Home Blog Page 1413

गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ : सीधे-सादे और जटिल

mukti

भोपाल के हमीदिया अस्पताल में मुक्तिबोध जब मौत से जूझ रहे थे, तब उस छटपटाहट को देखकर मोहम्मद अली ताज ने कहा था–

उम्र भर जी के भी न जीने का अन्दाज आया,
जिन्दगी छोड़ दे पीछा मेरा मैं बाज आया.

जो मुक्तिबोध को निकट से देखते रहे हैं, जानते हैं कि दुनियावी अर्थों में उन्हें जीने का अन्दाज कभी नहीं आया. वरना यहां ऐसे उनके समकालीन खड़े हैं, जो प्रगतिवादी आन्दोलन के कन्धे पर चढ़कर ‘नया पथ’ में फ्रन्ट पेजित भी होते थे, फिर पण्डित द्वारकाप्रसाद मिश्र की कृष्णयान का धूप-दीप के साथ पाठ करके फूलने लगे और अब जनसंघ की राजमाता की जय बोलकर फल रहे हैं. इसे मानना चाहिए कि पुराने प्रगतिवादी आन्दोलन ने भी मुक्तिबोध का प्राप्य नहीं दिया. बहुतों को दिया. कारण, जैसी स्थूल रचना की अपेक्षा उस समय की जाती थी, वैसी मुक्तिबोध करते नहीं थे. न उनकी रचना में कहीं सुर्ख परचम था, न प्रेमिका को प्रेमी लाल रूमाल देता था, न वे उसे लाल चूनर पहनाते थे. वे गहरे अंतर्द्वंद्व और तीव्र सामाजिक अनुभूति के कवि थे. मजे की बात है कि जो निराला की सूक्ष्मता को पकड़ लेते थे, वे भी मुक्तिबोध की सूक्ष्मता को नहीं पकड़ते थे.

दूसरी तरफ के लोग उनके पीछे विच हण्ट लगाए थे. उनके ऊबड़-खाबड़पन से अभिजात्य को मतली आती थी. वे उनके दूसरे खेमे में होने की बात को इस तरह से कहते थे, जैसे- अ गुड मैन फालेन अमंग फेबियंस.

वे गहरे अंतर्द्वंद्व और तीव्र सामाजिक अनुभूति के कवि थे. मजे की बात है कि जो निराला की सूक्ष्मता को पकड़ लेते थे, वे भी मुक्तिबोध की सूक्ष्मता को नहीं पकड़ते थे

ऐसा भी नहीं है कि मुक्तिबोध को समझने वाले लोग नहीं थे. पर निष्क्रिय ईमानदार और सक्रिय बेईमान मिलकर एक षडयंत्र-सा बना लेते हैं. मजे की बात यह है कि प्रगतिवादी सत्ता प्रतिष्ठान के नेता भी, जिन्हें प्रतिक्रियावादी कहते थे, उन्हीं की चिरौरी करके उन्हें अपने बीच सम्मान से बिठाकर रिस्पैक्टेबिलिटी प्राप्त करते थे, मगर जो अपना था उसे अवहेलित करते थे. वह तो अपना है ही, उसकी नियति तय है, वह कम्बख्त कहां जाएगा? पूर्वी यूरोप से साहित्य के आयात-निर्यात की जो फर्म है, उसके माल की लिस्ट में भी मुक्तिबोध की एक लाइन नहीं थी. हां, उन्हें बराबर भेजा जाता था, जिन्हें घर में फासिस्ट कहा जाता रहा है.

मुझे याद है, जब हम उन्हें भोपाल के अस्पताल में ले गए और मुख्यमंत्री की दिलचस्पी के कारण थोड़ा हल्ला हो गया, पत्रकार मित्रों ने प्रचार किया, तब कुछ लोग, जो साहित्य की राजधानियों के थे या वहां से बढ़कर आए थे, यह कहते थे कि हम प्रान्तीयता से ग्रस्त लोग उसे हीरो बना रहे हैं. हम लोग प्राविंशियल संस्कार के लोग कहलाते थे. प्रोफेसरान और ऊंचे लेखक उन्हें देखने शुरू-शुरू में इसलिए नहीं आते थे कि कहीं प्रयाग, दिल्ली और कलकत्ता में बदनामी न फैल जाए कि हम प्राविंशियल में दिलचस्पी ले रहे हैं. प्रयाग और दिल्लीवालों ने जब गेटपास दे दिया और अदीब ने टाइम्स ऑफ इण्डिया में अंग्रेजी में तारीफ कर दी, तब इनका दिलचस्पी लेने का साहस बढ़ा. बाद में तो लेख के शुरू में मुक्तिबोध की पंक्तियां मंगलाचरण के रूप में लिखने लगे- वन्दौ वाणी विनायकौ होने लगा. उनकी मृत्यु के बाद फूल बांटने की झपटा-झपटी में कबीर की चादर की बड़ी फजीहत हुई.

यह सब-बाई दी वे. मुझसे तो नामवरजी ने कुछ संस्मरणात्मक लिखने को कहा है. संस्मरणात्मक कुछ भी लिखने में अपने को बीच में डालना पड़ता है. संस्मरणात्मक की यह मजबूरी है. यह सावधानी बरतते हुए कि उनके बहाने अपने को प्रोजेक्ट न कर दूं, कुछ चीजें लिखता हूं… गो सफल संस्मरण का वही गुण है, जिससे मैं बचना चाहता हूं.

जबलपुर में जिस स्कूल में मुक्तिबोध ने नौकरी की थी, उसी में बाद में मैंने की. अपनी मुदर्रिसी का वह आखिरी दौर था, उनकी मास्टरी उसी अहाते में खत्म हुई थी. पुराने अध्यापक उनकी बात करते थे. साहित्य में, बल्कि पत्रकारिता में मेरा प्रवेश तब हो चुका था. सुनता था, यहां तारसप्तक वाले मुक्तिबोध रहते थे. उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की. फिर वे नागपुर प्रकाशन विभाग में चले गए. तब मुक्तिबोध की नई जवानी थी. छरहरे खूबसूरत आदमी थे. तब का उनका एक चित्र है, जो राष्ट्रवाणी के मुक्तिबोध अंक में छपा है. बड़ी-बड़ी गहरी भावुक आँखें हैं. नाक बहुत सेन्सुअस है. शरीर सूख जाने पर भी मुक्तिबोध की आंखें धुंधली नहीं हुईं, सूखा चेहरा भी खूबसूरत रहा.

मैं कुछ लिखने लगा था. वे देखते रहते थे. मित्रों ने भी बताया होगा. मैं नागपुर शिक्षक सम्मेलन के सिलसिले में गया था. एक मित्र उनसे मिलाने शुक्रवारा स्थित शायद उनके मकान पर ले गए. सच, कहूं, मुझे मुक्तिबोध से डर लगता था. मित्रों, प्रशंसकों में वे महागुरु कहलाते थे. एक आतंक मेरे ऊपर था. मैं अपने अज्ञान में सिकुड़ा-सिकुड़ा पहुंचा. वे दरी पर पालथी मारे बैठे थे. पास पानी का लोटा और उस पर प्याला. हम लोग दरी पर बैठ गए. मुझसे बोले, आइए साहब! निहायत औपचारिक दो-चार मामूली बातें हुईं. यह जानकर कि मैं शिक्षकों के श्रम-संगठन के काम से आया हूं, उन्होंने आंखें फाड़कर गौर से देखा. मुझसे न लिखने की बात की, न कोई तारीफ. चाय जरूर पिलाई. आगन्तुक के बहाने खुद चाय पीने का मौका वो चूकते नहीं थे. यह मुलाकात बहुत सुखी रही. मुक्तिबोध मुझे शंका से देख रहे थे. जांच रहे थे. वे एकदम गले किसी से नहीं मिलते थे. प्रकृति से वे शंकालु थे. किसी को जैसा-तैसा स्वीकार नहीं करते थे. बाद के अनुभव और अकेलेपन ने यह शंका की प्रवृत्ति और बढ़ा दी थी. राजनांदगांव में वे कई लोगों की कल्पना में न जाने कैसी-कैसी तस्वीरें बनकर परेशान हुआ करते थे.

दिल्ली, कलकत्ता, प्रयाग के बहुत-से लोगों की इतनी अतिरंजित तस्वीर वे बनाते थे कि लगता ये सब विकट शैतान हैं, जबकि वे अपने काम में लगे तटस्थ लोग थे. शंका व असुरक्षा की भावना इतनी तीव्र हो उठी थी, बाद में, कि वह भयावह कल्पना करते रहते थे कि अमुक-अमुक लोग मेरे खिलाफ षडयंत्र कर रहे हैं, जबकि उन्हें अपना भला करने से ही इतनी फुरसत नहीं मिलती थी कि उनका बुरा करें. उनके मित्रों को यह नहीं मालूम था कि मुक्तिबोध भयंकर शैतान के रूप में उनकी कल्पना कर चुके हैं. सामान्य आदमी का वे एकदम भरोसा करते थे, लेकिन राजनीति और साहित्य के क्षेत्र के आदमी के प्रति शंकालु रहते थे. कोई महज ही उनके समीप होना चाहता था या उनकी मदद करना चाहता, तो सशंकित हो जाते. कहते, ‘पार्टनर, इसका इरादा क्या है?’ ज्यों-ज्यों उनकी मुसीबतें बढ़ती गईं, ज्यादा कड़वे अनुभव होते गए, उनके कई विश्वसनीयों का चारित्रिक पतन होता गया, उनकी शंका बढ़ती गई. वे अपने को असुरक्षित अनुभव करते गए. अंत के एक-दो साल तो वे अपने चारों तरफ डर के कांटे लगाकर जीते थे. उन्हें लगता, कोई भयंकर षडयंत्र चारों तरफ से उन्हें घेर रहा है. यह स्थिति तब बहुत तीव्र हो गई, जब सरकार ने उनकी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाया. इस बात को आगे लिखूंगा.

परिवेश से कटकर आदमी रह नहीं सकता. मुक्तिबोध-जैसे पारदर्शी सच्चाई के सरल आदमी को अपने आसपास की यह अविश्वसनीयता और अकेलापन दे देती थी

नागपुर में चार-पांच दिन रहकर भी मैं उनसे दोबारा नहीं मिला. उन्होंने भी ऐसी कोई इच्छा नहीं की. यह सीधा कहलानेवाला आदमी, कुछ मामलों में बड़ा काइयां था. वह चुपचाप बैठा जांच रहा था. आगे साल-भर तक कोई संबंध नहीं रहा. एक दिन ‘नया खून’ का ताजा अंक खोला, तो तीन कालम की एक टिप्पणी का शीर्षक था ‘थाट और परसाई की स्पिरिट में अन्तर है.’ टिप्पणीकार- गजानन माधव मुक्तिबोध. मेरी एक कहानी का अनुवाद ‘थाट’ ने छापा था. मुक्तिबोध ने थाट की राजनीति बतलाई थी और मेरी कहानी को जैसे मिसफिट कहा था. चेतावनी थी कि ये पत्र प्रचार और पैसे का लोभ देकर किसी बनते लेखक को फंसाते हैं. मेरी उस कहानी का अर्थ थाट ने साम्यवादी व्यवस्था में रेजिमेण्टेशन के सन्दर्भ में लगाकर छापा था. यों मेरी एक फैण्टेसी को पांचजन्य ने पौराणिक कथा समझकर धर्मार्थ उद्धृत कर लिया था. अपनी समझ का उपयोग करने का हर एक को हक है.

मैंने उन्हें नहीं लिखा. वे भी चुप रहे. सालेक बाद जब वसुधा निकालने की योजना बनी, तो मैंने उन्हें पत्र लिखा. वे भरे बैठे थे. बड़ा लंबा पत्र आया. लिखा था कि नया खून की उस टिप्पणी के बाद यहां लोगों ने मुझसे बार-बार कहा कि आपको बहुत बुरा लगा है. मैं दूर हूं. लोगों से संपर्क होता नहीं है. सुनता रहता हूं. सोचा, सीधे आपसे बात कर लूं. मैं साफ बात करना पसंद करता हूं. आप मुझे साफ बताइए कि क्या उस टिप्पणी से आपको बुरा लगा?

मैं समझ गया कि मेरी-उनकी निकटता को घटित न होने देने में किन्हीं लोगों ने अपना फायदा देखा होगा. अपना फायदा देखने का भी हर एक को हक है. बाद में पता चला कि इन लोगों ने अपने समकालीनों के लिए खुफिया विभाग भी खोल रखा था और जगह-जगह एलची नियुक्त कर रखे थे. हमारे मित्र प्रमोद वर्मा जब तबादले पर जबलपुर आए, तब उन्हें हेड ऑफिस से चिट्ठी मिली थी कि यहां किससे संबंध रखना और किससे नहीं, इस बारे में अमुक से हिदायत ले लो. प्रमोद ने लिख दिया था कि शत्रु और मित्र मैं खुद बनाता हूं. उस चिट्ठी को मुक्तिबोध के सामने हम लोगों ने पढ़ा और खूब हंसते रहे. खैर, ये स्थानीय मधुर पालिटिक्स की बातें हैं. मगर परिवेश से कटकर आदमी रह नहीं सकता. मुक्तिबोध-जैसे पारदर्शी, सच्चाई के सरल आदमी को अपने आसपास की यह अविश्वसनीयता और अकेलापन दे देती थी.

‘कामायनी ः एक पुनर्विचार’ को छापने के लिए एक पुस्तक विक्रेता मित्र शेषनारायण राय राजी हो गए थे. वे पेशे से प्रकाशक नहीं हैं. पैसा लगा देने को तैयार थे. मुक्तिबोध जी पर उनकी श्रद्धा थी. तब मुक्तिबोध को कोई प्रकाशक नहीं मिलता था. पुस्तक की कम्पोजिंग चल रही थी, तब वे जबलपुर आए. तीन दिन हो गए, पर उन्होंने न किताब की बात की, न राय से मिलने की इच्छा. पहले तो रात-दिन पुस्तक छापने की लौ लगी रहती थी और अब यह विराग. मैंने कहा- आप प्रकाशक से तो मिल लीजिए. वे यहीं पास में रहते हैं. मुक्तिबोध खिन्न भाव से बोले- मिल लेंगे, पार्टनर. कोई उससे मिलने थोड़े ही आए हैं. मैंने कहा- सच बताइए मामला क्या है? वे बोले- अब पाण्डुलिपि तो दे ही चुके हैं. अमुक साहब कह रहे थे कि आप बुरे फंस गए. वह राय तो बहुत खराब आदमी है. खैर! मैंने राय से कहा, राय हंसा. कहने लगा- वही साहब मुझसे कह गए थे कि तुम पैसा पानी में डाल रहे हो. उस किताब को कौन खरीदेगा. मुक्तिबोध उनका विश्वास करते थे. वे बड़े हैरान हुए. कहने लगे- आखिर उसने ऐसा किया क्यों? बाद में राय ने उन्हें रुपये पेशगी दिए. दुकान से वो कुछ किताबें भी ले गए. बहु गदगद थे. ऐसे मौकों पर वे बच्चे की तरह हो जाते थे- वाह पार्टनर, आपका यह राय भी मजे का आदमी है. उसने इतने रुपये दे दिए. अगर उन्हें किसी से मुश्किल से सौ रुपये मिलने की उम्मीद है और वह दो सौ रुपये दे दे, तो वह चकित हो जाते. कहते- पार्टनर, यह भी बड़ी मजे की बात है. उसने तो दो सौ रुपये दे दिए. इतने रुपये कोई कैसे दे देता है. इस पुस्तक का प्रकाशन वो अपने ऊपर अहसान मानते थे. राजनांदगांव से उन्होंने राय को अंग्रेजी में एक चिट्ठी लिखी, जो कोई लेखक प्रकाशक को नहीं लिखेगा. लिखा था- पुस्तक अच्छी छपनी चाहिए. मैं आपको लिखकर देता हूं कि मुझे आपसे एक भी पैसा नहीं चाहिए, बल्कि आपका कुछ ज्यादा खर्च हो जाए तो मैं हरजाना देने को तैयार हूं.

राजनांदगांव में वे अपेक्षाकृत आराम से रहे. शरद कोठारी तथा अन्य मित्रों ने उनके लिए सब कुछ किया. पर वे बाहर निकलने को छटपटाते थे. वे साल में एक-दो बार किसी सिलसिले में जबलपुर आते और खूब खुश रहते, रंगीन सपने में डूबते हुए कहते- पार्टनर, ऐसा हो कि एक बड़ा-सा मकान हो. सब सुभीते हों. कोई चिंता न हो. वहां हम कुछ मित्र रहें. खूब बातें करें, खूब लिखे-पढ़ें और जंगल में घूमें. फिर कहते- आप राजनांदगांव आइए. वहीं कुछ दिन रहिए. बहुत बड़ा मकान है. कोई तकलीफ नहीं होगी. नो, नो, आई इनवाइट यू.

मुक्तिबोध की आर्थिक दुर्दशा किसी से छिपी नहीं थी. उन्हें और तरह के क्लेश भी थे. भयंकर तनाव में वे जीते थे. पर फिर भी बेहद उदार, बेहद भावुक आदमी थे. उनके स्वभाव के कुछ विचित्र विरोधाभास थे. पैसे-पैसे की तंगी में जीनेवाला यह आदमी पैसे को लात भी मारता था. वे पैसा देनेवाली पत्रिकाओं में लिखकर आमदनी बढ़ा सकते थे, पर लिखते नहीं थे. कहते – अपनी पत्रिका में लिखेंगे. बस मुझे कागज आप दे दीजिए. यों वे बहुत मधुर स्वभाव के थे. खूब मजे में आत्मीयता से बतियाते थे. मगर कोई वैचारिक चालबाजी करे या ढोंग करे, तो मुक्तिबोध चुप बैठे तेज नजर से उसे चीरते रहते. उस वक्त उनके ओठ किसी बदमाश स्कूली लड़के की तरह मुड़ जाते. आपस में मित्रों से एकरस हो जाते, मगर तभी वर्ग-चेतना जाग उठती, तो अजनबी होने लगते. जबलपुर आये तो मेरे घर पर एक मित्र हनुमान वर्मा से मुलाकात हुई. हनुमान कॉलेज में पढ़ाते हैं. खूब यारबाश आदमी हैं. दो-तीन दिन खूब मजे में उनसे मुक्तिबोध की जमती रही. फिर हनुमान अपने घर ले गया. वहां अच्छा-सा सोफा था. डाइनिंग टेबल भी थी. मुक्तिबोध को खटका लग गया. वे शिष्ट व्यवहार करने लगे. लौटते वक्त रास्ते में मुझसे बोले- पार्टनर, इस आदमी से अपनी कैसे पट सकती है! उसका सोफा देखो, डाइनिंग टेबल देखो. यह अपनी दुनिया का आदमी नहीं है. ही बिलांग्ज टू ए डिफरेण्ट वर्ल्ड. मैंने कहा – छह-सात सौ ही पाता है वह. अपनी ही दुनिया का आदमी है. पर यह बात गले उतरने में देर लगी.

वर्ग-चेतना के तीव्र बोध की एक-दो घटनाएं दिलचस्प हैं. मुझ पर एक प्रकाशक ने कॉपीराइट का मुकदमा चला दिया था. मुक्तिबोध आये हुए थे. दिसंबर का महीना था. भोजन करके वे सामने के मैदान में बैठे थे. मैं कचहरी जाने लगा, तो पूछा, पार्टनर, मजिस्ट्रेट कौन है? मैंने नाम बताया. वे बोले – नाम से मालूम होता है कि वह नीची जाति का है. विदर्भ में होते हैं ये लोग. आप छूट जाएंगे. मैंने यह पूछा – यह अन्दाज आपको कैसे लगा? उन्होंने कहा – वह नीची जाति का है न! उसकी वर्ग-सहानुभूति लेखक के प्रति होगी, प्रकाशक के साथ नहीं. संयोग से मुकदमा खारिज भी हो गया.

संबंधों में लचीले, मगर विचारों में इस्पात की तरह. कहीं कोई समझौता नहीं. पैसे-पैसे के लिए तंग रहते थे, पर पैसे को लात भी मारते थे. कभी बिल्कुल निस्संग हो जाते, कभी मोहग्रस्त

एक साहित्य-समारोह में एक वयोवृद्ध ब्राह्मण आचार्य थे. विवाद की स्थिति थी ही. आचार्य के मातहत एक अध्यापक ने भी भाषण में आचार्य जी का समर्थन किया. बाद में मुक्तिबोध अकेले में हम लोगों से बड़ी गंभीरता से बोले – वह जो अध्यापक है, उसकी सहानुभूति हमारी तरफ है. नौकरी के लिए आचार्य की बात बोल रहा था. वह जाति का अहीर है न! वह हमारा साथ देगा, ब्राह्मण आचार्य का नहीं.

पर एक दूसरे मौके पर दूसरी ही तरह की बात कहकर उन्होंने हमें चौंकाया. एक आदमी बड़ा ओछा व्यवहार कर रहा था. हम सब लोगों की पीठ पीछे निंदा करता था. मुक्तिबोध सुनते-सुनते बोले – पार्टनर, वह जात का लोधी है न! इसलिए.

