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‘सलवा जुडूम होता तो नहीं मरते मेरे पिता’

आपने फिर सलवा जुडूम जैसा आंदोलन शुरू किया है. इसकी क्या जरूरत है और उद्देश्य क्या है?

यह सलवा जुडूम नहीं है. हम बस्तर विकास संघर्ष समिति के बैनर तले इकट्ठा हुए हैं. सलवा जुडूम पर तो माननीय उच्चतम न्यायालय ने रोक लगा दी है. हां, नई समिति में सभी पुराने जुडूम लीडर एकजुट हुए हैं. लेकिन वास्तव में यह उन ग्रामीणों का प्रयास है जो अपने क्षेत्र में विकास के अलावा एक लोकतांत्रिक सरकार चाहते हैं. दंतेवाड़ा के 15 से 20 गांवों ने नक्सलियों का विरोध करना शुरू कर दिया है. फिर भी हमारी नक्सलियों से कोई सीधी लड़ाई नहीं है. हमारा उद्देश्य केवल अपने इलाके का विकास करना है. सलवा जुडूम के नेता हमेशा मुझसे कहते रहे हैं कि महेंद्र कर्मा के निधन के बाद बस्तर में एक शून्यता आ गई है. विकास के मोर्चे पर भी यह बहुत पीछे है. बस्तर में जमीनी स्तर पर कहीं भी सरकार नहीं है. हमारी समिति की एक बैठक हो चुकी है. जिसमें नेतृत्व को लेकर सवाल उठे थे. मैंने कह दिया था कि आप में से कोई भी नेतृत्व करे, मैं सभी का सहयोग करने के लिए तैयार हूं. लेकिन ग्रामीणों ने मुझे, चैतराम अटामी (पूर्व सलवा जुडूम नेता व वर्तमान भाजपा नेता) और सुखदेव ताती (पूर्व सलवा जुडूम नेता व वर्तमान भाजपा नेता) को समिति का संरक्षक बनाया है. अब हम अपनी अगली बैठक 25 मई को करेंगे. इस दिन महेंद्र कर्मा की पुण्यतिथि है. बैठक में आगे की रणनीति तय की जाएगी. लेकिन इतना तय है कि इस आंदोलन से हम लोगों को कोई नुकसान नहीं होने देंगे.
सलवा जुडूम पर आरोप लगते रहे हैं कि यह केवल उद्योगों के लिए सकारात्मक व सुरक्षित माहौल बनाने को लेकर शुरू हुआ था. इसलिए भाजपा सरकार ने इसका समर्थन भी किया. आपके पिता महेंद्र कर्मा ने जिन परिस्थितियों में सलवा जुडूम शुरू किया था, क्या फिर वैसी ही परिस्थितियां बन रही हैं? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी बस्तर में आकर विकास की बात कर रहे हैं.
देखिए पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं. मैंने तो मोदी जी के बस्तर आने के पहले ही अपना विरोध जता दिया है. मैं ‘तहलका’ के जरिए एक बात और कहना चाहता हूं कि छविंद्र कर्मा का शुरू से ही एक ही स्टैंड रहा है कि बस्तर का विकास होना चाहिए. हमारे इलाकों में गांवों तक जाने के लिए सड़कें नहीं है. यदि नक्सलियों को मेरी बात सही लगती है तो उनका भी मेरे मंच पर स्वागत है. लेकिन विकास विरोधियों के लिए हमारे मन में कोई जगह नहीं है. मोदी जी भी जिस औद्योगिक
विकास की बात कर रहे हैं, हम उसका विरोध करते हैं क्योंकि स्थानीय आदिवासी को केवल मजदूर बनानेवाला औद्योगिक विकास हमें नहीं चाहिए.

नक्सली जन अदालत लगाकर खौफ फैला रहे हैं. बंदूक की नोक पर ग्रामीणों से कहते हैं कि वे स्वीकार कर लें कि वे पुलिस के मुखबिर हैं

उनका और आपका तो एक ही उद्देश्य है बस्तर का विकास?

बस्तर का विकास तो हम तत्काल चाहते हैं लेकिन औद्योगिकीकरण अभी नहीं चाहते. पहले बस्तर के आदिवासियों की उद्योगों में भागीदारी सुनिश्चित की जाए. उसे इन उद्योगों से क्या फायदा होगा, यह सुनिश्चित किया जाए. तब तो उद्योगों का स्वागत है, अन्यथा नहीं. इसका कारण है कि बस्तर में तो एनएमडीसी (नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन) और एस्सार जैसे बड़े उद्योगों के प्लांट लगे ही हुए हैं लेकिन इससे बस्तर को कोई फायदा नहीं हुआ.

