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क्या इनका हश्र भी निगमानंद जैसा होगा?

राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के तीन सदस्यों के इस्तीफे ने एक बार फिर गंगा को स्वच्छ करने की महत्वाकांक्षी कवायद पर सवाल खड़े कर दिए हैं. 2008 में जब इस प्राधिकरण की स्थापना हुई थी तो लगा था कि मैली गंगा के दिन फिरने वाले हैं. लेकिन साढ़े तीन साल में ही हाल वही ढाक के तीन पात जैसा हो गया. इस्तीफा देने वाले तीन सदस्यों में से एक जल संरक्षण पर अपने काम के लिए चर्चित राजेंद्र सिंह भी हैं. उनका आरोप है कि प्राधिकरण के अध्यक्ष और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस नदी के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं समझ रहे. राजेंद्र सिंह के साथ प्राधिकरण के दो अन्य सदस्य रवि चोपड़ा और आरएच. सिद्दिकी भी गंगा को लेकर स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद के आमरण अनशन के समर्थन में प्रधानमंत्री को अपना इस्तीफा भेज चुके हैं.

इस मुद्दे के केंद्र में हैं 80 वर्षीय स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद जो पहले प्रोफेसर जीडी अग्रवाल के नाम से जाने जाते थे. उनका यह अनशन भौतिक से आध्यात्मिक परिवर्तन का अनूठा उदाहरण है.जिस सिविल इंजीनियर ने अपनी जिंदगी के सात साल रिहंद बांध परियोजना को दिए हों, आईआईटी प्रोफेसर के तौर पर जिसके पढ़ाए सैकड़ों छात्र रात-दिन देश की अनेक जल विद्युत परियोजनाएं बनाने में जुटे हों, उस व्यक्ति ने गंगा की अविरलता के लिए करीब दो महीने से अन्न और अब जल भी त्याग दिया है. अग्रवाल आईआईटी में सिविल इंजीनियरिंग और पर्यावरण विज्ञान विभाग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. अब वे ज्योतिषपीठ के दीक्षित शिष्य हैं. अपनी पीठ के तीर्थ अलकनंदा नदी के अलावा स्वामी सानंद ने गंगा की दो अन्य धाराओं भागीरथी और मंदाकिनी की अविरलता और पवित्रता की रक्षा के लिए अन्न-जल छोड़ दिया है.

स्वामी सानंद यह आंदोलन गंगा सेवा अभियानम् संगठन के दिशानिर्देश पर कर रहे हैं. इस अभियान के सर्वे-सर्वा उनके आध्यात्मिक गुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद हैं , जो ज्योतिष और द्वारिकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद के शिष्य हैं. आमरण अनशन पर जाने से पहले स्वामी सानंद ने 25 दिसंबर से अन्न त्याग कर फलाहार शुरू कर दिया था. 14 जनवरी से उन्होंने फलाहार भी छोड़ दिया और अब वाराणसी में आठ मार्च, 2012 से उन्होंने जल का भी त्याग कर दिया है. स्वामी सानंद के अलावा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह, गंगा प्रेमी भिक्षु और स्वामी कृष्ण प्रियानंद ने भी इस तपस्या में संकल्प लिया है. अविमुक्तेश्वरानंद बताते हैं, ‘रणनीति यह है कि एक तपस्यारत के प्राण जाते ही दूसरा उसकी जगह तपस्या में बैठेगा.’ वे आगे कहते हैं, ‘गंगा की अविरलता और स्वच्छता के लिए हम आंदोलन नहीं बल्कि तपस्या कर रहे हैं.’
इससे पहले प्रोफेसर अग्रवाल नवंबर, 2008 में 18 दिन तक उत्तरकाशी और दिल्ली में गंगा की अविरलता के लिए अनशन कर चुके हैं. उसके बाद 14 जनवरी, 2009 से शुरू हुआ उनका दूसरा अनशन 38 दिन तक दिल्ली में हिंदू महासभा के भवन में चला. साल 2010 में मातृ सदन में उनका तीसरा अनशन 39 दिनों तक चला. इन तीनों अनशनों के बाद वे भागीरथी पर उत्तरकाशी से ऊपर बनने वाली तीन बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं-लोहारी नागपाला, भैरोंघाटी और पाला मनेरी को बंद करवाने में सफल रहे थे.

अभियानम् का मानना है कि गंगा को राष्ट्रीय नदी बनाने की घोषणा करने के बाद भी अभी तक ऐसे कानून नहीं बनाए गए हैं जो इसके अनादर को दंडनीय बनाते हों जैसा कि अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों जैसे राष्ट्र ध्वज के मामले में होता है. उनका मानना है कि गंगा पांच राज्यों से बहती है और इसकी सहायक धाराएं तो 11-12 राज्यों और तिब्बत से भी आती हैं, इसलिए गंगा की पवित्रता की रक्षा के लिए केंद्रीय कानून बनना जरूरी है. अविमुक्तेश्वरानंद का तर्क है कि गंगा ऐक्शन प्लान 1 और 2 में करीब 12 हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं. उन्हें लगा कि इस बार भी तय 15 हजार करोड़ रु यूं ही बर्बाद हो जाएंगे और गंगा वैसी की वैसी रहेगी. इसी डर से गंगा सेवा अभियानम् ने तपस्या का निर्णय लिया.

बड़े नेताओं में से अभी तक इस आंदोलन को समर्थन देने के लिए केवल भाजपा की उमा भारती ही मातृ सदन आई हैं. केंद्र सरकार की तरफ से अभी तक वार्ता का कोई संकेत नहीं दिख रहा है.

अब सवाल यह है कि क्या जान देने के बाद ही स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद की बात सुनी जाएगी.

ऐतिहासिक चूक

उत्तर प्रदेश में विधानसभा के हालिया चुनावी नतीजों ने सियासत में अर्श से फर्श की जो मिसाल पेश की है अक्सर भारतीय राजनीति में दिख जाती है. हालांकि न तो सपा ने इतनी बड़ी कामयाबी के ख्वाब देखे थे और न ही बसपा सुप्रीमो मायावती को इतने बड़े सदमे का इल्म था. 20 करोड़ की आबादी वाले सूबे में दुर्गति तो कांग्रेस और भाजपा की भी हुई है, लेकिन सबसे बड़ी चोट उन मायावती को लगी है जिन्हें पांच साल पहले सोशल इंजीनियरिंग के नए फॉर्मूले ने 16 साल बाद प्रदेश की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने का अवसर दिया था. जिस सामाजिक ताने-बाने के चुनावी गणित ने मायावती को पिछली मर्तबा स्टार बनाया था, उसी के उलटने से बसपा को इस बार जमीन सूंघनी पड़ी है. वस्तुतः उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी एक बार फिर उसी मुकाम पर वापस पहुंच गई है जो इसके संस्थापक कांशीराम के चरम काल में हुआ करता था.

दरअसल मायावती के इस दुःस्वप्न के लिए उनकी कार्यशैली और वे विश्वस्त जिम्मेदार हैं जिन पर पूरी तरह निर्भर रहते हुए बसपा प्रमुख ने पांच साल तक प्रदेश में राज किया. शासन-प्रशासन की पूरी जिम्मेदारी जिन अफसरों पर थी उन्होंने ज्यादा वक्त मुख्यमंत्री को इस असलियत से दूर रखा कि अगड़ी जातियों खास तौर से ब्राह्मणों में सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश था. यही नहीं, बसपा के जिन जोनल और जिला कोऑर्डिनेटरों के जिम्मे पार्टी संगठन मजबूत करने और सरकार की नीतियों को जन-जन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी थी उन्होंने भी पार्टी सुप्रीमो को जमीनी हकीकत से दूर रखा. एक वक्त दो जोड़े कपड़ों में महीनों गुजार देने वाले बसपा के शुरुआती मूवमेंट से जुड़े ज्यादातर कोऑर्डिनेटर महंगी गाड़ियों में घूमने लगे, लेकिन मायावती को यह सब नहीं दिखा.

सरकार के ज्यादातर मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त रहे, लेकिन मुख्यमंत्री को यह तभी नजर आया जब तमाम मामले लोकायुक्त तक पहुंच गए. चुनाव के ऐन पहले तक लोकायुक्त की सिफारिश पर बर्खास्त होने वाले मंत्रियों की संख्या 17 तक पहुंच गई तो जनता को भी लगने लगा कि अगर लोकायुक्त नहीं होता तो शायद मुख्यमंत्री की आंखों को भ्रष्टाचार की भद्दी सूरत नजर ही नहीं आती.

जिन ब्राह्मणों ने पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा को वोट दिया था उन्हें सम्मान की बजाय एससी-एसटी ऐक्ट के फर्जी मुकदमों के जरिए अपमान मिला. हालांकि इस ऐक्ट के दुरुपयोग पर मायावती ने सख्ती के निर्देश दिए थे, लेकिन कुछेक घटनाओं के चलते अगड़ी जातियों में सरकार के खिलाफ आक्रोश का माहौल बन गया.

2007 में ऐतिहासिक जीत के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली मायावती को सभी जातियों का भरपूर समर्थन मिला. सदियों से एक-दूसरे के खिलाफ रहने वाले ब्राह्मण और दलित बसपा के छाते के नीचे इकट्ठा हो गए, लेकिन मायावती यह संतुलन कायम रख पाने में बुरी तरह असफल रहीं. बसपा सुप्रीमो ने पांच साल तक कमोबेश घर में ही बैठकर सरकार का संचालन किया.

असल में मायावती ने मुलायम सिंह के जंगल राज से निजात दिलाने के सपने तो दिखा दिए थे लेकिन उसको वास्तविकता में बदलने का काम उन्होंने खुद करने की बजाय कुछ चुनिंदा अफसरों के सिर पर छोड़ दिया. प्रदेश के इतिहास में पहली मर्तबा कैबिनेट सचिव का पद बनाकर मुख्यमंत्री नौकरशाही के आसरे हो गईं. पहले जिन मंत्रियों की भीड़ शासकीय दिशानिर्देश के लिए मुख्यमंत्री के दफ्तर में जमती थी वह लाइन कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह के दफ्तर में लगने लगी. जनता तो कोसों दूर, मंत्रीगण तक आसानी से मुख्यमंत्री से नहीं मिल पाते थे. यही हाल प्रमुख सचिव और सचिव स्तर के आईएएस अफसरों का था. संवाद का जरिया थे कैबिनेट सचिव और गिनती के कुछ अन्य अफसर और शायद इसी वजह से मायावती को धरातल की खबर हालिया विधानसभा चुनाव के बाद ही मिल पाई.

सत्ता छिनने के बाद मायावती ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा कि अगड़ी जातियों के मतों में विभाजन और मुसलमानों के 70 फीसदी मतों के सपा के पक्ष में जाने से बसपा का नुकसान हुआ. मायावती का जोर इस बात पर था कि वे दलितों का पूरा वोट पाने में सफल रही हैं. मायावती के इस बयान में उनकी सबसे बड़ी चिंता छिपी हुई है. प्रेस कॉन्फ्रेंस में वे इसे छिपाने की कोशिश कर रही थीं. आंकड़े बताते हैं कि मायावती का दलित जनाधार उनसे दूर हुआ है. वास्तव में गैरजाटव दलित वोटों के बंटने से बसपा का सबसे बड़ा नुकसान हुआ और सूबे की 85 सुरक्षित सीटों में पार्टी को कुल 15 सीटें ही मिल पाईं. पिछली बार यह संख्या 61 थी. इसके विपरीत सपा को 57, कांग्रेस को चार, रालोद और भाजपा को तीन-तीन सीटें मिलीं. मायावती का कहना है कि बसपा की बड़ी हार के पीछे मुसलिम आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस के बीच हुई घमासान और हिंदू मतों के ध्रुवीकरण की चिंता में मुसलिम वोटों का सपा के पक्ष में ध्रुवीकरण एक बड़ा कारण रहा जबकि दलित वोट बैंक पूरी तरह उनके पक्ष में एकजुट रहा. नतीजों पर निगाह डालें तो साफ है कि जाटवों ने तो बसपा का साथ दिया लेकिन धोबी, पासी, बाल्मीकि जैसे गैरजाटव दलितों ने उससे इस बार किनारा कर लिया. मायावती भले ही सफाई दें लेकिन एक हकीकत यह भी है कि गैरजाटव दलित तो 2009 के लोकसभा चुनाव में ही उनसे छिटक गया था. प्रदेश की 17 सुरक्षित लोकसभा सीटों में मुलायम को 11 मिली थीं, जबकि बसपा सिर्फ एक सीट ही जीत सकी थीं.

2007 में सरकार बनते ही मायावती ने अगड़ी जातियों को ज्यादा तवज्जो देते हुए सामाजिक संतुलन का जो ताना-बाना बुना वह दलितों को रास नहीं आया. गांव-गांव और जिलों-जिलों में अंबेडकर की मूर्ति न लगाने के आदेश हुए और एससी/एसटी ऐक्ट का कथित दुरुपयोग रोकने के लिए पुलिस उपाधीक्षक स्तर के अफसर की सहमति प्राप्त करने का प्रावधान किया गया. दलितों को लगा कि यह मायावती का अगड़ी जातियों के प्रति समर्पण है और गैरजाटव दलितों में इसकी खासी प्रतिक्रिया हुई जो 2009 के लोकसभा चुनाव के परिणामों में परिलक्षित हुई.

मायावती सपा के जंगल राज से निजात दिलाने के नाम पर सत्ता में आई थीं, लेकिन उसको लागू करने का   काम उन्होंने कुछ अफसरों के सिर पर छोड़ दिया

इसके बाद मायावती ने अपना स्टैंड बदला और बाकी के ढाई साल उनका रवैया अति दलित प्रेम का रहा. इस अवधि में सूबे में बहुत-से स्थानों पर एससी/एसटी ऐक्ट के दुरुपयोग के मामले हुए, लेकिन मुख्यमंत्री को उनके पसंदीदा अफसरों ने इसकी भनक तक नहीं लगने दी जिसका नतीजा अब सामने आया है.

एंटी इन्कंबेन्सी फैक्टर से निपटने के लिए मायावती ने इस बार 100 से ज्यादा मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए. उनकी सोच थी कि जनता में इन चेहरों के प्रति गुस्सा है इसलिए नए चेहरों के साथ चुनाव में उतरने पर वह सारे कुकर्मों को भूल जाएगी. लेकिन जनता का गुस्सा बसपा से था. ज्यादातर क्षेत्रों में अगड़ी जातियों ने बसपा को हराने के लिए जिसे भी सक्षम पाया उसे वोट दिया. यही काम गैरजाटव दलितों ने भी किया. अंबेडकर नगर बसपा का पुराना गढ़ रहा है जहां से मायावती एक मर्तबा लोकसभा भी पहुंच चुकी हैं. अंबेडकर नगर की सभी पांच सीटों पर पिछली बार बसपा के प्रत्याशियों ने चुनाव जीता था. लेकिन इस बार इस जिले में पार्टी का खाता तक नहीं खुला. आस-पास के जिलों बाराबंकी, गोंडा, फैजाबाद, जौनपुर, सुलतानपुर, लखनऊ और प्रतापगढ़ में भी पार्टी शून्य रही जबकि सात-सात विधायक देने वाले आजमगढ़ से पार्टी का केवल एक प्रत्याशी बमुश्किल जीत सका.

वैसे आनुपातिक लिहाज से सपा के मुकाबले बसपा 3.24 प्रतिशत ही पीछे है, लेकिन कुल साढ़े चौबीस लाख वोटों के अंतर के चलते उसे सपा के मुकाबले 144 सीटें कम मिली हैं.

चिंता की साफ लकीरें

दलितों की उदासीनता और ब्राह्मणों की नाराजगी ने मायावती को बैकफुट पर ला दिया है. संभवतः इन्हीं हालात के मद्देनजर बसपा सुप्रीमो ने सूबे में शीघ्र संभावित स्थानीय निकाय चुनाव से दूर रहने का फैसला किया है. इसके पीछे मायावती की खास रणनीति है. बसपा प्रमुख को लगता है कि लोकसभा के चुनाव वक्त से पहले होंगे और स्थानीय निकाय चुनाव में अगर पार्टी हिस्सा लेती है तो उम्मीदन इसके खराब नतीजे बड़ी लड़ाई में पार्टी की हालत और बिगाड़ सकते हैं. फिलहाल मायावती राज्य में पार्टी संगठन को अपनी देखरेख में मजबूत करके एक बार फिर सामाजिक भाईचारा की कवायद शुरू करने जा रही हैं. बसपा सुप्रीमो ने पार्टी के सभी कोऑर्डिनेटरों के काम-काज में बड़ा बदलाव करते हुए प्रदेश को दो हिस्सों में बांटकर संगठन संचालन स्वयं अपने हाथ में लेने का फैसला किया है.

विधानसभा चुनाव में भारी पराजय के बाद मायावती ने लखनऊ में लगातार दो दिन तक पार्टी संगठन के साथ बैठक करके कार्यकर्ताओं को नए सिरे से निर्देश जारी किए हैं. इन बैठकों में खास बात यह रही कि सतीश चंद्र मिश्रा और नसीमुद्दीन जैसे कद्दावर नेताओं को मायावती ने पहली बार प्रदेश भर से जुटे पार्टीजनों के सामने ही लताड़ लगाई. बसपा सुप्रीमो ने पांच साल में पहली बार इन नेताओं को मंच पर न बैठाकर आम कार्यकर्ताओं के साथ बैठाया. मायावती ने स्वीकार किया कि इन नेताओं ने उन्हें अंधेरे में रखा. पर इससे उनकी अपनी खामी ही उजागर होती है. मायावती ने नसीमुद्दीन को कार्यकर्ताओं के सामने ही डांटते हुए कहा, ‘तुम चुप रहो, मैं सब देख लूंगी.’ इस पर हॉल में बैठे बसपाइयों ने जमकर तालियां बजाईं. मायावती ने पार्टी के प्रमुख कोऑर्डिनेटर जुगल किशोर को भी खरी-खोटी सुनाई,  ‘यह अकेले ही अस्सी-नब्बे सीटें जिता रहा था, अपने बेटे के लिए टिकट मांगा तो मैने दे दिया, उसको भी नहीं जिता पाया. अब चुपके से पीछे बैठा है.’

बसपा सुप्रीमो ने लोकसभा चुनाव से पहले पार्टीजनों के बीच अपना एजेंडा साफ कर दिया है. दलित वर्ग के कार्यकर्ताओं के साथ ही सभी सांसदों, विधायकों, पराजित प्रत्याशियों और कोऑर्डिनेटर को कहा गया है कि प्रदेश में एससी/एसटी ऐक्ट के तहत मुकदमे दर्ज कराने से यथासंभव परहेज किया जाए. यदि किसी दलित के साथ कोई संगीन जुर्म होता है तभी थाने जाने की जरूरत है. दरअसल मायावती का सोचना है कि इस ऐक्ट के दुरुपयोग का भ्रामक प्रचार करके दूसरी पार्टियों ने उन्हे बड़ा सियासी नुकसान पहुंचाया है और अब सत्तारूढ़ दल के समर्थक एक बार फिर ऐसा माहौल बनाने की साजिश कर सकते हैं.

