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‘लालू ऊपरी वार करते हैं, जबकि नीतीश…’

फोटोः प्रशांत रवि
फोटोः प्रशांत रवि

अच्छी खासी राजनीति कर रहे थे आप, फिर अचानक से संन्यास क्यों ले लिया?
संन्यास जैसा कुछ नहीं कह सकते इसको. मैंने कहा कि चुनाव नहीं लड़ूंगा अब. राजनीति तो रग-रग में है, वह तो करता ही रहूंगा. मैं इधर-उधर आदर्श की बातें नहीं करूंगा. साफ-साफ बताता हूं. अभी लोकसभा चुनाव तो होगा नहीं. मेरी उम्र 72 की हो चुकी है. इस साल विधानसभा चुनाव होनेवाला है बिहार में और मेरी इच्छा कहीं से नहीं कि मैं अब एसेंबली का चुनाव लड़ूं. पांच साल बाद जब लोकसभा चुनाव होगा, तब तक मेरी उम्र 77 की हो जाएगी. उस उम्र में किससे टिकट मांगूंगा मैं. पिछले साल लोकसभा चुनाव में जरूर इच्छा थी कि लड़ूं. हार या जीत तो अपनी जगह. जब नीतीश कुमार की पार्टी से दरकिनार किया गया तो लालू प्रसाद से इच्छा जाहिर की कि बक्सर या बेतिया से लड़ना चाहता हूं. लालू प्रसाद टिकट बांट चुके थे. उन्होंने बेतिया में रघुनाथ झा को टिकट दे दिया था. बाद में लालू प्रसाद ने कहा कि बाबा आइए और पार्टी की कमान थामिए, तो मैं क्यों उनकी पार्टी की कमान थामने जाता.

लोकसभा नहीं लड़े. राज्यसभा के लिए तो संभावनाएं बची हुई थीं. लोग कब्र में पांव लटकने तक संन्यास नहीं लेते.
नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी में सभी को दो-दो बार मौका दिया. राज्य के विधानपरिषद के सदस्यों को भी देख लीजिए, लेकिन इस बार उन्होंने ठान लिया था कि मुझे दोबारा नहीं भेजना है. इस फेर में उन्होंने मेरे साथ एनके सिंह और साबिर अली को भी नहीं भेजा. जब तक राज्यसभा में था, जितना अनुभव और क्षमता थी, उसके आधार पर मैंने जदयू का पक्ष रखा, समाजवादी राजनीति और लोहिया-जेपी की धारा को आगे बढ़ाया. यहां तक कि शरद और नीतीश के टकराव में नीतीश का पक्ष लिया. संसद में महिला आरक्षण बिल पर दोनों के बीच मतभेद हुआ, नीतीश महिला आरक्षण के समर्थक थे, जबकि शरद आरक्षण में भी आरक्षण के. ऐसे में मैंने पार्टी की ओर से राज्यसभा में नीतीश की बातों को मजबूती से रखा. नीतीश उस दिन मीडियावालों से मुस्कुराते हुए कह रहे थे कि शिवानंद भाई ने जो आज कहा है, वही हमारी पार्टी की लाइन है. दो दिनों बाद पटना में एक बड़ा आयोजन हुआ. वहां भी नीतीश कुमार मुक्तकंठ से मेरी प्रशंसा करते रहे, लेकिन तब शायद वे शरद यादव के परास्त होने से खुश थे, क्योंकि राजगीर सम्मेलन के बाद वही शिवानंद तिवारी उनके लिए सबसे बड़ा कांटा हो गए.

मैंने राजगीर सम्मेलन में कोई गलत बात नहीं कही थी. पार्टी के सम्मेलन में वास्तविक स्थिति सबके सामने रखी थी कि नरेंद्र मोदी को हल्के में न लें. सामाजिक आंदोलन के नाम पर सिर्फ पिछड़ा-पिछड़ा कहकर उन्हें नहीं घेरा जा सकता, क्योंकि मोदी भी पिछड़ा ही हैं. आज खुद नीतीश हर जगह उसी बात को मानते हैं. मैंने लोकसभा चुनाव के पहले हर विधानसभा में कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग की थी, उसके आधार पर कहा था कि संगठन की हालत खस्ता है. कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा हुआ है, वे बिखरे हुए हैं. सच कह दिया, तो उसकी सजा मिल गई.

तो सिर्फ राजगीर सम्मेलन में दिए गए बयान की वजह से आपके साथ ऐसा व्यवहार हुआ?
दूसरी कोई वजह ही नहीं. सबसे ज्यादा बात यह चुभी कि मैंने कार्यकर्ताओं वाली बात उठाई. कहा कि सरकार के जो भी महादलित विकास से लेकर दूसरे लोकप्रिय कार्यक्रम चल रहे हैं, वह सीधे-सीधे प्रशासनिक तंत्रों के सहारे चल रहे हैं, यह ठीक नहीं है. प्रशासन के लोग यथास्थितिवाद के पोषक होते हैं. वे साथ नहीं देंगे. अंत में जरूरत कार्यकर्ताओं से ही पड़ेगी. कार्यकर्ता क्या करेंगे. अधिकारियों को सीधे-सीधे कह दिया गया है कि वे कार्यकर्ताओं का किसी तरह का हस्तक्षेप बर्दाश्त न करें. जनता सीधे कार्यकर्ता के पास अपनी समस्या लेकर जाती है और कार्यकर्ताओं की इतनी हैसियत नहीं रह गई है कि वे छोटी-मोटी पैरवी तक कर सकें. जिन्होंने पैरवी करने की कोशिश की, उन पर रंगदारी मांगने से लेकर न जाने कितने तरीके के मुकदमे कर दिए गए. जिन कार्यकर्ताओं ने 15-20 साल में अपनी पहचान जनता के बीच बनाई, जो घरों से निकालकर मतदाताओं को बूथ तक लाते रहे, उनकी औकात को कम कर देना तो सीधे-सीधे उनकी पहचान को खत्म करनेवाली बात है. यह एक किस्म का राजनीतिक अपराध है. यही सब तो कहा था जिसकी मुझे सजा मिली.

शरद यादव किसी तरह से लोकसभा या राज्यसभा में बने रहना चाहते हैं. वही उनका इकलौता मकसद है. बाकी उन्हें पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है

यानी नीतीश कुमार सार्वजनिक सवालों को भी व्यक्तिगत सवाल बनाकर राजनीति करते हैं?
मैं यह नहीं कह रहा कि व्यक्ति का या व्यक्तिवाद का महत्व नहीं है. एक नेता तो होना ही चाहिए, जिसके नाम पर टीम काम करे, लेकिन उस व्यक्ति को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके बनने या बने रहने में टीम की भी भूमिका है.

यह भी कहा जाता है कि नीतीश कुमार लोगों को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं.
टॉलरेंस लेवल है ही नहीं. नीतीश कुमार से मेरा कोई आज का संबंध नहीं है. इनको राजनीति में स्थापित करने में मैंने कोई कम भूमिका नहीं निभाई. मैं 60 के दशक में ही जेल जा चुका था. जब ये राजनीति में आए, तब तक मैं बिहार में युवा नेता के रूप में स्थापित हो चुका था. इतने वर्षों तक साथ दिया, लेकिन एक बार सार्वजनिक रूप से पार्टी के बारे में बात कह दी, तो उन्होंने ठेलकर वहां पहुंचा दिया, जहां से सिर्फ भाजपा में जाने का रास्ता ही बचा था मेरे पास. जब जदयू से मेरी दूरी बढ़ी, तो भाजपा से प्रस्ताव आया और मुझसे पूछा गया कि क्या आप चुनाव लड़ना चाहते हैं? तो मैंने सीधे कह दिया कि यह अपराध होगा मेरे लिए. मैं जानता था कि भाजपा से चुनाव लड़कर जीत भी जाऊंगा. शुरुआत से समाजवादी राजनीति के साथ रहा था, इसलिए अब भाजपा से चुनाव नहीं लड़ सकता था. लेकिन नीतीश ने वहां तक तो पहुंचा ही दिया था.

आप अपने मामले को छोड़ दें तो और कब लगा कि नीतीश कुमार लोगों को टॉलरेट नहीं कर पाते?
तमाम उदाहरण हैं. अब पिछले लोकसभा चुनाव में ही देखिए. जदयू के इकलौते मुस्लिम सांसद मोनाजिर हसन थे बेगुसराय से. नीतीश ने किसी वजह से मोनाजिर को नापसंद किया होगा, तो भाजपा से अलगाव के बाद नीतीश पर प्रगतिशील बनने का इतना भूत सवार हुआ कि इकलौते मुस्लिम सांसद की सीटिंग सीट भी सीपीआई को दे दी. सीटिंग सीट पर इकलौते मुस्लिम सांसद का टिकट काटकर गंगा स्नान करने लगे. वह सीट तो नीतीश हार ही गए, मोनाजिर भी भाजपा में चले गए.

आपके बारे में भी कहा जाता है कि आप पेंडुलम की तरह कभी लालू, तो कभी नीतीश के पाले में आते-जाते रहे. इस तरह पाला बदलने की क्या मजबूरी थी?
लालू और नीतीश के साथ ही जाते रहे. और तो कहीं नहीं गए न! दोनों एक ही जमीन की उपज हैं. दोनों के हित टकराए थे, तो ये अलग हो गए थे. दोनों लोहिया-जेपी का ही नाम लेते रहे हैं, कभी हेडगेवार या सावरकर का नाम तो इन्होंने नहीं लिया. दोनों सामाजिक न्याय की राजनीति करते रहे और मैं उसका पक्षधर हूं, तो दोनों के साथ रहा. मुझ पर तो यही एक आरोप है. लेकिन कभी उन दोनों नेताओं से भी पूछा जाना चाहिए कि मेरे जैसे आदमी को, जिसने अपना सब कुछ उन्हें दिया, वे क्यों एकोमोडेट नहीं कर पाते थे.

खैर! आप तो दोनों के साथ पिछले तीन दशक से हैं. दोनों की राजनीति में क्या बेसिक फर्क देखते हैं?
मैंने नीतीश की तुलना में लालू के लिए ज्यादा किया और लालू से ही ज्यादा जुड़ाव भी रहा. कोई आज का या सिर्फ राजनीतिक संबंध नहीं है लालू से. लालू जब स्कूल में पढ़ते थे, तब से उनसे संबंध है और निहायत ही व्यक्तिगत रिश्ता भी है उनसे. लालू की खासियत है कि चाहे जितना भी मनमुटाव हो जाए, अलगाव हो जाए, वे संवाद बंद नहीं करते. वे जब चोट करते हैं तो ऊपरी घाव लगता है, लेकिन नीतीश सिर्फ संवाद ही बंद नहीं करते, बल्कि वे जब चोट देते हैं तो अंदर तक बेधनेवाली पीड़ा देते हैं. यदि किसी ने नीतीश के मन की बात नहीं की, तो वे उसी दिन से उसकी राजनीतिक हत्या करने के लिए पूरी उर्जा लगा देते हैं. लालू ऐसे नहीं हैं.

अब तो वर्षों बाद दोनों मिल रहे हैं. क्या फर्क पड़ेगा बिहार की राजनीति पर दोनों के मिलने से?
हमें तो बहुत उम्मीद नहीं दिख रही, क्योंकि दोनों कोई नई बात कह नहीं पा रहे. पिछले दस साल से जो कह रहे हैं, उसी को दोहरा रहे हैं, जबकि स्थितियां बदल गई हैं. 65 फीसदी आबादी अब उन लोगों की हो गई है, जिनकी उम्र 35 साल से कम है, उनके लिए क्या है इनके पास. उन युवाओं के अपने सपने हैं, उनकी अपनी आकांक्षा है और मोदी उन सपनों पर बात कर रहे हैं. उन्हें लग रहा है कि उनकी आकांक्षा पूरी होगी. ऐसा होगा या नहीं, यह नहीं कह सकता. मोदी ने सपनों का उभार शुरू किया है. इन लोगों के पास तो रोडमैप भी नहीं है.

बात तो पूरे देश के समाजवादियों के मिलन की हो रही है. क्या जनता परिवार जैसा कुछ बनेगा?
कौन समाजवादी भाई? कैसा समाजवादी? चौटाला कैसे समाजवादी हैं, जो जेल के अंदर हैं. उनका प्रभाव क्या है हरियाणा के बाहर? मुलायम यूपी के बाहर क्या कर लेंगे? लालू और नीतीश बिहार के बाहर क्या कर पाएंगे? देवगौड़ा कब से समाजवादी हो गए? लोग बेवकूफ हैं क्या, जो नहीं जान रहे कि इनका मिलन समाजवादी राजनीति को बढ़ाने के लिए नहीं हो रहा, बल्कि मोदी से घबराकर अपने वजूद को बचाने के लिए हो रहा है.

बिहार में तो यह देखा जा रहा है कि लालू प्रसाद मौन साधे हुए हैं, नीतीश ज्यादा बेचैन हैं.
बेचैनी दोनों में बराबर है.

समाजवादी सबसे ज्यादा बिखरे हैं और प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह अपनी पार्टियां चला रहे हैं. क्या समाजवादी राजनीति के बुनियादी प्रशिक्षण में ही कोई गड़बड़ी रही?
यह सिर्फ समाजवादियों की दिक्कत नहीं है. लोकतंत्र का जो पैटर्न अपने यहां है, उसी में गड़बड़ी है. एमएन रॉय जैसे चिंतक ने तभी कहा था कि यह समाज को खंड-खंड में बांट देगा. गांधी कहते थे कि यह बांझ है. लोकसभा और विधानसभा को छोड़ दीजिए तो भी आज कितने किस्म के चुनाव हो रहे हैं देश में. पंचायत के, मुखिया के, जिला परिषद के, शिक्षा समिति के. जाति के बीच जाति का बंटवारा हो गया है. गली-गली और टोले-टोले को बांट चुके हैं ये चुनाव. रही बात समाजवादियों की, तो यह तो शुरू से देखना होगा. इस लोकतांत्रिक प्रणाली में अपनी आलोचना सुनने की आदत तो विकसित हो ही नहीं पाई. कोई विरोध न करे, सिर्फ अपनी मर्जी चले, इसके लिए इतनी पार्टियां बनती गईं. यह सब कांग्रेस की देन है. जवाहरलाल के जमाने में पटेल के जाने के बाद कौन रहा, जो उनकी बातों को काट पाता या उचित को उचित और अनुचित को अनुचित कह पाता.

नीतीश जिनको चाहें, वही विधायक-सांसद बन जाएं और कभी-कभार शरद के भी एक-दो लोग खप जाएं, बस इसी तरह दुकान चलती है

राजगीर सम्मेलन के बाद शरद यादव मुझसे बोले कि आपने जो बोला, वह पार्टी लाइन नहीं है. मैंने कहा कि आप जो बोलते हैं, वह पार्टी लाइन कैसे हो जाता है या नीतीश जो बोलते हैं, वह पार्टी लाइन कैसे होता है. किस मीटिंग में यह तय होता है कि पार्टी लाइन क्या होगी? जदयू के संविधान में लिखा हुआ है कि एक संसदीय बोर्ड होगा, जो पार्टी के राजनीतिक फैसले लेगा, लेकिन जदयू में आज तक संसदीय बोर्ड का गठन ही नहीं हुआ. नीतीश जिनको चाहें, वही विधायक बन जाए, वही सांसद बन जाए और कभी-कभार शरद के भी एक दो लोग खप जाएं, उनके लोगों पर भी कृपा हो जाए, बस इसी तरह दुकान चलती है. अब जैसे केसी त्यागी सांसद बने. शरद यादव उनके लिए वर्षों से लगे हुए थे, अंत में नीतीश ने कृपा कर दी.

आपने कहा कि आपको भाजपा से ऑफर मिला, लेकिन अपराधबोध के कारण आप नहीं गए. जब जदयू का भाजपा से गठबंधन हो रहा था, तब आप भी उसके पक्षधर थे, जबकि गठबंधन बाबरी ध्वंस के बाद हो रहा था.
हां, मैं पक्षधर था. भाजपा उस समय आर्थिक नीतियों में स्वदेशी मॉडल की बात कर रही थी. ऐसा लग रहा था कि वह अगर सत्ता में आई, तो स्वदेशी मॉडल से देश चलेगा.

आपके मुताबिक लोकतंत्र में गड़बड़ी है. तो सही रास्ता क्या है? सभी पार्टियों को देखा-आजमाया जा चुका है. समाजवादी व्यक्तिवादी हो गए हैं, कांग्रेस ने इतने साल के शासन में जो दिया वह सबके सामने है और भाजपा सांप्रदायिक ही है.
मैंने लोकतंत्र को खारिज नहीं किया. उसकी अपनी खासियत है. उसी की देन है कि आज चाय बेचनेवाला देश का प्रधानमंत्री बन गया. ललुआ-ललुआ, जिसे लोग कहते थे, गाय चरानेवाले का बेटा बिहार का मुख्यमंत्री बन गया. अस्थायी ठेका मजदूर रघुवर दास मुख्यमंत्री बन गए. यह सब लोकतंत्र की वजह से ही तो हुआ. सबसे बड़ी बात है कि लोकतंत्र से पिछड़ों का, वंचितों का, दलितों का गहरा जुड़ाव है. वह है, तभी यह लोकतंत्र चल रहा है. वह समूह जानता है कि संभावनाएं इसी प्रणाली में बची हुई हैं. उसके लिए स्पेस इसी प्रणाली में है, वरना जो अभिजात्य वर्ग है, वह तो कब का इस लोकतंत्र से चिढ़ चुका है. उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता कि कोई चाय बेचनेवाला पीएम बन जाए, मजदूर सीएम बन जाए, गाय चरानेवाला बड़ा नेता बन जाए.

