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छह माह पार, आनंदीबेन सरकार

Anandiben Patel to next Gujarat CM

गुजरात में एक दशक से अधिक समय तक एकछत्र राज करने के बाद नरेंद्र मोदी ने दिल्ली कूच करने से पहले अपनी जिस राजनीतिक साथी आनंदीबेन पटेल को अपना उत्तराधिकारी चुना था, वह मुख्यमंत्री के तौर पर छह महीने का कार्यकाल पूरा कर चुकी हैं. ऐसे में यह जानना दिलचस्प होगा कि मोदी के जाने और आनंदीबेन द्वारा कमान संभालने के बाद उस गुजरात में क्या-क्या हुआ जिसके विकास का मॉडल उस दौरान हर क्षेत्र के लिए आदर्श बना हुआ था. सवाल यह है कि पिछले 180 दिनों में गुजरात किन बदलावों का गवाह बना है? या वहां अब भी सब कुछ वैसे ही चल रहा है जैसा मोदी छोड़कर गए थे?

राजनीतिक विश्लेषकों के एक समूह की राय यह है कि पिछले छह महीनों में प्रदेश सरकार ने कोई ऐसी नई नीति नहीं बनाई या कोई ऐसा काम नहीं किया, जिसे मोदी युग से अलगाव के रूप में देखा जा सके. पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र पटेल आनंदीबेन के पिछले छह महीने के कार्यकाल की चर्चा करते हुए कहते हैं, ‘नरेंद्र मोदी ने जो स्टाइल शीट तैयार की थी, उसी के अनुसार आज भी काम हो रहा है. आज मोदी गुजरात में नहीं हैं, लेकिन सरकार वैसे ही चल रही है जैसे वह चलाया करते थे. प्रदेश का पूरा प्रशासन ठीक वैसा ही है जैसा मोदी के समय था.’

बतौर मुख्यमंत्री मोदी द्वारा बनाई गई योजनाओं को ही आनंदीबेन सरकार बीते छह महीने में लागू करती दिखाई देती रही. इसका एक कारण यह भी है कि मोदी गुजरात छोड़कर दिल्ली जाने के बाद भी सही अर्थों में गुजरात छोड़कर नहीं गए. प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारियों से बात करने पर पता चलता है कि मोदी भले ही गुजरात छोड़कर दिल्ली चले गए हैं, लेकिन वह गुजरात पर लगातार नजर रखे हुए हैं.’

मोदी की तुलना सीसीटीवी से करते हुए पटेल कहते हैं, ‘मोदी प्रदेश में सीसीटीवी कैमरे की तरह हैं, जो पूरे राज्य में हर जगह लगा हुआ है. हो सकता है वह काम न कर रहा हो, लेकिन उसके लगे होने मात्र से लोगों के भीतर यह डर हमेशा बना रहता है कि उनकी सारी हरकतें रिकॉर्ड हो रही हैं.’

बीते छह महीनों में प्रदेश के अधिकारियों की गतिविधियों की बात करें तो उनकी स्थिति यह है कि वरिष्ठ अधिकारी आज भी दिल्ली जाकर सीधे मोदी को रिपोर्ट करते हैं. प्रदेश के एक वरिष्ठ नौकरशाह कहते हैं, ‘सर (मोदी) को रिपोर्ट करने की बात नहीं है. आज वह पीएम हैं, लेकिन वे यहां 13 सालों तक सीएम थे, आनंदीबेन आज सीएम बनी हैं. ऐसे में सर से हम मार्गदर्शन लेते रहते हैं. सभी जानते हैं कि गुजरात उनके लिए एक राज्यभर नहीं है.’

‘आनंदीबेन भले ही सीएम बन गई हैं, लेकिन आज भी मोदी ही गुजरात चला रहे हैं. उनकी इच्छा के बिना यहां पत्ता तक नहीं हिलता.’

देवेंद्र कहते हैं, ‘मोदी किस कदर छाए हुए हैं और गुजरात कैसे उनकी प्राथमिकता में है, इसका पता इससे भी चलता है कि चीनी राष्ट्रपति जब भारत के दौरे पर आए तो उन्हें काफी धूम-धड़ाके के साथ गुजरात ले जाया गया. इसके अलावा अगला वाइब्रेंट गुजरात समिट पूरी तरह से मोदी की देखरेख में ही होने जा रहा है. पहले वह बतौर मुख्यमंत्री वाइब्रेंट गुजरात का आयोजन करते थे, इस बार वह बतौर प्रधानमंत्री इसका आयोजन करेंगे.’

