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मोदी की राह में, मोदी की चाह में

Amit-Shahनरेंद्र मोदी देश की बागडोर अपने हाथों में लेने के लिए किस कदर बेताब हैं इसकी जानकारी लगभग सभी को है. लेकिन मोदी के अलावा कोई और भी है जो उनके सर पर प्रधानमंत्री का ताज देखने के लिए उतना ही बेताब है. इसके लिए वह दिन-रात एक किए हुए है. यह व्यक्ति अपने ‘साहब’ के गांधीनगर से सात आरसीआर तक के रास्ते में मौजूद हर अड़चन, हर ठोकर को हटाने की जी-जान से कोशिश कर रहा है. मोदी के इस विश्वासपात्र का नाम है अमित अनिलचंद्र शाह. शाह, नरेंद्र मोदी के हनुमान कहे जाते हैं, उनके लिए मोदी भगवान से कम नहीं हैं और वे भी शाह पर ही सबसे अधिक भरोसा करते हैं.

पार्टी महासचिव अमित शाह वर्तमान में उत्तर प्रदेश में भाजपा के चुनाव प्रभारी हैं. भाजपा को पता है कि अगर पिछले 10 साल का संन्यास खत्म करना है तो उत्तर प्रदेश में उसे चमत्कार करना ही होगा. देश को सबसे अधिक सांसद और अब तक सबसे अधिक प्रधानमंत्री देने वाले उसी उत्तर प्रदेश में शाह अपने साहब और भाजपा की जीत सुनिश्चित करने में लगे हुए हैं. Read More>>

 


Mayawati

ईमां मुझे रोके है तो खेंचे है मुझे कुफ्र, 
काबा मेरे पीछे है, कलीसा मेरे आगे

गालिब का यह शेर मायावती और उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक तबके मुस्लिम समुदाय के लिए भी फिलहाल बेहद मौजूं है. उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक स्थिति ऊपरी तौर पर मायावती और मोदी के लिए सबसे मुफीद दिख रही है. लेकिन बसपा के नजरिये से इसमें अभी कुछ ऐसे छोटे-छोटे छेद हैं जिन्हें बंद किया जाना जरूरी है. यदि मुफीद हालात को सीटों में तब्दील करना है तो इन छोटे-छोटे कामों को करने का यह आखिरी समय है. बसपा के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक बहनजी हर कसर को पूरी करने में चुपचाप लगी हुई हैं. जानकारों की मानें तो मायावती की कोशिश बदसूरत पैबंद लगाने की नहीं बल्कि बारीक रफू करने की है. हाल के कुछ दिनों में बसपा सुप्रीमो ने उन तमाम गलतियों को दूर करने के कई दूरगामी उपाय किए हैं जो अतीत में उनसे जाने-अनजाने हुईं.

बसपा का मानना है कि अगर उनका 2007 वाला सर्वजन फार्मूला बना रहे और मुजफ्फरनगर के बाद पैदा हुए हालात में मुसलमान भी उसके साथ जुड़ जाए तो उत्तर प्रदेश में एक ऐसा जातिगत गठजोड़ खड़ा हो जाएगा जिसके आगे सारे समीकरण धराशायी हो जाएंगे. लेकिन जहां मुसलमान के उनसे जुड़ने की बारी आई वहीं उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण समुदाय को मोदी की हवा लगने के हालात भी बनने लगे हैं. इसके इतर अतिपिछड़ी जातियों का जो कुनबा कभी कांशीराम ने जोड़ा था वह भी उनके जाने के बाद कुछ कमजोर हो गया है. लेकिन पिछले कुछ महीनों के दौरान उन्होंने इस दिशा में जो काम किए हैं उनसे ऐसा माहौल जरूर बना है जिसमें सिर्फ बसपा ही अपने पिछले प्रदर्शन को या तो सुधारते हुए दिखती है या फिर पिछले प्रदर्शन को कायम रखने की स्थिति में है. Read More>>

मायावती: मोदी की राह में

सुधार और विचार हो- हल्ले से दूर चुपचाप लोकसभा चुनाव की तैयारी में लगीं मायावती
सुधार और विचार हो- हल्ले से दूर चुपचाप लोकसभा चुनाव की तैयारी में लगीं मायावती
सुधार और विचार हो-हल्ले से दूर चुपचाप लोकसभा चुनाव की तैयारी में लगीं मायावती

ईमां मुझे रोके है तो खेंचे है मुझे कुफ्र, 
काबा मेरे पीछे है, कलीसा मेरे आगे

गालिब का यह शेर मायावती और उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक तबके मुस्लिम समुदाय के लिए भी फिलहाल बेहद मौजूं है. उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक स्थिति ऊपरी तौर पर मायावती और मोदी के लिए सबसे मुफीद दिख रही है. लेकिन बसपा के नजरिये से इसमें अभी कुछ ऐसे छोटे-छोटे छेद हैं जिन्हें बंद किया जाना जरूरी है. यदि मुफीद हालात को सीटों में तब्दील करना है तो इन छोटे-छोटे कामों को करने का यह आखिरी समय है. बसपा के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक बहनजी हर कसर को पूरी करने में चुपचाप लगी हुई हैं. जानकारों की मानें तो मायावती की कोशिश बदसूरत पैबंद लगाने की नहीं बल्कि बारीक रफू करने की है. हाल के कुछ दिनों में बसपा सुप्रीमो ने उन तमाम गलतियों को दूर करने के कई दूरगामी उपाय किए हैं जो अतीत में उनसे जाने-अनजाने हुईं.

बसपा का मानना है कि अगर उनका 2007 वाला सर्वजन फार्मूला बना रहे और मुजफ्फरनगर के बाद पैदा हुए हालात में मुसलमान भी उसके साथ जुड़ जाए तो उत्तर प्रदेश में एक ऐसा जातिगत गठजोड़ खड़ा हो जाएगा जिसके आगे सारे समीकरण धराशायी हो जाएंगे. लेकिन जहां मुसलमान के उनसे जुड़ने की बारी आई वहीं उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण समुदाय को मोदी की हवा लगने के हालात भी बनने लगे हैं. इसके इतर अतिपिछड़ी जातियों का जो कुनबा कभी कांशीराम ने जोड़ा था वह भी उनके जाने के बाद कुछ कमजोर हो गया है. लेकिन पिछले कुछ महीनों के दौरान उन्होंने इस दिशा में जो काम किए हैं उनसे ऐसा माहौल जरूर बना है जिसमें सिर्फ बसपा ही अपने पिछले प्रदर्शन को या तो सुधारते हुए दिखती है या फिर पिछले प्रदर्शन को कायम रखने की स्थिति में है.

जैसा कि ऊपर लिखी बातों से भी स्पष्ट है इस समय मायावती के सामने तीन तात्कालिक चुनौतियां हैं. यदि समय रहते वे इनसे निपट लेती हैं तो एक बात आसानी से कही जा सकती है कि भाजपा के अलावा अकेली बसपा ही होगी जो 2009 के अपने आंकड़े में सुधार करेगी. बसपा की पहली चुनौती है ब्राह्मणों के भाजपा प्रेम को नियंत्रित करने की, दूसरी दलितों को मोदी लहर से बचाकर दलित पहचान पर कायम रखने की और तीसरी मुसलमानों के मन से अपने पुराने भाजपा से प्रेम वाले अतीत से जुड़ी आशंकाएं खत्म करने की. जब पूरे प्रदेश में भाजपा और सपा एक-दूसरे की टक्कर में रैली पर रैली करने में लगे हुए हैं, उसी दौरान मायावती ने अंदरखाने में ऐसे कई तमाम सुधारवादी कदम उठाए हैं जिनके चुनावी प्रभाव को लेकर कयासों और अटकलों की शुरुआत हो गई है.

मुसलमान
कहा जा सकता है कि इस तबके को अपने साथ जोड़ने के लिए पिछले कुछ दिनों में बसपा ने सबसे अधिक काम किया है. 2012 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनाने में बहुत बड़ा योगदान मुस्लिम समुदाय का था. लेकिन इन दो सालों के दौरान जो हालात उत्तर प्रदेश में रहे हैं उनमें सबसे ज्यादा मोहभंग भी इसी समुदाय का हुआ है. प्रदेश में छोटे-बड़े करीब 100 दंगे सपा के दो साल के शासन में हुए हैं. पिछले साल अक्टूबर महीने में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों के बाद स्थितियां पूरी तरह से सपा के हाथ से निकल गई लगती हैं. वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू बताते हैं, ‘सपा के साथ मुसलमानों की पैदा हुई दूरी का फायदा उठाने के लिए मायावती ने कई उपाय किए हैं. उन्होंनेे जामा मस्जिद के शाही इमाम अब्दुल्ला बुखारी को अपने साथ जोड़ा है. बुखारी का बयान आया है कि वे उत्तर प्रदेश और पूरे देश में बसपा के साथ मिलकर दलित-मुस्लिम गठजोड़ खड़ा करने का प्रयास अगले चुनाव में करेंगे. उन्होंने मुसलमानों से बसपा के पक्ष में वोट डालने की अपील भी की है. इसका कोई तार्किक महत्व भले ही न हो लेकिन पिछड़े मुस्लिम समाज में इसके जरिए एक राजनीतिक संदेश जरूर पहुंच जाता है.’

मुसलमानों को करीब लाने की गंभीर कोशिशों की बाबत बसपा के वरिष्ठ नेता और नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य का कहना है, ‘अब्दुल्ला बु्खारी एक बड़े मजहबी नेता हैं. उनकी अपने समुदाय पर जबरदस्त पकड़ है. जिस तरह से सपा और भाजपा ने पिछले एक साल के दौरान आपस में मिलकर पूरे प्रदेश को सांप्रदायिकता की आग में धकेला है, उससे इस प्रदेश के अल्पसंख्यकों में भारी नाराजगी है. बुखारी साहब ने इन दोनों को सबक सिखाने के लिए यह सकारात्मक कदम उठाया है.’

मुस्लिम समुदाय के साथ बसपा के प्रगाढ़ होते रिश्तों की दिशा में एक और पहल जमीयत-उलमा-ए-हिंद के मुखिया महमूद मदनी ने भी की है. उन्होंने बसपा के मुस्लिम सांसद सलीम अंसारी के साथ मुलाकात करके आगामी चुनाव में जमात का समर्थन बसपा को देने की इच्छा जताई है. इस दिशा में बात आगे बढ़ चुकी है, किसी भी दिन महमूद मदनी की मुलाकात बसपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ हो सकती है.

पूरे प्रदेश में जब सपा और भाजपा लोकसभा के चुनाव को अपने बीच का मामला दिखाने की कोशिश में हैं तब बसपा की तरफ से चुपचाप एक ऐसा काम किया गया जिसका जवाब चुनाव प्रबंधन के महारथी मुलायम सिंह के पास भी फिलहाल नहीं है. बसपा के लोकसभा उम्मीदवारों की संभावित सूची में कुल 18 मुस्लिम हैं. यह संख्या सपा के 14 उम्मीदवारों से चार ज्यादा है. हालांकि बसपा ने अभी अपने उम्मीदवारों की औपचारिक घोषणा नहीं की है. लेकिन जैसा कि स्वामी प्रसाद मौर्य बताते हैं, ‘हमारे उम्मीदवार तो डेढ़ साल पहले से ही तय हैं और उन्हें चुनावी तैयारी करने का इशारा भी दिया जा चुका है. इसमें कोई फेरबदल नहीं होगा.’ इनमें से लगभग आठ मुस्लिम उम्मीदवार मुजफ्फरनगर और उसके आस-पास की सीटों से चुनाव लड़ेंगे. एक नजरिये से यह बसपा का मुसलमानों को लुभाने का अतिउत्साही कदम भी माना जा सकता है. राजनीतिक विश्लेषक हेमंत तिवारी के शब्दों में यह काउंटर प्रोडक्टिव भी हो सकता है. यानी कि बसपा को इसका नुकसान भी हो सकता है.

लेकिन फिलहाल बसपा इसे बड़ी समस्या नहीं मान रही है. मुस्लिम समुदाय को विश्वास में लेने और उनके साथ दीर्घकालिक रिश्ते बनाने की दिशा में पार्टी ने अपने राज्यसभा सांसद मुनकाद अली को पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभारी भी नियुक्त किया है. इन उपायों के साथ एक और सच्चाई यह भी है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसपा का पलड़ा हमेशा सपा पर भारी ही रहा है. हेमंत तिवारी बताते हैं, ‘पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमानों का एकमुश्त वोट बसपा को मिलेगा और अगर मायावती ने कोई बड़ा हेर-फेर नहीं किया तो प्रदेश के दूसरे हिस्सों में भी उन्हें मुसलमानों का अच्छा समर्थन मिल सकता है. बसपा के 70 फीसद प्रत्याशी अपने-अपने क्षेत्रों में पिछले डेढ़ साल से काम कर रहे हैं, जबकि सपा ने हाल ही में अपने 77 में से 39 उम्मीदवारों को बदल दिया है. इससे सपा में जबरदस्त भितरघात होगी.’

मायावती को अपने लिए उम्मीद की एक किरण 2009 के लोकसभा चुनाव से भी मिल रही है. उस साल के आम चुनावों में हालांकि बसपा कोई खास प्रदर्शन नहीं कर पाई थी. उसे कुल 2० लोकसभा सीटें प्राप्त हुई थीं. पर इन 20 में से उसके पास चार मुसलमान सांसद थे, जबकि मुसलमानों के मसीहा के रूप मे स्थापित मुलायम सिंह का एक भी मुसलमान प्रत्याशी उन चुनावों में जीत नहीं सका था. उस वक्त बसपा के कुल 47 उम्मीदवार बेहद कम अंतरों से चुनाव हारे थे. आंकड़ों को थोड़ा और खंगालने पर कुछ नई सच्चाइयां सामने आती हैं. उत्तर प्रदेश में करीब 18 फीसदी मुस्लिम आबादी है. 23 फीसदी के करीब दलित आबादी है. इस लिहाज से देखा जाए तो अगर मायावती केवल दलित-मुस्लिम गठजोड़ ही खड़ा कर पाती हैं तो उन्हेंे हरा पाना किसी भी सियासी दल के लिए लगभग असंभव होगा. राजनीतिक टिप्पणीकार और बीबीसी के पूर्व पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, ‘अगर बसपा दलित-मुस्लिम गठजोड़ खड़ा कर ले तो वह हमेशा के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति पर कब्जा कर लेगी और राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित करने की हालत में होगी. पर यह मुश्किल काम है क्योंकि इसके आड़े मायावती का अपना अतीत आता है जो मुसलमानों को बताता है कि वे बार-बार भाजपा के साथ आती-जाती रही हैं.’