अगड़ी जातियों के साथ रिश्ते सुधारने के साथ ही मायावती का दूसरा खास एजेंडा ओबीसी वोट बैंक के बीच फिर से अपनी पहुंच बनाना है. मायावती ने पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए हैं कि वे पिछड़ी जातियों के बीच जाकर भरोसा पैदा करें और उन्हें समझाएं कि आज उन्हें आरक्षण का जो लाभ मिल रहा है वह वास्तव में डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की देन है. बसपा सुप्रीमो ने स्वीकार किया है कि उन्होने अपने दलित पदाधिकारियों पर भरोसा किया लेकिन वे सवर्णों के बीच स्थान नहीं बना पाए.

जाहिर है कि मायावती को अपने सोशल इंजीनियरिंग का गणित फेल होने का अहसास हुआ है और भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न हो इसके ठोस उपाय ढूढ़ने की कवायद उन्होने शुरू कर दी है. मायावती की रणनीति अब न्यूनतम गलती करने और समाजवादी पार्टी सरकार की हर गलती पर नजर रखने की होगी.

दिग्पराजय

पिछले तीन साल में मीडिया में आई कांग्रेस संबंधी खबरों का लेखा-जोखा निकाला जाए तो पता चलेगा कि सबसे ज्यादा जगह दिग्विजय सिंह ने घेरी. थोड़ी और पड़ताल की जाए तो पता चलेगा कि मध्य प्रदेश पर दस साल तक राज करने वाला यह नेता अक्सर नकारात्मक वजहों से सुर्खियों में रहा. सरकार में बगैर किसी ओहदे के चर्चा में कैसे बने रह सकते हैं, यह दिग्विजय सिंह ने दिखाया. जितने मुखर वे दिखे, उतना कोई और कांग्रेसी नहीं दिखा. मीडिया, संगठन और सरकार में उनकी छवि कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी के राजनीतिक गुरु की बन गई. राहुल गांधी ने अपने लिए सबसे बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों को तय किया था. इसके तहत दिग्विजय सिंह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया. 2009 के लोकसभा चुनाव के परिणाम ने राहुल का उत्साह बढ़ाने का काम किया था. राहुल बरास्ते उत्तर प्रदेश सात रेस कोर्स रोड में पहुंचने की रणनीति के तहत काम कर रहे थे. लेकिन इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पिछली बार की तरह चौथे नंबर पर रही. राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह की रणनीति ढेर हो गई. अब सवाल उठता है कि इसके बाद दिग्विजय सिंह की राजनीतिक दिशा क्या होगी.

विधानसभा चुनावों में खास तौर पर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हार पर सोनिया गांधी का कहना था कि हार की समीक्षा होगी और जरूरी कदम उठाए जाएंगे. कुछ लोग यह संकेत निकाल सकते हैं कि इस हार के लिए कुछ लोगों पर गाज गिरेगी. लेकिन सच्चाई कुछ और है. वरिष्ठ पत्रकार रसीद किदवई ‘तहलका’ से कहते हैं, ‘कांग्रेस विचित्र पार्टी है. यहां अकाउंटेबिलिटी का अभाव है. किसी को सजा देने की परंपरा यहां नहीं है. इसलिए यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व दिग्विजय सिंह के पर कतरेगा.’

राजनीति के चतुर खिलाड़ी दिग्विजय सिंह ने अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने का इंतजाम पहले से ही कर रखा है. हिमांशु शेखर का आकलन

तो फिर आगे दिग्विजय सिंह की भूमिका क्या होगी? कांग्रेसी सूत्रों के मुताबिक पार्टी में कई वरिष्ठ नेता उन्हें पसंद नहीं करते. इन नेताओं में दो सबसे बड़े नाम हैं पी चिदंबरम और कपिल सिब्बल. सूत्र बताते हैं कि पार्टी की आंतरिक बैठकों में इन दोनों नेताओं ने दिग्विजय पर हल्ला बोल दिया है. यूपी की हार का ठीकरा वे दिग्विजय की अनावश्यक बयानबाजी पर फोड़ना चाहते हैंैं. चिदंबरम और दिग्विजय का टकराव पुराना है. नक्सलवाद से लेकर बाटला हाउस मुठभेड़ तक दोनों नेताओं की अलग-अलग लाइन रही है. बाटला हाउस को जिस आजमगढ़ में दिग्विजय ने बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की वहां की सभी दस विधानसभा सीटों पर कांग्रेस तीसरे और चौथे स्थान पर रही. कहा जाए तो उत्तर प्रदेश में दिग्विजय का कोई भी दांव सफल नहीं हुआ. यही वजह है कि चिदंबरम और सिब्बल समेत कई कांग्रेसी दिग्विजय सिंह को किनारे करने के पक्षधर हैं. लेकिन क्या यह संभव है?

इस सवाल का जवाब समझने के लिए एक घटना का जिक्र जरूरी है. कुछ ही महीने पहले एक पत्रकार ने दिग्विजय सिंह से पूछा कि क्या उनकी कोई ऐसी इच्छा बची है जो पूरी नहीं हुई हो. उन्होंने जवाब दिया कि वे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहते हैं. मतलब साफ है कि दिग्विजय की ताकत का मूल स्रोत गांधी परिवार की भक्ति है. इस भक्ति का ही नतीजा है कि 2003 में विधानसभा चुनावों में उमा भारती की अगुवाई वाली भाजपा से मात खाने के बाद उनका विस्थापन नहीं होता बल्कि उनका पुनर्वास राष्ट्रीय राजनीति में करवाया जाता है बतौर महासचिव.

दिग्विजय सिंह उत्तर प्रदेश के नतीजों से अनजान नहीं थे. यही वजह है कि राहुल गांधी के साथ उत्तर प्रदेश में लगे रहने के बावजूद उन्होंने अपने गृह राज्य मध्य प्रदेश में कांग्रेस की आपसी गुटबाजी में बिसात कुछ इस तरह बिछाई कि अब वहां एक ही गुट बचा है. वह है दिग्विजय सिंह का गुट. मतलब साफ है कि 2013 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस के हर कदम के केंद्र में दिग्विजय रहने वाले हैं.

2014 के लोकसभा चुनावों से तकरीबन आठ महीने पहले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली में चुनाव होने हैं. इन चुनावों में गांधी परिवार ऐसे नतीजे चाहेगा जिनसे कांग्रेस की केंद्र में वापसी की संभावना बनी रहे. ऐसे में राजस्थान की सरकार बचाने के अलावा कांग्रेस का जोर मध्य प्रदेश में अपनी सेहत सुधारने पर भी रहेगा. यहीं पर दिग्विजय एक बार फिर से प्रासंगिक हो जाते हैं. उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में स्थानीय नेतृत्व का संकट झेलने वाली कांग्रेस दिग्विजय को किनारे करके मध्य प्रदेश में वही संकट पैदा करने का खतरा मोल नहीं ले सकती.

आरंभ है प्रचंड

अखिलेश यादव की तफसील में जाने से पहले दो छोटी-छोटी कहानियों पर गौर करना ठीक रहेगा.  उत्तर प्रदेश में चौथे चरण का मतदान खत्म हो चुका था. चुनावी मारामारी से उबरकर थोड़ा सुकून की तलाश में राहुल गांधी दिल्ली आए हुए थे. मौके का फायदा उठाने के लिए उन्होंने शहर के तमाम बड़े पत्रकारों को नाश्ते पर आमंत्रित किया. इनमें एनडीटीवी के बड़े पत्रकार थे, टाइम्स नाउ के थे, सीएनएन आईबीएन के थे और लगभग सभी बड़े अंग्रेजी अखबारों के संपादक भी मौजूद थे. इन सभी पत्रकारों के सामने राहुल ने अपना विजन उत्तर प्रदेश पेश किया. लेकिन इनमें करोड़ों की प्रसार संख्या वाले हिंदी अखबारों का एक भी पत्रकार आमंत्रित नहीं था. लाखों घरों में धमकने वाले हिंदी न्यूज चैनलों के भी किसी संपादक को बुलाने की जरूरत नहीं समझी गई. सवाल है कि उत्तर प्रदेश जैसे भदेस हिंदीभाषी प्रदेश के लिए भी राहुल को इनकी जरूरत क्यों नहीं महसूस हुई.

दूसरी कहानी सुनिए, तीसरे चरण के मतदान से ठीक पहले एक चर्चित अंग्रेजी न्यूज चैनल की विख्यात और तेज-तर्रार महिला पत्रकार दिल्ली से लखनऊ पहुंची थी. अखिलेश यादव चुनावी सभाओं में व्यस्त थे. पत्रकार महोदया ने अखिलेश से उसी दिन उनके हेलिकॉप्टर में चुनावी यात्रा करने की मांग रखी. अखिलेश ने पूरी विनम्रता के साथ उनका आवेदन यह कहते हुए ठुकरा दिया कि वे पहले से ही किन्हीं हिंदीभाषी पत्रकार को समय दे चुके हैं. महिला पत्रकार नाराज हो गईं. यह उनकी प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं था. हालांकि उन्होंने दो दिन बाद अखिलेश के साथ यात्रा की और सड़क किनारे पूरी पंचायत भी लगाई जो कि उनकी ट्रेडमार्क शैली है.

ये दो कहानियां देश में युवा राजनीति का परचम लहरा रहे दो नेताओं के बीच का फर्क दिखाती हैं. ये कहानियां उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजों में सीटों का फर्क भी तय करती हैं. इन किस्सों को सुनाने वाले वरिष्ठ अंग्रेजी पत्रकार अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘आप हिंदीवालों को साथ लेकर नहीं चलेंगे और उत्तर प्रदेश, बिहार को जीतने का सपना देखेंगे तो बात कैसे बनेगी? कांग्रेस ने अपने अभियान के दौरान भीड़ भले ही जुटा ली हो पर भीड़ का मन उसके साथ कभी नहीं जुड़ा. हर सपाई के पास एक पता होता है पांच विक्रमादित्य मार्ग. वह आसानी से वहां नेताजी से लेकर अखिलेश तक से मुलाकात और बातचीत कर सकता है. पर एक कांग्रेसी के पास कोई पता नहीं है पूरे सूबे में. जहां कार्यालय है वहां कोई नेता बैठना पसंद नहीं करता. राहुल जी से मिलना तो दूर की कौड़ी है. कहने का मतलब है मतदाता राहुल को दिल्लीवाला ही मानता रहा. जबकि अखिलेश बातचीत से लेकर व्यवहार के स्तर तक लोगों को अपने करीब लगे, अपने वादों और प्रयासों में ईमानदार नजर आए.’

सपा को मिला जनादेश जितना अप्रत्याशित था उतना आश्चर्य लोगों को तब नहीं हुआ जब अखिलेश को विधानमंडल दल का नेता चुना गया. हालांकि पार्टी के कुछ पुराने दिग्गजों और परिवार के कुछ लोगों की असहजता अखिलेश की राह में बाधा बन रही थी, मगर सात मार्च को मुलायम के नाम की घोषणा न होने से ही इस बात के संकेत मिल गए थे. उस दिन अखिलेश के नाम को लेकर कोई सहमति नहीं बन सकी तो इसकी एक वजह यह भी थी कि वरिष्ठ सपा नेता और पार्टी का मुसलिम चेहरा रहे आजम खान उस दिन संसदीय बोर्ड की मीटिंग में पहुंचे ही नहीं.

पहली बार पुराने नेताओं ने युवाओं के साथ बैठकर एक ही सीट के लिए दावा पेश किया. इस प्रक्रिया में कई पुरानों का टिकट कटा; परिवार के कई सहयोगी भी टिकट से वंचित हुए

अब मामला दस मार्च को होने वाली नवनिर्वाचित विधायकों की मीटिंग पर टल गया था. इस दौरान होली पड़ गई और अखिलेश के अलावा पूरा परिवार सैफई में इकट्ठा हुआ. यहां पर अखिलेश की राह का दूसरा सबसे बड़ा रोड़ा बन रहे उनके चाचा शिवपाल को समझाने का काम मुलायम ने रामगोपाल यादव (अखिलेश के प्रिय चाचा) को सौंपा. शिवपाल को यह अहसास था कि मुलायम सिंह और सपा के इतर उनकी अपनी कोई हैसियत नहीं है. इसलिए उन्हें पार्टी लाइन के आगे झुकना पड़ा. शिवपाल के खिलाफ एक और बात गई जिसे एक नवनिर्वाचित विधायक इस तरह बताते हैं, ‘403 उम्मीदवारों में से एक ने भी शिवपाल को अपने क्षेत्र में प्रचार के लिए नहीं मांगा. इससे उनकी उम्मीदवारी को बड़ा झटका लगा.’

शिवपाल को साधने के बावजूद आजम खान के रूप में सबसे बड़ी चिंता कायम थी. इससे पार पाने के लिए नौ तारीख की रात को मुलायम सिंह ने अपने आवास पर मैराथन मीटिंग आयोजित की. आजम खान लखनऊ में मौजूद होने के बावजूद तब तक नेताजी (मुलायम सिंह) से मिले नहीं थे. मुलायम सिंह ने उन्हें बुलवाया और अपने खराब स्वास्थ्य और अखिलेश की वजह से मिले प्रचंड बहुमत का हवाला देते हुए साफ कर दिया कि वे केवल अखिलेश को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं. इसके बाद आजम खान के पास भी कोई और विकल्प नहीं रह गया था. इसी बैठक में आजम खान को स्पीकर बनाने का प्रस्ताव भी दिया गया जिसे उन्होंने यह कहते हुए निरस्त कर दिया, ‘मंत्री बनूंगा स्पीकर नहीं.’ बैठक में अगले दिन की कार्यवाही पर भी विचार हुआ जिसका निष्कर्ष यह निकला कि आजम अखिलेश के नाम का प्रस्ताव रखेंगे और शिवपाल उसका अनुमोदन करेंगे ताकि सभी तरह की नकारात्मक चर्चाओं पर विराम लग सके.

अगले दिन यानी दस मार्च को 224 विधायकों से खचाखच भरे सपा कार्यालय में इसे अमलीजामा पहना दिया गया. इसके दो नतीजे निकले. एक उत्तर प्रदेश के इतिहास का सबसे युवा मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड अखिलेश यादव के नाम दर्ज हो गया. दूसरा समाजवादी पार्टी में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सत्ता सौंपने का काम भी पूरा हो गया.

1999 में राजनीति शुरू करने वाले अखिलेश को 2012 में हासिल हुई ऊंचाई किसी परीकथा सरीखी है. सिडनी यूनिवर्सिटी से पर्यावरण विज्ञान में इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर जब वे भारत लौटे थे तब उनका सपना अपना अलग व्यवसाय शुरू करने और अपनी अलग पहचान बनाने का था. कहीं किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता की तर्ज पर अखिलेश का भी आधा ही सपना पूरा हुआ. मुलायम सिंह यादव ने उनके लिए कुछ अलग ही योजना बना रखी थी. उन्हें राजनीति में आना पड़ा और अपना धंधा शुरू करने का कभी वक्त ही नहीं मिला. पर हां, अपनी अलग नजीर बनाने की उनकी दूसरी इच्छा इन चुनावों के बाद जरूर पूरी हो गई है.

अखिलेश ने अपना पहला चुनाव 2000 में कन्नौज लोकसभा से लड़ा और जीता. इसके बाद 2004 और 2009 में भी वे यहां से सासंद बने. मगर तब तक किसी ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया था. शायद तब तक वे भी राजनीति को इतनी संजीदगी से नहीं लेते थे.

मुलायम सिंह यादव ने उनके लिए कुछ अलग ही योजना बना रखी थी. उन्हें राजनीति में आना पड़ा और अपना धंधा शुरू करने का कभी वक्त ही नहीं मिला

2009 अखिलेश के जीवन का निर्णायक बिंदु है. इस साल उन्होंने कन्नौज के साथ फिरोजाबाद से भी लोकसभा का चुनाव लड़ा था. बाद में उन्होंने फिरोजाबाद की सीट खाली कर दी. उपचुनाव में  उनकी पत्नी डिंपल यादव को यहां से सपा का उम्मीदवार बनाया गया जिनके खिलाफ कांग्रेस ने कुछ समय पहले तक समाजवादी रहे राजबब्बर को उतारा. इस चुनाव में डिंपल बुरी तरह हार गईं. पार्टी के एक कार्यकर्ता बताते हैं कि इस हार से अखिलेश बहुत निराश और नाराज थे. उन्होंने पार्टी की कार्यशैली पर गुस्सा जताया और इसे बदलने का प्रण किया. इस प्रण के साथ ही एक छिपा हुआ प्रण उन्होंने और किया – कांग्रेस को मजा चखाने का. 2012 में उनकी सारी इच्छाएं पूरी हो चुकी हैं. पार्टी भी बदल चुकी है और कांग्रेस की आंखों (अमेठी, रायबरेली और सुलतानपुर) से काजल चुरा लाने का कारनामा भी सपा ने कर दिखाया है.

2009 के उपचुनाव में हार ने अखिलेश को जमीन पर ला दिया था. शायद 2012 के परिणाम राहुल गांधी को भी जमीन पर लाने में सफल रहें. सपा सिर्फ उपचुनाव ही नहीं हारी थी बल्कि आम चुनावों में भी उसे करारी शिकस्त खानी पड़ी थी. 39 सीटों का आंकड़ा 23 पर सिमट गया था. मंडल की पोटली से उपजी सियासत के नायक मुलायम सिंह यादव का किला दो दशकों में पहली बार ध्वस्त होता हुआ दिखा था और कांग्रेस ने हैरतअंगेज कारनामा करते हुए अपना आंकड़ा 21 लोकसभा सीटों तक पहुंचा दिया था.

पार्टी के लिए यह आपात स्थिति थी. इस घड़ी में मुलायम सिंह ने सपा की ध्वजा अखिलेश को पकड़ाने का निश्चय किया. वे उत्तर प्रदेश सपा के अध्यक्ष बना दिए गए. यहां से अखिलेश ने सपा का चाल-चरित्र-चेहरा बदलने के अभियान की शुरुआत कर दी.  वे एक साथ कई मोर्चों पर बदलाव की मुहिम चला रहे थे और संगठन में जोश भरने और उसे मजबूत करने का काम खुद गांव-बाजार में साइकिल पर घूमते हुए कर रहे थे.