मोदी का गुजरात में आज भी किस कदर राज है, इसका पता इससे भी चलता है कि मोदी की सहमति के बिना प्रदेश सरकार कोई भी निर्णय नहीं लेती. गुजरात में यह माननेवालों की कमी नहीं है कि प्रदेश सरकार ने पिछले छह महीनों में जो भी फैसले किए हैं, वे सभी मोदी की सहमति या उनके आदेश पर ही किए गए हैं.

मोदी गुजरात के कैसे अभी भी सुपर सीएम बने हुए हैं, तब भी दिखा जब प्रदेश सरकार ने मंत्रिमंडल के विस्तार का फैसला किया. अभी आनंदीबेन पटेल मंत्री बनाए जानेवाले लोगों की सूची को अंतिम रूप देकर मोदी और अमित शाह की सहमति के लिए दिल्ली भेजने ही वाली थीं कि दिल्ली से एक सूची उनके पास आ गई. गुजरात भाजपा के एक नेता उस घटना का जिक्र करते हुए कहते हैं, ‘आनंदीबेन के सूची भेजने से पहले ही दिल्ली से मोदी जी और अमित भाई ने ही नए मंत्रियों के नामों की सूची प्रदेश सरकार के पास भेज दी. वह सूची अंतिम थी. उस सूची में जिन लोगों के नाम थे, वे लोग मंत्री बन गए.’

प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला कहते हैं, ‘आनंदीबेन भले ही सीएम बन गई हैं, लेकिन आज भी मोदी ही गुजरात चला रहे हैं. उनकी इच्छा के बिना यहां पत्ता तक नहीं हिलता. कौन मंत्री बनेगा, कौन-सा प्रस्ताव पारित होगा, यह सब कुछ वही तय कर रहे हैं. आज भी वही अधिकारी प्रदेश चला रहे हैं जो उनके चहेते थे.’

आनंदीबेन को इस स्थिति का शायद पहले से ही आभास था. शायद यही कारण था कि उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने पहले भाषण में ही यह कह दिया था कि उन्हें प्रदेश के संचालन में कोई दिक्कत नहीं होनेेवाली, क्योंकि मोदी 2030 तक का ब्लूप्रिंट तैयार कर गए हैं.

तो क्या गुजरात में आनंदीबेन की स्थिति एक रबर स्टैम्प की हो गई है? देवेंद्र कहते हैं, ‘वह खुद मोदी भक्त हैं. ऐसा नहीं है कि वह मजबूरी में कुछ कर रही हैं. उन्हें कुछ भी अजीब नहीं लगता क्योंकि वह खुद मोदी के अनुसार ही सब कुछ करने में विश्वास रखती हैं.’

फिर क्या बदला गुजरात में?

क्या पिछले 6 महीनों में गुजरात में कुछ नहीं बदला है? देवेंद्र कहते हैं, ‘बदला है. मोदी के कार्यकाल में जिस तरह का खौफ अफसरों में रहा करता था, वह जरूर कम हुआ है.’

प्रदेश के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी नाम न छापने की  शर्त पर कहते हैं, ‘ऐसा नहीं है कि लोग काम में कोई कोताही बरत रहे हैं, लेकिन यह सही है, सर (मोदी) के जाने के बाद नौकरशाह थोड़ा रिलैक्स हुए हैं.’

विश्लेषक बताते हैं कि जब तक मोदी प्रदेश में थे, तब तक प्रशासन लगातार वार मोड में रहता था. कोई भी अधिकारी एक सेकेंड के लिए भी ढीला नहीं पड़ सकता था. मोदी की उपस्थिति ही कुछ ऐसी थी. लेकिन उनके जाने के बाद प्रशासन थोड़ा सहज हुआ है.

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देवेंद्र कहते हैं, ‘वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर कोई बदलाव नहीं है, लेकिन जैसे आप छोटे स्तर पर जाएंगे,  दूसरी और तीसरी श्रेणी के अधिकारियों के व्यवहार में अंतर जरूर महसूस कर लेंगे. उनके अंदर मोदी का खौफ जरूर कम हुआ है. यही कारण है कि राज्य में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद का हौसला थोड़ा मजबूत हुआ है.’

