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सत्यमं शिवं सुंदरम के बहाने झलकी भारतीयता’सत्यमं शिवं सुंदरम के बहाने झलकी भारतीयता

हैदराबाद में आयोजित साहित्यिक समारोह ‘हिंदी साहित्य एक विहंगम दृष्टिÓ के बहाने एक ही राज्य से अलग दूसरे राज्य की व्यथा, दो बिछड़े हुए दिलों को जोड़ कर भारतीय एकता की एक मिसाल के तौर पर दिखी। प्रस्तुत किया तेलंगाना की ज़मीन से जुड़े रहे आन्ध्र में पदेन वरिष्ठ पुलिस महानिरीक्षक कुमार विश्वजीत उर्फ सपन ने। उन्होंने ‘फेसÓ बुक पर ‘सत्यमं शिवमं सुन्दरमÓ मंच की स्थापना की है और अब हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में पर देश भर के विभिन्न साहित्यकारों के आए विचारों को संग्रहीत करके, पुस्तक का रूप दे दिया है।

जिसका विमोचन हैदराबाद के गैं्रड होटल के सभागार में पिछले दिनों कवि गिरेन्द्र सिंह मदारिया ने किया। इस अवसर पर फेसबुक के रचनाकार साथियों में हरीओम श्रीवास्तव, विनोद सिंह नामदेव, श्रीकृष्ण बाबू, गुरुचरण मेहता, आदित्य कुमार तायल,ज्योत्सना सक्सेना, विश्वजीत सागर शर्मा, ब्रजनाथ श्रीवास्तव आदि थे।

विश्वजीत ‘सपनÓ ने आयोजन को संचालित भी किया। इन अवसर पर मंच से अपना संदेश देते हुए कवियित्री अहिल्या मिश्र ने खुद को विश्वजीत के साथ प्रांतीय संबंधों को जोड़ते बताया कि ‘मैं भी बिहारी हूं।Ó साहित्य संदर्भों को जताते हुए विश्वजीत सपन ने साफ कहा था कि मेरी दृष्टि में हर रचनाकार जब रचना करता है तो वह उसे बांटना नहीं चाहता। दु:ख पाकर दु:ख की आंच को समझना और उस आंच में तपते हृदयों के साथ ‘समवेदनाÓ स्थापित करना अलग बात है।

आन्ध्र से तेलंगाना का बंटवारा जब हुआ तो लगभग लाटरी से अधिकारियों का भी राज्यों में बंटवारा कर दिया गया। मंच पर जहां विश्वजीत सपन थे वहीं तेलंगाना एसआईटी की आईजी अभिलाषा थीं जो अपने नन्हे पुत्र के साथ श्रोताओं में थीं और पुत्र पिता से मिलने को आतुर हो रहा था। क्योंकि महीने में एक बार पिता के साथ बिताए क्षणों का आज वह साहित्य के बहाने आन्ध्र और तेलंगाना के साझा मंच पर साझा कर रहा था। इस दारूण क्षण को एक श्रोता अर्जुन सिंह ने भी महसूस किया। उन्होंने कहा कि बे्रेख्त के अनुसार ऐन फैसले के मौके पर ऐसे दृश्य कारुणिक बहुत हैं जो उदास भी करते हैं फिर भी यह यर्थात पूर्ण रचना और ममता का संगम है।

ब्रजनाथ श्रीवास्तव ने कहा कि जिन्दगी का यही यथार्थ है जो हमें एक डोर से खींचता है। यही भारतीय संवेदना है। हिंदी के महारथी कवि-आलोचक राम विलास शर्मा और आलोचक-कवि नामवर सिंह ने साहित्य में हावी हो रही अस्तित्ववादी चेतना के बरक्स कबीर के जरिए भारतीय परंपरा स्थापित की थी। जिसे काफी कुछ बदलते हुए आज संस्कृत के विद्वान और बरसों हाशिए पर बैठे रहे हिंदी के वरिष्ठ रचनाकार अब ऐतिहासिक साहित्य वारिधि बनाने में जुट गए हैं।

संस्कृत साहित्य के साहित्य मर्मज्ञों ने जहां उद्देश्य को कभी भावों की प्रस्तुति बताया तो कभी कला की अनिवार्यता। विश्वजीत सपन ने कहा, साहित्य का उद्देश्य कभी आदर्शों की स्थापना का रहा तो कभी यथार्थ का। विश्वजीत के इस बयान पर अच्छा-खासा विवाद भी छिड़ा। यह तक कहा गया कि ‘शापÓ शब्द का उदय संस्कृत साहित्य की ही देन है। छंद के बाहर की कविता यानी मुक्त छंद मुक्तिबोध की सौ साल पुरानी विशेषता है। आज के हालातों में बढ़ती कट्टरता तोड़ पाने में यही सक्षम भी है।

मंच पर जहां तेलुगु-हिंदी के रचनाकार, आन्ध्र और तेलंगाना में और देश के विभिन्न साहित्यकार पुस्तक के बहाने आपस में मिले तो उसे देख कर लगा ‘राजनीति जहां हमें तोड़ती है वहीं साहित्य जोड़ता है, बकौल विश्वजीत, इस परिदृश्य में मैं अकेला नहीं हूं, आप सब साथ हैं।

जयराम ठाकुर ने हिमाचल में सरकार बनाने की ली शपथ

जयराम के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही हिमाचल की राजनीति में नए युग का सूत्रपात हो गया। राज्यपाल देव व्रत ने जय राम को प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। रिज मैदान पर मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के अलावा कई वरिष्ठ नेता जिनमें जगत प्रकाश नड्ढा, प्रेम कुमार धूमल, शांता कुमार शामिल है, मंच पर उपस्थित थे। दिलचस्प यह है कि केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा के बिलासपुर और पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कमर धूमल के हमीरपुर जिले से किसी को मंत्री नहीं बनाया गया है। मुख्यमंत्री के अलावा ११ मंत्रियों ने शपथ ली। हिमाचल में ६८ सदस्यों की विधानसभा है और इतने ही मंत्री बनाये जा सकते हैं।
धूमल के भविष्य को लेकर अभी कयास हैं। उन्हें या तो केंद्र में मंत्री या राज्यपाल बनाया जा सकता है। वे इस चुनाव में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार थे लेकिन आशचर्यजनक रूप से चुनाव हार गए थे। नवनिर्वाचित मुख्‍यमंत्री जयराम ठाकुर को बुधवार राज्यपाल देवव्रत ने पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री इस शपथ ग्रहण समारोह में मौजूद हैं। जयराम ठाकुर के साथ महेन्‍द्र सिंह, किशन कपूर, सुरेश भारद्वाज, अनिल शर्मा, सरवीन चौधरी, राम लाल मार्कण्डेय, विपिन सिंह परमार, वीरेंद्र कंवर, विक्रम सिंह, गोविंद सिंह और राजीव सहजल ने भी मंत्री पद की शपथ ली। भाजपा ने हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस को हराकर सत्ता हासिल की है। भाजपा ने 68 सदस्यीय विधानसभा में दो-तिहाई बहुमत के करीब 44 सीटें हासिल की है। कांग्रेस ने 21 सीटों पर जीत हासिल की है।
जयराम ठाकुर के शपथ लेते ही वहां जय श्रीराम के नारे लगने लगे। रिज पर बड़ी संख्या में भाजपा समर्थक उपस्थित थे और मोदी मोदी के अलावा जय श्री राम के नारे लगा रहे थे।
मुख्यमंत्री के बाद मोहिंदर सिंह ठाकुर ने मंत्री पद की शपथ ली। मंडी की धरमपुर सीट से विधायक बने. साल 1990 से लगातार सातवीं बार विधायक बने हैं। इनका पांच अलग-अलग दलों से जीतने का रिकॉर्ड है. साथ ही ये सीएम जयराम ठाकुर के भी बेहद करीबी हैं। किशन कपूर ने मंत्री पद की शपथ ली. वो दो बार हिमाचल सरकार में मंत्री रह चुके हैं। सुरेश भारद्वाज ने मंत्री पद की शपथ ली. वो शिमला शहरी सीट से विधायक बने। इससे पहले वो राज्यसभा सांसद थे। जबकि 1997, 2007 और 2012 में भी विधायक रह चुके हैं।
अनिल शर्मा ने मंत्री पद की शपथ ली। शर्मा मंडी सीट से विधायक हैं. वो 2017 के हिमाचल चुनाव से पहले ही बीजेपी में शामिल हुए थे. ये तीन बार विधायक और एक बार राज्यसभा सांसद रह चुके हैं।
सरवीन चौधरी ने मंत्री पद की शपथ ली. वो शाहपुर सीट से चुनाव जीतीं हैं. सरवीन शाहपुर से 2007 से लगातार विधायक हैं. धूमल सरकार में सामाजिक न्याय मंत्री भी रह चुकी है।
रामलाल मार्कण्डेय ने मंत्री पद की शपथ ली. वो लाहौल स्पीति सीट से विधायक बने हैं. 1998 और 2007 में भी विधायक बन चुके हैं. 1998 में कैबिनेट मंत्री भी रह चुके हैं।
विपिन परमार ने मंत्री पद की शपथ ली. वो सुल्लाह विधानसभा सीट से चुनाव जीते हैं। दो बार हिमाचल बीजेपी के महासचिव रहे हैं। कांगड़ा-चंबा बीजेपी युवा मोर्चा के अध्यक्ष हैं। वीरेंद्र कंवर ने मंत्री पद की शपथ ली. वो ऊना की कुटलेहड़ सीट से चुनाव जीते हैं। २००३ से लगातार विधायक चुने गए हैं। साथ ही धूमल के लिए सीट छोड़ने को तैयार थे।
विक्रम सिंह ने मंत्री पद की शपथ ली. वो जसवां प्रागपुर सीट से विधायक हैं. 2003-2012 में विधायक चुने जा चुके हैं। गोविंद ठाकुर ने संस्कृत में मंत्री पद की शपथ ली। वो कुल्लू की मनाली सीट से चुनाव जीते हैं. लगातार तीसरी बार विधायक बने हैं. गोविंद ठाकुर पूर्व मंत्री कुंज लाल ठाकुर के बेटे हैं। राजीव सैजल ने मंत्री पद की शपथ ली। वो सोलन की कसौली सीट से चुनाव जीते हैं. कसौली सीट से लगातार तीसरी बार विधायक बने हैं. सैजल अनुसूचित जाति से हैं।

‘हम छू गुजरात, हम छू विकास!’

