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काले धन की अमरबेल?

राज्यसभा सांसद और सपा के पूर्व महासचिव अमर सिंह पर काले धन के कारोबार के आरोप पहले भी लगते रहे हैं लेकिन तब ये सिर्फ आरोप थे. पिछले साल नवंबर में उत्तर प्रदेश पुलिस ने जो जांच रिपोर्ट इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जमा की है उसमें सिंह के काले धन के कारोबार से जुड़े तमाम अकाट्य सबूत मौजूद हैं. इस रिपोर्ट की एक प्रति तहलका के पास है. ये दस्तावेज बताते हैं कि किस प्रकार अमर सिंह ने साल 2003 से 2007 के बीच अवैध कंपनियों का जाल बिछाकर 138.5 करोड़ रुपयों का अवैध मुनाफा कमाया. रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्हें इतना मोटा मुनाफा आय का कोई वैध स्रोत न होने के बावजूद कमाया.

उत्तर प्रदेश पुलिस ने देश भर में फैली करीब 600 ऐसी कंपनियों, जिन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर अमर सिंह का बताया जा रहा था, में से 50 की जांच-पड़ताल की है. यह जांच सिंह के खिलाफ कानपुर में दायर एक एफआईआर के बाद की गई थी. एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि सिंह ने तमाम अवैध तरीकों से करीब 400 करोड़ रुपये इकट्ठा किए. इस काले धन को सफेद बनाने के लिए उन्होंने पहले तो इस धन को कई ‘शैल’ कंपनियों (ऐसी कंपनी जो कोई व्यवसाय नहीं करती और न ही जिसके पास कोई संपत्ति होती है) में लगाया. इसके बाद इस तरह की दर्जनों कंपनियों का उन कंपनियों में विलय कर दिया गया जिन पर पूरी तरह से अमर सिंह और उनके परिवार का नियंत्रण था.

हवाई कंपनी हवा-हवाई निदेशक

1. महेश सिंह राना, निवासी गली न. 3 श्याम पार्क, साहिबाबाद, गाजियाबाद. इन्हें अमर सिंह की दो कंपनियों का निदेशक दिखाया गया – गौतम रोडलाइंस प्रा लि. और ईस्टर इंडिया केमिकल्स लि
2.    ललित कुमार बांगरी, निवासी लतिका अपार्टमेंट हैंगर फोर्ट कोलकाता. इन्हें मर्करी मर्चेंट प्रालि का निदेशक दिखाया गया.
3.   बाबूलाल बांका, लाल बाजार स्ट्रीट कोलकाता. इन्हें तीन कंपनियों का निदेशक दिखाया गया
4.    गोपाल बांका, निवासी लाल बाजार स्ट्रीट कोलकाता, इन्हें कुल 19 कंपनियों के निदेशकमंडल में रखा गया है
5.    मनोहर लाल नगालिया, निवासी लाल बाजार कोलकाता, इन्हें तीन कंपनियों का निदेशक बताया गया है. अरिहंत टैक्सकॉम प्रा लि, गैलेंट ट्रैक्सिम प्रा लि, यामिनी ट्रेडलिंक प्रा लि
6.    अरुण कुमार नगालिया, निवासी लाल बाजार कोलकाता. ये कुल सात कंपनियों के निदेशकमंडल में हैं
7.    श्रीकांत झांवर, निवासी कनकुलिया रोड कोलकाता, इन्हें दो कंपनियों का निदेशक बनाया गया.
8.    गिरिराज किशोर, निवासी विवेक विहार हावड़ा, इन्हें एचपी वीडियोटेक का निदेशक बताया गया
9.    दिनेश प्रताप सिंह, निवासी गाजियाबाद. इन्हें दो कंपनियों का निदेशक बताया गया
10.    देवपाल सिंह राना, निवासी कानपुर

हाई कोर्ट में दाखिल रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिस समय अमर सिंह उत्तर प्रदेश विकास परिषद (प्रदेश के औद्योगिक विकास के लिए बनी सलाहकार संस्था जो 2003 से 2007 के बीच मुलायम सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में प्रभावी रही थी) के मुखिया हुआ करते थे उस दौर में उनकी कंपनियों ने गलत तरीकों से अरबों रुपये बनाए. उस समय अनिल अंबानी, कुमार मंगलम बिड़ला और केवी कामथ जैसे शीर्ष उद्योगपति इस परिषद के सदस्य हुआ करते थे.

पुलिस को दिए गए बयान में तकरीबन एक दर्जन फर्जी निदेशकों ने बताया कि जिन कंपनियों के निदेशक के रूप में उनके नाम इस्तेमाल किए गए  उनके काम-काज के बारे में उन्हें रत्ती भर भी जानकारी नहीं थी, सिर्फ उनकी पहचान का इस्तेमाल अमर सिंह और उनके भाई अरविंद सिंह ने किया

तहलका से बातचीत में अमर सिंह काले धन के कारोबार और आय से अधिक संपत्ति के आरोपों को सिरे से खारिज कर देते हैं. ‘उत्तर प्रदेश विकास परिषद के अध्यक्ष के तौर पर मैं बड़ी मात्रा में निवेश लेकर आया था. अपने पद का इस्तेमाल मैंने निजी फायदे के लिए कभी नहीं किया. यह सोचना भी हास्यास्पद है कि मैं भ्रष्टाचार में लिप्त था. मेरे पास तो दस्तखत तक के अधिकार नहीं थे. यह तो सिर्फ एक सलाहकार संस्था थी. अगर मेरे खिलाफ जांच हो रही है तो उन सभी शीर्ष उद्योगपतियों के खिलाफ भी जांच होनी चाहिए जो उस समय परिषद के सदस्य थे. यह जांच राजनीतिक षडयंत्र का परिणाम है’, सिंह कहते हैं.

अमर सिंह भले ही इसे राजनीतिक षडयंत्र करार दे रहे हों लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में उन तरीकों की विस्तार से जानकारी दी है जिनके जरिए अमर सिंह ने काले धन को सफेद करने का गोरखधंधा अंजाम दिया. रिपोर्ट के मुताबिक अमर सिंह ने फर्जी निदेशकों की एक पूरी मंडली के माध्यम से लगभग 43 छद्म कंपनियों पर अपना नियंत्रण बना रखा था. कोलकाता में पंजीकृत इन सभी कंपनियों के शेयर एक अजीबोगरीब ‘क्रॉस-होल्डिंग पैटर्न’ में लोगों के पास थे और कथित रूप से बिना कोई व्यवसाय किए सिर्फ बहीखातों में आंकड़े दर्ज करके ये कंपनियां अस्तित्व में बनी हुई थीं.

 कालेधन का काला खेल

उन कंपनियों की सूची जिनमें अमर सिंह और उनके परिजनों की शेयर होल्डिंग मेजोरिटी में है और अब इन पर काले धन के हेर-फेर में शामिल होने का संदेह गहरा गया है :

1 एनर्जी डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड
सरजापुर रोड, बेलांदुर,                    बेंगलुरू
2 पंकजा आर्ट ऐंड क्रेडिट प्राइवेट लिमिटेड
अजीमगंज हाउस, कामक स्ट्रीट,       कोलकाता 
3 सर्वोत्तम कैप्स लिमिटेड
अजीमगंज हाउस, कामक स्ट्रीट,       कोलकाता 
4 ईडीसीएल पावर प्रोजेक्ट्स प्रा. लि.
अजीमगंज हाउस, कामक स्ट्रीट,       कोलकाता
5 ईडीसीएल इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड
अजीमगंज हाउस, कामक स्ट्रीट,       कोलकाता
6 इस्टर (इंडिया) केमिकल्स लि.
ई-593, ग्रेटर कैलाश-II, नई दिल्ली   

पुलिस को दिए गए बयान में तकरीबन एक दर्जन फर्जी निदेशकों ने बताया कि जिन कंपनियों के निदेशक के रूप में उनके नाम इस्तेमाल किए गए  उनके काम-काज के बारे में उन्हें रत्ती भर भी जानकारी नहीं थी, सिर्फ उनकी पहचान का इस्तेमाल अमर सिंह और उनके भाई अरविंद सिंह ने किया. दिसंबर, 2003 में इस तरह की 18 छद्म कंपनियों का विलय अमर सिंह के स्वामित्व वाली कंपनी सर्वोत्तम कैप लिमिटेड में कर दिया गया. इसी तरह की 25 अन्य कंपनियों का विलय सिंह के स्वामित्व वाली एक अन्य कंपनी पंकजा आर्ट ऐंड क्रेडिट प्राइवेट लिमिटेड में जनवरी, 2005 में किया गया. पंकजा कुमारी सिंह अमर सिंह की पत्नी का नाम है. पुलिस की रिपोर्ट में कहा गया है कि ये छद्म कंपनियां न तो कोई व्यवसाय कर रही थीं और न ही इनमें भविष्य में मुनाफा कमाने की क्षमता थी. बावजूद इसके विलय के वक्त इन 43 कंपनियों की वास्तविक कीमत से कहीं ज्यादा कीमत आंकी गई और उनके शेयरों को उनकी बाजार कीमत से कई गुना ज्यादा पर खरीदा गया. तहलका के पास उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि इन कंपनियों के शेयर सिंह ने 400 से 600 प्रतिशत तक ज्यादा कीमत पर खरीदे. आरोप लग रहा है कि यह पूरी कवायद सिर्फ अमर सिंह के काले धन को सफेद करने के लिए की गई.

तहलका से बातचीत में सिंह बताते हैं, ‘ये सभी 43 कंपनियां कोलकाता में पंजीकृत हैं. इसलिए पहले तो यूपी पुलिस के पास उनकी जांच का अधिकार ही नहीं है. दूसरी बात विलय को कलकत्ता हाई कोर्ट की मंजूरी मिली हुई है. विलय के बाद पुरानी कंपनियां खत्म हो गईं, इसलिए उनके निदेशकों को इसके बारे में बोलने का कोई अधिकार नहीं है. तत्कालीन कॉरपोरेट अफेयर मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी इस विलय को क्लीन चिट दी थी.’ दिलचस्प बात यह है कि जब पुलिस ने सिंह से उन 43 कंपनियों के रिकॉर्ड दिखाने के लिए कहा तो उनका जवाब था कि सभी रिकॉर्ड खो गए हैं. ‘कोलकाता में मेरा दफ्तर स्थानांतरित करते समय सारे रिकॉर्ड खो गए थे. इस संबंध में साल 2006 में एक एफआईआर भी दर्ज करवाई गई थी’, सिंह कहते हैं.

अमर सिंह की दो अन्य कंपनियों के खिलाफ भी यूपी पुलिस ने स्पष्ट सबूत जुटाए हैं. उनके नाम हैं एनर्जी डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड और ईडीसीएल पावर प्रोजेक्ट्स लिमिटेड. रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2005-06 में एनर्जी डेवलपमेंट कंपनी लि. का मुनाफा सिर्फ 2.49 करोड़ था, मगर आश्चर्यजनक रूप से 2006-07 में यह करीब इक्कीस गुना बढ़कर 52.4 करोड़ रुपये हो गया. यह मुनाफा कहां से आया, इसमें इतनी वृद्धि कैसे हुई, इस संबंध में सिंह और उनके निदेशक एक भी दस्तावेज पेश नहीं कर सके. जांचकर्ता यह भी बताते हैं कि दो वित्त वर्षों के दौरान मुनाफे में इतनी जबर्दस्त वृद्धि के बावजूद इतना मुनाफा कमाने के लिए किए गए खर्च में कोई वृद्धि देखने को नहीं मिलती. इस तथ्य से भी इन आंकड़ों के संदिग्ध होने का संकेत मिलता है. इसी प्रकार ईडीसीएल पावर प्रोजेक्ट्स लि. ने साल 2004 से 2007 के बीच 14 करोड़ का मुनाफा दिखाया. लेकिन यूपी पुलिस के मुताबिक एक बार फिर से वे कंपनी को किसी तरह के कॉन्ट्रैक्ट या काम मिलने का कोई सबूत नहीं पेश कर पाए जिसके चलते कंपनी को यह फायदा हुआ था.’मेरी कंपनी द्वारा हासिल की गई सारी रकम चेक के जरिए आई है. एक भी लेन-देन नगद में नहीं हुआ है. नियमों का पूरा ध्यान रखा गया है. चेक हासिल करने वाला चेक देने वाले व्यक्ति द्वारा की गई किसी भी तरह की हेरफेर या करचोरी के लिए जिम्मेदार नहीं है. चेक जारी करने वाले को अपनी आय के स्रोत का खुलासा करना चाहिए’, अमर सिंह कहते हैं.

अमर सिंह के खिलाफ जारी जांच कानपुर निवासी एक सामाजिक कार्यकर्ता एसके त्रिपाठी की शिकायत का नतीजा है. ‘दिसंबर, 2008 में मैंने अखबारों में पढ़ा था कि अमर सिंह ने बिल क्लिंटन के चैरिटी फाउंडेशन के लिए 35 करोड़ रुपयों का दान किया था. जब मैंने राज्यसभा के सांसद के तौर पर उनके द्वारा घोषित की गई संपत्ति जानने की कोशिश की तो मैंने पाया कि उस वर्ष उनकी कुल संपत्ति सिर्फ 32 करोड़ थी. ये साफ तौर पर आय से अधिक संपत्ति का मामला था. इसने मुझे उनकी संपत्तियों की गहराई से पड़ताल करने के लिए प्रेरित किया. मैंने रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज से आंकड़े जुटाने शुरू किए तो पाया कि अमर सिंह के पास लगभग 600 छद्म कंपनियों का जटिल नेटवर्क है जिन्हें वे या तो खुद संचालित करते हैं या फिर अन्य लोगों के माध्यम से. इसके बाद मैंने कानपुर में इस संबंध में एक एफआईआर दर्ज करवा दी’, त्रिपाठी बताते हैं.

त्रिपाठी ने एफआईआर में आरोप लगाया था कि अमर सिंह ने छद्म कंपनियों के माध्यम से लगभग 400 करोड़ रुपयों के काले धन का हेरफेर किया है. चूंकि इनमें से अधिकतर कंपनियां कोलकाता में थीं, इसलिए यूपी पुलिस ने बंगाल पुलिस को जांच करने के लिए कहा. लेकिन कोलकाता पुलिस ने इसे ठुकरा दिया. तब उत्तर प्रदेश सरकार ने जांच का जिम्मा उत्तर प्रदेश पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा को सौंप दिया.
सिंह पलटवार करते हैं, ‘जिस थानेदार ने मेरे खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी उसे भ्रष्टाचार और घर पर कब्जा करने के आरोप में निलंबित किया जा चुका है.’ सिंह ने इस जांच को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक रिट पेटीशन भी दाखिल की थी. शिकायतकर्ता त्रिपाठी ने भी हाई कोर्ट के समक्ष रिट पेटीशन दायर करके सीबीआई अथवा ईडी जैसी केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा मामले की जांच की मांग की थी. हाई कोर्ट ने इन दोनों याचिकाओं को आपस में मिला दिया. दिसंबर, 2009 में कोर्ट ने सिंह की एफआईआर रद्द करने की याचिका खारिज करते हुए एक आदेश पारित किया कि उत्तर प्रदेश सरकार अमर सिंह के काले धन के साम्राज्य की जांच करने के लिए एकाउंटिंग विशेषज्ञों का एक दल गठित कर सकती है.
फिलहाल यूपी पुलिस की स्पेशल सेल ने अपनी जांच का दायरा सिर्फ 50 कंपनियों तक सीमित कर रखा है. एक साल लंबी जांच के दौरान पुलिस ने इन कंपनियों के दफ्तरों को चिह्नित करने के साथ-साथ इनके निदेशकों के बयान भी दर्ज किए जिसमें बड़ी संख्या में निदेशक फर्जी पाए गए. मसलन गाजियाबाद निवासी दिनेश प्रताप सिंह कागजों में उन 43 में से दो कंपनियों के निदेशक थे जिनका अमर सिंह की कंपनी में विलय हो गया. इनके नाम हैं- पीट इन्वेस्टमेंट और सान्यु इन्वेस्टमेंट प्रा. लि. लेकिन पुलिस ने जब उनसे पूछताछ की तो उन्होंने बताया, ‘मुझे नहीं पता कि पीट और सान्यु अस्तित्व में कब आए. मैं कभी भी उनके दफ्तर में नहीं गया. न ही मुझे कभी भी उनके मुनाफे से एक रुपया भी मिला. मुझे उनके व्यवसाय के बारे में भी कोई जानकारी नहीं है. और तो और मुझे उनके नफे-नुकसान की भी कोई जानकारी नहीं है.’ 

वे आगे बताते हैं, ‘मैं अमर सिंह की एक कंपनी ईस्टर इंडिया केमिकल्स लि. में सिर्फ एक कर्मचारी था. चूंकि मैं उनके यहां नौकरी करता था, इसलिए उनके भाई अरविंद सिंह ने मुझसे कुछ कागजात पर दस्तखत करवा लिए. उनका कर्मचारी होने के नाते मैंने वही किया जो उन्होंने मुझसे कहा. मुझे इन कंपनियों के बारे में कुछ भी पता नहीं.’ 

पीट और सान्यु के अमर सिंह की कंपनी में विलय का प्रस्ताव कलकत्ता हाई कोर्ट में दाखिल किया गया और उस प्रस्ताव पर निदेशक की हैसियत से दिनेश के भी दस्तखत मौजूद थे. लेकिन जब पुलिस ने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने कंपनी के विलय की सहमति दी थी या विलय के प्रस्ताव पर दस्तखत किए थे तो उनका जवाब था कि उन्हें इस तरह के किसी विलय की जानकारी तक नहीं है और न ही उन्होंने इस तरह के किसी प्रस्ताव पर दस्तखत किए हैं. पुलिस ने अपनी जांच में पाया कि दिनेश सिंह उन तमाम लोगों में से एक हैं जिनकी पहचान का इस्तेमाल अमर सिंह और उनके भाई ने फर्जी कंपनियों का जटिल जाल खड़ा करने में किया (बॉक्स देखें). संक्षेप में ये सभी 43 कंपनियां जिनका विलय अमर सिंह की दो कंपनियों में किया गया, फर्जी इकाइयां थी और उनकी स्थापना सिर्फ काले धन के कारोबार के लिए की गई थी. यूपी पुलिस की जांच रिपोर्ट फिलहाल इलाहाबाद हाई कोर्ट के पास है. अमर सिंह चाहते हैं कि उनके खिलाफ चल रही जांच खत्म हो जाए. उधर शिकायतकर्ता की मांग है कि पूरे मामले की जांच सीबीआई और ईडी द्वारा करवाई जाए.

इस मामले में अंतिम जिरह खत्म हो चुकी है और बस कुछ ही हफ्तों के अंदर अदालत अपना निर्णय सुना देगी और अमर सिंह के भाग्य का फैसला भी.

 

 

काले धन की अमरबेल?

राज्यसभा सांसद और सपा के पूर्व महासचिव अमर सिंह पर काले धन के कारोबार के आरोप पहले भी लगते रहे हैं लेकिन तब ये सिर्फ आरोप थे. पिछले साल नवंबर में उत्तर प्रदेश पुलिस ने जो जांच रिपोर्ट इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जमा की है उसमें सिंह के काले धन के कारोबार से जुड़े तमाम अकाट्य सबूत मौजूद हैं. इस रिपोर्ट की एक प्रति तहलका के पास है. ये दस्तावेज बताते हैं कि किस प्रकार अमर सिंह ने साल 2003 से 2007 के बीच अवैध कंपनियों का जाल बिछाकर 138.5 करोड़ रुपयों का अवैध मुनाफा कमाया. रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्हें इतना मोटा मुनाफा आय का कोई वैध स्रोत न होने के बावजूद कमाया.

उत्तर प्रदेश पुलिस ने देश भर में फैली करीब 600 ऐसी कंपनियों, जिन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर अमर सिंह का बताया जा रहा था, में से 50 की जांच-पड़ताल की है. यह जांच सिंह के खिलाफ कानपुर में दायर एक एफआईआर के बाद की गई थी. एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि सिंह ने तमाम अवैध तरीकों से करीब 400 करोड़ रुपये इकट्ठा किए. इस काले धन को सफेद बनाने के लिए उन्होंने पहले तो इस धन को कई ‘शैल’ कंपनियों (ऐसी कंपनी जो कोई व्यवसाय नहीं करती और न ही जिसके पास कोई संपत्ति होती है) में लगाया. इसके बाद इस तरह की दर्जनों कंपनियों का उन कंपनियों में विलय कर दिया गया जिन पर पूरी तरह से अमर सिंह और उनके परिवार का नियंत्रण था.

हाई कोर्ट में दाखिल रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिस समय अमर सिंह उत्तर प्रदेश विकास परिषद (प्रदेश के औद्योगिक विकास के लिए बनी सलाहकार संस्था जो 2003 से 2007 के बीच मुलायम सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में प्रभावी रही थी) के मुखिया हुआ करते थे उस दौर में उनकी कंपनियों ने गलत तरीकों से अरबों रुपये बनाए. उस समय अनिल अंबानी, कुमार मंगलम बिड़ला और केवी कामथ जैसे शीर्ष उद्योगपति इस परिषद के सदस्य हुआ करते थे.

तहलका से बातचीत में अमर सिंह काले धन के कारोबार और आय से अधिक संपत्ति के आरोपों को सिरे से खारिज कर देते हैंं. ‘उत्तर प्रदेश विकास परिषद के अध्यक्ष के तौर पर मैं बड़ी मात्रा में निवेश लेकर आया था. अपने पद का इस्तेमाल मैंने निजी फायदे के लिए कभी नहीं किया. यह सोचना भी हास्यास्पद है कि मैं भ्रष्टाचार में लिप्त था. मेरे पास तो दस्तखत तक के अधिकार नहीं थे. यह तो सिर्फ एक सलाहकार संस्था थी. अगर मेरे खिलाफ जांच हो रही है तो उन सभी शीर्ष उद्योगपतियों के खिलाफ भी जांच होनी चाहिए जो उस समय परिषद के सदस्य थे. यह जांच राजनीतिक षडयंत्र का परिणाम है’, सिंह कहते हैं.

अमर सिंह भले ही इसे राजनीतिक षडयंत्र करार दे रहे हों लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में उन तरीकों की विस्तार से जानकारी दी है जिनके जरिए अमर सिंह ने काले धन को सफेद करने का गोरखधंधा अंजाम दिया. रिपोर्ट के मुताबिक अमर सिंह ने फर्जी निदेशकों की एक पूरी मंडली के माध्यम से लगभग 43 छद्म कंपनियों पर अपना नियंत्रण बना रखा था. कोलकाता में पंजीकृत इन सभी कंपनियों के शेयर एक अजीबोगरीब ‘क्रॉस-होल्डिंग पैटर्न’ में लोगों के पास थे और कथित रूप से बिना कोई व्यवसाय किए सिर्फ बहीखातों में आंकड़े दर्ज करके ये कंपनियां अस्तित्व में बनी हुई थीं.

