Home Blog Page 184

मौलाना की लिखी नई इबारत

तब भी दुनिया में पहली बार ही ऐसा हुआ होगा और अब भी संभवतः ऐसी मिसाल कहीं कायम नहीं हो सकी है कि एक मस्जिद में तकरीर सुनने के लिए हिंदुओं के बैठने के वास्ते विशेष कमरों का निर्माण कराया गया हो, ताकि हर जुम्मे को जब मुसलमानों का कारवां मस्जिद तक नमाज अदा करने पहुंचे तो उनसे पहले हिंदू वहां पहुंचकर अपनी जगह लिए रहें. करीब नौ दशक पहले रांची की जामा मस्जिद में इस कल्पना को हकीकत में बदला था मौलाना अबुल कलाम आजाद ने. बंगाल से निकाले जाने और नजरबंदी के दौरान मौलाना ने अपने जीवन के स्वर्णिम तीन साल (सन 1916-1919 तक) रांची में ही गुजारे थे. नजरबंदी के दौरान ही मौलाना ने हिंदू-मुसलिम एकता की दिशा में जो कवायद की और फिर जो मिसालें पेश हुईं,  उसका जोर अब भी कहीं नहीं मिलता.

‘अल्लाह के पैगंबर ने तो अपने घर में ही हिंदुओं को रखा था. फिर तकरीर में उनके शामिल होने से मस्जिद नापाक कैसे हो सकती है?’ झारखंड अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष गुलफाम मुजिबी बताते हैं कि बंगाल से निकाले जाने के बाद मौलाना रांची में आकर रहने लगे. यहां आने पर प्रतिष्ठित स्वतंत्रता सेनानी नागरमल मोदी (जिनके नाम पर नागरमल मोदी अस्पताल है) ने ही उनके रहने का इंतजाम किया था. रांची के अपर बाजार में स्थित जामा मस्जिद में जुम्मे के नमाज से पहले उन्होंने तकरीर करना शुरू किया. यह दौर आजादी की लड़ाई का था. रांची में भी इसका प्रभाव था. मुसलमानों की बड़ी आबादी होने के बावजूद कोई नाम सामने नहीं था. नागरमल मोदी, डॉ जद्दूमल, देवकीनंदन प्रसाद, प्रतुलचंद मित्रा… आदि उसकी अगुआई कर रहे थे. मौलाना ने मसजिद में सबसे पहले यही अपील शुरू की कि अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मुसलमानों का सिर्फ सियासी फलिजा (फर्ज) ही नहीं बल्कि मजहबी फलिजा भी है…  इसका व्यापक प्रभाव पड़ा और मुसलमानों ने जंग-ए-आजादी में सक्रियता दिखानी शुरू कर दी. कल तक जो दूर थे उन्होंने सक्रियता दिखानी शुरू कर दी तो लोगों को आश्चर्य हुआ. कई हिंदुओं ने उनसे कहा कि आपने तो जादू कर दिया है. हमें भी आपका भाषण सुनना है. चूंकि मौलाना नजरबंद थे और सार्वजनिक स्थलों पर कुछ बोल नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने मस्जिद में ही लोगों को तकरीर देनी शुरू की और उनके बैठने के लिए कमरों का निर्माण करवा दिया. उनकी तकरीर का ही असर था कि जब अंजुमन इसलामिया की स्थापना 1917 में हुई तो मुसलमानों के साथ-साथ हिंदुओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपनी भागीदारी की. इस बात का प्रमाण मदरसे के शिलापट्ट से भी मिलता है जिस पर राय साहब ठक्कर दास राय, बाबू जगतपाल सहाय आदि के नाम दर्ज हैं. मदरसे की नींव का पत्थर रातू के महाराज शाहदेव ने रखा था. इसी कड़ी में कुछ और शानदार तथ्यों को जोड़ते हुए अल्पसंख्यक मामलों के जानकार हुसैन कच्छी कहते हैं, ‘जब दिल्ली के जामा मस्जिद में एक एजुकेशनल कांफ्रेस में स्वामी श्रद्धानंद को तकरीर करने के लिए बुलाया गया तो देश भर से उलेमाओं के एक तबके ने विरोध करना शुरू किया कि इससे मस्जिद नापाक हो गई है. किसी माध्यम से यह खबर मौलाना तक भी पहुंची, वे तड़प उठे और नजरबंदी के दौरान रांची के इसी जामा मस्जिद में बैठकर उन्होंने एक दिन में ही किताब लिख डाली. जो बाद में पूरे देश और दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गयी. किताब का नाम था -जामे-उस-सवाहिद (कलेक्शन ऑफ प्रूफ). गैरमुसलिमों के मस्जिद में दाखिल होने के संबंध में इस किताब में उन्होंने लिखा है कि अगर मुसलमानों की किसी जमात ने इंसानी भलाई के लिए कोई बेहतर से बेहतर काम किया है तो वो एक यही काम है कि मस्जिद में मजलिसें मुन अकिद कीं  और अपने गैर मजहब हमसायों और हलीफों यानी हिंदुओं को भी इस मकसद से उनको अच्छे काम के लिए शरीक किया, जिस मकसद से रसूल अल्लाह (स.व) गैर मजहब के सुलह पसंदों और दोस्तों को मस्जिद में बुलाते और ठहराते थे. और इससे बढ़कर और क्या मिसाल हो सकती है कि जो अच्छा काम है वो रसूल के काम से जुड़ा हुआ है.’ मौलाना मुफ्ती सलमान कासमी कहते हैं, ‘मुसलमानों के लिए रसूल की जिंदगी सबसे बेहतर नमूना है और उनके रास्ते पर चलने वाले लोग ही सबसे बेहतर मुसलमान. अल्लाह के पैगंबर ने तो अपने घर में ही हिंदुओं को रखा था. फिर तकरीर में उनके शामिल होने से मस्जिद नापाक कैसे हो सकती है?’

रांची से दिल्ली जाकर एक भाषण में मौलाना ने कहा, ‘अगर आज आसमान की बुलंदियों से कोई फरिश्ता उतरकर कुतुबमीनार की छत पर आ जाए और वहां से एलान करे कि मैं तुम्हें 24 घंटों के अंदर स्वराज दे दूंगा, लेकिन तुम्हें हिंदू-मुसलिम की एकता से दस्तबरदार होना पड़ेगा, तो मैं आजादी से दस्तबरदार होना बरदाश्त कर लूंगा पर हिंदू-मुसलिम एकता से नहीं. इसलिए कि आजादी तो हमें मिलकर रहेगी और यदि थोड़ी देर हुई तो इससे हिंदुस्तान का थोड़ा नुकसान होगा मगर यदि हमारी एकता जाती रही तो इससे आलम-ए-इंसानियत का नुकसान होगा.’ ऐसी मिसाल देश में और शायद ही कहीं मिलती हो, पर मौलाना ने जो किया वह एकता कायम करने के क्षेत्र में बेहतरीन नमूना है.

अनुपमा

गर काबा हुआ तो क्या, बुतखाना हुआ तो क्या

सदियों से जेठ के महीने में लखनऊ शहर बजरंग बली को समर्पित एक भव्य त्योहार मनाता रहा है. इसका नाम है बड़ा मंगल.  लखनऊ को जानने-समझने वाला कोई भी व्यक्ति इससे इनकार नहीं कर सकता कि बड़ा मंगल इस शहर के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है. इस त्योहार को भी बड़ा उसी सिफत ने बनाया जिसने लखनऊ के मुहर्रम को आसमान की बुलंदियों पर पहुंचाया- शहर की मिली-जुली अकीदत और आस्थाएं.

कहा जाता है नवाब सादत अली खान की मां जनाबे आलिया को एक रात ख्वाब में हनुमान जी दिखाई दिए थे. उसके बाद कुछ महंत उनके पास आए और उनसे एक हनुमान मंदिर बनवाने में सहयोग मांगा. इस पर जनाबे आलिया ने लखनऊ में हजरत अली के नाम आबाद इलाके अलीगंज में एक भव्य हनुमान मंदिर बनवाया और उस पर जेठ के मंगलवार को मेले की परंपरा डाली. इस तरह लखनऊ में बड़े मंगल की शुरुआत हुई. अलीगंज हनुमान मंदिर के शिखर पर मौजूद चांद का प्रतीक आज भी मौजूद है.

वैसे अवध के नवाब भी हनुमान जी पर श्रद्धा रखते थे और उनके यहां बंदरों की हत्या पर भी प्रतिबंध था. वाजिद अली शाह ने तो कई हनुमान स्तुतियां भी लिखीं. वे कहते थे, ‘हम इश्क के बंदे हैं, मजहब से नहीं वाकिफ, गर काबा हुआ तो क्या, बुतखाना हुआ तो क्या.’

वैसे तो जेठ महीने के पहले मंगल को बड़ा मंगल माना जाता है लेकिन इस महीने हर मंगलवार को लखनऊ के चौराहों पर शरबत, हलुवा, बूंदी, लड्डू और पूरियां बंटते देखी जा सकती हैं. बंटवाने वाले हिंदू भी होते हैं और मुसलमान भी. मंदिरों पर जुटने वाली भीड़ में भी दोनों होते हैं. जिस तरह मुहर्रम में लखनऊ के हिंदू इमाम हुसैन को अकीदत का नजराना पेश करते हैं उसी तरह यहां के मुसलमान जेठ के महीने में मंगलवार को हनुमान जी के प्रति श्रद्धावान रहते हैं. मुहर्रम और बड़े मंगल में एक और साम्य इनमें लगने वाली सबीलों (प्याऊ) का भी है. मुहर्रम में भी सबीलें खूब लगती हैं और बड़े मंगल में भी. अंग्रेजों के जमाने से ही लखनऊ में इस दिन स्थानीय अवकाश होता है.

