है. सचिन के चर्चा में आ जाने के बाद कलीमुल्लाह खुश तो बहुत हैं मगर उन्हें थोड़ा अफसोस भी है. अफसोस इस बात का कि वे अब तक महात्मा गांधी के नाम से आम की नस्ल विकसित नहीं कर पाए. वे कहते हैं, हम ठहरे काश्तकार आदमी पॉलिटिक्स- वालिटिक्स हम कुछ जानते नहीं. लेकिन हमें सबसे पहले महात्मा गांधी के नाम पर बापू के नाम से एक नए आम का नाम रखना था. गांधी जी ने हमको गुलामी से आजाद करवाया था. हमसे बड़ी गलती हो गई. कलीमुल्लाह की तमन्ना पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के नाम से भी आम की एक नस्ल बनाने की है. मुल्क से उनकी मोहब्बत का आलम यह है कि 80 के दशक में सऊदी अरब के एक शेख ने उन्हें वजन के बराबर सोना देने के एवज में वहीं रहकर आम के बागान लगाने का ऑफर दिया था. मगर कलीमुल्लाह ने अपनी मिट्टी की मोहब्बत में उसे भी ठुकरा दिया.

उसका स्वाद सबसे अलग था और फकीर के पास आने वालों के जरिए उस आम की शोहरत दूर-दूर तक पहुंच गई. धीरे-धीरे उस लंगड़े फकीर के नाम पर उस आम का नाम ही लंगड़ा पड़ गया

लखनऊ के आस पास की मिट्टी और आबोहवा आम के लिए खास है. उत्तर भारत का सबसे प्रसिद्व दशहरी आम काकोरी के पास दशहरी गांव से ही सारी दुनिया में मशहूर हुआ. दशहरी गांव में दशहरी आम का सबसे पुराना पहला पेड़ अब भी फल दे रहा है. इस पेड़ पर कभी अवध में नवाबों के खानदान का मालिकाना हक था. तब फलों के मौसम में इस पेड़ पर जाल डाल दिया जाता था. पेड़ से फल कोई चुरा न ले इसके लिए उस पर पहरा बैठा दिया जाता था. उन दिनों अगर ये दशहरी आम किसी को तोहफे में भेजा भी जाता था तो उसमें छेद कर दिया जाता था ताकि कोई और उसके बीज से नया पेड़ न बना ले. मलीहाबाद के एक पठान जमींदार ईसा खान ने लगभग डेढ़ सौ साल पहले नवाबों के एक पासी गुडै़ते की मदद से इसका एक पेड़ हासिल किया और फिर मलीहाबाद से फैलकर दशहरी ने सारी दुनिया में अपना सिक्का जमा दिया. आज भी मलीहाबाद के गांवों मे बड़े बूढ़ों की जुबान से दशहरी को लेकर तरह तरह के किस्से सुनने को मिल जाते हैं.

मलीहाबाद के इलाके में ही आम की एक और लाजवाब नस्ल चौसा विकसित हुई. संडीला के पास एक गांव है चौसा. वहां एक बार एक जिलेदार ने अपने दौरे के दौरान गांव के एक पेड़ का आम खाया. खास स्वाद और खुशबू के कारण उसे यह आम बहुत पसन्द आया. उसने गांव वालों से उसका एक पेड़ हासिल कर लिया और बाद में नवाब सण्डीला को इसकी खबर दी. फिर नवाब सण्डीला के जरिए चैसा की नस्ल कई जगह फैल गई.

आम की कई और किस्मों के नामकरण के भी अलग-अलग किस्से हैं. आम की एक और जाएकेदार नस्ल लंगड़ा के लिए कहा जाता है कि बनारस के एक लंगड़े फकीर के घर के पिछवाड़े में आम का एक पेड़ उगा था. उसका स्वाद सबसे अलग था और फकीर के पास आने वालों के जरिए उस आम की शोहरत दूर-दूर तक पहुंच गई. धीरे-धीरे उस लंगड़े फकीर के नाम पर उस आम का नाम ही लंगड़ा पड़ गया. इसी तरह बिहार में भागलपुर के एक गांव में फजली नाम की एक औरत के घर पैदा हुए एक और खास आम का नाम उसी औरत के कारण फजली पड़ गया.

भारतीय जनमानस में अनेक किस्से कहानियों से जुड़े आम की जन्मभूमि भी मूलतः पूर्वी भारत में असम बांग्लादेश व म्यांमार मानी जाती है. भारत से ही आम पूरी दुनिया में फैला. चौथी-पांचवी सदी में बौद्ध धर्म प्रचारकों के साथ आम मलेशिया और पूर्वी एशिया के देशों तक पहुंचा. पारसी लोग 10वीं सदी में इसे पूर्वी अफ्रीका ले गए. पुर्तगाली 16वीं सदी में इसे ब्राजील ले गए. वहीं से यह वेस्ट इंण्डीज व मैक्सिको पहुंचा. अमेरिका में यह सन् 1861 में पहली बार उगाया गया. आम का अंग्रेजी नाम मैंगो एक मलयालम शब्द मंगा से विकसित हुआ है. पुर्तगालियों ने इस शब्द को अपनाया और 1510 में पहली बार पोर्तुगीज में आम के लिए मैंगा शब्द लिखा गया जो अंग्रेजी में मैंगो हो गया.

बारे आमों का कुछ बयां हो जाए  

ख़ामां नख़्ले रतबफ़िशां हो जाए

भारत में रामायण- महाभारत जैसे पौराणिक ग्रंथों में आम का उल्लेख मिलता है. इस बात का भी जिक्र मिलता है कि सन् 327 ईसा पूर्व में सिकन्दर के सैनिकों ने सिंधु घाटी में आम के पेड़ देखे थे. हुएनसांग ने भी आम का जिक्र किया है और इब्नबतूता के विवरणों में तो कच्चे आम का अचार बनाने और पके आम को चूस कर अथवा काट कर खाने का उल्लेख मिलता है. मुगल बादशाहों को भी आम बहुत प्रिय था. कहा जाता है कि अकबर ने दरभंगा में एक लाख आम के पेड़ लगवाए थे. मुगलवंश के संस्थापक जलालुद्दीन बाबर को भी आम पंसद थे. बाबरनामा में जिक्र है कि आम अच्छे हों तो बहुत ही बढ़िया होते हैं पर बहुत खाओ तो थोडे़ से ही बढ़िया वाले मिलेंगे. अक्सर कच्ची केरियां तोड़ लेते हैं और पाल डाल कर पकाते हैं. गदरी केरियों का कातीक (मुरब्बा) लाजवाब बनता है. शीरे में भी अच्छा रहता है. कुल मिलाकर यहां का सबसे बढ़िया फल यही है. कुछ लोग तो सरदे के सिवा किसी और फल को इसके आगे कुछ मानते ही नहीं.

भारत आज भी आम की पैदावार के मामले में दुनिया में सरताज है. पूरी दुनिया में हर साल लगभग साढ़े तीन करोड़ टन आम पैदा होता है. इसमें से करीब डेढ़ करोड़ टन अकेले भारत में होता है. भारत के बाद क्रमशः चीन मैक्सिको थाइलैण्ड और पाकिस्तान का स्थान आता है. यूरोप में स्पेन में सबसे अधिक आम होता है और वहां का आम अपनी खास तीखी महक के कारण अलग पहचाना जाता है. अफ्रीकी देशों के आम के रंग बेहद आकर्षक होते हैं.

जिस तरह आम को फलों का राजा कहा जाता है उसी तरह दशहरी को आमों का राजा माना जाता है. दशहरी के दीवानों की भारत के बाहर भी कमी नहीं है. इसलिए अब इसका निर्यात भी बढ़ रहा है. मलीहाबाद के आस पास के इलाके के लिए तो दशहरी उपर वाले की सबसे बड़ी नियामत है. इस पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था शादी-ब्याह उत्सव. खरीदादारी और तमाम खुशियां सब कुछ दशहरी की फसल के अच्छे- बुरे होने से जुड़ी हैं. आम इस पूरे इलाके के लिए खुशियों की बहार हैं. गालिब ने कहीं आम की तारीफ में कहा था.

     बारे आमों का कुछ बयां हो जाए 
     ख़ामां नख़्ले रतबफ़िशां हो जाए

     आम का कौन मर्द-ए-मैंदा है
     समर-ओ-शाख गुवे-ओ-चैंगा है 

मलीहाबाद में जन्मे क्रान्तिकारी शायर जोश मलीहाबादी भी हिन्दुस्तान छोड़ते समय मलीहाबाद के आमों को भुला नहीं पाए थे –    

आम के बागों में जब बरसात होगी पुरखरोश 
    मेरी फुरकत में लहू रोएगी चश्मे मय फरामोश
    रस की बूदें जब उड़ा देंगी गुलिस्तानों के होश
    कुंज-ए-रंगी में पुकारेंगी हवांए जोश-जोश
    सुन के मेरा नाम मौसम गम जदा हो जाएगा
    एक महशर सा महफिल में गुलिस्तांये बयां हो जाएगा 
    ए मलीहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा.

नए जमाने के जानदार शायर गुलजार ने तो एक कविता में आम के दरख्त के बहाने जिन्दगी का पूरा फलसफा ही कह डाला है-

    मोड़ पर देखा है वो बूढ़ा इक आम का पेड़ कभी 
    मेरा वाकिफ है, बहुत सालों से मैं जानता हूं.
    सुबह से काट रहे हैं वो कमेटी वाले 
    मोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको

लेकिन आम के बागों की सेहत दुरूस्त रखने के लिए बूढ़े पेड़ों का विछोह भी जरूरी है. आम के इनसाइक्लोपीडिया कलीमुल्लाह मानते हैं कि आज आम की सबसे बड़ी बीमारी सबसे बड़ी समस्या इनका घनाव है. वे कहते हैं, आज बागों में आम के पेडों के बीच दूरी बढ़ा दी जाए, बीच के पेड़ काट दिए जाएं तो हर पेड़ का दायरा फैलेगा और पेड़ चैड़ाई में जितना फैलेगा उतना ही उसमें ज्यादा जान होगी, उतनी ही ज्यादा पैदावार होगी. इसलिए कटाई और छटाई जरूरी है. कभी मलीहाबाद के आम के बागों में आम की दावतें हुआ करती थीं. शेरो शायरी की महफिलें सजा करती थीं.  डालों पे झूले पड़ते थे. परिन्दे चहका करते थे और जिन्दगी में सचमुच बहार आ जाती थी . बदलते जमाने की रफ्तार में बाग तो बरकरार हैं मगर बहार नदारत हो गई है. फिर भी जिस किसी को आम की प्यास बुझाने का कोई उपाय ढूंढ़ना हो और आम की असली लज्जत का मजा लेना हो, उसे आम के दिनों में मलीहाबाद का एक चक्कर तो जरूर लगाना चाहिए.

 

'मौजूदा दौर में लेखकों के बीच लेखन का जिक्र कम हो रहा है'

आपकी पसंदीदा लेखन शैली क्या है?

उपन्यास मुझे बहुत प्रिय है. दुनिया भर के उपन्यास मुझे पसंद हैं. इसके अलावा यात्रा वृत्तांत और आत्मकथाएं बहुत पसंद हैं.

अभी क्या पढ़ रहे हैं?

उग्र जी की आत्मकथा अपनी खबर मैंने पढ़ी. यह मुझे बहुत दिलचस्प लगी. भाषा और कथ्य के लिहाज से यह अनूठी किताब है. साथ ही मार्क्वेज का हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिट्यूड भी हाल में पढ़ा है.

वे रचनाएं या लेखक जिन्हें आप बेहद पसंद करते हों?

नागार्जुन, फैज, शमशेर और केदारनाथ अग्रवाल मुझे बहुत प्रिय हैं. शमशेर मुझे शाम को याद आते हैं, नागार्जुन कड़ी धूप में और अग्रवाल बादलों के छाने पर. गालिब, निराला, मराठी के विंदा करंदीकर, पंजाबी के सुरजीत पातर, मलयालम के शंकर पिल्लै, उड़िया के रमाकांत रथ और कश्मीरी के रहमान राही भी पसंद हैं.

कोई जरूरी रचना जिसपर नजर नहीं गई हो?

जो लोग पढ़ते हैं, वे रचनाओं का आपस में जिक्र भी करते हैं. दुनिया की दूसरी भाषाओं में एकदम नया कवि भी एकदम पुराने कवियों का जिक्र करता है. लेकिन मौजूदा दौर में लेखकों के बीच लेखन का जिक्र कम हो रहा है. हिंदी में बहती गंगा (शिव प्रसाद रुद्र ‘काशिकेय’) और माटी की मूरतें (रामवृक्ष बेनीपुरी) अच्छी किताबें हैं, पर इनकी चर्चा नहीं होती.