जहां तक दूसरों को आजमाने की बात है, तो मुझे लगता है कि मोदी इस देश के आखिरी प्रधानमंत्री होंगे, जो इसी आर्थिक व्यवस्था को चलाना चाहेंगे या पुरजोर कोशिश करेंगे, लेकिन उनके बाद व्यवस्था बदलेगी. जब तक आर्थिक नीतियों में बदलाव नहीं होगा, किसी को आजमाते रहने से कुछ नहीं होगा. एक वैकल्पिक व्यवस्था उभरेगी.

आप तो जदयू में लंबे समय तक रहे हैं. शरद और नीतीश के स्टैंड में फर्क दिखता है. शरद यादव की भूमिका क्या है पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर?
शरद यादव की राजनीति का एजेंडा क्या है, यह पहले जानिए. वह किसी तरह लोकसभा या राज्यसभा में बने रहना चाहते हैं, वही उनका इकलौता मकसद है. बाकी उन्हें बहुत लेना-देना नहीं है पार्टी से. वे जबलपुर से सांसद हुए थे 1974 में. 1977 में जब जनता पार्टी की प्रचंड लहर थी, तो उनकी जीत का मार्जिन वहां से कम गया और 1980 में वहां से उनकी जमानत ही जब्त हो गई. तब मुलायम की शरण में गए और उसके बाद फिर बिहार आ गए. और तब से उनका बिहार से वास्ता बस किसी तरह सांसद बने रहकर सुविधाओं का इस्तेमाल करना है. वह एक बार मुझसे कहने लगे कि मैं 40 सालों से संसद में हूं. यही बात उन्होंने कई बार बोली, तो मुझे गुस्सा आ गया. मैंने कहा कि क्या 40 साल रट रहे हैं. 40 सालों में आपने कौन-सी क्रांति कर दी. दूसरे दलों के साथ मिलकर एकाध बार बंद करने के अलावा आपने और क्या किया 40 सालों के संसदीय जीवन में. रही बात राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर काम करने की, तो शरद तो हमेशा अपना दुखड़ा रोते रहे हैं. मुझसे भी दुखड़ा रोते रहे हैं कि उनकी चलती ही नहीं.

शरद की तो इच्छा नहीं थी कि बिहार में जदयू का भाजपा से अलगाव हो. क्या यह सही है?
हां, शरद नहीं चाहते थे. वह एनडीए में बने रहना चाहते थे. देखिए यह तो सच है न कि नीतीश ने बिहार को जिंदा किया. एक सकारात्मक माहौल दिया. जब नीतीश ने बिहार मंे काम शुरू किया, तो देशभर में चर्चा हुई. अमर्त्य सेन और रामचंद्र गुहा जैसे लोगों ने नीतीश में भावी पीएम की छवि देखनी शुरू कर दी. नीतीश को भी ऐसा लगने लगा. वह सोचने लगे कि देश का जो उदारवादी वर्ग है, वह तब तक उनके साथ नहीं आएगा, जब तक वह भाजपा का साथ छोड़ नहीं देते. नीतीश कुमार खुद को प्रधानमंत्री के रूप में देखने लगे और उसके लिए भाजपा का साथ छोड़ना उन्हें जरूरी लगा. यह काम नरेंद्र मोदी के नाम पर हुआ. लेकिन मुझे लगता है कि नीतीश ने वक्त को नहीं समझा. सही समय का चयन नहीं किया. 2010 के चुनाव के पहले ही अगर वह भाजपा का साथ छोड़ देते और अकेले चुनाव लड़ते, तो भाजपा इतनी बड़ी पार्टी नहीं बन पाती और आज इस तरह चुनौती नहीं बनती बिहार में. मैंने उसी समय नीतीश को कहा भी कि अब क्या बचा है, अलग रास्ता अपनाओ, लेकिन नीतीश दुविधा में रहे.

तो दुविधा और जिद की वजह से ऐसा हुआ.
भ्रम के साथ-साथ अहंकार की वजह से. नीतीश को लगता है कि वह जो सोचते हैं, वही सही है और सबसे बड़ी दिक्कत यही है. वह सिर्फ अपना आभामंडल चमकाना चाहते हैं. मैंने भी राजगीर सम्मेलन में नीतीश के सामने कहा था कि आप पार्टी के बड़े नेता हैं. इतनी तंगदिली ठीक नहीं है. नीतीश की दिक्कत है कि उन्हें लगता है कि सबकी बात सुनेंगे तो वह छोटे नेता हो जाएंगे.

चुनावी राजनीति से संन्यास ले चुके तिवारी इन दिनों आत्मकथा लिख रहे हैं. फोटो: प्रशांत रवि
चुनावी राजनीति से संन्यास ले चुके तिवारी इन दिनों आत्मकथा लिख रहे हैं.फोटो: प्रशांत रवि

क्या नीतीश का शुरू से ही ऐसा स्वभाव रहा है?
शुरू से क्या रहेगा. 1994 में जब वह लालू प्रसाद से अलग हुए और समता पार्टी बनी, लोगों की भीड़ आनी शुरू हुई, तो नीतीश में अचानक बदलाव हुआ और उन्हें लगने लगा कि वह बड़े नेता हैं. वरना नीतीश तो बहुत दब्बू नेता थे. नीतीश के करियर में बिहार में हुई कुर्मी चेतना रैली अहम रही है. उसी से नीतीश कुमार की राजनीति बदली. उसमें वह जाना चाहते थे, लेकिन लालू यादव नहीं चाहते थे कि नीतीश जाएं. मैंने नीतीश पर लगातार दबाव बनाया और अपनी गाड़ी से लेकर गया. वह तो समता पार्टी बनी, तो नीतीश कुमार पहली सभा में आरा-बक्सर गए. कई सीनियर नेता भी साथ थे. अब्दुल गफूर साहब, सैयद शहाबुद्दीन साहब, हरिकिशोर सिंह वगैरह-वगैरह. अचानक भीड़ देख लेने के बाद नीतीश ने इनसे ठीक से बात करना भी छोड़ दिया, तो हमने भी डांटा कि क्या हो गया है आपको. ये सीनियर लोग हैं, इनकी तो इज्जत होनी चाहिए.

और लालू प्रसाद यादव. उनको भी तो आपने शुरू से देखा है?
यह तो लालू प्रसाद भी जानते हैं और बार-बार कहते भी रहे हैं कि उनके राजनीतिक जीवन में मोड़ पटना विश्वविद्यालय चुनाव से आया. 1970 में पटना विश्वविद्यालय में छात्र संघ के महासचिव के चुनाव में मैं साथ नहीं होता, तो लालू प्रसाद कहां होते पता भी नहीं चलता. हुआ यह था कि उस साल पटना विश्वविद्यालय में छात्र संघ का चुनाव सीधे-सीधे हो रहा था. सीधे मतदान से. वहां दबंगों का कब्जा था. मुझे कोई रुचि नहीं थी. मैं तो दूसरी राजनीति कर रहा था. विश्वविद्यालय में दबंगों का वह समूह मिल गया. मैंने कहा कि यार, पहली बार सीधे चुनाव हो रहा है, लड़ने दो बच्चों को. उन लोगों से बहस हो गई. मैंने पैनल बनाया कि अब तो इस चुनाव में सक्रिय भूमिका निभानी है. लालू प्रसाद महासचिव पद के प्रत्याशी थे. बिना लालू से मिले उनका प्रचार करने लगा. लालू बाद में एक दिन मिले, तो सहमे-सहमे उन्होंने कहा िक बाबा, मैं जहां जाता हूं, वहां लोग कहते हैं कि आपके लिए वोट मांगने बाबा आए थे. उसी समय शंकराचार्य पर केस करके मैं चर्चा में आ गया था. पुरी के शंकराचार्य ने पटना की एक सभा में कहा था कि दलित तो जन्म से ही अछूत होते हैं. इसी पर केस किया था. पटना का एक अखबार आर्यावर्त तब ब्राह्मणों का गढ़ था. वह शंकराचार्य का पक्ष ले रहा था. उसके विरोध में मैंने एक मार्च आयोजित किया. यह उसी समय की बात है, जब पटना विश्वविद्यालय का चुनाव हो रहा था. विरोध जुलूस में मैंने लालू को बुलाया कि आओ और सड़क पर उतरकर जिंदाबाद-मुर्दाबाद करो. लालू पहली बार किसी सभा में शामिल हुए थे तब. रामविलास पासवान उस केस में हमारी ओर से गवाह बने थे. लालू 70 में महासचिव बने, 74 में विश्वविद्यालय के अध्यक्ष, 77 में एमपी और बाद में बिहार के मुख्यमंत्री. 70 में वह हार गए होते, तो कहा नहीं जा सकता कि आज कहां होते. लेकिन फर्क यह है कि लालू आज भी इस बात को मानते हैं और मान देते हैं.

नीतीश ने सही समय का चयन नहीं किया. 2010 के चुनाव के पहले ही अगर वह भाजपा का साथ छोड़ देते, तो वह बिहार में इतनी बड़ी पार्टी नहीं बन पाती

जब लालू से इतना गहरा रिश्ता था, तो छोड़ते क्यों रहे बीच-बीच में उनको? आपने उनके विरोध में समता पार्टी के निर्माण में भी योगदान दिया.
हमने छोड़ा कि लालू ने छोड़ा हमको? यह तो उनसे भी पूछा जाना चाहिए. वैसे समता पार्टी के बनने की कहानी अलग है. लालू और नीतीश दोनों सामाजिक न्याय और आंदोलन को उभारनेवाले नेता थे. 1990 में सत्ता संभालने के कुछ सालों बाद ही लगने लगा था कि लालू प्रसाद से ज्यादा योग्य नीतीश कुमार हैं. नीतीश को कहा जाने लगा कि अलग राह अपना लो, लेकिन नीतीश यहां भी साहस नहीं दिखा रहे थे.

लेकिन नीतीश को आगे बढ़ाने में, समता के गठन में जॉर्ज फर्नांडिस की भी भूमिका रही थी और नीतीश ने उनको भी दरकिनार कर दिया.
नीतीश को हर उस व्यक्ति से परेशानी है, जो बोलता हो. जॉर्ज भी बेचारे बिहार की राजनीति पर कम ही बोलते थे, लेकिन बाद में बोलने लगे, तो परेशानी होने लगी. दूसरी परेशानी यह हुई कि जॉर्ज पर स्व. दिग्विजय सिंह का प्रभाव ज्यादा था. नीतीश को लगता था कि जॉर्ज और दिग्विजय की ज्यादा बनती है और दिग्विजय काफी तेज तर्रार नेता थे, तो नीतीश ने दोनों का पत्ता काटा. दिग्विजय का पत्ता काटना तो सबको हैरत में डालनेवाला था. मैंने भी नीतीश से पूछा तो उन्होंने कहा कि हम नहीं जानते, शरद यादव जानते हैं. दरअसल जॉर्ज को किनारेकर उन्होंने शरद का नेतृत्व इसीलिए स्वीकार किया कि जब-जब मनमानी करनी होगी, शरद को सामने लाएंगे, क्योंकि शरद को साधना आसान था.

समता पार्टी ही क्यों, चारा घोटाले का केस करवाने में भी आप आगे रहे.
हां, वह तो अभी भी है. अभी भी लालू से ज्यादा सरोकारी संबंध है. कहा न कि लालू से राजनीतिक संबंध भर नहीं है. बैठकी वाला रिश्ता है. वह मेरे घर आते हैं, मैं उनके घर जाता हूं. रही बात चारा घोटाला केस की, तो उसकी अपनी कहानी है. जब चारा घोटाले का केस होना था, तो रविशंकर प्रसाद, सुशील मोदी, सरयू राय आदि सक्रिय थे. उस समय समता पार्टी और भाजपा में होड़ थी कि कौन इसका श्रेय ले, लेकिन नीतीश कुमार इस मामले में पड़ना ही नहीं चाहते थे. न जाने क्यों, वह वकालतनामे पर दस्तखत से भी इंकार कर गए. साहस ही नहीं जुटा पा रहे थे. ऐसे में जॉर्ज साहब ने मुझसे दिल्ली में कहा कि जहाज का टिकट कटवा रहे हैं, जाइए और साइन कीजिए और मैं भागा-भागा पटना पहुंचा था. नीतीश तो यही पूछते थे कि कागज-पत्तर है या सब हवा में है. बाद में जब चारा घोटाले का जिन्न बाहर निकला और बोलने की सहूलियत हो गई, तो नीतीश इसे अपना मसला बनाने लगे, वरना वह तो वकालतनामे पर साइन तक करने का साहस नहीं जुटा पाए थे.

आपको बैकरूम पॉलिटिशियन क्यों कहा जाता है?
कौन कहता है? इंटर पास करने के बाद रांची गए थे पढ़ने, तब से सड़कों पर ही राजनीति करते रहे. सीधे-सीधे चंद्रशेखर जी की चुनौती स्वीकार करके मैंने चुनाव लड़ा, हार गया. बिंदेश्वरी दुबे, जो बिहार के मुख्यमंत्री हुए, के खिलाफ मैंने चुनाव लड़ा था, हार गया था. हार-जीत अपनी जगह है. 56 साल की उम्र में पहली बार विधायक बना, लेकिन कभी सड़क नहीं छोड़ा. यह कहता कौन है, यह तो बताइए.

‘चारा घोटाले में नीतीश कुमार वकालतनामे पर दस्तखत से पीछे हट गए, तब जॉर्ज साहब ने मुझे दिल्ली से इस पर दस्तखत करने के लिए भेजा था’

दूसरी बात करते हैं. लालू-नीतीश का अब विलय हो रहा है तो आप किस तरह की मुश्किलें देखते हैं?
मुश्किलें तो होंगी, लेकिन दोनों मिलेंगे, क्योंकि दोनों की मजबूरी है और दोनों अपनी औकात देख चुके हैं. लालू प्रसाद मुस्लिम-यादव समीकरण को ही मूल आधार मान बैठे थे, वह टूट चुका है और नीतीश कुमार भी बैठकर विकास का प्रतिशत, अतिपिछड़ा का प्रतिशत, महादलित का और महिलाओं का प्रतिशत जोड़ते रह गए. लोकसभा चुनाव में दोनों देख चुके हैं कि घर में बैठकर जोड़ने से कुछ नहीं होगा. इसलिए दोनों की मजबूरी है कि अब मिलें. वे देख रहे हैं कि जातियों की राजनीति पर कब्जा करना होगा. धर्मनिरपेक्षता की बात करेंगे, लेकिन मेरा मानना है कि जो जातिनिरपेक्ष नहीं हो सकता, वह धर्मनिरपेक्ष तो कतई नहीं हो सकता.

और अब तो एक छोर जीतन राम मांझी भी हैं!
बेचारे नीतीश कुमार ने तो मांझीजी के इस रूप की कल्पना भी नहीं की होगी. उन्होंने सोचा होगा कि पहले वाले ही मांझी रहेंगे, जब चाहेंगे, जैसे चाहेंगे, इस्तेमाल करेंगे. लेकिन आज हकीकत यह है कि मांझी देशभर में चर्चित नेता हो चुके हैं और उन्होंने नीतीश-लालू से अलग अपना एक खास समूह तैयार किया है. आपने देखा होगा कि पिछले माह पटना के मिलर हाई स्कूल में महादलितों का एक सम्मेलन हुआ था. नीतीश भी थे और मांझी भी. नीतीश ने बोलना शुरू किया, तो महादलितों ने विरोध शुरू कर दिया. मांझी मुस्कुराते रहे. उन्होंने एक बार भी मना नहीं किया कि हल्ला क्यों कर रहे हो. दरअसल मांझी दिखाना चाहते थे नीतीश को कि भ्रम में मत रहिए. हमारा अपना आधार है, जिसमें अब आप स्वीकार्य नेता नहीं हैं. अब लालू मिलें या नीतीश मिलें, लेकिन बड़ा सवाल यह हो गया है कि क्या मांझी के बजाय किसी दूसरे के नेतृत्व में चुनाव होगा, तो मांझी के समर्थक उसे स्वीकार करेंगे? मुझे ऐसा नहीं लगता.

क्या ऐसा नहीं लगता कि मांझी के उभार से बिहार की राजनीति उत्तर प्रदेश की राह पर है, जहां पिछड़े और दलित की राजनीति दो ध्रुवों में बंटेगी? एक ओर नीतीश-लालू होंगे तो दूसरी ओर मांझी?
यह कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन एक बात साफ है कि नीतीश या लालू के नेतृत्व में चुनाव होगा, तो वे फिर हारेंगे और बुरी तरह से हारेंगे, क्योंकि वे पहले से ही परास्त सेनापति हैं. और यह कहीं से समझदारी नहीं होगी कि परास्त सेनापति को फिर से नेतृत्व देकर सैनिकों को लड़ाई लड़ने के लिए कहा जाए. बेहतर होगा कि मांझी ही नेतृत्व करें.

आखिरी सवाल. माना जा रहा है कि मांझी भाजपा के साथ भी जा सकते हैं.
यह नहीं कह सकता. लेकिन यह जो मिलन और विलय हो रहा है, उससे कुछ नहीं होगा. राजनीति मांझी के इर्द-गिर्द घूमेगी और वह एक अहम छोर बने रहेंगे. उन्हें कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता.

सेंसर बोर्ड अध्यक्षा का इस्तीफा, लगाया सरकारी हस्तक्षेप का आरोप

केंद्रीय सेंसर बोर्ड की अध्यक्षा लीला सैमसन
केंद्रीय सेंसर बोर्ड की अध्यक्षा लीला सैमसन

केंद्रीय सेंसर बोर्ड की अध्यक्षा लीला सैमसन ने बोर्ड के कामों में हस्तक्षेप, दबाव और भ्रष्टाचार जैसी वजहें बताते हुए इस्तीफा दे दिया है. उनका इस्तीफा डेरा सच्चा सौदा के विवादित गुरु गुरमीत राम रहीम की फिल्म ‘मैसेंजर ऑफ गॉड’ को फिल्म सर्टिफिकेशन एपिलेट ट्रिब्यूनल (एफसीएटी) की ओर से मंजूरी दिए जाने के ठीक बाद आया है. हालांकि दूसरी ओर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है.