इस दरम्यान मुलायम सिंह यादव अपनी कुछ पुरानी भूलों को दुरुस्त करने में लगे हुए थे. सबसे पहले उन्होंने 2009 के लोकसभा चुनावों से पहले साथी बने कल्याण सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया. मुसलमानों ने लोकसभा चुनावों के दौरान उन्हें इसकी सजा दे दी थी. सपा की सीटें घटने के साथ ही मुसलिम-यादव समीकरण वाली पार्टी का एक भी मुसलिम प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत सका था. यह शुरुआत थी. अब मुलायम सिंह के सबसे खासुल खास अमर सिंह की बारी थी. यह वह दौर था जब अमर सिंह नेताजी के आंख-कान हुआ करते थे.

अमरकाल में सपा ने तमाम पुराने समाजवादियों को किनारे लगाकर पार्टी में फिल्मी और पूंजीवादी संस्कृति का सूत्रपात किया था. इसी दौरान आजम खान, रामआसरे विश्वकर्मा जैसे नेताओं को बाहर कर दिया गया और वरिष्ठ नेता बलराम यादव हाशिये पर चले गए. पर 2009 के आखिर तक अमर की मौजूदगी सपा को भारी पड़ने लगी थी. पार्टी उनसे मुक्ति पाने का रास्ता तलाश रही थी और रास्ता खुद अमर सिंह ने ही उसे मुहैया करवाया. वे पार्टी के निर्णयों में की जा रही अपनी अनदेखी से नाराज चल रहे थे. हालांकि उनसे पार पाने का फैसला पार्टी में पहले ही हो चुका था पर उन्हें अपनी खिसकती जमीन का अहसास ही नहीं था. मुलायम सिंह पर दबाव बनाने के लिए उन्होंने ब्लैकमेलिंग की अपनी चिरपरिचित शैली का इस्तेमाल किया और अपने इस्तीफे का दांव चला. यह दांव उल्टा पड़ गया. अमर सिंह का इस्तीफा थोड़ी ना-नुकुर के बाद कबूल हो गया. अमर सिंह को इसकी उम्मीद नहीं थी. जनवरी 2010 में सिंह सपा से बाहर हो गए या कर दिए गए. व्यक्तिगत बातचीत में सपा कार्यकर्ता इस घटना का विवरण बड़े चाव से देते हैं. पार्टी के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता के शब्दों में, ‘अखिलेश भैया के इशारे पर नेताजी ने अमर सिंह का इस्तीफा कबूल किया था. भैया किसी भी हाल में पार्टी को उनके चंगुल से बाहर निकालना चाहते थे.’

इन दो बोझों से मुक्ति पाने के बाद अब मुलायम सिंह और अखिलेश के सामने अपनों को मनाने का वक्त था. उन्होंने इस काम में देरी नहीं की. उन्हें इस बात का इल्म था कि 2012 ज्यादा दूर नहीं है. तो मुलायम सिंह ने अपनी गलतियों के लिए प्रदेश के मुसलिम समाज से सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी. इसके बाद पार्टी के मुसलिम चेहरे आजम खान को तमाम मनुहारों के बाद दिसंबर, 2010 में पार्टी में वापस ले आया गया. आजम खान की दो बड़ी दिक्कतें – कल्याण सिंह, अमर सिंह – पहले ही दूर हो चुकी थीं. इसी दौरान पार्टी ने अपने पिछड़े वोटबैंक का दायरा और विस्तृत करने की प्रक्रिया में विशंभर प्रसाद निषाद और रामआसरे कुशवाहा को अपने साथ जोड़ लिया. इस तरह से सपा ने 2011 के मध्य तक अपने सभी कील-कांटे पूरी तरह से दुरुस्त कर लिए थे.

अखिलेश के सामने एक बड़ी चुनौती थी योग्य उम्मीदवारों के चयन की. सपा में पहली बार उम्मीदवारों के चयन के लिए आवेदन और साक्षात्कार की परंपरा शुरू की गई. इसका मकसद नए नेताओं को सामने लाने के साथ केवल वरिष्ठता के आधार पर मठाधीशी करने वाले नेताओं से मुक्ति पाना भी था. पहली बार तमाम पुराने नेताओं ने युवाओं के साथ बैठकर एक ही सीट के लिए दावा पेश किया. 3000 से ज्यादा आवेदन आए. इस प्रक्रिया में कई पुरानों का टिकट कटा; परिवार के कई सहयोगी भी टिकट से वंचित हुए.

मुलायम सिंह ने अखिलेश की पारी सुगम बनाए रखने के लिए प्लान ‘बी’ भी तैयार कर रखा है

अब सपा सभी हथियारों से लैस होकर जनता के बीच पहुंची. चयनित प्रत्याशियों के लिए एक गाइडलाइन बनाई गई. इसके तहत सभी प्रत्याशियों को अपने क्षेत्र में हर बूथ के लिए बूथ समिति बनानी थी. यह एक जटिल प्रक्रिया थी लिहाजा इसमें कई उम्मीदवारों ने हीला-हवाली की. इसके नतीजे में कुछ उठापटक भी देखने को मिली. कई सीटों पर उम्मीदवारों को बदला गया. खैर यह प्रक्रिया भले ही जटिल रही हो लेकिन कितनी कारगर रही इसका फैसला चुनावी नतीजों के आधार पर किया जा सकता है- 224 सीटें. ऐसा बहुमत जो भाजपा तक प्रचंड राम लहर और एकीकृत उत्तर प्रदेश में कभी नहीं पा सकी थी.

यहां से सपा ने निर्णायक संघर्ष शुरू किया. टिकट वितरण का काम लगभग संपन्न हो चुका था और इस समय तक अखिलेश की युवाओं की टीम काम करने लगी थी. सुनील यादव (राष्ट्रीय अध्यक्ष, समाजवादी छात्र सभा), आनंद भदौरिया (राष्ट्रीय अध्यक्ष, लोहिया वाहिनी), नफीस अहमद (राष्ट्रीय अध्यक्ष, समाजवादी युवजन सभा), जगत सिंह, नावेद सिद्दीकी (प्रदेश सचिव, सपा), विजय चौहान आदि के रूप में अखिलेश की टीम अपने काम में लगी हुई थी.

सुनील यादव और आनंद भदौरिया अखिलेश के सबसे करीबी लोगों में शुमार हैं. दोनों 9 मार्च, 2010 को राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खी बन गए थे. सपा ने एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था जिसमें अखिलेश को गिरफ्तारी देनी थी. अखिलेश को पुलिस ने हवाई अड्डे से गिरफ्तार कर लिया. तब आनंद और सुनील ने इस प्रदर्शन का नेतृत्व किया. जवाब में पुलिस ने दोनों पर जमकर लात और लाठियां बरसाई थीं. अगले दिन अखबारों में एक पुलिस अधिकारी आनंद भदौरिया के मुंह पर अपना पैर रखे हुए और सुनील लाठियों के नीचे दबे हुए दिखे. इस घटना ने बसपा सरकार और पुलिस की खासी किरकिरी करवाई.

इन आंदोलनों से होता हुआ सपा का कारवां सितंबर, 2011 तक आ पहुंचा था. तब अखिलेश ने अंतिम शंखनाद किया. वे समाजवादी क्रांति रथ लेकर प्रदेश में निकल पड़े. 1987 में मुलायम सिंह यादव भी समाजवादी रथ लेकर प्रदेश भर में घूमे थे. यह निर्णायक वार सिद्ध हुआ, जिसने चतुष्कोणीय मुकाबले में फंसे उत्तर प्रदेश की बाकी तीनों पार्टियों को बुरी तरह से चित कर दिया. जिन 21 सीटों पर कांग्रेस ने 2009 के लोकसभा चुनाव में परचम फहराया था उनकी 97 विधानसभा सीटों में से उसे सिर्फ 9 सीटें इस बार मयस्सर हुई हैं. यह आंकड़ा उस सच्चाई की गवाही है कि कितनी तेजी से सपा ने 2009 में अपनी खोई हुई जमीन पर वापस कब्जा जमाया है.

छह मार्च को प्रचंड बहुमत मिलने के बाद भी अखिलेश बार-बार दोहरा रहे थे कि नेताजी ही मुख्यमंत्री बनेंगे. लेकिन नेताजी का वह बयान अखिलेश के दावे को संदिग्ध बना रहा था कि 10 मार्च को विधायक दल ही अपने नेता का फैसला करेगा. जिस पार्टी में नेताजी बाईडिफॉल्ट लीडर हुआ करते थे वहां उनका यह बयान इशारा था कि नेतृत्व अखिलेश को सौंपे जाने का विमर्श गंभीरता से जारी है. वही हुआ भी, दस मार्च को आजम खान ने अखिलेश के नाम का प्रस्ताव रखा जिसका शिवपाल यादव ने अनुमोदन किया और विधायकों के दल ने हर्षध्वनि के साथ उन्हें स्वीकार कर लिया.

किन परिस्थितियों में ‘निराश’ लोगों ने हामी भरी इसका जिक्र पहले किया जा चुका है. इस दशा में नए नवेले अखिलेश के लिए यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि आजम खान या दूसरे लोग मन से उनके तहत कितना काम कर पाते हैं. नई लकीर गढ़ने वाले अखिलेश को इस मोर्चे पर भी खुद को सिद्ध करना होगा. हालांकि जानकार मानते हैं कि मुलायम सिंह ने अखिलेश की पारी सुगम बनाए रखने के लिए प्लान ‘बी’ भी तैयार कर रखा है. इसके तहत पार्टी के वे पुराने समाजवादी भी या तो सरकार में शामिल किए जाएंगे या उन्हें अन्य महत्वपूर्ण ओहदे दिए जाएंगे जो मुलायम सिंह यादव के बेहद विश्वसनीय हैं और पार्टी में जिनका कद आजम खान या दूसरे असंतुष्टों के बराबर है. इससे पार्टी में एक किस्म का संतुलन बना रहेगा. ऐसे नेताओं में छह बार से लगातार चुनाव जीत रहे माता प्रसाद पांडेय हैं. अंबिका चौधरी जैसे नेता भी हैं जो चुनाव भले ही हार गए हों लेकिन उन्हें नेताजी ने राज्यसभा भेजकर उनके पुनर्वास का जुगाड़ कर दिया है. चौधरी की स्थिति यह है कि उन्हें नेताजी ने विधानमंडल दल की बैठक में आमंत्रित किया था पर उन्हें पहुंचने में देर हो गई. लेकिन जब तक वे बैठक में पहुंचे नहीं तब तक मुलायम सिंह ने बैठक की कार्यवाही शुरू नहीं होने दी. बैठक के बाद राज्यपाल के पास औपचारिक दावा पेश करने के लिए अखिलेश चले तो आजम खान के साथ अंबिका चौधरी भी गए. मुलायम सिंह ने खुद को इससे दूर रखा. उन्होंने अपने भाषण में भी यह बात स्पष्ट कर दी, ‘अब मैं ज्यादा समय दिल्ली को ही दूंगा. लखनऊ के लिए अब कम वक्त रहेगा.’

हालांकि पार्टी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि अगले कुछ महीनों तक नेताजी लखनऊ से किसी तरह निगाह नहीं हटाने वाले हैं. उन्हें अफसरशाही से लेकर राजनीति तक के सभी दांवपेंच और सबकी काट पता है. इसका फायदा अखिलेश को होगा. हालांकि वे लोग यह विश्वास भी जताते चलते हैं कि अखिलेश को किसी कवच की जरूरत नहीं पड़ेगी. इस बीच अखिलेश ने अपने स्तर पर बदलाव का संकेत देना शुरू भी कर दिया है. छह मार्च को नतीजे आए और सात मार्च को पूरे लखनऊ शहर को छुटभैये नेताओं ने नेताजी और भैया के बैनर होर्डिंगों से पाट कर रख दिया. अखिलेश ने तत्काल कार्रवाई करते हुए इन सबको हटाने का निर्देश जारी किया. अपने सबसे विश्वसनीय सहयोगी सुनील यादव को उन्होंने इस काम की जिम्मेदारी सौंपी. सुनील यादव एक-एक होर्डिंग को हटवाने की कार्रवाई में लगे रहे. और आठ मार्च को एक बार फिर से पुरानी स्थिति बहाल हो गई. सारे शहर से बैनर-होर्डिंग हटा दिए गए.

यही नई राजनीति है जिसकी चर्चा मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक छाई हुई है. पर यह सवाल भी उठता है कि लोगों को राहुल गांधी वाले मॉडल पर यकीन क्यों नहीं हुआ. वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर कहते हैं, ‘राहुल का अभियान सुनियोजित नहीं था बल्कि हवाई था. जो योजना अखिलेश के अभियान में दिखती है वह कहीं और नजर नहीं आती. राहुल के बदलाव को लोग हवाई मानकर चल रहे थे.’ अखिलेश के उत्कर्ष को संकर्षण कांग्रेस की सबसे बड़ी चिंता करार देते हैं, ‘अब तक युवा राजनीति पर राहुल गांधी का एकाधिकार था. कांग्रेस जिसे तुरुप का इक्का मानकर चल रही थी उसके मुकाबले में अब उससे भी ज्यादा विश्वसनीय विकल्प खड़ा हो गया है. अखिलेश की उम्र राहुल से चार साल कम है. इसका मतलब है कि अगले तीस साल के दोनों के राजनीतिक सफर में बार-बार एक-दूसरे का टकराव होना है. राहुल को जल्द ही खुद को साबित करना होगा वरना अखिलेश उनके रास्ते में आ खड़े होंगे. कांग्रेस के लिए संकट की घड़ी है.’

संकट का काल मीडिया के लिए भी है. मुद्दे और बारीकियां उसके हाथों से फिसलती जा रही हैं. अंग्रेजी की सुविख्यात पत्रकार सागरिका घोष प्राइम टाइम पर अखिलेश से पूछ बैठती हैं, ‘अखिलेश… आपने अपनी पार्टी को तो बदल दिया है पर अपनी पार्टी को हिंदी बोलने की आदत से कब छुटकारा दिलवाएंगे.’ गौरतलब है कि अपने पूरे चुनावी अभियान के दौरान अंग्रेजी बोलने की क्षमता होते हुए भी अखिलेश ने अंग्रेजी मीडिया के साथ भी हिंदी में ही बात की थी. यह पहचान की राजनीति (आइडेंटिटी पॉलिटिक्स) का एक सकारात्मक पहलू है.

सागरिका गलत व्यक्ति से गलत सवाल पूछ रही थीं. सही व्यक्ति राहुल होते और सही सवाल होता, ‘राहुल, आप और आपकी पार्टी यह अंग्रेजियत का चोला कब उतारेगी?’ उत्तर प्रदेश की यही सच्चाई है.

12वीं की उम्र 5वीं का पाठ

हिंदी में एक कहावत है –  दूसरों के घरों में झांकने से पहले अपना आंगन बुहार लेना चाहिए. शायद राहुल गांधी और उनकी पार्टी को अभी सबसे ज्यादा यही करने की जरूरत है. केवल दिल्ली और पूरे देश वाली दिल्ली, दोनों की सरकारें आज कांग्रेस की हैं. हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, असम, केरल सहित देश के अन्य 12 राज्यों में भी कांग्रेस या उसके गठबंधन की ही सरकारें हैं. तो क्या इन राज्यों को उन्होंने आदर्श की स्थिति में पहुंचा दिया है? क्या यहां गांधी-नेहरु के सपनों के 10 फीसदी पर भी चलने वाली सरकारों का राज है? क्या इन प्रदेशों में मनरेगा से लेकर केंद्र और राज्य सरकारों की दूसरी तमाम योजनाएं बढ़िया से चल रही हैं? क्या यहां भ्रष्टाचार पर लगाम लगते और इस मोर्चे पर स्थिति सुधरती दिख रही है? क्या यहां कांग्रेस की स्थिति हर बीते दिन के साथ सकारात्मक बदलावों के चलते बेहतर हो रही है? अगर ऐसा नहीं है तो राहुल किस मुंह से अपनी पार्टी के कब्जे से बाहर वाले राज्यों को रंगीन बाग दिखाए जा रहे हैं? क्या वे देश की जनता को इतना नादान समझते हैं कि बाकी जगह उनकी पार्टी की सरकारें क्या कर रही हैं या वे उनसे क्या करवा पा रहे हैं इसका उसे कोई भान ही नहीं है? पहले अपना घर दुरुस्त करने वाली बात को रेखांकित करना इसलिए भी जरूरी है कि नेहरू-गांधी परिवार के परंपरागत चुनाव क्षेत्रों – अमेठी, रायबरेली, सुल्तानपुर – में ही कांग्रेस पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया. यानी दुनिया भर की दशा बदलकर उसे संतुष्ट करने का दावा करने वाले लोगों पर उनके घर के लोगों को ही भरोसा नहीं हो पा रहा है.

अगर 2012 के परिणामों की नजर से राहुल के नजदीकी भविष्य पर नजर डालें तो 15वीं लोकसभा में उनका प्रधानमंत्री न बनना अब लगभग तय हो चुका है

एक और कहावत है – थोथा चना बाजे घना. इस बार के चुनावों में राहुल का व्यवहार कुछ-कुछ ऐसा भी रहा. युवावस्था में गुस्सा आना स्वाभाविक है. चुनावों की गरमा-गरमी में दो-चार बातें इधर-उधर की कह जाना भी चलता है. मगर दूसरी पार्टी के चुनावी घोषणापत्र को ही फाड़कर फेंक देना सार्वजानिक और राजनीतिक शिष्टाचार की हर सीमा को लांघ जाना है. अगर केवल भारतीय क्रिकेट टीम का उपकप्तान बनाए जाने पर विराट कोहली पर यह सवाल उठ रहा है कि कई बार उनका व्यवहार संयत नहीं होता तो राहुल तो पूरे देश का ही कप्तान बनने के दावेदार माने जा रहे हैं. वे उम्र में भी विराट कोहली से करीब 20 साल बड़े हैं.

अगर उनके पिता की ही बात करें तो राजीव गांधी उनकी आज की उम्र से दो साल पहले ही देश के प्रधानमंत्री बन गए थे. उन्हें राजनीति का अनुभव भी राहुल से काफी कम था. ब्रिटेन के वर्तमान प्रधानमंत्री डेविड केमरन भी मात्र 43 साल की उम्र में बिना किसी राजनीतिक विरासत के प्रधानमंत्री बन गए थे. मगर राहुल सक्रिय राजनीति में आने के आठ साल बाद भी राजनीति के नौसिखिये बने हुए हैं. बुनियादी जरूरतें तो आज भी हमारे देश की 70 फीसदी आबादी की वही बिजली, पानी, सड़क, रोजगार आदि ही हैं. तो कितनी जगह और कितनी बार इन्हें जानने-समझने की राहुल को जरूरत है! क्या वे इतने कमजोर छात्र हैं कि उन्हें 12वीं कक्षा की उम्र में भी पांचवीं कक्षा का पाठ लगातार पढ़ते रहना होता है? क्या उन्हें देश के सामने खड़े 12वीं कक्षा के सवालों को समझने और उन्हें हल करने के लिए कुछ करने की जरूरत महसूस नहीं होती?

