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लामबंदी पर बंद जबान

इस बार चर्चा एक ऐसे तमाशे की जो चैनलों के पर्दे पर नहीं बल्कि पर्दे के पीछे चल रहा है. चैनलों की स्टिंग ऑपरेशन और टेलीफोन टैपिंग में अतिरिक्त दिलचस्पी होती है. राजनेताओं, अफसरों, माफियाओं और हीरो-हीरोइनों आदि के स्टिंग ऑपरेशन या टेलीफोन टेप या प्राइवेट गोपनीय वीडियो दिखाते-सुनाते हुए चैनलों का उत्साह देखते ही बनता है.

लेकिन इन दिनों कुछ टेलीफोन टेपों के कारण चैनलों और कुछ अपवादों को छोड़कर लगभग समूचे मीडिया को सांप सूंघा हुआ है. कोई उसे हाथ लगाने को तैयार नहीं है. सुनाना और दिखाना तो दूर, अधिकांश चैनल उनका नोटिस लेने को भी तैयार नहीं हैं जबकि ये टेप न सिर्फ 2जी घोटाले से जुड़े हुए है. बल्कि उनमें राजनीति, बिजनेस और मीडिया जगत के कई जाने-माने नाम शामिल हैं.

मेरे छात्र अकसर यह सवाल उठा देते हैं कि जब मूल्यों का कहीं आदर और पालन नहीं होता तो यह पढ़ाए क्यों जाते हैं

इन टेलीफोन टेपों में कॉरपोरेट पीआर और लॉबीइंग की दुनिया की  खिलाड़ी नीरा राडिया की 2009 में पूर्व संचार मंत्री ए राजा, उद्योगपति रतन टाटा से लेकर वीर संघवी, बरखा दत्त, प्रभु चावला जैसे बड़े पत्रकारों से अंतरंग बातचीत रिकॉर्ड है. यह बातचीत आयकर विभाग के निर्देश पर रिकॉर्ड की गई थी और सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में इनकी सत्यता प्रमाणित की है. इनमें बहुतेरी बातें ऐसी हैं जो सार्वजनिक महत्व की हैं और जिनका संबंध जनहित से जुड़ता है.
कहने का मतलब यह कि चैनलों के लिए उसमें ‘खेलने और तानने’ के लिए बहुत ‘मसाला’ है. यही नहीं, इन टेपों का संबंध पत्रकारिता की नैतिकता और आचार संहिता से भी है क्योंकि इसमें कई पत्रकार नीरा राडिया जैसी कारपोरेट लाॅबीइस्ट के इशारों पर नाचते हुए दिखाई देते हैं. इसलिए चैनलों से यह अपेक्षा करना अनुचित नहीं है कि वे न सिर्फ इन्हें सुनाएंगे बल्कि इन पर अपने ‘विशेषज्ञों’ से चर्चा/बहस भी करेंगे. लेकिन ‘सच दिखाते हैं हम’ से लेकर ‘खबर हर कीमत पर’ तक सभी चैनलों पर एक ‘षड्यंत्र भरी चुप्पी’ छाई हुई है.

सभी से सवाल पूछने और सबको कटघरे में खड़ा करने वाले चैनल नीरा राडिया टेप पर न कोई सवाल पूछ रहे हैं और न किसी को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं. आखिर क्यों? चैनलों की यह चुप्पी अब बोल रही है. खासकर जब से अंग्रेजी साप्ताहिक ‘ओपन’, ‘आउटलुक’ और ‘मेल टुडे’ आदि पत्र-पत्रिकाओं ने टेपों की बातचीत न सिर्फ छाप दी है बल्कि उसे अपनी वेबसाइटों पर भी मुहैया करा दिया है. इसके बावजूद चैनलों और उनके संपादकों-पत्रकारों की चुप्पी खलनेवाली है. इससे इन आरोपों की पुष्टि होती है कि चैनल खुद अपने अंदर झांकने और अपने विचलनों पर खुलकर बात करने के लिए तैयार नहीं हैं.

लेकिन कुछ बड़े और स्टार पत्रकारों को बचाने के लिए इस मुद्दे को ब्लैकआउट करके चैनल न सिर्फ अपनी साख दांव पर लगा रहे हैं बल्कि दूसरे भ्रष्ट और अवैध-अनुचित काम करने वालों के खिलाफ बोलने की नैतिक शक्ति भी गंवा रहे हैं. इस मुद्दे पर खुली चर्चा इसलिए भी जरूरी है कि इस प्रकरण ने सत्ता, कारपोरेट लॉबी और पावर ब्रोकरों के निरंतर प्रभावी होते गठबंधन में बड़े पत्रकारों-संपादकों की बढ़ती भागीदारी की अब तक दबी-छिपी सच्चाई को सामने ला दिया है. यह भी कि हम-आप चैनलों पर जो देखते हैं वह काफी हद तक कारपोरेट पीआर और लाबीइंग कंपनियों द्वारा निर्मित-निर्देशित होता है.
इसके गहरे निहितार्थ हैं. इसका अर्थ यह हुआ कि लोकतंत्र के चौथे खंभे के रूप में समाचार मीडिया खासकर चैनलों से दर्शकों-पाठकों की तथ्यपूर्ण, वस्तुनिष्ठ, निष्पक्ष और प्रासंगिक सूचनाओं की जो अपेक्षा रहती है, उसका अनादर किया जा रहा है. मीडिया की ताकत का फायदा उठाकर कुछ पत्रकार और चैनल नीतियों, फैसलों और यहां तक कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को भी तोड़ने-मरोड़ने के खेल में लग गए हैं. यह दर्शकों के विश्वास के साथ एक तरह का धोखा भी है.

इस पूरे प्रसंग में सबसे अधिक दुखद एनडीटीवी जैसे विश्वसनीय माने जाने वाले चैनल और उसकी पहचान बन चुकी बरखा दत्त जैसी प्रोफेशनल और मेहनती पत्रकार-संपादक का विचलन है. इस टेप से निश्चय ही बरखा के लाखों प्रशंसकों को धक्का लगा है. यह एक चमकते हुए सितारे के टूटने की तरह है. लेकिन यह एक सबक भी है. सबक यह कि चैनल यह न भूलें कि पत्रकारिता की आत्मा उन एथिक्स में है जो उसे साख और नैतिक प्रभामंडल देते हैं. लेकिन हाल के वर्षों में चैनलों में एथिक्स को ठेंगे पर रखने का रिवाज सा चल गया है.

हालत यह हो गई है कि जिस संस्थान में मैं पत्रकारिता खासकर एथिक्स पढ़ाता हूं, वहां मेरे विद्यार्थी अकसर यह सवाल उठा देते हैं कि जब इनका कहीं आदर और पालन नहीं होता तो यह पढ़ाया क्यों जाता है. यह सवाल मुझे बहुत परेशान करता है. जाहिर है कि मेरे विद्यार्थियों की तरह बहुतेरे युवा पत्रकारों को यह सवाल और भी परेशान करता होगा. इसलिए समय आ गया है जब चैनल न सिर्फ अपने अंदर झांकें बल्कि ऐसी प्रभावी व्यवस्था विकसित करें कि कोई और नीरा राडिया किसी और बरखा को विचलित न कर सके. इसकी शुरुआत इन टेपों पर चुप्पी से नहीं, बात करके ही हो सकती है.             

अनुमानों का घमासान

सालों पहले की बात है किसी अखबार में पढ़ा था कि जब एक आठवीं क्लास की बच्ची से निबंध प्रतियोगिता में सुखमय जीवन पर निबंध लिखने के लिए कहा गया तो उसने अपनी कॉपी में लिखा – 24 घंटे बिजली और प्रतिदिन दो घंटे बिना नागा पानी. उस बालिका को यह एक पंक्ति लिखने पर ही प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार दे दिया गया था. आश्चर्य होता है कि सुखमय जीवन का यह अर्थ एक 12-13 साल की बच्ची और सामान्य से ज्ञान वाले उस प्रतियोगिता के निर्णायकों की तो समझ में आता है मगर उनसे कहीं ज्यादा पढ़े और गुने बिहार चुनाव के विश्लेषक इसे ठीक से समझ या समझा नहीं पाते.

बुनियादी चीजों से ऊपर वाला विकास सबका नहीं होता. वह टुकड़ों-टुकड़ों में लोगों पर असर डालता है

आठवीं की वह बच्ची महानगरीय थी, सड़कों का उसके चारों ओर जाल सा बिछा था, ठीक-ठाक स्कूल में पढ़ती थी और सर्दियों की शुरुआत में मौसम बदलने से जुकाम होने जैसे मामूली संक्रमण के लिए भी उत्तम इलाज की आदी रही होगी. अगर इनमें से कुछ कमी और होती तो शायद वह सुखमय जीवन पर निबंध में ऐसा भी लिख सकती थी – पीने का साफ पानी, सुरक्षित जीवन, ठीक से प्रतिदिन पढ़ाने वाले टीचर, चोट लगने पर सिर्फ मां की फूंक के स्थान पर दवा देकर उसे कम करने वाले डॉक्टर और बरसात में खेत और सड़क के बीच भेद मिटाती कच्ची के स्थान पर पक्की डामर वाली सड़क जिससे हर मौसम में वह अपने स्कूल जा सके.

नीतीश ने बिहार को सबसे पहले ये ही बुनियादी चीजें देने की कोशिश की है. ऐसी चीजें जो सबको आकर्षित करती हैं. ऐसा विकास जो ऊपर से नीचे, पूरब से पश्चिम तक सबका साझा होता है. जो दिखता है, जिसकी कमी खलती है और जिसकी उपस्थिति कदम-कदम पर जिंदगी आसान होने का एहसास दिलाती है. इन बुनियादी चीजों से ऊपर वाला विकास सबका नहीं होता. वह टुकड़ों-टुकड़ों में लोगों पर असर डालता है. आगे आने वाले समय में इसी तरह के विकास की बारी है और वही नीतीश की असल परीक्षा भी होगी.

एक फटेहाल व्यक्ति को कहीं कहते सुना था कि गरीबी बुरी नहीं लगती सर जी लेकिन इससे जो कदम-कदम पर अपने स्वाभिमान की दुर्गति होती है वह खाए जाती है. बिना असुरक्षित हुए कहा जा सकता है कि बिहार के लोगों में भी स्वाभिमान की कोई कमी नहीं. मगर पिछले दिनों शिवसेना से लेकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और शीला दीक्षित से लेकर दिल्ली के उपराज्यपाल तक ने बिहारियों के आत्मसम्मान के साथ खुलकर खिलवाड़ किया है. ऐसे में नीतीश ने जिस प्रकार से हर तरह की संभावनाओं की बारिश से एक आम बिहारी को सराबोर किया है उसका कुछ-न-कुछ ईनाम तो उन्हें मिलना ही था.

कहा जा रहा है कि इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में बीसवीं सदी के आखिरी चतुर्थांश के उलट सत्ता विरोधी लहर का प्रभाव कम हो रहा है. गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, बिहार आदि उदाहरण के रूप में पेश किए जा रहे हैं. इस मामले में भाजपा कांग्रेस से आगे निकलती लग रही है. ध्यान से देखें तो समझ आएगा कि ऐसा कुछ क्षेत्रीय नेताओं की करनी का नतीजा है. मसलन नरेंद्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह, नीतीश कुमार, वाईएसआर इत्यादि. कांग्रेस पिछड़ती लग रही है क्योंकि उसके पास मजबूत क्षेत्रीय नेताओं का अभाव है या उन्हें केंद्र की राजनीति का चस्का लग चुका है. जबकि भाजपा में इसके उलट मजबूत केंद्रीय नेताओं का अभाव है. मगर यह कोई आज की बात नहीं है. बीते कल में भी जिन भी प्रदेशों में कद्दावर और परिवर्तन की संभावनाओं से भरे-पूरे राजनेता रहे वहां सत्ता विरोधी लहर उतनी असरकारी कभी नहीं रही. उदाहरण बंगाल के साथ खुद बिहार का भी है जहां आज के धूल-धूसरित लालू लगातार 15 साल तक ‘राजशाही’ भोग चुके हैं.

