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मजबूर मजदूर!

फोटोः विकास कुमार
फोटोः विकास कुमार

फरवरी की एक सुबह. गुड़गांव के जिला एवं सत्र न्यायालय में सामान्य दिनों की तरह ही कामकाज चल रहा है. अलग-अलग मामलों में आरोपित लोगों को पेशी के लिए लाया जा रहा है. इस सब के बीच हिमाचल से आईं 22 वर्षीय पूनम और उनके पिता विनोद कुमार शर्मा बड़ी ही बेताबी से किसी की तलाश कर रहे हैं. दोनों उन लोगों के चेहरों को बड़े ही गौर से देख रहे हैं जिन्हें पुलिस कोर्ट में पेशी के लिए ले जा रही है. एकाएक पूनम किसी को देखती है और हाथ हिलाकर इशारा करती है. इसके जवाब में सामने से 24-25 साल का एक नौजवान जिसे पुलिस के दो लोग कोर्ट में ले जा रहे हैं, हाथ हिलाता है और मुस्कुराता है. इस दौरान पूनम के चेहरे पर एक साथ दो विपरीत भाव उभरते हैं. वे गीली आंखों के साथ मुस्कुराती हैं. जिसे देखकर पूनम के चेहरे पर ये भाव आते हैं वह उनका बड़ा भाई राहुल रत्न है.

राहुल उन 147 मजदूरों में शामिल है जो जुलाई 2012 को मारुति के मानेसर इकाई में मजदूरों और प्रबंधन के बीच हुई झड़प के बाद से जेल में बंद हैं. इसी घटना में कंपनी के महाप्रबंधक (एचआर) अवनीश कुमार देव की जलने से मौत हो गई थी.

जुलाई 2012 की इस घटना से कोई चार महीने पहले तहलका ने मारुति के मानेसर इकाई में काम करने वाले मजदूरों में फैले गहरे असंतोष पर एक रिपोर्ट की थी – ‘क्या अब भी देश मारुति में सफर करना चाहता है?’  इस रिपोर्ट में तहलका की कई मजदूरों से बातचीत हुई थी. इनमें से एक गजेंद्र सिंह ने मारुति में काम करने वाले मजदूरों की हालत को कुछ इस तरह बयान किया था, ‘हमें नौ घंटे की शिफ्ट में साढ़े सात मिनट के दो ब्रेक मिलते हैं. इसी में आपको पेशाब भी करना है और चाय-बिस्कुट भी खाना है. ज्यादातर मौकों पर तो ऐसा होता है कि हमारे एक हाथ में चाय होती है और एक हाथ में बिस्कुट और हम शौचालय में खड़े होते हैं.’

छुट्टियों और मेडिकल सुविधाओं को लेकर भी मारुति के मानेसर इकाई में काम करने वाले मजदूरों में असंतोष था. उस समय मारुति प्रबंधन के खिलाफ चल रहे अभियान में मजदूरों के बीच समन्वय का काम करने वाले सुनील कुमार ने बताया था, ‘कागजी तौर पर तो हमें कई छुट्टियां दिए जाने का प्रावधान है लेकिन हकीकत यह है कि यहां छुट्टी पर जाने पर काफी पैसे कट जाते हैं. एक कैजुअल लीव लेने पर कंपनी प्रबंधन 1,750 रुपये पगार में से काट लेती है. यह प्रबंधन पर निर्भर करता है कि वह कितना पैसा काटेगा. महीने में आठ हजार रुपये तक छुट्टी करने के काट लिए जाते हैं. आपने चार दिन की छुट्टी ली और यह इस महीने की 29 तारीख से अगले महीने की दो तारीख तक की है तो आपके दो महीने के पैसे यानी 16,000 रुपये तक कट जाएंगे.’

उस वक्त मजदूर, कंपनी प्रबंधन की वादाखिलाफी से भी बहुत नाराज थे. प्रबंधन और मजदूरों के बीच हुए समझौते के कई महीने बाद तक भी प्रबंधन ने शिकायत निवारण और मजदूर कल्याण समिति का गठन नहीं किया था. वर्ष 2011 में मानेसर संयंत्र में हुई हड़ताल के बाद कंपनी ने मजदूरों के सामने काम पर आने से पहले ‘गुड कंडक्ट बॉंड’ साइन करने की शर्त रख दी थी . इसके जरिये मजदूरों पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए थे. तत्कालीन श्रममंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे ने संसद में ही इस बॉंड की आलोचना की थी. इसी तरह के माहौल में कंपनी में जुलाई 2012 की घटना घट गई.

हालांकि इस घटना के बाद तहलका से बात करते हुए मारुति के मुख्य परिचालन अधिकारी (एडमिनिस्ट्रेशन) एसवाई सिद्दीकी ने मजदूरों के सभी आरोपों को खारिज कर दिया था. समितियों के गठन न करने के बारे में सिद्दीकी का कहना था कि मजदूरों ने ही अपने प्रतिनिधियों को नामित नहीं किया इसलिए समितियों का गठन नहीं हो सका.

जब हम पूनम से बात करते हैं तो जानकारी मिलती है कि उसकी शादी पिछले साल नवंबर में हुई है और उसका भाई तब शादी में शामिल नहीं हो पाया था सो इस दफा वे अपने पापा के साथ उससे मिलने गुड़गांव आई हैं. पूनम कहती हैं, ‘पापा ने तब भईया की छुट्टी के लिए कोर्ट में अर्जी लगाई थी. लेकिन कोर्ट से एक ही दिन की छुट्टी मंजूर हुई थी सो वो नहीं आ सका. अब जज साहब को कौन समझाए कि हिमाचल जाकर कोई एक दिन में नहीं लौट सकता है.’

अभी पूनम ने अपनी बात खत्म ही की थी कि पास ही खड़े राहुल के पिता जो अब तक हमारी बातचीत सुन रहे थे बोल पड़े, ‘इससे तो अच्छा यही होता कि बेटा पहाड़ में ही रहता. आज तो स्थिति यह है कि हर दस-पंद्रह दिन में हिमाचल से गुड़गांव आना पड़ता है. रात स्टेशन पर गुजारनी पड़ती है. और कोर्ट-कचहरी के चक्कर अलग से.”

राहुल के पिता और बहन अकेले नहीं हैं जो पिछले डेढ़ साल से गुड़गांव में कोर्ट और वकीलों के चक्कर लगा रहे हैं. इनके जैसे और भी लोग हैं. 55 वर्षीय प्यारो देवी भी हिमाचल से ही आईं हैं. इनका 25 वर्षीय बेटा सुरेश भी इन्हीं  147 मजदूरों में शामिल है. प्यारो देवी हर सुनवाई पर आती हैं ताकि सुरेश को देख सकें. सुरेश इनका इकलौता बेटा है. जब हम प्यारो से सुरेश के बारे में पूछते हैं तो वे कहती हैं, ‘मेरा बेटा तो कमाने के लिए घर से आया था. पता नहीं कंपनी वाले कैसे यह कह रहे हैं कि उसने कंपनी में आग लगा दी. वो तो कभी गांव में भी किसी से नहीं उलझा.’ इतना कहकर प्यारो देवी फफक-फफक कर रोने लगती हैं.

हम आगे बढ़ते हैं. प्यारो देवी, पूनम और विनोद शर्मा जैसे और भी बहुत से लोग हैं जिनके पास अपनी-अपनी कहानी है. इनके भाई, बेटे और भतीजे मारुति संयंत्र में जुलाई 2012 में घटी घटना के सिलसिले में पिछले 19 महीनों से जेल में बंद हैं. इनमें से किसी को भी अभी तक जमानत नहीं मिल सकी है.

फोटोः गरिमा जैन
फोटोः गरिमा जैन

इस मामले में मजदूरों की तरफ से केस की पैरवी रघुवीर सिंह हुड्डा कर रहे हैं. ‘देेखिए पुलिस ने अपनी चार्जशीट में इन सब पर आईपीसी की धारा 302(हत्या), 307(हत्या करने का प्रयास करना), 147(दंगा करना), 353(सरकारी काम में बाधा पहुंचाना), 436(आग लगाना) और 120बी(साजिश करना) के तहत मामला बनाया है. ये सारी गैर जमानती धाराएं हैं. आमतौर पर ऐसे मामलों में निचली अदालतें जमानत नहीं देतीं. ऊपर से यह मामला थोड़ा ज्यादा ही चर्चित हो चुका है’ हुड्डा कहते हैं, ‘हमने नौ मजदूरों की जमानत के लिए हरियाणा उच्च न्यायालय में भी अपील की थी लेकिन न्यायालय ने जमानत देने से ये कहकर इनकार कर दिया कि इससे हरियाणा में हो रहे वैश्विक पूंजी निवेश पर विपरीत असर पड़ेगा. हमने हरियाणा उच्च न्यायालय के इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चैलेंज किया तो वहां से कहा गया कि पहले सभी गवाहों के बयान दर्ज हो जाएं फिर सोचा जा सकता है इस बारे में.’

इसी बातचीत के दौरान रघुवीर सिंह हमें पुलिस द्वारा इस मामले में जमा की गई चार्जशीट का एक हिस्सा दिखाते हैं. चार्जशीट के इस हिस्से में चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज हैं. गवाह नंबर नौ ने अपने बयान में कुल 25 मजदूरों के नाम लिए हैं जिनके नाम अंगेजी के अक्षर  ‘ए’ से ‘जी’ तक हैं. गवाह नं.10 ने भी अपने बयान में गिनकर 25 मजदूरों को ही देखने की बात स्वीकारी है. इनके नाम क्रम से अंग्रेजी के अक्षर ‘जी’ से ‘पी’ तक हैं. गवाह नंबर 11 ने जिन पच्चीस मजदूरों के नाम लिए हैं वे अंग्रेजी के ‘पी’ से ‘एस’ तक हैं.  गवाह नंबर 12 ने अपने बयान में 14 मजदूरों के नाम लिए हैं और ये नाम अंग्रेजी के ‘एस’ से ‘वाई’ तक हैं. इसके अलावा इन सभी चार गवाहों के बयान बिल्कुल एक जैसे ही हैं. जैसेकि इन सभी गवाहों ने अपने बयान के अंत में कहा है, ’इनके अलावे और तीन-चार सौ मजदूर थे जो अपने हाथ में डोरबीम लिए हुए थे और कंपनी के बाहर चले गए और मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाई.’

पुलिस चार्जशीट का यह हिस्सा दिखाने के बाद रधुवीर सिंह कहते हैं. ‘पहली ही नजर में यह साफ जान पड़ता है कि ये सारे बयान किसी एक ही आदमी ने लिखे हैं और इनमें जो नाम लिए गए हैं वो कंपनी के किसी रजिस्टर से देखकर लिखे गए हैं. ऐसा कैसे संभव है कि सभी गवाह कुछ खास अक्षर से शुरू होने वाले 25 नामों को ही देखते है.’

वहीं जुलाई 2012 की उस घटना के बाद मारुति ने अपनी मानेसर इकाई से 546 स्थायी और 1800 अस्थाई मजदूरों को काम से हटा दिया था. गुड़गांव निवासी राम निवास मारुति की मानेसर इकाई में पिछले नौ साल से काम कर रहे थे. इन्हें भी नौकरी से निकाल दिया गया. कंपनी से निकाले जाने के बाद से वे बेरोजगार हैं. मारुति से निकाले जाने वाले लोगों को कहीं और काम मिलने में बेहद परेशानी पेश आ रही है.

‘हर तरफ घूम लिए जी. कोई काम नहीं दे रहा. सो अब इस लड़ाई में ही लग गए हैं. सोच रहे हैं कि जब कामधाम है नहीं तो क्यों न लड़ा ही जाए’ रामनिवास कहते हैं, ‘जुलाई वाली घटना से कंपनी को कोई नुकसान हुआ है क्या. कंपनी का केस हरियाणा सरकार लड़ रही है. प्लांट में फिर से काम शुरू हो चुका है. और उस घटना में जो थोड़ा बहुत नुकसान हुआ उसके पैसे बीमा से मिल ही गए होंगे.’ रामनिवास पूरे रौ में हैं वे आगे कहते हैं, ‘अब दूसरे पक्ष को देखिए. देखिए कि उस घटना से किसकी रीढ़ की हड्डी टूटी और कौन आज भी पिस रहा है. उस दिन जिस एचआर मैनेजर की मौत हुई वो मजदूरों के हिमायती थे. मजदूरों से उनकी अच्छी पटती थी. उनकी हत्या हो गई. इस हत्या का दोष लगाकर कंपनी के यूनियन के ज्यादातर साथियों को और दूसरे निर्दोष मजदूरॊं को जेल में ठूंस दिया गया. बाकियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.’

मारुति में काम करने वाले एक मजदूर हमें बताते हैं, ‘इस घटना के बाद पूरे गुड़गांव के मजदूरों में एक भय है. उन्हें प्लांट में यह कहा जाता है कि अगर किसी ने भी ज्यादा यूनियनबाजी की तो उसका भी वही हश्र होगा जो मारुति वाले मजदूरों का हो रहा है. यह सब केवल मजदूरों की आवाज को दबाने का एक तरीका है.’

इन तर्कों में दम लगता है और तथ्यों के उभार के संकेत भी मिलते हैं. हम इसकी पड़ताल के लिए मारुति प्रबंधन से संपर्क करने की कोशिश करते हैं. कई अधिकारियों से बात भी होती है लेकिन वे आधिकारिक तौर पर कुछ भी कहने को तैयार नहीं होते. हां, कुछ यह जरूर कहते हैं कि मजदूरों द्वारा कही गई तमाम बातों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता.

गर आदमी हो तो क्या आदमी हो!

मनीषा यादव
मनीषा यादव

‘आज केवल आदमी होने से काम नहीं चलता है.’

‘दद्दा, मुझे लगता है आदमी होना ही बड़ी बात है.’

‘अगर आदमी ही होना बड़ी बात होती तो, आदमी को मयस्सर नहीं है इंसा होना, गालिब ने फिर क्यों कहा!’

‘आदमी और इंसान एक ही बात है!’

‘तुम भ्रमित हो! फर्क है!’

‘अगर फर्क होगा भी तो रत्ती भर!’

‘नहीं, जमीन आसमान का फर्क है!’

‘चलिए तो एक पल को मान लेते है कि दोनों एक ही है’

‘तो फिर मैं कहना चाहूंगा कि मात्र आदमी होने से काम नहीं चलता.’

‘अच्छा एक बात बताओ!’

‘पूछिए!’

‘पुरुष कितने प्रकार के होते हैं!’

‘तीन प्रकार के’

‘कौन-कौन से!’

‘प्रथम पुरुष, उत्तम पुरुष, मध्यम पुरुष’

‘और विकास पुरुष, लौह पुरुष भूल गए!’

‘अरे!’

‘अब बताओ, पुत्र कितने प्रकार के होते है!’

‘दो… जैविक पुत्र, दत्तक पुत्र’

‘एक और होता है!’

‘कौन सा.’

‘मानस पुत्र’

‘यह कैसा पुत्र!’

‘जो आपका जैविक पुत्र न हो, मगर आपकी विचारधारा से एकमत हो!’

‘दद्दा एक पुत्र और होता है!’

‘कौन-सा!’

‘धरती पुत्र!’

‘बहुत सही! अब तुम राजनीतिक बातें करने लगे!’

‘हा हा हा’

‘देखो बहुत मौके से याद आया.’

‘क्या दद्दा!’

‘गॉड फादर जानते हो’

‘माने जो आपको अवसर दे, जो आपका करियर, जिंदगी बनाए.’

‘तो जिनके गॉड फादर होते है उनके फादर नहीं होते होंगे.’

‘होते होंगे!’

‘लेकिन काम कौन आ रहा! एक अनजाना आदमी.’

‘दद्दा समझा नहीं!’

‘देखो यहां जैसे एक बाप से काम नहीं चलता, वैसे ही मात्र आदमी होने से काम नहीं चलता…’

‘यानी किसिम-किसिम के आदमी…’

‘हां मगर, अपना आदमी आदमी की एक खास किसिम होती है.’