आनंदीबेन के छह महीनों के कार्यकाल का आकलन करते हुए वाघेला कहते हैं, ‘देखिए बदलाव यही है कि मोदी कुर्ता-पायजामा पहनते थे और आनंदीबेन साड़ी पहनती हैं. वह अलग तरह का मेकअप करते थे, यह अलग तरह का करती हैं. वह पुरुष थे, यह महिला हैं. चेहरे का अंतर है. पहले पुरुष की फोटो थी, उसकी जगह महिला की फोटो आ गई है. इसके अलावा मोदी और आनंदीबेन में कोई फर्क नहीं है.’

तो क्या मोदी और आनंदीबेन के व्यक्तित्व में वाघेला कोई फर्क नहीं देखते? वह कहते हैं, ‘दोनों के ईगो में जरूर अंतर है. मोदी के अंदर बहुत ईगो था, आनंदीबेन के अंदर थोड़ा कम है.’

वाघेला को भले ही दोनों के बीच केवल ईगो का अंतर दिख रहा हो, लेकिन देवेंद्र दोनों के बीच एक बड़े राजनीतिक अंतर की तरफ इशारा करते हैं. वह कहते हैं,  ‘बतौर मुख्यमंत्री मोदी मजबूत तो थे ही, इसके साथ ही वह आम लोगों में काफी लोकप्रिय भी थे. वह आम लोगों से खूब मिला करते थे, उनसे संवाद किया करते थे, लेकिन आनंदीबेन का स्वभाव मिलनसार नहीं है. वह जरूरत से ज्यादा सख्त हैं.’

वह कहते हैं, ‘स्थिति को आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि अगर मोदी गुजरात में कोई रैली करते हैं, तो बिना किसी प्रचार के लाखों लोग वहां उमड़ पड़ेंगे, लेकिन अगर आनंदीबेन रैली करती हैं, तो फिर भीड़ को वहां जुटाना पड़ेगा.’

हाल ही में विधानसभा उपचुनाव को लेकर आनंदीबेन ने लोक संवाद सेतु की शुरुआत की थी. स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता बताते हैं कि इस संवाद सेतु में भीड़ जुटाने के लिए उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी थी.

पिछले छह महीनों में गुजरात में एक सकारात्मक बदलाव की भी चर्चा है. कुछ विश्लेषक इस बात का उल्लेख भी करते हैं कि जहां मोदी के कार्यकाल में सिर्फ उद्योग और कल-कारखानों की ही चर्चा होती थी, वहीं आनंदीबेन के समय में सामाजिक विकास की चर्चा भी धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही है. पत्रकार सुधाकर कथेरिया कहते हैं, ‘आदिवासी, महिलाएं, बच्चे, कुपोषण, स्वास्थ्य जैसे विषय, जिन पर पहले चर्चा नहीं होती थी, उन पर आनंदीबेन ने काफी ध्यान दिया है. उन्होंने पिछले छह महीनों में महिला संबोधन का काम भी खूब किया है. शायद इस बदलाव का संबंध उनके महिला होने से भी है. नरेंद्र मोदी के समय ये सब विषय प्राथमिकता सूची से गायब थे.’

बदलाव की चर्चा एक और बात को लेकर भी है कि पहले जहां आम आदमी को गांधीनगर के सचिवालय में जाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी, अब वह वहां आसानी से जा सकता है.

पार्टी में आनंदीबेन की स्थिति

मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले यह बहस काफी तेज हो गई थी कि अगर वह पीएम बनते हैं तो फिर प्रदेश का सीएम कौन होगा? उस समय आनंदीबेन पटेल से लेकर नितिन पटेल, सौरभ पटेल, वजूभाई वाला, पुरुषोत्तम रुपाला जैसे तमाम नाम दौड़ में शामिल थे. इन सभी नामों में खास समानता यह थी कि ये सारे नरेंद्र मोदी के करीबी तो थे ही, काफी हद तक एकसमान अनुभव वाले भी थे. ऐसे में जब आनंदीबेन को मोदी ने अपने उत्तराधिकारी के तौर पर चुना, तो यह सोचना असहज नहीं था कि आनंदी को इन नेताओं से चुनौती का सामना करना पड़ सकता है. तो क्या आनंदीबेन को पिछले छह महीनों में इनसे किसी तरह की चुनौती मिली है?