हलुवा, बूंदी और पूरियां बंटवाने वाले हिंदू भी होते हैं और मुसलमान भी. मंदिरों में जुटने वाली भीड़ में भी दोनों होते हैं

बड़े मंगल पर सबीलों और खाना बंटवाने की परंपरा नवाब वाजिद अली शाह ने शुरू की थी. चूंकि सबीलें इमाम हुसैन की शहादत से मंसूब हैं, इसलिए लखनऊ में बड़े मंगल पर मुसलमानों ने इस परंपरा को खूब आगे बढ़ाया. इतिहासकार डॉ रोशन तकी इस परंपरा को एक दूसरे नजरिए से भी देखते हैं. वे कहते हैं, ‘धार्मिक सद्भावना के अलावा इस परंपरा के पीछे एक मुख्य वजह यह भी थी कि सबील को एकता स्थापित करने वाले प्रतीक के रूप में देखा जाता है. अंग्रेजी हुकूमत का मुख्य हथियार सामाजिक फूट के जरिये राज्य हड़पना था. वाजिद अली शाह लखनऊ में एक अटूट समाज की स्थापना करना चाहते थे जिसको मज़हबी आधार पर तोड़ा न जा सके.’ बड़े मंगल के दौरान पिछले कई सालों से प्याऊ लगाने वाले जावेद अली कहते हैं, ‘जेठ में गर्मी बहुत पड़ती है. ऐसे में अगर आप किसी प्यासे को पानी पिलाते हैं तो इससे बड़ा सबाब नहीं हो सकता. जब मैं सबील नहीं लगाता था तब भी दूसरी सबीलों पर जाकर लोगों को पानी दिया करता था.’ लखनऊ के ही एक दूसरे मुसलमान हनुमान भक्त फहीम सिद्दीकी अपने हनुमान मंदिर जाने के पीछे की कहानी सुनाते हुए कहते हैं, ‘जिस दौर में मैं लखनऊ विश्वविद्यालय का छात्र था, तब साथ के बहुत-से दोस्त विश्वविद्यालय के सामने स्थित प्रसिद्ध हनुमान सेतु मंदिर जाया करते थे, बड़े मंगल पर सबका एक साथ अलीगंज वाले मंदिर जाने का प्रोग्राम बनता था. साथ देने के लिए मैं भी जाता था. इसी से धीरे-धीरे हनुमान जी के प्रति श्रद्धा बढ़ती गई. अब बाकी मंगलों में भले ही न जा पाऊं लेकिन जेठ के कम से कम एक मंगल में हनुमान सेतु जरूर जाता हूं.’

अगर आप लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों या फिर हनुमान सेतु मंदिर के महंतों से बात करें तो फहीम की बात को सही पाएंगे. लखनऊ विश्वविद्यालय के बहुत-से मुसलमान छात्र इस  मंदिर में हर मंगलवार को आते हैं. बड़े मंगल पर तो लखनऊ का शायद ही कोई मंदिर ऐसा हो जहां मुसलमान भक्त न जाते हों. यह भी सुखद संयोग है कि लखनऊ में कई हनुमान मंदिरों के बाहर मुसलमान प्रसाद की दुकान लगाते हैं तो मस्जिदों के बाहर हिंदू हलवाइयों की दुकानें हैं. शहर में हिंदुओं की बनवाई मस्जिदें और इमामबाड़े हैं तो मुसलमानों के बनवाए मंदिर भी हैं.
बड़ा मंगल शायद इसीलिए बड़ा मंगल कहा जाता है क्योंकि इसके बड़े दिल में सभी मजहब के लोगों के लिए जगह है. काश मंदिर और मस्जिद के लिए झगड़ने वाले लोगों ने इस बड़प्पन से कोई सबक सीखा होता.

हिमांशु बाजपेयी

एक स्वादिष्ट प्रेमकहानी : खिचड़ी

फिल्म खिचड़ी

निर्देशक आतिश कपाड़िया

अभिनेता राजीव मेहता, सुप्रिया पाठक, जेडी मजेठिया

भारत में यह पहली बार हुआ है कि किसी धारावाहिक पर फिल्म बनाई जाए, वह भी उन्हीं अभिनेताओं को लेकर. फिल्म सीरियल से कुछ कदम आगे ही है. हां, उसमें ऐसी कोई कहानी नहीं है कि आप बूझते रहें कि आगे क्या होगा. कहीं कहीं उसमें ठहराव वही कायम है जो धारावाहिकों में होता है लेकिन फिर भी उतना नहीं. महत्वपूर्ण यह है कि वह कहीं सीरियल की खूबियां नहीं खोती, उल्टा दो घंटे की एक कहानी में उन्हें दिखाने में कामयाब होती है. आमतौर पर टीवी पर आने वाले सिचुएशनल कॉमेडी वाले धारावाहिक मुख्य रूप से अपने किरदारों के इर्द-गिर्द घूमते हैं. वह जितना स्वाभाविक और विश्वसनीय ढंग से होता है, धारावाहिक उतना अच्छा लगता है. उनमें कहानी केन्द्र नहीं होती लेकिन केन्द्र से इतना बाहर भी नहीं होती कि वह ऊपर से थोपी हुई लगे. खिचड़ी भी ऐसा ही रहा है. उसकी जान उसके मुख्य पात्र हैं और उन्हें जीने वाले कमाल के एक्टर. फिर वे अपनी कहानी अपने आप भी रच सकते हैं. राजीव मेहता और सुप्रिया पाठक बड़े परदे के किसी भी हास्य अभिनेता से कम नहीं लगते.

यह एक ऐसा परिवार है, जिसके अधिकांश बड़े, अविश्वास करने की हद तक भोले (या बेवकूफ) हैं और बाकी बड़े उनसे कुछ कम. दो बच्चे हैं, जो समझदार हैं और फिल्म के सूत्रधार भी. खिचड़ी इस मायने में महत्वपूर्ण धारावाहिक और फिल्म है कि उसके कैरेक्टर बहुत मजबूत हैं. आप उन्हें बिल्कुल अलग अलग पहचान सकते हैं और यह जान सकते हैं कि इनमें से कौन किस बात पर कैसे रिएक्ट करेगा. फिल्म या धारावाहिक लिखने के स्तर पर यह आतिश कपाड़िया का प्रशंसनीय काम है. जैसे परिवार के मुखिया तुलसीदास थोड़े ज्यादा समझदार हैं और इसीलिए अपने परिवार की हरकतों पर नाराज रहते हैं. उनका बेटा प्रफुल्ल (जिसे वे ‘प्रफुल्ल गधा’ कहते हैं) खुद को बहुत होशियार समझता है लेकिन सबसे बेवकूफ है. वह अक्सर अपनी अंग्रेजी न जानने वाली पत्नी हंसा को अंग्रेजी शब्दों के हिन्दी अर्थ समझाता है जैसे ऑर्डर का अर्थ ‘और डर’. हंसा आदर्श टीवी सीरियल बहू की तरह सज धज कर रहती है, कुछ काम नहीं करती और बार-बार कहती है कि वह थक गई है. इस तरह यह टीवी धारावाहिकों का भी मजाक है और इसी कड़ी में आतिश फिल्म को ‘डीडीएलजे’ और ‘पापी गुड़िया’ जैसी अमर प्रेम कहानियों की तरह अमर बनाते हुए बॉलीवुड की ज्यादातर प्रेम-कहानियों पर शानदार व्यंग्य करते हैं. फिल्म में हंसा के भाई हिमांशु का किरदार बढ़ाकर उसे नायक बना दिया गया है. वह जब आखिर में अपनी पंजाबी मंगेतर को पाने निकलता है तो सड़क पर लगा मील का पत्थर मास्को की दूरी भी बता रहा है क्योंकि वह बॉलीवुड के नायक की हदें जानता है. इसी तरह स्विट्जरलैंड और समुद्र के किनारों को छोड़कर सब्जी मंडी में फिल्माए गए प्यार के गाने ‘भोंसले मार्केट चल’ का जिक्र किए बिना यह समीक्षा अधूरी है.  

गौरव सोलंकी

सगरी नगरिया शोर आपन हियां न भोर

कल्याण बिगहा का कल्याण

पटना के पहाड़ी बाईपास में पांच घंटे जाम में फंसे रहने के बाद दिन के करीब 12 बजे हम बख्तियारपुर जिले में स्थित नीतीश कुमार के पुश्तैनी गांव कल्याण बिगहा पहुंचने को होते हैं. हमें गांव तक ले जा रही गाड़ी के ड्राइवर सिंहजी कहते हैं, ‘कितना मजा आता अगर आज नीतीश कुमार भी अपने गांव आने वाले होते. जब पांच घंटे तक पहाड़ी जाम में फंसते तब पता चलता कि उनका गांव है तो पटना के पास लेकिन जाम के कारण इतना दूर हो जाता है कि पहुंचने के लिए 10 घंटे भी कम पड़ते हैं.’

खैर! 25 सितंबर को किसी तरह हम कल्याण बिगहा पहुंचते हैं. संयोगवश उसी रोज हमारे पहुंचते ही सतीश कुमार भी वहां पहुंच जाते हैं. पेशे से वैद्य सतीश कुमार नीतीश के बड़े भाई हैं. नीतीश के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद भी काफी समय तक सतीश अपने पुराने खपरैल वाले घर में ही रहा करते थे. लेकिन पिछले लगभग डेढ़ साल से मां की तबीयत ज्यादा खराब होने की वजह से वे उन्हें लेकर पटना चले गए हैं. वे अब वहां नीतीश के साथ ही रहते हैं.

अपने टूटे-फूटे घर के बाहर ही कुर्सी लगाकर बैठे सतीश कहते हैं, ‘जब मौका मिलता है, आ जाते हैं. मन तो इधर ही बसता है, कल्याण बिगहा में या बख्तियारपुर में. मां की तबीयत के कारण पटना रहते हैं नहीं तो इधर ही रहते हैं.’

सतीश का राजनीति से कभी कोई लेना-देना नहीं रहा. एक अजीब बात सतीश के अपने गांव में होने पर यह देखने में आती है कि उनके घर के अगल-बगल रहने वालों पर उनके वहां आने का कोई प्रभाव पड़ता नहीं दिखाई देता. आम तौर पर होता यह है कि नेता जी या उनके परिजन जब गांव आते हैं तो लोगों की भारी भीड़ जमती है, लेकिन कल्याण बिगहा में वह परंपरा नहीं दिखाई देती. एक मायने में यह अच्छा भी है लेकिन राजनीति से बेरुखी समझ से परे है. गांव के चौपालों पर बैठकें नहीं जमती हों ऐसा नहीं है. बैठकें भी जमती हैं और खूब गरमागरम बहसें भी होती हैं लेकिन नीतीश की राजनीति पर नहीं, न ही लालू के राजनीतिक दांव-पेंचों पर. बल्कि ताश के खेल में कौन कितना चतुर-ज्ञानी हो गया है, इस पर. 25 को हमारे कल्याण बिगहा पहुंचने के वक्त राज्य की चुनावी राजनीति में नीतीश का काव्य-युद्ध चर्चाओं के केंद्र में था. लेकिन कल्याण बिगहा के चौपालों में उसकी आहट तक सुनाई नहीं पड़ी.