पुलिस को दिए गए बयान में तकरीबन एक दर्जन फर्जी निदेशकों ने बताया कि जिन कंपनियों के निदेशक के रूप में उनके नाम इस्तेमाल किए गए  उनके काम-काज के बारे में उन्हें रत्ती भर भी जानकारी नहीं थी, सिर्फ उनकी पहचान का इस्तेमाल अमर सिंह और उनके भाई अरविंद सिंह ने किया. दिसंबर, 2003 में इस तरह की 18 छद्म कंपनियों का विलय अमर सिंह के स्वामित्व वाली कंपनी सर्वोत्तम कैप लिमिटेड में कर दिया गया. इसी तरह की 25 अन्य कंपनियों का विलय सिंह के स्वामित्व वाली एक अन्य कंपनी पंकजा आर्ट ऐंड क्रेडिट प्राइवेट लिमिटेड में जनवरी, 2005 में किया गया. पंकजा कुमारी सिंह अमर सिंह की पत्नी का नाम है. पुलिस की रिपोर्ट में कहा गया है कि ये छद्म कंपनियां न तो कोई व्यवसाय कर रही थीं और न ही इनमें भविष्य में मुनाफा कमाने की क्षमता थी. बावजूद इसके विलय के वक्त इन 43 कंपनियों की वास्तविक कीमत से कहीं ज्यादा कीमत आंकी गई और उनके शेयरों को उनकी बाजार कीमत से कई गुना ज्यादा पर खरीदा गया. तहलका के पास उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि इन कंपनियों के शेयर सिंह ने 400 से 600 प्रतिशत तक ज्यादा कीमत पर खरीदे. आरोप लग रहा है कि यह पूरी कवायद सिर्फ अमर सिंह के काले धन को सफेद करने के लिए की गई.

तहलका से बातचीत में सिंह बताते हैं, ‘ये सभी 43 कंपनियां कोलकाता में पंजीकृत हैं. इसलिए पहले तो यूपी पुलिस के पास उनकी जांच का अधिकार ही नहीं है. दूसरी बात विलय को कलकत्ता हाई कोर्ट की मंजूरी मिली हुई है. विलय के बाद पुरानी कंपनियां खत्म हो गईं, इसलिए उनके निदेशकों को इसके बारे में बोलने का कोई अधिकार नहीं है. तत्कालीन कॉरपोरेट अफेयर मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी इस विलय को क्लीन चिट दी थी.’ दिलचस्प बात यह है कि जब पुलिस ने सिंह से उन 43 कंपनियों के रिकॉर्ड दिखाने के लिए कहा तो उनका जवाब था कि सभी रिकॉर्ड खो गए हैं. ‘कोलकाता में मेरा दफ्तर स्थानांतरित करते समय सारे रिकॉर्ड खो गए थे. इस संबंध में साल 2006 में एक एफआईआर भी दर्ज करवाई गई थी’, सिंह कहते हैं.

अमर सिंह की दो अन्य कंपनियों के खिलाफ भी यूपी पुलिस ने स्पष्ट सबूत जुटाए हैं. उनके नाम हैं एनर्जी डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड और ईडीसीएल पावर प्रोजेक्ट्स लिमिटेड. रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2005-06 में एनर्जी डेवलपमेंट कंपनी लि. का मुनाफा सिर्फ 2.49 करोड़ था, मगर आश्चर्यजनक रूप से 2006-07 में यह करीब इक्कीस गुना बढ़कर 52.4 करोड़ रुपये हो गया. यह मुनाफा कहां से आया, इसमें इतनी वृद्धि कैसे हुई, इस संबंध में सिंह और उनके निदेशक एक भी दस्तावेज पेश नहीं कर सके. जांचकर्ता यह भी बताते हैं कि दो वित्त वर्षों के दौरान मुनाफे में इतनी जबर्दस्त वृद्धि के बावजूद इतना मुनाफा कमाने के लिए किए गए खर्च में कोई वृद्धि देखने को नहीं मिलती. इस तथ्य से भी इन आंकड़ों के संदिग्ध होने का संकेत मिलता है. इसी प्रकार ईडीसीएल पावर प्रोजेक्ट्स लि. ने साल 2004 से 2007 के बीच 14 करोड़ का मुनाफा दिखाया. लेकिन यूपी पुलिस के मुताबिक एक बार फिर से वे कंपनी को किसी तरह के कॉन्ट्रैक्ट या काम मिलने का कोई सबूत नहीं पेश कर पाए जिसके चलते कंपनी को यह फायदा हुआ था.’मेरी कंपनी द्वारा हासिल की गई सारी रकम चेक के जरिए आई है. एक भी लेन-देन नगद में नहीं हुआ है. नियमों का पूरा ध्यान रखा गया है. चेक हासिल करने वाला चेक देने वाले व्यक्ति द्वारा की गई किसी भी तरह की हेरफेर या करचोरी के लिए जिम्मेदार नहीं है. चेक जारी करने वाले को अपनी आय के स्रोत का खुलासा करना चाहिए’, अमर सिंह कहते हैं.

अमर सिंह के खिलाफ जारी जांच कानपुर निवासी एक सामाजिक कार्यकर्ता एसके त्रिपाठी की शिकायत का नतीजा है. ‘दिसंबर, 2008 में मैंने अखबारों में पढ़ा था कि अमर सिंह ने बिल क्लिंटन के चैरिटी फाउंडेशन के लिए 35 करोड़ रुपयों का दान किया था. जब मैंने राज्यसभा के सांसद के तौर पर उनके द्वारा घोषित की गई संपत्ति जानने की कोशिश की तो मैंने पाया कि उस वर्ष उनकी कुल संपत्ति सिर्फ 32 करोड़ थी. ये साफ तौर पर आय से अधिक संपत्ति का मामला था. इसने मुझे उनकी संपत्तियों की गहराई से पड़ताल करने के लिए प्रेरित किया. मैंने रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज से आंकड़े जुटाने शुरू किए तो पाया कि अमर सिंह के पास लगभग 600 छद्म कंपनियों का जटिल नेटवर्क है जिन्हें वे या तो खुद संचालित करते हैं या फिर अन्य लोगों के माध्यम से. इसके बाद मैंने कानपुर में इस संबंध में एक एफआईआर दर्ज करवा दी’, त्रिपाठी बताते हैं.

त्रिपाठी ने एफआईआर में आरोप लगाया था कि अमर सिंह ने छद्म कंपनियों के माध्यम से लगभग 400 करोड़ रुपयों के काले धन का हेरफेर किया है. चूंकि इनमें से अधिकतर कंपनियां कोलकाता में थीं, इसलिए यूपी पुलिस ने बंगाल पुलिस को जांच करने के लिए कहा. लेकिन कोलकाता पुलिस ने इसे ठुकरा दिया. तब उत्तर प्रदेश सरकार ने जांच का जिम्मा उत्तर प्रदेश पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा को सौंप दिया.
सिंह पलटवार करते हैं, ‘जिस थानेदार ने मेरे खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी उसे भ्रष्टाचार और घर पर कब्जा करने के आरोप में निलंबित किया जा चुका है.’ सिंह ने इस जांच को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक रिट पेटीशन भी दाखिल की थी. शिकायतकर्ता त्रिपाठी ने भी हाई कोर्ट के समक्ष रिट पेटीशन दायर करके सीबीआई अथवा ईडी जैसी केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा मामले की जांच की मांग की थी. हाई कोर्ट ने इन दोनों याचिकाओं को आपस में मिला दिया. दिसंबर, 2009 में कोर्ट ने सिंह की एफआईआर रद्द करने की याचिका खारिज करते हुए एक आदेश पारित किया कि उत्तर प्रदेश सरकार अमर सिंह के काले धन के साम्राज्य की जांच करने के लिए एकाउंटिंग विशेषज्ञों का एक दल गठित कर सकती है.
फिलहाल यूपी पुलिस की स्पेशल सेल ने अपनी जांच का दायरा सिर्फ 50 कंपनियों तक सीमित कर रखा है. एक साल लंबी जांच के दौरान पुलिस ने इन कंपनियों के दफ्तरों को चिह्नित करने के साथ-साथ इनके निदेशकों के बयान भी दर्ज किए जिसमें बड़ी संख्या में निदेशक फर्जी पाए गए. मसलन गाजियाबाद निवासी दिनेश प्रताप सिंह कागजों में उन 43 में से दो कंपनियों के निदेशक थे जिनका अमर सिंह की कंपनी में विलय हो गया. इनके नाम हैं- पीट इन्वेस्टमेंट और सान्यु इन्वेस्टमेंट प्रा. लि. लेकिन पुलिस ने जब उनसे पूछताछ की तो उन्होंने बताया, ‘मुझे नहीं पता कि पीट और सान्यु अस्तित्व में कब आए. मैं कभी भी उनके दफ्तर में नहीं गया. न ही मुझे कभी भी उनके मुनाफे से एक रुपया भी मिला. मुझे उनके व्यवसाय के बारे में भी कोई जानकारी नहीं है. और तो और मुझे उनके नफे-नुकसान की भी कोई जानकारी नहीं है.’ 

वे आगे बताते हैं, ‘मैं अमर सिंह की एक कंपनी ईस्टर इंडिया केमिकल्स लि. में सिर्फ एक कर्मचारी था. चूंकि मैं उनके यहां नौकरी करता था, इसलिए उनके भाई अरविंद सिंह ने मुझसे कुछ कागजात पर दस्तखत करवा लिए. उनका कर्मचारी होने के नाते मैंने वही किया जो उन्होंने मुझसे कहा. मुझे इन कंपनियों के बारे में कुछ भी पता नहीं.’ 

पीट और सान्यु के अमर सिंह की कंपनी में विलय का प्रस्ताव कलकत्ता हाई कोर्ट में दाखिल किया गया और उस प्रस्ताव पर निदेशक की हैसियत से दिनेश के भी दस्तखत मौजूद थे. लेकिन जब पुलिस ने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने कंपनी के विलय की सहमति दी थी या विलय के प्रस्ताव पर दस्तखत किए थे तो उनका जवाब था कि उन्हें इस तरह के किसी विलय की जानकारी तक नहीं है और न ही उन्होंने इस तरह के किसी प्रस्ताव पर दस्तखत किए हैं. पुलिस ने अपनी जांच में पाया कि दिनेश सिंह उन तमाम लोगों में से एक हैं जिनकी पहचान का इस्तेमाल अमर सिंह और उनके भाई ने फर्जी कंपनियों का जटिल जाल खड़ा करने में किया (बॉक्स देखें). संक्षेप में ये सभी 43 कंपनियां जिनका विलय अमर सिंह की दो कंपनियों में किया गया, फर्जी इकाइयां थी और उनकी स्थापना सिर्फ काले धन के कारोबार के लिए की गई थी. यूपी पुलिस की जांच रिपोर्ट फिलहाल इलाहाबाद हाई कोर्ट के पास है. अमर सिंह चाहते हैं कि उनके खिलाफ चल रही जांच खत्म हो जाए. उधर शिकायतकर्ता की मांग है कि पूरे मामले की जांच सीबीआई और ईडी द्वारा करवाई जाए.

इस मामले में अंतिम जिरह खत्म हो चुकी है और बस कुछ ही हफ्तों के अंदर अदालत अपना निर्णय सुना देगी और अमर सिंह के भाग्य का फैसला भी.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

थोड़ा नीम, जिससे शहद बनेगा : आई एम

ओनीर जितने फिक्रमंद फिल्मकार कम ही होते हैं. अपनी पहली फिल्म ‘माई ब्रदर निखिल’ में उन्होंने एक ऐसी कहानी सुनाई थी जिसे कहने-सुनने वाले बहुत कम लोग हैं. उसके बाद वे ‘बस एक पल’ और ‘सॉरी भाई’ से होते हुए फिर वहीं लौट आए हैं. वे कहानियां कहते हुए, जिन्हें कहा जाना बहुत जरूरी है लेकिन कोई कह ही नहीं रहा. और यह लौट आना कोई व्यावसायिक लौट आना नहीं है. ओनीर ‘आई एम’ की कहानियां ऐसे स्नेह से सुनाते हैं जैसे यही उनका असली घर हो.

लेकिन दुर्भाग्य, कि इतना काफी नहीं होता. ओनीर हमारे समाज के परेशान अल्पसंख्यक तबके के लिए चिंतित जरूर हैं लेकिन एक संपूर्ण फिल्म बनाने के लिए अच्छा कहानीकार होना भी जरूरी है, जो वे नहीं हो पाते. यही वजह है कि कई बार वे किसी मुद्दे की बात करते हुए डॉक्यूमेंट्री जितने नीरस भी हो जाते हैं. खासकर ‘आई एम मेघा’ में कश्मीरी पंडितों की बात करते हुए. ओनीर कश्मीर से विस्थापित हुए परिवारों और वहां रहकर फौज का आतंक झेल रहे परिवारों की बात तो करते हैं, लेकिन किसी भावहीन रिपोर्ट की तरह. खासकर उनके डायलॉग इतने सपाट हैं कि आप उस दर्द से जुड़ ही नहीं पाते. सबसे हैरत की बात है कि वे कश्मीर को खूबसूरत भी नहीं दिखा पाते.

लेकिन बाकी तीनों कहानियां बेहतर हैं. ‘आई एम आफिया’ बीच में थोड़ी खिंचती है लेकिन उसे नंदिता दास खास बनाती हैं. फिल्म के पास बहुत सारे एक्टर हैं और लगभग सभी उसकी पूंजी हैं. आखिरी दो कहानियां मुझे ज्यादा पसंद आईं. ‘आई एम अभिमन्यु’ का प्रस्तुतितीकरण बहुत खूबसूरत है. वह एक जवान लड़के का अपना बुरा बचपन याद करना है, जिसमें ओनीर सफेद कपड़ों वाली एक बच्ची का सपना भरते हैं, जो कहानी में कहीं नहीं है और जिसकी मां अचानक गायब हो जाती है. ऐसे सपने ही सिनेमा को सिर्फ कहानी कहने का माध्यम नहीं, सिनेमा बनाते हैं.

लेकिन आखिरी कहानी ‘आई एम उमर’ ही वह कहानी है जो इस फिल्म को जरूर देखे जाने लायक बनाती है. दो समलैंगिक पुरुषों की यह कहानी सबसे ज्यादा दिल से कही गई कहानी है. इसीलिए उसके रोमांटिक और क्रूर, दोनों दृश्य आपके अंदर बैठ जाते हैं. वहां डायलॉग्स वाली वह कमी भी अचानक गायब हो जाती है, जो बाकी कहानियों को दीमक की तरह खा रही थी. यहां फिल्म अपने पूरे शरीर और इस तरह हमारे पूरे आधुनिक समाज के शरीर के सारे कपड़े उतार देती है और आपको एक आईना देती है, जिसमें आपको अपनी बगल में बैठी एक औरत का समलैंगिक पुरुषों के चुंबन के सीन पर बेशर्मी से हंसना भी सुनना है. आप चाहते हैं कि उस औरत को और भारतीय संस्कृति के पहरुए उन बाबाओं को उसी क्षण मार डालें, जो कहते हैं कि समलैंगिकता मानसिक बीमारी है. उस मारने से पहले उन सबको यह फिल्म जबर्दस्ती दिखाई जानी चाहिए. जो भी हो, यह एक जरूरी फिल्म है जो हमारी दुनिया को किसी न किसी तरह बेहतर बनाएगी.

गौरव सोलंकी 

मजबूरी का मौन

लालू प्रसाद यादव कहते हैं कि उन्होंने छह माह के लिए मौन व्रत रखा हुआ है. उनके विरोधी कहते हैं कि उनके पास बोलने के लिए कुछ है ही नहीं. लालू के विभिन्न क्रियाकलापों और उनसे एवं अन्य लोगों से बातचीत के आधार पर निराला का आकलन

12 फरवरी को सुबह करीब सवा आठ बजे मैं अपने सहयोगी साथी इर्शादुल हक और विकास के साथ पटना के राबड़ी देवी वाले सरकारी आवास पर पहुंचता हूं. अहाते में कुल जमा चार-पांच लोगों की मंडली जमी है. लुंगी लपेटे, आधी बांह का स्वेटर पहन कुर्सी पर बैठे लालू प्रसाद यादव अखबारों के ढेर को निपटाकर उस पर टीका-टिप्पणी करने में मशगूल हैं. मंडली में कोई नामचीन चेहरा नहीं. राजनीतिक भी नहीं. लगभग डेढ़ घंटे की अवधि तक हम भी उसी मंडली का हिस्सा बनते हैं. उस अवधि में कम से कम चार बार लालू प्रसाद अपने अरदली को भोजपुरी मिश्रित हिंदी में अलग-अलग लहजे में कहते हैं- चाय लाओ रे सबके लिए…! चयवा कहां अटक गया रे…!! चयवा काहे नहीं ला रहा रे…!!! उनका आदेश पहले तो अनुरोध में बदलता है और फिर एक रट भर बनकर रह जाता है. आखिर में जब चला-चली की बेला आती है तो अरदली सिर्फ एक कप नींबू वाली चाय लिए हाजिर होता है.

यह थोड़ा अटपटा लगता है. सुबह-सुबह का समय, मौसम में ठंडेपन का एहसास भी है तो इस लिहाज से चाय का इंतजार वहां मौजूद लालू प्रसाद के कुछ खास मेहमान भी कर रहे थे. खास इसलिए कि लालू उन सबसे जिस तरह भोजपुरी में बोल-बतिया रहे थे –  ‘का रे, का हो और का सर’ – उससे साफ लग रहा था कि ये ‘लालू’ से मिलने आने वाले निहायत निजी-से लोग हैं. सत्ता-शासन से बेदखल नेता लालू प्रसाद यादव से मिलने आने वालों में से नहीं. लेकिन उस रोज एक कप नींबू की चाय सामने आते ही लालू प्रसाद बगैर किसी परवाह के अकेले ही चाय सुड़कने में मगन हो जाते हैं. मौके-बेमौके लालू प्रसाद के तीखे प्रहार से तिलमिला जाने वाले उनके घोर विरोधी और आलोचक भी जानते-मानते हैं कि मेहमाननवाजी और खाने-खिलाने के मामले में वे हमेशा ही बहुत दिलवाले रहे हैं. अपने उफान के दिनों में भी कोई निजी वक्त में उनके पास चला जाए तो वे दूध-रोटी, भात-दाल-चोखा साथ में ही बैठकर खाते थे. अगर घर से मिठाई नहीं मंगाते तो वहीं बगान से ही पपीता वगैरह कुछ भी तुड़वाते और खिलाते. तालाब से मछली निकलवाते और बनवाकर सबके साथ खाते. मगर उस सुबह एक कप चाय आते ही लालू का यह भूल जाना कि उन्होंने घंटे भर में कम से कम तीन-चार बार अपने अरदली को सबके लिए चाय लाने को कहा था, सिर्फ अपने लिए नहीं. तो क्या अब लालू इतने लापरवाह-बेपरवाह रहने लगे हैं!

‘अकेले लालू को 80 लाख मतदाताओं ने वोट दिया. हमको जो वोट मिला उसमें पासवान का वोट उतना कहां है, जो है सो लालू यादव का है’

शायद नहीं और शायद हां भी. नहीं, इसलिए कि आज भी गांव-जवार के पुराने मित्रों से लेकर नये-नवेले परिचितों तक को एक निगाह में ही पहचानते हैं वे, भरी भीड़ में भी नाम से संबोधित करके बुलाते हैं. हां की गुंजाइश इसलिए कि उसी रोज चाय मंगाने के पहले उन्होंने अपने अरदली से खैनी भी मांगी थी. खैनी मांगते ही उनकी हथेली पर बनी-बनाई खैनी रख दी गई. हाथ में खैनी लेने के दौरान लालू प्रसाद बातचीत में मशगूल हो जाते हैं. खैनी हथेली से धीरे-धीरे गिरती रहती है और वे फिर भी रट लगाते रहते हैं- खैनिया कहां है रे, खैनिया नहीं बनाया रे, खैनिया दो ना रे… अरदली साहस नहीं जुटा पाता कि कह दे कि आपके हाथे में तो है खैनी. लालू का ध्यान खुद उस पर जाता है, हंसते हुए कहते हैं- ओ, दे दिया है, फिर होठ तले दबाते हैं. और पांच मिनट के अंदर ही अपने पुराने अंदाज में उंगली से होठ को हिडोरते हुए खैनी निकालते हैं और कुरसी की दायीं ओर रखे पीकदान की ओर हाथ फैला देते हैं. अरदली काफी देर तक खैनी लगी उंगली पर पानी की पतली धार गिराता रहता है, तब तक, जब तक कि लालू खुद हाथ हटा नहीं लेते. लालू प्रसाद जब खैनी के बहाने अपनी बेपरवाही पर हंस रहे होते हैं तो ऐसा लगता है कि समूह में भी रहकर लालू अकेले किसी दुनिया में खोए रहते हैं अब! या एक साथ जेहन में कई बातें टकराते रहने की वजह से अब ज्यादा ही बेपरवाह-लापरवाह से रहते हैं. अरदली कहता है, जान-बूझकर ऐसा करते हैं साहब, यही तो उनकी खास पहचान वाली अदा है!

हो सकता है लालू प्रसाद अपनी खास पहचान वाली अदा को बनाए रखने के लिए जान-बूझकर ही ऐसा करते हों, लेकिन चुनाव के पहले से लेकर हार के बाद भी भटकाव, द्वंद्व और दुविधा की दुनिया से वे बाहर नहीं निकल पा रहे हैं, यह कई बातों से जाहिर हो जाता है. 12 फरवरी को जब वे प्रवचन देने की तर्ज पर अपनी बात बता रहे होते हैं तो हर एक मिनट पर बात बदलते रहते हैं. देहाती मुहावरे में कहें तो कभी हंसुआ के बियाह में खुरपी का गीत गाते हैं, तो कभी आम की बात करते-करते ईमली का स्वाद बताने लगते हैं.