कहीं से यह भी आवाज आ रही है कि पिछली बार की तरह यह मत भी विकास के पक्ष में कम और लालू प्रसाद के विरोध का ज्यादा है. ऐसा भी तो हो सकता है कि जिन लोगों ने लालू के विरोध में मत दिया हो उन्होंने उनकी विकास विरोधी छवि के लिए ऐसा किया हो और जिन्होंने लालू को मत दिया हो उनमें से कुछ ने उनकी रेलवे मंत्रालय वाली विकास समर्थक छवि के चलते ऐसा किया हो. तो फिर यह विकास के पक्ष वाला मत कैसे नहीं हुआ? क्यों हम हर राजनीतिक दल या उसके नेताओं को तो तरह-तरह के मौके देने के लिए तैयार रहते हैं लेकिन जनता, जो सही मायनों में परिपक्व है, को ऐसा कोई मौका नहीं देना चाहते. अगर पिछले तीन दशकों ने कमंडल की राजनीति को निस्तेज किया है तो पहचान पर आधारित राजनीति को लेकर भी तो लोगों में परिपक्वता आ सकती है. 

संजय दुबे

वरिष्ठ संपादक

ब्रेक के बाद वापस मत आइए : ब्रेक के बाद

फिल्म ब्रेक के बाद

निर्देशक दानिश असलम 

कलाकार इमरान खान, दीपिका पादुकोण, शाहना गोस्वामी, शर्मिला टैगोर 

रेणुका कुंजरू और दानिश असलम को गलतफहमी थी कि इम्तियाज अली जैसी फिल्में लिखकर हिट हो जाना दुनिया का सबसे आसान काम है और नकल से चिढ़ने वाले लोगों के लिए खुशखबरी है कि वे बुरी तरह असफल हुए हैं. यह फिल्म बॉलीवुड या किसी भी बाजार की इस भेड़चाल की भी पोल खोलती है, जो एक प्रोडक्ट ज्यादा बिक जाने पर बिना सोचे समझे रंग बदलकर उसकी नकल निकालने के आइडिया से आगे सोच ही नहीं सकती. फिल्म की आत्मा शायद कहीं तेल लेने चली गई है क्योंकि पूरी फिल्म में हम पर डायलॉग्स की लगातार बमबारी होती है लेकिन न हंसना आता है, न रोना. दीपिका बार-बार गुस्से में पैर पटकती हुई इतनी ओवरएेक्टिंग करती हैं कि ‘लव आजकल’ की उनकी बिलकुल इसी किरदार की अच्छी छवि को भूल जाने का मन करता है. लेखक रेणुका और दानिश तो इम्तियाज से इतने प्रभावित हैं कि जाने-अनजाने सीन भी उठकर इधर आ गए हैं. कहीं आपको ‘सोचा न था’ दिखती है, कहीं ‘जब वी मेट’ और कहीं ‘लव आजकल’.

सब कुछ है. कहानी वैसी ही है और उसे दिखाने का अंदाज भी लेकिन सारे किरदार नकली हैं और वे लंबे लंबे तथाकथित ‘चुटीले’ डायलॉग लगातार बोलते जाते हैं. दीपिका और इमरान की कैमिस्ट्री ऐसी फिजिक्स बन गई है जिसका भार शून्य है. दीपिका ने जो एकाध अच्छे रोल किए हैं, उनके पुण्यों को वे इस पाप से लगभग धो ही लेती हैं. अब छोटे कपड़ों में उनके अच्छे शरीर के लिए ही फिल्म देखनी है तो बेहतर है कि मुफ्त में उनकी तस्वीरें ही देख ली जाएं. इमरान खान हमेशा की तरह ऐसे ब्याज की तरह हैं जो शायद आमिर खान के ऋणी इस देश को लगातार कचोटता है. वे कहीं और खोए से रहते हैं. हमारे कहने से एेक्टिंग तो वे छोड़ेंगे नहीं इसलिए यह भी हम पर अहसान होगा कि वे ठीक से हिन्दी बोलना ही सीख लें. 

दानिश कुणाल कोहली के सहायक भी रह चुके हैं और कुणाल इस फिल्म के निर्माता भी हैं. कुणाल कोहली की ओवररेटेड बाकी फिल्मों और बॉलीवुड की अधिकांश हिट प्रेम कहानियों की लीक पर चलते हुए दानिश को भी शायद यह भ्रम है कि वे प्यार के बारे में सबसे ज्यादा जानते हैं और यह ज्ञान उन्हें दुनिया से बांटना चाहिए. इसीलिए उनके किरदार भी अपनी आधुनिक हिंग्लिश के बावजूद बीच-बीच में करण जौहर की फिल्मों की तरह प्यार, दुनिया और रिश्तों को बचाने के उपदेश देने लगते हैं.

‘दूसरों को खुशी देने से ही खुशी मिलती है’ टाइप बातें फिल्म को और असहनीय बनाती हैं. यहां तो प्रसून ‘लड़की क्यों’ जैसे वे गाने भी नहीं लिख पाते जिनकी शरण में कुछ शांति मिले. हां, गाने फिल्म से तो बेहतर हैं ही. फिल्म से बेहतर शुरू के टाइटल्स दिखाने का अंदाज भी है और आखिरी सीन भी, क्योंकि उसमें फिल्म खत्म होने की खबर छिपी है.

गौरव सोलंकी

अपनी संस्कृति ठुकरा कर हम बस कैरीकेचर बन सकते हैं

समाज और संस्कृति पर लगभग 14 किताबें लिखने के बाद पवन कुमार वर्मा ने भारत में थोपी हुई औपनिवेशिक संस्कृति और भारतीयता के सवाल पर साल के शुरू में एक किताब लिखी-बिकमिंग इंडियन. हिंदी में इसका अनुवाद भारतीयता की ओर नाम से पेंगुइन से प्रकाशित हुआ है. मूलतः गाजीपुर के रहनेवाले वर्मा अभी भारतीय विदेश सेवा में हैं और एक उपन्यास लिखने की सोच रहे हैं. पेश हैं उनसे रेयाज उल हक की बातचीत के मुख्य अंशः

संस्कृति पर किताब लिखने की जरूरत कब महसूस हुई. इसके लिए सामग्री का चयन कैसे किया. इस दौरान कैसी समस्याएं सामने आईं?

मैं कई सालों से मैं बाहर रह रहा हूं. हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में उपनिवेशवाद के नतीजे बहुत दिखते हैं, भाषा, विचार, सोच और दूसरी रचनात्मक कोशिशों में इसका प्रभाव आसानी से दिखता है. खास तौर से  जब मैं लंदन के नेहरू केंद्र का निदेशक था, तब इस बात पर गंभीरता से सोचना शुरू किया. मुझे यह समझ आया कि जिनकी अपनी संस्कृति में जड़ें होती हैं, वही वैश्वीकरण के इस दौर स्वाभिमान से बराबरी पर बातचीत कर सकते हैं. विदेश सेवा में रहने के दौरान पूरी दुनिया में घूमने के बाद जो मेरी समझ में आया वह यह है कि हमारे देश में उपनिवेशवाद के राजनीतिक और आर्थिक नतीजों का विश्लेषण तो बहुत हुआ है लेकिन संस्कृति और अस्मिता पर गौर कम किया गया है. मुझे लगा कि इस पर बात करना जरूरी है क्योंकि औपनिवेशिक ताकतों का मकसद शारीरिक नियंत्रण नहीं होता. उनका उद्देश्य हमेशा मानसिकता पर नियंत्रण करना होता है. इसके बारे में मेरे मन में तब से यह बातें चल रही थीं, जब 1984 में दिल्ली के खान मार्केट में एक किताब की दुकान में खोजने पर मुझे गालिब की किताब नहीं मिली. लंदन में यह संभव नहीं है कि आपको वहां किसी दुकान पर यीट्स की किताब न मिले. तबसे मैं इसकी वजहों की तलाश कर रहा था. मैंने अपने जीवन के अनुभवों और रोजमर्रा की चीजों को देखते हुए इस पर विचार करना शुरू किया. लोगों से बातचीत के नोट्स बनाए. इसके अलावा लंदन में रहते हुए मैंने वहां की लाइब्रेरी से भी काफी मदद ली. इस पर काम कम हुआ है इसलिए दिक्कतें तो कई आईं. फिर एक डिप्लोमेट होने की व्यस्तता अलग थी. फिर भी लगातार लिखने, पढ़ने और चीजों को देखते हुए उन पर विचार करने से यह किताब मुमकिन हो पाई.

किताब पहले अंगरेजी में छप चुकी है. इस पर आपको कैसी प्रतिक्रियाएं मिलीं?

भारतीय स्तर पर बहुत से ऐसे लोगों ने मुझसे कहा कि मुद्दे बहुत अहम हैं और उन पर सोचना अनिवार्य है. पर कुछ लोगों को मेरी टिप्पणियां तीखी भी लगीं. खास तौर से अंगरेजियत में डूबे लोगों को. मुझे इससे कोई ऐतराज नहीं है क्योंकि किताब का मकसद तभी हासिल होता है जब उसे सिर्फ सराहनेवाले ही न हों, उसकी मुखालिफत करनेवाले लोग भी हों. खास तौर से भाषा को लेकर, वे लोग जो अंगरेजियत के कारण सत्ता में हैं, उन्होंने एक विरूपण (डिस्टॉर्शन) या सरलीकरण किया कि मैं अंग्रेजी के खिलाफ हूं और हिंदीवादी हूं. मेरा ऐसा मानना नहीं है. अंगरेजी एक विश्व भाषा है जिसे सीखने के अपने फायदे हैं. पर सिर्फ अंगरेजी सीखने और अपनी भाषाओं को दरकिनार करके हम अपना ही नुकसान कर रहे हैं. भाषाएं दो तरह की होती हैं. एक तो संपर्क की भाषा होती जिसमें आप किसी से संवाद करते हैं. और दूसरी आपकी संस्कृति की भाषा होती है, जिसमें आप सोचते हैं, जिसमें आपकी लोक कथाएं, गीत, मां की लोरियां और गालियां होती हैं. यह दुनिया से आपके जुड़ने की अपनी खिड़की है. अगर इस भाषा को छोड़ कर इसे आप बंद कर देंगे तो आप इनसे विहीन हो जाएंगे. अंगरेजी संपर्क की भाषा जरूर रहे, लेकिन अपनी भाषाएं भी न छोड़ी जाएं, मैं यह कह रहा हूं. लेकिन हालात ये हैं कि अंग्रेजी के साथ एक प्रभुता का भाव आता है और हिंदी के साथ हीनता का. जिस देश के पास भाषाओं की 2-3 हजार साल पुरानी विरासत है वे अपनी भाषा छोड़ कर अंग्रेजी अपना लें, यह मुझे नामंजूर है क्योंकि यह आत्मसम्मान की बात होती है. आप इसे ज्ञानपीठ के मामले में देख सकते हैं. मेरे एक कवि मित्र हैं, उन्हें ज्ञानपीठ मिला लेकिन उनकी किताब की महज 870 प्रतियां बिकीं. इन्हीं वजहों से हम कुछ मौलिक नहीं दे पा रहे हैं. आप हमारे देश के विश्वविद्यालयों में मानविकी विभागों को देख लीजिए, लाइब्रेरी, संग्रहालयों आदि सबको देख लीजिए, किस हालत में हैं वे. कहीं न कहीं सारी चीजें आत्मसम्मान, भाषा और सांस्कृतिक स्वाभिमान से जुड़ी हैं. और उस मौलिक सोच को वापस लाना होगा. विरूपण और विवेकहीन नकलचीपन हमें फिर से दुनिया में विचारों के क्षेत्र में स्थापित नहीं कर सकते. मैं सिर्फ हिंदी की सिफारिश नहीं कर रहा. लोग अपनी भाषा सीखें और एक दूसरी भारतीय भाषा सीखें. चाहें तो छठी कक्षा के बाद अंगरेजी भी सीखें. मेरा मानना है कि सारी भाषाओं के बीच मतभेद खत्म हो जाएं अगर हम अपनी समझ से काम करना शुरू कर दें. चुनौती तीव्र है, क्योंकि एक उपनिवेश होने के नाते हमारे सामने जो सांस्कृतिक चुनौतियां थीं, उनसे हम निपट भी नहीं पाए थे कि वैश्वीकरण शुरू हो गया जिसमें बड़ी तेजी से कोऑप्शन हो रहा है. मैं नई चीजों का विरोध नहीं कर रहा हूं, लेकिन हमें चुनना होगा कि हम क्या अपनाएं और क्या छोड़ें. और यह वही कर सकते हैं जो अपनी संस्कृति से जुड़े हैं. हम फोटोकॉपी नहीं बन सकते, जबकि हम यही बन रहे हैं. इससे विदेशी भले हमारे मुंह पर हमारी तारीफ कर दें, पीठ पीछे वे हंसते हैं कि ये तो हमारी फोटोकॉपी हैं या उनकी कोशिश यही बनने की है.