गरमागरम बहसें होती हैं. नीतीश की राजनीति पर नहीं, न लालू के दाव-पेंच पर बल्कि ताश के खेल में कौन कितना चतुर-ज्ञानी हो गया है, उस पर

कल्याण बिगहा को राजनीति में ज्यादा रुचि नहीं. हां, कभी नीतीश की रैली हो तो पूरा गांव पहुंच जाता है वहां. नीतीश के नाम पर यहां जो भी वोट मांगेगा उसे एकमुश्त मिलेगा. इसकी गारंटी यहां हर कोई दे सकता है. जैसा कि रजनीश कुमार कहते हैं, ‘यह उनका अपना गांव है तो यहां क्या राजनीति की झलक मिलेगी. एक गांव में एक ही नेता पैदा होता है, यहां दूसरे नेता की गुंजाइश नहीं.’ वे बताते हैं कि यहां नीतीश साल में दो बार जरूर पहुंचते हैं – 14 मई को अपनी पत्नी मंजू देवी की पुण्यतिथि के अवसर पर और 29 नवंबर को अपने पिता स्व. रामलखन सिंह को श्रद्धांजलि देने. दोनों के स्मृति स्थल गांव में प्रवेश करते ही नजर आते हैं.

नीतीश के यहां आने से पहले गांव की साफ-सफाई अच्छे से होती है. नीतीश आते हैं, माल्यार्पण करते हैं, कुछ देर रुकते हैं, चले जाते हैं. ग्रामीणों के पास अपने नेता से पूछने के लिए कोई सवाल नहीं होता, समस्याओं की कोई फेहरिस्त नहीं होती और न ही उम्मीदों की पोटली लिए पहुंचता है कोई वहां.

नीतीश  के मुख्यमंत्री बनने के बाद कल्याण बिगहा में कल्याण की नदियां बही हैं. प्राथमिक विद्यालय के बाद अब इंटर तक की पढ़ाई का इंतजाम हो रहा है. कम्युनिटी हॉल में आईटीआई चालू हो चुका है. लालू के गांव फुलवरिया हम एक दिन पहले पहुंचे थे. वहां और यहां में एक फर्क साफ महसूस होता है. लालू की  तुलना में नीतीश का सबसे ज्यादा जोर शिक्षण संस्थान स्थापित करवाने पर रहा है. इसके अलावा बिजली के लिए विशेष व्यवस्था हो रही है. पानी की टंकी से पानी की सप्लाई होती है. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खुल गया है और जिस कल्याण बिगहा में हरनौत के रास्ते पहुंचने के लिए गड्ढों से होकर जाना पड़ता था, वहां मॉडल सड़क बिछी है.

लेकिन इतने के बाद भी नीतीश के गांव में राजनीति से लोगों का कोई लगाव नहीं दिखता. उन्हें तो बस तीर छाप पर वोट डालने से मतलब है. हालांकि वर्षों बाद नीतीश के गांव से एक और युवा ने राजनीति की शुरुआत की है. युवा जदयू के प्रदेश महासचिव बने राजकिशोर कहते हैं, ‘हम राजनीति ही करना चाहते हैं, इसमें साहब का सहयोग मिलेगा, यह उम्मीद है.’

अंत में नीतीश के डेवलपमेंट एजेंडे की पोस्टमार्टम करने वाले एक सज्जन मिलते हैं, ‘नीतीश जब तक अधिकारियों पर सख्ती नहीं करेंगे, उनका विकास-मॉडल खाली हाथी दांत ही रह जाएगा.’

फुलवरिया में नहीं महकती राजनीति

24 सितंबर को बिहार के अखबारों में लालू प्रसाद के बेटे तेजस्वी के राजनीति में लांचिंग की खबर सुर्खियों में थी. समूचे राज्य में तेजस्वी के बहाने लालू और लालू के बहाने तेजस्वी के राजनीतिक भविष्य का आकलन चल रहा था, उसी रोज हम फुलवरिया पहुंचे.

फुलवरिया यानी बिहार के करिश्माई नेता लालू प्रसाद यादव का खानदानी गांव. राजनीति में अदभुत प्रयोग से सीएम बनी राबड़ी का ससुराल. वह गांव, जो 1990 की शुरुआत में बिहार के चप्पे-चप्पे में रातों-रात चर्चित हो गया था. तब फुलवरिया पर रचित एक लोकगीत बड़ा मशहूर हुआ था – धन फुलवरिया, धन माई मरछिया, लालू जिनके ललनवा कि जानेला जहनवा ए रामा…

छपरा, सीवान, मीरगंज के बाद लाइनबाजार की संकरी सड़क पर बेतरतीब निकल आई दुकानों और हर नियम को तोड़ने पर आमादा ट्रकों के जाम से जूझते हुए फुलवरिया पहुंचने पर एक सज्जन से मुलाकात होती है. लालू जी का घर पूछने पर वे हाथों के इशारे से रास्ता बताते हैं. लालू जी के दोमंजिला मकान के सामने पहुंचकर जब जानने की कोशिश करते हैं कि यहां कोई रहता नहीं क्या तो बताया जाता है कि जिस व्यक्ति ने हमें यहां तक पहुंचने का रास्ता बताया वही यहां रहते हैं. उनका नाम है रामानंद यादव और वे लालू प्रसाद के भतीजे हैं. भैंस चरा रहे रामानंद के पास हम वापस पहुंचते हैं. वे थोड़ी देर में मिलने का आश्वासन देकर चले जाते हैं. वह ‘थोड़ी देर’ नहीं आता. 4 घंटों में कई बार उनसे सामना होता है, मगर वे हर बार कभी किसी तो कभी किसी बहाने कन्नी काट लेते हैं.

फुलवरिया में चौपालों की खाक छानने के क्रम में कइयों से दिलचस्प मुलाकातें होती हैं. लालू प्रसाद द्वारा निर्मित ब्रह्मबाबा चबूतरे पर गंवई गीतों की मस्ती के साथ गेहूं फटकती गांव की एक बहुरिया कहती है, ‘नेता जी के बारे में हमको विशेष पता नहीं, सिवाय इसके कि जब भी वोट का टाइम आएगा, हम लालटेन पर पीं बजा आएंगे.’

‘नेता जी के बारे में हमको विशेष पता नहीं, सिवाय इसके कि जब भी वोट का टाइम आएगा, हम लालटेन पर पीं बजा आएंगे’

लालू प्रसाद जब बिहार की सत्ता पर काबिज हुए थे तो फुलवरिया में एकाएक विकास की आंधी चली थी. हेलीपैड, अस्पताल, थाना, बैंक, डाकघर, पानी की टंकी, पावर हाउस, ब्लॉक ऑफिस, अंचल कार्यालय, भव्य दुर्गा मंदिर से लेकर ब्रह्मबाबा स्थान तक सबकी स्थापना हुई. लेकिन पूरे बिहार में राजनीति की नई परिभाषा गढ़ देने वाले लालू प्रसाद के गांव में उनकी चर्चा तो है, किसी भी प्रकार की राजनीति की बिलकुल नहीं. फुलवरिया में न कहीं राजद का कोई झंडा है, न बैनर-पोस्टर और न ही कहीं अपने नेता की कोई तसवीर. पूरे राज्य में छाए रहने वाले नेता के गांव में यह राजनीतिक शून्यता आश्चर्य में डाल देती है.

मरछिया देवी रेफरल अस्पताल के सामने एक गुमटी के पास चंद नौजवान बैठे मिलते हैं. उनमें से एक कमलेश कहता है, ‘यह तो साहेब का गांव है जहां हर चुनाव में उनकी पार्टी को एकमुश्त वोट पड़ेगा, इससे ज्यादा राजनीति की गुंजाइश यहां नहीं है.’

यह भी दिलचस्प है कि जब तेजस्वी के राजनीति में प्रवेश की चर्चा पूरे राज्य में थी, उस रोज फुलवरिया में सिर्फ एक आदमी इस पर बात करने को तैयार मिला. दुर्गा मंदिर की देखरेख करने वाले महेंदर दास कहते हैं, ‘तेज बाबू अभी क्रिकेट ही खेलते तो मजा आता. राजनीति में तो कभी भी आ जाते. हम तो उनको बड़ा खिलाड़ी बनते हुए देखना चाहते थे. उसमें ज्यादा नाम है.’ यहां राजनीति पर क्रिकेट का भारी होना भी एक अलग ही एहसास करवाता है.

गांव में ही मिले नौजवान परमहंस यादव बताते हैं, ‘हमारे नेता यहां के लिए भगवान ही हैं. उनके मंत्री बनने से पहले यहां आने के लिए कच्ची सड़क तक नहीं थी, कीचड़ भरे रास्ते को पार करना पड़ता था. लेकिन अब देखिए, कई-कई चार पहिए लगे हैं.’ परमहंस के अनुसार यही बदलाव है. यही विकास है. वहीं बैठा परमहंस का साथी उसकी बातों को काटता है, ‘बदलाव तो यह भी है कि एक समय जब लालू जी यहां आते थे तो हजारों का हुजूम उमड़ पड़ता था. पूरा इलाका फुलवरिया में होता था. अब इलाके की बजाय बस गांव-जवार वाले उमड़ते हैं.’ वह बात को आगे बढ़ाता है, ‘तब हमारे नेता जी ने ब्लॉक, बैंक, डाकघर, अस्पताल, पावर हाउस सब बनवाया लेकिन नई पीढ़ी के सामने सवाल यह है कि यहां एक हाई स्कूल क्यों नहीं है? एक इंटर कॉलेज क्यों नहीं है? कोई तकनीकी शिक्षण संस्थान क्यों नहीं खुला?’

लौटते समय लाइनबाजार में चाय की दुकान पर मिले ओमप्रकाश बताते हैं, ‘लालू जी ने अपने गांव में विकास के कई कार्य किए, पर आसपास के गांवों में कुछ खास नहीं हुआ जिससे उनमें फुलवरिया के प्रति ईर्ष्या का भाव पैदा हुआ और राजद के खिलाफ वोटिंग हुई. उनके खुद के इलाके मीरगंज से जदयू के रामसेवक सिंह विधायक हैं.’ ओमप्रकाश के अनुसार विकास के अन्य कार्यों के साथ राजनीतिक चेतना का भी विकास हुआ होता तो आज फुलवरिया और आसपास के इलाके में कई और लालू यादव पैदा हो गए होते जो राजा का गढ़ कभी नहीं ढहने देते.