मुक्तिबोध विचारों से आधुनिक लेकिन इसके साथ ही व्यवहार में कई बातों में बिल्कुल सामंती. किसी को अपने घर में साग्रह खाना खिलाना, अपनी हैसियत से बाहर खातिर करना उनकी खास प्रकृति थी. लगता था, कोई पुराने ठाकुर साहब हैं, जिन्हें मूंछें मुड़ाना पड़ेगा, अगर मेहमाननवाजी में कमी आयी. एक बार नागपुर में जब वे तीव्र ज्वर में नया खून के टीन के नीचे काम कर रहे थे, मैं पहुंच गया. भर-दोपहर में पास की दुकान पर मुझे मिठाई खिला लाए, तब चैन पड़ा. मैंने बहुत मना किया, पर वे कहते- नहीं साहब, आप आए हैं, तो कुछ खाना तो पड़ेगा. पक्षाघात से पीड़ित थे, तब हम उन्हें भोपाल के लिए लेने पहुंचे. उस हालत में भी वो हड़बड़ा रहे थे कि इनके लिए क्या कर दिया जाए. कहने लगे- आप मेरे महमान हैं. आप मेरे यहां क्यों नहीं ठहरेंगे, कोठारी के यहां क्यों? कोठारी से भी शिकायत की- क्यों साहब, यह क्या हरकत है? इन्हें आपने रास्ते में क्यों रोक लिया? इसमें बनावट नहीं थी. उनकी सच्ची ममता थी, उनके आंतरिक संस्कार थे. वे नयी से नयी वैज्ञानिक उपलब्धि से मुग्ध होते थे, पर परिवार-नियोजन के खिलाफ थे. परिवार-नियोजन को पूंजीवादी सभ्यता की प्रवृत्ति मानते थे. विचारों के मामले में जितने सधे हुए, जिंदगी की व्यवस्था में उतने ही लापरवाह. स्वास्थ्य के प्रति अत्यंत असावधान थे. संबंधों में लचीले, मगर विचारों में इस्पात की तरह. कहीं कोई समझौता नहीं. पैसे-पैसे के लिए तंग रहते थे, पर पैसे को लात भी मारते थे. कभी बिल्कुल निस्संग हो जाते, कभी मोहग्रस्त.

मुक्तिबोध विद्रोही थे. किसी भी चीज से समझौता नहीं करते थे. स्वास्थ्य के नियमों और अर्थशास्त्र के सिद्धांतों से भी नहीं. उनकी राजनीति है, यह बात सर्वविदित थी. नागपुर में सरकारी नौकरियों में थे, तब उनके पीछे साम्यवाद विरोधी भूत लगे रहते थे. उनके विचारों ने कभी उन्हें नौकरी में ऊपर नहीं उठने दिया. राजनांदगांव के प्राइवेट कॉलेज की नौकरी उन्हें अनुकूल पड़ी. वहां उन्हें लोगों ने बड़े श्रद्धा-प्रेम से रखा.

मुक्तिबोध भयंकर तनाव में जीते थे. आर्थिक कष्ट उन्हें असीम थे. उन जैसे रचनाकार का तनाव साधारण से बहुत अधिक होगा भी. वे संत्रास में जीते थे. आजकल संत्रास का दावा बहुत किया जा रहा है. मगर मुक्तिबोध का एक-चौथाई तनाव भी कोई झेलता तो उनसे आधी उम्र में मर जाता. मृत्यु से दो साल पहले वे जबलपुर आए थे. रात-भर वे बड़बड़ाते थे. एक रात चीखकर खाट से फर्श पर गिर पड़े. संभले, तब बताया कि एक बहुत बड़ी छिपकली सपने में सिर पर गिर रही थी.

उन दिनों उनकी पुस्तक ‘भारत : इतिहास और संस्कृति’ पर प्रतिबंध लग चुका था. वह पुस्तक कोर्स में लग चुकी थी. उसके खिलाफ आन्दोलन करानेवाले मुख्यत ः दूसरे प्रकाशक थे. आंदोलन में जनसंघ प्रमुख था. इसके साथ ही गैर-सांप्रदायिक पत्रों के भी बिके हुए संपादक थे. जनसंघ उनके पीछे पड़ गया था. राजनांदगांव में उसके स्वयंसेवक उन्हें परेशान करते थे. उस वक्त विद्वान लेकिन अधिकारहीन राज्यपाल था और भ्रष्ट तथा मूर्ख मुख्यमंत्री. राज्यपाल ने डेढ़ घण्टे बात की, बात मानी भी, पर कहा- मैं क्या कर सकता हूं. मुख्यमंत्री के पोर्टिको के पास मुक्तिबोध घण्टे-भर खड़े रहे. वह बंगले से निकला तो ये बात करने बढ़े. बात शुरू ही की थी कि बोला- उसमें अब कुछ नहीं हो सकता. इन्होंने कहा- पर आप मेरी बात को सुन लीजिए. वह बोला- मेरे पास इतना वक्त नहीं है. मुझे जरूरी काम है.

अपनी तरफ बढ़ती हुई मृत्यु को जो साफ देख रहा था, उसकी जिंदगी की जकड़ कम नहीं हुई थी. यह किसी भी तरह जीवन से अटके रहने का घटिया मोह नहीं था

जबलपुर लौटे तो बहुत टूटे हुए और बहुत क्रोधित. वह आदमी चट्टान जैसा था. लेकिन इस घटना ने उनके भीतर भय और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी थी. वे बेहद उत्तेजित थे. इस प्रतिबंध से उनकी अपार क्षति हुई. यदि पुस्तक चलती, तो उन्हें इतनी रायल्टी मिलती कि सारा संकट खत्म हो जाता. व्यक्तिगत क्षति का आघात तो था ही. पर इस पूरे काण्ड को व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देखकर वे बहुत त्रस्त थे. कहते थे- यह नंगा फासिज्म है. लेखक को लोग घेरें, शारीरिक क्षति की धमकी दें, इधर सरकार सुनने तक को तैयार नहीं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जा रही है. गला दबाकर आवाज घोंटी जा रही है.

‘अंधेरे में’ कविता का यही रचनाकाल है. उन दिनों मुक्तिबोध बहुत आशंकाग्रस्त थे. छोटी-से-छोटी बात उन्हें विचलित कर देती थी. चाबी जिस जेब में रखी होने की उन्हें याद थी, अगर उस जेब में नहीं है तो वे ऐसे सशंकित हो उठते थे, जैसे कोई बड़ा षडयंत्र उन्हें घेर रहा है. उन दिनों वे बहुत उत्तेजित होकर घण्टों बहुत जोर से बोलते रहते थे. गले की नसें तनी हुई साफ दिखती थीं. कनपटी लौकती थी, दम भर आता था और वे डबल स्ट्रॉन्ग चाय की मांग करते थे.

अंतिम बीमारी के महीने-भर पहले वे जबलपुर आए थे. हाथ और पांव में एक्जिमा था. पांवों को धोकर नीम की पट्टी करते. बहुत दुर्बल हो गए थे. बहुत परेशान थे. पर शारीरिक और आर्थिक कष्ट की बात लगभग नहीं करते थे. रात को उन्होंने हम लोगों को ‘अंधेरे में’ कविता सुनायी थी. डेढ़ घण्टे के पाठ के बाद वे शिथिल होकर बिस्तर पर लुढ़क गए थे. हम लोगों ने उन्हें थोड़ी ब्राण्डी देकर सुला दिया था. सुबह बोले- पार्टनर, दवा बहुत अच्छी थी.

महीने-भर बाद ही उन्हें पक्षाघात हो गया. आदमी यह सोचने को मजबूर है कि अगर ऐसा हो गया होता, तो वैसा नहीं होता. बहुत-से मित्र यहां सोचते हैं, अगर वे तभी जबलपुर रुक गए होते तो बीमारी न बढ़ती. यहां मेडिकल कॉलेज में उन्हें कुछ दिनों के लिए भरती करा देने का हम लोगों ने तय किया था. पर उन्हें बीमार पिताजी से मिलने नागपुर जाना था. वे कह गए थे कि महीने-भर में मैं लौटकर आता हूं और कुछ दिन रहकर यहीं आराम करूंगा और इलाज करूंगा. पर महीने-बाद उन्हें पक्षाघात हो गया. दिल्ली से जब मैं चल ही रहा था कि श्रीकान्त के नाम उनके पत्र से यह खबर मिली.

मुक्तिबोध अपनी बीमारी की भयंकरता जानते थे. वे जानते थे कि यह बीमारी प्राणांत भी कर सकती है. शारीरिक कष्ट उन्हें बहुत था. छोटे-छोटे बच्चों के भविष्य की चिंता भी थी. रात कराहते बीतती थी. भोपाल के मित्र रात-भर कमरे के बाहर बरामदे में बैठे आई ग (ओ मां) और अग (पत्नी को बुलाने के लिए) सुना करते थे. पर मुक्तिबोध का उत्साह कम नहीं हुआ था. वे टूटे नहीं थे. संज्ञाहीन होने के पहले तक वे बीमारी की शिकायत लगभग नहीं करते थे. वे साहित्य और राजनीति की बातें करते थे. खूब उत्साह से बोलते थे. कभी हम उन्हें स्वास्थ्य के बारे में झूठा भरोसा दिलाते तो वे पलकें नीची करके कहते- हां, पार्टनर, ठीक तो हो ही जाएंगे. उनके भाव से हम समझने लगे थे कि यह आदमी जानता है कि ये लोग मुझे दिलासा दे रहे हैं. वे संकेत से बता देते थे कि मैं सब जानता हूं. मुझे क्यों बहलाते हो!

अपनी तरफ बढ़ती हुई मृत्यु को जो साफ देख रहा था, उसकी जिन्दगी की जकड़ कम नहीं हुई थी. यह किसी भी तरह जीवन से अटके रहने का घटिया मोह नहीं था. सिगरेट और चाय के लिए अलबत्ता वे बाल-हठ-जैसा करते थे. बाकी अपने बारे में कुछ नहीं. नेहरू जी की तबीयत कैसी है? देश की राजनीति किस ओर से गुजर रही है? साहित्य में इन दिनों क्या चला हुआ है? यही सब बातें वे करते थे. पीड़ा होती तो कराह देकर वे फिर वैसे ही नॉर्मल हो जाते थे.

बीमारी से लड़कर मुक्तिबोध निश्चित जीत गए थे. बीमारी ने उन्हें मार दिया, पर तोड़ नहीं सकी. मुक्तिबोध का फौलादी व्यक्तित्व अंत तक वैसा ही रहा. जैसे जिंदगी में किसी से लाभ के लिए समझौता नहीं किया, वैसे मृत्यु से भी कोई समझौता करने को तैयार नहीं थे.

वे मरे. हारे नहीं. मरना कोई हार नहीं होती.

दोस्ती – मर्मस्पर्शी भावनाओं की कामयाबी

Dosti

रामनाथ अपनी मां के साथ रहता है. कंपनी की नौकरी करते हुए उसके पिता की मौत हो जाती है. मां और बेटे को उम्मीद है कि कंपनी से मदद मिलेगी. वे लोग गरीबी में जिंदगी बसर करते हैं. मां को दिल की बीमारी है. रामनाथ प्रतिभाशाली लड़का है. पढ़ाई और खेलकूद में आगे रहता है. कंपनी से मदद न मिलने की जानकारी होने पर मां सदमे में सीढ़ी से लुढ़क जाती है. मां को बचाने की फिक्र में भागता रामनाथ एक गाड़ी से टकरा जाता है. उसकी टांग में चोट आती है और वह पैर से अपाहिज हो जाता है. अस्पताल से निकलने पर उसे अपने किराए के घर में ताला लगा दिखता है. मां गुजर चुकी है. वह अनाथ सड़क पर भटकता है. उसकी मुलाकात मोहन से होती है. मोहन अंधा है. वह अपनी दीदी मीना की खोज में गांव से आया है. दोनों एक-दूसरे का सहारा बन जाते हैं.

आम तौर पर हिंदी फिल्मों में अनाथ बच्चों को भीख मांगते या फिर अपराधियों के हत्थे चढ़ते दिखा दिया जाता है.  लेकिन इस कहानी में वे मेहनत की राह चुनते हैं

‘दोस्ती’ एक अपाहिज और एक अंधे लड़के की दोस्ती, त्याग और समर्पण की भावपूर्ण कहानी है. एक-दूसरे के प्रति प्रेम और लगाव से वे जीवन की कठिनाइयों को पार करते हैं. उनके इस संघर्ष में पड़ोसी, शिक्षक और अन्य लोग सहायक बनते हैं. नैतिकता और आदर्श से भरपूर दोस्ती की इस कहानी में दुख और पीड़ा के साथ प्रेम, सुख और सहयोग भी है. फिल्म के अन्य किरदारों की बात करें, तो मंजुला, मंजुला के भाई, मोहन की बहन मीना, शिक्षक शर्मा जी, हेड मास्टर, मोहल्ले की मौसी, नंदू और कुत्ता टफी इन दोनों मुख्य किरदारों के कार्य-व्यापार में सहयोगी की भूमिका निभाते हैं. फिल्म में कोई खलनायक नहीं है. रामनाथ को स्कूल में तंग करते बच्चों को खल नहीं कहा जा सकता, वे उद्दंड हैं.

रामनाथ और मोहन परिस्थितियों की वजह से अनाथ हो गए हैं. आम तौर पर हिंदी फिल्मों में अनाथ बच्चों को भीख मांगते या फिर अपराधियों के हत्थे चढ़ते दिखा दिया जाता है. वे या तो अभावों में असहाय जिंदगी जीते हैं या फिर अपराध की दुनिया में शामिल हो जाते हैं. बाण भट्ट की लिखी इस कहानी में अपाहिज और अंधा होने के बावजूद रामनाथ और मोहन भटकाव के शिकार नहीं होते. वे मेहनत की राह चुनते हैं. आरंभ से ही वे स्वावलंबी होने की कोशिश करते हैं. फिल्म के एक शुरुआती दृश्य में रामनाथ बेसुध होकर माउथ ऑर्गन बजाता है, तो एक मुसाफिर उसकी जेब में सिक्का डाल जाता है. रामनाथ इसे भीख समझकर खीझता है, तो मोहन उसे समझाता है कि तूने मांगा नहीं है. तुम्हारे संगीत से खुश होकर किसी ने कुछ दिया, तो उसे भीख नहीं कहेंगे. फिल्म में ऐसी घटनाएं घटती हैं कि रामनाथ फिर से स्कूल में दाखिला लेना चाहता है. उसे 50-60 रुपयों की जरूरत है और कहीं से मदद नहीं मिल पाती, तो रामनाथ और मोहन मिलकर पैसे जुटाने की कोशिश करते हैं. इसके लिए वे गाने की मदद लेते हैं और उनके गीत में आह्वान है,

‘जानेवालों जरा, मुड़ के देखो मुझे, एक इंसान हूं, मैं तुम्हारी तरह
जिसने सबको रचा, अपने ही रूप से, उसकी पहचान हूं, मैं तुम्हारी तरह’

‘दोस्ती’ 1964 में रिलीज हुई थी. उस साल राज कपूर की ‘संगम’, मोहन कुमार की ‘आई मिलन की बेला’, शक्ति सामंत की ‘कश्मीर की कली’, चेतन आनंद की ‘हकीकत’ और राज खोसला की ‘वो कौन थी’ जैसी बड़ी फिल्में रिलीज हुई थीं. ये हिट भी हुई थीं. इन फिल्मों में उस समय के लोकप्रिय सितारे थे. आज की तरह तब भी फिल्में सितारों और गीत-संगीत की वजह से चलती थीं. गौर करें तो उन दिनों प्रचलित राज कपूर, शम्मी कपूर, धर्मेन्द्र, जीतेन्द्र, राजेन्द्र कुमार, मनोज कुमार, सुनील दत्त, विश्वजीत, जॉय मुखर्जी और किशोर कुमार जैसे लोकप्रिय सितारों के बीच बिल्कुल नए कलाकारों के साथ फिल्म बनाने की हिम्मत राजश्री प्रोडक्शंस के ताराचंद बड़जात्या ही कर सकते थे.

संगीतकारों में उन दिनों मदन मोहन, शंकर-जयकिशन और ओपी नैय्यर जैसे दिग्गजों के संगीत का जादू चल रहा था. याद करें तो ‘दोस्ती’ लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की पहली फिल्म थी, हालांकि इस जोड़ी की दूसरी फिल्म ‘पारसमणि’ कुछ कारणों से पहले रिलीज हो गई. ‘दोस्ती’ में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को अपने प्रिय गायकों मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर का भरपूर सहयोग मिला. कहते हैं, मोहम्मद रफी को जब पता चला कि इस फिल्म में उन्हें दो किशोरों के लिए अपनी आवाज देनी है, तो वे पसोपेश में पड़ गए. दिलीप कुमार, देव आनंद और शम्मी कपूर के लिए वह अपनी आवाज में फेरबदल कर लेते थे, लेकिन कम उम्र के सुशील कुमार और सुधीर कुमार के लिए सही आवाज लाने के लिए उन्हें अभ्यास करना पड़ा. ‘दोस्ती’ के गीतों को सुनते समय यह बिल्कुल एहसास नहीं होता कि यह वही मोहम्मद रफी हैं, जो दिलीप कुमार, देव आनंद और शम्मी कपूर की आवाज हैं.

इस फिल्म का एक और रोचक वाकया है. इस फिल्म में गीतों के अलावा अन्य जगहों पर भी माउथ आर्गन का इस्तेमाल हुआ है. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने माउथ आर्गन बजाने के लिए आरडी बर्मन को बुलाया था. उन दोनों से अपनी दोस्ती निभाते हुए आरडी ने इस फिल्म के लिए माउथ आर्गन बजाया और क्या खूब बजाया. मुश्किल धुनों पर रची गई माउथ आर्गन की स्वर लहरी में गहरी और लंबी सांसों का इस्तेमाल किया गया. जब भी माउथ आर्गन प्रेमी इन धुनों को बजाने की कोशिश करते हैं, तो उनकी सांसें उखड़ने लगती हैं.

साल 1964 के लिए फिल्मफेयर के पुरस्कारों की संगीत श्रेणी में ‘दोस्ती’ के साथ ‘संगम’ और ‘वो कौन थी’ भी नामांकित थीं, लेकिन ‘संगम’ के संगीतकार शंकर-जयकिशन और ‘वो कौन थी’ के संगीतकार मदन मोहन के मुकाबले लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के पुरस्कार के लायक समझा गया. इस फिल्म में गाए गाने ‘चाहूंगा मैं तुझे सांझ-सवेरे’ के लिए मोहम्मद रफी को सर्वश्रेष्ठ गायक का पुरस्कार मिला था. दरअसल ‘दोस्ती’ को कुल मिलाकर छह फिल्मफेयर पुरस्कार मिले थे.

‘दोस्ती’ के गाने सभी की जुबान पर चढ़ गए थे. इसकी वजह यह थी कि इसके संगीत की ही तरह फिल्म की थीम के अनुरूप लिखे गए इसके गीतों ने भी काफी असर डाला था. इसके लिए मजरूह सुल्तानपुरी को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था. इस फिल्म के सभी गीत लोकप्रिय हुए- ‘चाहूंगा मैं तुझे सांझ-सवेरे’, ‘मेरा तो जो भी कदम है’, ‘कोई जब राह न पाए’, ‘जानेवालों जरा मुड़ के देखो मुझे’, ‘राही मनवा दुख की चिंता’ और ‘गुड़िया हमसे रूठी रहोगी’.

बड़जात्या को बाण भट्ट की कहानी पर पूरा भरोसा था. इसके अलावा गोविंद मुनीस ने फिल्म के अर्थपूर्ण और मार्मिक संवाद लिखे थे. बानगी देखें- ‘रोने से क्या होगा? इस दुनिया में गरीबों का जीना मुश्किल है’, ‘गरीब घर में जन्म लिया है, तो तुझे हर मुसीबत का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा’, ‘आंखों में रोशनी नहीं, पानी तो है’, ‘क्या आदमी की पहचान कपड़े-लत्ते से ही होती है’, ‘अच्छा कपड़ा पहनने से कोई बड़ा नहीं होता. अच्छे गुण होने चाहिए.’ इसके अलावा गोविंद के संवादों में नेहरू युग की नैतिकता और आजादी के बाद के समाज का सपना भी है. फिल्म के एक दृश्य में मोहन से रामनाथ पूछता है, ‘कुछ देशों में मुफ्त शिक्षा है, अपने देश में कब होगी?’

इस फिल्म की अभूतपूर्व सफलता के बावजूद इसके बाद सुशील कुमार और सुधीर कुमार की फिल्में नहीं आईं. इस फिल्म से लॉन्च हुए संजय खान बाद में लोकप्रिय हुए

बड़जात्या ने इस फिल्म के  निर्देशन के लिए ‘जागृति’ के निर्देशक सत्येन बोस को आमंत्रित किया था, जिन्होंने इस फिल्म की सादगी और सरलता बरकरार रखी. फिल्म के दृश्य संयोजन और संरचना में अधिक नाटकीयता नहीं है. बोस ने अभिनय में भी कलाकारों को सहज रखा. फिल्म के मेलोड्रामैटिक सीन लाउड नहीं हैं. अनेक दृश्यों में इमोशंस की सघनता से हृदय द्रवित होता है. बोस ने फिल्म के अहम किरदारों को कमजोर नहीं रखा. वे सहानुभूति नहीं चाहते. दोनों ही अपनी मेहनत और लगन से सब कुछ हासिल करने की कोशिश करते हैं. दोनों ही किरदार नेक हैं. यहां तक कि जब रामनाथ हाजत से छूटने पर गुरुजी के साथ चला जाता है, तब भी मोहन के मन में दुर्भावना नहीं आती. जब उसे पता चलता है कि रामनाथ को परीक्षा में बैठने के लिए पैसों की जरूरत है, तब वह पैसों का इंतजाम कर देता है. जब फिल्म के अंतिम दृश्य में दोनों मिलते हैं, तब भी वे एक-दूसरे से शिकायत करना और एक-दूसरे को सफाई देना जरूरी नहीं समझते.

आश्चर्य की बात है कि इस फिल्म की अभूतपूर्व सफलता के बावजूद इसके बाद सुशील कुमार और सुधीर कुमार की फिल्में नहीं आईं. इस फिल्म से लॉन्च हुए अब्बास खान उर्फ संजय खान बाद में लोकप्रिय हुए, जबकि इसमें उनकी छोटी भूमिका थी. फिल्म के अन्य कलाकारों में बेबी फरीदा अभी तक सक्रिय हैं. वह टीवी पर फरीदा दादी के नाम से दिखती हैं. बीच में अफवाह उड़ी थी कि सुशील कुमार और सुधीर कुमार की हत्या हो गई थी और उस हत्या में किसी बड़े सितारे का हाथ था. लेकिन मशहूर रेडियो प्रोग्राम ‘सुहाना सफर’ की रिसर्च टीम से जुड़े विजय दुबे ने सुशील कुमार को खोज निकाला. सुशील कुमार अभी मुंबई के चेंबूर इलाके में अपनी पत्नी के साथ रहते हैं.