स्थानीय लोग आज भी बेरोजगार हैं. उलटा इलाके में नक्सली गतिविधियां बढ़ गईं. मैं दावे के साथ कहता हूं कि एस्सार कंपनी नक्सलियों को फंडिंग करती है. आप ही बताइए, जहां सरकार नहीं पहुंच पाती, जहां सुरक्षा बल नहीं पहुंच पाते, वहां से एस्सार अपनी पाइप लाइन सुरक्षित बिछाकर लौह अयस्क सप्लाई कर रहा है. यह नक्सलियों से बगैर सांठ-गांठ किए कैसे संभव है. सभी को पता है कि नक्सलियों ने एस्सार की पाइपलाइन क्षतिग्रस्त कर दी थी. बगैर नक्सलियों की अनुमति के वह कैसे दुरुस्त की गई.
नक्सली आरोप लगाते हैं कि सलवा जुडूम के नाम पर निर्दोष आदिवासियों की हत्या की गई. दो दिन पहले ही नक्सलियों के प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी ने विज्ञप्ति जारी कर आपके नए आंदोलन पर भी सवाल उठाए हैं. गुड्सा ने आपके आंदोलन को लेकर विरोध भी जताया है.
कोई साबित तो करे कि जुडूम की आड़ में लोगों ही हत्या हुई है. केवल आरोप लगाने से क्या होगा. दूसरी बात यह कि ऐसा केवल नक्सलियों के पैरोकार ही कहते हैं कि सलवा जुडूम ने निर्दोष आदिवासियों का खून बहाया है. उस वक्त बंदूक लेकर एसपीओ (स्पेशल पुलिस ऑफिसर) चल रहे थे, जुडूम कार्यकर्ताओं के पास तो बंदूकें नहीं थी. एसपीओ राज्य सरकार ने जुडूम कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के लिए लगाए थे. जो खून बहा, वह जुडूम कार्यकर्ताओं ने नहीं बहाया. नक्सली ही कभी मुखबिरी के आरोप में तो कभी जनविरोधी होने के आरोप में लोगों की हत्या करते रहे हैं. तब कोई मानव अधिकार कार्यकर्ता नहीं आया आवाज उठाने. क्या महेंद्र कर्मा बंदूक लेकर नक्सलियों से लड़ रहे थे? क्या लोकतंत्र में विरोध करने का भी अधिकार नहीं है? क्या आपके आसपास कुछ गलत हो रहा है तो आप विरोध भी नहीं कर सकते? नक्सली जनअदालत लगाकर खौफ फैला रहे हैं. बंदूक की नोक पर ग्रामीणों से कहते हैं कि वे स्वीकार कर लें कि वे पुलिस के मुखबिर हैं, जनविरोधी हैं. ये कैसी जन अदालत है, जहां जनता तो कोई फैसला नहीं करती, उल्टे नक्सली बंदूक की नोक पर फैसला सुनाते हैं. जहां तक बात गुड्सा उसेंडी की है, तो उनका बयान यही साबित करता है कि नक्सली विकास की बात पर बौखला गए हैं. यही हमारी जीत है.
आप छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रदेश सचिव हैं, क्या आपने अपने आंदोलन के लिए पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों से अनुमति ली है?
अभी हमें नहीं लगता कि किसी की अनुमति की जरूरत है लेकिन भविष्य में जरूरत पड़ी तो पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से बात की जाएगी. वैसे भी यह राजनीतिक आंदोलन नहीं है. यह हमारे घर की समस्या को सुलझाने के लिए एक पहल है. हमारी समिति में शामिल चैतराम अटामी और सुखदेव ताती, भाजपा के नेता हैं. हम सबका स्वागत कर रहे हैं, जो हमारे साथ चलने को तैयार है. सलवा जुडूम के बंद होने के बाद हमारे बहुत सारे साथी मारे गए. इसलिए हमें एक आंदोलन की जरूरत तो महसूस हो ही रही थी. खुद हमारे परिवार ने पिताजी (महेंद्र कर्मा) समेत 93 लोगों को खोया है लेकिन इतना जरूर बता दूं कि सलवा जुडूम चल रहा होता तो नक्सली कभी महेंद्र कर्मा की हत्या नहीं कर पाते. हमारे परिवार में तो शहादत की परंपरा ही चल निकली है. मैंने अपने पिता के अलावा भाइयों, चाचा, ताऊ, मामा और न जाने कितने रिश्तेदारों को खो दिया. अब हम अपने साथियों का और अहित नहीं चाहते हैं बल्कि सब साथ बैठकर इलाके के विकास के लिए काम करना चाहते हैं. यह भी स्पष्ट कर दूं कि यह मेरी राजनीति चमकाने का तरीका नहीं है, जैसा लोग सोच रहे हैं. मेरे पिता परिवार के बीच हमेशा कहते थे कि उनकी मौत नक्सलियों के हाथों होगी. मैं भी जानता हूं कि नक्सली कभी भी मुझे अपना शिकार बना सकते हैं. मैं तो केवल अपने पिता के सपने को पूरा कर रहा हूं, जो अधूरा रह गया था. मुझे इस बात का संतोष है.
क्या राज्य सरकार से समर्थन की उम्मीद रखते हैं आप?
मैं सरकार से समर्थन के लिए बात करना उचित नहीं समझता. छत्तीसगढ़ में कितने कांड हो चुके हैं, रानी बोदली, एर्राबोर, ताड़मेटला और अंत में झीरम घाटी हमला. मैंने झीरम घाटी नक्सल हमला होने के 2 साल बाद तक इंतजार किया कि सरकार नक्सल समस्या को लेकर कोई गंभीर कदम उठाएगी लेकिन नतीजा सिफर रहा. पहले लोगों को लगता था कि राज्य और केंद्र में अलग-अलग पार्टी की सरकार होने से समस्या का सही हल नहीं हो पा रहा है. लेकिन अब तो केंद्र में भी साल-भर से भाजपा की ही सरकार है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो घंटे के लिए बस्तर आए और चले गए. मैं कहता हूं कि यदि नक्सल समस्या को समझना है तो पहले बस्तरवासियों की मनःस्थिति समझनी पड़ेगी. उस दंश को समझना होगा, जो वे झेल रहे हैं. वे क्यों नक्सलियों की मदद करने को मजबूर हैं, यह समझना होगा. यह दो घंटों में समझ नहीं आएगा. मैं समझता हूं कि नक्सली समस्या का सबसे आसान समाधान है वार्ता और विकास साथ-साथ चलें. लेकिन राज्य सरकार ने 11 साल में कुछ नहीं किया, जिससे स्थितियां भयावह हो गई हैं. अभी अब सरकार को लगता है तो वह हमारे आंदोलन को सुरक्षा दे सकती है क्योंकि हमारे पास तो बंदूके हैं नहीं. हम तो केवल इतना चाहते हैं कि आंदोलन से जुड़नेवाले लोगों को सुरक्षा मिले. लेकिन यह कहने हम सरकार के पास नहीं जाएंगे, इसे वे खुद समझें तो बेहतर होगा.
कितने लोग हैं आपके साथ?
पुराने सभी जुडूम नेता हमारे साथ हैं. जनाधार भी है. लेकिन कौन हैं, कितने हैं, इसका खुलासा अभी नहीं कर सकता. अंत में इतना जरूर कहना चाहता हूं कि हम चाहते हैं कि अब सरकार और नक्सली दोनों स्पष्ट करें कि आखिर वे चाहते क्या हैं? सरकार का रवैया नक्सल समस्या को लेकर गंभीर नहीं है. बस वे केंद्र से नक्सल समस्या के नाम पर बड़ा बजट मंगाने के अलावा कुछ नहीं कर रही है. नक्सली भी वसूली में लगे हैं. दोनों का उद्देश्य केवल जनता को लूटना है.

 

कर्नाटक का राजनीतिक नाटक, २ और विधायक हुए बागी

कर्नाटक में कांग्रेस के दो और विधायकों के इस्तीफे हुए हैं जिसके बाद कांग्रेस-जेडीएस सरकार पर ख़तरा और ज्यादा बढ़ गया है। इस्तीफा देने विधायकों की संख्या अब १८ हो गयी है। कांग्रेस इस मसले पर हमलावर हो गयी है और उसने संसद से लेकर सड़क तक विरोध के स्वर तेज करते हुए भाजपा हाईकमांड पर पैसे के जोर पर सरकार गिराने का आरोप लगाया। उधर गोवा से भी खबर है कि वहां कांग्रेस के १० विधायक ”बागी” हो गए हैं।

उधर कई मौकों पर कांग्रेस के संकटमोचक रहे डीके शिवकुमार मुम्बई में होटल में ”ठहराए” गए कांग्रेस विधायकों से नहीं मिल पाए। उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और खबर कि उन्हें जबरदस्ती बेंगलुरु भेजने की तैयारी कर ली गयी है। बुधवार को कांग्रेस विधायक एमटीबी नागराज और के सुधार ने इस्तीफा दिया है।

गोवा से भी खबर आ रही है कि वहां कांग्रेस के १० विधायक ”बागी” तेवर दिखा रहे हैं। अभी तक मुताबिक यह विधायक पाला बदल सकते हैं। वहां सरकार भाजपा की ही सरकार है लेकिन उसका बहुमत बहुत कम विधायकों पर ही टिका है।

आज सुबह कर्नाटक के सियासी संकट के बीच मुंबई से बेंगलुरू और दिल्ली तक राजनीतिक हलचल दिखी। कांग्रेस के संकटमोचक डीके शिवकुमार ”बागी” विधायकों से मिलने मुंबई पहुंचे लेकिन उन्हें होटल के भीतर ही जाने नहीं।  शिवकुमार ने कहा कि उन्होंने उस होटल में कमरा बुक किया है लेकिन उन्हें भीतर नहीं जाने दिया जा रहा। इस बीच वे विरोध में पांच घंटे तक बारिश के बीच होटल के बाहर इंतजार करते रहे।  इस बीच मुंबई पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया।

