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‘दर्द-ए-दिल है तो भी पहले पेट दर्द को तवज्जो दें’

चिकित्सा विज्ञान में पेट को ‘जादू का बक्सा’ माना जाता है. ऊपर से कुछ भी न दिखे या समझे और अंदर से न मालूम क्या निकल जाए! अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, एमआरआई, एंडोस्कोपी आदि दसों अत्यंत आधुनिक समझे जाने वाले टेस्ट भी पेट के मामले में कुछ हद तक ही मदद कर पाते हैं. आज भी यही सच है कि बीमारी को पकड़ने के लिए तीन ही बातें मदद करती हैं.

डॉक्टर, मरीज को अपनी पूरी ‘हिस्टरी’ बताने का पर्याप्त समय दे, डॉ जाने कि मरीज द्वारा बताए गए लक्षण तथा बीमारी का सिलसिलेवार ब्योरा ही बीमारी की तरफ इंगित करेगा तथा डॉ. सावधानीपूर्वक न केवल मरीज के पेट को हाथ लगाकर जांच करे वरन अपनी जांच के अंत में गुदाद्वार की जांच, औरतों का गायनी चेकअप तथा आदमियों की टेस्टीज (अंडकोष) की जांच भी अवश्य करे. परेशानी यह है कि डॉ. प्राय: इतना समय देते ही नहीं. हवा कुछ ऐसी चली है कि पहले अल्ट्रासाउंड वगैरह कराके आओ फिर हम बताते हैं. फिर मरीजों की तरफ से यह कोताही आम है कि पेट की तकलीफ पर वह शुरुआत में तो ध्यान ही नहीं देता. स्वयं ही मान लेता है कि  कल रात खाने में ऐसा हो गया था या परसों रात देर से खाना खाया था –इसी से यह सब हो रहा होगा. फिर भी ठीक न हो तो कुछ दिनों तक घरेलू उपचार होता रहता है. इसके बाद भी आराम न मिले तो ही वह डॉ के पास जाने की सोचता है. फिर दस-बारह दिन वह सोचता है कि दिखाएं किसे? फिर डॉक्टरी जांचें. फिर रिपोर्टों के लिए भटकना. फिर रिपोर्टों का मोटा बंडल बन जाना और फिर भी कहीं नहीं पहुंच पाना. पेट की बहुत-सी तकलीफें हैं. एक संवेदनशील डॉक्टर मरीज से बात करके और उसके पेट की जांच करके ही सटीक निदान खोज सकता है.

इसमें डॉक्टर के अलावा मरीज की समझदारी का भी उतना ही महत्वपूर्ण रोल है. मैं आज पेट दर्द के बारे में आपकी समझदारी बढ़ाने की कोशिश करूंगा.  बाकी आप वैसे भी खासे समझदार हैं. और डर भी इसी बात का है कि कहीं आपकी यही समझदारी आपकी समझदारी बढ़ाने में आड़े न आए. बहरहाल! जमाने में हल्ला दिल के दर्द का है लेकिन  पेट का दर्द भी कम नहीं. जिसको होता है वही जानता है. बल्कि यूं कह लें कि प्राय: तो वह भी नहीं जानता कि पेट दर्द किसी गंभीर जानलेवा बीमारी का संकेत भी हो सकता है. तेज पेट दर्द हो, अचानक ही हो जाए तब तो आदमी भागकर डॉक्टर के पास जाता ही है. कठिनाई तो हल्के-हल्के पेट दर्द में होती है या ऐसा तेज दर्द हो जाने के बाद हल्का हो गया हो.

दोनों ही स्थितियों में आदमी सोचता है कि कुछ दिनों में अपने आप ही ठीक हो जाएगा. वह पेट दर्द के अपने आप ठीक हो जाने की प्रतीक्षा करता है. वह इस बात की चिंता नहीं करता कि यह पेट दर्द हुआ क्यों? स्वयं का मनबहलावन कयास लगाकर संतुष्ट हो जाता है. खाने में कुछ गड़बड़ हुआ होगा, पत्नी से कितनी बार कहा है पर खाने में वह इतने मसाले डालती है कि ठुकाई करने का मन करता है, गैस की समस्या है साली, शहर की पानी सप्लाई ही ठीक नहीं है वगैरह. दिल को बहलाने को फिर भी जो ख्याल गालिब को आ जाए, वही अच्छा लगता है. याद रहे कि पेट के अंदर इतना सारा अल्लम-गल्लम ईश्वर ने भर रखा है कि दर्द कहां से उठ रहा है वह पता करना डॉक्टर के लिए भी कठिन है. फिर पेट ही क्यों? पेट का दर्द तो छाती, मेरुदंड (स्पाइन), अंडकोष, नर्व की नसों, पेट, पीठ या आसपास की अन्य मांसपेशियों में हो रही बीमारी से भी हो सकता है. बड़ा-सा निमोनिया, नीचे की तरफ (डायफ्राम में) होने वाली प्लूरिसी, पेट की मांसपेशियों में खून का थक्का(क्लॉट) या इन्फेक्शन, मेरुदंड की टीबी या उसमें बैठ गया कैंसर. ये बीमारियां भी पेट दर्द कर सकती हैं. बीमारी पेट से बाहर है लेकिन दर्द पेट में हो रहा है. तो हल्का-हल्का दर्द भी हो तो डॉक्टर से सलाह लेना ही उचित होगा.

पेट दर्द तब और भी ध्यान मांगता है जब पेट दर्द के साथ निम्नांकित में से कुछ भी साथ-साथ हो रहा हो:

  • पेट दर्द है और वजन भी गिर रहा है
  • पेट दर्द है और भूख कम या खत्म ही हो गई है
  • पेट दर्द और बुखार भी रहता है
  • पेट का दर्द है और पीठ की तरफ या पीछे (आगे) जांघों की तरफ जाता है
  • पेट दर्द है और खाना खाने से एकदम कम हो जाता है या बढ़ जाता है
  • पेट दर्द है और पेट दबाने से और भी बढ़ जाता है
  • पेट दर्द है और खांसने, करवट लेने, तेज सांस खींचने से बढ़ जाता है
  • पेट दर्द और माहवारी चढ़ गई है
  • पेट दर्द और कमजोरी लगती है
  • पेट दर्द और टट्टी काली आती है
  • पेट दर्द है और टट्टी में ताजा (लाल) खून दिखा था थोड़ा-सा भी दिखा था तो भी बेहद महत्वपूर्ण है
  • पेट दर्द है और आजकल या तो बहुत दिनों से कब्जियत रहने लगी है या कभी कब्जी और कभी दस्त! जैसी पहले होती थी, वैसी हाजत अब नहीं होती.
  • पेट दर्द है, हाथ-पांव ठंडे हो रहे हैं और सांस भी फूल सी रही है.
  • पेट दर्द है और हाथ-पांव से ठंडा पसीना आ रहा ह पेट दर्द होता है लेकिन उल्टी हो जाए तो ठीक हो जाता है

ऐसे ही अनेक तरह के पेट दर्द हो सकते हैं जो एक सक्षम डॉक्टर ही समझ सकता है. तो पेट दर्द हो रहा हो और उपर्युक्त तरह का हो तो कतई नजरअंदाज न करें. तुरंत डॉक्टर को दिखाएं. पर याद रखें कि डॉक्टर को पूरी हिस्ट्री स्पष्ट तौर पर विस्तार से दें. वह न पूछे, तब भी उसे उपरोक्त बातें अवश्य बताएं. दर्द थोड़ा-थोड़ा ही था लेकिन कब से था? खाना खाने से घटता है कि बढ़ता है, सांस लेने-खांसने-झुकने-दबाने से दर्द बढ़ता तो नहीं, भूख कैसी है, वजन तो नहीं गिर रहा-आदि बातें स्वयं ही बता दें. लिखकर हो जाए तो और बेहतर. डॉक्टर जितना आपसे पेट दर्द के बारे में पूछेगा, उतना ही बीमारी को समझ पाएगा. ऐसा डॉक्टर पकड़ें जो आपकी सुने. जांचों का नंबर तो बहुत बाद में आता है. तो एक ही संदेश कि हल्के पेट दर्द को गंभीरता से लें.

ऊपर से देखने में अच्छा दिखता है . . .

‘वहां से अपना देश कैसा दिख रहा है?’ प्रधानमंत्री ने पूछा. ‘ठीक-ठाक ही दिख रहा है.’ अंतरिक्ष यात्री ने ठंडी प्रतिक्रिया दी. प्रधानमंत्री निराश होकर बोले, ‘मैं जानना चाहता हूं कि अंतरिक्ष से हमारा देश कैसा लगता है.’ अंतरिक्ष यात्री बोला, ‘सर, यह भी कोई बताने की बात है.’ अंतरिक्ष यात्री का जवाब सुन प्रधानमंत्री कुछ सोच में पड़ गए. कुछ सोचकर बोले, ‘ यह बताएं कि वहां से अपना देश कैसा लगता है.’  ‘सर, ऊपर से देखने में अपना देश अच्छा दिखता है.’ वहां खडे़ उनके सहयोगियों और वैज्ञानिकों ने अपना सिर हिलाया. यह देखकर प्रधानमंत्री उत्साह के अतिरेक में वह पूछ बैठे जो उन्हें नहीं पूछना चाहिए था.  ‘खुल कर बताइए वहां से क्या-क्या दिख रहा है.’  ‘सर कई लोग बैठ हुए दिख रहे हैं.’ ‘नाइस! कहां पर बैठे हुए हैं ?’ ‘सर वे रेलवे पटरी के किनारे बैठे हुए हैं.’ ‘क्या कोई धरना-प्रदर्शन हो रहा है?’ ‘नहीं सर’. प्रधानमंत्री और उनकी टोली ने राहत की सांस ली. ‘सर, वे लोग रेल पटरी के किनारे नित्त्यकर्म से निवृत्त हो रहे हैं.’ ‘हाऊ डिसगस्टिंग! हाऊ शेमफुल.’  प्रधानमंत्री का मूड कुछ उखड़-सा गया. तभी टोली में से एक सदस्य जो भारतीय प्रशासनिक अधिकारी था, ने

प्रधानमंत्री के कान में कुछ कहा. प्रधानमंत्री अंतरिक्ष यात्री से बोले, ‘तुम जहां देख रहे हो, वहां मत देखो! देखने का अपना कोण बदल लो.’ ‘जी सर, बदल दिया.’ ‘अब क्या दिख रहा?’ प्रधानमंत्री बोले. ‘सर, एक बहुत रोमांचकारी दृश्य दिख रहा है. यह सुन कर प्रधानमंत्री का मन खिल-सा गया. ‘सर एक नवविवाहिता ससुराल जाने से मना कर रही है.’ प्रधानमंत्री कुछ सोचने के बाद बोले, ‘डाउरी का प्रोटेस्ट कर रही है। ब्रेव गर्ल.’ ‘नहीं सर, वह कह रही है कि उसके ससुराल में शौचालय नहीं है, इसलिए वह वहां नहीं जाएगी.’ प्रधानमंत्री ने टोली की तरफ देखा और टोली ने उनकी तरफ. ‘सर, लड़कियों का एक स्कूल दिख रहा है…’ प्रधानमंत्री को न जाने क्या सूझी और बोल बैठे, ‘स्कूल वाली हमारी योजना दिख रही है कि नहीं!’ ‘माफ कीजिएगा सर, स्पष्ट नहीं देख पा रहा हूं. सर, एक गजब की बात देख रहा हूं.’ प्रधानमंत्री को कुछ रोमांच का अनुभव हुआ. ‘क्या!’ ‘कमाल है सर, लड़कियों के स्कूल में कोई शौचालय ही नहीं है!’ प्रधानमंत्री का मन अब बात करने का बिल्कुल न था. वे अनमने मन से बोले, ‘चांद कैसा दिख रहा है?’ ‘चांद से लाख गुना खूबसूरत अपनी पृथ्वी है, सर.’ ‘मगर यहां से तो चांद खूबसूरत दिखता है.’ ‘सब दूरियों का कमाल है, सर.’ ‘तब तो अपना देश भी खूबसूरत दिख रहा होगा!’ ‘हां सर, जैसा पहले आपसे कहा कि ऊपर से सब अच्छा दिखता है.’ ‘तो क्या देख रहे हो तुम?’ ‘सर मुझे लाखों लोग मैला उठाते हुए जाते दिख रहे हैं.’ प्रधानमंत्री बोले, ‘कहां जा रहे हैं सब?’ ‘सर, सब के सब मैला फेंकने जा रहे हैं.’ अब प्रधानमंत्री के लिए असहनीय था. वे कडे़ स्वर में बोले, ‘तुम अंतरिक्ष यात्री हो या कोई व्यंग्यकार !’ तभी वार्ता का क्रम टूट गया. जहां वार्ता का क्रम टूटा, वहीं प्रधानमंत्री और अंतरिक्ष यात्री के वार्तालाप को ‘संपूर्ण’ घोषित किया गया.

वार्ता के अगले दिन प्रधानमंत्री ने आनन-फानन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई. वे ऐसा कदापि न करते यदि उनकी और अंतरिक्षयात्री के बीच हुई वार्तालाप को पूरे देश ने लाइव न देखा होता. कांफ्रेस में प्रधानमंत्री ने अंतरिक्ष यात्री द्वारा जो कुछ बताया गया था, उसे और अंतरिक्ष यात्री का झूठा सिद्ध कर दिया. उन्होंने कहा, ‘जब हमें यहां रहकर भी यह सब नहीं दिखता, तो लाखों-करोड़ों मील दूर से वह अंतरिक्ष यात्री यह सब भला कैसे देख सकता है.’
-अनूप मणि त्रिपाठी

मुश्किल में परिवार

आजाद भारत पर सबसे अधिक राज गांधी-नेहरू परिवार ने किया है. मोतीलाल नेहरू इस परिवार के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने राजनीति में कदम रखा था. उनके बेटे जवाहरलाल नेहरू ने उनकी परंपरा को आगे बढ़ाया और आजादी के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. जब देश आजाद हुआ तो नेहरू इस देश के पहले प्रधानमंत्री बने. इस परिवार की राजनीतिक परंपरा को आगे बढ़ाने का काम उनके बाद इंदिरा गांधी, संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने किया. बोफोर्स घोटाले में राजीव गांधी पर लगे आरोपों के अलावा इस परिवार पर भ्रष्टाचार का और कोई सीधा आरोप नहीं लगा. लेकिन बीते दिनों जब इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने सोनिया गांधी के दामाद और प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए तो एक तरह से पूरा गांधी परिवार भी सवालों के घेरे में आ गया. रॉबर्ट कोई ऐसे-वैसे कारोबारी नहीं हैं. यह उनकी पहचान भी नहीं है. उन्हें तो लोग देश के प्रथम राजनीतिक परिवार के दामाद के तौर पर ही जानते हैं. इसलिए आरोप लग रहे हैं कि विभिन्न प्रदेशों की सरकारों ने वाड्रा को फायदा पहुंचाने और उनसे जुड़ी कुछ गड़बड़ियों को छिपाने के लिए के लिए जो संभव हो सकता था, किया.