अगर 2012 के परिणामों की नजर से राहुल के नजदीकी भविष्य पर नजर डालें तो 15वीं लोकसभा में उनका प्रधानमंत्री न बनना अब लगभग तय हो चुका है. अगर चुनावों के परिणाम अनुकूल होते और केंद्र सरकार कुछ और मजबूत होती तो बहुत संभावना थी कि किसी बहाने से मनमोहन सिंह को हटाकर उनके स्थान पर राहुल को लाया जाता. मगर 70 असंतुलित बैसाखियों पर टिकी सरकार का प्रधानमंत्री बनने से शुरुआत करने का साहस राहुल शायद ही कर सकेंगे. अब जो होगा वह शायद यह कि यदि आगे का कुछ समय कांग्रेस के लिए थोड़ा अच्छा रहता है और विपक्ष की हालत में कोई खास सुधार नहीं होता तो अगला आम चुनाव पार्टी राहुल के नेतृत्व में लड़ सकती है. नहीं तो, नेतृत्व तो राहुल का ही रहेगा मगर शायद उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की बात चुनाव से पहले न कहकर एक बचाव का रास्ता बचाकर रखा जाए. राहुल और कांग्रेस के लिए आगे का रास्ता क्या हो इस बारे में विचार करने के लिए उन्हें उस प्रदेश की ओर ही देखना होगा जिसे वे अपना कहते हैं और जिसने उन्हें हालिया चुनावों में सबसे बड़ा सबक सिखाया है.

अगर आज से दो साल पहले की बात करें तो समाजवादी पार्टी एकदम विलुप्ति के कगार पर खड़ी नजर आ रही थी. 2007 के विधानसभा चुनावों में जबरदस्त हार के बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में भी उसकी सीटें 37 से घटकर 23 पर पहुंच गई थीं. इसके बाद फिरोजाबाद उपचुनाव में अखिलेश की छोड़ी सीट से उनकी पत्नी डिंपल को भी राज बब्बर के हाथों शर्मनाक हार झेलनी पड़ी थी. मगर इसके बाद जो किया गया वह बड़ा सोच-समझकर बिना शोर-शराबे के हुआ. पार्टी की कमान एक प्रकार से अखिलेश के हाथों में सौंप दी गई. अमर सिंह सरीखे अनुपयोगी लोगों को पार्टी से चलता कर दिया गया. और अपनी गलतियों को न केवल मुलायम और अखिलेश ने माना बल्कि सार्वजनिक तौर पर उन्हें स्वीकार करके उनके लिए जनता से माफी भी मांगी. परिणाम आज सारी दुनिया के सामने है.

अगले लोकसभा चुनाव में भी अभी दो साल से कुछ ज्यादा का समय है. कुछ से कुछ ज्यादा अनुपयोगी बल्कि नुकसानदेह लोग राहुल के साथ भी हैं. और कुछ गलतियां उनसे भी हुई ही होंगी. तो राहुल ने जो कुछ भी अब तक सीखा है उसका इस्तेमाल करते हुए उन्हें इन सभी चीजों से पार पाने के प्रयास करने ही होंगे. नहीं तो वे केवल दुआ ही कर सकते हैं कि उनके सामने वाली पार्टियां इतनी मजबूत न हो जाएं कि वे उनकी और उनकी पार्टी की कमजोरियों का फायदा उठा लें. 

कयासों के विशेषज्ञ

विधानसभा चुनाव खत्म हुए  और इसके साथ चैनलों पर अहर्निश  जारी चुनावी तमाशा भी खत्म हुआ. एक बार फिर वोटर चैनलों के एंकरों, राजनीतिक संपादकों, रिपोर्टरों और मेरे जैसे अनाड़ी राजनीतिक विशेषज्ञों से ज्यादा तेज निकले. उत्तराखंड को छोड़कर बाकी सभी राज्यों  में स्पष्ट जनादेश देकर वोटरों ने सभी तरह के राजनीतिक सस्पेंस और उठापटक और उसमें  फलने-फूलने वाले चैनलों के लिए कयास लगाने की गुंजाइश को खत्म कर दिया. एक बार फिर कई एक्जिट और ओपिनियन पोल वोटरों के मन को पकड़ने में नाकाम रहे तो कई वास्तविक नतीजों से काफी आगे-पीछे रहने के बावजूद रुझानों का सही अनुमान लगाने में कामयाब रहे.  
एक बार फिर साबित हुआ कि एक्जिट पोल और ओपिनियन  पोल बड़े जोखिम हैं खासकर वोटों के प्रतिशत और सीटों के अनुमान के मामले में गणित अक्सर गड़बड़ा जा रहा है. आश्चर्य नहीं कि सीएनएन-आईबीएन पर राजनीतिक विज्ञानी और सेफोलाजिस्ट योगेंद्र यादव ने एक्जिट पोल में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब के बारे रुझानों के बारे में काफी हद तक सही पूर्वानुमानों के बावजूद इस धंधे को अलविदा कहने का एलान कर दिया है. अफसोस इस धंधे में गंभीर और ईमानदार खिलाड़ी होने के बावजूद उन्होंने रिटायर होने का एलान कर दिया.

इसी का नतीजा है कि चैनलों और अखबारों में चुनावों को लेकर होने वाली स्वतंत्र और बारीक फील्ड रिपोर्टिंग लगातार कम होती जा रही हैलेकिन योगेंद्र यादव रहें या न रहें, न्यूज चैनल एक्जिट और ओपिनियन पोल या कहें चुनावों के संभावित नतीजों को लेकर कयास लगाए बिना नहीं रह सकते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उसमें एक सस्पेंस, सनसनी और ड्रामा है. असल में, चैनलों समेत समूचे न्यूज मीडिया में चुनाव का मतलब ही कयास और पूर्वानुमान हो गया है. इसी का नतीजा है कि चैनलों और अख़बारों में चुनावों को लेकर होने वाली स्वतंत्र और बारीक फील्ड रिपोर्टिंग लगातार कम होती जा रही है, जबकि चैनलों पर स्टूडियो में होने वाली बहसों और चर्चाओं, नेताओं की रैलियों, प्रेस कॉन्फ्रेंसों, आरोप-प्रत्यारोपों और उम्मीदवारों के बीच बहस के नाम पर होने वाले दंगल का शोर-शराबा बढ़ता जा रहा है.  

हालांकि अपवाद भी हैं. इस मामले में अखबारों खासकर अंग्रेजी अखबारों ने फील्ड से कई अच्छी रिपोर्टें और चुनाव यात्रा विवरण छापे. इनमें भी खासकर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘द हिंदू’ ने कई बेहतरीन रिपोर्टें और गंभीर विश्लेषण छापे जो जमीन पर बदल रही राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक सच्चाइयों की वास्तविक तस्वीर पेश कर रहे थे. उनमें गहरी अंतर्दृष्टि, राजनीति और समाज के रिश्ते और उनमें आ रहे बदलावों को समझने की कोशिश थी. लेकिन इसके उलट ज्यादातर हिंदी अखबारों और चैनलों ने चुनाव कवरेज का मतलब शोर-शराबा और तमाशा समझ लिया है. खासकर चैनलों के लिए तो इस बार के चुनाव क्रिकेट के तमाशे की भरपाई करते दिखे क्योंकि एक तो कोई बड़ा टूर्नामेंट नहीं हो रहा था और दूसरे, ऑस्ट्रेलियाई दौरे पर भारतीय टीम बुरी तरह हार रही थी. इसके कारण उसमें न तो वह ड्रामा और न सस्पेंस रह गया था कि चैनल उसके पीछे भागते. नतीजा, चैनलों ने चुनावों खासकर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को 20-20 क्रिकेट मैच और कुछ हद तक डब्ल्यूडब्ल्यूएफ कुश्ती में बदल दिया. उसी तरह की लाइव कमेंट्री और उस पर मेरे जैसे कथित वरिष्ठ पत्रकारों और विशेषज्ञों की कभी चुटकुलानुमा और कभी कुछ तथ्य और ज्यादातर अनुमान पर आधारित 20 सेकंड की टिप्पणियों का ड्रामा अंत तक चलता रहा.  

चूंकि चैनल बहुत हो गए हैं और सबको विशेषज्ञ चाहिए, इसलिए इस बार अपन को भी कुछ चैनलों पर चुनाव विशेषज्ञ बनकर जाने का मौका मिल गया. इस अनुभव के बारे में जितना  कहूं, उतना कम होगा. अंदर की बात यह है कि ये चुनाव विशेषज्ञ भी अद्भुत प्रजाति हैं. इनमें से ज्यादातर अखबारों के पत्रकार और संपादक हैं. वे राजनीति के पंडित और चुनाव शास्त्र के विशेषज्ञ बताए जाते हैं. कुछ मशहूर विशेषज्ञों की तो इतनी मांग थी कि वे इस चैनल से उस चैनल शिफ्ट में भी काम करते दिखे. कई चैनलों ने अपना जलवा दिखाने के लिए एक-दो या तीन नहीं बल्कि एक दर्जन से ज्यादा विशेषज्ञ जुटा लिए.  

इस चक्कर में चैनलों में विशेषज्ञ जुटाने की होड़-सी शुरू हो गई. जिसके पास जितने विशेषज्ञ, वह उतना बड़ा चैनल. इस होड़ में हालत यह हुई कि आखिर में ‘टाइम्स नाउ’ पर अपने अर्नब गोस्वामी ने इतने विशेषज्ञ बुला लिए कि खुद बैठने को जगह नहीं मिली और खड़े-खड़े 100 घंटे तक अहर्निश चर्चा करनी पड़ी. वैसे यह मालूम नहीं कि उन विशेषज्ञों में से कोई इन चुनावों में नीचे जमीन पर झांकने भी गया या नहीं, लेकिन वे बात ऐसे करते दिखे जैसे उनका हाथ सीधे जनता की नब्ज पर हो. यह और बात है कि मुझ समेत उनमें से ज्यादातर की विशेषज्ञता कयास से आगे नहीं बढ़ पाई.  

अक्सर उनकी विशेषज्ञता ‘यह भी हो सकता है और उसका उल्टा भी हो सकता है’ में उलझ कर रह जा रही थी. यह मत पूछिए कि इससे बेचारे टीवी दर्शक का राजनीतिक ज्ञान और समझदारी कितनी बढ़ी, लेकिन इस तमाशे में मनोरंजन की कोई कमी नहीं थी. चैनलों को भला और क्या चाहिए?   

सीमा पर सुलगते सवाल

आप जानते हैं कि इस बस्ती का नाम भिखनाठोरी क्यों है?  बुद्ध के जमाने में बौद्ध भिक्षुओं का अहम ठौर था, इसीलिए. अपभ्रंश नाम है यह. कहते हैं कि ह्वेनसांग, फाह्यान भी गुजरे थे इधर से. 1904 में ही यहां रेल लाइन पहुंच गई थी. भारत का आखिरी रेलवे स्टेशन बना भिखनाठोरी. अब भी रोजाना तीन दफा सवारी ट्रेन की आवाजाही होती है. एक दशक पहले तक यह गांव 10-12 हजार लोगों की बसाहट से गुलजार रहता था. फिर एक-एक कर लोग चले गए. जो रह गए हैं उनकी जिंदगी पहाड़ है. पीने का पानी, आने-जाने के लिए रास्ता तो कभी मिला ही नहीं. जो पगडंडीनुमा राह थी उसमें भी अब ताले जड़ दिए गए हैं.  1972 से एक सरकारी स्कूल है. दो कमरों में आठवीं तक के बच्चे बैठते हैं. नामांकन बढ़ता ही जा रहा है. काफी कोशिश के बाद स्कूल की खातिर नई बिल्डिंग का फंड आया. बिल्डिंग बननी शुरू ही हुई थी कि उसे रुकवा दिया जंगलवालों ने. यह कहकर कि यहां रेलवे और वन विभाग के अलावा किसी विभाग की या किसी निजी व्यक्ति की जमीन नहीं है. सब अवैध हैं. राशन की दुकान, सरकारी स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र और इंसानों की बसाहट… सब अवैध. जब यह वन विभाग और रेल का ही इलाका रहा था तो स्कूल क्यों खोल दिया था सरकार ने? जब इंसानों के बसने की इजाजत नहीं थी तो करीब 400 मतदाताओं का वोट लेने के लिए पोलिंग बूथ क्यों बनता है यहां? जो लोग पीढ़ियों से अपना घर-बार और जमीन छोड़कर यहां बसने आ गए थे, उनकी यह पीढ़ी अब कहां चली जाए, बताइए…?’

भारत-नेपाल सीमा पर बसे एक गांव भिखनाठोरी में आयोजित एक चौपाल की ये बातें और उनके अंत में उठे सवाल उस त्रासदी की एक झलक देते हैं जिस पर अगर जल्द ही ध्यान न दिया गया तो वह एक बड़े खतरे का सबब बन सकती है. यह खतरा है हिंसा की राह चलने का.

नेपाल से सटे हुए इस इलाके का नाम थरुहट है. थरुहट यानी थारुओं का इलाका. थारु यानि पीढ़ियों से वनक्षेत्र में रहने वाली और नौ साल पहले कागजी तौर पर आदिवासी समुदाय में शामिल हुई एक जाति. ऐतिहासिक, पौराणिक दृष्टि से भी नायकविहीन समुदाय. वह समुदाय, जो कड़ी मशक्कत के बाद कागजी तौर पर आदिवासी समुदाय में शामिल कर लिए जाने के बावजूद घड़ी के पेंडुलम की तरह डोल रहा है. पिछड़ी श्रेणी में होने का लाभ मिलता था, वह भी गया और आदिवासी समुदाय में शामिल कर लिए जाने के बाद भी कागजी पेंच की वजह से वे सुविधाएं उसे नहीं मिल सकी हैं जो मिलनी चाहिए.

भिखनाठोरी, इसके बाद भतुझला और फिर ढायर जैसे थरुहट के कई गांवों से गुजरते हुए और इस दौरान कई चौपाली बतकहियों में शामिल होने के बाद रात को हम दोन क्षेत्र में प्रवेश करते हैं. थरुहट और दोन दोनों ही इलाके बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के हिस्से हैं. घनघोर जंगल में राह तलाशते हुए गाड़ी चला रहे थारू समुदाय के सुधांशुु गढ़वाल और हेमराज तरह-तरह के किस्से सुनाते हैं. हेमराज बताते हैं कि पिछले सप्ताह गन्ना काट रही एक महिला पर जंगली भालू ने हमला किया था. कुछ दूर आगे बढ़ने पर सुधांशु बताते हैं कि कुछ साल पहले यहां से गुजरते हुए दो दोस्तों में से एक को बाघ ने हमला कर मार डाला था. रोंगटे खड़े कर देने वाले ऐसे किस्सों की यहां कमी नहीं.

एक ही नदी को करीब दर्जन बार पार करके रात को हम सघन दोन के केंद्र में पहुंचते हैं. बिहार के बेतिया शहर से हमारे मार्गदर्शक बने वनाधिकार मंच के शशांक कहते हैं, ‘आप बिहार और भारत के उस हिस्से में चल रहे हैं जो बारिश के दिनों में शेष हिस्से से पूरी तरह कट जाता है. यहां जिंदगी गुजारने का अपना फॉर्मूला है. इतने संघर्ष के बाद भी यहां के लोग सब्र नहीं खोते.’मवेशियों के लिए रहने का जगह

लेकिन अब वह सब्र जवाब दे रहा है. कुदरत इन लोगों के सामने जो मुश्किलें खड़ी करती है उनसे उन्हें कोई शिकायत नहीं. व्यवस्था की उपेक्षा के भी वे आदी हो चुके हैं. लेकिन पिछले कुछ समय में उन्हें उनकी जड़ों से उखाड़ने की जो तैयारी हो रही है और जिस अंदाज में हो रही है उसके विरोध में ये लोग किसी भी राह जाने को तैयार दिखते हैं. हिंसक टकराव की भी.

थरुहट और दोन में ऐसे सवाल और उसकी परिधि में एक नई लड़ाई की अंगड़ाई दरअसल सरकार और शासन के एक फरमान के बाद से तेज हुई है. पश्चिमी चंपारण के जिलाधिकारी श्रीधर सी ने 26 नवंबर, 2011 को आदेश दिया था कि आठ दिसंबर को वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना के अंतर्गत पड़ने वाले राजस्व ग्रामों की ग्रामसभा की बैठक में इस परियोजना के लिए बफर क्षेत्र की स्वैच्छिक घोषणा को पारित करवाया जाए. जिलाधिकारी द्वारा प्रखंड विकास अधिकारी व अन्य छोटे अधिकारियों के जरिए ग्रामसभाओं को लिखी गई इस चिट्ठी ने थरुहट व दोन क्षेत्र के लोगों को सकते में डाल दिया.

इस फरमान ने अपने-अपने दुखों के साथ बिखरे थरुहटवासियों को बहुत हद तक एक होने का मौका भी उपलब्ध कराया. 26 नवंबर को चिट्ठी जारी हुई. आठ दिसंबर को ऐसा कर लेने का आदेश था. इस बीच के समय को थरुहट और दोन क्षेत्र के लोगों ने दिन-रात एक कर एक-दूजे से संपर्क स्थापित करने में लगाया. जबरदस्त तरीके से गोलबंदी हुई. नतीजा यह हुआ कि आठ दिसंबर को जिलाधिकारी का आदेश कहीं काम न कर सका. 152 गांवों की करीब 51 हजार एकड़ जमीन को बफर क्षेत्र घोषित करने के संदर्भ में यह आदेश था. एकाध गांव को छोड़ करीब-करीब सभी ने इसका बहिष्कार कर दिया. अपनी बसाहट वाले क्षेत्र और रैयती जमीन को बफर जोन में शामिल नहीं करने की जिद तो इतने गांवों के लोगों ने एक साथ दिखाई ही, अब उसी के बहाने नासूर की तरह अंदर ही अंदर रिस रहे सभी जख्म भी ताजा हो आए हैं. इसी एकजुटता के बूते एक-एक कर हर हिसाब लेने की सुगबुगाहट भी इस इलाके में शुरू हो गई है.