शहरबन्नी का सच

खगड़िया से अलौली प्रखंड मुख्यालय जाते वक्त सिंगल लेन सड़क का संकट तो फिर भी कम है लेकिन अलौली के बाद हथवन होते हुए फूलतोरा घाट तक पहुंचने में अगर आप ज्यादा मुश्किल झेले बिना सफल हो जाते हैं तो समझिए कि जंग जीत गए. यहां का रास्ता बेहद घटिया है. चालक बार-बार गाड़ी आगे ले जाने से मना कर देता है. बहुत मान-मनुहार के बाद ही वह फूलतोरा घाट तक जाने को तैयार होता है. फूलतोरा से नाव की सवारी करके ही रामविलास पासवान के गांव शहरबन्नी पहुंचा जा सकता है. वह गांव जहां के एक निर्धन दलित परिवार से आए रामविलास ने पांच दशक पहले राजनीति में न सिर्फ कदम रखा बल्कि बिहार सरकार में मंत्री रहे मिश्री सादा जैसे खुर्राट कांग्रेसी नेता को पटखनी भी दी थी.
इतने बड़े दिग्गज दलित नेता के गांव तक पहुंचने के लिए जिला मुख्यालय से सड़क मार्ग का न होना हैरत भरा है. बिजली के तार के इंतजार में लगे खंभे उपेक्षा की अलग कहानी कहते हैं. राजनीतिक निष्क्रियता यहां भी है, जनता और नेता दोनों की तरफ से. फूलतोरा घाट के रास्ते में मिले गंगेश बताते हैं, ‘बिजली-पानी और रोजी-रोटी जैसी बुनियादी चीजें न मिलें तो राजनीति को लेकर रोमांचित होने की कोई वजह नहीं बचती.’ वहीं रामप्रवेश, शिवनारायण समेत कई ऐसे लोग मिलते हैं जिनकी रुचि रामविलास की राजनीतिक बुलंदी में नहीं है और न ही उनके छोटे भाई व अलौली के विधायक पशुपति कुमार पारस के उपमुख्यमंत्री बनने में.

पूरा अलौली प्रखंड तो दूर, शहरबन्नी ही गांव जैसी बुनियादी सुविधाओं तक से वंचित है. यहां की बहुसंख्यक आबादी मुसहर है जो महादलित समीकरण का अहम हिस्सा हंै. ऐसे में नीतीश रामविलास की असफलताओं को भुनाने की पूरी कोशिश करेंगे. प्रदेश के दिग्गज राजनेता के गांव के प्रति सरकारी और उसकी राजनीतिक बेरुखी आश्चर्यजनक है.

वेद-कुरान का ज्ञान

संकरी गलियों की भूलभुलैया वाला इलाहाबाद का करेली मोहल्ला. मुसलिम बहुल इसी मोहल्ले की एक गली में तकुआ इस्लामिक स्कूल है जहां हमें वेदों और कुरान की शिक्षा एक साथ देने वाली शिक्षिका  असमा शम्स मिलती हैं. वे कहती हैं, ‘सभी धर्म एक ही मंजिल की ओर इशारा करते हैं. यदि आप भगवद गीता, वेद, उपनिषद या फिर कुरान से सुरे इख्लास, सुरे फातेहा पढ़ें तो आप पाएंगे कि इन सबमें एक समानता है.  ये सभी ईश्वर की एकता की बात कहते हैं. यही बात स्वामी दयानंद द्वारा लिखी गई  किताब सत्यार्थ प्रकाश और ब्रह्मसूत्र में भी कही गई है.’

मदरसे में बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ विभिन्न धर्मों के बीच मौजूद खाई को पाटने की तालीम भी मिलती हैइस इलाके में मदरसों की भरमार है. परंतु इस स्कूल का मिजाज इन मदरसों से बिलकुल जुदा है. नाम भले ही इस्लामिक स्कूल हो लेकिन यहां हर मजहब के बच्चों का स्वागत है.  स्कूल इस्लामिक एजुकेशन एंड रिसर्च संस्थान (ईरो) द्वारा चलाया जाता है. पेशे से कंप्यूटर प्रोग्रामर जिया-उस-शम्स इस संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष हैं. अप्रैल 2010 में इस स्कूल की शुरुआत करने वाले जिया कहते हैं कि वे ऐसा संस्थान शुरू करना चाहते थे जहां बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ ही विभिन्न धर्मों के बीच मौजूद खाई को पाटने और भाईचारे को बढ़ावा देने की तालीम दी जाए.

ईरो की स्थापना जनवरी, 2008 में जागरूक नागरिकों के एक समूह ने विभिन्न धर्मों के बीच संवाद स्थापित करने के उद्देश्य से की थी. इस्लाम के बारे में फैली भ्रांतियां दूर करना भी इसकी स्थापना की एक मुख्य वजह थी. तभी से यह संस्थान शांति और विभिन्न धर्मों में सामंजस्य बैठाने की दिशा में अनथक प्रयास कर रहा है. जिया बताते हैं, ‘यहां एक अनूठी लाइब्रेरी भी है जहां आपको कुरान, हदीस, बाइबिल, गीता और  वेद एक साथ रखे हुए मिल जाएंगे. यहां विभिन्न भाषाओं में धर्म ग्रंथ उपलब्ध हंै ताकि आम जनता उन्हें आसानी से पढ़ और समझ सके. यहां आप बाइबिल और भगवद गीता उर्दू में या फिर कुरान अंग्रेजी में पढ़ सकते हैं. हमारा मकसद लोगों को सिर्फ अपने धर्म के बारे में पढ़ने और समझने के लिए प्रेरित करना नहीं बल्कि दूसरे धर्मों को समझना और उसके बारे में फैली गलतफहमियों को दूर करना भी है. ‘जिया के इस कदम को अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है. वे अब ऐसे और स्कूल खोलने की भी सोच रहे हैं. उनके मुताबिक विभिन्न धर्मों के बीच फैले वैमनस्य की मुख्य वजह गलतफहमी और अविश्वास है. वे कहते हैं, ‘विभिन्न धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने पर कोई भी आसानी से यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि सभी धर्म एक ही बात कहते हैं. शांति, सामंजस्य और इंसानियत ही सभी धर्मों का सार है. हम चाहे उसे जिस नाम से बुलाएं या जिस तरीके से उसकी इबादत करें. परंतु वह एक है.’  स्कूल में पढ़ने वाली अल शिफा कहती हैं ‘शिक्षा ही लोगों को शांति और एकता की राह दिखा सकती है. अगर सब आपस में प्यार से रहें तो धरती ही जन्नत बन जाएगी.’

ईरो द्वारा समय-समय पर भाईचारे और आपसी विश्वास को बढ़ावा देने के लिए बैठकें, परिचर्चा और गोष्ठियां भी आयोजित की जाती हैं.  इन आयोजनों में सभी समुदायों के बुद्धिजीवी और धार्मिक नेता भाग लेते हैं और एक मंच से शांति के प्रसार और विभिन्न धर्मों के बारे में फैली भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास करते हैं.
आधुनिक विज्ञान के साथ संस्कृत और अरबी पढ़ते  तकुआ इस्लामिक स्कूल के बच्चे आश्वस्त करते लगते हैं कि वे आगे जाकर सभी धर्मों को समझने वाले और उनका आदर करने वाले जिम्मेदार नागरिक जरूर बनेंगे. 

सैफ उल्लाह खान                                

अमन सिखाती अयोध्या

‘सरयू नदी में पंडे धर्म-कर्म कराते थे और मुसलिम समुदाय के लोग फूल चढ़वाने का काम करते थे. जहूर मियां बाबरी मस्जिद का केस भी लड़ते थे और संत-महंत सामने से गुजर जाएं तो दुआ-सलाम व आदर देने में कहीं भी कोताही नहीं करते  थे. हाशिम मियां के क्या कहने, उनका महंत परमहंस जी से तो याराना जैसा था. हाशिम मियां आज भी हैं वे बाबरी मस्जिद के एक पक्षकार भी हैं और इसी मामले में हिंदू पक्ष की ओर से पक्षकार रहे रामचंद्र परमहंस के साथ एक ही गाड़ी में बैठकर रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का मुकदमा लड़ने के लिए जाते थे.’

फूलबंगले की सजावट से लेकर विभिन्न त्योहारों तक तमाम मौकों पर शहर के हिंदू-मुसलिम साथ खड़े दिखते हैंभाजपा के सांसद रहे ब्रह्मचारी विश्वनाथ दास शास्त्री की यह बात उस अयोध्या की झलक देती है जिसकी हर ईंट में गंगा-जमुनी तहजीब और सद्भाव की मिट्टी बसी है. फूलबंगले की सजावट से लेकर विभिन्न मेले-त्योहारों तक तमाम मौकों पर शहर के हिन्दू-मुसलिम साथ-साथ दिखाई देते हैं.  पूजा के लिए दिए जाने वाले फूलों से लेकर मंदिरों में चढ़ने वाली माला को पिरोने के काम में लगे मुसलिम समुदाय के लोग शहर के ताने-बाने में ऐसे रचे बसे हैं कि यदि ये न हों तो शायद अयोध्या की जिंदगी ही ठहर जाए.

कनकभवन के बगल में स्थित सुंदरभवन में रामजानकी का मंदिर है. अन्सार हुसैन उर्फ चुन्ने मियां 1945 से लेकर जीवन के अंतिम क्षणों तक इस मंदिर के मैनेजर रहे. मेले में तो वे पुजारी के काम में मंदिर में हाथ भी बंटाते थे. वे पंचवक्ती नमाजी थे लेकिन क्या मजाल इसे लेकर अयोध्या में कोई विवाद हुआ हो.
अयोध्या के साधु-संतों के लिए विशेष तौर पर अयोध्या के मुसलिम कारीगरों द्वारा जो खड़ाऊं बनायी जाती है उसे ‘चुन्नी-मुन्नी’ कहते हैं. इसका वजन 50 से लेकर 100 ग्राम तक होता है. इसे बनाने वाले एक मोहम्मद इकबाल बताते हैं कि यह एक खास हुनर है . इनके पिता भी यही काम करते थे और खानदान के लगभग एक दर्जन लोग इसे अपना व्यवसाय और सेवा बनाए हुए हैं. 6 दिसम्बर, 1992 को बाहरी उपद्रवी लोगों ने इनका घर जलाकर खाक कर दिया फिर भी इन्होंने न तो अयोध्या छोड़ी और न खड़ाऊं बनाना. हनुमानगढ़ी सहित तमाम मंदिरों में ये खड़ाऊं चढ़ाई जाती है. जब विश्व हिंदू परिषद के अयोध्या आंदोलन के कारण स्थितियां खराब होने के अंदेशे में खड़ाऊं के कारोबार में लगे मुसलिम कारीगर थोड़े दिनों के लिए अयोध्या छोड़कर दूसरी जगहों पर चले गए तो विश्व हिंदू परिषद को भरतकुंड के खड़ाऊ पूजन का कार्यक्रम पूरा करने के लिए जरूरी खड़ाऊं उपलब्ध नहीं हो सकी.