बात मीडिया के रवैये से शुरू करते हैं, नीतीश सरकार की कार्यप्रणाली पर आते हैं, गांधीजी, जेपी के बहाने अंग्रेजों के राज को याद करते हैं. इस बीच बार-बार अपने शासन के पुराने दिनों की भी यादें ताजा करते रहते हैं. अपने दिनों को याद करते हुए गर्व और संतोष का भाव बार-बार लाने की कोशिश करते हैं लेकिन वह कुछ पलों से ज्यादा नहीं टिक पाता. मंडली में ही मौजूद एक सज्जन बातचीत को बीच में काटते हुए लालू प्रसाद की ओर मुखातिब होते हुए कहते हैं, ‘सर, बिस्कोमान में चुनाव हो रहा है, सब कहता है कि हर जगह से ललटेन को उखाड़ देना है.’ लालू पल भर में ही गुस्से में आ जाते हैं,  ‘अयें, का कह रहा है सब जगह से ललटेन को उखाड़ देगा. एतना आसान है का रे…’ लालू कुछ और बोलना चाह रहे होते हैं लेकिन पल भर में उभरा गुस्सा पल भर में ही शांत हो जाता है और फिर मुस्कुराते हुए कहते हैं- ‘अरे ऐसा कुछ नहीं. लड़ो चुनाव बिस्कोमान में. हम हैं न.’ अभी बिस्कोमान की बात खत्म ही होती है तो एक जूनियर पुलिस अधिकारी वर्दी में वहां पहुंचते हैं. लालू प्रसाद की नजर उधर जाती है- का है हो सिपाही जी! लालू प्रसाद जानते हैं कि वे सिपाही नहीं, उनके बैच-स्टार बता रहे होते हैं कि कोई अधिकारी हैं. लेकिन लालू प्रसाद दो-तीन बार सिपाही जी-सिपाही जी का संबोधन देते हैं. वे पुलिस अधिकारी गिड़गिड़ाने के अंदाज में बोलते हैं, बक्सर से आए हैं सर, आपसे मिलने, आपका दर्शन करने. लालू उससे बात भी कर रहे होते हैं और यह भी कह रहे होते हैं कि अभी बात नहीं करेंगे. जाओ, बाद में आना. पुलिसवाले के साइड में जाने पर फिर गर्व का भाव आता है चेहरे पर, ‘सब एही जगह पहुंचता है. सबको एहिजे पहुंचना होगा.’
एक समय में अलसुबह से देर रात तक लोगों, प्रशंसकों, नेताओं और अधिकारियों का इस कदर मजमा जमता था कि सांस लेने तक की फुर्सत नहीं मिलती थी लालू प्रसाद को. मगर आज जब वे एक जूनियर पुलिस अधिकारी की परिक्रमा का भी अपनी गौरव गाथा के रूप में बखान करते हैं तो एक अजीब-सी विडंबना का एहसास होता है. लालू प्रसाद खुद तो यह कहते हैं कि हमने छह माह तक चुप रहने का संकल्प लिया है, इसलिए अभी कुछ नहीं बोल रहे हैं, सरकार को सहयोग कर रहे हैं. मगर लालू और लालू की राजनीति को जानने वाले जानते हैं कि चुप रहना उनकी मजबूरी है. नीतीश कुमार उन्हीं की बिछाई बिसात पर लगातार उन्हें शह और मात दिए जा रहे हैं. लालू प्रसाद की पहचान सोशल इंजीनियरिंग के मसीहा के रूप में थी, नीतीश ने सोशल इंजीनियरिंग को एक नया विस्तार दे डाला. लालू प्रसाद ने चुनाव के पहले सवर्णों को आरक्षण देने का बुलबुला छोड़ा, नीतीश ने सवर्ण आयोग गठित कर दिया. लालू प्रसाद पिछड़ों और दलितों की बात करते थे, नीतीश अतिपिछड़ों और महादलितों के समीकरण से उन्हें मात दे रहे हैं. गवर्नेंस और डेवलपमेंट की बात पर लालू प्रसाद चाहकर भी आक्रामक तेवर नहीं दिखा पाते. बिहार के सौ साल पर बिहार गीत निर्माण से लेकर तमाम तरह के आयोजनों की तैयारियां सरकारी स्तर पर चल रही हैं, इस पर लालू प्रसाद कुछ बोलेंगे तो सवाल होगा कि आपने तो कभी बिहार स्थापना दिवस मनाने की कोशिश की ही नहीं. इसी तरह बिहारी उपराष्ट्रीयता और बिहारी अस्मिता को लेकर जो नया उफान दिख रहा है उस पर भी लालू प्रसाद को मन मसोसकर चुप रहना पड़ रहा है. यह बात अलग है कि बिहारी उपराष्ट्रीयता की एक बड़ी पहचान खुद लालू प्रसाद और उनकी राजनीति रही है. लेकिन फिलहाल नीतीश कुमार की इन सधी हुए चालों से लालू प्रसाद चाहकर भी कुछ बोलने की स्थिति में नहीं आ पा रहे हैं. और जिन मसलों पर लालू प्रसाद नीतीश को घेर सकते हैं उन विषयों पर रणनीति बनाने वाले रणनीतिकार लालू के पाले में नहीं बचे हैं.

‘उहो अब बहुते स्टाइल मारकर लालू यादव की नकल करने की कोशिश करते हैं लेकिन स्टाइल मारने से कोई लालू यादव हो जाएगा!’

तो क्या अगले कुछ सालों तक, जब तक लोकसभा या विधानसभा चुनाव की बारी न आ जाए, लालू प्रसाद ऐसे ही चंद लोगों की मंडली में बैठ टीका-टिप्पणी करते रहेंगे. यह सवाल 12 फरवरी को उनकी मंडली में शामिल होते हुए बार-बार जेहन में उठ रहा था. हालिया दो दशक में ऐसा दौर शायद ही कभी लालू प्रसाद ने देखा हो. कभी खुद सीएम हुआ करते थे, बाद में पत्नी सीएम बन गईं, दोनों साले सुभाष और साधु बिहार के राजनीतिक गलियारे के नक्षत्र बन गए थे. अब साधु-सुभाष अपनी-अपनी राह पकड़कर राजनीति में हाशिये पर हैं. पत्नी राबड़ी देवी खुद दो-दो जगहों से चुनाव हार चुकी हैं. लालू प्रसाद को खुद उनके राजनीतिक दोस्त से पक्के दुश्मन बने शरद यादव और रंजन यादव चुनावी जंग में पटखनी दे चुके हैं. बेटे को भी पिछले चुनाव में लालू ने लॉन्च किया, लेकिन वह भी अब चुनाव के बाद झारखंड प्रीमियर लीग खेलने की तैयारी में है. हालांकि विगत वर्षों तक, जब खुद लालू प्रसाद रेल मंत्री रहे, उनका जलवा बरकरार रहा लेकिन जिस जगह से कभी बिहार की सत्ता-शासन की बागडोर नियंत्रित होती थी वहां से अब ज्ञान-दर्शन के स्वर सुनाई पड़ते हैं.

लालू प्रसाद से जब हम विदा लेने को होते हैं तो वे आखिर में किसी सचेत अभिभावक की तरह समलैंगिकता और प्यार-मोहब्बत के प्रसंग पर बात करते हुए समाज को दुत्कारते हैं. लालू प्रसाद किसी प्रवचनकर्ता की मुद्रा में फिर आते हैं और चिंतित भाव से कहते हैं, बताइए भला. अब लेस्बियनिज्म को मान्यता मिल रहा है. जो जानवर नहीं करता, वह इंसान करेगा. छीः,छीः,छीः… कोई विरोध भी नहीं कर रहा. समाज को चाहिए कि ऐसी प्रवृत्तियों का विरोध करे नहीं तो सब बर्बाद हो जायेगा.’ लालू प्रसाद सिर्फ राबड़ी देवी वाले आवास की चारदीवारी में ही ज्ञान-दर्शन की बातें और मौके-बेमौके एक गंभीर और बुजुर्ग अभिभावक के जैसी अपनी राय नहीं रख रहे हैं. कुछ रोज पहले वे भागलपुर पहुंचे तो वहां भी उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता को जमकर कोसा और कहा कि पाश्चात्य सभ्यता भारतीय युवाओं को बर्बाद कर रही है. फरवरी में ही वे बनारस में एक विवाह समारोह में पहुंचे तो पत्रकारों ने उन्हें बढ़ती महंगाई के सवाल पर घेरा. लालू प्रसाद ने व्यंग्यात्मक लहजे में जवाब दिया,  अच्छा ही है, महंगाई बढ़ेगी तो लोग पैदल ज्यादा चलेगें. ज्यादा पैदल चलेगें तो डायबिटिज का खतरा कम होगा.

‘लेरसियन (लेस्बियन) को मान्यता दिया गया है. जो जानवर के समाज में भी एलाउ नहीं है, उ इंसान के समाज में एलाउ किया जा रहा है’

विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद खुद के कहे अनुसार तो वे मौन व्रत्त में हैं लेकिन जब भी मौका मिलता है, खूब बोलने की कोशिश करते हैं. बस बोल लेने के बाद यह जरूर दुहरा देते हैं कि हम अभी चुप हैं, चुप रहेंगे, मौनव्रत्त में चल रहे हैं और छह महीने बाद बोलेंगे तो सब कुछ बोलेंगे. खुद के खुल के बोलने के लिए लालू प्रसाद द्वारा निर्धारित छह में से तीन महीने निकल चुके हैं. इन महीनों में लालू प्रसाद पांच-छह बार अपनी बात बोलने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन कोई ऐसी बात नहीं जिस पर सरकार को या सरकारी मकहमे को बचाव की मुद्रा में आना पड़े. अब उनकी बातें अखबारों में भी खबरों के ढेर में कहां दबकर रह जा रही हैं, पता नहीं चल पाता.

21 फरवरी को पटना के भारतीय नृत्य कला मंदिर में भी कुछ ऐसा ही हुआ. लालू यादव जिंदाबाद की नारेबाजी जारी थी. रविदास चेतना मंच द्वारा संत रविदास जयंती का आयोजन था. आयोजन का सबसे बड़ा आकर्षण यह बताया गया था कि इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए लालू यादव दिल्ली से पटना आ रहे हैं. सिर्फ इसी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आ रहे हैं, ऐसा बार-बार कहा जा रहा था. लालू प्रसाद आते हैं. आते ही सबसे पहले सामने से मीडियाकर्मियों को कैमरा वगैरह हटाने के लिए कहते हैं. संचालक शिवराम दूसरी घोषणा करने लगते हैं. सामने जो भी भाई-बहिन बैठे हुए हैं, सीट खाली कर दें, वहां मीडिया के लोग बैठेंगे. लालू बीच में ही हत्थे से उखड़ जाते हैं, ‘एकदम से बुड़बके हो का जी. हम कैमरवा सब को हटाने के लिए कह रहे हैं तो तू दोसरे गीत गा रहे हो…’ अपने दल के नेता रघुवंश बाबू के बोल लेने के बाद लालू बोलना शुरू करते हैं. अपनी जगह से बैठे-बैठे ही. खूब बोलते हैं लेकिन उनके बोले-कहे में संत रविदास का नाम शायद ही कभी आया हो. सरकार के खिलाफ बोलते रहते हैं, ‘शिकारी आएगा,जाल बिछाएगा…’ का किस्सा सुनाते हैं. तीर और कमल के घालमेल से बचकर रहने की नसीहत देते हैं. पटना में सड़क किनारे से हटाए जा रहे गरीबों-दुकानदारों के पक्ष में बोलते हैं, साइकिल बांट योजना की तुलना इससे करते हैं. गरीबों को आटा का पैकेट सीधे दिए जाने पर मजाक करते हुए कहते हैं कि सड़लका गेहूं देगा, सावधान रहियो. जनगणना में जरूर से जरूर नाम दर्ज करवाने की अपील करते हैं. यह भी कहते हैं कि ई जो पटना में बड़का-बड़का बिल्डिंग बन रहा है, उ सब पईसा कहां से आ रहा है, इस पर हिसाब मांगेंगे. इतना कुछ बोलने के बाद लालू प्रसाद अंत में कहते हैं, ‘अभी हम मौन व्रत्त में हैं इसलिए कुछ नहीं बोल रहे हैं, छह महीना कुछ नहीं बोलेंगे. बीच-बीच में बोल के टैबलेट दे रहे हैं, बाद में तो सुई भोंकेगें, उ करना भी जानता है लालू जादव लेकिन अभी चुप है.’ यह किस किस्म का मौन व्रत्त है, लालू प्रसाद खुद नहीं समझ पा रहे, दूसरों को तो क्या खुद को ही नहीं समझा पा रहे हैं.

मौनव्रत के आधे समय यानी तीन माह गुजरने के क्रम में लालू प्रसाद कुछेक बार मीडिया में दिखे हैं. नये साल के आरंभ में वे जगन्नाथ पुरी मंदिर गए थे. सो खबरिया दुनिया जहां नीतीश, सुशील मोदी और दूसरे नेताओं के शुभकामना संदेशों से पटी थी वहीं लालू का जिक्र तक नहीं था. बीच में एक दफा जनगणना करने वाले उनके घर पहुंचे तो लालू प्रसाद ने थोड़ा जनगणना पर भी व्याख्यान दे डाला. बिहार में जब उनकी पार्टी के भविष्य का आकलन हो रहा था तो लालू प्रसाद अंडमान-निकोबार में कार्यालय खोलने गए, चटखार अंदाज में अंग्रजी मीडिया में लालू दो-चार पंक्तियां बोलते दिखे. फिर महंगाई पर उनका बयान आया कि अब तो घी से भी महंगा हो जाएगा पेट्रोल. पूर्णिया विधायक नवल किशोर केशरी हत्याकांड में सीबीआई जांच की मांग की गई तो उनके नाम कर चर्चा हुई. 26 जनवरी को अपने यहां नेहरू टोपी लगाकर झंडा फहराया, सभी मीडियावालों को खबर पहुंचाई गई लेकिन कुछेक ने ही उन्हें जगह दी. कर्पूरी ठाकुर के नाम पर हुए समारोह में भाजपा पर निशाना कसा तो थोड़ी-बहुत चर्चा हुई और जब भारतीय जनता युवा मोर्चा की ओर से कश्मीर में झंडा फहराने की तैयारी हो रही थी, कारवां बिहार से गुजर रहा था तो लालू प्रसाद की आवाज सुनाई पड़ी थी कि इस सरकार में भाजपा और संघियों का मन बढ़ रहा है, कांग्रेस मर गई है. किसी न किसी बात पर रोज मीडिया में छाए रहने वाले लालू प्रसाद तीन माह में पांच-छह बार दिखायी-सुनायी पड़े. हाशिये से हस्तक्षेप की कवायद कर रहे हैं. लालू प्रसाद के सिपहसालार कहते हैं कि साहेब मीडियावालों से दूरी बनाकर रखे हुए हैं. मीडिया के लोग कहते हैं कि अब उनमें क्या रक्खा है, जो…

चर्चित पत्रकार और लेखक हेमंत, जिन्होंने ‘बतकही बिहार की’ में लालू युग का बहुत ही शिद्दत से डॉक्यूमेंटेशन किया है, पुराने दिनों के कुछ किस्से सुनाते हैं. वे बताते हैं कि लालू प्रसाद अभी ताजा-ताजा मुख्यमंत्री बने थे. बेली रोड से होते हुए उनकी गाड़ी गुजर रही थी. रास्ते में उन्होंने जबर्दस्ती हेमंत को भी गाड़ी में बैठा लिया और लेकर दानापुर चले गए. दानापुर क्यों जा रहे हैं, पूछने पर पता चला कि वहां शौचालय का उद्घाटन करेंगे लेकिन शिक्षा पर बोलेंगे. लालू प्रसाद ने वही किया भी. गांव के लोगों के बीच जाकर, उनके ही मुहावरों में घंटों बोलते रहे. हगना-मूतना जैसे गंवई शब्द राज्य के मुखिया के जुबान से सुनकर गंवई भींड़ खिंचती चली आई. शौचालय और शिक्षा के रिश्ते को जोड़ लालू प्रसाद वहां से विदा हो गए और भीड़ लालू पर फिदा हो गई, उस इलाके के लोकमानस में यह लालुई शैली बस गई. फिर एक बार वे सासाराम में गए. तकरीबन एक लाख की भीड़ थी. लालू प्रसाद मंच पर पहुंचे. बोलने की बजाय उन्होंने पूछा कि इस भीड़ में कोई है जो ताड़ के पेड़ से ताड़ी उतारना जानता हो. कई हाथ एक साथ उठे. लालू ने सबको मंच पर आने को कहा. ताड़ी उतारने वाले मंच के पीछे से ऊपर आने के लिए बढ़े. लालू ने कहा कि सीढ़ी से क्या आना है, सामने से तड़पकर चढ़ो मंच पर, यह लालू का मंच है. देखते ही देखते कई नौजवान तड़पकर मंच पर चढ़ गए. लालू ने सबसे भाषण दिलवाया और ताड़ी उतारने से पीठ पर पड़े दागों को दिखाते हुए कहा कि इसी दाग को मिटाएगा लालू जादव. आज से ताड़ी का टैक्स माफ. गुजरे जमाने के कई किस्से जब हेमंत सुना रहे होते हैं तो यह पुराने जमाने के किसी राजा के किस्सों सरीखा लग रहा होता है. नयी पीढ़ी लालू प्रसाद के उन किस्सों से नावाकिफ है. अब लालू प्रसाद के अनुसार लालू जादव मौनव्रत्त में है, कभी उनके आगे-पीछे रहनेवाला मीडिया उनसे बेरुखी अपना रहा है. 2005 के चुनाव के बाद भी लालू हारे थे, लेकिन उम्मीदों के सहारे बोलते रहते थे. केंद्र में रेलमंत्री थे तो भी कुछ जलवा रहा. लालू प्रसाद के खास माने जाने वाले उनके दल के एक सांसद कहते हैं, ‘बिहारी राजनीति का लालुई अंदाज अब इतिहास बनने की राह पर है. राजनीति की लालू शैली या लालू की राजनीतिक शैली उसी राह पर है.’ क्या सब इतिहास हो गया? लेखक प्रसन्न चौधरी कहते हैं, ‘समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलाव ऐसे ही होता है. अब किसी नये नाम के उभार का इंतजार कीजिए.’

हालांकि कुछ लोग उम्मीद कर रहे हैं कि अपने राजनीतिक जीवन में तमाम उतार-चढ़ाव देख चुके लालू जल्दी ही इससे उबरेंगे और आगामी लोकसभा चुनाव के लिए बचे अच्छे-खासे समय का इस्तेमाल अपनी धार को मजबूत करने, संगठन को सक्रिय करने और बिहार में नीतीश सरकार को सवालों के घेरे में लाकर विपक्ष को खाद-पानी देने में करेंगे. लेकिन नीतीश सरकार के लगभग तीन माह हो जाने के बाद अब तक लालू प्रसाद राजनीतिक मोर्चे पर उस ढर्रे पर चलते हुए नहीं दिख रहे. शायद अभी वे तय नहीं कर पा रहे हैं कि करना क्या है. किस राह को पकड़ना है? इसलिए जब संसद सत्र में भाग लेने गए तो कांग्रेस के पक्ष में खड़े होते नजर आए जबकि कुछ दिनों पहले उन्होंने यह कहा था कि कांग्रेस मर गई है. उनके दो विश्वस्त क्षेत्रीय साथियों में से एक जगतानंद सिंह हैं, जिनके बेटे भाजपा के टिकट से चुनाव लड़कर अपना भाग्य आजमा चुके हैं. दूसरे रघुवंश प्रसाद सिंह हैं, जो सार्वजनिक तौर पर यह कह चुके हैं कि लालू प्रसाद ने कांग्रेस का साथ छोड़कर सबसे बड़ी राजनीतिक भूल की. संसद सत्र में पहुंचे लालू प्रसाद शायद रघुवंश बाबू की बातों का अनुसरण करना शुरू करके नई शुरुआत करना चाह रहे हैं.   

तौर पर पांच साल अपनी

आईएएस अधिकारी कहते हैं, ‘मलयालियों को अनुपात से ज्यादा फायदा मिला है. यहां तक कि जब महालेखा नियंत्रक (कैग) की नियुक्ति होनी थी तो नायर को विनोद राय मिले जो मलयाली नहीं हैं मगर केरल कैडर से जरूर हैं.’ लेकिन पंजाब से नायर का ताल्लुक खत्म नहीं हुआ. मनमोहन के पीएमओ में आने के लिए उन्हें चंडीगढ़ में मौजूद अपने नेटवर्क का इस्तेमाल करना पड़ा. बताया जाता है कि वोरा के साथ अब उनका उतना संपर्क नहीं है. उनके एक जानकार कहते हैं, ‘दिल्ली में जैसा चलन है, उन्होंने भी उस सीढ़ी को लात मारना सीख लिया है जिससे वे ऊपर गए हैं.’ हालांकि मल्होत्रा से उनका अपनापा बरकरार है. मल्होत्रा का प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री आवास में आना-जाना है और वे प्रधानमंत्री के पसंदीदा हैं. पंजाब यूनिवर्सिटी में बतौर जूनियर अधिकारी करियर शुरू करने वाले मल्होत्रा कभी मनमोहन के चंडीगढ़ स्थित घर में किराएदार हुआ करते थे जो उनके ही एक परिचित के शब्दों में कारोबारी और खुफिया समुदाय के साथ अपने विकसित कए गए संबंधों के जरिए राजनीतिक उद्यमी और इंदिरा गांधी के आंख-कान बन गए. मल्होत्रा की अहम उपलब्धि रही क्रिड की स्थापना. आज यह सरकार से अच्छी-खासी रकम पाने वाला संस्थान है जिसे कांग्रेस सरकारों के शासनकाल में खूब फायदा होता रहा है. उर्दू में बीए और सियोल की सूकम्यूंग विमंस यूनिवर्सिटी से डॉक्टर की मानद उपाधि प्राप्त मल्होत्रा समाज विज्ञानी से ज्यादा राजनीति के खिलाड़ी हैं. उन्होंने मनमोहन और नायर, दोनों को ही क्रिड की गवर्निंग बॉडी में आमंत्रित किया (दोनों अब भी यहां हैं) और इस तरह दोनों को नजदीक लाए.

मल्होत्रा के दामाद डीपीएस संधू हैं. रेलवे सर्विस के अधिकारी संधू पीएमओ में निदेशक हैं. बिना अपने मूल कैडर में वापस आए सरकार के सबसे अहम दफ्तर में उन्होंने सात साल गुजार लिए हैं. और उनके ससुर के अलावा नायर का भी इसमें योगदान है. हाल के महीनों में संधू ने मीडिया को साधने का काम शुरू किया है और वे प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे को बाइपास कर रहे हैं. एक ऐसा पीएमओ जिसका असमंजस लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है, के इस दोहरे रवैये का श्रेय भी नायर को ही जाता है.
नौकरशाह के रूप में नायर न तो राजनीतिक रूप से इतने वजनदार हैं जितने बृजेश मिश्रा थे या एमके

मजबूरी का मौन

कुछ डाल पर मल्लू

पीजे थॉमस किसके उम्मीदवार हैं? उत्सुकता मिश्रित यह सवाल दिल्ली की सत्ता के गलियारों में तभी से उछलने लगा था जब सितंबर, 2010 में विवादास्पद परिस्थितियों में उनकी मुख्य सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) के पद पर नियुक्ति हुई थी. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनकी नियुक्ति रद्द किए जाने के बाद इस सवाल ने एक नयी अहमियत अख्तियार कर ली है. कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं. कुछ का कहना है कि थॉमस या फिर उनकी पत्नी केरल से ताल्लुक रखने वाले एक कांग्रेसी नेता के रिश्तेदार हैं. कुछ दूसरों का इशारा पहले राजीव और फिर सोनिया गांधी के निजी स्टाफ में शामिल रह चुके गांधी परिवार के एक विश्वासपात्र के साथ थॉमस के कथित संबंधों की तरफ है.

का दबाव’ होने का मुद्दा उसमें भी उठा. माना जाता है कि प्रधानमंत्री ने पहले-पहल अपना बचाव कुछ इसी तर्ज पर करने की कोशिश भी की. सूत्र बताते हैं कि इस पर प्रधानमंत्री से कहा गया कि वे स्पष्ट तौर पर बताएं कि कांग्रेस में किसने थॉमस की दावेदारी को आगे बढ़ाया था. उनसे कहा गया कि इसकी बजाय उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में अपने इर्द-गिर्द के लोगों पर भी ध्यान देना चाहिए. देवास-इसरो समझौते से लेकर थॉमस की नियुक्ति तक पर सरकार की जैसी किरकिरी हुई है उससे प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रति कांग्रेस के शीर्ष नेताओं का असंतोष बढ़ता ही जा रहा है.

सवाल कई हैं. पीएओ को आखिर चलाता कौन है? नौकरशाही के अलग-अलग हलकों में कुछ मजाक और कुछ तंज के साथ कही जाने वाली इस बात में कितना वजन है कि यूपीए के राज में मल्लुओं (मलयाली यानी केरल निवासी) की मौज है. क्या वास्तव में कोई केरल लॉबी है जो चुपचाप यूपीए सरकार के दिमाग के तौर पर काम कर रही है?