दिल्ली से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद भी संकट टालने के इरादे से  बेंगलुरू पहुंचे। भाजपा पर आरोप लगाते हुए राजभवन के बाहर वे अन्य नेताओं के  कर रहे थे जब पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया।

फिलहाल २२४ सदस्यीय विधानसभा में जेडीएस-कांग्रेस सरकार अल्पमत में दिख रही है और उसके सामने अस्तित्व बचने का संकट खड़ा हो गया है। अब तक गठबंधन के १८ एमएलए इस्तीफा दे चुके हैं। यदि सभी विधायकों के इस्तीफे स्वीकार हो जाते हैं तो विधानसभा की वर्तमान सदस्य संख्या कम हो जाएगी और बहुमत का आंकड़ा भी। इससे भाजपा के  बहुमत साबित करना आसान हो जाएगा। फिलहाल सभी की नजर स्पीकर पर टिकी है। वे ८ विधायकों के इस्तीफे खारिज कर चुके हैं जिसे इन विधायकों ने कोर्ट में चुनौती दी है।

 

कोमल अमित गेरा

 

 

जल्दबाजी के वादे पर सोचना ज़रूरी

भारत का मतदाता आज क्या चाहता है? कांग्रेस ने गरीबी के खिलाफ जो नई मुहिम छेड़ी है उसमें गरीब परिवारों को हर महीने रु पए छह हजार मात्र देने की बात है। जिससे मदद से यानी गरीबी परिवार अभी किसी तरह छह हजार मात्र कमा लेता है बाद में कांग्रेस यह पूरी राशि बढ़ कर बारह हजार तक जाती है। यानी बाहर हजार मात्र का मासिक आमदनी वाला परिवार गरीब है।

यह मान कर चलना कि गरीब परिवार यत्न करते हुए छह हजार रु पए कमाते ही हैं। इस संख्या पर आपत्ति हो सकती है। यह अंक कहां से आया। इस पर विचार ज़रूरी है। आर्थिक सर्वे के जो सरकारी दस्तावेज हैं उनसे भी घरों में होने वाले खर्च की ही जानकारी मिलती है। घरेलू आमदनी की नहीं। भारत भर में घरेलू आमदनी क्या और कितनी है उस पर किसी सर्वे कराने की किसी योजना नहीं सुनी। अलबत्ता 2016 में एक अध्ययन ‘डब्लू डब्लू डब्लू.360.इन’ पर हुआ था। उसमें भी आंकड़े भारत में घरेलू आमदनी के विभाजन पर हैं। इस अध्ययन में अमीरों से गरीबों तक के परिवारों में दस फीसद के स्लैब में आमदनी की हिस्सेदारी का अनुमान लगता है। लेकिन आमदनी के बंटवारे पर कोई खास काम नहीं हुआ। आज भारतीय घरेलू परिवारों की आमदनी का अनुमान उसके पारिवारिक खर्च (2018-19) के आधार पर ही है।

हम यदि अपने डाटा पर ध्यान दें तो अच्छी खबर कांग्रेस के लिए यही है कि भारतीय परिवार उतने गरीब शायद नहीं हैं जितना वे मान कर चल रहे हैं। भारतीय परिवारों में सबसे गरीब दस फीसद लोग हैं न कि बीस फीसद जिनकी आमदनी बारह हजार रु पए से कम है। उनकी औसत आमदनी रु पए 9500 मात्र प्रति माह की बनती है न कि रु पए छह हजार पांच सौ मात्र जो कही जा रही है। इसके बाद जो वर्ग है वह रु पए 15,700 मात्र प्रति माह कमाता है। परिवार में लोगों की संख्या कम होने से आकार भी कटता है। परिवारों के इस आकार से हर स्लैब पर 300 लाख मिलियन परिवार होंगे न कि 280 लाख।

यानी रु पए बारह हजार मात्र की मासिक आम वाले परिवारों को जो बढ़ी हुई नकदी चाहिए वह तकरीबन रु पए तीन हजार मात्र हैं न कि रु पए छह हजार मात्र। इस से उनकी रु पए की ज़रूरत एक तिहाई घट जाती है जो योजना में बताई गई है। यह सही है कि ऐसे परिवारों की पहचान की क्षमता विकसित की जाए। पहले की कई बार यह बात उठी है कि इस संबंध में कुछ गंभीर काम किया जाए। एक परिवार के क्रिया कलापों पर ध्यान दिया जाए तभी आमदनी का कुछ अनुमान लगता है।

अब आइए, सोचते हैं कि रु पए बाहर हजार मात्र की न्यूनतम आमदनी के लक्ष्य की वजहें तार्किक कितनी हैं। हम 1990 से ‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑(घर-घर की आमदनी को खर्च से अलग करके) देखते रहे हैं। इसमें यह जानकारी मिली कि बीस फीसद बेहद गरीब परिवारों को अपनी कमाई से ज्य़ादा खर्च करने की आदत थी। परिवार फिर कर्ज में फंसते रहे। इसके बाद के रईस ऐसे बीस फीसद परिवार हैं जो आठ से दस फीसद  की अतिरिक्त कमाई पर ध्यान देते हैं। ये वस्तुओं की कीमतों में हुई थोड़ी भी बढ़ोतरी पर काबू भी पा लेते हैं लेकिन ज्य़ादातर का निर्याह उनकी आमदनी में ही हो जाता है।

ऐसे घरों की सोच होती है कि इनका जो खर्च है वह ‘रूटीन’ और ‘बगैर रूटीन’ में है (यानी उदाहरण के लिए स्वास्थ्य संबंधी आपात खर्च या फिर पारिवारिक-सामाजिक आयोजन या फिर स्कूल कालेज में एडमिशन के लिए कैपिटेशन फीस। ऐसे परिवार जो रु पए 9500 प्रतिमाह कमाते हैं वे मुश्किल से ही सही अपने रूटीन खर्च भी पूरे कर पाते हैं। ऐसे परिवार जो हर महीने रु पए 15,700 मात्र कमाते हैं (अगले रईस दस फीसद वे अपने रूटीन खर्च भी पूरे कर लेते है। वे दस फीसद अतिरिक्त भी रखते है। लेकिन बात रूटीन खर्च के कारण वे कजऱ् में भी रहते हैं। इनके ऊपर जो परिवार है वे ज़रूर आम रूटीन खर्च के बाद भी अतिरिक्त पाते हैं। यानी बारह हजार मात्र से 13 हजार मात्र के बीच की कोई राशि बतौर न्यूनतम मासिक की आमदनी तार्किक है।

हमने फिर भी उन गरीब घरों के दस फीसद परिवारों की राज्यभर छानबीन की जिन्हें यह नकद धनराशि मिल सकती है। जवाब आया अवसाद भरा है। कई राज्यों में तो इसकी कोई सुगबुगाहट तक नहीं है। देश के सबसे ज्य़ादा गरीब दस फीसद परिवारों में सबसे ज्य़ादा परिवार तो झारखंड में हैं जो इक्कीस फीसद हैं। फिर बिहार नहीं बल्कि 15 से 19 फीसद पश्चिम बंगाल, ओडि़सा और मध्यप्रदेश में। आश्चर्य लेकिन सच, उत्तरप्रदेश में सिर्फ 12फीसद हैं। छत्तीसगढ़ में 13 फीसद, राजस्थान में दस फीसद हैं। तेलंगाना में यह आठ फीसद, असम में नौ फीसद और इससे कुछ कम बाकी प्रदेशों मेें।