इतिहास पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि अयोध्या में कई मंदिर और अखाड़े हैं जिन्हें मुसलिम शासकों ने समय-समय पर जमीन और वित्तीय संरक्षण दिया. फैजाबाद के सेटिलमेंट कमिश्नर रहे पी कारनेगी ने भी 1870 में लिखी अपनी रिपोर्ट में इस आशय के कई उल्लेख किए हैं. रामकोट क्षेत्र, जहां अयोध्या विवाद का मुख्य केंद्र बिंदु विवादित परिसर है, उसी के उत्तर में स्थित जन्मस्थान मंदिर 300 वर्ष पुराना है. यह वैष्णवों के तड़गूदड़ संप्रदाय का मंदिर है और कार्नेगी ने लिखा है कि इसके लिए जमीन अवध के नवाब मंसूर अली खान ने दी थी. रामकोट में प्रवेश द्वार पर ही एक टीलेनुमा किले के रूप में दिखती है हनुमानगढ़ी. सीढ़ियां देख लीजिए तो लगता है जैसे पहाड़ी पर चढ़ना है. हनुमानगढ़ी को नवाबों के समय में दी गई भूमि पर बनाया गया था और आसफुदौला के नायब वजीर राजा टिकैतराय ने इसे राजकोष के धन से बनवाया. आज भी यहां फारसी में लिपिबद्ध पंचायती व्यवस्था चल रही है. जिसका मुखिया गद्दीनशीन कहलाता है. इस समय रमेशदास जी इसके गद्दीनशीन हैं. हनुमानगढ़ी के महंत ज्ञानदास ने 2003 में अयोध्या के इतिहास में हनुमानगढ़ी परिसर में रोजा इफ्तार का आयोजन करके हिन्दू-मुसलिम के बीच अयोध्या आंदोलन के फलस्वरूप आई कुछ दूरियों को समाप्त करने के लिए एक नया अध्याय खोला और इसके बाद सादिक खां उर्फ बाबू टेलर ने मस्जिद परिसर में हनुमान चालीसा का पाठ कराकर अवध की उसी गंगा-जमुनी तहजीब का परिचय दिया जिसका अयोध्या भी एक हिस्सा है.

हनुमानगढ़ी के महंत, षटदर्शन अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत ज्ञानदास कहते हैं कि नागापनी संस्कार में उनके गुरू द्वारा बताया गया था कि अवध के नवाब आसफुदौला और सूबेदार मंसूर अली खान के समय में मंदिर को दान मिला था. महन्त ज्ञानदास फारसी में लिखे उस फरमान को दिखाते हैं जिसके अनुसार मंदिर को दान मिला. वे कहते हैं, ‘जहां तक मुझे ज्ञात है कि नवाब के नायब नवल राय द्वारा अयोध्या के कई मंदिरों का जीर्णोद्धार हुआ. बाबा अभयराम दास को भी नवाबों के काल में भूमि दी गई थी.’

इसी अयोध्या में बाबर के समकालीन मुसलिम शासकों ने दंतधावन कुंड से लगे अचारी मंदिर जिसे दंतधावनकुण्ड मंदिर के रूप में भी जाना जाता है, को पांच सौ बीघे जमीन ठाकुर के भोग, राग, आरती के लिए दान में दी थी. महंत नारायणाचारी बताते हैं कि अंग्रेजों ने भी इस जमीन पर मंदिर का मालिकाना हक बरकरार रखा और जमीन को राजस्व कर से भी मुक्त रखा, इस शर्त पर कि मंदिर द्वारा ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ कोई कार्य नहीं किया जाएगा.

अयोध्या में ही उदासीन संप्रदाय का नानकशाही रानोपाली मंदिर भी है. यह वही मंदिर है जिसकी चौखट पर ऐतिहासिक ‘धनदेव’ शिलालेख जड़ा है जिसमें पुष्यमित्र के वंशजों द्वारा यहां एक ऐतिहासिक यज्ञ करने का वर्णन है. इस मंदिर का क्षेत्र ही इतना बड़ा है कि मंदिर परिसर के अंदर खेती भी होती है. तहलका ने कुछ साल पहले जब यहां महंत दामोदरदास से मुलाकात की थी तो उन्होंने नवाब आसफुद्दौला का एक दस्तावेज दिखाया था जो फारसी में लिखा था. उन्होंने बताया था, ‘नवाब ने मंदिर के लिए एक हजार बीघे जमीन दान में दी थी लेकिन इसकी जानकारी हमें नहीं थी. 1950 में इसका पता चला जब महंत केशवदास से मार्तंड नैयर और शकुंतला नैयर ने मंदिर की जमीन का बैनामा करा लिया. मामला आगे बढ़ा तो पता चला कि यह तो हो ही नहीं सकता क्योंकि जमीन दान की थी उसी दौरान हमें आसफुद्दौला की ग्राण्ट का यह प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ था जिसे कोर्ट में लगाया गया और बैनामा खारिज हुआ. कोर्ट ने कहा कि दान की भूमि को बेचा नहीं जा सकता.’ गौरतलब है कि शकुंतला नैयर तत्कालीन जिलाधिकारी केकेके नैयर की पत्नी तथा मार्तंड नैयर उनके बेटे थे. केकेके नैयर के समय ही 22/23 दिसंबर 1949 को मूर्तियां बाबरी मस्जिद के अंदर रखी गई थीं. बाद में ये पति-पत्नी जनसंघ के टिकट पर सांसद भी निर्वाचित हुए थे.  

सरयू किनारे स्थित लक्ष्मण किले के बारे में उल्लेख मिलता है कि यह मुबारक अली खान नाम के एक प्रभावशाली व्यक्ति ने बनवाया था. यह अब रसिक संप्रदाय का मंदिर है जिसके अनुयायी  रासलीलानुकरण को अपनी उपासना के अंग के रूप में मान्यता देते हैं. अयोध्या-फैजाबाद दो जुड़वां शहर हैं. फैजाबाद नवाबों की पहली राजधानी रही है. गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रभाव फैजाबाद की दुर्गापूजा पर भी दिखता है जब चौक घंटाघर की मस्जिद से दुर्गा प्रतिमाओं के जुलूस पर फूलों की वर्षा की जाती है. यह परंपरा कब शुरू हुई यह कहना मुश्किल है, लेकिन यह उसी रूप में आज भी जारी है.

सुमन गुप्ता

राजनीतिक पत्रकारिता की छीजन

आखिर इसकी कीमत आम लोगों को ही तो चुकानी पड़ेगी

क्या चैनलों में राजनीतिक रिपोर्टिंग का मर्सिया पढ़ने का समय आ गया है? संभव है कि सवाल आपको बेतुका लगे. लेकिन अगर आपने हाल में  ‘स्टार न्यूज’ के नेशनल एडिटर और ठेठ राजनीतिक रिपोर्टर दीपक चौरसिया को राखी सावंत से या ‘आज तक’ के ब्यूरो चीफ और राजनीतिक रिपोर्टर रहे अशोक सिंहल को राहुल महाजन की पत्नी डिंपी महाजन से एक्सक्लूसिव इंटरव्यू करते देखा हो तो यह सवाल उतना बेतुका नहीं लगेगा. असल में, यह सवाल उठाने की जरूरत इसलिए पड़ रही है कि चैनलों पर राजनीतिक खबरों की रिपोर्टिंग न सिर्फ लगातार घट रही है बल्कि उसे न्यूज एजेंडा से हाशिए पर धकेल दिया गया है. अधिकांश चैनलों में राजनीतिक रिपोर्टिंग फैशन से बाहर हो गई है. एक समय था जब राजनीतिक रिपोर्टर स्टार माने जाते थे लेकिन अब हालत यह है कि उनकी खबरों की चैनलों में पूछ नहीं रह गई है. सभी व्यावहारिक अर्थों में वे बेकार हो गए हैं. ऐसे ज्यादातर रिपोर्टरों के लिए मक्खियां मारने की नौबत आ गई है.

ऐसा नहीं है कि इस बीच देश में राजनीतिक सरगर्मियां या हलचलें बंद हो गई हैं. राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति में वह सभी कुछ चल रहा है जो अखबारों और चैनलों को हमेशा ही कवरेज के लिए खींचता रहा है. एक दौर था जब राजनीतिक खबरों के बिना किसी चैनल या उसके बुलेटिन की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. बुलेटिनों में 30 से 40 फीसदी खबरें राजनीतिक हुआ करती थीं और राजकाज को लेकर लगभग 50 फीसदी. राष्ट्रीय जीवन में राजनीति की भूमिका और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करने की उसकी क्षमता को देखते हुए उसे यह महत्व मिलना गलत नहीं था. लोकतंत्र के चौथे खंभे के बतौर भी मीडिया से यह अपेक्षा की जाती है कि वह नागरिकों को देशकाल और राजकाज के बारे में पर्याप्त रूप से सूचित और सचेत रखे. बिना सूचित और सचेत नागरिकों के कोई लोकतंत्र नहीं चल सकता है. राजनीतिक खबरों को अन्य खबरों की तुलना में इसलिए भी अधिक महत्व मिलता रहा है क्योंकि इनके जरिए ही राजनीतिक तंत्र, राजनीतिक वर्गों और सत्ता तंत्र को जनता के प्रति जवाबदेह और जिम्मेदार बनाया जा सकता है. यही कारण है कि राजनीतिक रिपोर्टिंग पत्रकारिता का प्राण रही है. पत्रकारिता का विकास इसी रिपोर्टिंग के जरिए हुआ है.