कोई रचना जो बेवजह मशहूर हो गई हो?

कोई भी रचना बेवजह मशहूर नहीं होती. कुछ लोग होते हैं जो उसे चाहते हैं और अगर वे प्रभावशाली हुए तो रचना मशहूर हो जाती है. लेखन में विभिन्न आंदोलनों के जरिए भी कुछ किताबें चर्चा में आती हैं, लेकिन आखिर वही बचता है जो बचने लायक रहता है.

पढ़ने की परंपरा कायम रहे, इसके लिए क्या किया जाना चाहिए?

हिंदी में प्रकाशक बड़े आत्ममुग्ध हैं. पैसे से अलग होकर उन्हें पाठकों तक ठेले पर किताबें ले जाने के बारे में सोचना होगा.

रेयाज उल हक

फुटबॉल की एक समृद्ध नर्सरी

1970 के साल का सुब्रतो कप फाइनल तो पूरी तरह से ही देहरादून के नाम रहा. उस साल देहरादून की गोरखा ब्वॉयज कंपनी ने यहीं के गोरखा मिलेट्री स्कूल को 2-1 से हराकर सुब्रतो कप जीता उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में एक इलाका है गढ़ी कैंट. इसके आसपास बसे गांवों के बच्चों के बारे में कभी कहावत थी कि वे पैदा ही फुटबॉल के जूते पहनकर होते हैं. वह ऐसा दौर था जब शहर की फुटबॉल टीमें राष्ट्रीय स्तर पर अपने से कहीं मजबूत कद-काठी वाले खिलाड़ियों की टीमों को रौंद देती थी. राष्ट्रीय टीम में भी देहरादून के कई खिलाड़ी होते थे. इनमें से कइयों की तो पांचवीं पीढ़ी फुटबॉल खेल रही है. आज भी इन गांवों के बच्चों में फुटबॉल के लिए दीवानगी जिंदा है. हालांकि अब मौकों की कमी और खेल को व्यावसायिक स्वरूप न दे पाने जैसी वजहों ने शहर को इस खेल के मामले में पीछे धकेल दिया है.

देहरादून में फुटबॉल 1872 में यहां के वीरपुर और घंघोड़ा इलाके में गोरखा पल्टन के सेंटर खुलने के साथ आया. उस समय अंग्रेज सैनिकों के लिए दूनघाटी में मनोरंजन का एकमात्र साधन यह खेल ही था. समय के साथ इसकी लोकप्रियता बढ़ती रही. 1939 से तो देहरादून जिला खेल संघ ने यहां लाला नेमीदास फुटबॉल लीग मैच भी शुरू करा दिए थे. 60 का दशक आते-आते देहरादून देश के प्रमुख फुटबॉल केंद्रों में से एक बन गया.गोरखा ब्रिगेड तथा गोरखा मिलिट्री स्कूल के खिलाड़ियों के शानदार प्रदर्शन के चलते उम्दा फुटबॉल के लिए शहर का नाम कलकत्ता के बाद लिया जाने लगा था. आजादी के बाद देहरादून के फुटबॉल को पहली बड़ी सफलता तब मिली जब 58वीं गोरखा ब्रिगेड 1950 में डीसीएम कप के फाइनल में पहुंची. वहां यह देश की प्रमुख टीम ईस्ट बंगाल से हार गई मगर इसका प्रदर्शन हर जगह चर्चा का विषय बना. फिर लगातार तीन साल तक देहरादून की यह टीम डीसीएम कप की रनर-अप रही.

शहर के फुटबॉल को समर्पित वेबसाइट देहरादूनफुटबॉल.कॉम के संचालक, पत्रकार राजू गुसांई बताते हैं कि उस समय देहरादून के लीग मैचों का स्तर भी उम्दा हुआ करता था. वे कहते हैं, ‘वर्ष 1953 में डूरंड कप के फाइनल में पहुंचकर मोहन बगान की टीम से पराजित आईएमए देहरादून की फुटबॉल टीम वहां से वापस आते ही देहरादून लीग मैचों में दून के एक क्लब से मैच हार गई.’ 1958 में गोरखा ब्रिगेड की टीम डूरंड कप के फाइनल में पंहुचने वाली दून की दूसरी टीम बनी जहां उसने सिक्ख रेजीमेंट को 2-0 से हराया. राजू गुसांई बताते हैं, ‘वर्ष 1969 में गोरखा ब्रिगेड ने बीएसएफ को हराकर फिर डूरंड कप जीता.’

उस दौर में देहरादून के जूनियर खिलाड़ियों ने भी अपना जलवा बिखेरना शुरू कर दिया था. वर्ष 1960 से शुरू हुए जूनियर सुब्रतो कप में 1972 तक 12 सालों में देहरादून की टीमें सात बार फाइनल में पहुंचीं. जिसमें दून के गोरखा मिलेट्री स्कूल की टीम 1964 व 1965 में तथा गोरखा ब्वॉयज कंपनी 1969, 1970 व 1972 में चैंपियन बनीं. 1970 के साल का सुब्रतो कप फाइनल तो पूरी तरह से ही देहरादून के नाम रहा. उस साल देहरादून की गोरखा ब्वॉयज कंपनी ने यहीं के गोरखा मिलेट्री स्कूल को 2-1 से हराकर सुब्रतो कप जीता.

यह देखते हुए स्वाभाविक ही था कि राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में श्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे देहरादून के खिलाड़ी राष्ट्रीय फुटबॉल टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने लगे. भारत द्वारा जीते गए अंतर्राष्ट्रीय मैचों में देहरादून के फुटबॉलरों की महत्वपूर्ण भूमिका रही. 1969 में मलेशिया में खेले गए मड्रेका कप में भारत की ओर से तीन खिलाड़ी अमर बहादुर गुरंग, भूपेन्द्र रावत तथा रणजीत थापा खेले तो 1970 व 1971 में मड्रेका कप में भी दून के तीन-तीन खिलाड़ियों ने देश का प्रतिनिधित्व किया. देहरादून के अजय सूद, कमलनयन बर्तवाल आदि जूनियर इंडिया फुटबॉल टीम के खिलाड़ियों में रहे.

लेकिन 1976 के बाद देहरादून से गोरखा सेंटरों के देश के अन्य शहरों में जाने के बाद दून के फुटबॉल की दुर्दशा शुरू हो गई. अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉल प्रतियोगिताओं में कई बार भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके अमर बहादुर गुरंग बताते हैं कि देहरादून का फुटबॉल उस समय सेना के इर्द-गिर्द आगे बढ़ता था. बचपन की यादों को ताजा करते हुए वे बताते हैं कि उस समय के बच्चे गोरखा सेंटरों के नामी खिलाड़ियों को अपने आसपास खेलते देख बड़े होते थे. उन्हें अपना हीरो मानकर ये बच्चे भी फुटबॉल किट पहनकर खेलना शुरू कर देते थे. गोरखा मिलेट्री स्कूल में फुटबॉल के गुर सीखने के बाद ये सेना में भर्ती हो जाते थे. इस स्वाभाविक प्रक्रिया में युवा खिलाड़ियों को भविष्य में रोजी-रोटी के संकट की चिंता नहीं रहती थी. सेना के अलावा ओएनजीसी, सर्वे आफ इंडिया, ऑर्डिनेंस फैक्टरी जैसे प्रतिष्ठान भी तब अच्छे खिलाड़ियों को अपने यहां भर्ती कर लेते थे. इन सभी की अच्छी फुटबॉल टीमें थीं. अब सालों से इन्होंने खिलाड़ी भर्ती नहीं किए हैं. अमर बहादुर कहते हैं, ‘पेट की चिंता से जूझ रहे खिलाड़ियों से चमत्कार की आशा नहीं की जा सकती.’

लेकिन फिर भी कुछ चीजें आने वाले कल के लिए उम्मीदें जगाती हैं. देहरादूनफुटबाल.कॉम  को ही लीजिए. दुनिया और नए खिलाड़ियों को इस शहर के फुटबॉल का स्वर्णिम इतिहास बताने के लिए देहरादून के चार युवाओं राजू गुसांई, एलपी थापा, रोहित गोयल और नीलेश राणा ने 2005 में देश में शहरी फुटबॉल पर यह पहली वेबसाइट बनाई. इन युवाओं के प्रयासों से मोहन बागान सेल फुटबॉल अकादमी, दुर्गापुर, 2006 में फुटबॉल खेलने देहरादून आई. जिला फुटबॉल संघ के सचिव देवेंद्र बिष्ट बताते हैं, ‘30 सालों के बाद देहरादून के निवासियों को फिर एक बार स्तरीय खेल देखने को मिला.’ इसी प्रयास के तहत 27 जून 2009 में भारत की पहली मुफ्त एसएमएस फुटबॉल सेवा शुरू की गई जिसके माध्यम से देश भर के फुटबॉल प्रेमियों, खेल पत्रकारों व खिलाड़ियों को रोज देश में हो रही महत्वपूर्ण फुटबॉल प्रतियोगिताओं के नतीजे देहरादून से एसएमएस करके भेजे जाते हैं. अखिल भारतीय फुटबॉल संघ (एआईएफएफ) भी देहरादून फुटबॉल लीग के नतीजों को अपनी वेबसाइट पर प्रदर्शित करता है. देहरादूनफुटबाल.कॉम के प्रशंसकों में इतिहासकार रामचंद्र गुहा और फुटबॉल कंमेंट्रेटर और डूरंड कप सोसाइटी के नोवी कपाड़िया जैसे जाने-माने लोग हैं. कपाड़िया ने तो इस साल देहरादून की दो टीमों को डूरंड कप के क्वालीफाइंग मैचों में सीधा प्रवेश देने का वादा भी किया है. देहरादून जिला फुटबॉल एसोसिएशन में रजिस्टर्ड लगभग 900 खिलाड़ियों की संख्या बताती है कि उपेक्षा के बावजूद दून घाटी में फुटबॉल के लिए ललक जिंदा है. इसीलिए जिला फुटबॉल संघ के अध्यक्ष जोगिंदर पुंडीर को आशा है कि देहरादून का फुटबॉल अपना स्वर्णिम काल दोहराएगा.    l 

खेल की खामोश क्रांति

रांची के पास दो गुमनाम-से गांवों रुक्का और हुतु के बीच सड़क किनारे बने एक मैदान में हर सुबह एक शोर सुनाई देता है. यहां मुंह अंधेरे युवा आदिवासी लड़कियां अपनी फुटबॉल प्रैक्टिस से पहले जॉगिंग करती हैं. उनके साथ फ्रैंज गेसलर सबसे आगे भागते दिखते हैं. अमेरिका में मिनेसोटा के इस निवासी ने इस छोटी-सी जगह को अपना घर बना लिया है. अपने इस काम को वे मजाक में रिवर्स सोशल मोबिलिटी कहते हैं. गेसलर 27 साल के हैं. हावर्ड विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने कोका कोला, बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप और ऊषा मार्टिन जैसी चर्चित कंपनियों के लिए काम किया. लेकिन जो काम अब वे कर रहे हैं वह उनकी अब तक की सर्वश्रेष्ठ रणनीति हो सकती है. आदिवासी लड़कियों के इस झुंड को उन्होंने फुटबॉल की एक असाधारण टीम बना दिया है.

गेसलर को सबसे ज्यादा विरोध उन मांओं से झेलना पड़ा जिन्हें यह एतराज था कि लड़कियां खेलने जाएंगी तो घर के काम में उनका हाथ कौन बंटाएगा

गौर करें कि यह ऐसी जगह है जहां लड़कियों की जिंदगी का दायरा मुश्किल से ही रसोई या घर के कामों के बाहर जा पाता है. ऐसे में गेसलर की यह उपलब्धि काफी बड़ी लगती है. इसके बावजूद वे विनम्रता से कहते हैं कि उन्होंने तो महज क्षमताओं को दिशा दी है. उनके शब्दों में ‘लड़कियों में प्रतिभा थी. मैंने तो उसे बस फुटबॉल के साथ जोड़ दिया है.’