उन्होंने कहा, ‘हमें लिखित में कुछ भी नहीं मिला. सेंसर बोर्ड का मजाक उड़ाया गया है. मेरे इस्तीफे का फैसला दृढ़ है.’ आम तौर पर फिल्मों के रिलीज की मंजूरी और उसकी सर्टिफिकेशन का काम केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) करती है. ‘मैसेंजर ऑफ़ गॉड’ का मामला सेंसर बोर्ड की सामान्य प्रक्रिया को किनारे करते हुए सर्वसम्मति से सीधे एफसीएटी के पास भेजा गया था, जिसे एफसीएटी ने लीला सैमसन की राय के बगैर ही मंजूरी दे दी.

गौरतलब है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय की ओर से फंड जारी ने होने की वजह से बीते नौ महीनों में सेंसर बोर्ड की एक भी बैठक नहीं हुई है. सैमसन के मुताबिक, ‘वर्तमान बोर्ड के सभी सदस्यों और अध्यक्ष का कार्यकाल कब का खत्म हो चुका है.’ खुद सैमसन का तीन साल का कार्यकाल अप्रैल 2014 में ही समाप्त हो चुका है. सरकार की ओर से नई बहालियों पर रोक के फैसले के कारण मंत्रालय अभी तक नए बोर्ड के बारे में अभी तक कोई फैसला नहीं कर पाया है.

सैमसन ने आरोप लगाया है कि ‘मंत्रालय अतिरिक्त प्रभार वाले सीईओ के सहारे महीनों से बोर्ड के कामकाज में हस्तक्षेप कर रहा था. साथ ही पैनल के भ्रष्ट सदस्यों और अधिकारियों की वजह से बोर्ड की गरिमा को ठेस पहुंच रही थी.”

राम रहीम की फिल्म 'मैसेंजर ऑफ गॉड'
राम रहीम की फिल्म ‘मैसेंजर ऑफ गॉड’

दूसरी ओर डेरा सच्चा सौदा के प्रवक्ता के अनुसार फिल्म पर रोक लगाने की कोई वजह नहीं है. फिल्म नशाखोरी के खिलाफ है. गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को राम रहीम के फिल्म को लेकर सचेत रहने का आदेश दिया है. डेरा अनुयायी और सिख समुदाय इस फिल्म को लेकर आमने-सामने हैं. मंत्रालय के निर्देश के मुताबिक सिख समुदाय के कुछ समूहों और अन्य लोगों के विरोध की वजह से सांप्रदायिक घटनाएं हो सकती हैं और कानून-व्यवस्था में बाधा की स्थिति पैदा हो सकती है.

पुराना है विवादों से बोर्ड का नाता

दरअसल यह पहला मौका नहीं है जब सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली विवादों के घेरे में आई है. इससे पहले अगस्त 2014 में सेंसर बोर्ड के सीईओ राकेश कुमार को सीबीआई ने घूस लेते हुए गिरफ्तार किया था. सीबीआई के अनुसार कुमार ने फिल्मों की रिलीज और विभिन्न सर्टिफिकेशन के लिए दरें तय कर दी थीं. कुमार ने फिल्म को तीन दिन में पास करने के लिए 1.5 लाख रुपये और छोटे बजट की फिल्मों व डॉक्युमेंट्री को पास करने के लिए 15,000 रुपये का रेट तय कर रखा था.

साल 2004 से मार्च 2011 तक बोर्ड के अध्यक्षा के पद पर रही शर्मिला टैगोर के दौर में भी पक्षपात व नियमों के उल्लंघन के आरोप कई बार सामने आए थे. अनुराग कश्यप ने अमिताभ बच्चन पर आरोप लगाए थे कि अपने बेटे की फिल्म ‘खेलेंगे हम जी जान से’ की राह आसान करने के लिए उन्होंने उसी विषय पर बनी फिल्म ‘चिटगांग’ की रिलीज टलवाने की कोशिश की थी. उनका कहना था कि बच्चन ने बोर्ड पर दबाव बनाकर उसकी रिलीज रुकवा दी थी.

इसके अलावा फिल्म ‘टर्निंग 30’ के प्रमाणन को लेकर भी टैगोर और इसके निर्माता प्रकाश झा के बीच विवाद हो गया था.

अपडेट

एक और सदस्य का इस्तीफा

सेंसर बोर्ड की एक और सदस्य इरा भास्कर ने अपना इस्तीफा दे दिया है. भास्कर ने कहा, ‘लीला को काम नहीं करने दिया जा रहा था. मेरे बाद और भी लोग इस्तीफा दे सकते हैं. हम लीला की वजह से बोर्ड में रुके हुए थे. अब जब अध्यक्षा ने ही पद छोड़ दिया है, तो बाकी बोर्ड सदस्यों के रहने का कोई मतलब नहीं है.’ उन्होंने लीला सैमसन के आरोप का साथ देते हुए कहा कि पिछले कुछ महीनों से बोर्ड के अंदर नकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे थे.

 

सरकार ने आरोपों को किया ख़ारिज

इस बीच सूचना और प्रसारण राज्यमंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने लीला सैमसन द्वारा लगाए सभी आरोपों को खारिज किया है. उल्टा उन्होंने सैमसन पर बोर्ड के दफ्तर में अनुपस्थित रहने की बात भी कही है. भ्रष्टाचार के आरोपों पर राठौर ने कहा, ‘कुछ महीने पहले सीबीआई ने जिस व्यक्ति को घूस मांगने के आरोप में गिरफ्तार किया था, उसके नाम की सिफारिश खुद लीला सैमसन ने की थी.’

एचएस ब्रह्मा होंगे नए चुनाव आयुक्त

चुनाव आयुक्त एचएस ब्रह्मा
चुनाव आयुक्त एचएस ब्रह्मा
चुनाव आयुक्त एचएस ब्रह्मा

चुनाव आयुक्त एचएस ब्रह्मा आज सेवानिवृत्त हो रहे वीएस संपत की जगह मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाल रहे हैं. हालांकि वह मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर महज तीन महीने काम कर पाएंगे. 19 अप्रैल को वह 65 साल के हो जाएंगे, जो इस पद के लिए यह अधिकतम आयु सीमा है.

वह अगस्त 2010 में चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए थे. इससे पहले वह ऊर्जा मंत्रालय में सचिव थे. ब्रह्मा भारत सरकार के कई मुख्य पदों पर रह चुके हैं जिनमें संयुक्त सचिव, बॉर्डर मैनेजमेंट, विशेष सचिव एनडीएमए आदि पद शामिल है.

असम में पैदा हुए ब्रह्मा जेएम लिंगदोह के बाद पूर्वोत्तर से दूसरे मुख्य चुनाव आयुक्त होंगे. 2012 असम दंगों के दौरान ब्रह्मा ने कहा था कि’गैर कानूनी इमीग्रेशन को रोकना जरूरी है. असम में 1.5 लाख नकली वोटर आईडी हैं, इन्हें बांग्लादेश वापस भेज देना चाहिए नहीं तो ऐसी समस्याएं दूसरे राज्यों में भी सामने आ सकती हैं.’

भारत के 19वें मुख्य चुनाव आयुक्त का पदभार संभालने वाले ब्रह्मा 1975 बैच के अरुणाचल प्रदेश कैडर के सेवानिवृत आईएएस हैं. उनकी पदोन्नति वरिष्ठता के आधार पर की गई है. शिलांग से एडमंड कॉलेज से स्नातक करने के बाद गुवाहाटी विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान की पढ़ाई पूरी की.

उन्नाव में घाट पर मिले सैकड़ों शव

unnav-2उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में एक बेहद विचलित कर देने वाला दृश्य सामने आया हैजिले के पेरियार घाट के पास 100 इंसानी शव मिलने से एकबारगी सनसनी फैल गई.सारे शव पेरियार के एक श्मशान घाट से हो कर गुजरने वाली गंगा नदी की एक उप धारा में मिले हैंघटना की गंभीरता को देखते हुए कानपुर और उन्नाव का जिला प्रशासन तत्काल हरकत में आ गया और उसने इस पूरे मामले की जांच के आदेश दिए हैंघटनास्थल पर मौजूद लोगों के मुताबिक शवों की हालत इतनी बुरी है कि उनकी शिनाख्त संभाव नहीं है.

इस मसले पर कल उत्तर प्रदेश के डीजीपी ने कानपुर और उन्नाव के आला अधिकारियों के साथ एक बैठक भी कीप्रदेश सरकार का दावा है की उपधारा में पानी कम होने के कारण लाशें सतह पर आ गई हैंसरकार का यह भी कहना की हिन्दू समाज में छोटे बच्चों और अविवाहित महिलाओं को दफनाने और गंगा में विसर्जित करने की प्रथा हैंसंभव है की ये लाशें उन्हीं लोगों की हों.

कल जिला प्रशासन ने शवों की अंतिम संस्कार की व्यवस्था तो की थी लेकिन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेई की आपत्ति के बाद इस पर पहल नहीं की जा सकीअभी तय होना बाकी है कि प्रशासन पोस्टमार्टम के जरिए इनकी शिनाख्त आदि की व्यवस्था करेगी या इनका सीधे अंतिम ससंस्कार करवाया जाएगा.

कल अचानक से लोगों का ध्यान तब इस ओर गया जब नदी में कुछ कुत्ते लाशों के इर्द गिर्द घूमते दिखेइस घटना से एक बार फिर गंगा में शवो को प्रवाहित करने की प्रथा पर रोक लगाने की मांग को बल मिला हैइससे नदी के प्रदूषण और महामारी फैलने की आशंका भी काफी बढ़ गई है.

दिल्ली दंगल का ऐलान

nirvachanशनिवार को दिल्ली में हुई नरेंद्र मोदी की रैली और केजरीवाल के पलटवार से मचे घमसान को चुनाव आयोग ने और भी रोमांचक कर दिया है. आयोग ने दिल्ली चुनाव पर बने सस्पेंस से पर्दा उठाते हुए सात फरवरी की तारीख मुकर्रर की है. चुनाव के नतीजे 10 फरवरी को घोषित हो जाएंगे. चुनाव तारीख की घोषणा के साथ ही राजधानी में आचार संहिता लागू हो गई है. मुख्य चुनाव आयुक्त वीएस संपत ने तारीखों की घोषणा की.

दिल्ली में करीबन 1.3 करोड़ मतदाता हैं जो 11,000 बूथों पर मताधिकार का प्रयोग करेंगे. पहली बार मताधिकार का का इस्तेमाल करने वाले वोटरों की संख्या 1,72,450 है. आयोग लोगों के घरों तक फोटो वोटर स्लिप भी पहुंचाएगी जिससे उन्हें वोट डालने में सुविधा हो.

राजनीतिक पार्टियां तैयार

दिल्ली विधानसभा अगर भाजपा के लिए नाक की लड़ाई है तो आप के लिए यह मूंछ बचाने की जद्दोजहद. थकी-थकी सी दिख रही दिल्ली कांग्रेस के लिए भी यह साख बचाने का मौका है. भाजपा और आप पार्टी ने एक दूसरे पर सीधा प्रहार कर के चुनावों को द्विपक्षीय बना दिया है.

आप पार्टी ‘दिल्ली डायलाग’ के चुनावों से काफी पहले से ही जनता के बीच अपना प्रचार-प्रसार कर रही है. इन सभाओं में केजरीवाल कुर्सी छोड़ने के लिए कई बार माफ़ी भी मान चुके हैं. अलग अलग मुद्दे पर डायलॉग कर ‘आप’ जनता में कम हुई साख को वापस पाने की कोशिश कर रही है. चुनावी तैयारी में एक कदम आगे रहने के लिए ‘आप’ ने पहले ही अपने सभी 70 उम्मीदवारों के नाम की घोषणा कर दी है.

भाजपा भी हरियाणा चुनाव के बाद से मंडल स्तर पर लोगों से जुड़ने की कवायद शुरू कर चुकी है. दिसंबर में सदस्यता अभियान के जरिए भाजपा ने अपना पूरा जोर लगा दिया है. हालांकि अब तक पार्टी द्वारा उम्मीदवारों की कोई घोषणा नहीं की गई है. अमित शाह ने पहले ही पार्टी के नेताओं को टिकट के लिए किसी भी तरह की गुटबाजी से दूर रहने की सलाह दे दी है. 10 जनवरी को प्रधानमंत्री मोदी की रैली के जरिए पार्टी ने अपने अभियान का औपचारिक ऐलान कर दिया है.

कांग्रेस की तरफ से अरविंदर सिंह लवली अकेले कमान संभाले हुए हैं. अब तक पार्टी 24 उम्मीदवारों का नाम जारी कर चुकी है. इनमें से 12 को पिछले चुनाव में भी टिकट मिले थे. अरविंदर सिंह लवली, हारून यूसुफ व ओखला के विधायक आसिफ मोहम्मद का नाम इस लिस्ट में शामिल है. मटियामहल से पांच बार विधायक रह चुके शोएब इक़बाल कांग्रेस में शामिल हुए थे पार्टी ने उन्हें भी टिकट दिया है.

पिछले विधान सभा चुनाव में भाजपा जादुई आंकडे से सिर्फ चार सीट दूर रह गई थी. दूसरी तरफ क्रांति की गोद से निकली केजरीवाल की ‘आप’ ने इतिहास रचते हुए 28 सीटों पर परचम लहराया था. कांग्रेस के समर्थन से 49 दिन तक सरकार चलाने के बाद केजरीवाल ने 14 फरवरी को इस्तीफा दे दिया था. उसके बाद 17 फरवरी से दिल्ली में राष्ट्रपति शासन चल रहा था.

उप चुनाव

देश में विभिन विधानसभा व लोकसभा सीटों पर 13 फरवरी को उपचुनाव भी करवाए जाएंगे. इसमें तमिलनाडु की पूर्व मुख्य मंत्री जयललिता की विधान सभा सीट भी शामिल है.

चुनाव की तारीख- सात फरवरी

परिणामों की घोषणा- 10 फरवरी

आचार संहिता – 12 जनवरी से लागू

नॉमिनेशन की आखिरी तारीख – 21 जनवरी

कुल वोटर – 1.3 करोड़

पहली बार का मतदाता – 1,72,450

श्रीलंका में सिरिसेना की सत्ता

sirisenaमैथ्रीपाला सिरिसेना ने श्रीलंका के सातवें राष्ट्रपति चुनाव को ऐतिहासिक बना दिया. आठ जनवरी को हुए चुनावों में वह सब कुछ हुआ जिसकी किसी ने आशा नहीं की थी. महिंदा राजपक्षे अपनी जीत को लेकर इतने आस्वस्त थे की उन्होंने समय से दो साल पहले ही चुनाव कराने का जुआ खेला था. अगर उनकी जीत होती तो राजपक्षे तीसरी बार कुर्सी पर काबिज़ होने वाले पहले श्रीलंकाई राष्ट्रपति बन जाते. चुनावी नतीजों के बाद राजपक्षे पद पर रहते हुए चुनाव हार वाले पहले श्रीलंकाई राष्ट्रपति बन गए हैं. मैथ्रीपाला सिरिसेना ने जबर्दस्त रणनीतिक चतुराई दिखाते हुए सभी विपक्षी दलों को एक पाले में खड़ा कर राजपक्षे की हार की पटकथा लिखी है. राजपक्षे और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की उम्मीदों के विपरीत सिरिसेना को 51.3 फीसदी वोट मिले. श्रीलंका के चुनाव आयोग के मुताबिक सिरिसेना ने लगभग 4.5 लाख वोटों के अंतर से जीत दर्ज की.

श्रीलंका के इन आम चुनावों की खास बात यह रही कि पहली बार यहां 70 फीसदी से ज्यादा लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया. सिरिसेना को उम्मीदों के उलट तमिल बाहुल उत्तरी व पूर्वी जिलों में भी बड़ी जीत हासिल हुई है. वही कोलोंबो व मध्य श्रीलंकाई जिलों में भी उनका प्रदर्शन बेहतर रहा.

कौन है मैथ्रीपाला सिरिसेना
तमा कयासों को दरकिनार कर सत्ता पर काबिज़ होने वाले सिरिसेना, राजपक्षे की पिछली सरकार में स्वास्थ्य मंत्री थे. वे सत्तारूढ़ श्रीलंका फ्रीडम पार्टी (एसएलएफपी) के जनरल सेक्रेटरी भी थे.जब अक्टूबर में राजपक्षे ने समय से पहले चुनाव करने की घोषणा की तो मैथ्रीपाला सिरिसेना विद्रोह का बिगुल बजाते हुए राष्ट्रपति पद के लिए अपनी दावेदारी पेश कर दी. सिरिसेना 1967 से ही राजनीति में सक्रिय हैं और उन्होंने ने अपनी राजनीतिक जिंदगी की शुरुआत एसएलएफपी के साथ मात्र 17 साल की उम्र में की थी. सिरिसेना 1994 के बाद से लगातार सरकार में रहते हुए मंत्रालयों की जिम्मेदारी का निर्वाह किया है. इसमें रक्षा जैसा अहम ओहदा भी शामिल है.

ग्रामीण इलाकों में सिरिसेना की लोकप्रियता व उसका समर्थन कर रही यूनाइटेड नेशनल पार्टी की शहरी इलाकों में पकड़ ने राजपक्षे के खिलाफ निर्णायक बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभाई. राजपक्षे के पिछले कार्यकाल में लगे भ्रष्टाचार के आरोप ने उनके खिलाफ माहौल बनाने का काम किया. राजपक्षे ने अधिकतम दो बार राष्ट्रपति बनने की सीमा को संवैधानिक संसोधन करके हटा दिया था. इससे भी राजनैतिक हलकों में नाराजगी थी. श्रीलंका में लंबे समय तक चले गृहयुद्ध के दौरान तमिल विद्रोहियों व अलगाववादियों के लिए सिरिसेना एक सॉफ्ट टारगेट माने जाते थे.