देश के चुनाव आयोग ने 16 अक्तूबर को हिमाचल प्रदेश के मतदान की घोषणा की लेकिन गुजरात के चुनावों की घोषणा अर्से बाद की। इस दौरान भाजपा ने पंद्रह दिन की गौरव यात्रा निकाली इसमें राज्य के 182 निर्वाचन क्षेत्रों में 149 निर्वाचन क्षेत्रों में यह यात्रा गई। इन गौरव यात्राओं में हल्ला-हंगामा काफी रहा। अगस्त महीने में कांग्रेस के अहमद पटेल ने जीत हासिल की। यह गुजरात के लोगों को याद है। सूरत के व्यापारियों को जीएसटी के कारण खासी मुसीबतें झेलनी पड़ी, इसलिए वे सड़क पर उतरे। उधर पार्टी अध्यक्ष के पुत्र की कमाई से भी विपक्ष को अपनी बात जनता के बीच रखने का मौका मिला।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने 150 से 180 सीट हासिल करने का लक्ष्य रखा है। नरेंद्र मोदी राज्य में मुख्यमंत्री नहीं है अब भाजपा के नेताओं व कार्यकर्ताओं के सामने खासी बड़ी चुनौती है। पूरी ताकत से अमित शाह पार्टी कार्यकर्ताओं में जान फूंक रहे हैं। राज्य में 1985 में जब माधव सिंह सोलंकी मुख्यमंत्री थे तब कांग्रेस को 149 सीट मिली थी। इस बार अमित का ध्यान राज्य में डेढ़ सौ सीट जीत लेने का है।
भाजपा गुजरात में 1995 से बिना रुके जीतती ज़रूर रही लेकिन कभी 127 सीट से ज्य़ादा नहीं पा सकी। जब 2002 में दंगे हुए तो गुजरात में 127 सीट मिली। पिछली बार 2012 में जब मोदी ने आखिरी बार बतौर मुख्यमंत्री चुनाव लड़ा तो पार्टी को 115 सीटें हासिल हुई। हार के बाद भी कांग्रेस ने कभी अपना 38 फीसद का वोट बैंक नहीं छोड़ा भले ही नरेंद्र मोदी सत्ता प्रमुख रहे हों।
गुजरात के वर्तमान मुख्यमंत्री विजय रूपानी औसतन हर महीने एक परियोजना घोषित करते रहे हैं। अपनी दो दिनों की वडनगर और भड़ौच की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने भी 10,800 करोड़ की योजनाओं की घोषणा की। जनवरी में औसतन हर महीने राज्य में बड़े और भाजपा के नेता लगातार यात्राएं करते रहें हैं। इनमें केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह, स्मृति ईरानी, उमा भारती और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, योगी आदित्यनाथ शामिल हैं।
गुजरात को जीतना भाजपा के लिए गौरव की बात है। इस मकसद को कामयाब करने के लिए 2010 में केंद्रीय नेता सुषमा स्वराज, अरूण जेटली, नीतिन गडकरी ने भी नरेंद्र मोदी का साथ दिया और इन सबने म्यूनिसपल कॉरपोरेशन के लिए प्रचार किया। इन लोगों ने 2012 में विधानसभा चुनाव में जीत के लिए भी खासा प्रचार किया।
इधर अमित शाह के विश्वस्त सहयोगी भूपेंद्र यादव, प्रदीप सिंह जडेजा और जीतू वघानी (राज्य भाजपा प्रमुख) मोदी ने केंद्रीय मंत्री अरूण जेटली और निर्मला सीतारमण के नेतृत्व में वार रूम बनाया है।
भाजपा ने राज्य में बुलेट ट्रेन की घोषणा करके और जापान के प्रधानमंत्री शिंजोआबे के साथ गुजरात की धरती पर सारे समझौते और घोषणाएं करके राज्य की जनता को रिझाया। तब भाजपा को यह यकीन हुआ कि गुजरात निवासियों के लिए यह खास उपयोगी होगा। जनता में खासी व्यग्रता भी नज़र आई।
तभी विकास गाडो थायो छे का प्रचार भी शुरू हुआ। युवाओं की ओर से आए इस नारे पर अमित शाह खासे नाराज भी दिखे। उन्होंने एक बैठक में कहा कि नौजवानों को अपने दिमाग से भी सोचना चाहिए। सब कुछ वाट्स एप से नहीं सीखना चाहिए। पहली बार पार्टी को भी लगा कि राज्य में बुलेट ट्रेन लाने का फैसला चुनाव प्रचार में मुफीद नहीं जान पड़ रहा है।
पाटीदार आंदोलन समिति (पीएएस) के मीडिया संयोजक वरूण पटेल ने कहा विकास गाडो थायो छे की बात सागर सांवलिया (एक पाटीदार युवा) की थी। इसे आंदोलनकारी पाटीदारों ने उठा लिया। बाद में यह कांग्रेस को भी उचित जान पड़ा। वीडियो और फोटो से जीएसटी (गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स)और विमुद्रीकरण पर नाराज़गी दिखाई देने लगी। वस्त्र व्यवसायियों ने पूरे एक महीने तक हड़ताल की। लगभग डेढ़ हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। इसमें बड़ी तादाद में उत्तर भारतीय भी थे। इस हड़ताल से यह भ्रम भी टूटा कि पारंपरिक तौर पर व्यापारी भाजपा समर्थक रहता है। नरेंद्र मोदी ने इस नाराजगी को दूर करने के लिए सूरत से बिहार तक के लिए एक साप्ताहिक ट्रेन भी चलवाई। इसके बाद भी व्यापारियों का गुस्सा थमा नहीं। उन्होंने मांग की, जीएसटी का फिर संशोधन किया जाए। केंद्र सरकार ने वह भी किया लेकिन मसला ज्य़ादा शांत नहीं हुआ।
पार्टी ने उन जिलों में जीत की संभावना की तलाश की जहां नर्मदा का पानी जाता है। नरेंद्र मोदी ने सरदार सरोवर बांध का बहुप्रचारित उद्घाटन कर दिया। लेकिन इतने साल बाद भी नर्मदा का पानी जि़ले-जि़ले में पहुंचाने के लिए नहरों का जाल ही नहीं बन सका है। इसके चलते गुजरात के किसान भी बहुत उत्साहित नहीं दिखे।
अभी पिछले महीनों से सरकार ने घोषित किया कि स्थायी कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग के तहत भत्ते, सुविधाएं दी जाएंगी। भाजपा के राज्य सचिव भूपेंद्र यादव ने कहा कि राज्य में कांग्रेसी और भाजपाई राज का तुलनात्मक अध्ययन करके यह जानकारी जनता को दी जाएगी कि कृषि, उद्योग, शिक्षा और कानून व्यवस्था में कितनी उपलब्धि हुई।
हालांकि जीएसटी से व्यापारियों के हाथ निराशा लगी है जो भाजपा का समर्थक तबका रहा है। फिर भी पार्टी नेतृत्व का मानना है कि इसका कोई खास असर नहीं पड़ेगा। जल्दी ही कुछ नई योजनाएं जारी की जाएंगी। पार्टी नेता यह बताते हैं कि अमित शाह को पूरा भरोसा है कि पार्टी को लाभ ही होगा। हालांकि भाजपा कार्यकर्त्ताओं और नेताओं में बेचैनी ज़रूर है। उन्हें यकीन है कि भाजपा कार्यकर्ताओं की तैयारी अच्छी है और इसका असर भी ठीक ही पड़ेगा।
गुजरात भाजपा प्रमुख जीतू वघानी यह नहीं मानते कि भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं पर मोदी की यात्राओं से निराशा बढ़ी है। वे कहते हैं नरेंद्र मोदी गुजरात के ही बेटे हैं वे जब भी राज्य में आते हैं तो लाभ लाते हैं। पूरे राज्य के लिए कल्याण की बात करते हैं। इसलिए हम हमेशा उनकी यात्राओं के पक्ष में रहते हैं।
विकास पर भाजपा की खासी खिंचाई होती रहती है। जाति समीकरणों का जो हाल है उसे लेकर भी भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय बड़े नेता खासे चिंतित हैं। गुजरात में तकरीबन बारह फीसद मताधिकार की वोट हिस्सेदारी पाटीदारों की है जो आरक्षण में हिस्सेदारी चाहते हैं और सामाजिक हिस्सेदारी के अनुरूप भागीदारी के पक्ष में है।
जब 1980 के दशक में पाटीदारों ने कांग्रेस की बजाए भाजपा से संबंध बनाने शुरू किए, तो माधव सिंह सोलंकी के राज को ग्रहण लगना शुरू हो गया था। सोलंकी ने तब ओबीसी को आरक्षण और बाद में केएचएएम (क्षत्रिय-हरिजन-आदिवासी- मुसलिम) का खाम नामक वोट बैंक तैयार किया।
युवा नेता हार्दिक पटेल ने जुलाई 2015 में राजनीतिक शुरूआत की और पाटीदारों के लिए आरक्षण की मांग की। भाजपा ने काफी समय तक अनसुनी की फिर बातचीत में उलझाया जिसके चलते हुए दंगा फसाद में दस लोग मारे गए। हार्दिक गिरफ्तार किए गए। अदालत ने हार्दिक पर छह माह की निषेधाज्ञा लगा दी लेकिन मामला सुलझा नहीं। पार्टी के प्रति पाटीदारों में सहयोग घट रहा है। यह समुदाय मोदी के पुराने प्रतिद्वदी केशुभाई पटेल की गुजरात परिवर्तन पार्टी (जीपीपी) की 2012 में समर्थक था। हालांकि इसे सिर्फ दो सीटें ही मिली। उसके बाद जीपीपी का विलय भाजपा में ही हो गया।
हार्दिक अभी पच्चीस साल के भी नहीं हैं। इसलिए वे चुनाव नहीं लड़ सकते लेकिन सौराष्ट्र, सूरत, और उत्तर गुजरात के मेहसाणा और पाटण में उनका पाटीदारों में खासा प्रभाव है। वे पूरे राज्य का दौरा करते हैं। उन्हें सुनने के लिए खासा बड़ा समुदाय एकजुट होता है।
अब भाजपा ने पीएएएस के खिलाफ लगे मुकदमे उठाने शुरू कर दिए हैं। गृह राज्यमंत्री प्रदीप सिंह जडेजा ने अभी हाल में यह कहा भी कि इस समुदाय के प्रति उनकी यह एक राजनीति है। राज्य सरकार ने एक निगम बना दिया है जो अनारक्षित श्रेणियों के मामलों की छानबीन करेगा। एक आयोग भी बना है जो पीएएएस पर हुई पुलिस ज्य़ादातियों की पड़ताल करेगा। अभी हाल में मोदी ने हरिद्वार में एक आश्रम का उद्घाटन किया जहां कडवा पाटीदार समुदाय के तीर्थयात्री जाकर रह सकेंगे।
गुजरात की राजनीति में अकेले हार्दिक ही युवा, नेता नहीं है। इनके अलावा दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और ओबीसी के युवा नेता अल्पेश ठाकोर भी हैं। मेवाणी ने जबसे दलितों के लिए आत्म सम्मान आंदोलन छेड़ा तब से वे चर्चा के केंद्र में हैं। पिछले साल ऊना में दलितों की पिटाई के खिलाफ उन्होंने यह आंदोलन छेड़ा था। ठाकोर ओएसएस (ओ बीसी, एससी और एसटी) के संस्थापक भी हैं। उन्होंने खुद को दबे-कुचले समुदायों की आवाज बनाया जब राज्य में पाटीदारों के आरक्षण की मांग ने जोर पकड़ा।
हार्दिक से जिस तरह राज्य सरकार डरती दिखती हैं उतना उसे मेवाणी से डर नहीं लगता। क्योंकि राज्य की जनसंख्या में दलित सिर्फ सात या आठ फीसद ही है और इन्होंने कभी संगठित तौर पर बतौर ब्लाक या एकजुट होकर एक नेता का साथ नहीं दिया।
राज्य में ओबीसी ज़रूर महत्वपूर्ण है वे तकरीबन चालीस फीसद हैं। भाजपा की इन पर नज़र है। पिछले महीने शाह ने ओबीसी के साथ अपनी बैठक रद्द कर दी थी क्योंकि जब वह बैठक होनी थी तभी उन्हें बतौर गवाह पूर्व- मंत्री माया कोडनानी के एक अदालती मामले में पेश होना था। माया 2002 के नरोदा गाम मामले में फंसी थी। पार्टी ने तब राज्य में भारी बारिश होने के तर्क को आधार बनाकर बैठक के न हो पाने का तर्क दिया। सरकार को अभी किसानों के बीच अपनी पैठ जमानी है।
उधर कांग्रेस की नज़र राज्य को राजनीतिक गुणा भाग पर है। एक सूत्र के अनुसार हार्दिक के साथ कांग्रेस की रजामंदी हो गई है। यह कराने में दूसरे बड़े पाटीदार नेताओं ने भूमिका निभाई। वैसे भी इस आंदोलन को चलाए रखने वाली समिति में छह लोग युवा कांग्रेसी हैं और अन्य कांग्रेस के ही हैं। वरूण पटेल और रेशमा पटेल जैसे लोग भाजपा में जरूर चले गए पर वह रणनीती भी हो सकती है। ये भी आने वाले चुनावों में दस सीटों पर चुनाव भी लड़ते दिखेंगे। एक कांग्रेसी नेता ने नाम न देते हुए बताया।
मेवाणी से भी बातचीत हो रही है जो खुद को ठाकुर-ब्राहमण विरोधी बताते हैं। हालांकि ठाकोर में मेल-मिलाप की संभावना मेवाणी की तुलना में ज्य़ादा है। ठाकोर ने अपनी ओर से एक मांगपत्र भी दे रखा है।
भाजपा हार्दिक, मेवाणी और ठाकोर को अवसरवादी कहती है साथ इनके पीछे कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराती है। मेवाणी और ठाकोर को वह अवसरवादी कहती है। इसे ओबीसी का भरोसा है। गुजरात में कोली- तकरीबन सोलह फीसद हैं। ओबीसी में सबसे बड़ी उपजाति यह मानी जाती है। इन्ही कोली ने रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति होने पर उल्लास जताया था।
इसके अलावा भाजपा आदिवासियों को साथ लेने की कोशिश में है जिनकी 14 फीसद तादाद है। ‘आदिवासी विकास गौरव यात्रा में उनके गौरव और विकास पर फोकस भी था। भूपेंद्र यादव का कहना था कि उप चुनाव में भाजपा को छह में कामयाबी मिली। स्थानीय निकायों में भी यह कामयाब नही। कांग्रेस ने जन विरोध किया है। कांग्रेस ने ही नेशनल कमीशन फार बैकबर्ड क्लासेज विधेयक रोका। अन्यथा इसका लाभ गुजरात के लोगों को मिलता।
राहुल की नवसृजन यात्रा का पहला दौर गुजरात के त्यौहार नवरात्रि के दौरान हुआ। जिसमें युवक और युवतियां आपस में मिलते हैं। राहुल ने अपने व्यवहार, मिलनसारिता से यह जता दिया है कि वे आलोचना, असंतोष पर भी काफी सहज हैं। हालांकि भाजपा उन्हें नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं गंवाती। राहुल का यह कहना है कि उन्होंने किसी महिला को आरएसएस की शाखा में जाते नहीं देखा। उनकी इस आलोचना पर मतदाताओं में निराशा जनक प्रतिक्रिया नहीं हुई।
गुजरात के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष अर्जुन मोधवाडिया ने कहा कि राहुल की शैली बहुत बदली हुई है। भाजपा को धु्रवीकरण का मौका नहीं मिल रहा है। राहुल जमीनी मुद्दों मसलन रोज़गार, भ्रष्टाचार ही उठा रहे हैं। यदि कांग्रेस अपना चुनाव प्रचार ऐसे ही सतर्कता से करती रही और किसान, युवाओं और महिलाओं पर केंद्रित रही तो नतीजा अच्छा होगा। कांग्रेस ने किसानों का मांग पत्र अभियान भी छेड़ रखा है। बेरोज़गारी भत्ते की बात कही है।
पर कांग्रेस में आंतरिक कलह बहुत है। स्थानीय नेता मीडिया की ही तरह भाजपा सरकार और उसके मंत्रियों के खिलाफ बोलने से बचते हैं।

आप के 21 विधायकों की सदस्यता पर खतरा

फोटोः  तहलका आर्काइव
फोटोः तहलका आर्काइव

क्या है मामला?
दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत से आम आदमी पार्टी (आप) 24 फरवरी, 2015 को सत्ता में आई. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 15 मार्च, 2015 को अपने 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया था. इसके बाद राष्ट्रपति और चुनाव आयोग के पास एक शिकायत आई जिसमें कहा गया था कि यह पद ‘लाभ का पद’ है इसलिए आप विधायकों की सदस्यता रद्द की जानी चाहिए. हालांकि संसदीय सचिव बनाए जाने का यह पहला मौका नहीं था. परेशानी पद के नाम के साथ जुड़ी एक तकनीकी बाधा मात्र है. बाद में सरकार ने दिल्ली विधानसभा सदस्यता अयोग्यता निवारण संशोधन अधिनियम, 2015 विधानसभा से पारित कर दिया. इसमें संसदीय सचिव के पद को लाभ के पद के दायरे से बाहर रखने का प्रावधान था. जिसे 13 जून, 2016 को राष्ट्रपति ने मंजूरी देने से इनकार कर दिया. अब इस मामले का फैसला चुनाव आयोग को करना है. मौजूदा विवाद यहीं से शुरू हुआ जिसमें केजरीवाल पर विपक्ष ने आरोप लगाया कि विधायकों को सत्ता सुख मुहैया कराने की जल्दी में उन्होंने कानूनी प्रक्रिया का पालन करना भी मुनासिब नहीं समझा.

क्या है संवैधानिक प्रावधान?
संविधान के अनुच्छेद 102 (1) (अ) और 191 (1) (अ) के अनुसार संसद या फिर विधानसभा का कोई भी सदस्य अगर लाभ के किसी भी पद पर होता है उसकी सदस्यता जा सकती है. दिल्ली एमएलए (रिमूवल आॅफ डिसक्वालिफिकेशन) एेक्ट, 1997 के मुताबिक, संसदीय सचिव को भी इस लिस्ट से बाहर नहीं रखा गया है. यानी इस पद पर होना ‘लाभ का पद’ माना जाता है. दिल्ली सरकार ने 1997 में इसमें पहला संशोधन करके खादी ग्रामोद्योग बोर्ड और दिल्ली महिला आयोग के अध्यक्ष को लाभ के पद से बाहर कर दिया. 2006 में दूसरा संशोधन करके पहली बार मुख्यमंत्री के संसदीय सचिव सहित दस अन्य पदों को लाभ के पद के दायरे से बाहर किया गया. इसके बाद साल 2015 में केजरीवाल सरकार ने संशोधन प्रस्ताव के मार्फत मुख्यमंत्री और मंत्रियों के संसदीय सचिव शब्द जोड़ने की कोशिश की थी जिसे राष्ट्रपति ने अस्वीकार कर दिया.

विधायकों के सामने क्या विकल्प?
विधेयक पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से इनकार के बाद आप के 21 विधायकों की सदस्यता पर सवाल खड़े हो गए हैं. ऐसे में सभी विधायकों की सदस्यता रद्द हो जाएगी, जिसके बाद इन 21 सीटों पर दोबारा चुनाव कराया जा सकता है. जानकारों का कहना है कि अभी आप के पास समय है कि अपनी बात रखने के लिए वह अदालत का दरवाजा खटखटाए. वहीं लाभ के पद के मामले में चुनाव आयोग से शिकायत करने वाले वकील प्रशांत पटेल का कहना है कि लाभ के पद का मतलब केवल यह नहीं है कि आप सैलरी ले रहे हैं या नहीं. आप ऑफिस ले रहे हैं, तो यह भी उस परिभाषा में आता है. उन्होंने भाजपा से अपने किसी भी तरह के संबंध होने के आरोपों से इनकार किया है.

एस्सार पर मंत्रियों व ब्यूरोक्रेटों के फोन टेप करने का आरोप

स्टील, ऊर्जा समेत कई बड़े प्रोजेक्टों में निवेश करने वाले एस्सार ग्रुप पर 2001 से 2006 के बीच कई बड़े नेताओं समेत जानी-मानी हस्तियों के फोन टेप करने का आरोप लगा है. मीडिया में आई खबरों के मुताबिक जिन लोगों के फोन टेप होने की शिकायत पीएमओ से की गई है उसमें कई कैबिनेट मंत्रियों समेत मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी और कई बड़े ब्यूरोक्रेटों के नाम शामिल हैं. रिकॉर्ड हुई बातचीत में सरकार और उद्योग घरानों के बीच की सांठगांठ भी उजागर होने का दावा किया जा रहा है. इस रिकॉर्डिंग के बारे में शिकायत करने वाले शख्स सुरेन उप्पल हैं जो सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं. एक जून, 2016 को इसकी शिकायत की गई. शिकायत के अनुसार जिन लोगों का फोन टेप किया गया उसमें रेल मंत्री सुरेश प्रभु, पूर्व मंत्री प्रफुल्ल पटेल, राम नाइक, मुकेश अंबानी, उनकी पत्नी टीना अंबानी, प्रमोद महाजन और अमर सिंह भी शामिल हैं. इसमें गृह सचिव राजीव महर्षि, आईडीबीआई के चेयरमैन पीपी वोहरा, आईसीआईसीआई के पूर्व एमडी और सीईओ कीवी कामथ का भी नाम है.

एक साथ लोस व विस चुनाव को चुनाव आयोग का समर्थन

चुनाव आयोग ने लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के सरकार के विचार का समर्थन किया है. साथ ही आयोग ने यह भी साफ कर दिया है कि इस पर काफी खर्च आएगा और कुछ विधानसभाओं का कार्यकाल बढ़ाने और घटाने के लिए संविधान में संशोधन करना होगा. विधि मंत्रालय ने आयोग से कहा था कि वह संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट पर अपने विचार दे, जिसने एक साथ लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव कराने की वकालत की थी. मई में विधि मंत्रालय को अपने जवाब में आयोग ने कहा कि वह प्रस्ताव का समर्थन करती है लेकिन इस पर 9000 करोड़ रुपये से अधिक का खर्च आएगा. एक संसदीय समिति के समक्ष गवाही देते हुए आयोग ने इसी तरह की ‘कठिनाई’ का इजहार किया था. संसदीय समिति ने लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ कराने पर पिछले साल दिसंबर में अपनी व्यवहार्यता रिपोर्ट सौंपी थी. सरकार का मानना है कि एक बार लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने से चुनाव का खर्च बढ़ जाएगा लेकिन इस कवायद से जैसे ‘चुनाव बंदोबस्त’ केंद्रीय बलों और मतदानकर्मियों की तैनाती जिसमें पर आने वाला खर्च घट सकता है.