‘अच्छा!’

‘जो काम दे, जिससे काम निकले… इसे यूं समझो… जिससे काम मिलना है, जिससे काम निकलवाना हो, कैसे निकलवाओगे!’

‘काबिलियत के दम पर’

‘ओय काबिलियत के दम भरने वाले! जीवन में जाति, धर्म, क्षेत्र, वर्ण न जाने कितने पेंच फसते हंै, इन्हीं पेंचों को ढीला करने के लिए भी… छोड़ो! एक जवाब दो!’

‘पूछें दद्दा’

‘दो समान काबिलियत के दावेदार आ जाए तो तुम किसको मौका दोगे!’

‘आप ने तो फंसा दिया!’

‘अब फर्ज करो! तुम में काबिलियत नहीं है, तो तुम दूसरे को कैसे रोकोगे! तुम दौड़ने में फिसड्डी हो तो रेस कैसे जितोगे!’

‘लंगड़ी लगाकर!’

‘यह नकारात्मक भाव है.’

‘फिर दद्दा आप बताए!’

‘इत्ती देर से समझा रहा हूं, अबे कैसा आदमी है!’

‘क्या दद्दा…’

‘अपना आदमी बन कर घोंचू.’

फटा पोस्टर निकली ‘हीरोइन’

स्वीडन में कुछ महीने पहले एक नई तरह की रेटिंग शुरू हुई है. इसका मकसद यह है कि जिस तरह फिल्मों में सेक्स, हिंसा और अभद्र भाषा या गालियों पर सेंसर द्वारा शिकंजा कसा जाता है, उसी तरह उन फिल्मों को भी नहीं बख्शा जाएगा जिनमें महिलाओं के रोल कमज़ोर दिखें या उनके किरदार में किसी भी तरह का पक्षपात नजर आए. नियम के मुताबिक ‘ए’ रेटिंग पाने के लिए फिल्म को बेकडेल टेस्ट पास करना होगा. यह टेस्ट कहता है कि फिल्म में कम से कम दो महिला किरदार होने चाहिए जो आपस में ‘पुरुष’ के अलावा किसी और विषय पर बात करें. मज़ेदार बात ये है कि इस टेस्ट में ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’, ‘स्टार वॉर्स’ और ‘पल्प फिक्शन’ जैसी लोकप्रिय फिल्में भी फेल हो गईं.

ब्रिटेन के अखबार ‘दि गार्डियन’ के मुताबिक ऑस्कर 2014 की सबसे प्रबल दावेदार ‘ग्रैविटी’ भी इस टेस्ट में पास नहीं हो पाई. इसके बावजूद कि इस फिल्म में अभिनेत्री सैंड्रा बुलक ने एक वैज्ञानिक की मुख्य भूमिका निभाई थी जिसके सभी साथी अंतरिक्ष में मारे जाते हैं और वह अकेले ही धरती पर लौटने में कामयाब हो पाती है. पूरी फिल्म इस महिला वैज्ञानिक के धरती पर सुरक्षित पहुंचने की उठापटक को दिखाती है. पूरी फिल्म में सिर्फ सैंड्रा हैं और अभिनेता जॉर्ज क्लूनी का एक छोटा सा रोल है. फिर भी फिल्म बेकडेल टेस्ट में फेल हो गई. आलोचकों का कहना है कि आखिरी पलों में इस महिला वैज्ञानिक को अपने एक पुरुष साथी (जॉर्ज क्लूनी) का ही ख़्याल आता है जो उसे इस मुसीबत से बाहर निकालने का रास्ता दिखाता है और इस लिहाज से असली हीरो सैंड्रा नहीं जॉर्ज हुए, भले ही वे फिल्म में थोड़ी देर के लिए ही क्यों न आए हों.

खैर, ये रेटिंग स्वीडन के सिनेमा घरों के लिए ही है और महिलाओं के चित्रण को लेकर ये टेस्ट कितना सही है या गलत, इसे लेकर अलग अलग स्तर पर बहस भी जारी है. इस मुद्दे पर अपनी बात रखने वालों के पास कई सवाल हैं. मसलन क्या स्त्रीवादी विचारों का डंका पीटने वाली फिल्में ही सही कहानी कहती हैं या फिर वे फिल्में बेहतर हैं जो स्त्री को ‘स्त्री’ ना दिखाकर एक आम इंसान की तरह अपनी कहानी कहने और सुनने के लिए स्वतंत्र छोड़ देती हैं? जैसे ‘हैरी पॉटर’ सीरिज़ की किरदार हरमाइनी जो अक्सर अपने दोनों दोस्तों को अपनी बुद्धिमानी और चतुरता के बल पर मुसीबत से बाहर निकालती है, उस समझ के बलबूते पर जो किसी स्त्री या पुरुष के फेर में नहीं पड़ती.

हालांकि ऐसी किसी कसौटी को भारतीय सिनेमा की सबसे लोकप्रिय धारा बॉलीवुड के संदर्भ में देखना काफी दिलचस्प भी हो सकता है और विवादास्पद भी. भारत में बहुत पहले से कला और व्यावसायिक सिनेमा को अलग अलग देखा जाता रहा है. आज जरूर इन दोनों के बीच की लकीर धुंधली होती जा रही है, लेकिन लोकप्रिय फिल्मों में स्त्रियों के मुद्दे और नायिका को दी जाने वाली भूमिकाओं को लेकर अलग अलग विचारधाराएं पनपती रही हैं. बॉलीवुड में शुरु से एक फार्मूला चला जिसके तहत सिनेमा मतलब एक नायक, एक नायिका और खलनायक. बदलते दौर के साथ नायक और खलनायक के बीच की दूरी खत्म हुई और एंटी हीरो को लाया गया. यहां खास बात ये भी थी कि पुरुष शासित समाज में ज्यादातर पुरुष केंद्रीय फिल्में ही बनी, लेकिन उन्हें नैतिकता का पाठ अक्सर नारी पात्रों द्वारा ही पढ़ाया गया. इन सबके बीच कुछ ही फिल्में ऐसी बनीं जिन्होंने दर्शकों को ये बताया कि हीरो या अभिनेता के बगैर भी सिनेमा मनोरंजक लग सकता है.

आठ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर ‘गुलाब गैंग’ और ‘क्वीन’  रिलीज़ हो रही हैं. पर्दे पर इन दोनों ही फिल्मों की कमान अभिनेत्रियों ने ही संभाली है और दोनों ही फिल्मों में नायक के नाम पर कोई बड़ा नाम नहीं है. इससे पहले इम्तियाज़ अली की ‘हायवे’ में सिर्फ एक फिल्म पुरानी आलिया भट्ट, वीरा के लीड रोल के साथ काफी न्याय करती नज़र आईं.

हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. 1937 में फिल्मकार वी शांताराम द्वारा बनाई गई ‘दुनिया ना माने’ में अभिनेत्री शांता आप्टे ने एक ऐसी स्त्री की भूमिका निभाई थी जो पिता के उम्र के विधुर से अपनी शादी का जमकर विरोध करती है. ये कहना गलत नहीं होगा कि पूरी फिल्म में शांता अपने संवाद और अभिनय से छाई रही.

शांताराम की एक और फिल्म ‘दहेज’ भी काफी चर्चित रही थी. फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे अपनी किताब ‘महात्मा गांधी और सिनेमा’ में इस फिल्म के एक सीन का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं – फिल्म में नायिका के पिता अपना सब कुछ बेचकर दहेज का सामान जुटाते हैं और अपने बेटी से कहते हैं कि वो देहज का सामान ले आए हैं. नायिका कहती है कि पिताजी आप एक चीज लाना भूल गए. पिता पूछते हैं क्या ? नायिका कहती है ‘कफन ’ और मर जाती है. सिनेमाघरों में इस दृश्य पर महिला दर्शक चीख पड़ी थी. कुछ शहरों में महिलाएं बेहोश भी हो गईं थी. इस फिल्म के प्रभाव से दहेज विरोधी नियम की पहल की गई और बिहार जैसे कुछ प्रांतों में नियम लागू भी किया गया.

30 से लेकिर 60 के दशक में दहेज, सीमा, जोगन, मदर इंडिया जैसे लोकप्रिय फिल्मों ने नायिका के किरदार की अहमियत को बरकरार रखा. लेकिन 70 के दशक में ‘एंग्री यंग मैन’ के आने के बाद हीरोइन का काम जैसे इस ‘मैन’ के गुस्से को शांत करने का ही रह गया था. इस दौरान महिलाओं की कहानी या उनको अच्छे या दमदार रोल देने का बीड़ा मानो आर्टहाउस सिनेमा ने ही उठा लिया था. ‘मिर्च-मसाला’, ‘भूमिका’, ‘हज़ार चौरासी की मां’ जैसी कई फिल्मों में अभिनेत्रियों ने अपने काम का लोहा मनवाया, वहीं उस दौर के कमर्शियल सिनेमा में हीरोइन ज्यादातर रोने, नाच-गाने और हीरो को ढांढस बंधाने के काम आती रही.

ellहीरो की गैर मौजूदगी
लेकिन पिछले कुछ सालों से आर्ट और कमर्शियल सिनेमा के बीच मिटती दूरी की वजह से ऐसी फिल्में दोबारा थिएटर हॉल में लोगों का ध्यान खींच रही हैं जो बीच के दशक में रडार से गायब हो चुकी थी. ‘कहानी’, ‘द डर्टी पिक्चर’,‘सात खून माफ’ या ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी फिल्मों में नायक की कम या गैर मौजदूगी ने शायद ही दर्शकों को परेशान किया हो. अनेक प्रयोगों से गुज़र रहे बॉलीवुड में अब हीरोइन भी धीरे-धीरे मनोरंजन में आगे की सीट लेती जा रही है. मसलन कुछ महीने पहले आई ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ को लें जिसमें शाहरुख खान के होने के बावजूद दीपिका पादुकोण की पीठ ज्यादा थपथपाई गई. कई समीक्षकों का कहना था कि यदि इस फिल्म में से दीपिका को हटा दिया जाए तो इसमें देखने लायक कुछ नहीं बचेगा.

बॉलीवुड में इस नई शुरुआत का सहरा अभिनेत्री विद्या बालन के सिर बांधा जाता है जिन्होंने ये साबित कर दिया कि बगैर जीरो फिगर बनाए या किसी बड़े हीरो के साथ के बिना भी दर्शकों के दिल पर राज किया जा सकता है. लेकिन अपनी फिल्म के लिए अभिनेत्रियों पर इस तरह का भरोसा दिखाना आसान नहीं है. गुलाब गैंग में अपने समय की दो मशहूर कलाकार – जूही चावला और माधुरी दीक्षित को पहली बार एक साथ दिखाने वाले निर्देशक सौमिक सेन बताते हैं कि इस फिल्म के लिए निर्माता ढूंढना आसान काम नहीं था. कई निर्माताओं ने उनकी फिल्म को इसलिए नकार दिया क्योंकि उनकी कहानी में कोई नायक नहीं था. इसके पीछे की वजह बताते हुए सौमिक कहते हैं कि बॉलीवुड में ऐसा हमेशा नहीं होता ना कि महिलाओं को लेकर एक पूरी मसाला फिल्म बनाई जाए इसलिए एक नए निर्देशक के तौर पर उनके पास ऐसा कोई पुराना और सफल मॉडल भी नहीं था जिसका तकाजा निर्माताओं को दिया जा सकता.

वैसे ये हाल सिर्फ हिंदी नहीं हॉलीवुड फिल्मों का भी है. अमरीकी पत्रिका ‘दि अटलैंटिक’ के मुताबिक 2013 की सबसे चर्चित फिल्म ‘ग्रैविटी’ के निर्देशक अलफान्सो कुआरों पर भी स्टूडियो का काफी दबाव था कि वे अपनी फिल्म में एक प्रेम-प्रसंग डालें और अंत में महिला वैज्ञानिक को अंतरिक्ष से धरती पर कोई बचाकर लाया जाए. लेकिन निर्देशक ने इस दबाव के आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया.

जोखिम कौन उठाए
भारत में दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है जहां हर साल 1100 से भी ज्यादा फिल्में बनाई जाती हैं. यह आंकड़ा अमेरिकी फिल्म इंडस्ट्री से दो गुना और ब्रिटेन से 10 गुना ज्यादा है. इनमें से लगभग 200 फिल्में अकेले बॉलीवुड में बनती हैं और बॉक्स ऑफिस पर आगे रहने की होड़ में यहां तमाम तरह के गठजोड़ किए जाते हैं. ऐसे में मुनाफा कमाने के जमे जमाए फॉर्मूले से हटकर नायिका प्रधान फिल्म को बनाने का जोखिम उठाना बॉलीवुड में अब भी आसान नहीं है. ट्रेड विशेषज्ञ कोमल नाहटा कहते हैं, ‘आज से पांच छ साल पहले तक किसी ‘हीरोइन-लीड’ वाली फिल्म का आयडिया सुनकर ही कह दिया जाता था कि फिल्म चलने ही नहीं वाली है, जनता ये देखेगी ही नहीं. अब काफी कुछ बदल गया है, कहानी जैसी फिल्में बन रही हैं. लेकिन माहौल इतना भी नहीं बदला है कि अक्षय कुमार, ऋतिक रोशन या सलमान खान की फिल्मों के व्यवसाय से टक्कर ली जा सके. इतना ज़रुर हुआ है कि अगर सीमित बजट में हीरोइन को लीड में लेकर कोई फिल्म बनाई जाए तो वह ठीक-ठाक मुनाफा कमा सकती है. इतनी स्वीकृति तो मिली है.’

ऐसे में विद्या बालन की फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर नज़र रखने वालों को हैरान कर दिया है. उनकी फिल्म   ‘द डर्टी पिक्चर’ के अकेले हिंदी संस्करण का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन करीब 80 करोड़ रहा. वहीं 2012 को महिला दिवस के मौके पर ही रिलीज़ हुई विद्या की फिल्म ‘कहानी’ ने बेहद ही ढीली शुरुआत के बाद तीन हफ्ते में भारतीय और विदेशी बाज़ारों में करीब 70 करोड़ का व्यवसाय किया था. कोमल मानते हैं कि विद्या द्वारा चुने गए विषय उनकी फिल्मों को औरों से अलग बनाते हैं. वे कहते हैं, ‘वैसे भी अगर कहानी तगड़ी हो तो शुरुआती हिचिकचिहाट झेलने के बाद फिल्म रफ्तार पकड़ ही लेती है. डर्टी पिक्चर में तीन हीरो थे लेकिन याद सबको विद्या बालन ही है.’

विद्या भी मानती हैं कि पहले ज्यादातर फिल्में पूरी तरह हीरो पर आधारित होती थी और उसके चलने ना चलने का दारोमदार हीरो पर ही रहता था इसलिए उनकी फीस भी ज्यादा होती है. लेकिन अब फॉर्मूला बदल रहा है और इसके शायद इंड्स्ट्री की सोच भी.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आने वाली फिल्म ‘शादी के साइड इफेक्ट्स’ के लिए विद्या बालन ने फरहान अख़्तर से ज्यादा फीस मांगी थी. ये सही है कि बीते समय में विद्या समेत प्रियंका चोपड़ा, करीना कपूर और कटरीना कैफ ने 2 से 7 करोड़ के बीच का आंकड़ा छू लिया है लेकिन इंडस्ट्री के खान, कुमार और देवगन की बराबरी करने के लिए उन्हें अब भी काफी दूरी पाटनी है.

सिर्फ औरत का ‘दर्द’ क्यों ?
इसमें कोई दो राय नहीं कि सिर्फ बॉलीवुड ही नहीं, विश्व सिनेमा ने अपने-अपने तरीके से औरतों की तकलीफों और उनके मुद्दों को अपनी फिल्मों में जगह दी है, लेकिन नारीवादियों का एक वर्ग शिकायत करता है कि फिल्मों में औरतों की तकलीफों का डंका ही क्यों पीटा जाता है.  बेलडेक टेस्ट की ही तरह फिल्मों में स्त्रियों के चित्रण पर ज़ोर देने वाले एक और टेस्ट का नाम ‘माको मोरी’ है जो 2013 में आई अमरीकी फिल्म ‘पैसेफिक रिम’ के एक महिला किरदार के नाम पर रखा गया है. इस टेस्ट का मानदंड है कि फिल्म में कम से कम एक महिला किरदार हो जो नायक की स्टोरी को सहारा न देकर, अपनी एक अलग कहानी को लेकर फिल्म में आगे बढ़े.