अपनी संस्कृति पर बात करते हुए हमेशा अतीतजीवी या प्राचीनता को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने का खतरा रहता है, जिसका इस्तेमाल दक्षिणपंथ भी कर सकता है.

मैं ग्लोरीफाई नहीं कर रहा. मैं तो अपनी कमजोरियों को समझता हूं. इसीलिए तो मैं कहता हूं कि बिना शॉवेनिज्म के, विना उग्र और अति राष्ट्रवादी हुए हमें अपनी संस्कृति को अपनाना होगा. जो यह मानते हैं कि उनका कोई इतिहास नहीं है, वे मूर्ख हैं. क्योंकि बिना इतिहास को नजर में रखे न हम वर्तमान को समझ सकते हैं और न ही भविष्य का निर्माण कर सकते हैं.

लेकिन एक सवाल यह भी आ रहा है कि औपनिवेशिक संस्कृति के बरअक्स जिस संस्कृति की चर्चा हो रही है, वह ब्राह्मणवादी क्यों है. और उसे ऐसा क्यों होना चाहिए.

मैं कहता हूं कि आप संस्कृति को परिभाषित मत कीजिए. बस एक कसौटी रखिए कि नकलचीपन को छोड़ दीजिए, जिसे आप बिना सोचे समझे अपना लेते हैं. आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इस नकलचीपन से जूझ लीजिए, यही क्रांति है. अगर दलितों-पिछड़ों का आर्थिक उत्थान अंगरेजी से होता है तो यह अच्छी बात है और अंगरेजी सीखनी चाहिए. पर क्या इसके लिए अपनी भाषा और संस्कृति छोड़ देना अनिवार्य है. यह बेहद सरलीकरण है कि अंगरेजी ही एकमात्र रास्ता है. एक दौर था जब अंगरेज थे और अंगरेजी सीखने से ऊपर ऊठने के रास्ते खुलते थे. लेकिन आज हमारे यहां लोकतंत्र है. अब हमें संतुलन बना कर रखना होगा. यह मैं अटल मान कर चलता हूं कि अपनी भाषा और संस्कृति को ठुकरा कर कोई समृद्ध नहीं हो सकता. इससे आप बस एक कैरीकेचर बन सकते हैं.

बढ़ता दायरा घटता प्रभाव!

पिछले कुछ समय में बिहार में नक्सली हिंसा कम हुई है लेकिन नक्सल प्रभावित इलाके बढ़े हैं. इस बार नक्सलियों द्वारा बहिष्कार की घोषणा के बावजूद विधान सभा चुनाव में मतदान का प्रतिशत बढ़ा है. इसे नक्सलियों के घटते असर के रूप में देखा जाए या उनकी बदली रणनीति के तौर पर, बता रहे हैं निराला

एनएच टू यानी जीटी रोड पर है डोभी. डोभी से ही गयाबोधगया जाने के लिए गाड़ियां मुड़ती हैं. यहीं से दूसरी ओर भी एक रास्ता मुड़ता है. झारखंड के चतरा की ओर जाने के लिए. यहां से छहसात किलोमीटर दूर एक छोटासा बाजार है, कोठवारा.

हम कोठवारा बाजार में ही बैठकर इलाके की राजनीति, स्थानीय समस्या और चूंकि यह क्षेत्र नक्सलियों के गढ़ के रूप में भी जाना जाता है, इसलिए इलेक्शन के नक्सल कनेक्शन को समझने की कोशिश करते हैं. यहां हमारी मुलाकात आनंदस्वरूप से होती है. वे बताते हैं, ‘मसला सिर्फ एक था कि पुल चाहिए. हमने एकएक कर वामपंथी समेत सारे दलों को आजमा लिया, लेकिन किसी ने हमारी नहीं सुनी. आखिर में तय यह हुआ कि पुल नहीं तो वोट नहीं.’ कोठवारा के बाद फलगु नदी के पार पड़नेवाले करीबन 40 गांवों की 30 हजार आबादी के लिए सिर्फ एक पुल चाहिए. लगे हाथ वे यह भी समझाते हैं कि इससे यह समझने की भूल की जाए कि वे नक्सलियों के वोट बहिष्कार का समर्थन करेंगे. अगर ऐसा करना होता तो यहां कभी भी वोट नहीं पड़ते, क्योंकि एक पुल नहीं होने के कारण नक्सलियों ने कोठवारा पार के लेंबोगढ़ा, बरिया, नावाडीह, सुगासोत, बलजोरी बिघा, सुग्गी, पंड़री, खरांटी जैसे 30-40 गांवों को जाने कितने सालों से अपना सुरक्षित आशियाना बना रखा है. वे हर बार परचापोस्टर चिपकाते हैं. लेकिन उनकी जोरदार उपस्थिति वाले इलाके में कभी उनके बहिष्कार वाले परचेपोस्टरों का असर नहीं पड़ता. इस बार हम स्वेच्छा से यह निर्णय ले रहे हैं.

कोठवारा की तरह ही जहानाबाद के एक गांव में भी यही स्थिति देखने को मिली. जहानाबाद शहर से सटा हुआ गांव है मुठेर, जो विकास की राजनीति, जाति की राजनीति आदि के हिसाब से मॉडल गांव है. यहां पिछड़ी, अतिपिछड़ी, दलित, महादलित, अल्पसंख्यक आदि जातियों का वास है. मुठेर पंचायत मुख्यालय है लेकिन पिछले आठ साल से यहां बिजली नहीं है. आबादी करीब दस हजार की है. मुठेर में पंकज नाम के एक युवा से मुलाकात होती है. पंकज पटना में पढ़ाई करता है, लेकिन वोट के दिन वह अपने गांव में ही था. वह बताता है, ‘हमारे गांव के आसपास नक्सलियों का डेरा शुरू से ही रहा है. खाना खिलाने आदि का रिश्ता भी मजबूरी में ही चलता रहा है लेकिन यहां के लोगों ने कभी उनके चुनावों के बहिष्कार की अपील को नहीं माना और मान सकते हैं. हम जानते हैं कि हमारा गांव अंधेरे में है लेकिन नक्सलियों की बात मानकर कौन सा उजाला जाएगा! हम वोट बहिष्कार करते हैं तो वह भी हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक हिस्सा होता है. हम वोट बहिष्कार से ही अपनी उम्मीदें पूरी होने की उम्मीद करते हैं.’

इस बार के बिहार चुनाव में ऐसी ही स्थितियां अलगअलग हिस्सों में दिख रही हंै. चुनाव के पहले कजरा हिल प्रकरण (जहां चार पुलिसकर्मियों को नक्सलियों ने अगवा करके बाद में इनमें से एक लुकस टेटे को मार दिया था) से लेकर शिवहर, लखीसराय कांड कर, शेरघाटी में विस्फोट, औरंगाबाद के मदनपुर में प्रत्याशी को अगवा कर नक्सलियों ने खौफ पैदा करने की कोशिश तो की लेकिन उनकी रणनीति उन्हें ही मात देती हुई नजर रही है. वोट बहिष्कार का असर होने की बजाय मतदान का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है. बिहार में पांच चरण के चुनाव खत्म हो चुके हैं. जिसमें चुनाव आयोग को मिली आधिकारिक सूचना के अनुसार 33 जगहों पर चुनाव बहिष्कार की बात सामने आई है. लेकिन खुफिया विभाग की सूचना के अनुसार इनमें से कजरा हिल वाले इलाके को छोड़ दें तो शायद ही कहीं माओवादियों के फरमान की वजह से वोटों का बहिष्कार हुआ हो. सभी जगह स्थानीय कारण रहे. यूं भी बिहार में जिस तरह से माओवादियों ने वोट बहिष्कार के बहाने जो काम किए, उनसे उनके भीतर की कमजोरियां ही सामने आईं. कजरा हिल प्रकरण में लुकस टेटे को मार दिया जाना माओवादियों के अंदर जातिगत समीकरणों का असर माना गया तो उसके बाद भी वोट बहिष्कार के नाम पर जहांजहां अटैक हुए, उससे ऐसा नहीं लगा कि उनका इरादा लोकतंत्र या संसदीय राजनीति का विरोध करने का है, बल्कि वे उम्मीदवारों को जितानेहराने के हिसाब से निशाने साधते रहे. समाजशास्त्री और नक्सलियों के प्रभाव पर अध्ययन कर रहे डॉ सचिंद्र नारायण कहते हैं, ‘माओवादियों को यदि समग्रता में वोट का ही बहिष्कार करवाना होता तो वे सबसे पहले चंपारण में ऐसा करवाने की कोशिश करते जहां नेपाल के माओवादियों से बेहतर संबंध होने की वजह से उनका गहरा असर है. लेकिन चंपारण में इन्होंने कुछ भी नहीं किया. बिहार में और भी कई जगहें हैं जहां माओवादियों का गहरा प्रभाव है लेकिन उन जगहों पर इन्होंने चुनाव बहिष्कार के लिए परचेपोस्टर तक नहीं लगाए. इससे साफ जाहिर होता है कि इनका इरादा कुछ और है.’ यूं भी देखें तो इस बार माओवादी संगठनों से जुड़े हुए लोग या उनके परिजन बड़ी संख्या में चुनावी मैदान में हैं. खुफिया विभाग के एक अधिकारी कहते हैं, ‘अब तक जो सूचना आई है उसके अनुसार करीब दो दर्जन उम्मीदवार ऐसे हैं जिनका परोक्ष या प्रत्यक्ष तौर पर नक्सलियों से रिश्ता है इस वजह से भी माओवादियों के फरमान का कोई असर नहीं पड़ रहा. माओवादी खुद चुनाव लड़कर सत्ता सुख भी काटना चाहते हैं और उसका विरोध भी करते रहना चाहते हैं, यह कब तक

ओबामामेनिया के शिकार चैनल

पता नहीं, गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड्स को खबर है या नहीं लेकिन समाचार चैनलों ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे का लगातार 72 घंटे कवरेज करके एक नया रिकॉर्ड बना दिया है. मुझे नहीं लगता कि इससे पहले किसी राष्ट्राध्यक्ष को इतना अधिक और व्यापक कवरेज मिला होगा. चैनलों को इस रिकॉर्ड के लिए बधाई देते हुए भी पूछने की इच्छा हो रही है कि क्या मनमोहन सिंह की अमेरिका यात्रा को भी वहां के मीडिया में इतनी ही जगह मिलेगी. दूसरे, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए बेचैन चैनल क्या भारत यात्रा पर आने वाले अन्य राष्ट्राध्यक्षों की भी नोटिस लेते हैं?

ओबामा से ठीक दो दिन पहले भारत आए मलावी के राष्ट्रपति बिंगु वा मुथारिका की यात्रा को कितने चैनलों ने कवर किया? याद रहे मलावी भारत की ही तरह जी-20 का सदस्य है. लेकिन अमेरिका और ओबामामेनिया से ग्रस्त चैनलों को इन सवालों पर सोचने की फुर्सत कहां थी? ऐसा लगा जैसे तीन दिनों के लिए देश ठहर-सा गया है. ओबामा के अलावा और कोई खबर नहीं है.

72 घंटे की अहर्निश कवरेज कोई मजाक नहीं है खासकर तब जब चैनलों की राष्ट्रपति ओबामा तक सीधी पहुंच नहीं थी. असल में, योजना के मुताबिक उन्हें पृष्ठभूमि में रहकर ही इस यात्रा का माहौल बनाना था. चैनलों को इस खेल में महारत है. ‘आधी हकीकत, आधा फसाने’ के तर्ज पर हर बेमतलब की जानकारी परोसी गई जैसे- अमेरिकी राष्ट्रपति के खास विमान- एयरफोर्स वन और कैडिलक कार, उनकी सुरक्षा में लगी अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां व एजेंट,  ओबामा जिस होटल में ठहरे उसका प्रेसिडेंट सुइट, प्रधानमंत्री के घर हुई डिनर पार्टी का मेन्यू और मिशेल ओबामा के नाच और खरीददारी तक.

अधिकांश चैनलों के स्टूडियो यानी घाट पर ओबामा के कहे-अनकहे एक-एक शब्द की व्याख्या के लिए विदेश नीति, रक्षा और रणनीति के जाने-पहचाने पंडितों के अलावा राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं (स्पिनर्स) की भीड़ जमा कर ली गई. हमेशा की तरह वही कुछ जाने-पहचाने चेहरे और उनकी वही घिसी-पिटी बातें थीं, लेकिन 72 घंटे तक इसे ‘खींचने-तानने’ का दबाव ऐसा था कि आखिर आते-आते दोहराव के कारण वे बातें न सिर्फ बकवास लगने लगीं बल्कि एंकरों और पंडितों दोनों की थकान और बोरियत भी साफ दिखने लगी.