लेकिन ऐसे राज्य जहां गैर भाजपा सरकारें हैं मसलन पश्चिम बंगाल, ओडिसा में बेहद गरीब परिवारों की तादाद 15 फीसद में भी ज्य़ादा है। अविकसित ग्रामीण इलाकों में दस फीसद बेहद गरीब परिवारों में 85 फीसद हैं। जबकि 11 फीसद लोग बड़े शहरों और आस-पास के गांवों-कस्बों में।

इन तमाम तथ्यों के अलावा विकसित होते समाज के लोग वही चाहते हैं जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेहतर तरीके से समझते हैं। नकद धन खातों में आएं। लेकिन वे ऐसे मौके चाहते हैं जहां और ज्य़ादा कमाया जा सके। जो बच्चों के लिए बेहतर हो तब जीवन की और तमाम ज़रूरतों- संभावनाओं का पता लगा सकेंगे। बेहद गरीब परिवारों में यदि हम परिवार के मुखिया के कामकाज की पड़ताल करें तो इनमें आधे से ज्य़ादा दिहाड़ी वे मजदूर हैं। तीस फीसद लोग गैर कृषि और सोलह फीसद कृषि क्षेत्र से जुड़े हैं। जाहिर है कांग्रेस को वह बात आज भी याद है जिसे भाजपा भूल चुकी है। कांगे्रस ने ही मनरेगा से आमदनी बढ़ाने का कार्यक्रम शुरू किया था। वह वाकई जादुई इस लिहाज से रहा कि इससे एक तरह से न्यूनतम वेतन की राशि तय हो गई। धीरे-धीरे आधार भी माना गया। दूसरे 22 फीसद लोग छोटे किसान हैं। इनमें भूमिहीन भी कुछ राज्यों में काम की दूसरी योजनाएं भी हैं जो उन वित्तीय और भावी ज़रूरतों को समझते हैं। इसके अलावा देश में 22 फीसद परिवार ऐसे भी हैं जिनका भरण-पोषण बच्चों से आर्थिक सहयोग और मकान के लिए किराए से चलता है।

सब से दुखदायी पहलू है उच्च शिक्षा के स्तर पर किसी बेहद गरीब परिवारों में किसी का पहुंच जाना। क्योंकि बेहद गरीब दस फीसद परिवारों में 45 फीसद लोग ही प्राइमरी स्कूल और 44 फीसद से भी कम उम्र तक की पढ़ाई भी कर पाते हैं। किसी भी पार्टी ने इसके समाधान पर नहीं सोचा कि ऐसा सामाजिक अभियान शुरू हो जिसमें न्यूनतम आय की गारंटी के साथ ही शिक्षा की भी समुचित व्यवस्था हो। अच्छा है, अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों के साथ ही शिक्षा विदों के साथ मिल बैठ यह समय है, जब मतदाता की भी सुनी ही जाए।

रमा बीजापुरकर

राकेश शुक्ेल

साभार: इंडियन एक्सप्रेस

   

गंगा की लहरों पर पड़ती दूधिया रोशनी। बाकी दूर तब फैला अंधियारा। अचानक दिखाई देती हैं कई नावें। इन नावों से उभरती दूधिया रोशनी में चमकती है साड़ी पहनी एक युवती साथ में कुछ और भी महिलाएं दूसरी नावों में सफेद कपड़े पहने पहुंचे नेता। ‘आ गईं प्रियंका गांधी।’ आवाजें गूंजती हैं। गंगा किनारे बढ़ जाती है चहल-पहल। पटरों पर नावों से उतरते एसपीजी जवानों के बूटों की धमक सुनाई देती है। लाल साड़ी में नाव से उतरती हैं प्रियंका। फूलों की मालाओं के साथ होता है प्रिंयंका गांधी वाड्रा का स्वागत।

अर्से बाद एक युवा महिला नेता का चेहरा दमकता दिखता है भारतीय राजनीति में। देश की लगभग आधी आबादी का एक चेहरा। देश की इस आबादी की तकरीबन दो करोड़ महिलाएं आज भी मतदाता सूची से बाहर हैं क्योंकि वे दलित और मुसलमान है। हमेशा की तरह भारत के निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूचियां अपडेट करने के आदेश दिए होंगे। राज्यों की प्रशासनिक मशीनरी ने खानापूर्ति भी की होगी। लेकिन इतनी बड़ी तादाद में महिलाएं मतदाता सूचियों से बाहर ही रह गईं।

प्रियंका कहती हैं देश में जो सरकार है वह महिला विरोध है जन विरोधी है, मजदूर  विरोधी है। इस सरकार पर सोचना ही होगा। यह सरकार राज करने के लिए जाति, धर्म, संप्रदाय में भेद करती है। छोटे दस्तकार, बुनकर छोटे काम-धंधे करके परिवार चलाने वाले इस सरकार के कायदे कानूनों से आज बेहद परेशान हैं। एकजुट होकर बेहतर भविष्य के लिए आपको अपने मत का इस्तेमाल करना है। यह आपका हथियार है। इसका सही इस्तेमाल कीजिए। इससे किसी को कोई चोट नहीं लगती। तकलीफ नहीं होती। लेकिन इससे आप अपना भविष्य चुनते हैं। जिसे आप वाकई चाहते हैं।

प्रयागराज (इलाहाबाद) से मिर्जापुर (चुनार) पहुंची प्रियंका गांधी। सुबह की सक्रियता अच्छी लगी। पार्टी के लोगों से मिलना। विंध्यवासिनी मंदिर में मत्था टेका। दरगाह पर चादर चढाई। कई जगह छोटी-छोटी नुक्कड़ सभाएं कीं। लोगों के साथ सेल्फी ली। महिलाओं और बुजुर्ग महिलाओं से मिलना-बतियाना। भीड़ में भी उन्हें देख कर उत्साह। गोपीगंज मेें पांच सौ मीटर तक वे पैदल चलीं।

एक नुक्कड़ सभा में कहा, ‘भाजपा 70 साल की रट लगानी बंद करे। छह दशक में कांग्रेस ने क्या किया यह पूरा देश जानता है। उन्होंने सभा में जनसमूह से कहा, ‘भाजपा के नेताओं से उनके बड़े-बड़े वादों की रिपोर्ट मांगो। इनकी सरकार ने बुनकरों, हथकरघा मज़दूरों, कारीगरों, छोटे कारखानों में काम करने वालों, नौजवानों को बुरी तरह छला। छोटे उद्योगों का काम धंधे को पूरी तरह से बंद कर दिया है। इनसे पूछिए, ऐसा इन्होंने क्यों किया?’