कंगना रानौत की फिल्म ‘क्वीन’ ऐसी ही एक फिल्म है. इस फिल्म के निर्देशक विकास बहल मानते हैं कि क्वीन, किसी औरत के दुख-दर्द को बयां नहीं करती बल्कि ये तो किसी पुरुष की कहानी भी हो सकती है. विकास के अनुसार महिलाएं मर्दों से ज्यादा अच्छा मनोरंजन कर सकती हैं और इसलिए वे चाहते थे कि उनकी फिल्म को एक औरत ही कहे जबकि उसके एक पुरुष के ज़रिए दिखाए जाने की भी पूरी गुंजाइश थी. फिल्मों में नायिका के लिए गढ़ी जाने वाली भूमिका को लेकर विकास कहते हैं, ‘पर्दे पर औरतों को अबला, बेचारी और दुखियारी दिखाना बंद किया जाना चाहिए. उनके पास बताने, सुनने, सुनाने के लिए और कई बातें हैं जिन्हें पर्दे पर मज़ेदार तरीके से दिखाया जा सकता है. औरतों से जुड़े मुद्दों को नकारा नहीं जाना चाहिए लेकिन उनके उस पहलू को भी तो दिखाया जाए जो किसी भी तरह के ‘स्त्री-पुरुष वाद’ से परे हो.’

पिछले साल आई फिल्म ‘अय्या’ ऐसी ही एक लड़की की कहानी थी जिसे एक दक्षिण भारतीय लड़के की तरफ ‘शारीरिक’ आकर्षण हो जाता है. हालांकि फिल्म की बॉक्स ऑफिस पर हवा निकल गई थी लेकिन हिंदी सिनेमा में शायद कभी कभार ही ऐसा होता है जब पुरुष को ‘उपभोग की वस्तु’ की तरह प्रस्तुत किया जाए.

हालांकि सिनेमा के जानकार प्रकाश रे को लगता है कि हिंदी फिल्मों में शुरु से ही महिलाओं की भावनाओं का ख़्याल रखा गया है और ये कहना गलत होगा कि सिर्फ उनकी तकलीफों का ही बखान किया गया है. ‘आवारा’ फिल्म का गाना ‘दम भर जो उधर मुंह फेरे, ओ चंदा मैं उनसे प्यार कर लूंगी’ या फिर 1957 में ‘नया दौर’ का ‘उड़े जब जब ज़ुल्फें तेरी, कंवारियों का दिल धड़के’ जैसे गीत काफी साफगोई से एक औरत के दिल की बात कह रहे हैं.

सिनेमा को समाज का आईना मानने वाले रे मानते हैं कि सिनेमा से किसी तरह के समाज-सुधार की उम्मीद करना अन्याय होगा. वे कहते हैं, ‘आजादी से पहले और उसके बाद जिस तरह भारतीय समाज में धीरे धीरे बदलाव आए हैं और हमारा लोकप्रिय सिनेमा भी उसी की नव्ज़ को पकड़कर आगे बढ़ रहा है. इसलिए औरतों के संदर्भ में भी सिनेमा उतना ही प्रगतिशील या पिछड़ा हो सकता है जितना हमारा समाज है.’

बदलते दौर के साथ सिनेमा का चेहरा भी बदल रहा है. पर्दे के पीछे निर्देशन से लेकर एडिटिंग, कास्टिंग और मेक-अप तक औरतें धीरे-धीरे ही सही, लेकिन मजबूती के साथ कब्ज़ा जमाती जा रही हैं. जहां तक पर्दे पर दिखने वाले चेहरों की बात है तो उस दिन का इंतज़ार रहेगा जब क्वीन, कहानी या गुलाब गैंग जैसी नायिका प्रधान फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर लोगों का ध्यान खींचने के लिए किसी महिला दिवस का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा.

रण अंतिम क्षण में

बुकोणीय दंगल ओमप्रकाश चौटाला, भूपिंदर हुड्डा और योगेंद्र यादव (बाएं से दाएं)
बुकोणीय दंगल ओमप्रकाश चौटाला, भूपिंदर  हुड्डा और योगेंद्र यादव (बाएं से दाएं). फोटोः पवकास कुमार

कुछ समय बाद जब पूरे देश में लोकसभा चुनाव होंगे, उसके कुछ ही समय बाद हरियाणा में विधानसभा का भी चुनाव होना है. जहां सामने दो-दो चुनाव खड़े हों वहां राजनीतिक गतिविधियां बढ़ना स्वाभाविक ही है. आम आदमी पार्टी के प्रवेश ने जहां हरियाणा के मुकाबले में एक और कोण जोड़ दिया है वहीं पहले से राज्य में राजनीति कर रही पार्टियां भी उथल-पुथल से गुजर रही हैं. राज्य का चुनावी तापमान जानने के लिए लिए प्रदेश के राजनीतिक दलों के स्वास्थ्य का परीक्षण जरुरी है. शुरुआत करते हैं उस कांग्रेस से जो राज्य में पिछले 10 सालों से सत्ता पर काबिज है.

कांग्रेस
भुपेंदर सिंह हुड्डा सरकार हरियाणा में अपने शासन का एक दशक पूरा करने जा रही है. 2009 के लोकसभा चुनावों में भी पार्टी को बहुत अच्छी सफलता मिली थी. आज हरियाणा की 10 लोकसभा सीटों में से नौ उसकी झोली में हैं. पिछले साल ही राज्य में प्रमुख विपक्षी दल और कांग्रेस की कट्टर विरोधी इंडियन नेशलन लोकदल (आईएनएलडी) के नेता ओमप्रकाश चौटाला और उनके बेटे अजय चौटाला को कोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में 10 साल की सजा सुनाकर जेल भेज दिया. दोनों जेल में हंै. 2009 के नतीजों और मुख्य विपक्षी पार्टी के प्रमुख नेताओं के जेल जाने के बाद पैदा हुई परिस्थितियों में माना जा रहा था कि कांग्रेस की स्थिति आगामी चुनावों में भी ठीक-ठाक रहने वाली है. लेकिन पिछले आठ महीने में सूबे और कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में जिस तरह के परिवर्तन हुए हैं उससे पार्टी की उम्मीदों को गहरा आघात लगा है. राज्य की राजनीति के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार नवीन एस ग्रेवाल कहते हैं, ‘आज स्थिति यह है कि जिस पार्टी के पास 10 में नौ लोकसभा सीटें है उसके लिए 2014 में रोहतक छोड़कर किसी और सीट के जीतने की संभावना नहीं है. आगामी विधानसभा चुनाव में भी पार्टी हार की संभावना को काफी हद तक स्वीकार कर चुकी है.’ पार्टी को अपनी खिसकती जमीन का अहसास है इसलिए उसने कुछ आपातकालीन उपाय भी किए हैं. सालों से लंबित पड़े प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर टीम राहुल के सदस्य और लोकसभा सांसद अशोक तंवर को नियुक्त किया गया है. लेकिन भागाभागी में देर से लिया गया यह फैसला कांग्रेस का कितना भला कर पाएगा इसके बारे में अभी कुछ कहा नहीं जा सकता.

पिछले साल फरवरी में जब आईएनएलडी के मुखिया ओमप्रकाश चौटाला और उनके बेटे अजय चौटाला को सजा मिली तब कहा गया कि अब प्रदेश कांग्रेस की चुनौतियां खत्म हो गई हैं. एक तरफ मुख्य विपक्षी दल के कर्ताधर्ताओं को जेल हो चुकी थी तो दूसरी तरफ राज्य में हरियाणा जनहित कांग्रेस-भाजपा गठबंधन की राजनीतिक हैसियत ऐसी नहीं थी कि वह कांग्रेस को कोई खास चुनौती दे पाए. लेकिन बिना बाधा के 2014 की लोकसभा और विधानसभा जीतने का सपना देख रहे मुख्यमंत्री हुड्डा और पूरी पार्टी को आज आंतरिक गुटबाजी ने जैसे पस्त कर दिया है. कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता अपनी ही पार्टी और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. इनमें वरिष्ठ नेता और राज्य सभा सदस्य चौधरी वीरेंद्र सिंह, राज्य सभा सांसद कुमारी शैलजा, राज्य सभा सांसद ईश्वर सिंह, और फरीदाबाद से सांसद अवतार सिंह भड़ाना प्रमुख हैं. कोई भेदभाव का आरोप लगा रहा है, कोई मुख्यमंत्री बनने के सपने संजो रहा है तो कोई प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए प्रयासरत है. इस सबका शिकार अंततः पार्टी हो रही है. जानकर बताते हैं कि इसी गुटबाजी के कारण आगामी लोकसभा चुनाव में उसकी फजीहत होनी निश्चित है. विधानसभा चुनाव में इस फजीहत का विस्तार भर होगा. बीते ही दिनों गुड़गांव से पार्टी के सांसद रहे राव इंद्रजीत सिंह भाजपा में चले गए. इससे पहले राव ने हर संभव तरीके से न सिर्फ हुड्डा की फजीहत कराने की कोशिश की बल्कि उनके विरोध की चिंगारी रॉबर्ट वाड्रा तक भी पहुंच गई थी.

10 साल से राज्य की कमान संभाले कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर का भी सामना कर रही है.  इसके अलावा उसे कांग्रेसनीत केंद्र सरकार के पिछले 10 सालों के किए धरे का भी नुकसान उठाना होगा. गुटबाजी के साथ ये कारक जैसे कोढ़ में खाज बनकर आए हैं. राजनीतिक विश्लेषक बलवंत तक्षक कहते हैं, ‘राज्य में पार्टी की हालत बहुत खराब है. सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं. साथ में सत्ता विरोधी लहर और आंतरिक गुटबाजी के कारण पार्टी बुरे समय की तरफ अग्रसर है.’

लेकिन सबसे बड़ी चुनौती उस मुख्य विपक्षी पार्टी यानी आईएनएलडी की तरफ से आ रही है जिसे साल भर पहले वह राजनीतिक रुप से मरा हुआ मान चुकी थी. हाल के दिनों में आईएनएलडी अपने शीर्ष नेतृत्व की अनुपस्थिति के बावजूद कांग्रेस सरकार के लिए डरावना सपना बन चुकी है. कुछ महीने पहले उसने सीडियों की एक पूरी सीरीज जारी की जिसमें कैमरे के सामने तमाम कांग्रेस के विधायक, नेता और उनके परिजन घूस के एवज में लैंड यूज बदलवाने (सीएलयू) की बात करते हुए दिखाई दिए. सीडी में हुड्डा सरकार में मुख्य संसदीय सचिव और बवानीखेड़ा से विधायक तथा हुड्डा के करीबी रामकिशन फौजी भी लेनदेन करते दिखे. इसमें वे लैंड यूज बदलवने के बदले पांच करोड़ रु की रिश्वत मांगते दिखाई दिए थे. रामकिशन के अलावा प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री राव नरेंद्र सिंह, मुख्य संसदीय सचिव विनोद भयाना, रतिया के विधायक जरनैल सिंह और बरवाला के विधायक रामनिवास घोड़ेला की सीएलयू और अन्य मामलों में कथित रूप से काम करवाने के बदले करोड़ों रुपये मांगने वाले टेप भी आईएनएलडी ने जारी किए हैं. इन सीडियों ने कांग्रेस पर न सिर्फ चौतरफा दबाव बनाने का काम किया है बल्कि जो कांग्रेस कुछ समय पहले तक विजय रथ पर सवार होने की तैयारी कर रही थी उसके रास्ते में जबर्दस्त ब्रेकर खड़े कर दिए हैं.

चुनौती यहीं खत्म नही होती. लोकदल को जमीनी स्तर पर जाट समाज के बड़े तबके से सहानुभूति भी मिल रही है. यह हरियाणा का वह प्रभावशाली समूह है जो ओमप्रकाश चौटाला और अजय चौटाला के जेल जाने से दुखी है. ग्रेवाल कहते हैं, ‘राज्य सरकार के कई कर्मचारी संगठन भी सरकार के खिलाफ सड़कों पर हैं. ऐसे में कांग्रेस की नैया पार लगती तो बहुत मुश्किल दिख रही है.

चुनावी आंधी में दीप! हजकां के कुलदीप विश्नोई
चुनावी आंधी में दीप! हजकां के कुलदीप विश्नोई

हालांकि कांग्रेस इन सब बातों में कोई गंभीर समस्या नहीं देखती. गुटबाजी, सत्ता विरोधी लहर और अंदरूनी खींचतान जैसे आरोपों के जवाब में हरियाणा कांग्रेस के प्रवक्ता करमवीर सैनी कहते हैं, ‘ कांग्रेस में नेताओं की कतार बहुत लंबी है. जिसे आप गुटबाजी कह रहे हैं वह असल में सत्ता पाने की स्वाभाविक इच्छा है. पार्टी का हर आदमी मुख्यमंत्री बनना चाहता है, अब सीएम तो एक ही आदमी बन सकता है. जो आज आपको नाराज दिख रहे हैं चुनाव के समय एक साथ आ जाएंगे. हुड्डाजी के कद का दूसरा नेता पूरे हरियाणा में नहीं है. हम लोकसभा की सारी की सारी सीटें भी जीतेंगे और विधानसभा में भी बहुमत हासिल करेंगे. राव इंद्रजीत सिंह जैसे लोग सत्ता के लालची हैं. जल्द ही उन्हें अपनी गलती का अहसास होगा.’

पार्टी के रणनीतिकारों का एक और भी आकलन है. हरियाणा कांग्रेस के एक नेता कहते हैं, ‘बहुत संभव है कि केंद्र सरकार के खिलाफ देश में जो माहौल है उसका नुकसान हमें लोकसभा चुनाव में उठाना पड़े. लेकिन विधानसभा चुनाव तक आते-आते जनता का गुस्सा खत्म हो जाएगा. जनता फिर से हमारे साथ आ जाएगी.’ जिस बात पर कांग्रेस की उम्मीद कायम है उसका जिक्र करते हुए वे तर्क देते हैं, ‘हरियाणा का जाट समुदाय जाट के अलावा किसी और समुदाय के नेता को अपना सीएम स्वीकार नहीं करेगा. चूंकि चौटाला पिता-पुत्र जेल में है और उस परिवार के दूसरे किसी व्यक्ति का कद हुड्डा के बराबर नहीं है तो ऐसे में जाट समुदाय अपने आदमी के रूप में फिर से हुड्डा को ही चुनेगा.’ जानकार भी मानते हैं कि अगर ओमप्रकाश चौटाला जेल से बाहर नहीं आते तो ऐसी स्थिति में हुड्डा इस लाइन को आगे बढ़ा सकते हैं कि ओमप्रकाश चौटाला तो है नहीं. चौटाला परिवार के बाकी लोग राजनीति में अभी नौसिखिए हैं. वरिष्ठ पत्रकार मीनाक्षी शर्मा कहती हैं, ‘जाट मतदाता हुड्डा से इस बात को लेकर खफा तो हैं कि कैसे एक जाट ने दूसरे जाट को जेल भिजवा दिया. लेकिन उसके पास कोई और विकल्प है नहीं. ऐसे में वह हुड्डा को जीवनदान देने के बारे में जरूर सोच सकता है.’ डूब रही कांग्रेस को आप रूपी तिनके का सहारा भी मिल सकता है. कांग्रेस को उम्मीद है कि आप के आने से मुकाबला चौतरफा हो जाएगा और सत्ता विरोधी लहर बंटेगी. इसका सीधा फायदा कांग्रेस को ही होगा. मीनाक्षी कहती हैं, ‘राज्य में कांग्रेस के खिलाफ माहौल तो है लेकिन वह किसी के पक्ष में नहीं हैं. ऐसे में सत्ता विरोधी वोटों का बंटवारा तय है.’