जमीन के खेल में गड़बड़ी के सीधे आरोप कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी पर भी लग रहे हैं. कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि वाड्रा विवाद से भारतीय राजनीति में गांधी परिवार की चमक फीकी पड़ने की प्रक्रिया को गति मिल गई है क्योंकि वाड्रा का मामला ऐसा नहीं है जो कुछ दिनों में खत्म हो जाए. गांधी परिवार और कांग्रेस पर हमला करने के लिए विपक्षी दल इसका इस्तेमाल अपनी सुविधा के अनुसार करते रहेंगे. यह एक तथ्य है कि आज गांधी परिवार के तीनों स्तंभ मुश्किल में हैं. सोनिया गांधी बीमार हैं. उनकी बीमारी को खुद उनके परिवार और पार्टी ने रहस्य बना रखा है. कई पत्र-पत्रिकाओं में यह प्रकाशित हुआ है कि अमेरिका के जिस अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है वह कैंसर की चिकित्सा करने वाला अस्पताल है. लेकिन न तो परिवार ने और न ही पार्टी ने इस रहस्य पर से पर्दा हटाया है. ऐसे में वे कब तक और कितनी सक्रिय रहेंगी, इसे लेकर जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं. जानकारों के मुताबिक राहुल गांधी न सिर्फ चुनावी राजनीति में बल्कि हर मोर्चे पर नाकाम रहे हैं. पूरा जोर लगाने के बावजूद राहुल गांधी का जादू उत्तर प्रदेश और उससे पहले बिहार में नहीं चल पाया. उन्हें वहां के लोगों ने खारिज कर दिया. सरकार में जिम्मेदारी लेने को लेकर उनका बार-बार कतराना भी उनकी क्षमताओं पर सवाल खड़े कर रहा है. उत्तर प्रदेश चुनावों से पहले तक कांग्रेस के ‘ट्रंप कार्ड’ के तौर पर पेश की जा रही प्रियंका गांधी न सिर्फ रायबरेली और अमेठी में नाकाम रही हैं बल्कि अपने पति रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ लग रहे नए-नए आरोपों की वजह से सवालों के घेरे में हैं. वाड्रा का मामला ऐसा है कि चाहकर भी प्रियंका इससे पीछा नहीं छुड़ा सकतीं. राजनीति में आने पर ना-ना की औपचारिकता

निभाने वाली प्रियंका ने भी अब तक कुछ ऐसा नहीं किया जिससे लगे कि उनके पास देश को लेकर कोई सपना है.
ऐसे में अब कुछ लोग यह सवाल उठाने लगे हैं कि क्या भारतीय लोकतंत्र के इस राजपरिवार का सूरज अस्त हो चला है? क्या कांग्रेस को बार-बार संजीवनी देकर चलायमान रखने वाले परिवार को आज खुद ही किसी संजीवनी की जरूरत है? या फिर 90 के दशक में उठ रहे ऐसे ही सवालों के बीच सोनिया गांधी ने जिस तरह से परिवार की वापसी कराई थी, जिस तरह से इमरजेंसी के बाद बिलकुल हाशिए पर चली जाने वाली इंदिरा गांधी सिर्फ दो साल में ही बेहद मजबूत होकर उभरी थीं, क्या वैसा ही कुछ होने वाला है. इन सवालों के जवाब में देश की राजनीति का भविष्य छिपा हुआ है. इन्हें समझने के लिए जरूरी है कि गांधी परिवार के तीनों वर्तमान स्तंभों की सियासत को बारी-बारी से जाना जाए.

सोनिया गांधी

तारीख 14 मार्च, 2008. स्थान सोनिया गांधी का सरकारी निवास यानी 10 जनपथ. मौका था सोनिया गांधी के सक्रिय राजनीति में आने के दस साल पूरे होने का. 1998 में जब सोनिया गांधी को कांग्रेस में सक्रिय करने के लिए काफी मान-मनौव्वल के बाद पार्टी के कुछ नेताओं ने राजी किया था तो इटली में जन्मी सोनिया के मन में भी अपने भविष्य को लेकर संदेह रहे होंगे. लेकिन राजनीति में आने के छह साल के अंदर देश ने उन्हें प्रधानमंत्री बनने का अवसर दिया जिसे उन्होंने ठुकराया. कांग्रेस ने जहां इसे त्याग बताकर प्रचारित किया तो विपक्ष ने इसे विदेशी मूल के मुद्दे का दबाव बताया. जिस दिन सोनिया गांधी के राजनीति में सक्रिय होने के दस साल पूरे हुए उस दिन उन्हें बधाई देने की औपचारिकता निभाने के लिए उनके आवास पर न सिर्फ कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की होड़ दिखी बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री भी वहां पहुंचे. 2004 में खुद कुर्सी छोड़कर सोनिया गांधी ने ही मनमोहन सिंह को देश का प्रधानमंत्री बनाया था. सरकार में किसी पद पर रहे बगैर अगर किसी नेता को बधाई देने के लिए अगर प्रधानमंत्री पहुंचते हैं तो इससे उसके प्रभाव का अंदाजा लगाया जा सकता है.

लेकिन आज सोनिया गांधी कई मोर्चे पर संघर्ष करती हुई दिख रही हैं. इनमें सबसे पहली बात उनकी सेहत की. पिछले साल जब सोनिया गांधी अपना इलाज कराने के लिए अचानक अमेरिका गईं तो उन्होंने कांग्रेस के संचालन के लिए चार लोगों की एक समिति बनाई. इसके बाद सोनिया गांधी की बीमारी को लेकर तरह-तरह की बातें चलीं. पार्टी ने इसे सोनिया गांधी का निजी मामला बताते हुए इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी. दुनिया की चर्चित पत्रिका ‘इकोनॉमिस्ट’ ने अपनी एक रिपोर्ट में यह बताया कि सोनिया गांधी जिस अस्पताल में इलाज करा रही हैं, वहां कैंसर का इलाज होता है. इस अस्पताल का नाम है- स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर. फिर भी न तो पार्टी ने कुछ कहा और न ही गांधी परिवार ने. सियासी गलियारों में यह बात भी चली कि अब सोनिया गांधी उस तरह से सक्रिय नहीं हो पाएंगी जिस तरह से वे पहले थीं. उनकी बीमारी को लेकर न सिर्फ बाहर बल्कि पार्टी में भी भ्रम बना हुआ है.

दो राज्यों में कांग्रेस के प्रभारी की भूमिका निभा रहे एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कहते हैं, ‘अनिश्चय के बावजूद सोनिया जी की उपस्थिति भर से पार्टी के लोगों को उत्साह मिलता है. पार्टी में कोई भी लाख दावे करे लेकिन अब भी सबसे अधिक अपील सोनिया जी या उनके बच्चों की ही है.’ वे आगे कहते हैं, ‘उनकी मुश्किल सिर्फ सेहत के स्तर पर ही नहीं हैं. उनके लिए चिंता की सबसे बड़ी वजह राहुल गांधी की नाकामी है. तमाम कोशिशों के बावजूद राहुल अब तक अपना प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहे हैं. पहले जहां सिर्फ सोनिया गांधी को पार्टी चलाने की चिंता करनी होती थी वहीं अब उन्हें सरकार को टिकाए रखने के काम भी शामिल होना पड़ रहा है. जब तक प्रणब मुखर्जी सरकार में थे तब तक सहयोगियों की शिकायतों को सुलझाने और उनके साथ सुलह-सफाई के काम से सोनिया मुक्त थीं.’

सोनिया गांधी की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं बल्कि उनकी अगुवाई वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) का प्रदर्शन भी सवालों के घेरे में है. संप्रग की पहली सरकार में रोजगार गारंटी योजना और सूचना का अधिकार लागू करवाने का श्रेय एनएसी को गया था. इसे सरकार के बजाए सोनिया गांधी की निजी सफलता कहकर प्रचारित किया गया था. लेकिन संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान इस समिति ने ऐसा कोई काम नहीं किया है. ऐसे में अब एनएसी की प्रासंगिकता को लेकर भी सवाल खड़े रहे हैं. एनएसी पर सवाल उठने का मतलब यह भी निकलता है कि सोनिया गांधी का प्रदर्शन भी सवालों के घेरे में है. क्योंकि सोनिया गांधी सरकार में मंत्री नहीं हैं और उनके पास पार्टी अध्यक्ष के अलावा यही एक सार्वजनिकजिम्मेदारी है.

बतौर पार्टी अध्यक्ष भी सोनिया गांधी का प्रदर्शन पिछले दो-तीन साल में ऐसा नहीं रहा जिसे उत्साहजनक कहा जा सके. विधानसभा चुनावों में पार्टी को लगातार हार का सामना करना पड़ा. राष्ट्रीय स्तर पर भी देखा जाए तो पार्टी नया नेतृत्व उभारने में नाकामयाब रही. पार्टी और सरकार के शीर्ष पद के लिए तैयार किए जा रहे राहुल गांधी नाकाम साबित हो रहे हैं. पार्टी के प्रतिनिधित्व के मामले में अब भी वही पुराने चेहरे गिनाए जा रहे हैं. पार्टी में जो नए लोग उभरे उनमें भी अधिकांश नेता राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवारों से हैं. बतौर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी  ने उस आम आदमी  को पार्टी में स्थापित नहीं किया जिसके साथ वे कांग्रेस के हाथ  के होने का दावा करती हैं. लेकिन इन सबके बावजूद पार्टी में सोनिया गांधी के नेतृत्व को लेकर कोई सवाल उठने की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखती. कांग्रेस और सरकार में अहम पदों पर रहे मणिशंकर अय्यर कहते हैं, ‘गांधी परिवार कांग्रेस को जोड़े रखने का काम करता है. जैसे ही पार्टी से परिवार की दूरी  बढ़ेगी . वैसे ही पार्टी का बिखरना भी शुरू हो जाएगा.’

2009 के बाद से कांग्रेस की अगुवाई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की सरकार लगातार विवादों में है. कुछ महीने गुजरते नहीं कि कोई न कोई बड़ा घोटाला सामने आ जाता है. केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंत्रियों को इस्तीफा तक देना पड़ा है. अब भी विपक्ष कुछ मंत्रियों के इस्तीफे की मांग लगातार कर रहा है. जाहिर है कि जब सरकार के किसी अच्छे काम का श्रेय सोनिया गांधी को मिलता है तो फिर सरकार की नाकामी को भी लोग उनसे ही जोड़कर देखेंगे. संप्रग सरकार में भ्रष्टाचार नहीं रोक पाने को कई जानकार सोनिया गांधी की नाकामी भी बताते हैं. ताजा मामला रॉबर्ट वाड्रा का है. वाड्रा सोनिया गांधी के दामाद हैं और उन पर एक कांग्रेस शासित प्रदेश में वहां की एक ऐसी सरकार के समर्थन से गड़बडि़यां करने के आरोप हैं जिसके मुखिया की कुर्सी का भविष्य गांधी परिवार के हाथ में है.

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस वर्मा का मानना है कि सत्तासीन लोगों को प्रभावित कर सकने की क्षमता रखने वाले हर व्यक्ति को हर तरह के शक-शुबहे से परे होना चाहिए. मगर वाड्रा शक के घने कोहरे में हैं जिसके छींटे गांधी परिवार तक पर पड़ रहे हैं.
 कई लोग मानते हैं कि आज सोनिया जिन मुश्किलों से घिर गई हैं उनके लिए उनके गलत राजनीतिक फैसले जिम्मेदार हैं. इस बारे में विकिलीक्स के 2007 के एक केबल में कहा गया, ‘सोनिया गांधी अवसर गंवाने का कोई भी मौका नहीं छोड़तीं.’ सोनिया के सलाहकारों को लेकर भी कई तरह के सवाल उठते हैं. गुजरात के अहमद पटेल सोनिया के राजनीतिक सलाहकार हैं. जनार्दन द्विवेदी और एके एंटोनी को भी उनके करीब माना जाता है. लेकिन सोनिया गांधी की जीवनी लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई कहते हैं, ‘वे चैन से रहना पसंद करती हैं. भले ही लोग कुछ कहें लेकिन अब भी उनके सबसे करीबी सलाहकारों में राहुल और प्रियंका प्रमुख हैं.’ इसका मतलब यह कि अवसर गंवाने के लिए सोनिया अकेले जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि राजनीतिक अवसर को पहचानने में राहुल और प्रियंका भी अपरिपक्व हैं.

राहुल गांधी

रॉबर्ट वाड्रा का मामला उजागर होने के बाद राहुल गांधी पर भी आरोप लगा कि उन्होंने भी पलवल में औने-पौने दामों में जमीन खरीदी. हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे ओमप्रकाश चौटाला ने बाकायदा प्रेस वार्ता करके राहुल पर आरोप लगाया. कहा गया कि उन्होंने 2008 में पलवल में डेढ़ लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से साढ़े छह एकड़ जमीन खरीदी जबकि उस जमीन की सरकारी दर आठ लाख रुपये प्रति एकड़ थी. हालांकि ऐसा करना किसी अपराध की श्रेणी में नहीं आता लेकिन जब वाड्रा पर कई तरह के जमीन आदि से संबंधित आरोप हों तब उनके साथ ही राहुल का जमीन खरीदना चौटाला सरीखे कई लोगों को उनके खिलाफ बोलने का मौका दे देता है.

कांग्रेस और सरकार में अहम पदों पर रहे मणिशंकर अय्यर एक घटना बताते हैं, ‘1989 की बात है. राजीव गांधी के साथ मैं भी दक्षिण भारत में चुनाव प्रचार कर रहा था. अक्सर रात को देर हो जाती थी पर अगले दिन सुबह तीन-चार बजे ही आगे की सभाओं की तैयारी के लिए उठना पड़ता था. हमारे साथ राहुल गांधी भी थे. उस वक्त वे काफी कम उम्र के थे. राहुल ने देखा कि कैसे उनके पिता को ठीक से सोने का वक्त नहीं मिलता. यह सब देखकर एक दिन राहुल ने राजीव गांधी से कहा – वे दिन बहुत अच्छे थे जब आप इंडियन एयरलाइंस के पायलट थे और आप राजनीति में शामिल नहीं थे. राहुल ने अपने पिता से कहा कि हमें फिर से उसी जिंदगी में लौट जाना चाहिए. जवाब में राजीव गांधी ने राहुल से कहा कि अब मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि अब मुझे देश की जनता पर भरोसा है, इसलिए लौटने का सवाल ही नहीं उठता. राजनीति में राहुल गांधी की सक्रियता की वजह भी यही है कि जिस तरह से राजीव गांधी को देश के लोगों पर भरोसा था उसी तरह का भरोसा राहुल को भी है.’