दोन में रहने वाले लोग कई मायने में नाम के नागरिक हैं.  बिजली, सड़क जैसी सुविधाएं यहां दूर-दूर तक नहीं दिखतीं. मोबाइल जरूर दिखता है मगर उससे भी आपस में संपर्क हो पाएगा इसकी गारंटी नहीं. मोबाइल से बात हो जाए इसके लिए घर-घर में एंटीना लगे दिखते हैं. एंटीना में तार जोड़ घंटों मशक्कत करने के बाद बात हो जाती है. ऐसी कई मुश्किलें हैं यहां. विकसित होते बिहार का रोजमर्रा वाला जो गान होता है उसकी गूंज क्या कानाफूसी तक नहीं हुई यहां. लेकिन संघर्ष के बीच सृजन की अद्भुत कला और क्षमता से लबरेज इलाका. बीते आठ-नौ नवंबर को दोन क्षेत्र के हजारों बाशिंदों ने बैलगाड़ियों पर मिट्टी ढो-ढाकर दो दिन में 13 किलोमीटर का रास्ता खुद ही तैयार कर लिया.

उसी नए रास्ते से गुजरते हुए हम रात के करीब दस बजे दोन क्षेत्र के गोबरहिया दोन गांव पहुंचते हैं. वहां सामुदायिक भवन में पहले से ही ग्रामीणों की भीड़ दिखती है. एक और चौपाली सभा. कुछ देर में ही पता चल जाता है कि यहां मौजूद भीड़ में शामिल ग्रामीण दूसरी सभाओं में मिले लोगों की तरह ही सहज-सरल तो हैं लेकिन उनकी बातों में दया के पात्र बन जाने की याचना भर नहीं दिखती. आर-पार की लड़ाई लड़ने की कसमसाहट और अकुलाहट भी दिखती है. आधी रात तक चली सभा में दर्जन भर से अधिक लोगों के संवादों के टकराव के कई निहितार्थ निकलते हैं. लेकिन मूल में एक ही बात कि हम जंगल नहीं छोड़ेंगे और अब याचना भी नहीं करते रहेंगे.

हालांकि बफरजोन निर्धारण के लिए चिट्ठी जारी करने वाले पश्चिमी चंपारण के जिलाधिकारी श्रीधर सी तहलका से बातचीत में कहते हैं कि कहीं न कहीं चिट्ठी को लेकर कोई भ्रम जैसा हुआ है और उसकी गलत व्याख्या कर ली गई. वे बताते हैं, ‘फिर भी किसी ग्रामीण ने बहिष्कार नहीं किया है. बल्कि एक भ्रम का माहौल बना है, जिसे हम दूर कर लेंगे. हम ग्रामीणों से मिल रहे हैं. हम शीघ्र ही उस इलाके में ईको हर्ट सेंटर शुरू करेंगे, इंटरप्रेटेशन सेंटर खोलेंगे…’ यह सब कहने के बाद वे कहते हैं कि जंगल और जंगल के दावेदारों के तकनीकी पेंच को समझने के लिए आप वन विभाग के अधिकारियों से संपर्क करें.

श्रीधर सी बहुत ही सहजता से बात समेट देते हैं. लेकिन बात इतनी आसानी से समेटने वाली नहीं लगती. खबरिया दुनिया में इस दुरूह क्षेत्र की
मुकम्मल खबर नहीं आने की वजह से भले ही इसका अंदाजा बाहरी तौर पर नहीं मिल रहा और इसे गंभीरता से नहीं लिया जा रहा लेकिन संकेत कुछ ठीक नहीं मिल रहे.

वाल्मीकि व्याघ्र अभयारण्य नेपाल की सीमा पर स्थित देश का चर्चित बाघ अभयारण्य है. सब मिलाकर यह कुल  880.78 वर्ग किलोमीटर का इलाका है. बिहार सरकार की ख्वाहिश है और बार-बार घोषणा की जा रही है कि इस स्थल को ईको टूरिज्म, टाइगर सफारी, बेजोड़ पर्यटन स्थल आदि के तौर पर विकसित किया जाएगा. इलाके को लेकर और भी कई हसीन ख्वाब दिखाए जा रहे हैं. इसी सिलसिले में टाइगर प्रोजेक्ट एरिया में निर्माण के लगभग दो दशक बाद कोर और बफर जोन का निर्धारण किए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई है. बफर जोन यानी वह इलाका जहां जंगली जानवर आसानी से विचरण कर सकते हैं. लेकिन इस जोन का दायरा कितना होगा, यही अब तक तय नहीं हो सका है और चिट्ठी जारी हो गई. भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट में साफ लिखा है कि कोर जोन कितना होगा यह अब तक तय नहीं है.

इस मूल सवाल को पूछने पर वन संरक्षक संतोष तिवारी उसी को तो निर्धारित करने की प्रक्रिया में लगे हैं हम, सर्वे होगा, नोटिफिकेशन होगा जैसी तमाम बातें कहते हैं. वे यह भी स्वीकारते हैं कि कुछ गलती ग्रामीणों की है कि वे किसी तीसरे पक्ष के बहकावे में आकर सहयोग नहीं कर रहे और कुछ गलती उनके महकमे की भी है कि वह उन्हें ठीक से समझा नहीं सका. तिवारी कहते हैं, ‘हम जानते हैं कि थरुहट है, थारू हैं तभी व्याघ्र क्षेत्र है और पार्क है, यह हम जानते हैं इसलिए हम चाहते हैं कि उन्हें वनाधिकार मिलें.’

लेकिन लगता है कि बात समझने-समझाने, चाहने-न चाहने की मंशा के दायरे से बाहर निकल चुकी है. थरुहट और दोन क्षेत्र के लोग एक-एक कर कई सवालों का जवाब चाहते हैं. स्थानीय पत्रकार सत्यार्थी कहते हैं, ‘पता नहीं क्यों जान-बूझकर फिर एक गलती की जा रही है. क्यों शासन-प्रशासन के लोग भूल जा रहे हैं कि 2005 में इसी दोन से सटे नेपाल के पास धूप पहाड़ पर माओवादियों की एक बड़ी बसाहट का पता चला था. वहां से पांच-छह जेनरेटर, कई टेंट, अत्याधुनिक उपकरण, कंप्यूटर आदि मिले थे. अब यदि दोनवालों को और परेशान किया जाएगा तो फिर वे किसी के सॉफ्ट कॉर्नर बन सकते हैं, क्योंकि वे सहज लोग हैं.’

सत्यार्थी जैसी ही बात थारू समुदाय के प्रतिष्ठित बुजुर्ग, पूर्व विधान पार्षद व इस समुदाय के अब तक के इकलौते पूर्व मंत्री व थारू कल्याण महासंघ के अध्यक्ष प्रेमनारायण गढ़वाल कहते हैं. वे कहते हैं, ‘करीब साढ़े तीन लाख की आबादी है, 2.60 लाख वोटर हैं, सैकड़ों गांव हैं, राजनीतिक-सामाजिक और व्यक्तिगत कोई अधिकार ही नहीं मिलेगा और कोई रास्ता नहीं बचेगा तो आंदोलन ही होगा और आंदोलन तो किसी दिशा में जा सकता है!’
गढ़वाल की बातों को यदि हालिया घटनाओं से जोड़कर देखें तो सिर्फ जिलाधिकारी की बफर-कोर जोन वाली चिट्ठी ही नहीं बल्कि उसके समानांतर भी कई मसलों को लेकर इसकी बुनियाद तैयार होती रही है. पिछले 31 दिसंबर को शेरवा दोन में डीएफओ ने ईंट भट्ठे पर काम कर रही महिलाओं की ईंटें अपनी गाड़ी से रौंद डाली थीं. ग्रामीण बताते हैं कि डीएफओ नशे में धुत थे और उन्होंने हवा में दो-तीन गोलियां भी चलाईं. बाद में डीएफओ की जमकर पिटाई हुई. वहां वन संरक्षक भी पहुंचे. डीएफओ ने लिखकर दिया कि उनकी गलती है. लेकिन जैसे ही वे गांव से छूटे उनको बचाने वाले ग्रामीणों पर ही केस कर दिया गया. इस घटना के बारे में संतोष तिवारी कहते हैं, ‘मैं गवाह नहीं लेकिन यह देखना होगा कि डीएफओ ने तीन गोली ही चलाई, वह चाहता तो कुछ और कर सकता था.’ फिर संभलते हुए कहते हैं, ‘हां, कुछ गलती डीएफओ की भी रही होगी. यह अकेली घटना नहीं है. अतीत में यह सब होता रहा है.’

वनाधिकार मंच के प्रवक्ता शशांक कहते हैं, ‘थरुहट के साथ हमेशा पेंच फंसाया जाता रहा है. वर्तमान जिलाधिकारी ने पत्र जारी कर बफर व कोर जोन के निर्धारण की बात कही है. ऐसा ही प्रस्ताव 2005 में भारत ज्योति नामक एक अधिकारी ने तैयार किया था. लेकिन उसे राज्य सरकार ने खारिज कर दिया था. फिर वही प्रस्ताव लाया गया है जबकि जो मूल काम होना चाहिए था वह नहीं हो रहा.’

उनका इशारा वनाधिकार की तरफ है. एक जनवरी, 2008 को देश में वनाधिकार कानून लागू हुआ. सात जुलाई, 2008 को बिहार में राज्यपाल ने इस संबंध में पत्र जारी किया. लेकिन उसके बाद से इस कानून को लागू करवाने की दिशा में कोई ठोस कोशिश नहीं हुई. काफी मशक्कत के बाद अब किसी तरह ग्राम समितियों के गठन का काम शुरू हुआ है. लेकिन उसमें भी खानापूरी ही अधिक है, जबकि वनाधिकार लागू करने से इस क्षेत्र की कई समस्याओं का हल खुद ही हो जाएगा. दूसरी ओर थरुहट के रहनेवाले और अनुसूचित जनजाति आयोग के सदस्य नंदलाल महतो से जब बात होती है तो वे जो बोलते हैं उसका आशय कुछ नहीं निकल पाता. वे कहते हैं, ‘2001 की जनगणना के आधार पर चुनाव हुआ है, 2003 में थारू आदिवासी बने, अब की जनगणना के बाद उनके लिए विधानसभा सीट रिजर्व हो ही जाएगी. डीएफओ भी बहुत बदमाशी करते रहता है तो लोग गुस्साएंगे ही. वैसे कोर और बफर जोन क्या होता है, हम नहीं जानते.’

उस रात गोबरहिया दोन में सामुदायिक भवन में आधी रात तक चली ग्रामीण चौपाली सभा में प्रतापचंद काजी, समाजसेवी गगनदेव बाबू, महेंदर बाबू, शीतलजी,मोतीचंद, मुसला साह, रामप्रवेशजी, सुधांशु,रूदल, हेमराज जैसे थरुहट के चर्चित लोगों की उपस्थिति में कई-कई वाक्य एक-दूजे से टकराए थे. उन वाक्यों को समेटकर-सहेजकर यदि एक मुकम्मल स्वरूप दें तो अधरतिया की सभा का आख्यान कुछ ऐसा था- ‘हम दोन वाले, थरुहट वाले जंगल के लोग हैं. जंगल से पीढ़ियों से नाता है. जानवर हमें मारते हैं, हमारी फसल बर्बाद करते हैं, लेकिन हम धैर्य नहीं खोते. हम जानते हैं कि यह उनका जन्मगत स्वभाव है. आजादी के बाद हमें कुछ नहीं मिला लेकिन हम इसके लिए भी सड़कों पर नहीं उतरते. हमारे इलाके में बिजली आ जाती, सड़क बन जाता तो क्या-क्या बदलाव होते हमारी जिंदगी में, इसका आकलन नहीं करते हम कभी! हम यथासंभव खुद ही अपनी राह तैयार करते रहते हैं. नदियों पर पुल तो नहीं बना सकते लेकिन आपस में एक-दूसरे तक पहुंचने के लिए राह बनाते रहते हैं. पिछले माह ही बैलगाड़ी से मिट्टी वगैरह ढोकर दोन के करीब आठ हजार लोगों ने स्वेच्छा से 13 किलोमीटर सड़क तैयार की, ताकि खेत में उपजे गन्ने को हम गन्ना बिक्री केंद्रों तक पहुंचा सके.

हमारी यह उद्यमिता चर्चा में नहीं आई, क्योंकि रातों-रात 13 किलोमीटर रास्ता तैयार करने में नए और विकसित होते बिहार की सरकार की कोई भूमिका नहीं थी. खैर, हमें इसकी चाहत भी नहीं. पर अब पानी सिर के उपर से गुजर रहा है तो धैर्य चूकता जा रहा है. सहने की एक सीमा होती है. हम समझौता करते-करते सिमटते रहे हैं, लेकिन अब याचना की बजाय रण चाहते हैं. दो दशक पहले बगैर हमारी जानकारी के हमारी रैयती जमीन का रसीद नहीं काटे जाने की भूमिका तैयार हुई. तब से रसीद नहीं कट रही. हमें घरसंगहा, हरसंगहा, सवइया आदि मिलता था. घरसंगहा से हम घर बनाने के लिए लकड़ी ला सकते थे, हरसंगहा के लिए हल बनाने के लिए लकड़ी ला सकते थे और सवइया घास से हम झाडू़ आदि बनाकर जीवन की गाड़ी चला पाते थे. यह सब बंद कर दिया गया, हम कुछ नहीं बोले. समझौता-दर-समझौता कर खुद को छोटे दायरे में समेटते गये. लेकिन अब हमें उस दायरे से भी बेदखल किए जाने की तैयारी है. बाघों को बचाने और बाहर से आने वाले सैलानियों के दम पर हम मूल बाशिंदों को यहां से हटाए जाने की योजना बनी है. बाघ के नाम पर कैसा खेल चलता है, यह हर कोई जानता है. दो दशक पहले जब जंगल वाले यहां नए-नए आए थे तो बाघों की संख्या 80 से ज्यादा बताई गई थी. ‘

‘अब आठ बचे हैं. हमारी व्यवस्था रहने तक 80 बाघ रहते थे, जंगल वालों का राज आया तो दसवां हिस्सा बचा. हम चाहते हैं कि सैलानी यहां आए, हमें भी अच्छा लगेगा. रोजगार मिलेगा. बाघ बचे, हम भी चाहते हैं, उनके संग पीढ़ियों से हमारा रिश्ता है. लेकिन यह सब हमारे अस्तित्व की कीमत पर हो, यह कैसे संभव होगा? कई बार जंगल के अधिकारी कहते हैं कि एक बाघ की कीमत दोन के दो-तीन गांवों के बराबर है, हम हंसकर टाल देते हैं कि चलो कुछ तो कीमत है हमारी. हम मूलतः गन्ना उपजाने वाले किसान हैं. हमारे गन्ने का भुगतान जंगल में ही होता रहा है. लेकिन अब उसे भी रोक दिया गया है. अब हमें दूर-दराज जाकर चीनी मिल से पेमेंट लेने को कहा जा रहा है. दस-बीस हजार रुपये मिलते हैं साल भर में. वह लेकर आएंगे, रास्ते में कोई छीन ले तो हमारी साल भर की कमाई एक झटके में चली जाएगी. दोन के करीब 27 गांवों में 20 हजार आबादी है हमारी. दोन और उसके बाहर रहने वाले 152 गांव के बाशिदों को पिछले माह एक नोटिस मिला. इसमें कहा गया था कि हम ग्राम सभा की बैठक में शामिल होकर यह फैसला कर लंे कि हम अपनी बसाहट वाले इलाके में करीब 51 हजार एकड़ रैयती जमीन बाल्मीकि नगर टाइगर प्रोजेक्ट के लिए बफर जोन घोषित करने का एलान करते हैं. चिट्ठी का लहजा ऐसा है जैसे वह कोई तानाशाही फरमान हो. ग्रामसभाओं को इस लहजे में आदेश देने का यह पहला मामला होगा शायद. हमने भी वही किया जो कभी, कहीं नहीं हुआ होगा शायद. हम ने एकजुट होकर जिलाधिकारी के आदेश का बहिष्कार कर दिया. अब संभव है, बौखलाहट में हम पर थर्ड डिग्री का भी इस्तेमाल हो. हम बहुत शांतिप्रिय लोग हैं. कुछ साल पहले माओवादियों ने फरमान सुनाया था कि हर गांव से पांच बेटे-बेटियों को देना होगा, हमने उन्हें खदेड़ दिया था. बाद में वे इधर फटके भी नहीं. हम थारूओं की आबादी बिहार में तीन लाख से भी ज्यादा है. हम एक ही हिस्से में रहते हैं. सामूहिकता के साथ ही रहना चाहते हैं. लेकिन जब बार-बार हमारे अस्तित्व को मिटा देने, सामूहिकता को खत्म कर देने की कोशिश होगी तो हम किसी भी रास्ते जा सकते हैं…!’

हमारे लोकतंत्र की सेहत दुरुस्त है

पांच राज्यों के चुनावी नतीजों की धूल अब बैठ चुकी है. अब यह देखने का समय है कि इन चुनावों ने हमारे लोकतंत्र के रक्तचाप पर क्या असर डाला है.  उत्तर प्रदेश में यह लगातार दूसरी बार है जब वोटरों ने किसी एक दल को साफ बहुमत दिया है. 2007 के पहले बीते बीस सालों में ऐसा नहीं हुआ था. पंजाब में 40 साल में पहली बार है जब किसी दल या गठबंधन को लगातार दूसरी बार विधानसभा में बहुमत मिला हो. उत्तराखंड में किसी को बहुमत नहीं मिला और सिर्फ एक सीट के अंतर से सबसे आगे निकलने वाली कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए दूसरों की मदद लेनी पड़ी.

यूपी-पंजाब को देखते हुए एक बात कही जा रही है कि भारतीय मतदाता अब स्थिर सरकारें चाहता है, इसलिए उसने दलों को स्पष्ट बहुमत दिया है. लेकिन क्या स्पष्ट बहुमत कोई ऐसी चीज है जिससे लोकतंत्र या राजकाज के बेहतर होने की गारंटी मिलती हो?  मायावती से पहले आखिरी बार उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की जिस सरकार को बहुमत हासिल हुआ था उसके रहते और उसकी भागीदारी से बाबरी मस्जिद गिरी. गुजरात में दंगों के बावजूद नरेंद्र मोदी को विराट बहुमत मिला और अब तो वे खुद को गुजरात का गौरव बताते हैं. 2004 में अपने सहयोगियों पर कहीं ज्यादा निर्भर यूपीए सरकार कहीं ज्यादा जिम्मेदार नजर आती रही, लेकिन 2009 की मजबूत हैसियत ने उसे आज की तारीख में ज्यादा गैरजिम्मेदार बनाया है.