आईएनएलडी
राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी आईएनएलडी के सामने यक्ष प्रश्न बना हुआ है कि अगर उसके दोनों नेता जेल से बाहर नहीं आते तो पार्टी दोनों चुनावों में कैसे जाएगी, हालांकि पार्टी की पिछले एक साल की गतिविधियों पर अगर नजर दौड़ाएं तो एक संभावना यह भी दिखती है कि पार्टी उनके दूसरे पुत्र अभय चौटाला और दोनों पोतों दिग्विजय और दुष्यंत चौटाला के नेतृत्व में आगे बढ़ेगी. हालांकि अभय पर भी भ्रष्टाचार के कई मामले दर्ज हैं. दूसरी तरफ दिग्विजय और दुष्यंत की उम्र 24-25 साल है. ऐसे में भविष्य बेहद अनिश्चित है. संकट के इस दौर में पार्टी ने गठबंधन के जरिए एक सहारा ढूंढ़ने का प्रयास भी किया लेकिन यह किसी सिरे नहीं लग सका. अतीत में काफी समय तक उसका भाजपा के साथ गठबंधन रहा है. लेकिन आज की स्थिति यह है कि आईएनएलडी ने कई मौकों पर भाजपा से गठबंधन की अपनी इच्छा जताई लेकिन भाजपा ने उसे भाव नहीं दिया.

आईएनएलडी पिछले 10 सालों में लोकसभा की एक भी सीट नहीं जीत पाई है. राज्य में आज भाजपा-हजकां का गठबंधन है. पार्टी खुद को हजकां की जगह देखना चाहती है लेकिन भाजपा इस पर चुप्पी साधे है. ग्रेवाल कहते हैं, ‘भाजपा के आईएनएलडी से गठबंधन न करने के पीछे पार्टी की भष्टाचार वाली छवि है. भाजपा पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बना रही है. ऐसे में वह ऐसी पार्टी के साथ गठबंधन से बच रही है जिसके शीर्ष नेता ही भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में हैं.’ वैसे गठबंधन न होने की स्थिति में भी पार्टी के नेता दस की दसों सीटों पर प्रत्याशी खड़ा करने का खम ठोंक रहे है, लेकिन अनौपचारिक बातचीत में कई नेता इस बात को मानते हैं कि अगर गठबंधन नहीं हुआ तो इस बार भी लोकसभा में पार्टी का खाता शायद ही खुल पाए. हालांकि एक संभावना के द्वार हमेशा खुले हुए हैं. अगर पार्टीं लोकसभा में एक दो सीट जीतती है तो भाजपा विधानसभा चुनावों में उसके साथ गठबंधन के लिए मजबूर होगी. तक्षक कहते हैं, ‘लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा-आईएनएलडी के गठबंधन की पूरी संभावना है.’ लोकदल के नेता लगातार कह रहे हैं कि वे चाहते हैं कि मोदी प्रधानमंत्री बनें और वे इसके लिए भाजपा का समर्थन करेंगे. भाजपा इस प्रेम का तिरस्कार कब तक करेगी यह देखना दिलचस्प होगा.

विधानसभा चुनावों को लेकर पार्टी उत्साहित है. उसे लगता है कि भले ही उसके नेता जेल से बाहर आकर चुनाव न लड़ पाएं लेकिन कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का न सिर्फ उसे फायदा मिलेगा बल्कि उसके नेताओं के जेल में जाने से उपजी सहानुभूति भी वोटों में जरुर तब्दील होगी. पार्टी नेता दुष्यंत चौटाला कहते हैं, ‘जनता जानती है कि कांग्रेस ने जानबूझकर श्री ओमप्रकाश चौटाला और अजय चौटाला को फंसाया है. विधानसभा चुनाव में जनता कांग्रेस की इस करतूत का मुंहतोड़ जवाब देगी. मैं पूरे राज्य में घूम रहा हूं. हमें अभूतपूर्व समर्थन मिल रहा है.’

भाजपा-हजकां गठबंधन
हरियाणा में वर्तमान स्थिति यह है कि एक दल का राजनीतिक भविष्य काफी हद तक दूसरे पर निर्भर है. कुछ ऐसा ही हाल कुलदीप बिश्नोई की हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) का भी है. एक तरफ जहां आईएनएलडी भाजपा के साथ गठबंधन के लिए अपना पूरा जोर लगा रही है वही हजकां ऐसा कुछ भी होने से रोकने के लिए कमर कस कर तैयार है. लोकसभा की 10 सीटों में से भाजपा-हजकां के बीच 8-2 का बंटवारा हो चुका है. लेकिन हजकां की नजर लोकसभा से ज्यादा आगामी विधानसभा चुनाव पर टिकी हुई है. पार्टी को पूरी उम्मीद है कि कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर और आपसी गुटबाजी के कारण ढलान पर है और आईएनएलडी के नेता जेल में हैं तो ऐसे में उसकी लॉटरी निकल सकती है. पूरे खेल में भाजपा का भी उत्साह बढ़ा हुआ है. उसका आकलन है कि मोदी का जादू हरियाणा के वोटरों पर सिर चढ़कर जरुर बोलेगा. भाजपा नेताओं के मुताबिक पूरे देश में मोदी के पक्ष में लहर चल रही है और कांग्रेस के खिलाफ जबर्दस्त माहौल है. ऐसे में हरियाणा की अपने खाते की आठ लोकसभा सीटों में से वह 5-6 जीतने का ख्वाब संजोए हुए है. पार्टी के स्थानीय नेता रामकिशन यादव कहते हैं, ‘यह हमारा अतिआत्मविश्वास नहीं है. आप देखिएगा मोदी जी के नेतृत्व में हमारा गठबंधन दस की दसों सीटें जीतेगा.’

लेकिन क्या ऐसा होने की संभावना है? जानकारों का मानना है कि जिन आठ सीटों को जीतने का भाजपा ख्बाव देख रही है, वर्तमान में वे सारी कांग्रेस के पास है. यह सही है कि केंद्र से लेकर राज्य तक कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर के कारण पार्टी फिलहाल बैकफुट पर है लेकिन उसने इससे निपटने की काट भी ढूंढने की कोशिश की है. पहला उपाय पार्टी ने किया है वर्तमान सांसदों को हटाकर नए चेहरों को टिकट देने का. हालांकि इस रणनीति की कामयाबी संदिग्ध ही है. भाजपा और हजकां के बीच गठबंधन से दोनों दलों को कोई खास फायदा होते राजनीतिक पंडित नहीं देखते. वे मानते हैं कि चूंकि दोनों दलों का समर्थक वर्ग एक ही है. अर्थात शहरी मतदाता जिसमें व्यापारी और मध्य वर्ग शामिल है. ऐसे में दोनों दल एक दूसरे को कोई फायदा नहीं पहुंचाएंगे. कुलदीप बिश्नोई के बारे में कहा जाता है कि उनका पूरा राजनीतिक प्रभाव हिसार तक सीमित है. ग्रेवाल कहते हैं, ‘कुलदीप राज्य स्तर के नेता का कद अभी तक हासिल नहीं कर पाए हैं. ऐसे में वे भाजपा और खुद का भला कितना कर पाते हैं, यह देखने वाली बात होगी. हां, 2014 में मोदी अगर पीएम बनते हैं तो जरूर प्रदेश में भाजपा कुछ उथल-पुथल मचा सकती है.’ ग्रेवाल एक और संभावना का जिक्र करते हैं. अगर किसी तरह से भाजपा, आईएनएलडी और हजकां तीनों के बीच महागठबंधन हो जाता है तो फिर वे लोकसभा और विधानसभा, दोनों मोर्चों पर बड़ा उलटफेर कर सकते हैं.

आम आदमी पार्टी
हरियाणा में इस समय चर्चा का सबसे बड़ा विषय अरविंद केजरीवाल, योगेंद्र यादव और आम आदमी पार्टी बने हुए हैं. आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी ने गुड़गांव से अपने वरिष्ठ नेता योगेंद्र यादव को न सिर्फ उम्मीदवार बनाया है बल्कि विधानसभा चुनाव के लिए उन्हें बतौर मुख्यमंत्री भी प्रोजेक्ट कर रही है. जहां तक लोकसभा चुनावों का सवाल है तो आप गुड़गांव में राव इंद्रजीत को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में दिख रही है. इसके अलावा दिल्ली से सटे फरीदाबाद की सीट पर भी पार्टी के असर डालने से इंकार नहीं किया जा सकता. राज्य में आप के प्रभाव के बारे में बताते हुए राजनीतिक विश्लेषक बलवंत तक्षक कहते हैं, ‘हरियाणा में आप का असर शहरी इलाकों तक ही सीमित है. ग्रामीण इलाकों में पार्टी को लेकर चर्चा तो है लेकिन समर्थन की कोई सूरत दिखाई नहीं देती.’  यह उसी तरफ इशारा करता है जिस ओर कांग्रेस उम्मीद किए बैठी है. अगर शहरी क्षेत्र जिन्हें कि भाजपा-हजकां का बड़ा आधार माना जाता है, वहां पर आप सेंध लगाने में कामयाब होती है तो फायदा सिर्फ कांग्रेस को ही मिलेगा. हरियाणा की जातिगत राजनीति में पार्टी के लिए चुनौती पर मीनाक्षी शर्मा कहती हैं, ‘आसान तो बिलकुल नहीं है. यह जाट बहुलता वाला राज्य है. जाट मनोविज्ञान के ऊपर तो आप का कोई असर नहीं होगा. हां, उन युवाओं एवं शहरी क्षेत्रों के लोगों पर इसका असर हो सकता है जिनके लिए भ्रष्टाचार एक गंभीर मसला है और वे वर्तमान राजनीतिक दलों से ऊब चुके हैं.’

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर प्रेम कुमार के मुताबिक हरियाणा के सबसे बड़े हिस्से यानी ग्रामीण क्षेत्र मेंं आप शायद ही कोई असर छोड़ सके. ग्रामीण इलाकों में जाति की भूमिका सबसे बड़ी होती है. वहां आप के जातिविहीन राजनीतिक नारेबाजी को सुनने वाला कोई नहीं है. हालांकि आप इस वर्ग को खुद से जोड़ने का प्रयास कर रही है. इसके तहत पार्टी के लोग विभिन्न खाप नेताओं से लगातार बातचीत और समझ स्थापित करने की प्रक्रिया में हैं. इसी रणनीति के तहत आप ने खाप जैसे संगठनों को सामाजिक और सांस्कृतिक जरूरतों को पूरी करने वाला बताकर उसके पास आने की कोशिश की है.

हरियाणा के मानस में लोकसभा के नतीजों से ज्यादा उत्सुकता आप के विधानसभा परिणामों के प्रति है. दिल्ली के नतीजों को देखते हुए राजधानी से सटे हरियाणा की 13-14 विधानसभा सीटों पर आप के प्रभाव की पूरी संभावना है. अगर आप ये सीटें जीतती है तो हरियाणा की अगली राज्य सरकार में वह महत्वपूर्ण ताकत होगी. कहा जा रहा है कि अगला विधानसभा चुनाव परिणाम त्रिशंकु विधानसभा को जन्म दे सकता है. ऐसे में आप के सपने परवान चढ़ सकते हैं.

यानी हरियाणा में फिलहाल न तो किसी के पक्ष में लहर दिखती है और न ही किसी पार्टी की चुनावी सफलता की संभावना को पूरी तरह से खारिज ही किया जा सकता है. प्रोफेसर प्रेम कुमार के शब्दों में ‘किसी बड़ी लहर के अभाव में अब सारा दारोमदार चुनाव प्रबंधन और प्रत्याशियों की योग्यता पर निर्भर है.’

‘नागरिकता नहीं मिली तो जिएंगे कैसे’

फोटोः विकास कुमार
फोटोः विकास कुमार
फोटोः विकास कुमार

कौन
पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थी

कब
19 फरवरी से 22 फरवरी 2014 तक

कहां
जंतर मंतर (नई दिल्ली)

क्यों
धरना देखने-समझने के बाद हम चलने को होते हैं कि रवींद्र सिंह हमारे पास आते हैं. शायद उन्हें हमसे तसल्ली देने वाले किसी जवाब की उम्मीद है. वे कहते हैं, ‘क्या साहब? हमारा कुछ होगा? पांच साल तो हो गए यहां-वहां भटकते.’

रवींद्र सिंह पाकिस्तान के सिंध से भारत आए हैं. वे एक लाख से भी ज्यादा उन पाकिस्तानी हिंदुओं में से हैं जिनका बड़ा हिस्सा राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और जोधपुर के अलावा मध्यप्रदेश व गुजरात के सीमांत इलाकों में रहता है. पाकिस्तान से आए हुए ये हिंदू शरणार्थी अपने लिए भारत की नागरिकता चाहते हैं. आज से नहीं, कई साल से. राजस्थान के जोधपुर में रहने वाले इन 500 शरणार्थी हिंदुओं के इस दल की भी मांग यही है. सामाजिक संस्था सीमांत लोक संगठन के अध्यक्ष हिंदू सिंह सोढ़ा इस जत्थे का नेतृत्व कर रहे हैं. सोढ़ा कहते हैं, ‘देखिए, ये लोग खुशी से अपने देश को छोड़ के नहीं आ रहे. वहां उन्हें जीने और रहने में परेशानी आ रही है तभी ये लोग यहां आ रहे हैं. अगर हम भी इन्हें यहां नहीं रखेंगे, इन्हें यहां की नागरिकता नहीं देंगे तो ये लोग जाएंगे कहां?’ वे आगे कहते हैं, ‘जो भी पाकिस्तानी हिंदू भारत में आ रहे हैं उनमे से अधिकतर तीर्थयात्रा के नाम पर आते हैं क्योंकि इसके लिए वीजा आसानी से मिल जाता है. जब वे यहां आ जाते हैं तो यहां से वापस नहीं जाना चाहते और ऐसी हालत में वे यहां नरक जैसी जिंदगी जीने को मजबूर हो जाते हैं.’ पाकिस्तान से आए इन हिंदुओं की दशा बहुत खराब है. किसी पहचान के बगैर इन्हें कोई काम नहीं मिलता. कोई परेशान करे तो ये कहीं गुहार भी नहीं लगा सकते.

भारत ने 1951 की अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी संधि और 1967 में उसके प्रोटोकॉल पर दस्तखत नहीं किए हैं, न ही यहां राष्ट्रीय स्तर का कोई कानून शरणार्थियों के संबंध में मौजूद है. नागरिकता पाने के लिए न्यूनतम सात साल भारत प्रवास का नियम है लेकिन इतने लंबे समय तक टिकने के लिए इन शरणार्थियों के पास कोई संसाधन नहीं.

लोढ़ा कहते हैं, ‘हम कुछ भी ज्यादा नहीं चाह रहे. ये लोग जो पाकिस्तान में प्रताड़ित होते रहे हैं उन्हें यहां थोड़ी राहत दी जाए. कम से कम इन्हें यहां बसने का तो अधिकार दिया जाए. इन्हें हिंदू-मुस्लिम से अलग करके देखें तो ये भी इंसान हैं और इन्हें भी बाकियों की तरह अपनी जिंदगी जीने का अधिकार है.’

पिछले साल दिसंबर में राज्यसभा में नागरिकता कानून 1955 में संशोधन के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक 2013 पारित किया गया था. इसे संसद के इस सत्र में लोकसभा में पारित किया जाना था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सत्र के आखिरी के दिन तेलंगाना विवाद की भेंट चढ़ गए और धरने पर बैठे लोग निराशा के साथ वापिस लौट गए.

हम लोढ़ा से पूछते हैं कि अब क्या करेंगे? क्या लड़ाई आगे भी जारी रहेगी? वे कहते हैं, ‘इनके पास इसके सिवाय कोई रास्ता ही नहीं है. ये लोग पाकिस्तान वापिस जाना नहीं चाहते. यहीं रहना चाहते हैं. अगर इन्हें यहां रहना है तो नागरिकता जरूरी है. बगैर नागरिकता के ये लोग यहां कुछ भी नहीं कर सकते.’