प्रियंका की गंगा यात्रा के दौरान नदी के दोनों पाटों पर पड़ रहे गांवों-कस्बों से नदी किनारे उतरे जन समूह की खबरों से जिला-मंडल प्रशासकों और उत्तर प्रदेश सरकार की बौखलाहट काफी बढ़ गई थी। तीन दिन की यात्रा के दौरान पुलिस प्रशासन ने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ही नहीं, बड़ी संख्या में युवाओं को अपने संदेह के दायरे में रखा। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियों की गईं। एहतियात के तौर पर ऐसे व्यापक सुरक्षा प्रबंध किए जिससे प्रयागराज में वाराणसी तक के इलाके कहीं कांग्रेसमय न दिखे लेकिन कांग्रेस प्रभाव से बनारस को मुक्त करने के लिए वाराणसी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अचानक सभा व्यवस्था (24 मार्च)की गई। लखनऊ में और आगरा मेंभाजपा के वरिष्ठतम नेताओं की सभाएं हुईं।

पूर्वी उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने गंगा यात्रा के दौरान देश के नागरिकों की आम जिंदगी में बढ़ी मुश्किलों की जानकारी ली। उन्होंने गंगा के दोनों किनारों पर बसे गांवों और कस्बों मे जि़ंदगी के कठिन रूपों को भी जाना समझा। साफ-सफाई, श्मशान, मंदिर, मल्लाह, केवट, बुनकर रंगरेज मिट्टी के खिलौने बनाने वाले कुम्हार, धोबी, ठेले चलाने वालो छोटे दर्जी, जूते-चप्पल ठीक करने वालों से भी उनकी कम ही सही मगर महत्वपूर्ण बातचीत हुई।

गंगा यात्रा कर रही प्रियंका को देखने-जानने गंगा नदी के दोनों पाटों पर जहां-जहां भी समूह दिखा। नेहरू-गांधी परिवार की इस युवा नेता ने उनके पास पहुंच कर जन-संवाद किया। इस बातचीत में समय लगा लेकिन जनसमूह निराश नहीं हुआ। युवा नेता ने बड़े ही इत्मिनान से अधेड़-बुजुर्ग महिलाओं की भी बातें सुनीं और युवाओं की रोज़गार न मिल पाने, शिक्षा ठीक से न होने और स्वास्थ्य के अच्छे दवाखानों के न होने की भी बातें सुनीं-समझीं।

एक जगह छोटी सभा में उन्होंने कहा, ‘चौकीदार तो अमीरों के होते हैं, गरीबों के नहीं।’ आज नई दिल्ली की केंद्र सरकार न केवल किसान, मजदूर, महिला विरोधी है बल्कि यह एक ऐसी नकारात्मक सरकार है, जिसे बदलने का वक्त अब करीब आ गया है। आज ज़रूरत है, ‘नई राजनीति’ की। इस ‘नई राजनीति’ के तहत इस सरकार को बदलने की आवाज़ काशी से उठनी चाहिए। देश में बदलाव के लिए अब काशी वासी ही आगे आएं। जनसमूह ने उनकी बात सुनी और तालिया बजाईं।

बनारस में चाय की और दूध की दूकानों पर गली-चौराहों पर जुटे लोग या तो  काशी विश्वनाथ से ललिता घाट तक जाने वाली गलियों-मकानों दुकानों के ध्वंस होने और विश्वनाथ कारिडोर बनाने से काशी की घटी प्रतिष्ठा की बात करते हैं। या फिर प्रियंका की गंगा यात्रा की। लोगों को लगता है कि कांगे्रेस ज़रूर कुछ कर दिखाएगी। जन समर्थन इसे मिलना चाहिए क्योंकि इसने आज़ादी और आज़ादी के बाद देश में विकास की एक तस्वीर तो गढ़ी थी जिसे अच्छा करने की बात के बहाने नष्ट कर दिया गया। अब की फिर कांगे्रस को एक बार क्यों नहीं।

घर-घर में युवा और अधेड़ महिलाओं में प्रियंका की वेशभूषा, बोलचाल, चलने का अंदाज पर बहस रही। सबने माना कि उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाके में अपना जनाधार खो चुकी कांगे्रस को फिर से मजबूत करने में प्रियंका मेहनत तो कर रही हैं। उनके साथ अब नए लोग जुड़ रहे हैं। गंगा यात्रा के जरिए उन्होंने उत्तरप्रदेश में इलाहाबाद और शैक्षणिक-सांस्कृतिक तौर पर मशहूर बनारस में अंग्रेजी राज के खिलाफ हुई आज़ादी की लड़ाई के सपूतों की विरासत की याद दिला दी। इस कारण वे पूर्वी उत्तरप्रदेश में लगभग छा गईं।

अपने दौरे के तीसरे दिन उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर मेें पूजा-अर्चना की। जब दोपहर सवा दो बजे वे मंदिर की ओर चलीं। प्राचीन गलियों में बने पुराने मकानों की बालकनियों और छतों से उनका फूलों की पंखुडिय़ों से उनका स्वागत किया गया। पूरी गली मे सिर्फ हर-हर महादेव का उद्घोष सुनाई देता रहा।

मंदिर में प्रियंका गांधी वाड्रा ने बाबा का षोडसोपचार पूजन और दुग्धाभिषेक किया। काशी के वयोवृद्ध मान्य पंडित चंद्रशेखर नारायण दातार ने सप्तयोगी अनुष्ठान किया पंडित दातार के अनुसार सबसे पहले सप्तयोगी अनुष्ठा करने का  आदेश स्वयं भगवान शिव ने दिया था जिसे सप्तऋृषियों ने किया था।

बाबा के दर्शन पूजन के बाद प्रियंका ने ‘विश्वनाथ कॉरिडोर’ बनाने के संकल्प को जाना समझा। इस संकल्प को पूरा करने के लिए काशी की उन तंग गलियों के मकानों-मंदिरों-दूकानों का ध्वंस कर दिया गया। इससे बहुत से लोग बेरोज़गार हो गए। कांग्रेस नेता व्यथित दिखीं।

यहां से वे पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के आवास को गई। जैसे ही वे उस गली में घुसीं उन पर गुलाब की पंखुडिय़ां बरसने लगीं। उत्साहित बच्चे और युवा खासे उत्साह में थे। सभी बाबा महादेव की जय-जयकार कर रहे थे। यहां से वे चौक घाट को बढ़ीं। अब उनकी यात्रा भव्य रोड़ शो में बदल गई थी। यहां वे शहीद विशाल पांडे के घर गई। शहीद की छोटी बहन को उन्होंने दुलारा। उन्होंने कहा, ‘पिता को खोने का दर्द मैं समझती हूं। मैं जब 19 साल की थी तो मेरे पिता (पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी) शहीद हुए थे। उन्होंने शहीद की बहन को पढ़ाई लिखाई में अच्छी मेहनत करने और पायलट बनने की सलाह दी। उससे कहा, ‘तैयारी करो। हम मदद करेंगे।’ फिर वे बहादुरपुर में शहीद अवधेशकुमार यादव (पुलवामा हमले में शहीद) के घर भी गईं। परिवार के लोगों को सांत्वना दी।

बनारस में पिपलासी कटरा के सरोजा पैलेस में कांग्रेस के कार्यकर्ता सम्मेलन में उनकी मौजूदगी में भाजपा के उत्तरप्रदेश अध्यक्ष महेंद्रनाथ पांडे के छोटे भाई के परिवार में बहू अमृता पांडे ने कांग्रेस की सदस्यता की। इस पर उन्होंने चुटकी ली कि ‘आपके ससुरजी आपसे नाराज़ तो नहीं होंगे।’