आश्चर्य नहीं कि इस थकान के कारण स्मार्ट एंकर और विशेषज्ञ पंडित भी संसद में ओबामा के भाषण और भारत-अमेरिका साझा बयान की कई महत्वपूर्ण बातें या तो अनदेखी कर गए या समझ ही नहीं पाए. वैसे इतने व्यापक और रिकॉर्ड कवरेज और बतकुच्चन के बावजूद चैनलों ने ओबामा यात्रा के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज किया. वजह यह थी कि उन्होंने इस दौरे के कवरेज और विश्लेषण का एजेंडा पहले से ही तय कर लिया था. एक बहुत ही संकीर्ण दायरे और सीमित मुद्दों के इर्द-गिर्द ओबामा की पूरी यात्रा को देखा और दिखाया गया.

बारीकी से देखिए तो ऐसा लगता है जैसे यह सब पूर्व नियोजित और एक रणनीति के तहत था ताकि ओबामा की यात्रा की सफलता और भारत के अमेरिकी खेमे में शामिल होने के पक्ष में अनुकूल राजनीतिक माहौल बनाया जा सके. चाहे वह दौरे की शुरुआत में होटल ताज में दिए गए ओबामा के भाषण में ‘पी’ यानी पाकिस्तान शब्द का जिक्र न होने को लेकर चैनलों पर शोर-शराबा हो या यात्रा शुरू होने से पहले स्थायी सदस्यता के मुद्दे पर किसी स्पष्ट वायदे से ओबामा का इनकार- इसके जरिए तनाव, उद्विग्नता और अपेक्षाओं का ऐसा माहौल बनाया गया कि जब ओबामा ने संसद में अपने भाषण में ‘पी’ शब्द और सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का उल्लेख किया तो असली मुद्दों को भूलकर चहुंओर ओबामा की जय-जयकार शुरू हो गई.

असल में, इस सामूहिक शोर में ऐसा माहौल बनाया गया गोया ओबामा के समर्थन करते ही सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता मिल जाएगी. जबकि सच्चाई यह है कि ओबामा ने एक ऐसा चेक दिया है जो कब भुनेगा यह किसी को पता नहीं. स्थायी सदस्यता का रास्ता न सिर्फ बहुत लंबा बल्कि अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति की कई जटिलताओं से भरा भी है. 

इसी तरह, चैनलों खासकर अर्णब गोस्वामी और ‘टाइम्स नाउ’ का पाकिस्तान ऑब्सेशन सारी हदें पार कर गया है. ओबामा के ताज के भाषण के बाद अर्णब के शुरू करते ही सभी चैनलों ने पाकिस्तान को लताड़ने को इतना बड़ा मुद्दा बना दिया जैसे कोई बच्चा अपने पिता से बिगड़ैल भाई की शिकायत कर रहा हो. नतीजा- जैसे ही पिता ने पाकिस्तान को लताड़ा, रूठे चैनल ऐसे नाचने लगे जैसे ओबामा ने उनकी मुंहमांगी मुराद पूरी कर दी हो.

लब्बोलुआब यह कि चैनलों ने 72 घंटे के कवरेज के रिकॉर्ड के बावजूद ओबामा की यात्रा के राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक निहितार्थों का खुलासा करने में नाकाम रहने का भी रिकॉर्ड बनाया. या कह सकते हैं कि यह उनका उद्देश्य भी नहीं था. इस कवरेज को देखकर आज मार्क्स होते तो कहते कि ‘समाचार चैनल मध्यवर्ग और बुद्धिजीवियों की अफीम हैं.’

पहले जीत तो जाएं नीतीश कुमार

बिहार के विधानसभा चुनावों में किसकी जीत होने जा रही है? मीडिया की खबरों और चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों पर भरोसा करें तो नीतीश कुमार वहां फिर से सरकार बनाएंगे. कुछ अनुमान यहां तक बता रहे हैं कि नीतीश कुमार दो-तिहाई से ज्यादा सीटें जीतकर आएंगे.

लेकिन क्या ऐसे अनुमानों पर हमें भरोसा करना चाहिए? कम से कम अतीत इसकी इजाजत नहीं देता. चुनावी भविष्यवाणियां हमारे यहां मुंह की खाती रही हैं, इसकी मिसालें एक नहीं अनेक हैं. चाहें तो याद कर सकते हैं कि 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनावों में ज्यादातर अखबारों ने राजीव गांधी और कांग्रेस की हार की भविष्यवाणी की थी. जिन्होंने नहीं की उन्होंने भी यह उम्मीद नहीं की थी कि राजीव गांधी को इतना व्यापक समर्थन मिलेगा. लेकिन राजीव गांधी को 400 से ज्यादा सीटें मिलीं, जिसकी कल्पना भी आज कोई दल नहीं कर सकता. इस चुनावी नतीजे के बाद कई अख़बारों ने अपनी गलत भविष्यवाणी के लिए पाठकों से माफी मांगी.

मान लें कि वह पुराना दौर था. आखिर 25 साल पहले पत्रकार अपने अनुमानों पर चला करते थे और उन दिनों चुनावी सर्वेक्षणों की कहीं ज्यादा वैज्ञानिक समझी जाने वाली पद्धति विकसित नहीं हुई थी. लेकिन गलत भविष्यवाणियों का इतिहास खुद को लगातार दुहराता रहा है.
2004 के लोकसभा चुनावों से पहले सारे सर्वेक्षण और एग्जिट पोल चीख-चीखकर बता रहे थे कि अटल बिहारी वाजपेयी की वापसी हो रही है. वे भारत उदय और फील गुड के गुब्बारों के दिन थे और यह अनुमान आम था कि एनडीए से जुड़े दल 300 से ज्यादा सीटें लाएंगे. कुछ उत्साही पत्रकारों और सर्वेक्षणों का आकलन 400 सीटों तक जा रहा था. जब नतीजे आए तो सारे अखबारों और टीवी चैनलों ने हैरानी से देखा कि एनडीए 200 सीटों का भी आंकड़ा छू नहीं सका.

विकास पुरुष बनने की कोशिश कर रहे नीतीश को भी मालूम है कि बिहार के सामाजिक पूर्वाग्रह उसके तथाकथित आर्थिक बदलाव पर भारी पड़ेंगे

कुछ और आगे बढ़ें. 2007 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के वक्त भी सर्वेक्षणों और एग्जिट पोल का खेल चला. लेकिन किसी सर्वेक्षण में यह उम्मीद नहीं जताई गई कि उत्तर प्रदेश में किसी एक दल को अपने बूते बहुमत मिलने जा रहा है. हर तरफ त्रिशंकु विधानसभा का शोर था और राजनीतिक पंडित आने वाले दिनों के समीकरण जोड़-घटा रहे थे. लेकिन बीएसपी को मिली कामयाबी ने फिर इन पंडितों को अंगूठा दिखाया और उन्हें मजबूर किया कि वे समीकरण जोड़ने की जगह यह समझने की कोशिश करें कि उनके अपने आकलन कहां और क्यों गलत हो गए.
तो इन चुनावी सर्वेक्षणों पर हम कितना भरोसा करें? क्यों मान लें कि बिहार में जेडीयू और नीतीश कुमार की वापसी हो रही है? निश्चय ही इस तर्क की यह व्याख्या नहीं होनी चाहिए कि नीतीश की वापसी संदिग्ध है या वे हार रहे हैं. अगर सर्वेक्षणों के गलत होने के उदाहरण हैं तो उनके सही साबित होने की मिसालें भी हैं. बिलकुल सही-सही भविष्यवाणी उन्होंने भले न की हो, लेकिन ऐसे मौके एकाधिक रहे हैं जब उन्होंने हवा की ठीक-ठीक थाह ली है.

लेकिन बिहार के संदर्भ में चुनावी सर्वेक्षणों पर भरोसा न करने की वजह मेरे लिए सिर्फ अतीत के अनुभव नहीं हैं, वर्तमान की हवाएं भी हैं. बिहार से छन-छन कर आ रही खबरों को ध्यान से देखें तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि वहां लंबे अरसे तक लालू यादव के जायज-नाजायज विरोध से पैदा हुआ ध्रुवीकरण खबरों के विश्लेषण का रंग बदल रहा है. इसी का नतीजा है कि नीतीश विकास के नए नायक की तरह पेश किए जा रहे हैं और लालू-पासवान की जोड़ी में पुरानी अराजकता का डर पैदा किया जा रहा है.

बेशक, नीतीश कुमार ने बिहार में काम किए होंगे. कम से कम दो मोर्चे ऐसे हैं जिनमें नीतीश बाहर वालों की वाहवाही लूटते रहे हैं. लोगों का कहना है कि राज्य की कानून व्यवस्था पहले के मुकाबले कहीं बेहतर है और गांवों-कस्बों और शहरों में सड़कें सुधर गई हैं. बिहार जिस ठहराव को पिछले कुछ वर्षों में जीता रहा है उसके आईने में यह हलचल भी लोगों को बहुत प्रभावित कर रही है. लेकिन क्या बिहार का सच इतना सा है- साफ-सुथरी सड़कें और उन पर साइकिल चला रही स्कूल जाती लड़कियां? काश कि कम से कम इतना तो सच हो. काश कि वाकई बिहार का चुनाव सिर्फ विकास के वादों और नारों पर लड़ा जा रहा हो.

लेकिन बिहार का विकास पुरुष बनने की कोशिश कर रहे नीतीश कुमार को भी मालूम है कि बिहार के सामाजिक पूर्वाग्रह उसके तथाकथित आर्थिक बदलाव पर भारी पड़ेंगे. इसलिए वे सिर्फ सड़कों और पुलों की दुहाई नहीं दे रहे, वे सिर्फ सुधरी हुई कानून-व्यवस्था का हवाला नहीं दे रहे हैं, वे बहुत चौकन्नेपन से महादलित, अतिपिछड़ा और अल्पसंख्यक जैसी सरणियां भी तैयार कर रहे हैं. इस सीवन में उन्हें कोई झोल मंजूर नहीं, यह उन्होंने एक दूसरे विकास पुरुष गुजरात के नरेंद्र मोदी को बिहार में चुनाव प्रचार न करने देने की जिद पर अड़कर साबित किया है. अगर मोदी के खिलाफ नीतीश का गुस्सा इतना तीखा और सच्चा है तो वे उन दिनों एनडीए की सरकार में मंत्री क्यों बने रहे जब गुजरात जल रहा था और नरेंद्र मोदी क्रिया के विरुद्ध प्रतिक्रिया के वैज्ञानिक सिद्धांत का घोर अवैज्ञानिक और सांप्रदायिक भाष्य कर रहे थे?

जाहिर है, नरेंद्र मोदी से जो दूरी या वितृष्णा तब नहीं थी या कभी नहीं रही, उसे अब प्रदर्शित करने का मकसद अपने राज्य के अल्पसंख्यकों को यह संदेश देना है कि वे नीतीश कुमार पर भरोसा करें, मुसलिम लड़कियों के लिए चलाए जा रहे उनके कल्याणकारी कामकाज को सिर्फ उनकी वोटबटोरू रणनीति का हिस्सा न मानें. लेकिन अगर नीतीश का ऐसा कल्याणकारी कामकाज है तो यह वोटबटोरू हो या नहीं, उसके लाभ उनको मिलेंगे. अगर वाकई नीतीश का बिहार ऐसा दमक रहा है कि उसकी रोशनी आने वाले कल का भरोसा दिलाती हो तो बिहार की जनता इस रोशनी के साथ जाएगी, किसी सामाजिक पूर्वाग्रह के अंधेरे का दामन क्यों थामेगी?