सीआईएसएफ विद्रोह: बोकारो

cosfभारत में सुरक्षाबलों के विद्रोह की घटनाएं गिनती की ही हुई हैं. इनमें सीआईएसएफ (केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षाबल) में विद्रोह की घटना काफी चर्चित रही है. इस बल का गठन 1968 में केंद्रीय प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए किया गया था. उस समय तक सरकारी कारखानों और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों का सकल घरेलू उत्पाद में लगभग आधा योगदान था और इनकी सुरक्षा के लिए एक प्रशिक्षित बल की जरूरत थी. यही दौर मजदूर आंदोलन के उभार का भी रहा है. सीआईएसफ के गठन का एक उद्देश्य हिंसक मजदूर आंदोलनों से सरकारी संपत्ति को बचाना भी था. इस बल के गठन के बाद कुछ ही सालों में लगभग सभी सार्वजनिक उपक्रमों की सुरक्षा इसको सौंप दी गई.

सीआईएसएफ के विद्रोह की घटना बोकारो (झारखंड) स्थित स्टील प्लांट में तैनात यूनिट से जुड़ी है. 1979 में यहां तकरीबन 2000 जवान तैनात थे. चूंकि इन जवानों की तैनाती हमेशा सार्वजनिक उपक्रमों में होती थी इसलिए वहां के मजदूर आंदोलनों से वे भी अछूते नहीं थे. ऐसे में जब यहां तैनात जवानों ने अपने काम करने की बुरी स्थितियों और मासिक वेतन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा शुरू की तो जल्दी ही बल के भीतर इन मसलों पर एक राय बन गई और सीआईएसएफ के भीतर ही जवानों ने अपना एक संगठन बना लिया.

कहा जाता है कि बल के भीतर विद्रोह की घटना का शुरुआती बिंदु वह था जब रांची में कथिततौर पर एक कमांडेंट की प्रताड़ना से एक जवान की मौत हो गई थी. इसके बाद बोकारो में सीआईएसएफ कर्मियों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया. देशभर से बल के कुछ चुने हुए प्रतिनिधि दिल्ली में अपनी मांगों को लेकर दिल्ली भी गए. लेकिन यहां उन्हें विरोध प्रदर्शन करने पर हिरासत में ले लिया गया. इन दोनों घटनाओं ने बोकारो के जवानों को पूरी तरह आंदोलित कर दिया.

जून के महीने में इन जवानों ने अपने वरिष्ठों के आदेश मानने से पूरी तरह इनकार कर दिया. आखिरकार इनको नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार को सेना भेजनी पड़ी. 25, जून को जब सेना यहां पहुंची उसके पहले ही सीआईएसफ के विद्राेही जवान अपने आवासीय परिसरों के आसपास सशस्त्र संघर्ष की तैयारी कर चुके थे. उन्होंने सेना से मुठभेड़ के लिए रेत की बोरियां जमा करके बैरकें बना ली थीं. सेना जब इस क्षेत्र में आगे बढ़ी तो इन जवानों ने फायरिंग कर दी. दोनों पक्षों में मुठभेड़ शुरू हो गई और तीन घंटों की मुठभेड़ के बाद आखिरकार विद्रोही जवानों ने आत्मसमर्पण कर दिया. लेकिन इस पूरी घटना का सबसे दुखद पक्ष यह रहा कि सेना की कार्रवाई में दर्जनों जवानों की मौत हो गई. सेना को अपने तीन जवान खोने पड़े तो सीआईएसएफ के तकरीबन 60 जवान मारे गए. इस घटना के बाद स्टील प्लांट से सीआईएसएफ हटा ली गई. इस यूनिट के तकरीबन 500  जवानों को बर्खास्त कर दिया गया और उनपर मुकदमा चलाया गया.

आरोपों के लपेटे में चैनल

मनीषा यादव

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, नेताओं के आपसी आरोप-प्रत्यारोप भी तीखे और व्यक्तिगत होने लगे हैं. न्यूज मीडिया हमेशा से ऐसे आरोप-प्रत्यारोपों का मंच और अखाड़ा बनता रहा है. लेकिन इस बार पहली दफा खुद न्यूज मीडिया खासकर चैनल इन आरोप-प्रत्यारोपों के लपेटे में आ गए हैं.  प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी से लेकर गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे और पूर्व सेनाध्यक्ष पलट नेता बने जनरल वीके सिंह तक खुलेआम न्यूज मीडिया पर खुन्नस निकाल रहे हैं. यहां तक कि आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने तो न्यूज मीडिया खासकर चैनलों के खिलाफ पूरा मोर्चा ही खोल दिया है. उनका आरोप है कि कई मीडिया कंपनियों में मुकेश और अनिल अंबानी का पैसा लगा हुआ है और इस कारण वे व्यक्तिगत तौर पर उनके खिलाफ झूठी खबरें दिखा रही हैं.

भाजपा नेताओं और मोदी समर्थकों का आरोप है कि अखबार और चैनल केजरीवाल का महिमामंडन कर रहे हैं क्योंकि उनके ज्यादातर पत्रकार वामपंथी, छद्म धर्मनिरपेक्ष और कांग्रेसी हैं. भाजपा नेता सुब्रमणियम स्वामी और संघ से जुड़े एस गुरुमूर्ति ने तो एनडीटीवी पर मनी लॉन्डरिंग का आरोप लगाते हुए अभियान छेड़ रखा है. खुद मोदी ने एक न्यूज चैनल के कार्यक्रम में एनडीटीवी पर सरकारी पैसे से चलने और बाद में दिल्ली की एक रैली में इसी चैनल की एक पत्रकार पर नवाज शरीफ की मिठाई खाने का आरोप लगाया था. इतना ही नहीं, सोशल मीडिया- ट्विटर और फेसबुक पर भी चैनलों और उनके संपादकों/एंकरों को मोदी और केजरीवाल समर्थक जमकर गरिया रहे हैं. इससे चैनलों और मीडिया के साथ पत्रकारों में भी बेचैनी है. नतीजा, एडिटर्स गिल्ड को न्यूज मीडिया के बचाव में उतरना पड़ा. लेकिन लगता नहीं है कि न्यूज मीडिया खासकर चैनलों पर हमले कम होंगे. वजह यह है कि इस बार चुनावों में न सिर्फ दांव बहुत ऊंचे हैं, केजरीवाल जैसे नए खिलाड़ी ‘नियमों को तोड़कर’ खेल रहे हैं बल्कि इस बार खेल में न्यूज मीडिया खासकर चैनल खुद खिलाड़ी बन गए हैं.

आप मानें या न मानें लेकिन 2014 के चुनाव जितने जमीन पर लड़े जा रहे हैं, उतने ही चैनलों पर और उनके स्टूडियो में भी. केजरीवाल और मोदी की ‘लार्जर दैन लाइफ’ छवि गढ़ने में चैनलों की भूमिका किसी से छुपी नहीं. यह पहला आम चुनाव है जिसमें चैनल इतनी बड़ी और सीधी भूमिका निभा रहे हैं. हर रविवार को होने वाली मोदी की रैलियां जिनका असली लक्ष्य चैनलों पर लाइव टेलीकास्ट के जरिये करोड़ों वोटरों तक पहुंचना है, आश्चर्य नहीं कि उनकी टाइमिंग से लेकर मंच की साज-सज्जा तक और कैमरों की पोजिशनिंग से लेकर भाषण के मुद्दों तक का चुनाव टीवी दर्शकों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है.

चुनावी दंगल में इस बढ़ती और निर्णायक भूमिका के कारण ही चैनल नेताओं और पार्टियों के निशाने पर आ गए हैं. इसके जरिये चैनलों पर दबाव बनाने और उन्हें विरोधी पक्ष में झुकने से रोकने की कोशिश की जा रही है. लेकिन इसके लिए काफी हद तक खुद चैनल भी जिम्मेदार हैं. सच यह है कि चैनल खुद दूध के धोए नहीं हैं. यह किसी से छुपा नहीं है कि कई चैनल चुनावी दंगल की तथ्यपूर्ण और वस्तुनिष्ठ रिपोर्टिंग और व्याख्या के बजाये खेल में खुद पार्टी हो गए हैं. यह भी सही है कि उनमें से कई की डोर बड़े कार्पोरेट्स के हाथों में है और वे उन्हें अपनी मर्जी से नचा रहे हैं. कुछ बहती गंगा में हाथ धोने में लग गए हैं और कुछ बेगानी शादी में अब्दुल्ला की तरह झूम रहे हैं.

ऐसे में, हैरानी क्यों? जब चैनल खेल में पार्टी बनते जा रहे हैं तो आरोप-प्रत्यारोपों के उछलते कीचड़ से भला कब तक बचते?

प्रहसन एक पूर्व प्रधानमंत्री की मौत का

राजीव गांधी की शवयात्रा

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क्या राजीव गांधी हत्याकांड में न्याय हुआ है? इस घटना के 23 साल बाद भी शायद इस सवाल का कोई निश्चित जवाब नहीं दिया जा सकता. 26 दोषियों को फांसी की सजा से शुरू हुआ यह न्यायिक मामला अब सभी दोषियों की रिहाई का राजनीतिक मामला बन चुका है. पिछले 23 साल के सफर में कई बार इस मामले में न्याय की परिभाषाएं बदली, कई बार फैसले आए, कई बार अपील हुई और कई बार अंतिम फैसले भी आए. लेकिन राजनीतिक दांव-पेचों ने उन्हें अंतिम नहीं रहने दिया. यह मामला आज भी न्यायालय में है और अपना अंतिम न्याय लिखे जाने का इंतजार कर रहा है. आज न्याय की मांग पीड़ितों के लिए नहीं बल्कि दोषियों के लिए होने लगी है जबकि यह मामला असल में उन 18 लोगों को न्याय दिलाने का था जिनकी इन दोषियों ने हत्या कर दी थी. लोक स्मृति में धुंधली हो चुकी इस हत्याकांड से जुड़ी बातें और घटनाक्रम मिलकर एक दिलचस्प सिलसिला बनाते हैं. न्यायालय के फैसलों, जांच आयोगों और समितियों की रिपोर्टों, हजारों पन्नों के दस्तावेजों, संबंधित लोगों के बयानों और साक्षात्कारों के आधार पर इसे समझते हैं.

राजीव गांधी हत्याकांड के पूरे मामले को समझने के लिए जरूरी है कि इसकी शुरुआत आजादी से की जाए. भारत की नहीं, श्रीलंका की आजादी से. इस मामले में श्रीलंका के इस इतिहास की इतनी अहमियत है कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने फैसले में इसे विस्तार से लिखा है. भारत की आजादी के अगले ही साल श्रीलंका आजाद हुआ था. तब इसे सीलोन कहा जाता था. आजादी से पहले हजारों तमिल लोगों को श्रीलंका के चाय बागानों में मजदूरी के लिए लाया गया था. भारत से गए इन तमिलों को भारतीय-तमिल कहा जाता था जबकि वहां पहले से रह रहे तमिलों को श्रीलंकन-तमिल या जाफना-तमिल कहते थे. श्रीलंका में बहुसंख्यक आबादी बौद्ध धर्म को मानने वाले सिंहला लोगों की थी और तमिल भाषियों को लगातार उनकी उपेक्षा का शिकार होना पड़ता था. आजादी के बाद भारतीय तमिलों से वोट देने का अधिकार भी छीन लिया गया. श्रीलंका की लगभग 23 प्रतिशत आबादी तमिलों की थी. इतनी बड़ी आबादी से वोट देने का अधिकार छीना जाना एक बड़ा झटका था. समय के साथ स्थितियां खराब होती गईं. 1956 में श्रीलंका सरकार ने घोषणा कर दी कि देश की एक मात्र आधिकारिक भाषा सिंहला होगी. सरकार के इस फैसले से तमिल भाषी लोगों को सरकारी नौकरी मिलना भी लगभग असंभव हो गया. इसके बाद 1972 में बने श्रीलंका के संविधान में बौद्ध धर्म को देश का प्राथमिक धर्म घोषित कर दिया गया. साथ ही सिंहला लोगों को बहुसंख्यक होने के बावजूद भी हर जगह वरीयता और आरक्षण दिया जाने लगा. धीरे-धीरे तमिल लोग नौकरियों से लेकर शिक्षा तक हर क्षेत्र में हाशिये पर धकेल दिए गए.

इस भेद-भाव का नतीजा यह हुआ कि अंततः तमिलों ने हथियार उठा लिए. उत्तरी और पूर्वी श्रीलंका में तमिलों के कई छोटे-छोटे संगठन बनने शुरू हुए. एक तमिल युवा वेलुपिल्लई प्रभाकरन ने भी अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर ‘तमिल न्यू टाइगर्स’ नाम का एक संगठन बनाया. उस वक्त प्रभाकरन सिर्फ 18 साल का था. धीरे-धीरे यह संगठन मजबूत होने लगा. पांच मई, 1976 को प्रभाकरन ने इसका नाम बदल कर ‘लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम’ कर दिया. इसे आम तौर से लिट्टे नाम से जाना जाने लगा. 1980 का दशक आते-आते लिट्टे सबसे मजबूत, अनुशासित और  बड़ा तमिल आतंकवादी संगठन बन गया. लिट्टे ने उस वक्त के सभी छोटे संगठनों को या तो अपने साथ शामिल कर लिया या खत्म कर दिया. श्रीलंका में भारत के उच्चयुक्त रहे एनएन झा एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘लिट्टे ने उन सभी तमिल नेताओं को भी समाप्त कर दिया जो बातचीत में विश्वास रखते थे. प्रभाकरन तमिलों का एकमात्र प्रतिनिधि बन गया था.’ लिट्टे जितना मजबूत गुरिल्ला लड़ाई में था उतना ही मजबूत उसका संचार तंत्र भी था. लगभग 30 साल तक लिट्टे और श्रीलंका से जुड़े विषयों पर लिखते रहे वरिष्ठ पत्रकार श्याम टेकवानी के अनुसार लिट्टे का लंदन में मीडिया हेडक्वाटर था. लिट्टे द्वारा हर खबर यहां पहुंचा दी जाती थी. लंदन स्थित यह मुख्यालय इन ख़बरों को प्रेस विज्ञप्ति के रूप में सभी अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों और प्रकाशकों को भेज देता था. इस कारण लिट्टे जल्द ही दुनिया भर में मशहूर हो गया.

श्रीलंका में तमिलों के साथ हो रहे भेदभाव के कारण तमिलनाडु के लोग उनके प्रति सहानुभूति रखते थे. इस कारण भारत पर तमिलों की मदद करने का भारी दबाव था. प्रभाकरन तमिलों का एकमात्र प्रतिनिधि बन चुका था. उसने भारत से मदद मांगी. भारत इसके लिए तैयार हो गया. तमिलनाडु तथा श्रीलंका में तमिल छापामारों को भारत सरकार द्वारा प्रशिक्षण दिया जाने लगा. इस बात का खुलासा सबसे पहले इंडिया टुडे पत्रिका के रिपोर्टर शेखर गुप्ता ने किया. एक साक्षात्कार में वे बताते हैं, ‘भारत सरकार लिट्टे के लोगों को सैन्य ट्रेनिंग दे रही थी. तमिलनाडु में तो यह एक खुले रहस्य की तरह था. इसकी जानकारी वहां सबको थी लेकिन सबको शायद यही स्वीकार  था इसलिए कोई इस पर लिख नहीं रहा था.’ लिट्टे को भारत से पूरी मदद मिल रही थी. ट्रेनिंग, हथियार, बम, पेट्रोल, वायरलेस, दवाइयां, कपड़े सब कुछ भारत द्वारा उन्हें दिया जाने लगा था.