इस सम्मेलन में बोलते हुए उन्होंने कहा, ‘आज़ादी से पहले देश में अंग्रेजी सरकार की तानाशाही थी। तब गरीब लोगों (सुरलियों) को बहुत यातनाएं दी जाती थीं, मारा-पीटा जाता था। आज देश में वही हाल हैं। जनता की आवाज़ सुनने की बजाए उसे दबाया जा रहा है। सिर्फ इतना है कि वर्तमान तानाशाह भारतीय हैं।’

गंगा यात्रा के आखिरी दिन प्रियंका ने मिर्जापुर में चुनाव किले के गेस्ट हाउस में मीडिया से बातचीत की। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया कि वे जनता को भ्रमित कर रहे हैं। उन्होंने कहा, जो लोग सत्ता में होते है उन्हें यह गलतफहमी होती है कि वे किसी को भी डरा सकते हैं। क्योंकि वे हर तरह से सक्षम हैं। इसलिए वे लोगों को बरगलाते हैं। कांगे्रस महासचिव ने कहा, प्रधानमंत्री को यह सोचना छोड़ देना चाहिए कि लोग बेवकूफ हैं। उन्हें यह पता होना चाहिए कि जनता सब जानती समझती है।

उत्तरप्रदेश का पूर्वी अंचल बतौर पूर्वांचल भी जाना जाता है। यहां सांस्कृतिक सामाजिक-शैक्षाणिक विकास तो है लेकिन ज़रूरी विकास कार्य किसी भी सरकार ने नहीं किए। इसलिए इस पूरे अंचल को पूर्वांचल के तौर पर अलग राज्य बनाने की मांग भी होती रही है। कांग्रेस की महासचिव प्रियंका के पास होने से इलाके की जनता में उम्मीद बंधी हैं। उनकी गंगा यात्रा कई मायनों में खासी कामयाब रही। उन्होंने अपना दल (कृष्णा गुट) की पल्लवी पटेल को खास तरजीह दी। अपने साथ रखा इस गुट से कांग्रेस का तालमेल होने से परस्पर लाभ संभव है। इस पूरे इलाके के कांग्रेस को लेकर उत्साह बढ़ा है।

खुद मां होने के कारण युवा, अधेड़ और बूढ़ी महिलाओं में इंदिरा की पोती के प्रति जिज्ञासा बढ़ी है। युवाओं में बड़ी दीदी के प्रति स्नेह बढ़ा है और बनारस में अधेड़ हो रहे लोगों में उम्मीद की लहर बनी है। बनारस में तो यह भी शोर था कि प्रियंका यहीं से चुनाव भी लड़ें। लेकिन बड़े ही संभव तरीके से उन्होंने यही कहा कि पार्टी का हर फैसला वे मानेंगी।

प्रियंका गांधी वाड्रा की गंगा यात्रा पर राजनीतिक दल के विशेषज्ञों में बहस छिड़ी हुई है। गंगा और बाबा महादेव की नगरी बनारस की पुरानी गलियों में हुआ ध्वंस न केवल पूर्वांचल, बल्कि प्रदेश और देश के लोगों के लिए खासा बेचैनी भरा रहा है।

सुरेश प्रताप

उत्तराखंड में लड़ाई प्रतिष्ठा की

मोदी लहर के सहारे उत्तराखंड में दोबारा पांचों सीटों पर काबिज होने का सपना संजोए भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस ने अपनी शतरंजी चाल में उलझा दिया है। अब इन दोनों दलों में मुकाबला रोचक हो गया है। कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह पर दांव लगाया है तो भाजपा ने भी पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक और प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट पर भरोसा जताया है।

सूबे की पांच लोकसभा सीटों पौड़ी गढ़वाल, टिहरी, हरिद्वार, नैनीताल और अल्मोड़ा पर अभी भाजपा ही काबिज है। अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश से पृथक कर उत्तराखंड राज्य बनाने का श्रेय भारतीय जनता पार्टी को जाता है और भाजपा  हर चुनाव में इस उपलब्धि को ‘‘हमने बनाया है, हम ही संवारेंगे’’ के नारे के साथ दोहराती भी है। केंद्र की राजनीति में उत्तराखंड के नेताओं का खासा दखल रहा है। हेमवती नंदन बहुगुणा, पंडित नारायण दत्त तिवारी, ब्रह्मदत्त, के सी पंत और भक्त दर्शन इनमें से प्रमुख रहे हैं। कठिन भौगोलिक

परिस्थितियों और विकास की दौड़ में पिछड़ेपन के कारण लंबे अरसे से यहां की जनता अलग राज्य की मांग कर रही थी।

इन चुनावों में पौड़ी गढ़वाल सीट और नैनीताल सीट पर रोचक मुकाबला है। पौड़ी सीट पर भाजपा के कद्दावर नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी को पार्टी ने टिकट नहीं दिया। खंडूरी केंद्र के एक फैसले को लेकर बहुत आहत थे। उन्हें रक्षा कमेटी के चेयरमैन पद से अचानक हटाया गया। चेयरमैन रहते मेजर जनरल खंडूरी ने रक्षा कमेटी को सौंपी रिपोर्ट में रक्षा उपकरणों को लेकर कुछ ऐसी तलख टिप्पणियां की थीं जो प्रधानमंत्री को नागवार गुजरी। उधर खंडूरी के पुत्र मनीष को इस बीच कांग्रेस अपने साथ जोडऩे में कामयाब हो गई और बिना वक्त गंवाए कांग्रेस हाईकमान ने मनीष को पौड़ी गढ़वाल से अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। कांग्रेस के इस दांव से प्रदेश भाजपा के नेता भी सकते में आ गए। हालांकि पिता भुवन चंद खंडूरी का इस पूरे मामले में रवैया बिल्कुल स्पष्ट है कि मनीष के फैसले से उनका कोई सरोकार नहीं लेकिन मनीष के पास अपने पिता की राजनीतिक विरासत में तीन दशकों के उनके योगदान को गिनाने के अलावा और कुछ भी नहीं है। नामांकन करने के बाद मनीष ने अपनी पहली सभा में ही एक मार्मिक वक्तव्य से यह इशारा कर दिया कि भले ही वह राजनीति में नए हों लेकिन पिता की छत्रछाया और राजनीतिक धूप छांव के हर मौसम का उनको पूरा तजुर्बा है।  मनीष बोले, ‘‘मैंने अपने पिता की आंखों में आज तक दो बार आंसू देखे हैं। एक जब बेटी को विदा किया और दूसरी बार जब रक्षा समिति के चेयरमैन पद से इस्तीफा दिया। भुवन चंद खंडूरी इसलिए भी धर्म संकट में हैं क्योंकि मनीष के खिलाफ भाजपा प्रत्याशी तीरथ सिंह रावत को मेजर जनरल खंडूरी का राजनीति में दत्तक पुत्र माना जाता है। तीरथ सिंह भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और राज्य में मंत्री भी रहे हैं । इस जटिल त्रिकोण में जनता भी दोराहे पर खड़ी है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि मनीष की जीत में तो पिता की जीत है लेकिन हार में भी पिता की ही जीत है।