लेकिन पिछले दस साल की राहुल गांधी की राजनीतिक सक्रियता को देखते हुए यह सवाल उठता है कि राहुल को तो लोगों पर भरोसा है लेकिन क्या लोगों को भी राहुल पर भरोसा है. कहने की जरूरत नहीं कि चुनावी राजनीति बहुत निर्मम होती है. यह कभी किसी को सर-माथे बैठाती है तो अगले ही चुनावों में उसे पूरी तरह से धराशयी भी कर देती है. इसलिए अगर चुनावी राजनीति के पैमाने पर कांग्रेस के युवराज को कसें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उनका अब तक का प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा है. राहुल ने अपनी चुनावी नाकामी की सबसे बड़ी कहानी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में लिखी. तमाम दांव-पेंच के बावजूद वे कांग्रेस की सीटों का आंकड़ा 22 से बढ़ाकर 28 पर ही ले जा पाए. दूसरे राज्यों में भी ऐसा ही हाल रहा. बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान भी राहुल ने जमकर प्रचार किया था लेकिन कांग्रेस नौ सीटों से घटकर चार पर ही सिमट गई.

राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में नए राजनीतिक प्रयोगों की बात कर रहे थे. लेकिन उनकी कथनी और करनी का फर्क कुछ लोगों को इस बात में नजर आया कि उन्होंने न सिर्फ दूसरे दलों से खारिज किए गए असंतुष्टों को टिकट दिया बल्कि ज्ञान आयोग के अध्यक्ष सैम पित्रोदा का परिचय बढ़ई और विश्वकर्मा के रूप में कानपुर की एक जनसभा में कराया. इस तरह से उन्होंने ‘नई’ की बजाय जात-जमात की ही राजनीति का लाभ लेने की कोशिश की. इससे ऐसे लोगों को काफी निराशा हुई जो राहुल से यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि वे राजनीति को बदलने में अहम भूमिका निभा सकते हैं. राहुल ने उत्तर प्रदेश में अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था. उन्होंने चुनाव से तकरीबन ढाई साल पहले से प्रदेश के अलग-अलग इलाकों का दौरा करना शुरू कर दिया था. उनकी सभाओं में भीड़ भी उमड़ती थी. इसी भीड़ को देखकर न सिर्फ कांग्रेस के रणनीतिकार मुगालते में रहे बल्कि कहीं न कहीं राहुल को भी भ्रम रहा होगा. लेकिन नतीजों ने उनका भ्रम तोड़ दिया और यह संकेत दे दिया कि भले ही कांग्रेस को गांधी परिवार के युवराज से काफी उम्मीदें हों लेकिन आम लोगों में युवराज उम्मीद जगाने में नाकाम रहे हैं.

बतौर सांसद उन्होंने आठ साल से अधिक का वक्त गुजारा है. लेकिन अब तक संसद में कोई ऐसी बात नहीं कही है जिससे लगे कि उनके पास देश के भविष्य को लेकर कोई योजना है. लोकपाल के मसले पर जब काफी हो-हल्ला हुआ और उनकी चुप्पी पर हर तरफ से सवाल खड़े किए जाने लगे तो उन्होंने जो लिखा हुआ भाषण लोकसभा में पढ़ा उसमें भी ऐसा कुछ नहीं था जिसके आधार पर उनमें कोई बड़ी संभावनाएं तलाशी जाए. उन्होंने लोकसभा के अपने भाषण को ‘गेमचेंजर’ बताया था और अपने भाषण में लोकपाल को संवैधानिक संस्था का दर्जा देने की बात की थी. लेकिन आज उन्हीं की सरकार लोकपाल को लेकर हीलाहवाली कर रही है. लोकपाल को शक्तियां देने के मामले पर सरकार अक्सर आना-कानी करते दिखती है.

राहुल गांधी की नाकामी यहीं नहीं थमती. जब उन्होंने युवा कांग्रेस की बागडोर संभाली थी तो इसे लोकतांत्रिक बनाने की बात कही थी. लेकिन उनकी यह योजना भी बुरी तरह नाकाम रही. युवा कांग्रेस के चुनावों में धांधली की कई खबरें मीडिया में आईं. वहां अब भी वही चुनावी प्रक्रिया काम कर रही है जो राहुल गांधी के आने से पहले कर रही थी. युवा कांग्रेस के चुनावों में जीत हासिल करने के मकसद से राहुल गांधी के पर्यवेक्षक के अपहरण की एक घटना भी सामने आ चुकी है. राहुल गांधी की एक बड़ी नाकामी यह भी है कि उन्होंने युवा नेतृत्व के नाम पर पार्टी में जिन लोगों को तवज्जो दी उनमें से ज्यादातर सियासी घरानों के नेता हैं. कहने को तो राहुल यह कहते रहे कि वे कांग्रेस को देश के आम युवाओं से जोड़ना चाहते हैं लेकिन जब पार्टी में कोई ओहदा देने या चुनाव लड़ाने की बात आई तो वे घरानों के

दायरे से बाहर नहीं निकल पाए. अपने गैरजिम्मेदाराना बयानों को लेकर भी राहुल गांधी लगातार विवादों में रहे हैं.
राहुल की नाकामी की एक बड़ी वजह उनकी सलाहकारों की मंडली भी है. भले ही वे अपने सूबे में पूरी तरह से असफल हों मगर दिग्विजय सिंह को सोनिया गांधी ने राहुल की राजनीति को चमकाने के काम पर उत्तर प्रदेश में लगा दिया. लेकिन दिग्विजय यहां भी कामयाब नहीं हुए. उल्टे उनकी सलाह पर भरोसा करने वाले राहुल गांधी की क्षमता पर भी सवाल उठाए जाने लगे. दिग्वजय के अलावा राहुल गांधी की सलाहकारों की मंडली में दो तरह के लोग हैं. एक तो वे युवा नेता हैं जो कांग्रेस की सियासी घरानों की नुमाइंदगी करते हैं. इनमें सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दीपेंद्र सिंह हुड्डा प्रमुख हैं. वहीं दूसरी तरफ वे लोग हैं जो विदेशों से डिग्री लेकर आए हैं और लैपटॉप व आंकड़ों के जरिए देश की राजनीति को कांग्रेस के पक्ष में मोड़ने के गुलाबी सपने राहुल गांधी को दिखाते रहते हैं. राहुल गांधी की सलाहकार मंडली हर मोर्चे पर अब तक नाकाम रही है. इसके बावजूद अगर राहुल इससे कोई सबक लेने को तैयार नहीं है तो कुछ लोगों के मुताबिक यह उनकी अक्षमता को भी दिखाता है.

बार-बार यह चर्चा होती है कि राहुल गांधी को सरकार में कोई अहम जिम्मेदारी लेनी चाहिए. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी उन्हें अपने कैबिनेट में शामिल करने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं. लेकिन इसके बावजूद राहुल गांधी पता नहीं किस अनजाने भय की वजह से सरकार में शामिल नहीं होते हैं. 28 अक्टूबर को हुए मंत्रिमंडल विस्तार से पहले भी उनके इसमें शामिल होने-न होने को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म था. लेकिन वे इस बार भी मंत्री नहीं बने. प्रधानमंत्री ने एक और बार इस पर अफसोस जताया. हालांकि इस बारे में कांग्रेस के एक नेता कहते हैं, ‘पार्टी में उनकी क्षमता को लेकर कोई सवाल ही नहीं है. इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी को लेकर भी लोग सवाल उठाते थे लेकिन इन तीनों ने राजनीति में अपना लोहा मनवाया. इसलिए पार्टी को ऐसी ही उम्मीद राहुल से भी है.’ क्या पार्टी के सभी नेता ऐसा ही सोचते हैं? इसके जवाब में वे कहते हैं, ‘नहीं, कुछ लोगों में राहुल की क्षमताओं को लेकर शंका है लेकिन कोई यह बात बोलना नहीं चाहता.’ कुछ ऐसी बात विकिलीक्स के 2007 के एक केबल से भी उजागर हुई थी. इसमें बताया गया था कि वरिष्ठ राजनीतिक जानकार राहुल के गलत कदमों की कोई वाजिब वजह नहीं देखते और कांग्रेस के कई लोग उन्हें प्रधानमंत्री पद के योग्य नहीं मानते. हालांकि राशिद किदवई अलग राय रखते हैं, ‘कुछ लोगों को शंका हो सकती है लेकिन अभी की स्थिति में पार्टी में इस बात पर सहमति है कि अगला आम चुनाव राहुल के नेतृत्व में ही लड़ना चाहिए. पार्टी के पास और कोई विकल्प नहीं है. मुझे लगता है कि राहुल सब संभाल लेंगे क्योंकि पार्टी में अब भी गांधी परिवार के प्रति वफादारी का भाव बरकरार है.’

प्रियंका गांधी

कांग्रेस की ओर से ‘ट्रंप कार्ड’ के तौर पर पेश की जा रही प्रियंका गांधी की राजनीतिक संभावनाओं पर ग्रहण लगाने का काम उनके पति रॉबर्ट वाड्रा पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों ने कर दिया है. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अब जब भी वे लोगों के बीच वोट मांगने जाएंगी तो लोग रॉबर्ट वाड्रा की वजह से उन्हें भी संदेह की निगाह से देखेंगे. इसकी पर्याप्त वजहें भी हैं. आरोपों के घेरे में आई रॉबर्ट वाड्रा की एक कंपनी ब्लू ब्रिज ट्रेडिंग के निदेशक मंडल में प्रियंका गांधी भी शामिल रही हैं. कंपनी के निदेशक मंडल में प्रियंका 2007 के नवंबर महीने से लेकर 2008 के जुलाई महीने तक रही हैं. इसलिए प्रियंका यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकती हैं कि अपने पति के कारोबार के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. जाहिर है कि रॉबर्ट वाड्रा पर तरह-तरह के आरोप लगने के बाद प्रियंका गांधी के लिए चुनावी राजनीति का सफर आसान नहीं होने जा रहा है. वाड्रा का मामला ऐसा है कि इसका इस्तेमाल विपक्षी दल खास तौर पर उस वक्त सबसे अधिक करेंगे जब प्रियंका राजनीति में सक्रिय होने की कोशिश करेंगी. राशिद किदवई कहते हैं, ‘अगर रॉबर्ट वाड्रा के मामले में प्रियंका सामने आकर स्थिति साफ करती हैं तो इससे न सिर्फ उन्हें फायदा होगा बल्कि पार्टी को भी लाभ मिलेगा.’

राजनीतिक सक्रियता के मामले में प्रियंका ने अब तक खुद को अपनी मां सोनिया गांधी के निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली और अपने भाई राहुल गांधी के निर्वाचन क्षेत्र अमेठी तक ही सीमित रखा है. 2012 के विधानसभा चुनावों में भी इन दोनों जिलों में चुनाव अभियान की कमान प्रियंका गांधी ने ही संभाली थी. प्रचार के दौरान प्रियंका अपने दोनों बच्चों को लेकर भी पहुंची थीं. उनके पति रॉबर्ट वाड्रा ने भी मोटरसाइकिल से प्रचार किया था. प्रियंका ने बार-बार यह दोहराया कि दोनों जिलों की सभी 10 विधानसभा चुनावों पर जीत हासिल करने के लक्ष्य के साथ कांग्रेस चुनाव मैदान में है. लेकिन इन दस में से सिर्फ दो सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार जीत पाए. रायबरेली में जहां कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला वहीं अमेठी में सिर्फ दो सीटों पर  पार्टी को जीत हासिल हुई. इन दो जिलों के चुनावी नतीजों ने यह साबित किया कि कांग्रेस की ओर से ‘ट्रंप कार्ड’ बताई जा रही प्रियंका गांधी को जमीनी स्तर पर उस तरह का जनसमर्थन नहीं मिल रहा जिसकी बात दिल्ली में बैठकर कई कांग्रेसी नेता कर रहे हैं.

गांधी परिवार के गढ़ में कांग्रेस की दुर्गति को कई तरह से देखा गया. युवाओं के एक बड़े वर्ग में खासे लोकप्रिय उपन्यासकार चेतन भगत ने ट्विटर पर लिखा, ‘कांग्रेस का रायबरेली और अमेठी में हार जाना कुछ ऐसा ही है जैसे चेन्नई में रजनीकांत की फिल्म का पिट जाना.’ गांधी परिवार के लिए अमेठी और रायबरेली का कितना महत्व है इसे समझने के लिए इतिहास में झांकना जरूरी है. बात 1921 की है. उस वक्त जवाहर लाल नेहरू 32 साल के थे. तब नेहरू परिवार इलाहाबाद के आनंद भवन में रहता था. उसी साल अमेठी और रायबरेली में स्थानीय जमींदारों के खिलाफ किसानों का प्रदर्शन शुरू हुआ. मोतीलाल नेहरू ने जवाहरलाल नेहरू को वहां मामला शांत करने के लिए भेजा. मोतीलाल नेहरू देश के प्रख्यात वकील थे और अमेठी के राजा उनके मुवक्किल थे. जवाहर लाल अपने पिता के निर्देश पर वहां गए और राजा की बजाय किसानों का साथ दिया. माना जाता है कि उन्होंने अपना पहला राजनीतिक भाषण भी यहीं दिया. उस समय से इस इलाके से जुड़ा परिवार का संबंध अब तक चला आ रहा है. जब 1930 में महात्मा गांधी का नमक आंदोलन चल रहा था तो उस वक्त 8 अप्रैल को इंदिरा गांधी ने अपनी मां कमला नेहरू के साथ इस आंदोलन में रायबरेली में हिस्सा लिया. रायबरेली से इंदिरा का यह पहला संपर्क था. 1967 में इंदिरा ने यहां से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. इसके पहले 1952 में हुए पहले आम चुनाव में उनके पति फिरोज गांधी ने भी इस सीट पर जीत हासिल की थी. उन्होंने इस सीट का प्रतिनिधित्व 1960 तक किया. अमेठी से संजय और राजीव गांधी ने भी लोकसभा का चुनाव जीता. सिर्फ 1977 का आम चुनाव ही ऐसा था जब इस इलाके ने गांधी परिवार को खारिज किया. उस चुनाव में रायबरेली से इंदिरा और अमेठी से संजय गांधी को हार का मुंह देखना पड़ा था.

2012 में कांग्रेस के उम्मीदवारों के जरिए गांधी परिवार को खारिज किए जाने की कई वजहें हैं. इस बारे में रायबरेली के पंकज पांडे कहते हैं, ‘इस परिवार के लोग आजादी के बाद से ही यहां से चुनाव जीतते रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद अब तक किसी ने यहां कोई छोटा-सा भी घर नहीं बनाया. इससे यहां के लोगों को लगने लगा है कि ये लोग इस क्षेत्र का इस्तेमाल बस चुनावी जीत के लिए करते हैं.’ वे आगे कहते हैं, ‘इन दोनों जिलों के कांग्रेस के विधायकों का प्रदर्शन अच्छा नहीं था. पहले गांधी परिवार की अपील पर लोग किसी को भी वोट दे देते थे लेकिन अब स्थिति बदल रही है. पूरे प्रदेश की तरह इन दोनों जिलों में भी कांग्रेस का सांगठनिक ढांचा बिखर चुका है. केएल शर्मा की अगुवाई में राजीव गांधी ट्रस्ट के कुछ लोग इन दोनों जिलों के उम्मीदवारों का चयन करते हैं. सोनिया गांधी जब यहां आती हैं और उस दौरान लोग जो भी आवेदन उन्हें देते हैं वे सब वह केएल शर्मा को दे देती हैं मगर शर्मा इन पर कोई कार्यवाही नहीं करते.
इससे लोग खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं.’