ये सारे सवाल एक ही शख्स की तरफ इशारा करते हैं और वह शख्स है टीकेए नायर. पीएमओ में प्रधान सचिव नायर पर ही थॉमस का मददगार और देवास का संरक्षक होने के आरोप लग रहे हैं. कुछ अपनी काबिलियत और कुछ परिस्थितियों की वजह से नायर पीएमओ में मौजूद सबसे ताकतवर व्यक्ति के रूप में उभरे हैं. 2004 में जब उन्हें प्रधान सचिव का पद दिया गया था तब यह स्थिति नहीं थी. नायर की इस अभूतपूर्व तरक्की से वे दो लोग भी हैरान हैं जिन्होंने उन्हें पीएमओ तक पहुंचाया. इनमें पहले हैं पूर्व गृह और सुरक्षा सचिव तथा वर्तमान में जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोरा. दूसरे हैं सेंटर फॉर रिसर्च इन रूरल एेंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट (क्रिड), चंडीगढ़ के एक्जीक्यूटिव वाइस चेयरमैन रशपाल मल्होत्रा. वोरा जाना-माना नाम हैं. मल्होत्रा उतने मशहूर तो नहीं हैं मगर मनमोहन के पीएमओ पर उनका असर काफी है. आपको बता दें कि हाल तक आईआईएम, कोच्चि के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में मल्होत्रा, थॉमस और नायर, तीनों साथ-साथ थे.

2004 में कांग्रेस की अप्रत्याशित जीत के बाद जैसे ही मनमोहन सिंह को पता चला कि उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जा रहा है तो उन्होंने वोरा को अपने कार्यालय में प्रधान सचिव बनाने की इच्छा जाहिर की. ऐसा होने पर वोरा, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेएन दीक्षित और आंतरिक सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन के साथ  एक जबर्दस्त तिकड़ी बनाने वाले बन जाते. मगर ऐसा हुआ नहीं. कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व द्वारा इसमें अड़ंगा लगा दिया गया. कहा यह गया कि रक्षा सचिव के तौर पर वोरा बोफोर्स मामले में उतने मददगार साबित नहीं हुए थे. मनमोहन वोरा को तब से जानते हैं जब वे अमृतसर में लेक्चरर थे. उन्होंनेे वोरा से सुझाव मांगा. वोरा ने नायर का नाम सुझाया. नायर तब पब्लिक सेक्टर इंटरप्राइजेज बोर्ड के चेयरमैन थे और वोरा की तरह वे भी पंजाब के मुख्य सचिव रह चुके थे.

शुरुआती हफ्तों में मनमोहन के पीएमओ में वर्चस्व की लड़ाई रही. हालांकि नायर इस सब से अलग ही रहते दिखे. उनके पास न दीक्षित जैसा कद था और न ही नारायणन जैसा प्रोफाइल. हालांकि वे 1997-98 में इंद्रकुमार गुजराल की सरकार के दौरान पीएमओ में बतौर सचिव रह चुके थे लेकिन उनके पास वह विराटता नहीं आ पाई थी जो प्रधान सचिवों के नाम के साथ जुड़ी होती है. न उनके पास बृजेश मिश्रा (अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के प्रधान सचिव) जैसी रणनीतिक कुशलता थी और न ही वे एएन वर्मा (नरसिम्हा राव के प्रधान सचिव) की तरह आर्थिक नीति के पंडित थे. उनकी योग्यता बस यही थी कि उन्हें कैसे भी हालात में टिके रहना आता था.

हालांकि पीएमओ में आने के छह महीने बाद ही दीक्षित का निधन हो गया था, मगर नारायणन ने फुर्ती दिखाते हुए आंतरिक सुरक्षा और एनएसए के प्रभार मिला दिए. आईबी के पूर्व मुखिया और चतुर राजनीतिक बुद्धि वाले नारायणन अब एक तरह से सुपर प्रधान सचिव बन गए थे. सरकार और व्यवस्था कैसे काम करती है इसका उन्हें जबर्दस्त ज्ञान था और इसी की बदौलत उन्होंने खुद को मनमोहन सिंह के लिए अपरिहार्य बना लिया था.

इसके अलावा और भी लोग थे जिनका वजन ज्यादा लगता था. मनमोहन के शुरुआती दिनों में पीएमओ में दो आईएएस अधिकारी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका में थे. इनमें पहले थे बीवीआर सुब्रमण्यम जो प्रधानमंत्री के निजी सचिव थे. दूसरे पुलक चटर्जी जो प्रधानमंत्री के अतिरिक्त सचिव थे. चटर्जी पहले राजीव गांधी और फिर राजीव गांधी के नाम वाली फाउंडेशन को अपनी सेवाएं दे चुके थे. वे सोनिया गांधी के भी विश्वासपात्र थे और इस नाते कांग्रेस अध्यक्ष तक पहुंचने वाला पुल बन गए थे. सोनिया और मनमोहन के बीच तालमेल में उनकी कितनी अहमियत थी यह इससे समझा जा सकता है कि अहमद पटेल जिन्हें सोनिया का राजनीतिक एडीसी कहा जाता है, उनसे मिलने खुद साउथ ब्लॉक जाया करते थे. एक और नाम संजय बारू का है जो प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हुआ करते थे. बारू ने यह साफ कर दिया था कि उनकी जवाबदेही और वफादारी सिर्फ प्रधानमंत्री के लिए है.

2008 की गर्मियों में इन तीनों दिग्गजों ने पीएमओ को अलविदा कह दिया. चटर्जी और सुब्रमण्यम विश्व बैंक में चले गए और बारू सिंगापुर में एक थिंक टैंक को अपनी सेवाएं देने. कुछ ही महीनों बाद मुंबई पर आतंकी हमला हुआ और नारायणन सवालों के घेरे में आ गए. करीब एक साल तक ही वे बच पाए और जनवरी, 2010 में उन्हें पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाकर कोलकाता भेज दिया गया

इस तरह कुछ जगहें खाली हो गईं. उनकी जगह नये लोग आए मगर कुछ भूमिकाएं फिर भी खाली ही रहीं. नारायणन के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की जिम्मेदारी संभालने वाले शिव शंकर मेनन विदेश सेवा के पुराने तजुर्बेकार थे. उन्हें आंतरिक सुरक्षा से ज्यादा कूटनीतिक मामलों में सहजता महसूस होती थी. दूसरे जूनियर अधिकारी अभी पीएमओ में सेटल हो रहे थे. ऐसे में जो संभव था उस पर नायर ने कब्जा कर लिया. उनके सहयोगी केएम चंद्रशेखर थे. कैबिनेट सचिव के तौर पर कई सेवा विस्तार पाने वाले चंद्रशेखर भी आईएएस के केरल कैडर से आने वाले मलयाली हैं.

नायर वैसे तो पंजाब कैडर के आईएएस हैं और  राज्य के मुख्य सचिव भी रह चुके हैं पर इन दिनों पंजाब से ज्यादा केरल के उनके रिश्ते चर्चा में हैं. इन रिश्तों में व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों तरह के हैं. नायर ने केरल में भी अपने करियर का करीब एक दशक गुजारा है. वे राज्यों में नौकरशाहों की अदला-बदली के चलते 1980 के दशक में वहां गए थे. बाद में उन्होंने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति मांगी और मरीन प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी के मुखिया के तौर पर पांच साल अपनी सेवाएं दीं. कोच्चि स्थित यह संस्था वाणिज्य मंत्रालय के अधीन आती है. उनके एक परिचित का अनुमान है कि इस तजुर्बे के बाद ही सिविल सेवा में केरल से ताल्लुक रखने वाले उनके दोस्तों की संख्या पंजाब कैडर के उनके दोस्तों से ज्यादा हो गई.

एक पूर्व आईएएस अधिकारी कहते हैं, ‘मलयालियों को अनुपात से ज्यादा फायदा मिला है. यहां तक कि जब महालेखा नियंत्रक (कैग) की नियुक्ति होनी थी तो नायर को विनोद राय मिले जो मलयाली नहीं हैं मगर केरल कैडर से जरूर हैं.’ लेकिन पंजाब से नायर का ताल्लुक खत्म नहीं हुआ. मनमोहन के पीएमओ में आने के लिए उन्हें चंडीगढ़ में मौजूद अपने नेटवर्क का इस्तेमाल करना पड़ा. बताया जाता है कि वोरा के साथ अब उनका उतना संपर्क नहीं है. उनके एक जानकार कहते हैं, ‘दिल्ली में जैसा चलन है, उन्होंने भी उस सीढ़ी को लात मारना सीख लिया है जिससे वे ऊपर गए हैं.’ हालांकि मल्होत्रा से उनका अपनापा बरकरार है. मल्होत्रा का प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री आवास में आना-जाना है और वे प्रधानमंत्री के पसंदीदा हैं. पंजाब यूनिवर्सिटी में बतौर जूनियर अधिकारी करियर शुरू करने वाले मल्होत्रा कभी मनमोहन के चंडीगढ़ स्थित घर में किराएदार हुआ करते थे जो उनके ही एक परिचित के शब्दों में कारोबारी और खुफिया समुदाय के साथ अपने विकसित कए गए संबंधों के जरिए राजनीतिक उद्यमी और इंदिरा गांधी के आंख-कान बन गए. मल्होत्रा की अहम उपलब्धि रही क्रिड की स्थापना. आज यह सरकार से अच्छी-खासी रकम पाने वाला संस्थान है जिसे कांग्रेस सरकारों के शासनकाल में खूब फायदा होता रहा है. उर्दू में बीए और सियोल की सूकम्यूंग विमंस यूनिवर्सिटी से डॉक्टर की मानद उपाधि प्राप्त मल्होत्रा समाज विज्ञानी से ज्यादा राजनीति के खिलाड़ी हैं. उन्होंने मनमोहन और नायर, दोनों को ही क्रिड की गवर्निंग बॉडी में आमंत्रित किया (दोनों अब भी यहां हैं) और इस तरह दोनों को नजदीक लाए.

मल्होत्रा के दामाद डीपीएस संधू हैं. रेलवे सर्विस के अधिकारी संधू पीएमओ में निदेशक हैं. बिना अपने मूल कैडर में वापस आए सरकार के सबसे अहम दफ्तर में उन्होंने सात साल गुजार लिए हैं. और उनके ससुर के अलावा नायर का भी इसमें योगदान है. हाल के महीनों में संधू ने मीडिया को साधने का काम शुरू किया है और वे प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे को बाइपास कर रहे हैं. एक ऐसा पीएमओ जिसका असमंजस लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है, के इस दोहरे रवैये का श्रेय भी नायर को ही जाता है.
नौकरशाह के रूप में नायर न तो राजनीतिक रूप से इतने वजनदार हैं जितने बृजेश मिश्रा थे या एमके नारायणन या फिर एनके सिंह. लेकिन उन्होंने पीएमओ की ट्रांसफर, पोस्टिंग और प्रमोशन करने की क्षमताओं को काफी हद तक साध लिया है. जिससे नौकरशाही में उनका कद खूब बढ़ा. अगर उनका थॉमस वाला दांव भी सीधा पड़ जाता तो सीवीसी की कुर्सी पर भी उनका ही उम्मीदवार नजर आता.  कुल मिलाकर    

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पीजे थॉमस किसके उम्मीदवार हैं? उत्सुकता मिश्रित यह सवाल दिल्ली की सत्ता के गलियारों में तभी से उछलने लगा था जब सितंबर, 2010 में विवादास्पद परिस्थितियों में उनकी मुख्य सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) के पद पर नियुक्ति हुई थी. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनकी नियुक्ति रद्द किए जाने के बाद इस सवाल ने एक नयी अहमियत अख्तियार कर ली है. कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं. कुछ का कहना है कि थॉमस या फिर उनकी पत्नी केरल से ताल्लुक रखने वाले एक कांग्रेसी नेता के रिश्तेदार हैं. कुछ दूसरों का इशारा पहले राजीव और फिर सोनिया गांधी के निजी स्टाफ में शामिल रह चुके गांधी परिवार के एक विश्वासपात्र के साथ थॉमस के कथित संबंधों की तरफ है.

का दबाव’ होने का मुद्दा उसमें भी उठा. माना जाता है कि प्रधानमंत्री ने पहले-पहल अपना बचाव कुछ इसी तर्ज पर करने की कोशिश भी की. सूत्र बताते हैं कि इस पर प्रधानमंत्री से कहा गया कि वे स्पष्ट तौर पर बताएं कि कांग्रेस में किसने थॉमस की दावेदारी को आगे बढ़ाया था. उनसे कहा गया कि इसकी बजाय उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में अपने इर्द-गिर्द के लोगों पर भी ध्यान देना चाहिए. देवास-इसरो समझौते से लेकर थॉमस की नियुक्ति तक पर सरकार की जैसी किरकिरी हुई है उससे प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रति कांग्रेस के शीर्ष नेताओं का असंतोष बढ़ता ही जा रहा है.

सवाल कई हैं. पीएओ को आखिर चलाता कौन है? नौकरशाही के अलग-अलग हलकों में कुछ मजाक और कुछ तंज के साथ कही जाने वाली इस बात में कितना वजन है कि यूपीए के राज में मल्लुओं (मलयाली यानी केरल निवासी) की मौज है. क्या वास्तव में कोई केरल लॉबी है जो चुपचाप यूपीए सरकार के दिमाग के तौर पर काम कर रही है?

ये सारे सवाल एक ही शख्स की तरफ इशारा करते हैं और वह शख्स है टीकेए नायर. पीएमओ में प्रधान सचिव नायर पर ही थॉमस का मददगार और देवास का संरक्षक होने के आरोप लग रहे हैं. कुछ अपनी काबिलियत और कुछ परिस्थितियों की वजह से नायर पीएमओ में मौजूद सबसे ताकतवर व्यक्ति के रूप में उभरे हैं. 2004 में जब उन्हें प्रधान सचिव का पद दिया गया था तब यह स्थिति नहीं थी. नायर की इस अभूतपूर्व तरक्की से वे दो लोग भी हैरान हैं जिन्होंने उन्हें पीएमओ तक पहुंचाया. इनमें पहले हैं पूर्व गृह और सुरक्षा सचिव तथा वर्तमान में जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोरा. दूसरे हैं सेंटर फॉर रिसर्च इन रूरल एेंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट (क्रिड), चंडीगढ़ के एक्जीक्यूटिव वाइस चेयरमैन रशपाल मल्होत्रा. वोरा जाना-माना नाम हैं. मल्होत्रा उतने मशहूर तो नहीं हैं मगर मनमोहन के पीएमओ पर उनका असर काफी है. आपको बता दें कि हाल तक आईआईएम, कोच्चि के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में मल्होत्रा, थॉमस और नायर, तीनों साथ-साथ थे.

2004 में कांग्रेस की अप्रत्याशित जीत के बाद जैसे ही मनमोहन सिंह को पता चला कि उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जा रहा है तो उन्होंने वोरा को अपने कार्यालय में प्रधान सचिव बनाने की इच्छा जाहिर की. ऐसा होने पर वोरा, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेएन दीक्षित और आंतरिक सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन के साथ  एक जबर्दस्त तिकड़ी बनाने वाले बन जाते. मगर ऐसा हुआ नहीं. कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व द्वारा इसमें अड़ंगा लगा दिया गया. कहा यह गया कि रक्षा सचिव के तौर पर वोरा बोफोर्स मामले में उतने मददगार साबित नहीं हुए थे. मनमोहन वोरा को तब से जानते हैं जब वे अमृतसर में लेक्चरर थे. उन्होंनेे वोरा से सुझाव मांगा. वोरा ने नायर का नाम सुझाया. नायर तब पब्लिक सेक्टर इंटरप्राइजेज बोर्ड के चेयरमैन थे और वोरा की तरह वे भी पंजाब के मुख्य सचिव रह चुके थे.

शुरुआती हफ्तों में मनमोहन के पीएमओ में वर्चस्व की लड़ाई रही. हालांकि नायर इस सब से अलग ही रहते दिखे. उनके पास न दीक्षित जैसा कद था और न ही नारायणन जैसा प्रोफाइल. हालांकि वे 1997-98 में इंद्रकुमार गुजराल की सरकार के दौरान पीएमओ में बतौर सचिव रह चुके थे लेकिन उनके पास वह विराटता नहीं आ पाई थी जो प्रधान सचिवों के नाम के साथ जुड़ी होती है. न उनके पास बृजेश मिश्रा (अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के प्रधान सचिव) जैसी रणनीतिक कुशलता थी और न ही वे एएन वर्मा (नरसिम्हा राव के प्रधान सचिव) की तरह आर्थिक नीति के पंडित थे. उनकी योग्यता बस यही थी कि उन्हें कैसे भी हालात में टिके रहना आता था.

हालांकि पीएमओ में आने के छह महीने बाद ही दीक्षित का निधन हो गया था, मगर नारायणन ने फुर्ती दिखाते हुए आंतरिक सुरक्षा और एनएसए के प्रभार मिला दिए. आईबी के पूर्व मुखिया और चतुर राजनीतिक बुद्धि वाले नारायणन अब एक तरह से सुपर प्रधान सचिव बन गए थे. सरकार और व्यवस्था कैसे काम करती है इसका उन्हें जबर्दस्त ज्ञान था और इसी की बदौलत उन्होंने खुद को मनमोहन सिंह के लिए अपरिहार्य बना लिया था.

इसके अलावा और भी लोग थे जिनका वजन ज्यादा लगता था. मनमोहन के शुरुआती दिनों में पीएमओ में दो आईएएस अधिकारी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका में थे. इनमें पहले थे बीवीआर सुब्रमण्यम जो प्रधानमंत्री के निजी सचिव थे. दूसरे पुलक चटर्जी जो प्रधानमंत्री के अतिरिक्त सचिव थे. चटर्जी पहले राजीव गांधी और फिर राजीव गांधी के नाम वाली फाउंडेशन को अपनी सेवाएं दे चुके थे. वे सोनिया गांधी के भी विश्वासपात्र थे और इस नाते कांग्रेस अध्यक्ष तक पहुंचने वाला पुल बन गए थे. सोनिया और मनमोहन के बीच तालमेल में उनकी कितनी अहमियत थी यह इससे समझा जा सकता है कि अहमद पटेल जिन्हें सोनिया का राजनीतिक एडीसी कहा जाता है, उनसे मिलने खुद साउथ ब्लॉक जाया करते थे. एक और नाम संजय बारू का है जो प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हुआ करते थे. बारू ने यह साफ कर दिया था कि उनकी जवाबदेही और वफादारी सिर्फ प्रधानमंत्री के लिए है.

2008 की गर्मियों में इन तीनों दिग्गजों ने पीएमओ को अलविदा कह दिया. चटर्जी और सुब्रमण्यम विश्व बैंक में चले गए और बारू सिंगापुर में एक थिंक टैंक को अपनी सेवाएं देने. कुछ ही महीनों बाद मुंबई पर आतंकी हमला हुआ और नारायणन सवालों के घेरे में आ गए. करीब एक साल तक ही वे बच पाए और जनवरी, 2010 में उन्हें पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाकर कोलकाता भेज दिया गया

इस तरह कुछ जगहें खाली हो गईं. उनकी जगह नये लोग आए मगर कुछ भूमिकाएं फिर भी खाली ही रहीं. नारायणन के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की जिम्मेदारी संभालने वाले शिव शंकर मेनन विदेश सेवा के पुराने तजुर्बेकार थे. उन्हें आंतरिक सुरक्षा से ज्यादा कूटनीतिक मामलों में सहजता महसूस होती थी. दूसरे जूनियर अधिकारी अभी पीएमओ में सेटल हो रहे थे. ऐसे में जो संभव था उस पर नायर ने कब्जा कर लिया. उनके सहयोगी केएम चंद्रशेखर थे. कैबिनेट सचिव के तौर पर कई सेवा विस्तार पाने वाले चंद्रशेखर भी आईएएस के केरल कैडर से आने वाले मलयाली हैं.

नायर वैसे तो पंजाब कैडर के आईएएस हैं और  राज्य के मुख्य सचिव भी रह चुके हैं पर इन दिनों पंजाब से ज्यादा केरल के उनके रिश्ते चर्चा में हैं. इन रिश्तों में व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों तरह के हैं. नायर ने केरल में भी अपने करियर का करीब एक दशक गुजारा है. वे राज्यों में नौकरशाहों की अदला-बदली के चलते 1980 के दशक में वहां गए थे. बाद में उन्होंने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति मांगी और मरीन प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी के मुखिया के तौर पर पांच साल अपनी सेवाएं दीं. कोच्चि स्थित यह संस्था वाणिज्य मंत्रालय के अधीन आती है. उनके एक परिचित का अनुमान है कि इस तजुर्बे के बाद ही सिविल सेवा में केरल से ताल्लुक रखने वाले उनके दोस्तों की संख्या पंजाब कैडर के उनके दोस्तों से ज्यादा हो गई.

एक पूर्व आईएएस अधिकारी कहते हैं, ‘मलयालियों को अनुपात से ज्यादा फायदा मिला है. यहां तक कि जब महालेखा नियंत्रक (कैग) की नियुक्ति होनी थी तो नायर को विनोद राय मिले जो मलयाली नहीं हैं मगर केरल कैडर से जरूर हैं.’ लेकिन पंजाब से नायर का ताल्लुक खत्म नहीं हुआ. मनमोहन के पीएमओ में आने के लिए उन्हें चंडीगढ़ में मौजूद अपने नेटवर्क का इस्तेमाल करना पड़ा. बताया जाता है कि वोरा के साथ अब उनका उतना संपर्क नहीं है. उनके एक जानकार कहते हैं, ‘दिल्ली में जैसा चलन है, उन्होंने भी उस सीढ़ी को लात मारना सीख लिया है जिससे वे ऊपर गए हैं.’ हालांकि मल्होत्रा से उनका अपनापा बरकरार है. मल्होत्रा का प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री आवास में आना-जाना है और वे प्रधानमंत्री के पसंदीदा हैं. पंजाब यूनिवर्सिटी में बतौर जूनियर अधिकारी करियर शुरू करने वाले मल्होत्रा कभी मनमोहन के चंडीगढ़ स्थित घर में किराएदार हुआ करते थे जो उनके ही एक परिचित के शब्दों में कारोबारी और खुफिया समुदाय के साथ अपने विकसित कए गए संबंधों के जरिए राजनीतिक उद्यमी और इंदिरा गांधी के आंख-कान बन गए. मल्होत्रा की अहम उपलब्धि रही क्रिड की स्थापना. आज यह सरकार से अच्छी-खासी रकम पाने वाला संस्थान है जिसे कांग्रेस सरकारों के शासनकाल में खूब फायदा होता रहा है. उर्दू में बीए और सियोल की सूकम्यूंग विमंस यूनिवर्सिटी से डॉक्टर की मानद उपाधि प्राप्त मल्होत्रा समाज विज्ञानी से ज्यादा राजनीति के खिलाड़ी हैं. उन्होंने मनमोहन और नायर, दोनों को ही क्रिड की गवर्निंग बॉडी में आमंत्रित किया (दोनों अब भी यहां हैं) और इस तरह दोनों को नजदीक लाए.