दूसरा रोचक मुकाबला कुमाऊं मंडल की नैनीताल उधम सिंह नगर सीट पर है। यहां अप्रत्याशित फैसला लेकर पूर्व मुख्यमंत्री कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत ने सबको हैरत में डाल दिया है। मुख्यमंत्री रहते हुए हालांकि रावत का पूरे राज्य में ही संगठित जनाधार रहा है बावजूद इसके कि पिछले चुनाव में उनको पराजय का मुंह देखना पड़ा था। हरीश रावत के मुकाबले में भाजपा ने रावत के पारंपरिक विरोधी रहे भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को मैदान में उतारा है। पिछली विधानसभा में जब कांग्रेस के ही 10 बागी विधायकों ने हरीश रावत सरकार को गिराने की पटकथा रची थी तब उसके निर्देशक के रूप में अजय भट्ट का नाम ही सामने आया था। हरीश रावत कैंप हालांकि इस मर्तबा खासा जोश में है और जीत को लेकर पूरी तरह

आश्वस्त है।

हरिद्वार संसदीय सीट पर निवर्तमान सांसद डॉ रमेश पोखरियाल निशंक पर पार्टी ने दोबारा भरोसा जताया है। मजेदार बात यह है कि पांचों सीटों में से कांग्रेस भी इस सीट को ज्य़ादा तवज्जोह नहीं दे रही है। यहां पूर्व विधायक अमरीश कुमार को कांग्रेस ने निशंक के खिलाफ मैदान में उतारा है। निशंक दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं और राज्य गठन पूर्व से क्षेत्र का विधान सभा में प्रतिनिधित्व करते रहे हैं।

अल्मोड़ा सीट पर कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा के सामने भाजपा ने केंद्रीय कपड़ा राज्य मंत्री अजय टम्टा को मैदान में उतारा है। अल्मोड़ा एक सांस्कृतिक हब के रूप में पूरे देश में विख्यात है और यहां अमूमन राष्ट्रीय मुद्दों की लहर का मतदाताओं पर ज्यादा असर रहता है।

टिहरी लोकसभा सीट पर वर्तमान सांसद माला राज्यलक्ष्मी शाह के मुकाबले पर कांग्रेस ने अपने प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह को मैदान में उतारा है। प्रीतम सिंह की गिनती एक ईमानदार और चरित्रवान नेताओं में होती है। इस संसदीय सीट के तहत चकराता विधानसभा से प्रीतम सिंह के पिता गुलाब सिंह निर्विरोध विधायक भी रहे हैं। प्रीतम की ज़मीनी पकड़ मजबूत होने की वजह से निवर्तमान सांसद माला राज्यलक्ष्मी शाह के लिए मुकाबला थोड़ा कड़ा हो गया है।

बहरहाल सूबे की पांच लोकसभा सीटों के लिए कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशियों के अलावा 55 अन्य प्रत्याशी मैदान में है। कुल 65 प्रत्याशी मैदान में हैं। इनमें छह महिला प्रत्याशी हैं। गढ़वाल से 12, टिहरी से 15 हरिद्वार से 20 नैनीताल से 10 और अल्मोड़ा से आठ प्रत्याशी मैदान में है।  पिछले लोकसभा चुनाव 2014 में कुल 95 प्रत्याशियों ने नामांकन किए थे।

भारतीय जनता पार्टी सर्जिकल स्ट्राइक, भ्रष्टाचार और ‘‘मैं भी चौकीदार हूँ’’ के साथ और ढेर सारे स्थानीय मुद्दों के को लेकर कांग्रेस से मुकाबले के लिए कमर कस चुकी है वहीं कांग्रेस को राहुल गांधी के हालिया ‘‘गरीबी हटाओ’’ और न्यूनतम आय गारंटी की घोषणा से उत्तराखंड में नई ऑक्सीजन मिली है।

क्या भारत महिला और पुरु ष में बराबरी ला पाया?

इस साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2019 का विषय था बराबरी बेहतरी के लिए, सारी दुनिया मेें औरत मर्द कीलैंगिक बराबरी रहे। आज जबकि राजनीतिक दल भारत में आम चुनाव की तैयारी के कोलाहल में उलझे हैं।‘तहलका’ ने तय किया, ‘भारत में अकेली औरत के संकटों पर आवरण कथा दी जाए। उसमें इस बात का भीजायजा लिया जाए कि महिलाओं ने काफी कुछ हासिल किया लेकिन अभी भी उनके सशक्तिकरण के लिएकाफी कुछ बाकी है।’

अभी हाल ही में केरल में जन जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी दस लाख महिलाओं ने कंधे से कंधा मिला कर 620किलोमीटर लंबी ‘महिला दीवार’ बनाई। इनकी मांग समानता और पुनर्जागरण के मूल्यों के मुद्दों पर मर्दऔरत में बराबरी की थी। इन महिलाओं ने पूरे  देश में इतिहास रचा है।

अफसोस की बात है कि व्यापार में महिलाओं के नेतृत्व निभाने की भूमिका में भारत तीसरे नंबर पर है। यहजानकारी मिली उस सर्वे में जिसे ‘ग्रांट थ्रांटन महिलाएं व्यापार में: नया परिदृश्य’ के तहत कराया गया था जोनतीजे सामने आए, वे चौंकाते हैं। भारत में सिर्फ 17 फीसद महिलाएं ही वरिष्ठ अधिकारी की भूमिका में हैं।जबकि 41 फीसद व्यापारिक प्रतिष्ठानों मेें कोई महिला नेतृत्व की भूमिका में नहीं है। भारत में वरिष्ठ प्रबंधकों कीभूमिका में भी महिलाओं का आंकड़ा सात फीसद है। इससे यह जाहिर है कि आज ज़रूरत है कि इस असमानताको दूर किया जाए। जो भी लोग फैसला लेने की स्थिति में हैं भले ही वे व्यापार, समुदाय, सरकार में हों ज़रूर इससंबंध में अपना नज़रिया बदलें।

इसी तरह मुद्दा जब राजनीतिक ताकत का होता है तो यह साफ दिखता है कि दुनिया भर नेताओं में सात फीसदसे भी कम महिलाएं हैं। 24 फीसद महिलाएं कानून बनाने (यानी जनप्रतिनिधि के रूप में) की हैसियत में होती हैं।संयुक्त राष्ट्र संघ के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार राष्ट्र प्रमुखों के रूप में चुनी गई महिलाओं का फीसद पहले 7.2फीसद था। यह अब 2017-2018 में घट कर 6.6 फीसद रह गया। इसी अवधि में सरकार में प्रमुख रही महिलाओंकी तादाद 5.7 फीसद से घट कर 5.2 फीसद ही रह गई।

अब यह बात साफ है कि जब तक भेदभाव खत्म नहीं होता तब तक विकास संभव नहीं है तब तक औरतों औरमर्दों में समानता नहीं होती। इसलिए मांग की गई कि लैंगिक न्याय और बराबरी हो। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने अपने‘फिफथ सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल’ का लक्ष्य भी लैंगिक समानता रखा है। महिलाएं चाहती हैं कि उसे फैसलेलेने के विभिन्न स्तरों पर उन्हें नेतृत्व संभालने का मौका मिले साथ ही आर्थिक स्रोतों में बराबरी के अधिकार हों,उत्तराधिकार हो, जमीन पर स्वामित्व और नियंत्रण का अधिकार हो। साथ ही समाज में उसका समादर औरउसकी भूमिका के आधार पर महिलाओं का सशक्तिकरण किया जाए।