विजय दुबे को सुशील कुमार ने बताया कि उन्होंने बाल कलाकार के तौर पर अभिनय की शुरुआत की थी. 1958 में सिंधी भाषा में बनी ‘अबाना’ उनकी पहली फिल्म थी. वह मशहूर अदाकारा साधना की भी पहली फिल्म थी. बाल कलाकार के तौर पर सुशील कुमार ने अनेक फिल्मों में काम किया था.

जब बड़जात्या ने 1959 में रिलीज हुई बांग्ला फिल्म ‘लालु-भुलु’ को हिंदी में बनाने का फैसला किया, तो उन्हें 17-18 साल के दो ऐसे लड़कों की जरूरत थी, जो रामनाथ और मोहन का किरदार निभा सकें. कहते हैं कि बडज़ात्या की बेटी राजश्री ने सुशील कुमार को ‘फूल बने अंगारे’ में देखा था. सुशील के काम से प्रभावित राजश्री ने ही अपने पिता को उनका नाम सुझाया. इसके बाद फिल्म के निर्देशक बोस ने श्री साउंड स्टूडियो में उनका स्क्रीन टेस्ट लिया था. फिर सुधीर कुमार को अंधे मोहन और सुशील कुमार को अपाहिज रामनाथ की भूमिकाओं के लिए चुना लिया गया. उनके साथ तीन सालों का अनुबंध किया गया और तनख्वाह 300 रुपये तय हुई.

सुशील कुमार ने विजय दुबे को असल किस्सा बताया कि ‘दोस्ती’ के बाद उन दोनों को फिल्में क्यों नहीं मिल सकीं. दरअसल सुधीर कुमार ने राजश्री प्रोडक्शंस का अनुबंध तोड़ दिया और एवीएम की फिल्म ‘लाडला’ करने मद्रास चले गए थे. बड़जात्या ने सुशील और सुधीर से वादा किया था कि वह उन दोनों के साथ अगली फिल्म भी बनाएंगे, लेकिन सुधीर कुमार के अनुबंध तोड़ने की वजह से सुशील कुमार का अनुबंध भी समाप्त हो गया. बाद में 1968 में आई ‘तकदीर’ में बड़जात्या ने फिर सुशील कुमार को मौका दिया, लेकिन तब तक फिल्म इंडस्ट्री से निराश सुशील ने तय कर लिया था कि वह आगे फिल्मों में काम नहीं करेंगे. उन्होंने पढ़ाई खत्म करने के बाद एयर इंडिया में नौकरी कर ली.

सुधीर कुमार ने हिंदी और मराठी की कुछ फिल्मों में काम करने के बाद अभिनय से सन्यास ले लिया. चूंकि फिल्मों के ऑफर नहीं मिल रहे थे, इसलिए छोटी-मोटी भूमिकाएं करने के बजाय उन्होंने सन्यास लेना ही बेहतर समझा. साल 2004 में सुशील को ‘दोस्ती’ के अपने दोस्त सुधीर की मौत की खबर मिली.

‘दोस्ती’ सरल भावनाओं पर आधारित आदर्श फिल्म थी. आजादी के बाद के सपने और सवाल इस फिल्म में मुखर हुए थे. लोगों के शहरों में पलायन और कर्मचारियों के प्रति कंपनियों की बेपरवाही के संकेत भी इस फिल्म में मिलते हैं. भाई को देखने के बाद भी उसकी पहचान से इन्कार करती बहन मीना की दुविधा भी समझ में आती है. वह मंजुला के अमीर भाई की नजरों में छोटा होने से बचना चाहती है. भला वह किसी भिखमंगे की बहन कैसे  हो सकती है. बाद में भाई को न पहचानने का दुख उसे कचोटता है, तो वह बिलख पड़ती है. बाद में हम देखते हैं कि अभी तक गरीब और भिखमंगा समझकर रामनाथ और मोहन को दुत्कारने वाले किरदार अशोक का मन बदल चुका है. शायद बीमारी की वजह से गुजर चुकी अपनी बहन के मर्म को समझने के बाद वह पश्चाताप करता है. फिल्म में ऐसे आदर्श के अनेकों दृश्य हैं. ‘दोस्ती’ की कामयाबी की वजह इसमें दिखाई गई ऐसी कोमल भावनाएं तो हैं ही, इनके अलावा इसके भावपूर्ण गीतों और मधुर संगीत ने इसे लोकप्रियता की नई बुलंदियों तक पहुंचाया.

(लेखक वरिष्ठ फिल्म समीक्षक हैं)

जवाहरलाल नेहरू: 125 सवालों के घेरे में

nehru

गुलाम भारत के अंतिम वाइसरॉय अौर स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने अपने प्रिय मित्र, ब्रितानी साम्राज्यवाद के कट्टर विरोधी अौर अपनी पत्नी एडविना के गहरे अनुरागी जवाहरलाल नेहरू के बारे में, उनकी मृत्यु के बाद जो लिखा, जवाहरलाल का उससे बेहतर मूल्यांकन शायद ही किसी ने किया होगा, ‘अगर जवाहरलाल की मृत्यु 1947 में हो जाती तो वे इतिहास के महानतम नायकों की कतार में रखे जाते, अब वे दुनिया के महान राजनेताअों की श्रेणी में रखे जाएंगे!’

ऐसा ही कुछ कभी उनके भाई समान रहे, कभी के उनके अनन्य प्रशंसक अौर कभी के उनके अनन्यतम राजनीतिक विरोधी लोकनायक जयप्रकाश ने भी कहा था, ‘हमें एक साथ दो जवाहरलाल को देखना, समझना व सीखना होगा – 1947 से पहलेवाले अौर 1947 के बादवाले!’ अाजाद भारत में अमेरिका के राजदूत बनकर अाए चेस्टर बाउल्स ने 15 अगस्त, 1947 के बाद लिखा, ‘अब दुनिया गांधी को इतिहास का नायक (हीरो अॉफ द पास्ट) अौर जवाहरलाल को भविष्य की अाशा (होप अॉफ द फ्यूचर) की नजर से देखेगी.  ऐसे कितने ही, कम से कम 125, उद्गारों से हम उन जवाहरलाल को याद कर सकते हैं जिनकी 125वीं जयंती का यह वर्ष है अौर जिसे लेकर सब तरफ यह बहस चल पड़ी है कि जवाहरलाल ने ऐसा क्या किया कि वे 125 साल जी सके. उन पर अारोपों के भी कम से कम 125 तीर तो चलाए ही जा सकते हैं. अगर उपलब्धियों अौर विफलताअों के 125 तीर दोनों अोर से चलाए जा रहे हैं, तो इस जवाहरलाल में कुछ खास तो जरूर था. कोई 50 वर्ष पहले ही मर चुका यह अादमी अगर अाज भी इस कदर जिंदा है, तो यह मानना ही होगा कि यह कोई साधारण अादमी नहीं था. अाज हम उस दौर में जवाहरलाल को याद कर रहे हैं जिस दौर में लोग-बाग जनता के पैसों से टूटी हुई सड़क या पुलिया भी ठीक करवाते हैं, तो उस पर यह बोर्ड लगवाना नहीं भूलते कि यह हमारी सांसद निधि से बनाया गया है, जहां लोग नकली लालकिला बनवाकर, उस पर चढ़कर खुद को प्रधानमंत्री घोषित कर देते हैं अौर फिर अपनी ही पार्टी का गला दबोचकर उससे चूं करवा लेते हैं! इस मोड़ से देखता हूं, तो जवाहरलाल दो अंगुल अौर बड़े नजर अाते हैं. उनके नाम की तख्ती इतिहास ने ही टांग रखी है.

जवाहरलाल संत, साधक, क्रांतिकारी या प्रशासक में से कुछ भी नहीं थे, लेकिन इतिहास ने उन पर ये सारी भूमिकाएं थोप दीं और दूसरों की अपेक्षा उन्होंने बेहद सफलता से इनका निर्वाह किया

जवाहरलाल की सबसे बड़ी खुशकिस्मती यह हुई कि वे उस युग में पैदा हुए जो एकाधिक अर्थों में गांधी-युग था, अौर यही उनका दुर्भाग्य भी बना. गांधी ने उनके भीतर छुपे उन गुणों को पहचाना, जिनके बारे में खुद जवाहरलाल को ही पता नहीं था. उन्हें तराशा-चमकाया अौर फिर वक्त की भट्ठी में झोंक दिया. फिर गांधी ने उनकी ऐसी कसौटी करनी शुरू कर दी कि जवाहरलाल का दम फूल गया. गांधी ने अपने समेत सबके साथ ऐसा ही किया, अौर इसलिए अाश्चर्य नहीं कि उस दौर के सारे गुलिवर अाज की कसौटी पर लिलिपुटियन नजर अाते हैं. जवाहरलाल को गांधी न मिले होते तो वे किसी भी सूरत में हिंद के जवाहरलाल तो न बने होते, शायद प्रधानमंत्री भी नहीं. लेकिन हम ऐसा कहें, तो उसी सांस में यह भी कहना होगा कि गांधी नहीं होते तो जिन्ना भी अौर सरदार भी अौर राजेन्द्र बाबू, मौलाना अौर राजाजी अौर जयप्रकाश नारायण अौर विनोबा भावे भी वो नहीं होते जो वे बने अौर अाज जहां वे हैं. यह तो उस गांधी का विभूतिमत्व ही था कि उसने कविगुरु रवींद्र अौर बाबा साहेब अंबेडकर अौर ठक्करबापा जैसों को एक ही दरी पर ला बिठाया अौर सबने इसमें धन्यता का अनुभव किया. इसलिए अाज हम गांधी को किनारे रखकर, केवल जवाहरलाल की बात करेंगे.

महात्मा गांधी ने जिस देश की कमान जवाहरलाल को सौंपी थी, वह देश अभी-अभी खून की नदियां पारकर, अाजादी के किनारे लगा था अौर इस जद्दोजहद में इसका एक हिस्सा वक्त के समंदर में टूटकर किसी दूसरे किनारे जा लगा था- पाकिस्तान ! वह अलग ही नहीं हुअा था, इस हिंदुस्तान में से दूसरा भी जो हड़पा जा सके, उसे हड़पने की कोशिश में लगा था.  इधर जो हिंदुस्तान जवाहरलाल के हाथ अाया था, उसके मुंह में भी खून लग चुका था. वह तन से भले ही एक दीखता था, मन से एक नहीं था अौर एक-दूसरे के प्रति गहरी हिकारत से भरा था. गरीबी अौर अशिक्षा अौर कुशिक्षा अौर जहालत अौर अालस्य ऐसा था जो अाप ही प्रतिमान बन गया था. धार्मिकता का कहीं पता नहीं था, धर्मांधता का बोलबाला था. भौतिक विकास की गहरी भूख थी, लेकिन भौतिक विकास का कोई ढांचा नहीं था. बाहरी अौर भीतरी खतरों से घिरे इस मुल्क के हर कोने से एक ही अावाज उठती थी कि उसे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए फौज-पुलिस चाहिए अौर देश के पास राजधानी दिल्ली को बचाने के लिए भी बहुत अपर्याप्त अौर अकुशल फौज-पुलिस थी. अौर ऐसे में जो देश का सबसे बड़ा अौर वर्षों का जांचा-परखा रहनुमा था, हमने उसकी हत्या कर डाली थी. देश ऐसी ही हालत में था तब, जैसे वक्त के समंदर में बिना पतवार की नाव. जवाहरलाल ने ऐसा देश संभालने की नहीं सोची थी. लेकिन जैसा भी िमला, उसे संभालने अौर बचाने की कोशिश में वे पहले क्षण से अंतिम क्षण तक जुटे रहे.

जवाहरलाल संत, साधक, विचारक, क्रांतिकारी या दुर्धर्ष प्रशासक में से कुछ भी नहीं थे लेकिन इतिहास ने उन पर ये सारी भूमिकाएं थोप दीं अौर वे उस दौर के दूसरे नायकों की अपेक्षा इनके निर्वाह में न केवल बहादुरी से लगे रहे, बल्कि एक प्रतिमान भी बना गये. वे इतिहास की गहरी समझ रखनेवाले, उत्साह व ऊर्जा से भरपूर मोहक व्यक्तित्व के धनी थे. कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने उन्हें वैसे ही ‘ऋतुराज’ या गांधी ने ‘हिंद का जवाहर’ नहीं कहा था. वे सच में ऐसे ही थे. अपने इस व्यक्तित्व के कारण, अाजादी की लड़ाई के अग्रणी सिपाही की राष्ट्रीय पहचान अौर इतिहास की बारीकियों को पहचानने के कारण वे इस डगमागते देश में अाशा का संचार कर सके, इसका भौगोलिक ढांचा बनाने व मजबूत करने का काम कर सके अौर दुनिया के सामने इसके भूत, वर्तमान व भविष्य का मोहक व चुनौतीपूर्ण नक्शा रख सके. उन्होंने देश को मजबूत व स्थिर करने के दो सबसे महत्वपूर्ण तत्व को पहचाना – संसदीय लोकतंत्र की नींव मजबूत की जाए अौर देश को अार्थिक निर्भर बनाया जाए. सवाल था कि कैसे हो यह काम? इन दोनों के बारे में एक काल्पनिक तस्वीर थी, महात्मा गांधी की दी हुई, जिसे उनकी बुद्धि स्वीकारती नहीं थी. गांधी से अलग समाज का कोई नया ढांचा बना सकने की बौद्धिक क्षमता उनमें नहीं थी. उनके सामने अपेक्षाकृत अासान व बुद्धिगम्य रास्ता था कि वे रूस का साम्यवादी या अमरीका का पूंजीवादी ढांचा अपनाएं. लेकिन गांधी से मिली दृष्टि उन्हें इसकी कमियों-कमजोरियों के प्रति सावधान करती थी. उन्होंने एक तीसरा रास्ता खोजा- हम इन दोनों मॉडलों के अच्छे-अच्छे तत्वों को लेकर अपने भारत का स्वरूप गढ़ें. क्या इसमें कोई गलती थी?

जिस संविधान सभा में देश की सारी अाला प्रतिभाएं लंबे समय तक दिमाग जोड़ कर बैठीं – राजेंद्र प्रसाद से लेकर डॉक्टर अंबेडकर तक – वह भी वही संविधान बना सकी न जिसमें दुनिया के प्रचलित संविधानों से ले-लेकर प्रावधान जोड़े गये थे. हम कह सकते हैं कि एक अच्छी-सुंदर टेपेस्ट्री है हमारा संविधान. उसमें हिंदुस्तान की अपने जीनियस की, लंबी अार्थिक, सामाजिक, राजनीतिक परंपरा व अनुभव की कोई झलक मिलती नहीं है, क्योंकि वह काम बहुत मौलिकता व दृढ़ता की मांग करता है. हम अपनी फिल्मों का संदर्भ लें तो बात समझना अासान होगा. अधिकांश भारतीय फिल्में कैसे बनती हैं? किसी विदेशी फिल्म की हम नकल मारते हैं अौर अपनी-अपनी समझ से उसका भारतीयकरण कर लेते हैं. हमारा संविधान भी अौर हमारा सारा राजनीतिक दर्शन भी ऐसी ही मानसिकता से बना है.

उन्होंने देश को मजबूत व स्थिर करने के दो सबसे महत्वपूर्ण तत्व को  पहचाना – संसदीय लोकतंत्र की नींव मजबूत की जाए अौर देश को आर्थिक निर्भर बनाया जाए

संविधान बन गया, तब किसी ने ध्यान खींचा कि इसमें कहीं भी भारतीय सामाजिक परंपरा, ग्रामीण संस्कृति अौर ग्रामस्वराज्य की गांधी की परिकल्पना का तो जिक्र भी नहीं अाया. हवा में यह सनसनी तो थी ही कि बूढ़े गांधी को संविधान निर्माण की यह पूरी कसरत ही व्यर्थ की लग रही है, वे इस पर कोई टिप्पणी भी नहीं कर रहे हैं. ऐसे में अगर वे देखेंगे कि इस संविधान से बनने व चलनेवाला राज्य उन मूल्यों के बारे में अपनी कोई प्रतिबद्धता जाहिर ही नहीं करता है जिसका वादा अाजादी की लड़ाई के दौरान गांधी के साथ सबने देश से किया था, तो क्या होगा? सभी जानते थे कि इस संविधान की नैतिक बुनियाद ही धसक जाएगी अौर यह खोटा सिक्का भर रह जाएगा. यदि इस पागल बूढ़े ने इसके बारे में कोई नकारात्मक टिप्पणी कर दी, तो राजेंद्र प्रसाद की नींद हराम हुई. डॉक्टर अंबेडकर गांधी के रवैये को लेकर ज्यादा संवेदनशील नहीं थे, लेकिन एक रास्ता निकाला गया अौर गांधी की वह सारी खब्त थोक के भाव से संविधान के एक नये बेशकीमती अध्याय में डाल दी गई अौर उसे राज्य के नीति-निर्देशक तत्व का नाम दिया गया. खाना-पूर्ति का यह अध्याय ही कहीं गले की फांस न बन जाए, इसका खतरा भांप कर, इसके अंत में यह पंक्ति भी जोड़ दी गई कि राज्य इनकी पूर्ति की दिशा में तो काम करेगा, लेकिन इसके अाधार पर उसे किसी अदालत में अपराधी बनाकर खड़ा नहीं किया जा सकता है. यह पूरा प्रसंग यह समझने में सहायक होगा कि सिर्फ जवाहरलाल नेहरू ही नहीं, देश का तब का पूरा नेतृत्व यह बुनियादी बात समझ नहीं सका था कि कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जोड़कर सड़कें-इमारतें तो शायद बन भी जाएं, मुल्क नहीं बनते हैं. इसलिए नेहरू के नेतृत्व में भारतीय समाज के विकास की कहानी बहुत अाधी-अधूरी अौर जयप्रकाश नारायण के शब्दों में बेहद नकली बनी. लेकिन कौन था कि जिसके पास तब कोई दूसरा प्रतिमान था?

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद सैकड़ों कमरोंवाले उसी वाइसरॉय भवन में अाराम से अवस्थित हो रहे थे, जिसे गांधी तुरंत ही सार्वजनिक अस्पताल में बदल देना चाहते थे. सरदार पटेल अंग्रेजों की बनाई अौर छोड़ी उसी नौकरशाही से वही सब काम करवाने में जी-जान से जुटे थे जिसे गांधी ने देश के लिए अनुपयोगी व घातक साबित कर दिया था. मौलाना अाजाद शिक्षामंत्री की अारामदेह कुर्सी पर अात्ममुग्ध बैठे थे. डॉक्टर अंबेडकर सत्ता में भी भागीदारी चाहते थे अौर विपक्ष में भी अपनी जगह  सुरक्षित रखने की कसरत कर रहे थे. जयप्रकाश नारायण का समाजवादी खेमा देश की नहीं, अपनी जड़ें मजबूत करने में लगा था क्योंकि उनका समाजवाद सत्ता में अाने के बाद ही शुरू होता था. तब के सारे संघ परिवारी राष्ट्र-निर्माण की किसी भी चुनौती से नहीं जूझ रहे थे, बल्कि हिंदुत्व की जड़ें सींचने में लगे थे. उनके लिए हिंदू राष्ट्र का निर्माण ही राष्ट्रनिर्माण था. देश का सारा व्यापार जगत जेआरडी टाटा के नेतृत्व में कह रहा था कि देश की सारी अार्थिक गतिविधियों का सूत्र-संचालन राज्य के हाथों में ही होना चाहिए. तब के सबसे बड़े अर्थशास्त्रियों में एक (तब के मनमोहन सिंह) पीसी महालनोबीस हमारे पहले योजनाकार थे अौर सार्वजनिक क्षेत्र में उपक्रम खड़ा करने की शुरुअात उनकी पहल से ही हुई थी. राजेंद्र प्रसाद अौर सरदार पटेल ने उस अार्थिक ढांचे की जोरदार पैरवी की, जिसे हम मिश्रित अर्थतंत्र का नाम देते हैं अौर जिसका श्रेय जवाहरलाल को देते हैं. तो इन सारे प्रयासों का अच्छा-बुरा ठीकरा केवल जवाहरलाल के सर कैसे फोड़ा जा सकता है? अगर इस अर्थ में यह बात कही जा रही हो कि सबसे बड़ा सर उनका ही था, तो सबसे अधिक जिम्मेवारी भी उनकी ही है, तो इससे इंकार नहीं किया जा सकता है. लेकिन तब हमारा स्वर अभियोग का नहीं, अफसोस का होना चाहिए.

जवाहरलाल को देखने की एक खिड़की अौर भी है. हम भारत की अाजादी के साथ या उसके अासपास अाजाद हुए दुनिया के प्रमुख देशों की अाजादी, लोकतंत्र अौर उनके सामाजिक-अार्थिक विकास का जायजा लें. पाकिस्तान का हाल क्या रहा अौर अाज क्या है, यह लिखने की जरूरत नहीं है. तब के पाकिस्तान की जेल में बैठे फैज अहमद फैज ने लिखा था, ‘निसार मैं तेरी गलियों पे ऐ वतन कि जहां / चली है रस्म की कोई न सर उठाकर चले’ अौर अाज के पाकिस्तान में घुटते अजहर रफीक लिख रहे हैं, ‘मुझको अब यह मुल्क, ये अपना घर नहीं अच्छा लगता / दहशतगर्दों का यह खौफ नगर नहीं अच्छा लगता / शहर में एक तन्जीम क्लाशननिकोव लिए फिरती है / लोगों के कंधों पर इसको सर नहीं अच्छा लगता / मैं अाजाद वतन का शहरी, कैदी अपने घर में / अब इस अरज-ए-पाक पे, सैर-अो-सफर नहीं अच्छा लगता.’ पाकिस्तान उस प्रेत से लड़ने को अभिशप्त है, जिसकी ताकत से इसका जन्म हुअा है. हर वक्त के िजन्नाअों को यह समझना ही होगा कि मुल्कों की जड़ में अाप कैसे सपनों की खाद भरते हैं, इसका निर्णायक महत्व होता है. घृणा, द्वेष, चालों-कुचालों की ताकत से सत्ता की अपनी भूख को तृप्त करने की कोशिश में बने मुल्क पाकिस्तान जैसे अंधेरे, रक्तरंजित वर्तमान अौर भविष्यहीन भविष्य से घिरे रह जाते हैं. गुलामी के हमारे दौर में ही गांधी ने अाजाद भारत के सपनों की ऐसी खाद हमारे मनों में भरी कि उसकी कसौटी पर, बाद में उगी सारी फसलें हमें कमतर नजर अाती हैं- जवाहरलाल की उपलब्धियां भी बौनी नजर अाती हैं. लेकिन गांधी के तराजू पर जवाहलाल को तौलना न्याय नहीं है क्योंकि यह अादमी इस तराजू से हरदम इंकार ही करता अाया था.  हम सोचें तो यह कि गांधी अगर हुए ही नहीं होते अौर हमारे पास विकास का एक ही मानक होता, जो पश्चिम से लिया हुअा है, तब जवाहरलाल की उपलब्धियां कैसी नजर अाती हैं?