लेकिन पिछले साल तक उन्हें यह काम खासा मुश्किल नजर आ रहा था. लड़कियों के मां-बाप उन्हें फुटबॉल खेलने की इजाजत देने के लिए तैयार ही नहीं थे. महीनों तक उन्हें समझाने के बाद गेसलर को सफलता मिल ही गई. वे बताते हैं, ‘पहले-पहल तो ऐसा हुआ कि मेरी कितनी भी कोशिशों के बावजूद सब कभी भी एक तय वक्त पर मैदान में नहीं पहुंचतीं. फिर एक दिन मैंने उनसे पूछा कि क्या उनके घर में घड़ी है. सिर्फ एक के ही घर में थी और वह भी टूटी हुई.’

शुरुआत में लोगों को गेसलर पर शक भी हुआ. कुछ को वे धर्मपरिवर्तन के मकसद से यहां आए मिशनरी लगे. किसी को लगा कि वे माइनिंग कंपनियों के लिए काम करते हैं. गेसलर के साथ काम करने वाली एक स्वयंसेविका हेलेना टेटे बताती हैं, ‘हाल ही में एक खिलाड़ी ने हमें बताया कि उसके गांव के कुछ लोगों ने उसके घरवालों को चेतावनी दी थी कि हम उसका अपहरण कर उसे अमेरिका भेज देंगे. देखा जाए तो इस अंदेशे में कुछ अस्वाभाविक भी नहीं है क्योंकि राज्य से हर साल औसतन 30,000 लड़कियों की तस्करी होती है.’
मगर गेसलर को सबसे ज्यादा विरोध उन मांओं से झेलना पड़ा जिन्हें यह एतराज था कि लड़कियां खेलने जाएंगी तो घर के काम में उनका हाथ कौन बंटाएगा. लेकिन आज वही मांएं अपनी बेटियों का उत्साह बढ़ाती हैं.

खिलाड़ियों की जो लिस्ट तीन नामों के साथ शुरू हुई थी आज उसमें 100 से भी ज्यादा लड़कियां हैं. इनमें गीता, सीता और नीता झारखंड की अंडर 13 टीम में हैं. इस टीम ने पिछले राष्ट्रीय खेलों में दिल्ली की टीम को 8-1 से रौंदा. उत्साह के साथ सीता कहती है, ‘दिल्ली की गोलकीपर को तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है.’ फुटबॉल ने इन लड़कियों को बराबरी का मैदान दिया है. नीता कुमारी कहती है, ‘हमें पूरा विश्वास है कि हमारा जूनियर टीम में सलेक्शन हो जाएगा और अगर वे (गेसलर) हमारे साथ रहे तो यह पक्का है कि हम राष्ट्रीय टीम के लिए कई अच्छे पल लेकर आएंगे. हमें उस दिन का इंतजार है.’

लेकिन गेसलर को अहसास है कि पहाड़ सरीखी चुनौतियां आगे भी हैं. वे न विश्वस्तरीय खिलाड़ी हैं न कोच. बल्कि वे तो हॉकी खेला करते थे. लड़कियों को फुटबॉल सिखाने के लिए वे इंटरनेट का सहारा लेते हैं. वे कहते हैं, ‘मैं एलेक्स फर्गुसन नहीं हूं लेकिन मेरी क्षमताएं उनकी सीमाएं नहीं होनी चाहिए. और सबसे बढ़िया कोच तो खुद खेल ही होता है. हम एक ऐसा माहौल बना रहे हैं जिसमें वे खुद ही बेहतर होती रहें.’ इस मकसद को चलायमान रखने के लिए गेसलर को हर साल करीब 20 लाख रुपए की जरूरत है. खिलाड़ी बढ़ते जा रहे हैं और वे कोशिश कर रहे हैं कि पैसा इकट्ठा करके वे फुटबॉल के मैदान के लिए जमीन खरीद लें. राज्य सरकार और निजी कंपनी कोका-कोला द्वारा उनकी मदद की संभावनाएं बन रही हैं.

राह भले ही कठिन हो लेकिन गेसलर के समर्पण में कोई कमी नहीं. एक अन्य कोच आनंद गोप बताते हैं, ‘प्रैक्टिस के लिए वे सबसे पहले मैदान पर पहुंचते हैं. सुबह साढ़े चार बजे. तब उनके साथ गांव के कुत्ते ही होते हैं.’ गेसलर मानते हैं कि मिनेसोटा की ठंडी आबोहवा उन्हें  याद आती है, मगर जब वे खुले आसमान के नीचे लड़कियों के माता-पिता के साथ खाना खाने बैठते हैं तो माहौल में पसरी शांति उन्हें बहुत भाती है.

उनकी मेहनत कई तरह से रंग ला रही है. कुछ समय पहले जब 17 साल की पूनम टोपो की सगाई हुई तो उसने गेसलर से आग्रह किया कि वे उसके होने वाले पति से बात करें ताकि शादी के बाद भी उसका खेल जारी रह सके. उसके मंगेतर राजेश ओरांव कहते हैं, ‘अगर उसे यह अच्छा लगता है तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है.’ सीता कुमारी की मां सावित्री कहती हैं, ‘फुटबॉल नहीं होता तो सीता मेरे साथ रसोई में काम कर रही होती. उसकी जिंदगी गुमनाम होती.’ गेसलर का काम ऐसी जिंदगियों को नए नाम और आयाम दे रहा है.        

वो भूली दास्तां…

हर चार साल बाद फुटबॉल का विश्व कप आता है और देश में इस खेल की दुर्दशा के बारे में कुछ सवाल छोड़ जाता है. लेकिन वह भी वक्त था जब हालात आज के उलट थे. कभी भारत एशिया की सबसे तगड़ी फुटबॉल टीम हुआ करता था और यह टीम 1950 के विश्व कप में हिस्सा लेते-लेते रह गई थी.

मेलबर्न ओलंपिक में टीम चौथे स्थान पर रही. ऐसा पहली बार हुआ था कि कोई एशियाई टीम ओलंपिक के सेमीफाइनल में पहुंची हो

1950 का विश्व कप जब आयोजित हो रहा था तो दुनिया दूसरे विश्व युद्ध की त्रासदी से उबर ही रही थी. उम्मीद की जा रही थी कि खेमों में बंट चुकी दुनिया के लिए यह आयोजन एक होकर जश्न मनाने का मौका लेकर आएगा. भारत को एशिया की सबसे मजबूत टीम होने के नाते इसमें शामिल होने का निमंत्रण मिला. लेकिन कहते हैं कि ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (एआईएफएफ) ने यह निमंत्रण ठुकरा दिया क्योंकि उन दिनों भारतीय खिलाड़ी नंगे पैरों से खेलते थे और एआईएफएफ  को लगा कि अगर फीफा के नियमों के मुताबिक उन्हें जूते पहनकर खेलना पड़ा तो वे अच्छा नहीं खेल पाएंगे.

लेकिन बहुत-से लोग मानते हैं कि वजह सिर्फ यही नहीं थी. भारत तब एक नया-नया आजाद हुआ देश था और उसके पास टीम पर खर्च करने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा नहीं थी. पानी के जहाज से ब्राजील तक की समुद्री यात्रा भी बहुत लंबी होती. इसके अलावा एक बात और भी है. 1970 तक भारत में फुटबॉल के मैच 90 की बजाय 70 मिनट के हुआ करते थे, इसलिए यह भी लगा कि मैच के आखिर तक टीम थक जाएगी और गोल खा बैठेगी. अब यह कहा जाता है कि अगर भारत ने 1950 के विश्व कप में भाग ले लिया होता तो देश में इस खेल को एक दूसरी ही दिशा मिल गई होती. फुटबॉल को अब तक एक व्यापक और पेशेवर स्वरूप मिल चुका होता और भारत के लोग विश्व कप में शायद अपनी ही टीम का उत्साह बढ़ा रहे होते.

फुटबॉल में भारत के करीब डेढ़ दशक लंबे स्वर्णयुग की शुरुआत 1948 में लंदन ओलंपिक से हुई. तब सैय्यद अब्दुल रहीम टीम के कप्तान थे. भारत क्वार्टरफाइनल तक पहुंचा जहां उसे फ्रांस जैसी मजबूत टीम से 2-1 से शिकस्त खानी पड़ी थी. इस मैच में भारतीय टीम दो पेनल्टी किकों का फायदा नहीं उठा पाई थी क्योंकि खिलाड़ी ठिठुराती ठंड में नंगे पांव खेल रहे थे. इसके बावजूद भारतीय खिलाड़ियों का खेल इतना रंग जमा गया था कि मैच के बाद किंग जार्ज षष्ठम ने इस टीम को अपने महल में आमंत्रित किया था.

1951 में नई दिल्ली में एशियाई खेलों का आयोजन हुआ. भारत ने फुटबॉल में स्वर्ण पदक जीता और एशिया में अपनी श्रेष्ठता पर मुहर लगाई. इसके बाद था 1952 का हेलसिंकी ओलंपिक. यहां टीम को कड़कड़ाती ठंड में नंगे पांव खेलने का खामियाजा भुगतना पड़ा और उसे यूगोस्लाविया ने 10-1 से रौंद डाला. इसका नतीजा यह हुआ कि अगले साल से एआईएफएफ ने खिलाड़ियों के लिए जूते पहनना जरूरी कर दिया.

1956 का साल भारतीय फुटबॉल के लिए एक बड़ी उपलब्धि लेकर आया. मेलबर्न ओलंपिक में टीम चौथे स्थान पर रही. ऐसा पहली बार हुआ था कि कोई एशियाई टीम ओलंपिक के सेमीफाइनल में पहुंची हो. भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 4-2 से हराया था और नेविल डिसूजा ओलंपिक में हैट्रिक जमाने वाले पहले और अकेले एशियाई बने. सेमीफाइनल में भी भारत का खेल शानदार था और यह मैच खत्म होने से दस मिनट पहले तक टीम 1-0 की बढ़त बनाए हुए थी.

वह ऐसा दौर था जब भारतीय खिलाड़ियों के ड्रिबल, पास और मैदान पर उनकी रफ्तार देखते ही बनती थी. फॉरवर्ड चुन्नी गोस्वामी, तुलसीदास बलराम, पीके बनर्जी, साहू मेवालाल और अहमद खान, मिडफील्डर नूर मोहम्मद, केंपिया और यूसुफ खान, डिफेंडर अजीज, लतीफ और जरनैल सिंह और गोलकीपर टी आओ और बाद में पीटर थंगराज का खेल एशिया में मानक माना जाता था.
1962 में जकार्ता में हुए एशियाई खेलों में मिले स्वर्ण कप को भारतीय फुटबॉल की आखिरी बड़ी उपलब्धि माना जाता है. खासकर उन परिस्थितियों के संदर्भ में जिनमें यह खेला गया था. दरअसल तब राजनीतिक कारणों से इजराएल और ताइवान को इस आयोजन से बाहर रखा गया था और इसके लिए भारत ने मेजबान देश की आलोचना की थी. इसके बाद तो स्थानीय प्रशंसकों की भीड़ मानो भारत की दुश्मन हो गई. हालत यह थी कि जरनैल सिंह बस के फर्श पर बैठते थे ताकि बाहर लोगों को उनकी पगड़ी न दिखे. बाद में एक साक्षात्कार में जरनैल ने याद करते हुए बताया था, ‘स्टेडियम में एक लाख से भी ज्यादा लोग हमें हूट कर रहे थे. यहां तक कि हमारे राष्ट्रगान को भी सम्मान नहीं दिया गया. जब बॉल हमारे किसी खिलाड़ी के पास आती तो स्टेडियम में इतना शोर होता कि रेफरी की सीटी सुनना भी मुश्किल हो जाता.’

इसके बावजूद भारतीय टीम ने असाधारण खेल दिखाया और फाइनल में दक्षिण कोरिया को 2-1 से मात दी. इससे पहले एक लीग मैच में दक्षिण कोरिया भारत को हरा चुका था. यह जीत इसलिए भी खास थी कि कई खिलाड़ी बीमारी और चोटों के बावजूद खेले थे. गोलकीपर थंगराज को फ्लू था, अंगूठे का नाखून उखड़ने की वजह से राइट बैक त्रिलोक सिंह को बहुत तकलीफ हो रही थी, जरनैल के माथे में चोट लगी थी. मगर ये सभी खिलाड़ी यह सब भूलकर खेले. मैच के आखिरी क्षणों तक तो जरनैल के माथे का घाव खुल गया और उससे खून बहने लगा. लेकिन उन्होंने मैदान छोड़ने से इनकार कर दिया क्योंकि उन दिनों खिलाड़ी बदलने का नियम नहीं था और उनके मैदान से बाहर जाने का मतलब होता टीम का दस खिलाड़ियों के साथ खेलना. ऐसा था उस टीम का जुनून.