 

 

 पूर्व आतंकवादी जहांगीर अपनी पत्नी और बेटी के साथ.
पूर्व आतंकवादी जहांगीर अपनी पत्नी और बेटी के साथ. फोटोः बृजेश सिंह

श्रीनगर का नवपुरा इलाका. मार्च, 2012 का एक दिन. दोपहर के तीन बज रहे थे. 70 वर्षीय वली मोहम्मद अपनी लकड़ी के फर्नीचर बनाने वाली दुकान में काम करने के बाद खाना-खाने घर आए थे. अभी खाना परोसा ही जा रहा था कि दरवाजे पर किसी के ठकठकाने की आवाज आई. वली दरवाजा खोलने के लिए बाहर आए. दरवाजा खोला तो सामने 35-36 साल का एक नौजवान, एक महिला और तीन बच्चों के साथ, पीठ पर एक बड़ा-सा बैग लादे खड़ा था. महिला ने गोद में एक बच्ची को उठा रखा था. उनके दरवाजा खोलते ही सामने खड़े व्यक्ति ने झटके से बैग नीचे फेंका. महिला और बच्चों को पीछे छोड़कर वह उनसे लिपटते हुए फफक-फफककर रो पड़ा. वली हक्का-बक्का रह गए. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि यह हो क्या रहा है? रोने की आवाज सुनकर उनकी बड़ी बहू के साथ ही आस-पड़ोस के लोग वहां इकट्ठा हो गए. रोते-रोते ही उस युवक ने कश्मीरी में कुछ कहा. जिसका मतलब था, ‘मुझे माफ कर दो, मुझसे गलती हो गई थी, मैं सबकुछ छोड़कर अब आपके पास आ गया हूं.’ वली ने उस व्यक्ति से उसका नाम पूछा. जवाब मिला, ‘जहांगीर.’ वली को लगा उन्होंने कुछ गलत सुना है. उन्होंने दोबारा पूछा. उसने फिर अपना नाम दोहराया. सुनते ही वली उसे गले लगाकर जोर-जोर से रोने लगे. रोते हुए ही आसपास जमा हो चुके लोगों की तरफ देखते हुए उन्होंने कहा, ‘मेरा जहांगीर आ गया. मेरा बेटा. सब कहते थे तू कभी नहीं आएगा लेकिन मैं जानता था तू एक दिन जरूर आएगा. अब मैं सुकून से मर सकूंगा.’

आसपास के लोगों ने वली मोहम्मद को संभाला. उन्हें सहारा देते हुए घर के अंदर ले गए. थोड़ा सामान्य होने के बाद वली ने साथ आई महिला और बच्चों के बारे में पूछा. जहांगीर ने बताया, ‘ यह आपकी बहू और पोते-पोतियां हैं.’ वली ने बच्चों को गले से लगा लिया. आंखों से आंसू थे कि थम ही नहीं रहे थे.

बीते कुछ महीनों में श्रीनगर और कश्मीर के दूसरे इलाकों में ठीक इसी तरह के कई वाकये देखने और सुनने को मिले. हर बार पिता व बेटे के नाम बदल गए पर उनकी अनपेक्षित मुलाकातों में भावनात्मक तीव्रता का उफान एक जैसा ही रहा. ऐसा जैसे अब उनकी जिंदगी पूरी तरह बदलने वाली है. तो आखिर ऐसा क्या खास था इन मुलाकातों में? ये लोग कौन थे? आखिर क्यों इनकी वापसी की उम्मीद किसी को नहीं थी? और बाद में क्या हुआ? इन सवालों के जवाब खोजने के लिए हम एक बार फिर जहांगीर से बात शुरू करते हैं.

सन् 1990. मार्च की 20 तारीख. वली मोहम्मद के तीन बच्चों में से सबसे छोटा बेटा जहांगीर तब तकरीबन 14 साल का रहा होगा. उस दिन जहांगीर के दोस्त उस्मान के एक रिश्तेदार के घर शादी थी. उस्मान जहांगीर को लेकर शादी में शामिल होने गया था. शादी में उस्मान को दूल्हे के लिए माला लाने भेजा जाता है. वे दोनों स्कूटर से बाजार की तरफ निकल पड़ते हैं. रास्ते में उस्मान जहांगीर को माला लेने से पहले एक और जगह चलने के लिए कहता है. यहां कुछ लोग उससे मिलना चाहते हैं. जहांगीर तैयार हो जाता है. श्रीनगर के उत्तरी इलाके में बने इस घर में उसकी मुलाकात यहां पहले से इकट्ठा करीब दर्जन भर लोगों से होती है. इस घटना के दो दिन बात सुबह जब वली सोकर उठते हैं तो उन्हें घर में कहीं जहांगीर दिखाई नहीं देता. उस दिन को याद करते हुए वे बताते हैं, ‘ मैंने सोचा कि वह कहीं बाहर दोस्तों के साथ घूमने चला गया होगा. शाम तक आ जाएगा. खैर शाम से रात और रात से सुबह हो गई लेकिन जहांगीर का कहीं कोई अता-पता नहीं चला.’ थक-हारकर उन्होंने पुलिस में अपने बेटे की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवा दी. दिन, महीनों में तब्दील होते गए लेकिन जहांगीर की कोई खबर नहीं मिली.

करीब आठ महीने बाद वली के पास एक चिट्ठी आती है. इसकी इबारत पढ़कर उनके होश उड़ जाते हैं. चिट्ठी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद से आई थी. यह जहांगीर की थी. उसने लिखा था कि वह मुजफ्फराबाद से करीब सौ किलोमीटर दूर हिजबुल मुजाहिद्दीन (एचएम) के एक ट्रेनिंग कैंप में है. यहां उसके जैसे ढेर सारे लड़के हैं. उसका दोस्त उस्मान भी यहां है. उसने रफीक भाई की शादी के दिन कुछ लोगों से उसे मिलवाया था. उन्हीं के साथ वह यहां आया है. यहां उसे बंदूक चलाना और जेहाद करना सिखाया जा रहा है. वली बताते हैं, ‘चिट्ठी में लिखा था कि उसे अपने कश्मीर को भारत से आजाद कराना है. अब और गुलामी नहीं सहनी. यह काम सिर्फ हथियार से ही हो सकता है.’

जहांगीर के घर छोड़ने के ठीक बीस साल बाद एक और घटना हुई जहां उन्हें फिर उम्मीद की एक किरण दिखाई दी. 2010 में जम्मू कश्मीर की उमर अब्दुल्ला सरकार ने केंद्र सरकार के साथ मिलकर एक नीति बनाई थी. इसका मकसद था पूर्व आतंकवादियों का पुनर्वास करना. नीति में कहा गया था कि जम्मू कश्मीर के वे लोग जो नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार करके आतंकवादी प्रशिक्षण लेने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर गए हैं यदि अब उनका हृदय परिवर्तन हो गया हो और वे आतंकी गतिविधियां छोड़कर वापस अपने घर आना चाहते हैं तो सरकार उन्हें आने की इजाजत देगी. इसके साथ ही उनका पुनर्वास भी किया जाएगा. इसके तहत यह नियम बनाया गया कि पूर्व आतंकवादी जो पाकिस्तान से वापस आना चाहते हैं उनके परिवार वालों को संबंधित जिले के एसपी के सामने उसके समर्पण का आवेदन देना होगा. उस आवेदन का खुफिया और सुरक्षा एजेंसियां विश्लेषण करेंगी. उनसे हरी झंडी मिलने के बाद उस व्यक्ति की घर वापसी का रास्ता साफ हो जाएगा. सरकार की इसी योजना के तहत 22 साल बाद जहांगीर अपने घर वापस आए हैं.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक 855 लोग जिनमें आतंकवादी और उनके परिवार भी शामिल हैं, इस दौरान पाकिस्तान से जम्मू कश्मीर आ चुके हैं. इनमें 277 पुरुष, 140 औरतें और 438 बच्चे शामिल हैं. हालांकि सूत्रों की मानें तो आने वालों की संख्या सरकारी आंकड़ों से काफी ज्यादा है. इनके मुताबिक पिछले कुछ सालों में कश्मीर में लगभग 1,500 से ज्यादा पूर्व आतंकवादी पाकिस्तान या पीओके से वापस अपने घर जम्मू कश्मीर आए हैं. लोगों के वहां से आने की शुरुआत योजना लागू होने से बहुत पहले हो गई थी. राज्य सरकार के मुताबिक पाकिस्तान में अभी-भी कश्मीरी मूल के तकरीबन तीन हजार पूर्व आतंकी मौजूद हैं. उनमें से लगभग एक तिहाई राज्य की पुनर्वास नीति के तहत घाटी में वापसी करना चाहते हैं.

जम्मू कश्मीर के लिए यह बिल्कुल नई परिघटना है. ऐसी जो राज्य के लिए बेहद आशावादी तस्वीर बनाती है. लेकिन तस्वीर का एक दूसरा और भयावह पहलू भी है. पूर्व आतंकवादी पुनर्वास की जिस आखिरी उम्मीद पर वापस आए हैं वह इस समय राज्य में उन्हें दूर-दूर तक पूरी होती दिखाई नहीं देती. इससे बड़ी विडंबना यह है कि आज की हालत में ज्यादातर पूर्व आतंकवादी अपने परिवार और राज्य में भी सबसे अवांछित व्यक्तियों में शामिल हो गए हैं. इसका नतीजा है कि वे अपने घर से दूर जिस त्रासदी से गुजर रहे थे, आज फिर उसी में आकर फंस गए हैं. आखिर इन लोगों की वापसी के साथ ये हालात क्यों बने? ये लोग किन-किन त्रासदियों के बीच जी रहे हैं? और इनका राज्य में भविष्य क्या है? इन सवालों के जवाब जानने से पहले यह समझना जरूरी है कि आखिर किन परिस्थितियों में जहांगीर और उनके जैसे हजारों लोग पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी प्रशिक्षण लेने गए थे और वहां उनका मोहभंग कैसे हुआ.

युवकों के आतंकवादी बनने का सफर
26 साल पहले सन् 1987 में राज्य विधानसभा के चुनावों में कथित धांधली होने की बात को लेकर पूरे जम्मू-कश्मीर में एक अभूतपूर्व गुस्से की लहर थी. पूरे सूबे में युवा सड़क पर उतर आए. राज्य की एक बडी़ आबादी का मानना था कि केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर की जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले मुस्लिम युनाइटेड फ्रंट के प्रत्याशियों को फर्जीवाड़ा करके चुनाव हरवाया है.

1990 में सरहद पार गए और जून, 2012 में वापस आए पूर्व आतंकी एहसान उल हक कहते हैं, ’87 के चुनाव में धांधली ने सारा माहौल खराब कर दिया. युवाओं को लगा कि अब हथियार उठाने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचा है.’

1980-90 के दशक के दौरान घाटी में ऐिे दृश्य आम थे.
1980-90 के दशक के दौरान घाटी में ऐसे दृश्य आम थे. फोटो साभारः कादिर वान लोहिजेन

हिजबुल मुजाहिद्दीन (एचएम) के संस्थापक सदस्य एवं श्रीनगर और बड़गाम जिले के कमांडर रहे हनीफ हैदरी (55 वर्ष) उस समय एक लोहे के कारखाने में वेल्डिंग का काम करते थे. वे बताते हैं, ‘मैंने उस चुनाव में मुस्लिम युनाइटेड फ्रंट का जमकर प्रचार किया. यह उन इस्लामिक पृथकतावादी दलों का गठबंधन था जो अब्दुल्ला परिवार की नेशनल कॉन्फ्रेंस को उखाड़ फेंकना चाहते थे. मैं उस चुनाव में सैयद मोहम्मद यूसुफ शाह का चुनाव प्रभारी था. यूसुफ शाह की जीत पूरी तरह पक्की थी लेकिन नतीजे आने पर उसे हारा हुआ बताया गया. यह नतीजा उस चुनाव में हुई भयानक धांधली का सबसे बडा उदाहरण था.’ यही यूसुफ शाह आगे चलकर एक बड़ा आंतकवादी सैयद सलाउद्दीन बना. उस समय चुनाव के बाद सलाउद्दीन को उसके कई साथियों समेत गिरफ्तार कर लिया गया. हैदरी को भी पुलिस ने उस समय हिरासत में ले लिया था.

हैदरी के मुताबिक, ‘ चुनाव में हुई धांधली ने स्थापित कर दिया कि भारत सरकार खुद चुनावों में विश्वास नहीं करती. उससे न्याय मिलने की सारी उम्मीदें खत्म हो गईं. हमें समझ में आ गया कि कश्मीर पर कब्जा करके बैठी भारत सरकार को उखाड़ फेंकने का समय आ गया है. यह काम शांतिपूर्वक और लोकतांत्रिक तरीके से नहीं हो सकता था क्योंकि इसका हश्र हम देख चुके थे. उसके बाद पूरे कश्मीर में यह नारा गूंजने लगा – हमें इलेक्शन और सलेक्शन नहीं चाहिए. हमें आजादी चाहिए. आजादी से कम कुछ भी मंजूर नहीं.

हथियारों के दम पर भारत सरकार को कश्मीर से खदेड़ने और कश्मीर को आजाद कराने के उद्देश्य से युवा सरहद पार पीओके और पाकिस्तान में पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा संचालित आतंक के ट्रेनिंग कैंपों में जाने लगे. 1988-89 तक आते-आते कश्मीर की आजादी को लेकर जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ ) से जुड़े चरमपंथी पाकिस्तान जाकर ट्रेनिंग करके और वहां से हथियारों से लैस होकर वापस कश्मीर आ चुके थे. 30 जुलाई, 1988 को श्रीनगर के टेलीग्राफ ऑफिस को बम से उड़ाकर जेकेएलएफ के चरमपंथियों ने कश्मीर में आतंकवाद का दौर शुरू होने की औपचारिक घोषणा कर दी थी.

पू्र्व आंतकी सैफुल्ला फारुख उस दौर को याद करते हैं, ‘तब पूरे कश्मीर में दो नारे हर एक की जुबां पर छाए हुए थे. पहला यह कि हम क्या चाहते आजादी और दूसरा, पाकिस्तान जाएंगे, क्लाशनिकोव लाएंगे.’

जहांगीर श्रीनगर के अपने घर से पाकिस्तान के आतंकी प्रशिक्षण शिविर तक पहुंचने का अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं, ‘ मैंने किसी को अपने घर में नहीं बताया था कि मैं पाकिस्तान जा रहा हूं. जाने वाली रात हम कुल 65 के करीब लोग थे. श्रीनगर से हम 20 लोग थे. बाकी जम्मू-कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों से थे. अधिकांश लड़के गांवों से थे. हम रात को निकले. कुपवाड़ा बॉर्डर से पाकिस्तान में हमें दाखिल होना था. पहाड़ और जंगलों से होते हुए हम आगे बढ़ रहे थे. रास्ते में कई लड़कों की हिम्मत जवाब दे गई. कुछ इतना थक गए थे कि आगे जाने की स्थिति में नहीं रहे. वे वहीं रुक गए. पांच लड़के रास्ते में पहाड़ों पर चढ़ते हुए फिसल कर नीचे गिर कर मर गए. दो लड़के रास्ते में आर्मी स्नाइपर्स की गोलियों से मारे गए.’ जहांगीर याद करते हुए बताते हैं कि कैसे रास्ते में सात लोगों की मौत के बाद उनके गाइड ने सभी लड़कों से कुरान की आयतें पढ़ने के लिए कहा था. इस तरह चार दिन के बाद ये लोग पीओके स्थित दूध निहार बॉर्डर पहुंचे और वहां से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर. इसके बाद जहांगीर व उनके साथियों को मुजफ्फराबाद ले जाया गया. मुजफ्फराबाद पहुंचने के बाद उन्हें एक ट्रक में चढ़ने को कहा गया.

जहांगीर बताते हैं, ‘हम सबके हाथ बांधकर आंखों पर काली पट्टी बांध दी गई थी. मुझे याद है उसके बाद हमें एक-एक कर ट्रक के अंदर चढ़ा दिया गया. ट्रक में शायद बैठने के लिए कुछ नहीं था. हम सब खड़े थे. ट्रक स्टार्ट हुआ और चल पड़ा. हमें पता नहीं था कि हमें कहां ले जाया जा रहा है. रास्ते में कई लड़कों ने ट्रक में उल्टियां कर दी. अंदर हमारा दम घुट रहा था. लगभग आठ घंटे के लगातार चलने के बाद ट्रक एक जगह रुका. हमें एक-एक कर उतारा गया. हाथ और आंखें खोल दी गईं.’

इन लोगों को हिजबुल मुजाहिद्दीन के ट्रेनिंग कैंप में ले जाया गया. यह दीनी कैंप था. उस समय को याद करते हुए जहांगीर कहते हैं, ‘जब हमारी आंख खुली तो सामने आर्मी के मिलेट्री कैंपों की तरह एक बड़ा कैंप दिखाई दिया. हमें नहीं पता था कि हम इस वक्त कहां हैं. वहां पर 10 हजार के करीब कश्मीरी लड़के थे.’ वे बताते हैं कि कैंप का जीवन बहुत मुश्किल था. लेकिन वे इसके लिए तैयार थे क्योंकि उनके कश्मीर की आजादी का रास्ता यहीं से होकर निकलना था.