जाहिर है, नीतीश कुमार के दावों में कोई दरार या कोई अधूरापन है. बिहार के जानकार बताते हैं कि राज्य में सड़कें तो बन गई हैं लेकिन वे अब भी लोगों को राज्य के बाहर ही पहुंचा रही हैं, राज्य में बन रहे किन्हीं कल-कारखानों तक नहीं ले जा रहीं. यानी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी जैसी राहत प्रदान करने वाली योजनाओं को छोड़ दें- जिनका असर व्यापक भ्रष्टाचार ने काफी कम कर दिया है- तो बिहार में ऐसा कुछ नहीं है जो उसके गरीब को तरक्की का भरोसा दिलाए. बिहार में सड़कें और पुल उन बाहर वालों को लुभा रहे हैं जो दूर से अपने राज्य को देख रहे हैं. इन जानकारों का यह भी कहना है कि दरअसल चीजें बदली हैं लेकिन खत्म नहीं हुई हैं. वे दूसरे रूप में बची हुई हैं. जो भ्रष्टाचार पहले बुरी तरह राजनीति केंद्रित था वह अब प्रशासन केंद्रित हो गया है. यानी थानों और सरकारी महकमों और योजनाओं में विधायकों और छुटभैये नेताओं की घुसपैठ खत्म हो गई है तो अफसरों और बाबुओं का व्यापक भ्रष्टाचार शुरू हुआ है. माफिया गिरोहों का केंद्र पहले एक अणे मार्ग- यानी लालू यादव का घर- हुआ करता था तो अब वह बदलकर दूसरे पतों तक चला गया है. अपराध खत्म करने और अपराधियों को जेल भेजने के दावे के बावजूद नीतीश बड़े अपराधियों से सांठगांठ करने और उनके सगे-संबंधियों को टिकट देने पर मजबूर हैं तो इसमें कुछ सच इस नए बिहार का भी दिखाई पड़ता ही है.

सड़कें तो बन गई हैं लेकिन वे अब भी लोगों को राज्य के बाहर ही पहुंचा रही हैं, राज्य में बन रहे किन्हीं कल-कारखानों तक नहीं ले जा रहीं

बहरहाल, मेरा मकसद यह साबित करना नहीं है कि बिहार में नीतीश कुमार ने कोई काम नहीं किया है और वे सिर्फ झूठे दावे कर रहे हैं. दरअसल, इन सारी बातों के उल्लेख का मकसद सिर्फ यह ध्यान दिलाना है कि बिहार में जो चल रहा है वह छवियों की राजनीति है. छवि की यही राजनीति कभी लालू यादव ने की थी. 20 साल पहले उन्होंने खुद को सामाजिक न्याय और पिछड़ा उभार का प्रतीक बना डाला. जिस न्यूनतम प्रयत्न से यह छवि बनी उसके अलावा लालू यादव ने और कुछ नहीं किया. लालू यादव के इसी प्रतीकवाद का नतीजा रहा कि बिहार में पिछड़ा अस्मिता कुछ और विपन्न हो गई, सामाजिक न्याय कुछ और अविश्वसनीय हो गया. भूलने की बात नहीं है कि तब उस छविवाद में लालू के साथ नीतीश भी शामिल थे.

अब छवि की दूसरी राजनीति दूसरे सिरे से नीतीश कुमार कर रहे हैं. वे खुद को विकास का प्रतीक साबित करने में लगे हैं. लेकिन बिहार के विकास का कोई ठोस नक्शा उनके पास नहीं दिख रहा. न राज्य की ठहरी हुई खेती को आगे बढ़ाने का कोई खाका उन्होंने पेश किया है और न ही नए उद्योगों की गुंजाइश दिख रही है. स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाई का माहौल नहीं है, छात्र बाहर भाग रहे हैं और शिक्षक वेतन की राह देख रहे हैं. निर्माण उद्योग की तेजी से राज्य की वृद्धि दर जरूर आगे दिख रही है और अकूत भ्रष्टाचार से एक छोटे-से मध्यवर्ग में आ रहा पैसा ही यह आंकड़ा तैयार कर रहा है कि धनतेरस के दिन बिहार में 500 करोड़ की गाड़ियां बिक गईं.

हो सकता है, इस फील गुड में नीतीश एक चुनाव निकाल लें. लेकिन अगर यह सफलता उन्हें मिलती है तो उसे स्थायी बनाने के लिए उन्हें वाकई ठोस कदम उठाने होंगे. वरना कभी बिहार में अपराजेय दिखने वाले लालू यादव का जो हश्र हुआ वही उनका भी होगा. उनकी स्थिति इस लिहाज से बेहतर है कि सामाजिक न्याय की जो निष्कंटक दावेदारी लालू को हासिल थी वह उन्हें नहीं है. शायद इसी स्थिति ने लालू यादव को तानाशाह भी बनाया. दूसरी तरफ नीतीश को एहसास है कि उनकी नाकामी सामाजिक न्याय का इंतजार कर रहे बिहार को दूसरे विकल्पों की तरफ भी ले जा सकती ह. यही वजह है कि वे सामाजिक समीकरणों की राजनीति कर रहे हैं और नारा विकास का देने को मजबूर हैं. लेकिन इस नारे को हकीकत में बदले बिना न नीतीश विकास पुरुष बन पाएंगे, न बिहार का उद्धार होगा. अंततः यह स्थिति बिहार के ही नहीं, नीतीश कुमार के खिलाफ भी जाएगी.

लेकिन दुर्भाग्य से उनके यशोगान में डूबा मीडिया उन्हें यह सच देखने नहीं दे रहा. वह जीत से पहले ही उनके सिर पर जीत का तिलक लगाने को बेताब है.

फौज की फजीहत

आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाले में सेना प्रमुख (पूर्व) दीपक कपूर और सेना से जुड़े कई वरिष्ठ अधिकारियों के नाम सामने आने के बाद सारा देश स्तब्ध है. सेना एक ऐसा संस्थान है जिस पर देश की जनता को पूरा भरोसा रहा है. मगर अब उसी जनता को संशय सता रहा है कि भ्रष्टाचार का यह पैमाना देखते हुए क्या देश की सीमाओं को वास्तव में पूरी तरह सुरक्षित कहा जा सकता है ? सवाल यह भी है कि महज कुछ साल पहले तक भारतीय गणतंत्र के सबसे भरोसेमंद संस्थान का रुतबा रखने वाले इस खंभे में दिख रही यह दरार सिर्फ ऊपरी है या फिर यह खोखलापन भीतर तक घर कर गया है?

यह ठीक एक दशक पहले, 2001 की बात है. उस समय तहलका के ‘ऑपरेशन वेस्टएंड’ के जरिए पहली बार रक्षा खरीद में चल रहे भारी भ्रष्टाचार और इसमें सेना के वरिष्ठ अधिकारियों की संलिप्तता को सारे देश ने टीवी पर देखा था. वह घटना सेना में भ्रष्टाचार रोकने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए सरकार और प्रतिष्ठान के पास सबसे बड़ा मौका था. लेकिन हुआ उल्टा. सत्ता तंत्र के निशाने पर तहलका आ गया. सरकार और खुद सेना अपने भीतर तेजी से घर कर रही बीमारी की उपेक्षा करती रही. पिछले पांच साल के दौरान सेना के कई वरिष्ठ अधिकारियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप बताते हैं कि तब सरकार के पास संस्थान को दुरुस्त करने का एक बहुत अच्छा मौका था, लेकिन उसे बर्बाद कर दिया गया.

आज जब ‘ऑपरेशन वेस्टएंड’ को तकरीबन एक दशक बीत गया है, सेना की छवि पर अब तक का सबसे बड़ा संकट मंडरा रहा है. हालांकि इसी दशक के दौरान कुछ उम्मीद की किरणें भी दिखी हैं. मसलन भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई जाती रही है, दूसरे अधिकारी अनुशासन का पालन करते हुए भ्रष्टाचार के मामले उजागर करते रहे हैं और कोर्ट ऑफ इंक्वायरी ने अपना काम बेहद संजीदगी से अंजाम देते हुए अधिकारियों के कोर्ट मार्शल के फैसले सुनाए हैं. अब जिस तरह से सैन्य भ्रष्टाचार का मामला लगातार मीडिया की सुर्खियां बना हुआ है उसके बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि यह संस्थान अपनी साख पर लगे धब्बों को हटाने की दिशा में गंभीरता से काम करेगा.

रक्षा प्रतिष्ठान- जिसमें राजनेता, नौकरशाह, और सैन्य नौकरशाह शामिल हैं, के लिए इस दिशा में आगे बढ़ना यानी भ्रष्टाचार पर अंकुश इसलिए भी जरूरी है कि एक अनुमान के मुताबिक 2015 तक भारत सरकार रक्षा क्षेत्र पर 2.21 लाख करोड़ रुपए खर्च करने वाली है. कंसल्टेंसी फर्म केपीएमजी के मुताबिक इस समयावधि में भारत दुनिया के कुछ सबसे बड़े रक्षा खरीद सौदे करेगा. रक्षा उत्पादन से जुड़ी दुनिया की शीर्ष कंपनियां अभी से दिल्ली में डेरा डालने पहुंच रही हैं. कई भारतीय कंपनियों को उम्मीद है कि तकरीबन 44,299 करोड़ रुपए के ठेके उन्हें मिल सकते हैं. इन स्थितियों में भारी रिश्वत और भ्रष्टाचार की संभावना को नकारा नहीं जा सकता.

तीन महीने पहले सिंगापुर की रक्षा उत्पादन फर्म एसटी काइनेटिक्स के मुख्य मार्केटिंग अधिकारी पैट्रिक चॉय ने अनौपचारिक बातचीत के दौरान एक बयान दिया था जो भारत में काम कर रही विदेशी रक्षा उत्पादन फर्मों की तल्ख हकीकत बयान करता है. उनका कहना था, ‘हम ऐसे माहौल में काम नहीं कर सकते जहां चीजें कैसे हो रही हैं इसका कुछ अंदाजा ही न लग पा रहा हो.’ कहा जाता है कि कपूर के कार्यकाल में 155-एमएम गन खरीद के लिए 13,289 करोड़ रुपए के सौदे के लिए एसटी काइनेटिक्स की प्रतिस्पर्धा बीएई सिस्टम्स से थी. लेकिन एसटी काइनेटिक्स को काली सूची में डालकर इस दौड़ से बाहर कर दिया गया था.

फिलहाल कपूर, पूर्व और वर्तमान सैनिकों के लिए शर्मिंदगी का प्रतीक बने हुए हैं. इसकी वाजिब वजहें भी हैं. कहा जाता है कि उन्होंने न सिर्फ कुछ रक्षा सौदों में रिश्वत ली है बल्कि सेना प्रमुख के कार्यालय को नेता, ठेकेदार और नौकरशाहों की भ्रष्ट तिकड़ी का एक आश्रय स्थल बनाने के लिए भी वे ही जिम्मेदार हैं. ऐसा उन्होंने राजनीतिक हलकों में यह संकेत देकर किया कि उनके साथ ‘दूसरे काम’ करना भी सहज है. हालांकि कुछ विश्लेषक उनके पूर्ववर्ती एनसी विज को इस परंपरा की शुरुआत के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं.

सेना में रक्षा उपकरणों की खरीद में हमेशा ही आर्थिक भ्रष्टाचार के मौके रहे हैं. देश भर में सैन्य बलों के अधिकार क्षेत्र में कीमती जमीन भी है. पिछले कुछ सालों से रिहायशी जमीन की कीमत में अचानक तेजी आने के बाद रियल एस्टेट माफिया सेना की जमीनों पर नजर गड़ाए हुए हैं. इन माफियाओं को नेताओं का वरदहस्त भी प्राप्त है. आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला इसी की एक मिसाल है. सेना के अधिकारियों में इस घटना पर काफी रोष है. घोटाले पर दुख जाहिर करते हुए मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) जीडी बक्शी कहते हैं, ‘यह देखकर बहुत पीड़ा होती है.’ इस गगनचुंबी इमारत को जब महाराष्ट्र सरकार ने अनुमति दी थी तो 2003 में नौसेना की पश्चिमी कमान के कमांडर वाइस एडमिरल संजीव भसीन ने लिखित में इस पर आपत्ति जताई थी. उनका कहना था कि इमारत की ऊंचाई से नजदीकी नौसेना अड्डे की सुरक्षा को खतरा है. भसीन ने इस मामले में शामिल प्रोमोटरों और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की भी मांग की थी.

कपूर और विज दोनों कहते हैं कि उन्हें जानकारी नहीं थी कि आदर्श सोसायटी के फ्लैट कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए जवानों के परिवारों को आवंटित होने हैं. मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) एससीएन जटार कहते हैं, ‘ सेना का एक वरिष्ठ अधिकारी कह रहा है कि उसे जानकारी नहीं कि फ्लैट शहीद हुए जवानों की विधवाओं के लिए हैं? यह बकवास है. यदि ऐसा है तो वे अपने पद पर रहने लायक ही नहीं थे.’