मल्होत्रा के दामाद डीपीएस संधू हैं. रेलवे सर्विस के अधिकारी संधू पीएमओ में निदेशक हैं. बिना अपने मूल कैडर में वापस आए सरकार के सबसे अहम दफ्तर में उन्होंने सात साल गुजार लिए हैं. और उनके ससुर के अलावा नायर का भी इसमें योगदान है. हाल के महीनों में संधू ने मीडिया को साधने का काम शुरू किया है और वे प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे को बाइपास कर रहे हैं. एक ऐसा पीएमओ जिसका असमंजस लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है, के इस दोहरे रवैये का श्रेय भी नायर को ही जाता है.
नौकरशाह के रूप में नायर न तो राजनीतिक रूप से इतने वजनदार हैं जितने बृजेश मिश्रा थे या एमके नारायणन या फिर एनके सिंह. लेकिन उन्होंने पीएमओ की ट्रांसफर, पोस्टिंग और प्रमोशन करने की क्षमताओं को काफी हद तक साध लिया है. जिससे नौकरशाही में उनका कद खूब बढ़ा. अगर उनका थॉमस वाला दांव भी सीधा पड़ जाता तो सीवीसी की कुर्सी पर भी उनका ही उम्मीदवार नजर आता.  कुल मिलाकर    

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पीजे थॉमस किसके उम्मीदवार हैं? उत्सुकता मिश्रित यह सवाल दिल्ली की सत्ता के गलियारों में तभी से उछलने लगा था जब सितंबर, 2010 में विवादास्पद परिस्थितियों में उनकी मुख्य सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) के पद पर नियुक्ति हुई थी. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनकी नियुक्ति रद्द किए जाने के बाद इस सवाल ने एक नयी अहमियत अख्तियार कर ली है. कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं. कुछ का कहना है कि थॉमस या फिर उनकी पत्नी केरल से ताल्लुक रखने वाले एक कांग्रेसी नेता के रिश्तेदार हैं. कुछ दूसरों का इशारा पहले राजीव और फिर सोनिया गांधी के निजी स्टाफ में शामिल रह चुके गांधी परिवार के एक विश्वासपात्र के साथ थॉमस के कथित संबंधों की तरफ है.

का दबाव’ होने का मुद्दा उसमें भी उठा. माना जाता है कि प्रधानमंत्री ने पहले-पहल अपना बचाव कुछ इसी तर्ज पर करने की कोशिश भी की. सूत्र बताते हैं कि इस पर प्रधानमंत्री से कहा गया कि वे स्पष्ट तौर पर बताएं कि कांग्रेस में किसने थॉमस की दावेदारी को आगे बढ़ाया था. उनसे कहा गया कि इसकी बजाय उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में अपने इर्द-गिर्द के लोगों पर भी ध्यान देना चाहिए. देवास-इसरो समझौते से लेकर थॉमस की नियुक्ति तक पर सरकार की जैसी किरकिरी हुई है उससे प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रति कांग्रेस के शीर्ष नेताओं का असंतोष बढ़ता ही जा रहा है.

सवाल कई हैं. पीएओ को आखिर चलाता कौन है? नौकरशाही के अलग-अलग हलकों में कुछ मजाक और कुछ तंज के साथ कही जाने वाली इस बात में कितना वजन है कि यूपीए के राज में मल्लुओं (मलयाली यानी केरल निवासी) की मौज है. क्या वास्तव में कोई केरल लॉबी है जो चुपचाप यूपीए सरकार के दिमाग के तौर पर काम कर रही है?

ये सारे सवाल एक ही शख्स की तरफ इशारा करते हैं और वह शख्स है टीकेए नायर. पीएमओ में प्रधान सचिव नायर पर ही थॉमस का मददगार और देवास का संरक्षक होने के आरोप लग रहे हैं. कुछ अपनी काबिलियत और कुछ परिस्थितियों की वजह से नायर पीएमओ में मौजूद सबसे ताकतवर व्यक्ति के रूप में उभरे हैं. 2004 में जब उन्हें प्रधान सचिव का पद दिया गया था तब यह स्थिति नहीं थी. नायर की इस अभूतपूर्व तरक्की से वे दो लोग भी हैरान हैं जिन्होंने उन्हें पीएमओ तक पहुंचाया. इनमें पहले हैं पूर्व गृह और सुरक्षा सचिव तथा वर्तमान में जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोरा. दूसरे हैं सेंटर फॉर रिसर्च इन रूरल एेंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट (क्रिड), चंडीगढ़ के एक्जीक्यूटिव वाइस चेयरमैन रशपाल मल्होत्रा. वोरा जाना-माना नाम हैं. मल्होत्रा उतने मशहूर तो नहीं हैं मगर मनमोहन के पीएमओ पर उनका असर काफी है. आपको बता दें कि हाल तक आईआईएम, कोच्चि के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में मल्होत्रा, थॉमस और नायर, तीनों साथ-साथ थे.

2004 में कांग्रेस की अप्रत्याशित जीत के बाद जैसे ही मनमोहन सिंह को पता चला कि उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जा रहा है तो उन्होंने वोरा को अपने कार्यालय में प्रधान सचिव बनाने की इच्छा जाहिर की. ऐसा होने पर वोरा, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेएन दीक्षित और आंतरिक सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन के साथ  एक जबर्दस्त तिकड़ी बनाने वाले बन जाते. मगर ऐसा हुआ नहीं. कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व द्वारा इसमें अड़ंगा लगा दिया गया. कहा यह गया कि रक्षा सचिव के तौर पर वोरा बोफोर्स मामले में उतने मददगार साबित नहीं हुए थे. मनमोहन वोरा को तब से जानते हैं जब वे अमृतसर में लेक्चरर थे. उन्होंनेे वोरा से सुझाव मांगा. वोरा ने नायर का नाम सुझाया. नायर तब पब्लिक सेक्टर इंटरप्राइजेज बोर्ड के चेयरमैन थे और वोरा की तरह वे भी पंजाब के मुख्य सचिव रह चुके थे.

शुरुआती हफ्तों में मनमोहन के पीएमओ में वर्चस्व की लड़ाई रही. हालांकि नायर इस सब से अलग ही रहते दिखे. उनके पास न दीक्षित जैसा कद था और न ही नारायणन जैसा प्रोफाइल. हालांकि वे 1997-98 में इंद्रकुमार गुजराल की सरकार के दौरान पीएमओ में बतौर सचिव रह चुके थे लेकिन उनके पास वह विराटता नहीं आ पाई थी जो प्रधान सचिवों के नाम के साथ जुड़ी होती है. न उनके पास बृजेश मिश्रा (अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के प्रधान सचिव) जैसी रणनीतिक कुशलता थी और न ही वे एएन वर्मा (नरसिम्हा राव के प्रधान सचिव) की तरह आर्थिक नीति के पंडित थे. उनकी योग्यता बस यही थी कि उन्हें कैसे भी हालात में टिके रहना आता था.

हालांकि पीएमओ में आने के छह महीने बाद ही दीक्षित का निधन हो गया था, मगर नारायणन ने फुर्ती दिखाते हुए आंतरिक सुरक्षा और एनएसए के प्रभार मिला दिए. आईबी के पूर्व मुखिया और चतुर राजनीतिक बुद्धि वाले नारायणन अब एक तरह से सुपर प्रधान सचिव बन गए थे. सरकार और व्यवस्था कैसे काम करती है इसका उन्हें जबर्दस्त ज्ञान था और इसी की बदौलत उन्होंने खुद को मनमोहन सिंह के लिए अपरिहार्य बना लिया था.

इसके अलावा और भी लोग थे जिनका वजन ज्यादा लगता था. मनमोहन के शुरुआती दिनों में पीएमओ में दो आईएएस अधिकारी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका में थे. इनमें पहले थे बीवीआर सुब्रमण्यम जो प्रधानमंत्री के निजी सचिव थे. दूसरे पुलक चटर्जी जो प्रधानमंत्री के अतिरिक्त सचिव थे. चटर्जी पहले राजीव गांधी और फिर राजीव गांधी के नाम वाली फाउंडेशन को अपनी सेवाएं दे चुके थे. वे सोनिया गांधी के भी विश्वासपात्र थे और इस नाते कांग्रेस अध्यक्ष तक पहुंचने वाला पुल बन गए थे. सोनिया और मनमोहन के बीच तालमेल में उनकी कितनी अहमियत थी यह इससे समझा जा सकता है कि अहमद पटेल जिन्हें सोनिया का राजनीतिक एडीसी कहा जाता है, उनसे मिलने खुद साउथ ब्लॉक जाया करते थे. एक और नाम संजय बारू का है जो प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हुआ करते थे. बारू ने यह साफ कर दिया था कि उनकी जवाबदेही और वफादारी सिर्फ प्रधानमंत्री के लिए है.

2008 की गर्मियों में इन तीनों दिग्गजों ने पीएमओ को अलविदा कह दिया. चटर्जी और सुब्रमण्यम विश्व बैंक में चले गए और बारू सिंगापुर में एक थिंक टैंक को अपनी सेवाएं देने. कुछ ही महीनों बाद मुंबई पर आतंकी हमला हुआ और नारायणन सवालों के घेरे में आ गए. करीब एक साल तक ही वे बच पाए और जनवरी, 2010 में उन्हें पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाकर कोलकाता भेज दिया गया

इस तरह कुछ जगहें खाली हो गईं. उनकी जगह नये लोग आए मगर कुछ भूमिकाएं फिर भी खाली ही रहीं. नारायणन के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की जिम्मेदारी संभालने वाले शिव शंकर मेनन विदेश सेवा के पुराने तजुर्बेकार थे. उन्हें आंतरिक सुरक्षा से ज्यादा कूटनीतिक मामलों में सहजता महसूस होती थी. दूसरे जूनियर अधिकारी अभी पीएमओ में सेटल हो रहे थे. ऐसे में जो संभव था उस पर नायर ने कब्जा कर लिया. उनके सहयोगी केएम चंद्रशेखर थे. कैबिनेट सचिव के तौर पर कई सेवा विस्तार पाने वाले चंद्रशेखर भी आईएएस के केरल कैडर से आने वाले मलयाली हैं.

नायर वैसे तो पंजाब कैडर के आईएएस हैं और  राज्य के मुख्य सचिव भी रह चुके हैं पर इन दिनों पंजाब से ज्यादा केरल के उनके रिश्ते चर्चा में हैं. इन रिश्तों में व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों तरह के हैं. नायर ने केरल में भी अपने करियर का करीब एक दशक गुजारा है. वे राज्यों में नौकरशाहों की अदला-बदली के चलते 1980 के दशक में वहां गए थे. बाद में उन्होंने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति मांगी और मरीन प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी के मुखिया के तौर पर पांच साल अपनी सेवाएं दीं. कोच्चि स्थित यह संस्था वाणिज्य मंत्रालय के अधीन आती है. उनके एक परिचित का अनुमान है कि इस तजुर्बे के बाद ही सिविल सेवा में केरल से ताल्लुक रखने वाले उनके दोस्तों की संख्या पंजाब कैडर के उनके दोस्तों से ज्यादा हो गई.

एक पूर्व आईएएस अधिकारी कहते हैं, ‘मलयालियों को अनुपात से ज्यादा फायदा मिला है. यहां तक कि जब महालेखा नियंत्रक (कैग) की नियुक्ति होनी थी तो नायर को विनोद राय मिले जो मलयाली नहीं हैं मगर केरल कैडर से जरूर हैं.’ लेकिन पंजाब से नायर का ताल्लुक खत्म नहीं हुआ. मनमोहन के पीएमओ में आने के लिए उन्हें चंडीगढ़ में मौजूद अपने नेटवर्क का इस्तेमाल करना पड़ा. बताया जाता है कि वोरा के साथ अब उनका उतना संपर्क नहीं है. उनके एक जानकार कहते हैं, ‘दिल्ली में जैसा चलन है, उन्होंने भी उस सीढ़ी को लात मारना सीख लिया है जिससे वे ऊपर गए हैं.’ हालांकि मल्होत्रा से उनका अपनापा बरकरार है. मल्होत्रा का प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री आवास में आना-जाना है और वे प्रधानमंत्री के पसंदीदा हैं. पंजाब यूनिवर्सिटी में बतौर जूनियर अधिकारी करियर शुरू करने वाले मल्होत्रा कभी मनमोहन के चंडीगढ़ स्थित घर में किराएदार हुआ करते थे जो उनके ही एक परिचित के शब्दों में कारोबारी और खुफिया समुदाय के साथ अपने विकसित कए गए संबंधों के जरिए राजनीतिक उद्यमी और इंदिरा गांधी के आंख-कान बन गए. मल्होत्रा की अहम उपलब्धि रही क्रिड की स्थापना. आज यह सरकार से अच्छी-खासी रकम पाने वाला संस्थान है जिसे कांग्रेस सरकारों के शासनकाल में खूब फायदा होता रहा है. उर्दू में बीए और सियोल की सूकम्यूंग विमंस यूनिवर्सिटी से डॉक्टर की मानद उपाधि प्राप्त मल्होत्रा समाज विज्ञानी से ज्यादा राजनीति के खिलाड़ी हैं. उन्होंने मनमोहन और नायर, दोनों को ही क्रिड की गवर्निंग बॉडी में आमंत्रित किया (दोनों अब भी यहां हैं) और इस तरह दोनों को नजदीक लाए.

मजबूरी का मौन

प्रेस वार्ता या…

घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी यूपीए सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह ने आखिरकार पिछले महीने अपनी लंबी चुप्पी तोड़ने का फैसला किया. वैसे एक सक्रिय और गतिशील लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही के नाते प्रधानमंत्री की चुप्पी हैरान करने वाली थी. निश्चय ही, उन्हें और उनके सलाहकारों को एहसास होने लगा था कि उनकी चुप्पी और सवालों से बचने की कोशिश उनकी छवि धूमिल कर रही है. नतीजा, घोटालों और भ्रष्टाचार पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने और एक तरह से सफाई देने के लिए प्रधानमंत्री ने समाचार चैनलों के मंच को चुना और एक दर्जन से अधिक संपादकों को मिलने के लिए बुलाया.

हालांकि यह एक संवाददाता सम्मेलन की तर्ज का आयोजन था, लेकिन असल में संवाददाता सम्मेलन नहीं था क्योंकि इसमें चैनलों के रिपोर्टर नहीं बल्कि चुने हुए संपादक बुलाए गए थे. यह असल संवाददाता सम्मेलन इसलिए भी नहीं था कि एक खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस की सरगर्मी के उलट यहां सवाल-जवाब की पूरी प्रक्रिया बहुत ‘सैनिटाइज्ड,’ ‘मैनेज्ड’ और मशीनी थी. सभी संपादकों को प्रधानमंत्री से बारी-बारी से सवाल करने का मौका दिया गया. सभी संपादक अपनी पसंद, मर्जी और कुछ अपने चैनल के दर्शक समूह के मुताबिक सवाल पूछने में लगे रहे. इस कारण, सवाल-जवाब का कोई फोकस नहीं बन पाया.

यह प्रधानमंत्री और संपादकों की कोई व्यक्तिगत मुलाकात नहीं थी और न ही वे प्रधानमंत्री से मित्रता की वजह से वहां बुलाए गए थे

यही नहीं, संपादकों को पूरक प्रश्न करने या बारी तोड़कर प्रधानमंत्री के जवाब में से सवाल करने का मौका नहीं दिया गया. ‘टाइम्स नाउ’ के अर्णब गोस्वामी ने कोशिश भी की तो उन्हें प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार ने लगभग डपटते हुए चुप करा दिया. हैरानी की बात है कि किसी भी संपादक ने इसका विरोध नहीं किया और न ही किसी और ने ऐसी कोशिश की. अधिकतर सवाल रूटीन किस्म के और हल्के-फुल्के थे. कुछ सवाल लल्लो-चप्पो वाले थे.

पूरा देश इसका लाइव प्रसारण देख रहा था. लोग हैरान थे कि जो संपादक-एंकर अपने चैनलों पर राजनेताओं की खिंचाई और धुलाई के लिए मशहूर हैं वे यहां अनुशासित बच्चों की तरह कैसे व्यवहार कर रहे हैं. ऐसा नहीं है कि संपादकों ने प्रधानमंत्री से असुविधाजनक और तीखे सवाल नहीं किए लेकिन कुल मिलाकर, एक घंटे से अधिक का ‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’ जैसा यह कार्यक्रम वास्तव में पीआर कॉन्फ्रेंस बन गया, जहां प्रधानमंत्री भी पीआर कर रहे थे और संपादक भी. यह और बात है कि प्रधानमंत्री इतनी नियंत्रित, प्रबंधित और संकुचित प्रेस कॉन्फ्रेंस का वैसा लाभ नहीं उठा पाए जैसा उनके सलाहकार चाहते थे.

इस कॉन्फ्रेंस से जितने सवालों का जवाब मिला, उससे ज्यादा सवाल पैदा हुए. 2जी से लेकर देवास डील तक पर प्रधानमंत्री की सफाई से शायद ही कोई संतुष्ट हुआ हो. लोगों को इससे भी निराशा हुई कि संपादकों को खुलकर सवाल-जवाब क्यों नहीं करने दिया गया. हालांकि कहना मुश्किल है कि अगर यह मौका मिलता भी तो कितने संपादक इसका लाभ उठाने के लिए तैयार थे. लेकिन कम से कम प्रधानमंत्री को यह दावा करने का मौका मिल सकता था कि उन्होंने खुद को ईमानदारी से हर तरह के सवाल के लिए पेश किया. इस मायने में यह ‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’ प्रधानमंत्री की पीआर मशीनरी के मकसद को पूरा करने में नाकाम रही. लेकिन इसकी वजह चैनल और उनके संपादक कम थे. उन्होंने तो अपने तईं प्रधानमंत्री और उनकी मशीनरी की पूरी मदद की. कुछ को छोड़कर अधिकांश संपादक प्रधानमंत्री के निमंत्रण से अभिभूत थे. नतीजा, उन्होंने मनमोहन सिंह से वही सवाल किए जिनकी अपेक्षा उनकी पीआर मशीनरी ने की थी. यही नहीं, कुछ सवाल इतने ‘फ्रेंडली’ थे कि लगता था जैसे उन्हें पहले से तय करवाया गया है. सजे-धजे संपादक जिस नफासत और दोस्ताना तरीके से सवाल करने का कोरम पूरा कर रहे थे, उससे लग रहा था कि जैसे यह ‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’ सरकार की किसी बड़ी उपलब्धि की घोषणा के लिए बुलाई गई है. हालांकि प्रधानमंत्री से क्या सवाल करना है, यह तय करने का अधिकार संपादकों को है, लेकिन कुछ अधिकार दर्शकों का भी है. यह प्रधानमंत्री और संपादकों की व्यक्तिगत मुलाकात नहीं थी और न ही वे प्रधानमंत्री से मित्रता की वजह से वहां बुलाए गए थे. उन्हें वहां इसलिए बुलाया गया था कि प्रधानमंत्री उनके माध्यम से देश को उन सवालों के जवाब देना चाहते थे जो पिछले कई महीनों से लोगों के मन में हैं. जाहिर है कि संपादक अपने दर्शकों के प्रतिनिधि के बतौर वहां बुलाए गए थे. ऐसे में उनसे यह अपेक्षा थी कि वे प्रधानमंत्री से वे सवाल जरूर करेंगे जो अगर उनके दर्शकों को सीधा मौका मिलता तो करते. लेकिन ऐसे सवाल बहुत कम किए गए. असल में, यह ‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’ जिस तरह से आयोजित की गई, उसमें ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि चैनलों और उनके संपादकों ने प्रधानमंत्री की पीआर मशीनरी को खुद को इस्तेमाल करने का मौका क्यों दिया. दूसरे, अगर प्रधानमंत्री को इसी तरीके से सवालों का जवाब देना था तो बेहतर होता कि वे दूरदर्शन/डीडी न्यूज पर राष्ट्र के नाम संदेश पढ़ देते. इसके लिए इस तामझाम की जरूरत क्या थी?

आश्चर्य नहीं कि इस बेमानी पीआर कसरत से प्रधानमंत्री और न्यूज चैनलों के संपादकों दोनों की साख को धक्का लगा है. कहीं दूर खड़ी नीरा राडिया जरूर मुस्कुरा रही होंगी.

न युद्ध, न शांति

चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ इसी महीने भारत आ रहे हैं. इसी दौरान दोनों देशों के तनाव-भरे कूटनीतिक संबंधों को भी 60 साल होने जा रहे हैं. चीन की नई मुखरता कूटनीतिज्ञों, नेताओं और सैन्य रणनीतिकारों को हैरान कर रही है. चीनी मामलों के जानकार और हाल में रॉ से रिटायर हुए भास्कर रॉय कहते हैं, ‘पश्चिमी सेक्टर में स्थित लद्दाख की पैंगोंग सो झील के पास चीन का नियंत्रण लगातार बढ़ता गया है. भारतीय सेना ने सरकार को सूचना दी है कि चीनी और भी ज्यादा जमीन पर अपना दावा कर रहे हैं.’

सरकार में कोई यह बात मानने को तैयार नहीं होगा मगर यह सच है कि दो साल पहले भारत के सैन्य बलों ने चीन से खतरे का स्तर ‘लो’ से बढ़ाकर ‘मीडियम’ कर दिया है. आधिकारिक रूप से चीन का रक्षा बजट 70 अरब डॉलर है, मगर पेंटागन का मानना है कि यह 150 अरब डॉलर से कम नहीं. उधर, भारत का रक्षा खर्च पेंटागन के आंकड़े का पांचवां हिस्सा ही है.

हालांकि इतने भारी-भरकम खर्च के बावजूद इसकी संभावना कम ही है कि परमाणु हथियारों से लैस भारत और चीन युद्ध लड़ेंगे. ऐसा इसलिए कि दोनों में से कोई भी 21वीं सदी में दुनिया की अगुआई करने का अवसर खोना नहीं चाहता. यानी दांव पर बहुत कुछ है.

फिर भी बीजिंग और नई दिल्ली की सैन्य गतिविधियां बताती हैं कि पूर्वी सेक्टर यानी अरुणाचल प्रदेश और पश्चिमी सेक्टर यानी लद्दाख में दोनों देश टकराव की तैयारी कर रहे हैं. हालांकि इसके भी किसी युद्ध में तब्दील होने की संभावना कम ही दिखती है.

लद्दाख में पीएलए की बढ़ती घुसपैठ बताती है कि कश्मीर मुद्दे पर चीन ने अपना रुख बदल लिया है

लद्दाख का सीमावर्ती इलाका किसी उल्टी हथेली की तरह है. पिछले चार दशकों में चीन ने इस हथेली से निकलने वाली तीन उंगलियों पर कब्जा कर लिया है. दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर ईस्ट एशियन स्टडीज के चेयरमैन श्रीकांत कोंडपल्ली बताते हैं, ‘अब वे (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ऑफ चाइना या पीएलए) चौथी उंगली की तरफ बढ़ रहे हैं जिसे ट्रिगोनोमेट्रिक हाइट्स या ट्रिग हाइट्स कहा जाता है. सबसे ज्यादा घुसपैठ इसी इलाके में हो रही है.’

लद्दाख में हो रही इस चीनी घुसपैठ पर यूपीए सरकार का रवैया लगातार ठंडा रहा है. सितंबर, 2009 में खबरें आई थीं कि चीन ने लेह के पूर्व में चुमार सेक्टर में स्थित जुलुंग ला इलाके में घुसपैठ की है. यह इलाका लद्दाख, स्पीति और तिब्बत को जोड़ता है. अरुणाचल पर चीन के दावे को सुर्खियां मिलती हैं, मगर वास्तव में भारतीय और चीनी सेनाएं पश्चिमी सेक्टर में लगातार एक-दूसरे को मात देने का खेल खेल रही हैं.

कोंडपल्ली कहते हैं, ‘पैंगोंग सो झील का दो तिहाई हिस्सा उनके नियंत्रण में है. खबरें हैं कि चीनी वहां तोपखाना और गश्ती नौकाएं ले आए हैं. वे आक्रामकता के साथ झील में गश्त लगाते हैं. चीनी मीडिया में तो एक पनडुब्बी की तैनाती तक की रिपोर्ट है. भारतीय सैनिकों के पास झील के एक तिहाई हिस्से पर अपना प्रभावपूर्ण प्रभुत्व जताने के साधन ही नहीं हैं. हम ज्यादा गश्त नहीं कर सकते क्योंकि हमारे सैनिकों के पास गश्ती नौकाएं ही नहीं हैं.’