(लेखक जाने-माने फुटबॉल विशेषज्ञ हैं)

 

जहां 'गोल' है जहां

इतिहास के पन्ने सम्राटों और विजेताओं की असाधारण उपलब्धियों से भरे पड़े हैं. लेकिन हमारे दौर का इतिहास जब लिखा जाएगा तो पढ़ने वालों को यह सोचकर जरूर हैरत होगी कि किस तरह एक गेंद ने थोड़े-से ही वक्त में सारी दुनिया को जीत लिया. लोकप्रिय खेल तो बहुत से हैं मगर फुटबॉल ने जिस विराटता के साथ दुनिया के हर कोने में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है वह किसी भी दूसरे खेल के हर दावे को छोटा कर देती है.

सारी दुनिया की तरह भारत में भी इन दिनों फुटबॉल विश्व कप का खुमार है. देश में खेल की लचर दशा के कारण भारतीय टीम भले ही इस प्रतिष्ठित मंच तक पहुंच नहीं पाईहो मगर उससे फुटबॉल के दीवानों का जोश कम नहीं हुआ है. यह विशेष प्रस्तुति उन उजले कोनों को देखने की कोशिश है जो अपने यहां इस खेल पर छाई नाउम्मीदी की घनी बदरी में कहीं-कहीं पर नजर आते हैं

कोलकाता से केरल तक जाबूलानी

कोलकाता के रंग इन दिनों बदले हुए हैं. जो शहर महीना भर पहले तक वाममोर्चे के लाल और तृणमूल के तिरंगे झंडों से अटा पड़ा था उसकी दीवारों पर इन दिनों या तो अर्जेंटीना की जर्सी का नीला-सफेद रंग दिखता है या फिर ब्राजील की पहचान हरा-पीला. दक्षिण अफ्रीका में चल रहे फुटबाल विश्व कप ने इस शहर की फिजा तब्दील कर दी है.

ब्राजील के तो खैर यहां के लोग बहुत पहले से ही प्रशंसक रहे हैं मगर अर्जेंटीना की लोकप्रियता तब बढ़ी जब विश्व कप में मैरेडोना ने अपने जादुई खेल का जलवा दिखाया

रेलवे में काम करने वाले अजय कार की मेहनत हर विश्व कप में बढ़ जाती है. इस दौरान वे कोलकाता की दीवारों पर फुटबॉल के सितारों की तस्वीरें बनाते हैं. इस बार उन्होंने हरीश मुखर्जी रोड पर स्थित बालीगंज शिक्षा सदन की दीवारों पर अपने रंग सजाए हैं. पिछले 28 साल से वे इस काम में लगे हैं ताकि बच्चों को फुटबॉल खेलने की प्रेरणा मिले. उनके साथी पप्पू दास कहते हैं, ‘फुटबॉल के मामले में हमें ब्राजील से अपनापा महसूस होता है. हमारी तरह वह भी गरीब देश है और फुटबॉल गरीबों का खेल है. उन्होंने दिखा दिया है कि गरीबी आपसे आपकी क्रिएटिविटी नहीं छीन सकती.

कई दशकों से कोलकाता में फुटबॉल का मतलब घोटी-बांगाल प्रतिद्वंद्विता रहा है. बांगाल यानी आजादी से पहले के पूर्वी बंगाल से यहां आए शरणार्थी और घोटी मतलब प. बंगाल के मूल लोग. मोहन-बागान और ईस्ट बंगाल के मैचों का रोमांच इसी होड़ का परिणाम होता था. ईस्ट बंगाल के प्रशंसक जर्मनी को अपना आदर्श मानते थे जबकि घोटियों का आदर्श ब्राजील हुआ करता था.

लेकिन वक्त के साथ कोलकाता भी बदला और इस प्रतिद्वंद्विता में अब पहले जैसा तीखापन नहीं दिखता. क्षेत्रीय और भाषाई दरारें धुंधली पड़ रही हैं और साल्ट लेक स्टेडियम में उमड़ने वाली भीड़ की आदर्श टीमें अब अर्जेंटीना और ब्राजील हैं. ब्राजील के तो खैर यहां के लोग बहुत पहले से ही प्रशंसक रहे हैं मगर अर्जेंटीना की लोकप्रियता तब बढ़ी जब विश्व कप में मैरेडोना ने अपने जादुई खेल का जलवा दिखाया. पेले और मैरेडोना, दोनों ही यहां आ चुके हैं. पेले 1977 में आए जबकि मैरेडोना 2008 में और इन दोनों हस्तियों का शहर ने जिस तरह स्वागत किया वह देखने लायक था. मैरेडोना तो कह भी गए कि यह अब तक की जिंदगी में उनका दूसरा सबसे भव्य स्वागत था.

केरल में कोच्चिकोड़े के पास बसे एक गांव निननवलप्पु में भी इन दिनों फुटबॉल विश्व कप के रंग बिखरे हैं. समुद्र के पास स्थित निननवलप्पु में घूमते हुए आपको जगह-जगह पर खिलाड़ियों के कट-आउट, बैनर और होर्डिंग लगे दिख जाएंगे. युवाओं का इन दिनों अपनी पसंदीदा टीम की जर्सी में दिखना आम बात है. निननवलप्पु फुटबॉल फैंस एसोसिएशन के सेक्रेटरी एनवी सुबैर कहते हैं, ‘अर्जेंटीना से लेकर न्यूजीलैंड तक हमारे यहां सभी 32 देशों के प्रशंसक हैं.यह खेल हमारे यहां दिलों को जोड़ता है और सांप्रदायिक तनाव पर लगाम रखता है.उनकी एसोसिएशन का जलवा यह है कि वह फीफा से जुड़ी हुई है और इस अंतर्राष्ट्रीय संस्था की तरफ से उसे नए नियमों, ब्रॉशरों और मिनियेचरों की एक कॉपी भी भेजी गई है.

सिर्फ निननवलप्पु ही नहीं बल्कि केरल के समूचे उत्तरी हिस्से पर इन दिनों फुटबॉल का खुमार छाया हुआ है. मलप्पुरम इस खुमार का केंद्र है. यहां पीके मैरेडोना भी रहते हैं. 24 साल के मैरेडोना एक प्राइवेट फर्म में काम करते हैं. 1986 के विश्व कप में मैरेडोना का शानदार प्रदर्शन देखकर उनके पिता छथुकुट्टी ने उनका नामकरण इस स्टार के नाम पर कर दिया. इन दिनों लियोनेल मेसी के प्रशंसक मैरेडोना याद करते हैं, ‘स्कूल में टीचरों को इसके लिए मनाना कि वे मुझे इसी नाम से पुकारें, सबसे मुश्किल काम रहा.हंसते हुए वे कहते हैं कि वे भी अपने बच्चों का नाम फुटबॉल के सितारों के नाम पर ही रखना चाहेंगे बशर्ते उनकी पत्नी इसके लिए राजी हो जाए. मलप्पुरम में एक फूड फेस्टिवल भी चल रहा है जिसमें फुटबॉल खिलाड़ियों के नाम पर व्यंजन परोसे जा रहे हैं. चिकन मेसी मैजिक, क्रिस्टियानो डोसा जैसे इन व्यंजनों के प्रति लोगों में खूब उत्साह भी है. सिर्फ खाने ही नहीं, पीने में भी फुटबॉल का जलवा है. पेले डांस शेक, मैराडोनास गॉड्स हैंड, अफ्रीकन ब्लैक ब्वॉयज जैसे पेय खूब बिक रहे हैं और फुटबॉल के दीवाने इनका आनंद ले रहे हैं. कोच्चि के तेवरा में आपको डॉन अडोनी, रॉबर्टो बैजियो और जमोरानो नाम के तीन भाई मिलेंगे. उनके पिता स्नेहजन दिहाड़ी मजदूर हैं. वे चाहते हैं कि फुटबॉल के इन सितारों की तरह उनके बेटे भी इस खेल से अपनी रोजी कमाएं.

भारत के पूर्व कप्तान आईएम विजयन कभी त्रिशूर में होने वाले स्थानीय मैचों के दौरान मूंगफली और सोडा बेचकर गुजारा करते थे.  वे कहते हैं, ‘यहां फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि जिंदगी है. यहां तो एक बच्चा भी हर टीम और खिलाड़ी के बारे में अपनी राय रखता है.केरल की तरह गोवा में भी फुटबॉल को लेकर दीवानगी देखने को मिलती है. यहां फुटबॉल बड़ा खेल है और बड़ा कारोबार भी. देश के तमाम मशहूर फुटबॉल क्लब यहां हैं. मसलन सलगांवकर, डेंपो, चर्चिल ब्रदर्स, वॉस्को स्पोर्ट्स क्लब और स्पोर्टिंग क्लब डि गोआ. भारत के इस सबसे छोटे राज्य ने हाल के वर्षों में खुद को राष्ट्रीय फुटबाल परिदृश्य में चोटी पर ला खड़ा किया है. गोवा में फुटबॉल की परंपरा काफी पुरानी है. यह लगभग 450 साल तक पुर्तगाल का उपनिवेश रहा और इसी दौरान यह खेल यहां आया और खूब फला-फूला.

इसलिए आश्चर्य नहीं कि इन दिनों गोवा में हर तरफ पुर्तगाली टीम की जर्सी वाला लाल और हरा रंग दिखता है. गोवा फुटबॉल एसोसिएशन के सेक्रेटरी सेवियो मेसियास कहते हैं, ‘गोवा में आप जहां भी जाएं आपको पुर्तगाल का प्रभाव देखने को मिलेगा. हमारे घरों में, संगीत में, खाने में, तो फिर फुटबॉल भला कैसे पीछे रहे.‘  

        

कुंभकर्ण का किरदार

तहलका द्वारा साहित्य पर केन्द्रित अंक का स्वागत. साथ ही तहलका का आभार, जिसके जरिये हमें युवा कथाकारों की रचानाओं और रचनाशीलता पर हिन्दी कथाजगत के बुजुर्गों की महत्वपूर्ण राय तथा एक जैसे ‘सुविचार’ जानने को मिले. युवा पीढ़ी की आलोचना होनी चाहिये,अक्सर लोग यही करते हैं, पर क्या उस आलोचना की भाषा की कोई मर्यादा नही होनी चाहिये? बुजुर्गियत की अचूक और कुठाँव मार झेल रहे इन अग्रज कथाकारो की बात और भाषा को सच मान लें तो कोई तर्क नही बचता जिसे आधार बना कर युवा लिखते रहें. अगर दिनेश कुमार द्वारा सम्पादित उस लेख का भरोसा कर लें तो हम युवाओं को अब तक अपने लिखे के अपराध का प्रायश्चित करना होगा. तानाशाह बन जाने की इच्छा पाले इन बुजुर्गों की तमन्ना पूरी करने के लिये क्या कहानी लिखना छोड़ देना ही कामचलाउ सजा होगी या कहानी के इन जमींदारों के महल के आगे हमारे आत्मदाह ही पर्याप्त होंगे – इसे जब तक कोई पता लगाये, तब तक मैं इनके महान विचारों के दूसरे कोने अँतरे खंगालता हूँ.

क्या कहानी लिखना छोड़ देना ही कामचलाउ सजा होगी या कहानी के इन जमींदारों के महल के आगे हमारे आत्मदाह ही पर्याप्त होंगे – इसे जब तक कोई पता लगाये, तब तक मैं इनके महान विचारों के दूसरे कोने अँतरे खंगालता हूँविश्वनाथ जी का यह कहना कि नये रचनाकार एक जैसे रच रहे हैं, बहुत गहरे आशय देता है. इनके लिये काला अक्षर भैंस बराबर कहने की हिमाकत तो मैं नही कर सकता पर भैंस का ही उदाहरण लें तो कह सकते हैं सारी भैंसे,अपने झुंड में, हमारे लिये तो एक जैसी ही होती हैं पर जो ग्वाले हैं, जिन्होने अपना जीवन दूध व्यवसाय को समर्पित कर दिया है, जो बीसियों साल से अपनी साईकिल पर दूध के बाल्टे रामनगर से बनारस लाते है, रोज, बिला नागा,  वो बन्धु दूर से देख कर ही बता सकते हैं कि अमुक भैस की क्या खासियत है और तमुक की क्या? यह दरअसल ‘इंवॉल्वमेंट’ कहलाता है. जैसा माहौल तैयार हो चुका है उसमें आसानी से त्रिपाठी जी मेरी बात का बुरा मान जायेंगे. उनके चमचे उन्हे मेरे खिलाफ भड़कायेंगे पर वो अगर अपनी आत्मा से बात करें तो पायेंगे कि उन्होने सबकी कहानियाँ पढ़ी ही नही है. और पढ़ी है तो उन्हे बताना था कि यह एक-सा पन किस किस कहानियों में उन्हे मिला.