अमेठी और रायबरेली में चुनाव प्रचार के दौरान जो भाषण उन्होंने दिए, अगर उन पर ध्यान दिया जाए तो उससे साफ होता है कि राजनीतिक परिपक्वता के लिए अभी उन्हें लंबा सफर तय करना है. चुनावों में जिसकी हार स्पष्ट नजर आती है वह भी आम तौर पर नतीजे आने के ठीक पहले तक खुद को ही संभावित विजेता के तौर पर प्रस्तुत करता है. लेकिन अमेठी में प्रियंका जो बोल रही थीं उससे लग रहा था कि वे नतीजे की बात तो दूर, चुनाव से पहले ही हार मान चुकी हैं. अमेठी के टिकरमाफी गांव में एक सभा को संबोधित करते हुए प्रियंका का कहना था, ‘इस चुनाव में नहीं तो हमें अगले चुनाव में बल मिलेगा.’ जाहिर है कि इससे न सिर्फ कांग्रेस के उम्मीदवारों का बल्कि कार्यकर्ताओं का भी मनोबल टूटा होगा. हालांकि, राशिद किदवई कहते हैं, ‘अमेठी और रायबरेली में प्रियंका की नाकामी के बावजूद पार्टी में ऐसे नेता हैं जो मानते हैं कि अगर प्रियंका जमकर चुनाव प्रचार करती हैं तो उनकी वजह से लोक सभा चुनावों में कांग्रेस की 15-20 सीटें बढ़ सकती हैं.’
राजनीति में आने को लेकर प्रियंका की औपचारिक अनिच्छा के बावजूद इस बात को लेकर राजनीतिक जानकारों की आम दावा है कि वे सही समय का इंतजार कर रही हैं. लेकिन अब तक प्रियंका ने न तो अपने किसी भाषण से या न ही किसी सार्वजनिक मंच या मीडिया के किसी माध्यम से यह बताने की कोशिश की है कि भारत के भविष्य को लेकर उनके विचार क्या हैं. भारत के विकास को लेकर उनकी राय क्या है. मणिशंकर अय्यर इस पर प्रियंका का बचाव करते हैं, ‘प्रियंका को राजनीति की गहरी समझ है. आपको यह ध्यान में रखना चाहिए कि शुरुआती दिनों में प्रियंका की मां सोनिया से अधिक अराजनीतिक कोई नहीं था लेकिन उन्होंने तेजी से राजनीति को समझा. प्रियंका सिर्फ दिखने के मामले में इंदिरा जी जैसी नहीं हैं बल्कि और भी कई मामलों में उनके जैसी हैं.’    l

मेनका गांधी और वरुण गांधी

कभी संजय गांधी भारतीय राजनीति और खास तौर पर कांग्रेस के सबसे ताकतवर केंद्र थे. आज उनकी पत्नी मेनका गांधी और बेटे वरुण गांधी राजनीति में तो हैं लेकिन कांग्रेस की नहीं बल्कि भाजपा की राजनीति कर रहे हैं. संजय के बड़े भाई राजीव गांधी की पत्नी को कुछ लोग देश का सुपर प्रधानमंत्री कहते हैं और उनके बेटे को प्रधानमंत्री पद का दावेदार लेकिन न तो मेनका गांधी ही भाजपा में किसी बड़ी भूमिका में हैं और न ही उनके पुत्र वरुण गांधी.

इंदिरा गांधी के दौर में उनके दोनों बेटों में से राजनीति में सक्रिय होने का फैसला पहले उनके बड़े बेटे राजीव गांधी ने नहीं बल्कि संजय गांधी ने किया था. कुछ ही समय में संजय इतने ताकतवर हो गए कि कहा जाने लगा कि इंदिरा गांधी अपने छोटे बेटे की मुट्ठी में हैं. यही वह दौर था जब यह कहा जाने लगा कि सरकार प्रधानमंत्री कार्यालय से नहीं बल्कि प्रधानमंत्री आवास से चल रही है. 1974 में संजय की शादी मेनका गांधी से हुई. 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया तो इसका असली गुनहगार भी संजय को ही बताया गया. जब आपातकाल हटा तो इंदिरा गांधी की छवि ठीक करने को बीड़ा भी मेनका गांधी ने ही उठाया. उन्होंने साप्ताहिक समाचार पत्रिका सूर्या में इंदिरा गांधी का लगातार इंटरव्यू प्रकाशित करके उनके प्रति लोगों की धारणा बदलने की कोशिश की. उस वक्त की राजनीति को

करीब से देखने वाले लोग बताते हैं कि इंदिरा गांधी मेनका को काफी पसंद करती थीं. कई बार वे चुनाव प्रचार के लिए भी मेनका को अपने साथ ले जाती थीं. इसी बीच मेनका और संजय के बेटे वरुण का जन्म 1980 में हुआ. वरुण का नाम भी इंदिरा गांधी ने ही रखा था. संजय तो बेटे का नाम अपने पिता के नाम पर फिरोज रखना चाहते थे. वरुण के जन्म के कुछ ही महीने बाद संजय गांधी की मौत एक हवाई दुर्घटना में हो गई. इंदिरा की दुलारी रही मेनका को संजय गांधी की मौत के तकरीबन तीन साल बाद अपमानजनक तरीके से इंदिरा गांधी का घर छोड़कर निकलना पड़ा. उन्होंने न सिर्फ घर छोड़ा बल्कि कांग्रेस से अलग राह भी बना ली. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय संजय मंच के नाम से पार्टी बनाई.

1984 का लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने अपने पति संजय गांधी की सीट अमेठी को चुना. लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान इंदिरा गांधी की हत्या हो गई और राजीव गांधी मेनका के खिलाफ चुनाव में उतरे. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उभरी सहानुभूति की लहर की वजह से राजीव को यहां जबरदस्त जीत हासिल हुई. 1988 में मेनका ने अपनी पार्टी का विलय जनता पार्टी में कर लिया और पार्टी महासचिव बन गईं. मेनका जनता पार्टी सरकार और भाजपा की सरकार में मंत्री भी रही हैं. भाजपा की औपचारिक सदस्यता नहीं होने के बावजूद वे वाजपेयी सरकार में मंत्री थीं. 2004 में वे औपचारिक तौर पर भाजपा में शामिल हुईं. उनके साथ उनके पुत्र वरुण गांधी भी भाजपा में 2004 में ही शामिल हुए. 2009 में मेनका ने अपनी सीट पीलीभीत से अपने बेटे वरुण गांधी को उतारा और खुद आंवला से जीतकर आईं. वरुण को भी जीत हासिल हुई.

लेकिन आज मां-बेटे दोनों की सियासत उलझी हुई लग रही है. मेनका गांधी को पार्टी ने कोई अहम जिम्मेदारी नहीं दी है. महिला मोर्चा का काम भी स्मृति ईरानी को दे रखा है. भाजपा अध्यक्ष मीनाक्षी लेखी को पार्टी के मामलों में अधिक तरजीह देते हुए दिख रहे हैं. राष्ट्रीय कार्यकारिणी के अलावा मेनका गांधी भाजपा के किसी कार्यक्रम में भी आम तौर पर नहीं दिखतीं. पर्यावरण के मामले में विशेषज्ञता होने के बावजूद पार्टी तब भी मेनका गांधी को आगे नहीं करती जब इससे संबंधित किसी विषय पर सरकार पर हल्ला बोलने की जरूरत होती है. पार्टी के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि रोज-रोज की राजनीति में मेनका गांधी की बहुत दिलचस्पी भी नहीं है. लेकिन अगर कोई राजनीति में है और उसे पार्टी कोई बड़ी जिम्मेदारी देती है तो उसे अच्छा लगता है. मेनका जी के मामले में पार्टी के कई नेता यह मानते हैं कि अगर केंद्र की सत्ता में भाजपा आई तो उन्हें मंत्री तो बनाया ही जाएगा.’

राहुल गांधी की तुलना में ऐसी ही हालत वरुण गांधी की भी है. एक भाई प्रधानमंत्री पद की दौड़ में है तो दूसरे की चुनौती अपनी लोकसभा सीट बचाने की है. पार्टी के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘जब वरुण आए थे तो उनसे न सिर्फ पार्टी को बल्कि ऐसा लग रहा था कि युवाओं को भी काफी उम्मीदें हैं. लेकिन 2009 के चुनावों में जिस तरह का आपत्तिजनक भाषण देने का आरोप लगा उससे उनकी छवि को धक्का लगा.’ पार्टी के लोग बताते हैं कि वरुण को भाजपा में बड़ी जिम्मेदारी देने की बात चल रही थी लेकिन यह योजना उनके भाषण की वजह से खटाई में पड़ गई. भाजपा के कुछ लोग यह भी बताते हैं कि वरुण की दिलचस्पी भारतीय जनता युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनने में थी लेकिन पार्टी ने उनके इस प्रस्ताव को नहीं माना. कहने को उनके पास संगठन में सचिव का पद है लेकिन पार्टी उन्हें अपने मंच से बोलने का मौका भी नहीं देती. वरुण गांधी के बाद आए कई युवा नेताओं को भाजपा में बढ़ाया जा रहा है लेकिन कोई बड़ी जिम्मेदारी वरुण को नहीं मिल रही. वरुण के साथ काम कर चुके एक सज्जन कहते हैं, ‘उनकी राजनीतिक तरक्की की राह की सबसे बड़ी बाधा उनका व्यवहार है. आम तौर पर राजनीति करने वाले लोग मित्र बनाने में यकीन करते हैं. किसी से नाराज होने पर भी उसके सामने अपनी नाराजगी नहीं जाहिर करते. लेकिन वरुण ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने न सिर्फ कई नेताओं को नाराज किया है बल्कि इसी वजह से वे अपने कई सहयोगियों को भी खो चुके हैं.’ जो लोग पीलीभीत की राजनीति को जानते हैं, उनका कहना है कि अगले आम चुनाव में वरुण के लिए अपनी सीट निकालना मुश्किल साबित होने जा रहा है.

क्या जदयू व्यक्ति केंद्रित पार्टी बनने की राह पर है?

जदयू की तरफ से आगामी चार नवंबर को बिहार की राजधानी पटना में आयोजित हो रही ‘अधिकार रैली’ के मद्देनजर पूरे शहर को तरह-तरह के पोस्टर-बैनरों से पाट दिया गया है. अपने कलेवर और संदेशों में बेहद भिन्न दिख रहे इन सभी पोस्टर-बैनरों में तीन बातें समान हैं. जदयू के वरिष्ठतम नेता रहे जॉर्ज फर्नांडिज की अनुपस्थिति, पार्टी के अध्यक्ष शरद यादव की नाममात्र उपस्थिति और मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की हर पोस्टर में उपस्थिति. बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर आयोजित हो रही इस रैली का नतीजा चाहे जो भी हो लेकिन एक छिपा संदेश यही है कि जदयू में नीतिश के आगे सब फीके हैं. निराला की रिपोर्ट. 

मजबूर बुढ़ापा जब सुनी राहों की धूल न फांकेगा, मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीख न मांगेगा. हक मांगनेवालों को जिस दिन सूली न दिखायी जाएगी, वह सुबह कभी तो आएगी…‘. ‘ज्ञान के लिए पढ़ो, अधिकार के लिए लड़ो. पढ़ाई-लड़ाई साथ-साथ…’. ‘ न ज्यादा, न कम, बिहारियों में है दम…’.‘ जब विकसित बिहार है आपका संकल्प, तो विशेष दर्जा ही एकमात्र विकल्प.’ विशेष राज्य की मांग उठी है, जन-जन के अरमानों से, हर हाथ को काम मिलेगा, खेत-खलिहान-कारखानों से…’

ऐसे ही तरह-तरह के नारे चमक रहे हैं पटना की सड़कों के दायें-बायें लगे पोस्टरों-बैनरों पर. करिश्माई नेतृत्व से बढ़ते बिहार का गुणगान भी है और साथ में गरीबी और भूख से तड़पते-विवश बिहार का नजारा भी. पोस्टरों में हाथ जोड़े खड़े नेताओं के साथ हुंकार भरे वाक्यों की भरमार है. जवान तो जवान, अधेड़ावस्था में भी कई नेता पोस्टरों के सहारे अपने को जवान साबित करने के लिए हैट, चश्मा आदि लगाकर मॉडल सरीखे उभार रहे हैं खुद को. कुछ जगहों पर रणक्षेत्र में रथ पर सवार कृष्ण(नीतीश कुमार) और रथ के सारथी बने शरद भी दिख रहे हैं.

बिहार प्रदेश कुशवाहा महासभा जैसी संस्थाओं ने तो अपनी पूरी कलात्मक प्रतिभा का परिचय पोस्टरों के जरिये देने की कोशिश की है. अस्त-व्यस्त बाल बिखेरे महिला की पेंटिंग लगायी गयी है, उसकी बायीं ओर डरावनी आंखों की पेंटिंग है और फिर तीर एक वाक्य को भेदते हुए गुजरता दिखता है- सोनिया गांधी आंखें खोलो.

चार नवंबर को राजधानी पटना के गांधी मैदान में सत्ताधारी जदयू की ओर से आयोजित अधिकार रैली की तैयारी के परवान चढ़ने के नजारे हैं ये सब. राजधानी पटना में पोस्टरों का मेला लगा हुआ है और इन पोस्टरों के बीच से कभी-कभार गुजर रहे वाहनों में गीत सुनायी पड़ रहे हैं- नीतीश के पीएम बना द हो बाबा, विशेष राज्य के दर्जा दिला द…

नजारा ऐसा बन पड़ा है कि शहर के प्रायः सभी गोलचक्करों के बीच स्थित महापुरूषों की प्रतिमाएं बड़े-बड़े बैनरों की वजह से अदृश्य से हो गए हैं. रैली के पहले बैनरों के जरिये अपनी पूरी प्रतिभा, अपनी पूरी ताकत का प्रदर्शन कर रहे जदयू नेताओं का कौशल पहले तो शहरवासियों के लिए कौतूहल और मजा लेने का विषय रहा, बाद में इंच दर इंच पाटने की होड़ ने मन भर दिया. जदयू नेताओं ने पब्लिक के इस मूड को भांपा. 31 अक्तूबर की दोपहर अचानक पटना के दो मुख्य चैराहे इनकम टैक्स गोलंबर और गांधी मैदान के पास मौर्या होटल गोलंबर के चारो ओर लगे पोस्टर-बैनर को हटा दिया गया.