पीएलए धीरे-धीरे पश्चिमी सेक्टर में समर लुंगपा क्षेत्र पर अपना दावा मजबूत कर रही है. चीनियों के अनुसार, वास्तविक नियंत्रण रेखा समर लुंगपा, काराकोरम दर्रे और छिपछाप नदी के बीच अंकित क्षेत्र के दक्षिण में है. लेकिन भारत का आधिकारिक रुख पहले जैसा ही है.  भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के डायरेक्टर जनरल आरके भाटिया ने नवंबर के पहले हफ्ते में एक बयान देते हुए कहा, ‘हमारे पास सीमाओं पर किसी भी घुसपैठ की कोई रिपोर्ट नहीं है. सीमाओं पर शांति है.’

कोंडपल्ली कहते हैं,’चीन से जुड़े कोई भी आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए गए हैं. राष्ट्रीय अभिलेखागार में जाइए और चीन संबंधी किसी भी दस्तावेज के बारे में पूछिए तो आपको चुप्पी के अलावा कुछ नहीं मिलेगा.’ भारत के कानून के मुताबिक 50 साल के बाद गोपनीय आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक किए जा सकते हैं. लेकिन चीन से संबंधित दस्तावेज 1914 के बाद से सार्वजनिक नहीं हुए हैं. 1914 के दस्तावेज भी उस समय हुए शिमला सम्मेलन के हैं जब ब्रिटेन, चीन और तिब्बत के प्रतिनिधियों ने तिब्बत की स्थिति को हल करने के लिए मुलाकात की थी. इस दौरान ही भारतीय-चीन सीमा के तौर पर मैकमोहन रेखा बनाई गई थी. चीन इस सीमा को स्वीकार नहीं करता.

रॉय के मुताबिक पीएलए की घुसपैठ और लद्दाख में इसका बढ़ता अतिक्रमण दिखाता है कि कश्मीर मुद्दे पर चीन ने अपना रुख बदल लिया है. वे कहते हैं, ‘1980 के दशक में चीनी कश्मीर को एक द्विपक्षीय विवाद कहते थे. जम्मू व कश्मीर को भारत अधिकृत कश्मीर और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को पाक अधिकृत कश्मीर कहा जाता था. अब वे कहते हैं कि भारत के पास जो कश्मीर है वह एक विवादित क्षेत्र है और पाक अधिकृत कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा है.’

चीन के इस खेल को वही समझ सकता है जिसे उसके चरित्र की गहरी समझ हो. रॉय कहते हैं, ‘चीनी सीधे बात नहीं करते.’ कश्मीर पर चीन ने अपने रुख में नाटकीय बदलाव तभी जाहिर कर दिया था जब उसने बिना किसी प्रचार के जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल के लोगों को स्टेपल्ड वीजा (नत्थी किए हुए कागज पर वीजा) जारी करना शुरू कर दिया. कोंडपल्ली कहते हैं, ‘पाक अधिकृत कश्मीर और नार्दन एरिया में रह रहे लोगों को चीन द्वारा स्टेपल्ड वीजा जारी करने का कोई रिकॉर्ड नहीं है. इसलिए यह एक अहम संकेत है कि चीन भारत को क्या बताना चाहता है. मतलब यह कि पाकिस्तान के नियंत्रण वाला कश्मीर अब विवादित क्षेत्र नहीं है.’ इस तर्क से यह भी कहा जा सकता है कि चीनी नेतृत्व ने भारत को यह संकेत दे दिया है कि वह जम्मू-कश्मीर को एक विवादित इलाका मानता है. 

सीमा से जुड़े विवादों में जमीन किसकी है, इसके निर्धारण के लिए नक्शों का आदान-प्रदान महत्वपूर्ण होता है

फिर इसी साल अगस्त में चीन ने नार्दन कमांड के ले. जनरल बीएस जसवाल को एक आधिकारिक यात्रा के लिए वीजा देने से इनकार कर दिया. उसने यह सुझाव दिया कि जसवाल की जगह किसी और जनरल, जो जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल के बाहर तैनात हो, को भेजा जा सकता है. भारत ने तत्काल यह सुझाव ठुकरा दिया. इसके बाद सितंबर में द न्यूयॉर्क टाइम्स में एक खबर छपी जिसमें कहा गया था कि पाक अधिकृत कश्मीर के गिलगित और बाल्टिस्तान में चीन ने 11,000 सैनिकों की तैनाती कर दी है. हाल ही में चीन के विदेश मंत्रालय ने एलान किया कि नार्दन एरिया, गिलगित और बाल्टिस्तान पाकिस्तान का हिस्सा हैं. भारत इन्हें अविभाजित जम्मू-कश्मीर का हिस्सा मानता है.

चीन मामलों के विशेषज्ञ और सरकार के सूत्र बताते हैं कि चीन पाक अधिकृत कश्मीर और नॉर्दन एरिया में बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं में निवेश करके अपनी नई कश्मीर नीति को वैधता का जामा पहना रहा है. पाकिस्तान और अन्य जगहों पर पनबिजली परियोजनाओं और सड़क व रेल निर्माण में चीनी निवेश का आंकड़ा 30.14 अरब डॉलर बताया जा रहा है. पाक अधिकृत कश्मीर में चीन ने एक महत्वपूर्ण रणनीतिक परियोजना शुरू की है. वह झिंजियांग प्रांत के पास 4,693 मीटर की ऊंचाई पर बसे खूंजेराब और नॉर्दन एरियाज के बीच एक रेल लाइन बनवा रहा है. उसकी इस रेल लाइन को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक ले जाने की योजना है. गौरतलब है कि यह बंदरगाह भी चीन ही बनवा रहा है. कोंडपल्ली कहते हैं. ‘चीनी चाहते हैं कि भारत और पाकिस्तान हमेशा अलग-अलग रहें.’

रॉय के मुताबिक, चीन जम्मू और कश्मीर को एक त्रिपक्षीय मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है. इससे पहले से ही जटिल कश्मीर मुद्दे में जटिलता की एक और परत जुड़ जाएगी. चीन चुपचाप समीकरण बदल रहा है. भले ही भारत ने अपनी स्थिति न बदली हो और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा यहां आकर बयान दे गए हों कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच का मुद्दा है. अक्टूबर के आखिरी हफ्ते चीन की नई ऑनलाइन मानचित्रण सेवा लांच हुई. गूगल मैप्स की प्रतिद्वंद्वी कही जा रही इस सेवा में अरुणाचल और अक्साई चिन (लद्दाख का एक हिस्सा) को चीन का हिस्सा दिखाया गया है.

19वीं सदी में पांच हिमालयी राज्य थे. तिब्बत, लद्दाख, सिक्किम, नेपाल और भूटान. 20 सदी में इस स्थिति में बदलाव हुआ. लद्दाख और सिक्किम भारत में मिल गए. भूटान और नेपाल स्वतंत्र देश बन गए.  उधर, तिब्बत, तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (टीएआर) के रूप में चीनी नियंत्रण में आ गया. कोंडपल्ली कहते हैं, ’19वीं सदी में जो कश्मीर था उसका 20 फीसदी हिस्सा आज चीन के कब्जे में है और इसलिए तकनीकी रूप से देखा जाए तो यह विवाद का हिस्सा हो जाता है. लेकिन कश्मीरी अलगाववादियों में यह हिम्मत नहीं कि वे चीन से अपनी जमीन वापस मांगें क्योंकि उनके पाकिस्तानी आका उन्हें इसकी इजाजत नहीं देंगे.’

तो स्थिति यह है कि कश्मीर समस्या के जन्म के 63 साल बाद चीन ने चुपचाप खुद को इस समस्या का ‘तीसरा पक्ष’ बनाकर इसे एक त्रिपक्षीय मुद्दे में तब्दील कर दिया है. लेकिन भारत भी चीन के इस खेल को समझ रहा है. पिछले महीने चीन के वुहान शहर में हुई रूस, भारत और चीन के विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान कृष्णा ने अपने समकक्ष यांग च्येछी से सीधी बात की.  विदेश सचिव निरुपमा राव के मुताबिक कृष्णा ने कहा कि ‘उम्मीद है कि चीन जम्मू एवं कश्मीर के प्रति संवेदनशील रुख दिखाएगा जिस तरह हम टीएआर और ताइवान के संदर्भ में दिखाते रहे हैं.’ पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह कहते हैं, ‘यह निश्चित रूप से अतीत के रुख से अलग है. पहली बार ऐसी बात कही गई है.’

सीमा विवाद को सुलझाने के लिए भारत और चीन के बीच विचार-विमर्श के 13 दौर हो चुके हैं. रॉय कहते हैं, ‘लेकिन कभी भी पश्चिमी और पूर्वी सेक्टर के नक्शों का आदान-प्रदान नहीं किया गया.’ कोंडपल्ली कहते हैं, ‘हमने अपने नक्शे दिखाए हैं मगर चीनियों ने अपने नक्शे नहीं दिखाए हैं.’ नटवर सिंह कहते हैं, ‘चीनी कभी हमें अपनी सीमा के नक्शे नहीं देते. जो एनलाई ने नेहरू को बताया था कि चीनी नक्शे बहुत पुराने हैं और उनका कोई फायदा नहीं है. तब से लेकर आज तक चीनी हमेशा अपने नक्शे न देने की कोई न कोई वजह गिनाते रहे हैं.’

रिपोर्टें बताती हैं कि पीएलए 1962 के कब्जे से 11 किमी आगे तक आ गई है और इस इलाके में कर वसूल रही है

सीमा से जुड़े विवादों में जमीन किसकी है, इसका निर्धारण करने के लिए नक्शों का आदान-प्रदान महत्वपूर्ण होता है. कोंडपल्ली कहते हैं, ‘अगर नक्शों का आदान-प्रदान हो जाता है तो यह समझ लिया जाता है कि भारत और चीन ने अपनी-अपनी बात को ऑन रिकॉर्ड रख दिया है. आसानी से समझने के लिए मान लेते हैं कि हमारे बीच प्रॉपर्टी से जुड़ा कोई विवाद है. हम दोनों के पास प्रॉपर्टी डीड हैं. जज इनका विश्लेषण करता है और यह देखता है कि किसका दावा मजबूत है. इसके बाद वह फैसला देता है.’ मिलेट्री इंटेलिजेंस (एमआई) के सूत्र बताते हैं कि जियाबाओ की यात्रा के दौरान अगर चीन आधिकारिक रूप से नक्शों का आदान-प्रदान करने का फैसला करता है तो भारत को झटका लग सकता है.

कोंडपल्ली कहते हैं, ‘जमीन पर अपना दावा साबित करने का एक तरीका यह है कि आप यह प्रमाण दें कि उस जमीन पर कर की वसूली आप कर रहे हैं. अगर आप दुर्गम इलाकों से वसूले जा रहे भू एवं राजस्व कर के साक्ष्य पेश कर सकते हैं तो यह कहा जा सकता है कि जो भी करों की वसूली कर रहा है, कानूनी रूप से जमीन उसी की है. खबरें हैं कि एमआई ने सरकार को बताया है कि 1980 से ही पीएलए वास्तविक नियंत्रण रेखा के इर्द गिर्द रहने वाले लोगों से ऐसे दस्तावेज इकट्ठा कर रही है. ऐसी भी रिपोर्टें हैं कि लोग चीनी इलाकों में जाकर बस गए हैं और अपने साथ जमीन से जुड़े दस्तावेज भी ले गए हैं. इसके अलावा यह भी सूचना है कि पीएलए खानाबदोशों से भी अप्रत्यक्ष कर वसूल रही है और इसका रिकॉर्ड बना रही है.’

इससे यह बात समझ में आ सकती है कि पिछले दो दशकों के दौरान पीएलए की छोटी-छोटी टीमें क्यों पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों में लगातार घुसपैठ करती रही हैं. भूमि संबंधी दस्तावेज और भूमि व राजस्व कर लेने के लिए. इससे यह भी समझा जा सकता है कि चीनी वास्तविक नियंत्रण रेखा वाले अपने नक्शे क्यों नहीं दिखाते. पिछले 20 साल में चीन धीरे-धीरे अपने दावे के समर्थन में सबूत जमा करता आ रहा है कि अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश उसका हिस्सा हैं. कोंडपल्ली कहते हैं, ‘रिपोर्टें बताती हैं कि पीएलए 1962 के कब्जे से 11 किमी आगे तक आ गई है और इस दायरे में आने वाले इलाकों से कर वसूल रही है.’

उत्तराखंड और सिक्किम में सीमा पर भारत और चीन के बीच एक सहमति हो चुकी है. लेकिन अरुणाचल प्रदेश के 90,000 वर्ग किमी क्षेत्र पर चीन लगातार दावा करता आ रहा है.  हालांकि राय और दूसरे कई विदेश नीति विशेषज्ञ इस पर सहमति जताते हैं कि चीन के इन हमलावर तेवरों के सीमा पार करने की आशंका नहीं है क्योंकि आज के दौर में दांव पर बहुत कुछ लगा है. रक्षा विश्लेषक और इंडियन डिफेंस रिव्यू के संपादक भरत वर्मा कहते हैं, ‘चीन अब से 2012 तक ही भारत पर हमला कर सकता है. इसके बाद इस अवसर की खिड़की का बंद होना शुरू हो जाएगा और 2015 तक चीन के लिए ऐसा करना लगभग असंभव हो जाएगा. चीन के लिए भारत पर हमला करने की तीन अनिवार्यताएं होंगी: 1) पाकिस्तान में भारी अराजकता हो गई है, वह टूटकर बिखर रहा है. चीन ने पाकिस्तान  में भारी निवेश किया है. पाकिस्तान को बचाने के लिए और इसे तोड़ने वाली ताकतों को एक करने के लिए चीन भारत पर हमला करेगा. 2) चीन के नजरिये से तिब्बत का विलय तब तक पूरा नहीं है जब तक अरुणाचल पर उसका कब्जा न हो. 3) भारतीय सेना 2015 तक बहुत ही अत्याधुनिक हो जाएगी और चीन को हमले के बारे में सोचने से पहले भी कई बार सोचना पड़ेगा.’

चीन 4,000 किमी की वास्तविक नियंत्रण रेखा के नजदीक अपने सैन्य ढांचे का विस्तार कर रहा है. वह सड़कें और रेल लाइनें बिछा रहा है ताकि सैनिकों की आवाजाही तेज और ज्यादा सक्षम तरीके से हो सके. वास्तविक नियंत्रण रेखा के नजदीक भारी पैमाने पर गतिविधियों को देखते हुए ही जनरल वीके सिंह ने कहा था, ‘चीन बुनियादी ढांचे के विकास पर बहुत पैसा खर्च कर रहा है. वह कहता है कि यह क्षेत्र के स्थानीय लोगों के लिए है. मगर हमें उसके इरादों पर शक है.’ इसी बयान को पकड़ते हुए पूर्व रक्षा मंत्री और समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने संसद में यह मसला उठाया था. यादव कहते हैं, ‘चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता. मैं रक्षा मंत्री रहा हूं और जानता हूं कि उनके इरादे क्या हैं. हमारी सीमाएं सुरक्षित नहीं हैं.’

अरुणाचल में वास्तविक नियंत्रण रेखा के उस पार चीनी हिस्से तक पहुंच अपेक्षाकृत आसान है जबकि इस पार भारतीय हिस्से में घने वन और दुर्गम पहाड़ियां हैं. नाम न छापने की शर्त पर अधिकारी तहलका को बताते हैं, ‘2008 तक रणनीति यह थी कि पूर्व की तरफ पड़ने वाले सीमावर्ती इलाकों को विकसित न किया जाए और सेना भी इस पर सहमत थी. 1962 की शर्मनाक हार वह भूली नहीं थी और उसे लगता था कि अगर इन क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का विकास किया गया तो युद्ध की स्थिति में चीनी इसका फायदा उठाएंगे.’ दो साल पहले ही सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों पर अपनी इस नीति को आखिरकार बदलने का फैसला किया. 2008 में सरकार ने इन इलाकों में सीमा पर सड़कों के निर्माण के लिए भूमि सर्वेक्षण शुरू किया और अब ऐसा लग रहा है कि सरकार वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास बसे भारत के सीमावर्ती इलाकों को सड़क मार्ग से जोड़ देगी.

10 नवंबर को गृह राज्य मंत्री मुलापल्ली रामचंद्रन द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में  कहा गया है कि सरकार ने जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में भारत और चीन सीमा पर स्थित क्षेत्रों में 804 किमी कुल लंबाई की 27 सड़कें अलग-अलग चरणों में बनाने का फैसला किया है. पिछले दो साल के दौरान वास्तविक नियंत्रण रेखा के नजदीक सड़कें बनाने पर सरकार ने 384 करोड़ रु खर्च किए हैं. भारत ने पूर्वोत्तर में दो अतिरिक्त माउंटेन डिविजनें बनाकर अपने सैनिकों की संख्या का आंकड़ा एक लाख से भी ऊपर पहुंचा दिया है. भारतीय वायु सेना द्वारा हाल ही में अपने बेड़े में शामिल किए गए सुखोई-30 लड़ाकू विमानों के दो स्क्वाड्रन तेजपुर में तैनात कर दिए गए हैं. इसके साथ ही हवाई हमले की चेतावनी देने वाली व्यवस्था भी है. पूर्वोत्तर में 3,500 किमी की दूरी तक मार करने वाली अग्नि-3 मिसाइलें भी तैनात की गई हैं. अगले साल की शुरुआत में अग्नि-5 का परीक्षण भी किया जाएगा जो चीन के उत्तर में सबसे दूर स्थित शहर हारबिन तक मार करने में सक्षम है. इसके अलावा भारतीय वायुसेना ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थित अपनी तीन हवाई पट्टियों को फिर से शुरू कर दिया है.

चीन की नौसैन्य रणनीति भी भारत के लिए चिंताएं जगा रही है. 18 नवंबर को श्रीलंका ने चीन द्वारा बनाए गए हंबनटोटा बंदरगाह का उदघाटन किया. चीन पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह का निर्माण कर रहा है. म्यामांर के कोको द्वीप पर भी उसने चौकियां बना ली हैं और वह थाइलैंड, कंबोडिया और बांग्लादेश में भी बंदरगाह सुविधाएं स्थापित कर रहा है. उसकी बढ़ती अर्थव्यवस्था निर्यात पर निर्भर है. चीन अपने उत्पादन का 30 फीसदी अपने यहां खपाता है और बाकी 70 फीसदी हिंद महासागर में मौजूद जल मार्गों के जरिए दुनिया के बाकी भागों में भेजता है. उसकी 20 करोड़ टन सालाना तेल जरूरत का 80 प्रतिशत मलक्का के जलडमरूमध्य के माध्यम से इस तक पहुंचता है. कोंडपल्ली कहते हैं, ‘अंडमान में स्थित भारतीय सैन्य बेस मलक्का के जलडमरूमध्य तक पहुंच पर नियंत्रण रखता है.  चीनी चिंतित हैं कि युद्ध की स्थिति में भारतीय नौसेना चीनी तेल टैंकरों को डुबा सकती है. इससे चीन की निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा.’

इस साल अगस्त में चीन, जापान को पीछे छोड़ते हुए अमेरिका के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है. जियाबाओ इस शानदार आर्थिक तरक्की से पैदा हुए विश्वास के साथ भारत आएंगे. लेकिन उन्हें यह भी पता होगा कि उनके दौरे से एक महीने पहले ही भारतीय सेना ने अरुणाचल स्काउट्स बटालियन का गठन किया है. अरुणाचल के ही मूल निवासियों से मिलकर बनी इस पहली बटालियन के सदस्यों को ऊंचाई पर स्थित क्षेत्रों में होने वाली लड़ाई के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा.

तो क्या जियाबाओ भारत की इस बड़ी रणनीति का जवाब भूअभिलेख और कर दस्तावेज दिखाकर देने वाले हैं ताकि वे अक्साइ चिन और अरुणाचल पर अपना दावा साबित कर सकें? नई दिल्ली उम्मीद ही कर सकती है कि ऐसा न हो.

राडिया की रामकहानी

अरबों रु के संचार घोटाले से घिरी लॉबीइस्ट नीरा राडिया ने पिछले दिनों अपने जन्मदिन पर दक्षिण दिल्ली में एक मंदिर का उद्घाटन किया. इस कृष्ण मंदिर को बनवाने के लिए दान भी उन्होंने ही दिया था. इस मौके पर मौजूद रहे लोग बताते हैं कि राडिया ने मंदिर में काफी देर तक पूजा-अर्चना की. इन दिनों उनके नाम पर जितना बड़ा बवाल मचा हुआ है उसे देखते हुए अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में अब तक के सबसे बड़े इस घोटाले की छाया से बाहर निकलने के लिए उन्होंने ईश्वर से मदद की प्रार्थना की होगी. मंदिर जाने से पहले दक्षिण दिल्ली की सीमा पर बने उनके फार्महाउस पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), आयकर विभाग और सीबीआई के नोटिस पहुंच चुके थे. यह वही फार्महाउस है जो जितना वहां होने वाले धार्मिक भोजों के लिए जाना जाता है उतना ही देर रात तक चलने वाली पार्टियों के लिए भी. दोनों ही आयोजनों में दिल्ली के रसूखदार लोग शामिल होते हैं.

अब यह तो वक्त ही बताएगा कि यह प्रार्थना सत्ता के गलियारों में मौजूद इस अकेली महिला लॉबीइस्ट की कोई मदद कर पाएगी या नहीं. अकसर साड़ी या बिजनेस सूट में नजर आने वाली राडिया के बारे में कहा जाता है कि इंसानी सोच और तकनीकी शब्दावली पर उनकी पकड़ इतनी कुशल है कि अमीर और ताकतवर लोगों की नब्ज टटोलने में उन्हें ज्यादा देर नहीं लगती.

लॉबीइंग की दुनिया में राडिया ने शुरुआती कदम भाजपा के साथ बढ़ाए. फिर उन्होंने कांग्रेस के भीतरी गलियारों तक पहुंच बनाई और माना जाता है कि अब सीपीएम के साथ भी उनकी अच्छी छनती है. उनके बारे में होने वाली चर्चाएं बताती हैं कि आज उनकी निजी संपत्ति 500 करोड़ रु से ऊपर की है.

आयकर विभाग की जांच बताती है कि रीयल एस्टेट कंपनी यूनिटेक को टेलीकॉम लाइसेंस दिलवाने में राडिया ने अहम भूमिका निभाई

कर चोरी को पकड़ने के लिए कुछ समय पहले आयकर विभाग ने जब कुछ लोगों के फोन टेप करने शुरू किए थे तो ऐसा करने वाले अधिकारियों को अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि यह रूटीन काम उन्हें इतने बड़े घोटाले तक पहुंचा देगा. अब आयकर विभाग समेत दूसरी कई एजेंसियां भी यह जानने की कोशिश कर रही हैं कि क्या दिल्ली की सत्ता के गलियारों में राडिया की पहुंच इस कदर है कि वे किसी को भी मंत्री बनवा दें या फिर अपने कॉरपोरेट क्लाइंटों के हित में सरकार से नीतियां बनवा दें.

उधर, प्रवर्तन निदेशालय यह जानने की कोशिश कर रहा है कि कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस के लिए बनी राडिया की कंपनी के जरिए पैसा किससे किसको पहुंचा. शायद राडिया को भी ईडी की इस मंशा के बारे में अंदाजा हो गया था, इसलिए पूछताछ के लिए सबसे पहले भेजे गए नोटिसों को उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी कारणों का हवाला देकर टालने की कोशिश की. इस दौरान मिले समय का इस्तेमाल उन्होंने उत्तर प्रदेश के कुछ नेताओं से संपर्क करने में किया. बताया जाता है कि राडिया ने उनसे कहा कि वे अपने राज्य के कैडर के अधिकारियों को खामोश रहने के लिए कहें जो इस घोटाले की जांच कर रहे हैं. लेकिन एक लाख 76 हजार करोड़ रु के इस घोटाले की आंच में कोई अपने हाथ नहीं जलाना चाहता था.