इनकी ‘नंगातलाई का गॉव’ पढ़ कर खासा प्रभावित हुआ और एक कार्यक्रम में इन्हे सुनने गया. कार्यक्रम हजारी प्रसाद द्विवेदी पर था जो, सुनने में ही भर आता है कि, इनके गुरु थे. हजारी प्रसाद जी के सारे उपन्यास हमने पढ रखे हैं और आज तक यह समझ ही नही पाए कि अपने पूरे जीवन में चालीस से पचास कहानियाँ भी नही लिखने वाले ‘महान’ बुजुर्गों ने हजारी प्रसाद जैसे रचनाकार को किस चालाकी से पूरे परिदृश्य से ही गायब कर दिया है? उम्मीद थी कि त्रिपाठी जी इस चालाकी के खिलाफ बोलेंगे पर वो पूरी गोष्ठी में यही बोलते रह गये कि हजारी प्रसाद जी की धर्मपत्नी द्वारा बनाये गये दाल,भात और चोखे का स्वाद कितना असाधरण होता था. उनके हाथ का अचार कितना अच्छा होता था. तालियाँ, जैसा कि उनके बजने की रवायत है, बजती रहीं.

आप स्वाद में इस कदर उलझे पड़े है सर जी कि आपको पता ही नही – हम उन कहानीकारों की श्रेणी से नही आते जो टारगेट बना कर एक कहानी स्त्री विमर्श पर, अगली कहानी दलित विमर्श पर और फिर अगली कहानी साम्प्रयादियकता पर(जिसमें यह निश्चित है कि वो प्रेम कहानी ही होगी और हिन्दू बहुलता का ख्याल रखते हुए पुरुष पात्र हिन्दू होगा तथा स्त्री माईनॉरिटी ग्रुप से होगी, इसे गदर सिंड्रोम कहते हैं, जिसे पढ़ते हुए हिन्दू और ‘सॉफ्ट हिन्दू’ आँख मूँद मूँद कर यह सोचते और सोच कर खुश हो लेते है कि   गनीमत है जो मुसलमान नायक नही है वरना वो हिन्दू की लड़की के साथ यह सब करता…).सर जी, स्त्री हमारी कहानियों में प्रमुखतम पात्र के तौर पर आती है. वह स्त्री अपने सारे निर्णय खुद लेती है. ऐसे ही दलित भी आयेंगे और जब आयेंगे तो सवर्ण कुकर्मियों के लिये विलाप से अलग दूसरा कोई चारा नही बचेगा. आपको हमारे लेखन पर पछताने की जरूरत नही है जैसा कि श्रद्धेय कथाकार काशीनाथ जी इन दिनों लगातार पछता रहे हैं.

पाठक के कम होते जाने का जो सिलसिला, जाने कैसे, हिन्दी कहानी पर आप लोगों के शासन काल से शुरु हुआ वो बदस्तूर जारी है और इस सच से हम खूब वाकिफ हैं. बाजार का असर तो तब होता जब पाठक बढ़ते

डॉक्टर काशीनाथ जी की हालत उस अमीर इंसान की हो गई है जिसकी दी हुई खराब कमीज को उसके गरीब मित्र ने साफ सुथरा कर, इस्त्री लगा पहन लिया था. अब वो दोनो जहाँ भी जायें, लोग गरीब मित्र के कमीज की तारीफ कर दें तब फिर बेचारा अमीर मित्र तुरंत कहता- ये कमीज मैने ही इसे दी है. इनके पछतावे से हम डरे हुए हैं. अगर किसी बुजुर्ग लेखक को अपने लिखे का इस कदर पश्चाताप हो तो हमारा दु:ख जायज है. जिसने पूरा जीवन, कम से कम कहा तो यही जायेगा, रचते हुए गुजार दिया उसे एकाएक अपने लिखे पर शक होने लगे तो उस बेचारे लेखक के लिये कितनी दु:ख की बात है. हम नही चाहते कि आप अपनी दूसरी रचनायें भी दुबारा पढ़े ताकि आपको यही समस्या अपनी कहनियों के बारे में घेर ले. रही बात आपके वागर्थ वाले लेख की तो कहाँ फंसे पड़े हैं महाराज? किसी के लिखने से कोई कहानीकार स्थापित होता है भला! आपके साथ ही ज्ञानरंजन जी भी लिखने वाले थे,पर उन्होने नही लिखा तो क्या हमने लिखना बन्द कर दिया? पर आपको यह जरूर बताना चाहिये कि आप कौन सी विज्ञापन विधि से अपरिचित थे जिससे हम परिचित हो गये हैं? ये कोई अन्धा भी जानता है कि जिस दौर में आप लोग साहित्य साहित्य खेल रहे थे वह हिन्दी साहित्य का स्वर्णिम दौर था और जिसे आप सब ने यों ही बीत जाने दिया. आपके समय पत्रिकाओं की लाख प्रतियाँ छपती थी, दो घंटे की मास्टरी के बाद लिखने के नाम भर पर उस समय के लोगों को कितना अफराद समय मिलता था?

हम पर बाजार का कोई दबाव नहीं है गुरुवर. जब भी यह खबर मिलती है कि हम युवा रचनाकारों की किताबों के तीसरे या चौथे संस्करण आ रहे हैं तो मुझे हैरानी इस बात की होती है कि क्या इतने पाठक हैं? पाठक के कम होते जाने का जो सिलसिला, जाने कैसे, हिन्दी कहानी पर आप लोगों के शासन काल से शुरु हुआ वो बदस्तूर जारी है और इस सच से हम खूब वाकिफ हैं. बाजार का असर तो तब होता जब पाठक बढ़ते. उल्टे इससे हमें यह सबक मिला कि जो भी लिखो ईमानदारी से लिखो क्योंकि जो पाठक ऐसे समय में भी साहित्य के साथ है वो बहुत जेनुईन है, वो समझदार है, उसके कंसंर्स हवाई नही है. हमारा पाठक दिन में तारे देखना पसन्द नही करता, उसे ठोस सच्चाईयॉ जानने का जुनून है. रही अपनी बात तो अगर हम युवा आपको अपना कलेजा चीर के भी दिखा दें तब भी आपको यकीन नही होगा कि सिर्फ और सिर्फ अच्छी रचना ही हम सबका मकसद है. आपको भरोसा वैसे ही नही होगा जैसे किसी धार्मिक को इसका भरोसा नही होता कि ईश्वर नही है, जैसे किसी अफसर को इस बात का भरोसा नही होता कि घूस लेना अपराध है. मुझे उदय प्रकाश की डिबिया याद आ रही है.   

हमारी इस चिंता से जाहिर होता है कि हम मनुष्य विरोधी नही है जैसा कि ज्ञानरंजन जी ने सत्य उद्घाटित करने के अन्दाज में बताया है.. पर ये हमारे इतने प्रिय कथाकार हैं कि एक बार तो ‘बेनेफिट ऑफ डॉऊट’ इन्हे देना ही होगा और इनकी स्थापना माननी होगी कि यह सचमुच की नई और युवा पीढ़ी मनुष्य विरोधी है.. पर इसे मानते ही दु:खद समस्या खड़ी होती है.क्योंकि यह विश्वास करने का कोई कारण नही है कि ज्ञान जी को यह ‘रिवेलेशन’ अचानक से हुआ होगा, पहल जैसी अनोखी पत्रिका के सम्पादक की वैज्ञानिकता पर जायें तो इन्हे ये बात हमारी रचनाओं को इधर उधर पढ़ कर पहले ही मालूम पड़ गई होगी कि यह पीढ़ी हिंसक और मनुष्य विरोधी है. फिर भी आपने हमारी कहानियाँ अपनी पत्रिका पहल में प्रकाशित किया. क्यों? क्यों फिर आपने पहल जैसी नामधारी और प्रतिबद्ध पत्रिका के पाठकों, जिसके पाठक, जिनमें मैं भी एक हूँ, पहल को एक किताब का दर्जा देते हुए उसमें छपी एक एक रचना पढ़ जाते हैं, के साथ ऐसा खिलवाड़ किया?

सर, कहीं ऐसा तो नही कि आपने कहानी प्रकाशित करने से पहले ही उसके मनुष्यविरोधी और क्रूर होने को जान लिया हो और इस उम्मीद में कहानियाँ प्रकाशित किये हो कि लोग हम युवाओं पर हसेंगे, हमारे लिखे का मजाक उड़ायेंगे. पर हो इसका उल्टा गया. लोगों ने उन कहानी में मनुष्यता के सार्थक चिन्ह ढूंढ लिये होंगे. तब हार पीछ कर आपने इस सत्योघाटन का जिम्मा लिया हो. जो भी हो, हम बहुत दु:खी हैं यह जानकर कि पहल जैसी सचमुच की अच्छी पत्रिका में छपने की हमारी क्षमता नही थी. फिर  भी आपने…? आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप आगे कि किसी बात चीत को ऐसे तोड़ मरोड़ देंगे जिससे आप, हमें मनुष्यविरोधी घोषित करने के अपने तुर्की फैसले, पर कुछ भी कहने से बचे रहे. आप हमारा यकीन करिये हम आपसे पूछेंगे ही नही कि आखिर हम सब मनुष्य विरोधी कैसे हो गये? हमें खूब पता है कि हम ऐसे हर्गिज नहीं है.   

संजीव जी से खौफ खाते हुए, डरते हुए अगर यह मान लिया जाये कि हम विवादस्पद और खराब लोग हैं तो उन्होने ही इस राज का भी सनसनीखेज खुलासा किया है कि ऐसे भी कहानीकार हैं जिन्हें  संजीव जी तो जानते हैं पर वो कम चर्चित है या उन सचमुच के अच्छे कहानीकारों का रास्ता हम जैसे विवादास्पद और विज्ञापनबाज (काशीनाथ जी के पछताये शब्दों में)  कहानीकारों ने छेंक रखा है. तो फिर आपने ऐसा ‘अपराध’ क्यों कर दिया संजीव जी? आपको तहलका ने मंच दिया. यहाँ से गूंजी आवाज बहुत ज्यादा फैलेगी यह आपको पता तो था फिर आपने भी उन अच्छे युवा रचनाकरों को गुमनाम रहने दिया. आपको यहाँ, तहलका के इस बेहतरीन मंच पर, उनके नामों की घोषणा करनी चाहिये थी ताकि वो आगे आ सके. पर आपने नही किया और बड़ी चालाकी से आपने उन बेहतरीन नगीनो को गुमनामी के अन्धेरे मे डूबे रहने के लिये छोड़ दिया? यह जान बूझ कर किया गया और ज्यादा सघन ‘अपराध’ है संजीव जी जिसके लिये थीसिस फेंकने की भी जरूरत नही पड़ी.कितने चालाक हैं आप! कहीं रवीन्द्र कालिया जी ने आप सबों की गहरे कहीं डूबती नब्ज पर तो हाथ नही रख दिया यह कहते हुए कि- नई पीढ़ी के आने के बाद पुरानी पीढ़ी असुरक्षित हो गई है.

हालात यह हैं कि अगर यह बताय जाये आपको कि हम युवा लोग तो आप सबकी कहानियों/कविताओं/ उपन्यासों को पढ़ते, दुहराते, तिहराते बड़े हुये हैं. आप सब लोग, कम से कम मेरे लिये, द्रोणाचार्य सरीखे हैं. पर आपकी चाहत ययाति बन जाने की दीख रही है. आपकी बातों से तिरस्कार और बे-ईमानी की बू आ रही है. मेरी प्यारी भोजपुरी में जिसे चोरहथई कहते हैं.  इसलिये ही मैं कहना चाहता हूँ कि मोल जीवन और गोल भाषा के आदी हो चुके आप लोगों ने जिस गोल-मोल अन्दाज में सकारात्मक प्रचुर अपवाद का जिक्र किया है मैं उसमे से एक नही होना चाहता.खासकर जैसे अकाट्य सत्यों के पक्ष में आप खड़े हुए हैं उसे जान कर तो हर्गिज नहीं. मुझे यह भी यकीन है कि आप अपने पैने शाब्दिक नाखून लेकर मेरे पीछे पड़ जायेंगे. आपके स्टील, लोहे, चाँदी और नकली सोने के चमचे मुझे उचित-अनुचित तरीकों से नुकसान पहुँचाने मे भिड़ जायेंगे. मेरी भाषा/कहानी में तम्बाकू की अमर गन्ध की तलाश कर उसे खारिज करने में लग जायेंगे पर इन सब के बावजूद अगर आप सब ही हिन्दी के अवधराज हुए तो विभीषण के प्रति सच्ची सहानुभूति रखते हुए भी मैं अपने लिये कुम्भकर्ण का किरदार चुनता हूँ.   