दोनों जगह जेपी की ही प्रतिमा है, जेपी दिखने लगे लेकिन दूसरे गोलंबरों पर मौजूद महापुरूष बैनर-पोस्टर से छिपे हुए हैं. एक नवंबर को फिर वही अभियान चला. लेकिन जदयू नेताओं का उत्साह प्रशासन के इस अभियान पर पानी भी फेरता रहा. चूहे-बिल्ली का खेल चलता रहा. एक जगह से बैनर-पोस्टर हटते रहे, दूसरी जगह उसे लगाने का अभियान चलता रहा.

खैर! यह तो सत्ताधारी दल की एक विशाल महत्वाकांक्षी रैली है, सो यह नजारा दिख रहा है. इसमें आश्चर्य या असमान्य जैसा कुछ भी नहीं. बिहार में इस प्रवृत्ति के नजारे सामान्य दिनों में भी दिख जाते हैं. जमीन जंग से परहेज करनेवाले नेताओं की बढ़ती संख्या की वजह से जुबानी जंग की तरह ही  बैनर-पोस्टर वार भी यहां की नयी परंपरा है. उसका एक्सटेंशन कई रूपों में होते रहता है. अगर नीतीश कुमार को कोई चैनलवाला भी एक्सेलेंस जैसा अवार्ड दिया तो सरकारी विभागों से होर्डिंग दर होर्डिंग लगा दिये जाते हैं.अगर लालू प्रसाद को कुछ कहना हुआ तो उनके दूत संदेशों के साथ रातों-रात गोलंबरों को बैनरों से पाट देते हैं.

अगर किसी बड़े नेताजी के माताजी गुजर जाती हैं तो पटना के प्रमुख चैराहों पर रातों-रात ऐसे वाक्यों के साथ बैनर लगा दिये जाते हैं- आप धन्य हो मां!  अगर आप ना होती तो ऐसा लाल धरा पर न आया होता. और अगर यह लाल न आया होता तो पता नहीं क्या होता बिहार का? अगर कोई आयोजन-प्रायोजन न हो तो, किसी नेता के विदेश यात्रा को महान उपलब्धियों की तरह बखान करते हुए बैनर-पोस्टर पाटे जाते हैं. जयंती-पुण्यतिथि का खेलवाले पोस्टरों में तो प्रायः सभी राजनीतिक दलों की समाज रुचि रहती ही है. .

अधिकार रैली के मौके पर लगाये गये बैनर-पोस्टर मेले में उनकी संख्या अथवा उनके प्रकार या उनमें उभर रही कलात्मकता की बजाय आश्चर्य की कुछ दूसरी वजहें दिखती हैं. जदयू नेताओं द्वारा लाखों की संख्या में लगे छोटे-बड़े बैनर-होर्डिंग्स में अपने दल के दिग्गज नेताओं को गायब पाकर हैरत में पड़ सकते हैं. मसलन, पुराने नेता पूछ रहे हैं कि भाई कहीं तो किसी पोस्टर, बैनर, फ्लैक्स में जॉर्ज फर्नांडिस भी दिखते. वृद्ध हो गये हैं तो क्या हुआ, एक विरासत, थांति की तरह ही दिखते जैसे कि निष्क्रिय होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी को भाजपा जरूर दिखाती है.

फिर बतकही चल रही है कि सबको पता है कि आज यदि नीतीश कुमार सत्ता में है, जदयू का अस्तित्व इतना मजबूत है तो उसमें जॉर्ज फर्नांडिस का खून-पसीना भी लगा हुआ है. फिलहाल अधिकार रैली के पहले के इस पोस्टर-बैनर रैली में जलवा बिखेरनेवाले जदयू के पोस्टर-बैनरबाज नये-नवेले नेताओं ने यह संदेश दिया है कि उनका बस चलेगा तो जॉर्ज के नाम तक लेने की दरकार नहीं समझी जाएगी! जॉर्ज ने अपना पूरा राजनीतिक जीवन ही बिहार में खपाया और जद, जदयू जैसे दलों को खड़ा किया.

खैर! जो जॉर्ज कहीं हैं ही नहीं, उनकी बात करने की बजाय जो हैं, उन पर नजर डालते हैं. नीतीश हर जगह छाये हुए हैं, शरद की उपस्थिति तुलनात्मक रूप से बेहद कम है. शरद से कहीं ज्यादा आइएएस से नेता बने आरसीपी सिन्हा जैसे नये उभार वालों की जगमगाहट है. शिवानंद तिवारी जैसे नेता टिमटिमाते तारे की तरह एकाध जगह दिख रहे हैं.

हाल में अपने ही दल के नेता नीतीश कुमार की सरकार का विरोध करनेवाले सीमांचल के दिग्गज तसलीमुद्दीन जैसे नेता भी नदारद-से ही हैं. जदयू को बनानेवाले और जो पुराने नेता रहे हैं, वे भी गायब-से ही हैं. अधिकार रैली के पहले माहौल बनाने के लिए फिलहाल चल रहे पोस्टर-बैनर मेले में जदयू नेताओं के नाम पर या तो सत्ता के गलियारे में चमकते ध्रुवतारों की जगमगाहट है या फिर सोना सिंह, बिट्टू सिंह, छोटु सिंह जैसे नये-नवेलों  का डंका है, जो शहर के मुख्य होर्डिंग पर सुंदर तस्वीरों के साथ कब्जा जमाये हुए हैं.

चार नवंबर को अधिकार रैली में केंद्र की सरकार का विरोध होगा. जदयू केंद्र की सरकार को अपने ताकत का अहसास करवायेगी. इसी के जरिये अपने सहयोगी भाजपा को मुगालते से बाहर निकलने का संदेश देगी.लालू प्रसाद, रामविलास पासवान जैसे नेताओं को भी ‘विशेष राज्य दर्जेवाले मसले पर अपार जनसमूह दिखाकर नीतीश उनकी नींद हराम करने की तैयारी में हैं. संभव है यह सब होगा लेकिन रैली के पहले पोस्टर-बैनर-होर्डिग्स रैली यह बता रहा है कि जदयू का मतलब मुख्य रूप से नीतीश को ही समझा जाए. भूत भी, वर्तमान भी और भविष्य भी.पार्टी के भविष्य का एक खाका भी दिख रहा है- जिसके पास पैसा होगा. जो होर्डिंग्स, बैनर, पोस्टर का किराया देकर अपनी तसवीरें लगवा सकता है, वही चमकेगा.

छात्रसंघ चुनाव से डरी सरकार

मध्य प्रदेश में सत्तासीन भाजपा विधानसभा चुनाव के ठीक पहले राज्य में छात्र संघ चुनाव करवाने से कतरा रही है. दरअसल पार्टी यह तो जानती है कि बीते छात्र संघ चुनावों के मुकाबले इस साल का छात्र संघ चुनाव ज्यादा अहम है और यदि वह यह चुनाव कराती है तो उसे आम चुनाव में खास भूमिका निभाने वाले युवाओं का रुझान समझ में आ जाएगा. किंतु पार्टी यह भी जानती है कि आगामी विधानसभा चुनाव के पहले होने वाले छात्र संघ चुनाव में अगर परिणाम अच्छे नहीं आए तो कुल मतदाताओं में से आधे से अधिक संख्या में मौजूद युवाओं के बीच उसकी कमजोर पकड़ का खुलासा हो जाएगा और यह मुख्य चुनाव के पहले उसके सामने अलोकप्रियता की बड़ी वजह बनेगा. इसी से जुड़ा एक जरूरी तथ्य यह भी है कि निर्वाचन आयोग ने इस बार मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के लिए युवाओं पर फोकस किया है और इस क्रम में उसने अब तक प्रदेश के बारह लाख से अधिक मतदाताओं को चुनाव की सूची में शामिल किया है. युवाओं के बूते सत्ता पर काबिज होने का मंसूबा पालने वाली किसी भी पार्टी के लिए यह इतना बड़ा आंकड़ा है जो उसकी जीत या हार में निर्णायक साबित हो सकता है.

 पर्दे के पीछे जाएं तो चुनावी दहलीज पर खड़ी भाजपा सरकार के सामने कानून-व्यवस्था बनाये रखना भी एक बड़ी चुनौती है. इसलिए वह ऐसी कोई नयी पहल नहीं चाहती जो 2013 में कठिनाई खड़ी करें. लिहाजा सरकार के छात्र संघ चुनाव न कराने के पीछे गृह-विभाग की उस रिपोर्ट को आधार बनाया जा रहा है जिसमें उसने इन चुनावों के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा की आशंका जतायी है. दरअसल चुनावी तैयारी के नाम पर भाजपा समर्थित छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) बैतूल में एक छात्र की हत्या के ताजे प्रकरण के अलावा जगह-जगह कई प्रोफेसरों के साथ मारपीट के आरोप झेल रही है. आमतौर पर इन सभी घटनाओं को 2006 के उज्जैन में घटित प्रो सबरवाल के उस चर्चित हत्याकांड से जोड़ा जाता है जो राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की साख पर भी बट्टा लगा चुका है. हालिया घटनाओं को देखते हुए पार्टी के नेता ही दबी जुबान में अब मानते हैं कि चुनाव हुए तो उन्हें अपनी ही छात्र इकाई के कार्यकर्ताओं पर लगाम लगाना मुश्किल होगा. इन नेताओं का कहना है कि यदि हिंसा की एक-दो बड़ी घटना घट गईं तो चुनाव की दहलीज पर खड़ी सरकार के पास इतना वक्त भी नहीं कि वह इनकी भरपायी कर पाएं.

 भाजपा सरकार की दूसरी परेशानी हाइकोर्ट के उस फैसले से भी जुड़ी है जिसमें उसने लिंगदोह आयोग की सिफारिश के आधार पर प्रत्यक्ष चुनाव कराने का निर्देश दिया है. गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में दिल्ली और राजस्थान सहित बाकी कई राज्यों से अलग छात्र संघ का अप्रत्यक्ष चुनाव कराया जाता है. इस प्रक्रिया में कॉलेज प्रबंधन की चुनाव समिति ही मेरिट के आधार पर कक्षा प्रतिनिधियों की नियुक्ति करती है और फिर नियुक्त प्रतिनिधि अपने बीच से अध्यक्ष आदि चुनते हैं. भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन के प्रदेश अध्यक्ष विपिन बानखेड़े का आरोप है, ‘यह प्रणाली इस हद तक सीमित और शासन के हाथों में होती है कि सरकार इस पर आसानी से दवाब बनाकर चुनाव को अपने पक्ष में कर लेती है.’ यदि इसके पहले प्रत्यक्ष प्रणाली की पृष्ठभमि देखें तो इसमें कांग्रेस की छात्र इकाई भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन ही एकतरफा जीतता रहा है. जाहिर है प्रत्यक्ष प्रणाली में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के खराब प्रदर्शन के चलते भी सरकार कोई प्रयोग नहीं आजमाना चाहती.

 प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के मुताबिक कॉलेजों के शैक्षणिक सत्रों में देरी को देखते हुए अब छात्र संघ का चुनाव करा पाना संभव भी नहीं. वे कहते हैं, ‘चुनाव हुए तो अकादमिक कैलेंडर और पीछे जाएगा.’ मगर मजेदार है कि सरकार की इस दलील पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को सख्त आपत्ति है. परिषद के क्षेत्रीय संगठन मंत्री वीडी शर्मा के मुताबिक, ‘सत्र तो हर साल ही पीछे जाते हैं. इसलिए कैलेंडर में छात्र संघ का चुनाव पहले से ही तय होने के बावजूद उन्हें न कराने की बात हजम नहीं होती.’ दरअसल परिषद के एक धड़े को मलाल है कि पार्टी के कई बड़े नेता शक्ति प्रदर्शन से लेकर मतदाताओं को मतदान केंद्र तक खींचने के लिए तो उन्हें उपयोग में लाते हैं. मगर वे नहीं चाहते कि छात्र संघ में कोई युवा चुनाव जीते और उसके बाद विधायक की टिकिट के लिए अपना दावेदारी ठोंके.

 वहीं यहां बड़ी संख्या में खुल रहे निजी कॉलेजों में मंहगी फीस ज्वलंत मामला बनकर उभरा है. आए दिन छात्रों की आत्महत्या के ऐसे कई मामले उजागर हुए हैं जिनका सीधा संबंध आर्थिक लाचारी से है. स्टुडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया के प्रांतीय महासचिव शैलेष बोहरे के मुताबिक, ‘अधिकतर निजी कॉलेज भाजपाईयों के हैं. इसलिए शिक्षा के व्यवसायिकरण को लेकर एवीबीपी कितने भी नारे लगा लें लेकिन तजुर्बेदार भाजपा जानती है कि यदि वह चुनाव में उतरी तो सत्ता विरोधी रूख से बच नहीं पाएगी.’

 प्रदेश के आठ संभागों में भाजपा की युवा बाईक रैली के फ्लॉप होने से भी पार्टी के भीतर हड़कंप है. बीते दिनों भाजपा प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा ने राजधानी भोपाल में एक लाख बाईक की रैली निकालने का दावा किया था, लेकिन इसमें पांच हजार बाईक भी नहीं आ पायीं. दरअसल भाजपा ने घोषणा-पत्र में महिला आयोग की तर्ज पर यहां युवा आयोग बनाने की बात की थी. मगर वह अपने पूरे कार्यकाल में न आयोग बना पायीं और न ही हर साल एक लाख युवाओं को रोजगार देने का अपना वादा ही पूरा कर पायीं है. प्रदेश युवक कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष मुकेश नायक के मुताबिक, ‘युवाओं के बीच सम्मोहन की राजनीति बड़ी काम देती है किंतु एक समयसीमा तक. इसके बाद यह उतनी की तेजी से उलटा असर भी दिखाती है.’ वहीं पार्टी के भीतर का ही एक तबका मानता है कि यदि सूबे में छात्र संघ के चुनाव कराये जाते तो यह यहां के एक हजार से अधिक पांरपरिक कॉलेजों के लाखों छात्रों के साथ एक सियासी लहर पैदा कर देता. जबकि भाजपा सरकार विधानसभा चुनाव के ऐन वक्त पर ठंडी पड़ी कांग्रेस को ऐसा कोई मौका नहीं देना चाहती जिससे कांग्रेस का युवा धड़ा सक्रिय हो और यह विपक्ष में हलचल की कोई संभावना पैदा करें.

नये बिहार में 'भिखारी’ उपेक्षित!

हाल के वर्षों में बिहार में जयंती- पुण्यतिथि के जरिये राजनीति की धुआंधार परंपरा परवान चढ़ी है. तमाम दल अपने- अपने तरीके से एक दूसरे को मात देने की कोशिश में विस्मृति के गर्भ से नायकों को निकालकर, उन्हें जातीय फ्रेम में फिट कर उनके नायकत्व को उभारने में लगे हुए हैं. कई मायने मे यह अच्छा ही है. जयंती आयोजन की दिशा में बिहार सरकार ने भी एक नयी पहलकदमी की है. राज्य के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की जयंती एक साल तक अमृत वर्ष के रूप में मनाने की शुरुआत हुई है. मुजफ्फरपुर मे एक बड़े आयोजन से इसकी शुरुआत मुख्यमंत्री ने कर दी है, अब साल भर यह सिलसिला पूरे राज्य मे चलेगा.