राजपक्षे का लोकप्रियता से हर तक का सफर
एंटी इंकम्बैंसी का खतरा मंडराने के बावजूद महिंद्रा राजपक्षे चुनाव के लिए आत्मविश्वास से भरे थे. एलटीटीई को कुचलने और 29 साल से चल रहे आतंरिक युद्ध पर अंकुश लगाने के बाद 2010 में भी महिंद्रा राजपक्षे ने निर्धारित समय से पहले चुनाव कराए थे. कमज़ोर विपक्ष और युद्ध के बाद बढ़ी राजपक्षे की लोकप्रियता तब ने उनके लिया जीत का रास्ता आसान कर दिया था.
2010 के बाद दूसरी पारी खेल रहे राजपक्षे पर मानवाधिकारों का हनन, तानाशाही तौर तरीके से सरकार चलने और परिवार व करीबियों को सत्ता में शामिल करने के आरोप थे. इससे उनकी लोकप्रियता गिर गई थी.
कई छोटी पार्टियों के समर्थन के साथ चुनाव में उतरे राजपक्षे ने अपने मैनिफेस्टो को ‘वर्ल्ड विनिंग पाथ’ नाम दिया था. इसमें साल भर के अंदर नए संविधान से लेकर आंतरिक युद्ध अपराधों की निष्पक्ष जांच जैसे मसले शामिल थे. इन सब के बावजूद महिंद्रा राजपक्षे तीसरी बार जनता का विश्वास जीतने में असफल रहे. ट्वीट के जरिये उन्होंने अपनी हार कबूलते हुए उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता हस्तांतरण का भरोसा भी दिया.

सिरिसेना की जीत और भारत
भारत के साथ संबंधों पर इस नतीजे के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं. राजपक्षे के कार्यकाल में चीन के साथ श्रीलंका की नजदीकियां बेहद बढ़ गई हैं. चीनी राष्ट्रपति ने सितम्बर 2014 के दौरे के दौरान श्रीलंका के साथ 24 समझौतों पर दस्तखत किए थे. इनमे इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में निवेश शामिल था. सिरिसेना ने इनमें से कुछ समझौतों पर सवाल भी उठाए थे.
आतंरिक युद्ध के दौरान श्रीलंकाई तमिलों के मानवाधिकार का हनन भारतीय तमिल राजनीति में महत्वपूर्ण मुद्दा है. इसकी वजह से भारत सरकार को कई बार फजीहत का सामना भी करना पड़ता है. इसका एक उदाहरण तो प्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह पर महिंद्रा राजपक्षे को आमंत्रित करने की खबरों के बाद ही देखने को मिल गया था. अब जब राजपक्षे की सत्ता से विदाई हो गई है तो यह मुद्दा भी रुकी हुई द्विपक्षीय बातचीत को दोबारा से शुरू करवा सकता है. चीन और राजपक्षे की बढ़ती करीबी भारत के हिंद महासागर में बड़ी चिंता थी जिसपर अब विराम लगने के असार हैं. श्रीलंका के नए राष्ट्रपति सिरिसेना चीन के बढ़ते प्रभाव और आधुनिक साम्राज्यवाद की और इशारा करते हुए उसे बेअसर करने की बात कर चुके हैं. भारत के मित्र माने जाने वाले कई लोग इस नई सरकार का हिस्सा हो सकते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फोन करके मैथ्रीपाला सिरिसेना को जीत की बधाई दी और शांति व प्रगति के लिए भारत के निरंतर सहयोग का भरोसा दिलाया है.

इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों, संस्थाओं और घटनाओं से बीते वर्ष के अनूठे रिश्ते को समर्पित अंक

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jawaharजवाहरलाल नेहरू: 125 सवालों के घेरे में

यह तथ्य सर्वविदित है कि वर्तमान में भारत का जो स्वरूप है उसकी प्रस्तावना जवाहरलाल नेहरू ने लिखी थी. आधुनिक, सभ्य, उदार और अपनी परंपराओं में गुंथा हुआ भारत, जो आधुनिक विश्व से तालमेल भी बिठा सकता है और गांधी के सपनों में भी विश्वास रखता है. इस महामना की 125वीं जयंती के बहाने उनका स्मरण

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चिर विद्रोही मुक्तिबोध किसी भी चीज से समझौता नहीं करते थे, अर्थशास्त्र के सिद्धांतों और स्वास्थ्य के नियमों से भी नहीं. वह संबंधों में लचीले थे, मगर विचारों में इस्पात की तरह. पैसे-पैसे के लिए तंग रहते थे, पर पैसे को लात भी मारते थे. एक संस्मरण

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पचास साल बाद जब हम सीपीआई (एम) का आकलन करने बैठते हैं, तो पाते है कि इसने कभी भी खुद को हिंदुस्तान की मौलिक सोच, जमीन, आदमी, जल, जंगल से जोड़ने का यत्न ही नहीं किया. आयातित सपनों को थोपने की जिद उसे ऊंचाई की बजाय हाशिए की तरफ ले आई है

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2014 पहले विश्वयुद्ध की सौवीं वर्षगांठ है. जब भारत अंग्रेजों से अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, तब भारत के सैनिक अंग्रेजों के लिए यह महासंग्राम लड़ रहे थे. इस युद्ध में अंग्रेजों को विजय तो मिली, लेकिन भारत और भारतीयों के लिहाज से इस विजय में कुछ भी सम्मानजनक नहीं था

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bhagalpur riotsभागलपुर दंगा : नृशंसता के छह माह

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यूं तो फिल्मकारों ने दोस्ती के रिश्ते पर एक से बढ़कर एक फिल्में बनाई हैं, लेकिन इस फिल्म में अंधे और अपाहिज दोस्तों की जो मर्मस्पर्शी कहानी दिखाई गई है, वह आज भी दोस्ती के फार्मूले पर बनी दूसरी फिल्मों पर भारी पड़ती है
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जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे...जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे…

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गरीबी, असमानता और भेदभाव जैसी तमाम स्थितियों के रहते हुए भी देश में वामपंथी राजनीति का दायरा सिकुड़ता क्यों जा रहा है?
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नई कविता के अग्रणी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध के निधन को आधी सदी हो रही है, इसी के साथ उनकी सर्वाधिक चर्चित और महत्वपूर्ण कविता ‘अंधेरे में’ भी अपनी रचना के 50 साल पूरे कर चुकी है. समय रहते अपना दाय न पा सके इस दिग्गज कवि को उसके निधन के बाद रचना संसार ने सर आंखों पर बिठाया
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मौत की बांहों में भोपाल

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यूनियन कार्बाइड का कारखाना भोपाल शहर के एक छोर पर राक्षस की तरह खड़ा दूर तक फैली बस्ती की ओर देख रहा है. रविवार की उस ठंडी रात कुछ कोहरा था. सरकारी लट्टुओं से जो आभा फैल रही थी, वह अंधेरे को दूर नहीं कर पा रही थी. लोग ठंड में दुबके सो रहे थे. कारखाने के ठीक सामने सड़क के उस पार कोई हजार गरीब परिवारों की बस्ती, जयप्रकाश नगर के लोग उस ठंड में कैसे सो पा रहे होंगे, समझना मुश्किल है. लकड़ी की कमजोर पटियों, जिन्हें भोपाल की बोली में ‘फर्रे’ कहा जाता है, से बने वे झोंपड़े. वहीं से एक रास्ता, जो बस स्टैंड हमीदिया रोड तक जाता है. रोड के एक छोर पर है रेलवे स्टेशन का इलाका और दूसरे पर ताजमहल कहलाने वाली इमारतें, ताजुल मसजिद और शाहजहांबाद. अगर उस रात कुछ हलचल होगी तो इस सड़क पर. रेलवे स्टेशन पर लखनऊ से आनेवाली किसी ट्रेन का इंतजार था. कुली यहां-वहां बिखरे बैठे थे. ऊंघते सुस्त यात्री. यहां-वहां आग ताप शरीर की कंपकंपी दूर करने का प्रयत्न करते समूह.
वह भोपाल के जीवन की सामान्य-सी रात थी. किसी को ख्याल नहीं था कि बहुत करीब बेरसिया रोड पर काली परेड के नाम से जाने जाते उस क्षेत्र पर बना कारखाना यूनियन कार्बाइड उनकी ओर राक्षसी आंखों से घूर रहा है और बड़ी जल्दी मौत अपनी काली परेड शहर में आरंभ कर देगी. वे नहीं जानते थे कि झीलों के इस शहर पर जहरीली गैस का एक झरना आज रात फूट पड़ने की तैयारी में है.

उस समय कारखाने के अन्दर क्या हो रहा था, ठीक से बयान नहीं किया जा सकता. भीषण नर-संहार के बाद से राक्षस ने अपने होंठ बंद कर लिये हैं. वह चुप है, कुछ नहीं बताता

उस समय कारखाने के अन्दर क्या हो रहा था, ठीक से बयान नहीं किया जा सकता. भीषण नर-संहार के बाद से राक्षस ने अपने होंठ बंद कर लिए हैं. वह चुप है, कुछ नहीं बताता. हम नहीं जानते, हत्यारा कब बोलेगा; और जब बोलेगा, क्या सच बोलेगा? स्थिति का वर्णन ‘बताया जाता है’, ‘कहा जाता है’, आदि वाक्यांशों के सहारे ही किया जा सकता है. चश्मदीद गवाह और गैस का विस्फोट रोकने की कोशिश में बड़ी हद तक हिस्सेदार, शकील अहमद कुरेशी कस्तूरबा अस्पताल के एक वार्ड में जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है. पुलिस उसे ऐसे घेरे है, जैसे वह कोई सतवन्त सिंह हो! उसका बयान लाखों डॉलर का है, वह बहुतों की छवि धूमिल कर सकता है; उसकी आवाज खरीदी और बेची जा सकती है. इसलिए उसे सुरक्षित और छुपाकर रखा जा सकता है.

अफसर रजाइयों में दुबके रहे
अतः बताया जाता है कि आधी रात को कारखाने के एक ऑपरेटर ने पहली बार यह महसूस किया कि गैस रिस रही है. सड़े बादाम की-सी गन्ध, जिसे ठीक से बयान नहीं किया जा सकता पर जिसे वे जानते हैं, वो वहां काम करते हैं. जो इस गुण में प्रशिक्षित हैं कि कैसे सायरन बजते ही हवा की उलटी दिशा में दौड़ना चाहिए. उनमें से एक प्लांट ऑपरेटर ने देखा कि रह-रहकर ‘मिक’ (मिथाइल आइसोसाइनेट) गैस- यदि वह गैस वही हो तो- पानी के साथ रिस रही है. शायद वहां ऐसा प्रायः होता हो! मिक या एम.आई.सी. गैस का यह रिसना तापमान बढ़ जाने से संभावित है और पानी की तेज धारा से उसका शमन किया जा सकता है. ऑपरेटर महोदय ने वही किया, पर टंकी का दबाव बतानेवाला पैमाना काम नहीं कर रहा था- इसलिए बात उनके वश की नहीं थी. उन्होंने शकील कुरेशी को बताया. शकील ने जाकर देखा कि गैस बड़ी तेजी से स्क्रबर से बाहर आ रही है- अर्थात वह हिस्सा, जहां अनुपयोगी गैस को कास्टिक सोडे के घोल से गुजारकर नाकाम किया जाता है. इसके बाद जो बच जाती है, उसे एक चिमनी से निकालकर जला दिया जाता है.

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कीड़ों के लिए सेविन नामक जहर बनानेवाले इस कारखाने में उत्पादन एक-डेढ़ माह से रुका पड़ा था, अतः कोई साठ टन गैस टंकी में जमा थी, स्क्रबर अनुपयोगी पड़ा था और खर्च बचाने के चक्कर में चिमनी से मुंह पर जो लौ जलती रहती थी, वह भी बुझा दी गई थी. शकील कुरेशी समझ नहीं पा रहा था कि क्या उपाय करे. तभी खटके के साथ सीमेंट का एक टुकड़ा गिरा और लगा कि टंकी फटेगी. उसने सुपरिंटेंडेंट को रपट की. सुपरिंटेंडेंट ने कहा, मैनेजर से बात करो. मैनेजर ने कहा, चिमनी के पास लौ जला दो ताकि अतिरिक्त निकल रही गैस जल जाए. शकील ने साहब की आज्ञा सुन ली. पर वह जानता था कि वातावरण में फैल रही तीव्र ज्वलनशील गैस को अब आग छुआने का अर्थ होगा- एक जोरदार धमाके के साथ भीषण अग्निकांड. आज्ञा की उपेक्षा कर बार-बार गैस मास्क लगा रिसती गैस के पास जा उसका प्रवाह रोकने की चेष्टा शकील तथा अन्य कर्मचारियों द्वारा की जाती रही, पर गैस के उस प्राणलेवा कुहासे में वे रिसना बन्द नहीं कर पा रहे थे. इसी कोशिश में शकील कुरेशी बेहोश हो नीचे गिर पड़ा. शेष जितने थे, उल्टे पांव हवा से उल्टी दिशा में भागने लगे. हजारों की जानें जाने वाली थीं, पर अपनी भी तो बचानी थी. बड़े अफसर और बड़े  इंजीनियर वगैरह घर पर सो रहे थे.
कारखाने में मौत की उस भोपाली रात क्या घट रहा था, कोई नहीं जानता. ऊपर की यह कहानी भी सरासर बनावटी और गढ़ी हुई हो सकती है. क्योंकि दूसरे दिन भोपाल में जो परस्पर कहा जा रहा था, वह दूसरा किस्सा है. उसके अनुसार गैस की रिसन के प्राथमिक लक्षण दिन में ग्यारह बजे के लगभग प्रकट होने लगे थे. शकील कुरेशी तथा अन्य कर्मचारी उसे बंद नहीं कर पा रहे थे. चार बजे के करीब वे लिखित में अपने अफसरों को आगाह कर चुके थे. पर पांच बजे बिना समस्या का निदान निकाले सब बड़े अधिकारी अपनी कारों और स्कूटरों से कारखाने से बाहर आ गए. किसी को न चिन्ता थी और न कल्पना कि यह रोजमर्रा की हल्की-फुल्की रिसन आज क्या रंग लाएगी. कहते हैं कि रात को फोन करके बुलाने पर भी बड़े इंजीनियर या मैनेजर कारखाने तशरीफ नहीं लाए. लापरवाही का नमूना पेश करते हुए वे अपनी रजाइयों में दुबके हुए थे.

गली-गली मंडराती गैस
सायरन बाद में बजा होगा, रिसन रोकने के जिम्मेदार पहले अहाते से बाहर हो गए और लगे दौड़ने बेरसिया रोड पर. और उस क्षण से वह जानलेवा गैस हवा के रुख के साथ भोपाल नगर की दिशा में बढ़ने लगी. मौत की लंबी जीभ ने सबसे पहले झोंपड़ियों में सोए लोगों के प्राण चाटने शुरू कर दिए. भोपाल मौत की बांहों में सिमटने लगा. गैस ऊपर आकाश में नहीं जा रही थी. वह दो मंजिला घरों तक की ऊंचाई वाले गुबार की तरह सड़क-सड़क, गली-गली चल रही थी, फैल रही थी. शुरू में बहुत तेज और बाद में धीमे-धीमे टहलती हुई, वह यहां-वहां से भोपाल को लील रही थी. सारा शहर धीरे-धीरे एक विराट गैस चैम्बर में बदल गया था. जयप्रकाश कॉलोनी, छोला, रेलवे कॉलोनी, टोला जमालपुर, काजी कैम्प, चांदवड़, विजयनगर, सिंधी कॉलोनी, कपड़ा मिल कॉलोनी पर गैस होश संभलने के पहले छा गई थी. दरवाजे-खिड़कियां बन्द करके सो रहे लोग नहीं जानते थे कि बाहर गली में मौत गैस बनकर मंडरा रही है, उनके उजालदानों और दरारों से गैस घर के अंदर पैठ रही है. वे समझ नहीं पाए कि यह जो सोते-सोते हल्की-सी घुटन और परेशानी वे महसूस कर रहे हैं, यह मृत्यु की पहली दस्तक है उनके शरीर के दरवाजे पर. आंखों में जलन-सी महसूस करनेवाले मां-बाप पहचान नहीं रहे थे कि मौत इस समय उनके आसपास लेटे बच्चों को थपथपी दे अंतिम नींद सुला रही है.