आज के एकलव्य

पैलेट, वेपन, वेलोसिटी… एक सांस में बोलने वाली 76 वर्षीया चंद्रो तोमर की बातें सुनकर जब तक हम हैरान हों तब तक वे हमारा हाथ पकड़कर हमें अहाते में ले आती हैं, यह बताने के लिए कि कैसे उन्होंने इन शब्दों का मतलब और इस्तेमाल सीखा है. टेढ़े-मेढ़े पटियों से बनाया गया तकरीबन तीन फुट ऊंचा और ढाई फुट चौड़ा प्लेटफॉर्म, प्लेटफॉर्म को लंबाई में ठीक बीच से बांटता बरगद का पेड़, सामने 10 मीटर दूर ईंट की दीवार, उसपर लगे कागज के टारगेट और टारगेट खींचने के लिए रस्सी और पुली का इंतजाम. यह है बागपत जिले की बड़ौत तहसील के एक छोटे-से गांव जोहड़ी में बनी शूटिंग रेंज. दूसरे शब्दों में कहें तो उत्तर भारत की जुगाड़ तकनीक का एक और बेहतरीन उदाहरण. प्लेटफॉर्म के पीछे खड़ी होकर दादी (चंद्रो तोमर को सारे गांववाले दादी ही कहते हैं) हमें बताती हैं कि कैसे उन्होंने 66 साल की उम्र में यहां पहली बार एयर पिस्टल चलाई थी. वे ठेठ हरियाणवी लहजे में कहती हैं, ‘पहली बार में ही सही निशाना लगा तो लोगों ने कहा तू भी कोशिश कर ले, फिर तो लगन ही लग गई.’

शुरुआत में इक्का-दुक्का लड़कियों ने जब कुछ प्रतियोगिताओं में मेडल जीते तो गांव की कई लड़कियां निशानेबाजी सीखने आने       लगीं, हरियाणा से सटे इस इलाके में यह एक नई परंपरा थी

दादी इस शटिंग रेंज की सबसे उम्रदराज निशानेबाज हैं. साल 2000 में वे वरिष्ठ वर्ग की निशानेबाजी प्रतियोगिता (इसमें 55 साल से अधिक के पुरुष और महिला निशानेबाज भाग ले सकते हैं) में उत्तर भारत क्षेत्र की चैंपियन बन गई थीं. इसके बाद उन्हें कई स्कूलों मंे बच्चों को निशानेबाजी के गुर सिखाने के लिए बुलाया जाने लगा. नजर कमजोर हो जाने के कारण दादी आजकल शूटिंग तो नहीं कर पातीं लेकिन बच्चों, खास तौर पर लड़कियों की वे सबसे पसंदीदा कोच हैं.

टीन की छत के नीचे अभी काफी गर्मी है लेकिन निशानेबाजी का अभ्यास कर रहे 12 से 23 साल की उम्र के इन लड़के-लड़कियों को देखकर कहीं से आभास नहीं होता कि गरमी और असुविधाओं का इनपर कोई असर है. यहां जो बच्चे अभी नए हैं वे प्लेटफॉर्म के पीछे बनी दीवार के सामने डमी पिस्टल लेकर हाथ साधने का अभ्यास कर रहे हैं. बाकी एयर पिस्टल से टारगेट पर निशाना लगा रहे हैं. एक फायर उसके बाद तीन-चार मिनट का विराम, फिर दूसरे की तैयारी. इस बीच कोई शोरगुल नहीं, कोई बातचीत नहीं. फायर होने के बाद आवाज सिर्फ टारगेट के पीछे लगे टीन के टुकड़े की आती है.
इन निशानेबाजों के पीछे खड़े होकर जब आप इनकी प्रतिभा पर आश्चर्य मिश्रित संदेह जता रहे होते हैं तब इनकी सटीक निशानेबाजी एक के बाद एक आपके कई पूर्वाग्रह तोड़ती है. जैसे शूटिंग सिर्फ राजे-महाराजाओं या उद्योगपतियों का खेल है, यह भी कि इसके लिए लाखों के खर्चे और विदेशी कोच अनिवार्य हैं.

लेकिन क्या इन संसाधनों से औसत प्रतिभाओं के इतर चैंपियन तैयार किए जा सकते हैं? अपने इस सवाल का उत्तर पाने के लिए हमें ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा. बाकी निशानेबाजों से अलग प्लेटफॉर्म के पीछे बैठे रवि जाटव से हमारी बात शुरू होती है. वे यहां रायफल के अकेले निशानेबाज हैं. कुर्सी पर बैठकर अपनी रायफल (यह उन्होंने दिल्ली के एक लड़के से कुछ दिनों के लिए उधार ली है) ठीक कर रहा 23 साल का यह युवा जर्मनी, सिंगापुर, थाइलैंड और चेक रिपब्लिक में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय निशानेबाजी प्रतियोगिताओं में भाग ले चुका है. नवीन जिंदल के साथ उनकी टीम लगातार तीन साल से राष्ट्रीय निशानेबाजी का सिल्वर मेडल जीत रही है. खुद रवि 2004 में सिंगापुर शूटिंग फेस्टिवल में गोल्ड मेडल जीत चुके हैं.  एक भट्टा मजदूर के आठ बच्चों में तीसरे रवि की कहानी उन सभी खिलाड़ियों के लिए एक मिसाल हो सकती है जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने घटिया प्रदर्शन के लिए संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं. निशानेबाजी कोटे के दम पर दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफन कॉलेज में पढ़ने वाले रवि के पास एक समय अभ्यास के लिए छर्रे नहीं होते थे. तब वे अंडे बेचकर  छर्रे खरीदते थे. स्नातक के अंतिम साल में पढ़ रहे रवि इस समय पढ़ाई को लेकर काफी गंभीर हैं. हमसे बात करते हुए वे कहते हैं, ‘ये मेरी पढ़ाई का आखिरी साल है और इस बार ग्रैजुएशन के लिए काफी मेहनत कर रहा हूं, इसके बाद पूरा ध्यान शूटिंग पर दूंगा.’

दादी के अलावा हमारी नजर यहां एक और उम्रदराज व्यक्ति पर जाती है. खादी का धोती-कुर्ता, हट्टा-कट्टा शरीर और निशानेबाजों पर बारीक नजर. ये डॉ राजपाल सिंह हैं, इस शूटिंग रेंज और इस इलाके के लड़के-लड़कियों के सपनों को हकीकत में बदलने वाले शख्स. पेशे से आयुर्वेदिक चिकित्सक और दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में सुपरिटेंडेंट 59 वर्षीय सिंह ने 1998 में बागपत के जोहड़ी गांव में शूटिंग रेंज की स्थापना की थी. राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित कई दिग्गजों को निशानेबाजी के गुर सिखा चुके सिंह दिल्ली या एनसीआर की बजाय अपने पुश्तैैनी गांव में शूटिंग रेंज बनाने की वजह बताते हुए कहते हैं, ‘शहर गांव की ओर, मेरा मिशन है. मेरी पूरी कोशिश है कि गांवों की प्रतिभाओं को तराशा जाए. यदि किसी शहर में रहने वाले को मुझसे शूटिंग सीखनी है तो उसे भी जोहड़ी आकर ही सीखना होगा.’

‘मैं पापा से हर बार पूछती हूं कि ऐसा कब होगा जब छर्रे, पिस्टल, टारगेट जैसा मन मेरा पढ़ाई में भी लगेगा’

1986 में सिओल एशियाड में निशानेबाजी प्रतियोगिता (यहां उनका छठा स्थान था) में भाग ले चुके सिंह  के लिए जोहड़ी में शूटिंग रेंज खोलना कोई बड़ा काम नहीं था. लेकिन इस रेंज में बच्चों को बुलाना सबसे बड़ी चुनौती था. अपराधों के लिए कुख्यात पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस गांव में शूटिंग रेंज का शुरू में काफी विरोध किया गया. गांववालों का कहना था कि इसके बाद तो बच्चा-बच्चा कट्टे से निशाना लगाना सीख जाएगा. इस बारे में डॉ सिंह बताते हैं,  ‘गांववालों को मैं इस मायने में ज्यादा समझदार मानता हूं कि उन्हें हर नफे-नुकसान का साक्षात प्रमाण चाहिए. यहां बातें कह देने भर से काम नहीं चलता. इसलिए मैंने गांववालों के विरोध पर कान न देकर उन्हें प्रमाण देने की बात ठान ली.’

अभी शूटिंग रेंज को खुले हुए तीन महीने ही हुए थे कि यहां के बच्चों ने शिमला के बिशप कॉटन स्कूल में आयोजित ऑल इंडिया इंटर स्कूल चैंपियनशिप में कई मेडल जीत लिए. इस प्रदर्शन के आधार पर एयरइंडिया ने तुरंत ही चार बच्चों को स्पांसर कर दिया और उन्हें कंपनी से वजीफा मिलने लगा. इसी साल जोहड़ी की एक लड़की सीमा तोमर का निशानेबाजी की राष्ट्रीय टीम में चयन हुआ और उसने गोल्ड मेडल जीत लिया. ये उपलब्धियां जोहड़ी की शूटिंग रेंज को सिर्फ छह महीने में मिली थीं. इसका पहला परिणाम यह हुआ कि शूटिंग रेंज को लेकर गांववालों का विरोध पूरी तरह खत्म हो गया. इसके अलावा जोहड़ी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सीमा से लगे इस इलाके में एक और नई शुरुआत की. परंपरागत रूप जो इलाका लड़कियों और महिलाओं पर कई तरह की पाबंदियों के लिए जाना जाता था, वहां जोहड़ी शूटिंग रेंज से शुरुआत में इक्का-दुक्का लड़कियों ने जब कुछ प्रतियोगिताओं में गोल्ड मेडल जीता तो यह परंपरा भी दरकने लगी और गांव की कई लड़कियां यहां निशानेबाजी सीखने आने लगीं. दादी ने भी इसी समय निशानेबाजी सीखनी शुरू की थी. वे यहां अपनी पोतियों को निशानेबाजी सिखाने लाई थीं. एक दिन पिस्टल लोडिंग में अपनी पोती की मदद करते हुए उन्हें निशानेबाजी का ऐसा चस्का लगा कि बाद में निशानेबाजी की कई प्रतियोगिताओं में उन्होंने सेना के अधिकारियों को हराकर मेडल जीते.

इसी बीच एक और घटना हुई जिसने शूटिंग रेंज को पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित हरियाणा में खासी प्रतिष्ठा दिला दी. साल 2002 में सेना के एक लेफ्टिनेंट जनरल अशोक वासुदेवन यहां आए थे. वासुदेवन को सेना के लिए कुछ अच्छे निशानेबाजों की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने यहां से छह लड़कों और दो लड़कियों को सेना में सीधे भर्ती कर लिया. इस घटना के बाद इलाके भर में जोहड़ी को ऐसा केंद्र समझा जाने लगा जहां बच्चों की किस्मत बदल जाती है. उस समय आर्मी में यहां की एक लड़की सीमा तोमर का भी चयन हुआ था. सीमा ने हाल ही में डोरसेट  में (इंग्लैंड) आयोजित निशानेबाजी विश्व कप में ट्रैप इवेंट का सिल्वर मेडल जीता है. इस समय जोहड़ी गांव की यह लड़की विश्व महिला निशानेबाजों में चौथी रैंकिंग पर है, किसी भी भारतीय महिला निशानेबाज की यह अब तक की सबसे ऊंची रैंकिंग है.