मुद्दा केवल राजनीतिक कवरेज में मात्रात्मक गिरावट का ही नहीं बल्कि राजनीतिक रिपोर्टिंग की गुणवत्ता का भी है

लेकिन लगता है कि हिंदी समाचार चैनलों में राजनीतिक रिपोर्टिंग को पांच ‘सी’ (क्रिकेट,सिनेमा,सेलेब्रिटी,क्राइम,कामेडी) की नजर लग गई है. स्वतंत्र मीडिया शोध संस्था- सेंटर फार मीडिया स्टडीज के एक सर्वेक्षण के मुताबिक 2005 से 2007 के बीच हिंदी और अंग्रेजी के छह समाचार चैनलों के प्राइम टाइम (रात 8 बजे से 10 बजे) पर राजनीतिक कवरेज में 50 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई. हालांकि आम चुनावों के साथ-साथ कई विधानसभा चुनावों के कारण 2009 में राजनीतिक कवरेज में सुधार आया, लेकिन फिर भी वह 2005 की तुलना में कुछ प्रतिशत कम ही था. दूसरी ओर, पांच ‘सी’ का कवरेज ढाई गुना से ज्यादा बढ़ गया है.

मुद्दा केवल राजनीतिक कवरेज में मात्रात्मक गिरावट का ही नहीं बल्कि राजनीतिक रिपोर्टिंग की गुणवत्ता का भी है. इस आकलन से असहमत होना मुश्किल है कि हाल के वर्षों में राजनीतिक रिपोर्टिंग की न सिर्फ धार कुंद हुई है बल्कि वह उथली भी हुई है. चैनलों की राजनीतिक रिपोर्टिंग राजनेताओं की बयानबाजियों, आरोप-प्रत्यारोपों और मिलने-टूटने तक सिमटकर रह गई है. यही नहीं, ज्यादातर राजनीतिक रिपोर्टर अपनी राजनीतिक बीट कवर करते हुए इस कदर ‘स्टाकहोम सिंड्रोम’ के शिकार हो गए हैं कि वे उन पार्टियों और उनके बड़े नेताओं के माउथपीस-से बन गए हैं. सबसे खतरनाक बात तो यह हुई है कि कई बड़े राजनीतिक रिपोर्टर, संपादक और टीवी पत्रकार नेताओं की किचेन कैबिनेट के हिस्सा बन गए हैं. वे नेताओं, उनके गुटों/धड़ों और दूसरे नेताओं और उनके गुटों/धड़ों के बीच, पार्टियों और पार्टियों के बीच और मंत्रियों-नेताओं और कॉरपोरेट समूहों के बीच लॉबीइंग भी करने लगे हैं. मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, अफसरों की नियुक्ति में भूमिका निभाने लगे हैं. राजनीतिक रिपोर्टिंग के नाम पर एक तरह की एम्बेडेड पत्रकारिता हो रही है. इससे राजनीतिक पत्रकारिता की साख को धक्का लगा है. ऐसे राजनीतिक रिपोर्टर और संपादक स्वतंत्र और तथ्यपूर्ण राजनीतिक रिपोर्टिंग करने में सक्षम नहीं रह गए हैं. दूसरी ओर, चैनलों में राजनीतिक रिपोर्टरों की एक बड़ी तादाद ऐसी भी है जिन्हें भारतीय राजनीति का क-ख-ग भी नहीं मालूम है और न उनमें जानने की इच्छा है. वे राजनीतिक रिपोर्टिंग के नाम पर बाइट पत्रकारिता करते हैं और उनसे इससे अधिक की अपेक्षा करना उनके साथ अन्याय है.

इस तरह, इस तितरफा प्रक्रिया के बीच राजनीतिक रिपोर्टिंग का लगातार क्षय और क्षरण हो रहा है. इसके कारण लोकतंत्र का भी क्षरण और छीजन हो रहा है. कमजोर पड़ती राजनीतिक रिपोर्टिंग के कारण राजनीतिक दल, राजनेता और पूरा राजनीतिक तंत्र निरंकुश और अनुत्तरदायी होता जा रहा है. यह सबके लिए चिंता की बात है. आखिर इसकी कीमत आमलोगों को ही तो चुकानी पड़ेगी.

तमाशबीन दुकानें लगा के बैठ गए

झारखंड की कई समस्याएं उसकी अपनी और विशिष्ट समस्याएं हैं तो कई एक साझा और अखिल भारतीय संकट की भी देन हैं

झारखंड का होने के नाते अकसर मुझे अपने साथी पत्रकारों का यह उलाहना सुनना पड़ता है कि मेरे राज्य में क्या हो रहा है. राजनीतिक और आर्थिक भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी दिल्ली का यह उलाहना मुझे शर्मिंदा कम, हैरान ज्यादा करता है. हालांकि इसके साथ यह अफसोस जुड़ा रहता है कि झारखंड इन दिनों या तो उस भ्रष्टाचार की स्मृति जगाता है जिसके आरोपों की जद में शिबू सोरेन से लेकर मधु कोड़ा तक हैं या फिर उन अवसरवादी बनते-टूटते गठजोड़ों की, जिनकी वजह से इस छोटे-से राज्य में दस साल में आठ सरकारें बन चुकी हैं. दिल्ली की निगाह में झारखंड राजनीतिक अवसरवाद और भ्रष्टाचार का नया प्रतीक है जिससे यह साबित होता है कि छोटे राज्य छोटे स्वार्थों के आगे आसानी से बिछ जाते हैं या आदिवासियों के दमन और शोषण की बात उठाने वाले नेता खुद शोषकों के साथ खड़े हो जाते हैं और लगभग लुटेरों की तरह राज्य के संसाधनों का दोहन करते हैं.

झारखंड का आंदोलन सिर्फ इसके लिए नहीं चला था कि लूट का तंत्र पटना से उठकर रांची चला आए. वह सिर्फ एक राजनीतिक आंदोलन भी नहीं था. वह एक समग्र सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन था जिसकी बुनियाद में अगर शोषण और दमन की सदियों पुरानी टीस थी तो एक नया और समतामूलक समाज बनाने का सपना भी था और विकास की वैकल्पिक धारा बन सकने का आत्मविश्वास भी. यानी यह बस एक अलग राज्य का ही नहीं, विकास के नए प्रारूप का भी आंदोलन था. सच्चे अर्थों में एक जनांदोलन जो आधी सदी से ज्यादा समय तक इस बात के बावजूद पूरी ताकत से चलता रहा कि इसके नेता वक्त-वक्त पर आंदोलन के साथ दगाबाजी करते रहे.

पहले ही दिन से झारखंड उन दिक्कुओं के हवाले हो गया था जिनके विरुद्ध संघर्ष के आह्वान के साथ कभी इसकी मांग अस्तित्व में आई थी

लेकिन शोषण और दमन की जिस राजनीति के विरोध में यह आंदोलन खड़ा हुआ और चलता रहा उसी ने बाद में चुपके से इसे अगवा कर लिया. यह शायद 80 का दशक था जब झारखंड के सभी राजनीतिक दल एक ही सुर में बोलने लगे. बिहार से अलग झारखंड की राजनीतिक मांग दिल्ली तक पहुंचने लगी और यह नई बनी एकजुटता बताने लगी कि झारखंड तो बनके रहेगा. यह आंदोलन अचानक सिर्फ स्थानीय राजनीतिक दलों और आकांक्षाओं का नहीं रह गया, वह कांग्रेस, भाजपा और जनता दल जैसी पार्टियों का भी आंदोलन हो गया. दरअसल पुराने सांस्कृतिक और राजनीतिक संघर्ष की बुनियाद पर खड़ा यह नया अवसरवादी आंदोलन था जिसका प्रत्युत्तर देना दिल्ली और पटना को आसान लगा और साल 2000 में झारखंड अस्तित्व में आ गया.

कायदे से यह नया राज्य झारखंड के मूल आदिवासी संघर्ष को नहीं, इस नई राजनीतिक मांग को दिया गया. झारखंड के नाम पर एक कपटी आम सहमति तैयार की गई और अलग राज्य की एक उचित और वास्तविक दावेदारी अवसरवाद की नई राजनीतिक अपसंस्कृति के हवाले हो गई. झारखंड की मांग सबको लुभाने लगी तो इसलिए नहीं कि इससे आदिवासियों और गरीबों का शोषण रुकेगा, बल्कि इसलिए कि सत्ता के प्रपंच कुछ और करीब आ जाएंगे, साधनों की लूट-खसोट से पटना में काबिज एक तंत्र को बाहर किया जा सकेगा. इसीलिए साल 2000 में जो कटा-छंटा झारखंड बना, वह पहले ही दिन से उन दिक्कुओं के हवाले हो गया जिनके विरुद्ध संघर्ष के आह्वान के साथ कभी इसकी मांग अस्तित्व में आई थी. यह अनायास नहीं था कि राज्य में पहली सरकार उस भारतीय जनता पार्टी की बनी जो झारखंड की नहीं, वनांचल की मांग करती थी.
इस लिहाज से दुष्यंत कुमार का एक शेर झारखंड के हालात पर सटीक बैठता है, ‘ दुकानदार तो मेले में लुट गए यारो / जो तमाशबीन थे, दुकानें लगा के बैठ गए.’ झारखंड आंदोलन के नाम पर जिन नेताओं की दुकान चलती थी, उन्हें वाकई मेले ने लूट लिया और जो बाहर से तमाशा देखते थे, वे उनकी दुकानों पर काबिज हो गए. इन नए दुकानदारों को इस बात की परवाह क्यों होती कि जो झारखंड मिला है, वह आधा-अधूरा है या फिर उसमें आदिवासी हितों की उपेक्षा हो रही है, उनके लिए इतना ही पर्याप्त था कि अपनी राजनीतिक हसरतों के लिए उन्हें एक नए राज्य की जमीन हासिल हो गई है.

दरअसल जो दिल्ली आज झारखंड को उलाहना देती है, उसी ने उसे सत्ता की सौदेबाजियां भी सिखाई हैं. झारखंड आंदोलन की विश्वसनीयता को जो सबसे तीखी चोट लगी, वह कई भाषाओं के जानकार और विद्वान माने जाने वाले प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के समय लगी जब उनकी सरकार को बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों ने रिश्वत ली. इस रिश्वत कांड की कालिख कांग्रेस नहीं, झारखंड मुक्ति मोर्चा के चेहरे पर पोती गई. पिछले दिनों भी झारखंड का जो संकट पैदा हुआ, वह दिल्ली की सरकार बचाने की कशमकश के दौरान ही हुआ. ईमानदार माने जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पार्टी ने अपनी राजनीतिक मजबूरियों और जरूरतों के हिसाब से इन नेताओं का इस्तेमाल किया और फिर इन्हें किनारे कर दिया. रांची में कांग्रेस और भाजपा अपने-अपने ढंग से झारखंडी दलों को नचाते रहे.