जवाहरलाल को जैसा रक्तरंजित देश मिला था उसमें इसका टूट जाना, लोकतंत्र का चोला उतार फेंकना, दरबारियों का जमावड़ा लगना, कुछ भी अस्वाभाविक नहीं होता

तटस्थ राष्ट्रों की परिकल्पना में जवाहरलाल के साथ अा जुड़े चार सबसे कद्दावर नेताअों को देखिए – मिस्र के गमाल अब्दुल नासिर, घाना के क्वामे एंक्रूमा, इंडोनेशिया के सुकर्णो अौर यूगोस्लाविया के मार्शल जोसेफ ब्रोज टीटो. 1952 में राजशाही को खत्मकर मिस्र अागे अाया अौर 1956-1970 तक नासिर उसके राष्ट्रपति रहे. एकाधिकारशाही अौर मतांतर को फौजी बूटों से कुचलना, मनमानी फौजी कार्रवाइयों से अपनी ताकत का प्रदर्शन करना – नासिर ने अपने देश को इस रास्ते पर जो तब डाला, वह अाज तक मिस्र को जकड़े हुए है. कभी ‘अफ्रीका के लेनिन’ कहे जानेवाले एंक्रूमा ने 1951-1966 के दौर में अपनी निजी सत्ता बनाए रखने के लिए हर उस हथकंडे का इस्तेमाल किया जिसने राजनीतिक-अार्थिक भ्रष्टाचार का अभूतपूर्व मायाजाल रचा. अफ्रीकी दुनिया की एका के सपने का कब अंत हुअा यह तो नहीं पता चला, लेकिन घाना की बीमारी सारे अफ्रीकी देशों को ग्रस ले गई, यह तो हम देख ही सकते हैं. 1949 में सुकर्णो ने इंडोनेशिया को अपने हाथ में लिया अौर फिर वहां कभी भी राजनीतिक स्थिरता नहीं अाई- राजनीतिक व फौजी तख्तापलट, भ्रष्टाचार, परिवारवाद अौर सामाजिक अशांति की बैसाखी पर ही चलता रहा है इंडोनेशिया. टीटो 1953-1980 तक यूगोस्लाविया के राष्ट्रनेता रहे. वहां की अार्थिक संपन्नता का श्रेय उन्हें दिया जाता है, लेकिन सत्ता के इस्तेमाल के बारे में मतांतर के कारण अपने अनन्यतम सहयोगी मिलोवान जिलास को जेल में ठूंसने से जो बात शुरू हुई, वह टीटो से असहमत हर व्यक्ति की नियति ही बन गई. अपने राजनीतिक विरोधियों की कमर तोड़ते-तोड़ते टीटो ने वह माहौल रचा कि अंतत: यूगोस्लाविया ही  टूट गया. जवाहरलाल को जैसा रक्तरंजित देश मिला था, उसमें इसका टूट जाना, सांप्रदायिक दंगों की अाग में झुलसते रहना, लोकतंत्र का चोला उतार फेंकना, दरबारियों का जमावड़ा अौर राजनीतिक-अार्थिक भ्रष्टाचार का घटाटोप कुछ भी अस्वाभाविक नहीं होता. लेकिन कदम-दर-कदम यह देश अागे ही बढ़ा, मजबूत हुअा, संसदीय लोकतांत्रिक संस्थाअों व परंपराअों के प्रति हमारी मजबूत प्रतिबद्धता बनी, अार्थिक विकास व अात्मनिर्भरता के बारे में देश सचेत हुअा, तो इन सबका श्रेय हम किसे दें? गांधी द्वारा फैलाई गई चेतना का, उस दौर में बने-उभरे दूसरे प्रखर राजनीतिक नेताअों का, विनोबा-जयप्रकाश जैसे सामाजिक क्रांतिकारियों की सतत जद्दोजहद का योगदान तो है ही, लेकिन जवाहरलाल को हम इस श्रेय से वंचित कर सकेंगे क्या? माअो के चीन, सिंगमन री के दक्षिण कोरिया, जिन्ना के पाकिस्तान, भंडारनायके के श्रीलंका, जनरल अांग सन के बर्मा अौर गुरियन के इजराइल से हम अपना हिंदुस्तान या अपना जवाहरलाल बदलना चाहेंगे क्या? कम से कम मैं तो नहीं, हर्गिज नहीं! इन सबने पहली चुनौती में ही लोकतंत्र को गंदे कपड़े की भांति उतार फेंका था. जवाहरलाल ने हर गंदगी को पार करते-झेलते हुए भी लोकतंत्र को एक मूल्य की तरह पकड़कर रखा.

हम यह न भूलें कि जवाहरलाल सत्ता की ताकत से समाज का कल्याण करने के प्रचलित दर्शन में विश्वास करनेवाले व्यक्ति हैं. वे सत्ता के बारे में वैसी तटस्थता कभी नहीं रखते हैं कि कोई छीन ले जाए तो ले जाए. वे संगठन व सरकार दोनों पर अपनी पूरी पकड़ रखना चाहते हैं अौर इसलिए संसदीय राजनीति की मान्य मर्यादाअों को भंग किए बिना अपने लोग चुनते भी हैं अौर उन्हें खास जगहों पर बिठाते भी हैं. उन पर तरह-तरह के अारोप लगानेवाले अधिकांश लोग वे ही हैं, जो उनकी तरह ही सत्ता से समाज का कल्याण करने के दर्शन में विश्वास करते हैं. वे सब सत्ता पाने की जितनी जुगत करते हैं, जवाहरलाल सत्ता बनाए रखने की वैसी ही जुगत करते मिलते हैं, तो हम किस अाधार पर शिकायत करें? जवाहरलाल पर खानदानी राजनीति का अारोप इसलिए कि उन्होंने अपनी बेटी इंदिरा को राजनीति में स्थापित किया. यह सच है, लेकिन इसका एक पहलू यह भी है कि इंदिरा गांधी में राजनीतिक प्रतिभा अौर नेतृत्व का कीड़ा जन्मजात ही था. एक जागरूक किशोरी की तरह उन्होंने अाजादी के अांदोलन में भी हिस्सा लिया था. उन्होंने अपने पिता की राजनीति को निकट से देखा भर ही नहीं था, बल्कि उसे संभाला भी था. अपने वैवाहिक जीवन को बहुत तवज्जो न देकर भी वे इस क्षेत्र की थाह लेती रही थीं. अपनी ऐसी बेटी की प्रतिभा को पहचानकर, पिता ने उन्हें इस समुद्र में उतरने की इजाजत दी. यह अपने बेटे या बेटी को या भाई या भतीजे को अपनी राजनीतिक विरासत सौंपने की खानदानी सियासत जैसी बात नहीं है. राजनीति को या सत्ता को अपना खानदानी पेशा बनाने वाले ये लोग भले अपनी कमजोरी या बेईमानी को छिपाने के लिए जवाहरलाल की अोट लें, लेकिन इससे उनकी नंगई छिपती नहीं है. अौर फिर यह तथ्य तो सामने है ही कि जवाहरलाल के बाद इंदिरा गांधी नहीं, लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने. अचानक हुई उनकी मौत ने फिर से वह पद खोल दिया अौर सिंडिकेट ने अपना पूरा हिसाब लगाकर, इस गूंगी गुड़िया को कुर्सी पर बिठाया. यह उनकी रणनीति थी. इसमें जवाहरलाल की कोई भूमिका नहीं थी.

JLN2

हमें यह भी सोचना चाहिए कि यदि शास्त्री जी की असमय मृत्यु नहीं हुई होती और वे अगले 5-7 सालों तक प्रधानमंत्री रह जाते, तो इंदिरा गांधी कहां होतीं? फिर खानदानी राजनीति का अारोप किसके सर जाता? क्या उनके जो संघ परिवार की अनुमति या अादेश के िबना एक चपरासी भी नियुक्त नहीं करते हैं? अौर क्या प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी ने यह साबित नहीं कर दिया, ये सभी राजनीति का जैसा खेल खेलने में लगे थे, अौर अाज भी लगे हैं, उस खेल की सबसे चतुर, सबसे क्रूर खिलाड़ी वे ही हैं! इंदिरा गांधी जवाहरलाल के बल पर नहीं, अपने अौर सिर्फ अपने बल पर प्रधानमंत्री बनीं अौर लंबी पारी खेलकर सिधारीं. हम उनका सकारामक या नकारात्मक जैसा भी विश्लेषण करें, इतनी ईमानदारी तो बरतें ही कि वह इंदिरा गांधी की अाड़ में जवाहरलाल पर हमला बनकर न रह जाए.

प्रधानमंत्री के रूप में, अाज 67 सालों के बाद भी वही रोल मॉडल हमारे राजनेताअों के सामने है, जिस पर खरा उतरने की कोशिश अटल बिहारी वाजपेयी ने भी की अौर अाज नरेंद्र मोदी भी उनकी ही नकल करते दिखाई देते हैं. गांधी तो बहुत दूर की बात है, जवाहरलाल जैसा बनना अौर उसे निभा ले जाना भी बहुत बड़ा सीना मांगता है – 56 इंच का हो कि न हो, दूसरे किसी से भी ज्यादा गहरा अौर पारदर्शी तो हो ही – अौर वैसा सीना जवाहरलाल नेहरू के पास था. हम अाज भी उसकी कमी अौर उसकी ऊष्मा महसूस करते हैं.

अादमी पूरा हुअा तो देवता हो जाएगा, है जरूरी कि उसमें कुछ कमी बाकी रहे !

(लेखक वरिष्ठ गांधीवादी चिंतक हैं)

[box]

नियति से मुलाकात

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का यह ऐतिहासिक भाषण 14 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि को संसद भवन में दिया गया था. उनका यह भाषण ट्रिस्ट विद डेस्टिनी नाम से मशहूर है
जवाहरलाल नेहरू

कई वर्षों पहले हमने नियति से मिलने का एक वचन दिया था, अब वह समय आ गया है कि हम अपने वचन को निभाएं, पूरी तरह न सही, जहां तक संभव हो सके वहां तक ही सही. आज आधी रात के समय जब सारी दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और आजादी की नई सुबह के साथ उठेगा. एक ऐसा क्षण जो इतिहास में कभी-कभार आता है. जब हम पुराने को छोड़ नए की तरफ जाते हैं, जब एक युग का अंत होता है और वर्षों से शोषित एक देश की आत्मा, अपनी बात कह सकती है. यह एक संयोग है कि इस पवित्र मौके पर हम समर्पण के साथ भारत और उसकी जनता की सेवा और उससे भी बढ़कर सारी मानवता की सेवा करने की प्रतिज्ञा ले रहे हैं.

इतिहास के आरंभ के साथ ही भारत ने एक अंतहीन खोज की दिशा में कदम बढ़ा दिया था. न जाने कितनी ही सदियां इसकी महान सफलताओं और असफलताओं से भरी हुई हैं. चाहे अच्छा वक्त हो या बुरा, भारत ने कभी इस खोज से अपनी दृष्टि नहीं हटाई और कभी भी अपने उन आदर्शों से डिगा नहीं जिसने इसे शक्ति दी. आज हम दुर्भाग्य के एक युग का अंत कर रहे हैं और भारत पुनः खुद को खोज पा रहा है. आज हम जिस उपलब्धि का उत्सव मना रहे हैं, वो महज एक मौका है, नए अवसरों के खुलने का. इससे भी बड़ी विजय और उपलब्धियां हमारी प्रतीक्षा कर रही हैं. क्या हममें इतनी शक्ति और बुद्धिमत्ता है कि हम इस अवसर को समझें और भविष्य की चुनौतियों को स्वीकार करें?

भविष्य में हमें विश्राम करना या चैन से नहीं बैठना है, बल्कि निरंतर प्रयास करना है, ताकि हम जो वचन बार-बार दोहराते रहे हैं और जिसे हम आज भी दोहराएंगे उसे पूरा कर सकें. भारत की सेवा का अर्थ है लाखों-करोड़ों पीड़ित लोगों की सेवा करना. इसका मतलब है गरीबी और अज्ञानता को मिटाना, बीमारियों और अवसर की असमानता को मिटाना. हमारी पीढ़ी के महानतम व्यक्ति की यही दिली इच्छा रही है कि हर एक आंख से आंसू मिट जाए. शायद ये हमारे लिए संभव न हो पर जब तक लोगों की आंखों में आंसू हैं और वे पीड़ित हैं, तब तक हमारा काम खत्म नहीं होगा.

इसलिए हमें परिश्रम करना होगा, और कठिन परिश्रम करना होगा, ताकि हम अपने सपनों को साकार कर सकें. ये सपने भारत के लिए हैं, पर साथ ही वे पूरे विश्व के लिए भी हैं. आज कोई खुद को बिलकुल अलग-थलग रखकर आगे नहीं बढ़ सकता, क्योंकि सभी राष्ट्र और लोग एक-दूसरे से बड़ी निकटता से जुड़े हुए हैं. शांति को अविभाज्य कहा गया है, इसी तरह से स्वतंत्रता भी अविभाज्य है, समृद्धि भी और विनाश भी. अब इस दुनिया को छोटे-छोटे हिस्सों में नहीं बांटा जा सकता है. हमें स्वतंत्र भारत का निर्माण करना है, जहां उसके सारे बच्चे रह सकें.

आज वह समय आ गया है, एक ऐसा दिन जिसे नियति ने तय किया था-और एक बार फिर वर्षों के संघर्ष के बाद, भारत जागृत और स्वतंत्र खड़ा है. कुछ हद तक अभी भी हमारा अतीत हमसे चिपका हुआ है, और हम अक्सर जो वचन देते रहे हैं, उसे निभाने से पहले बहुत कुछ करना है. फिर भी निर्णायक बिंदु बीते वक्त की बात हो चुका है, और हमारे लिए एक नया इतिहास आरंभ हो चुका है, एक ऐसा इतिहास जिसे हम गढ़ेंगे और जिसके बारे में और लोग लिखेंगे.

यह हमारे लिए सौभाग्य का क्षण है, एक नए तारे का उदय हुआ है, पूरब में स्वतंत्रता के सितारे का उदय. एक नई आशा का जन्म हुआ है, एक दूरदृष्टि अस्तित्व में आई है. काश ये तारा कभी अस्त न हो और ये आशा कभी धूमिल न हो! हम सदा इस स्वतंत्रता में आनंदित रहें. भविष्य हमें बुला रहा है. हमें किधर जाना चाहिए और हमारे क्या प्रयास होने चाहिए, जिससे हम आम आदमी, किसानों और कामगारों के लिए स्वतंत्रता और अवसर ला सकें, हम गरीबी, अज्ञानता और बीमारियों से लड़ सकें, हम एक समृद्ध, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील देश का निर्माण कर सकें और हम ऐसी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना कर सकें, जो हर एक आदमी-औरत के लिए जीवन की संपूर्णता और न्याय सुनिश्चित कर सकें?

हमें कठिन परिश्रम करना होगा. हम में से कोई भी तब तक चैन से नहीं बैठ सकता है, जब तक हम अपने वादों को पूरी तरह निभा नहीं देते, जब तक हम भारत के सभी लोगों को उस गंतव्य तक नहीं पहुंचा देते, जहां भाग्य उन्हें पहुंचाना चाहता है. हम सभी एक महान देश के नागरिक हैं, जो तीव्र विकास की कगार पर है, और हमें उस उच्च स्तर को पाना होगा. हम सभी चाहे जिस धर्म के हों, समान रूप से भारत मां की संतान हैं, और हम सभी के बराबर अधिकार और दायित्व हैं. हम सांप्रदायिकता और संकीर्ण सोच को बढ़ावा नहीं दे सकते, क्योंकि कोई भी देश तब तक महान नहीं बन सकता जब तक उसके लोगों की सोच या उनके कर्म संकीर्ण होंं.

विश्व के देशों और लोगों को शुभकामनाएं भेजिए और उनके साथ मिलकर शांति, स्वतंत्रता और लोकतंत्र को बढ़ावा देने की प्रतिज्ञा लीजिए. और हम अपनी प्यारी मातृभूमि, प्राचीन, शाश्वत और निरंतर नवीन भारत को नमन करते हैं और एकजुट होकर नए सिरे से इसकी सेवा करने का प्रण लेते हैं.

[/box]

इरोम चानू शर्मिला : लौह महिला

इस साल नवम्बर महीने में मणिपुर की 42 वर्षीय इरोम चानू शर्मिला, जिन्हें लोग ‘आयरन लेडी ऑफ मणिपुर’ के नाम से भी बुलाने लगे हैं, की भूख हड़ताल 15वें वर्ष में दाखिल हो गई. दो नवम्बर 2000 को मणिपुर के मालोम कस्बे में बस स्टॉप पर इन्तजार कर रहे 10 लोगों को कथित तौर पर असम राइफल्स ने मार डाला था. मृतकों में 62 वर्ष की एक महिला और 18 वर्ष की एक लड़की भी शामिल थी. इन हत्याओं के विरोध में शर्मिला ने भूख हड़ताल शुरू कर दी थी.

आफ्स्पा के विरोध में मणिपुरी महिलाओं का बहुचर्चित नग्न विरोध

इस देश में अगर भूख हड़तालों के इतिहास पर एक नजर डालें, तो पता चलता है कि यह पहली भूख हड़ताल है जो इतने लंबे समय से जारी है. अगर यह इसी तरह चलती रही तो पहली वास्तविक ‘आमरण भूख हड़ताल’ भी सिद्ध हो सकती है. क्या इरोम शर्मिला पागल हैं, क्या वह आम इंसानों से अलग हैं, क्या उन्हें भूख नहीं लगती, क्या वह इस दुनियावी लाग-लपेट से ऊपर उठ चुकी हैं या फिर वह महज नाम और शोहरत के लिए ये सब कर रही हैं? ऐसे कई सारे सवाल उनकी लंबी भूख हड़ताल के संदर्भ में उठते हैं और अक्सर पूछे जाते हैं. इन सवालों का एक ही उत्तर है और वह है नहीं, कदापि नहीं!

अपने एक बाल प्रशंसक से आत्मीयता जताती इरोम शर्मिला

इस जवाब के पीछे भरोसा क्या है? जवाब खुद शर्मिला देती हैं, ‘मैं जीना चाहती हूं. एक आम इंसान की तरह जिंदगी जीना चाहती हूं, बिल्कुल आप लोगों की तरह. मैं भी अन्न खाना चाहती हूं. तरह-तरह के लजीज खानों का स्वाद लेना चाहती हूं. मुझे भी प्यार और रोमांस में दिलचस्पी है. मैं शादी भी करना चाहती हूं. पर यह सब तभी मुमकिन है जब मणिपुर से आफ्स्पा (आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट) को खत्म कर दिया जाए. और जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक ऊपर जताई गई मेरी तमाम इच्छाओं के कोई अर्थ नहीं रह जाते. इसे खत्म होने तक मुझे अपनी इच्छाओं को दबाना होगा और अपने संघर्ष को जारी रखना होगा.’ ये शर्मिला के शब्द थे जब कुछ महीने पहले दिल्ली में कुछ पत्रकारों ने उनसे बातचीत की थी. उस दिन दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में शर्मिला की पेशी थी. उन पर आरोप है कि 2006 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर उन्होंने खुदकुशी करने की कोशिश की थी, जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 309 के अनुसार एक अपराध है. उस दिन शर्मिला का पत्रकारों को दिया गया यह बयान सुनकर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है कि कोई व्यक्ति इतना ऊर्जावान कैसे हो सकता है, पन्द्रह साल बिना खाए-पिए अपनी सोच-विचार के दायरे को इतना विस्तृत और संतुलित कैसे रख सकता है?

54
शर्मिला के बालपन की एक दुर्लभ तस्वीर

शर्मिला की इस जिजीविषा भरी कहानी और इसके पीछे छिपे संघर्ष को समझने के लिए उन हजारों मणिपुरी लोगों की कहानी को समझना होगा जिनकी वजह से शर्मिला की भूख हड़ताल आज तक जारी है. इस बीच क्या कुछ नहीं हुआ, जेल, खुदकुशी का आरोप, तरह-तरह के लांछन, राजनीतिक दलों के प्रलोभन, परिवार का दबाव. और भी बहुत कुछ ऐसा, जिसकी चर्चा नहीं की जा सकती. लेकिन बात उस वजह की, जिसने शर्मिला को यह फैसला लेने लिए मजबूर किया और अपनी लड़ाई को लगातार जारी रखने का साहस दिया. वह है आफ्स्पा.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले तीन दशकों (1979-2012) के दौरान मणिपुर के अंदर 1,528 आम नागरिक सशस्त्र बलों की गोलियों के शिकार बन चुके हैं

साल 2009 के चार मार्च की बात है. मणिपुर के पश्चिमी इम्फाल जिले के युम्नु गांव की घटना है. दोपहर के 12 बजने वाले थे. 12 साल का मोहम्मद आजाद खान अपने घर के बरामदे में एक दोस्त के साथ बैठा हुआ था. अचानक से मणिपुरी पुलिस कमांडो के कुछ जवान जबरन उस घर में दाखिल हो गए. एक जवान ने आजाद को दोनों हाथों से पकड़कर घसीटना शुरू कर दिया और उत्तर दिशा में लगभग 70 मीटर दूर स्थित एक खेत तक ले गए. इसी बीच एक दूसरे जवान ने आजाद के मित्र से पूछा कि तुम इसके साथ क्यों रहते हो? तुम्हें मालूम होना चाहिए कि यह एक उग्रवादी संगठन का सदस्य है और यह कहते हुए उसके मुंह पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया. जवानों ने आजाद को खेत में ले जाकर पटक दिया. इस बीच जब आजाद के घरवालों ने बीच-बचाव की कोशिश की, तो जवानों ने उन पर बन्दूकें तान दीं और बुरे अंजाम की धमकी दी. इसके बाद का दृश्य बेहद निर्मम था. एक जवान ने बंदूक से गोली चला दी और 12 साल का आजाद खान वहीं पर बेजान होकर गिर पड़ा. इसके बाद प्रचलित पुलिसिया हथकंडों के तहत लाश के पास एक अवैध बंदूक रख दी गई. इसे आजाद के पास से बरामदगी के रूप में दिखाया गया. लाश को थाने ले जाया गया. जब परिवार और गांव के लोग भी साथ थाने जाने लगे, तो उन्हें वापस भगा दिया गया.