मायावती ने दिल्ली गमन की इच्छा अपनी रैली में सार्वजनिक रूप से जता दी है. फोटो: प्रमोद अधिकारी

यह जो समस्या मायावती के आड़े आ रही है उससे निपटने की गंभीर कोशिशें उन्होंने हाल के दिनों में की हैं. 15 जनवरी को लखनऊ स्थित रमाबाई रैली स्थल पर आयोजित बसपा की विशाल रैली में मायावती ने एलान किया कि वे चुनावों के बाद न तो भाजपा के साथ जाएंगी न ही कांग्रेस के साथ. उनके लिए एक नागनाथ है तो दूसरा सांपनाथ. राजनीतिक विश्लेषक उनके इस बयान के दो निष्कर्ष निकालते हैं. एक तो वे उस मुसलमान को साफ संदेश देना चाह रही हैं जिसके मन में उनके भाजपा से जुड़ाव को लेकर थोड़ी-बहुत आशंका है. राजनीतिक टिप्पणीकार और मायावती की जीवनी बहन जी के लेखक अजय बोस कहते हैं, ‘मुसलमान इस समय चुप है क्योंकि वह सपा को सबक सिखाना चाहता है. वह सपा को दुविधा में रखकर आखिरी वक्त में मायावती को वोट करेगा.’

इसके अलावा उन्होंने कांग्रेस से दूरी बनाकर पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ जो हवा है उससे हो सकने वाले किसी भी नुकसान की संभावना को खत्म करने की कोशिश की है. जनवरी से पहले इस बात की खूब अटकलें लग रही थीं कि कांग्रेस-बसपा के बीच लोकसभा चुनाव से पहले गठबंधन हो सकता है. केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने इस संभावना से जुड़ा एक चर्चित बयान भी दिया था, ‘उत्तर प्रदेश और देश भर में सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए कांग्रेस और बसपा को साथ आना चाहिए. अगर यह गठजोड़ हो जाता है तो लोकसभा चुनाव में बाकी सभी पार्टियों का पत्ता साफ हो जाएगा.’ बेनी बाबू की यह इच्छा धरी की धरी रह गई. इसी तरह की बेरुखी मायावती ने मोदी या भाजपा के प्रति नरमी दिखाने वालों के साथ भी दिखाई है. कुछ महीने पहले राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बुंदेलखंड क्षेत्र से बसपा सांसद विजय बहादुर सिंह ने मोदी की तारीफ कर दी थी. मायावती ने उन्हें अगले ही दिन पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. यानी मुसलमानों के मन में विश्वास बढ़ाने का वे कोई मौका छोड़ नहीं रही हैं.

ब्राह्मण
2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा को अभूतपूर्व जीत हासिल हुई थी. पहली बार उत्तर प्रदेश में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी. बसपा के वोटों का आंकड़ा 30 फीसदी तक पहुंच गया था. इस चमत्कारिक जीत के पीछे मायावती की सोशल इंजीनियरिंग की बड़ी भूमिका बताई गई थी. सुर्खियों के पायदान पर सतीश चंद मिश्रा का नाम बड़ी तेजी से ऊपर चढ़ा था. उनकी प्रतिष्ठा मायावती के विश्वस्त लेफ्टिनेंट के तौर पर स्थापित हो गई थी. हालांकि गोविंद पंत राजू का आकलन दूसरा है, ‘जितना कहा सुना गया उतना ब्राह्मण वोट बसपा को 2007 में नहीं मिला था. यह मुलायम के कुशासन से पीड़ित जनता का उनके खिलाफ दिया गया वोट था जिसमें सभी समुदायों ने मायावती का साथ दिया था.’ उस दौर में सतीश मिश्रा के बारे में कहा जाता था कि उन्होंने एक साल तक लगातार पूरे प्रदेश में घूम-घूमकर दलित-ब्राह्मण एकता से जुड़ी सर्वजन रैलियां की थीं जिसका फायदा 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा को मिला.

लेकिन 2014 में हालात बदल चुके हैं. इस दौरान बसपा को दो बड़ी हार का सामना करना पड़ा है. 2009 के लोकसभा चुनाव और 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा की हालत खराब रही है. उसकी वोटों की हिस्सेदारी पांच फीसदी तक घट गई है. जाहिर-सी बात है कि दलित ब्राह्मण फार्मूला इन चुनावों में काम नहीं कर सका है. जानकारों की मानें तो आगामी लोकसभा चुनावों में भी ब्राह्मणों का बसपा से दुराव बना रह सकता है. उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत कहते हैं, ‘लोकसभा चुनाव में बसपा को ब्राह्मणों का वोट किसी हालत में नहीं मिलेगा. ब्राह्मणों ने 2009 में भी इन्हें वोट नहीं दिया था. फिलहाल तो ब्राह्मण मोदी और भाजपा के पीछे खड़ा है क्योंकि उसे पता है कि प्रधानमंत्री भले ही मोदी बन जाएं लेकिन चुनाव जीतने की स्थिति में पार्टी और संघ के जरिए ब्राह्मण ही सबसे ज्यादा ताकतवर रहने वाले हैं.’

ब्राह्मण और शहरी मध्यवर्ग के ऊपर मोदी का असर साफ-साफ देखा जा सकता है. मोदी के इस बहाव ने उत्तर प्रदेश की जातिगत खांचों में बंटी राजनीति में एक नए तरह का ध्रुवीकरण पैदा किया है. अजय बोस एक दिलचस्प विचार रखते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में लंबे समय बाद ऐसा चुनाव हो रहा है जो काफी हद तक बाईपोलर है. इसमें ब्राह्मण, ठाकुर और मध्यवर्ग मोदी के समर्थन में है जबकि दलित, मुसलिम और महापिछड़ी जातियां बसपा के पाले में हैं. कांग्रेस यहां पर पहले से ही दौड़ से बाहर हो चुकी है. मुलायम सिंह के पास केवल अपना यादव वोटबैंक ही बचा हुआ है. हो सकता है कि यादवों का भी एक बड़ा हिस्सा उनसे कट जाए क्योंकि जिस तरह से उन्होंने पिछले दो सालों में अपने परिवार को आगे बढ़ाने का काम किया है उससे यादवों के एक बड़े वर्ग में नाराजगी है.’

यहां अहम सवाल है कि जिस दलित-ब्राह्मण गठजोड़ के जरिए मायावती ने चमत्कार किया था उसमें से ब्राह्मण के अलग होने का कितना नुकसान बसपा को हो सकता है और पार्टी इसकी भरपाई कैसे करेगी. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, ‘फिलहाल पार्टी का ध्यान 40 फीसदी वाले फार्मूले (दलित-मुस्लिम) को ठोस रूप देने पर है न कि तीस फीसदी (दलित-ब्राह्मण) वाले फार्मूले पर.’ जाहिर-सी बात है बसपा के भीतर ब्राह्मणों के मोदी की तरफ जाने की कोई खास चिंता नहीं है. अजय बोस के शब्दों में, ‘बसपा को इतना ब्राह्मण वोट कभी नहीं मिला है, हल्ला ज्यादा हुआ है.’ इसके बावजूद ब्राह्मण समुदाय को आश्वस्त करने और उसके साथ हर-संभव मधुर रिश्ते कायम रखने की कोशिश दो स्तरों पर चल रही है. पहला, पार्टी महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा 2006 की तर्ज पर प्रदेश भर में घूम-घूम कर दलित-ब्राह्मण गठजोड़ वाली रैलियां कर रहे हैं. दूसरा, पार्टी ने अपने घोषित लोकसभा उम्मीदवारों में करीब 18 टिकट ब्राह्मण समुदाय को दिए हैं. यहां पार्टी की रणनीति यह है कि उम्मीदवारों के निजी प्रभाव के जरिए ब्राह्मण वोटों का एक हिस्सा भी पार्टी अपने हक में कर लेती है तो यह उसके लिए बोनस होगा.

महापिछड़ी जातियां
कांशीराम ने जिस सोशल इंजीनियरिंग के जरिए राजनीतिक सत्ता तक पहुंचने का रोडमैप बनाया था उनमें दलितों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की 15-16 महापिछड़ी जातियां भी शामिल थीं. कांशीराम की इस विशाल छतरी  के नीचे बिंद, राजभर, बरई, कुशवाहा और पासी आदि अत्यंत पिछड़ी जातियां शामिल थीं. लेकिन 1998 के बाद बसपा में कांशीराम का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया और उनकी जातियों की छतरी छिन्न-भिन्न होती गई. कांशीराम ने पहले ही मायावती को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. पार्टी में मायावती का प्रभाव बढ़ गया था. जानकार इस छतरी के बिखरने के पीछे मायावती के निरंकुश रवैये को जिम्मेदार मानते हैं. मायावती ने उन नेताओं को एक-एक कर किनारे लगाना शुरू कर दिया जिनसे उनके एकाधिकार को चुनौती मिल सकती थी. अफरा-तफरी के इस दौर में कांशीराम के इकट्ठा किए गए तमाम साथी बसपा से बाहर निकाल दिए गए. इनमें बरखूराम वर्मा, आरके चौधरी, रामसमुझ पासी, डॉ. मसूद, किशनपाल जैसे तमाम नेता शामिल थे. यह 2001 के आस-पास की घटना है. इनके जाने के बाद बसपा में मायावती की एकल सत्ता स्थापित हो गई. लेकिन हाल के दिनों में मायावती को इस बात का इल्म हुआ है कि दलितों को दिल्ली के दरबार तक पहुंचाने के लिए उसी रास्ते पर चलना होगा जिस पर चलने का सपना कभी कांशीराम ने देखा था.

पिछले कुछ महीनों के दरमियान मायावती ने इस दिशा में कई सुधारवादी कदम उठाए हैं जिनसे महापिछड़ी जातियों के बसपा के साथ एक बार फिर से जुड़ाव की संभावना बलवती हो गई है. पार्टी में दलितों के साथ अतिपिछड़ों की हिस्सेदारी फिर से बढ़ी है. बसपा की अंदरूनी समझ रखने वाले अजय बोस बताते हैं, ‘आरके चौधरी को बहनजी एक बार फिर से पार्टी में वापस लाने जा रही है. चौधरी, कांशीराम के साथी और बसपा के संस्थापक सदस्य थे. इसी तरह से पासियों के बड़े नेता रामसमुझ पासी की भी बसपा में वापसी की बात चल रही है. उत्तर प्रदेश में पासी समुदाय की बड़ी आबादी है.’

महापिछड़ी जातियों का छाता बसपा ने काफी फैलाया है. फिलहाल पार्टी के पास सुखदेव राजभर, रामअचल राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे तमाम अतिपिछड़े नेता हैं. पुराने साथियों की वापसी के सवाल पर स्वामी प्रसाद मौर्य इशारों ही इशारों में पुष्टि करते हैं, ‘बसपा व्यक्तियों पर ध्यान नहीं देती. हमारा लक्ष्य सर्वजन को साथ लाने का है. जो लोग किसी कारणवश दूर हो गए थे, अगर वे चाहेंगे तो बहनजी उन पर विचार करेंगी.’

संगठन और मुद्दे
अजय बोस के शब्दों में, ‘मोदी के पक्ष में हवा तो है लेकिन उस हवा में 1990 के मंदिर आंदोलन जैसा भावनात्मक लगाव नहीं है.’ वे हमें उत्तर प्रदेश के दलित मध्यवर्ग में मायावती के प्रति फिर से पैदा हुए भावनात्मक लगाव के बारे में भी बताते हैं. प्रमोशन में आरक्षण का मुद्दा पिछले दिनों काफी चर्चा का

विषय रहा था. बसपा को छोड़कर शेष सभी पार्टियों ने इसका विरोध किया था विशेषकर सपा और भाजपा ने. बोस के मुताबिक दलितों के नौकरीपेशा तबके और मध्यवर्ग में इस बात को लेकर गुस्सा है कि सभी पार्टियां प्रमोशन में आरक्षण की विरोधी हैं. सिर्फ मायावती ही उन्हें यह अधिकार दिला सकती है.

बसपा ने भी अपने कोर वोटबैंक के बीच इस मुद्द को काफी आक्रामक ढंग से आगे बढ़ाया है.

इस काम को आगे बढ़ाने में बसपा अपने पुराने संगठनों का इस्तेमाल कर रही है. बसपा के सांगठनिक ढांचे पर रोशनी डालते हुए गोविंद पंत राजू बताते हैं, ‘डीएसफोर और कांशीराम द्वारा 70 के दशक में खड़े किए गए दलित कर्मचारी संगठन आज भी बसपा के लिए काडर का काम करते हैं. अंबेडकर जयंती, महात्मा फूले जयंती, रविदास जयंती के अलावा तमाम दलित महापुरुषों की जयंतियों और पुण्यतिथियों के माध्यम से ये संगठन साल भर जिलों-तहसीलों में सक्रिय रहते हैं. इनमें दलित और अतिपिछड़े समुदायों की जमकर हिस्सेदारी होती है. इन आयोजनों के जरिए बसपा अपने दलित वोटरों को लामबंद करने और अपनी बात को नीचे तक पहुंचाने में सफल रहती है. ये संगठन बसपा के अपने राजनीतिक ढांचे के साथ बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं. इसमें प्रदेश स्तर की कमेटियां, जोनल कमेटियां, उसके नीचे जिला कमेटियां और ब्लाक स्तरीय कमेटियां होती है. इसके जरिए छोटा से छोटा संदेश भी देखते-देखते मायावती से आम वोटर तक और आम वोटर से मायावती तक पहुंच जाता है.’

ऊपर से देखने पर मायावती भले ही ज्यादा सक्रिय नहीं दिखती हों लेकिन इस ढांचे के जरिए उनका जमीन से संपर्क लगातार बना रहता है.

बसपा की दिक्कत
मुलायम सिंह यादव को चुनाव प्रबंधन का बड़ा खिलाड़ी माना जाता है. यह चर्चा लगातार बनी हुई है कि मुलायम सिंह अपना दावा यूं ही नहीं छोड़ेंगे. लिहाजा उनके तरकश से निकलने वाले तीर का सबको इंतजार है. सुरेंद्र राजपूत के मुताबिक ‘मुसलमानों को अपने पाले में खींचने के लिए मुलायम सिंह ने मुस्लिम उलेमाओं की एक पूरी फौज खड़ी कर रखी है जो गांव-गांव जाकर सपा के पक्ष में वोट मांगने का काम करेंगे.’