राजनीतिक रूप से राडिया को अलग-थलग पड़ते देख जांच एजेंसियों की हिम्मत बढ़ी. पूछताछ के लिए उन्हें फिर से नोटिस भेजे गए. इस बार इन नोटिसों की भाषा काफी तल्ख थी. 24 नवंबर को राडिया ईडी के दफ्तर पहुंचीं. शायद मीडिया की नजर से बचने के लिए उन्होंने वक्त चुना सुबह सवा नौ बजे. उस समय तक तो जांच अधिकारी भी दफ्तर नहीं पहुंचे थे. जांच में शामिल ईडी के एक बड़े अधिकारी राजेश्वर सिंह से जब तहलका ने बात करने की कोशिश की तो वे इससे ज्यादा कुछ भी कहने को तैयार नहीं हुए कि वे शायद भारत में हुए अब तक के सबसे बड़े घोटाले की जांच कर रहे हैं.

जब तक राडिया ईडी के दफ्तर से बाहर निकलतीं तब तक वहां मीडिया का भारी-भरकम जमावड़ा लग गया था. सवालों की बौछार के बीच वे सधे हुए शब्दों में उसी नफासत के साथ बोलीं जो किसी पीआर प्रोफेशनल की पहचान होती है. कुछ भी ज्यादा कहने से बचते हुए उन्होंने जो कहा उसका मतलब यही था कि मामला अदालत में है और उनकी तरफ से पूरा सहयोग दिया जाएगा.

उधर, सीबीआई अधिकारियों का दावा है कि उनके पास ऐसे सबूत हैं जो बताते हैं कि राडिया की कंपनी का डाटा यूक्रेन स्थित सर्वरों (जिन तक किसी तीसरे पक्ष की पहुंच बहुत मुश्किल होती है) पर रहा है और उनके और उनके करीबी सहयोगियों ने अपने फोनों पर ऐसे इजराइली उपकरण लगा रखे थे जिनसे नंबरों की निगरानी संभव नहीं हो पाती. सीबीआई के पास वैष्णवी कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस की चेयरपर्सन राडिया और नेताओं, नौकरशाहों और कुछ बड़े पत्रकारों के बीच 180 घंटे की बातचीत है जो उन्हें उस दूरसंचार घोटाले के केंद्र में खड़ा कर सकती है जिसने ए राजा की कुर्सी छीन ली. गौरतलब है कि संचार मंत्री रहे राजा को वास्तविक कीमत से कहीं कम कीमत पर 2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस बेचने से उठे विवाद के बाद अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

सीबीआई उन पूर्व नौकरशाहों और राडिया के बीच के गठजोड़ की भी जांच कर रही है जिन्हें राडिया ने इसलिए नौकरी पर रखा था ताकि वे अपने क्लाइंटों के हिसाब से नीतियां बनवा सकें. उनके क्लाइंटों में टाटा, रिलायंस, आईटीसी, महिंद्रा, लवासा, स्टार टीवी, यूनिटेक, एल्ड हेल्थकेयर, हल्दिया पेट्रोकैमिकल्स, इमामी और बिल ऐंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन जैसे बड़े नाम हैं.

पिछले ही हफ्ते राडिया के करीबियों में से एक प्रदीप बैजल से सीबीआई ने चार घंटे से भी ज्यादा समय तक पूछताछ की. गौरतलब है कि बैजल दूरसंचार मंत्रालय के पूर्व सचिव हैं और देश में विवादास्पद विनिवेश प्रक्रिया को शुरू करने का श्रेय उन्हीं को जाता है. सीबीआई ने उनसे गुयाना और सेनेगल जैसे अफ्रीकी देशों में उनके तथाकथित निवेशों के बारे में पूछताछ की.

इस बारे में ज्यादा जानकारी देने से इनकार करते हुए ईडी अधिकारी राजेश्वर सिंह बस इतना ही कहते हैं, ‘आरोप गंभीर हैं.’ सीबीआई और ईडी अधिकारियों ने तहलका को बताया है कि यह साबित करने के लिए उनके पास पर्याप्त सबूत हैं कि डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी ऐंड प्रोमोशन में सचिव रहे अजय दुआ, पूर्व वित्त सचिव सीएम वासुदेव, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन एसके नरूला और नागरिक उड्डयन सचिव रहे अकबर जंग जैसे रिटायर्ड नौकरशाह राडिया के इशारे पर काम करते हैं.

दूसरी तरफ, आयकर विभाग की जांच बताती है कि रीयल एस्टेट कंपनी यूनिटेक को टेलीकॉम लाइसेंस दिलवाने में राडिया ने अहम भूमिका निभाई.

ईडी अधिकारियों ने तहलका को बताया है कि यूनिटेक के लिए 1,600 करोड़ रु जुटाने में राडिया की अहम भूमिका थी. गौरतलब है कि यूनिटेक
भी उन विवादास्पद कंपनियों में से एक है जिसे ये टेलीकॉम लाइसेंस हासिल हुए थे. कंपनी ने अपनी दूरसंचार फर्म का एक बड़ा हिस्सा आखिरकार नार्वे की एक कंपनी टेलेनॉर को बेचा और उस कीमत से सात गुना ज्यादा पैसा वसूला जो उसने लाइसेंस खरीदने के लिए चुकाई थी.
एजेंसियों के पास जो बातचीत रिकाॅर्ड है उसके कुछ हिस्से राडिया का संबंध लंदन स्थित वेदांता समूह से भी जोड़ते हैं. गौरतलब है कि उड़ीसा के कालाहांडी जिले में अपनी खनन परियोजनाओं में पर्यावरण संबंधी मानकों का उल्लंघन करने के लिए इस समूह की काफी आलोचना हुई है. विश्वस्त सूत्रों ने तहलका को यह भी बताया है कि वेदांता समूह ने राडिया को भारत में अपनी नकारात्मक छवि को बदलने की भी जिम्मेदारी सौंपी थी. नतीजा यह हुआ कि अखबारों और पत्रिकाओं में वेदांता को अच्छा बताते कई महंगे विज्ञापन छपे. लेकिन इनसे कोई खास असर नहीं हुआ क्योंकि पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने उसकी परियोजना को रद्द कर दिया.

बातचीत के टेप राडिया का संबंध सुनील अरोड़ा से भी साबित करते हैं. अरोड़ा राजस्थान में तैनात आईएएस अफसर हैं जिन्होंने राडिया को अलग-अलग मंत्रालयों में तैनात अपने दोस्तों तक पहुंचाया. इन टेपों में रिकॉर्ड बातचीत उन नोट्स का हिस्सा है जो सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपे हैं. ऐसा लगता है कि नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल पटेल के खिलाफ मोर्चा खोलकर इंडियन एयरलाइंस के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर की अपनी कुर्सी गंवाने वाले अरोड़ा ने राडिया के लिए भारत में कई दरवाजे खोले. यह पता चला है कि इंडियन एयरलाइंस के मुखिया के तौर पर अरोड़ा के कार्यकाल के दौरान सात विमान उन कंपनियों से लीज पर लिए गए थे जिनके एजेंट के तौर पर राडिया की कंपनियां काम कर रही थीं. वरिष्ठ आयकर अधिकारी अक्षत जैन कहते हैं, ‘हमारे पास सबूत हैं कि राडिया की कंपनी ने अरोड़ा के मेरठ स्थित भाई को काफी पैसा दिया है.’

राडिया आज भी जेट एयरवेज के मुखिया नरेश गोयल और उड्डयन मंत्री प्रफुल पटेल से खार खाती हैं. उन्हें लगता है कि इन दोनों की वजह से उनकी अपनी एयरलाइन का सपना पूरा नहीं हो सका

अब राडिया की पृष्ठभूमि पर एक नजर. 19 नवंबर ,1960 को सुदेश और इकबाल मेमन के घर नीरा राडिया का जन्म हुआ. ईदी आमिन के पतन के वक्त उनके परिवार को अफ्रीका छोड़कर ब्रिटेन जाना पड़ा. कभी कुख्यात हथियार डीलर अदनान खशोगी का उभरता प्रतिद्वंद्वी कहे जाने वाले मेमन ने लंदन में विमान लीज कारोबार में काम शुरू किया. परिवार के इस कारोबार की राडिया स्वाभाविक उत्तराधिकारी थीं. लंदन में उन्होंने एक अमीर व्यापारी परिवार से ताल्लुक रखने वाले जनक राडिया से शादी की. सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि 1996 में काले धन की जमाखोरी के एक मामले में वे जांच के घेरे में आईं और फिर वे भागकर भारत आ गईं. यहां पहले उन्होंने तब सहारा सुप्रीमो सुब्रत रॉय के चहेते उत्तर कुमार बोस के साथ काम किया जो एयर सहारा का काम देख रहे थे. सहारा इंडिया के निदेशकों में से एक अभिजित सरकार भी इसकी पुष्टि करते हुए कहते हैं, ‘उन्होंने कुछ समय तक हमारे लिए काम किया.’ मगर बोस तब राय की नजरों से उतर गए जब यह पाया गया कि जो एयरक्राफ्ट लीज पर लिए गए हैं उनके किराए बाजार भाव से 50 फीसदी ज्यादा हैं.

इसके बाद राडिया ने अपने बूते आगे बढ़ने का फैसला किया. उनकी नजर बंद हो चुकी मोदीलुफ्त पर थी जिसे फिर से शुरू कर वे मैजिक एयर के नाम से चलाना चाहती थीं, मगर इसके लिए उन्हें जरूरी मंजूरियां नहीं मिलीं. ताकतवर प्राइवेट एयरलाइंस लॉबी ने हर कदम पर उन्हें मात दी और जल्दी ही राडिया ने इस काम के लिए खाड़ी स्थित जिन फायनेंसरों को राजी किया था वे पीछे हट गए. मलेशियन एयरलाइंस सहित कई एयरलाइनों से पायलटों और उड्डयन विशेषज्ञों की जो क्रैक टीम राडिया ने बनाई थी वह एक लंबी और परेशान कर देने वाली यथास्थिति के बाद टूट गई.

ऐसे कई लोग हैं जो दावा करते हैं कि राडिया आज भी जेट एयरवेज के मुखिया नरेश गोयल और नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल पटेल से खार खाती हैं. उन्हें लगता है कि इन दोनों व्यक्तियों की वजह से उनकी अपनी एयरलाइन का सपना पूरा नहीं हो सका. राडिया को क्राउन एयर के प्रोमोटर के तौर पर सुरक्षा मंजूरी तो नहीं मिली लेकिन वे तत्कालीन उड्डयन मंत्री और भाजपा के अनंत कुमार के करीबी संपर्क में आ गईं. भाजपा नेतृत्व के सूत्र बताते हैं कि जब पीएमओ से उन्हें साफ संकेत मिले कि कुमार की कुर्सी जाने वाली है तो राडिया ने मान लिया था कि क्राउन एयर अब एक मर चुका सपना है. इसके बाद भी राडिया ने एनडीए शासनकाल के दौरान जमीन का एक विशाल टुकड़ा बहुत ही सस्ते दामों में अपनी स्वर्गवासी मां के नाम पर बनी सुदेश फाउंडेशन को आवंटित कराने में सफलता पा ली.

आईबी की एक पुरानी रिपोर्ट बताती है कि राडिया को सुरक्षा संबंधी मंजूरी देने के खिलाफ जो एतराज थे उनमें से कुछ का संबंध मुंबई स्थित एक व्यक्ति चंदू पंजाबी के साथ उनकी डीलिंग से भी था जिसकी पृष्ठभूमि संदिग्ध थी. पंजाबी ठाकरे परिवार का भी करीबी था. राडिया ने फिल्म अग्निसाक्षी की फंडिंग में भी अहम भूमिका निभाई थी. इस फिल्म के निर्माता बाल ठाकरे के बेटे बिंदा ठाकरे थे. पंजाबी के बारे में बताया जाता है कि बांद्रा स्थित सी रॉक होटल में उसका भी कुछ हिस्सा था. 1992 में मुंबई में हुए सीरियल ब्लास्टों में से एक इस होटल में भी हुआ था और अब यह होटल टाटा समूह की इंडियन होटल्स कंपनी द्वारा चलाया जाता है. नेटवर्किंग के अपने गुण की बदौलत राडिया ने सिंगापुर एयरलाइंस के साथ तालमेल स्थापित कर लिया और भारत में उसके रखरखाव, रिपेयर और ओवरहॉल सुविधा स्थापित करने में मदद की. सरकार की नीति में इस बदलाव  कि विदेशी एयरलाइंस भारत में नहीं आ सकतीं, के बारे में भी यह चर्चा चली थी कि यह बदलाव उनके विरोधियों गोयल और पटेल ने करवाया था.

नौकरशाह और राजनेताओं से अपने संपर्क और कुमार के साथ उनके गठजोड़ ने राडिया के लिए दिल्ली की सत्ता के गलियारों के कई दरवाजे खोले. एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के एक पूर्व मुखिया और एनडीए सरकार के दौरान ताकतवर रहे नौकरशाह एसके नरूला रिटायर होने के बाद भी राडिया के विश्वासपात्र हैं और उनकी तरफ से सरकार के साथ कुछ महत्वपूर्ण सौदेबाजियों को अंजाम देते हैं.

राडिया को सबसे बड़ा ब्रेक तब मिला जब उनका परिचय रतन टाटा के करीबी सहयोगी आरके कृष्ण कुमार से हुआ. कुमार वही शख्स थे जिन्हें टाटा ने अपनी एयरलाइन के सपने को हकीकत में बदलने की जिम्मेदारी सौंपी थी. टाटा-सिंगापुर एयलाइंस गठजोड़ नाकाम रहा मगर जल्दी ही राडिया ने पब्लिक रिलेशंस के क्षेत्र में फिर से शरुआत की. उन्होंने वैष्णवी कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस की शुरुआत की और उन्हें टाटा समूह की सभी कंपनियों का काम मिल गया. अब उनके पास भारत के सबसे प्रतिष्ठित कारोबारी घराने का नाम था. जल्दी ही उनकी कंपनी की जड़ें आठ शहरों में जम गई थीं.

जब टाटा समूह टाटा फायनैंस के दिलीप पेंडसे के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करना चाहता था और पेंडसे ने मराठी मानुस कार्ड खेलकर उसका यह प्रयास विफल कर दिया था तब एक दिन दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने पेंडसे को एक बहुत ही छोटे मामले में गिरफ्तार कर लिया. पेंडसे ने आरोप लगाया कि यह सब राडिया के इशारे पर हुआ है क्योंकि पुलिस विभाग में पहुंच उनकी रणनीतियों का एक अहम पहलू है. यह एक ऐसा हथियार है जिसे वे अकसर अपना काम निकालने के लिए इस्तेमाल करती हैं. इसका राडिया को इतना खयाल है कि पिछले आठ सालों में एक स्टाफर को इसी काम के लिए रखा गया है कि ग्राउंड लेवल पर काम करने वाले पुलिसकर्मियों के साथ रिश्ते बनाकर रखे जाएं. उधर, राडिया पुलिस के सीनियर स्टाफ के साथ बनाकर रखती हैं. दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर केके पॉल राडिया के करीबी दोस्त थे जिन्हें एनडीए की सरकार के आखिरी चार महीने के दौरान ही यह पद मिला था. महाराष्ट्र के एक पूर्व डीजीपी को जब फरवरी, 2007 में रातों-रात मुंबई पुलिस कमिश्नर के पद से हटाया गया तो यह चर्चा खूब उड़ी थी कि राडिया उसे दिल्ली में सीबीआई या किसी इंटेलिजेंस एजेंसी में कोई अहम पद दिलवाने के लिए भारी लॉबीइंग कर रही हैं. इंटेलिजेंस के सूत्र मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर हसन गफूर से जुड़े उस विवाद में राडिया का हाथ होने से इनकार नहीं करते जब उनका एक विवादास्पद इंटरव्यू एक मैगजीन में छप गया था. इससे पहले वे महाराष्ट्र के डीजीपी पद के लिए पहली पसंद कहे जा रहे थे. गफूर विवाद का फायदा एएन राय को हुआ जो टाटा मोटर्स के मुखिया रविकांत के करीबी रिश्तेदार हैं. राय भी दक्षिण मुंबई के उसी रेजीडेंसियल कांप्लेक्स में रहते हैं जहां कांत सहित टाटा मोटर्स के तीन-चार बड़े लोगों का आशियाना है.

दिलचस्प यह भी है कि राडिया ने अपनी कमर्शियल एयरलाइन का सपना 2004 में एक बार फिर जिंदा किया और फिर मलेशियन एयरलाइंस के उड्डयन विशेषज्ञों की एक टीम बनाई. इसके मुखिया नग फूक मेंग पहले भी क्राउन एयर का हिस्सा रह चुके थे. अपने विरोधी प्रफुल पटेल के उड्डयन मंत्री होने के बावजूद आशावादी राडिया इस मोर्चे पर जम गईं. लेकिन 14 महीने तक कोशिशों के बाद आखिरकार उन्हें मैदान छोड़ना पड़ा.

इसी अवधि के दौरान राडिया ने दयानिधि मारन के साथ भी एक तीखी लड़ाई लड़ी. मारन, कारोबारी सी शिवशंकरन को रतन टाटा के कथित संरक्षण से नाराज थे. राडिया ने डीएमके मुखिया करुणानिधि की पत्नी राजति अम्मल के एक करीबी के साथ संपर्क बढ़ाया और चेन्नई की कई यात्राएं करके अम्मल के साथ अच्छी दोस्ती कर ली. उन्हें तब मौका मिला जब मारन और करुणानिधि परिवार में फूट पड़ी जिसकी वजह से दयानिधि मारन को संचार मंत्रालय छोड़ना पड़ा. माना जाता है कि राडिया  चेन्नई गईं और उन्होंने डीएमके सुप्रीमो, उनके बेटे एमके स्टालिन और टाटा के बीच एक गुपचुप वार्ता आयोजित की थी.

एएआई के पूर्व सीएमडी नरूला ने नौकरशाही के उस शीर्ष स्तर तक उनकी पहुंच के द्वार खोले जिसके रिटायर होने में पांच-छह साल बचे होते हैं और जो रिटायर होने के बाद कॉरपोरेट इंडिया के साथ अवसरों की तलाश में होता है. बैजल और वासुदेव ने भी इस काम में अहम भूमिका निभाई. इनकी सेवाओं का इनाम देते हुए राडिया ने बैजल, वासुदेव और नरूला को पार्टनर बनाते हुए नियोसिस नाम की फर्म खोली. जल्दी ही इसने टेलीकाॅम क्षेत्र की बड़ी खिलाड़ी हुवाई सहित कुछ चीनी कंपनियों को अपनी परामर्श सेवाएं देनी शुरू कर दीं.

राडिया की इस अचानक बड़ी छलांग और सिंगापुर की उनकी कई यात्राओं ने कई लोगों का ध्यान उनकी तरफ खींचा. बताया जाता है कि बड़े नकद सौदों में से कुछ को उनके नाम से मिलते-जुलते कोड के साथ किया गया था. उनकी अबाध उन्नति ने बहुतों को हैरान भी किया. उन्होंने रिलायंस इंडस्ट्रीज लि. (आरआईएल) का काम संभाला तो अपने संपर्कों की बदौलत मुकेश अंबानी को करोड़ों का अप्रत्याशित लाभ करवा दिया. आरआईएल का काम संभालने के लिए राडिया ने न्यूकॉम बनाई. अब भारत के दो सबसे बड़े उद्योगपति उनके पास थे, जिनसे उन्हें चर्चाओं के मुताबिक 100 करोड़ रु सालाना मिल रहे थे. राडिया ने इस क्षेत्र में काम शुरू करने के छह साल के भीतर ही हर स्थापित खिलाड़ी को मीलों पीछे छोड़ दिया था. जल्दी ही वे कॉरपोरेटों के लिए ही नहीं बल्कि राज्य सरकारों को भी अपनी सेवाएं देने लगीं. तेलगू देशम पार्टी के मुखिया चंद्रबाबू नायडू और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी उन लोगों में से कुछ हैं जिनके साथ राडिया ने करीबी से काम किया. कहा जाता है कि नैनो प्रोजेक्ट को बंगाल से गुजरात लाने में राडिया की भूमिका अहम थी.

अगर स्पेक्ट्रम घोटाला इतना बड़ा नहीं हुआ होता तो उनकी यह निर्बाध यात्रा निश्चित रूप से जारी रहती. मगर राडिया जिस कारोबार में हैं वहां टिके रहने के लिए नेताओं और कॉरपोरेट्स के विश्वास की जरूरत होती है. और ये दोनों इसमें पैसे के लिए आते हैं. इसके अलावा कोई भी ऐसे शख्स के साथ काम नहीं करना चाहता जिसकी छवि पर दाग लग चुका हो.

हारे को हरिनाम

चुनाव परिणाम वाले दिन यानी 24 नवंबर को लालू प्रसाद ने अपने आवास पर मीडियाकर्मियों को बुलाया तो था दिन के तीन बजे लेकिन निर्धारित समय से 15 मिनट पहले ही वे पत्रकारों के बीच पहुंच गए. साथ में छाया की तरह हमेशा उनके आगे-पीछे रहने वाले सिपहसालार रामकृपाल यादव और वफादार सेनानी जगतानंद सिंह भी थे. पत्रकारों के बीच बैठने के बाद लालू तुरंत उठकर वापस चले भी गए. रामविलास पासवान भी उनके साथ हैं, वे भी उनके साथ ही मीडिया से मुखातिब होंगे, लालू शायद कुछ देर के लिए भूल गए थे. वहां से उठकर बगल में बरामदे के पास एस्बेस्टस शीट के नीचे लगी बेंत की कुर्सी पर जाकर वे अकेले बैठ पासवान का इंतजार करने लगते हैं. तभी कोई कार्यकर्ता या आदेशपाल लालू प्रसाद की कुरसी की दाईं ओर पान की पीकदानी रख जाता है. लालू पीकदानी की ओर झुकते हैं, लेकिन शायद गलती ही दुहराते हैं. उन्हें इस बात की भी सुध नहीं कि वे तो आज पान खा ही नहीं सके हैं. वे खुद की नजरों से ही बचने की कोशिश करते हुए सामने से एक बुजुर्ग, अचर्चित राजद नेता को पास बुलाते हैं, बगल में बैठाकर बतियाने लगते हैं. थोड़ी ही देर में रामविलास पासवान आ जाते हैं. लालू प्रसाद पत्रकारों के बीच फिर से उपस्थित होते हैं. पहले अपनी बात बोल लेते हैं. सिर्फ चार प्रमुख बातें- ‘यह जो कथित जनादेश है, वह रहस्यों से भरा हुआ है लेकिन हम इसे स्वीकार करते हैं.’ इस वाक्य को कई बार दुहराते हैं लालू. फिर एक ही बात को कम से कम छह-सात तरह से बोलते हैं- ‘हम अपना कर्म करेंगे, फर्ज निभाएंगे, काम करेंगे, दायित्व निभाएंगे.’ लगे हाथ नीतीश कुमार को बधाई देते हैं. फिर मीडियाकर्मियों को रामविलास से सवाल पूछने का इशारा करते हुए एक आखिरी वाक्य कहते हैं, ‘हमने पूरा जीवन बिहार के लिए खपा दिया, राजनीति को दे दिया, ऐसे कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, घबराने वाले नहीं हैं…’

पहले लालू ने खुद को सरकार का मुखिया समझा, फिर खुद को सरकार समझने लगे और आखिर में वे खुद को बिहार भी समझने लगे

लालू घबराए हुए थे या नहीं, यह तो पता नहीं चल पा रहा था लेकिन उधेड़बुन, हैरानी और अलबलाहट का भाव साफ दिख रहा था. रामविलास पासवान जब मीडिया से मुखातिब होते हैं तो लालू लगभग 10-15 मिनट तक या तो रामविलास की बात पर कुछ-कुछ बुदबुदाते रहते हैं या पासवान का कोट धीरे-धीरे खींच रहे होते हैं. किसी बच्चे की तरह. पता नहीं उस वक्त वे रामविलास पासवान को कुछ बोलने से रोकने की कोशिश में ऐसा करते हैं या कुछ और बातें उनसे कहलवाना चाहते थे. बीच-बीच में परिचित अंदाज में कृत्रिम हंसी के साथ रामविलास की ओर इशारा करके कहते हैं कि ‘बोल रहे हैं पासवान जी, सुनिए ध्यान से…’ प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होते ही लालू प्रसाद, रामविलास पासवान, रामकृपाल यादव और जगतानंद सिंह एक कमरे में चले जाते हैं. उस कमरे के बाहर बरामदे में कृष्ण की लगी तरह-तरह की कई-कई तसवीरें भी चुनाव परिणाम की तरह ही रहस्यमयी-सी प्रतीत होती हैं. वहां भगवान कृष्ण इतने सारे रूपों में लालू प्रसाद की यादवी अथवा यदुवंशी राजनीति के प्रतीक के तौर पर हैं या उनके बड़े बेटे के इस्कॉन से जुड़े रहने के असर के रूप में!