यह किसी हिन्दी फिल्म की पटकथा या क्राइम थ्रिलर का हिस्सा नहीं है, एक वास्तविक घटना है, जिसकी सत्यता पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जस्टिस संतोष हेगड़े की जांच समिति भी अपनी मुहर लगा चुकी है. आजाद की ही तरह चोंग्खाम संजीत, मनोरमा, सोंजित सिंह, गोबिंद मेतेई, नोबो मेतेई, अकोइजम परियोब्राता जैसे कई नाम हैं, जिनके साथ ज्यादती हुई. यह सूची बहुत लंबी है. विडंबना यह है कि इस तरह की अनगिनत कहानियां मणिपुरियों के जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं. इनके बारे में कोई बात नहीं करता.

स्कूल के दिनों में शर्मिला अपने भाई-बहनों और परिजनों के साथ

फर्जी मुठभेड़ में मारा जाना, पुलिस की बदतमीजी का शिकार होना, यातना सहना, महिलाओं के साथ बलात्कार, यह सब मणिपुर के लोगों के जीवन का हिस्सा बन गया है. पिछले साल सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक समिति ने पाया कि मणिपुर में कथित मुठभेड़ में मारे गए लोगों के परिजनों के एक समूह एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल एक्जिक्यूशन विक्टिम फेमिलीज एसोसिएशन ऑफ मणिपुर द्वारा लगाये गए आरोप बिलकुल सही हैं. इस समूह द्वारा 2012 में तैयार एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले तीन दशकों (1979-2012) में मणिपुर के अंदर 1,528 आम नागरिक सशस्त्र बलों की गोलियों के शिकार हो चुके हैं. इन सभी मौतों के पीछे जो मुख्य कारण उभरकर सामने आता है, वह है- आफ्स्पा. इस कानून के संरक्षण में सुरक्षा बल किसी भी तरह की जवाबदेही से मुक्त हो जाते हैं. अपने किसी भी ऑपरेशन या अभियान में मारे गए लोगों के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. ऐसे में इस बात की संभावना हमेशा बनी रहती है कि अगर किसी जवान का दिमाग फिर जाए, तो किसी की भी जिंदगी खतरे में पड़ सकती है. इसी बर्बर कानून को खत्म करवाने के लिए शर्मिला इतने वर्षो से भूख हड़ताल पर हैं.

प्रतिरोध के इतर शर्मिला का अपना एक रचनात्मक संसार भी है

विद्रोही नगा गुटों को नियंत्रित करने के मकसद से यह विवादास्पद कानून 22 मई 1958 को अस्तित्व में आया था. उस समय भी नगा लोगों ने इसका पुरजोर विरोध किया था. बावजूद इसके भारतीय संसद ने एक अलोकतांत्रिक कानून को लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में कानून बना दिया. उस समय सरकार का कहना था कि इस कानून का मकसद नगा-बहुल इलाकों में शांति स्थापित करना है, जैसे ही यह लक्ष्य हासिल हो जाएगा, सरकार आफ्स्पा को वापस ले लेगी. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ. हुआ इसके बिल्कुल विपरीत. धीरे-धीरे यह कानून नगा-बहुल इलाकों से फैलते हुए पूरे पूर्वोत्तर और फिर जम्मू कश्मीर तक पहुंच गया. आज पूर्वोत्तर के सातों राज्यों में यह कानून लागू है.

इस कानून में ऐसा क्या है कि देश के रक्षक इसे पाते ही अचानक से बेकाबू होते दिखने लगते हैं. इस ‘कानून’ के अनुसार सरकार द्वारा घोषित ‘अशांत’ इलाकों में सशस्त्र बलों को सिर्फ विशेष अधिकार ही नहीं, बल्कि एकाधिकार मिल जाता है. आफ्स्पा के दायरे में एक तरह से लोकतंत्र समाप्त हो जाता है और सेना की सत्ता कायम हो जाती है. सैन्यकर्मियों के ऊपर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती. सशस्त्र बल जब चाहे, जहां चाहे, हथियारों का इस्तेमाल कर सकते हैं. उनका तर्क ही इसमें मायने रखता है. मसलन अमुक व्यक्ति गैरकानूनी काम कर रहा था या फलां व्यक्ति देश की संप्रभुता के लिए खतरा था आदि. यह विशेषाधिकार सिर्फ सशस्त्र बल के उच्च अधिकारियों के पास ही नहीं है बल्कि आम जवानों (नॉन-कमीशंड) तक को हासिल है.

पिछले 56 वर्षों में बार-बार यह बात साबित हुई है कि यह कानून किसी भी सभ्य समाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल्यों से मेल नहीं खाता. इसके बावजूद यह कानून दिनोंदिन मजबूत होता गया है. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों में इसकी अमानवीयता पर रोशनी डाली गई है. वर्ष 2004 में भारत सरकार द्वारा गठित जस्टिस जीवन रेड्डी की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट में भी इसे कबूल किया गया है. जून 2005 में आई इस रिपोर्ट का एक हिस्सा कहता है, ‘चाहे जो भी कारण रहे हों, यह कानून उत्पीड़न, नफरत, भेदभाव और मनमानी का जरिया बन गया है.’ हाल ही में मणिपुर के एक न्यायालय ने शर्मिला को बरी करते हुए कहा कि राजनीतिक मांग के लिए इरोम शर्मिला का आंदोलन एक लोकतांत्रिक और कानूनी तरीका है, इसलिए उन्हें इसकी सजा नहीं दी जा सकती. पर दो दिन बाद ही पुलिस ने उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया. आज भी वह एक कैदी की जिन्दगी गुजारने को मजबूर हैं.

‘मैं तभी अपनी भूख हड़ताल खत्म करूंगी जब मणिपुर से आफ्स्पा को खत्म किया जाएगा’ इरोम शर्मिला 4 नवंबर, 2010 को दिल्ली यात्रा के दौरान
‘मैं तभी अपनी भूख हड़ताल खत्म करूंगी जब मणिपुर से आफ्स्पा को खत्म किया जाएगा’ इरोम शर्मिला 4 नवंबर, 2010 को दिल्ली यात्रा के दौरान

इन 15 वर्षों में शर्मिला ने अपनी बात को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की है. उन्होंने सरकार और उसकी तमाम संस्थाओं से आफ्स्पा को खत्म करने की गुहार लगाई है. हर नए व्यक्ति, सरकार और पार्टी में एक उम्मीद देखी है. इसी उम्मीद को लेकर उन्होंने प्रधानमंत्री से मिलने के लिए समय भी मांगा, जो उन्हें आज तक नहीं मिला है. इन सबके बावजूद शर्मिला को न केवल उम्मीद, बल्कि यकीन है कि एक न एक दिन आफ्स्पा जरूर खत्म होगा. हाल ही में एक मुलाकात के दौरान उन्होंने मुझसे एक बात कही थी, जिसका जिक्र करना जरूरी है- ‘मुझे उम्मीद है कि मैं अपना अगला जन्मदिन (14 मार्च) आफ्स्पा मुक्त मणिपुर में मनाऊंगी.’ उनकी इस उम्मीद पर हिंदुस्तान यही कह सकता है- आमीन!

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे…

bwदूरदर्शन के एक प्रसारण में कैफ़ी आजमी से पूछा गया- आपकी पहचान नज़्मों के लिए रही है, ग़ज़लें आपने बहुत कम कही हैं. लेकिन इन दिनों आप फिर से ग़ज़लें कहने लगे हैं. इसकी क्या वजह है? कैफ़ी ने जवाब दिया, ‘मैंने वापस ग़ज़लें कहना उसी वजह से शुरू किया जिस वजह से ग़ालिब मुसव्विरी सीखना चाहते थे. मैं ग़ज़ल इसलिए कहता हूं ताकि मैं ग़ज़ल यानी बेगम अख़्तर से नज़दीक हो जाऊं.’ कैफ़ी आज़मी का ये जुमला बेगम अख़्तर की शख़्सियत के बारे में बहुत कुछ कह जाता है. वो सचमुच हमारे मुल्क, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में ग़ज़ल का दूसरा नाम हैं. किसी भी महफिल में जब ग़ज़ल का ज़िक्र छिड़ता है, तो बात बेगम अख़्तर से ही शुरू होती है और उन्हीं पर आकर ख़त्म होती है. बेगम अख़्तर ने ग़ज़ल गायिकी को और ग़ज़ल गायिकी ने बेगम अख़्तर को बेपनाह शोहरत अता की. कोठे से उतरी ठेठ दरबारी शैली की ग़ज़ल गायिकी को आवाम के बीच रचा-बसा देने का करिश्मा वही कर सकती थीं.

ग़ज़ल उनकी गायिकी का सबसे दिलकश अंदाज़ ठहरा, लेकिन उनकी ज़ंबील में ग़ज़ल के अलावा ठुमरी, चैती, दादरा, ख़याल आदि विधाओं के भी बेशुमार नगीने हैं. उपशास्त्रीय गायन का सम्मोहन बेगम अख़्तर के यहां अपने शबाब पर दिखता है. जो कुछ भी उन्होंने गाया, यूं लगा कि वो बेगम के लिए ही बना है और बेगम भी उसी के लिए ही बनी हैं. उनके अनन्य प्रशंसक यतीन्द्र मिश्र उनकी गायिकी को विश्लेषित करते हुए लिखते हैं, ‘उनकी शास्त्रीय संगीत की परंपरा पटियाला घराने के उस्ताद अता मोहम्मद ख़ान और किराना घराने के दिग्गज उस्ताद अब्दुल वाहिद ख़ान से संबद्ध रही है. वे जहां पटियाला घराने की गंभीर गायकी में अपने उस्ताद से ग़ज़ल, ठुमरी और दादरा सीखने में व्यस्त रहीं, ठीक उसी समय उन्हें किराना घराने के ख़याल की बारीकियों को सीखने का अवसर मिला. बेग़म अख़्तर की पूरी संगीत यात्रा, इन्हीं दो घरानों के बीच किसी नाजुक बिन्दु पर संतुलित मिलती है’. यतीन्द्र के मुताबिक उनके लिए संगीत सिरजना सिर्फ़ राग, ताल और धुनों पर ही आधारित काम नहीं था, बल्कि वे गीत के शब्दों और बोलों की सटीक अर्थ-व्याप्ति के लिए भावों को बहुत गौर से बरतने में तल्लीन दिखाई पड़ती हैं.

बिब्बी से अख़्तरी, अख़्तरी से अख़्तरीबाई फैज़ाबादी और अख़्तरीबाई फैज़ाबादी से बेगम अख़्तर बनने के सफ़र में ग़म और गायिकी दोनों उनके हमसफ़र बने रहे

बेगम अख़्तर की गायिकी के इस वैभव के नज़दीक जाने के लिए उनके जीवन के नज़दीक जाना जरूरी है. अंतिम दिनों में एक उद्घोषिका ने रेडियो पर उनको बेग़म अख़्तर कह कर संबोधित कर दिया, तो बेगम ने उससे कहा, ‘बेटी पूरी ज़िंदगी तो ग़मों के बीच ही गुज़री है, मैं बेग़म कहां हूं?’ बिब्बी से अख़्तरी, अख़्तरी से अख़्तरीबाई फैज़ाबादी और अख़्तरीबाई फैज़ाबादी से बेगम अख़्तर बनने के सफ़र में ग़म और गायिकी दोनों उनके हमसफ़र बने रहे. जन्म फैज़ाबाद के करीब भदरसा कस्बे में जुड़वा बहन के साथ 7 अक्टूबर 1914 को हुआ. नाम मिला बिब्बी उर्फ अख़्तरी. उनकी मां मुश्तरीबाई अपने ज़माने की मशहूर गानेवाली थीं, जबकि वालिद सैयद असग़र हुसैन सिविल जज थे, जिन्होंने मुश्तरी को किसी महफिल में सुना था और फिर दूसरी बीवी के तौर पर अपने घर ले आए थे. अख़्तरी अभी तीन साल की भी नहीं हुईं थीं कि उनकी जुड़वा बहन अनवरी का इंतक़ाल हो गया और इसके थोड़े ही वक्त बाद उनके वालिद ने उनकी मां मुश्तरी को छोड़ दिया. मां पर पड़ी दुखों की इस दोहरी मार को अख़्तरी ने भी बहुत छोटी उम्र में ही न केवल महसूस किया, बल्कि उनके साथ-साथ भोगा भी. अख़्तरी की मां उनके सबसे नज़दीक थीं. उनकी पूरी शख़्सियत पर मां की अटूट छाप दिखाई देती है. मां ने तमाम मुसीबतों और मुफ्लिसी के बीच जिस तरह अख़्तरी की तरबियत की, वो भी अपने आप में एक मिसाल है. आकाशवाणी के लिए बेगम अख़्तर के जीवन पर ‘कुछ नक़्श तेरी याद के’ जैसा चर्चित धारावाहिक लिखने वाले पत्रकार अटल तिवारी मुश्तरी के बारे में एक महत्वपूर्ण बात कहते हैं- ‘मुश्तरी ने जिस तरह का अविश्वसनीय संघर्ष अपनी बेटी का मुस्तकबिल संवारने के लिए किया, वो उन्हंे किसी प्रेरणाप्रद नायिका की तरह सामने लाता है. उस वक़्त के समाज में बेटी को अकेले पालना, उसे कोठे की रिवायत से निकालने के लिए अलग-अलग शहरों में ले जाकर बड़े-बड़े उस्तादों से तालीम दिलवाना, बेटी की तालीम के लिए अपना सब कुछ बेच देना वगैरह इस बात की बानगी है कि मुश्तरी में किस दर्जे की दूरदर्शिता, प्रगतिशीलता और विद्रोह था.’

Begum-Akhtar WEB2

बचपन की पढ़ाई-लिखाई में अख़्तरी का ज्यादा मन नहीं लगा, अलबत्ता फैज़ाबाद के मिशन स्कूल में वो टीचर की चोटी काट देने जैसे कारनामों से ज़्यादा जानी जाती रहीं. लेकिन मां से नज़दीकी की वजह से गायिकी की तरफ बचपन से ही उनका संजीदा रुज्हान रहा. इसे देखते हुए मां ने मशहूर सारंगी वादक इमदाद अली खां से अख़्तरी को सिखाने को कहा. अख़्तरी ने अभी सीखना शुरू ही किया था कि फैज़ाबाद में उनका घर जला दिया गया. पतियों द्वारा छोड़ी जा चुकी तवायफों के ऊपर इस तरह के ख़तरे उन दिनों आम थे. फैज़ाबाद से दाना-पानी उठने के बाद मां-बेटी ने बिहार के गया का रुख किया. गया पहुंचने के बाद मुश्तरी ने बेटी की संगीत शिक्षा की तरफ और संजीदगी से ध्यान दिया. गहने, बर्तन बेच-बेचकर उन्होंने बेटी को पहले सख़ावत हुसैन और फिर पटियाला घराने के उस्ताद अता मोहम्मद से तालीम दिलवाई. मां के अलावा अख़्तरी की गायिकी पर बुनियादी असरात अता मोहम्मद के ही दिखते हैं. सीखा भी अख़्तरी ने सबसे ज़्यादा उन्हीं से.

अख़्तरी की पूरी शख़्सियत पर मां की अटूट छाप दिखाई देती है. मां ने तमाम मुसीबतों और मुफ्लिसी के बीच जिस तरह अख़्तरी की तरबियत की, वो भी अपने आपमें एक मिसाल है

1924 में अख़्तरी मां के साथ कोलकाता चली आईं, जो उस वक्त गीत, संगीत और नाटक का गढ़ था, फिल्म इंडस्ट्री भी वहीं थी. अता मोहम्मद से उनकी तालीम लंबे वक्त तक जारी रही. इसके बाद उन्होंने उस्ताद अब्दुल वाहिद खां और अंत में झंडे खां से सीखा. इस दरमियान अख़्तरी कोलकाता की छोटी-मोटी निजी नशिस्तों में जाने लगी थीं. लेकिन कोलकाता में उनकी गायिकी ने पहले-पहल धूम सिर्फ बीस साल की उम्र में 1934 में मचाई, जब भारत कोकिला सरोजिनी नायडू की मौजूदगी में उन्होंने बिहार भूकंप पीड़ितों की मदद के लिए एक आयोजन में स्थानापन्न कलाकार के बतौर गाते हुए सैंकड़ों दर्शकों पर जादू कर दिया था. इस जलसे की तब के कलकत्ता में बड़ी चर्चा हुई और इसी के बाद अख़्तरी अख़्तरीबाई फैज़ाबादी बन गईं. लेकिन गाने वाली बाइयों के साथ होनेवाला व्यवहार उन्हें हमेशा सालता रहा. इस सिलसिले में उनका क़ौल मशहूर है, ‘इस समाज को क्या कहा जाए, जहां मर्द अच्छा गाता है, तो उस्ताद या पंडित कहलाता है और औरत अच्छा गाती है तो बाई कहलाती है.’

1934 में ही मेगाफोन कंपनी के मालिक जेएन घोष ने उन्हें छह ग़ज़लें रिकॉर्ड करने का प्रस्ताव दिया, जिसे अख़्तरी ने कुबूल कर लिया. रिकॉर्ड की गई उनकी पहली ग़ज़ल थी, वो असीरे दामे बला हूं. मेगाफोन द्वारा जारी किया गया ये रिकॉर्ड चल निकला और अख़्तरी ने पहली बार शोहरत का स्वाद महसूस किया. इसके बाद उनके ठुमरी, दादरा, चैती और ख़याल गायिकी के भी कई रिकॉर्ड्स निकले और कामयाब रहे. जिसके चलते 1936 में ऑल इंडिया रेडियो, कोलकाता ने भी उन्हें रिकॉर्ड किया. इस बीच वो बतौर अभिनेत्री फिल्म और थिएटर में भी काम करना शुरू कर चुकी थीं. लैला मजनूं (1934) और नई दुल्हन (1934) उनके मशहूर नाटक थे. साथ ही नल दमयंती (1933), एक दिन का बादशाह (1933), मुमताज़ बेगम (1934), अमीना (1934), रूपकुमारी (1934), जवानी का नशा (1935), नसीब का चक्कर (1936) जैसी फिल्मों में बतौर मुख्य अभिनेत्री काम करने के बाद उनकी शोहरत अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई थी और इसका सीधा फ़ायदा उनकी व्यावसायिक गायिकी की साख को हुआ था. मेगाफोन कंपनी अब उनके रिकॉर्ड्स का बाकायदा विज्ञापन जारी करती थी, जिस पर उनका परिचय लिखा होता था- ‘अख़्तरीबाई फैज़ाबादी फिल्म स्टार’. इस दौरान एक फिल्म कंपनी बिना उनका बकाया चुकाए बंद हो गई, तो उन्होंने उस पर मुकदमा करने की भी ठान ली. इसी सिलसिले में 1937 में लखनऊ के बैरिस्टर इश्तियाक़ अहमद सिद्दीक़ी से उनकी पहली मुलाक़ात हुई थी. इतना ही नहीं अब उन्हें हिंदुस्तान के प्रमुख दरबारों से ख़ुसूसी न्यौता भी मिलने लगा था. निज़ाम हैदराबाद ने उनके लिए सौ रुपये प्रतिमाह का वज़ीफ़ा मुक़र्रर कर दिया था, तो नवाब रामपुर ने उन्हें अपने दरबार में अहम पदवी से नवाजा था. अख़्तरी अब आधा वक्त रामपुर में और आधा लखनऊ में गुज़ारने लगी थीं.

1924 में अख़्तरी कोलकाता आईं, जो उस वक्त गीत, संगीत और नाटक का गढ़ था. कोलकाता में उनकी गायिकी ने पहले-पहल धूम सिर्फ बीस साल की उम्र में मचाई

1938 में अख़्तरी ने लखनऊ में अपना ख़ुद का घर बनवाया, वो भी हज़रतगंज जैसे इलाके के पास. ये कदम उनके रुतबे का पता देता है, क्योंकि उस वक्त तक लखनऊ की ज़्यादातर गानेवालियां चौक या दूसरे इलाक़ों की गलियों में रहती आईं थी. हज़रतगंज के आसपास उनका क़याम कभी नहीं रहा था. अख़्तरी ने ये दस्तूर बदला, क्योंकि शहर के ज़्यादातर रईस हज़रतगंज के आसपास ही रहते थे. व्यावसायिक तौर पर ये जगह उनके लिए ज़्यादा मुफ़ीद थी. फिल्म अभिनेत्री होने के बावजूद उनकी ज़्यादा मज़बूत पहचान गायिका की ही थी. रामपुर दरबार से जुड़ जाने के बाद भी लखनऊ में वो महफ़िलों का हिस्सा लगातार बनी रहीं. मशहूर गायिका मालिनी अवस्थी बेगम की गायिकी के बारे में दो महत्वपूर्ण बातें कहती हैं, ‘पहली बात तो ये है कि वो जिस मिट्टी की थीं यानी लखनऊ-फैज़ाबाद उसके संगीत की तमाम विधाओं को उन्होंने इस ख़ूबी के साथ गाया कि वो सभी पूरी दुनिया में पहुंच गईं. ठुमरी, दादरा, चैती, होरी, कजरी, मर्सिया, ग़ज़ल सब कुछ. उन्होंने अपने आपको कभी किसी एक विधा (जैसे ग़ज़ल) में महदूद नहीं किया. ये काम उनके चाहनेवालों ने किया. दूसरी बात कि उन्होंने कठिन चीज़ें भी जिस सहजता से गा दी हैं, वो बताता है कि उनकी अपनी आवाज़ पर कितनी पकड़ थी, कितनी समझ थी, कितना परिचय था. ये लंबे रियाज़ के बाद आता है. इसी का नतीजा है कि बेगम जब गाती हैं, तो बेहद कठिन चीज़ को भी बेहद आसानी से निभा ले जाती हैं और साधारण से साधारण श्रोता को भी मंत्रमुग्ध कर देती हैं.’