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में प्रशिक्षण लेने गए युवाओं में ज्यादतर ने वहीं शादी की और बस गए.
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में प्रशिक्षण लेने गए युवाओं में ज्यादतर ने वहीं शादी की और बस गए.
फोटो साभारः कादिर वान लोहिजेन

पीओके के इस कैंप में अगले तीन महीने तक जहांगीर और उनके साथियों की ट्रेनिंग हुई. इन्हें बम बनाने और चलाने से लेकर, एंटी एयरक्राफ्ट गन चलाना, और गुरिल्ला यद्ध के तौर-तरीके आदि सिखाए गए. इसके बाद 25 लड़कों के एक समूह के साथ जहांगीर को आगे की ट्रेनिंग के लिए अफगानिस्तान भेज दिया.

पाकिस्तान से मोहभंग और उसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन
जहांगीर पाकिस्तान-अफगानिस्तान में ट्रेनिंग लेने गए पहली पीढ़ी के युवकों में से नहीं थे. उनके इन कैंपों में पहुंचने के दो-तीन साल पहले से जम्मू कश्मीर के युवक वहां जाकर ट्रेनिंग ले रहे थे. इस समय तक हैदरी अफगानिस्तान में छह महीने का प्रशिक्षण पूरा कर मुजफ्फराबाद में रहने लगेे थे. यह 1989 की बात थी जब उन्हें एक नए आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन (एचएम) बनाने के बारे में बताया गया. तब तक जेकेएलएफ आतंकवादियों का सबसे प्रभावशाली संगठन था. इसका घोषित मकसद कश्मीर की आजादी. जमात ए इस्लामी से जुड़े हिजबुल मुजाहिदीन के उदय ने इस पूरी लड़ाई को अपेक्षाकृत धर्मनिरपेक्ष हथियारबंद सशस्त्र संघर्ष के बजाय इस्लामी और पाकिस्तान समर्थित बना डाला. कुछ महीनों बाद ही हैदरी इस संगठन में कमांडर बने और श्रीनगर आ गए.

जेकेएलएफ और एचएम के बीच पनप रहे अंतर का असर ट्रेनिंग कैंपों में ट्रेनिंग पा रहे लड़ाकों पर भी पड़ा. पूर्व आतंकवादी बताते हैं कि कैंपों में पाकिस्तानी ट्रेनर एक सोची-समझी रणनीति के तहत श्रीनगर और कश्मीर की अन्य जगहों से आए लड़कों के बीच अलगाव पैदा करने का काम करते थे. दरअसल उनके लिए श्रीनगर से आए लड़कों को बरगला पाना आसान नहीं था. जबकि गांव के लड़कों को वे अपनी मर्जी से ढाल लेते थे. थोड़ा बहुत सोचने-समझने वाले लड़के आजादी के नाम पर चल रही इस लड़ाई के तौर तरीकों पर गाहेबगाहे सवाल उठाते रहते थे. जहांगीर बताते हैं, ‘पीओके के आम लोग भी कहते थे कि तुम लोग यहां आकर फंस गए हो. यहां कश्मीरियों को छोड़कर सभी को फायदा है. जेहाद के नाम पर फंड आ रहा है. धंधा चल रहा है. वे हमें सिखाते थे कि शिया काफिर हैं उन्हें मारना है. दरगाह और स्कूलों को खत्म करना है. मस्जिदों में बम फोड़कर लोगों में दहशत लाना है. मैं उनसे पूछा करता था कि मस्जिद में बम फेंकना कहां का जेहाद है. हम लोग तो यहां आजादी की लड़ाई लड़ने आए हैं.’ कई पूर्व आतंकवादी इस प्रचलित धारणा को भी गलत बताते हैं कि पीओके में पाकिस्तान का समर्थन है. उनके मुताबिक मीरपुर, रावलकोट, बाग-कोटली और पूंछ आदि में पाकिस्तान का भारी विरोध है.

इन्हीं दिनों एचएम ने खुले तौर पर जेकेएलएफ पर तंज कसने शुरू कर दिए. इसका नतीजा यह हुआ कि दोनों संगठन एक दूसरे से संघर्ष की स्थिति में आ गए. सन् 1990 से 1993 के बीच दोनों संगठनों ने एक-दूसरे के 200 से अधिक लोगों को मार दिया. जेकेएलएफ ने उस समय आरोप लगाया था कि एचएम आईसआई के साथ मिलकर उसके लोगों को मार रहा है. हैदरी बताते हैं, ‘ एचएम का गठन बहुत सोच-समझकर किया गया था. इसका एक बेहद समर्पित और मजबूत वैचारिक आधार था. यही कारण है कि संगठन आज भी जिंदा है और लड़ रहा है. इसके पीछे हमारा उद्देश्य कश्मीर को भारत से अलग करके एक इस्लामिक राज्य बनाना था. हमारी रणनीति व्यापक थी. हमने सोचा था कि भारत को हराने के बाद पाकिस्तान में हमारी बड़ी भूमिका हो जाएगी. हम पाकिस्तान को पूरी तरह से एक इस्लामिक राज्य बना देंगे.’

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haneef‘सैयद सलाउद्दीन तो सर्कस का शेर है, वह भी अधमरा’

जो भी कश्मीरी लड़के पाकिस्तान में कश्मीर की आजादी की बात करते हैं वेे लोग उन्हें बॉर्डर पर भेजकर मरवा देते हैं. वे कश्मीर की आजादी के खिलाफ हैं. जहां तक सलाउद्दीन (हिजबुल मुजाहिदीन का प्रमुख) की बात है तो देखिए कि उसके चारों बेटे यहां जम्मू कश्मीर में सरकारी नौकरी कर रहे हैं. चीफ कमांडर के बेटों को नौकरी मिल रही है, उनके पास पासपोर्ट है लेकिन जब आम कश्मीरी पासपोर्ट मांगता हैं तो सरकार कहती है नहीं देंगे, क्योंकि तुम्हारा दूर का रिश्तेदार पहले आतंकवादी था. यह किस तरह का न्याय है. सलाउद्दीन तो बस वहां बैठकर आईएसआई के आदेश पर बयान देने का काम करता है. वह सर्कस के शेर जैसा है. जिसकी एक टांग टूटी हुई होती है. गले में पट्टा होता है. वह पहले से ही अधमरा होता है. उसे नचाने वाला आता है और जब आकर पीछे हंटर मारता है तो वह दहाड़ना शुरु कर देता है.

हनीफ हैदरी, हिजबुल मुजाहिद्दीन के संस्थापक सदस्य

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सैफुल्लाह बताते हैं, ‘ इन संगठनों के लोगों ने आपस में एक दूसरे के इतने लड़कों को मारा है जितने सेना के हाथों भी नहीं मारे गए.’

इसके बाद एचएम के नेताओं के बीच आपसी लड़ाई शुरू हो गई. वह अलग-अलग गुट में बंटने लगा. हर दिन दो लोग मिलकर नया संगठन खड़ा कर लेते थे. एक समय के बाद तो ऐसी स्थिति हो गई कि पता नहीं चलता था कि कौन किसको मार रहा है. हैदरी कहते हैं, ‘ यह सबकुछ बेहद दुखद था. हम कश्मीर के लिए लड़ रहे थे. मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्यों हम एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं. क्यों संगठन लगातार कमजोर हो रहा है. इसके पीछे के कारणों को जानने मैं पाकिस्तान स्थित ट्रेनिंग कैंपों में गया. वहां की स्थिति देखकर मैं हैरान रह गया. वहां जाकर मेरा पाकिस्तान और सशस्त्र संघर्ष से मोहभंग हो गया. मुझे पता चला कि इस सब बर्बादी के पीछे आईएसआई और पाकिस्तान का हाथ है. वही कश्मीर में गुटबाजी के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार थे.’

ऐसा ही एक आतंकी ट्रेनिंग बेस कैंप जो मुजफ्फराबाद के पास था, में जब हैदरी पहुंचे तो उन्होंने पाया कि पाकिस्तानी एजेंसियों ने कैंप को आतंकवाद की फैक्ट्री में बदल दिया है. यहां हजारों की संख्या में अलग-अलग देश और नस्ल के लोग अलग-अलग पार्टियों के कैंप में ट्रेनिंग ले रहे हैं. इन लोगों के लिए विचारधारा का कोई मतलब नहीं था.

‘ मैंने 11 अलग-अलग कैंपों में 11 अलग संगठनों के लोगों को पाया. जब मैं इन संगठनों के कमांडरों से मिला और उनसे पूछा कि इतने संगठन क्यों बने हुए हैं. सब एक साथ क्यों नहीं हैं. तो उन्होंने मुझसे कहा कि हर संगठन की अपनी अलग धार्मिक और राजनीतिक विचारधारा है.’ हैदरी बताते हैं, ‘ इस तरह से वहाबियों के पास तहरीक उल मुजाहिद्दीन और लश्कर ए तैयबा था, शियाओं का हिजबुल मोहमिनीन तो सुन्नियों का हिजबुल मुजाहिद्दीन और हिज्ब ए इस्लामी था. इस तरह से तमाम ऐसे संगठन बने हुए थे. उस समय मैंने तय कर लिया कि मेरे जेहाद के दिन पूरे हो चुके हैं. मेरा आजादी की इस लड़ाई से मोहभंग हो चुका था. मैंने सब छोड़ दिया. ‘

हैदरी ही नहीं पाकिस्तान आए तमाम कश्मीरी नौजवानों का धीरे-धीरे पाकिस्तान की असलियत से सामना होने लगा. उन्हें समझ आने लगा कि उनको धोखा दिया जा रहा है. जिस देश को वे अपनी आजादी की लड़ाई में साथी मानकर चल रहे थे उसका इस समर्थन के पीछे अपना एजेंडा है. इनमें से ज्यादातर लड़के खुद को छला हुआ महसूस करने लगे. जल्दी ही इसकी प्रतिक्रिया भी यहां दिखाई देने लगी. हैदरी जानकारी देते हैं, ‘ मैंने वहां कश्मीरी लड़कों के लिए जम्मू और कश्मीर रिफ्यूजी वेल्फेयर एसोसिएशन शुरू की. दिन में मैं एक दुकान पर वेल्डिंग का काम करता और रात में पूर्व आंतकियों को बुलाकर उनके साथ मीटिंग करता. उनकी समस्याएं सुनता और यहां से कैसे निकल सकते हैं इस पर हम चर्चा करते.’ इन बैठकों में ही यह तय हुआ कि पाकिस्तान सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया जाएगा. फिर धीरे-धीरे पाकिस्तान के खिलाफ धरना-प्रदर्शन के आयोजन होने लगे. ये प्रदर्शन पाकिस्तान की कश्मीर में भूमिका और वहां रह रहे जम्मू कश्मीर के युवकों के साथ किए जा रहे बुरे सलूक के खिलाफ था.

पाकिस्तान ट्रेनिंग करने गए लोगों में से कई ऐसे थे जिन्होंने ट्रेनिंग खत्म होने के बाद हथियार डाल दिए. उन्होंने कैंप, आतंक और आजादी की लड़ाई दोनों से मुंह मोड़ लिया. कई ऐसे थे जिनका बढ़ते समय के साथ आजादी की लड़ाई की जमीनी हकीकत से सामना होने पर मोहभंग हो गया. इसकी सबसे बड़ी वजह थी कि इस कथित आजादी की लड़ाई का संचालन पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के हाथ में था. हाल ही में पीओके से वापस लौटे मोहम्मद यूसुफ कहते हैं, ‘ मुझे वहां जाने के दो साल के भीतर ही समझ आ गया कि आईएसआई व पाकिस्तान का क्या एजेंडा है. मुझे पता चल गया कि इन लोगों को कश्मीर की आजादी से कोई मतलब नहीं है. भारत के खिलाफ लड़ाई में कश्मीर इनके लिए सिर्फ मोहरा भर है.’

वहीं कुछ समय के बाद ही वहां दूसरे आतंकी संगठनों के बीच भी आपसी लड़ाई शुरू हो गई. इन हालात में कुछ सालों के भीतर ही कई कश्मीरियों ने इस कथित आजादी की लड़ाई से किनारा कर लिया. 1995 तक पाकिस्तान और पीओके में ऐसे कश्मीरियों की संख्या काफी बढ़ गई जो लड़ाई छोड़कर बतौर शरणार्थी यहां रहने लगे थे. वे तभी से वापस अपने घर आना चाहते थे. लेकिन यह सोचकर उस दिशा में नहीं बढ़ पाते थे कि अगर वे ऐसा करते पकड़े जाते हैं तो आईएसआई और आतंकी संगठनों के लोग उन्हें मार डालेंगे और किसी तरह जान बचाकर भारत पहुंच गए तो भारत सरकार उन्हें जिंदा नहीं छोड़ेगी.

इन लोगों द्वारा पाकिस्तान विरोध की शुरुआत होने के बाद उसका सबसे ज्यादा असर भारतीय हिस्से वाले कश्मीर में हुआ. यहां के युवाओं के सामने पाकिस्तान की असलियत खुल चुकी थी. लड़कों ने पीओके और पाकिस्तान जाना धीरे-धीरे बंद कर दिया. कश्मीर से जेहाद की ट्रेनिंग के लिए लड़के आने बंद हो गए. अब आलम यह हो गया कि 10-15 आतंकियों के समूह में कुल इक्का-दुक्का ही कश्मीरी होते थे. कश्मीरियों के मोहभंग को देखते हुए पाकिस्तान ने कश्मीर में पाकिस्तानी लड़कों को भेजना शुरू किया. लश्करे तैयबा जैसा संगठन जिसके पूरे कैडर में सभी पाकिस्तानी हैं, उसको आईएसआई ने कश्मीर में सक्रिय करना शुरू किया.

फोटोः शैलेंद्र पाण्डेय
फोटोः शैलेंद्र पाण्डेय

इस बीच अफगानिस्तान पर अमरीकी हमले ने पाकिस्तान की हालत और खराब दी. अब उसे अफगानिस्तान के मोर्चे पर भी निपटना था. अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का अलग दबाव था सो पाकिस्तान कश्मीर से दूर होता चला गया. हैदरी कहते हैं, ‘ हालत इतनी खराब हो गई कि पाकिस्तान में जेहाद के लिए चलने वाले कैंपों में राशन तक खत्म हो गया. जो अमीर पंजाबी कश्मीर में जेहाद के नाम पर पैसा और राशन भेजते थे उन्होंने अब तालिबान को सपोर्ट करना शुरू कर दिया था.’

पीओके में बने इन हालात का कश्मीर घाटी पर भी असर पड़ा. जानकार बताते हैं कि हिजबुल के समर्थन में आ रही गिरावट के कारण ही आज यह आलम है कि यहां एचएम पर लश्कर ए तैयबा भारी पड़ रहा है. हिजबुल को यहां कैडर नहीं मिल रहा है. सरकार इसे स्थानीय लोगों के आतंकवाद से मोहभंग होने के रूप में देखती है. आंकड़े बताते हैं कि आज घाटी में आतंक की घटनाएं पिछले 20 सालों में सबसे निचले स्तर पर हैं. दो साल पहले के आंकड़े बताते हैं कि साल 2011 की तुलना में 2012 में आतंकी हिंसा में जहां 26 फीसदी की कमी आई वहीं हताहत होने वालों की संख्या में 48 फीसदी की गिरावट आई है.

इन पूर्व आतंकवादियों की पूरी व्यथा समझने के लिए हम एक बार फिर जहांगीर की कहानी पर वापस चलते हैं. अफगानिस्तान पहुंचे जहांगीर को भी कुछ महीनों के भीतर ही यह पता चल गया था कि वे यहां अलग तरह से गुलाम बनाए जा रहे हैं. यहीं एक ऐसी घटना हुई जिससे जहांगीर का कैंप के जीवन से मोहभंग हो गया. इसबारे में वे बताते हैं, ‘ कश्मीर में किन-किन जगहों को निशाना बनाना है इसको लेकर दो पाकिस्तानी कमांडर हम 25 लड़कों की क्लास ले रहे थे. उन्होंने कहा कि भारतीय सेना की सप्लाई लाइन को काटने के लिए सबसे पहले हमें पुलों को निशाना बनाना पड़ेगा. मैंने खड़े होकर कहा कि ऐसा करना गलत होगा. इससे भारतीय सेना को कोई दिक्कत नहीं होगी. उन्हें सप्लाई पहुंचाने के लिए पुल की जरूरत नहीं है. अगर उन्हें इसकी जरूरत पड़ती भी है तो वे चंद घंटों में ही अपनी जरूरत के लिए आपातकालीन पुल तैयार कर लेंगे. ऐसे में अगर हम पुल उड़ाते हैं तो इससे कश्मीर की आम जनता को परेशानी और नुकसान उठाना पड़ेगा. अधिकारियों ने कुछ लोगों की तरफ इशारा करके मुझे बाहर निकालने को कहा. उन्होंने मुझे एक पेड़ से बांध दिया. मुझे यकीन हो गया था कि ये लोग अगले कुछ समय में मेरा गला काट देंगे. मैं बुरी तरह डर गया था. तभी मेरे कुछ कश्मीरी दोस्त मुझसे मिलने आए और कहा कि अब तुम्हारे बचने का एक ही उपाय है कि तुम खुद के पागल हो जाने का नाटक करो. अगले तीन दिनों तक मैं वहीं पेड़ से बंधा हुआ पाकिस्तान का राष्ट्रीय गीत और फिल्मी गाने गाता रहा. अमेरिका को गाली देता रहा. कमांडरों को पहले गाली देता फिर उनकी तारीफ करता.’