राज्य के पहले वित्त मंत्री अनुग्रह नारायण सिंह की 125वीं जयंती वर्ष को भी पूरे साल धूमधाम से मनाये जाने सरकारी तैयारी है॰ नेताद्वय की याद मे घूम-घूम कर, तरह-तरह से आयोजन होंगे, उनकी जीवनी स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल होगी, भाषण संकलित कर प्रकाशित करने का प्रस्ताव है. इस खास आयोजन के लिए एक समिति भी बनी है, जिसके अध्यक्ष खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं. समिति में उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, भाजपा के बिहार प्रदेश अध्यक्ष डा सीपी ठाकुर, जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह, राज्य के कई मंत्री, विधानसभा में विपक्ष के नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी, विधानपरिषद में प्रतिपक्ष के नेता गुलाम गौस, वाम पृष्ठभूमि वाले विधान पार्षद केदार पांडेय, वासुदेव सिंह आदि शामिल हैं. समिति निर्माण में बेहतर, चतुर राजनीतिक दृष्टिबोध का समन्वय झलकता है. सत्ता पक्ष, विपक्ष, वाम का बेहतर समन्वय.

बहरहाल, बात दूसरी. उम्मीद की जानी चाहिए कि इन पुराने नेताओं के जीवनमूल्य, उनके संघर्ष और संघर्ष के साथ ही सृजन के बीज बोने की कोशिश प्रेरणादायी साबित होगी. लेकिन, इस जयंतीमय माहौल में एक छोटी सी चूक बड़ी खटक पैदा करनेवाली है. गुजर रहा साल लोक नाट्य सम्राट तथा बिहार और बिहारी शैली को प्रतिष्ठित करानेवाले भिखारी ठाकुर का 125वां जयंती वर्ष भी है. सरकार के साथ श्रीबाबू-अनुग्रह बाबू जयंती समिति में शामिल दूसरे दल के नेताओं को भी भिखारी याद नहीं आये, महत्वपूर्ण नहीं लगे, खटकनेवाली बात है.

बनाव-बिगड़ाव की समानुपाति प्रक्रिया से गुजर रहे बिहार को श्रीबाबू और अनुग्रह बाबू के साथ भिखारी के संघर्ष-सृजन के पुनर्पाठ की जरूरत कुछ मायनों में ज्यादा है. सांस्कृतिक राजनीति के अभाव में बिहार अराजकता के दायरे से बाहर नहीं निकल पा रहा. भिखारी सामाजिक बदलाव के एक ऐसे दुर्लभ व अद्भुत सूत्रधार थे, जिन्होंने सांस्कृतिक चेतना को राजनीतिक चेतना से आगे रखते हुए बदलाव की ऐसी बुनियाद तैयार की थी, जो राजनीति अब भी करने में सक्षम नहीं हैं. भिखारी ने कई चुनौतियां को ध्वस्त किया था. सामंती रंडी नाच का वर्चस्व खत्म कर लौंडा नाच की परंपरा विकसित कर, उसे परवान चढ़ाकर मनोरंजन की एक अहम विधा नाच का सामान्यीकरण कर सबके लिए सुलभ कर दिया था.

ठेठ गंवई शैली में ‘बिदेसिया’ के जरिये स्त्री की बिरह वेदना को लोक स्वर दिया था. बेटियों की बिक्री के खिलाफ भिखारी ने ‘बेटीबेचवा’ नाटक के माध्यम से बहुत पहले ही असरदार काम किया था. बतौर अभिनेता, जर्जर काया के साथ  आखिरी बार धनबाद के एक मंच पर उतरे भिखारी ने सूदखोरों और बेटीबेचनेवालों पर धावा बोला था. प्रभाव यह हुआ था कि पहली बार कोलियरी इलाके में सूदखोरों के खिलाफ लोगों का संगठन बना. यह संकल्प भी लिया गया कि जो बेटी बेचेगा, उसका हुक्का-पानी बंद कर दिया जाएगा.

 भिखारी के नायकत्व को उभारने की ज्यादा जरूरत क्यों है, उसे ऐसे भी समझ सकते हैं. आज बिहार में राजनीति स्त्री स्वातंत्र्य, सशक्तिकरण और उन्हें अधिकारों से लैश करने का अभियान चल रहा है. भिखारी ने अपने दायरे में, अपने संसाधन से इस उभार की कोशिश आजादी से पहले ही की थी. बदलाव की आकांक्षा जगायी थी. भिखारी की मंडली गांव में ‘गबरघिचोर’ नाटक करती थी, जिसमें एक स्त्री अपने यौन आकांक्षा और स्वतंत्रता पर पंचों से बहस करती है. सोचिए, सामंतमिजाजियों के इलाके में, ठेठ गंवई मंच पर एक स्त्री के जरिये यह सार्वजनिक संवाद करने-करवाने का साहस कितना बड़ा रहा होगा. भिखारी ने यह बार-बार किया था. आज हाशिये के समूह को मुख्यधारा में लाने की पहल बिहार की राजनीति में चल रही है, भिखारी ने उसे भी बहुत पहले किया था. आप गौर करें उनके नाटक के पात्रों के नामों पर. मलेछू, चपाट, उदबास, गलीज आदि नाम उनके नाटक के नायकों के हैं. हाशिये के नाम, उपेक्षित-वंचित समुदायों के नामों को नायकत्व दे रहे थे भिखारी. अपने दल में वंचितों को शामिल कर नायकत्व भी प्रदान कर रहे थे.

आज भिखारी बिहार की प्रमुख भाषा भोजपुरी के समाज के सबसे बड़े अवलंबन हैं. दुनिया के उन तमाम मुल्कों में उनके नाम का सम्मान है, जहां भोजपुरी समझी जाती है. बिहारी अस्मिता को स्थापित करने और बिहारी शैली को परवान चढ़ाने को बेकरार नया बिहार, उनकी ताकत को क्यों नहीं समझ रहा, यह समझ से परे है. श्रीबाबू, अनुग्रह बाबू की जयंती समारोह समिति में शामिल सत्ता पक्ष, विपक्ष और वाम नेताओं के बुद्धि-विवेक पर तरस खाने के अलावा कुछ नहीं कर सकते आप !

सही है जो, क्यों न हो

जीवित रहने के लिए हर समाज को खुश रहने और भूलते रहने की आवश्यकता होती है. हल्की-फुल्की बेवकूफियां और स्मृतिलोप न हों तो जीवन एक बोझ बनकर बस काटने भर का रह जाएगा जीने लायक नहीं.

मगर याद रखना और दुखों से दो-चार होना भी कम जरूरी नहीं. कुछ दुख ऐसे होते हैं जिन्हें भूलना उचित नहीं और कुछ घाव ऐसे होते हैं जिन्हें खुला रखने की हिम्मत करनी ही चाहिए, ताकि उनके पीछे की कहानियों से जरूरी सबक लिए जा सकें. अगर ये दुख और घाव अन्याय होने और न्याय पाने के संघर्ष का हिस्सा हों तब ऐसा किया जाना और भी जरूरी है. जब कोई व्यक्ति सभ्यता के मान्य सिद्धांतों के बाहर जाकर कुछ भी अमानवीय करता है तो फिर उसे अपने ऐसे किए का दंश भुगतना ही चाहिए. जब कोई अपनी पाश्विक वृत्तियों के चलते दूसरों के साथ गलत करता है तो उसे शर्म और पछतावे के ताप को अनुभव करना ही चाहिए.

जो सामाजिक सौहार्द को बढ़ाने या बिगड़ने से रोकने के नाम पर हमें 2002 के गुजरात या 1984 की दिल्ली को भूल जाने को कहते हैं, वे गलत हैं. हम अपनी गलतियों को दुरुस्त नहीं करते हैं, इसलिए उन्हें दोहराते रहते हैं. गलतियों का यह दोहराव हमें कभी सुधरने नहीं देता.

यहूदी अपने भीषण दुखों को बड़े जतन से सहेजते हैं और उन्हें ऐसे हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं जो उनकी सुरक्षा करता है और कुछ करने के लिए उकसाता है. हमें अपनी विविधताओं-जटिलताओं के चलते और वैसे भी ऐसे किसी उकसावे की जरूरत नहीं, लेकिन जो कुछ नरौदा-पाटिया मामले में हुआ वैसा तो किया ही जाना चाहिए. मायाबेन कोडनानी (तस्वीर में) और बाबू बजरंगी को उनके अपराधों की सजा अदालत ने दी है न कि किन्हीं ऐसों ने जो संविधान के दायरे के बाहर जाकर काम कर रहे थे. हमें अपने दुखों को याद करने, उन्हें दूर करने और खुद को सुधारने के लिए ऐसे ही रास्तों को अपनाना होगा. थका देने वाले कानून के ऐसे रास्ते जिन पर गवाहियों और सबूतों के पहाड़ों को काटकर हमें बिना थके आगे बढ़ना होता है.

वर्ष 2002 में तीन दिन तक गुजरात पर मानो कहर बरपा. 10 साल में ही सही न्याय की किताब के कुछ पन्नों को बंद करने का काम शुरू हो गया है. हम सभी को इस पर गर्व होना चाहिए. 2002 में तीन दिन तक हजारों हिंदू अपने बारे में एक बाहरी और खतरनाक विचार के बहकावे में रहे. मगर पिछले 10 साल में सैकड़ों हिंदू – वकील, सामाजिक कार्यकर्ता पत्रकार, राजनेता – पीड़ित और मारे गए मुसलमानों के न्याय और अधिकार की लड़ाई भी लड़ते रहे. हम सभी को इस पर भी अभिमान होना चाहिए.

भले ही गुजरात, संघ परिवार की अतियों का परिणाम हो, राजधर्म के बोध का खत्म होना एक बड़ी समस्या है और इससे कोई भी दल या सरकार अछूती नहीं है. हमारे चारों ओर कानून के मुताबिक चलने वाले ऐसे शासन का वायदा, जो आंखों और दिल दोनों को ठीक लगे, तार-तार पड़ा नजर आता है. हद दर्जे की धूर्तता और लालच के दो पैरों पर खड़ा शासन हमें हर बीते दिन के साथ कुछ और भी छोटा किए जा रहा है. यहां भी हमें गुजरात के अभियान से ही अपने पाठ सीखने होंगे. हमें असंवैधानिक तरीकों की बजाय कानून के दायरे में रहकर, जरूरी तर्कों और संयमित भाषा में, सिद्धांतों न कि छुद्र पहचान के आधार पर जुटाए लोगों के बल पर अपनी लड़ाई लड़नी होगी

‘सरकार के पास सिर्फ 6 महीने का वक्त है'

2007 में भी सरकार आपसे वादा करके मुकर चुकी है. ऐसे में आप इस समझौते पर कितना विश्वास करते हैं?

2007 की पदयात्रा के बाद प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक आयोग और विशेषज्ञों की समिति का गठन हुआ था. आयोग ने कोई भी काम नहीं किया, लेकिन समिति ने अपना काम किया और अपनी रिपोर्ट में 300 सुझाव दिए. यह रिपोर्ट हमारे लिए एक हथियार बनी. इस बार भी टास्क फोर्स का गठन एक बड़ी सफलता है जिसके साथ मिलकर हम आगे की लड़ाई लड़ सकते हैं.

आंदोलन के चरम पर आते ही कई बड़े नाम आपके साथ जुड़ गए. कहीं ये लोग आपके आंदोलन से अपने राजनीतिक हित तो नहीं साध रहे हैं?

मध्य प्रदेश हमारा कार्यक्षेत्र होने के कारण वहां के मुख्यमंत्री से हमारे पुराने संबंध हैं. मैं गरीबों और भूमिहीनों के हितों से जुड़े कई काम उनसे करवाता रहा हूं तो उनका हमारे आंदोलन से जुड़ना स्वाभाविक है. स्वामी अग्निवेश भी भूमिहीनों के आंदोलनों से काफी समय से जुड़े रहे हैं और बाबा रामदेव को हमने ही आमंत्रित किया था. मैंने बाबा के भाषणों में उन्हें जल-जंगल-जमीन की बातें करते सुना था. तो मैंने ही उन्हें कहा कि आप जल-जंगल के अधिकारों की बात करते हैं तो हमारे साथ आइए.

क्या कारण थे कि जो बात ग्वालियर में नहीं बन पाई वह आगरा में बन गई?

समझौता तो ग्वालियर में ही होना तय हुआ था. जयराम रमेश के साथ 16 मुद्दों पर हमारी सहमति भी बन गई थी.  परंतु उन पर शायद मंत्रिमंडल या प्रधानमंत्री कार्यालय का दबाव था जो कि आखिरी समय में समझौता पत्र पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया गया. शायद केंद्र सरकार को यह भी डर था कि यदि यहां हस्ताक्षर कर दिए तो पूरे भारत में हो रहे आंदोलनों पर समझौता पत्र लिखित में न देना पड़ जाए. मगर आंदोलन का दबाव इतना बढ़ चुका था कि सरकार को आगरा में समझौता करना ही पड़ा.

क्या आपकी सभी मांगों को समझौते में शामिल किया गया है?

कई मुद्दों को टास्क फोर्स पर छोड़ दिया गया है, जैसे कि महिलाओं को भूमि अधिकार दिलाना. टास्क फोर्स का गठन ही एक बड़ा कदम है. सच्चर कमिटी जैसी कई रिपोर्टों टास्क फोर्स द्वारा खोली जाएंगी और उन पर काम होगा. इसमें काबिल लोगों को शामिल किया जाएगा. राज्यों का सहयोग भी इसमें बहुत जरूरी है. अब हम राज्यों के पास भी यह दस्तावेज लेकर जाएंगे और उनसे बात करेंगे.

जन सत्याग्रह पर हुए समझौते के किन बिंदुओं को आप भूमि सुधार की दिशा में सबसे अहम मानते हैं?

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भूमिहीनों को आवासीय भूमि देने की दिशा में यह पहला कदम है. राइट टू लैंड फॉर शेल्टरकी जो धारणा है वह इससे हासिल होती दिखती है. दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु है गरीबों को कृषि योग्य भूमि उपलब्ध करवाना. इस समझौते से इन दोनों ही उद्देश्यों के रास्ते खुले हैं.

किन मुद्दों पर राजी होने से सरकार सबसे ज्यादा कतरा रही थी?

केंद्रीय नीति लागू करवाना सबसे बड़ी चुनौती थी. भूमि को राज्यों का विषय बताकर केंद्र सरकार हमेशा इस मुद्दे को टालना चाहती थी. हमारा तर्क था कि भूमि अधिग्रहण कानून, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम और खान एवं खनिज संबंधी कई कानून केंद्रीय कानून हैं. फिर भूमि सुधार हेतु एक राष्ट्रीय नीति क्यों नहीं हो सकती?

समझौता पत्र पर हस्ताक्षर होने को आप आंदोलन की सफलता मानते हैं?