इसके अलावा मुलायम सिंह की उम्मीद नरेंद्र मोदी भी हैं. जानकारों के मुताबिक मुलायम सिंह की फौज मुजफ्फरनगर को भुलाकर मुसलमानों के बड़े दुश्मन के रूप में मोदी को आगे बढ़ाएगी. अगर यह दांव कामयाब होता है तो मायावती के लिए रास्ता कठिन हो जाएगा. अगर मुसलमान काबा और कलीसे के फेर में फंस गया तो मायावती का खेल खराब हो जाएगा क्योंकि उनके सर्वजन फार्मूले से ब्राह्मण पहले ही अलग होकर मोदी के पक्ष में मन बनाता दिख रहा हैै.

अब बात आती है बसपा को मिलने वाली संभावित सीटों की. इस मुद्दे पर ज्यादातर लोग किसी तरह की भविष्यवाणी करने से बचते हैं. रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, ‘सीटों के बारे में विश्वास से तभी कुछ कहा जा सकता है जब फाइनल उम्मीदवारों के नाम सामने आ जाएं क्योंकि अंतिम समय में उम्मीदवार और उसकी व्यक्तिगत क्षमता सबसे अहम होती है.’

जानकारों की इस मुद्दे पर सहमति है कि भाजपा के अलावा सिर्फ बसपा उत्तर प्रदेश में अपने पिछले प्रदर्शन को दोहराने में कामयाब रहेगी और यदि मायावती के हालिया उपाय काम कर गए तो उत्तर प्रदेश में और शायद राष्ट्रीय राजनीति में भी मोदी का रथ रोकने का काम मायावती ही कर सकती हैं.

अमित शाह: मोदी की चाह में

नरेंद्र मोदी देश की बागडोर अपने हाथों में लेने के लिए किस कदर बेताब हैं इसकी जानकारी लगभग सभी को है. लेकिन मोदी के अलावा कोई और भी है जो उनके सर पर प्रधानमंत्री का ताज देखने के लिए उतना ही बेताब है. इसके लिए वह दिन-रात एक किए हुए है. यह व्यक्ति अपने ‘साहब’ के गांधीनगर से सात आरसीआर तक के रास्ते में मौजूद हर अड़चन, हर ठोकर को हटाने की जी-जान से कोशिश कर रहा है. मोदी के इस विश्वासपात्र का नाम है अमित अनिलचंद्र शाह. शाह, नरेंद्र मोदी के हनुमान कहे जाते हैं, उनके लिए मोदी भगवान से कम नहीं हैं और वे भी शाह पर ही सबसे अधिक भरोसा करते हैं.

पार्टी महासचिव अमित शाह वर्तमान में उत्तर प्रदेश में भाजपा के चुनाव प्रभारी हैं. भाजपा को पता है कि अगर पिछले 10 साल का संन्यास खत्म करना है तो उत्तर प्रदेश में उसे चमत्कार करना ही होगा. देश को सबसे अधिक सांसद और अब तक सबसे अधिक प्रधानमंत्री देने वाले उसी उत्तर प्रदेश में शाह अपने साहब और भाजपा की जीत सुनिश्चित करने में लगे हुए हैं.

आखिर अमित शाह नाम का यह व्यक्ति है कौन? क्या है इस व्यक्ति की काबिलियत? क्या कारण है कि इतने बड़े और अनुभवी नेताओं वाले इतने महत्वपूर्ण प्रदेश की जिम्मेदारी अमित शाह को दे दी गई है? क्यों नरेंद्र मोदी को शाह पर इतना भरोसा है कि वे उत्तर प्रदेश में पार्टी में न सिर्फ जान फूंक देंगे बल्कि यहां से क्रांतिकारी चुनाव परिणाम भी लाएंगे.

इन सभी प्रश्नों का जवाब तलाशने के लिए हमें थोड़ा पीछे चलना होगा. चलना होगा गुजरात. नरेंद्र मोदी से अमित शाह की पहली मुलाकात अहमदाबाद में लगने वाली संघ की शाखाओं में हुई थी. बचपन से ही दोनों इनमें जाया करते थे. हालांकि जहां मोदी एक बेहद सामान्य परिवार से आते थे, वहीं शाह गुजरात के एक रईस परिवार से ताल्लुक रखते थे. युवावस्था में एकाएक सब कुछ छोड़कर, सभी से संपर्क काटते हुए मोदी कथित तौर पर ज्ञान की तलाश में हिमालय कूच कर गए. वहीं शाह संघ से जुड़े रहते हुए शेयर ट्रेडिंग तथा प्लास्टिक के पाइप बनाने के अपने पारिवारिक व्यापार से जुड़ गए. समय गुजरता रहा.

अस्सी के दशक की शुरुआत में वापस आने के बाद मोदी फिर से संघ से जुड़ गए और बेहद सक्रियता से उसके लिए काम करना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे वे संघ की सीढ़िया चढ़ते गए. इसी दौरान उनकी अमित शाह से फिर मुलाकात हुई. शाह उस समय संघ से तो जुड़े थे लेकिन मुख्य रूप से अपने पारिवारिक व्यवसाय में रचे-बसे थे. अमित शाह ने मोदी से भाजपा में शामिल होने की अपनी इच्छा जाहिर की. मोदी, शाह को लेकर गुजरात भाजपा के तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष शंकरसिंह वाघेला के पास गए. वर्तमान में गुजरात विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री वाघेला उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, ‘मैं पार्टी ऑफिस में ही बैठा था. मोदी अपने साथ एक लड़के को लेकर मेरे पास आए. कहा कि ये अमित शाह हैं. प्लास्टिक के पाइप बनाने का व्यापार करते हैं. अच्छे व्यवसायी हैं. आप इन्हें पार्टी का कुछ काम दे दीजिए.’

इस तरह से अमित शाह भाजपा में शामिल हो गए. पार्टी में शामिल होने से लेकर लंबे समय तक शाह की पहचान एक छुटभैये नेता की ही थी. लेकिन वे धीरे-धीरे नरेंद्र मोदी के और भी करीब होते जा रहे थे.

नब्बे के दशक में जब गुजरात में भाजपा मजबूत हो रही थी उस समय अमित शाह के राजनीतिक जीवन में सबसे बड़ा मौका आया. वर्ष 1991 में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सांसद का चुनाव लड़ने के लिए गांधीनगर का रुख किया. उस समय शाह ने नरेंद्र मोदी के सामने लालकृष्ण आडवाणी के चुनाव प्रबंधन की कमान संभालने की इच्छा जाहिर की. शाह का दावा था कि वे अकेले बहुत अच्छे से पूरे चुनाव की जिम्मेदारी संभाल सकते है. अगर आडवाणी यहां अपना चुनाव प्रचार नहीं करते हैं तब भी वे इस सीट को आडवाणी के लिए जीत के दिखाएंगे. शाह के इस आत्मविश्वास से मोदी बड़े प्रभावित हुए और आडवाणी की उस सीट के चुनावी प्रबंधन की पूरी कमान उन्हें सौंप दी गई. आडवाणी उस चुनाव में भारी मतों से जीते. इसका असली सेहरा बंधा मोदी और उनके बेहतरीन चुनावी प्रबंधन के माथे पर. उधर मोदी और आडवाणी भी जानते थे कि जो कुछ हुआ था उसमें अमित शाह की काबिलियत की बहुत बड़ी भूमिका थी. इस चुनाव के बाद शाह का कद गुजरात की राजनीति में बढ़ता चला गया.

इसी तरह का मौका 1996 में भी अमित शाह के पास आया. जब पार्टी नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने गांधीनगर (गुजरात) से चुनाव लड़ने का तय किया. मोदी के कहने पर उस चुनाव की पूरी जिम्मेदारी फिर से अमित शाह को ही सौंपी गई. उस समय अटल पूरे देश में पार्टी का प्रचार कर रहे थे. ऐसे में उन्होंने अपने क्षेत्र में न के बराबर समय दिया. पूरा दारोमदार पार्टी ने अमित शाह के कंधे पर दे रखा था. मोदी को यकीन था कि जिस व्यक्ति को पार्टी ने गांधीनगर की जिम्मेदारी सौंपी है, वह इसमें जरूर सफल होगा. और हुआ भी वैसा ही.

राज्य की राजनीति को जानने-समझने वाले बताते हैं कि इन दो चुनावी सफलताओं ने शाह के जीवन पर तीन तरह से असर किया. सबसे बड़ा प्रभाव यह पड़ा कि अमित शाह छुटभैये नेता की छवि से बाहर निकलकर एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित हो गए जो चुनावी प्रबंधन में बेहद माहिर है.

दूसरा, भाजपा के दो शीर्ष नेताओं के सफल चुनाव प्रबंधन के चलते वे उन नेताओं यानी वाजपेयी और आडवाणी की नजरों में आ गए थे.

तीसरा, वे नरेंद्र मोदी के और अधिक विश्वासपात्र और करीबी हो गए. मोदी को शाह की क्षमताओं से अपने राजनीतिक भविष्य की तस्वीर भी सुनहरी होती दिखाई देने लगी. गुजरात की राजनीति को लंबे समय से देख रहे एबीपी न्यूज से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश कुमार सिंह कहते हैं, ‘पॉलिटिकल स्टैटजी तैयार करने और चुनाव प्रबंधन में अमित शाह की मास्टरी रही है. वो चुनावी व्यूह रचना करने और कैंडिडेट जिताने-हराने में महारत रखते हैं. अपनी इसी काबिलियत के दम पर वो मोदी पर प्रभाव डाल पाने में सफल रहे.’

शुरुआत में काफी लंबे समय तक शाह की राजनीति अहमदाबाद शहर के इर्द-गिर्द ही सीमित थी लेकिन अटल-आडवाणी के आशीर्वाद और मोदी के वरदहस्त ने शाह के राजनीतिक सपनों को उड़ान दे दी. अब उनकी नजर गुजरात की सहकारी संस्थाओं पर थी. पूरे राज्य में, बैंकों से लेकर दूध तक से जुड़ी कोऑपरेटिव संस्थाओं पर कांग्रेस पार्टी का कब्जा था. अमित शाह ने अहमदाबाद में इन संस्थाओं पर भगवा फहराने की शुरुआत कर दी. ब्रजेश कहते हैं, ‘अमित शाह की ये सबसे बड़ी सफलता थी. गुजरात की सहकारी संस्थाओं पर अगर आज भाजपा का कब्जा है तो वो अमित शाह के कारण ही है. इसी व्यक्ति ने अपनी काबिलियत और प्रबंधन से कांग्रेस को दशकों पुराने उसके कब्जे से उखाड़ फेंका.’

प्रदेश की राजनीति को समझने वाले लोग कांग्रेस की राज्य में बदहाल स्थिति को कोऑपरेटिव पर उसके खत्म हुए प्रभाव से भी जोड़ कर देखते हैं. ब्रजेश कहते हैं, ‘इन सहकारी संस्थाओं का गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों पर एक व्यापक प्रभाव था. जिस रफ्तार से कांग्रेस का कंट्रोल इन संस्थाओं पर से कम हुआ, उसी अनुपात में प्रदेश में पार्टी की राजनीतिक सेहत कमजोर होती चली गई.’

सहकारी संस्थाओं के बाद शाह का अगला निशाना गुजरात क्रिकेट संघ था. जानकार बताते हैं कि प्रदेश के क्रिकेट संघ पर वर्षों से कांग्रेस नेता नरहरि अमीन का कब्जा था. शाह ने यहां भी अपनी तैयारी और तिकड़म से कांग्रेस को पटखनी दे दी और डेढ़ दशक से ज्यादा के उसके एकाधिकार को खत्म कर दिया. कालांतर में उन्होंने संघ की कुर्सी पर अपने साहब नरेंद्र मोदी को बिठाया. बदले में मोदी ने शाह को संघ के उपाध्यक्ष की कुर्सी दे दी. यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि उस समय जो भी राजनीतिक कलाबाजियां शाह दिखा रहे थे उसमें उनके मार्गदर्शक नरेंद्र मोदी ही थे.

जिस तरह आज मोदी देश के शीर्ष पद पर बैठने को बेताब ह,ैं उसी तरह की बेकरारी से वे उस समय भी ग्रस्त थे जब केशुभाई पटेल गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. मोदी की नजर प्रदेश के मुखिया की कुर्सी पर थी. उन्होंने अपनी व्यूहरचना जारी रखी. शाह के माध्यम से प्रदेश में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की दिशा में वे काम करते रहे.

जानकार बताते हैं कि इसी राजनीतिक तैयारी के तहत मोदी ने अमित शाह को केशुभाई पटेल के करीब भेजा था. मोदी चाहते थे कि अमित शाह केशुभाई के साथ रहते हुए अंदर की सारी बातें उन तक ले आएं. केशुभाई को इसकी भनक तक नहीं लगी.

हालांकि पार्टी में कुछ लोगों को इस बात का अंदाजा था कि अमित शाह पार्टी में रहकर उससे ज्यादा मोदी के लिए काम करते हैं. शंकरसिंह वाघेला कहते हैं, ‘मोदी ने जब अमित शाह को मुझसे मिलाया और कुछ काम देने के लिए कहा तो मैंने हां कर दी. कुछ समय बाद ही मुझे पता चल गया कि ये आदमी मेरी जासूसी करता है. वो मेरी बातें जाकर मोदी को बताता था. मोदी ने मेरी जासूसी कराने के लिए उसे मेरे पास रखा था. अमित शाह और मोदी की जिस जासूसी वाली हरकत की चर्चा आज है. उस काम को ये दोनों दशकों पहले से करते आए हैं.’

खैर, प्रदेश के राजनीतिक समीकरण आने वाले समय में कुछ इस कदर बदले कि मोदी को केशुभाई पटेल और तत्कालीन संगठन मंत्री संजय जोशी ने गुजरात से बाहर भिजवाने का इंतजाम कर दिया. वर्ष 1986 में मोदी राष्ट्रीय सचिव बनकर दिल्ली आ गए. यहां आकर वे कई राज्यों के प्रभारी बने और कुशाभाऊ ठाकरे के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद महासचिव भी बनाए गए. लेकिन मोदी का मन गुजरात से दूर नहीं हो पाया था. वे वहां की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए थे. इस दौरान अमित शाह ने केशुभाई पटेल के करीबी लोगों में अपनी जगह बना ली थी. उन्हें प्रदेश सरकार और केशुभाई पटेल की हर हरकत का पता होता था, जिसकी सूचना वे बिना देरी किए मोदी तक पहुंचाया करते थे.