वोटर को अपने इलाके के दल और नेता चाहिए. राहुल गांधी जनता की निगाह में बाहरी थे जिसके मुकाबले अखिलेश बिल्कुल लोकल थे 

मतलब यह कि स्पष्ट बहुमत वह चीज नहीं है जिस पर लोकतंत्र को बहुत खुश होना चाहिए. बेशक, इसकी वजह से विधानसभाओं में दिखने वाली घोड़ा मंडी बंद हो जाती है, कई बार सरकारें बेजा दबाव झेलने से भी बच जाती हैं, लेकिन अक्सर बड़ा बहुमत सत्ताओं को निरंकुश बनाता है और ताकतवर तबकों के बहुसंख्यकवाद को मजबूत करता है. जब कांशीराम कहा करते थे कि उन्हें मजबूत नहीं मजबूर सरकारें चाहिए तो वे दरअसल यही बताया करते थे कि मजबूत सरकारें कमजोर लोगों और तबकों की नहीं सुनतीं. यूपी में मजबूर सरकारों के सहारे ही वह दलित राजनीति परवान चढ़ पाई जिसने इस राज्य को आजादी के बाद पहली बार ऐसा मुख्यमंत्री दिया जिसने अपना कार्यकाल पूरा किया. विडंबना बस यही है कि मायावती खुद को मिले स्पष्ट बहुमत को दीर्घावधिक जनादेश में नहीं बदल सकीं. भरोसा करना चाहिए कि अखिलेश यादव मायावती का हश्र याद रखेंगे.

बहरहाल, अब दूसरे मुद्दे पर लौटें. यह सच है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में राहुल गांधी नहीं चले, जबकि उनकी मदद के लिए सोनिया भी आईं और प्रियंका भी. लेकिन सारा दम लगा लेने के बावजूद कांग्रेस 30 सीटों तक भी नहीं पहुंच सकी. नेहरू-गांधी परिवार के विरोधी मानते हैं कि जनता ने राहुल गांधी के नाटक को नकार दिया है. लेकिन क्या यह राहुल गांधी या वंशवाद की हार है?  बेशक, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को उतनी सीटें नहीं मिलीं जितनी उसे उम्मीद थी, लेकिन कायदे से राज्य में उसके वोट भी बढ़े हैं और सीटें भी. इसलिए यह नतीजा जल्दबाजी भरा लगता है कि वे यूपी में अंतिम तौर पर खत्म हो गए हैं या खारिज कर दिए गए हैं. आखिर 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को यहीं से 22 सीटें मिली थीं.

दूसरी बात यह कि नेहरू-गांधी परिवारवाद की भले हार हुई हो, उत्तर प्रदेश और पंजाब दोनों राज्यों में परिवारवाद ही जीता है. मुलायम सिंह यादव की जगह अखिलेश यादव ले रहे हैं और प्रकाश सिंह बादल की जीत का सेहरा सुखबीर सिंह बादल के सिर बांधा जा रहा है. जाहिर है, पार्टियों में वह आंतरिक लोकतंत्र नहीं है जिसमें परिवार के बाहर किसी नेता के उदय की गुंजाइश बने.
सवाल है, इन चुनावों का क्या कोई सकारात्मक पहलू है?  एक तो यह कि जनता ने इन चुनावों में, जहां-जहां क्षेत्रीय विकल्प दिखे, उन्हें तरजीह दी. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बीएसपी के बाद ही बीजेपी-कांग्रेस को जगह मिली है. पंजाब में अकाली-बीजेपी गठजोड़ का जो बहुमत है वह अकालियों के बूते आया है, बीजेपी की सीटें भी घटी हैं और उनके वोट भी. उत्तराखंड में चूंकि ऐसा कोई विकल्प नहीं था, इसलिए लड़ाई कांग्रेस-बीजेपी के बीच बनी रही. गोवा में बीजेपी ने कांग्रेस को शिकस्त दी, लेकिन अपनी राष्ट्रीय छवि से अलग उसने वहां एक उदार चेहरा पेश किया और चर्च का भरोसा जीतने में कामयाबी हासिल की. मणिपुर में कांग्रेस के दबदबे को चुनौती देने की स्थिति नहीं थी, लेकिन वहां भी तृणमूल कांग्रेस ने अपनी लक्ष्य की जा सकने लायक मौजूदगी दर्ज करा दीं.

इसका एक मतलब साफ है कि वोटर को अपने इलाके के दल और नेता चाहिए. यूपी में राहुल गांधी के पिटने की एक वजह यह भी रही कि वे जनता की निगाह में बाहरी आदमी थे जिसके मुकाबले अखिलेश बिल्कुल लोकल थे. इस लिहाज से ये चुनाव भारतीय राष्ट्र राज्य के संघीय ढांचे की अवधारणा को कुछ और ताकत देते हैं. दिल्ली की निर्भरता राज्यों पर बढ़ी है- लखनऊ, पटना, भोपाल, या कोलकाता में अब वह अपने फैसले आसानी से थोप नहीं सकती. बेशक, यह स्थिति इन चुनावों से पहले भी थी- आखिर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से पहले बीएसपी की ही सरकार थी. फिर भी इन चुनावों से यह प्रक्रिया मजबूत हुई है और कांग्रेस और बीजेपी जैसे दलों पर यह दबाव है कि वे अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं में कुछ स्थानीय हसरतों के लिए भी गुंजाइश बनाएं. दरअसल इन चुनावों में सबसे बुरा हाल बीजेपी का हुआ है. उसकी सीटें भी कम हुई हैं, वोट भी, और जहां उसे कामयाबी मिली है – गोवा में- वहां स्थानीय स्तर पर खुद को बदलने की कोशिश की वजह से ही मिली है.

बहरहाल, यह चुनाव चर्चा कुछ सरलीकरणों का सच समझे बिना पूरी नहीं होगी. एक सरलीकरण तो यह था कि इस बार बहुत बड़ी तादाद में वोटर निकले. जबकि चुनाव शास्त्र के जानकार योगेंद्र यादव बताते हैं कि जो नई मतदाता सूचियां हैं वे पहले से कहीं बेहतर और सटीक हैं जिनमें बरसों से चले आ रहे, या अलग-अलग जगहों पर दुहराए जा रहे नाम हटाए जा चुके हैं. इसलिए वोटरों की संख्या जरूर बढ़ी है, लेकिन यह बढ़ोतरी उतनी बड़ी नहीं है जितनी प्रतिशत के लिहाज से दिखती है.

दूसरी और ज्यादा महत्वपूर्ण बात चुनाव आयोग की वह भूमिका है जिसकी इन दिनों कुछ ज्यादा तारीफ हो रही है. बेशक, चुनाव आयोग की सख्ती की वजह से कई गड़बड़ियां रुकी हैं, लेकिन इसके कुछ अवांतर प्रभाव भी रहे. जो चुनाव भारत में लोकतंत्र के त्योहार की तरह हुआ करते थे, वे बहुत तकनीकी किस्म की औपचारिकता में बदलते जा रहे हैं. हमारे यहां चुनावी राजनीति का एक देशज रंग रहा जिसमें आम लोगों को चुनाव होने की जानकारी चुनाव आयोग की अधिसूचनाओं से नहीं, दीवारों पर लिखे लाल नारों से होती थी. पार्टियों के वादों की सूचना उनके घोषणापत्रों से नहीं, नेताओं के भाषणों से मिलती थी और चुनावी हवा की थाह घरों और सड़कों पर लगे झंडों से लगती थी. लेकिन अब घरों पर झंडे नहीं लग सकते, दीवारों पर नारे नहीं लिखे जा सकते और नेता मनचाहे वादे नहीं कर सकते. सतह पर दिख रहा है कि इससे चुनाव साफ-सुथरे हुए हैं, लेकिन सच यह है कि इसकी वजह से जो खर्च खुलकर होता था वह अब छिपकर होने लगा है और उसमें काले पैसे की भूमिका और बढ़ गई है. इन चुनावों में यूपी से पंजाब तक जितने बड़े पैमाने पर रुपये और शराब बंटने की खबर आई, उससे अंदाजा मिलता है कि यह चुनावी साफ-सुथरापन कैसा था. दूसरी बात यह कि सड़क और मैदान पर प्रचार की कमी ने मीडिया पर नेताओं और पार्टियों की निर्भरता बढ़ाई और जानकार बताते हैं कि इन चुनावों में पेड न्यूज का खेल शर्मनाक ढंग से खेला गया.

बेशक, चुनाव आयोग को अपना काम करना चाहिए और नेता कायदे तोड़ें तो उन्हें रोकना भी चाहिए. लेकिन अंततः चुनाव आयोग एक प्रशासनिक संस्था ही है, राजनीतिक प्रक्रियाओं के नियमन और निर्धारण में उसकी भूमिका एक हद से आगे नहीं हो सकती. चुनाव अंततः समाज में और लोगों के बीच लड़े जाने हैं. लोग अपने ढंग से फैसले करते हैं और उन्होंने किया है. यूपी में पूरी तरह सरकार बदल डाली, पंजाब में अकालियों को दुबारा मौका दिया और उत्तराखंड में कांग्रेस को सांत्वना पुरस्कार देकर छोड़ दिया कि वह मिल-मिलाकर सरकार बना ले. यह भी स्पष्ट है कि लोग मीडिया के असर में नहीं आए. मीडिया में राहुल गांधी की हवा चल रही थी जो जनता के बीच निकल गई. ज्यादातर एग्जिट पोल इन नतीजों का अनुमान लगाने में नाकाम रहे.

जो लोग इन चुनावों को 2014 की लोकसभा का सेमीफाइनल बता रहे हैं, वे कुछ ज्यादा हड़बड़ी में हैं. इसी साल गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव हैं, अगले साल पहले कर्नाटक में और लोकसभा चुनावों से ठीक पहले चार और राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में. हालांकि तब भी उन नतीजों को लोकसभा चुनावों का पूर्वाभास मानने की भूल  खतरनाक होगी. हम याद कर सकते हैं कि 2003 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की जीत ने ही बीजेपी को यह गुमान दिया कि अगर वह जल्दी चुनाव कराए तो 2004 में केंद्र में लौट सकती है. लेकिन नतीजों ने उन्हें अंगूठा दिखा दिया.

दरअसल इन चुनावों ने यही बताया है कि सारे तनावों-दबावों के बीच, पैसे और बाहुबल जैसी बीमारियों के बावजूद और जातिगत-सांप्रदायिक मधुमेह के रहते हुए भी हमारे लोकतंत्र के बुनियादी अवयव ठीक से काम कर रहे हैं, उसका रक्तचाप दुरुस्त है और उसकी सेहत अच्छी है.

अवैध खनन का ‘राज’स्थान

पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय के सामने राजस्थान सरकार ने दावा किया था कि अरावली की पहाड़ियों में खनन पूरी तरह बंद है. लेकिन राष्ट्रीय राजधानी के मुहाने पर बसे सीकर जिले की तस्वीर ही इस दावे की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है. शिरीष खरे की रिपोर्ट

राजस्थान की राजधानी जयपुर को देश की राजधानी दिल्ली से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-8 के साथ ऊंट के आकार-सी उठती-बैठती अरावली पर्वत श्रृंखला भी सरपट दौड़ती है. मगर हमें जिसकी तलाश है उसका रास्ता जयपुर से कोई दो घंटे की दूरी पर पावटा कस्बे से खुलता है. यह सीकर जिला है, राजस्थान में चल रहे अवैध खनन और उससे हो रहे पर्यावरण विनाश का एक बड़ा केंद्र. यहां के दुर्गम रास्तों से 45 किलोमीटर दूर नीम का थाना (सीकर की एक तहसील) की तरफ बढ़ते हुए सफेद पत्थरों से ओवरलोडेड ट्रकों का काफिला देखकर ही पता चल जाता है कि आगे आपको बड़े पैमाने पर खनन देखने को मिलेगा. और आधा घंटे के बाद ही आपको बूचाड़ा नदी का वह किनारा भी मिल जाता है जिसके किनारे-किनारे कोई 15 किलोमीटर तक बजरी (बारीक पत्थर) फिल्टर प्लांटों का जाल बिछा हुआ है. यहीं बने बूचाड़ा बांध से लगी पहाड़ियों पर थोड़ी-थोड़ी देर में होने वाले धमाकों से इलाके में चल रहे खनन के काले कारोबार की सूचना सुनी जा सकती है. जगह-जगह पर मशीनी पंजों के जरिए अरावली के सीने से पत्थरों को निकालकर बड़े-बड़े पहाड़ इकट्ठा किए गए हैं. और उनकी ढुलाई के लिए नजदीक ही बड़ी तादाद में ट्रक भी तैनात हैं. मशीनों पर न तो सर्दी-गर्मी का असर पड़ता है और न ही दिन-रात का. लिहाजा खुदाई से ढुलाई तक का काम बेरोकटोक जारी है.

खनन माफिया अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ पत्थरों की इतनी खुदाई कर जाते हैं कि ठीक-ठाक कुछ बताया भी नहीं जा सकता. यह तो खनन का शुरुआती दृश्य है. इससे भयावह रूप पहाडि़यों के बीच छिपा है. यहां के गांव टोडा से लेकर भराला और रायपुर मोड़ से लेकर पाटन और कोटपुतली इलाके की पहाड़ियों तक बर्बादी का आलम कई किलोमीटरों में टुकड़ों-टुकड़ों में बिखरा दिखता है.
अरावली भारत के सबसे प्राचीन पर्वतों में से एक है. दिल्ली के कुछ उत्तर से गुजरात तक तकरीबन 692 किलोमीटर लंबी यह पर्वत श्रृंखला बीच-बीच में टूट गई है. इसी के पश्चिमी भाग पर बालेश्वर पर्वत श्रृंखला की गोद में राजस्थान का यह जिला स्थित है. दिल्ली और हरियाणा के नजदीक स्थित यह इलाका फिलहाल लूट की गहरी खदानों में तब्दील हो चुका है. स्थानीय मानवाधिकार कार्यकर्ता कैलाश मीणा बताते हैं, ‘इस इलाके की स्थिति सड़क पर पड़े उस ट्रक की भांति है जिसमें भरे संतरों को बचाने की बजाय लोगों द्वारा उसे लूटा जाता है. दिल्ली और गुड़गांव के कुछ रसूखदारों के लिए भी यह इलाका अब लूट का गढ़ बन चुका है.’

खनन माफिया ने सीकर में बहने वाली कासावती नदी को पत्थरों से पाट दिया है, इसके चलते रायपुर बांध में पानी की आवक भी ठप पड़ गई है

2002 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली क्षेत्र में खनन के नए पट्टे के आवंटन पर पूरी तरह से रोक लगा दी थी. बीते साल सुप्रीम कोर्ट में दाखिल शपथपत्र में भी राज्य सरकार ने यहां किसी भी तरह का खनन न होने का दावा किया था. मगर स्थानीय बाशिंदे बताते हैं कि बीते दो साल में अवैध खानों के चलते इलाके का नक्शा कुछ ऐसा बदला है कि अब स्थानीय आदमी ही रास्ता भूल जाए तो वह एक खान से दूसरी खान में भटकता रह जाएगा.

अरावली की इसी पट्टी पर मोडा पहाड़ी भी है. कई करोड़ रुपये का घोटाला सामने आने के बाद इसे घोटाला पहाड़ी भी कहा जाने लगा है. सितंबर, 2010 में स्थानीय लोगों ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से अवैध खनन को लेकर लिखित शिकायत की थी. मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्देश पर खनन विभाग के एक दल ने जब यहां का दौरा किया तो भारी मात्रा में अवैध खनन की शिकायत को सही पाया. इसके बाद 18 खानों को बंद किया गया. दल ने अपनी रिपोर्ट में 18.44 लाख टन अवैध खनन की पुष्टि और 23 करोड़ रुपये जुर्माना वसूलने की सिफारिश की थी. मगर इस कार्रवाई के बाद बाद में वही हुआ जो यहां सालों से चलता आ रहा है. सीकर के खनन इंजीनियर द्वारा वसूली किए बिना ही सभी 18 खानों को दुबारा खनन करने की अनुमति दे दी गई और खनन आज भी धड़ल्ले से जारी है. नीम का थाना नगर पालिका के चेयरमेन केशव अग्रवाल बताते हैं, ‘इस धंधे के गैरकानूनी तौर-तरीके पुलिस, अधिकारियों और राजनेताओं की मिलीभगत के बिना मुमकिन नहीं. यह तो एक पहाड़ी पर हुए अवैध खनन का मामला है. यहां से पूरे इलाके में जारी लूट की छूट का अनुमान लगाया जा सकता है.’

यहां खनन माफिया के लिए खनन का एक मतलब है जितनी खुदाई उसी अनुपात में पानी का दोहन भी. इसके लिए नदी-नालों और बांधों को भी नहीं बख्शा गया है. सुप्रीम कोर्ट और राजस्थान अप्रधान खनिज (छोटे खनिज) अधिनियम,1986 के अनुसार जल भराव क्षेत्रों में खनन नहीं हो सकता. मगर यहां के रेला बांध भराव क्षेत्र में 16 खानों से खनन का मामला उजागर हुआ है. इस मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो द्वारा कलेक्टर धर्मेंद्र भटनागर और पूर्व कलेक्टर जीएल गुप्ता सहित कई अधिकारियों को नोटिस भेजा गया है. दूसरी तरफ ऐसे मामलों से बेपरवाह खनन माफिया क्रशिंग मशीनों का रास्ता बनाने के लिए कई नदियों का रास्ता भी रोक रहा है. यहां कासावती एकमात्र ऐसी नदी है जिसमें लगातार पानी बहता था. मगर माफिया ने अपने कारोबार के लिए नदी का रास्ता भी रोक दिया है. उसने खनन क्षेत्रों से निकलने वाले भारी-भरकम पत्थरों से नदी को पाट दिया है. इससे बीते छह महीने में कासावती का पानी तो रुका ही, नदी पर बने रायपुर बांध के लिए पानी की आवक भी ठप पड़ गई है. इसी क्रम में पाटन के डाबरा नदी के आस-पास फैले बजरी फिल्टर प्लांटों पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा आपत्ति जताए जाने के बावजूद प्लांटों से चौबीसों घंटे बजरी साफ की जा रही है. इससे कई गांवों में ट्यूबवेलों के पानी से बारूद की बदबू आना आम बात हो गई है. इसी के समानांतर धरती का सीना छलनी करने वाली बोरिंग मशीनों की संख्या भी तेजी से बढ़ती जा रही है. 2010 में सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान की सभी बोरिंग मशीनों का रजिस्ट्रेशन करने का आदेश दिया था. मगर आरटीआई से मिली सूचनाएं बताती हैं कि सीकर जिले में एक भी बोरिंग मशीन का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है. जाहिर है खनन के इस कारोबार में प्रतिदिन लाखों लीटर पानी को भी अवैध तौर पर ही उलीचा जा रहा है.