एक ऐसा समाज जहां प्रकृति और ऊर्जा के उपयोग में महिलाओं की महती भूमिका को नकार कर सर्वां विकासके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता हो। यह मांबाप की जिम्मेदारी है कि वे बेटे और बेटियों को शिक्षित करें।जिससे वे ऐसे भाषाई प्रयोग भी न करें कि ‘यह तो महिलाओं का काम है।’ और कुछ काम को नीचा दिखाएं।आज महिलाओं के बारे में दकियानूसी उक्तियों का कोई मायना नहीं मतलब नहीं रह गया है। महिलाओं कोदुनिया पर जीत हासिल करने के लिए पुरु षों की ज़रूरत भी नहीं है।

मुंबई और ठाणे सहित महाराष्ट्र में बर्ड फ्लू ने फैलाये पंख, सीएम की तत्काल मीटिंग

मुंबई और ठाणे सहित महाराष्ट्र में बर्ड फ्लू ने फैलाये पंख, सीएम की तत्काल मीटिंग

राज्य में संख्या में जिलों में बर्ड फ्लू का संकट अब पूरे राज्य में फैल रहा है। राज्य के कई जिलों में मृत पक्षी पाए गए। एक रिपोर्टों के अनुसार, बर्ड फ्लू मुंबई और ठाणे सहित राज्य के कई जिलों में फैल गया है।
अकेले परभणी जिले में बर्ड फ्लू के कारण एक ही दिन में 800 मुर्गियों की मौत हो गई है।
बीमारी की गंभीरता को देखते हुए चीफ मिनिस्टर उद्धव ठाकरे ने आज इस विषय पर एक तत्काल मीटिंग बुलाई है जिसमें वह स्थिति का जायजा लेंगे।

देश में बर्ड फ्लू छह से सात राज्यों में फैल गया है। महाराष्ट्र के साथ ही अन्य राज्यों में बर्ड फ्लू फैलने लगा है। रत्नागिरी जिले के दापोल के साथ साथ परभणी, बीड तक फैल गया है। परभणी के साथ, मुंबई, ठाणे, बीड और अन्य जिलों में मृत पक्षी पाए गए। उनके नमूने प्रयोगशाला में भेजे गए। उनकी रिपोर्ट मिल गई है और प्रशासन ने कहा है कि बर्ड फ्लू पांच जिलों में फैल गया है।
परभणी जिले के मुरुम्बा गाँव में एक ही दिन 800 मुर्गियाँ मर गईं। वह पोल्ट्री फार्म जिसमें यह घटना घटी वह एक स्व-सहायता समूह द्वारा चलाया जाता है। पोल्ट्री फार्म में 8000 हजार मुर्गियाँ हैं, जिनमें से 800 मुर्गियाँ मर चुकी हैं। इसलिए, निवारक उपाय किए गए हैं। प्रशासन के अनुसार, लगभग 80,000 मुर्गियाँ नष्ट की जाएंगी।
रविवार को बीड जिले के पाटोदा तालुका के मुगगाँव में छब्बीस कौवे मृत पाए गए। तीन कौवों के सैंपल भोपाल भेजे गए थे जबकि कुछ अन्य नमूनों को पुणे भेजा गया था। रविवार को मुंबई के चेंबूर इलाके में टाटा कॉलोनी के पास नौ कौवे मृत पाए गए। इस बारे में जानकारी मिलने के बाद बीएमसी के कर्मचारियों ने मृत कौवों के नमूने जांच के लिए भेजे हैं।

हेपेटाइटिस को नजरअंदाज ना करें

विश्व हेपेटाइटिस दिवस के अवसर आज लीवर रोग व हेपेटाइटिस रोग विशेषज्ञों का कहना है कि हेपेटाइटिस 5 प्रकार का होता है। ए,बी,सी,डी और ई । हेपेटाइटिस एड्स से ज्यादा खतरनाक है। इसमें जरा सी लापरवाही जानलेवा हो सकती है।

एम्स के लीवर रोग विशेषज्ञ डाँ संदीप का कहना है कि हेपेटाइटिस संक्रमित रक्त और गंदे पानी के सेवन से भी होता है। यानि कि संक्रमण की वजह से लीवर तक डैमेज हो जाता है। आई एल वी एस के डाँ शांतनु दुबे ने बताया कि हेपेटाइटिस रोगियों के बढ़ने की मुख्य वजह जागरूकता का अभाव व समय पर इलाज का ना कराना है। जिसके कारण ये रोग तेजी से अपनी गिरफ्त में ले लेता है। आई एम ए के पूर्व संयुक्त सचिव डाँ अनिल बंसल का कहना है कि हेपेटाइटिस एक गंभीर रोग है। जिसके मूल में है। संक्रमण का होना है। गंदे पानी के सेवन से संक्रमित इंजेक्शन से मरीजों को रक्त चढ़ाने से हेपेटाइटिस रोग आसानी से हो जाता है। उन्होंने बताया कि कोरोना काल में अन्य रोग से पीडितों को सही से उपचार नहीं मिल पाया है।डाँ बंसल का कहना है कि जागरूकता के अभाव में व समय पर इलाज होने के कारण लीवर रोग और लीवर कैंसर के मामले तेजी से बड़े है। बचाव के तौर पर इन लक्षणों को नजरअंदाज ना करें जैसे बुखार का आना, आँखों में पीलापन, पीले पेशाब का आना, कमजोरी का महसूस होना आदि शामिल है।

केन्द्र सरकार की कृषि कानून के विरोध में 26 नवम्बर को किसानों का धरना प्रदर्शन

कृषि कानून के विरोध में देश भर के करीब 5 सौ किसान संगठन 26 नवम्बर को दिल्ली में धरना –प्रदर्शन कर केन्द्र सरकार किसान विरोधी नीतियों को उजागर करेगे।

किसान नेता सूरज प्रताप सिंह ने बताया कि देश में जब भी आपदा या विपदा आयी है तो देश के किसानों ने अहम् सकारात्मक भूमिका निभाई है। लेकिन आज केन्द्र की भाजपा सरकार सत्ता के नशे में इस कदर चूर है कि वो किसानों की समस्याओं को नजरअंदाज कर रही है।

किसान पंकज सिंह ने तहलका संवाददाता को बताया कि देश में कोरोना महामारी फैली है। लोगों में डर है। ऐसे में किसान सोशल डिस्टेंसिंग को अपनाकर सरकार की किसान और कृषि नीतियों का विरोध करेगें। उन्होंने बताया कि अगर हमारी मांगों को नहीं माना गया तो इस बार का विरोध प्रदर्शन तब तक चलेगा । जब तक हमारी मांगों को पूरा नहीं मान लिया जाता है। उन्होंने बताया कि सरकार के समक्ष कई बार अपनी बात रख चुके है। पर सरकार किसानों को गुमराह करने में लगी है।किसान पंकज का कहना है कि देश भर के किसान दिल्ली आने को तैयार है । चाहे उन्हें कितनी परेशानी का सामना क्यों ना करना पड़े।