मजबूत संचार तंत्र के कारण लिट्टे को दुनिया भर के तमिलों से भी मदद मिलने लगी थी. प्रभाकरन लगातार मजबूत हो रहा था. 23 जुलाई, 1983 को प्रभाकरन ने श्रीलंकाई सेना के खिलाफ पहला बड़ा कदम उठाया. लिट्टे ने श्रीलंका के 13 सैनिकों की हत्या कर दी. इसके साथ ही श्रीलंका में नरसंहारों और खूनी संघर्ष का सबसे वीभत्स दौर शुरू हो गया. पूरे श्रीलंका में तमिल विरोधी दंगे भड़क गए. लेखक एमआर नारायणस्वामी इन दंगों के बारे में कहते हंै, ‘जुलाई 1983 में श्रीलंका में जब तमिलों को मारा जा रहा था तो वहां की सरकार इसमें पूरी तरह से मिली हुई थी. उग्रवादियों के हाथ में वोटर लिस्ट थी और वे तमिलों को घर-घर जाकर मार रहे थे. सेना की गाड़ियों में उग्रवादी घूम रहे थे और पुलिस सब कुछ देख रही थी.’ दंगों के इस दौर को ‘ब्लैक जुलाई’ कहा गया. इसके बाद से श्रीलंका में गृह युद्ध की शुरुआत हुई. हजारों की संख्या में तमिल शरणार्थी भारत आने लगे. यहीं से अलग तमिल राष्ट्र- ‘ईलम’ की भी मांग तेज हो गई. पूर्व उच्चायुक्त एनएन झा के शब्दों में, ‘ब्लैक जुलाई से पहले ज्यादा लोग अलग राष्ट्र की मांग से सहमत नहीं थे. लेकिन इसके बाद तो तमिलों के मन में यह बात बैठ गई कि अलग हुए बिना न्याय नहीं हो सकता.’ लिट्टे तो पहले से ही ईलम की मांग कर रहा था. इस घटनाक्रम से इस मांग को व्यापक जनसमर्थन मिल गया.

ब्लैक जुलाई के बाद से लिट्टे और श्रीलंकाई सेना के बीच लगातार मुठभेड़ होती रही. इनमें दोनों तरफ के सैकड़ों लोग हर रोज मारे गए. भारत अब भी लिट्टे की पूरी मदद कर रहा था. तमिलनाडु में लिट्टे की सक्रियता बढ़ती जा रही थी और राज्य सरकार न सिर्फ उसे नजरंदाज कर रही थी बल्कि उसका समर्थन भी कर रही थी. नवंबर 1986 में तमिलनाडु पुलिस ने कुछ ईलम संगठनों पर छापा मारकर कई हथियार, वायरलेस और अन्य अवैध समान बरामद किए. इसके विरोध में प्रभाकरन मद्रास में भूख हड़ताल पर बैठ गया. उसने हथियार तो नहीं लेकिन अपने वायरलेस और संचार साधन वापस करने की मांग की. मीडिया ने भी इस मामले को खूब हवा दी. अंततः सरकार ने उसे जूस पिलाते हुए जब्त समान वापस कर दिया. इसके बाद तो तमिलनाडु में पहले से ही प्रसिद्ध प्रभाकरन की तमिलों में भगवान सरीखी छवि बन गई.

उधर, श्रीलंका में गृह युद्ध जारी था और इसमें हजारों लोग मारे जा चुके थे. श्रीलंका और भारत सरकार के बीच इसे रोके जाने को लेकर बातें भी चल रही थी. 1987 में यह तय किया गया कि भारत और श्रीलंका के बीच एक शांति समझौता किया जाएगा. नटवर सिंह उस वक्त विदेश राज्य मंत्री थे. एक साक्षात्कार में वे बताते हैं, ‘मैं और पी चिदंबरम साहब प्रभाकरन से मिले. हमने उन्हें समझाने की बहुत कोशिशें की लेकिन वे ईलम की मांग पर कोई समझौता करने तो तैयार नहीं थे. हमने उन्हें कहा कि ईलम का बनना मुमकिन नहीं है, इसे भूल जाओ. उन्होंने कहा कि मैं ईलम को नहीं भूल सकता.’

इसके बाद 28 जुलाई, 1987 को प्रभाकरन को राजीव गांधी से मिलने बुलाया गया. इस मुलाकात के बाद प्रभाकर ने प्रेस को बयान दिया और कहा, ‘प्रधानमंत्री तमिलों की समस्या समझते हैं और इस दिशा में काम कर रहे हैं. हम प्रधानमंत्री के इस रुख से संतुष्ट हैं.’ लेकिन प्रभाकरन ने खुलकर इस समझौते से संबंधित कोई भी बयान नहीं दिया. इसके अगले ही दिन राजीव गांधी श्रीलंका पहुंचे और राष्ट्रपति जेआर जयवर्धने के साथ शांति समझौते पर दस्तखत कर दिए.

भारत और श्रीलंका के बीच हुआ यह समझौता कितना घातक होने वाला था इसके संकेत जल्द ही मिलने लगे. समझौते पर किए गए राजीव गांधी के दस्तखत की स्याही सूखी भी नहीं थी कि उन पर जानलेवा हमले की कोशिश हुई. यह हमला श्रीलंका में ही हुआ और हजारों लोगों की मौजूदगी में हुआ. समझौते के अगले दिन राजीव गांधी को श्रीलंका सेना द्वारा सैनिक सलामी दी जा रही थी. राष्ट्रपति जयवर्धने के साथ राजीव गांधी सलामी ले रहे थे कि तभी सबसे आगे पंक्ति में खड़े एक श्रीलंकाई सैनिक ने उन पर बंदूक के बट से हमला कर दिया. खुद को संभालते हुए राजीव गांधी नीचे झुक गए जिस कारण उनके सिर पर चोट नहीं आई. बंदूक का यह वार उनकी गर्दन और कंधे पर जाकर लगा. सारे देश ने इस घटना को दूरदर्शन के माध्यम से देखा. इस हमले के कुछ साल बाद सोनिया गांधी ने कहा था कि ‘उस हमले के बाद राजीव लंबे समय तक न तो अपना कंधा पूरी तरह से उठा पाते थे और न ही उस करवट सो पाते थे.’

समझौते के दिन प्रभाकरन दिल्ली में ही था. पूर्व उच्चायुक्त एनएन झा का मानना है कि ‘प्रभाकरन कभी भी इस समझौते के पक्ष में नहीं था. लेकिन उस पर भारत का दबाव था इसलिए उसने कुछ समय तक इसका खुलकर विरोध नहीं किया.’ समझौते के अनुसार भारत से एक विशेष सैन्य दल भी श्रीलंका भेजा जाना था. इस दल को ‘इंडियन पीस कीपिंग फोर्स’ (आईपीकेएफ) कहा गया. समझौते वाले दिन ही आईपीकेएफ को भी श्रीलंका रवाना कर दिया गया. इसका काम था लिट्टे से आत्मसमर्पण करवाना. प्रभाकरन ने आईपीकेएफ को लिख कर दिया कि वह आत्मसमर्पण के लिए तैयार है. आईपीकेएफ के कमांडर रहे दीपेंदर सिंह ने अपनी किताब में इसका जिक्र करते हुए लिखा है, ‘अन्य आतंकी संगठनों के मुकाबले लिट्टे बड़े ही सुनियोजित तरीके से आत्मसमर्पण कर रहा था. वे हमें समय बताते थे और ठीक समय पर उनके ट्रक हथियार लेकर पहुंच जाते थे.’

लेकिन समझौते के तीन हफ्ते बाद ही 21 अगस्त को लिट्टे ने हथियारों का समर्पण बंद कर दिया. प्रभाकरन ने आईपीकेएफ के अधिकारियों को बताया कि भारतीय खुफिया विभाग लिट्टे के विरोधी संगठनों को हथियार दे रहे हैं. इस कारण लिट्टे अब समर्पण नहीं करेगा.

प्रभाकरन ने जब हथियार डालने से इनकार कर दिया तो श्रीलंका में मौजूद भारतीय अधिकारियों की एक बैठक बुलाई गई. इस बैठक में प्रभाकरन को भी बातचीत के लिए बुलाया गया था. जेएन दीक्षित उस वक्त भारत के उच्चायुक्त थे और यह बैठक उन्हीं की अध्यक्षता में होनी थी. आईपीकेएफ के मेजर जनरल रहे हरकीरत सिंह एक साक्षात्कार में बताते हैं, ‘इस मीटिंग से एक रात पहले मुझे उच्चायुक्त दीक्षित साहब का फोन आया था. उन्होंने मुझे कहा कि जनरल, कल जब प्रभाकरन मीटिंग में आए तो आप उसे गोली मार देना. मैंने जनरल दीपेंदर सिंह से इस बारे में बात की और फिर दीक्षित साहब को जवाब दिया कि हम फौजी हैं, हम कभी भी पीठ पर गोली नहीं मारते.’ यह मीटिंग हुई और प्रभाकरन इसमें शामिल भी हुआ. लेकिन अब तक लिट्टे ने जो उम्मीदें भारत से लगा रखी थी वे टूटने लगी थी. तमिल लोगों को जिस तरह से बसाया जा रहा था उससे लिट्टे समर्थक संतुष्ट नहीं थे. आईपीकेएफ द्वारा भी तमिलों पर अत्याचार की बातें सामने आ रही थी. इसके विरोध में 15 सितंबर को थिलीपन नाम का एक लिट्टे सदस्य भूख हड़ताल पर बैठ गया. उसका कहना था कि न तो समझौते की बातों पर अमल हो रहा है और न ही भारत सरकार अपनी भूमिका निभा रही है. 12 दिनों कि भूख हड़ताल के बाद थिलीपन की मौत हो गई. इस मौत ने एक बार फिर से लिट्टे में बदले की आग को हवा दे दी. यह मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि एक और हादसा हो गया. अक्टूबर के पहले हफ्ते में श्रीलंका सेना ने लिट्टे के 17 सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया. इन्हें पूछताछ के लिए कोलंबो ले जाया जाने लगा. लिट्टे ने इनकी रिहाई के लिए भारत सरकार से मांग की. भारत सरकार ने लिट्टे की इस मांग पर कोई तेजी नहीं दिखाई. इस बीच इन गिरफ्तार सदस्यों में से 12 लोगों ने सायनाइड खाकर आत्महत्या कर ली. थिलीपन की मौत से भड़की आग में इस हादसे ने घी का काम किया. इसके बाद लिट्टे ने भारत और आईपीकेएफ को भी अपना दुश्मन मान लिया. कुछ दिन के भीतर ही लिट्टे ने आईपीकेएफ के 11 सैनिकों को जिंदा जलाकर मार डाला.

यहां से लिट्टे और आईपीकेएफ आमने-सामने आ गए. जो सेना भारत से शांति बहाली के लिए गई थी अब वही युद्ध में लग गई. आठ अक्टूबर को भारतीय जनरल ने आईपीकेएफ को लिट्टे पर खुले हमले के आदेश दे दिए. इस दिन के बाद से प्रभाकरन लगभग ढाई साल तक भूमिगत रहा.

भारत में राजीव गांधी द्वारा आईपीकेएफ को श्रीलंका भेजे जाने का विरोध होने लगा. संसद से लेकर सड़कों तक प्रदर्शन और रेल रोको आंदोलन तक हुए. देश के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा था कि श्रीलंका में भारतीय सेना के जवान मारे जा रहे थे और राजनीतिक दल सेना का ही विरोध कर रहे थे. 1989 में सत्ता परिवर्तन हुआ और राजीव गांधी प्रधानमंत्री पद से हट गए. नए प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने आते ही आईपीकेएफ को वापस बुलाने को फैसला किया. 24 मार्च 1990 को आईपीकेएफ का अंतिम बेड़ा श्रीलंका से वापस लौट आया. आईपीकेएफ के कुल 1248 जवान श्रीलंका में मारे गए थे लेकिन इस दौरान आईपीकेएफ ने लिट्टे को बहुत हद तक सीमित कर दिया था.

इसके बाद से भारत में राजनीतिक समीकरण लगातार बदल रहे थे. राजीव गांधी के फिर से प्रधानमंत्री बनने की प्रबल संभावनाएं थी. इस बीच अगस्त 1990 में राजीव गांधी का एक साक्षात्कार अमृत बाजार पत्रिका में प्रकाशित हुआ. इसमें उन्होंने भारत-श्रीलंका शांति समझौते का समर्थन किया था और अखंड श्रीलंका की बात कही थी. इस समझौते के कारण लिट्टे का ईलम का सपना टूट रहा था. लिट्टे को डर था कि राजीव गांधी का प्रधानमंत्री बनना उनके लिए घातक सिद्ध हो सकता है लिहाजा उसने उनकी हत्या का षड्यंत्र रचना शुरू किया. इस षड्यंत्र के मुख्य पात्र थे लिट्टे चीफ प्रभाकरन, लिट्टे की खुफिया इकाई के मुखिया पोट्टू ओम्मान, महिला इकाई की मुखिया अकीला और सिवरासन. सिवरासन ही राजीव गांधी की हत्या के षड्यंत्र का मास्टरमाइंड भी था. राजीव गांधी का साक्षात्कार प्रकाशित होने के एक महीने बाद ही उनकी हत्या करने के उद्देश्य से लिट्टे के आतंकियों की पहली टुकड़ी शरणार्थी बनकर भारत आई. इसके बाद कुल सात अलग-अलग टुकड़ियों में लोग आए और उन्होंने भारत में अलग-अलग जगह अपने ठिकाने बनाए. इन लोगों को हत्याकांड से पहले और उसके बाद छुपने के लिए जगह तलाशने का काम भी सौंपा गया था. इनमें से दो आरोपितों जयकुमार और रोबर्ट पयास के ठिकानों पर वायरलेस लगाए गए. यहां से लगातार जाफना संदेश भेजे जाते थे. पत्रकार राजीव शर्मा द्वारा लिखी गई किताब ‘बियोंड द टाइगर्स: ट्रैकिंग राजीव गांधीज असैशिनेशन’ में यह भी लिखा गया है कि भारतीय नौसेना और रॉ ने राजीव गांधी की हत्या से संबंधित ये संदेश पकड़ भी लिए थे, लेकिन इनको हत्या के कई महीनों बाद ही डिकोड किया जा सका.

इस षड्यंत्र को अंजाम देने वालों में से एक था मुरुगन. वह जनवरी 1991 में भारत आया. यहां आकर वह नलिनी के परिवार के साथ उसके घर पर ठहरा. नलिनी तब एक निजी कंपनी में नौकरी करती थी और अपने परिवार से अलग रहती थी. मुरुगन से मिलने के बाद नलिनी की उससे नजदीकियां बढ़ी और उन्होंने बाद में शादी कर ली. मुरुगन ने नलिनी को बताया कि सिवरासन श्रीलंका से दो लड़कियों को लेकर आने वाला है और नलिनी को उन्हें अपने साथ रखना होगा. 1 मई, 1991 को सिवरासन लिट्टे के सबसे समर्पित और इस षड्यंत्र के सबसे महत्वपूर्ण लोगों को लेकर भारत आया. इनमें मानव बम धनु और उसकी सहेली सुबा सहित कुल नौ लोग शामिल थे. सुबा और धनु भारत आकर नलिनी से मिलीं. नलिनी को उनके साथ उनके अभिभावक की तरह रहने की जिम्मेदारी दी गई थी. इसी बीच सुबा ने नलिनी को बताया कि आईपीकेएफ ने तमिलों पर बहुत अत्याचार किए हैं. सुबा ने उसे यह भी बताया कि भारतीय सेना के जवानों ने सात तमिल लड़कियों का बलात्कार करके उनकी हत्या कर दी. श्रीलंका में तमिलों पर हुए अत्याचार की बातें बताते हुए सुबा और धनु ने नलिनी को बताया कि इसके लिए राजीव गांधी जिम्मेदार हैं. बताया जाता है कि इसके बाद से नलिनी के मन में भी राजीव गांधी के प्रति बदले की भावना पैदा हो गई.