2002 में इस रेंज को भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) ने मान्यता दे दी. साई द्वारा यहां नियुक्त कोच फारुक पठान सरकार से मान्यता मिलने का फायदा बताते हुए कहते हैं, ‘अब यहां प्रशिक्षण ले रहे बच्चों को हर महीने 900 रुपए का वजीफा मिलता है जिससे निशानेबाजी के लिए छर्रों का खर्च पूरा करने में आसानी होती है. लेकिन साई ने हमें अभी तक एक ही पिस्टल दी है, जबकि हमें उनसे आठ पिस्टल मिलनी थीं.’
इस समय जोहड़ी शूटिंग रेंज में बाहर के युवा भी प्रशिक्षण ले रहे हैं. बीकानेर की 20 वर्षीया भावना शर्मा कुछ दिन पहले ही यहां आई हैं. जूनियर पिस्टल शूटिंग में भारतीय रिकॉर्ड की बराबरी करने वाली और शूटिंग की राष्ट्रीय खिलाड़ी भावना हमसे बात करते हुए कहती हैं, ‘यहां का प्रतियोगी माहौल सबसे बड़ी खासियत है. यहां आपके पास नेशनल, इंटरनेशनल खिलाड़ी प्रैक्टिस करते हैं. इनसे काफी कुछ सीखने को मिलता है, लेकिन फिर भी कोई दिक्कत हो तो डॉ अंकल तो हैं ही.’

एक दूसरे से सीखने की ललक इस रेंज की सबसे बड़ी खासियत है. भावना जूनियर स्तर पर अपने राष्ट्रीय रिकॉर्ड पर बात करते हुए कहती हैं, ‘मैं चाहती हूं कि मेरा रिकॉर्ड जोहड़ी की ही कोई शूटर तोड़े.’  उनका इशारा सुल्तानपुर की एक और निशानेबाज वर्तिका की ओर है. 15 साल की यह लड़की इंटर स्कूल चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीत चुकी है.

इस शूटिंग रेंज का हर एक निशानेबाज डॉ सिंह  की एक खास तकनीक का मुरीद है. वे निशाना लगाने के लिए तैयार निशानेबाज का हाथ पकड़कर उसकी आंखों की पुतली में देखकर अपने हाथ से पिस्टल का ट्रिगर दबाते हैं और लगभग हर बार छर्रा सही निशाने पर लगता है. डॉ सिंह की इस तकनीक से अभिभूत यहां की एक निशानेबाज रुचि सिंह हमें बताती हैं, ‘इससे हमारी ग्रुपिंग (एक ही जगह निशाना लगाना) अच्छी होती है.’ सुल्तानपुर के गांव धरौरा की रुचि यहां अभ्यास कर रही एक और अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी हैं. एक सीमांत किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाली 17 साल की यह लड़की पिछले पांच साल से निशानेबाजी की राष्ट्रीय चैंपियनशिप में शामिल हो रही है. पिछले साल दिसंबर में दोहा में आयोजित यूथ ओलंपिक ट्रायल में रुचि को ओलंपिक को कोटा मिला है. एयर पिस्टल में यूथ ओलंपिक का कोटा पाने वाली यह भारत की पहली निशानेबाज है. 11वीं की इस छात्रा से बात करते हुए आपको बिल्कुल भी एहसास नहीं होता कि उसने ‘भारत की पहली महिला शूटर’ के तमगे को बहुत गंभीरता से लिया है, उसकी बातों में अभी भी स्कूली छात्रों वाली झिझक और मसखरापन बाकी है. अपनी पढ़ाई के बारे में वह हंसते हुए कहती है, ‘मैं पापा से हर बार पूछती हूं कि ऐसा कब होगा जब छर्रे, पिस्टल, टारगेट जैसा मन मेरा पढ़ाई में भी लगेगा.’

जोहड़ी में आज इन लड़कियों का आखिरी दिन है. कुछ दिन अपने घर पर रहने के बाद इन्हें पुणे जाना है. यहां निशानेबाजी के विश्व कप का ट्रायल आयोजित किया गया है. जोहड़ी की इस शूटिंग रेंज में दोपहर बीत चुकी है. लड़के-लड़कियां दूसरे सत्र में निशानेबाजी के अभ्यास के लिए फिर जुट रहे हैं. हम जाते-जाते रुचि से पूछते हैं, ‘तो अगले वर्ल्ड कप का लक्ष्य क्या है?’ जवाब हमारे सोचे हुए ‘गोल्ड मेडल’ से कहीं ज्यादा सकारात्मक और उम्मीद से भरा है. रुचि कहती हैं, ‘बस दूसरों से लंबी लकीर खींचनी है.’

(जयप्रकाश त्रिपाठी के योगदान के साथ)

‘वैकल्पिक सिनेमा की जरूरत दर्शकों का भ्रम है’

पहली बार आपको यह कब एहसास हुआ कि आप फिल्मी विरासत वाले परिवार की सदस्य हैं?

जब से मैंने इस दुनिया को समझना शुरू किया. बचपन में मुझे पता रहता था कि मेरे दादा-दादी और करिश्मा की वजह से हमारे परिवार पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है. लोगों की नजरें मुझ पर भी रहती थीं. जब मैं स्कूल में थी तभी से हर कोई जानता था कि मैं फिल्मों में ही जाऊंगी. हालांकि इन सब बातों का हमारे ऊपर कोई असर नहीं पड़ा. शायद इसलिए क्योंकि पूरा फिल्म उद्योग हमारा घर है. हमारे परिवार में सिनेमा पर हर किसी की अपनी राय होती है. मेरी मां को गोलमाल और सिंह इज किंग जैसी मसाला फिल्में पसंद हैं. करिश्मा बहुत भावुक है, उसे लव आजकल, जब वी मेट जैसी फिल्में अच्छी लगती हैं. जिन फिल्मों में कलाकारों ने बेहतरीन काम किया हो, जैसे कमीने और थ्री इडियट, मुझे वे पसंद आती हैं. मसाला फिल्में करने के बावजूद मुझे विशाल भारद्वाज और राजकुमारी हिरानी की फिल्में ज्यादा पसंद हैं.

अपने चचेरे भाई रणबीर कपूर के बारे में कुछ बताइए.

बचपन में हमारी बात होती थी, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं. आज भी कुछ ऐसा ही है.

बचपन में जब आपके माता-पिता ने अलग-अलग रहने का फैसला किया तो उसका आप पर क्या असर रहा?

वे कानूनी तरीके से अलग नहीं हुए थे. मेरे पापा हर दिन हमसे मिलने आते थे, इसलिए मुझे कभी नहीं लगा कि वे दूर हैं.

करिश्मा  ने 16 साल की उम्र से ही फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया था, उनका संघर्ष आपके लिए कैसे मददगार साबित हुआ?

हमने दस साल की उम्र से ही अभिनय के बारे में सोचना शुरू कर दिया था. असल में हमें बचपन से ही अपने फैसले लेने की आजादी थी.  करिश्मा फिल्मों में जो मुकाम पाना चाहती थी उसे हासिल करने में उसे दस साल लगे. वह फिल्मों में जहां तक पहुंची वहां तक जाने में उसकी असफलताओं का बहुत योगदान है. सुपर हिट फिल्मों से सुपरस्टार बनना बहुत आसान है, लेकिन असफलताओं से उबरकर सुपरस्टार बनना बेहद मुश्किल होता है. ऐसी कई अभिनेत्रियां हैं जो सुपर हिट फिल्मों का हिस्सा रहीं लेकिन उन्हें आसानी से भुला भी दिया गया. मैं आज जो भी हूं अपनी फ्लॉप फिल्मों की वजह से हूं. करिश्मा जब फिल्मों के सेट पर होती थी तो उस दौरान मैं भी वहीं रहती थी. इस वजह से उसके साथ काम कर रहे सभी कलाकारों जैसे अजय देवगन, सलमान या अक्षय कुमार के साथ मेरे अच्छे संबंध बन गए थे. इससे मेरे लिए कई चीजें आसान हो गईं. हालांकि एक साल तक मेरे दिमाग में वकील बनने का विचार भी चलता रहा, लेकिन मुझे जल्दी ही समझ आ गया कि ये मेरे बस की बात नहीं है. उसी समय मैंने तय किया कि मुझे क्या करना है. अपनी सफलता के साथ आगे बढ़ना बेहद आसान होता है. इस लिहाज से मैं किस्मतवाली रही. फिर भी जब मेरी फिल्में फ्लॉप हुईं तब मम्मी और करिश्मा ही थीं, जिन्होंने मुझे कभी हताश नहीं होने दिया.

आपके खयाल से क्या आज महिलाएं ज्यादा स्वतंत्र हैं? और सेक्सुअलिटी के बारे में बेहिचक…

हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा दोहरे मानदंड रखता है. सेक्सी दिखना, सही डाइट लेना या वर्जिश करना दूसरे लोगों के लिए नहीं होना चाहिए- मैं इसे ही महिला का स्वतंत्र होना कहती हूं. यह सब आप अपने लिए करें, अपने बॉयफ्रेंड के लिए या किसी दूसरे को पीछे छोड़ने के लिए नहीं. मेरे खयाल से महिलाओं को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ महसूस करना चाहिए, चाहे वे कितने बजे भी उठें और कहीं भी काम करने जाएं.

फिल्म उद्योग ऐसी जगह है जहां लोग अपने संबंधों को अकसर छिपाते हैं लेकिन आपके मामले में ऐसा नहीं है.

मेरा ईमानदारी और खुलेपन में पूरा विश्वास है. मेरे अभिभावकों ने मुझे सिखाया है कि हमेशा स्पष्टवादी रहो. कई अभिनेत्रियां मानती हैं कि अपनी उम्र या संबंधों के बारे में बात करने से उनके फैंस की संख्या कम हो जाएगी. काजोल और मेरी बहन जब अपने करियर के शिखर पर थीं तब उन्होंने शादी की, लेकिन आज भी उनके बहुत फैंस हैं.  

शाहिद और सैफ में वह कौन-सी बात थी जो आपको उनके नजदीक ले गई?

बीते हुए वक्त के बारे में बात मत कीजिए. मैं चाहती हूं कि वो वक्त अच्छी यादों के रूप में हमेशा मेरे साथ रहे. जहां तक सैफ के साथ (मुस्कराते हुए) संबंधों की बात है,  सैफ एक संवेदनशील इनसान है जिसे दुनिया की काफी समझ है. वह सिर्फ उन्हीं फिल्मों में काम करना पसंद करता है जिनपर उसे भरोसा होता है. उसे पढ़ना और घूमना पसंद है. वो काफी एक्टिव और दिलचस्प जिंदगी जीने वाला इंसान है, उसकी यह बात मुझे काफी पसंद है.
पहले मेरी पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. सैफ ने ही मुझे सिखाया कि पढ़ना मजेदार अनुभव है और पढ़ना-लिखना आपकी जिंदगी और अभिनय को समृद्ध करता है. मेरे साथ ऐसा हुआ भी. मैं धीमी गति से पढ़ती हूं लेकिन मुझे मजा आता है. हम दोनों को फिल्मों के बारे में बातें करना पसंद है, लेकिन एक और बात जो मैंने उससे सीखी वह यह कि काम को कभी घर में मत लाओ.

फिल्म उद्योग में जो बदलाव आए हैं उनके बारे में क्या कहना चाहेंगी?

आर्थिक और तकनीकी रूप से हम आसमानी ऊंचाइयां छू रहे हैं.  लेकिन सिनेमा के हर पहलू के बारे में ऐसा कहना मुश्किल है. असल में हमारे यहां दर्शकों की पसंद का पैमाना तय करना काफी मुश्किल है. उन्हें गोलमाल जैसी कॉमेडी फिल्में आज भी पसंद आती हैं. यह एक तरह का कन्फ्यूजन है क्योंकि उन्हें थ्री इडियट जैसी भावुक करने वाली फिल्में भी पसंद आ रही हैं. दर्शकों को फिल्म में एक अच्छी कहानी तो चाहिए लेकिन उसके साथ जूबी डूबी जैसा कुछ मसाला भी हो. यह सब देखकर लगता है कि दर्शकों को आज भी फिल्मों में कुछ जानी- पहचानी चीजें जरूर चाहिए. लीक से हटकर बनी कमीने जैसी अच्छी फिल्में अच्छा बिजनेस नहीं कर पातीं. हमें यह कहना पसंद है कि हम बदल रहे हैं क्योंकि इससे हम ‘कूल’ दिखते हैं, लेकिन मुझे पता नहीं कि हम इस मामले में कितना सच बोल रहे हैं.

राज कपूर के समय से तुलना करें तो सिनेमा इस समय पूरी तरह बदल चुका है. वह असली सिनेमा था. उस समय ‘वैकल्पिक सिनेमा’ की कोई बात नहीं करता था, उस दौर की फिल्में बेहतरीन कहानियां होती थीं- अच्छे-से लिखी हुई और खूबसूरती से से कही गई. आज यदि हम एक अच्छी कहानी कहने की कोशिश करें तो उसे समांतर सिनेमा कह दिया जाता है, लेकिन यदि इसमें कुछ नाच-गाना हो तो वह कमर्शियल सिनेमा बन जाता है. मुझे नहीं पता कि दर्शक इस बारे में क्या सोचते हैं, लेकिन मैं राज कपूर, विजय आनंद और गुरु दत्त के सिनेमा को काफी मिस करती हूं.