जटार का गुस्सा बेवजह नहीं है. इस बात की पुष्टि तथ्य भी करते हैं. कपूर ने 2005 में जब सोसायटी के फ्लैट के लिए आवेदन किया था तब पात्रता नियमों के मुताबिक आवेदक के लिए यह अनिवार्य था कि वह पिछले 15 सालों से मुंबई में रह रहा हो. शर्त का तोड़ खोजने के लिए उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को पत्र लिखा. देशमुख ने उनके लिए एक मूलनिवास प्रमाण पत्र बनवा दिया. आवेदन के साथ कपूर की सैलरी स्लिप भी जमा हुई थी. इसमें उनकी मासिक आय मात्र 23 हजार 450 रुपए दर्ज थी. आज वे खुद इस बात पर हैरानी जताते हैं कि सैलरी स्लिप में यह आंकड़ा कैसे आ सकता है.

कपूर के भ्रष्टाचार में शामिल होने को लेकर कुछ तथ्य तब भी सामने आए थे जब पिछले अगस्त तृणमूल कांग्रेस की सांसद अंबिका बनर्जी ने रक्षा मंत्री को एक पत्र लिखकर सूचना दी थी कि पूर्व सेना प्रमुख ने आय से अधिक संपत्ति जमा की है. इस पत्र के मुताबिक कपूर के पास एक फ्लैट द्वारका के सेक्टर 29, तीन फ्लैट गुड़गांव के सेक्टर 23, एक फ्लैट गुड़गांव के सेक्टर 42/44, एक फ्लैट गुड़गांव के फेज 3 और एक घर मुंबई के लोखंडवाला में है. इस घटना के बाद कपूर ने एके एंटनी से मिलकर इन सभी आरोपों का खंडन किया था.

सेना के एक पूर्व मुखिया पर एक के बाद एक लगातार आरोप लगने से पूर्व थलसेना प्रमुख वीपी मलिक स्तब्ध हैं. वे कहते हैं, ‘जहां तक भ्रष्टाचार की बात है तो इस हालिया घोटाले ने सेना का अब तक का सबसे बड़ा नुकसान किया है.’

एक मामला सुखना भूमि घोटाले से भी संबंधित है. कहा जाता है कि इस मामले में दीपक कपूर ने आरोपित लेफ्टिनेंट जनरल अवधेश प्रकाश के प्रति नरमी बरतने की कोशिश की थी. प्रकाश उस समय सेना प्रमुख के सैन्य सचिव थे. यह मामला दार्जिलिंग के सुखना में तैनात सेना की 33वीं कोर से जुड़ा है. यहां एक निजी शिक्षा संस्थान, गीतांजली एजुकेशनल ट्रस्ट को कोर की तरफ से 70 एकड़ जमीन खरीदने की अनुमति दी गई थी. जांच बताती है कि लेफ्टिनेंट जनरल रथ, लेफ्टिनेंट जनरल हलगली और प्रकाश सहित सेना के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने एक बिल्डर को फायदा पहुंचाने की गरज से जमीन खरीद की अनुमति दी थी. सुखना घोटाले की गंभीरता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि रथ जल्दी ही उप थल सेना प्रमुख बनने वाले थे और प्रकाश सेना प्रमुख के आठ सैन्य सचिवों में से एक थे. इस पद पर रहते हुए उनके पास पदोन्नति और पोस्टिंग जैसे अधिकार होते थे. वर्तमान थल सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह उस समय पूर्वी कमान जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ (जीओसी-सी) थे और इन चारों अधिकारियों के खिलाफ गठित कोर्ट ऑफ इंक्वायरी (सीओआई) के मुखिया भी. सीओआई ने जांच के बाद अधिकारियों को दोषी पाया था और प्रकाश को नौकरी से बेदखल करने की सिफारिश की थी. लेकिन इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए कपूर ने सिफारिश की कि प्रकाश के खिलाफ सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई होनी चाहिए. इसके बाद मामले ने तूल पकड़ लिया और खुद रक्षा मंत्री एके एंटनी को सेना प्रमुख को पत्र लिखकर कोर्ट मार्शल की कार्रवाई आगे बढ़ाने के लिए कहना पड़ा.

कपूर के भ्रष्टाचार से जुड़े होने की कहानी और पीछे तक भी जाती है. 2006 में ऑर्डनेंस कोर के मेजर जनरल मल्होत्रा ने 16 करोड़ रुपए की लागत से टेंट खरीदने का एक प्रस्ताव दिया था. इसमें कहा गया था कि टेंटों की भारी कमी को देखते हुए सेना के एरिया कमांडर के विशेष वित्तीय अधिकारों का इस्तेमाल करके टेंट खरीदे जाने चाहिए. इसके बाद यह फाइल उत्तरी कमान के मेजर जनरल, जनरल स्टाफ (एमजीजीएस) के पास गई. उनकी इस फाइल पर टिप्पणी थी, ‘क्या हम थलसेना के विशेष वित्तीय अधिकारों का इस्तेमाल उन टेंटों को खरीदने के लिए करने वाले हैं जिनकी आपूर्ति ऑर्डनेंस विभाग से होनी चाहिए?’ इस सारे घटनाक्रम से जुड़ी सबसे हैरानी की बात यह है कि प्रस्ताव पर सहमति न मिलने के तीन महीने बाद भी मल्होत्रा ने दोबारा प्रस्ताव बनाकर भेजा कि टेंटों की कमी से सैनिकों को भारी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है. इस बार एमजीजीएस ने फाइल चुपचाप आगे बढ़ा दी. कपूर भी इस प्रस्ताव पर सहमत थे.

कुछ समय बाद कपूर थल सेना मुख्यालय में बतौर उप-थल सेना प्रमुख नियुक्त हो गए और उनकी जगह लैफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग उत्तरी कमान के कमांडर नियुक्त हुए. पनाग को अज्ञात स्रोत से टेंट घोटाले के बारे में जानकारी मिली. जांच में पाया गया कि टेंट खरीदने की जरूरत ही नहीं थी. मामले पर कार्रवाई के लिए मेजर जनरल सप्रु के अधीन कोर्ट ऑफ इंक्वायरी का गठन हुआ और पाया गया कि मल्होत्रा ने 1.6 करोड़ रुपए का घोटाला किया है. इसके बाद पनाग ने एक आदेश जारी किया जिसके तहत मल्होत्रा की भविष्य में होने वाली पदोन्नतियों पर रोक लगनी थी.

लेकिन पनाग को इस बात का कतई अंदाजा नहीं था कि अनजाने में उन्होंने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है. तब तक कपूर सेना प्रमुख बन चुके थे और उन्होंने पनाग के दो साल के कार्यकाल के मध्य में ही उनका स्थानांतरण मध्य कमान में कर दिया. पनाग इस मसले पर कपूर से मिले, लेकिन उनसे कहा गया कि यह सेना प्रमुख का विशेषाधिकार है. इस पर पनाग एंटनी के पास गए. नाम न छापने की शर्त पर सेना के एक सेवानिवृत्त अधिकारी कहते हैं, ‘यह साफ था कि कपूर को उनसे परेशानी थी लेकिन एंटनी के सामने सेना प्रमुख और कमांडर में से किसी एक को चुनने का विकल्प मिला तो उन्होंने सेना प्रमुख को तरजीह देना बेहतर समझा.’

किसी सेना कमांडर के बीच कार्यकाल में उसका स्थानांतरण बेहद असामान्य माना जाता है. कहा जाता है कि इस घटना ने सेना में असंतोष पैदा कर दिया था. इन घटनाओं के अलावा मार्च, 2007 में जब नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट आई तो उसमें भी आरोप लगाया गया था कि उत्तरी कमान के कमांडर ने सेना की परिचालन संबंधी जरूरतें पूरी करने के लिए अपने विशेषाधिकारों का दुरुपयोग किया था.

इन सभी सवालों पर प्रतिक्रिया लेने के लिए तहलका ने कपूर से कई बार संपर्क करने की कोशिश की. पांचवीं कॉल पर, उन्होंने बात तो की लेकिन अपने ऊपर लगे आरोपों के बारे में जवाब देने से साफ मना कर दिया. उनका कहना था, ‘बाहर बहुत-सी बातें चल रही हैं और मैं उन पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता.’

सेना जैसे अतिप्रतिष्ठित संस्थान, जहां 2002-03 तक मेजर जनरल के ओहदे वाले अफसरों के कोर्ट मार्शल के बारे में सोच पाना भी बेहद दुर्लभ हुआ करता था, में 2010 तक कई पूर्व जनरलों के नाम घोटालों में सामने आ चुके हैं. यदि पिछले पांच साल के दौरान मीडिया की सुर्खी बनी रही इन खबरों को छोड़ दें तो भी सेना के लगभग हर विभाग में कई और घोटाले भी होते रहे हैं. चाहे वह आपूर्ति विभाग हो या सेना आयुध उत्पादन विभाग, ऊंचे ओहदे पर आसीन अफसर पैसों के हेर-फेर में लगे रहे :

• 2006 में एक कोर्ट ऑफ इंक्वायरी ने मेजर जनरल इकबाल सिंह मुलतानी, चार ब्रिगेडियरों और सात दूसरे अफसरों को सैन्य कोटे के लिए आवंटित शराब को खुले बाजार में बेचने का दोषी ठहराया था

• 2006 में जम्मू और कश्मीर में तैनात सैनिकों के लिए ‘सूखी खाद्य सामग्री की कुछ विशेष चीजों’ की सरकारी खरीद में भारी अनियमितताओं के लिए लेफ्टिनेंट जनरल सुरेंद्र कुमार साहनी, दो ब्रिगेडियरों और आठ दूसरे अफसरों को दोषी पाया गया था

• 2007 में एक कोर्ट ऑफ इंक्वायरी ने लेफ्टिनेंट जनरल एसके दहिया, ब्रिगेडियर डीवीएस विश्नोई और तीन दूसरे अफसरों पर लद्दाख में तैनात जवानों के लिए फ्रोजेन मीट के ठेके में कथित रूप से अनियमितता बरतने का आरोप लगाया था.

• 2009 में 41 अफसरों को उनके नॉन सर्विस पैटर्न हथियारों (जो हर एक सैनिक को निजी तौर पर दिए जाते हैं और इन्हें सैनिक सेवानिवृत्ति के बाद वापस कर सकता है या सेना की अनुमति के बाद अपने पास ही रख सकता है) को निजी इस्तेमाल के लिए चोर बाजार में बेचने का दोषी पाया गया था.

आखिर ऐसा क्या था जिसने इतने कम समय में इन वरिष्ठ अधिकारियों को भ्रष्टाचार की सीमाएं तक लांघने को प्रेरित किया? सेवानिवृत्त हो चुके मेजर जनरल अफसर करीम के अनुसार, ‘इस तरह की चीजें तभी मुमकिन हैं जब शीर्ष नेतृत्व कमजोर और भ्रष्ट हो. सब अपने ऊपर के अधिकारी को देखते हैं. अगर वह ईमानदार है तो नीचे वालों की कुछ गलत करने की हिम्मत नहीं होगी. लेकिन ऊपर बैठा अफसर ही अगर ईमानदार न हो, भ्रष्टाचार में लिप्त हो तो फिर कुछ नहीं किया जा सकता. इसलिए चाहे युद्ध हो या शांति, ऐसे अफसर सेना के लायक नहीं है. वे एक-दूसरे की मदद करते हैं, ऊपर वाले नीचे वालों को प्रोमोशन दिलवाते हैं, तमगे दिलवाते हैं और इस वजह से इन सबकी जांच नहीं हो पाती और भ्रष्ट अफसरों का एक बहुत बड़ा जाल तैयार हो जाता है.’

सेना के कई वरिष्ठ लोग मानते हैं कि एक जनरल तब भ्रष्ट नहीं बनता जब उसे वह ओहदा मिल जाता है. बुनियादी सवाल यह है कि आखिर एक अधिकारी जो भ्रष्ट है, उस ओहदे तक पहुंचता कैसे है ?