भागते, गिरते, मरते, अंधेरे में रास्ता पहचानते वे मृत्यु से जीवन की ओर दौड़ रहे थे. यह अंतिम प्रयत्न था, अंतिम दौड़ थी. जहरीली गैस के कारण फेफड़ों में दम नहीं रह गया था

फिर सबको अहसास होने लगा कि वे इस समय किसी भयावह स्थिति से गुजर रहे हैं. जब शुद्ध हवा का झोंका पाने के लिए उन्होंने दरवाजा खोला, तब गैस और अंदर धंसी. देखा कि सड़कों पर लोग अपने प्राण बचाने के लिए दौड़ रहे हैं. वे भी निकले और दौड़ने लगे. पर कइयों के लिए यह दौड़ लम्बी नहीं हो सकी. वे सांस लेने का प्रयत्न करते हुए यहां-वहां गिरने लगे. वे सब मृत्यु की लपेट में थे, दिशा अस्पष्ट थी, कोई अपना-पराया रह नहीं गया था. सब प्राण बचाने को भाग रहे थे. पुराने भोपाल से नए खुले भोपाल की तरफ, पुराने शहर से टी.टी. नगर की तरफ, घुटन से हवा की तरफ. भागते, लड़खड़ाते, गिरते, मरते, अंधेरे में रास्ता पहचानते वे मृत्यु से जीवन की ओर दौड़ रहे थे. यह अंतिम प्रयत्न था, अंतिम दौड़ थी. जहरीली गैस के कारण फेफड़ों में दम नहीं रह गया था. धीरे-धीरे, देखे-अनदेखे शहर लाशों और बेहोश पड़े लोगों से पटने लगा.
अब किसी से पूछो कि गैस की गन्ध कैसी होती है, तो वह अपने अनुभव को शब्द नहीं दे पाता. कहेगा- ऐसा लगता था कि जैसे गले में मिर्ची की धांस समा गई हो! (एम.आई.सी. से सिर भारी होता है, जबड़े कस जाते हैं. फॉसजीन से छाती में जलन हो, मृत्यु हो जाती है.) गला रुंध गया. कंठ में एक गोला-सा बनकर श्वास-प्रक्रिया को रुद्ध करने लगा. आंखों में जलन, आंसू, उल्टियां, मुंह में झाग. हर शख्स दमा के पुराने मरीज की तरह सांस लेता हुआ. पूरे शहर को ताजी हवा की तलाश थी! भोपाल में जिसकी कभी कमी नहीं रही, उसकी ऐसी कोताही कभी न हुई. पुराने भोपाल का हर घर मौत की काल-कोठरी बन गया था. गैस चैम्बर, आंखों से सूझता न था, सांस घुट रही थी, जान बाकी थी. पर आसपास पड़ी लाशें देख कर यह विश्वास टूट गया था कि हम जीवित रह पाएंगे. उस दिन शुद्ध हवा बैरन बन कहीं गायब थी. वायु मंडल में दबाव ऐसा था कि गैस को उड़ना नहीं था. वहीं रहकर सबके प्राण लेना था.
कीड़े मारने की दवाई में जो गैस उपयोग में आती थी, वह उन्हें कीड़ों की मौत मार रही थी. कुछ जो गहरी नींद सोए थे, इतनी गैस फेफड़ों में ले चुके थे कि वे सोते ही रहे. फिर नहीं उठे. पूरे परिवार मौत के मुंह में समा गए थे. लाशें बिछ रही थीं. उजाला फूटने तक सब उस हाहाकारी दृश्य से परिचित हो चुके थे. अवाक थे. किंकर्तव्यविमूढ़ थे. उन्होंने अपने जीवन में इतनी मौतें एक साथ नहीं देखी थीं. मृत्यु का साधारण-सा फार्मूला था कि जैसे ही गैस शरीर में जा शरीर के पानी के सम्पर्क में आती थी, एक दुष्ट रासायनिक प्रक्रिया इनका प्राणान्त कर देती थी. बस्तियां चसनाला हो रही थीं. प्रत्येक के मरने की कहानी शायद दूसरे से कुछ भिन्न है. कोई इसलिए मरा चूंकि उसने भागते हुए तेज श्वास-क्रिया द्वारा जहरीली गैस अधिक मात्रा में ले ली थी; और कोई इसलिए बचा क्योंकि वह भागा था. कुछ घर में मुंह ढककर सोने से बच गए थे और कुछ मुंह ढके सोए ही मर गए. मरनेवालों में बच्चों की गिनती सबसे ज्यादा थी. कहते हैं, गैस नसों में प्रवेश कर उन्हें फाड़ देती है. कारण जो भी हो, सुबह होते-होते भोपाल के पास अनगिनत लाशें थीं, आदमी, औरत, बच्चे, गाय, भैंसें, कुत्ते, बिल्ली.

जिससे जो बना, वह वही करने लगा. एकाएक भोपाल ने उस भारतीय आत्मा के दर्शन किए, जो गहराते संकट में आंसू पोंछकर चुनौती से जूझ जाना जानती है

देर रात स्टेशन पर सवारी का इंतजार करनेवाले तांगे का घोड़ा भी मरा और उस पर बैठा तांगाचालक भी. टिकट बाबू टिकट बेचते-बेचते चल बसा. देर रात जब रेल भोपाल आई, तब यात्रियों ने गैस को अनुभव किया और प्राण बचाने को आतुर भीड़ के संकट को समझा. सारा स्टेशन काल के गाल में था. आती हुई रेलों को भोपाल आने से रोकने की सूचना आसपास के स्टेशनों को देते हुए स्टेशन मास्टर हरीश धुर्वे चल बसे. सब कुछ बड़ी तेजी से एकाएक घटा. गैस का दायरा बढ़ रहा था. अब गैस पुराना भोपाल पार कर प्रोफेसर कॉलोनी से होती बाणगंगा क्षेत्र में उतर सरकारी कर्मचारियों की बस्ती तात्या टोपे नगर में प्रवेश कर रही थी. उसका कुछ प्रतिशत भोपाल के तालाबों में घुल रहा था. बाणगंगा की हवा में वह कुछ बिखरी, बंटी, कम हुई. उसका दूसरा रेला शायद एम.एल.ए. रेस्ट हाउस के पीछे से अरेरा कॉलोनी की तरफ बढ़ा. समूची त्रासदी में प्रकृति का इतना ही योग था कि हवा ने कारखाने से शहर की तरफ रुख लिया. इसके अतिरिक्त जो कुछ था, मनुष्य का किया-कराया था. हवा के रुख को बनाने में, हो सकता है, भोपाल की पहाड़ियों का हाथ रहा हो. मध्यप्रदेश सरकार और यूनियन कार्बाइड को दोषी न ठहराने में लगे व्यक्ति चाहें तो इस तथ्य पर जोर दे सकते हैं. वे मृतकों की नासमझी को तो दोषी ठहरा ही रहे हैं.

जनता का आत्मनिर्णय
सुबह. अस्पतालों के बाहर, अंदर, गलियारों, बरामदों, मैदान और सड़क पर बीमार और मृत पड़े थे. इतनी मृत्यु आंसुओं को सुखा देती है. चारों ओर एक भौंचक खामोशी नजर आ रही थी. किसी के मां-बाप गए, किसी के बच्चे. जो बिछुड़ गए थे, वे परस्पर तलाश में लग गए. लोग लाशों के समुदाय में कफन उठा-उठाकर अपनेवालों को पहचान रहे थे. खीज रहे थे, झींक रहे थे, आक्रोश में थे. उस जिन्दादिल शहर ने कभी सोचा न था कि उसके इतिहास में एक दिन ऐसा भी होगा. ऐसे में व्यवस्था गायब थी. वे छुटभैये नेता गायब थे जो कल रात तक वोटों की खींचतान में सरगना बने हुए थे. तभी एकाएक मृत्यु के उस कुहासे में मनुष्य की चेतना जागी. उसका मनुष्यत्व जागा. मां-बाप के रोके भी भोपाल के लड़के-लड़कियां अपने घरों, अपने कमरों, अपने हॉस्टलों से निकल पड़े. जिससे जो बना, वह वही करने लगा. एकाएक भोपाल ने उस भारतीय आत्मा के दर्शन किए, जो गहराते संकट में आंसू पोंछकर चुनौती से जूझ जाना जानती है. वे अपनी आत्मा द्वारा अनुशासित हो एक-दूसरे से पूछते, एक-दूसरे की बात मानते, कामों में लग गए. बीमार बच्चों को रात से दूध नहीं मिला था. जिससे जितना बन पड़ा, दूध की थैलियां, ब्रेड आदि ले अस्पतालों में पहुंचने लगा. जिससे जो मांगा, वह लेने दौड़ पड़ा. निजी वाहन समाज सेवा में आ गए. इंतजार करती लाशों को अपरिचित ही सही, पर कन्धे मिलने लगे. बीमारों के आसपास पूछनेवाले जुटने लगे. युवा डॉक्टरों से लेकर मेडिकल कॉलेज के फर्स्ट ईयर की छात्राओं तक सभी डॉक्टर बन गए थे. इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र वालंटियर हो गए. घर-घर में मरीजों के लिए अतिरिक्त भोजन बनने लगा. लोगों ने जेब से नोट निकाल, आइ-ड्रॉप्स से लेकर गुलाब-जल की बोतलों तक जो भी खरीद सके, खरीदा और अस्पतालों में जाकर दिया. वह भोपाल की जनता का आत्मनिर्णय था. उसमें नेतृत्व नहीं था, व्यवस्था नहीं थी और आज लोग कहते हैं, यही उसका शुभ पक्ष था. क्योंकि जब से व्यवस्था और सरकार कार्यरत हुई, अनेक घोटाले, विसंगतियां और पाखंड आरंभ हो गए.
इधर मरीजों के इर्द-गिर्द तीमारदारों की संख्या बढ़ रही थी, पर मृत्यु की संख्या कम नहीं हो रही थी. सरकारी आंकड़े जब पांच सौ के आसपास थे, तब वास्तविकता यह थी कि हजार से ऊपर मर चुके थे. सरकारी मुंह जब दो हजार क्रॉस नहीं कर पा रहे थे, तब भोपाल पांच हजार से ज्यादा बता रहा था. मृत्यु का क्रम जारी था. आज सरकार पांच हजार कहती है, विरोधी छह हजार और लोग दस हजार. सरकार की गिनती करने का तरीका होता है. पर जाने कितने अनजाने परदेशी, भिखारी, कोढ़ी, गरीब, अपंजीकृृत कुली रेलवे के- उनके मरने पर किसने गिनती की? प्रश्न यह भी है कि गिनती बताने के परस्पर दावों से होता क्या है? हम मुद्दे से हटते हैं. त्रासदी की भयावहता का वर्णन करने से जो करुणा निस्सारित होती है, वह प्रायः अपराधियों को सिर छुपाने में मदद करती है. हत्यारे आपके आंसुओं का लाभ लेने लगते हैं. आपके साथ वे भी रोने लगते हैं. उस दिन मध्यप्रदेश शासन मगर के आंसू रोया.
पर भोपाल के यूनियन कार्बाइड नामक बहुराष्ट्रीय अपराधी कारखाने ने अपेक्षाकृत बेशर्मी से काम लिया. जब पुलिस कंट्रोल-रूम में जहरीली गैस प्रवेश कर रही थी और कर्मचारी खांसने-कराहने लगे थे, तब पूछे जाने पर यूनियन कार्बाइड वालों ने फोन पर जवाब दिया कि नहीं, गैस का कोई रिसन यहां से नहीं हुआ. जब अल्ल सुबह कुछ पत्रकार कार के शीशे चढ़ा कारखाने में पहुंचे, तो अधिकारी हंसकर बोले- गैस से कोई मर कैसे सकता है? देखिए, हम तो गैस के सबसे पास होकर भी जिन्दा हैं! ही…ही…! यह मगरूर और सीनाजोर तरीका उनका चरित्र और पुराना स्वभाव रहा है. सुबह हो रही थी. अपराधी हत्यारा जानता था कि उसकी मदद और रक्षा के लिए दूसरा अपराधी आ जाएगा. वह थी व्यवस्था, सरकार बहादुर या सत्ता, जो इतने सालों से इस जहर को अपने कागजी और शाब्दिक आंचल से ढके हुए हैं.

अपने अपराध को ढकने के लिए सरकार ने रुख लिया कि वह जनता के हित में मुआवजे की लड़ाई लड़ेगी. कारखाने से शत्रुता प्रदर्शित करने का नाटक रचेगी

‘जनसत्ता’ दिल्ली के 16 जून, 1984 के अंक में राजकुमार केसवानी के लेख ‘भोपाल ज्वालामुखी के मुहाने पर’ में यह साफ लिखा था कि किस तरह यह संस्थान देश को धोखा देते हुए भोपाल के गरीबों की जान से खेल रहा है. यह तो हो ही नहीं सकता कि खरीदे हुए बुद्धिजीवियों द्वारा ‘पारदर्शी शासन’ के नाम से अभिनंदनित सरकार के संवेदनशील बनने वाले नेता और मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने वह लेख पढ़ा न हो उस पत्र को भी न पढ़ा हो जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हुए राजकुमार केसवानी ने उन्हें भेजा था. विधान सभा में उठाए सवाल के आड़े-टेढ़े पेंचदार जवाब को लाजवाब तरीके से पेशकर कारखाने को बचाने की बात उन्हें याद होगी. उन्हें पता होगा कि उनकी ही सरकार के निष्ठावान आई.ए.एस. अधिकारी एम.एन. बुच ने जब यूनियन कार्बाइड को शहर से हटाने का नोटिस दिया था, बजाय कारखाना हटाने के एम.एन. बुच को हटाया गया था. इसी संवेदनशील सरकार के श्रममंत्री ने कुछ दिन हुए, कहा था कि आखिर यूनियन कार्बाइड 25 करोड़ की सम्पत्ति है; कोई पत्थर का टुकड़ा नहीं, जिसे मैं इधर-से-उधर रख दूं. उस रात वह पच्चीस करोड़ का अमेरिकी पत्थर भोपाल के सिर पर पड़ा था. लोगों ने संवेदनशीलता के पाखंड को अन्तिम बार पूरी तरह पहचान लिया था कि यह पारदर्शी परत वास्तव में कितनी ठोस रूप से जालिम और बेशर्म है.
अपने अपराध को ढकने के लिए सरकार ने रुख लिया कि वह जनता के हित में मुआवजे की लड़ाई लड़ेगी. कारखाने से शत्रुता प्रदर्शित करने का नाटक रचेगी. वह पीड़ा को नारों में बदल परिस्थितियों को भुनाएगी. सत्ता के नेताओं की नजर लोकसभा चुनाव के वोट पर थी. सारी सरकारी मशीन इस काम में जुट गई कि जनाक्रोश, बजाय उनके, कारखाने के खिलाफ पूरी तरह मुड़ जाए, मुड़ा ही रहे और यह काम इस सिफ्त से हो कि सरकार के साथ कारखाने का भी कुछ न बिगड़े. जहां तक भोपाल के सामान्य जन का सवाल था, उसने लाशों के ढेर के साथ यह भी देख लिया था कि सरकार यहां कुछ पहले ही मर गई है.

मुर्दाघर से जीवित लौटे ‘मृत’
इधर अस्पतालों की हालत यह थी कि सारे एलोपैथ होमियोपैथ हो रहे थे; अर्थात क्षणों के अनुसार दवा दे रहे थे. दवा का रोग से कोई सम्बन्ध नहीं था. चिंता केवल रोगी से जुड़ने की थी, जो मौत के कगार पर बैठा था. आंख का दर्द कहो तो ड्रॉप मिल गया, सीने में जलन बताई तो डायजीन दे दी. जैसे दिल के मरीज गैस से नहीं, उस तेज दवा से मर गए, जो दी गई थी. इसी तरह बहुतेरे, जिन्हें मृत घोषित कर दिया था, बाद में जीवित पाए गए. कुछ मृत घोषित किए जाने के बाद मरे. इलाज करनेवालों के अगुआ डॉक्टरों ने यह रहस्य की बात दो दिन बाद बताई कि चूंकि इस गैस को अपनी सांसों में समाहित कर लेने वाले मरीज का एक लक्षण यह है कि उसकी नाड़ी गायब हो जाती है पर प्राण शेष रहते हैं, धड़कन बकाया रहती है, इसलिए उसे नाड़ी देखकर मृत घोषित नहीं करना चाहिए.

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मैं स्वयं एक महिला से मिला हूं जो मृत घोषित की जाने के बाद मुर्दाघर में पहुंचाई जा चुकी थीं, जिनके पति उन्हें मृत मानकर अपनी भी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे, क्योंकि वे भी गैस के उतने ही शिकार थे. पर तभी मुर्दाघर में एक रिश्तेदार डॉक्टर लड़की की नजर उस महिला के चेहरे पर पड़ी और चौंकी कि बुआ यहां कैसे? जांच करने पर पता चला कि प्राण शेष हैं और पांच-छह घंटे के प्रयत्न से वे बच गईं. पर ऐसे सौभाग्य बहुतों के नहीं थे. एक बार मृत घोषित किए जाने के बाद चिता ही उनकी दिशा थी. उनकी दशा क्या है, यह प्रश्न निरर्थक था. कोई एक लाख लोगों पर असर था. मरीजों का तांता लगा हुआ था. इलाज को लेकर डॉक्टरों और विशेषज्ञों में मतभेद था. सब जानते थे कि एम.आई.सी. का कोई एंटीडोट नहीं है. बहस इस पर भी थी कि गैस कौन-सी है. कारखाना चुप था. सरकार एम.आई.सी. बता रही थी. जिस तेजी से भोपाल गैस चैम्बर साबित हुआ था, उसे देखकर सभी कह रहे थे कि वह फॉसजीन गैस थी, जो अधिक भयानक होती है. एक सूत्र का कयास था कि विदेशी कारखाना मालिक ने किसी नई प्रायोगिक रूप से तैयार की गई जहरीली गैस को एम.आई.सी. के नाम पर यहां उसी लाइसेंस के अन्तर्गत भेज दिया है, ताकि तीसरी दुनिया के इस गरीब इलाके में उनके असर की जांच-पड़ताल की जा सके. भोपाल के जयप्रकाश नगर, छोला और चांदबड़ क्षेत्र में ‘गिनीपिग’ बसते हैं न! उनके मरने से पता चल जाएगा अमेरिका को कि गैस कितनी असरदार है और मानव सभ्यता को नष्ट करने में उसकी कितनी उपयोगिता है.
घटना हो जाने के दो-तीन दिन बाद कुछ अमेरिकी विशेषज्ञों ने जिन दवाइयों के नाम लिए, वे भारत में नहीं मिलतीं. हमारे देश में जनसंख्या अधिक है, विकास और उत्पादन कम है; इसलिए हम उनसे कारखाना खुलवाते हैं, गैस मंगवाते हैं, पर दवाई नहीं. पश्चिम जर्मनी से जो दवाई आई, वह केवल एक हजार लोगों के लिए थी. उसका अधिकांश भावी खतरे से सुरक्षा के लिए भोपाल के विशिष्ट वर्ग ने बांट लिया. इस तरह इलाज के मामले में इस हादसे का गौरवशाली अध्याय यह है कि प्रयत्न जारी  रहे, लोग मरते रहे. जो जीवित रह गए, यह उनका भाग्य. मृतकों में बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा थी. बिन खिले मुरझा गए उन बच्चों को देखकर लगता था, मीठी नींद सो रहे हैं. अभी-अभी कुनमुनाकर उठेंगे और दूध मांगेंगे.
भोपाल के एक छोर पर सेना का पड़ाव रहता है. गैस का झोंका उस तरफ भी गया. वहां ड्यूटी पर तैनात सैनिक अधिकारियों ने सड़क पर बेहोश होकर गिरते-मरते लोगों को देखा और बिना ऊपरी आदेश का इंतजार किए अपना कर्तव्य तय कर सेवा में जुट गए. बहुतों की जान उनके प्रयत्नों से बची. यह एक अलग अध्याय है.