उधर केशुभाई पटेल के नेतृत्व में प्रदेश भाजपा की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही थी. पार्टी स्थानीय चुनावों से लेकर उपचुनावों तक में हार का मुंह देख रही थी. इसी बीच 2001 में गुजरात को भयानक भूकंप का सामना करना पड़ा. भूकंप पीड़ितों को राहत पहुंचाने के मामले में भी प्रदेश सरकार की काफी आलोचना होने लगी. इसके बाद तो पूरा एक ऐसा माहौल बना कि केशुभाई पटेल के नेतृत्व में अगर सरकार को छोड़ा गया तो आगामी चुनावों में भाजपा की हार तय है. केशुभाई के खिलाफ दिल्ली में खूब लॉबीइंग हुई. स्थानीय अखबारों से लेकर राष्ट्रीय पत्रिकाओं के पास गुजरात भाजपा की तरफ से ही केशुभाई के खिलाफ खबरें आने लगीं. केशुभाई के खिलाफ बने माहौल के सूत्रधार मोदी थे और इसमें उनकी मदद अमित शाह कर रहे थे. पदमश्री से सम्मानित गुजरात के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक देवेंद्र पटेल कहते है, ‘केशुभाई के खिलाफ माहौल बनाने का काम नरेंद्र मोदी के लिए अमित शाह ने ही किया था.’

खैर, केशुभाई के जिस तख्तापलट की उम्मीद नरेंद्र मोदी लगाए बैठे थे और जिसके लिए अमित शाह दिल्ली में फील्डिंग सजा रहे थे वह अंततः सफल रही. मोदी और शाह की मेहनत रंग लाई. केशुभाई को प्रदेश के मुखिया की गद्दी से हटाकर मोदी को प्रदेश की कमान सौंप दी गई.

यहां से मोदी और अमित शाह के संबंधों के एक नए दौर की शुरुआत होती है. उस अमित शाह के बनने की शुरुआत होती है जो आज हमारे सामने है.

2002 में अमित शाह को पार्टी ने सरखेज विधानसभा से टिकट दिया. चुनाव में वे रिकॉर्ड एक लाख 60 हजार मतों से जीत कर आए. जीत का यह आंकड़ा मोदी की चुनावी जीत से भी बड़ा था. यह 2007 में जाकर 2 लाख 35 हजार पर पहुंच गया.

खैर, 2002 में जब प्रदेश में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की फिर सरकार बनी तो सरकार में सबसे कम उम्र के अमित शाह को गृह (राज्य) मंत्री बनाया गया. यही नहीं, सबसे अधिक 10 मंत्रालय उन्हें दे दिए गए. मोदी ने शाह को 90 फीसदी से अधिक कैबिनेट समितियों का सदस्य भी बनाया जिनसे उनके विभागों का कोई लेना-देना तक नहीं था. जानकार बताते है कि यह भी मोदी की अपने मंत्रियों पर नजर रखने की रणनीति ही थी. कुछ लोगों की नजर में शाह पर ये मेहरबानियां केशुभाई के तख्तापलट में उनका साथ देने का इनाम थीं.

अमित शाह के रसूख में दिन दोगुनी, रात चौगुनी तरक्की होने की यह सिर्फ शुरुआत भर थी. धीरे-धीरे प्रदेश में स्थिति ऐसी होती गई कि अमित शाह राज्य में मोदी के बाद सबसे अधिक प्रभाव वाले नेता बन गए. कैबिनेट में शाह का रुतबा मोदी से कम नहीं था.

ऐसा नहीं है कि मोदी और शाह के संबंधों में कोई उतार-चढ़ाव नहीं आया या फिर शाह को किसी तरह की कोई चुनौती नहीं मिली. शाह के लिए भी मोदी के मन पर एकछत्र राज कर पाना बहुत आसान नहीं था. इसका सबसे बड़ा कारण थीं वर्तमान में गुजरात की शिक्षा मंत्री आनंदी बेन पटेल.

गुजरात में नरेंद्र मोदी जिन दो लोगों के बेहद करीब थे उनमें से एक थे अमित शाह और दूसरी थीं आनंदी बेन. मोदी के बेहद करीबी मानी जाने वाली आनंदी और अमित शाह के बीच लंबे समय तक शीतयुद्ध चलता रहा. दोनों मोदी पर किसी और के प्रभाव को देखने को तैयार नहीं थे. लेकिन मोदी ने कभी दोनों में से किसी एक को चुनने का काम नहीं किया. पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘अमित शाह मोदी जी की परछाई हैं लेकिन आनंदी बेन मोदी जी के बेहद करीब हैं. ये दोनों लोग आरएसएस के समय से ही एक साथ हंै. शाह और आनंदी के बीच में असहमति हो सकती है. लेकिन मोदी जी कभी इस बात को बर्दाश्त नहीं करते कि शाह आनंदी बेन से कंपटीशन करें.’ दोनों के साथ काम कर चुके शंकरसिंह वाघेला कहते हैं, ‘दोनों बहुत अलग-अलग स्वभाव के लोग है. शाह जहां षड़यंत्र वाले कामों में महारत रखते हैं वहीं आनंदी की प्रशासन पर बेहतर पकड़ रही है.’

हालांकि कैबिनेट के तमाम सदस्यों और पार्टी के अन्य नेताओं की तरफ से भी शाह के प्रति नापसंदगी की खबरें दबे-छिपे आती रही हैं. लेकिन मोदी से नजदीकी की वजह से किसी ने मुंह खोलकर शाह का विरोध करने की हिम्मत नहीं की. ब्रजेश कहते हैं, ‘मोदी सरकार में अमित शाह सब कुछ थे. मोदी के बाद वही सरकार थे. इस वजह से कैबिनेट के बाकी लोग, जो उम्र और अनुभव में शाह से  वरिष्ठ थे, उनका शाह से नाराज होना स्वाभाविक था.’ खैर मोदी ने हरसंभव तरीके से शाह को आगे बढ़ाया और शाह ने भी उन्हें प्रसन्न करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी.

देवेंद्र पटेल कहते हैं, ‘अब तक गुजरात में मोदी ने जो भी रणनीति अपनाई है जो कुछ भी किया है उसके पीछे असली दिमाग अमित शाह का ही रहा है. भले ही पर्दे के सामने मोदी दिखाई देते हों. अब तक के अपने राजनीतिक करियर से उन्होंने ये स्थापित किया है कि वो एक बेहद चालाक, सोशल और पॉलिटिकल इंजीनियरिंग में माहिर व्यक्ति हैं.’

शाह का व्यक्तित्व विश्लेषण करते हुए शंकरसिंह वाघेला कहते हैं, ‘ये आदमी बहुत बढ़िया मैनेजर है. अपने मालिक के प्रति वफादार रहता है. इसी आदमी ने गुजरात में कांग्रेस को तोड़ा. सहकारी संस्थाओं से कांग्रेस को खत्म करने का काम किया. ये आदमी 24 घंटे राजनीतिक षडयंत्र में लगा रहता था. आज भी वही करता है. उत्तर प्रदेश में वही करने वो गया है.’

चुनावी राजनीति में माहिर अमित शाह के नाम यह रिकॉर्ड भी है कि अपने जीवन में उन्होंने अभी तक कुल 42 छोटे-बड़े चुनाव लड़े लेकिन उनमें से एक में उन्होंने हार का सामना नहीं किया. दूसरी ओर अमित शाह पर कई फर्जी एनकाउंटर कराने, हत्या कराने, फिरौती, अपहरण जैसे संगीन आरोप भी हैं. हाल ही में उन पर यह आरोप भी लगा कि जब वे गृह राज्य मंत्री थे तो उन्होंने मोदी के आदेश पर अवैध तरीके से एक महिला की जासूसी करवाई थी.

सोहराबुद्दीन शेख की फर्जी मुठभेड़ के मामले में अमित शाह को 2010 में गिरफ्तारी का सामना करना पड़ा. शाह पर आरोपों का सबसे बड़ा हमला खुद उनके बेहद खास रहे गुजरात पुलिस के निलंबित अधिकारी डीजी बंजारा ने किया. फर्जी मुठभेडों के मामले में ही जेल में बंद बंजारा ने एक चिट्ठी लिखकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर फर्जी मुठभेड़ का आरोप लगाते हुए कहा कि ये दोनों नेता भी फर्जी मुठभेड़ में हुई उन मौतों के आरोपी हैं जिसके चलते वे और 31 अन्य अधिकारी वर्षों से जेल में कैद हैं. साबरमती केंद्रीय कारागार से लिखे गए इस पत्र में वंजारा ने शाह पर पुलिस अधिकारियों को धोखा देने का आरोप लगाया. बंजारा ने लिखा कि वह नरेंद्र मोदी को लंबे समय तक एक भगवान की तरह मानता था, लेकिन उसे यह कहते हुए खेद हो रहा है कि ‘मेरा भगवान अमित भाई शाह जैसे शैतान के प्रभाव से नहीं उबर सका.’ शाह पर गुजरात में ईमानदार पुलिस अधिकारियों को हाशिये पर धकेलने और मनमानी करने के भी आरोप हैं.

अपने अब तक के राजनीतिक करियर में शाह ने एक बेहद लो-प्रोफाइल रखने वाले व्यक्ति की छवि बनाई है. एक ऐसा व्यक्ति जो मीडिया से मोदी के समान ही दूरी बरतता है. बेहद नपे-तुले शब्दों में अपनी बात रखने वाले शाह पर पार्टी के नेता तानाशाह और घमंडी होने समेत कई आरोप लगाते रहे हैं.

गुजरात में पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष कानजी एस ठाकुर इन आरोपों का खंडन करते हुए कहते हैं, ‘ऐसा नहीं है. वो सभी को साथ में लेकर चलते हैं. उनमें कोई घमंड नहीं है. हां, ये है कि वो जो सच होता है वो सीधे मुंह पर बोल देते है. किसी को अच्छा लगे या बुरा.’

उत्तर प्रदेश में उन्हें भेजे जाने के सवाल पर कानजी कहते हैं, ‘जो व्यक्ति यहां गुजरात में कमाल कर सकता है, उसे पार्टी आगे क्यों ना बढ़ाए. हमें विश्वास है कि वो वही करिश्मा उत्तर प्रदेश में दिखाएंगे जो उन्होंने यहां किया है. मोदी जी को किससे क्या काम लेना है ये अच्छी तरह से आता है.’

उत्तर प्रदेश
मोदी और शाह के बीच के अब तक के आपसी संबंध और शाह की चुनावी काबिलियत से यह बात समझी जा सकती है कि क्यों मोदी ने उनको उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाया. उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनने के बाद से अमित शाह ने प्रदेश में भाजपा की जीत के लिए युद्ध स्तर पर काम करना शुरू कर दिया है.

भाजपा के स्थानीय पार्टी नेता बताते हैं कि प्रभारी बनने के बाद लखनऊ में अमित शाह अकेले नहीं आए बल्कि उनके साथ एक पूरी टीम आई है. इसमें बड़ी संख्या में लोगों को वे गुजरात से लेकर आए हैं, ये सभी लोग अमित शाह के मार्गदर्शन में पार्टी की रणनीति बनाते रहे हैं. इनके अलावा आईआईटी और आईआईएम के लड़कों की भी एक टीम शाह ने बनाई है. इसी टीम के माध्यम से शाह उत्तर प्रदेश की व्यूहरचना करने में जुटे हैं. उन्होंने लखनऊ में अपना एक पूरा तंत्र स्थापित किया है.

Amit-Shahअमित शाह ने सालों से मरणासन्न पड़े संगठन को सक्रिय करने से अपने काम की शुरुआत की है. पार्टी नेता बताते हैं कि एक रणनीति बनाई गई है जिसके तहत लखनऊ से लेकर राज्य के हर बूथ तक पार्टी संगठन को सक्रिय बनाने की कोशिश की जा रही है. पार्टी प्रवक्ता मनोज मिश्रा कहते हैं, ‘सबसे पहले अमित शाह जी के नेतृत्व में पार्टी ने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का काम किया है. उन्होंने तेजी से जनसंपर्क किया है और सभी आठ क्षेत्रों में व्यक्तिगत दौरा किया है. पूरे राज्य में वैज्ञानिक तरीके से बूथ कमेटियां बनाई जा रही हैं.’ शाह के उत्तर प्रदेश में आने के बाद हुए बदलावों की चर्चा करते हुए वाजपेयी कहते हैं, ‘आज लगभग 80 प्रतिशत जगहों पर हमारी बूथ कमेटियां तैयार हो चुकी हैं. पहले ऐसा नहीं होता था. होता ये था कि अगर मुझे टिकट नहीं मिला तो फिर बूथ जाए भाड़ में मैं पार्टी के औपचारिक प्रत्याशी के खिलाफ काम करूंगा. इस बार ऐसा नहीं है. इस बार व्यक्ति नहीं पार्टी चुनाव लड़ रही है. संगठन के तंत्र से चुनाव लड़ा जा रहा है.’

इसके अलावा शाह के नेतृत्व में पार्टी उत्तर प्रदेश में कुछ उसी तरह से तकनीक के साथ गलबहियां कर रही है जिस तरह का प्रयोग प्रमोद महाजन ने अपने समय में किया था. पार्टी नेता बताते हैं कि तकनीक का जैसा प्रयोग इस बार के चुनाव में हो रहा है वैसा उत्तर प्रदेश में पहले कभी नहीं हुआ. हाल ही में अति अत्याधुनिक 400 मोदी रथों को पूरे राज्य में रवाना किया गया है.

पार्टी के नेता बताते हैं कि शाह के यहां आने के बाद एक बड़ा बदलाव यह आया है कि प्रदेश के नेताओं की आपसी सिर-फुटौव्वल बंद हुई है. पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘पहले बड़े नेता आपस में खूब जूतमपैजार करते थे. लेकिन अमित शाह के आने के बाद कार्यकर्ताओं की सुनवाई शुरू हुई है. इन नेताओं को पता है कि शाह मोदी के आदमी हैं. मोदी भाजपा का वर्तमान और भविष्य हैं, ऐसे में जिसे अपने भविष्य की चिंता है वो शाह के सामने जी सर वाली मुद्रा में रहने में ही अपनी भलाई समझ रहा है. सभी कार्यकर्ता इससे बेहद खुश हैं.’