इसके बाद कमांडरों को भरोसा हो गया कि जहांगीर सच में पागल हो गए हैं. उनकी रस्सी खोल दी गई. फिर एक रात वे वहां से भाग निकले और कई महीनों तक मुजफ्फराबाद की एक मस्जिद में रहे. यहीं उनकी मुलाकात शफीक नाम के एक लड़के से हुई जिसने मुजफ्फराबाद ट्रेनिंग कैंप में उनके साथ ही ट्रेनिंग की थी. वह जेकेएलएफ से जुड़ा था. यह जानने के बाद कि जहांगीर संगठन में फिर वापस नहीं जाना चाहता शफीक उसे अपने घर ले गया. उसका घर पीओके के दक्षिण में स्थित कोटली जिले के सरसावां गांव में था. जहांगीर बताते हैं, ‘ शफीक अपने मां बाप का इकलौता लड़का था और वह जेहाद छोड़ना नहीं चाहता था. उसने अपने घरवालों से कहा कि वह जा रहा है लेकिन जहांगीर वहीं रहेगा. अगर उसे कुछ हो जाता है तो फिर जहांगीर को ही वे अपना बेटा मान लें.’ बकौल जहांगीर, ‘मैं वहां तीन साल रहा और इसी दौरान शफीक के मारे जाने की खबर भी हम लोगों को मिली. इसके बाद उन्होंने मुझे अपना बेटा ही मान लिया.’ शफीक के परिवार वालों ने ही उनकी शादी करवा दी. जहांगीर बताते हैं, ‘ वे लोग मुझे जान से ज्यादा प्यार करते थे लेकिन मुझे अपने घरवालों की बहुत याद आती थी. मैंने अपनी पत्नी को कह दिया था कि एक दिन मैं अपने घर वापस जाऊंगा.’

इन लोगों के घर वापसी के सपने के परवान चढ़ने की शुरुआत 2004 से मानी जा सकती है. तब भारत सरकार और तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के बीच लंबी बातचीत के बाद बॉर्डर पर स्थिति थोड़ी सामान्य होने लगी थी. नियंत्रण रेखा के आर-पार बसों की आवाजाही शुरू हो गई. इसके बाद से पाकिस्तान में बैठे इन लोगों की घर वापस की छटपटाहट और बढ़ गई.

पुनर्वास की नीति और पाकिस्तान से वापसी
पाकिस्तान से वापस अपने घर का सफर इन लोगों के लिए बेहद डरावना, खर्चीला और परेशान करने वाला रहा. जम्मू-कश्मीर की उमर अब्दुल्ला सरकार ने केंद्र सरकार के साथ मिलकर इनकी वापसी के लिए 2010 में जो नीति बनाई उसके तहत पूर्व आतंकवादियों के भारत में वापस आने के लिए चार रास्ते चिह्नित किए गए. ये थे- वाघा बॉर्डर, इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (नई दिल्ली), उरी-मुजफ्फराबाद और पूंछ-रावलकोट. लेकिन सरकारी नीति की यह शर्त शुरुआत में ही पुनर्वास के इरादों पर बड़े सवाल खड़ा कर देती है. इससे जुड़ी सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जितने पूर्व आतंकी पाकिस्तान से वापस जम्मू कश्मीर आए हैं उनमें से मुश्किल से कोई ही इन रास्तों से वापस आया हो. वजह यह कि पाकिस्तान इन रास्तों के जरिए इन लोगों को सीमापार नहीं करने देता. यदि ये किसी तरह छुपते-छुपाते भारतीय सीमा में दाखिल हो भी जाते हैं तो भारतीय सेना इन्हें अंदर नहीं आने देती.

फारुख अहमद शाह कहते हैं कि लोग उन्हें पूर्व आतंकवादी होने की वजह से कोई काम नहीं देते.
फारुख अहमद शाह कहते हैं कि लोग उन्हें पूर्व आतंकवादी होने की वजह से कोई काम नहीं देते. फोटोः बृजेश सिंह

पूर्व आतंकी असलम खान अपना ऐसा ही एक अनुभव साझा करते हैं, ‘मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रात के अंधेरे में छुपते-छुपाते भारतीय सीमा पर पहुंचा था. मैंने बीएसएफ के जवानों को बताया कि मैं एक पूर्व आतंकवादी हूं और सरकारी नीति के तहत वापस आया हूं. लेकिन मेरी हालत उस समय खराब हो गई जब बीएसएफ के अधिकारी ने मुझे चुपचाप वापस पाकिस्तान चले जाने को कहा.’ असलम के मुताबिक जवानों ने उनसे कहा कि यदि वे वापस नहीं गए तो उन्हें वहीं गोली मार दी जाएगी. उन्हें अपने परिवार सहित वापस लौटना पड़ा. वे बाद में नेपाल के रास्ते (सरकारी नीति में यह रास्ता अवैध है) जम्मू कश्मीर वापस आ पाए.

हालांकि, इक्का-दुक्का लोग ऐसे भी हैं जो किसी तरह से बचते-बचाते हुए सीमा पार करके वापस आने में सफल रहे हैं. हालांकि उनके लिए यह यात्रा कदम-कदम पर जानलेवा जोखिम से भरी रही. इन्हीं रास्तों से वापस आए सरफराज बताते हैं, ‘ हमारे पास नेपाल बॉर्डर से आने के लिए पैसा नहीं था. इस रास्ते से पहुंचाने के लिए एजेंट हमसे पांच लाख रुपये मांग रहे थे लेकिन मेरे पास पांच हजार रुपये तक नहीं थे. बॉर्डर क्रॉस करने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं था. हम अपने घर आने के लिए मुजफ्फराबाद से रात में निकले. रात भर लगातार चलते रहे. उसी में बारिश हो गई और हम पूरी तरह से भीग गए थे. लेकिन हम रुके नहीं चलते रहे. रास्ते में हमें कहीं कोई पाकिस्तानी सैनिक नहीं मिला और हम पाकिस्तानी सीमा पार कर आए. जब तक हम भारतीय सीमा में दाखिल हुए तब तक उजाला हो चुका था. हालांकि कहीं कोई दिखाई नहीं दे रहा था. रात भर चल कर हम लोग थक चुके थे तो सामने एक खेत में लगी फसल की आड़ में बैठ गए. अभी वहां हमें बैठे कुछ मिनट ही हुए थे कि कहीं कोई हूटर बजा और देखते-देखते हमें भारतीय सैनिकों ने घेर लिया. हमसे उन्होंने अगले तीन घंटे तक पूछताछ की. उसके बाद हमें पुलिस को सौंप दिया गया.’ सरफराज की पत्नी जाहिदा 15 दिन के बाद जमानत पर रिहा हो गईं. लेकिन सरफराज पर पुलिस ने जनसुरक्षा अधिनियम (पीएसए) लगाया था. वह छह महीने बाद जेल से बाहर आ पाए.

सरफराज की कहानी चंद अपवादों में से एक हैं. बाकी असलम जैसी कहानी लगभग हर उस व्यक्ति की है जिसने सरकार द्वारा तय किए गए या बॉर्डर के रास्तों से वापस आने की कोशिश की. जितने भी लोगों ने उन रास्तों से वापस आने की कोशिश की उन्हें वापस लौटा दिया गया. लेकिन ऐसा हुआ क्यों?

umarपूर्व आतंकी बशीर अहमद कहते हैं, ‘हमें भी नहीं पता. पाकिस्तान का तो समझ में आता है कि वह नहीं चाहेगा कि पूर्व आतंकवादी समर्पण करने के लिए भारत की सीमा में दाखिल हो क्योंकि इससे यह साबित हो जाएगा कि पाकिस्तान में आतंकवादी मौजूद है. उसने उन्हें पनाह दे रखी है. लेकिन भारत सरकार ने जब खुद ही हम लोगों की वापसी के लिए नीति बनाई है तो फिर वह क्यों चिह्नित रास्तों से हमें आने नहीं देती यह हमारी समझ के बाहर है.’

इस पूरे मामले में पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग की भूमिका भी अजीबोगरीब है. जैसे ही लोगों को पता चला कि सरकार ने वापस जाने के लिए चार रास्ते चिह्नित किए हैं. इन लोगों ने पाकिस्तान स्थिति भारतीय उच्चायोग से संपर्क करना शुरू किया. इन्हें सूचना मिली थी कि वीजा, बाकी जरूरी दस्तावेज और भारत लौटने की अनुमति उन्हें वहीं से मिलेगी.

खैर, जहांगीर जैसे तमाम लोग उस समय हैरान रह गए जब इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग ने उनकी किसी तरह से मदद करने से इनकार कर दिया. पूर्व आतंकी एहसान कहते हैं, ‘उच्चायोग के अधिकारियों ने हमसे कहा कि हमें सरकार द्वारा चिह्नित चार रास्तों से घर जाने के बारे में सोचना छोड़ देना चाहिए. यह संभव नहीं है. उच्चायोग के लोगों ने वापस जाने का एक चौंकाने वाला तरीका बताया. उन्होंने कहा आप लोग ऐसा करो नेपाल के रास्ते चले जाओ. जब आप अपने घर पहुंच जाएंगे तो हम कागजी कार्रवाई वहीं पूरी करा लेंगे. आपके पुनर्वास का काम उसके बाद शुरू हो जाएगा.’

भारतीय उच्चायोग द्वारा मदद से इनकार करने और नेपाल के रास्ते भारत जाने की सलाह देने के बाद ये लोग इस बात पर विचार करने लगे कि आखिर कैसे नेपाल के रास्ते से भारत जा सकते हैं.

जहांगीर बताते हैं कि उनकी मुलाकात कुछ ऐसे लोगों से हुई जो उन्हें नेपाल के रास्ते भारत पहुंचाने के लिए तैयार हो गए. लेकिन इसके लिए घर के हर सदस्य के हिसाब से एक लाख रुपये का खर्च था. पांच लोगों के लिए उन्हें पांच लाख रुपये देने पड़े. नेपाल के रास्ते से अपने घर कश्मीर आए पूर्व आतंकी हमीद पठान बताते हैं, ‘ वहां एजेंट नेपाल जाने के लिए वीजा के लिए एप्लाई करवाते हैं. हमें यह कहना होता है कि हम अपने रिश्तेदार की शादी के लिए जा रहे हैं या इलाज कराने या घूमने. इसके बाद नेपाल जाने के टिकट के साथ ही वापस पाकिस्तान आने का भी टिकट कटाते हैं ताकि उन्हें लगे कि सामने वाला जा रहा है तो वापस भी आएगा. जहांगीर जानकारी देते हैं, ‘ ये सारे काम कराने वाले एजेंट कराची में हैं. कराची एयरपोर्ट पर छोड़ने के बाद वे नेपाल में अपने एजेंट का नंबर और संपर्क आदि दे देते हैं.’ काठमांडू पहुंचने के बाद वहां एक दूसरा एजेंट मिलता है जो इन लोगों को नेपाल सीमा पार करवाकर गोरखपुर लाता है. इन एजेंटों को पहले से यह निर्देश होता है कि पाकिस्तान से आ रहे इन लोगों के पासपोर्ट वह अपने कब्जे में लेकर तुरंत नष्ट कर दे जिससे यह सबूत मिट जाए कि वे पाकिस्तान से आ रहे हैं. इसके बाद ये लोग ट्रेन से जम्मू पहुंचते हैं. पूर्व आतंकवादी वापसी और पुनर्वास की नीति के तहत आए हैं इसलिए जम्मू आते ही सीधे अपने क्षेत्र के थाने में जाकर रिपोर्ट करते हैं.

एक नई त्रासदी की शुरुआत
अभी तक वापस आए पूर्व आतंकियों के मन में इस बात की जरा भी शंका नहीं थी कि कश्मीर में एक और त्रासदी उनका इंतजार कर रही है. यूसुफ अपनी आपबीती सुनाते कि हुए कहते हैं, ‘वापस आने के बाद पुलिस ने मुझ पर पाकिस्तान से ग्रेनेड लाने का झूठा केस दर्ज कर दिया. हमें कई दिनों तक बड़गाम थाने में बंद रहना पड़ा. आप ही बताइए कोई पत्नी और चार बच्चों के साथ ग्रेनेड लेकर आएगा? पत्नी को कहा कि वह दूसरे मुल्क की लड़की है. बॉर्डर क्रॉस करके भारत आई है. जबकि हम दोनों नेपाल वाले रास्ते से बच्चों के साथ आए थे. मुझ से कहा गया मैं नेपाल से अवैध तरीके से भारत आया हूं. पत्नी का केस पिछले पांच सालों से चल रहा है. मैं कहता हूं गलती मैंने की मुझे सजा दो. उस बेचारी को क्यों परेशान कर रहे हो.’

पीओके से लौटे मोहम्मद यूसुफ को इस बात की भी चिंता है कि जब उन्हें ही  सरकार नहीं अपना रही है तो उनकी बेटियों का भविष्य में क्या होगा
पीओके से लौटे मोहम्मद यूसुफ को इस बात की भी चिंता है कि जब उन्हें ही सरकार नहीं अपना रही तो उनकी बेटियों का भविष्य में क्या होगा
फोटोः बृजेश सिंह

पुनर्वास योजना के तहत आए लगभग सभी पूर्व आतंकियों और उनके परिवार वालों के साथ कुछ इसी तरह का सलूक हुआ है. जहांगीर कहते हैं, ‘ मैं भी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ 11 दिनों तक श्रीनगर के एक पुलिस थाने में बंद रहा. उन्होंने हमारे पास मौजूद आखिरी 850 डॉलर भी अपने पास रख लिए. हमने उनसे कहा भी कि हम तो बीवी बच्चों के साथ आए हैं. हमारे पास कोई बंदूक भी नहीं फिर हमसे ऐसा सलूक क्यों किया जा रहा है.’ ये पूर्व आतंकवादी हर लिहाज से राज्य में सबसे आसान शिकार हैं. ऐसे लोगों को कानूनी मदद मुहैया करा रहे वरिष्ठ अधिवक्ता ताज हुसैन कहते हैं, ‘पुनर्वास तो दूर की बात है. सरकार इन्हें यहां शांति से रहने भी नहीं दे रही. अवैध तरीके से बॉर्डर क्रॉस करने, पासपोर्ट कानून का उल्लंघन करने से लेकर इग्रेस एंड इंटरनल मूवमेंट कंट्रोल ऑर्डिनेंस (बिना वैध दस्तावेजों के आवाजाही), दुश्मन एजेंट अध्यादेश, पीएसए जैसे तमाम कानूनों के तहत इन पर केस दर्ज कर दिए जाते हैं.

ऐसा ही एक मामला किश्तवाड़ के मुजम्मिल खान का है. वे जम्मू कश्मीर में हिजबुल मुजाहिद्दीन के ऑपरेशन कमांडर थे. वे बताते हैं, ‘ पुनर्वास की नीति बनने के बाद मैंने एके 47 और दो जिंदा मैग्जींस के साथ समर्पण किया था. आर्मी ने मुझे छोड़ दिया लेकिन पुलिस ने उठाकर जेल में डाल दिया. मैं तीन साल जेल में रहा. वहां से बाहर निकला तो आज तक पुनर्वास की बाट जोह रहा हूं. अभी घर चलाने के लिए मजदूरी करता हूं. हमारा भी पंजाब और उत्तर-पूर्व के पूर्व आतंकवादियों की तर्ज पर पुनर्वास किया जाना चाहिए.’

ऐसे भी कई मामले हैं जहां पूर्व आतंकवादियों के मुताबिक सेना और पुलिस के लोग खुद उनसे कहते हैं कि वे किसी बड़े हथियार के साथ सरेंडर करें ताकि उनका जल्दी और अच्छे से पुनर्वास हो. लेकिन यहां सरेंडर करने के बाद उन पर तमाम तरह के केस लाद दिए जाते हैं. ऐसा ही कुछ अब्दुल गनी के साथ हुआ. गनी के मुताबिक वे जब से आए हैं तब से पुलिस उन्हें कुछ हथियार और गोला बारूद के साथ ‘आत्मसमर्पण’ के लिए कह रही है. वे कहते हैं, ‘ मैं जानता हूं वे लोग अपनी पदोन्नति और मेडल के लिए यह सब कराना चाहते हैं. लेकिन उनकी ये इच्छा पूरी करने के लिए मैं हथियार कहां ले आऊं?’