भागो, भागो, फिर गैस निकली!
दोपहर के बाद छुटभैये नेता नजर आने लगे थे कि तभी एक अजीब घटना  घटी. हुआ यह कि लोगों की बड़ी भारी संख्या यूनियन कार्बाइड के अपराधी कारखाने के इर्द-गिर्द जमा हो रही थी. नाराजी तीव्र थी और लोगों का मूड कारखाने को नष्ट कर देने का था. कहा जाता है कि उस भीड़ से कारखाने को बचाने के लिए यह खबर उड़ाई गई कि टंकी फूट गई है और गैस निकल रही है. भागो, भागो, फिर गैस निकली, भागो! जिसने सुना, वही भागा. रात को शहर  में मौत का तांडव हो चुका था. दिल से दहशत गई नहीं थी. सब भागने लगे.  सिर्फ पुराना शहर ही नहीं, नया शहर भी. घरों को बिना ताला लगाए, अपने-परायों को संभालते या छोड़ते, जो जैसे बना, भाग रहा था. बुरकेवाली औरतें, बच्चे, बूढ़े, समझदार, जिम्मेदार, जवान लड़के-लड़कियां, सरकारी प्यादे, अफसर, वजीर, नेता. रात को वे सो रहे थे, पर इस समय वे होश में थे. सारा भोपाल घर से बाहर निकल गया. डॉक्टर और कलक्टर सभी भागने लगे. नेता भागने लगे. गैस उनका मानो तेजी से पीछा कर रही हो! सड़कों पर सैलाब-सा उमड़ने लगा, डरे हुए परेशान लोगों का.

यह घटना भी भोपाल के मानस से कभी नहीं हटेगी. पति अपनी पत्नी को छोड़ और मां-बाप अपने बच्चों को छोड़ भाग लिये थे. इतने कम समय में बहुत अधिक अनुभव लिये थे भोपाल ने

बाद में अफवाह का जोरदार खंडन किया गया, पर सभी बताते हैं कि खुद मुख्यमंत्री उस समय केरवा बांध के डाक बंगले की तरफ भाग गए थे. भगदड़ मच गई तो रोकना मुश्किल हो गया. रेडियो खबर का खंडन कर रहा था, पर भागनेवाले ट्रांजिस्टर तो लेकर दौड़ नहीं रहे थे. भागने और घबराने का यह दृश्य बहुत दर्दनाक था. गैस नहीं थी, पर गैस का भय पीछा कर रहा था. यह घटना भी भोपाल के मानस से कभी नहीं हटेगी. पति अपनी पत्नी को छोड़ और मां-बाप अपने बच्चों को छोड़ भाग लिए थे. इतने कम समय में बहुत अधिक अनुभव लिए थे भोपाल की जनता ने.
पर इसी सिलसिले में अब तक निष्क्रिय पड़ी व्यवस्था को पुनः लोगों पर छा जाने का अवसर मिल गया. वे जो घृणा के पात्र होकर समाज से तिरोहित हो चुके थे, ‘अफवाहों से सावधान रहिए, कोई डरने की बात नहीं है, स्थितियां पूरी तरह से नियन्त्रण में हैं और सामान्य हैं, जरूरत पड़ने पर कंट्रोल-रूम को फोन कीजिए’ आदि घोषणाओं के साथ वापस लोगों के सिर पर छाने लगे. सबके दर्द के मसीहा बनने लगे. नेतागिरी लौट आई. उसकी छाया तले अफसरशाही. फोन जुड़ने लगे. सरकारी गाड़ियां दौड़ने लगीं. आदेश देनेवालों ने आदेश दिए. जिन्हें आदेश दिए गए, उन्होंने और आदेश दिए. ड्यूटी लगने लगी. मानव सेवा के लिए कुर्सियों का यथोचित पदक्रमानुसार बंटवाना होने लगा. अमला अटेंशन में आया. स्थिति की गम्भीरता सरकारी तौर पर स्वीकार की गई. हुकुम चलने लगे- “भई, ये लड़कों की भीड़ अस्पताल में बहुत ज्यादा  है. इन लोगों ने सब मेस कर रखा है. डॉक्टरों को इलाज करने में तकलीफ होती है. हटाइए इन्हें.”
जो छात्र सेवा में दिन-रात एक किए थे, भगाए जाने लगे. तीमारदारी करने वाली सामाजिक संस्थाएं हटाई जाने लगीं. “यह आप लोगों ने अपना तम्बू अस्पताल के कम्पाउंड में कैसे लगा रखा है? हटाइए इसे!” अभी तक जो क्रियाएं और अंतरक्रियाएं मानवीय स्तर पर चल रही थीं, अब उनका निपटारा सरकारी अंदाज से होने से कुछ मरीजों को ठंड लग रही है. सुना है, इन्दौर से दो ट्रक कम्बल आए हैं. अगर उनमें से कुछ कम्बल मिल जाएं तो मरीजों को दे दें. बेचारे ठंड से मर रहे हैं.” निवेदन सुनकर सरकार बहादुर ने पहला सवाल तो पूछा कि आप कौन होते हैं मरीजों की तरफ से कम्बल मांगनेवाले? दूसरे यह कि कम्बल इश्यू करने के बाद वापस जमा करने की जिम्मेदारी कौन लेगा? तीसरे, इस बात का क्या सबूत कि उस मरीज के नाम पहले कम्बल इश्यू नहीं हुआ? चौथे, यह कि कम्बल मेरे चार्ज में नहीं हैं और जिसके चार्ज में हैं, मुझे पता नहीं, इसलिए सुबह आइए. और किसी अस्पताल में अफसर की कृपा से कम्बल बंट भी गए.

सरकारी पैसाः  मुंशी नजरिया
डॉक्टरों पर जोर डाला गया कि मरीजों की भीड़ कम करो, ताकि सरकार की तरफ से यह घोषणा की जा सके कि अथक प्रयासों से स्थिति नियंत्रण में है और मरीज स्वस्थ होकर लौट रहे हैं. दवाइयां (जो कि वास्तव में दवाइयां थीं ही नहीं, इसमें संदेेह है) थमाकर मरीजों से तम्बू खाली कराए जाने लगे. जाइए-जाइए, घर जाइए. इधर वी.आई.पी. मरीज के आगमन की अपेक्षा से प्राइवेट वार्ड खाली कराए जाने लगे, उधर जनरल वार्ड और तम्बुओं से मरीजों की छुट्टी की जाने लगी. बदनामी के दौर में लोकप्रियता अर्जित करने के लिए सरकार ने घोषित कर दिया कि पीड़ितों को मुआवजा दिया जाएगा. कम कष्ट होने पर एक हजार तक, ज्यादा पर दो हजार तक और इससे ज्यादा पांच हजार तक. अब यह ‘तक’ का निर्णय करने का काम अफसरों के स्वविवेक पर छोड़ दिया गया. सरकारी पैसा बांटने में मुंशी नजरिया काम में लिया गया. जनता की गाढ़ी कमाई के तेल के मालिक तेलियों के आदेश के बावजूद मशालचियों के जी जलने लगे, समान रूप से पीड़ित होने के बावजूद किसी को उसके नेता ने दो हजार दिलवा दिए और किसी बीमार के हाथ सौ रुपये का नोट थमाकर कहा- चलो, फूटो यहां से.

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इधर मरीजों में बात फैल गई कि पांच दिन पलंग से चिपके रहो तो दो हजार मिलेंगे. तीन दिन हो चुके थे. इधर डॉक्टर और अफसर मरीज से कहें कि भागो अस्पताल से. उधर कार्यकर्ता मरीज से कहें कि जाना मत, नहीं तो समझना- डूबे दो हजार. खींचतान मचने लगी, कार्यकर्ताओं और डॉक्टरों में तू-तड़ाक शुरू हुई. नौबत हाथापाई और मारपीट तक आ गई. इस सबका अंतिम हश्र हुआ डॉक्टरों की हड़ताल. यह था एक मानवीय त्रासदी के निराकरण में व्यवस्था और नेतृत्व का सक्रिय योगदान. जब राजीव गांधी आए, अस्पताल में चुनाव का बिल्ला लगाए श्वेत वस्त्रधारी कार्यकर्ताओं की भीड़ लग गई. राजीव गांधी के जाने के साथ वे भी चले गए. जाने वे सब कार्यकर्ता थे या सादे कपड़ों में सीआईडी और अंगरक्षक!

एंडरसन की गिरफ्तारी का नाटक
इधर एक ओर चाहिए थे मुर्दों के लिए कफन. चिता के लिए लकड़ी, कब्र खोदनेवाले और नये कब्रिस्तान के लिए जमीन. उधर हर भोपालवासी मौका लगते ही शहर छोड़ने की सोच रहा था. स्टेशन पर जानेवालों की भीड़ रेल-दर-रेल बढ़ रही थी. मृत्यु निरंतर आसपास मंडराती- सी लगती थी और सब भाग रहे थे. स्टेशन पर उतरनेवालों की भीड़ कम नहीं थी. टेलीफोन लगते नहीं थे. तारों के जवाब नहीं मिलते थे. भोपाल स्थित प्रियजनों और रिश्तेदारों की खबर पूछने लोग चले आ रहे थे. गैस से बचे तो गेस्टों ने मारा. चौपट धंधे में लुटे हुए लोग बातें करते बैठे थे.

हर भोपालवासी मौका लगते ही शहर छोड़ने की सोच रहा था. स्टेशन पर जानेवालों की भीड़ रेल-दर-रेल बढ़ रही थी. मृत्यु निरंतर आसपास मंडराती- सी लगती थी

इधर राज्य सरकार नए स्टंटों में अपने आप को चमकाने की कोशिश में लग गई. कारखाना बंद कर दिया गया. भारी हर्जाने और बड़े दावे की बातें हवा में थीं. हादसे को लेकर अटकलें जारी थीं, क्योंकि घटना की वास्तविकता का कोई सही चित्रण देना यूनियन कार्बाइड ने अपना कर्तव्य नहीं समझा. इसी बीच अमेरिका से कारखाने के मालिक एंडरसन आए. वे बम्बई से दो भारतीय व्यवस्थापकों को लेकर भोपाल पहुंचे. इस मौके का लाभ ले सत्ता ने अपनी प्रगतिशील साहसी छवि उभारने का प्रयत्न कर अपनी पूंजीपरस्ती को उजागर कर दिया. उसी यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित गेस्ट हाउस को बरसों से निजी ऐशगाह की तरह उपयोग करनेवाले मुख्यमंत्री ने यात्री हवाई जहाज के चारों ओर पुलिस फैला अरबपति मालिक एंडरसन को गिरफ्तार करने का नाटक रचाया. गिरफ्तारी के बाद अरबपति अपराधी को ससम्मान उसी ऐशगाह में लाया गया, और एक उपयुक्त धारा खोजी गई, जिसके अन्तर्गत एंडरसन साहब जमानत पर छोड़े जा सकें. अदालत से निवेदन किया गया कि चूंकि एंडरसन साहब अदालत तक नहीं आ सकते, इसलिए अदालत स्वयं गेस्ट हाउस तक चली आए. अदालत आई और शाम तक राज्य शासन के हवाई जहाज से हत्यारे कारखाने के मालिक अरबपति एंडरसन साहब मात्र पच्चीस हजार रुपयों की जमानत पर उस स्वागत-सत्कार भरी गिरफ्तारी से रिहा किए गए और बजाय बम्बई के दिल्ली की दिशा में विदा कर दिए गए. राज्य के मछुआरों ने केन्द्र के मछुआरे से कहा, बड़ी मछली फंस गई है गुरू. हमरे बस की नहीं. इससे तो तुम ही सुलझो.
सुना, दिल्ली में भी सचिव स्तर पर एंडरसन साहब से भोपाल में हुई असुविधा के लिए माफी मांगी गई. एंडरसन साहब से पत्रकार सवाल भी नहीं पूछ सके और न एंडरसन ने मुआवजे या कारखाने के भविष्य या घटी त्रासदी पर कुछ कहा. यह समझ ही नहीं आया कि वे जनाब यहां आए क्यों थे? और गैस से मरे और बीमार हुए गरीब भोपालियों की ओर से इस प्रगतिशील कहलाने वाली सरकार ने उससे समझौता क्यों किया? समझौता न किया तो लड़ाई क्या लड़ी? बहस क्या की? यह सब नाटक हुआ क्यों? एंडरसन के साथ आए कारखाने के वे दो भारतीय व्यवस्थापक कुछ दिनों भोपाल में उसी आरामगाह में गिरफ्तारी फरमाने के बाद बम्बई पधार गए हैं. राज्य सरकार, पीड़ित जनता की प्रतिनिधि, ‘सर, जी सर,’ करती, कहते हैं, उनके आगे-पीछे डोलती रही है इतने दिनों.
विरोधी दलों के नेताओं को इतनी फुरसत तो नहीं थी कि वे लोकसभा चुनाव की भागदौड़ से समय निकाल भोपाल आ सकें और आते भी तो वे सिवाय बयान देने के क्या कर लेते? चुनाव यों भी आरम्भ हो गए थे. विरोधी कह रहे थे कि मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को त्यागपत्र दे देना चाहिए और कांग्रेस (इ) वाले कह रहे थे कि सखलेचा को गिरफ्तार किया जाना चाहिए, जिनके मुख्यमन्त्रित्व काल में जहरीली गैस बनाने की इजाजत दी गई.

सीपीआई (एम) : आधी सदी, अधूरा सफर

aadhi_sadi(आलेख के बीच-बीच में आए इटैलिक पैराग्राफ एक सीपीआई (एम) कार्यकर्ता की डायरी के संपादित अंश हैं. इससे वामपंथी नेतृत्व के फैसलों और जमीन से उनके कटाव को समझने में आसानी होती है)

आधी सदी पहले चीनी आक्रमण के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की नेशनल काउंसिल की एक मीटिंग से 32 सदस्य उठकर बाहर निकल गए थे, जिन्होंने देश की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी सीपीआई (एम) की बुनियाद डाली. मसला था- भारत में क्रांति कैसे होगी, इसकी रणनीति पर मतभेद. लेकिन बुर्जुआ पार्टियों के घाघ नेताओं के बीच मध्यस्थता कराने, उनके ईगो सहलाने और पुचकारने के माहिर सीपीआई (एम) के पूर्व महासचिव और उसके पहले पोलित ब्यूरो के सदस्य कॉमरेड हरिकिशन सिंह सुरजीत ने इसे कुछ और तरह से व्याख्यायित किया था, ‘नेतृत्व के एक हिस्से को चीन समर्थक होने के आरोप में गिरफ्तारकर जेल में डाल दिया गया था, इसका फायदा उठाकर दूसरे गुट ने पार्टी पर कब्जा कर लिया. जो जेल गए थे वही सीपीआई (एम) बनानेवाले थे.’

यह साफगोई सच के ज्यादा करीब है कि झगड़ा भारतीय परिस्थितियों में क्रांति का रास्ता पहचानने का नहीं था, बल्कि सोवियत रूस या चीन की कम्युनिस्ट पार्टियों की लाइन में से एक को स्वीकार करने का था, जिनके आपसी मतभेद जगजाहिर हो चुके थे. विभाजन के बाद मुंबई में हुई सोवियतपंथी सीपीआई की पार्टी कांग्रेस में भी चीनी आक्रमण और गुटबाजी को जिम्मेदार बताया गया था. इस तरह कम्युनिस्टों का पहला घरेलू बंटवारा अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन के मतभेदों के कारण हुआ था.

(सारे देश में पार्टी दफ्तर, फंड, फादरलैंड से संबंध, कम्युनिस्ट आंदोलन की विरासत के दस्तावेज उन्हें और नेता हमें मिले. हमारी पार्टी को सब कुछ लगभग शून्य से शुरू करना पड़ा)

तीन साल बाद 1967 में सीपीआई (एम) में फिर विभाजन हुआ. चारू मजूमदार, कानू सान्याल के नेतृत्ववाले गुट सीपीआई (एम-एल) ने संसदीय राजनीति की भर्त्सना करते हुए सशस्त्र क्रांति को लक्ष्य घोषित किया. नक्सलबाड़ी विद्रोह के प्रभाव में इस गुट को नक्सलाइट कहा गया. जंगल और कागज दोनों जगहों पर खुद को नक्सल कहनेवाले अब इतने संगठन हैं कि गिनती मुश्किल है.