1940 के आस पास उनका फ़िल्मों से जी उचाट होने लगा था. क्योंकि उनके उस्ताद अता मोहम्मद को उनका फिल्मों में काम करना गायिकी के साथ अन्याय लगता था. वे इसके ख़िलाफ़ थे. नवाब रामपुर भी उनके फ़िल्मों में काम करने के पक्ष में नहीं थे. इसलिए महबूब खान की फिल्म रोटी (1942) के बाद उन्होंने फिल्मों से किनारा कर लिया. अब वो पूरा ध्यान अपनी गायिकी पर देने लगीं. उम्र अब तीस के करीब पहुंच रही थी, इसलिए लड़कपन की शोख़ी भी अब संजीदगी में बदल रही थी. ज़िंदगी एक दूसरे तरह का स्थायित्व चाह रही थी. नवाब रामपुर ने उनसे शादी करने की ख्वाहिश भी जताई, लेकिन अख़्तरी ने ख़ुद को नाचीज़ कहते हुए प्रस्ताव ठुकरा दिया. उन्होंने अपने लिए लखनऊ के बैरिस्टर अब्बासी को चुना, जिनसे उनकी पुरानी आश्नाई थी. दोनों एक-दूसरे के क़ायल भी थे. मगर अख़्तरी के गाने-बजाने का पेशा अब्बासी और उनके बीच दीवार बना हुआ था. फिर एक दिन अख़्तरी ने फैसला किया कि वो गाना छोड़कर अब्बासी का हाथ थामेंगी. हुआ भी ऐसा ही. 1945 में अख़्तरी बाई फैज़ाबादी बेगम अख़्तर बन गईं और गायिकी से उनका रिश्ता टूट गया.

फिल्म अभिनेत्री होने के बावजूद अख्तरी की ज़्यादा मज़बूत पहचान गायिका की ही थी. रामपुर दरबार से जुड़ने के बाद भी लखनऊ में वो महफ़िलों का हिस्सा लगातार बनी रहीं

बेगम दुनिया में गाने के लिए ही आईं थीं. उनकी मां ने उनको ढाला भी ऐसे ही था. बेगम के हज़ारों चाहनेवालों को उनके गाना छोड़ने का रंज था. इस बात से सबसे ज़्यादा दुखी उनकी मां मुश्तरी ही थीं. उन्होंने अपना पूरा जीवन अख़्तरी के लिए वक़्फ कर दिया था. मुसीबतें उठा-उठाकर उनको तालीम दिलवाई थी. यहां तक कि अख़्तरी जब स्टार बन गईं थीं, तब भी मुश्तरी उनके एक-एक कदम का हिसाब रखतीं थीं और उनको गाहे-बगाहे सलाह भी देती रहती थीं. बेगम ने गाना छोड़ा, तो उनकी मां पूरा-पूरा दिन उनके रिकॉर्ड सुनती रहतीं और रोती रहतीं. खुद बेगम अख़्तर की हालत गाने के बिना बेहाल थी. अब वो अकेलेपन और अवसाद में घिर गईं थीं, जिसने धीरे-धीरे कई बीमारियों को दावत दे दी थी. तबीयत जब ज़्यादा ख़राब हुई, तो डाक्टरों ने उनके पति अब्बासी से कहा कि अब इन्हें गाने की इजाज़त दे दी जाए, तभी तबीयत संभल सकती है. आख़िरकार शौहर ने हारकर बेगम को वापस गाने के लिए कहा. इसके बाद बेगम ने चार साल के तवील अंतराल के बाद 1949 में ऑल इंडिया रेडियो के लिए रिकॉर्डिंग की.

[ilink url=”https://tehelkahindi.com/continued-part-of-begum-akhtar/” style=”tick”]जारी…[/ilink]

सीपीआई (एम) : पचास साल में ढाई कोस

cpimभला किसने सोचा होगा कि भारत में वामपंथी राजनीति की हिरावल पार्टी- भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) अपनी स्थापना के पचासवें साल में उससे भी बुरे हाल में खड़ी होगी, जहां से 1964 में उसने अपनी यात्रा शुरू की थी. अपने स्वर्ण जयंती साल में पार्टी न सिर्फ सबसे गहरे और कठिन वैचारिक-राजनीतिक संकट का सामना कर रही है, बल्कि अपना अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद से भी गुजर रही है. राष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खतरे में है. सीपीआई (एम) को इतने गंभीर वैचारिक-राजनीतिक संकट से उस समय भी नहीं गुजरना पड़ा था, जब 1964 में अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) टूटी थी.

उस समय एक नया हौसला था, ‘क्रांति’ का सपना था और पी सुन्दरैया, एके गोपालन, ईएमएस नम्बूदरीपाद, टी नागी रेड्डी, प्रमोद दासगुप्ता, हरे कृष्ण कोनार, ज्योति बसु जैसे नेताओं-संगठनकर्ताओं का एकजुट और प्रतिबद्ध नेतृत्व था, जो सीपीआई नेतृत्व की संशोधनवादी लाइन के खिलाफ ‘वर्ग संघर्ष’ पर जोर देने की वकालत करते हुए नई राह पर निकला था. लेकिन 50 सालों में सीपीआई (एम) कहां पहुंची? 2014 के आम चुनाव में पार्टी ने कुल 98 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिनमें से सिर्फ 9 सीटों (अगर केरल में वाम मोर्चा समर्थित दो स्वतंत्र उम्मीदवारों की जीत को जोड़ लिया जाए, तो कुल 11 सीटों) पर उसे जीत मिली और उसे देश में पड़े कुल वोटों का सिर्फ 3.2 फीसदी वोट मिला. यह 1964 में सीपीआई (एम) की स्थापना के बाद से अब तक का सबसे कम वोट प्रतिशत है.
ऐसा लगता है कि पार्टी नौ दिन चले अढ़ाई कोस की तर्ज पर 50 साल में सवा तीन कोस चल पाई है. पार्टी की राजनीतिक ढलान साफ दिख रही है. पश्चिम बंगाल, जहां सीपीआई (एम) के नेतृत्व में वाम मोर्चे ने 1977 से 2011 तक एकछत्र राज किया और जो किसी जमाने में अभेद्य लाल दुर्ग समझा जाता था, वहां की राजनीति में वह क्रमश: अप्रासंगिक होने की ओर बढ़ती दिख रही है. पश्चिम बंगाल में पार्टी के वोटों में जिस तेजी से क्षरण हो रहा है, वह चौंकानेवाला है. पार्टी को राज्य में 2009 के आम चुनावों में 33.1 फीसदी, 2011 के विधानसभा चुनावों में 30 फीसदी और 2014 के आम चुनावों में मात्र 22.7 फीसदी वोट मिले.

इसके उलट राज्य में भाजपा के वोटों में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है. यह जले पर नमक छिड़कने जैसा है. लेकिन सच यही है कि बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच हो रहे ध्रुवीकरण में सबसे ज्यादा नुकसान सीपीआई (एम) को हो रहा है. इसी के राजनीतिक आधार से समर्थकों के अलावा कार्यकर्ता और स्थानीय स्तर के नेता भी भाजपा की ओर जा रहे हैं. नतीजा, पार्टी 2014 के आम चुनावों में राज्य की 42 सीटों में से मात्र दो सीटें जीत पाई, जितनी सीटें राज्य की राजनीति में हाशिए की पार्टी समझी जानेवाली भाजपा को मिलीं. यहां तक कि पार्टी ने 1964 में स्थापना के बाद 1967 में अपने पहले लोकसभा चुनाव में भी यहां से चार सीटें जीती थीं.

पार्टी के दूसरे गढ़ केरल में भी स्थिति अच्छी नहीं है. वहां की बीस सीटों में से वाम-लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) को कुल 8 सीटें सीपीआई (एम) को पांच) सीटें मिलीं, जबकि पार्टी इस बार वहां से इसकी दुगुनी सीटें जीतने की उम्मीद कर रही थी. केरल में लगभग एक नियम की तरह हर पांच साल में एक बार सीपीआई (एम) के नेतृत्ववाले एलडीएफ और एक बार कांग्रेस के नेतृत्ववाले यूडीएफ को सत्ता और सीटें मिलती हैं. इस कारण पार्टी इस बार यहां से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद कर रही थी, लेकिन उसे निराशा ही हाथ लगी. उल्लेखनीय है कि केरल में 2011 के विधानसभा चुनावों में एलडीएफ बहुत मामूली अंतर से हार गया था.

लेकिन राज्य में पार्टी के करिश्माई नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन (1964 में गठित पार्टी के 32 प्रमुख नेताओं में से जीवित बचे दो नेताओं में से एक) और राज्य सचिव पिनराई विजयन के बीच दो धड़ों में बंट गई है. पिछले दस सालों से ज्यादा समय से दोनों नेताओं के बीच तीखे संघर्ष और खींचतान के कारण पार्टी का हाल बेहाल है. इसका नतीजा हाल के आम चुनावों में दिखाई पड़ा. लेकिन पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व इस झगड़े को आज तक सुलझा नहीं सका है. इस कारण भाजपा यहां भी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है.

सीपीआई (एम) के लिए अगर कोई राहत की बात है तो वह यह कि उत्तर पूर्व के राज्य त्रिपुरा में पार्टी की मजबूत पकड़ बनी हुई है. विधानसभा चुनावों के साथ 2014 के लोकसभा चुनावों में सीपीआई (एम) ने राज्य की दोनों सीटें 64 फीसदी वोट के साथ जीत लीं. लेकिन इसे पार्टी से ज्यादा राज्य के मुख्यमंत्री माणिक सरकार और उनकी साफ-सुथरी छवि और बेहतर सरकार की जीत माना जा रहा है. यही नहीं, अपने ज्यादा मजबूत गढ़ों में पिट गई सीपीआई (एम) के लिए यह भले सांत्वना पुरस्कार की तरह हो, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में त्रिपुरा की जीत के कोई बहुत मायने नहीं हैं. इस जीत से पार्टी के दिन नहीं
बहुरनेवाले हैं.

सीपीआई (एम) को इतने गंभीर वैचारिक-राजनीतिक संकट से उस समय भी नहीं गुजरना पड़ा था, जब 1964 में अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) टूटी थी

असल में, देश के तीन राज्यों- पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा की राजनीति में सबसे प्रभावी और ताकतवर पार्टी होने के कारण राष्ट्रीय राजनीति और खासकर गैर कांग्रेसी-गैर भाजपा तीसरे मोर्चे के अंदर सीपीआई-एम की जो हैसियत रही है, वह पश्चिम बंगाल और केरल में पार्टी की राजनीतिक फिसलन के कारण तेजी से ढलान की ओर है. याद रहे कि पार्टी के नेतृत्व में वाम मोर्चे ने 2004 के आम चुनावों में अपना सबसे बेहतर प्रदर्शन किया था और उसे कुल 60 सीटें मिलीं थीं. इस कारण उसकी यूपीए सरकार बनवाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही और इस सरकार में शामिल न होते हुए भी वह लगभग ड्राइवर की सीट पर थी.

हालांकि 543 की लोकसभा में 60 सीटें 10 फीसदी से कुछ ही ज्यादा बनती हैं, लेकिन तथ्य यह है कि वास्तविक संसदीय मौजूदगी की तुलना में सीपीआई (एम) और वाम मोर्चे का राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव कहीं ज्यादा दिखाई पड़ा. यह एक अवसर था जब पार्टी और उसके नेतृत्व में वाम मोर्चा एक लंबी राजनीतिक छलांग लगा सकता था. इसके लिए जरूरी था कि पार्टी अपने राजनीतिक प्रभाव के प्रमुख तीन राज्यों की सीमा को तोड़कर देश के अन्य हिस्सों खासकर हिन्दी पट्टी में विस्तार करे. पार्टी कांग्रेस में यह फैसला भी  किया गया. पार्टी महासचिव प्रकाश करात ने खुद आगे बढ़कर इसकी जिम्मेदारी भी ली.

लेकिन 2004 से लेकर 2014 के बीच देश और खासकर हिन्दी क्षेत्रों में पार्टी के विस्तार का लक्ष्य तो दूर रहा, सीपीआई (एम) ने अपने मजबूत किले भी गंवा दिए. आखिर ऐसा क्यों हुआ? कहने की जरूरत नहीं है कि इसका कोई एक कारण नहीं है, लेकिन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कारण सीपीआई-एम का राजनीतिक-वैचारिक विचलन और रणनीतिक भूलें हैं. पार्टी ने राष्ट्रीय राजनीति में एक ओर नव उदारवादी आर्थिक नीतियों का विरोध किया, लेकिन दूसरी ओर, केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार को उन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाने दिया. यही नहीं, खुद पश्चिम बंगाल में उन्हीं नीतियों को जोर-जबरदस्ती लागू करने की भी कोशिश की.

सिंगुर और नंदीग्राम में बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने पार्टी के समर्थन से जिस तरह लाठी-गोली के जरिए जमीन छीनने की कोशिश की, उसका नतीजा उसे भुगतना पड़ा. यही नहीं, पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार की राजनीतिक-प्रशासनिक नाकामियों, जैसे पीडीएस घोटाला, रिजवानुर रहमान हत्याकाण्ड, सच्चर कमिटी की रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यकों की सबसे बदतर स्थिति का सामने आना और जंगलमहाल इलाके में दमन आदि ने वाम मोर्चे की पहले से ही घटती लोकप्रियता को और नीचे धकेल दिया. यही नहीं, पार्टी में जिस तरह से गुंडे, लम्पट, ठेकेदार, दलाल और भ्रष्ट तत्व घुस आए और जिला मुख्यालय से लेकर ग्राम पंचायत तक पार्टी के चेहरे बन गए और समानांतर सरकार चलाने लगे, उससे आम लोगों में नाराजगी बढ़ी.

हालांकि पार्टी ने ऐसे तत्वों को बाहर निकालने के लिए ‘शुद्धिकरण अभियान’ चलाया, लेकिन वह आंख में धूल झोंकने की कोशिश ही साबित हुई. असल में तीन दशकों से ज्यादा समय तक सत्ता में रही पार्टी में जिस तरह का अहंकार और निश्चिन्तता आ गई, उसने पार्टी में किसी तरह के बदलाव की संभावना खत्म कर दी. यहां तक कि सीपीआई (एम) का राज्य और केन्द्रीय नेतृत्व किसी भी तरह की आलोचना सुनने को तैयार नहीं था, विरोध की हर आवाज को दबा दिया गया. पार्टी ने उन वाम बुद्धिजीवियों और छोटी पार्टियों की आलोचनाओं और विरोध का जवाब दमन से दिया, जो उनसे सहानुभूति रखते थे. पार्टी नेतृत्व के इस रवैये ने उसे डुबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

लेकिन सीपीआई (एम) का मौजूदा संकट सिर्फ पश्चिम बंगाल-केरल में पराजय के कारण भर नहीं है. राजनीति में हार-जीत चलती रहती है. भाजपा 1984 के आम चुनावों में सिर्फ दो सीटें जीत पाई थी, लेकिन अगले डेढ़ दशक में वह गठबंधन के जरिए केंद्र की सत्ता में और तीन दशकों में अकेले दम पर दिल्ली की सरकार में पहुंच गई. सीपीआई-एम का संकट कहीं ज्यादा गहरा और बड़ा है. उसका संकट यह है कि वह इन 50 सालों में वाम राजनीति को तीन राज्यों से बाहर नहीं ले जा पाई. उलटे इन राज्यों के बाहर जैसे आंध्र प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, पंजाब और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी उसका प्रभाव लगातार सिकुड़ता और सिमटता गया है.

सीपीआई-एम की पचास साल की राजनीति की सबसे बड़ी नाकामी यह है कि वह राष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान की बजाय हमेशा कोई कंधा खोजती रही

खासकर हिन्दी क्षेत्रों में वह जिस तरह से सांप्रदायिकता से लड़ने के नाम पर अपनी स्वतंत्र पहचान और राजनीति को त्यागकर सत्तालोलुप, भ्रष्ट, परिवारवादी-जातिवादी और अवसरवादी राजनीति करनेवाली मध्यमार्गी पार्टियों और उनके नेताओं की पिछलग्गू बन गई, उसके कारण उसका विस्तार तो दूर, जो जनाधार बचा था, वह भी उनका साथ छोड़कर मुलायम-लालू के साथ चला गया. सांप्रदायिकता से लड़ने के नाम पर सीपीआई (एम) ने जिस तरह से सामाजिक न्याय के नारे के नीचे जातियों की गोलबंदी और जोड़-गुणा की रणनीति को आगे बढ़ाया, उसकी सीमाएं और अंतर्विरोध शुरू से ही जाहिर थे, लेकिन बुरी तरह पिट जाने के बावजूद वह आज तक इस रणनीति से आगे नहीं बढ़ पाई है.

असल में, सीपीआई (एम) की पचास साल की राजनीति की सबसे बड़ी नाकामी यह है कि वह राष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की बजाय हमेशा कोई कंधा खोजती रही. आश्चर्य नहीं कि पार्टी एक पेंडुलम की तरह पहले कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़ने के लिए गैर कांग्रेसी पार्टियों और यहां तक कि रणनीतिक रूप से भाजपा के साथ गलबहियां करने तक पहुंच गई और उसके बाद भाजपा के उभार को रोकने के नाम पर कांग्रेस के साथ ब्रेकफास्ट/डिनर करने लगी. इस रणनीति पर चलते-चलते एक दौर ऐसा आया कि सीपीआई (एम) और बाकी मध्यमार्गी पार्टियों के बीच फर्क करना मुश्किल हो गया.

यही नहीं, इस प्रक्रिया में सीपीआई (एम) एक रेडिकल बदलाव की वामपंथी-कम्युनिस्ट पार्टी के बजाय सरकारी वामपंथी पार्टी में बदलती गई, जहां उसका सबसे ज्यादा जोर पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा की सरकारों को बचाए रखने में लगने लगा. सरकार चलाने और उसे बनाए रखने के लिए वह मुद्दों को भी कुर्बान करने लगी. इसके कारण वह धीरे-धीरे अपने रेडिकल एजेंडे और मुद्दों को छोड़कर यथास्थितिवादी सरकारी पार्टी में तब्दील होती चली गई. पार्टी नेतृत्व में ऊपर से लेकर नीचे तक नौकरशाही हावी होने लगी, पार्टी जनसंघर्षों से दूर होने लगी, यहां तक कि खुद के शासित राज्यों में जनान्दोलनों के दमन पर उतर आई.

इसके साथ ही उसमें वह चमक और आकर्षण भी खत्म होने लगा, जो किसी भी वामपंथी/कम्युनिस्ट पार्टी के रेडिकल बदलाव के एजेंडे में सहज रूप से होता है. हैरानी की बात नहीं है कि सीपीआई (एम) की राजनीति और वैचारिकी आज छात्रों-युवाओं को उस तरह से आकर्षित नहीं कर पा रही है, जिस तरह से कुछ दशक पहले तक करती थी. इससे ज्यादा चौंकानेवाली बात क्या हो सकती है कि तीन राज्यों से बाहर उसकी ताकत और प्रभाव का चौथा राज्य माने जानेवाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में उसके छात्र संगठन-एसएफआई में पार्टी की राजनीतिक लाइन के खिलाफ खुला विद्रोह हो गया और पार्टी को पूरी यूनिट को भंग करना पड़ा.

इस सबके बीच ज्यादा चिंता की बात यह है कि अपने स्वर्ण जयंती वर्ष में राष्ट्रीय राजनीति में राजनीतिक और वैचारिक रूप से अप्रासंगिक होने के खतरे का सामना कर रहे सीपीआई (एम) के नेतृत्व में इस खतरे को लेकर कोई बेचैनी नहीं दिख रही है और न ही उससे निपटने की रणनीति, तैयारी और उत्साह है. उल्टे लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद देश-भर में वाम कार्यकर्ताओं के बीच पैदा हुई पस्त-हिम्मत, निराशा और हताशा के बीच वाम मोर्चे खासकर सीपीआई (एम) नेतृत्व की निश्चिन्तता और जैसे कुछ हुआ ही न हो (बिजनेस एज यूजुअल) का रवैया हैरान करनेवाला है.

अफसोस की बात यह है कि धर्मनिरपेक्षता जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण विचार और मुद्दे को जिस सिनिकल तरीके से कांग्रेस और दूसरी मध्यमार्गी पार्टियों के भ्रष्टाचार, परिवारवाद, अवसरवाद और निक्कमेपन को छुपाने के लिए इस्तेमाल किया गया है, उसके लिए सीपीआई (एम) कम जिम्मेदार नहीं है. इससे आज धर्मनिरपेक्षता का विचार संकट में है. कहने की जरूरत नहीं है कि धर्मनिरपेक्षता के विचार को आम लोगों के रोजी-रोटी और बेहतर जीवन के बुनियादी सवालों और बेहतर प्रशासन की जिम्मेदारी से काटकर सिर्फ भाजपा को रोकने के लिए जोड़-तोड़ का पर्याय बना देने की सिनिकल राजनीति अब अपने अंत पर पहुंच गई है.