यहां पत्थरों से सोना बनाने के खेल में पर्यावरण के कई नियमों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मापदंडों के मुताबिक आबादी से 1,500 मीटर और स्कूलों से 500 मीटर की सीमा में कोई भी विस्फोट नहीं किया जा सकता. मगर यहां आबादी और स्कूलों से बामुश्किल 100 मीटर के दायरे में ही धमाका कर दिया जाता है. इन धमाकों से कई घर धसकते हैं तो कई पत्थर स्कूल की दीवारों से टकरा जाते हैं. कुठियाला गांव में खनन माफिया की धमक का खौफ कुछ ऐसा है कि यहां का स्कूल खाली हो चुका है. फिलहाल इस स्कूल में माफिया का कार्यालय खुला है. वहीं रामल्यास गांव में स्कूल के हेडमास्टर ब्रजमोहन बताते हैं कि धमाकों से कोई न कोई कमरा चटकता ही रहता है. बच्चे जिस छत के नीचे पढ़ने आते हैं उसकी बार-बार मरम्मत के बाद भी हालत इतनी जर्जर है कि पता नहीं यह कब गिर जाए.

सवाल है कि धमाकों में काम आने वाला बारूद आता कहां से है. आरटीआई के तहत मिली जानकारी में भारत सरकार के पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन ने बताया कि उसने सीकर जिले में सिर्फ पांच लोगों को प्रतिदिन 70 से 250 किलोग्राम तक विस्फोट करने का लाइसेंस दिया है. इलाके के लोग बताते हैं कि यहां हर दिन तकरीबन 100  से 150 धमाके होते हैं और एक धमाके में कम से कम 120 किलो बारूद की जरूरत होती है. इस हिसाब से हर दिन यहां कम से कम 12,000 किलो बारूद का इस्तेमाल हो रहा है. सीधा मतलब है कि गैरकानूनी तरीके से यहां की खानों में प्रतिदिन कई क्विंटल विस्फोटक का प्रयोग किया जाता है. यहां अवैध विस्फोटक को कई बार पुलिस ने जब्त भी किया है लेकिन ज्यादातर मामलों में खानापूर्ति के बाद मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है. जबकि विस्फोटक अधिनियम, 1908 में जीवन को खतरे में डालने या संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले विस्फोटक को रखने पर दस वर्ष के कठोर कारावास का प्रावधान है. दो साल पहले स्थानीय लोगों की मुहिम पर उच्च कोटि के विस्फोटक से भरा एक ट्रक पाटन पुलिस चौकी के पास पकड़ा गया था. मगर सिविल न्यायाधीश ने ड्राइवर को मात्र एक हजार के जुर्माने पर छोड़ दिया. हालांकि न्यायाधीश ने पाटन थानाधिकारी को विस्फोटक नष्ट करने का भी आदेश दिया था, लेकिन आरटीआई से मिली सूचना से पता चला है कि बाद में पुलिस ने यह विस्फोटक भी ट्रक के मालिक को ही सौंप दिया.

सवाल यह भी है कि इन पहाडि़यों से निकला माल ट्रकों के जरिए अपनी मंजिल तक पहुंचता कैसे है. डाबला पहाड़ी इलाके के किसान मालीराम बताते हैं कि उनके गांव में हर दिन 40 ट्रकों की आवाजाही होती है. कई व्यापारी बताते हैं कि यह माल पड़ोसी राज्य हरियाणा की सीमा से बाहर पहुंचता है. पाटन से सटे हरियाणा के महेन्द्रगढ़ जिले की दूरी सिर्फ आठ किलोमीटर है और धूल उड़ाते ट्रकों का रास्ता भी पाटन पुलिस थाने से होते हुए सीधा हरियाणा की ओर जाता है. ऐसे में पुलिस के कुछ नहीं कर पाने से उसकी भूमिका संदिग्ध बन जाती है. मगर सीकर कलेक्टर धर्मेंद्र भटनागर कहते हैं, ‘हर चौकी पर सख्ती से जांच की जाती है.’ उनका तर्क है कि यहां पर्याप्त चौकियां नहीं हैं और अगर कोई ट्रक किसी तरह हरियाणा की सीमा में चला जाए तो फिर कुछ नहीं किया जा सकता.

विडंबना यह है कि खनन की अवैध गतिविधियों को रोक पाने में नाकारा साबित हुए कई विभागों के पास उससे जुड़ी बुनियादी सूचनाएं तक नहीं. जैसे कि आरटीआई के तहत तहसीलदार, विद्युत विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जब नीम का थाना में कुल स्टोन क्रशरों की संख्या पूछी गई तो सभी ने अलग-अलग आंकड़ा दिया. तहसीलदार ने 52, विद्युत विभाग ने 173 और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 34 स्टोन क्रशर बताए. वहीं कुछ मामलों में सूचनाएं होने के बाद भी प्रशासनिक कार्रवाई नहीं की गई. हालांकि भूमि राजस्व अधिनियम, 1991 की धारा 6 के मुताबिक अगर कोई अधिकारी या कर्मचारी सरकारी जमीन पर अतिक्रमण की सूचना होने के बावजूद कार्रवाई नहीं करता तो वह भी सजा का पात्र है. मगर आरटीआई से मिली सूचनाएं बताती हैं कि राजस्व विभाग के अधिकारियों को इस इलाके के नदी-नालों सहित चरागाहों की सरकारी जमीनों पर खनन माफिया द्वारा किए गए कब्जों की जानकारी है. मगर अफसरशाही पर खनन माफिया इस कदर भारी है कि किसी पर कोई कार्रवाई नहीं की गई.

‘आपने अपना शैतान खुद गढ़ा है’

‘चाणक्य’ और ‘पिंजर’ बनाने वाले डॉ. चन्द्र प्रकाश द्विवेदी का नया धारावाहिक ‘उपनिषद गंगा’ पिछले इतवार से दूरदर्शन पर शुरू हुआ है. उनकी फ़िल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ भी इसी साल रिलीज होने वाली है. डॉ. द्विवेदी से मेरी मुलाकात उनके घर में होती है, जिसमें विभिन्न मुद्राओं में बुद्ध की अनेक मूर्तियां हैं और उनसे भी ज्यादा सकारात्मकता. उनके साथ समय बिताना भारत के अतीत की छांह में बैठने जैसा है, किसी और समय में पहुंचने जैसा है जिसमें आपको लगेगा कि आप किसी शांत जंगल में एक तालाब के किनारे बैठे हैं और बाहर जो शोर हो रहा है, वह किसी और समय की बात है. वे ऐसे गिने-चुने व्यक्तियों में से हैं जो अपने काम की बजाय वेदांत पर बात करते हुए ज्यादा खुश दिखते हैं. वे बताते हैं कि कैसे अपने सर्जक होने का अहंकार करने के लिए हम सब बहुत मामूली हैं, कैसे हर चीज का अतीत निश्चित है और इसलिए अतीत से बचने या उसे हिकारत से देखने की बजाय उसे समझने की कोशिश ज्यादा काम आ सकती है. यहां उसी बातचीत के कुछ अंश हैं.

आपका अधिकांश काम इतिहास पर है. इतिहास में सबसे ज़्यादा क्या लुभाता है या कहीं कोई ऐसी लालसा है कि मैं इस बहाने इतिहास में जी लूं.

हजारों साल पहले किसी ऋषि ने भी यही कहा कि हम उससे मिलने की शर्त पर ही अलग हुए हैं. अब हर कोई किसी से मिलना चाह रहा है. किसी का आनन्द स्त्री या पुरुष तक आकर ही रुक गया और कोई है जो ‘उस’से मिलने का इंतज़ार कर रहा है.

ये सच है कि मैं किसी और समय में जी लेता हूं. यह एक्वायर्ड है. लम्बे समय के अभ्यास और अनुभव के बाद ये हुआ कि मैं कहता हूं लोगों से कि मेरे लिए किसी युग में जाकर उस युग के पात्रों के साथ रहना और उन्हें देख पाना आसान है. वो हो सकता है कि मेरा अपना भ्रम भी हो. क्योंकि कल्पना और भ्रम के बीच एक झीनी सी रेखा होती है. लेकिन कल्पना के दृष्टिकोण से देखा जाए तो उसका कारण है कि मैंने भारत के अतीत को लेकर जिसे डेवलपमेंट ऑफ मैटीरियल कल्चर, सभ्यता का विकास कहते हैं जिसमें स्थापत्य है, कला है, वेशभूषा है, समाज है. समाज का सामाजिक इतिहास कि वह किस तरह से विकसित हो रहा है, उसका लम्बे समय तक अध्ययन किया है.

एक बार किसी बड़े प्रसिद्ध निर्माता ने पूछा था मुझसे कि आपको क्या लगता है कि आपको पकड़ना हो तो कितना समय लगेगा इन सब चीजों में? मैंने कहा पन्द्रह वर्ष. इसीलिए कि मैं पन्द्रह वर्ष लगातार यह पढ़ता रहा और अब जब वह पढ़ना शुरू करेगा, मैं फिर आगे और कुछ पढ़ लूंगा. (हँसते हैं) यह आत्मश्लाघा है, आत्मप्रशंसा है. इससे बचते हुए मैं यह कहूंगा कि भारत का इतिहास, यह विश्व के इतिहास के बारे में मैं नहीं कहता हूं, मुझे मोहनजोदड़ो, बुद्ध का काल, मौर्यकाल की गलियाँ, गुप्तकाल की गलियाँ, ये बुलाती हैं कि आओ यहाँ और देखो. बीच में कभी जब एक दो बार मुझे एड फ़िल्म्स बनाने को कहा गया, तब भी मैं उन एड फ़िल्म्स को लेकर किसी युग में चला गया. हालांकि मैंने बनाई नहीं. पर एक ज़बर्दस्त आकर्षण है. किसी पुरातात्विक स्मारक पर जाकर मुझे अति प्रसन्नता होती है. जैसे मैं नालन्दा गया था तो मैं अकेला था. मैं 1988 या 1989 में गया था नालन्दा. गर्मी का महीना था, चिलचिलाती धूप. उस समय न स्मारक पर कोई सुरक्षा थी. मैं अकेला व्यक्ति था और मेरे हाथ में एक कॉपी थी जिस पर मैं प्लान बना रहा था. एक स्मारक को देखकर मुझे जितना आनन्द आता है, किसी दूसरे पर्यटन स्थल को देखकर नहीं आता है. कहीं न कहीं एक आकर्षण है या कहूं कि वह मेरी चेतना का हिस्सा है. शर्ट पैंट या गाड़ियों से मुझे कोई परहेज नहीं. मैं इसी युग में पैदा हुआ हूं. परंतु बैलगाड़ी और धोती और लालटेन और दिया, यह मुझको ज़्यादा आकर्षित करता है. मैंने गाँव तब जाना बन्द कर दिया, जब गाँव में बिजली आ गई. इसलिए कि मेरे लिए गाँव और शहर का अंतर ख़त्म हो गया. दूसरा एक मेरा मानना है कि जो कुछ भी आप करते हैं, वह सब अतीत के गर्भ में जा रहा है. भूतकाल निश्चित है आपका इसलिए उससे आप बच नहीं पाएँगे. और अगर आप भूत को समझने का प्रयत्न करें तो शायद आप वर्तमान को और बेहतर तरीके से देख पाएँगे. पर हम लोग हमेशा अतीत के प्रति एक हिकारत का भाव रखते हैं. खासकर हमारे भारत में. उसके कई कारण हैं- ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनैतिक कारण हैं. परंतु शायद इतिहास लिखा ही इसलिए जाता है और लगातार पीढ़ियों को वह याद दिलाया जाता है कि इतिहास को जान लोगे तो भविष्य भी बेहतर हो सकता है.

लेकिन इतिहास को कैसे पढ़ा जाए? क्योंकि इतिहास के भी कई रूप हैं. कोई नया विद्यार्थी किन चीजों को माने, कहाँ शंका करे?

क्रॉस रेफरेंस के बिना तो संभव भी नहीं है. और हमारे यहां तो अजीब स्थिति है. क्योंकि हमारे यहां इतिहास मौखिक परंपरा में ही जीवित रहा. लिखने की हमारे यहां परम्परा ही नहीं रही है. उसका कारण भी मैं देख पा रहा हूं. जो आत्मा की अमरता का संदेश देने वाला, जो मानता है कि सत्य के अलावा सब चीजें नित्य बदलती जाएँगी, देश काल समाज परिस्थिति, जो कुछ भी आप देख रहे हैं, जो आज है, हर क्षण बदल रहा है, बुद्ध भी वही कहते हैं, वेदांत भी. आत्मा के अलावा और किसी चीज को स्थिर माना ही नहीं गया है इसलिए हमारे यहाँ इसकी बिल्कुल चिंता नहीं की गई कि इतिहास को बिल्कुल सँभालकर रखा जाए और अक्षरों में लिख दिया जाए. और यह अमिट है, यह भी प्रयत्न नहीं हुआ. इतिहास की जो हमारी चेतना है, यह भी पश्चिम की चेतना है जो शब्दों में लिखी जाती है.

किसी एक घटना को लेकर अलग-अलग व्यक्तियों का अलग दृष्टिकोण होगा लेकिन आप उन सबको देखेंगे तो कोई ऐसा सूत्र मिल जाएगा. कोई एक धागा मिल जाएगा जो सभी को जोड़ रहा होगा. तो सच्चाई पर पहुँचना बहुत कठिन काम नहीं है. एक और बात, इतिहास का अर्थ यह नहीं होता है कि किसी व्यक्ति के जन्म और मृत्यु की तारीखें और उसके जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंग. इतिहास तो है ही इंटरप्रेटेशन. कि ऐसा क्यों हुआ, या ऐसा नहीं होता तो क्या होता. यानी प्लासी की लड़ाई की हार के कारण. सत्य सिर्फ़ इतना है कि हार गए. कौन जीता, कौन हारा, आपने देख लिया लेकिन बाद में मीमांसा होती है. और यही इतिहास को रोचक बनाता है कि ऐसा क्यों हुआ.

क्या आप मिथकों को भी इतिहास का हिस्सा मानते हैं?

मिथक भी इतिहास का हिस्सा है. इसलिए कि मिथक में भी सत्य आपको मिल जाएगा. सत्य कहीं न कहीं अपना लंगर डाले रहता है. और उसके आसपास कहानियों का आवरण आ चुका होता है. परत दर परत आवरण उतारते जाएँगे तो सच मिल जाएगा. हम दूर क्यों जाएँ. मैं तुमसे जो कह रहा हूं, तुम जब किसी और से कहोगे तो उसमें कुछ शब्द बढ़ और घट जाएँगे. यह मेरे लिए तो नित्य का अनुभव है. मैं हर दिन अपने आपको समझाता हूं कि मैंने उसी बात पर थोड़ा और मुलम्मा क्यों लगा दिया? शायद हमारे भीतर का जो रचनाकार है, वह रोज़मर्रा की बातों के साथ भी रचना करना चाहता है.

यह दिलचस्पी शुरू कब हुई? बहुत बचपन में या पढ़ाई के दौरान?

इतिहास पढ़कर मैंने यही जाना कि मेरे होने या न होने से कोई अंतर नहीं पड़तामेरे एक शिक्षक थे देवनाथ सिंह जो इतिहास पढ़ाते थे लेकिन मुझे लगता है कि वे एक नाटककार थे. क्योंकि जब वे कहते थे कि युद्ध हुआ तो वे युद्ध पर नहीं ठहरते थे. तलवारें टकराईं, खनखनाहट हुई, हाथी चीखे चिंघाड़े, यह सब बताते थे. शायद अपने विद्यार्थियों को इंगेज करने का उनका यह तरीका था. लेकिन उससे मुझे समझ में आया कि इतिहास विजुअली बहुत दिलचस्प हो सकता है. मुझे याद हैं पान खाते हुए देवनाथ सिंह जो इतिहास पंक्तियों तक ही सीमित नहीं रखते थे, उनके बिम्ब बनाते थे. मेरे मन में वही बिम्ब ठहर गए, इसलिए मैं इतिहास को हमेशा चित्रों में देखता हूं. और इसलिए जब मैं लिखता हूं तो मैंने इतिहास को हमेशा अपना विषय चुना, इसलिए कि आपके पास एक पुख़्ता ज़मीन है, एक पुख़्ता कहानी है और इतिहास के जो हम पात्र लेते हैं, ये वो पात्र हैं जिन्होंने युग रचा है. वे असामान्य पात्र हैं. असामान्य व्यक्ति और असामान्य परिस्थितियां ही इतिहास बनाते हैं. जैसे चाणक्य और चन्द्रगुप्त असामान्य व्यक्ति हैं. देश खंड खंड में बंटा हुआ है, एक यूनानी आक्रांता देश पर आक्रमण करने जा रहा है. यह अभूतपूर्व परिस्थिति है और अभूतपूर्व चरित्र हैं. इसीलिए युग बदलता है. तो मुझे लगता है कि किसी भी कहानी के लिए इससे ज़्यादा मसालेदार चीज नहीं हो सकती.

अगर हम अपने आसपास भी देखें तो घूम-फिरकर हमारे अतीत की कहानियां ही हमें बार बार सुनाई जाती हैं. रामायण की कहानी को जब भी कोई कथाकार सुनाता है, हर बार वर्तमान के दृष्टांत जोड़ता है, हर बार वह और रसमय बनती जाती है. वह नित्य बढ़ती जाती है. बाबा वाल्मीकि से शुरू हुई और आसाराम बापू तक बढ़ती जा रही है. आसाराम बापू यहाँ सिर्फ़ एक नाम है. आप बनारस जाएँगे तो हर गली मोहल्ले में कोई न कोई कथाकार उसमें कुछ जोड़ता मिलेगा. तो स्कूल के दिनों से इतिहास में रुचि शुरू हुई. मेरा एक अच्छा दोस्त था अब्दुल कादिर. कई बार पीछे जाकर देखता हूं कि कहानी कहना कहाँ से मैंने शुरू किया तो अब्दुल कादिर और मैं प्राइमरी में एक बेंच पर बैठते थे. और अब्दुल कादिर दारासिंह की फिल्में बहुत देखता था. और वह आकर म्यूजिक के साथ कहानियाँ सुनाता था. ढिशुम. तलवारें चलीं तो खचखच खचखच. मैं तो ऐसे परिवार से था जहाँ फ़िल्में देखना भी बहुत अच्छा नहीं माना जाता था. साल-दो साल में एकाध फ़िल्म देखी जाती थी. लेकिन अब्दुल कादिर हमेशा बताता रहता था.

पहली फ़िल्में कौनसी थीं जिन्होंने आप पर प्रभाव डाला.