लेकिन क्या यह इतना इकतरफा खेल है? क्या झारखंड के आदिवासी हितों के प्रवक्ता नेता वाकई इतने मासूम और भोले-भाले हैं जिन्हें दिल्ली ने ठग लिया या फिर उन्हें भी दिल्ली का खेल रास आने लगा था? तौर-तरीके दिल्ली ने भले सिखाए हों, लेकिन अपने ही लोगों को लूटने का, उनकी उम्मीदों को तोड़ने का, एक पूरे और वास्तविक आंदोलन को अविश्वसनीय बनाने का जो अक्षम्य अपराध है, वह तो इन्होंने ही किया है और इसका दंड भी इन्हें भुगतना होगा. शायद वह इन्हें मिल भी रहा है. झामुमो हो या आजसू, सब कांग्रेस और भाजपा के हाशिए के मददगार के तौर पर बचे हुए हैं और उनके लूटतंत्र में अपना एक हिस्सा हासिल कर संतुष्ट हैं.

इस लिहाज से देखें तो झारखंड एक बहुत बड़ी संभावना की अकाल मृत्यु का भी प्रतीक है. अपनी विशिष्ट पठारी बनावट, अपने प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता और अपनी बहुसांस्कृतिक आबादी के साथ झारखंड सिर्फ विकास का ही नहीं, नए और आधुनिक समाज का भी ऐसा मॉडल हो सकता था जो बाकी भारत के लिए नजीर होता. 50 साल से ज्यादा लंबे समय तक चले सांस्कृतिक-राजनीतिक आंदोलन ने वहां एक ऐसा बुद्धिजीवी समाज भी बनाया जो इस वैकल्पिक मॉडल की रूपरेखा बनाता रहा था और बना सकता था. रांची विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय भाषा विभाग ने अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाओं में जो काम किया और करवाया, उसकी वजह से अलग-अलग समुदायों में जागरूक युवाओं और विचारकों की एक बड़ी टीम तैयार भी थी. लेकिन सत्ता का बुलडोजर इन सबको बड़ी बेरहमी से कुचलता चला गया. झारखंड अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता से रीता हुआ बस एक राजनीतिक झारखंड होकर रह गया जिसे राजनीतिक दल अपनी-अपनी सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल और बदनाम करते रहे. इस झारखंड में गरीब और आदिवासी पहले की ही तरह विस्थापित होते रहे और दिल्ली-पटना और रांची के बीच तार बिछाकर बैठे बिचौलियों की ताकत और हैसियत बढ़ती चली गई. दुर्भाग्य से इस दुरभिसंधि में सिर्फ नेता ही नहीं, दूसरी जमातें भी शामिल रहीं.

सवाल है, झारखंड की यह नियति क्यों हुई? बीती सदी में जो सांस्कृतिक आंदोलन इस समाज में दिख रहा था, वह अचानक तिरोहित क्यों हो गया? इसका एक जवाब वीर भारत तलवार की झारखंड पर केंद्रित किताब झारखंड के आदिवासियों के बीच: एक ऐक्टिविस्ट के नोट देने की कोशिश करती है. तलवार लिखते हैं कि झारखंड को बिरसा मुंडा के रूप में राजा राममोहन राय तो मिले, वह विवेकानंद नहीं मिला जो इस आंदोलन को उसकी तार्किक परिणति तक पहुंचाता, वैज्ञानिक समाजवाद की जो अवधारणा इस सांस्कृतिक आंदोलन के साथ विकसित होनी चाहिए थी, वह नहीं हुई. वे समाजवादी विचारधारा और आदिवासी महासंघ को एक साथ लेकर चलने के हामी हैं.

कोई समाज अगर शोषणमुक्त होना चाहता है, तो उसके पास उसका एक समाजवादी एजेंडा होना चाहिए

यह जवाब भले मुकम्मिल न हो, लेकिन एक सूत्र छोड़ता है. यह जवाब याद दिलाता है कि कोई समाज अगर शोषणमुक्त होना चाहता है, अगर वह समतामूलक लक्ष्यों की तरफ बढ़ना चाहता है तो उसके पास उसका एक समाजवादी एजेंडा होना चाहिए- ऐसा एजेंडा जिसमें आर्थिक विकास एक अनिवार्य पहलू हो, लेकिन इकलौता नहीं, ऐसा एजेंडा जिसमें समाज की सांस्कृतिक और वैचारिक आकांक्षाओं के लिए भी पूरा स्थान और सम्मान हो.

लेकिन झारखंड इस लड़ाई में पीछे रह गया और बिचौलियों के हाथ लग गया तो यह सिर्फ झारखंड की नाकामी नहीं है. दरअसल पूरा भारत जिस औपनिवेशिक लूट का बेलिहाज मैदान बना हुआ है, जिस बेरहमी से देश के अलग-अलग हिस्सों में दलितों, आदिवासियों और सदियों से रह रहे निवासियों को उजाड़ा जा रहा है, जिस बेशर्मी से उनके घर, जमीन और जंगल हथियाए जा रहे हैं, उन सबसे झारखंड अलग कैसे रह सकता है. झारखंड भी उस लूट का ही मैदान भर है- इस लिहाज से कुछ ज्यादा त्रासद कि यहां यह खेल वे अपने लोग चला रहे हैं जिन्होंने इस आंदोलन से सांस ली है और ताकत ली है. पर फिर यह कहां नहीं हो रहा? हर तरफ साम्राज्यवादी ताकतों के अपने एजेंट हैं जो झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा जैसे पिछड़े इलाकों में ही नहीं, मुंबई और दिल्ली जैसे संपन्न कहलाने वाले इलाकों में भी छीनाझपटी और लूटखसोट का वही जाल फैलाए हुए हैं. दिल्ली में इन दिनों चल रहे कॉमनवेल्थ खेल इस लूट का एक और आईना हैं.

दरअसल समझने की बात यही है कि झारखंड की कई समस्याएं उसकी अपनी और विशिष्ट समस्याएं हैं तो कई एक साझा और अखिल भारतीय संकट की भी देन हैं. झारखंड को दोनों लड़ाइयां लड़नी पड़ेंगी. उसका सांस्कृतिक और समतामूलक आंदोलन तभी सार्थक और संपूर्ण हो पाएगा जब वह रांची-पटना और दिल्ली के साझा लूटतंत्र को समझेगा और इनके विरुद्ध एक पूरी लड़ाई छेड़ेगा. इसमें शक नहीं कि इस लड़ाई के लायक ईंधन और आयुध झारखंड के बौद्धिक शस्त्रागार में काफी हैं और लड़ाई का अभ्यास भी.

अपेक्षाओं और उपेक्षाओं की मायानगरी- ‘झॉलीवुड’

अब न तो चिल्ला-चिल्लाकर भालू का खेल दिखाने वाले मदारी रहे, न ही भोंपू पर सिनेमा का प्रचार करते बाइस्कोप लिए गांवों और मेलों में घूमने वाले. तकनीक ने सब-कुछ बदल डाला है. लेकिन झॉलीवुड (हॉलीवुड और बॉलीवुड की तर्ज पर झारखंड के फिल्म उद्योग का प्रचलित नाम) की फिल्मों को अंतिम आदमी तक पहुंचाने के लिए कुछ-कुछ वही पुराने तरीके ही इस्तेमाल में लाए जाते हैं. यहां सिनेमा तैयार होने के बाद कुछ लोग भाड़े पर प्रोजेक्टर लेकर गाड़ी से घूमते रहते हैं – हाट, कस्बे, मेलों और गांवों में. लाउडस्पीकर और माइक के जरिए सिनेमा का प्रचार होता है और खुली जगह पर लोगों की भीड़ जुटाकर, उजले पर्दे या दीवार पर सिनेमा दिखाया जाता है. गांव-गुरबे के लोगों के लिए अपनी बोली और अपने ही इलाके में मिल रहा यह मनोरंजन का सबसे सुलभ साधन है.

मोरहाबादी मैदान के पास हम ऐक्शन, कैमरा, कट और शॉट जैसे शब्द सुनकर रुक जाते हैं. किसी गाने की शूटिंग चल रही है बिना किसी मेकअप रूम के. कोई एयरकंडीशनर नहीं, न ही कोई और ताम-झाम. मौजूद लोगों में से एक चिल्लाता है- जल्दी करो, ट्रैफिक का टाइम हो रहा है. तकनीक के नाम पर इनके पास सामान्य वीडियो कैमरे हैं और एडिटिंग के लिए भाड़े पर ली गई बुनियादी-सी मशीनें. स्टूडियो के नाम पर मुफ्त की पहाड़ियां, मैदान, नदियां और सड़कें.

आम-से वीडियो कैमरे से ‘बुद्धा वीप्स इन जादूगोड़ा’ सरीखी डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाकर राष्ट्रीय पुरस्कार पा चुके निर्माता-निर्देशक श्रीप्रकाश ने पहली बार झॉलीवुड के लिए फीचर फिल्म बनाई थी. नागपुरी और सादरी भाषा में बनी इस फिल्म का नाम था ‘बाहा’. झॉलीवुड की मायानगरी में संघर्ष कर रहे कलाकारों पर आधारित इस फिल्म ने झारखंड में बहुत नाम कमाया, लेकिन कमाई के नाम पर बस लाख-सवा लाख रुपए ही जुटा पाई जो  इसकी लागत का एक मामूली-सा हिस्सा भर था. गौरतलब है कि यहां एक फिल्म करीब 6 से 7 लाख रुपए में बनती है, जो हिंदी फिल्मों के चरित्र कलाकार के मेहनताने से भी काफी कम है.

फिल्म निर्माता कमाई न कर पाने की दो मुख्य वजहें बताते हैं. एक- झारखंड के सारे सिनेमाहॉल बहुत बुरी हालत में हैं जहां कुछ गिने-चुने दर्शक ही जुटते हैं (कुछ हॉलवाले डिजिटल फिल्मों को दिखाने में आनाकानी भी करते हैं). टिकटों की कीमत छोटे शहरों में 8 से 14 रुपए और रांची जैसे शहरों में 20 से 60 रुपए तक है. रांची जैसे शहरों में इन फिल्मों को बस मॉर्निंग शो में ही दिखाते हैं, इसलिए व्यवसाय की ज्यादा गुंजाइश नहीं रह जाती. इसके अलावा ज्यादातर घरों में इन फिल्मों की पायरेटेड डीवीडी पहले-दूसरे दिन ही पहुंच जाती हैं.