वापस आए लोगों में तमाम लोग ऐसे हैं जो बाहर पुलिस और सरकार की उपेक्षा और उत्पीड़न के साथ ही घरवालों से अलग स्तर पर जूझ रहे हैं. साल 2010 में जब मंजूर अहमद बड़गाम जिले के नरबल स्थित अपने घर पहुंचे तो कुछ दिनों तक सबकुछ ठीक रहा. आस-पड़ोस वालों से लेकर दूर तक के सारे रिश्तेदार उनसे मिलने आए. सभी ने उन्हें भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी. लेकिन एक महीने में सबकुछ बदल गया. भाइयों ने अपनी व्यवस्था कहीं और कर लेने की बात कहनी शुरू कर दी. बकौल मूंजूर, ‘उन्होंने दबे छुपे शब्दों में यह कहना शुरु कर दिया कि 20 साल तक तो तुम यहां थे नहीं. तुम्हारी वजह से पुलिस और एजेंसी वाले हमें पीटते थे. अब तुम आ गए हो तो अपनी और अपने परिवार की व्यवस्था देखो.’

pic2मंजूर, उनकी पत्नी और चार बच्चों को उनके भाइयों ने घर से बाहर निकाल दिया है. फिलहाल वे पूंछ जिले में एक किराए के मकान में रहते हैं. मंजूर के हिस्से की संपत्ति उनके भाइयों ने सालों पहले ही अपने नाम करा ली थी. पूर्व आतंकवादी सैफुल्ला बताते हैं, ‘ हमारी वापसी से सरकार खुश है या नाराज, यह तो पता नहीं लेकिन अधिकांश पूर्व आतंकवादियों के परिवार वाले, खासकर के उनके भाई वगैरह काफी नाराज हैं. दरअसल ये लोग इनके हिस्से की संपत्ति पहले ही अपने नाम करा चुके हैं. इन्हें विश्वास था कि पीओके गए लड़के कभी नहीं आएंगे. अब चूंकि इन लोगों की वापसी हो रही है तो इन्हें चिंता है कि कहीं वे संपत्ति में अपना हक ना मांगने लगे.’

इस बात से सरकार इनकार नहीं करती कि उसने पूर्व आतंकियों की वापसी के लिए जो नीति बनाई उसमें इनके पुनर्वास का आश्वासन है. लेकिन पिछले चार सालों में किसी एक व्यक्ति का भी सरकार ने पुनर्वास नहीं किया. पिछले साल जम्मू कश्मीर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष महबूबा मुफ्ती के एक प्रश्न के जवाब में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सदन को जानकारी दी थी कि बीते तीन सालों में 360 पूर्व आतंकी पाकिस्तान से अपने घर वापस जम्मू कश्मीर आए हैं और चूंकि सभी लोग सरकार द्वारा तय रास्ते के बजाय नेपाल के रास्ते से भारत आए हैं इसलिए इनमें से किसी का भी पुनर्वास नहीं किया गया. इन लोगों के प्रति राज्य सरकार का रुख आज तीन साल बाद भी बिल्कुल नहीं बदला है. तहलका ने इस मामले पर राज्य सरकार से कई बार संपर्क करने की कोशिश की लेकिन अभी तक हमें उनकी प्रतिक्रिया नहीं मिली. ऐसे मामलों में राज्य मानवाधिकार आयोग से भी कुछ उम्मीद की जा सकती है लेकिन जम्मू कश्मीर राज्य मानवाधिकार आयोग का रवैया बेहद हास्यास्पद है. आयोग के सदस्य रफीक फिदा सफाई देते हैं, ‘हमें तो इस मसले पर कुछ पता ही नहीं. पूर्व आतंकवादियों में से किसी ने हम से संपर्क नहीं किया.’

पूर्व आतंकवादी बताते हैं कि उनके लिए सरकार द्वारा तयशुदा रास्तों से वापसी मुमकिन ही नहीं है. सरकार के इस रवैए को सारे पूर्व आतंकवादी धोखाधड़ी करार देते हैं. एहसान उल हक सवाल उठाते हैं, ‘सरकार अपनी जिम्मेदारियों से बचना चाहती है. इनसे पूछा जाना चाहिए कि हम लोग तय रूटों से आएं इसके लिए इन्होंने क्या किया? पाकिस्तान के साथ क्या इन्होंने इस संबंध में कोई बात की? अपने इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग को हमें वीजा और जरूरी कागजात मुहैया कराने के किए कहा? क्या बॉर्डर पर खड़ी सेना को इन्होंने कहा कि जो पूर्व आतंकी आत्मसमर्पण करने आ रहे हैं उन्हें आने दो? स्थिति यह रही है कि जो लोग पाकिस्तानी एजेंसियों से किसी तरह छुपते-छुपाते बॉर्डर तक पहुंचे उन्हें सेना के लोग वापस नहीं जाने की स्थिति में गोली मारने की धमकी देते हैं. ऐसे में सरकार का यह कहना है कि ये लोग निर्धारित रुटों से नहीं आए एक बेहद अमानवीय और भद्दा मजाक है.’

यूसुफ कहते हैं, ‘इस बात का क्या मतलब कि हम किस रूट से आए. अरे आ तो गए हैं. हमारा पुनर्वास करो. जब तक मैं यहां नहीं आया था. सेना और सीआईडी के लोग मेरे अब्बू के पास रोज आते थे. उनसे कहते थे कि वे मुझे पाकिस्तान से वापस बुला लें. यहां सरकार मुझे नौकरी देगी. पैसा भी देगी. अब्बू ने मुझे उनके कहने के बाद ही वापस आने के लिए चिट्ठी लिखी. तभी मैं आया. लेकिन यहां आने के बाद वे लोग अपना वादा भूल गए. फौज तो कम से कम परेशान नहीं करती लेकिन सीआईडी वाले तो आए दिन तंग करते रहते हैं.’

 सफरोज अहमद का भाई अली मोहम्मद जेकेएलएफ का सदस्य था जिसकी हिजबुल मुजाहिद्दीन के लोगों ने 1993 में हत्या कर दी थी
सफरोज अहमद का भाई अली मोहम्मद जेकेएलएफ का सदस्य था जिसकी हिजबुल मुजाहिद्दीन के लोगों ने 1993 में हत्या कर दी थी
फोटोः बृजेश सिंह

ये लोग 20-22 साल के बाद अपने घर वापस आए हैं. चूंकि इनमें से ज्यादातर लोग अपनी किशोरावस्था में ही सरहद पार चले गए थे ऐसी स्थिति में इनके पास जम्मू-कश्मीर का निवासी होने का कोई पहचान पत्र नहीं है. यानी एक तरह से जम्मू कश्मीर की नागरिकता का काम करने वाला ‘स्टेट सबजेक्ट’ नहीं हैं. राज्य में जिसके पास यह दस्तावेज होता है वही लोग जमीन जायदाद खरीद सकते है. इन्हीं लोगों को सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा का अधिकार होता है.

सबसे ज्यादा दिक्कत इन लोगों की पत्नियों और बच्चों के साथ हैं. पूर्व आतंकियों में से लगभग सभी ने पीओके या पाकिस्तान की लड़कियों के साथ शादी की है. ऐसे में उनकी पत्नियों की पहचान का मामला अधर में लटका हुआ है. यहां आने के बाद का अपना अनुभव बताते हुए जहांगीर की पत्नी साजिया कहती हैं, ‘ मैं सिर्फ यहां इसलिए हूं क्योंकि मेरे शौहर यहां आने चाहते थे. नहीं तो मेरा यहां मन एक सेकेंड भी नही लगता. न यहां की औरतों से हमारी सोच मिलती है, न जुबान, न रहन-सहन और न पहनावा. हम किसी से अपनी बात नहीं कर सकते.’

साजिया का अनुभव कोई अपवाद नहीं है. एक पूर्व आतंकी की पत्नी सबा परवीन कहती हैं, ‘ पहली दिक्कत तो यह है कि हमारी भाषा इन लोगों से बिलकुल अलग है. हमें कश्मीरी समझ में नहीं आती. ये लोग कश्मीरी भाषा में ही बात करते हैं. हम हिंदी, पंजाबी और उर्दू जानते हैं लेकिन इस भाषा में बात करने वाले बहुत कम लोग हैं यहां.’

इन महिलाओं के मन में इस बात की भी गहरी टीस है कि वे शायद कभी अपने घर वालों से नहीं मिल पाएंगी. साजिया कहती हैं, ‘ यहां इन लोगों के परिवार के सदस्य हमें पूरी तरह से नहीं अपना रहे हैं. ऐसे में अगर कल को इन्हें कुछ हो गया तो मैं अपने बच्चों को लेकर कहां जाऊंगी. यहां की लड़कियों का तो इस देश में मायका है. हमारा तो इनके अलावा कोई नहीं है और हम अपने घर भी नहीं जा सकते. शादी के बाद ही ये हमें छोड़कर चले आते तो तकलीफ नहीं होती. आज हमारे बच्चे हैं. ये उग्रवादी रहे हैं तो होंगे. इससे मेरा और मेरे बच्चों का क्या लेना देना.’ पूर्व आतंकी मतीन की पत्नी निशत फातिमा कहती हैं, ‘ सरकार से हमें कुछ नहीं चाहिए. हम तो बस अपने पति के कारण यहां आ गए. बस हमें हमारे घरवालों से मिलने जाने की इजाजत दे दें. जो बस उरी-मुजफ्फराबाद जाती है उससे हमें अपने घरवालो से भी मिलने जानें दें. हम पर रहम करें.’

हाल ही में यूसुफ की पत्नी शबीना के पिता का मुजफ्फराबाद में देहांत हो गया लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी वे अपने पिता को देखने नहीं जा पाईं. युसूफ कहते हैं, ‘शबीना के अब्बू के इंतकाल पर मैंने हर जगह मिन्नतें कीं. मैंने कहा कि बस एक बार मेरी पत्नी को उसके पिता को देखने जाने दो लेकिन किसी ने हमारी बात नहीं सुनी.’ सरकार को कोसते हुए युसूफ कहते हैं, ‘यह किस तरह का भेदभाव है. यासीन मलिक को आप पाकिस्तान जाने के लिए पासपोर्ट देते हैं. वह वहां जाकर शादी करता है. हाफीज सईद के साथ बैठक करता है. हमेशा आता-जाता है लेकिन हमारी पत्नियों को जाने की इजाजत नहीं है. जो लोग गन कल्चर को लेकर यहां आए उन्हें आप पासपोर्ट दे देते हो.’

pic3पूर्व आतंकवादियों की पत्नियों के साथ ही इनके बच्चों का जीवन भी यहां बेहद एकाकी और अलगाव से भरा है. पूर्व आतंकवादी जमील का 12 वर्षीय पुत्र इरफान कहता है, ‘ मेरे सभी दोस्त मुजफ्फराबाद में हैं. यहां के लड़कों की भाषा मुझे समझ नहीं आती.’ इन बच्चों की आगे की पढाई भी एक बड़ी दिक्कत है. बड़गाम के मंजूर अहमद कहते हैं, ‘ मेरा बड़ा बेटा वहां 10 वीं पास करके आया है लेकिन यहां आने के बाद उसका कहीं एडमिशन नहीं हो रहा है. पिछले दो सालों से मैं सबके सामने हाथ जोड़ रहा हूं लेकिन स्कूल वाले हमारे बच्चों को एडमिशन देने से बिना कोई कारण बताए इंकार कर रहे हैं.’ यह अनुभव यहां लौटने वाले लगभग हर व्यक्ति का है. जहां तक प्रशासन की बात है तो वह इस समस्या को स्वीकार तो करता है लेकिन सीधा हल सुझाने की दिशा में कुछ करता नहीं दिखता. डीजीपी अशोक प्रसाद के अनुसार, ‘नागरिकता और आगे की पढ़ाई के लिए डिग्रियों की वैधता जटिल मामले हैं. उनके हल होने में थोडा समय लगेगा क्योंकि ये कानूनी और संवैधानिक मसला है. बाकी उनके जीवन को बेहतर बनाने की हम लगातार कोशिश कर रहे हैं.’

जब इन पूर्व आतंकवादियों का पुनर्वास नहीं हुआ तो इन्होंने राज्य में अपने स्तर पर रोजी-रोजगार करने की ठानी लेकिन इस मामले में भी इनके साथ मुसीबतें कम नहीं हैं. 2010 में पीओके से वापस आए फारुक अहमद शाह कहते हैं, ‘हमें कोई काम नहीं देता. जहां भी काम मांगने जाते हैं लोग हमारे मिलिटेंट बैकग्राउंड के कारण काम देने से इंकार कर देते हैं. एक तरफ रोजी रोटी का कोई इंतजाम है नहीं, वहीं हर दूसरे दिन पुलिस, सीआईडी पूछताछ के नाम पर बुलाती है. घंटों बैठाए रखती है. महीने में 20 दिन तो यही निकल जाते हैं. जब से आए हैं तभी से परेशान कर रहे हैं.’ पूर्व आतंकवादी अमजद अहमद कहते हैं, ‘यहां आने के बाद हमारे पास कोई रोजगार नहीं है. हम में से हर व्यक्ति पीओके में कोई ना कोई रोजगार कर रहा था लेकिन यहां हमारे सामने रोजी-रोटी का संकट है. 20-22 सालों में हमने जो भी कमाया था वह पूरा पैसा तो यहां आने में खर्च हो गया. अब यहां हमारे पास कोई रोजगार नहीं है.’ वापस आए ज्यादातर लोगों में से कोई दिहाड़ी मजदूरी कर अपना पेट पाल रहा है तो कोई ऑटो चलाकर या अन्य तरीकों से किसी तरह से दो जून की रोटी का इंतजाम अपने परिवार के लिए कर रहा है.

ये तमाम लोग आने के बाद किस तरह की अमानवीय स्थिति में जी रहे हैं, कितने प्रताड़ित हैं इसका पता उस समय चला जब हाल ही पाकिस्तान से वापस आए एक पूर्व आंतकी सैयद बशीर अहमद शाह ने खुद को आग लगाकर आत्महत्या कर ली थी. बशीर के 15 वर्षीय पुत्र फैजान कहते हैं, ‘अब्बू बहुत परेशान थे. पिछले साल ही हम लोग मुजफ्फराबाद से यहां आए थे. अम्मी यहां आने से रोक रहीं थीं लेकिन अब्बू नहीं माने. यहां आने के हफ्ते भर बाद ही अब्बू के बड़े भाई ने हमें घर से बाहर जाने के लिए कह दिया. हमारे पास रहने के लिए कोई जगह नहीं थी. कुछ दिन के लिए हम अपने एक रिश्तेदार के पास चले गए. अब्बू के पास पैसे नहीं थे. वे घरों की रंगाई-पुताई का काम करने लगे. मजदूरी से जो पैसे मिलते थे उससे रोज का खर्च चलता था. दो महीने बाद उनसे वह दिहाड़ी मजदूरी भी छिन गई. घर खर्च के लिए लोगों से उन्होंने पैसे उधार लिए. वे लोग भी अपने पैसे मांगने लगे. आखिर में इन्हीं बातों का तनाव झेलते हुए उन्होंने एक दिन खुद पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा ली.’

हाल ही में वापस आए मोहम्मद अशरफ वानी उर्फ जमील की स्थिति इतनी खराब हो गई कि उन्हें अपनी बेटी की मजबूरी में शादी करनी पड़ी. जमील कहते हैं, मेरे पास यही विकल्प था कि अपनी बेटी को घर पर रखकर भूख से मार डालूं या कुछ करूं. मैंने उसकी शादी कर दी. मैं उसका गुनहगार हूं, वह 11 वीं में पढ़ती थी. मजबूरी में मैंने उसकी शादी की. न हमारे पास पहचान पत्र है, न राशन कार्ड. पता नहीं कब तक जिंदा रहेंगे हम. जमील बताते हैं उन्होंने ऑटो चलाकर अपना गुजारा करने की बात सोची थी लेकिन सरकार कहती है कि जब वे यहां तीन साल रह लेंगे तब उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस मिलेगा. इस समय उनके पास कोई रोजगार नहीं है और वे जैसे-तैसे गुजारा कर रहे हैं.