 

जात गिनने से शुरुआत होगी

देश में जाति-आधारित जनगणना को लेकर बहस थमने का नाम नहीं ले रही. कम से कम तीन तरह की राय हमारे सामने बिल्कुल स्पष्ट है. पहली राय के मुताबिक ऐसी गिनती समाज में जातिवाद को मजबूत करेगी और देश को पीछे ले जाएगी. दूसरी राय ठीक उलटी है कि जाति आधारित जनगणना के बिना हम न्याय और समतामूलक समाज बनाने का लक्ष्य पूरा नहीं कर पाएंगे. तीसरी राय में कुछ दुविधा दिखती है- वह जातिमूलक गणना के पूरी तरह विरुद्ध नहीं, लेकिन इस प्रश्न पर संशयग्रस्त है कि कहीं तो किसी मोड़ पर हमें जाति की पहचान से मुक्त होकर आगे बढ़ने की कोशिश करनी होगी.

आखिर किसी आधुनिक समाज में वे निशानियां खत्म होनी चाहिए जिनसे लोग बंटते हों और उनके बीच दीवार खड़ी होती होबहरहाल, 1931 के बाद पहली बार देश में जाति गिनने की बात चल पड़ी है- हालांकि कुछ सीमित अर्थों में. क्योंकि फिलहाल जो प्रस्ताव है, वह सिर्फ ओबीसी यानी अन्य पिछड़ी जातियों की गणना का है. यही नहीं, इस पर अंतिम निर्णय मंत्रियों के समूह को लेना है. इस बीच इस मुद्दे पर नेताओं और राजनीतिक दलों की दुविधाएं भी सामने आती रही हैं. कांग्रेस के कई नेता जातिगणना के विरोध में खुलकर सामने आ चुके हैं तो बीजेपी के भीतर जातिगणना के पक्ष में उठने वाली आवाज़ें दबाई जा रही हैं. ताजा ख़बर यह है कि आरएसएस ने इस मामले में जातिगणना के साथ खड़े होने पर बीजेपी की खिंचाई की है.

इसमें शक नहीं कि जातिगणना होगी तो वह ऐतिहासिक कदम होगी जिसके दूरगामी नतीजे होंगे. यह सच है कि ऐसी गणना के पहले एक कसक हमारे भीतर पैदा होनी चाहिए कि 50 साल में हम जातिगत पूर्वाग्रहों की उस सच्चाई से ऊपर उठ नहीं पाए जिसे हमने दफन कर देने का फैसला किया था. आखिर किसी आधुनिक समाज में वे निशानियां खत्म होनी चाहिए जिनसे लोग बंटते हों और उनके बीच दीवार खड़ी होती हो.

इसीलिए आजादी के बाद हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने जातियों के आधार पर जनगणना कराना मंज़ूर नहीं किया था. तब कहीं यह खयाल था कि ऐसी गिनती जातिवाद को मज़बूत करेगी और यह सपना भी था कि नया लोकतांत्रिक भारत इन पुरानी बेड़ियों से आजाद हो जाएगा. एक अर्थ में हमारा संविधान बहुत क्रांतिकारी रहा, सदियों की मानसिक और सामाजिक गुलामी के पार जाकर हमारे संविधान निर्माताओं ने बराबरी का एक सपना देखा और लिखा जिस पर भारत चल सके. हमारी स्वतंत्रता और हमारे संविधान का एक बड़ा लक्ष्य सामाजिक और राजनीतिक आधारों पर एक समतामूलक देश बनाना ही रहा था.

लेकिन 2,000 साल की सामाजिक संरचना नए दौर के राजनीतिक और आधुनिक सपने से कहीं ज्यादा ताकतवर निकली. इसीलिए समतामूलक समाज का सपना पीछे छूट गया और जातिमूलक पूर्वाग्रहों की सच्चाई ज़्यादा बड़ी हो गई. यह एक देश के रूप में हमारी विफलता है और यही वजह है कि समाज के एक बड़े हिस्से को जातियों की गिनती जरूरी लग रही है.

साफ है कि हम जातिगणना से जिस पुराने राक्षस के फिर से जीवित होने का डर दिखा रहे हैं वह कभी मरा ही नहीं. उसने अपना स्थूल रूप भले नष्ट कर लिया, लेकिन ज्यादा बारीक और सूक्ष्म स्तरों पर बचा रहा. दरअसल, जाति के आधार पर गिनती की अहमियत यहीं से दिखाई पड़ती है. कानून के हिसाब से जातियों का फर्क भले ख़त्म हो गया हो वह सामाजिक व्यवहार में, खासकर बेटी और रोटी के रिश्ते में खुलेआम बचा रहा और राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवहार में छुपे तौर पर कायम रहा.

यह सच्चाई है कि जाति गिनने से जाति ख़त्म नहीं होगी. लेकिन वह पिछले 70 साल से जाति न गिनने से भी खत्म नहीं हुईइस प्रक्रिया के कई नतीजे रहे. एक नतीजा देश के संसाधनों और संस्थानों पर अगड़ी जातियों के वर्चस्व और कब्जे के रूप में दिखता है तो दूसरा नतीजा संसदीय लोकतंत्र और चुनावी राजनीति की जातिवादी जकड़नों में नज़र आता है. दुर्भाग्य से प्रशासनिक और सामाजिक नेतृत्व की बड़े पैमाने पर नाकामी ने जातिवाद को नए तर्क भी दिए नई खुराक भी. कई लोगों को लगता है कि 1990 में वीपी सिंह की राजनीति से पैदा हुई मंडल की परिघटना ने भारतीय समाज की दरार बढ़ाई. लेकिन सच्चाई यह है कि मंडल ने बस वह कालीन हटा दी जिसके नीचे जातिवाद की दरारों से भरा भारतीय समाज का फर्श दिखने लगा. यह दरार मौजूद थी, इसीलिए मंडल की मांग ने इतना तूफ़ान पैदा किया. साफ तौर पर यह सरकारी नौकरियों में आरक्षण का मामला भर नहीं था, देश के संसाधनों पर बराबरी के हक का मामला था. यह अनायास नहीं है कि मंडल के बाद पिछड़ा राजनीति लगभग पूरी तरह स्वायत्त हो गई. बेशक मंडल में आमूलचूल बदलाव की जो संभावना थी उसे उसके नेता समझ नहीं पाए और उन्होंने एक नई यथास्थिति के निर्माण में उसे जाया भर कर दिया. लेकिन इसमें संदेह नहीं कि मंडल ने भारतीय समाज की दरारों को बिल्कुल प्रत्यक्ष कर दिया. यही नहीं मंडल ने यह भी समझाया कि अंतत: देश और समाज को बदलना है तो सत्ता के सूत्र अपने हाथ में लेने होंगे.

इसी समझ का नतीजा है कि जिन पिछड़ी जातियों को अपनी जाति कभी ढकनी-छुपानी पड़ती थी वे मांग कर रहे हैं कि जनगणना के दौरान लोगों की जाति भी पूछी जाए और जिन लोगों का सारा जीवन अपनी जाति के अभिमान में बीता, अपने सजातीयों को नौकरी या सुविधा देते गुजरा, अपनी बेटी के लिए जाति के भीतर अच्छे वर खोजते कटा वे यह उपदेश दे रहे हैं कि जाति समाज को तोड़ेगी.

निश्चय ही जाति समाज को तोड़ती है. लेकिन यह किन लोगों की जाति है जो समाज को तोड़ रही है? इस देश के सबसे पढ़े-लिखे लोग, सबसे ज्यादा साधनों पर काबिज लोग अब भी अपनी जाति के बाहर देखने को तैयार नहीं हैं. महानगरों में जो एक नया खाता-पीता भारत बन रहा है उसके यहां जाति टूटी है तो बस अगड़ों के बीच, यहां तक कि अगड़े हिंदू और अगड़े मुसलमान भी साथ दिख रहे हैं. लेकिन अब भी अगड़ी और पिछड़ी जातियों की शादियां नहीं के बराबर नज़र आती हैं.

वाकई समाज को बचाने के लिए जाति को तोड़ना होगा. लेकिन जाति आसानी से नहीं टूटती. राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि जाति तोड़नी है तो भारत को रोटी और बेटी का नाता जोड़ना होगा. रोटी का नाता मन मारकर सामाजिक मजबूरियों में हम जोड़ने को तैयार हो गए, बेटी का नाता जोड़ने में अब भी हिचक दिखाई पड़ती है. सारे अगर-मगर के बावजूद फिलहाल हमें मानना होगा कि जाति अब भी एक बड़ी संरचना है जिससे हमारे निजी, पारिवारिक, सामाजिक और यहां तक कि राजनीतिक रिश्ते तय होते हैं. इस संरचना का विद्रूप यही है कि अगड़ी जातियों का एक छोटा-सा तबका राष्ट्रीय संपत्ति के बड़े हिस्से पर काबिज है.

कई लोगों का दावा है कि यह सच्चाई नहीं है. 1931 के जिस आंकड़े को हमारी आबादी के जातिगत अनुपात का आधार बनाया जाता है उसमें बहुत परिवर्तन हो चुके हैं. उसका कोई नया आंकड़ा नहीं है जिसके आधार पर जाति और संपत्ति का, जाति और संसाधनों का अनुपात तय किया जा सके. लेकिन यह तर्क भी अंतत: जातिगत आधार पर जनगणना के पक्ष में खड़ा होता है. अगर हम नया आंकड़ा चाहते हैं- जो हमें इसलिए भी चाहिए कि अपने समाज में पिछड़ी जातियों और पिछड़े समुदायों का ठीक-ठीक अनुमान लगा सकें और उनके लिए जरूरी उपक्रम कर सकें- तो हमें जातियों के आधार पर लोगों की गिनती करनी होगी. जाति अगर हमारी सामाजिक संरचना का अविभाज्य हिस्सा बनी हुई है तो इसे तोड़ने के लिए ही पहले इसे समझना होगा. अपने समाज की बुनावट और बनावट को ठीक से नहीं समझेंगे तो कौन-सी बराबरी लाएंगे, कैसा विकास लाएंगे?

दरअसल, जो लोग यह दुहाई देते हैं कि जाति के आधार पर जनगणना से समाज बंटेगा वे या तो समाज से आंख चुराना चाहते हैं या फिर समाज को ज्यों का त्यों बनाए रखना चाहते हैं. हम एक बंटे हुए समाज इसलिए बने रहे कि हमने अपनी दरारें भरने की जगह उन पर परदा डाल दिया. जाहिर है इसके पीछे नादानी नहीं सयानापन है. उन लोगों का सयानापन जो जाति की चर्चा उठाना नहीं चाहते हैं क्योंकि वे जातिगत यथास्थिति के सारे लाभ अपने पास बनाए रखना चाहते हैं. निश्चय ही जाति की गणना होगी तो उसका पहला लाभ जाति की राजनीति करने वालों को मिलेगा. लालू, शरद या मुलायम सिंह यादव इसलिए भी यह गिनती चाहते हैं. लेकिन इस छोटे-से ख़तरे को टालने के लिए हम एक ज्यादा बड़ी सामाजिक प्रक्रिया को समझने की जरूरत से इनकार नहीं कर सकते.
यह सच्चाई है कि जाति गिनने से जाति ख़त्म नहीं होगी. लेकिन वह पिछले 70 साल से जाति न गिनने से भी खत्म नहीं हुई. जाति को खत्म करने के लिए एक ज़्यादा बड़ी लड़ाई ज़रूरी है. और सूचना के हक के इस दौर में यह समझाने की जरूरत नहीं कि इस लड़ाई के लिए भी जाति के बारे में हमारे पास ज़्यादा से ज्यादा सूचनाएं होनी चाहिए, अपनी सामाजिक समरभूमि का एक साफ नक्शा होना चाहिए.

हैरान करने वाली बात है कि इस बार की जनगणना के साथ जुड़े विशिष्ट पहचान पत्र के लिए हम अपनी दसों उंगलियों के निशान और अपनी आंखों की बायोमेट्रिक पहचान देने को तैयार हैं- बिना यह सवाल उठाए कि इससे पुलिस राज्य की मजबूती के अलावा और क्या हासिल होगा. लेकिन जाति की जिस गिनती से आखिरकार हमारी एक बड़ी लड़ाई का वास्ता है, उसके लिए हम
तैयार नहीं हैं.