जी हां, मानता हूं. सार्वजनिक रूप से समझौता पत्र पर हस्ताक्षर होना आंदोलन की सफलता के साथ ही आम लोगों और अहिंसा की भी जीत है. आंदोलनों से निराशा के इस दौर में तो यह समझौता सभी के लिए उम्मीद जगाता है. साथ ही इस आंदोलनों से भूमि सुधार का मुद्दा एक बार फिर से राष्ट्रीय पटल पर आया है वरना इसे तो लोग भूल ही चुके थे. यहां तक कि भूमि सुधार की बात करने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां भी इस मुद्दे को पीछे छोड़ चुकी थीं.

यदि सरकार फिर से अपने वादों से मुकर जाती है तो आप क्या करेंगे?

छह महीने के भीतर यदि सरकार मांगें पूरी नहीं करती तो हम फिर से जन आंदोलन करेंगे. हम लोग मरने से नहीं डरते और सरकार यह जानती है. पिछली यात्रा में हमारे 13 साथियों की जान चली गई थी. दिन में एक बार खाना खाकर और पूरे दिन पैदल चलकर हम  लक्ष्य तक पहुंचते हैं. जिस गरीबी को लोग कमजोरी मानते हैं, हमने अपनी उसी कमजोरी को अपनी ताकत बनाया है. हमारी इस ताकत से सरकार भी घबराती है. इसीलिए ग्वालियर से आगरा आने तक ही सरकार को मानना पड़ा. यदि सरकार मुकरी तो लाखों लोगों का समूह अपने हक लेने दिल्ली आ पहुंचेगा.

सहकारिता से चुनावी सबक

मध्य प्रदेश में सहकारी संस्थाओं पर सत्तासीन होने के लिए भाजपा और कांग्रेस के बीच की उठापटक के साथ ही आगामी विधानसभा का चुनावी बिगुल भी बज गया है. असल में यह 2013 के चुनाव के ठीक पहले का ऐसा मुकाबला है जिसमें दोनों पार्टियां अपनी-अपनी ताकत और जनता की नब्ज टटोल लेना चाहती हैं. ये जानती हैं कि हर गांव में अपनी मौजूदगी दर्ज करने वाली यहां की पांच हजार से अधिक सहकारी संस्थाएं एक ऐसा क्षेत्र बनाती हैं जिससे 70 लाख किसान सदस्य सीधे जुड़े हैं. यही क्षेत्र सूबे का सबसे बड़ा राजनीतिक नेटवर्क है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ऐसी रीढ़ भी है जिस पर यदि किसी तरह सवार हो गए तो राजनीतिक दल इसके असीमित संसाधनों के दम पर आने वाले कई चुनावों में लाभ लेने की स्थिति में होंगे. यही वजह है कि राज्य में सत्ता की लगाम थामे भाजपा एक बार फिर कानून की आड़ लेकर इस रीढ़ पर सवार होने की तैयारी में है.

किंतु कांग्रेस भी कानून के ही कुछ ऐसे दांव खेल रही है जिससे भाजपा की सवारी तो मुश्किल में पड़ ही गई है, पहली बार सहकारिता के चुनावों के चलते राजनीति का पारा भी अचानक काफी ऊपर चढ़ गया है.
इस चढ़े हुए पारे को जानने से पहले थोड़ा इसकी अंतर्कथा को जान लेना दिलचस्प रहेगा. दरअसल सूबे की सहकारी संस्थाएं देश की सबसे पुरानी संस्थाओं में से हैं और शुरुआत से कांग्रेस के सत्ता में रहने के चलते उसके समर्थकों का ही इन पर कब्जा भी था. राजनीतिक प्रेक्षकों के मुताबिक अस्सी के दशक में पूर्व मुख्यमंत्री स्व. अर्जुन सिंह ने कांग्रेस की नींव मजबूत बनाने के लिए अपनी पार्टी के जिन सुभाष यादव को अपेक्स बैंक का अध्यक्ष बनाया था उन्होंने तीस साल से अधिक समय तक कभी अपनी कुर्सी बचाने तो कभी अपनों को कुर्सियों पर लाने के लिए कानूनों को मन-मुताबिक तोड़ा-मरोड़ा. सहकारिता को सत्ता की वैकल्पिक सीढ़ी बनाते हुए पूर्व उपमंख्यमंत्री के पद तक पहुंचने वाले यादव सहकारिता के नेटवर्क को इतना मजबूत मानते थे कि एक जमाने में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेटवर्क से मुकाबला करने के लिए सरस्वती शिशु मंदिर की तर्ज पर सहकारिता स्कूल खोलने तक की वकालत की थी. उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने ही राज्य में सहकारिता का एक ऐसा बहुस्तरीय (प्राथमिक सहकारी समिति से लेकर अपेक्स बैंक तक) ताना-बाना बुना था जिसमें लाखों वेतनभोगी कर्मचारियों को सत्ता का साथ देने के लिए एक सहायक कैडर के तौर पर उपयोग में लाया जाने लगा.

बीते सात साल से सहकारिता पर काबिज भाजपा भी यह भलीभांति जानती है कि सहकारिता इतना बड़ा सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम है जिससे प्रदेश का 70 प्रतिशत ग्रामीण वोट बैंक जुड़ा है. वह जानती है कि यदि उसे गांवों तक अपनी जड़ंे जमानी है तो प्राथमिक सहकारी संस्थाओं पर अपने समर्थकों को बैठाना पड़ेगा. इसके पहले भी 1990 में भाजपा के सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने सभी संस्थाओं को भंग करने का आदेश देकर सहकारिता से कांग्रेस समर्थकों को बेदखल किया था. मगर निर्वाचित संस्थाओं को अकारण भंग करने के चलते हाई कोर्ट ने सभी संस्थाएं पुनः बहाल कर दीं. इसके बाद 2003 में भाजपा जब दोबारा सत्ता में लौटी तो पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने सहकारिता पर पार्टी की पताका फहराने के लिए गोपाल भार्गव को विभागीय मंत्री नियुक्त किया. भार्गव ने एक विशेष रणनीति के तहत समयसीमा से अधिक खर्च करने के नाम पर बड़ी संख्या में पदाधिकारियों के खिलाफ जांच करवाई और उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया. सहकारिता उपभोक्ता भंडार के पूर्व अध्यक्ष ब्रजमोहन श्रीवास्तव बताते हैं, ‘इस दौरान शासन के एक विशेष आदेश के तहत कई कामकाजी कमेटियां बना ली गईं और सत्ता के सूत्रों का उपयोग करते हुए कई भाजपाई उनके अंदर पहुंच गए.’

सहकारिता इतना बड़ा सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम है कि इससे प्रदेश का 70 प्रतिशत ग्रामीण वोट बैंक जुड़ा है. इस बात को दोनों पार्टियां बहुत अच्छे से जानती हैं

लेकिन हाल ही में केंद्र की कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने संविधान में संशोधन करते हुए सहकारिता को मूलभूत अधिकारों में शामिल कर लिया है और इसी में सहकारिता चुनाव से जुड़ा एक ऐसा प्रावधान भी है जिसने इन दिनों भाजपा सरकार की नींद उड़ा दी है. प्रावधान के मुताबिक राज्य में सहकारी संस्थाओं का चुनाव एक स्वतंत्र प्राधिकरण के माध्यम से किया जाना है. अभी तक इसके चुनाव विभाग के ही आयुक्त पंजीयक के जरिए संपन्न कराए जाते रहे हैं. इस क्षेत्र की रिपोर्टिंग से जुड़े जानकार बताते हैं कि मुख्यधारा के चुनावों से ठीक उलट सहकारिता के चुनाव ‘जिसकी लाठी उसी की भैंस’ यानी जिसकी सत्ता उसी की सहकारिता की तर्ज पर कराए जाते रहे हैं. मगर केंद्र के इस संशोधन के बाद राज्य सरकार का निर्वाचन की प्रक्रिया पर किसी तरह का कोई नियंत्रण नहीं रह जाएगा और यही वजह है कि सूबे में जहां कांग्रेसी नेताओं की बांछंे खिली हुई हैं वहीं भाजपा ऊहापोह की स्थिति में है.

इस संशोधन का कानूनी पहलू यह है कि यह फरवरी, 2013 तक राज्य में प्रभावी हो जाएगा. यानी इसके पहले यदि चुनाव नहीं हुए तो राज्य की भाजपा सरकार अपने मुताबिक चुनाव नहीं करा सकती और उसे नई व्यवस्था के तहत चुनाव में उतरना पड़ेगा. इसलिए ऐसी स्थिति से बचने के लिए वह अपनी निर्वाचित सूची के आधार पर किसी भी सूरत में जनवरी के पहले चुनाव कराने की ताक में है. वहीं कांग्रेस की कवायद है कि जनवरी के पहले किसी भी सूरत में चुनाव न हो पाएं और इसी कवायद को लेकर दोनों दल कानून के मैदान पर अपनी-अपनी तलवारें भांज रहे हैं. कांग्रेस के सहकारिता नेता भगवान सिंह यादव कहते हैं, ‘जब एक बार केंद्र से संशोधन किया ही जा चुका है तो राज्य सरकार नई व्यवस्था लागू होने तक क्यों नहीं रुक सकती?’ दूसरी तरफ, सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन का कहना है, ‘सभी सहकारी संस्थाओं का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और ऐसे में निर्वाचन के लिए लंबा इंतजार नहीं किया जा सकता.’

भाजपा की दूसरी बेचेनी सहकारी अधिनियम, 1960 की धारा 48(7) को समाप्त करने से जुड़ी है. दरअसल 2007 के अधिनियम संशोधन में अऋणी (जिसने संस्थाओं से कभी लेन-देन नहीं किया) को भी चुनाव में भाग लेने का अधिकार दिया गया है. पर्दे के पीछे माना जा रहा है कि इन्हें कांग्रेस के प्रभाव से मतदाता सूची में शामिल किया गया था और यह गाहे-बगाहे उसी की तरफदारी करेंगे. एक तिहाई से अधिक अऋणी सदस्य होने के चलते भाजपा नेताओं को डर है कि यह संख्या कहीं सरकार का पांसा न पलट दें. उनके डर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य सरकार आनन-फानन में एक ऐसा अध्यादेश भी ले आई है जिसमें सभी अऋणी सदस्यों को चुनाव से दूर कर दिया जाएगा. अपेक्स बैंक के उपाध्यक्ष कैलाश सोनी की मानें तो इससे सहकारिता की सेहत सुधरेगी. सोनी के मुताबिक, ‘अऋणी सदस्यों का सहकारिता से कोई लेना-देना नहीं है. इसलिए संचालक मंडल में यदि इनकी संख्या बढ़ी तो यह सहकारिता का ही बेड़ा गर्क कर डालेंगे.’ वहीं कांग्रेस जानती है कि यदि ऋणी सदस्यों को ही शामिल किया गया तो इसका सीधा लाभ सत्तारूढ़ दल को मिलेगा. कांग्रेसी नेताओं को लगता है कि जिन किसानों ने सरकार से ऋण नहीं लिया वे तो उनकी तरफ रहेंगे लेकिन जिन्होंने जीरो प्रतिशत ब्याज दर जैसी लुभावनी योजना से ऋण लिया है वे सरकार की तरफ जाएंगे. इसीलिए अध्यादेश के खिलाफ वह राज्यपाल की परिक्रमा तो लगा रही है, हाई कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा आई है. कांग्रेसी विधायक गोविंद सिंह का कहना है, ‘किसी भी किसान का ऋण नहीं लेना इतनी बड़ी गलती नहीं है कि केवल इसी आधार पर उससे उसका मताधिकार छीन लिया जाए.’

भाजपा की दूसरी बेचेनी सहकारी अधिनियम, 1960 की धारा 48(7) को समाप्त करने से जुड़ी है.

भाजपा की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं. सहकारिता चुनाव कराने में सबसे बड़ी भूमिका अधिकारियों को निभानी है, लेकिन प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक लंबे समय तक सत्ता के शीर्ष पर बैठने के चलते इनमें से कईयों को सत्ता का चस्का लग गया है और वे चाहते हैं कि दोनों दल और अधिक उलझें ताकि कई संस्थाओं के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के पद पर बैठे रहने का उन्हें और अधिक मौका मिल सके. इसी के साथ भाजपा की एक अड़चन सहकारिता जैसी बड़ी सल्तनत में अपने और पराये की सही पहचान से जुड़ी है. पार्टी सूत्रों के मुताबिक सहकारिता में एक बड़ा तबका भाजपा के ही कैडर का है लेकिन इसमें खासी संख्या ऐसी भी है जो भाजपाई का छदम रूप धरकर घुस गई है. नौबत यह है कि जबलपुर, पन्ना, होशंगाबाद और सीधी जैसी कई सहकारी संस्थाओं में भाजपा को अपने द्वारा ही बनाए गए अध्यक्षों से लड़ना पड़ रहा है. यानी भाजपा में आपसी समन्वय का अभाव भी चुनाव थमने की एक वजह बन रहा है.

इन सबके बावजूद भाजपा को सहकारिता चुनाव में उतरना ही पड़ेगा. दरअसल भाजपा सूबे में तीसरी बार सरकार बनाने की जद्दोजहद में है और सरकार के खिलाफ बढ़ते रुख को भांपते हुए वह सहकारिता पर अपना शिकंजा कसना चाहती है. वरिष्ठ पत्रकार शिवअनुराग पटेरिया बताते हैं, ‘किसी भी चुनाव के पूर्व हर पार्टी अपने आपको जांचती-परखती है और जनता को मतदान तक खींचने के लिए एक तंत्र भी बनाती है. मध्य प्रदेश में सहकारिता बना-बनाया तंत्र है और इसलिए भाजपा अपने समर्थन में इस तंत्र को साध रही है.’ इसे साधने की और एक वजह है. प्रदेश में सरकार के मुकाबले सहकारिता के विभागों की संख्या कहीं अधिक है. इसलिए आगामी विधानसभा या लोकसभा चुनावों में भाजपा को यदि उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं मिले तो भी वह राज्य की इस समानांतर सत्ता पर आने वाले पांच साल तक बैठना चाहती है.

सेवा के बाद सलाह

‘हां… यह सच है कि मुझे विश्व हिंदू परिषद की ओर से अयोध्या के विवादित स्थल में भगवान श्रीराम के जन्म को प्रमाणित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. चूंकि मैं राम मंदिर की तलाश में काफी समय से लगा हुआ था, सो खुदाई के दौरान मिले हुए 84 खंबों, शिलालेखों तथा अन्य दस्तावेजों के आधार पर मैंने इलाहाबाद के सक्षम न्यायालय को यह अवगत कराया कि अयोध्या में एक नहीं तीन मंदिर थे. अब मैं पिछले कुछ समय से छत्तीसगढ़ में मंदिरों की खोजबीन में लगा हुआ हूं.’