अपनी समस्याओं और मांगों को लेकर ये लोग श्रीनगर में कई बार प्रदर्शन कर चुके हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. अब हालात ऐसे हो गए हैं कि कई परिवारों ने वापस पाकिस्तान जाने के बारे में सोचना शुरू कर दिया है. हाल ही में सेना ने बारामुला से बॉर्डर क्रॉस करके पाकिस्तान जाने का प्रयास करते हुए पांच परिवारों को गिरफ्तार किया था. पिछले दो महीने में तीन परिवारों के वापस जाने की भी खबरें आईं जिसमें दो परिवार उत्तरी कश्मीर के बंदीपुर जिले से थे और एक श्रीनगर से.

एहसान बताते हैं, ‘ अभी लगभग 25 हजार के करीब कश्मीरी लड़के पाकिस्तान में हैं. वे सभी वहां से आना चाहते हैं लेकिन हम उनसे कहते हैं, यहां आओगे तो भूखे मारे जाओगे. इसलिए वहीं रहो.’ जहांगीर झुंझलाते हुए कहते हैं, ‘आप से नहीं संभल रहा है तो हमें किसी तीसरे मुल्क में भेज दो. लोग सऊदी और कहां-कहां नौकरी करने जा रहे हैं लेकिन हम शहर से बाहर नहीं जा सकते. हम यहां कैद हो गए हैं. अगर मान लीजिए दिल्ली वगैरह में काम की तलाश में चले गए भी तो पुलिस पकड़ के कहेगी कि उसने एक बड़ा आतंकवादी पकड़ा है. लियाकत शाह का उदाहरण हमारे सामने है.’

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hafeej‘पाकिस्तान में अब भी आतंकवादी शिविर चल रहे हैं’

पाकिस्तान में आतंक की ट्रेनिंग तो अभी-भी चल रही है. लेकिन पहले जैसी स्थिति नहीं है. जो लड़के कश्मीर से आए थे वे धीरे-धीरे सब हकीकत जान गए. इन लोगों को कहा गया था कि जेहाद में बरकत है. जेहाद में सबकुछ है. बड़े-बड़े वादे किए जाते थे कि कश्मीर आजाद होगा लेकिन हकीकत में पाकिस्तान और यहां की सेना को इससे कोई मतलब नहीं है. पाकिस्तान अपने स्वार्थ और मकसद के लिए इन्हें इस्तेमाल कर रहा है. ये खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं. जेहाद के लिए पहले जो ब्रेनवाश किया जाता था वह अब मुमकिन नहीं है. दूसरा यहां पर जेहादी गुटों के जो बड़े नेता हैं, उनके लड़के तो खुद जेहाद से बाहर हैं और वे यहां गरीब बच्चों को इस्तेमाल करते हैं. यहां जो कश्मीरी लड़के हैं वे भी देख रहे हैं कि भारतीय कश्मीर में स्थिति बेहतर हुई है. मुसलमान लड़के वहां से आईएएस बन रहे हैं, पढ़ाई कर रहे हैं. उन्हें सरकारी नौकरियां मिल रही हैं. भारतीय कश्मीर में तो स्थिति बेहतर हो रही है. इसलिए अब ये लड़के पाकिस्तानी ट्रेनिंग कैंपों का रुख नहीं करते.

हफीज चाचड़, पाकिस्तान में बीबीसी के पूर्व संवाददाता

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इन पूर्व आतंकवादियों की राज्य में जो दुर्दशा है वह खुद ही कई खतरों को आमंत्रित कर सकती है. वरिष्ठ पत्रकार और जम्मू कश्मीर पर बने तीन सदस्यीय वार्ताकारों के समूह के सदस्य दिलीप पड़गांवकर इस बारे में इशारा करते हैं, ‘ यह एक दुखद सच है कि इन लोगों का पुनर्वास नहीं किया जा रहा. हम इन लोगों से मिले हैं. सरकार को ये सोचना चाहिए कि अगर वह इन लोगों का पुनर्वास नहीं करेंगे तो इसका फायदा आईएसआई और कश्मीर विरोधी ताकतें ही उठाएंगी.’ कुछ इसी तरह की बात हाल ही में पाकिस्तान से लौटे पूर्व आतंकवादी फारुक अहमद भी कहते हैं, ‘सरकार खुद चाहती है कि लोग मिलिटेंट बने. आज हमारे बच्चे तिल-तिल मर रहे हैं. अब ऐसे में कोई मुझे 10 लाख रुपये किसी गलत काम के लिए देगा तो क्या मैं नहीं लूंगा.’

एक तरफ पूर्व आतंकवादी वापस कश्मीर आने और अपने पुनर्वास को लेकर संघर्ष कर रहे हैं तो इधर एजेंसियां भी उनके ‘हृदय परिवर्तन’ की सच्चाई पर नजर बनाए हुए हैं. खुफिया विभाग के एक अधिकारी कहते हैं, ‘ हमें बिलकुल चौंकन्ना रहने की जरूरत है. सभी को पता है कि अफजल गुरु भी सरेंडर्ड मिलिटेंट ही था. डबल क्रॉस की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.’ सरकार ने बेशक इन लोगों के लिए पुनर्वास की नीति बना दी हो लेकिन खुफिया विभाग का यह रवैया काफी हद तक इनके लिए मुसीबत का सबब बना हुआ है. खुफिया विभाग के अधिकारियों का यह भी कहना है कि पूर्व आतंकवादियों में से ज्यादातर ने पाकिस्तानी महिलाओं से शादी कर ली है. इनके बच्चे भी हैं. ऐसे में इनकी नागरिकता का दर्जा एक बड़ी समस्या है. पत्नी को वापस भेजा जा सकता है, लेकिन बच्चों का क्या करेंगे? सबसे बड़ा डर यह है कि आने वाले समय में ये बच्चे एक स्पष्ट नागरिकता के अभाव की स्थिति में कश्मीर विवाद की पहचान न बन जाएं. रॉ के पूर्व प्रमुख आनंद वर्मा कहते हैं, ‘इन लोगों को सरकार का साथ देना चाहिए. कुछ ऐसा नहीं करना चाहिए जिससे यहां के अमन चैन को कोई नुकसान पहुंचे. एजेंसियों को ध्यान रखना होगा कि इनके बीच ब्लैक शीप (संदिग्ध) ना आ जाएं. इन लोगों पर कुछ समय तक नजर रखने की जरूरत है.’

घाटी में पृथकतावादी भी इनकी वापसी को लेकर खुश नहीं है. सैयद अली शाह गिलानी कहते हैं, ‘ ये लोग लालच में आ गए. इन्हें यहां नहीं आना चाहिए था. पुर्नवास नीति के नाम पर भारत सरकार ने इन्हें पकड़ने के लिए जाल बिछाया जिसमें ये लोग फंस गए.’ जहां तक पूर्व आतंकवादियों की बात है तो वे खुद इन प्रथकतावादी संगठनों और उनके नेताओं की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाते हैं. जहांगीर कहते हैं, ‘आजादी की बात करने वाले ये लोग भारत और पाकिस्तान दोनों से पैसा लेते हैं. इनके बच्चे लंदन और अमेरिका में पढ़ रहे हैं. इन्होंने शहीदों की कब्रें बेच दीं. हम हुर्रियत के लोगों की कोठियों पर कब्जा करेंगे. इन्होंने ही हमें बंदूकें पकड़ाईं थी अब ये लोग आराम से नहीं बैठ सकते .’

चाहे राज्य सरकार हो, सुरक्षाबल, खुफिया एजेंसियां, प्रथकतावादी या अपना परिवार, हर किसी के लिए पाकिस्तान से आ रहे ये पूर्व आतंकवादी इस समय सबसे अवांछित व्यक्ति बन चुके हैं. ऐसा ही रहा तो मुमकिन है कि आने वाले समय ये भी राज्य की उन दर्जनों मानवीय त्रासदियों में शुमार हो जाएं जिनका जम्मू-कश्मीर के पास कोई स्थाई समाधान नहीं है.