लालू प्रसाद की यह प्रेस कॉन्फ्रेंस उसी आवास में थी जिसमें कभी उनके साले साधु यादव रहा करते थे. राबड़ी के कार्यकाल में इसे दस जनपथ का नाम भी दिया गया था. तब वे यहां से सिर्फ एक सड़क पार करके एक अणे मार्ग यानी मुख्यमंत्री आवास पहुंच सकते थे. अब इसमें लालू-राबड़ी का वास है. इस आवास में आने से पहले भी कम बखेड़ा नहीं हुआ था. राबड़ी देवी 15 साल तक एक अणे मार्ग यानी आधिकारिक तौर पर मुख्यमंत्री के लिए आवंटित आवास में रही थीं और इसे छोड़ने के लिए तैयार ही नहीं थीं. लेकिन अंततः उन्हें अपनी जिद छोड़नी ही पड़ी थी. जब लालू-राबड़ी परिवार के साथ गायों को एक अणे मार्ग से वर्तमान आवास में शिफ्ट किया जा रहा था तो लालू प्रसाद ने मीडिया में यह शगूफा भी छोड़ा कि नीतीश गौ माता को परेशान कर रहे हैं, श्राप लगेगा. लेकिन 24 नवंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वीरान-से पड़े भव्य आवासीय परिसर में सवाल न गौ माता का था न राबड़ी की इस जिद का कि उन्हें यह नहीं वह आवास चाहिए. 20 साल के बाद पहली बार सवाल यह है कि आने वाले समय में पटना के किसी भी सरकारी आवास में लालू प्रसाद, राबड़ी देवी और उनके परिवारवाले रह सकेंगे या नहीं. यह नीतीश के विवेक और मेहरबानी या आवास के विशेष ऐक्ट और उसको बदलने की नीतीश की इच्छा और अनिच्छा पर निर्भर करेगा. लालू प्रसाद खुद सांसद हैं. राबड़ी दोनों जगहों यानी सोनपुर और राघोपुर से चुनाव हार चुकी हैं. अब वह दिन सामने है जब अपने चहेतों को लालबत्ती से लेकर तमाम तरह की सुविधाएं उपलब्ध करवाने वाले परिवार के पास सत्ता-शासन तो क्या एक अदद सरकारी आवास के लिए भी संभावनाओं के द्वार बंद होते दिख रहे हैं.

बिहार की राजनीति में बेताज बादशाह रहे लालू प्रसाद की अलबलाहट, द्वंद्व या दुविधा 24 नवंबर को नई नहीं थी. उस रोज चुनाव परिणाम से उनका हैरानी में पड़ना स्वाभाविक था, लेकिन अपने मसखरेपन वाले व्यवहार में अचानक बदलाव करें या कुछ दिन और अपने अंदाज को बनाए रखें, वे यह तय नहीं कर पा रहे थे. पूरे चुनाव में भी लालू ऐसे ही दोराहे पर खड़े दिखें. कभी खांटी गंवई अंदाज में यह कहकर चुनावी सभा को संबोधित करते कि ‘नीतीश के पैरा ठीक नइखे, जब से आइल बा, तब से बाढ़-सुखाड़ आवत बा’ तो कभी यह कहते रहे कि ‘नीतीश सूर्यग्रहण में बिस्कुट खा लिए थे, इसलिए राज्य सुखाड़ से त्रस्त है.’ लालू ऐसे ही तर्कों के सहारे चुनावी कसरत करते रहे. नीतीश और सुशील मोदी के भाषणों का जवाब देने के लिए उन्होंने राबड़ी को 56 और चुनावी राजनीति के रंगरूट अपने बेटे तेजस्वी को 100 सभाओं में भेज दिया. ऐसा उन्होंने परिवार की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए सधी हुई रणनीति के तहत किया या दूसरे किसी पर भरोसा नहीं करने के कारण, यह बताने की स्थिति में राजद का कोई नेता नहीं. जैसा कि तहलका से बातचीत में राजद के दिग्गज नेता व सांसद जगतानंद सिंह कहते हैं, ‘मुझसे बिहार के इस चुनाव परिणाम पर कुछ बात न कीजिए, मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा, अब आप लोग विश्लेषण कीजिए.’

लालू प्रसाद के आवासीय परिसर में ही मिले एक वरिष्ठ राजद नेता, जो लालू के काफी विश्वासपात्र कहे जाते हैं, कहते हैं, ‘हमारा नेता अब हमेशा अनिर्णय की स्थिति में रहता है, जिसकी वजह से लगातार पार्टी गर्त में जा रही है.’ वे कहते हैं कि इस बार के चुनाव में लालू ने पहले तो यह कहा कि अब कोई सवर्ण मुख्यमंत्री नहीं बन सकता तो फिर कुछ दिनों बाद सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण देने की बात कहकर उन्होंने खुद को हंसी का पात्र क्यों बनाया. छात्रों-युवाओं को साइकिल की जगह मोटरसाइकिल का लॉलीपॉप देकर भी वे खुद को उपहास का पात्र ही बना रहे थे.’ नेता जी बुझे हुए स्वर में आगे कहते हैं, ‘अब यह मान लीजिए कि बिहार में लालू-राबड़ी युग का अंत हो गया. अब राजद का अस्तित्व बचाना है तो दूसरे नेताओं को सामने लाना होगा, लेकिन शर्त यह होगी कि वे लालू-राबड़ी परिवार से न हों.’

यह सुझाव तो ठीक है लेकिन लालू प्रसाद और उनकी पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वाकई वे भविष्य में बिहार की राजनीति में अपने को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए ऐसा करने का साहस जुटा पाएंगे. जो लालू प्रसाद को करीब से जानते हैं वे यह भी जानते हैं कि लालू ऐसा कभी नहीं कर सकते. कुछ तो यह भी कहते हैं कि लालू को इसका एहसास पहले से ही हो गया था कि इस चुनाव में वे बुरी तरह परास्त होने वाले हैं, इसलिए अभी से अपने बेटे तेजस्वी को राजनीति के मैदान में उतार दिया ताकि पांच साल के बाद दूसरी पीढ़ी कमान संभालने के लिए तैयार हो. 1997 में भी लालू प्रसाद ने तब ऐसा ही किया था जब वे चारा घोटाले में नाम आने की वजह से सत्ता छोड़ने वाले थे. तब उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का राजकाज सौंप दिया. जब उफान के दिनों पर थे तो साले सुभाष यादव और साधु यादव अचानक से बिहार की राजनीति में समुद्री लहर की तरह प्रकट हो गए. नतीजा यह हुआ कि 1990 में पिछड़ों की राजनीति और सामाजिक न्याय के मसीहा के तौर पर उभरा बिहार का सबसे कद्दावर और करिश्माई नेता धीरे-धीरे रसातल में जाने लगा.

जैसा कि प्रो नवल किशोर चौधरी कहते हैं, ‘अब यह मान लेना चाहिए कि लालू युग का अंत हो गया है और यह जरूरी भी था, बिहार के लिए बेहतर भी.’ वे कहते हैं, ‘तीन ऐसे पड़ाव आए जहां से लालू की राजनीति का मर्सिया गान शुरू हो गया था. पहला पड़ाव जब लालू प्रसाद का नाम चारा घोटाले में आया. फिर दूसरी गलती यह कि उन्होंने सत्ता राबड़ी देवी को सौंप दी और फिर 2005 के चुनाव में परास्त होने के बाद भी सबक न ले सके, अपनी असलियत को नकारते रहे, यह उनकी आखिरी भूल थी.’ प्रो चौधरी कहते हैं कि लालू बिहार में सवर्णों की जकड़न से तंग लोगों की आकांक्षा के तौर पर उभरे हुए नेता थे लेकिन बिहार की सत्ता मिलने के बाद पहले तो उन्होंने खुद को सरकार का मुखिया समझा, फिर खुद को सरकार समझने लगे और आखिरी दौर वह भी आया जब लालू खुद को ही बिहार भी समझने लगे. उनके गुरूर-अहंकार ने उन्हें नायक से अधिनायक बना दिया, जो उन्हें विनाश के इस मुहाने तक ले आया. प्रो चौधरी की बातों को अतीत और वर्तमान से जोड़कर देखें तो समझ आ सकेगा कि लालू प्रसाद की राजनीति ने अचानक ही यू-टर्न नहीं लिया है. लालू की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि वे अपने कार्यकर्ताओं से लगातार कटते रहे. पूरे बिहार की बात कौन करे, अपने गृह जिले गोपालगंज में भी लालू की पकड़ अब इतनी नहीं रही कि वह छह में से एक भी सीट अपनी पार्टी को दिलवा सकते. लालू प्रसाद हैरत भरे शब्दों में कहते हैं, ‘वह तो ठीक है लेकिन मगध और कोसी के इलाके में भी ऐसा कैसे हो गया?’

20 साल के बाद पहली बार सवाल यह है कि आने वाले समय में पटना के किसी भी सरकारी आवास में लालू प्रसाद, राबड़ी देवी और उनके परिवारवाले रह सकेंगे या नहीं

लालू प्रसाद शायद कोसी और मगध की बात कहकर अपने को शांत करने की कोशिश कर रहे हैं जबकि सच यह है कि अब उनके हाथ से पूरा बिहार ही निकल गया है. राष्ट्रीय जनता दल को इस बार 22 सीटें मिली हैं, यानी पिछले नुकसान में भी 32 सीटों का नुकसान हुआ है. विश्लेषक यह दावा कर रहे हैं कि लालू का माय यानी मुसलिम-यादव समीकरण तो पहले ही ध्वस्त हो चुका था, इस बार बड़े पैमाने पर इनके खेमे से यादवी आधार भी खिसका है, वरना कोई कारण नहीं कि 12-13 प्रतिशत आबादी वाले यादव जाति का वोट यदि एकमुश्त लालू के खाते में जाता तो इतनी बुरी हार होती. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं कि इस चुनाव में यह संकेत साफ है कि लालू यादव से यादव मतदाता भी खिसक गए हैं. वे कहते हैं कि जातीय राजनीति का यह सिद्धांत है कि अकेले कोई जाति किसी एक नेता के साथ बहुत दिनों तक नहीं रह सकती. यादव लालू प्रसाद के साथ तभी रहेंगे जब और पिछड़ी जातियां उनके साथ हों. दूसरी पिछड़ी जातियों में आधार खिसकेगा तो यादव भी उनके साथ नहीं रह सकते. महेंद्र की बातों में कुछ सच्चाई तो साफ ही दिखती है, वरना कोई कारण नहीं था कि राबड़ी दोनों जगहों से चुनाव हारतीं और लालू प्रसाद के गृह जिले गोपालगंज में राजद का इतना बुरा हश्र होता. यूं भी लालू-राबड़ी के राज में यादवों के लिए ऐसा कुछ हुआ नहीं जिससे काफी दिनों तक उनकी जाति पर उनका प्रभाव बना रहता. लालू-राबड़ी के शासन में यदि अराजकता, अपराध में इजाफा हुआ, विकास कार्य ठप रहा तो उसका खामियाजा किसी जाति विशेष को नहीं बल्कि पूरे बिहार को भुगतना पड़ा था.

लालू प्रसाद कितने फ्रंट पर और कब-कब नाकाम होते रहे, इसकी पोल-पट्टी खोलने में अब उनके ही लोग लग गए हैं. जैसा कि लालू के आवासीय परिसर में मिले एक युवा राजद कार्यकर्ता मुमताज अंसारी कहते हैं, ‘लालू जी पिछले 15 साल से बिहार क्रिकेट एसोसिएशन के प्रमुख रहे. इन 15 साल में इन्होंने एक भी खिलाड़ी को राष्ट्रीय स्तर पर भेजने की कोशिश नहीं की. एक कोशिश भी की तो अपने बेटे तेजस्वी के लिए, जो आधा-अधूरा ही खिलाड़ी बन सका.’ ऐसे कई छोटे-छोटे सवाल जमा होकर अब ढेर की तरह लालू के सामने हैं. लालू प्रसाद जब 1990 में बिहार के राजा बने थे तो उनके साथ समाजवादी नेताओं की सशक्त टीम थी. लेकिन सत्ता मद उन्हें इस कदर अहंकारी बनाने और छोटी परिधि में लाने लगा कि उनके अपने ही एक-एक कर किनारे होते गए. सबसे पहले इनसे नीतीश ही किनारे हुए, जो कभी इनके चाणक्य कहे जाते थे. फिर जॉर्ज फर्नांडिस, रामविलास पासवान, शरद यादव, देवेंद्र यादव जैसे परिपक्व नेताओं ने लालू की मंडली से एक-एक कर किनारा कर लिया. जो लालू को राजनीति में रणनीति समझाते थे वे खुद अलग जमात में रणनीति बनाकर नीतीश को लालू के मुकाबले खड़ा करते गए. जैसा कि कभी लालू के ब्रेन रहे शिवानंद तिवारी कहते हैं, ‘लालू का राजनीतिक दुश्मन कभी और कोई नहीं रहा बल्कि खुद लालू प्रसाद ही हैं. वे खुद से ही लड़ रहे हैं, खुद से ही हार रहे हैं, खुद से ही निपट रहे हैं.’ लालू के सारे रणनीतिकार अलग तो हुए ही, बना-बनाया माय समीकरण भी तेजी से ध्वस्त होता रहा. यादव खेमे से शरद, रंजन यादव जैसे नेता अलग धुरी पर गए, दोनों ने लालू प्रसाद को हराया.

मुसलिम नेताओं में कभी भी लालू प्रसाद ने अब्दुल बारी सिद्दिकी या डॉ जाबिर हुसैन जैसे नेताओं को फ्रंट पर नहीं रखा बल्कि तस्लीमुद्दीन और शहाबुद्दीन जैसे नेता फ्रंट पर आते रहे, जिनसे जुड़ाव दिखाने में खुद मुसलिम समाज भी कतराता है. लालू युग का अंत तभी हो जाता, लेकिन ऐसे समय में लालू ने अपने को बनाये-बचाए रखने के लिए कांग्रेस का दामन थामा. रेलवे में कुछ करिश्मा हुआ तो मैनेजमेंट गुरु बनने के चक्कर में वे फिर से इस कदर खोए कि अपनी ही पार्टी तक को भूल गए. रेल के गुरूर को एक झटके में ममता बनर्जी ने तोड़ा और इस बीच कांग्रेस से भी उन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में महज तीन सीटों का प्रस्ताव देकर रार छेड़ दी. लालू ने कांग्रेस से थोड़ा किनारा किया, कांग्रेस ने ज्यादा दूरी बना ली.

अब उन्हें रामविलास पासवान ज्यादा भरोसेमंद लगने लगे थे, यह जानते हुए भी कि बिहार के जातीय समीकरण में कभी भी यादव और पासवान जमीनी स्तर पर एक-दूसरे के दोस्त नहीं हो सकते. ऐसी कई गलतियों ने लालू  के सामने आज अस्तित्व का संकट ला खड़ा किया है. नीतीश ने उन्हें विकास और अतिपिछड़ों-महादलितों की राजनीति में घेर लिया. लालू उसी जाल में फंसकर अपनी उपलब्धि भी कायदे से नहीं बता सके कि मछुआरों का टैक्स माफ करके, भूमिहीनों को चार-चार डिसमिल जमीन देने की कवायद शुरू करके उन्होंने भी कोई कम बड़ा काम नहीं किया था. नीतीश ने उन्हें ये बातें कहने का मौका ही नहीं दिया. लालू प्रसाद तो कायदे से भ्रष्टाचार का मसला भी नहीं उठा सके. बाद में दूसरे चरण के चुनाव के बाद नीतीश ने खुद ही आगे बढ़कर भ्रष्टाचार का मसला उठाकर अपनी कमजोरी को अपनी ताकत में बदल लिया.

मुमताज अपनी बातों में आगे जोड़ते हैं, ‘मैंने वह समय भी देखा है जब लालू प्रसाद अपने लोगों को हमेशा नाम से याद रखते थे, संबोधित करते थे, जिससे हम जैसे कार्यकर्ताओं को भी अच्छा लगता था, लेकिन रेलमंत्री बनने के बाद प्रधानमंत्री बनने के सपने में ऐसे खोए कि पूरा का पूरा संगठन ही बिखर गया. और जब तक इस बात को लालू समझ पाते, बहुत देर हो चुकी थी. मुमताज की बातों को यदि लालू के पिछले कुछ समय की गतिविधियों से जोड़कर देखें तो इधर वे लगातार प्रमंडल और जिला स्तर पर कार्यकर्ता सम्मेलन कर रहे थे. वे कार्यकर्ताओं से माफी मांग रहे थे कि रेल और मैनेजमेंट गुरु की फंडई में ऐसे फंसे कि जिलों में अपनी पार्टी के कार्यालय तक नहीं खोल सके. वे यहां तक कहने लगे थे कि जो जिले में पार्टी कार्यालय खोलने के लिए जमीन देगा उसे टिकट भी देंगे. चुनाव परिणाम आने के दो दिनों पहले जब उन्होंने पटना के मौर्या होटल में प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई थी तो पता नहीं कौन से खयाली पुलाव पकाते हुए वे जातीय गणित को जोड़-घटाकर अपनी जीत सुनिश्चित कर रहे थे. प्रो नवल चौधरी कहते हैं कि इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि लालू को जमीनी हकीकत का पता आखिरी दिनों तक नहीं था. यानी वे पूरी तरह से जमीनी राजनीति से कट गए थे वरना इस तरह का आकलन आखिरी दिनों तक नहीं करते.

समाजवादी नेता निवास इस प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए दुष्यंत कुमार का एक शेर सुनाते हैं-

तुम्हारे पांव के नीचे कोई जमीन नहीं, गजब यह है कि तुम्हें यकीन नहीं…

निवास कहते हैं कि ऐसा ही लालू के साथ हुआ. लालू 1990 में चंद्रशेखर और बीपी सिंह के सौजन्य से नेता बन गए. 1995 का चुनाव उन्होंने अपने दम पर जीता. 2000 का चुनाव तो थुक्काफजीहत वाला रहा. तो कायदे से वे एक बार ही अपने दम पर चुनाव जीतकर जमीनी हकीकत भूल गए तो यह तय तो था कि उनका हश्र ऐसा ही होगा. दुष्यंत कुमार का शेर शायद लालू प्रसाद को अभी सुनने में ठीक नहीं लगेगा लेकिन उन्हें रह-रहकर वे सारे दिन तो अब याद आ ही रहे होंगे, जब उन्होंने ‘भूराबाल साफ करो’ का नारा दिया था या जब उन पर ‘जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू’, ‘धन फुलवरिया, धन माई मरछिया, लालू भइया जिनके ललनवा कि जानेला जहनवां ए रामा… ‘ गीत रचे गए थे. तब पूरे बिहार में लालू चालीसा को बेचा और बांटा जाता था. अब कौन सुनेगा लालू चालीसा, कौन सुनाएगा ‘जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू…?’

ऐसा भी नहीं कि लालू के लिए संभावनाओं के सारे द्वार बंद ही हो गए हैं. इस बार राबड़ी देवी को दोनों सीटों पर मिली मात, बेटे तेजस्वी की 100 सभाओं की बेअसरी और नए राजनीतिक साथी रामविलास पासवान के दो भाइयों और दो दामादों की करारी हार से लालू अगर सबक लेते हुए भविष्य की रणनीति तय करेंगे तो उनके लिए राजनीति में अब भी संभावनाएं शेष बचती हैं. यदि मॉडल के तौर पर ही सही लालू अपने पैतृक गांव फुलवरिया जाकर, रुककर सोचें तो उन्हें भविष्य की राजनीतिक यात्रा का खाका तैयार करने में सबसे ज्यादा मदद मिलेगी. उन्हें 20 वर्षों में फुलवरिया में हुए कार्यों का आकलन खुद करना होगा. बड़ा मंदिर, विशाल बरम बाबा का चबूतरा, हेलिपैड, छठ घाट वगैरह-वगैरह, लेकिन हाई स्कूल नहीं. अंधेरे से निकलने के लिए कोई रोशनदान नहीं. ऐसे ही कारणों ने उन्हें बिहार नहीं बल्कि अपने गृह जिले गोपालगंज में भी औंधे मुंह गिराया. लालू प्रसाद आज भी यहां सांप्रदायिकता विरोधी राजनीति के सबसे मजबूत स्तंभ हैं. मुसलमान भी लालू के इस मजबूत पक्ष से अवगत हैं. सहमत हैं. लेकिन बदले हालात में उन्हें भी बाबरी-राम मंदिर से ज्यादा, दंगों की राजनीति से ज्यादा, जस्टिस रजिंदर सच्चर आयोग की रिपोर्ट व अनुशंसा पर काम करा सकने वाला नेता चाहिए. नीतीश को बड़ी जीत मिली है, बड़ी जिम्मेदारी मिली है, तो जनता के सपनों के मुताबिक चुनौतियां भी बड़ी होंगी. लालू सिर्फ सशक्त तरीके से विपक्ष की भूमिका में रहें तो संभावनाएं बनेंगी, बढ़ेंगी, बिखरे कुनबे एकजुट हो जाएंगे.

मगर सत्ता का कैसा भी स्वाद चखने के मौके के लिए उन्हें कम से कम 2014 के लोकसभा चुनावों तक इंतजार करना होगा और बिना रुके विधानसभा से बाहर सड़कों पर, गांव-देहात में संघर्ष करते रहना होगा. तब तक वे 67 साल के भी हो जाएंगे. इस दौरान उन्हें नीतीश की गलतियों से लड़ना है और नीतीश का हर अच्छा काम उनकी सत्ता की राह कुछ और मुश्किल बना सकता है. मगर लालू यह सोचकर खुश हो सकते हैं कि चूंकि अगले तीन-चार साल तक कोई चुनाव नहीं है इसलिए उनके पास अपनी गलतियां सुधारने और तैयारियों के लिए पर्याप्त समय है.