शाह से जुड़े अपने अनुभव को साझा करते हुए एक भाजपा कार्यकर्ता राकेशचंद्र त्रिपाठी कहते हैं, ‘वो प्रैक्टिकल एप्रोच वाले व्यक्ति हैं. उत्तर प्रदेश के उन पुराने नेताओं की तरह नहीं हैं कि पांच घंटे भाषण देंगे जिसमें से तीन लाइनें ही काम की निकलेंगी. वो तीन लाइनें ही बोलते हैं और सभी काम की होती हैं.’ पार्टी के एक जिलाध्यक्ष शाह के काम करने के तरीके पर चर्चा करते हुए कहते हैं, ‘उनकी बातचीत से एक बात साफ हो जाती है कि उन्हें सिर्फ जीत से मतलब है. उनके लिए कुछ और मायने नहीं रखता. आप देख सकते हैं कि प्रदेश में तमाम लोगों को पार्टी से जोड़ा जा रहा है. उन्होंने साफ कर रखा है किसी भी कीमत पर हमें नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री बनाना है. हमको ये चुनाव किसी भी तरह से जीतना ही होगा.’ भाजपा के उत्तर प्रदेश से लेकर गुजरात और दिल्ली तक के नेताओं से बातचीत में यह बात सामने आ जाती है कि कैसे मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए कोई पूरी पार्टी में पागलपन की हद तक मेहनत कर रहा है तो वह अमित शाह ही हैं.

लक्ष्मीकांत बाजपेयी कहते हैं, ‘अमित शाह को पूरी तरह से फ्री हैंड मिला हुआ है. वो प्रदेश में  सब कुछ कर रहे हैं जो करना चाहते हैं.’ शाह के माध्यम से आए नवाचारों में एक व्यवस्था यह भी शामिल है कि इस बार पार्टी किसी प्रत्याशी को कैश में कोई रकम नहीं दे रही. लक्ष्मीकांत कहते हैं, हम लोग लोकसभा के स्तर पर पार्टी का बैंक एकाउंट खुलवा रहे हैं. पार्टी प्रत्याशी को जो भी पार्टी की तरफ से सहयोग होगा वो इसी तरह से जाएगा और प्रत्याशी तीन अन्य लोगों की सहमति के बाद ही उस एकाउंट से पैसे निकाल सकता है. बाद में उसको खर्च का पूरा ब्यौरा देना होगा. काले-नीले धन की कोई गुंजाइश नहीं रहने देंगे. ये सब शाह जी की रणनीति का हिस्सा है.’

हालांकि पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं से विस्तार से बातचीत करने पर शाह के तौर-तरीकों को लेकर उनकी अप्रसन्नता भी सामने आ जाती है. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक शरत प्रधान कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में शाह दो तरह के लोगों को साथ लेकर काम कर रहे हैं. एक उन्होंने संघ के लोगों की टीम बनाई है. दूसरी गुजरात से वो अपने लोगों को लाए हैं. प्रदेश के नेताओं को वो तवज्जो नहीं दे रहे. यही कारण है कि प्रदेश के बड़े नेताओं में उनको लेकर नाराजगी है. लेकिन लोग डर के मारे मुंह नहीं खोल रहे.’

शाह की कार्यप्रणाली और प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं से उनकी नाराजगी के प्रश्न को जब हम प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी के सामने रखते हैं तो वे कुछ यूं जवाब देते हैं, ‘जो वरिष्ठ नेता राज्य में पार्टी को 10 और 47 पर ले आए वो आज राज्य में अपने अस्तित्व का संकट झेल रहे हैं. इसीलिए वो ऐसा माहौल बना रहे हैं. इन लोगों से शाह जी बात करते हैं. उनकी राय ली जाती है लेकिन अब नीतियों के कार्यान्वयन में उनकी बात नहीं माना जाएगी ये तय है. अगर वही निर्णय होना है जो ये काबिल नेता आज तक करते आए हैं तो फिर नई टीम का मतलब क्या रह जाएगा? इन नेताओं ने प्रदेश में हुई रैलियों में अब तक न एक नए पैसे की मदद की है और न भीड़ में एक आदमी बढ़ाने में मदद की है. बस इन लोगों से आप भाषण दिलवा लीजिए.’

उधर शाह के आने से पार्टी के जिला स्तर के नेता और सामान्य कार्यकर्ता खुश नजर आते हैं. वाराणसी महानगर के भाजपा जिलाध्यक्ष तुलसी जोशी कहते हैं, ‘शाह जी पार्टी को हर वार्ड और हर घर से जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. पहले ऐसा नहीं था. पार्टी को उनके जैसे चार लोग और मिल जांए तो पूरे भारत में वो पार्टी की सूरत बदल देंगे. वो आम कार्यकर्ता को खुद फोन करते हैं. हम जब चाहें वो फोन पर उपलब्ध रहते हैं. ऐसा पहले कभी नहीं था.’

गुजरात, दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि अगर नरेंद्र मोदी किसी तरह से पीएम बन जाते हंै तो फिर भारतीय राजनीति और खासकर भाजपा की अपनी राजनीति में अमित शाह सबसे अधिक राजनीतिक प्रभाव वाले नेता होंगे.

खैर, मोदी को गुजरात का सीएम बनाने में सफल भूमिका अदा करने वाले अमित शाह अपनी तरफ से तो वह हर कोशिश करते नजर आ रहे हैं जिससे मोदी को वे पीएम बनवा सकें लेकिन समय की बंद मुट्ठी में क्या है यह तो वक्त ही बताएगा.

‘सामाजिक न्याय भूलकर लालू यादव परिवार का न्याय करने में लग गए हैं’

ramराजद को छोड़कर भाजपा में जाने का फैसला अचानक ही लिया या लंबे समय से इस दिशा में विचार चल रहा था?
राजद में लगातार कार्यकर्ताओं और दूसरे नेताओं की उपेक्षा से मन काफी आहत था, लेकिन यह सब बहुत पहले से विचार कर नहीं किया है. एक हद होती है, उसके बाद हमारे सामने क्या उपाय था? सामाजिक न्याय करते-करते लालू प्रसाद सिर्फ अपने परिवार के पक्ष में न्याय करने तक सिमट गए हैं. पार्टी से सालों से जुड़े हुए कार्यकर्ता लगातार उपेक्षित महसूस कर रहे थे.

यह पहली बार तो नहीं हुआ कि लालू प्रसाद परिवार मोह से इस कदर ग्रस्त हुए हों. कई अवसरों पर उन्होंने परिवार के साथ न्याय करने का काम किया है. तो क्या यह माना जाए कि उन्होंने आपको टिकट नहीं दिया, सिर्फ इसी वजह से आपने वर्षों पुराना रिश्ता तोड़ दिया?
मैंने कहा न कि हर चीज की हद होती है. जब टिकट बंटवारे की बारी आई तो हर दिन कहते थे कि फलां को टिकट देंगे, फलां को नहीं देंगे. उस वक्त मैंने भी कुछ नहीं बोला कि क्योंकि उनका काम था और हमें उम्मीद थी कि वे ईमानदारी से करेंगे. कार्यकर्ता, नेता सालों-साल तक पार्टी के लिए काम करते रहते हैं और जब टिकट देने की बारी आई तो अपने परिवारवालों के साथ अपने पीए तक को टिकट देने पर विचार करने लगे.

आप तो राजद के महासचिव थे, लालू प्रसाद के बाद दूसरे सबसे महत्वपूर्ण नेता. क्या आपको पहले खबर नहीं थी कि आपकी जगह अपनी बिटिया मीसा भारती को टिकट देने का निर्णय ले चुके हैं?
राजद में किसी को कुछ भी बाहर पता नहीं चलता. सब फैसले घर में बैठकर लिए जाते हैं, परिवार के बीच सलाह-मशविरा करके. तो हमें कैसे पता चलता पहले.

आज आप लालू प्रसाद के खिलाफ जितनी आग उगल रहे हैं और पार्टी की बुराई कर रहे हैं, इतने वर्षों से पार्टी में रहते क्या कभी लालू प्रसाद को समझाने की कोशिश की आपने या कार्यकर्ताओं की ओर से कोई शिकायत रखी आपने?
कुछ माह पहले मैंने उन्हें समझाया था और उनसे इन विषयों पर बात भी की थी.

राजद छोड़ने का फैसला करने के बाद आप भाजपा और जदयू में से किसी एक को चुनने को लेकर बेहद दुविधा में थे. ऐसा लग रहा था कि भाजपा में जाने से हिचक हो रही थी?
वास्तव में बहुत दुविधा में था और परेशान भी. यह फैसला करना इतना आसान नहीं था. राजनीतिक दुविधा थी, और भी कई तरह के सवाल थे. लेकिन सहयोगियों और कार्यकर्ताओं से लगातार विचार-विमर्श करने के बाद भाजपा में जाने का निर्णय लिया.

तो भाजपा में आपको ऐसी क्या खासियत लगी कि आपने इसमें शामिल होने का फैसला किया?
कांग्रेस को लगातार देखा जा रहा है. भ्रष्टाचार-महंगाई चरम पर है. देश के अहम सवालों के प्रति कांग्रेस में कोई चिंता ही नहीं है. देश में आज भाजपा के प्रति एक लहर है और देश को आगे ले जाने वाले नेता के तौर पर नरेंद्र मोदी को देखा जा रहा है. ऐसी कई बातों को ध्यान में रखकर मैंने फैसला किया.

राजद में रहते हुए आप तो भाजपा और नरेंद्र मोदी को सबसे ज्यादा निशाने पर लेने वाले नेता रहे हैं. अब क्या कहकर नरेंद्र मोदी के पक्ष में वोट मांगेंगे?    
कार्यकर्ताओं के सामने एक ही नारा लगेगा- ‘छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी, नए दौर में लिखेंगे, मिलकर नई कहानी’. कोर्ट ने नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी है. आखिर ऐसे ही तो कोर्ट ने क्लीन चिट नहीं दी होगी. अब नया समय है, देश के सामने नई चुनौतियां हैं. इन सबसे निपटने के लिए नरेंद्र मोदी जैसे नेता की जरूरत आज देश को है.

तो क्या मोदी अब आपके लिए सांप्रदायिक नहीं रहे?
जो लोग नरेंद्र मोदी को जुबानी जमा खर्च कर सांप्रदायिक कहते रहते हैं, उन्हें यह भी देखना चाहिए कि मोदी जी के शासनकाल में मुसलमानों व अल्पसंख्यकों का कितना हित और विकास हुआ है. अगर वे सांप्रदायिक होते तो अल्पसंख्यकों का भला नहीं सोचते.

तो आगामी चुनाव में बिहार का परिदृश्य कैसा होगा? आपकी नई पार्टी का क्या होगा और पुरानी पार्टी का?
हमारी पुरानी पार्टी यानी लालू जी की पार्टी की स्थिति और बुरी होगी. उनकी सीटें और कम होंगी. यह वे खुद भी जानते हैं. भाजपा की लहर है बिहार में यह सिर्फ मेरे कहने से नहीं मानिए, खुद जाकर महसूस कीजिए.

वह भी एक दौर था

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फोटो: विकास कुमार

मेरे वालिद फरीदुद्दीन खान बड़े जमींदार हुआ करते थे. 1929 में उनका इंतकाल हुआ. इलाके के मुसलमानों में ही नहीं, हिंदुओं में भी उनकी काफी इज्जत थी. लोग झगड़ों के हल के लिए अक्सर उनके पास आया करते थे. वे जो फैसला करते, दोनों ही पक्ष उसे बिना किसी बहस के मान लेते थे. हमारे इलाके में हिंदुओं की आबादी ज्यादा थी, लेकिन मेरे वालिद को कभी किसी सांप्रदायिक समस्या का सामना नहीं करना पड़ा. वे मजहब के पाबंद भी थे और उदार सोच वाले भी. वे अगर देखते कि किसी को मदद की जरूरत है तो बिना जताए उसकी मदद कर देते थे. जैसे अगर कोई अपना घर बना रहा है और उसे लकड़ी की जरूरत है तो वे उससे कहते कि मेरी जमीन में एक पेड़ काट लो. एक बार किसी हिंदू परिवार की बारात हमारे घर के पास से गुजर रही थी. रात हो चुकी थी इसलिए मेरे वालिद ने उनसे कहा कि आप लोग इस अंधेरे में कहां जा रहे हैं? रात हमारे घर गुजारिए. सुबह चले जाइएगा. पूरी बारात उस रात हमारे घर पर रुकी और सबके खाने और सोने का बंदोबस्त किया गया.

देश में उस वक्त या कहें कि 20वीं सदी की शुरुआत तक ऐसा ही माहौल हुआ करता था. ऐसी सोच या बर्ताव वाले सिर्फ मेरे वालिद नहीं थे. उन दिनों ज्यादातर रसूखदार लोग ऐसे ही थे. यह माहौल देश के उन कई इलाकों में 1947 के बाद भी रहा जो हिंदू-मुस्लिम टकराव की बीमारी से प्रभावित नहीं हुए थे. यह बात कई हिस्सों के बारे में आज भी कही जा सकती है.

हमारे ही गांव में एक मुस्लिम जमींदार भी हुआ करता था. उम्र में वह मुझसे छोटा था और बड़े जिद्दी मिजाज वाला भी. उसके पास एक लाइसेंसी बंदूक थी जिसे वह अक्सर साथ लेकर ही चलता था. हमारे गांव से बमुश्किल एक किलोमीटर के फासले पर बकिया नाम का एक और गांव था. वहां एक हिंदू राजपूत रहता था जिसका नाम था छत्रधारी सिंह. दोनों में जमीन या पैसे का कोई झगड़ा नहीं था लेकिन शायद अहम के टकराव की वजह से दोनों एक-दूसरे के दुश्मन बन गए. यह 1966 की बात होगी. दोनों ही ट्रेन से आजमगढ़ जा रहे थे. संजरपुर में वे एक-दूसरे के सामने पड़ गए और किसी बात को लेकर उनकी बहस शुरू हो गई. मुसलमान जमींदार हमेशा की तरह बंदूक साथ लेकर चल रहा था. उसने बंदूक निकाली और गोली दाग दी. छत्रधारी सिंह की मौके पर ही मौत हो गई.