(मुझे लगता है पार्टी क्लास और जार्गनबाजी से कम्युनिस्टों के मतभेदों को नहीं समझा जा सकता, इसके बजाय उनके खानपान, बॉडी लैंग्वेज, उपन्यास-कहानियों से ज्यादा मदद मिलती है. पार्टी क्लास में बंगाल से केंद्रीय कमेटी के एक नेता आए थे, जो अजीब भाषा में बोल रहे थे. अधिरचना, प्रतिक्रियावादी, प्रोलेतेरियत, सिन्थेसिस, पेटी बोर्जुआ, त्रात्सकाइट, लुम्पनाइजेशन वगैरह अनजानी मिट्टी के बड़े-बड़े ढेले किसानों पर फेंके जा रहे थे. ये प्राइमरी स्कूल में भी मास्टर से पिटने के डर से ऐसे ही झूठ-मूठ मुंडी हिलाते रहे होंगे. हमारे सूबे के एक नेता हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे अकेले हैं जिन्होंने पंखे में चुटिया बांध कर कार्ल मार्क्स की दास कैपिटल पढ़ी है, उन्हीं को आर्थिक प्रश्नों पर अमूर्त प्रवचन के लिए हर बार खड़ा कर दिया जाता है. वे ज्ञान के गुमान से तने रहते हैं, लेकिन सच तो यह है कि पढ़े-लिखे मूर्ख हैं. किसान सभा के संस्थापक स्वामी सहजानंद सरस्वती की किताब के पहले पन्ने पर लिखा है, हमको ऐसा समाजवाद चाहिए जो खैनी की पिचपिच और रजाई की चीलर से पैदा हुआ हो, राहुल सांकृत्यायन तो छत्तीस भाषाएं जानते थे, लेकिन उन्होंने “भागो नहीं दुनिया को बदलो” भोजपुरी में लिखी, सव्यसाची की कितबिया को भी जोड़ लें, तो यही तीन अपने पल्ले पड़ी बाकी पार्टी, क्लास-कचहरी की मिसिल है जिसको बूझने के लिए पहले बैरिस्टरी, फिर फारसी की पढ़ाई करनी पड़ेगी. हद तो यह है कि बिना समझे कॉमरेड लोग बहस भी करने से लगे हैं और उन्हीं पहेली जैसे शब्दों से डराकर चुप भी करा देते हैं.)

सीपीआई (एम) ने इमरजेंसी का विरोध तो किया, लेकिन उसका ताप इतना नहीं था कि जनता के गुस्से को जनता पार्टी की तरह समर्थन में बदल सके

सीपीआई (एम) बनने के चार साल बाद केरल में ईएमएस नंबूदिरीपाद के नेतृत्व में इनकी पहली सरकार बनी. 1977 में बंगाल में वाममोर्चा की सरकार बनी, जो लगातार चुनाव जीतते हुए 2011 तक यानी तीन दशक से अधिक समय तक सत्ता में रही. अस्सी का दशक आते-आते सीपीआई (एम) राष्ट्रीय राजनीति की बड़ी ताकत बन चुकी थी, जो वीपी सिंह, देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल की सेकुलर सरकारों को चलाने में अहम भूमिका अदा करने लगी. नब्बे के दशक में बनी युनाइटेड फ्रंट सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में पहली पसंद बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु थे. इस प्रस्ताव को पार्टी ने ठुकरा दिया जिसे ज्योति बसु ने ‘हिस्टाेरिक ब्लंडर’ यानी ऐतिहासिक चूक कहा था.

सीपीआई (एम) के मुखपत्र पीपुल्स डेमोक्रेसी के अनुसार इस समय सीपीआई (एम) के सत्तर लाख पार्टी सदस्य और फ्रंटल संगठनों के सात करोड़ से अधिक सदस्य हैं, लेकिन यह पार्टी अपने इतिहास के सबसे बुरे दिन काट रही है. 2009 के ही लोकसभा चुनाव में इसके सांसदों की संख्या 44 से घटकर 16 हो गयी थी. एक तरफ नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का विरोध और दूसरी तरफ बंगाल के औद्योगीकरण के लिए उन्हीं नीतियों को लागू करने के नतीजे में हुए सिंगुर-नंदीग्राम के गोलीकांड और कैडर की गुंडागर्दी का नतीजा यह हुआ कि 2011 में ममता बनर्जी ने वामपंथियों का सबसे मजबूत किला ढहाकर सत्ता से बाहर कर दिया. 2014 के लोकसभा चुनाव में बंगाल से सीपीआई (एम) के सिर्फ दो सांसद जीत पाए.

पिछले चुनाव में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद वामपंथियों ने दक्षिणपंथ के नए उभार से लड़ना प्रमुख लक्ष्य घोषित किया है. उनका मानना है कि भारत की वास्तविक सत्ता बुर्जुआ और जमींदारों के नुमाइंदों के नियंत्रण में है, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के मुनाफाखोरों के साथ गठजोड़ कर लिया है.
अरबों के घोटालों, वंशवाद, सतही मुद्दों पर अपराधियों को चुनाव जिताने के अभ्यस्त और साथ ही घुटन भी महसूस करते समाज में वामपंथियों की ईमानदारी, गरीबों, वंचितों को राजनीति के एजंडे पर लाने की नीयत, विपरीत परिस्थितियों में लड़ने की क्षमता पर संदेह नहीं किया जा सकता. हर लिहाज से सबसे बड़े और निर्णायक हिंदी पट्टी के इलाके में अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद उनकी नाकामी स्तब्ध करती है, यह एक ऐसा अवरोध है जिसने न सिर्फ वामपंथ, बल्कि किसी भी अन्य प्रगतिशील राजनीतिक विकल्प का रास्ता रोक रखा है.

(कम्युनिस्ट समाज की व्यावहारिक सच्चाइयों को मार्क्सवादी फर्मे में कसकर देखने के बजाय उन सच्चाइयों के फर्में में सिद्धांत को परखते तो बाजी पलट सकते थे. एक अच्छी बात है कि कम्युनिस्ट वंशवादी नहीं हो सकते क्योंकि कम्युनिज्म कभी पारिवारिक मूल्य नहीं बन पाया. कम्युनिस्ट नेताओं के बच्चे या तो नौकरी करते हैं या उन पार्टियों की ओर लपकते हैं, जिनके नेताओं से तुलना करते हुए वे बचपन से अपने बाप को कोस रहे होते हैं.)

हर लिहाज से सबसे बड़े और निर्णायक हिंदी पट्टी के इलाके में तमाम तरह की अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद पार्टी की नाकामी स्तब्ध करती है

आजादी के बाद कांग्रेस के एकछत्र राज के जमाने में सीपीआई ने हिंदी पट्टी में सशक्त विपक्ष की भूमिका अदा करते कई बड़े जनसंघर्षों को संगठित किया, लेकिन वह सोवियत संघ की ओर झुकाव रखनेवाले जवाहरलाल नेहरू के विचित्र ब्रांड के बांझ समाजवाद के झांसे में ऐसा फंसी कि उसकी चमक खत्म होने लगी, यहां तक कि वह इमरजेंसी का समर्थन करने की हद तक गई, जिससे उसकी साख को बहुत बुरी तरह धक्का लगा.

यहां ध्यान दिया जाना चाहिए कि सीपीआई जिस समय कांग्रेस के साथ दिखाई दे रही थी वह गैर कांग्रेसवाद का दौर था, कांग्रेस के वंशवाद, भ्रष्टाचार, राजनीति के अभिजन कल्चर और जनविरोधी नीतियों के खिलाफ एक राजनीतिक विकल्प आकार ले रहा था. इसमें कोई दो राय नहीं कि
सीपीआई का नेतृत्व उस वक्त की राजनीतिक आकांक्षाओं को पहचान पाने में नाकाम रहा था या अगर पहचान भी गया, तो उनके अनुरूप चलने की हिम्मत नहीं कर सका.

इमरजेंसी के दौर में कांग्रेस का समर्थन करना ऐसा राजनीतिक पाप था जिसका कोई प्रायश्चित नहीं हो सकता था और इसकी कीमत सीपीआई को जनाधार के घटने और नेताओं के निस्तेज हो जाने के रूप में चुकानी पड़ी. रही-सही कसर नब्बे के दशक की शुरुआत के तुरंत पहले सोवियत संघ के विघटन ने पूरी कर दी, इससे समूचे वामपंथ को भारी सदमा लगा, लेकिन सीपीआई तो जैसे पितृविहीन होकर अस्तित्व के संकट से जूझने लगी.

वामपंथियों का ठेठ देशी यथार्थ से पाला अस्सी के उत्तरार्ध और नब्बे के दशक में पड़ा, जब धर्म और जाति राजनीति की केंद्रीय धुरी बनकर सामने आए

(नकली कम्युनिस्ट नेताओं की पहचान है कि उनके ओसारे के एक कोने में कुल्हड़ और शीशे के गिलास रखे रहते हैं, ताकि घर आनेवाले दलित और मुसलमान कार्यकर्ताओं को चाय पिलाई जा सके. अक्सर निचली जाति का कोई कॉमरेड जिला कमेटी की बैठक में छुआछूत बनाम मेहनतकश कतारों से नेतृत्व की दूरी का सवाल उठाता है, तो नेता किचकिचाते हैं कि डी-क्लास वे हुए उनका परिवार नहीं, क्या आप लोग मुझे घर से ही निकलवा देना चाहते हैं? ज्यादातर ऐसे नेता इसलिए कम्युनिस्ट पार्टी में आए थे कि उनके परिवारों को खेती के लिए समय पर सस्ते मजदूर मिल सकें, उन्हीं के बच्चे फादरलैंड के स्वर्णकाल में डाक्टरी, इंजीनियरी पढ़ने सोवियत रूस गए. मंहगी मुसहर मजाक करता है- अगर लेनिन जी के कहनाम से कामरेड आंख की पुतली होता है तो हम लोगों को अलग बरतन में काहे चाय पिलाते हैं.)

दूसरी तरफ सीपीआई (एम) ने इमरजेंसी का विरोध तो किया, लेकिन उसका ताप इतना नहीं था कि जनता के गुस्से को जनता पार्टी की तरह समर्थन में बदल सके, लेकिन कांग्रेस विरोधी मिजाज का फायदा उठाते हुए वह पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा की सरकार बनाने में कामयाब रही. वहां वामपंथियों ने संगठन का विस्तार गांव स्तर तक करते हुए संविधान के दायरे में भूमि सुधार लागू करने, पंचायती राज का विकेंद्रीकरण करने और एक हद तक वंचित तबकों को उनके अधिकारों का अहसास कराने में कामयाबी हासिल की जिसके कारण वे तीन दशक से भी ज्यादा समय तक सत्ता के नशे में चूर होकर बहक जाने तक टिके रहे.
वामपंथियों को मानने में चाहे जितना गुरेज हो, लेकिन इस कामयाबी में खुद को विशिष्ट माननेवाली बंगाली उपराष्ट्रीयता का सांस्कृतिक रंग भी घुला हुआ था जिसके कारण पार्टी का विस्तार बंगालियों और स्थानीय आदिवासियों के संघर्ष से जलते त्रिपुरा तक तो हुआ, लेकिन पड़ोसी बिहार और उसके आगे हिंदी पट्टी के अन्य राज्यों में नहीं हो पाया.

(अजीब नारा है- यूपी भी बंगाल बनेगा, बलिया ही शुरुआत करेगा. यूपी अपनी कद काठी और पहचान के साथ क्यों नहीं वामपंथियों के साथ खड़ा हो सकता है.)
अगर वामपंथी अपने कट्टर वैचारिक मतभेदों, झंडे की तरह फहरानेवाली नास्तिकता, वर्ग संघर्ष के स्वप्नों के साथ भी स्वतंत्र भूमिका निबाहते रहते, तो भी गनीमत होती, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. हिंदी पट्टी में बड़े उद्योग लगभग नहीं हैं, जहां हैं भी, वहां पार्टी के सबसे जहीन नेता कारखानों और लेबर कोर्ट के बीच उलझकर रह गए. अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट नेताओं के चमकदार नामों के आभामंडल में ट्रेड यूनियन करना कुछ वैसी ही प्रेरणा थी जैसे बॉलीवुड के ज्यादातर अभिनेता और एक्स्ट्रा अमिताभ बच्चन हो जाने का अरमान पाले रहते हैं.

(ट्रेड यूनियन का नेता अंततः लेबर कोर्ट का वकील होकर समाप्त हो जाता है. सिर्फ वेतन, भत्ते और काम की परिस्थितियां सुधारने की लड़ाई लड़ने के कारण मजदूर तभी तक यूनियन के साथ रहते हैं जब तक आर्थिक मसलों पर लड़ाई चलती है. बाकी समाज से अलगाव रेलवे, बैंक, बीमा से छोटे कारखानों तक की यूनियनों में महसूस किया जा सकता है. इन मजदूरों का भी कोई वर्ग नहीं है क्योंकि वे जाति से ही गांव और यहां जाने जाते हैं. इस प्रश्न से कम्युनिस्टों को टकराना ही होगा, वे कैसी भी बुल्गागिन कट दाढ़ी रख लें, लेकिन जाति उनका पीछा नहीं छोड़ेगी. ऐसा तभी संभव है जब अनगढ़, देसी, मौलिक सोच वाले नेताओं को उभरने का मौका दिया जाएगा)

वामपंथियों का ठेठ देशी यथार्थ से पाला अस्सी के उत्तरार्ध और नब्बे के दशक में पड़ा, जब धर्म और जाति राजनीति की केंद्रीय धुरी बनकर सामने आए. मंडल और कमंडल यानी धर्म और जाति की राजनीति को निहायत अभारतीय ढंग से समझने की कोशिश करने के कारण पलिहर के बानर बन कर रह गए. पहले कांग्रेस से लड़ने के नाम पर फिर सांप्रदायिकता के विरोध में दोनों वामपंथी पार्टियों ने जनता दल, समाजवादी पार्टी जैसी मध्यमार्गी, अवसरवादी पार्टियों के एजंडे के पीछे-पीछे चलना शुरू कर दिया जो सबसे अधिक घातक साबित हुआ.

अजीब स्थिति थी उस दौर की जब साझा रैलियों में सबसे अधिक लाल झंडे दिखाई देते थे, लेकिन मुद्दा वीपी सिंह, लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह का आभामंडल हुआ करता था. इन्हीं नेताओं के नामों के आगे कॉमरेड लगाकर लाल सलाम करने का अजीबोगरीब फैशन भी साफ नजर आ रहा था.

(भारतीय राजनीति के इतिहास का सबसे बड़ा मोतियाबिन्द है कि कम्युनिस्टों को जाति नहीं दिखाई देती और उनके कार्यकर्ता पिछड़े मुलायम सिंह और दलित कांशीराम के साथ जा रहे हैं. क्या यह अपवाद था कि केरल में एके गोपालन जैसे नेता ने गुरूवयूर मंदिर में दलितों को प्रवेश दिलाने के लिए पुजारियों के घंटे से मार खाई थी. उन्हीं के नाम पर बने गोपालन भवन में पार्टी का हेडक्वार्टर है. पोलित ब्यूूरो में गोपालन जैसे कम लोग पहुंच पाए, ज्यादातर कैम्ब्रिज, आक्सफोर्ड, एडिनबर्ग और देश के इलीट कालेजों से पढ़कर आए नेताओं ने मार्क्सवाद के द्वारा उपलब्ध कराए वर्ग के फर्मे में कसकर जाति को देखने की कोशिश की. वाकई यह मास्को में बारिश-भारत में छाता जैसी गलती थी जिसका नतीजा रहा कि भूमिहीन खेत मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी दिलाने का नारा कांशीराम के सम्मान और सत्ता में भागीदारी के नारे के आगे नहीं चल पाया. मंडल कमीशन लागू हुआ, सर्वण लड़के आत्मदाह करने लगे, कम्युनिस्टों ने गजब किया. नेताओं ने कहा-, ‘आरक्षण पौधों में वाष्पोत्सर्जन जैसी आवश्यक बुराई है.’ यहां बौखलाए छात्र और युवा पूछ रहे हैं, मंडल के साथ हो या खिलाफ हो, लेकिन कॉमरेड लोग वनस्पतिशास्त्र पढ़ाकर अपना मजाक बना रहे हैं. अलग बात है चुनाव में जाति के आधार पर टिकट पाया कॉमरेड भी इतनी सफाई से बात करता है कि वर्ग संघर्ष को आगे बढ़ाता नजर आता है. किताब पढ़कर राजनीति करने वाले नेताओं को जाति से मुंह इसलिए चुराना पड़ता है क्योंकि मार्क्स से लेकर माओ तक ने जाति पर कुछ नहीं कहा है.)

इस रणनीति को वामपंथ ने बृहद मोर्चा नाम दिया था, जिसके अनुसार इन मध्यमार्गी दलों के कैडर को वामपंथियों की ईमानदारी और संगठन शक्ति से प्रभावित होकर उनके साथ आ जाना था, लेकिन हुआ ठीक उल्टा. जिस अनुपात में वामपंथियों की स्वतंत्र पहलकदमी की ताकत समाप्त होने लगी. उनका किसान आधार भी इन मध्यमार्गी पार्टियों की ओर खिसकने लगा. इन पार्टियों के साथ तालमेल और गठबंधन को बनाए रखने के लिए वामपंथियों ने समाज में रेडिकल बदलाव यानी क्रांति की तैयारी में चलाए जा रहे जनसंघर्षों को भी छोड़ दिया. मध्यमार्गी पार्टी के नेताओं के व्यक्तिगत विचलनों और अवसरवादी कलाबाजियों की अनदेखी की और छोटी-छोटी चुनावी सफलताओं के लिए बहुत से समझौते किए. इस दौर को वाममोर्चे के सरकारी वामपंथ के रूप में पतित होने के दौर के रूप में याद किया जाता है. वामपंथी भी जातिगत आधार पर टिकट देने लगे और पार्टी कार्यालयों में टिकटार्थियों के धरने और उपवास होने लगे.
इसी समय पार्टी में एक किस्म की नौकरशाही भी हावी होने लगी, जिसके लिए सदस्यता की रसीदें आंदोलन से ज्यादा जरूरी हो गईं. गेहूं कटाई के बाद लेवी की वसूली और धान कटाई के बाद जेल भरो कर्मकांड हो गए. राज्यों का काम ऊपर से आए सर्कुलर का पालन करना हो गया, नेतृत्व के आचरण पर सवाल उठाने की बहुत पुरानी परंपरा खत्म हो गई.