दरअसल, सेना में पदोन्नति की नीति में कुछ बुनियादी गड़बड़ी है. अधिकारी के आगे बढ़ने की संभावना ज्यादातर सेना और राजनीति में ऊंचे ओहदों पर बैठे लोगों की मरजी और पसंद पर आधारित होती है. करीम कहते हैं, ‘जो ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ है उसे आगे बढ़ने के मौके तब ही मिल पाते हैं जब तक कि ऊपर बैठे अधिकारी उसे नोटिस न करें या सरकार इसमें कोई भूमिका न निभाए. अगर आप चालाक और बेईमान हैं तो आपके पास आगे बढ़ने के मौके उनसे ज्यादा हैं. सरकार आम तौर पर उसकी हां में हां मिलाने वाले को बड़े ओहदे पर पहुंचाना चाहती है और जिस आदमी के पास छिपाने को बहुत-कुछ है वह हमेशा जी हुजूरी करता है.’ सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी तहलका के इस संदेह की पुष्टि करते हैं कि आदर्श और सुखना भूमि घोटाले तो जमीन में छिपे एक विशाल बरगद की फुनगी भर हैं. वे कहते हैं, ‘असली घोटाले तो सरकारी खरीद में होते हैं. इसमें पहले आता है सेना का आपूर्ति विभाग. हमारे पास कुल 13 लाख जवान हैं. अब अगर हम एक जवान के खाने पर 50 रुपए भी खर्च करें तो बजट 6.5 करोड़ पहुंच जाएगा. आप अंदाजा लगा सकते हैं कि प्रोक्योरमेंट डिपार्टमेंट में कितना पैसा है और यहां हेर-फेर की कितनी गुंजाइश होती है.’

इसके बाद सैनिकों के लिए मोजे से लेकर हथियारों तक की आपूर्ति करने वाला आयुध उत्पादन विभाग आता है. इसका सालाना बजट 8,000-10,000 करोड़ रुपए है. 2009 में इस विभाग के पास कोई प्रमुख नहीं था क्योंकि इस पद के काबिल तीनों अफसरों पर रिश्वत लेने के आरोप थे. मेजर जनरल एके कपूर (आरोपपत्र के अनुसार) जब 1971 में सेना में शामिल हुए थे तो उनके पास कुल 41,000 रुपए थे. 2007 में अब उनके पास 5.5 करोड़ की अचल संपत्ति है, दिल्ली, गुड़गांव, शिमला और गोआ में कुल 13 अचल संपत्तियां हैं.

कॉलेज ऑफ मेटेरियल मैनेजमेंट, जबलपुर के ऑफिसिएटिंग कमांडेंट रहे मेजर जनरल अनिल स्वरूप को भी संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियान में भेजी गई यूनिट के लिए की गई सरकारी खरीद में अनियमितता बरतने का दोषी पाया गया था. उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में हुए घोटाले की तर्ज पर कीमतें बढ़ा-चढ़ाकर लिखीं- जो जेनरेटर बाजार में 7 लाख रुपए में उपलब्ध हैं, उन्हें 15 लाख में खरीदा गया, जो केबल 300 में मिल सकते हैं उन्हें 2,000 रुपए में खरीदा गया. लगभग 100 करोड़ रु की यह लूट 2006 से 2008 तक जारी रही.

आपूर्ति और आयुध विभाग के बाद बारी आती है मिलिटरी इंजीनियरिंग सर्विस की. यह थल सेना के अलावा वायु और जल सेना के लिए भी काम करती है. इसका सालाना निर्माण बजट कम-से-कम 10,000 से 12,000 करोड़ रु है. इस बजट का 10 प्रतिशत कमीशन के रूप में ‘वैध’ माना जाता है. इस तरह के सारे घोटाले बिना रक्षा मंत्रालय और वित्तमंत्रालय के कर्मचारियों की सांठ-गांठ के नहीं हो सकते.

अगर सेना में भ्रष्टाचार का खेल इसी निर्लज्जता से चलता रहा तो सेना का मनोबल और साथ ही देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी. मेजर जनरल जीडी बख्शी बताते हैं, ‘सैन्य नेतृत्व प्रेरणादायी होना चाहिए. मैं एक जवान से यह नहीं कह सकता कि मैं तुम्हें 5,000 रुपए बोनस दूंगा, सीमा पर जाओ और मरो. लेकिन वह अपनी 5,000 की सैलरी में ही लड़ने और मरने को तैयार रहता है क्योंकि यह उसके देश, उसकी यूनिट के सम्मान से जुड़ा है.’ सेना के एक बड़े अधिकारी आगे जोड़ते हैं, ‘अगर आप सरकारी खरीद विभाग या छोटी-मोटी घटनाओं को छोड़ दें तो कर्नल के नीचे रैंक वाले अफसरों में भ्रष्टाचार नहीं है, जैसे-जैसे लोग स्वतंत्र और शक्तिशाली होने लगते हैं, उनकी उठ-बैठ अपने बॉसों के साथ होने लगती है. यही वह वक्त होता है जब इस दलदल में उनके पैर धंसने शुरू हो जाते हैं..’

बहुत सारे अफसरों का मानना है कि सेना में आई इस सड़न से निपटा जा सकता है, लेकिन इसके लिए सेना को सभी दोषियों के साथ सख्ती बरतनी होगी. सुखना भूमि घोटाले की तरह. मेजर जनरल जटार कहते हैं, ‘मेरे हिसाब से इन सबके ओहदे छीन लिए जाने चाहिए. वे इस लायक नहीं कि उन्हें जनरल या पूर्व थल या जल सेना-प्रमुख कहकर पुकारा जाए. निचले ओहदे वाले अधिकारी को जरूर दिखना चाहिए कि पूर्व सेना-प्रमुखों तक को नहीं बख्शा गया है.’

इस महामारी को जड़ से मिटाने के बारे में सेना के वर्तमान और सेवानिवृत सैन्य अधिकारी एकराय हैं कि इस दिशा में कड़े कदम उठाने की जरूरत है. अगर टोकरी में रखे सेबों में से कुछ सड़ जाएं तो उन्हें हटाकर बाहर फेंक देना चाहिए वरना बाकी के भी सड़ जाने का डर होता है.

बदलें सोच के सांचे

चाहे राहत हो या पुनर्वास या फिर विकास…उत्तराखंड में इन सभी मुद्दों को एक नई रोशनी में और समग्र सोच के साथ देखे जाने की जरूरत है, बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू 

घर-घर में बिजली, पक्की टाइल्स बिछी गलियां, सीमेंट के मजबूत खड़ंजे, गलियों में स्ट्रीट लाइट के खंभे, सिंचाई के लिए मजबूत नहरें, पीने के पानी के लिए जलसंस्थान की पक्की लाइन, सीवर लाइन से जुड़े शौचालय, मुख्य मोटर मार्ग तक पहुंचने के लिए बढ़िया सड़क, बच्चों के लिए स्कूल और 500 लोगों के बैठ सकने लायक एक खूबसूरत ऑडिटोरियम

6,000 फुट से अधिक ऊंचाई पर बसे उत्तराखंड के एक दूरदराज के गांव रैथल में यह सब चीजें एक साथ मौजूद हैं और वह भी उपयोग करने लायक सही-सलामत हालत में. उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से गंगोत्री की ओर 45 किलोमीटर की दूरी पर बसे रैथल गांव में लगभग 200 परिवार रहते हैं और इस गांव की कुल आबादी 1,200 से अधिक है. रैथल उत्तराखंड का एक ऐसा गांव है जहां से हाल के वर्षों में कोई पलायन नहीं हुआ, उल्टे बाहर से लोग आकर वहां बस रहे हैं.

इस गांव में हो रहे इस चमत्कार की कहानी आज के जमाने में अविश्वसनीय-सी लगती है, लेकिन इसका मूलमंत्र है विकास के लिए आए धन का शत-प्रतिशत सदुपयोग और इसमें बरती जाने वाली पारदर्शिता. 1970 में अध्यापकी छोड़कर ग्राम प्रधान बने चंदन सिंह राणा ने जब पद संभाला तभी तय कर लिया कि गांव के लिए मिलने वाली एक-एक पाई का सही-सही इस्तेमाल करेंगे. एक पैसा भी बर्बाद नहीं होने देंगे. घूस और भ्रष्टाचार बिलकुल बंद.

यह काम लीक से हटकर था इसलिए उन्हें दिक्कतें भी कम नहीं आईं. अधिकारियों-अभियंताओं के कमीशन और ठेकेदारों की अंधेरगर्दी से निपटना आसान नहीं था. लेकिन उन्होंने सारे गांव को साथ लेकर एलान कर दिया कि इस गांव में यह सब बिलकुल नहीं चलेगा. कोई योजना गांव में आती तो पूरे गांव को उसकी जानकारी दी जाती, सबका हानि-लाभ देखकर उसका क्रियान्वयन होता और ठेकेदारों के एक-एक काम पर गांववालों की निगरानी रहती. कई बार नियमानुसार न हुए काम या घटिया निर्माण को तोड़ा भी गया. धीरे-धीरे एक नजीर-सी बनती चली गई. 18 वर्ष तक प्रधान रहने के बाद राणा तो ब्लॉक प्रमुख बन गए मगर गांव में उनकी स्थापित की हुई परंपरा आज तक बरकरार है. विश्व प्रसिद्व दयारा बुग्याल का आधार गांव होने के कारण इस गांव को पर्यटन योजनाओं के लिए भी पैसा मिला है और आज तक गांव में विकास कार्यों के लिए लगभग पांच करोड़ से अधिक की राशि यहां खर्च की जा चुकी है और यह सारा पैसा वास्तविक रूप से योजनाओं के काम में खर्च हुआ है. इनसे स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिला और आज वे इनका उपयोग भी कर रहे हैं. उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय तो अब इस गांव के विकास को आधार बनाकर ग्राम्य विकास का एक पाठ्यक्रम भी शुरू करने जा रहा है.

यहां इस गांव का जिक्र इसलिए कि चंदन सिंह राणा और उनके रैथल गांव का उदाहरण सितंबर में आपदा की बारिश से तबाह हुए उत्तराखंड के लिए आज एक मॉडल बन सकता है. प्राकृतिक आपदा के बाद अब उत्तराखंड में पुनर्निर्माण का दौर शुरू हो चुका है. राज्य सरकार केंद्र से 21,000 करोड़ रु का आपदा राहत पैकेज मांग चुकी है. कुछ रकम उसे मिल भी गई है और कुछ आने वाली है. हालांकि इस मांग को लेकर तरह-तरह के विवाद भी हैं. विपक्ष का आरोप है कि यह रकम जमीनी हकीकत को जाने बिना, बढ़ा-चढ़ाकर मांगी जा रही है. राज्य सरकार कहती है जितनी क्षति हुई है उससे यह मांग कहीं कम है और इन दोनों के बीच आपदा से जूझ रहे आम आदमी के हाथ अब भी खाली ही हैं.

बहरहाल इस विवाद से इतर, यह तो तय ही है कि उत्तराखंड में आपदा राहत के लिए करोड़ों रु. केंद्र से आएंगे और यह रकम पुनर्निर्माण कार्यों मंे खर्च भी होगी ही. लेकिन आपदा राहत की इस भारी-भरकम रकम पर आंख गड़ाए बैठी भ्रष्ट अधिकारी-राजनेता और ठेकेदारों की तिकड़ी से इस रकम को बचाकर सही मायनों में पुनर्निर्माण कार्यों पर खर्च कर पाना एक बड़ी चुनौती है. वर्तमान में आदर्श स्थितियों में भी इस रकम का 30 से 40 फीसदी हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ना तय है.

ऐसे में क्या उपाय बचता है? क्या रैथल मॉडल एक उदाहरण बन सकता है? राज्य के आपदा राहत और पनर्वास महकमे से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘रैथल मॉडल एक रास्ता हो सकता है, खास तौर पर ऐसे पुनर्निर्माण कार्यों में जहां पैसे का इस्तेमाल किसी विशेष इलाके या गांव के लिए किया जाना है. सड़क आदि पुनर्निर्माण कार्यों में सरकार योजना पर निगरानी रखने के लिए खुद जन निरीक्षक तैनात कर सकती है.’

बहरहाल, राज्य सरकार रैथल को उदाहरण बनाए या न बनाए मगर यह तय है कि आपदा राहत की रकम का उपयोग उत्तराखंड में 2012 के चुुनाव का परिणाम तय करने मंे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और उत्तराखंड की मौजूदा सरकार को अपनी कुर्सी बचाए रखने का प्रयास करने के लिए राहत पैकेज का शत प्रतिशत पारदर्शी सदुपयोग सुनिश्चित करना ही होगा.