सिवरासन ने भारत आने के बाद धनु और सुबा को ट्रेनिंग भी दी. सात मई को मद्रास में वीपी सिंह की सभा होने वाली थी. सिवरासन इस रैली में धनु, सुबा और नलिनी को लेकर गया ताकि वे एक पूर्व प्रधानमंत्री के सुरक्षा घेरे में जाकर उसे माला पहनाने का अभ्यास कर सकें. नलिनी, मुरुगन, पेरारिवलन और हरी बाबू भी इनके साथ ही सभा में गए थे. वीपी सिंह के मंच पर आने से पहले सुबा और धनु ने उन्हें माला पहनाई. अपनी ट्रेनिंग में मिली इस सफलता से दोनों लड़कियों के इरादे और भी ज्यादा मजबूत हो गए. उन्होंने अगले ही दिन जाफना संदेश भिजवाया कि अब उनका आत्मविश्वास बहुत मजबूत है और वे इसी महीने में अपना उद्देश्य पूरा कर लेंगी. 11 मई को नलिनी धनु के साथ टेलर के पास गई और उसके लिए नया सलवार-कुर्ता सिलवाया. यह कपड़े इस मकसद से ढीले सिलवाए गए थे कि इनमें विस्फोटक छिपाए जा सकें.

19 मई 1991 के अखबारों में राजीव गांधी का चुनावी कार्यक्रम प्रकाशित हुआ. यहीं से सिवरासन को मालूम हुआ कि 21 मई को राजीव गांधी श्रीपेरंबदूर आने वाले हैं. यह मौका वह चूकना नहीं चाहता था. उसने नलिनी से जगह के बारे में मालूम किया और उसे 21 मई को आधे दिन की छुट्टी लेने को कहा. 20 मई को सिवरासन ने पेरारिवलन को बैटरी खरीदने को कहा और साथ ही उससे एक कैमरे का रोल भी मंगवाया.

इसके बाद वह दिन आया जिसका इन लोगों को इंतजार था. सिवरासन ने सुबा और धनु को अंतिम उद्देश्य के लिए तैयार होने को कहा. धनु ने अपने शरीर में विस्फोटक लगाए और वही नया सिलवाया सलवार-कुर्ता पहन लिया. इसके बाद सिवरासन ने अपने एक साथी को ऑटो लेने भेजा और साथ ही उसे निर्देश दिए कि ऑटो को घर के नजदीक नहीं लाना है. यहां से सिवरासन, धनु और सुबा ऑटो लेकर नलिनी के घर पहुंचे. सुबा ने नलिनी को उनकी मदद करने के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि ‘धनु आज राजीव गांधी को मारकर इतिहास बनाने जा रही है.’

लगभग पांच बजे सिवरासन के साथ ही ये तीनों महिलाएं पास के एक बस स्टॉप पर पहुंचीं. यहां हरी बाबू पहले से ही एक कैमरे और एक माला लिए मौजूद था. सभी पांचों लोग यहां से श्रीपेरंबदूर के लिए बस से रवाना हुए. लगभग 7.30 बजे ये लोग उस स्थान पर पहुंच गए जहां राजीव गांधी की सभा होनी थी. सिवरासन ने नलिनी को बताया कि उसे हर समय धनु और सुबा के साथ रहना है और इस बात का ध्यान रखना है कि कोई भी उन्हें उनकी श्रीलंकाई भाषा के कारण पहचान न ले. साथ ही उसने नलिनी को यह भी समझया कि हत्या के बाद वह सुबा को लेकर पास में बनी इंदिरा गांधी की मूर्ति के पास आ जाए और वहां दस मिनट तक उसका इंतजार करे. इसके बाद नलिनी, सुबा और धनु महिलाओं के लिए आरक्षित जगह पर बैठ गए.

राजीव गांधी के पहुंचने से कुछ समय पहले घोषणा हुई कि जो भी लोग उन्हें माला पहनाना चाहते हैं वे एक पंक्ति में खड़े हो जाएं. सिवरासन ने धनु को उसकी जगह से उठाया और उसे लेकर मंच के पास चला गया. वहां एक 14 साल की बच्ची और उसकी मां भी मौजूद थे. कोकिला नाम की यह बच्ची राजीव गांधी को हिंदी में एक कविता सुनाने वाली थी. हरी बाबू भी मंच के पास ही मौजूद था. वह एक पत्रकार के रूप में वहां मौजूद था. उसका काम था इस पूरे हत्याकांड की तस्वीरों को कैद करना. कुछ ही देर में राजीव गांधी वहां पहुंच गए. इस पर धनु ने सिवरासन और सुबा को वहां से हट जाने का इशारा कर दिया. राजीव गांधी कोकिला नाम की उस बच्ची से मिलने को रुके. कोकिला के लिए राजीव गांधी के चेहरे की वह मुस्कान उनकी जिंदगी की आखिरी मुस्कान थी. अगले ही पल एक धमाका हुआ और चारों तरफ सिर्फ लाशें, खून, चीख और आंसू पसर गए.

राजीव गांधी सहित कुल 18 लोगों की इस धमाके में मौत हो गई और कई लोग घायल हुए. धनु के साथ ही इस षड्यंत्र में शामिल हरी बाबू की भी मौत हो गई. हरी बाबू का काम फोटो खींचने का था. लिट्टे के हर ऑपरेशन की तस्वीरें और वीडियो बनाई जाती थी. ऐसा दो कारणों से होता था. पहला, लिट्टे के अन्य सदस्यों को इन तस्वीरों के आधार पर असल घटनाओं का उदाहरण देते हुए ट्रेनिंग देना. और दूसरा, जब ईलम अलग राष्ट्र बने तो इसके संघर्ष में जान गंवाने वाले क्रांतिकारियों के बारे में आने वाली पीढ़ियों को बताया जा सके. लेकिन लिट्टे की यही दूरगामी सोच इस मामले में उसके गले का फंदा बनी. हरी बाबू की लाश के साथ  पुलिस ने यह कैमरा बरामद किया जो इस षड्यंत्र को बेनकाब करने में सबसे अहम साबित हुआ.

हत्याकांड के तीन दिन बाद ही इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी गई. इसके बाद गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हुआ. एक महीने के भीतर ही नलिनी और मुरुगन जैसे मुख्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया. सिवरासन और सुबा सहित कई आरोपितों ने गिरफ्तारी से पहले ही आत्महत्या कर ली. सीबीआई ने पूरे एक साल में मामले की जांच पूरी की और विशेष न्यायालय में आरोपपत्र दाखिल कर दिया. इसमें कुल 41 लोगों को इस हत्याकांड का आरोपी बताया गया था. इनमें से 12 लोगों की मौत हो चुकी थी, तीन फरार थे और बाकी 26 गिरफ्तार कर लिए गए थे. फरार में प्रभाकरन, पोट्टू ओम्मान और अकीला शामिल थे.

इस हत्याकांड में एक पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस के प्रभावशाली नेता की मौत हुई थी. इसलिए इस हत्याकांड का राजनीतिक होना और इस हत्याकांड पर राजीनति होना दोनों ही स्वाभाविक थे. न्यायालय में चल रहे मामले के साथ ही हत्या के एक हफ्ते बाद ही एक जांच आयोग भी बना दिया गया था. जस्टिस वर्मा की अध्यक्षता वाले इस आयोग का काम था राजीव गांधी की सुरक्षा में हुई चूक की जांच करना. कुछ समय बाद ही जस्टिस वर्मा से इस हत्याकांड के पीछे के षड्यंत्र की भी जांच करने को कहा गया.उन्होंने यह जांच करने से इनकार कर दिया और अपनी जांच को सुरक्षा में हुई चूक तक ही सीमित रखने की बात कही. इसके बाद यह काम जस्टिस मिलाप चंद जैन को दिया गया. 23 अगस्त, 1991 को जैन आयोग का गठन हुआ. यह आयोग कई तरह के विवादों में घिरता रहा. कभी सीबीआई के दस्तावेजों की जांच को लेकर तो कभी न्यायालय की प्रक्रिया में बाधा बनने संबंधी सवाल जैन कमीशन पर लगतार होते रहे. जैन कमीशन तब सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना जब इसकी अंतरिम रिपोर्ट लीक हुई. इस रिपोर्ट में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री करुणानिधि की भी राजीव गांधी की हत्या में भूमिका होने की बात कही गई थी. रिपोर्ट में बताया गया था कि तमिलनाडु सरकार तब भी लिट्टे को पूरी तरह समर्थन कर रही थी जब भारत और श्रीलंका के बीच समझौता हो चुका था और भारतीय सेना लिट्टे के खिलाफ लड़ रही थी. रिपोर्ट के अनुसार करुणानिधि जब 1989 में मुख्यमंत्री बने तो इसके बाद प्रदेश में लिट्टे की हर अवैध गतिविधि को नजरअंदाज किया जाने लगा और लिट्टे की सक्रियता यहां काफी बढ़ गई. जैन रिपोर्ट में करुणानिधि पर सबसे गंभीर आरोप खुफिया विभाग की दो रिपोर्ट्स के आधार पर लगाए गए हैं. 1990 में लिट्टे ने मद्रास में एक तमिल संगठन के नेता पद्मनाभ और उसके 15 अन्य साथियों की हत्या कर दी थी. इन हत्याओं के नौ दिन बाद खुफिया  विभाग ने दो रिपोर्ट जमा की थी. इनमें से एक रिपोर्ट में बताया गया कि ‘मुख्यमंत्री नातेसन (एक लिट्टे नेता) को बता रहे हैं कि अपनी गतिविधियों और छिपने के ठिकानों की जानकारी पहले ही देते रहना ताकि पुलिस को ऐसी जगहों से दूर रखा जा सके.’ इसके साथ ही इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मुख्यमंत्री ने पद्मनाभ के गद्दार होने की बात भी कही थी. साथ ही जैन कमीशन की रिपोर्ट में तमिलनाडु के गृह सचिव का एक बयान भी है जो करुणानिधि पर गंभीर सवाल करता है. गृह सचिव नागराजन का बयान है, ‘पद्मनाभ की हत्या के बाद राज्य के डीजीपी ने मुझे बताया कि मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए हैं कि पुलिस को तब तक इस मामले में आरोपितों को ढूंढने में दिलचस्पी दिखाने की कोई जरूरत नहीं है जब तक मुख्यमंत्री लौटकर आगे के निर्देश नहीं देते.’ पद्मनाभ हत्याकांड इसलिए भी ज्यादा प्रासंगिक है क्योंकि इसे भी उन्हीं लोगों ने अंजाम दिया था जिन्होंने बाद में राजीव गांधी की हत्या की. जैन कमीशन ने राजीव गांधी हत्याकांड में सीबीआई द्वारा की गई जांच पर भी सवाल खड़े किए थे और कई मुद्दों पर पुनः जांच की बात कही थी. लेकिन जैन कमीशन पर यह भी आरोप लगते रहे हैं कि इसकी रिपोर्ट बहुत हद तक राजनीतिक रूप से प्रभावित थी और इस रिपोर्ट का लीक होना भी सुनियोजित था.

जैन कमीशन की रिपोर्ट पूरी होने तक न्यायालय की कार्रवाई भी पूरी हो चुकी थी. इस मामले को आतंकवादी प्रवृति का मानते हुए सभी आरोपितों पर टाडा कानून लागू किया गया था. इस कानून के अनुसार पुलिस के सामने दिया गया इकबालिया बयान भी न्यायालय में स्वीकार्य होता है. लिहाजा इन सभी आरोपितों के बयान इस मामले में बहुत अहम साबित हुए. इनके अलावा लगभग एक हजार गवाहों के लिखित बयान, 288 गवाहों से जिरह, 1477 दस्तावेजों जिनकी कुल संख्या 10000 से ज्यादा थी, 1,180 नमूनों एवं सबूतों और वकीलों के हजारों तर्कों के बाद विशेष न्यायालय ने सभी 26 दोषियों को हत्या और षड्यंत्र का दोषी पाया और सबको मौत की सजा सुना दी. विशेष न्यायालय के अनुसार यही इस मामले में न्याय था.

इस फैसले को चुनौती देने सभी आरोपित सर्वोच्च न्यायालय पहुंचे. यहां तीन जजों की बेंच को यह मामला सौंपा गया. विशेष न्यायालय के फैसले के एक साल बाद ही इस मामले में न्याय की परिभाषा पूरी तरह से बदल गई. सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि विशेष अदालत का फैसला न्याय नहीं बल्कि ‘न्यायिक नरसंहार’ है. देश की सबसे बड़ी अदालत ने 1999 में इन 26 में से 19 लोगों को रिहा कर दिया. कोर्ट ने इन सभी को हत्या और षड्यंत्र का दोषी नहीं माना और कहा कि जो अपराध इन पर बनते थे उनकी सजा ये लोग आठ साल जेल में रह कर पूरी कर चुके हैं. तीन अन्य आरोपितों के अपराध को भी कम गंभीर पाते हुए न्यायालय ने उनकी फांसी को आजीवन कारावास में बदल दिया. नलिनी, मुरुगन, संथन और पेरारिवलन के अपराध को ही कोर्ट ने अक्षम्य मानते हुए फांसी की सजा सुनाई. इस फैसले में एक जज रहे जस्टिस थॉमस नलिनी की फांसी को माफ करने पक्ष में थे. लेकिन दो-एक के बहुमत से उसकी फांसी बरक़रार रही.
गिरफ्तार होने के कुछ महीनों बाद ही नलिनी की एक बेटी हुई थी. यह बेटी काफी समय तक जेल में उसके साथ ही रही. जस्टिस थॉमस द्वारा नलिनी की फांसी माफ करने का एक कारण यह भी था कि उसकी एक छोटी बेटी थी और  यदि मुरुगन और नलिनी दोनों को फांसी होती तो यह बच्ची अनाथ हो जाती. सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद सोनिया गांधी व्यक्तिगत तौर पर राष्ट्रपति से मिलीं और उनसे नलिनी की फांसी माफ करने की अपील की. साल 2000 में दया याचिका को मंजूर करते हुए नलिनी की फांसी माफ कर दी गई. जेल से बाहर रहते हुए नलिनी ने राजीव गांधी की हत्या की कुख्याति प्राप्त की तो जेल में रहते हुए एक कीर्तिमान भी अपने नाम किया. वह जेल में रहते हुए एमसीए की पढ़ाई पूरी करने वाली पहली भारतीय बन गई है. यह भी एक संयोग ही है कि उसे अपनी यह डिग्री ‘इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय’ से मिली है.

नलिनी की फांसी माफ होने के बाद इस मामले में तीन ही आरोपित फांसी की राह पर रह गए थे. इन्होने राष्ट्रपति के सामने 2000 में दया याचिका दाखिल की. इस दया याचिका पर 11 साल बाद फैसला लिया गया. भारतीय इतिहास में सबसे ज्यादा फांसियां माफ करने वाली राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने इनकी फांसी को माफ नहीं किया. उन्हें इन तीन आरोपितों को मौत की सजा देना ही न्याय लगा. 2011 में राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका खारिज हो जाने के बाद इन तीनों आरोपितों को फांसी देने के लिए नौ सितंबर 2011 का दिन तय किया गया. लेकिन अब मद्रास उच्च न्यायालय ने इसे अन्याय माना और इस पर रोक लगा दी. मामला एक बार फिर से सर्वोच्च न्यायलय में पहुंच गया. फरवरी 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह माना कि अब फांसी देना सही नहीं है क्योंकि इनकी दया याचिका को 11 साल तक लंबित रखा गया था. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इन तीन आखिरी आरोपितों की भी फांसी माफ कर दी गई. इस फैसले के अगले ही दिन तमिलनाडु सरकार ने जेल में कैद सभी सात आरोपितों को रिहा करने की घोषणा भी कर दी. लेकिन केंद्र सरकार ने इसका विरोध किया और यह मामला फिर से न्याय तलाशता हुआ सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया.

न्याय की किताबी परिभाषाओं से इतर यदि व्यावहारिकता देखी जाए तो न्यायालय का फैसला ही न्याय माना जाता है. इस तरह से 18 लोगों की हत्या के इस मामले में जो भी और जब भी हुआ न्याय ही हुआ है. 26 लोगों को फांसी होना भी न्याय था, 19 लोगों का बरी होना भी न्याय था, चार लोगों को फांसी होना भी न्याय था और सबकी फांसी माफ होना भी न्याय था. अब बाकी सात लोगों पर फैसला चाहे रिहाई का आए या आजीवन कारावास का, जो भी फैसला होगा वह न्याय ही होगा.