सिंगुर-नंदीग्राम गोलीकांड के बाद तो वामपंथियों ने नवउदार और पूंजीवादी आर्थिक नीतियों के विरोध का नैतिक अधिकार भी जैसे खो दिया है

(तिरूवनन्तपुरम में बड़ी पार्टी कांग्रेस होनेवाली है. अगर किसान सभा की दस हजार मेम्बरशिप नहीं हुई, तो पार्टी के जिला सचिव डेलीगेट नहीं बन पाएंगे. आज चाय की गुमटी पर एक डोली रुकी, तो उन्होंने पास के गांव के कहारों से मेंबर बन जाने के लिए कहा. कहारों ने कहा, उनके टोले में किसी के भी पास एक धुर जमीन नहीं है वे किसान सभा के मेंबर कैसे बन सकते हैं. नेताजी ने कहा, अभी किसान सभा में हो जाओ बाद में खेत मजदूर सभा में भी कर देंगे. उन्होंने कहा, नेताजी हमारे रसीद लेने से आपकी इज्जत बढ़ती है तो बना दीजिए, लेकिन हम लोग फीस नहीं दे पाएंगे. नेताजी ने कहारों से दुलहिन का नाम पूछकर उसकी भी रसीद काट दी, जिसे कभी पता नहीं चल पाएगा कि उस पर कितनी भारी जिम्मेदारी आ पड़ी है. सम्मेलनों में जब जनसंगठनों की बढ़ती सदस्यता का जिक्र आता है तो मुझे उन कहारों और दुलहिन की याद आती है.)

अगले साल उन कहारों को खेत मजदूर सभा का भी मेंबर बना दिया गया.

(आज समझ में आया कि दलित औरतें पार्टी के बारे में क्या सोचती हैं. एक महिला ने पार्टी के एक नेता पर बलात्कार का आरोप लगाया था जिसके लिए पंचायत बुलाई गई थी और मुझे जिला कमेटी ने आब्जर्वर बनाकर भेजा था. नेताजी एक साल से अक्सर उसके घर पर रुकते थे, उसके दो बच्चों को पढ़ा दिया करते थे. महिला ने कॉमरेडों के बीच बेधड़क कहा, ‘सवर्ण जमींदार हमारे साथ कुछ करते हैं, तो बदले में ज्यादा मजदूरी, साबुन, साड़ी या नकद रुपया देते हैं. इनसे पूछो कि मुझे क्या दिया जो साल-भर से हैंडपंप चला रहे हैं.’ मुझसे कुछ कहते नहीं बना. क्या पार्टी का उससे संबंध कुछ लेने-देने का ही है. वह ऐसा सोचती है तो कुछ गलत नहीं है, क्योंकि बुर्जुआ पार्टियां उन्हें लालच देकर मुफ्त की बस से रैली, धरने में ले जाती हैं. पहले चुनाव के समय से ही इस गांव में वोट के लिए पैसा और शराब चलते हैं. उसे हम बता ही कहां पाए हैं कि वह पार्टी में किसी दूसरे का काम नहीं करती, बल्कि अपने हक के लिए लड़ रही है.)
इसी दौर में सीपीआई (एम) महासचिव हरिकिशन सिंह सुरजीत को बुर्जुआ राजनीतिज्ञों ने चाणक्य का खिताब दिया, जिनका काम मध्यमार्गी पार्टियों के नेताओं के बीच समझौते कराना, गठबंधन को चलाना और जोड़-तोड़ करना था. ऊपर से चल रही हवा के प्रभाव में राज्य इकाइयों में भी सुरजीत के पेपरबैक संस्करण पैदा हो गए और वहां की सरकारों से लाभ लेने लगे. जिस समय सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता की राजनीति के पुछल्ले के रूप में वामपंथी लगे हुए थे, वे अच्छी तरह जानते थे कि इसके पुरोधा भी इन मूल्यों के प्रति कितने गंभीर हैं. ये मुद्दे सिर्फ सत्ता पाने के औजार हैं. जल्दी ही राज्यों में उनकी सरकारें बनने के बाद सामाजिक न्याय की जगह वंशवाद, भ्रष्टाचार, अपराधीकरण और कांग्रेस जैसी ही पूंजीपरस्त नीतियों का जलवा नजर आने लगा. जब जनता का मोहभंग दिखने लगा तब भी वे उनके पीछे लगे रहे.

इस अवसरवादी राजनीति ने हिंदी पट्टी में एक ओर विशुद्ध पॉवर पालिटिक्स और सत्ता पाकर व्यक्तिगत हितों में उसका दुरुपयोग करने वाली सपा, बसपा, राजद, जेडी (यू) जैसी बुर्जुआ पार्टियों को और उनकी प्रतिक्रिया में भाजपा जैसी सांप्रदायिक पार्टियों को जड़ें जमाने का मौका दिया. कांग्रेस के कमजोर होने से हिंदी पट्टी में जो स्पेस बना उसे भरने की सबसे स्वाभाविक दावेदार होते हुए भी वामपंथी पार्टियां इमरजेंसी के बाद एक बार फिर मुंह ताकती रह गईं क्योंकि शार्टकट के चक्कर में वामपंथी अपने मुद्दे और स्वतंत्र पहलकदमी भूल चुके थे.

(जब सोवियत संघ का अमेरिका से शीतयुद्ध चला करता था तब कम्युनिस्टों का प्रिय कर्तव्य दिल्ली में रैली कर विश्वशांति की कामना और साम्राज्यवाद का विरोध हुआ करता था. राममंदिर मुद्दे से भाजपा के उभार के बाद से वे सांप्रदायिकता का विरोध करने के लिए किसी भी सामंतवादी, पूंजीवादी, वंशवादी पतनशील पार्टी के साथ जनवादी मोर्चा बना लेते हैं और न्यूनतम साझा कार्यक्रम की लग्गी लगाकर किसी भी सरकार का समर्थन कर देते हैं. यह पिछली सीट पर बैठकर ड्राइवर को निर्देश देने का सुखद काल होता है. जल्दी ही ड्राइवर आवश्यक बहुमत का जुगाड़कर उन्हें सड़क किनारे उतार देता है और वे धकियाए जाने के बाद कहते हैं, भाजपा, कांग्रेस और तीसरे मोर्चे की आर्थिक नीतियों में कोई फर्क नहीं है, लेकिन फिर गठबंधन का अवसर आते ही शामिल हो जाते हैं, जिससे उनकी विश्वसनीयता को जबरदस्त नुकसान हुआ है. ताज्जुब है कि जितनी आसानी से वे बुर्जुआ पार्टियों से गठजोड़ कर लेते हैं, आपस में नहीं कर पाते. वाम मोर्चे का न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाने की बैठकों में जूते में दाल बंटती है. वर्तमान को दफना कर अतीत को जिलाया जाता है, प्रतिक्रियावादी, संशोधनवादी, नक्सलवादी और छद्म जनवादी आपस में लड़कर अपने दफ्तरों को लौट जाते हैं. पूछने का मन करता है- कॉमरेड धर्म अफीम है और दंगे का आधार धर्म है, तो आप घोषित नास्तिक कैसे उसे रोक लेंगे.)

2004 के बाद सत्ता में आई कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए-वन और टू की सरकारों को वामपंथियों ने जिस पैंतरेबाजी से चलाया, उसने जनता को विकल्पहीन बनाकर कांग्रेस को नई जिंदगी दी और उनके सबसे मजबूत किले बंगाल को भी ढहाने का गोला बारूद ममता बनर्जी को मुहैया कराया. सिंगुर-नंदीग्राम गोलीकांड के बाद तो वामपंथियों ने नवउदार आर्थिक नीतियों के विरोध का नैतिक अधिकार भी जैसे खो दिया है.

मध्यमार्गी बुर्जुआ पार्टियों के पीछे चलते हुए संसदीय राजनीति में कामयाब होने की आकांक्षा की भूल को वामपंथी अब भी स्वीकार करने को तैयार नहीं दिख रहे हैं, लेकिन वे अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में जनता की स्वतःस्फूर्त, लेकिन क्षणिक भागीदारी और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के उभार और अब बिखराव से जूझने की प्रक्रिया को बड़े गौर से देख रहे हैं. हो सकता है उन्हें कभी समझ में आए कि राजनीति में अपना एजेंडा, स्वतंत्र पहलकदमी, सत्ता लोलुप तिकड़मी नेताओं से दूरी और भारतीय परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढालते हुए जनता से दीर्घकालीन रिश्ता कायम करने में ही कामयाबी की कुंजी छिपी है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं)

गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ : अनवरत विद्रोही

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वह कौन-सी बात है जो किसी रचना या रचनाकार को कालजयी बनाती है? शायद उसके द्वारा रचित साहित्य की प्रासंगिकता. हिंदी कविता का कोई कवि अगर पिछले 50 सालों के दौरान हर छोटी-बड़ी घटना पर बार-बार प्रासंगिक बनकर सामने आता रहा है तो वह हैं- गजानन माधव मुक्तिबोध. भरे विश्वास से मुक्तिबोध को सर्वकालिक महान रचनाकारों में शुमार किया जा सकता है. वजह केवल इतनी भर है कि उन्होंने जो भी रचा वह कालातीत हो गया. 11 सितंबर 1964 को नई दिल्ली में इलाज के दौरान जब मुक्तिबोध का निधन हुआ तब वे महज 46 साल के थे.
उस वक्त तक उनका कोई कविता संग्रह प्रकाशित नहीं हो सका था. छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मध्य प्रदेश) के राजनांदगांव में रहने वाले मुक्तिबोध को उस दौर के युवा साहित्यकार श्रीकांत वर्मा, हरिशंकर परसाई और अशोक वाजपेयी इलाज के लिए दिल्ली लाए थे. उस वक्त वो कोमा में थे.
मुक्तिबोध का जीवन उतार-चढ़ाव से भरा रहा. वैचारिक धरातल पर अपने समकालीनों के बीच सबसे ऊंचे पायदान पर खड़ा यह कवि भौतिकता के मध्यवर्गीय मानकों के मुताबिक कभी संपन्न नहीं रहा. यहां तक कि साहित्य जगत में गंभीर दस्तक के बावजूद मुक्तिबोध सही मायनों में वह पहचान हासिल नहीं कर सके थे जिसके वह हकदार थे. लेकिन उनके निधन के तत्काल बाद उनकी ख्याति का ऐसा बवंडर उठा जिसने सारे हिंदी साहित्याकाश को ढंक लिया. अगले दो दशक तक हिंदी साहित्य और खासकर कविता जगत मुक्तिबोधमय रहा.

मुक्तिबोध का जीवन उतार-चढ़ाव से भरा रहा. अपने समकालीनों के बीच ऊंचे पायदान पर खड़ा यह कवि भौतिकता के मध्यवर्गीय मानकों के मुताबिक कभी संपन्न नहीं रहा

मुक्तिबोध अपने समय की सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहते थे, लेकिन उनकी कविताओं का पहला संग्रह ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’, उनकी मौत के बाद ही प्रकाशित हो सका. हालांकि उससे पहले तारसप्तक में अज्ञेय उन्हें चिह्नित कर चुके थे. मुक्तिबोध की कविताओं का दूसरा संग्रह ‘भूरी भूरी खाक धूल’ उनके निधन के 15 साल बाद पाठकों तक पहुंचा. इस संग्रह की भूमिका में अशोक वाजपेयी ठीक ही लिखते हैं कि इन 15 वर्षों की अवधि में हिंदी कविता पर मुक्तिबोध छाये रहे हैं. युवतम पीढ़ी अगर किसी बुजुर्ग से खुद को जोड़ती है और प्रामाणिकता और सार्थकता पाने की कोशिश करती है, तो वह मुक्तिबोध ही हैं.
राजनांदगांव जैसी अपेक्षाकृत छोटी जगह पर रहते हुए भी मुक्तिबोध साहित्य में भरपूर सक्रियता रखते थे. आलोचना तथा हंस जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके आलेख देश के तमाम बौद्धिकों के बीच चर्चा का विषय हुआ करते थे. उनके निधन के बाद एक-डेढ़ दशक तक पूरा साहित्य विमर्श मुक्तिबोध पर ही केंद्रित रहा. यहां तक कि उस दौर में नई कविता का कोई भी कवि ऐसा नहीं था जो मुक्तिबोध से प्रभावित न हो.
वे सही मायनों में जनवादी कवि थे, निहायत आम जीवन जीते थे. यही वजह थी कि आम आदमी के जीवन में उनकी गहरी रुचि और आस्था थी. संभवत: इस जीवन ने ही उनको एक व्यक्ति के जीवन संघर्ष, उसकी वैयक्तिकता, उसकी असुरक्षा और अनिश्चितता से रूबरू कराया. ये तमाम चीजें जब उनकी आंतरिक बेचैनी से टकराईं, तो हिंदी कविता को एक से एक नायाब रचनाएं मिलीं.
मुक्तिबोध की कालजयी कविता ‘अंधेरे में’ दरअसल उनके इसी आत्मसंघर्ष तथा उस वक्त के नग्न यथार्थ (दुर्भाग्यवश हालात आज भी वही हैं) का चित्रण करती है. यह लंबी कविता सन 1957 से 1962 के बीच रची गई. सन 1964 में यह ‘आशंका के द्वीप : अंधेरे में’ शीर्षक से प्रकाशित हुई. ‘अंधेरे में’ समेत मुक्तिबोध की तमाम कविताओं में फैंटेसी एक प्रमुख तत्व के रूप में उभरकर सामने आती है. यह दरअसल खांटी देसी जादुई यथार्थवाद का नमूना है. लेकिन ‘अंधेरे में’ केवल फैंटेसी नहीं है.
मुक्तिबोध की दो सबसे प्रखर और प्रसिद्ध रचनाओं की बात की जाए, तो ‘ब्रह्मराक्षस’ और ‘अंधेरे में’ का ही जिक्र आता है. ‘ब्रह्मराक्षस’ कविता में मुक्तिबोध ने ब्रह्मराक्षस के मिथक के जरिये तत्कालीन बौद्धिक वर्ग के द्वंद्व और आम लोगों से उसके अलगाव की नग्न तस्वीर पेश की थी. यह एक ऐसा आईना था, जिसमें अपनी शक्लें झांकने में लोगों को डर लगता था.
मुक्तिबोध की कविताओं के लंबा होने की एक वजह यह थी कि वह कविताओं के जरिये एक पूरी पीढ़ी या पूरी सभ्यता की पड़ताल में लग जाते थे. उन्होंने स्वयं कहा भी है कि उनकी छोटी कविताएं दरअसल अधूरी कविताएं हैं.

मुक्तिबोध की कालजयी कविता ‘अंधेरे में’ दरअसल उनके आत्मसंघर्ष तथा उस वक्त के नग्न यथार्थ (दुर्भाग्यवश हालात आज भी वही हैं) का चित्रण करती है

‘अंधेरे में’ कविता में उन्होंने सत्ता और बौद्धिक वर्ग के बीच के गठजोड़ को बेनकाब किया. शासक वर्ग द्वारा जनता के दमन और नये के सृजन तक इस कविता में भारत का संपूर्ण अतीत और वर्तमान प्रतिध्वनित होता है. अगर हम ‘अंधेरे में’ कविता के रचनाकाल पर गौर करें, तो आजादी को एक-डेढ़ दशक बीत चुके थे. स्वतंत्रता से जुड़े सारे स्वप्न भंग हो चले थे. सामाजिक विषमता, बड़े पैमाने पर व्याप्त बेरोजगारी और उद्योग-धंधों के अभाव और सत्ता के षडयंत्रों और कुत्सित गठजोड़ों ने जनता में गहरी निराशा भर दी थी. उसका पूरी तरह मोहभंग हो चुका था. यह वह दौर था जब वाम दलों का विभाजन तत्काल ही हुआ था. ऐसे वक्त में जब हर ओर संदेह, संशय और विश्वासभंग का माहौल था, मुक्तिबोध ‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है’ के खरे जुमले के साथ सामने आए. इस बात को समझने के लिए ‘अंधेरे में’ कविता की कुछ पंक्तियां देखते हैं-

muktiboodh- apnimati

‘ओ मेरे आदर्शवादी मन,
ओ मेरे सिद्धांतवादी मन,
अब तक क्या किया?
जीवन क्या जिया!!

उदरम्भरि बन अनात्म बन गए,
भूतों की शादी में कनात-से तन गए,
किसी व्यभिचारी के बन गए बिस्तर,

दुखों के दागों को तमगों-सा पहना,
अपने ही खयालों में दिन-रात रहना,
असंग बुद्धि व अकेले में सहना,
जिंदगी निष्क्रिय बन गई तलघर,
अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया!!
बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गए,
करुणा के दृश्यों से हाय! मुंह मोड़ गए,
बन गए पत्थर,
बहुत-बहुत ज्यादा लिया,
दिया बहुत-बहुत कम,
मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम!!
लो-हित-पिता को घर से निकाल दिया,
जन-मन-करुणा-सी मां को हंकाल दिया,
स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया,
भावना के कर्तव्य–त्याग दिए,
हृदय के मंतव्य–मार डाले!
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
तर्कों के हाथ उखाड़ दिए,
जम गए, जाम हुए, फंस गए,
अपने ही कीचड़ में धंस गए!!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
आदर्श खा गए!

अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया,
ज्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम…’

भले ही मुक्तिबोध की कविताओं में कोई गीतात्मकता न हो, लेकिन उसमें एक आंतरिक लय है. वे वास्तव में जनता के एक राजनीतिक कवि थे. मुक्तिबोध को पढ़ना वास्तव में अपने भीतर और बाहर एक लंबी यात्रा से गुजरना है. उन कविताओं को पढ़ते हुए आप अपने आपे में नहीं रहते, निकल पड़ते हैं उन कविताओं के साथ जंगल, पहाड़, अंदर, बाहर की यात्रा पर अपनी पूरी संवेदनाओं के साथ. कभी गौर किया है आपने मुक्तिबोध की कविता पढ़ने के तत्काल बाद बहुत थकान महसूस होती है. उस थकान की वजह यही यात्रा है.