लेकिन राहत पैकेज केे सदुपयोग से भी पीड़ितों के जख्म पूरी तरह भरने संभव नहीं. इसका कारण यह है कि राहत के मानकों के केंद्र में पीड़ित लोग हैं ही नहीं. राज्य सरकार ने केंद्र से जो राहत मांगी है उसमें आपदा से क्षतिग्रस्त हुए 2,356 स्कूलों के लिए तो प्रति स्कूल 15 लाख रु मांगे गए हैं, जबकि अपने नागरिकों को वह किसी भी स्थिति में प्रति भवन 50 हजार रु से अधिक दे नहीं सकती क्योंकि मानक ही इस तरह के बने हुए हैं. जाहिर है कि आपदा राहत के ये मानक बेहद पुराने हैं और उनके निर्धारण में उत्तराखंड की विशेष भौगोलिक परिस्थितियों को कतई ध्यान में नहीं रखा गया है. इन मानकों को बदले जाने की आवश्यकता है, मगर इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा. सरकार में शामिल उत्तराखंड क्रांतिदल के युवा विधायक पुष्पेंद्र त्रिपाठी भी यह बात मानते हुए कहते हैं, ‘आपदा राहत के मानक बहुत पुराने हैं. उत्तराखंड राज्य बनने के बाद इन्हें जिस तरह बदलवाया जाना चाहिए था वह हो नहीं पाया है. पटवारी गांवों में जाकर गाइड लाइन की परिभाषाओं के मुताबिक भवनों की क्षति को आंशिक, पूर्ण और तीक्ष्ण इन तीन श्रेणियों में रखकर मुआवजा तय कर देते हैं. यह बेतुकी बात है. इसमें नियमों और गाइड लाइन से अधिक, मानवीय दृष्टिकोण पर ध्यान दिया जाना चाहिए. घरों की क्षति के लिए नया मानक होना चाहिए, जिसमें साफ-साफ दो श्रेणियां हों. रहने योग्य और रहने के अयोग्य. इसी आधार पर मुआवजा भी तय होना चाहिए.’

राहत पैकेज और पुनर्वास के मायने भी बेमानी हैं. उत्तराखंड के तीन सीमांत जिले चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ भूगर्भीय दृष्टिकोण से अस्थिर क्षेत्र में हैं. ताजा आपदा ने 200 से अधिक पर्वतीय गांवों को खतरनाक बना दिया है. इनका पुनर्वास होना है जो एक विकट समस्या है. राज्य के वरिष्ठ मंत्री प्रकाश पंत भी मानते हैं कि यह समस्या बहुत विकराल है. वे कहते हैं, ‘पहाड़ी क्षेत्रों में ही 200 से अधिक गांवों का अस्तित्व खतरे में है. इन सभी का भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण होना है, पुनर्स्थापन होना है और इस पुनर्स्थापन का अर्थ यह नहीं है कि उन्हें सिर्फ नए घर बनाकर दे दिए जाएं. समूचे ग्रामीण परिवेश को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना बड़ी टेढ़ी खीर है. इसके लिए बड़ी रकम की भी जरूरत है और भूमि की भी. तराई क्षेत्र में जमीन है नहीं. राज्य के वन क्षेत्र में से 22 फीसदी वन विहीन भूमि का भूउपयोग बदलकर अगर केंद्र सरकार प्रभावित गांवों को बसाने की अनुमति दे दे तो यह एक समाधान हो सकता है. लेकिन इसके लिए भी पैसे की जरूरत कम नहीं होगी.’

राज्य सरकार ने आपदा राहत में 233 गांवों को खतरनाक घोषित करके उनके पुनर्वास के लिए 12,000 करोड़ की रकम मांगी है. प्रति परिवार 38 लाख रु खर्च किए जाने की योजना है. लेकिन फिलहाल तो आपदा पीड़ितों के हाथों में दो-ढाई हजार रु ही पहुंच पाए हैं और पुनर्वास भी उनके लिए अब तक एक दिवास्वप्न ही साबित हो रहा है. हालांकि उत्तराखंड में अब हर ओर यह मांग जोर पकड़ रही है कि हिमालय क्षेत्र की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए राष्ट्रीय आपदा कोष को ऐसे इलाकों के लिए भवन, भूमि और जीवन के मुआवजे की रकम पर पुनर्विचार करके उसे बढ़ाना चाहिए और हिमालयी राज्यों के लिए आपदा राहत के नए मानक भी बनाने चाहिए.

सितंबर की आपदा ने एक बार फिर हमें हिमालय के मिजाज को समझने की चेतावनी दे दी है. प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा कहते हैं, ‘आज भारत ही नहीं समूचा विश्व हिमालय की रक्षा की बात कर रहा है और हिमालय तभी बचेगा जब उसको बचाने वाले स्थानीय लोगों को बचाया जाएगा.’ आज उत्तराखंड में लगभग 500 से ज्यादा छोटी-बड़ी पनबिजली परियोजनाएं निर्माणाधीन अथवा विचाराधीन हैं. बड़े पैमाने पर पहाड़ों में भूमिगत सुरंगें बनाए बिना यह पूरी नहीं हो सकतीं. यह बेहद खतरनाक काम है. इनमें से ज्यादातर योजनाओं के लिए पर्याप्त तकनीकी अध्ययन तक नहीं किया गया है. 500 करोड़ रु फूंक देने के बाद बंद की गई लोहारीनाग-पाला परियोजना इसका एक उदाहरण है.

हिमालय के पानी से चलने वाली इन सभी योजनाओं पर ग्लेशियरों के बदलते मिजाज से खुद-ब-खुद सवालिया निशान लग रहे हैं. रुड़की के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी के वरिष्ठ वैज्ञानिक मनोहर अरोरा ने अपने ताजा शोघ पत्र ‘वाटर रिसोर्सेज पोटेंशियल ऑफ हिमालय ऐंड पॉसिबल इम्पेक्ट ऑन क्लाइमेट’ में कहा है कि पिछले 10 वर्षों में हिमालय के 67 फीसदी ग्लेशियर सिकुड़ गए हैं. साथ ही ग्रीनहाउस प्रभाव के कारण धरती का तापमान भी 0.75 सेटीग्रेड बढ़ गया है. अगले दो दशकों तक इसमें वृद्वि जारी रहेगी. अरोरा का निष्कर्ष है कि इस वृद्धि के कारण हिमालय में मौजूद ग्लेशियरों के पिघलने की गति और भी तेज हो जाएगी. जाहिर है कि इस तरह के शोध निष्कर्ष हिमालय में बड़े बांधों के औचित्य पर ही सवाल खड़े कर देते हैं. ऐसे में केंद्र सरकार और योजना आयोग को भी उत्तराखंड और दूसरे हिमालयी राज्यों के बारे में संवेदनशील, व्यापक और समग्र विकासनीति बनाने की पहल करनी चाहिए.

बांध और बिजली का सवाल सिर्फ उत्तराखंड के लोगों का ही सवाल नहीं है. यह सिर्फ पहाड़ या पर्यावरण का सवाल भी नहीं है. यह सवाल समूचे हिमालय के अस्तित्व का सवाल है और हिमालय के अस्तित्व पर पूरे देश का भविष्य निर्भर है. हिमालय का सवाल वैश्विक सवाल है क्योंकि हिमालय से होने वाली छेड़छाड़ पूरी दुनिया के पर्यावरण और ईकोसिस्टम को बदल सकती है. इसलिए इस सवाल को आज किसी युद्ध जैसी आपातस्थिति मानकर इसी नजरिए से इसका समाधान खोजा जाना चाहिए.

'अफराद-ए-किस्सा जैसे हैं वैसे दिखाई दें…'

शहरयार, फिल्म उमराव जान के अपने गीतों के लिए पहचाने जाते हैं लेकिन वे उर्दू के एक महत्वपूर्ण शायर भी हैं. उनकी शायरी में एक बेचैन समाज सवालों के एक लंबे सिलसिले के साथ मौजूद होता है. हाल ही में उन्हें प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ सम्मान देने की घोषणा हुई है. पेश है उनसे रेयाज उल हक की बातचीत के मुख्य अंशः 

ज्ञानपीठ मिलने के बाद अपनी जिंदगी में क्या बदलाव महसूस कर रहे हैं?

यह सम्मान पाने के बाद मुझे उसी तरह खुशी हुई जैसे एक साधारण आदमी को होनी चाहिए. मेरी जिंदगी में वैसे तो ज्ञानपीठ के बाद कोई तब्दीली नहीं आई है लेकिन बहुत-सी चीजों को लोग दूसरों के कहने से मानते हैं. कुछ लोग जो मेरे बारे में पूर्वाग्रह रखते थे उन्हें भी अब लगा है कि मैं अहम चीज हूं.

आपके लेखन की शुरुआत कैसे हुई?

मेरी जिंदगी शुरू में बड़ी शायरी-विरोधी थी. मैं हॉकी खेलता था. सिनेमा देखता था. फिर एक घटना घटी मेरी जिंदगी में कि मुझे घर छोड़ना पड़ा. फिर मेरी दोस्ती आलोचक खलीलुर्रहमान आजमी के साथ हुई, मैं उनके साथ रहा और फिर मैंने शायरी शुरू की. हालांकि आज भी मैं शायरी की तकनीक से वाकिफ नहीं हूं. 1958 से मैंने लिखना शुरू किया था. 1960 के दशक में देश में बहुत कुछ हो रहा था. लोग पुरानी चीजों से ऊब चुके थे. वे कुछ नया चाहते थे. लोगों को मेरी शायरी पसंद आई. मेरे जीवन में कुछ भी पहले से तय नहीं रहा. बिना किसी योजना के चीजें घटती गईं. मैंने पहले साइकोलॉजी से एमए ज्वाइन किया था. फिर उर्दू में दाखिला लिया. तब मुझे लगा कि अब इसमें ही कैरियर बनाना है. मैं हालांकि मार्क्सवादी हूं लेकिन ऐसी ताकत में भी यकीन है जो मेरे जीवन को गाइड करती है. मैं सिनेमा में जाऊंगा, टीचर बनूंगा यह सब कभी नहीं सोचा था. लेकिन जब यह सब हासिल हुआ तो कोशिश की कि मैं सबसे अलग कुछ करूं. इत्तेफाक से फिल्मों की मकबूलियत से मेरी तरफ लोगों का ध्यान गया. मैं अपने अदब (साहित्य) की वजह से फिल्मों में गया था और लोग फिल्मों की वजह से मुझे जानकर मेरी शायरी की तरफ आए. कहा जाता है कि फिल्मों में जाकर लोग अपना स्तर खो देते हैं, लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ. मैंने फिल्मों में जो कुछ भी लिखा उसमें भी वही गहराई है जो मेरी शायरी में है.

फिल्मों से जुड़ाव कैसे हुआ?

मुजफ्फर अली 1964 में अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी से बीएससी कर रहे थे. उस समय तक मेरा संग्रह आ चुका था. इसके आठ-दस साल बाद उनका एक खत आया कि वे एक फिल्म बना रहे हैं गमन, जिसमें वे मेरी दो गजलों का इस्तेमाल करना चाहते हैं. गमन के बाद जब वे उमराव जान बना रहे थे तो उसमें फिल्म की पटकथा के लिहाज से गीत लिखे गए, लेकिन वे भी फिल्मी नहीं थे. इसके बाद भी कई फिल्मों के लिए लिखा.

आपने फिल्मों के लिए भी लिखा और शायरी भी की. अपनी किस भूमिका को ज्यादा पसंद करते हैं?

पहले मुझे अच्छा नहीं लगता था कि लोग मुझे सिर्फ फिल्मों की वजह से जानें. लेकिन फिर लगा कि यह अच्छा ही है कि लोगों में उनकी वजह से मेरी चाहत पैदा हुई. फिर यह भी बात है कि अपनी तरफ से मैंने फिल्मों के लिए कुछ अलग से नहीं लिखा. मेरी कोशिश रहती है कि जो जैसा है वह हर हाल में वैसा ही दिखे –

अफराद-ए-किस्सा जैसे हैं वैसे दिखाई दें,

जाएल तमाशागाह में बीनाई क्यों न हो.

फिल्मों में लिखने और शायरी करने में बहुत फर्क नहीं है. अगर शायर दिए गए हालात को अपना ले और ठीक उसी ढंग से उसे जीने की कोशिश करे तो वह उन पर लिख सकता है.

आप अपनी शायरी के विषय कहां से हासिल करते हैं?

दुनिया से. मैं खुली आंख से दुनिया को देखता हूं और किसी हादसे से उतना ही प्रभावित होता हूं जितना वे लोग जिन पर हादसा गुजरा है. वैसे लिखने की प्रक्रिया रहस्यमय होती है. कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि वह जो चाहे जब चाहे लिख सकता है. रिटायर होने के बाद मैंने कम लिखा है और बहुत दिनों से कुछ नहीं लिखा है. हो सकता है कि मैं कुछ ऐसा लिखूं जो लोगों को हैरान कर दे, हालांकि मैं कोई दावा नहीं कर रहा. वैसे मैं कोशिश करता हूं कि अगर अच्छा न लिखूं तो अच्छा पढ़ूं.