किलों के प्यार ने जिसे भारतीय बना दिया था

imgफ्रांसिस का जन्म एक पुर्तगाली जहाज पर हुआ जो उनके परिवार को फ्रांस से क्यूबा ले जा रहा था. साढ़े चार साल क्यूबा में रहने के बाद फ्रांसिस का परिवार वापस फ्रांस चला गया और दो साल बाद मोरक्को. मोरक्को में आठ साल रहने के बाद, जहां फ्रांसिस ने स्कूली शिक्षा हासिल की, उनका परिवार वापस फ्रांस आकर बस गया जहां उन्होंने कॉलेज और एमबीए किया. फिर आगे की पढ़ाई के लिए वे एक साल ब्रिटेन में रहे. इसके बाद फ्रांस का नागरिक होने के नाते एक साल की अनिवार्य मिलिट्री ट्रेनिंग के लिए जर्मनी भेजे गए. अगले दो साल मैक्सिको और ब्राजील में गुजारने के बाद उन्होंने भारत का रुख किया. पिछले 41 साल से फ्रांसिस यहीं रह रहे थे.
तहलका ने कुछ समय पहले उनसे मुलाकात की थी. खुद को आखिरी समय तक वामपंथी मानने वाले फ्रांसिस पहली बार भारत 1969 में एक कट्टर वामपंथी पत्रकार दोस्त के साथ आए जो नक्सलबाड़ी आंदोलन कवर करना चाहता था. ये दोनों कई वामपंथी नेताओं से मिले जिनमें ईएमएस नंबूदिरीपाद  (केरल और देश की पहली वामपंथी सरकार के मुख्यमंत्री) भी थे. तहलका से बात करते हुए उनका कहना था, ‘नंबूदिरीपाद बेहद अच्छे इंसान थे, खुले विचारों के और सीधा बोलने वाले. काफी संपन्न और रुढ़िवादी परिवार से होने के बाद भी उन्होंने अपना सब-कुछ छोड़ कर लोगों के लिए काम किया.’ लेकिन बाद में फ्रांसिस नंबूदिरीपाद की विचारधारा के विरोधी हो गए.उनका कहना था, ‘तब मैं सिर्फ 26 का था. उस उम्र में समाज को बदलने और चीजों को सुधारने को लेकर आप ज्यादा उत्साहित रहते हैं. लेकिन आज जब पलट कर देखता हूं तो काफी मुद्दों पर उनका नजरिया सही नहीं लगता.’ उसी दौरान वे फ्रांसिस मृणाल सेन और सत्यजीत रे के भी करीब आए. उस दौर की नई धारा के सिनेमा के आंदोलन में भी शामिल हुए और श्याम बेनेगल, कुमार साहनी, मणि कौल जैसे दिग्गजों के साथ काम भी किया.

दूसरी तरफ पत्रकार दोस्त यहां वामपंथ की हालत से नाराज एक महीने में ही वापस लौट गया मगर फ्रांसिस अगले तीन महीनों के लिए यहीं रुक गए. उन्हें भारत से प्यार हो गया था. कुछ लव एट फस्ट साइट जैसा. उन्होंने ट्रेन के थर्ड क्लास डिब्बे से लेकर लोकल बसों में सफर किया. इस देश के आम लोगों को करीब से जाना और उनसे खूब बातचीत की. लोगों के साथ यह संपर्क ही वह चीज थी जिसकी तरफ फ्रांसिस सबसे ज्यादा आकर्षित हुए. मगर उन्होंने हमेशा के लिए भारत में रुकने का फैसला कर्नाटक में एक गरीब जुलाहों के गांव में कुछ हफ्ते बिताने के बाद लिया. बकौल फ्रांसिस, ‘उस गांव की जगह अगर दिल्ली या मुंबई में वह वक्त गुजारता तो शायद मैं यहां रहने का फैसला नहीं करता. वह भारत के साथ मेरे लव अफेयर की शुरुआत थी.’

इसके बाद फ्रांसिस ने मुंबई स्थित फ्रांस के वाणिज्य दूतावास में सहायक वाणिज्य आयुक्त की नौकरी कर ली. वहीं फ्रांसिस के घरवालों ने उनके फैसले का समर्थन तो किया मगर चिंता भी जताई. दरअसल 1970 के उस दौर में बाहर देशों में भारत की पहचान गाय, फकीर, गरीबी और गंदगी के तौर पर ही थी.

कुछ साल बाद 1977 में फ्रांसिस शेखावटी के भित्तिचित्रों पर अपने दोस्त अमरनाथ के साथ मिलकर लिखी जा रही एक किताब के सिलसिले में राजस्थान के सीकर और झुंझुनू जिलों में गए. यहां शोध के दौरान उन्होंने पहली बार नीमराना किले को देखा जो पिछले 40 सालों से खंडहर था. इस किले के बारे में फ्रांसिस का कहना था ‘उस किले को देख कर हमें उससे इस कदर प्यार हो गया कि हमने 1986 में वहां के महाराजा से उसे सात लाख में खरीद लिया. उस समय हमें नहीं पता था कि हम इसे होटल में तब्दील करेंगे. लेकिन बाद में जब हमने कुछ कमरों का नवीनीकरण कर अपने दोस्तों को दिखाया तो उन लोगों ने इसे इतना पसंद किया कि वे यहां रहने चले आए. हम लोगों को पता चलता उससे पहले ही नीमराना किला एक होटल बन चुका था.’

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नीमराना किला जिसे नवीनीकरण करने के बाद होटल में बदल दिया गया.

नीमराना होटलों की श्रृंखला के तहत अब तक 26 पुराने महलों, किलों और इमारतों का नवीनीकरण कर उन्हें हेरीटेज होटलों में तब्दील किया जा चुका है. नीमराना के हर होटल में वहां की स्थानीय संस्कृति को तरजीह दी जाती है और शिल्पकृतियां और फर्नीचर भी स्थानीय होते हैं. यहां नामचीन कालेजों से प्रोफेशनल नहीं लिए जाते और एमबीए डिग्री वाले भी कम ही हैं. हर होटल में उस जगह के स्थानीय लोगों को नौकरी दी जाती है. फ्रांसिस ने ऐसा जानबूझकर किया था. उनके मुताबिक वे दो चीजों के प्रति प्रतिबद्ध थे, स्थानीय लोगों को मौका देने और धरोहरों का संरक्षण करने के लिए.

दूसरे लोगों को यह जानकर ताज्जुब होगा कि उनके कई होटलों में ऐसे लोग काम करते हैं जो शुरू में उनके लिए पत्थर काटा करते थे या दीवारों का निर्माण करते थे. वे लोग आज वेटर, कैप्टन से लेकर मैनेजर तक हैं. इस अपरंपरागत सोच की एक वजह शायद यह भी है कि खुद फ्रांसिस कभी व्यवसायी नहीं रहे. उनके दोस्त भी ऐसे ही थे जिनमें किसी के पास होटल मैनेजमेंट की डिग्रियां नहीं थीं.

नीमराना के ज्यादातर होटलों का नवीनीकरण पुराने परंपरागत तरीकों से होता है. यह काम उन मिस्त्री और कारपेंटरों का है जो पुरानी विधा में पारंगत होने की वजह से आज भी झरोखे, वृत्ताकार छत वगैरह बनाने में माहिर हैं. ये लोग चूना और पत्थर से दीवारें बनाते हैं और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करने से बचते हैं. यह जानकर किसी को भी हैरत हो सकती है कि फ्रांसिस ने नीमराना होटलों के निर्माण में जिस चूने का उपयोग किया उसकी पिसाई का काम ऊंटों द्वारा ही हुआ था. फ्रांसिस का कहना था, ‘ आपको ज्यादातर नीमराना होटलों के कमरों में न टीवी मिलेगा न टेलीफोन. साथ ही रूम सर्विस का भी प्रावधान नहीं है. इसलिए शुरुआत में हमारे होटलों में भारतीय कम ही आते थे क्योंकि उन्हें ज्यादा आवभगत की आदत होती है लेकिन धीरे-धीरे लोगों को हमारा फलसफा समझ आने लगा और अब हमारे यहां आनेवालों में ज्यादातर भारतीय ही हैं.’

अगर रूपक में बात करें तो फ्रांसिस नावों के एक ऐसे समूह का हिस्सा रहे जो कई देशों की संस्कृति, पहचान, भाषा, खान-पान, पहनावे के बीच तैरते रहे. लेकिन बकौल फ्रांसिस, ‘मेरे अंदर पहचान को लेकर कोई द्वंद नहीं रहा. मैं दो संस्कृतियों के बीच में बैठा हूं और देखने वाले को यह तकलीफदेह लग सकता है लेकिन मुझे इस तरह जीने में बहुत मजा आता है.’ उनका भारतीय नागरिकता लेने का अनुभव भी कम रोचक नहीं है. उन्होंने 1984 में भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन दिया था और छह साल बाद 1990 में फ्रांसिस को यहां नागरिकता मिली. उस साल 31 दिसंबर की शाम को उन्होंने संविधान की शपथ ली और उसके अगले दिन नए साल वे भारतीय नागरिक बन गए. पिछले 21 साल से भारत में वोट कर रहे फ्रांसिस के लिए भारतीय नागरिकता लेने का फैसला व्यवहारिक या बिजनेस से जुड़ा न होकर भावनात्मक ज्यादा था. उनका कहना था, ‘मैं बहुत गहराई तक भारतीय संस्कृति से जुड़ा हुआ हूं. काफी लंबे अरसे से मैं यहां रह रहा हूं. मेरे साथ अक्सर होता है कि विदेश से भारत लौटने पर जब मैं एयरपोर्ट पर भारतीय नागरिकों वाली कतार में खड़ा होता हूं तो लोग मुझे टोकते हैं कि मैं गलत कतार में हूं. तब मैं उन्हें बताता हूं कि नहीं, मैं सही जगह खड़ा हूं. और ऐसा करते वक्त मुझे बहुत खुशी होती है.’

‘दस हजार में टाइपिस्ट तक नहीं मिलेगा’

मनीषा यादव
मनीषा यादव
मनीषा यादव

दिल्ली में सऊदी अरब के दूतावास में स्थायी हिंदी अनुवादक की जरूरत थी. मेरे पास कॉल आई. उस वक्त जिंदगी बुरी तरह से बेपटरी थी. जेब में गिनती के पैसे थे, करने को काम नहीं और रहने को घर नहीं वाली नौबत थी. मैं किसी चमत्कार के इंतजार में था. कॉल आई तो दिल बाग़-बाग़ हो गया. उम्मीद कमाल की चीज होती है. यह आती है और सारी उदासी हवा हो जाती है, खासकर तब जब आप बेहद बुरे दौर से गुजर रहे हों. जिस दिन कॉल आई उसी दिन मैं भोपाल पहुंचा था. एक दोस्त के पास दस-पंद्रह दिन गुजारने का दिल था ताकि कुछ दिन तमाम उलझनों से दूर रहूं. स्टेशन के पास ही दो सौ रुपये में किराए पर कमरा लिया था, जहां मेरा दोस्त मुझे शाम को मिलता और फिर मैं उसके साथ हो लेता. पर किस्मत कहीं और ही ले जाना चाहती थी.

कॉल आने के बाद तो मैं जैसे खुशी से पागल हो गया था क्योंकि मुझे हमेशा यकीन रहता था कि अगर इंटरव्यू तय हो गया है तो नौकरी तो पक्की है. बहरहाल मैंने अपने दोस्त को कॉल करके आने से मना किया और रात की ट्रेन पकड़कर वापस दिल्ली चला आया.

जेब लगभग खाली थी. जेएनयू में दोस्तों के कमरे ही अपना आशियाना थे. वहीं एक दोस्त के पास पहुंचा. नहा-धोकर तैयार हुआ और वसंत विहार में स्थित दूतावास के लिए रवाना हुआ. लगातार सोलह घंटों के सफर के बाद, बिना आराम किए मैं इंटरव्यू के लिए निकल चुका था पर थकान जैसी कोई चीज महसूस नहीं हो रही थी.

मेरे सामने दूतावास का आलीशान भवन था. कला और शिल्प की सैकड़ों निशानियां भवन के बाहर से देखी जा सकती थी. अच्छी तरह तस्दीक कर लेने के बाद सुरक्षाकर्मी ने मुझे अंदर जाने की इजाजत दी. अंदर मौजूद एक-एक चीज मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रही थी. चाहे वो फर्श पर बिछी कालीन हो, या रिसेप्शन पर लगी मेज और कुर्सियां, गमले की नक्काशी हो या झूमर की साइज! लग रहा था जैसे किसी दूसरी दुनिया में पहुंच गया हूं. ये शान-ओ-शौकत देखकर मैंने मन ही मन यह विचार करना शुरू कर दिया था कि कितनी तनख्वाह मांगनी है. मुझे दूतावास में पदस्थ संस्कृति विभाग के मुखिया से मिलना था. उनका नाम अरबी लफ्जों से बना था.

इन साहब का दफ्तर बेडरूम की औसतन साइज का तीन गुना तो बेशक था. उन्होंने मुझे भी सामने वाली कुर्सी पर बैठने का इशारा किया. हिंदी उन्हें आती नहीं थी सो अंग्रेजी में बातचीत शुरू हुई. साहब का पहला सवाल कुछ यूं था- तो राहुल, तुम्हें पता है, तुम यहां क्यों हो? उस आलीशान भवन का असर मुझ पर कुछ ऐसा हुआ था कि मुझे वो साधारण-सा सवाल भी बड़ा दार्शनिक-सा लगा. हालांकि मुझे दार्शनिक जवाब सूझा नहीं- बतौर हिंदी अनुवादक काम करने के लिए. इसके बाद मेरे अनुभवों और शैक्षणिक डिग्रियों पर बात हुई. फिर टेस्ट लिया गया, जिसमें मैं अच्छे नंबर से पास हो गया.

इस बीच यह बताना जरूरी है कि डॉक्टर साहब की अंग्रेजी भी थोड़ी अरबी टोन में थी तो कई बार मुझे उन्हें समझने में भारी मशक्कत करनी पड़ती. इसी टोन में उन्होंने मुझे बताया, तुम्हारी नौकरी पक्की है, तुम्हारी तनख्वाह इतनी है और तुम आज से ही काम शुरू कर दो. मैंने सब कुछ सुना पर तनख्वाह समझने में फेर हुई.

मुझे एचआर के पास ले जाया गया जो भारतीय थे और उन्हें हिंदी आती थी. उन्होंने दस्तखत करने के लिए मेरी और कागजात बढ़ाया तो उस पर तनख्वाह थी दस-हजार रुपये प्रति माह. मेरे तो पैर के नीचे से जमीन खिसक गई. ‘ये तो भारत के प्रकाशकों और सरकारी विभागों से भी गए गुजरे निकले’, मैंने मन ही मन सोचा. ‘दस हजार… सच में’, मुझे यकीन नहीं हो रहा था. मैंने एचआर को कहा कि दस्तखत करने से पहले मैं डॉक्टर साहब से एक बार और मिलना चाहता हूं.

साहब ने कहा, ‘राहुल, मैंने तो तुम्हें पहले ही तनख्वाह बता दी थी और तुमने हामी भी भर दी थी.’ मैंने कहा, ‘सर, आप वाकई दस हजार ऑफर कर रहे थे?’ जवाब आया- हां. मैंने कहा, ‘सर, इतने में आपको हिंदी टाइपिस्ट भी नहीं मिलेगा, अनुवादक तो भूल ही जाइए.’ फिर याद आया, यहां रहकर भी किसी और ही दुनिया में रहने वाले यही तो लोग हैं जिन्हें खाने और रहने के लिए कभी अपने बटुए का इस्तेमाल नहीं करना पड़ता. इन्हें लगता है दुनिया अब भी वहीं अटकी है जहां पांच और दस रुपये में पेट भर खाना मिल जाता है और जहां दस हजार हैंडसम अमाउंट है. मैं वहां से निकल पड़ा- खुद पर हंसते और झल्लाते हुए.

(लेखक मीडिया से जुड़े हैं और मुंबई में रहते हैं.)