  • कांग्रेसी राजकुमार की हैसियत से राहुल गांधी 2009 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पहुंचे थे. वे उत्तर प्रदेश की एक दलित बस्ती का दौरा करके सीधे यहां आए थे. राहुल दलित बस्ती में तो बिना किसी तामझाम के गए, लेकिन जेएनयू में उनके साथ कड़ी सुरक्षा थी. इस पर बीबीसी ने लिखा था, ‘राहुल को जेएनयू के बुद्धिजीवियों से कोई खतरा तो नहीं था? वैसे नेताओं को जेएनयू में हमेशा खतरा रहता है लेकिन जान का नहीं, बल्कि सवालों का और उस खतरे से सामना राहुल का भी हुआ.’ राहुल को जेएनयू में काले झंडे दिखाए गए. ठीक वैसे ही जैसे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या उनसे बहुत पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दिखाए गए थे. राहुल बीच में भाषण छोड़कर मंच से नीचे आए और छात्रों से सवाल पूछने को कहा. छात्रों ने सवालों की झड़ी लगा दी. कॉरपोरेट को टैक्स में छूट, विदेश नीति, किसान आत्महत्या, गुटनिरपेक्षता, लैटिन अमेरिका पर भारत की नीति और कांग्रेस में मौजूद वंशवाद पर तीखे सवाल पूछे गए. यह संसद की समयबिताऊ बहस नहीं थी. यह हर दिन मार्क्स, एंगेल्स, गांधी, एडम स्मिथ और गॉलब्रेथ को पढ़ने वाले युवाओं के सवाल थे. राहुल गांधी छात्रों को माकूल जवाब देकर संतुष्ट नहीं कर पाए.
    यह जेएनयू की परंपरा है जहां से राजनीति और लोकतांत्रिक प्रतिरोध की एक स्वस्थ धारा निकलती है. देश और दुनिया भर से छात्र यहां पढ़ने आते हैं और कम से कम एशिया में उसे एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के तौर पर जाना जाता है. हालांकि, जेएनयू के बारे में तरह-तरह की भ्रांतियां और आरोप भी सामने आते रहे हैं. हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र ‘पांचजन्य’ ने जेएनयू पर ‘दरार का गढ़’ शीर्षक से एक कवर स्टोरी प्रकाशित की, जिसमें आरोप लगाया गया, ‘जेएनयू को वामपंथियों का गढ़ कहा जाता है. भारतीय संस्कृति को तोड़-मरोड़कर गलत तथ्यों के साथ प्रस्तुत करना यहां आम बात है…यहां के लोग तमाम तरह की देशविरोधी बातों की वकालत करते हैं. यहां के ‘बुद्धि के हिमालयों’ को सिर्फ एक ही बात समझाई और घुट्टी में पिलाई जाती है कि कैसे भारतीय संस्कृति से द्रोह व द्वेष, भारतीय मूल्यों का विरोध, हिंदू विरोध, देश विरोधी कार्य, समाज विरोधी कार्य करना है.’ इसके अलावा पांचजन्य जेएनयू परिसर पर कुछ ऐसा आरोप लगाता है कि जैसे यहां पर देश तोड़ने वाले लोगों का कोई कैंप चलता हो.
    पांचजन्य के ये आरोप गंभीर हैं. उन पर जरूर गौर करना चाहिए. क्या जेएनयू में सिर्फ नक्सली समर्थक या देश तोड़ने वाले लोग पाए जाते हैं? वहां वामपंथ, दक्षिणपंथ, समाजवाद, गांधीवाद, अंबेडकरवाद आदि सभी धाराओं के मानने वाले लोग भी मौजूद हैं, क्या आरएसएस इन सबको नक्सली या समाज तोड़ने वाला मानता है? और अगर जेएनयू नक्सलियों और देशद्रोहियों का गढ़ है तो उसे क्यों न बंद कर दिया जाए?
    पांचजन्य में छपा लेख कहता है, ‘जेएनयू की नीति निर्माण इकाई में नव-वामपंथियों ने गहरी घुसपैठ की है और इसका परिणाम यह हुआ कि यहां की पाठ्य सामग्री में उनका पूरा हस्तक्षेप हो गया. इतना ही नहीं यहां मानवाधिकार, महिला अधिकार, पांथिक स्वतंत्रता, भेदभाव एवं अपवर्जन, लैंगिक न्याय एवं सेक्युलरिज्म से ओतप्रोत पाठ्यक्रमों को बढ़ावा दिया गया. साथ ही यहां एक षडयंत्र के तहत भेदभाव एवं अपवर्जन अध्ययन केंद्र, पूर्वोत्तर अध्ययन केंद्र, अल्पसंख्यक एवं मानवजातीय समुदायों और सीमांत क्षेत्रों का अध्ययन केंद्र सहित और भी कई अध्ययन केंद्रों की स्थापना की गई. लेकिन इनमें नव वामपंथी छात्र एवं छद्म ईसाई मिशनरियों से ओतप्रोत शिक्षकों को भर दिया गया. इन तमाम चीजों ने जेएनयू से शिक्षित पीढ़ी को वैचारिक रूप से भ्रष्ट बना दिया.’ इस लेख के मुताबिक, जेएनयू के छात्र और शिक्षक दोनों ही मिलकर ‘देश और समाज’ को तोड़ रहे हैं.
    यह सोचने की बात है कि क्या मानवाधिकार, महिला अधिकार, पांथिक स्वतंत्रता, भेदभाव एवं अपवर्जन, लैंगिक न्याय एवं सेक्युलरिज्म जैसे मूल्यों का अध्ययन करने पर पीढ़ियां भ्रष्ट हो जाती हैं? क्या मानवाधिकारों का उल्लंघन, महिला उत्पीड़न, भेदभाव, लैंगिक अन्याय और सांप्रदायिकता से राष्ट्र मजबूत होता है? इन आधुनिक मूल्यों के प्रति युवाओं में जागरूकता फैलाना राष्ट्र को तोड़ना है या इनका विरोध करना राष्ट्र को तोड़ना है? उक्त सभी मूल्यों का विरोध करना क्या राष्ट्र को मध्ययुग में ले जाने का प्रयास करना नहीं है?
    जेएनयू के प्रोफेसर मणींद्र ठाकुर इन आरोपों के जवाब में कहते हैं, ‘यह बेवकूफी भरे आरोप हैं. किसी जमाने में जेएनयू काफी रेडिकल हुआ करता था, आज तो वह वैसा भी नहीं रहा. ये जरूर है कि 60-70 प्रतिशत छात्र पिछड़े तबके से आते हैं. वे देखते हैं कि यह व्यवस्था अमीरों के लिए ज्यादा है. पूरा भारतीय गणराज्य कॉरपोरेट के लिए खोल दिया गया है. वे वामपंथ से प्रभावित होते हैं क्योंकि वह सबकी भागीदारी और सामाजिक न्याय की बात करता है. आप माओवादियों की लड़ाई के तरीके से मतभेद रख सकते हैं, लेकिन जिस गरीब जनता के लिए न्याय की लड़ाई की बात की जाती है, उससे इत्तेफाक रखने में क्या बुराई है? यह सही है कि कुछ लोगों को नक्सल आंदोलन से सहानुभूति है, लेकिन इन छात्रों को नक्सली कहना ज्यादती है. कॉरपोरेट व्यवस्था पर सवाल करना देशद्रोह कैसे हो गया? कॉरपोरेट हमारे लिए राष्ट्र कैसे हो सकता है? यह भाजपा, संघ और सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोगों की निजी दिक्कत है.’
    जेएनयू की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद पांचजन्य के इस हमले को एक राजनीतिक हमले के रूप में देखती हैं. वे कहती हैं, ‘जेएनयू छात्रसंघ नॉन नेट फेलोशिप खत्म करने और शिक्षा के निजीकरण के विरोध में प्रदर्शन की अगुआई कर रहा है. विश्वविद्यालय में दक्षिणपंथ से प्रभावित कोर्स लागू करने के प्रयासों का विरोध किया गया. जेएनयू के छात्रों और शिक्षकों ने लेखकों, वैज्ञानिकों और कलाकारों के उस आंदोलन का समर्थन किया जो सांप्रदायिकता के खिलाफ और बोलने की आजादी के पक्ष में चलाया जा रहा है. आरएसएस के मुखपत्र का यह हमला इन्हीं राजनीतिक संदर्भों में देखना चाहिए. जेएनयू हमेशा ही प्रचलित स्थापनाओं के खिलाफ और प्रगतिशीलता के समर्थन में रहा है. यहां के अध्यापक और छात्र हमेशा राजनीतिक स्टैंड लेते हैं और सत्ताधारी वर्ग के शोषण के खिलाफ आवाज उठाते हैं.’
    जेएनयू वह कैंपस है, जहां पर 1975 में आपातकाल का पुरजोर विरोध किया गया था. यहां के छात्रों ने 1984 में सिख विरोधी दंगों का विरोध किया तो बाबरी ध्वंस और गुजरात दंगे का भी यहां विरोध हुआ. मनमोहन सिंह और राहुल गांधी के अलावा प्रणब मुखर्जी भी जब जेएनयू आए तो उन्हें तीखे सवालों का सामना करना पड़ा. नवउदारवादी नीतियों का सबसे मुखर विरोध जेएनयू कैंपस में ही होता है. मुजफ्फरनगर दंगों का भी जेएनयू के छात्रों ने विरोध किया. हाल ही में मुजफ्फरनगर दंगे पर बनी डाक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग पुलिस ने रोकने की कोशिश की, लेकिन जेएनयू के छात्रों ने उसकी स्क्रीनिंग करवाई.
    जेएनयू में एबीवीपी के प्रेसीडेंट रह चुके डॉ. मनीष कुमार का कहना है, ‘यह पहली बार नहीं है कि जेएनयू के बारे में ‘पांचजन्य’ और ‘ऑर्गनाइजर’ में ऐसी बातें लिखी गई हैं. 2013 में भी ऑर्गनाइजर लिख चुका है कि जेएनयू नक्सलवाद का बुद्धिजीवी मुखौटा है. किसी ने उसे महत्व नहीं दिया. लेकिन इस बार पांचजन्य के लेख को असहिष्णुता आंदोलन से जोड़ दिया गया. जेएनयू के विद्यार्थी हर विचारधारा से जुड़े हैं. यहां आरएसएस की विद्यार्थी परिषद भी चुनाव लड़ती है. इस बार भी उनकी एक सीट आई है. यहां की फैकल्टी में जरूर संघ की विचारधारा वालों के लिए निषेध है. लेकिन जेएनयू को देशद्रोहियों का अड्डा कहना अर्धसत्य है. यह एक वैचारिक दृष्टिकोण हो सकता है. ठीक उसी तरह जिस तरह भाजपा-संघ को वामपंथी फासिस्ट और न जाने क्या क्या कहते हैं. दोनों ही एक दूसरे को नीचा दिखाने में किसी से कम नहीं हैं.’
    यहां के छात्रों और शिक्षकों पर नक्सलवादियों और अलगाववादियों से सहानुभूति रखने का आरोप मनीष कुमार भी लगाते हैं लेकिन वे कहते हैं, ‘विचारधारा चुनने की स्वतंत्रता होनी ही चाहिए. नक्सलवाद एक समस्या है. जो लोग इसे एक सामाजिक-आर्थिक समस्या मानते हैं उनके लिए ये छात्र देशभक्त हैं और जो लोग नक्सलवाद को देशद्रोह मानते हैं वो इन्हें देशद्रोही कहने के लिए स्वतंत्र हैं. लोगों को भारत में विचारधारा चुनने की आजादी है. विश्वविद्यालय के छात्र वैचारिक आदर्शवाद का आनंद नहीं लेंगे तो कौन लेगा? जेएनयू के ज्यादातर वामपंथी छात्र भी पढ़ाई के बाद प्रशासन और अन्य क्षेत्रों में जाते हैं या फिर यूरोप-अमेरिका जाकर जेएनयू का नाम रोशन करते हैं. इसलिए जेएनयू को देशद्रोहियों का अड्डा कहना उचित नहीं है.’
    जेएनयू के कुलपति सुधीर कुमार सोपोरी से एक बार एक साक्षात्कार में पूछा गया कि जेएनयू में खास क्या है? उनका जवाब था, ‘यहां का माहौल और खुली सोच इस विश्वविद्यालय की ताकत है. आपको कहने और सुनने की क्षमता मिलती है. यहां के शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच एक संबंध है. कई छोटी जगहों और पिछड़े तबके के छात्रों से मिलना बहुत भावुकता भरा होता है. कई छात्र कहते हैं कि जेएनयू नहीं होता तो हम पढ़ नहीं पाते. अगर शांति भंग न हो तो यहां आपको जो विचार-विमर्श करना है कीजिए. हमें कोई समस्या नहीं. हमें विभिन्न अनुशासनों की दीवारें तोड़नी होंगी, तभी नई धारणाएं सामने आएंगी और नई अकादमिक लहर बनेगी.’
    जेएनयू के बारे में वहां के छात्रों या शिक्षकों से अलग तमाम लोग ऐसे हैं जो वहां की आबो-हवा से बहुत प्रभावित रहते हैं और सिर्फ बहस-मुबाहसों का आनंद लेने के लिए वहां आते-जाते रहते हैं. जेएनयू पर दक्षिणपंथी हमले के बरअक्स साहित्यकार अशोक कुमार पांडेय कहते हैं, ‘जेएनयू एक आधुनिक और लोकतांत्रिक शैक्षणिक माहौल के सृजन का प्रतीक है. देश के बाकी सभी विश्वविद्यालयों से इतर यहां सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक चेतना को विकसित करने का जो प्रयास लगातार किया गया है उसका परिणाम है कि इस विश्वविद्यालय ने न केवल ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में मौलिक तथा जनपक्षधर योगदान दिया है बल्कि करियरिज्म से ग्रस्त हमारी शिक्षा व्यवस्था के समक्ष एक समावेशी तथा लोकतांत्रिक मॉडल भी विकसित किया है. जेएनयू का छात्र सही मामले में वैश्विक चेतना से लैस होता है तथा देश-दुनिया के उन सभी मामलों में हस्तक्षेप की कोशिश करता है जो सत्ता और नागरिकों के द्वंद्व से उपजते हैं. धर्मनिरपेक्षता, जाति और लैंगिक समानता का संवैधानिक मूल्य यहां की शिक्षा व्यवस्था में ही नहीं बल्कि रोजमर्रा के व्यवहार में भी गहरे समाए हुए हैं. यही वजह है कि संविधान विरोधी, कट्टरपंथी, पुरोगामी और असहिष्णु शक्तियों को जेएनयू से हमेशा ही समस्या रही है. उनके विनाशकारी मंसूबों के खिलाफ यह विश्वविद्यालय हमेशा एक चुनौती प्रस्तुत करता रहा है. शिक्षा के निजीकरण से लेकर जल, जंगल और जमीन की लूट के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाला संस्थान उन्हें कैसे पच सकता है? यह राष्ट्र का नहीं, बल्कि उस हिंदू राष्ट्र का विरोधी संस्थान है जिसमें संविधान के नाम पर मनुस्मृति लागू करने की घृणित मंशा छिपी हुई है.’
    इस साल सत्र की शुरुआत में भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का नाम बदल कर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नाम पर रखने की मांग की थी. इसी दौरान भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी का कहना था कि जेएनयू नक्सलियों, जेहादियों और राष्ट्र विरोधियों का अड्डा बन गया है. उन्हें यहां का उप-कुलपति बनाने की चर्चा चली तो उन्होंने कहा कि पहले जेएनयू कैंपस में एंटी नॉरकोटिक्स ब्यूरो और सीआईएसएफ कैंप लगाया जाना चाहिए. जेएनयू के पूर्व छात्र सुयश सुप्रभ कहते हैं, ‘हाल के वर्षों में जेएनयू में संघ का प्रभाव बढ़ा है. लेकिन उनकी राजनीति का तरीका अलग है. वे उपद्रव और आतंक के सहारे लोगों को भड़काने की राजनीति करते हैं. जेएनयू की परंपरा में बहुत सी चीजें कमजोर हुई हैं. लिंगदोह कमेटी के सहारे छात्र राजनीति को लगातार कमजोर किया जा रहा है. वे समाज का जैसा ढांचा चाहते हैं, उसी के अनुरूप राजनीति भी चाहते हैं. हम सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता की बात करते हैं तो इससे उन्हें परेशानी होती है.’
    भाजपा और संघ के जेएनयू विरोध पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के शोधार्थी आशीष मिश्र कहते हैं, ‘भाजपा सोच-विचार की हर संभावना को नष्ट करते हुए नागरिक को मात्र भीड़ बना देना चाहती है. इस प्रक्रिया में सबसे बड़े प्रतिरोधी हैं सोचने-समझने व तर्क करने वाले लोग. जो लोग अपने ही देश के मानक विश्वविद्यालय पर इस तरह की बातें कह रहे हैं उनके बारे में क्या कहा जा सकता है! जिस पवित्र स्थान पर पैर रखने से बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी डरते हैं, मूर्ख वहां धड़धड़ा के घुस जाता है.’
    जेएनयू में ही शोधछात्र और वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल इस विरोध के पीछे सवर्ण वर्चस्व की मानसिकता को रेखांकित करते हैं. वे कहते हैं, ‘जेएनयू का विरोध तमाम तरह से होता रहा है. लेकिन इस बार एक सत्ता प्रतिष्ठान की ओर से संगठित ढंग से यह हमला हुआ है, जो अपने आप में एक संदेश है. जेएनयू में रेडिकलिज्म पहले भी था, उससे उन्हें दिक्कत नहीं थी. अब इसमें सामाजिक विविधता भी जुड़ गई है. यह दोनों बातें एक साथ होना सत्ता प्रतिष्ठान को पसंद नहीं है. 2011 में पूरी तरह से आरक्षण लागू होने के बाद यहां पर लड़कियों और दलितों-पिछड़ों की भागीदारी खूब बढ़ गई है. वैसे भी दलित संगठनों का सामना करना दक्षिणपंथी संगठनों के लिए मुश्किल होता है क्योंकि वे सामाजिक न्याय का मसला उठाते हैं. इसकी जगह कोई मुस्लिम संगठन हो तो उनके लिए यह आसान हो जाता है. महिलाओं व दलितों की ज्यादा संख्या और रेडिकलिज्म का एक साथ होना उन्हें चुभता है, जबकि यह दोनों चीजें अलग-अलग और भी जगह हैं, लेकिन वहां पर विरोध नहीं होता.’
    जेएनयू पर एक आरोप यह भी लगता है कि यह भारतीय मूल्यों को नष्ट करने पर तुला है और यहां पढ़ने वाली लड़कियां स्वच्छंद होती हैं, या फिर उनको सामाजिक-पारिवारिक मूल्यों को तोड़ना सिखाया जाता है. उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से आकर यहां एमए कर रहीं अदिति मिश्रा किसी पार्टी या संगठन से जुड़ी नहीं हैं. वे कहती हैं, ‘एक लड़की के रूप में मुझे जेएनयू के कैंपस में जितनी आजादी मिली, उतनी और कहीं नहीं मिली. जेएनयू ही एक ऐसी जगह है, जहां पर कभी मुझे डर नहीं लगा. दिल्ली की सड़कों पर शाम सात-आठ बजे डर लगता है, लेकिन जेएनयू में रात के दो बजे भी डरने की जरूरत नहीं होती. मैं यहां पर आराम से रह सकती हूं, पढ़ती हूं, तो क्या मैं नक्सली या आतंकी हूं? जो आरोप लगा रहे हैं, उन्हें अपनी विचारधारा पर पुनर्विचार करना चाहिए कि लोग उन्हें क्यों नापसंद करते हैं.’
    आरएसएस के सपनों के भारत में परंपराओं के साथ-साथ सामाजिक बुराइयों का बड़ा मजबूत स्थान है. वे खुले तौर पर दलितों और महिलाओं के पक्ष को खारिज तो नहीं कर पाते, लेकिन मनुस्मृति पर आधारित शोषणकारी वर्ण व्यवस्था और गैर-लोकतांत्रिक पारिवारिक मूल्यों को भी बनाए रखना चाहते हैं. इसीलिए दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श से आरएसएस के लोग खासे असहज हो जाते हैं. पत्रकार अरविंद शेष कहते हैं, ‘आरएसएस जिस समाज की कल्पना करता है, वह जेएनयू जैसे परिसर में बहुत ठोस तरीके से ध्वस्त हो जाती है. यहां की वैचारिकी का पूरे देश में एक खास असर है. संघ का आरोप उनकी जेएनयू जैसे बौद्धिक परिसर के बरअक्स खड़ा होने की कोशिश है कि हम आरोप लगाएं और वहां के लोग हमसे बहस करें. वे अपने राजनीतिक विरोधियों को ही राष्ट्रद्रोही कहते हैं. जो इनके वैचारिक सामाजिक खांचे में फिट न बैठे, वह इनके लिए देशद्रोही हो जाता है.’
    यह भी एक तथ्य है कि देश भर के विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति को कमजोर किया गया है. जर्मनी के मीडिया संस्थान डायचे वेले में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार उज्ज्वल भट्टाचार्य ने बताया, ‘बीएचयू कैंपस में छात्रों का राजनीतिक विमर्श में भाग लेने व संगठन बनाने का अधिकार छीन लिया गया है. हम सबको याद है कि किस तरह छात्र संघ व शिक्षक संघ के पूर्व अध्यक्ष प्रो. आनंद कुमार को छात्रों के साथ बातचीत करने से रोक दिया गया था. लेकिन आरएसएस की गतिविधियां जारी हैं. परिसर में अन्य छात्र संगठनों की गतिविधियां तो प्रतिबंधित हैं, लेकिन एबीवीपी खुलेआम काम कर रही है. विश्वविद्यालय परिसरों का अराजनीतिकरण किया जा रहा है. इसकी एक वजह यह भी है कि शिक्षा के क्षेत्र को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के लिए खोला जाना है. विरोध और विमर्श की संस्कृति उसमें बाधा बन सकती है. पूरे देश में शैक्षणिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श के मंच के रूप में विश्वविद्यालयों की भूमिका को खत्म किया जा रहा है.’ अब सवाल उठता है कि क्या जेएनयू पर हमला इसी योजना की कड़ी है?
    जेएनयू छात्रसंघ में इस बार एबीवीपी के एक प्रत्याशी सौरभ शर्मा को भी ज्वाइंट सेक्रेटरी पद पर जीत हासिल हुई थी. उन्होंने कहा, ‘मैं पांचजन्य के आरोप से सहमत हूं. सब लोग यहां ऐसे नहीं हैं, लेकिन कुछ लोग हैं जो नक्सलवाद और देशद्रोही गतिविधियों के समर्थक हैं. जब दंतेवाड़ा में सुरक्षा बलों पर नक्सली हमला हुआ तो यहां पर खुशियां मनाई गईं. याकूब मेमन की फांसी पर उन्हें शहीद बताया गया और अब्दुल कलाम की मृत्यु पर उन्हें भला बुरा कहा गया. यहां के वामपंथी खास विचार की तरफ लोगों का ध्रुवीकरण करते हैं. वे महिषासुर दिवस मनाते हैं. आप रावण या महिषासुर की पूजा कीजिए, लेकिन वे लोग हिंदू देवी देवताओं को गालियां देते हैं. वामपंथी संगठन लोकतंत्र की बात करते हैं लेकिन जैसा स्पेस अपने लिए चाहते हैं, वैसा सबको क्यों नहीं देना चाहते? वे भारतीय संस्कृति का विरोध क्यों करते हैं? हम भी सबके लिए स्वतंत्रता चाहते हैं, लेकिन वे लोग जिस स्वतंत्रता की बात करते हैं, वह देश तोड़ने वाली है.’
    जेएनयू की छात्रा रह चुकीं साहित्यकार सुमन केशरी कहती हैं, ‘जेएनयू इस देश में एकमात्र ऐसा कैंपस है जहां पर लड़कियां सुरक्षित हैं. जेएनयू सही अर्थों में विश्वविद्यालय है जो विश्वदृष्टि देता है. वहां छात्रों में एक लोकतांत्रिक और समतामूलक दृष्टि विकसित होती है. वहां पढ़ने वाली लड़कियां सही अर्थों में अपने को मनुष्य मानती हैं, क्योंकि उनकी बहुत लोकतांत्रिक और चेतनासंपन्न ट्रेनिंग होती है. जेएनयू में ऐसा खुला वातावरण है कि वे अन्याय के खिलाफ खड़ी हो पाती हैं. अब इस बात से जिन्हें लगता है कि संस्कृति टूट जाएगी, यह उनकी और संस्कृति की समस्या है. किसी परिवार में अगर हर सदस्य लोकतांत्रिक और स्वतंत्रचेत्ता सोच का हो, तो इससे तो परिवार और मजबूत व लोकतांत्रिक होंगे. बाकी कैंपसों में जेएनयू जैसा खुलापन और वैचारिक माहौल क्याें नहीं है.’
    गुजरात विश्वविद्यालय में पीएचडी के छात्र अर्श संतोष लिखते हैं, ‘विश्वविद्यालयी शिक्षा और शोध के हवाले से विश्व-स्तर पर जो थोड़ी-बहुत पहचान भारत की बनी थी वह जेएनयू के कारण ही थी. इसीलिए आरएसएस खेमे को वह देशद्रोहियों का अड्डा लगता है. हालांकि सच यह है कि केवल जेएनयू ही नहीं, हर वह विश्वविद्यालय जहां दलित, अल्पसंख्यक और आदिवासी छात्र पढ़ते हैं, वह इन्हें देशद्रोहियों का ही अड्डा लगता है. इन्हें वैज्ञानिक, तर्क आधारित शिक्षा ही राष्ट्रद्रोही लगती है. पढ़ाई-लिखाई का माहौल देखकर ही इन्हें परेशानी होने लगती है.’