स्कूल में तो हम सबके आदर्श मनोज कुमार थे. मुझे याद है कि उनकी ‘यादगार’ देखने के लिए हम टिकट के लिए लाइन में लगे थे. और मनोज कुमार की फ़िल्म देखने के लिए घर से परमिशन मिल जाती थी क्योंकि उन्होंने वह प्रतिष्ठा पा ली थी कि अच्छी फ़िल्में बनाते हैं. फ़िल्में देखने का शौक ज़रूर रहा है लेकिन जैसे जैसे सिनेमा में आता गया, मेरी देखने की रुचि घटती गई. इसका एक कारण यह भी रहा होगा कि मैं जिस तरह की सेरिब्रल फ़िल्में देखना चाहता हूं, जिनमें कोई बौद्धिक विमर्श हो, सिर्फ़ चित्र न हों. चमकीले चित्र, सुन्दर चेहरे हर किसी को अच्छे लगते हैं और अधिकतर हम टीवी या सिनेमा से उसके चेहरों के माध्यम से ही जुड़ते हैं. आइडिया कभी आपको नहीं जोड़ता. मैं आइडिया से जुड़ता हूं और जब वह नहीं होता है सिनेमा में तो सब कुछ होने के बाद भी, कितना भी विस्मयकारी और अद्भुत हो, मुझे लगता है कि उसमें आत्मा नहीं है. मैं पढ़ता ज़्यादा हूं क्योंकि उसमें आप अपने बिम्ब खुद गढ़ने के लिए स्वाधीन होते हैं.

शोध किस तरह का करते हैं आप? ऐसा इसलिए पूछ रहा हूं कि आपके काम में जो प्रामाणिकता देखने को मिलती है, वह बहुत कम दिखती है.

मुझे लगता है कि आपको लाइब्रेरी तक जाना पड़ेगा और घंटों रहना पड़ेगा. और यह एक दिन का काम नहीं है, वर्षों का काम है. यह निरंतर चलता है. कई चीजें मुझे चाणक्य के निर्माण के बीस साल बाद समझ आईं कि चाणक्य के युग के निर्माण में और क्या बेहतर हो सकता था. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के बहुत सारे लोगों ने बहुत सालों तक कालिदास के नाटक किए हैं. ‘आषाढ़ का एक दिन’ बहुत सारे लोगों ने किया है. मैंने उनके बहुत सारे चित्र देखे. एक दिन अचानक मैंने सोचा कि हम पश्चिम की जो फ़िल्में देख रहे हैं 84 ईस्वी या समकालीन समय की और हमारी फ़िल्में देख रहे हैं तो दोनों की सभ्यता में बड़ा अन्तर है. वे लोग सिले हुए वस्त्र पहनने लगे हैं. हम लोगों में सिले हुए वस्त्रों का उल्लेख है लेकिन हम लोग पहन नहीं रहे हैं. हम उत्तरीय और अंतरीय पर अटके हैं. बस दो कपड़े और हमारा बाकी शरीर उघड़ा है. यह कहा जा सकता है कि पश्चिम ठंडा है और हम उष्ण प्रदेश हैं. लेकिन मुझे लगता है कि सर्दी में उत्तर या मध्य भारत में आप सिर्फ़ उत्तरीय के सहारे तो नहीं रह सकते. आपको ऊनी कम्बल की ज़रूरत पड़ी होगी और लगातार उसे लपेटकर रखना भी सम्भव नहीं है, और जबकि सुंई का उल्लेख है कि बौद्ध भिक्षु अपने साथ सुंई रखते थे और सीने की कला से भी हम अनभिज्ञ नहीं थे तो हमारे निरूपण में सिले हुए वस्त्र गायब क्यों हैं?  फिर मैंने एक दिन एनएसडी के कुछ लोगों से पूछा कि बरसात के दिनों में या कश्मीर की ठंडक में कालिदास उत्तरीय पहनकर कैसे घूम सकता था? वे बोले कि इस पर हमने विचार ही नहीं किया था.

दरअसल हमने अपने शोध में शिल्पों को अपना आधार बना लिया. मन्दिरों की जो मिथुन मूर्तियां है, उनको आधार बनाया. लेकिन उसमें उल्लास उत्सव को अभिव्यक्त किया गया है, यथार्थ को नहीं. क्योंकि शिल्पकार तो शरीर का सौंदर्य दिखाता है. इसीलिए हमारे यहां आइटम गीत भी हैं. इसीलिए होता है कि नाचते हुए कभी न कभी कोई नायक शरीर के कपड़े उतार देता है या स्त्रियों को आप कम से कम कपड़ों में देखते हैं. क्योंकि शरीर का सौन्दर्य दर्शनीय है. इसलिए मन्दिरों के शिल्प में आप स्तन, नितम्ब, नाभि, कटि देख रहे हैं. उन पर आप लबादा डाल देंगे तो वह सौन्दर्य नहीं दिखेगा. वह संस्कृति का उद्देश्य है. और जब आप यथार्थ को कहना चाह रहे हैं तो आपका उद्देश्य अलग होता है. यह समझने में मुझे बीस साल लगे. अब अगर मैं मौर्यकाल करूंगा, उसमें ऋतुएं होंगी और उसमें अलग वेशभूषाएं होंगी.

नज़दीक के समय को फिर से रचने में ज़्यादा मेहनत लगती है या प्राचीन समय को?

नज़दीक के समय को. क्योंकि वह हर किसी की चेतना का हिस्सा होता है. बैलगाड़ी का स्वरूप हज़ारों साल तक नहीं बदला लेकिन कारें हर दस साल में बदल जाती हैं. मोहल्ला अस्सी में हमें 1988 से 1998 तक का समय शूट करना था और इसमें मेरी सबसे बड़ी चिंता थी कि मैं सड़कों से गाड़ियाँ कैसे हटवाऊंगा. क्योंकि उस समय में सिर्फ़ मारुति थी, इंडिका वगैरा नहीं आई थी. आखिर एक समय के बाद मैंने परेशान होकर कह दिया कि कुछ मत करो और हम घोषणा कर देंगे कि आप कहानी पर ध्यान दें, समय मेरी रुचि का विषय नहीं है. अब बनारस जैसे भीड़भाड़ वाले इलाके में आप कैसे गाड़ियों को हटाएँगे? या तो आप फिर डिजिटली हटाएँ उन्हें लेकिन फिर सवाल यह है कि इतना श्रम, इतना मेहनत क्या ज़रूरी भी है? और देखने वाले भी जानते हैं कि वे सिनेमा ही देख रहे हैं, असलियत नहीं. वरना क्या आप कभी परदे पर आग लगने पर पानी लेकर दौड़े हैं? इसीलिए मैंने अपने कला निर्देशक से कहा कि हम घोषणा कर देंगे कि हो सकता है कि आप कुछ ऐसी चीजें देख लें, जो उस समय में नहीं थी. वह गुस्से में कहने लगा कि क्यों घोषणा कर दें यार? मैंने कहा कि मेरी प्रतिष्ठा ही पीरियड को लेकर है. लोग कहेंगे कि आपको इंडिका दिखाई ही नहीं दी. वह बोला, जिसको दिखेगा, देख लेगा, घोषणा नहीं करेंगे. तो हम चिंतित थे, चाहे हमारे पास संसाधनों की कमी हो. इसीलिए जब मैं उपनिषद कर रहा था, मैंने सबसे पहले देश, काल, समाज और परिस्थिति को तिलांजलि दी. उसकी शुरुआत में ही आप देखेंगे कि हमारा उद्देश्य भौतिक संस्कृति को फिर से रचना नहीं है. हम बस विचार की बात कर रहे हैं, जो सर्वकालिक है.

उपनिषद गंगा दाराशिकोह से शुरू होता है. इसकी क्या कहानी है?उपनिषद् गंगा का एक दृश्य

उपनिषद एक विचार है. ‘उपनिषद’ का अर्थ है- आओ, मेरे पास बैठो. जब दो लोग बात करते हैं तो वह भी उपनिषद हो जाता है. उपनिषद वेदांत हैं. उन्हें कहने के लिए हम जब उस समाज के बारे में सोच रहे थे, जिसे हम दिखाएं, वह वैदिक समाज जो अपने प्रश्नों के हल ढूंढ़ रहा हो, हमने कहानी कहने के लिए वेदव्यास को भी सोचा, कृष्ण द्वैपायन को भी, लेकिन हमें लगा कि हम दाराशिकोह के साथ अन्याय करेंगे अगर उसकी कहानी देश को नहीं बताते. दाराशिकोह मुमताज महल और शाहजहां का सबसे बड़ा बेटा था. बहुत बड़ा वैदिक स्कॉलर था. दाराशिकोह ने बावन उपनिषदों का फ़ारसी में अनुवाद किया था. वे अनुवाद किसी फ्रेंच यात्री के हाथों यूरोप पहुंचे और वहां उपनिषदों को लेकर जिज्ञासा शुरू हुई. इसलिए मेरा मानना है कि दाराशिकोह का बहुत बड़ा योगदान है, उपनिषदों को विश्व तक ले जाने में. उसी तरह, जैसे अशोक बुद्ध के विचार को दुनिया तक ले गया.

’चाणक्य’ के वक़्त से टीवी बहुत बदल गया है. वह टीआरपी का ग़ुलाम है. सास बहू और फूहड़ता को देख रहे दर्शक क्या जीवन दर्शन की बात करने वाले किसी धारावाहिक में रुचि लेंगे?

हम बिल्कुल निश्चिंत थे. हमें पता था कि हम ऐसी किसी चीज पर काम नहीं कर रहे हैं जो रातों रात लोकप्रिय हो जाए. जिस देश ने हज़ारों सालों से उपनिषदों को हाथों हाथ नहीं लिया, वह एक टीवी सीरियल से उपनिषद को क्या हाथों हाथ लेगा? कितने लोग भौतिकविद होते हैं, गुरुत्वाकर्षण कितने लोग खोजते हैं? खोज करने वाले मुट्ठी भर लोग होते हैं और पूरी मनुष्यता उससे लाभ पाती है. आज जहाज में उड़ने वाले आदमी को मालूम नहीं है कि एक न्यूटन या एक एडिसन या ग्राहम बैल न हुआ होता तो हमारा जीवन कैसा होता. हम नहीं जानते कि उन्होंने कैसे किया लेकिन हम उन सब चीजों का उपभोग कर रहे हैं. उसी तरह से विचार पर कुछ ही लोग काम करते हैं. बस हम चाहते थे कि वह प्रवाह बना रहे. मेरा मकसद बस यही था कि सौ करोड़ की आबादी में नई पीढ़ी के दस लोग भी इस ज्ञान को आगे ले जाने के लिए तैयार हो जाएं तो काफ़ी है. हम विचार के अलावा कुछ नहीं बेच रहे. जो प्रायोजक हैं, वे तो बहाना हैं. बहुत विनम्रता के साथ कहना चाहूंगा कि हमने किसी चैनल के लिए प्रोग्रामिंग नहीं की. हमारी प्रोग्रामिंग भविष्य के भारत के लिए है. कोई यह न कहे कि आज़ादी के बाद के साठ सालों में किसी ने उपनिषदों को नई पीढ़ी तक उनके माध्यम में पहुँचाने की कोशिश नहीं की. हो सकता है कि इसे पूरी तरह नकार दिया जाए, बकवास कह दिया जाए, ऐसा कहा जाए कि ये अतीतजीवी, मूर्ख, पुरातनपंथी लोग अभी यक इसमें जीवित हैं. लेकिन तब आपकी ज़िम्मेदारी और बढ़ जाएगी कि सही चित्र क्या है, वह आप आगे ले जाएं.

उपनिषदों के साथ इतना वक़्त गुज़ारते हुए आपके जीवन में क्या बदला?

केके रैना का उदाहरण देता हूं जिन्होंने इसमें काम किया है. उन्होंने एक बार मुझसे कहा कि मैं कभी नहीं मानता था कि कला का कोई माध्यम व्यक्ति का जीवन बदल सकता है लेकिन उम्र के इस मोड़ पर, उपनिषद करते हुए मुझे लगा कि मैं ग़लत था. उन्होंने कहा कि मैं बहुत अशांत था, पीड़ा से भरा हुआ था और बहुत से प्रश्न थे, जिनसे मैं पूरी जिन्दगी लड़ता रहा था. अचानक उन्हें लगा कि उनके उत्तर कितने आसान थे लेकिन किसी ने उन्हें सीधे तरीके से बताए नहीं थे. मेरे साथ भी यही हुआ कि खुद से बहुत से द्वन्द्व कम हुए. ऐसा तो नहीं कहूंगा कि मैं सर्वज्ञानी हो गया हूं लेकिन जीवन आसान हुआ. एक कहानी मैंने तुलसीदास के माध्यम से कही है. तुलसीदास का चरित्र पढ़कर लिखकर यह समझ में आया कि तुम आखिर हो कौन? जिस आदमी का काम भारतीय जनमानस में चार सौ साल से है, उसी को समाज ने इतना दुतकारा तो मैं अहंकार करने वाला कौन हूं?

बहुत सारे लोग आपको इतना दक्षिणपंथी मानते हैं कि पिंजर को भी उसी चश्मे से देखते हैं, जिससे गदर को देखते हैं. आपके कैसे अनुभव रहे हैं?

हाँ, मैं जिस दिन से फ़िल्मों में आया, बिना मुझे मिले, बिना मुझे देखे लोग कहने लगे कि यह आरएसएस वाला है. यह पूर्वाग्रह है. हम बहुत चीजों का निराकरण बहुत जल्दी करना चाहते हैं, सामान्यीकरण करना चाहते हैं. पहले मैं थोड़ा दुखी भी होता था कि मुझे आरएसएस वाला क्यों कहते हैं? अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता. लगता है कि क्या आरएसएस वाले समाज का हिस्सा नहीं हैं? वह अच्छा हो या बुरा, आपके समाज का हिस्सा है. मैं आपको इसलिए आरएसएस वाला लगता हूं क्योंकि मैं भारत की बात करता हूं. लेकिन फिर तो हममें से अधिकतर लोग आरएसएस वाले हैं. मैं तुमसे तीन सवाल करूंगा तो तुम भी दो मिनट में आरएसएस वाले हो जाओगे. और मुझसे बड़े तथाकथित भाजपाई फ़िल्मों में हैं, उनके लिए मैंने कभी एक भी ऐसा शब्द नहीं देखा. कभी सुना है, शत्रुघ्न सिन्हा के खिलाफ किसी को? क्योंकि हर किसी को ऐसा आदमी चाहिए जिसका उसे लगता है कि उसमें जवाब देने की सामर्थ्य नहीं है. आप मेरा संघर्ष नहीं देखते. लोग आसानी से कहते हैं कि उसे क्या दिक्कत है यार, वो बीजेपी वालों को कहेगा, उसे पैसा मिल जाएगा. वे अनजान हैं. उस आदमी के लिए कह रहे हैं जिसे एक सीरियल से दूसरे के बीच में बीस साल लगे. वे वस्तुस्थिति नहीं देखते हैं. मैंने दोनों धारावाहिक तब बनाए, जब कांग्रेस सरकार थी. जब भाजपा की सरकार थी, देखिए कि मैं क्या कर रहा था. लोग ऐसे भ्रम इसलिए फैलाते हैं क्योंकि उनके भीतर हिंसा होती है. आपने अपना शैतान खुद गढ़ा है. मुझे उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता.

आप खुद को लेफ्ट, राइट या सेंटर के सांचों में से किसी में पाते हैं?

जिनकी मजबूरियां होती होंगी, वे इनमें रहते होंगे. मैं तो उस भारतीय विचार को मानने वाला हूं जिसमें मेरे सिवा कुछ है ही नहीं. आप मतभेद क्यों देखते हैं, यही विचार तो हम ले जा रहे हैं. दूसरा, तुमने पूछा न कि इतिहास का मुझे क्या फ़ायदा हुआ. यही हुआ कि मैंने जाना कि मेरे होने या न होने से कोई अंतर नहीं पड़ता. और ऐसे में जब आप मान लेते हो कि आपका विचार श्रेष्ठ है तो मुझे आप पर दया आने लगती है. समग्रता से बहुत कम लोग देख पाते हैं. कार्ल मार्क्स और बुद्ध जैसे कितने लोग हैं? बुद्ध स्वयं कहते हैं कि जब आप किसी विचार से इतने जुड़ जाते हैं कि उससे अलग कुछ सोच नहीं पाते, तब तो आपसे पराधीन व्यक्ति कोई नहीं है. मैं हमेशा कहता हूं लोगों से कि आप भी इस लेफ्ट राइट सेंटर के चक्कर से मुक्त होंगे एक दिन, बस थोड़ा ज़्यादा समय लगेगा.

आपका सारा काम साहित्य के एडेप्टेशन का ही है. क्या मौलिक कुछ करना नहीं चाहते?

मैं आसपास की कहानियां लिख सकता हूं, लेकिन लिखना नहीं चाहता. मैं कुछ बड़ा बदलने वाली कहानियां कहना चाहता हूं. एक बार मेरे एक शिक्षक ने कहा था कि तुम जिस विधा में लिखते हो, वह बहुत लम्बी है. संगीत सीखो, कविता लिखो, उससे तुम सम्पूर्ण कलाकार भी बन जाओगे. लेकिन मुझे लगा कि यह मेरे स्वभाव के विरोध में होगा.

जैसा आप कहते रहे हैं कि हम सब एक शाश्वत चेतना का हिस्सा हैं और पुरानी कहानियों को नए दृष्टांत जोड़कर दोहरा रहे हैं. ऐसे में मौलिकता क्या है?

मुझे लगता है कि बात तो सब वही कह रहे हैं. मैं गीत सुनता हूं तो हतप्रभ रह जाता हूं. ‘मैं तुमसे नहीं मिल पा रहा हूं’ के अलावा कोई और बात कहने वाला गीत है तो मुझे बता दो. और इसी को किस किस तरह से अभिव्यक्त किया जा रहा है. हजारों साल पहले किसी ऋषि ने भी यही कहा कि हम उससे मिलने की शर्त पर ही अलग हुए हैं. अब हर कोई किसी से मिलना चाह रहा है. किसी का आनन्द स्त्री या पुरुष तक आकर ही रुक गया और कोई है जो ‘उस’से मिलने का इंतज़ार कर रहा है. लेकिन हमारी पूरी रचना इस मिलन की प्यास पर ही हो रही है. हम उस एक ही कहानी की ओर बढ़ रहे हैं. मूल में वही एक प्रश्न और तनाव है, फिर चाहे आप अनुराग कश्यप की ‘गुलाल’ ले लो या कोई प्रेमकहानी.

कौनसे समकालीन फ़िल्मकारों का काम आपको पसंद है?

मैं विचार से प्रभावित होता हूं. वह विचार किसी का भी हो सकता है. ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ के बाद मैंने राजकुमार हीरानी को फ़ोन किया और कहा कि तुम्हें पराजित करने के लिए पता नहीं कौनसा तीर निकालना पड़ेगा गुरू, लेकिन निकालेंगे. वह क्राफ़्ट की दृष्टि से ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ से नीचे थी लेकिन विचार की दृष्टि से सबसे ऊपर थी. ‘ओमकारा’ देखने के बाद मैंने विशाल से कहा कि आपने क्राफ़्ट में पैमाना थोड़ा और ऊपर कर दिया है हमारे लिए, लेकिन लगाएंगे छलांग. ये वो चुनौतियां हैं जो अच्छी लगती हैं, उत्साह जागता है.