दर्शकों की अपेक्षाओं और सरकारी उपेक्षाओं के बीच फंसे झॉलीवुड की भिड़ंत उच्च तकनीक और तामझाम से लैस हिंदी फिल्मों से है

चूंकि झॉलीवुड कमाई के मामले में बहुत पीछे है लिहाजा इसके सितारे भी ज्यादा पैसा नहीं कमा पाते. झॉलीवुड के एंग्री यंग मैन दीपक लोहार के अलावा यहां कोई अन्य हीरो या हीरोइन आर्थिक दृष्टि से बहुत मजबूत नहीं हैं. ‘बाहा’ की 29 वर्षीया हीरोइन शीतल सुगंधिनी मुंडा समुदाय से हैं. एक इतनी नामी फिल्म में काम भी उनकी जिंदगी में कोई बड़ा बदलाव नहीं ला पाया है. वे एक एनजीओ में नौकरी करती हैं. ‘झारखंड का छैला’ के निर्देशक अनिल सिकदर के लाइटिंग इंजीनियर ऋषिकेश के मुताबिक इन फिल्मों में हीरो को तकरीबन 20 और हीरोइन को 15 हजार रुपए मिलते हैं. कुछ तो अपने घर का भी पैसा लगा देते हैं, इस उम्मीद में कि एक बार जम गए तो आगे उनकी पूछ बढ़ेगी. सपनों के बनने और बिखरने का खेल बॉलीवुड की तर्ज पर यहां भी कम नहीं होता.

एनएफडीसी (राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम) की जिम्मेदारी भले ही भारत की क्षेत्रीय बोलियों में बनने वाली फिल्मों को बढ़ावा देना है पर शायद झॉलीवुड उनकी नजरों के दायरे से बाहर की चीज है. यह बात और है कि इन फिल्मों को भी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के उन्हीं मानकों पर परखा जाता है जिन पर अन्य स्थापित भारतीय फिल्म उद्योगों की फिल्मों का परीक्षण होता है. पर क्या सरकारी तंत्र इनके प्रति जरा भी जवाबदेह नहीं है?

फिल्म निर्माताओं का मानना है कि यदि सरकार उन्हें थोड़ी-सी टैक्स में सब्सिडी दे, सिनेमाहॉलों के लिए साल में छह सप्ताह इन क्षेत्रीय फिल्मों को दिखाना अनिवार्य कर दे और गांव-गुरबों के छोटे-छोटे सिनेमाहॉलों को बढ़ावा दे तो झॉलीवुड की भी किस्मत बदल जाएगी. 2008 में गठित अखिल भारतीय संथाली फिल्म समिति (एआईएसएफए) के अध्यक्ष रमेश हांसदा कहते हैं, ‘बिना किसी सरकारी सहयोग के हमने झारखंड में स्थानीय बोली और लोगों को लेकर फिल्में बनाई और दिखाई हैं. लोगों ने इन्हें खूब सराहा लेकिन सरकार हमें नजरअंदाज करती है, अगर वह हमारी ओर ध्यान दे तो कोई कारण नहीं कि हम अच्छा नहीं कर पाएं.’

हालांकि झॉलीवुड में बनने वाली ज्यादातर फिल्में डिजिटल कैमरों की सहायता से बनाई जाती हैं, मगर यहां अब तक 9 सेल्यूलाइड फिल्में भी बन चुकी हैं. समुदाय की आवाज को सेल्यूलाइड का माध्यम देने वाले ऐसे लोगोंं में करनडीह के रहने वाले दशरथ हांसदा (रमेश हांसदा के भाई) और प्रेम मार्डी का नाम पहले आता है. इन दो कलाकारों ने ही सबसे पहले ‘चांदो लिखोन’ (झारखंड की पहली जनजातीय फिल्म) बनाकर संथाली (आदिवासी) चलचित्र के सपने को साकार किया था. युगल किशोर मिश्र और रवि चौधरी ने भी कुछ सेल्यूलाइड फिल्में बनाई हैं. हालांकि महंगी होने की वजह से इन्हें वापस डिजिटल तकनीक का सहारा लेना पड़ रहा है.

‘अमू’ फिल्म को संगीत देने वाले और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पैठ बना चुके नंदलाल नायक भी अमेरिका छोड़-छाड़कर एक साल पहले झारखंड आ बसे हैं. वे एक महत्वाकांक्षी फिल्म बनाने में लगे हैं. यह फिल्म झारखंड से लड़कियों के पलायन और माओवाद के इर्द-गिर्द घूमती है. इसी तरह पत्रकार और संस्कृतिकर्मी मनोज चंचल भी पलायन को केंद्र में रखकर ‘बीरची’ नामक फिल्म बना रहे हैं. बिरसा मुंडा और आदिवासी आंदोलनों को केंद्र में रखकर भी कई फिल्में बनी हैं.

इसका यह मतलब कतई नहीं है कि यहां की फिल्में डॉक्यूमेंट्री फिल्मों कजैसी होती हैं. झॉलीवुड अपने दर्शकों की जरूरतों का पूरा खयाल रखता है. यहां की लगभग सभी फिल्मों में गाने, रोमांस, ऐक्शन और मार-धाड़ वाले दृश्यों का अच्छा तालमेल होता है.

अनिल सिकदर के मुताबिक झॉलीवुड का सालाना कारोबार दो से ढाई करोड़ रुपए का है और यह अब झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और बिहार तक फैलने लगा है. यहां की इकलौती इंफोटेनमेंट पत्रिका ‘जोहार सहिया’ के संपादक अश्विनी कुमार पंकज के मुताबिक आने वाले समय में झॉलीवुड में काफी संभावनाएं हैं.

त्रासदी यह है कि दर्शकों की अपेक्षाओं और सरकारी उपेक्षाओं के बीच फंसे झॉलीवुड की भिड़ंत उच्च तकनीक और तामझाम से लैस हिंदी फिल्मों से है, लेकिन झारखंड की मायानगरी अपने स्तर पर अपने अस्तित्व को बनाए रखने के संघर्ष में जुटी है और यह एक शुभ संकेत है.

अयोध्याः एक फैसला, एक हल, एक अवसर

अयोध्या पर उच्च न्यायालय के फैसले के बाद क्या होगा, इसपर पूरी दुनिया माथापच्ची करने में लगी है. मगर बड़े-बड़े लेख पढ़ने के बाद भी बस इतना ही समझ आ पा रहा है कि हम सबको न्यायपालिका का आदर करना चाहिए, हारने वाले पक्ष के लिए 24 तारीख के बाद भी सारे रास्ते बंद नहीं होने वाले, वह सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है आदि-आदि…

यह मसला न्याय से ज्यादा अहम की लडाई का है. और इसे अहम की लड़ाई हमारे यहां की सांप्रदायिक राजनीति ने बनाया है. हिंदू समुदाय के कुछ लोगों के दिमाग में यह डाल दिया गया है कि हमारे देश में आकर, हमारी इतनी संख्या होने के बावजूद कोई हमारे सबसे बड़े आराध्य के जन्म स्थान को हमसे कैसे छीन सकता है(भले इसके कोई प्रमाण हों या न हों). मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों के दिमाग में यह घर करा दिया गया है कि अगर हम इस तरह से हार मान लेंगे तो पता नहीं किन-किन बातों पर हमें बहुसंख्यक समुदाय के साथ समझौते करने पड़ेंगे.

अब मामला ऐसा फंस गया है कि इस मामले पर सामने वाले समुदाय की भावनाओं की ज़रा भी इज्जत करना दोनों समुदायों को अपनी कमजोरी का प्रमाण लगने लग गया है.

अब तक जो हो चुका उस पर बहस बेमानी है मगर अभी भी शायद एक हल ऐसा है जो आने वाले अदालती फैसले को दोनों समुदायों और देश के लिए एक अवसर बना सकता है.

माना फैसला मुस्लिम समुदाय के पक्ष में आता है – कि बाबरी मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर नहीं बनाई गई थी और वहां मस्जिद ही थी कोई राम का मंदिर नहीं. तो ऐसे में यदि मुस्लिम समुदाय यह घोषणा कर दे कि वह अपनी मस्जिद की आधी जमीन मंदिर के लिए देना चाहता है और वहां मंदिर और मस्जिद साथ-साथ बनवाना चाहता है तो यह उसकी कमजोरी या किसी तरह के समझौते की नहीं बल्कि बड़प्पन की बात होगी. यह न केवल देश में सुलगती आ रही सांप्रदायिकता की चिन्गारी की चटकन को कम करके खत्म करने की क्षमता रखता है बल्कि देश की राजनीति के सांप्रदायिक औजारों को हमेशा के लिए भोंथरा करने की भी कुव्वत रखता है.

ऐसा ही हिंदू भी कर सकते हैं. यदि फैसला उनके पक्ष में आता है तो वे विवादित स्थान पर मंदिर के साथ एक मस्जिद के निर्माण की घोषणा कर सकते हैं. ऐसा करने से न वे छोटे होंगे न ही उनका धर्म. बल्कि दोनों ही हिमालयी ऊंचाइयों पर पहुंच जाएंगे. और यह उनकी राष्ट्रवादिता का भी सबसे बड़ा प्रमाण होगा.

यह हल दोनों पक्षों के अहम को तो संतुष्ट करता ही है, कि कोई हमसे जबरन हमारी चीज नहीं छीन रहा है, दोनों की ही इच्छाएं भी पूरी कर देता है. एक समुदाय द्वारा अपने बडप्पन को दर्शाने वाली ऐसी घोषणा दूसरे समुदाय को न जाने और कितने दूसरे इसी प्रकार के छोटे-बड़े मसलों पर बड़प्पन दिखाने के अवसर मुहैया करा देगी. अगर एक स्थान से जुड़ी आस्था देश की राजनीति को बुरे के लिए बदल सकती है तो उसका एक सर्वमान्य हल उसी राजनीति को एक नई और बेहतर दिशा भी दिखा सकता है.

इसके उलट, यदि ऐसा कुछ नहीं होता है तो यह मुकदमेबाजी सर्वोच्च न्यायालय तक जाने और उसका फैसला आने के बाद देश के भविष्य को न जाने कौन-कौन से तरीकों से प्रभावित करने वाली है!

संजय दुबे, वरिष्ठ संपादक