लेकिन अगले साल अप्रैल में पार्टी कांग्रेस की तैयारी कर रही सीपीआई (एम) से जिस तरह की खबरें आ रही हैं, उससे यह आशंका बढ़ रही है कि भाजपा के जबरदस्त उभार के बाद अपनी गलतियों उर्फ ऐतिहासिक भूलों से सीखने के बजाय वह एक बार फिर चुकी और नकारी हुई कांग्रेस और दूसरी अवसरवादी मध्यमार्गी पार्टियों का गठबंधन बनाने की कोशिशें शुरू कर सकती है. यह आत्महत्या के अलावा और कुछ नहीं होगा. आम चुनावों का साफ सन्देश है कि लोग अस्मिताओं की अवसरवादी, संकीर्ण और सिनिकल राजनीति से ऊब रहे हैं, उनकी आकांक्षाएं बेहतर जीवन की मांग कर रही हैं और वे वैकल्पिक राजनीति को मौका देने के लिए तैयार हैं.

अगर सीपीआई (एम) अब भी नहीं संभली, तो हाशिए पर पहले ही पहुंच चुकी थी, अब उन्हें अप्रासंगिक होने और खत्म होने से कोई बचा नहीं सकता है

यह सीपीआई (एम) के लिए सबक है और आखिरी मौका भी. अगर वे अब भी नहीं संभले, तो हाशिए पर पहले ही पहुंच चुके थे, अब उन्हें अप्रासंगिक होने और खत्म होने से कोई बचा नहीं सकता है. कहने की जरूरत नहीं है कि भारतीय राजनीति में वामपंथ के पुनर्जीवन का कोई शार्ट-कट नहीं है. वामपंथ के लिए एकमात्र रास्ता खुद को वामपंथ की स्वतंत्र पहचान के साथ खड़ा करना ही है. वामपंथ को वामपंथ की तरह दिखना होगा.
वामपंथ की पहचान और ताकत जनान्दोलन रहे हैं और जनान्दोलनों से ही वैकल्पिक राजनीति और विकल्प बने हैं. लेकिन क्या सीपीआई (एम) इसके लिए तैयार है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षाविद् हैं)

‘एक गिलास कोल्ड ड्रिंक और 10 रुपये का अपमान!’

इरफान
इरफान

किसी भी चीज की कीमत किस चीज से तय होती है? अर्थशास्त्र के मांग और उपलब्धता के सिद्घांत से परे अगर हम थोड़ा दार्शनिक नजरिया अपनाएं तो किसी भी चीज का मोल वही होता है जो हम अपने मन में आंकते हैं. बुज़ुर्गों की भाषा में कहें तो ‘सब मन का धन है.’ आखिर हमारे बचपन में गुब्बारे और टॉफी सोने के गहनों से अधिक कीमती होते थे या नहीं? बात 90 के दशक के बीच की है. मैं उस समय कक्षा 5 या 6 का छात्र था और एक आम मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चे की तरह मेरे लिए भी गर्मी की छुट्टी का अर्थ नानी या मौसी के यहां कम से कम बीस दिन बिताना ही था. मेरे लिए मौसी का घर बाकी सब जगहों से बेहतर हॉलिडे डेस्टिनेशन था, क्योंकि उनके बड़े से घर और संयुक्त परिवार होने के कारण वहां कई हमउम्र बच्चे और खेलने की पर्याप्त जगह होती थी. उस साल किसी वजह से मैं अकेले ही मौसी के घर झांसी गया था, या यूं कहें कि मुझे पहुंचा दिया गया था. मौसा जी की तरफ से एक अन्य रिश्तेदार का एक हमउम्र लड़का ‘छोटू’ भी वहां था. हम दोनों की ही छुट्टियां डब्ल्यूडब्ल्यूएफ और शक्तिमान की चर्चाओं में मजे से कट रहीं थीं. एक दिन मौसाजी की एक और रिश्तेदार, जो उसी शहर के दूसरे कोने में रहती थीं, आईं और हम दोनों को अपने घर आने का न्योता दे गईं. मैं पहले भी कई बार उनके घर जा चुका था तो कोई समस्या नहीं थी और छोटू तो उनका सगा भांजा ही था.

‘मेरे लिए मौसी का घर बाकी सब जगहों से बेहतर हॉलिडे डेस्टिनेशन था क्योंकि वहां हमउम्र बच्चे और खेलने की पर्याप्त जगह होती थी’

हम दोनों दिन में 11 बजे नाश्ता कर के घर से निकले, इधर से बेसिक पर फोन कर दिया गया कि बालक आ रहे हैं. रास्ते का नक्शा रटवाकर, बर्फ का गोला खाने के लिए अतिरिक्त 2-2 रुपये देने के बाद किसी से फालतू बात न करने की हिदायत देकर ही हमें छोड़ा गया. जून का महीना, झांसी शहर और आधे घंटे धूप में सफर, हम दोनों का क्या हाल हुआ होगा आप समझ सकते हैं. ‘अरे तुम लोग आ गए’, ‘कितना लंबा हो गया है ये’, ‘कुछ खायाकर दुबला हो रहा है’ जैसे हर बार दोहराये जाने वाले जुमलों के साथ बाकी के परिवार से मुलाकात हुई. कुछ देर बैठने और बातें करने के बाद हम वापस चल दिए. घर पहुंच कर थोड़ी देर सुस्ताने के बाद जब मौसी से कहा, ‘खाना लाओ’. तो मौसी ने चौंककर पूछा, ‘वहां नहीं खाया?’ ‘नहीं!’ मैंने बड़े आराम से कहा. ‘पर छोटू (मेरे साथ वाला लड़का) तो बता रहा था कोल्ड ड्रिंक, क्रीम वाले बिस्कुट और चिप्स खाये थे. और दस रुपए कहां हैं जो वहां वाली मौसी ने दिए थे?’ एक सांस में मौसी ने इतना कुछ पूछ डाला. इस बीच छोटी-सी बुद्घि में यह बात आ गई थी कि जब बाहर बैठक में परिवार के बाकी लोग मुझसे सवाल-जवाब कर रहे थे, तो उस समय छोटू को भीतर किचन में क्यूं याद किया गया था. मैं यह नहीं कह सकता कि उस छोटी उम्र में मुझे कोई बहुत बड़ा अपमान महसूस हुआ. न ही मुझे एक गिलास कोल्ड ड्रिंक को लेकर ठगा जाना बुरा लगा, न ही उन दस रुपयों के न मिलने का. हालांकि तब तक मैं यह आकलन लगा चुका था कि उतने रुपयों में मैं सुपर कमांडो ध्रुव की 5 कॉमिक्स किराये पर ले सकता था. फिर भी कुछ तो था जो उस दिन मेरे मन में टूट गया. शायद बड़े लोगों के इस छोटे व्यवहार ने एक ही दिन में मुझे थोडा बड़ा बना दिया. उसके बाद साल बीतते गए, मैं बड़ा होता गया, छुट्टियां कभी प्रतियोगिताओं की तैयारी में बीतने लगीं तो कभी कोई कोर्स करने में. धीरे-धीरे मौसी के यहां जाना भी कम होता गया. आज उस बात को लगभग 20 साल बीत चुके हैं. कहने को तो वह बात इतनी छोटी-सी थी कि वह न तो छोटू को याद है, न मौसी को, न ही किसी और को, मगर उस दिन के बाद से जब कभी भी उस घर में जाने का मौका आया, न जाने क्यों मैं बस टालता ही रहा. हालांकि मैंने कई बार कोशिश भी की कि इन मामूली चीज़ों को भूल जाऊं और उनके घर भी हो आऊं, मगर हर बार 10 रुपये की मामूली रकम और एक गिलास कोल्ड ड्रिंक से जुड़ा वह सवाल इतना बड़ा हो जाता है कि इसके आगे कुछ सोच ही नहीं पाता.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं)

उन दिनों फिल्में नहीं, राजेश खन्ना चलते थे’

प्रतिद्वंदी? फिल्म आनंद के एक दृश्य में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन
प्रति्द्वंदी? फिल्म आनंद के एक दृश्य में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन

राजेश खन्ना और मेरे करियर ने 1970 की शुरुआत में तकरीबन एक ही साथ उड़ान भरी थी. राजेश खन्ना से जब हमारी (मेरी और जावेद अख्तर) मुलाकात हुई थी, तब तक उनकी फिल्में आराधना और दो रास्ते रिलीज हो चुकी थीं और उन्हें सुपरस्टार का खिताब मिल चुका था. फिर हमने जीपी सिप्पी की फिल्म अंदाज में पहली बार साथ काम किया. इस फिल्म के निर्माण के दौरान ही हमारी जान-पहचान बढ़ी. उनके साथ नए स्टोरी आइडियाज पर बहुत चर्चा होती थी. हम अच्छे दोस्त बन गए. बान्द्रा में भी हम लोग पड़ोसी हुआ करते थे और तकरीबन रोज ही मिला करते थे. जिन दिनों उनका सितारा बुलंदी पर था, मैं भी अक्सर उनके बंगले आशीर्वाद की बैठकों में शामिल हुआ. मुझे उन्हें करीब से जानने का वक्त मिला. कई साल तक उन्हें जानने-समझने के बाद मैं उनके बारे में ये तो नहीं समझ पाया कि वो अच्छे हैं या बुरे, बस इतना समझा कि वो अजीब थे. सबसे अलग.

ये वो वक्त था जब फिल्म इंडस्ट्री आज के दौर के मुकाबले छोटी जरूर थी लेकिन यहां प्रतिद्वंद्विता कम नहीं थी. दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनंद, शम्मी कपूर, राजेंद्र कुमार जैसे एक्टर राज करते थे. इन सबकी मौजूदगी में किसी भी नए एक्टर के लिए अपनी पहचान बनाना बड़ी बात थी. राजेश ने न सिर्फ अपनी पहचान बनाई, बल्कि बहुत कम वक्त में अपने स्टारडम को एक नई ऊंचाई तक पहुंचा दिया. 1969-1975 तक मैंने उनके सुपर स्टारडम को बेहद करीब से देखा, लेकिन मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि जिस ऊंचाई को उन्होंने छुआ, वहां उनके बाद आज तक हिंदी सिनेमा का कोई स्टार नहीं पहुंचा. उनकी कामयाबी एक मिसाल है.

आज मेरा बेटा सलमान बड़ा स्टार है. हमारे घर के बाहर उसे देखने के लिए हर रोज भीड़ लगती है. लोग मुझसे कहते हैं कि किसी स्टार के लिए ऐसा क्रेज पहले नहीं देखा. मैं उन लोगों से कहता हूं कि इसी सड़क से कुछ दूरी पर, कार्टर रोड पर आशीर्वाद के सामने मैं ऐसे कई नजारे देख चुका हूं. राजेश खन्ना के बाद मैंने किसी भी दूसरे स्टार के लिए ऐसी दीवानगी नहीं देखी.

राजेश के फैन्स में छह से 60 साल तक के लोग शामिल थे. खासतौर पर लड़कियां तो उनकी दीवानी थीं. उनके करियर की सबसे बड़ी हिट फिल्म हाथी मेरे साथी लिखने में भी मेरा योगदान था. मुझे याद है कि इस फिल्म की शूटिंग के वक्त मैं उनके साथ मद्रास (चेन्नई) और तमिलनाडु की कई दूसरी लोकेशन्स पर गया. मैंने देखा उन इलाकों में भी राजेश खन्ना के नाम पर भारी भीड़ जमा हो जाती थी. ये हैरत की बात थी क्योंकि वहां हिंदी फिल्में आमतौर पर ज्यादा नहीं चलती थीं. तमिल फिल्म इंडस्ट्री खुद काफी बड़ी थी और उसके अपने मशहूर स्टार थे, लेकिन राजेश खन्ना का करिश्मा ही था, जो भाषा की सरहदों को भी पार कर गया था. ये करिश्मा उन्होंने उस दौर में कर दिखाया जब न तो टेलीविजन था, न 24 घंटे का एफएम रेडियो न बड़ी-बड़ी पीआर एजेंसियां.

लेकिन चार-पांच साल के बाद उनके करियर की ढलान भी शुरू हुई. जिस तरह उनकी बेपनाह कामयाबी की कोई एक वजह नहीं थी, उसी तरह उनके करियर के ढलने की भी कोई एक वजह नहीं थी. उनकी पारिवारिक जिंदगी के तनाव, इंडस्ट्री के लोगों के साथ उनका बर्ताव और कुछ नया न करना… ऐसी कई वजहें थीं. लेकिन मुझे लगता है कि इसमें किस्मत का खेल भी था. फिर जब फिल्में पिटीं तो उन्होंने अपने अंदर झांककर नहीं देखा कि गलती कहां हुई. उन्होंने दूसरों को दोष देना शुरू कर दिया. उन्हें लगता था कि उनके खिलाफ कोई साजिश हुई है.

उन जैसे सुपरस्टार के बारे में ये जानकर आपको हैरानी होगी कि एक इंसान के तौर पर वो इंट्रोवर्ट थे और खुद को सही ढंग से एक्सप्रेस तक नहीं कर पाते थे. वो बेहद शर्मीले भी थे. मैं उनकी मेहमाननवाजी का भी गवाह रहा हूं. बड़े दिल के आदमी थे, खाना खिलाने के शौकीन थे. मैं जानता हूं कि उन्होंने अपने स्टाफ के लोगों को मकान भी दिए हैं. कोई आदमी अच्छा लगता था तो उसके लिए बिछ जाते थे. गाड़ियां तक गिफ्ट दी हैं. उस जमाने में अपने दोस्त नरिंदर बेदी को भी उन्होंने गाड़ी तोहफे में दी थी. फिर धीरे-धीरे उनका दौर गुजर गया. लेकिन मुझे लगता है कि अपने जेहन में वो इस बात को कभी स्वीकार नहीं कर पाए.

फिल्म इंडस्ट्री के बड़े स्टार्स पर कई किताबें लिखी गई हैं. इनमें से ज्यादातर या तो राजेश खन्ना से पहले के स्टार्स जैसे दिलीप कुमार, देव आनंद, राज कपूर, शम्मी कपूर वगैरह पर हंै या फिर राजेश खन्ना के बाद के स्टार्स जैसे अमिताभ बच्चन पर. हैरानी की बात है कि राजेश खन्ना पर अब तक कुछ भी शोधपरक नहीं लिखा गया था. जबकि उनका दौर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का बेहद अहम और करिश्माई दौर रहा है. अपने उस दौर में वह वन मैन-इंडस्ट्री थे और कहा जाए तो उन दिनों फिल्में नहीं चलती थीं, सिर्फ राजेश खन्ना चलते थे.

किसी कलाकार की जिंदगी के बारे में रिसर्च करके लिखना आसान नहीं है. वक्त बीतने के साथ-साथ कलाकार को जानने वालों की यादें अक्सर धुंधली होती जाती हंै. जरूरी है कि उन लोगों से बात करके उसकी पर्सनैलिटी को समझ कर, उसे दस्तावेजबंद किया जाए. कोई भी शख्स ऐसा क्यों था? उसकी एक्टिंग, फिल्में और जिंदगी, सिनेमा के इतिहास का हिस्सा हैं जिनके बारे में लिखा जाना चाहिए.

इस किताब के शोध के लिए लेखक यासिर उस्मान ने ऐसे कई लोगों से बात की है जो राजेश खन्ना को करीब से जानते थे या फिर उनके साथ काम कर चुके हैं. इसके अलावा खुद राजेश के पुराने इंटरव्यूज, उनके निर्माता-निर्देशकों, को-स्टार्स के अनुभव और कड़ी रिसर्च के जरिए उनकी जिंदगी और उस दौर को बड़ी खूबसूरती से री-क्रिएट किया गया है. हालांकि ये राजेश खन्ना की असली जिंदगी की कहानी है लेकिन लेखक का अंदाज-ए-बयां ऐसा है कि ये कहानी किसी दिलचस्प फिल्म की तरह जेहन में यादगार तस्वीरें उभारती है. इन तस्वीरों में राजेश खन्ना पलकें झपकाते हुए, अपनी हसीन मुस्कान के साथ भी नजर आते हैं और बाद में अकेलेपन और गुमनामी से जूझते हुए गुजरे जमाने के स्टार के तौर पर भी.

पुस्तकः कुछ तो लोग कहेंगे लेखक ः यासिर उस्मान मूल्यः 250 रुपये  पृष्ठः 296 प्रकाशन ः पेंगुइन बुक्स इंडिया
पुस्तक: कुछ तो लोग कहेंगे
लेखक: यासिर उस्मान
मूल्य: 250 रुपये
पृष्ठ: 296
प्रकाशन:  पेंगुइन बुक्स इंडिया

फिल्म स्टार्स या पब्लिक फिगर्स के बारे में बात करते वक्त हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि वो भी आम इंसान ही हैं, जो गलतियां करते हैं, नाकाम भी होते हैं, जिन्हें असुरक्षा  होती है और कामयाबी खोने का डर भी सताता है. इस कहानी में राजेश खन्ना के बेमिसाल स्टारडम के साथ एक एक्टर के तौर पर उनकी काबिलियत का जिक्र है, तो एक इंसान के तौर पर उनकी खूबियों और खामियों की भी बात है. कुल-मिलाकर लेखक, राजेश खन्ना की शख्सियत के कई डायमेंशंस बड़ी खूबी से सामने लाए हैं. अक्सर मशहूर शख्सियतों की असली जिंदगी पर लिखे गए लेख या किताबें या तो सिर्फ उनकी तारीफ करती हैं या सिर्फ आलोचना और इस कोशिश में अक्सर यूनी डायमेंशनल हो जाती हैं. लेकिन यहां कड़ी रिसर्च के हवाले से, बड़े बैलेंस तरीके से सारी बातें उभरती हैं. किसी दिलचस्प नॉवेल की तरह कहानी को आगे बढ़ाते हुए, लेखक गंभीर बात कह जाते हैं. खासतौर पर अंत तक पहुंचते हुए, उन्होंने जिस तरह राजेश खन्ना के व्यक्तित्व को समझाने की कोशिश की है, वो लेखनी पर उनकी पकड़ को साफ दिखाता है. इसमें लेखक की पत्रकारिता की ट्रेनिंग भी नजर आती है.

मैंने भी ये सोचा नहीं था कि अगर एक इंसान की जिंदगी खोली जाए तो उसमें कितनी पर्तें हो सकती हैं और ये पर्तें उसकी शख्सियत को कितने आयाम देती हैं. फिल्म की स्क्रिप्ट लिखते समय, नए-नए किरदार गढ़ते वक्त मैं इन बातों पर बेहद ध्यान देता था, लेकिन ये किताब पढ़कर मुझे यही लगा कि वाकई ट्रूथ इज स्ट्रॉन्गर दैन द फिक्शन. एक ऐसा शख्स जिसे मैं एक जीते-जागते इंसान के तौर पर जानता था, उसी शख्स को देखने समझने का एक नया नजरिया और उसकी जिंदगी एक नया पहलू मुझे इस किताब में नजर आया.

मुझे यकीन है कि इस किताब को पढ़ते वक्त आप मुस्कुराएंगे, कुछ हिस्से आपकी आंखें नम भी करेंगे. अपने हीरो राजेश खन्ना के लिए आपको हमदर्दी भी होगी और फिर क्लाईमैक्स तक आते-आते एक जीत का अहसास भी होगा. यानी ये अनुभव तकरीबन वैसा ही है जैसा राजेश खन्ना की कोई बेहद कामयाब फिल्म देखने के बाद हुआ करता था. फिल्म इंडस्ट्री के जिस दौर का मैं भी गवाह रहा हूं, उस खास वक्फे को इस किताब में जिंदा करने की कोशिश की गई है. मेरा मानना है कि ये किताब सिनेमाई लेखन में एक अहम दस्तावेज हैं, जो आने वाले समय में फिल्म इतिहास का हिस्सा रहेगी.

(पुस्तक की भूमिका से)

किसी की मुसीबत, किसी का मुनाफा

दिल्ली सरकार के आंकड़ों के मुताबिक शहर में 55 हजार ऐसे लोग हैं जिनके पास अपना कोई ठौर-ठिकाना नहीं है, कोई घर नहीं है. हालांकि इस संख्या को लेकर मतभेद भी है. इसी मुद्दे पर काम करने वाली आश्रय अधिकार अभियान नामक स्वयंसेवी संस्था का दावा है कि सरकार का आंकड़ा गलत है. संस्था के मुताबिक इस वक्त दिल्ली में बेघर लोगों की संख्या लगभग 1.5 लाख है. सरकार जिस आंकड़े की बात कर रही है वह सर्वे 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों के समय हुआ था और उस वक्त पूरे शहर से बेघर लोगों को निकाल दिया गया था. उन्हें दिल्ली से बाहर के इलाकों में भेज दिया गया था. इसीलिए सरकार वास्तविक संख्या से अंजान है.

खैर, संख्या चाहे जो भी हो, सच इतना भर है कि ठंड के इस मौसम में शहर में एक बड़ी आबादी सड़कों पर रह रही है. इनमें एक बड़ी आबादी उन लोगों की है जो सड़कों पर, मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारों के आगे भीख मांगते हैं. कुछ नशेबाज भी होते हैं. अमूमन ये लोग शाम होते ही सरकार द्वारा चलाए जा रहे रैन बसेरों में आश्रय ले लेते हैं. इसकी वजह यह है कि इन रैन बसेरों में ठहरने के लिए कोई पैसा नहीं देना पड़ता. लेकिन इनमें गंदगी इतनी ज्यादा होती है कि कोई सामान्य आदमी यहां थोड़ी देर के लिए रुक भी नहीं सकता, पूरी रात सोना तो दूर की बात है.