खबर जंगल में आग की तरह फैली. बड़ी तादाद में हिंदू छत्रधारी सिंह के घर के पास इकट्ठा होने लगे. सब बहुत गुस्से में थे. वे सिर्फ उस जमींदार से नहीं बल्कि बल्कि पूरे गांव से इसका बदला लेना चाहते थे.

वह उन्मादी भीड़ जब हमारे गांव में दाखिल हुई तो हमारा पूरा गांव आसानी से जलकर खाक हो सकता था, लेकिन तभी एक ऐसी बात हुई जिसके बारे में शायद ही किसी ने सोचा हो. छत्रधारी सिंह के भाई इस भीड़ के सामने खड़े हो गए और बोले, ‘ऐसा कभी नहीं हो सकता. हम बदला जरूर लेंगे लेकिन सारे मुसलमानों से नहीं, बल्कि सिर्फ उस मुसलमान से जिसने मेरे भाई की हत्या की है. और हमारा बदला यह नहीं होगा कि हम उसकी हत्या कर दें. हम इस उसे कोर्ट में ले जाएंगे और कानून के मुताबिक उसे सजा दिलवाएंगे.’ यही हुआ भी. हत्यारे के खिलाफ मामला दर्ज हुआ और अदालत ने उसे लंबी कैद की सजा सुनाई.

तो हालात तब ऐसे हुआ करते थे. और यह सिर्फ हमारे इलाके की बात नहीं है, पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में ऐसा था. इसी तरह हिंदू और मुसलमान आपस में शांति से रहा करते थे. यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है और मेरी उम्र के लाखों लोगों ने अपनी आंखों से इसे देखा और महसूस किया है.

तो फिर ऐसी घातक राजनीति कैसे पनपी जिसने हिंदू और मुसलमानों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने का काम किया और जिसके नतीजे में 1947 में भारत का बंटवारा हो गया? जवाब यह है कि बंटवारा हिंदू और मुसलमानों के बजाय उनके कुछ नेताओं के दिमाग की उपज था. बंटवारा आम हिंदू या मुसलमान की नहीं बल्कि कुछ नेताओं की समस्या थी जो अपने समुदाय का प्रतिनिधि होने का दावा करते थे. हिंदू और मुसलमान तो सहजता के साथ मिलजुलकर रहा करते थे जैसा मैंने ऊपर जिक्र किया. लेकिन बाद में जब अखबार का दौर आया तो चीजें बदलने लगीं. अखबारों के साथ एक नया नेतृत्व उभरने लगा. हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जो सहज संवाद था उसकी जगह नेताओं ने ले ली. ये नेता ही अपने समुदाय के मार्गदर्शक बन गए. यहीं से हमारी सारी राजनीतिक समस्याओं की शुरुआत हुई.

नेता कौन बनता है? नेता ऐसे लोग होते हैं जो आम लोगों से ज्यादा चतुर होते हैं. और अनुभव बताते हैं कि जो ज्यादा योग्य, तजुर्बेकार और चतुर होता है उसमें जाने-अनजाने एक अहम आ जाता है. लगभग हर नेता के पास एक बड़ा अहम होता है. भारतीय उपमहाद्वीप में शायद इस नियम का अपवाद एक ही नेता था और वह थे महात्मा गांधी.

ज्यादातर सांप्रदायिक त्रासदियां सिर्फ एक कारण से उपजती हैं और वह है दो प्रतिद्वंदी नेताओं के बीच अहम का टकराव. 1971 में पाकिस्तान का विभाजन जुल्फिकार अली भुट्टो और शेख मुजीबुर्रहमान के बीच अहम के ऐसे ही टकराव के कारण हुआ. इसी तरह कश्मीर विवाद आज तक अनसुलझा है तो इसकी मुख्य वजह यही है कि शेख मुहम्मद अब्दुल्ला और मुहम्मद अली जिन्ना के बीच भी अहम का एक ऐसा ही टकराव हुआ था. उदाहरण कई हैं.

दक्षिण एशियाई राजनीति का एक अध्ययन हमें अहम सबक देता है. बंटवारा आम हिंदू और मुसलमान की वजह से नहीं हुआ था. इसे हिंदू और मुसलमान नेताओं ने आम हिंदू और मुसलमान के नाम पर अंजाम दिया था.  आदमी का अहम उसकी सोच को एक सीमा से आगे नहीं बढ़ने देता. ये नेता उस सीमा से आगे नहीं जा सके. नतीजा, पूरे देश को उनके इस अहम की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी.

(लेखक प्रसिद्ध इस्लामिक विद्वान और लेखक हैं. यह लेख उनकी आने वाली किताब का अंश है )     

झीरम घाटी में फिर नक्सल हमला

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फाईल फोटो: शैलेंद्र पांडेय

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर जिले में स्थित झीरम घाटी में एक बार फिर नक्सलवादियों ने बड़ी वारदात को अंजाम दिया है. नक्सली हमले में केंद्रीय रिजर्व सुरक्षा बल के 11 जवान और स्थानीय पुलिस के चार कर्मी शहीद हो गए हैं. ये जवान तोंगपाल से वापस लौटते वक्त नक्सलियों के एंबुश में फंस गए. लोकसभा चुनाव के ठीक पहले नक्सलियों द्वारा की गई इस बड़ी वारदात को दहशत फैलाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. साथ ही इसने मई, 2013 में झीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हुए हमले की यादें भी ताजा कर दी हैं. इसमें तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और महेंद्र कर्मा सहित कांग्रेस के 30 नेता मारे गए थे.

केंद्रीय रिजर्व सुरक्षा बल की 80-बटालियन के 50 जवान तोंगपाल में बन रही सड़क को सुरक्षा देने के लिए सर्चिंग पर निकले थे. सर्चिंग कर जब ये जवान लौट रहे थे तब नक्सलियों ने घात लगाकर इन पर हमला कर दिया. हमले में कई  जवान घायल भी हुए हैं. घटना के बाद छत्तीसगढ़ पुलिस महानिदेश एएन उपाध्याय और एडीजी नक्सल ऑपरेशन आरके विज भी घटनास्थल रवाना हो गए हैं. मौके से 16 लोगों के शव मिले हैं इनमे एक ग्रामीण भी है लेकिन आशंका जताई जा रही है कि मृत जवानों की संख्या बढ़ सकती है. पुलिस सूत्रों के मुताबिक नक्सलियों की संख्या 300 के करीब थी. प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है जैसे माओवादियों ने यह हमला सुनियोजित तरीके से किया है. नक्सलियों ने पहले बारूदी सुरंग में विस्फोट कर जवानों का रास्ता बाधित किया. इसके बाद जवानों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाकर कर उन्हें संभलने का मौका नहीं दिया.

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने इसे राज्य सरकार की विफलता करार दिया है. जबकि मुख्यमंत्री रमन सिंह ने माओवादी वारदात की कड़ी निंदा करते हुए अपना दिल्ली दौरा रद्द कर दिया है. रमन सिंह शाम को रायपुर पहुंचकर आपात बैठक लेंगे.

अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक मुकेश गुप्ता के अनुसार हमला तोंगपाल की दरभा (झीरम) घाटी में हुआ है. 44 जवान सड़क निर्माण के काम की सुरक्षा के लिए जगदलपुर-सुकमा रोड़ पर गश्त कर रहे थे. उसी समय नक्सलियों ने घात लगाकर हमला कर दिया. पुलिस और माओवादियों के बीच एक घंटे तक मुठभेड भी चली.

घटना स्थल पर मिले खून के निशान के आधार पर पुलिस ने दो नक्सलियों के मारे जाने की संभावना भी जता रही है. हालांकि नक्सलियों के शव बरामद नहीं किए जा सके हैं.

‘हम अपनी आलोचनाओं का ठीक से जवाब नहीं दे पाए’

milindजल्द ही आगामी लोकसभा चुनावों की घोषणा हो जाएगी. मौजूदा हालात में कांग्रेस के लिए आपको क्या उम्मीदें नजर आती हैं?
अर्थव्यवस्था में आई गिरावट के कारण पिछले कुछ सालों के दौरान हम बहुत बुरे दौर से गुजर रहे  हैं. इसी दौरान कांग्रेस में भी पीढ़ीगत बदलाव चल रहा है. बावजूद इसके एक साल पहले के मुकाबले आज स्थितियां काफी बेहतर हैं. हमारे पास अभी भी थोड़ा समय है. उम्मीद है कि अगले कुछ महीनों में हम खुद को और बेहतर स्थिति में पहुंचा सकेंगे.

देश में जो आम भावना है वह कांग्रेस के खिलाफ है, विशेषकर नए वोटरों में. आप उन्हें कैसे संतुष्ट करेंगे?
हमारी सबसे बड़ी असफलता यह रही कि हम एक सरकार और एक पार्टी दोनों ही रूपों में अच्छा प्रदर्शन करने में असफल रहे. जो पार्टी सत्ता में होती है उसके प्रति जनता यह फर्क नहीं करती कि सरकार अलग है और पार्टी अलग है. न तो हम युवाओं को सकारात्मक संदेश दे पाए और न ही अपनी आलोचनाओं का सही से जवाब दे पाए. हम इस समस्या का  हल ढूंढ़ रहे हैं. जल्द ही हम विपक्षी पार्टियों को पीछे छोड़ देंगे. पिछले कुछ सालों के दौरान हमने देखा है कि तकनीकी और संचार के साधनों ने लोगों की जीवनशैली में बड़ा बदलाव किया है. आज देश में 16 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं. इन चीजों से हम बेहतर तालमेल बिठा नहीं पाए. हमारे ऊपर टूजी और कोल घोटाले के आरोप लगे लेकिन हम लोगों को यह संदेश दे नहीं पाए कि ये नीतियां तो हमें विरासत में मिली थीं. हमने कोई नए कानून नहीं बनाए थे. इस मुद्दे को न समझा पाने की हमारी नाकामी को देश ने हमारी गलती समझ लिया. प्रभावी और लगातार संवाद के अभाव में यह छवि बनी है.

आप एक शहरी निर्वाचन क्षेत्र से सांसद है. कांग्रेस और यूपीए के प्रति पैदा हुई नाराजगी से खुद को अलग करने और जनता को संतुष्ट करने के लिए आप क्या करेंगे?
दक्षिण मुंबई में दो तरह के लोग रहते हैं-एक पढ़ा-लिखा व्यापारी वर्ग और दूसरा शहरी गरीब. अर्थव्यवस्था की अहमियत दोनों को पता है. अर्थव्यवस्था के मसले पर मैं उन्हें समझाने की कोशिश करूंगा कि कांग्रेस और यूपीए का अकलन पिछले दो साल के प्रदर्शन के आधार पर न करें क्योंकि दस सालों के दरम्यान करीब तीन-चौथाई समय तक हमारी वित्त व्यवस्था खूब फली-फूली है. आप उसका श्रेय हमसे छीन नहीं सकते. हमें इन बातों को पूरे संदर्भ के साथ रखना होगा, यही एकमात्र रास्ता है.

राहुल गांधी द्वारा दागी सांसदों को बचाने वाले अध्यादेश के विरोध से पहले आपने एक ट्वीट किया था. क्या आपको पहले से अनुमान था कि इसका हश्र यही होने वाला है?
मैं खूब ट्वीट करता हूं लेकिन मेरे ट्वीट कभी चर्चित नहीं होते. एक या दो दिन बाद पार्टी नेताओं ने अध्यादेश को समाप्त करके इस पर प्रतिक्रिया जताई. मुझे खुशी है कि मेरे विचारों को बाद में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने संज्ञान में लिया. लेकिन में कोई कांग्रेस का भविष्यवक्ता नहीं हूं जो पहले ही घटनाओं पर ट्वीट करता है. पार्टी में इस तरह से चीजें नहीं चलतीं.

राहुल गांधी को कांग्रेस उपाध्यक्ष बने एक साल से ऊपर हो गया है. क्या इसके बाद से पार्टी के महत्वपूर्ण और निर्णायक पदों पर अन्य युवाओं को तरजीह दी गई है?
पिछले एक साल में पार्टी संगठन में कई बड़े बदलाव हुए हैं. मुझे नहीं लगता कि राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी मंत्रिमंडल या पार्टी का नेतृत्व पूरी तरह से युवाओं के हाथ में चला जाएगा. हर संगठन पुराने और नए लोगों के तालमेल से चलता है. कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी या सरकार चलाना कोई आसान काम नहीं है. इसके लिए निश्चित तौर से युवाओं की ऊर्जा और उत्साह की जरूरत होती है लेकिन साथ ही बड़ों का अनुभव और जानकारी की भी जरूरत पड़ती है. राहुल ने पार्टी और सरकार में दोनो चीजों का मिश्रण बनाए रखा है.

महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन में टकराव चल रहा है. राज्य के टोल बूथों में तोड़फोड़ करने वालों के साथ नरमी बरतने के आरोप कांग्रेस पर लग रहे हैं. क्या यह सही है?
हमने किसी के साथ नरमी नहीं बरती है. पिछले चुनावों में भी हम पर ऐसे आरोप लगे थे. कहा जा रहा था कि हम मनसे जैसी पार्टियों को बढ़ावा दे रहे हैं. लेकिन हमें एक सख्त संदेश देने की जरूरत है. बर्बरता या उपद्रव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. कानून को तोड़ने की अनुमति किसी को भी नहीं दी जा सकती. हम 1999 से एनसीपी के साथ गठबंधन में हैं. इतने समय से चल रहे किसी भी रिश्ते में स्वाभाविक तौर से कुछ उठापटक चलती रहती है. लेकिन हमारा गठजोड़ आगे भी बना रहेगा.