छत्तीसगढ़ के संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में वर्ष 2005 से बतौर सलाहकार नियुक्त किए गए अरुण कुमार शर्मा बेबाकी से आगे कहते हैं, ‘सब जानते हैं कि बैतलपुर के मदकूदीप इलाके में ईसाई समुदाय की अच्छी-खासी मौजूदगी है, यहां हर साल एक बड़ा मेला भी लगता है, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक चाहते थे कि मैं मंदिरों को खोज निकालूं. उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए मैंने वहां भी 19 मंदिरों को खोज निकाला है.’ तहलका से चर्चा में शर्मा बेहिचक मानते हैं कि वे छात्र जीवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रमों में हिस्सेदारी दर्ज करते थे इसलिए अब भी राष्ट्रवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए वे प्रयत्नशील हैं.12 नवंबर, 1933 को रायपुर जिले के चंदखुरी इलाके के मोंहदी गांव में जन्मे शर्मा इसी साल 80 साल की देहरी छू लेंगे. छत्तीसगढ़ में वे अकेले बुजुर्ग सलाहकार नहीं हैं. यहां कई वयोवृद्ध और सेवानिवृत्त अफसर हैं जिन पर संघ और सरकार की कृपा बरस रही है. और जिन पर नहीं बरस रही है वे भी जुगाड़ की अपनी योग्यता के चलते सलाहकार बन बैठे हैं.

अब यह अलग बात है कि एक बड़ी सीमा तक उनकी सलाह का कोई फायदा होता नजर नहीं आ रहा. जोड़-तोड़ और जुगाड़ का बेहतर उपयोग करने के मामले में सबसे पहला नाम भारतीय प्रशासनिक सेवा 1973 बैच के अफसर शिवराज सिंह का लिया जाता है. 13 जुलाई, 1948 को जन्मे सिंह यूं तो प्रदेश के दो अफसरों बीकेएस रे और विजय कुमार कपूर से जूनियर थे, लेकिन वे न केवल मुख्य सचिव बने बल्कि सेवानिवृत होने के बाद उन्हें निर्वाचन आयुक्त भी बनाया गया. एक जून,  2010 से वे राज्य योजना आयोग में उपाध्यक्ष हैं और इसी तारीख से मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह के सलाहकार भी. वैसे तो शिवराज सिंह का संघ से कोई सीधा नाता नहीं रहा है लेकिन प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा आम है कि वे जोड़-जुगाड़, ब्रह्मांड- अध्यात्म और ग्रह-नक्षत्रों से होने वाले नफे-नुकसान के अपने ज्ञान के कारण मुख्यमंत्री की नजदीकी हासिल करने में सफल रहे हैं.शिवराज सिंह के अलावा प्रदेश में मुख्यमंत्री के संसदीय सलाहकार के तौर पर एक जून, 2006 से अशोक चतुर्वेदी भी कार्यरत हैं. उन्हें 65 हजार रु के वेतनमान पर रखा गया है. मध्य प्रदेश विधानसभा में श्रीनिवास तिवारी के अध्यक्षीय कार्यकाल के दौरान अशोक चतुर्वेदी सचिव थे और उन्हें संघ से नजदीकी रिश्ते रखने की वजह से ही अपने पद से हाथ भी धोना पड़ा था. कुछ समय तक वे एक मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के प्रमुख सहयोगी के रूप में भी कार्य करते रहे. वैसे तो उन्होंने ‘संसदीय लोकतंत्र और पत्रकारिता’ जैसे विषय पर किताब भी लिखी है, लेकिन संघ के कार्यक्रमों में अपनी मौजूदगी को लेकर वे कई बार चर्चा में रहे हैं.

‘विभागों में सलाहकारों की नियुक्ति से यह संदेश जाता है कि सलाहकारों की सलाह विभाग के अफसरों की सलाह से ज्यादा महत्वपूर्ण और तगड़ी है’

कई सलाहकार ऐसे भी हैं जिन्हें वरिष्ठ अफसरों के निकटतम होने का फायदा मिलता रहा है. अविभाजित मध्य प्रदेश में चीफ इंजीनियर के पद से सेवानिवृत्त हुए बीएस गुप्ता को ही लीजिए. जब छत्तीसगढ़ अविभाजित मध्य प्रदेश का हिस्सा था तब बिलासपुर मार्ग पर नांदघाट में एक पुल गुप्ता ने अपनी देखरेख में बनवाया था. यह पुल उनकी सेवानिवृत्ति से कुछ पहले ही टूट गया. तब विभागीय तौर पर यह माना गया था कि पुल में घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल किया गया था. लेकिन गजब देखिए कि यही गुप्ता छत्तीसगढ़ बनने के ठीक दो साल बाद 16 अप्रैल, 2002 को राज्य में निर्माण संबंधी गुणवत्ता जांच के लिए सलाहकार बना दिए गए. प्रदेश में जब भाजपा की सरकार बनी तो गुप्ता तत्कालीन लोकनिर्माण मंत्री राजेश मूणत और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर विवेक ढांड के करीबी बन बैठे. इस बीच 2004 में प्रदेश की सड़कों में ठेकेदारों द्वारा घटिया डामर इस्तेमाल किए जाने का एक सनसनीखेज मामला उजागर हुआ. इसकी गूंज विधानसभा तक पहुंची तो उन्हें सलाहकार के पद से हाथ धोना पड़ा. विवादों से घिरे रहने वाले 82 वर्षीय गुप्ता जोड़-तोड़ और जुगाड़ के चलते 30 जून, 2009 को एक बार फिर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के तहत बनने वाली प्रधानमंत्री ग्राम सड़क का कामकाज देखने वाले सलाहकार बना दिए गए हैं. चूंकि इस विभाग के अपर मुख्य सचिव भी विवेक ढांड ही हैं, इसलिए माना जा रहा है कि इस बार भी उनकी पारी थोड़ी लंबी हो सकती है.

आबादी के लिहाज से संतुलन बनाए रखने के लिए गठित की गई न्यू रायपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी (नारडा) में भी सलाहकारों का बोलबाला है. छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल में कार्यपालन अभियंता रहे एके बोस नई राजधानी की विद्युत संबंधी गतिविधियों के सुचारू ढंग से संचालन के लिए सलाहकार नियुक्त किए गए हैं, तो लोकनिर्माण विभाग में सहायक अभियंता के पद से रिटायर हुए एसके नाग को सड़क निर्माण क्षेत्र का सलाहकार बनाया गया है. रायपुर के कलेक्टर कार्यालय में जमीन का कामकाज देख चुके डीसी पांडेय किसानों की जमीन अधिगृहीत करने के दौरान होने वाली अड़चनों को दूर करने के लिए उपाय बताने वाले सलाहकार बनाए गए हैं तो फैयाज हुसैन को सीमांकन का सलाहकार बनाया गया है. वैसे तो नारडा से जुड़े एक अफसर इन सभी नामों को काबिल बताते हैं लेकिन अपना नाम न छापने की शर्त पर यह भी कहने से नहीं चूकते कि अफसरों ने काबिलियत की चमड़ी पर चमचागिरी का लेप मल रखा है. इन अफसरों को सलाहकार बनाने के अलावा नारडा ने 2005 से नवी मुंबई की शहरी नियोजन संस्था सिडको को भी अपना सलाहकार नियुक्त कर रखा है. विधिक सेवा से जुड़े लोग भी पीछे नहीं हैं. एक सितंबर, 2012 को सरकार ने एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश टीसी यदु को लोकसेवा आयोग में विधिक सलाहकार नियुक्त किया है. उनका वेतनमान है 76 हजार 450 रु . मध्य प्रदेश में एक महिला कर्मचारी के साथ विवाद के चलते सुर्खियों में रहे बीएल शर्मा को 29 जून, 2012 को राज्य योजना आयोग में सलाहकार बनाया गया है. शर्मा राज्य योजना आयोग में निदेशक पद से रिटायर हुए हैं.

मंत्रालय के एक वरिष्ठ अफसर नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘बोर्ड, मंडलों और विभागों में सलाहकारों की नियुक्ति से यह संदेश जाता है कि सलाहकारों की सलाह विभागीय अफसरों की सलाह से ज्यादा महत्वपूर्ण और तगड़ी है. लेकिन सच्चाई यह है कि आज तक किसी भी अफसर की सलाह से कभी कोई फायदा होते नहीं दिखा है.’  इस बात में दम इसलिए भी नजर आता है कि राज्य की पावर कंपनी में कई सलाहकार नियुक्त होते रहे हैं लेकिन किसी भी सलाहकार ने अब तक यह नहीं बताया कि कंपनी को घाटे से कैसे उबारा जा सकता है. 2007 में यानी अपने विखंडन से पहले विद्युत मंडल 355 करोड़ रु. के फायदे में था. लेकिन 2008 में उत्पादन, होल्डिंग, वितरण, पारेषण और ट्रेडिंग कंपनियों के बन जाने से कंपनी का घाटा 740 करोड़ रु. तक जा पहुंचा है. बिजली महकमे से जुड़े एक प्रमुख कर्मचारी नेता पीएन सिंह प्रदेश में हाल ही में चर्चित ओपन एक्सेस घोटाले का हवाला देते हुए कहते हैं, ‘राज्य में निजी बिजली कंपनियों श्रेयस सहला और बागबहरा की जिंदल इलेक्ट्रिक पावर ने छत्तीसगढ़ राज्य पावर कंपनी से बिजली चोरी करके उसे अन्य निजी उत्पादकों को बेचने का खेल किया था.

‘यदि किसी भी सलाहकार की सलाह का कोई ब्योरा मौजूद नहीं है तो संदेश साफ है कि अफसरों को उपकृत किया जा रहा है’

ये कंपनियां अफसरों की मिली-भगत से चोरी की बिजली को प्रदेश के बाहर बेचा करती थीं.’  पीएन सिंह बताते हैं कि दो निजी उत्पादकों को लाभ पहुंचाने के मामले में मुख्य अभियंता एके राय और सलाहकार एसआर सिंह को प्रमुख रूप से जिम्मेदार माना गया था. निलंबन की गाज दोनों पर साथ ही गिरी थी. बिजली कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष अरुण देवांगन भी मानते हैं कि पावर कंपनी में तैनात सलाहकार कंपनी को नुकसान ही पहुंचा रहे हैं. वे कहते हैं, ‘अब तक किसी भी सलाहकार ने छत्तीसगढ़ पावर कंपनी को घाटे से उबारने की सलाह नहीं दी है, इसलिए सीधे तौर पर यह तो कहा जा सकता है कि पावर कंपनियां रिटायर्ड अफसरों को सलाहकार बनाकर उपकृत कर रही हैं या फिर ढो रही हैं.’

वैसे तो पावर कंपनी बनने से पहले विद्युत मंडल में कई सलाहकार कार्यरत रहे हैं लेकिन फिलहाल तीन सलाहकारों की नियुक्ति विवादों के घेरे में है. आयकर विभाग में 30 जुलाई, 2010 तक चीफ कमिश्नर रहे जमील अहमद सेवानिवृत्ति के कुछ दिनों बाद ही होल्डिंग कंपनी के सलाहकार बना दिए गए थे. उनकी नियुक्ति को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही उठता रहा है कि चूंकि वे बिजली विभाग से जुड़े हुए नहीं हैं इसलिए बिजली की एबीसीडी से भी वाकिफ नहीं हैं. बहरहाल जब वे आयकर विभाग से सेवानिवृत्त हुए थे तब उन्हें एक लाख तीन हजार 66 रु. वेतन हासिल होता था. सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्हें 51 हजार पांच सौ तैतीस रु. पेंशन पाने की पात्रता हासिल हुई. इधर पावर कंपनी भी उन्हें सलाहकार के तौर पर 51 हजार रु. दे रही है. इस तरह उन्हें फिर से उतनी ही तनख्वाह मिल जाती है जितनी आयकर महकमे में मिलती थी.

छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल से बतौर सचिव सेवानिवृत्त हुए एपी नामदेव ने तो सलाहकार के तौर पर एक्सटेंशन हासिल करने का रिकॉर्ड ही तोड़ डाला है. 31 जुलाई, 2006 को सेवानिवृत्त होने के बाद नामदेव पहली बार 28 अगस्त, 2006 को महज डेढ़ माह के लिए सलाहकार बनाए गए थे, लेकिन 10 अक्टूबर, 2006 को उन्हें एक्सटेंशन दे दिया गया. एक मार्च व 1 सितंबर , 2007 को उन्हें फिर एक्सटेंशन मिला. 29 अगस्त, 2008 के बाद उन्हें 19 जनवरी और 30 जुलाई, 2009 को एक्सटेंशन दिया गया.  2010, 2011 और 2012 में उन्हें तीन बार और एक्सटेंशन मिला. इस तरह से बीते 72 महीने में वे कुल दस मर्तबा पावर वितरण कंपनी में सलाहकार नियुक्त किए गए. कंपनी का रिकॉर्ड यह बताता है कि इस दौरान उन पर कुल 85 लाख 77 हजार पांच सौ ( वेतन-वाहन-टेलीफोन व्यय के साथ ) का खर्च किया गया. बिजली के अनाप-शनाप बिल से परेशान आरटीआई कार्यकर्ता एवं राज्य निर्माण सेनानी संघ के प्रांताध्यक्ष ललित मिश्रा ने हाल ही में जब सूचना के अधिकार के तहत नामदेव की तरफ से बोर्ड को दी गई सलाह और फायदों की जानकारी मांगी तो जवाब मिला कि किसी भी सलाहकार की सलाह को लेखे में संधारित नहीं किया जाता है. पॉवर कंपनी के इस जवाब को ललित मिश्रा मनमानी की पराकाष्ठा मानते हैं. वे कहते हैं, ‘ यदि पावर कंपनी के पास किसी भी सलाहकार की महत्वपूर्ण सलाह का कोई ब्योरा मौजूद नहीं है तो साफ तौर पर यह स्पष्ट है कि कंपनी चमचागिरी में लिप्त अफसरों को उपकृत करने के गोरखधंधे में लगी हुई है.’

पावर कंपनी में तीसरे सलाहकार सीसी एंथोनी की नियुक्ति भी हाल-फिलहाल हुई है. 31 अगस्त, 2012 को सेवानिवृत्त हुए एंथोनी को कंपनी में ही कार्यरत एक अफसर जीएस कलसी का करीबी माना जाता है. कर्मचारी एवं अफसर दबी जबान में उनका विरोध कर रहे हैं. उनका तर्क है कि अब तक मुख्य अभियंता को ही सलाहकार बनाया जाता था लेकिन पहली बार एक अतिरिक्त मुख्य अभियंता ( एंथोनी पावर कंपनी से इसी पद पर रहते हुए सेवानिवृत्त हुए हैं ) को सलाहकार बना दिया गया है. जोड़-तोड़ के अलावा एक खास विचारधारा से जुड़े लोगों को ही सलाहकार के तौर पर नियुक्त किए जाने के मामले को पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी एक गंभीर मसला मानते हैं. वे कहते हैं, ‘सरकार अपने गुप्त एजेंडे के तहत सलाहकारों की आड़ में चुनाव वैतरणी को पार लगाने वाले कलाकारों की फौज तैयार करने में जुटी हुई है.’