बेघर-बार लोगों में और भी कई तरह के लोग हैं. कुछ ऐसे हैं जो दूसरे राज्यों से काम की तलाश में यहां आए हैं. ये लोग दिनभर दिहाड़ी पर मजदूरी करते हैं और रात में सड़कों के किनारे ही सो जाते हैं. गर्मी के मौसम में तो खुले आसमान के नीचे रात कट जाती है, लेकिन जाड़े में ये लोग किसी ऐसे ठौर की तलाश करते हैं जहां रात की नींद पूरी हो जाए. लोगों की यह मजबूरी कुछ लोगों के लिए रोजगार का मौका है. पुरानी दिल्ली के कुछ इलाके इसी तरह के एक अनोखे धंधे की उर्वर जमीन है. यहां कई ऐसी जगहें हैं जहां लोगों को रात में सोने के लिए चारपाई, दरी और रजाई किराए पर दी जाती है और अलसुबह ही छीन ली जाती है. एक की मजबूरी से दूसरे की रोजी-रोटी का यह अद्भुत अर्थशास्त्र है.

chaarpaayi_razai1

खुले आसमान के नीचे सो रहे इनलोगों के पास किराये का कमरा या घर नहीं है. इन्हें हर महीने का किराया नहीं देना होता बल्‍कि ये रोज सुबह किराया देते हैं.

 

 

एक रात के लिए चारपाई के साथ रजाई का किराया 30 रुपये से 50 रुपये तक लिया जाता है. जिन इलाकों में सुबह 6 बजे जगा दिया जाता है, वहां 30 रुपये बतौर किराया लिया जाता है और जहां 7 से 7.30 बजे तक सोने दिया जाता है, वहां 50 रुपये लिया जाता है. अमूमन रात में 10 से 11 बजे के बीच ग्राहकों को सुलाया जाता है.

एक रात के लिए चारपाई के साथ रजाई का किराया 30 रुपये से 50 रुपये तक लिया जाता है. जिन इलाकों में सुबह 6 बजे जगा दिया जाता है, वहां 30 रुपये बतौर किराया लिया जाता है और जहां 7 से 7.30 बजे तक सोने दिया जाता है, वहां 50 रुपये लिया जाता है. अमूमन रात में 10 से 11 बजे के बीच ग्राहकों को सुलाया जाता है.

 

 

razaii_10

पुरानी दिल्ली की एक गली में चैन की नींद सोते इस आदमी को सुबह 50 रुपया किराया के तौर पर देना होगा.

 

 

जब इलाके की बाकी दुकानें बंद हो जाती हैं, तो इस दुकान का शटर खुलता है. मोलभाव शुरू होता है. किराए का पैसा लेने के बाद रजाई, दरी और चारपाई दी जाती है. सुबह जब तक बाकी दुकानें खुलती हैं, तब यह दुकान एक बार फिर से शाम तक के लिए बंद हो जाती है.

जब इलाके की बाकी दुकानें बंद हो जाती हैं, तो इस दुकान का शटर खुलता है. मोलभाव शुरू होता है. किराए का पैसा लेने के बाद रजाई, दरी और चारपाई दी जाती है. सुबह जब तक बाकी दुकानें खुलती हैं, तब यह दुकान एक बार फिर से शाम तक के लिए बंद हो जाती है.

 

 

 

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो चारपाई और रजाई किराए पर नहीं ले पाते. ऐसे लोगों के लिए जमीन पर एक बड़ी दरी बिछा दी जाती है. केवल रजाई किराए पर लेकर लोग साथ-साथ सो जाते हैं. केवल रजाई का किराया 10 रुपये से 20 रुपये के बीच है. सुबह इनके जगने का इंतजार नहीं किया जाता. सुबह होते ही रजाई छीन ली जाती है.

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो चारपाई और रजाई किराए पर नहीं ले पाते. ऐसे लोगों के लिए जमीन पर एक बड़ी दरी बिछा दी जाती है. केवल रजाई किराए पर लेकर लोग साथ-साथ सो जाते हैं. केवल रजाई का किराया 10 रुपये से 20 रुपये के बीच है. सुबह इनके जगने का इंतजार नहीं किया जाता. सुबह होते ही रजाई छीन ली जाती है.

 

 

 

 जैसे-जैसे ठंड बढ़ती है वैसे-वैसे सोनेवालों की संख्या बढ़ती है. कारोबार बढ़ता है. सोने का सामान किराए पर देनेवाले लोग अपने साथ दो-चार लोग रखते हैं जो सुबह होते ही हरकत में आ जाते हैं और कुछ ही समय में सारी रजाई, खाट और दरी एक जगह जुटा देते हैं. इन मजदूरों को सोने के लिए मुफ्त में रजाई मिलती है और मेहनताने के तौर पर 50 रुपये भी मिलते हैं.

जैसे-जैसे ठंड बढ़ती है वैसे-वैसे सोनेवालों की संख्या बढ़ती है. कारोबार बढ़ता है. सोने का सामान किराए पर देनेवाले लोग अपने साथ दो-चार लोग रखते हैं जो सुबह होते ही हरकत में आ जाते हैं और कुछ ही समय में सारी रजाई, खाट और दरी एक जगह जुटा देते हैं. इन मजदूरों को सोने के लिए मुफ्त में रजाई मिलती है और मेहनताने के तौर पर 50 रुपये भी मिलते हैं.

 

 

यमुनापार रहनेवाले रफीक पिछले कई सालों से यह काम कर रहे हैं. इनके यहां एक रात में तकरीबन दो सौ लोग सोते हैं. ठंड बढ़ने पर हर रात चार सौ लोग तक यहां सोते हैं. रफीक दिल्ली पुलिस से नाराज हैं. वह कहते हैं कि पुलिस उन्हें परेशान करती है और उनसे घूस लेती है. वह कहते हैं, ‘हम किसी को सोने के लिए गर्म रजाई, खाट और दरी देते हैं. बदले में किराया लेते हैं. इसमें गलत क्या है. अगर सरकार इनके सोने का इंतजाम कर दे तो ये लोग हमारे यहां आएंगे ही नहीं. हमारा काम बंद हो जाएगा. सरकार को इन बेघरों के लिए इंतजाम करना चाहिए न कि हमें भगाना चाहिए.’

यमुनापार रहनेवाले रफीक पिछले कई सालों से यह काम कर रहे हैं. इनके यहां एक रात में तकरीबन दो सौ लोग सोते हैं. ठंड बढ़ने पर हर रात चार सौ लोग तक यहां सोते हैं. रफीक दिल्ली पुलिस से नाराज हैं. वह कहते हैं कि पुलिस उन्हें परेशान करती है और उनसे घूस लेती है. वह कहते हैं, ‘हम किसी को सोने के लिए गर्म रजाई, खाट और दरी देते हैं. बदले में किराया लेते हैं. इसमें गलत क्या है. अगर सरकार इनके सोने का इंतजाम कर दे तो ये लोग हमारे यहां आएंगे ही नहीं. हमारा काम बंद हो जाएगा. सरकार को इन बेघरों के लिए इंतजाम करना चाहिए न कि हमें भगाना चाहिए.’

 

 

‘स्त्री की आकांक्षा भी बेहतर दुनिया की आकांक्षा है’

alpana_mishraआप आधुनिक हिंदी साहित्य के हस्ताक्षरों में से एक पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी के परिवार से आती हैं. लिखने की शुरुआती प्रेरणा क्या रही? अब तक के लेखन में क्या किसी तरह का कोई दबाव महसूस किया?
यह मेरा सौभाग्य ही रहा कि मेरा जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ, जहां विद्वता, ज्ञान और किताबें चारों तरफ थीं. वहां अधिक से अधिक पढ़ना एक सहज क्रिया थी. लेकिन मेरे पिता जी की नौकरी एक छोटी जगह पर थी. बस्ती जनपद में. बस्ती में किताबें मिलना मुश्किल था. पर उस समय की सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाएं बस्ती में, मेरे घर आती थीं. बस्ती प्रतिभाशाली लोगों का क्षेत्र रहा है. साहित्य की बड़ी प्रतिभाएं वहां से निकली हैं. इन सभी प्रतिभाओं को अपना विकास करने के लिए बस्ती से बाहर जाना पड़ा. इसलिए वहां चुनौतियां अलग तरह की थीं. पारिवारिक दबाव नहीं था. साहित्य का सम्मान था. इसलिए छोटी उम्र में जब मैंने अन्याय का विरोध करने के लिए एक कविता लिखी, तो परिवार वाले अतिरिक्त रूप से खुश हो गए. उन्होंने उस समय जो एक बहुत छोटा-सा अन्याय मेरे और मेरी बहनों के साथ हो गया था, उसे समझा भी, सराहा भी. फिर मित्रों, परिचितों के आगे कविता सुनाने का सिलसिला शुरू हुआ. पिता जी गर्व से भर उठते. मेरे लिए यह कठिन हो गया कि अन्याय के विरोध में लिखी कविता मनोरंजन बन कर रह जाए, तब इस स्थिति के विरोध में एक और कविता लिखी, इसे सुन कर कविता सुनवाने का सिलसिला रोक दिया गया. इस सब से मुझे समझ में आया कि साहित्य अपनी बात कहने का सशक्त माध्यम है. अपनी बात भी और जो नहीं कह सकता, उनकी बात भी. गद्य के क्षेत्र में बाद में कदम रखा, जब लगने लगा कि कहने के लिए और अधिक स्पेस चाहिए. मेरी पहली कहानी ‘हंस’ अक्टूबर 1996 में ‘ऐ अहिल्या’ नाम से प्रकाशित हुई थी. इस पर घर, परिवार से लेकर दोस्तों- मित्रों तक ने कहा कि अब ये सब क्या लिखने लगी? कविता तक ठीक था. लेकिन मेरी मां ने मुझे स्वीकार किया. पिता जी ने भी हौसला बढ़ाया. जब ‘कथादेश’ के नवलेखन अंक जून 2001 में कहानी ‘मुक्ति प्रसंग’ प्रकाशित हुई, तब बहुत मुश्किलें आईं. पत्रों के ढेर लग गए. अच्छे बुरे, धमकी भरे, अश्लील तक. संपादक के पास भी बहुत पत्र आए. बहुत से लोगों ने पीठ थपथपाई, तो बहुत से लोगों ने साफ कहा कि अब बंद करो ये सब लिखना. यही हाल हुआ, जब ‘इंडिया टुडे’ की साहित्य वार्षिकी 2002 में कहानी ‘भय’ आई. लेकिन मैं तो ‘कहने’ निकली हूं. जिद है कि उन लोगों की तरफ से भी कहूंगी, जो खुद नहीं बोल सकते.

परिवार, नौकरी और लेखन में तालमेल बिठाने में मुश्किल नहीं आई कभी? कोई मोड़ ऐसा आया हो जब लगा हो कि किसी एक से समझौता करना पड़ेगा?
बार-बार मुश्किलें आईं. परिवार और नौकरी के साथ एक स्त्री का काम कई गुणा बढ़ जाता है. अगर लेखन भी साथ हो तो सोने पर सुहागा जैसा होगा. परिवार और नौकरी के बाद केवल अपने आराम का समय ही है, जो एक स्त्री लेखन को दे सकती है. मैंने भी अपनी नींद का वक्त लेखन को दिया. सारी कहानियां देर रात जगकर लिखी गईं. उपन्यास लिखते समय दो-तीन बजे रात तक जगने की आदत पड़ गई थी. जब उपन्यास पूरा हो गया तो करीब महीने-भर तक रात तीन बजे तक नींद नहीं आती थी. इस तरह कोशिश-भर संतुलन साधा. मेरे साथ एक और भी मुश्किल रही हैं, परिवार की अधिकतम जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ जाती रहीं. इसका कारण मेरे पति कर्नल अमिताभ का सेना में होना था. वे फौज की कठिन ड्यूटी करते रहे हैं. फिर भी उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया है. मैंने स्त्री आत्मनिर्भरता के लिए नौकरी करना चुनकर फौज की कुछ सुविधाओं को छोड़ा भी था, इस निर्णय में भी पति ने मेरा साथ दिया. मैंने अपने अनुभवों से जाना है कि ज्यादातर फौजी परिवार के मामले में भावुक और विचार के मामले में प्रगतिशील होते हैं. इस तरह पति और बच्चों और माता-पिता, सब के साथ मिल-जुल कर हमने यह गाड़ी ठीक ठाक ले चलने की कोशिश की है.

आपके लेखन में वंचित वर्ग और स्त्रियों के दुखः दर्द केंद्रीय विषय बनकर सामने आते हैं. लेखन के शुरुआत से अब तक आप इन दोनों वर्गों की स्थिति में किस तरह का सकारात्मक या नकारात्मक बदलाव देखती हैं?
मैंने अपनी कहानियों में लगातार स्त्री के वृहत्तर सरोकारों और व्यापक दृष्टि की बात की है. स्त्री की आकांक्षा भी बेहतर दुनिया की आकांक्षा है. इसलिए मेरे सरोकार भी कमजोर तबके से जुड़े हैं, जिनमें दलित, वंचित वर्ग, शोषित, पीडि़त और स्त्रियां हैं. हां, युवा भी मेरी चिंता के केन्द्र में हमेशा रहा है, वह युवा स्त्री भी है और पुरुष भी. उसके पास मूल्य भी हैं, वह परेशान भी है और कई बार भ्रमित भी. मुझे लगता है कि आज वर्ग भेद की खाई पहले से कहीं गहरी और चौड़ी हुई है. वर्ग के भीतर भी कई वर्ग बने हैं. बड़े बाजार की भी बड़ी भूमिका देखी जा सकती है. शोषण, अपमान, अवमानना के तरीके भी पहले की अपेक्षा अधिक बारीक, अधिक चालाक और अधिक क्रूर और हिंसक हुए हैं. स्त्रियों ने जितना स्पेस लिया है उसी के मुकाबले उन्हें नियंत्रित करने की छटपटाहट भी बढ़ी है. उन पर हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं. कुछ सकारात्मक हुआ है- स्त्री शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ी है, नई तकनीक ने कुछ सुविधाएं भी बढ़ाई हैं, तो बहुत कुछ नकारात्मक भी हुआ है. पिछले दस-पन्द्रह वर्षों में बहुत बदलाव आए हैं.

पुस्तकः अन्हियारे तलछट में चमका लेेखिका : अल्पना मिश्र मूल्यः 200 रुपये  प्रकाशन: आधार प्रकाशन, पंचकूला
पुस्तकः अन्हियारे तलछट में चमका
लेेखिका : अल्पना मिश्र
मूल्य: 200 रुपये
प्रकाशन: आधार प्रकाशन, पंचकूला

आप पिछले कुछ समय के दौरान स्त्री लेखन में आ रही तेजी को कैसे देखती हैं?
मैं इसे बेहद सकारात्मक रूप में देखती हूं. बड़ी संख्या में स्त्रियां लिख रही हैं. वे देह विमर्श वाले भटकाव से निकल गई हैं. वे अपने निज के सरोकारों और मानवीय चिंताओं के साथ लिख रही हैं.

महिला लेखन फिक्शन तक सीमित क्यों है? आलोचना, चिंतन तथा अन्य अध्ययनपरक विधाओं में महिलाएं उस तरह से नहीं लिख रही हैं जैसे कविता या कहानी?
महिलाएं फिक्शन ज्यादा लिख रही हैं, यह सही है. गद्य से पहले उन्होंने कविताएं और गीत लिखे. शिक्षा मिलने के साथ गद्य के क्षेत्र में उनका आना हुआ. गद्य चिंतन और विचार का क्षेत्र माना गया है. यह अधिक चुनौतीपूर्ण है. धीरे-धीरे स्त्रियां विचार के इस क्षेत्र में भी अधिक स्पेस लेंगी. अभी उन्हें शिक्षा मिले बहुत लंबा अरसा नहीं हुआ है, जबकि हमारी सभ्यता के पास ज्ञान की हजारों वर्ष की परम्परा है. जितना ज्यादा शिक्षा का प्रसार होगा, साथ ही जितना चेतना का विकास होगा, उतना ही विचार के क्षेत्र में हस्तक्षेप बढ़ेगा. मैं भी गद्य में कई अलग तरह के काम कर रही हूं. बहुत दिनों से मीरा पर काम कर रही थी, उनके पदों का एक नया पाठ तैयार करने की योजना है, इस वर्ष यह काम पूरा करने की कोशिश है. एक दूसरे उपन्यास पर भी काम जारी है. इसी के साथ कुछ ऐसी कहानियों को, जो फार्मूले से अलग स्त्री के समाजीकरण की प्रक्रिया को दिखाती हैं, उन्हें विमर्श की सैद्धांतिकी के साथ समझाने की कोशिश भी है.

आपकी कहानियों की स्त्रियां हमारे आसपास की स्त्रियां हैं. आपके पास तो फौज के भी गहन अनुभव हैं. क्या उनमें से कुछ खास अनुभव साझा करना चाहेंगी?
मेरी कहानियों की स्त्रियां हमारे समाज की संघर्षरत स्त्रियां हैं. इसीलिए ये पाठक को जानी-पहचानी लगती हैं. पाठक का ऐसी कहानियों के साथ एक पाठकीय रिश्ता बनता है. लेखक के लिए यह एक बड़ी पूंजी है कि पाठक उसकी कहानियों को अपना मानें. फौजी जीवन के अनुभवों का खजाना मेरे पास है. पर अभी मैं इस पर बहुत नहीं लिख पाई हूं. केवल एक कहानी ‘छावनी में बेघर’ में ही कुछ बातें कह पाई थी. इस कहानी में मैंने सैनिकों के मनुष्य जीवन की बात उठाई थी, उनकी हीरोइक छवि से अलग उनके मानवीय सुख, दुख, जिम्मेदारियां, चिंताएं और मुसीबत के वक्त फौजी परिवारों की आपसी सांझेदारियां, सहयोग… कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि इस कहानी में है. फौजियों का जीवन बहुत कठिन है. इसे आम आदमी समझता भी है पर भैतिकवादी दृष्टिकोण और बाजार ने आज धन को सर्वोच्च बना दिया है और त्याग, बलिदान जैसे मूल्यों को पीछे ढकेल दिया है. सैनिक चाहे अफसर हो या सिपाही, मेरे मन में उनके लिए बहुत सम्मान है.

क्या आपको लगता है कि फेसबुक जैसे सोशल मीडिया माध्यमों ने साहित्य को लोकतांत्रिक बनाया है. तमाम नए लोग इनके जरिये सामने आए हैं, आपको इसकी क्या कमियां या खूबियां नजर आती हैं?
सोशल मीडिया ने एक नया जनतांत्रिक स्पेस निर्मित किया है. यहां कोई भी अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र है. कई बार यहां बड़ी अच्छी बहसें उठ खड़ी होती हैं. बहस करते-करते कोई बीच से गायब भी हो सकता है, इसकी भी छूट है. कई बार ऐसे बेतुके झगड़े भी देखने को मिल जाते हैं, जिनसे जीवन की एक और समझ खुलती है. मनुष्य ऐसा ही है- तमाम अंतर्द्वद्वों से घिरा हुआ. इसकी खूबी यह भी है कि विवेक की परीक्षा यहां होती रहती है. और तमाम तरह के विचारों, सूचनाओं का पिटारा भी आपको यहां मिल जाता है. तमाम प्रतिभाएं ऐसी भी दिख जाती हैं, जिन्हें यदि जरा-सा मांज दिया जाए तो अद्भुत हो उठेंगी. व्यस्त जीवन में लोगों को कनेक्ट करने का एक बड़ा माध्यम तो यह है ही. मैं खुद भी इसके साथ जुड़ी हुई हूं. जल्दी ही एक ब्लॉग शुरू करने वाली हूं.

आपका पहला उपन्यास  ‘अन्हियारे तलछट में चमका’  अपने अनूठे कथ्य और शिल्प की वजह से चर्चा में रहा. उसे प्रेमचंद सम्मान से भी सम्मानित किया गया. एक कथा लेखक को उपन्यास लिखते समय किन चुनौतियों से जूझना पड़ता है.
यह कहा जाता है कि उपन्यास अधिक समय और उर्जा लेने वाली श्रमसाध्य विधा है, यह ठीक है, लेकिन श्रम तो कोई भी कर सकता है. असल बात है औपन्यासिक विजन, जिसके बिना उपन्यास नहीं सध सकता. जीवन को आप कितना समझते हैं? आपके अनुभव का दायरा कितना बड़ा है? विचार के स्तर पर क्या बन सका है, इतिहास बोध है भी या नहीं, पिछली और समसामयिक समस्याओं को किस तरह चिन्हित कर पाये हैं? इस तरह की बातों का उपन्यास के लिए बड़ा महत्व है. जीवन की गहरी समझ और विराट विजन मुझे उपन्यास के लिए जरूरी लगता है.

जहां तक ‘अन्हियारे तलछट में चमका’ की बात है तो यही कहूंगी कि बस, मेरी कोशिश इतनी थी कि जो बात कहना चाहती हूं, उसे खूब अच्छी तरह से कह पाऊं. समय बहुत लगा. केवल फाइनल ड्राफ्ट बनाने में लगभग एक वर्ष का समय लग गया. तकनीक नई थी तो शायद इसी से शिल्प भी बदलता चला गया. कहानी कहने के लिए आत्मकथा की तकनीक को भी इसमें मिला दिया. तमाम प्रविधियां घुलमिल कर एक नई प्रविधि की तरफ लेती गईं. यह भी अनायास ही हुआ. बस, कहने के तरीके की खोज में यह तरीका बनता गया. व्यापक पाठकीय प्रतिक्रियाओं ने मेरा हौसला बढ़ाया है. युवा वर्ग इसे अपने से कनेक्ट कर के देख रहा है, मुझे इसका भी सुकून मिल रहा है. दूर-दराज से पत्र, फोन और एसएमएस आ रहे हैं. एक महिला गाजियाबाद से मुझे ढूंढ़ते हुए आई, उन्होंने अखबार में उपन्यास के बारे में पढ़कर उपन्यास मंगवाया था. एक युवक ने उपन्यास के पहले चैप्टर की कुछ पंक्तियां एक सांस में सुना दीं और कहा कि वह भी ऐसा ही सोचता था. मुझे तसल्ली है कि इस उपन्यास के पात्र पाठकों को परिचित लग रहे हैं. बल्कि कई जगह पाठकों ने यह भी पूछा है कि ‘क्या ये पात्र जीवित हैं?’ इस पर मैं कहूंगी कि इस उपन्यास के पात्रों का जीवित या मृत व्यक्तियों से कोई संबंध नहीं है, पर दरअसल ये सब जीवित हैं, हमारे आस-पास हैं.