अपने निर्वाचन क्षेत्र और महाराष्ट्र में मोदी लहर को कैसे रोकेंगे?
पिछले पांच साल से मैं अपने निर्वाचन क्षेत्र में हर महत्वपूर्ण मुद्दे पर आवाज उठता रहा हूं. अपने इसी काम को लेकर मैं अपने क्षेत्र की जनता के पास जाऊंगा. मुझे पूरा विश्वास है कि यहां मुझसे बेहतर कोई नहीं है. मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती लोगों तक यह संदेश पहुंचाने की है कि अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी में फर्क है. भारत के लोगों ने वाजपेयी के रूप में एक कट्टर पार्टी का नरम चेहरा देखा था. लेकिन मोदी पहले से ही कट्टर पार्टी के भी सबसे चरम हिस्से का प्रतीक हैं

छत्तीसगढ़ में ‘आप’ की शुरुआत

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रायपुर में ‘आप’ के कार्यक्रम में हुंकार भरती सोनी सोरी

लोकसभा चुनाव की रणभेरी बजते ही छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी (आप) ने भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी है. भाजपा तो पहले से ही कमर कसकर मैदान में जुटी हुई है. लेकिन लगता है कि कांग्रेस की नींद खुलना अभी बाकी है. कांग्रेस ने अभी तक किसी बड़े कार्यक्रम का ऐलान नहीं किया है. जबकि लोकसभा की तारीखों के ऐलान के साथ ही जहां भाजपा राजनाथ सिंह ने छत्तीसगढ़ में दो आम सभाएं ले ली हैं. वहीं आप नेता सोनी सोरी ने भी राज्य सरकार के खिलाफ हुंकार भरना शुरू कर दिया.

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बुलाए गए कार्यकर्ता सम्मेलन में आप नेता सोनी सोरी ने राज्य सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि हमें कमजोर समझने की भूल ना करें. सोरी ने कहा कि वे राजनीति में इसलिए आई हैं ताकि व्यवस्था रहकर उसमें सुधार कर सकें. उन्होंने मुख्यमंत्री रमन सिंह पर आरोप लगाया कि सीएम नक्सलियों को गले लगा रहे हैं लेकिन आम आदिवासी पर अत्याचार करवा रहे हैं. सोनी यहीं नहीं रुकी. उन्होंने यह भी कहा कि जो उनके साथ हुआ है यदि वह सीएम की बहन या बेटी के साथ होता तो वे क्या करते. उन्होंने कहा कि मुझे जेल में बार-बार निर्वस्त्र किया गया.  मैने राष्ट्रपति से लेकर मुख्यमंत्री तक सबको चिट्ठी लिखी लेकिन उनकी सुनवाई कहीं नहीं हुई. सोनी ने कहा कि उनके पास राज्य सरकार के खिलाफ कई सबूत हैं जिनका समय आने पर खुलासा किया जाएगा.

आप की सभा में प्रदेश भर के कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में रायपुर पहुंचकर शक्ति प्रदर्शन किया. पूरे कार्यक्रम के दौरान सोनी सोरी अपने तेवरों के साथ आकर्षण का केंद्र भी बनी रही.

आप की सभा के ठीक एक दिन पहले भाजपा ने भी कांकेर और दुर्ग लोकसभा सीट पर दो सभाएं आयोजित करवाईं. इन सभाओं में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह कार्यकर्ताओं में जोश तो भरा ही साथ ही कांग्रेस की तुलना बिल्ली से करते हुए कहा कि बिल्ली को हम पाल तो सकते हैं लेकिन दूध की सुरक्षा की उम्मीद नहीं कर सकते. वैसा ही हाल कांग्रेस का है. जिसने देश को लूटने का काम किया है. राजनाथ ने कहा कि यूपीए सरकार हर मोर्चे पर विफल रही है. इस बार चुनाव सरकार बनाने के लिए नहीं बल्कि देश बनाने के लिए हो रहा है. कांकेर लोकसभा सीट भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती है. कांकेर लोकसभा में आठ विधानसभा क्षेत्र हैं जिनमें से छह कांग्रेस के पास हैं जबकि केवल दो विधानसभा सीटों अंतागढ़ और सिहावा में भाजपा को सफलता मिली थी. कांकेर लोकसभा सीट भाजपा के लिए इसलिए भी सरदर्द बन गई हैं क्योंकि यहां के सांसद भाजपा नेता सोहन पोटाई पर आरोप लगे हैं कि नक्सलियों का शहरी नेटवर्क उनसे जुड़ा हुआ था. पुलिस द्वारा पिछले दिनों पकड़े गए नक्सली मददगार धर्मेंद्र चोपड़ा और नीरज चोपड़ा पोटाई के करीबी बताए जा रहे हैं. ऐसे पोटाई से साथ-साथ भाजपा को भी आरोप-प्रत्यारोप का सामना करना पड़ रहा है. यही कारण है कि भाजपा ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत कांकेर से की है.

कांग्रेस की बात करें तो पार्टी अभी कछुआ चाल ही चल रही है. पार्टी ने अभी तक ना तो कोई बड़ा कार्यक्रम घोषित किया है ना ही अपने आपसी झगड़ों से छुटकारा पाया है. हालांकि कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि जल्द ही आप जैसी नई नवेली पार्टी से सीख लेकर उनका स्थानीय नेतृत्व कार्यकर्ताओं में जान फूंकने का काम शुरू कर देगा.

‘हर्पीज और एलर्जी अलग हैं’

मनीषा यादव
मनीषा यादव

मुझे बहुत से पाठकों ने कहा कि आप ‘हर्पीज’ पर लिखें- ‘हर्पीज’ यानी ‘हर्पीज जॉस्टर’, (जैसे गांधीजी बोलो तो लोग यह मान लेते हैं कि महात्मा गांधी.)

पर ‘हर्पीज जॉस्टर’ की बात बताऊंगा तो चिकनपॉक्स की बात भी स्वत: निकलेगी. दोनों ही बीमारियों में बदन पर दाने निकल आते हैं. चिकनपॉक्स में पूरे शरीर पर, ‘हर्पीज’ में शरीर के किसी छोटे से हिस्से पर ही. दोनों ही बीमारियां एक ही तरह के कीटाणु (वायरस) से होती हैं जिसे ‘वेरिसेल्ला-जॉस्टर वायरस’ कहा जाता है. इसे यूं समझें कि वायरस दोनों में वही चिकनपॉक्स वाला ही है पर बीमारियां अलग हैं. कभी यह न समझें कि हर्पीज जॉस्टर चिकनपॉक्स जैसा है. दोनों एकदम अलग बीमारियां हैं. हां, दाने चिकनपॉक्स जैसे ही निकलते हैं. पर दोनों यहीं से एकदम अलग हो जाते हैं. यूं समझें कि यदि आपको बचपन में कभी चिकनपॉक्स हुआ था, या मात्र उस बीमारी से आप एक्सपोज भी हुए थे- तो वर्षों बाद, बल्कि दशकों बाद, कभी आपको हर्पीज जॉस्टर नामक बीमारी हो सकती है. इस बीमारी में होता यह है कि आपके शरीर में तब प्रवेश कर गए चिकनपॉक्स वायरस (वेरिसेल्ला वायरस) चुपके से जाकर आपकी नसों की गांठों में छुप जाते हैं. वहीं वर्षों तक छुपे रहते हैं. फिर एक दिन, उस गांठ से निकलकर, त्वचा के उस पूरे टुकड़े पर छा जाते हैं जिसे यह नस, स्नायुतंत्र तथा सेंसेशनस सप्लाई करती है. त्वचा में पहुंचकर ये उस छोटे से इलाके में चिकनपॉक्स जैसे दाने, पैदा कर देते हैं. चूंकि एक नस में यह बीमारी हुई है तो बेहद दर्द भी होता है.

मरीज मूलत: यही कहता हुआ आता है कि सर देखिए, छाती (या हाथ, पांव, पीठ, नितंब, चेहरे या पांव आदि में कहीं भी) ये दाने निकल आए हैं और बड़ा तेज दर्द भी हो रहा है. मरीज प्राय: समझता है कि किसी एलर्जी की वजह से ये दाने हो गए हैं. वह बताता है कि शायद किसी कीड़े ने काट लिया है. या शायद सोते में मकड़ी दब कर कुचल गई और उसका

द्रव्य निकल कर त्वचा में लग गया, सो यह एलर्जी हो गई है.

याद रहे. यदि शरीर के एक हिस्से में अचानक चिकनपॉक्स जैसे दाने निकल आएं तो यह हर्पीज जॉस्टर हो सकता है. यदि दानों के साथ उस इलाके में तेज जलन जैसा या चमक वाला दर्द भी हो रहा है तो यह हर्पीज हो सकता है. यदि शरीर के एक ही तरफ (बाएं या दाएं दाने आए हों) पर मध्य के हिस्से को पार करके दूसरी तरफ बिल्कुल न हों तब पक्के से यह हर्पीज की बीमारी है. चिकनपॉक्स की भांति इसमें बुखार नहीं होता. फिर यह बच्चों की बीमारी भी नहीं है. प्राय: पांचवें-छठवें दशक के बाद के बुढ़ापे में कदम रखते लोगों या अधेड़ों की बीमारी है. ऐसे दानों को एलर्जी न मानें. फालतू में एलर्जी की दवाई या क्रीम पोतने न बैठ जाएं. यह एकदम अलग ही बीमारी है. इसका इलाज भी एलर्जी से एकदम अलग है. और, खराब बात यह है कि दाने सूख जाने के बाद भी उस इलाके में इतना तेज दर्द बना रह सकता है कि जिंदगी दूभर कर डाले. यदि अधिक उम्र में ‘हर्पीज जॉस्टर’ हो जाए तो इस दर्द के बने रह जाने का डर और ज्यादा रहता है इसे ‘पोस्ट हर्पीटिक न्यूरेल्सिया’ कहते हैं. इस दर्द की कुछ विशिष्ट दवाएं हैं. यह आम दर्द की दवाओं से ठीक नहीं होता. कई बार ये विशिष्ट दवाईयां भी काम नहीं करती हैं. इस न्यूरेल्सिया के कारण कभी-कभी तो लोग आत्महत्या तक कर लेते थे.

वैसे यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है सो यह न मान लें कि जवानी में हुई है तो ‘हर्पीज’ हो ही नहीं सकती. हां, प्राय: यह बाद की उम्र की बीमारी है.

यदि यह चेहरे पर हो जाए तो कभी आंख की पुतली पर दाने भी बन जाते हैं तब इससे आंख की रोशनी तक जा सकती है. जुबान तथा कान के अंदर तक दाने हो जाने पर ऐसा हो सकता है कि आधी जीभ में स्वाद का ही पता न चले. चेहरे की ‘हर्पीज’ में चेहरे की नस खराब हो जाए तो चेहरा (चांद के मुंह की तरह) टेड़ा हो सकता है.

प्राय: ये दाने आएं, दर्द उससे पूर्व ही चालू हो जाता है. आदमी दर्द से तड़प कर अस्पताल जाता है जहां उस दर्द को कुछ भी समझकर कुछ भी जांचें तथा इलाज शुरू हो सकता है. मैंने छाती की ‘हर्पीज’ के ऐसे रोगियों को देखा है जिनको ‘हार्ट अटैक’ की लाइन पर इलाज चल पड़ा और एक दो दिन में जब छाती पर दाने निकल आए तब जाकर पता चला कि असली मामला क्या है! हां, एक अलर्ट डॉक्टर दर्द के विवरण से ही जान जाता है कि शायद ‘हर्पीज’ हो रहा है.

क्या ‘हर्पीज’ वाला मरीज दूसरे को हर्पीज कर सकता है? नहीं. ‘हर्पीज’ सालों का मामला है. अलबत्ता, कमजोर बूढ़ों या जिनको चिकनपॉक्स का टीका न लगा हो और कभी चिकनपॉक्स भी न हुआ हो वे यदि हर्पीज जॉस्टर के मरीज के सघन संपर्क में रहें तो उनको इससे चिकनपॉक्स अवश्य हो सकता है. एचआईवी, बहुत ज्यादा उम्र, बहुत कमजोर लोग, कैंसर की कीमोथैरेपी ले रहे लोगों में हर्पीज बिगड़ भी सकती है- पूरे शरीर में फैल भी सकती है. वर्ना, प्राय: यह दो तीन सप्ताह में ठीक हो जाने वाली बीमारी है.

इसका इलाज क्या है डॉक्टर साहब?
इलाज है. घरेलू इलाज न लेने बैठ जाएं. न ही, केमिस्ट से लेकर एलर्जी की कोई गोली खा लें. खासकर, बहुत ज्यादा दाने हों तब तो पक्का ही इलाज लें. यदि एकदम शुरुआत में एंटी वायरल दवाइयां दी जाएं तो बाद में ठीक रहेंगे. वर्ना दाने ठीक हो जाने के बाद भी उस इलाके में बेहद तेज दर्द बना रह सकता है जिसका ठीक से इलाज किसी के पास भी नहीं. तुरंत किसी अच्छे डॉक्टर

की सलाह लें!

साहित्य से किसका हित!

मनीषा यादव
मनीषा यादव

हिंदी साहित्य जगत में किसी किताब का एक बेस्ट सेलर हो जाना एक चर्चा लायक घटना है. शायद यही वजह थी कि मई, 2013 में सारा हिंदी साहित्य जगत अचानक चौंक गया. लोगों को पता चला कि हिंदी की एक युवा लेखिका का एक कहानी संग्रह ‘बेस्ट सेलर’ हो गया है. यह खबर लोगों के बीच तब पहुंची जब प्रकाशन गृह वाणी प्रकाशन ने इसके उपलक्ष्य में नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक आयोजन किया. वहां वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी ने गर्व के साथ बताया कि दो महीने के भीतर कहानी संग्रह की 1,000 प्रतियां बिकने के बाद इसे बेस्ट सेलर घोषित किया गया है. यानी 50 करोड़ से अधिक लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली हिंदी में किसी पुस्तक की महज 1,000 प्रतियों का बिकना उसे बेस्ट सेलर का दर्जा दिलाने के लिए पर्याप्त है!

इसकी तुलना में अगर हम अंग्रेजी साहित्य पर नजर डालें तो हिंदी किताबों की बिक्री सागर में एक बूंद के समान नजर आती है. चेतन भगत के पिछले उपन्यास ‘रिवॉल्युशन 2020’ को 10 लाख प्रतियों के साथ बाजार में उतारा गया था और पहले ही दिन इसकी बिक्री लाखों में हुई. अब तक आ चुके उनके पांच उपन्यासों की बिक्री 50 लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है. वहीं अमीष त्रिपाठी की शिवा ट्राइलॉजी (द इमॉर्टल्स ऑफ मेलुहा, द सीक्रेट ऑफ नागाज और द ओथ ऑफ वायुपुत्राज) की तकरीबन 20 लाख प्रतियां बिक चुकी हैं और इससे 50 करोड़ रुपये से अधिक की खुदरा आय हो चुकी है.

अब हम हिंदी में बेस्ट सेलर वाली घटना पर वापस लौटते हैं. दरअसल इस घटना से हिंदी साहित्य जगत की कई गुत्थियों को समझा जा सकता है. इसी से यह भी समझा सकता है कि  लेखन,पठन और प्रकाशन के खेल में प्रकाशक सारे नियम तय करने वाले कैसे बन बैठे हैं. सबसे पहले लेखक की बात करते हैं. पिछले साल जिन लेखिका की किताब बेस्ट सेलर घोषित की गई थी उनके बारे में कहा जाता है कि वे अपनी आजीविका के लिए पूर्ण रूप से साहित्य लेखन पर निर्भर नहीं हैं. यदि ऐसा किसी बेस्ट सेलर की लेखिका के लिए कहा जा सकता है तो बाकी साहित्यकारों के लिए यह मानने में कोई मुश्किल नहीं है कि केवल लेखन के जरिये अपनी आजीविका चलाना उनके लिए लगभग असंभव है. वैसे यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि हिंदी के सभी स्थापित लेखक अपनी आजीविका के लिए नौकरी या व्यवसाय पर निर्भर हैं.

उधर दूसरी तरफ पाठकों की यह आम शिकायत है कि हिंदी में उत्कृष्ट और पठनीय सामग्री कम मिलती है जबकि अंग्रेजी में शोधपरक और तथ्यात्मक रचनाओं की भरमार है. हिंदी में फिक्शन और नॉन फिक्शन किताबों के निम्न स्तर तथा हिंदी व अंग्रेजी किताबों की तुलना के बारे में कवि एवं दखल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक कुमार पांडेय कहते हैं, ‘चूंकि प्रकाशक पैसे नहीं देते इसलिए हिंदी के अधिकतर लेखक पार्ट टाइम लेखक हैं. नौकरी या व्यापार से बचे हुए समय में लिखने वाले. उनके पास अंग्रेजी के लेखकों की तरह शोध करने, घुमक्कड़ी करने या मूड के हिसाब से लिखने का वक्त भी नहीं और सुविधा भी नहीं.’ अशोक ने कुछ समय पहले ही अपने कुछ साथियों के साथ प्रकाशनगृह शुरू किया है.

पाठकों कमी बस एक बहाना है
यह एक बड़ा सवाल है कि तकरीबन आधा अरब लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली भाषा हिंदी जिसमें देश के सर्वाधिक प्रसार वाले अखबार प्रकाशित होते हैं, उसमें किताबों की बिक्री की दशा इतनी शोचनीय क्यों है? अगर पढ़ने वाले इतने ही कम होते तो हिंदी में इतने सारे अखबार हर साल प्रसार संख्या का नया रिकॉर्ड नहीं बना रहे होते. पिछले दिनों तहलका समेत हिंदी की प्रमुख राजनीतिक और विमर्श पत्रिकाओं ने साहित्य-संस्कृति पर केंद्रित जो विशेषांक निकाले उन्हें पाठकों ने खूब पढ़ा और सराहा. इसी तरह हिंदी में साहित्य और विचार पर आधारित अनेक मासिक पत्रिकाएं निकलती हैं जिनकी अच्छी-खासी प्रसार संख्या है. ऐसे में किसी को भी इस बात पर आश्चर्य हो सकता है कि क्या ये पाठक साहित्यिक किताबों में रुचि नहीं रखते?  दरअसल किताबें की बिक्री का सीधा संबंध उनकी कीमतों से जुड़ता है. यदि आप एक ही किताब, जो अलग-अलग प्रकाशनगृह ने छापी है को ही देख लें तो आप समझ सकते हैं कि हिंदी साहित्यजगत में कीमतों का कोई नियम नहीं है. एक प्रकाशनगृह अगर 150 पृष्ठ की किताब को 70 रुपये में बेच रहा है तो दूसरा उसी को 200 रुपये में और तीसरा 500 रुपये में भी बेच सकता है. हिंदी के प्रतिष्ठित कवि विष्णु खरे ने कुछ अरसा पहले अपने एक आलेख में हिंदी प्रकाशन जगत पर जबरदस्त प्रहार करते हुए कहा था कि वे अपनी पुस्तकों का दाम लागत से कम से कम छह गुना अधिक रखते हैं और इस तरह वे केवल संस्थागत खरीद के ही लायक रह जाती हैं. इसी आलेख में खरे यह सुझाव भी देते हैं कि पुस्तकों के मूल्य निर्धारण के लिए एक समिति का गठन किया जाना चाहिए जिसमें लेखक, प्रकाशक और सरकार सभी के प्रतिनिधि शामिल हों. ऐसा करने से इसमें कुछ हद तक पारदर्शिता लाई जा सकती है.

आधिकारिक तौर पर इस बात को कोई स्वीकार नहीं करना चाहता है लेकिन हिंदी प्रकाशन जगत की एक बड़ी सच्चाई यह है कि पाठक बड़े प्रकाशकों की सोच की जद से पूरी तरह बाहर हो चुके हैं. हिंदी के एक बड़े कहानीकार नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, ‘ हमारे लेखन का मकसद है कि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे. लेकिन हमारी तमाम शिकायतों पर प्रकाशकों का एक ही जवाब है कि हिंदी में साहित्य के पाठक नहीं हैं.’ प्रकाशकों के संबंध में इन कहानीकार की बात बिल्कुल सही प्रतीत होती है. औपचारिक-अनौपचारिक हर तरह की चर्चा में तमाम बड़े प्रकाशक पाठकों की कमी को हिंदी प्रकाशन उद्योग के लिए एक खतरे की तरह बताते हैं. यदि इस बात में सच्चाई है तो पिछले सालों दर्जनों प्रकाशन गृहों को बंद हो जाना चाहिए था? लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उल्टे बीते एक दशक में कई प्रकाशन गृह न सिर्फ स्थापित हुए बल्कि छपने वाली किताबों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है. इस उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि प्रकाशक किताबों के प्रकाशन के वक्त पुस्तकालयों और सरकारी खरीद को ही ध्यान में रखते हैं. यही वजह है कि उनकी किताबों के दाम बहुत ज्यादा होते हैं. प्रकाशन जगत के एक और स्याह पहलू को उजागर करते हुए अशोक कहते हैं, ‘कुछ बड़े लेखक जो सत्ता प्रतिष्ठानों पर काबिज होते हैं वे बड़े प्रकाशकों के साथ होते हैं. वे सारे इंतजामात में मदद करते हैं. पाठकों की कमी का रोना दरअसल लेखकों को उनकी हद में रखने और रॉयल्टी आदि से बचने के लिए किया जाता है. इससे प्रकाशक बहुत बड़ा और लेखक बहुत छोटा बनता चला गया है.’ अशोक अपनी बात आगे बढ़ाते हुए हिंदी में बेस्ट सेलर की असलियत बताते हुए एक और बात उजागर करते हैं, ‘ हिंदी में बेस्ट सेलर जैसा कुछ नहीं होता, इसे प्रकाशक गढ़ता है. पिछले दिनों एक युवा लेखिका की बेहद औसत किताब को जबरदस्ती चर्चा में लाया गया. बेस्टसेलर घोषित किया गया. बाद में पता चला कि वह हिंदी के दो बड़े प्रकाशक भाइयों की प्रतिद्वंद्विता का फल था.’

हिंदी साहित्य जगत में कई छोटे प्रकाशक भी हैं. ये अपनी आमदनी के लिए सर्वथा अलग तरीका अपनाते हैं. ऐसा तरीका जिसे अनैतिकता की बहस से बाहर जाकर देखें तो यह अपने आप में काफी दिलचस्प है. दरअसल हिंदी पट्टी में साहित्यकार कहलाने की चाहत रखने वाले कुछ स्तरहीन लेखकों की बड़ी जमात मौजूद है. ये किसी भी कीमत पर किताब छपवाने के लिए व्याकुल रहते हैं. इनका फायदा ऐसे प्रकाशक उठाते हैं. वे लेखकों से प्रकाशन मूल्य से अधिक पैसे लेकर सौ-दो सौ प्रतियां छाप देते हैं. यहां किताब छपने से पहले ही प्रकाशक को अपने हिस्से का मुनाफा हासिल हो जाता है. खैर पाठकों को तो ऐसे ‘ साहित्यकारों ‘ से कुछ लेनादेना ही नहीं होता. फेसबुक और ब्लॉग जैसे त्वरित माध्यमों के आने के बाद ऐसे लेखकों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है. नतीजतन छोटे प्रकाशक भी उसी अनुपात में बढ़े हैं. हाल ही में दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में इसकी एक मजेदार बानगी देखने को मिली. एक प्रकाशक ने बाकायदा लेखकों से अपील की कि वह उचित दर पर पुस्तकें छापने का उनका सपना पूरा कर सकता है. उस प्रकाशक ने न केवल किताब छापने बल्कि सभा, गोष्ठी करवाने तथा पुस्तक की समीक्षा करवाने जैसी मार्केटिंग रणनीतियां अपनाने का भी आश्वासन दिया.

रॉयल्टी का गणित
हिंदी लेखकों को मिलने वाली रॉयल्टी एक ऐसा मुद्दा है जिसको सुलझाने से यदि शुरुआत की जाए तो पाठकों और साहित्यकारों की कई शिकायतें दूर हो सकती हैं. लेखकों को उनकी हर बिकने वाली किताब पर मुनाफे का एक हिस्सा, वार्षिक आधार पर दिया जाता है. यही रॉयल्टी होती है. आमतौर पर हार्डबाउंड पुस्तकों के मूल्य का 10 से 15 फीसदी जबकि पेपरबैक पर तकरीबन 7.5 फीसदी रॉयल्टी देने का चलन है. लेकिन यह गणित कागज पर जितना आकर्षक दिखता है वास्तव में उतना है नहीं. क्योंकि लेखकों को मिलने वाली रॉयल्टी का किताबों की बिक्री से सीधा संबंध है और किताबों की बिक्री के आंकड़े प्रकाशन समूह के पास रहते हैं. ऐसे में ज्यादातर साहित्यकारों को अपनी कृतियों पर नाममात्र रॉयल्टी ही मिल पाती है. वरिष्ठ साहित्यकार मधु कांकरिया बताती हैं कि उनके चार उपन्यास और एक कहानी संग्रह राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हो चुके हैं जिनके लिए उन्हें एक साल में तकरीबन 8,000 रुपये की रॉयल्टी मिलती है. इसके अलावा वाणी प्रकाशन, किताबघर और ज्ञानपीठ से प्रकाशित किताबों के लिए कांकरिया को क्रमश: 6,000 और तीन-तीन हजार रुपये रॉयल्टी के रूप में मिले हैं. वहीं जब उनकी किताब ‘सेज पर संस्कृति’ त्रिवेंद्रम विश्वविद्यालय के बीए के पाठ्यक्रम में शामिल की गई तो राजकमल प्रकाशन ने उसका विद्यार्थी संस्करण प्रकाशित किया. इस नए संस्करण के बारे में काफी लिखत-पढ़त के बाद उनको 500 रुपये की रॉयल्टी दी गई जो ऊपर लिखी गई 8,000 रुपये की राशि में शामिल है.

रॉयल्टी के इस खेल को स्पष्ट करते हुए कांकरिया बताती हैं, ‘ प्रकाशकों का पूरा जोर नई किताबें छापने पर होता है क्योंकि उन किताबों की सरकारी खरीद और पुस्तकालयों में आपूर्ति आदि की संभावना रहती है. ऐसे में पुरानी किताबों की बिक्री अगर होती भी है तो उसके आंकड़े प्राय: सार्वजनिक नहीं किए जाते हैं. इसका असर लेखक को मिलने वाली रॉयल्टी पर पड़ता है.’

एक सीधा गणित है कि यदि किताबें ज्यादा से ज्यादा बिकें तो लेखकों को रॉयल्टी के जरिए ज्यादा आमदनी होगी वहीं प्रकाशकों को भी फायदा होगा. लेकिन इसके लिए किताबों को पाठकों के बजट के भीतर लाना होगा. यानी उनकी कीमतों में कमी करनी होगी. किताबें सस्ती करने के खिलाफ प्रकाशक चाहे जो भी तर्क दें लेकिन यह इतना मुश्किल भी नहीं है. इस समय प्रकाशक सीधे वितरकों को अपनी किताबें बेचने के लिए 20 से 30 फीसदी तक की छूट दे देते हैं. अगर यह छूट पाठकों तक पहुंचे तो क्या किताबों की बिक्री में जबरदस्त इजाफा नहीं होगा?

हिंदी के प्रकाशक और लेखक किताबों की मार्केटिंग को भी तवज्जो नहीं देते जबकि यह किताबों की बिक्री के लिए खासी अहम है. कुछ अरसा पहले अमीष त्रिपाठी ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि कोई भी लेखक अगर यह सोचता है कि अच्छी किताब खुद लोगों को अपनी ओर आकर्षित करेगी तो वह गलत है. बगैर मार्केटिंग के ऐसा संभव नहीं है. भारतीय इतिहास में सबसे तेज बिक्री वाली किताबें लिखकर रिकॉर्ड बुक में अपना नाम दर्ज करा चुके अमीष ने खुद जब अपनी पहली किताब लिखी थी तो उसे बाजार में उतारने के पहले उसके कुछ चैप्टर उन्होंने प्रतिष्ठित बुक स्टोर पर रखवाए थे. ये चैप्टर वहां से खरीदारी करने वाले हर ग्राहक को मुफ्त दिए जाते थे. आश्चर्य नहीं कि बाजार में आने के पहले ही उनकी किताब की भारी मांग तैयार हो चुकी थी. शायद यही वजह है कि चेतन भगत और अमीष त्रिपाठी समेत आज देश के बेस्टसेलर लेखकों में से ज्यादातर आईआईएम के पासआउट हैं.

क्या आज की परिस्थितियों के देखते हुए यह माना जाए हिंदी साहित्य जगत अपने असली बेस्टेसेलर की खोज का कोई उपाय नहीं है और इसका निर्णय हमेशा की तरह प्रकाशक ही करते रहेंगे? युवा साहित्यकार सत्यनारायण पटेल इसका एक सटीक समाधान देते हैं, ‘ हमारे यहां लेखकों को किताबें छपवाकर अनुगृहीत होने का भाव त्यागना चाहिए. यदि उन्हें प्रकाशकों की जरूरत है तो प्रकाशकों के लिए भी वे जरूरी हैं. इस संबंध में जितनी बराबरी आएगी, उतनी अच्छी किताबें छपेंगी, उतने ज्यादा पाठक बढ़ेंगे.’