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गुजरात भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘इनमें से कोई भी नेता किसी से कम प्रतिभाशाली नहीं था, लेकिन आनंदी बाजी मार ले गईं. जाहिर है, अगर आपको लगता है कि आप सामनेवाले पद के लिए पूरी तरह से योग्य हैं, लेकिन वह किसी और को मिल जाए तो आपको दिक्कत तो होगी ही. ऐसे में नेताओं के बीच आनंदीबेन को लेकर जलन की भावना तो है, लेकिन ये लोग कुछ कर नहीं सकते.’

ये लोग क्यों कुछ नहीं कर सकते, इसका जवाब देते हुए देवेंद्र कहते हैं, ‘सभी को पता है कि आनंदीबेन मोदी की पसंद हैं. उनके विरोध का मतलब है मोदी का विरोध. ऐसे में आनंदीबेन का विरोध करना तो दूर, ऐसा सोचने का साहस भी किसी के पास नहीं है.’

करना पड़ा है झटके का सामना

हालांकि पिछले छह महीनों में आनंदीबेन को एक राजनीतिक झटके का जरूर सामना करना पड़ा है. बीते लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रदेश की सभी 26 सीटों को अपनी झोली में डालने में सफल रही थी, लेकिन इस प्रचंड जीत के कुछ महीनों बाद विधानसभा की नौ और लोकसभा की एक सीट के लिए हुए उपचुनाव में पार्टी को झटका लगा. पार्टी नौ में से तीन विधानसभा सीटें कांग्रेस के हाथों हार गई, जो पहले उसके कब्जे में थी. मोदी के इस्तीफे के कारण खाली हुई वड़ोदरा लोकसभा सीट पर भी भाजपा के प्रत्याशी की जीत मोदी जैसी शानदार नहीं रही. सूत्र बताते हैं कि उपचुनावों में मिले इस झटके के कारण आनंदीबेन को मोदी से कुछ कड़े शब्द भी सुनने को मिले.

खैर कांग्रेस जहां भाजपा से 3 सीटें छीनने और मोदी के प्रदेश से जाने के बाद न केवल उम्मीदें पाल रही है, बल्कि अगले विधानसभा चुनाव में कुछ चमत्कार करने के ख्वाब भी बुन रही है. ऐसे में प्रदेश में इस बात की भी चर्चा गर्म है कि क्या आनंदीबेन प्रदेश में भाजपा की सरकार का सिलसिला मोदी जैसे ही बरकरार रख पाएंगी?

राजनीतिक विश्लेषक विमल पंड्या कहते हैं, ‘पिछले छह महीनों को आधार मानें तो तय लगता है कि भाजपा समय के साथ प्रदेश में कमजोर होती जाएगी. उपचुनावों के नतीजों से यही संकेत मिलता है.’ लेकिन विमल की इस बात से देवेंद्र सहमत नहीं दिखते. वह कहते हैं, ‘कडवा पटेल कुछ हद तक भाजपा से नाराज चल रहे थे, लेकिन पार्टी ने उन्हें मना लिया है. पार्टी सभी को साधने में कामयाब रही है. मुझे लगता है कि प्रदेश में कमजोर होने के बजाय भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग और मजबूत होगी.’

संघ और विहिप, मोदी के रहते काफी हद तक नियंत्रण में थे, लेकिन उनकी गतिविधियां पिछले छह महीनों में काफी तेजी से बढ़ी हैं

वाघेला को भी नहीं लगता कि मोदी के गुजरात से जाने के बाद प्रदेश में भाजपा कमजोर होगी. हालांकि इस बारे में उनका नजरिया कुछ अलग ही है. वह कहते हैं, ‘पहले भी भाजपा यहां मजबूत नहीं थी, लेकिन यह मार्केंटिग में दक्ष थी. मार्केंटिंग के दम पर ही भाजपा जीतती थी. ऐसे में मोदी भले ही प्रदेश से चले गए हैं, लेकिन जिस मार्केटिंग के दम पर भाजपा चुनाव जीतती आई है, वह मार्केटिंग कंपनी अभी भी यहीं है.’

वह कहते हैं, ‘आपके पास कोई तर्क नहीं है, लेकिन फिर भी आप सालों से कोलगेट का इस्तेमाल करते आ रहे हैं, मार्केंटिग के दम पर भाजपा की स्थिति भी गुजरात में ऐसी ही हो गई है.’

बढ़ रही हैं संघ की गतिविधियां

एक तरफ जहां गुजरात में सब कुछ अभी भी मोदीमय बने होने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी तरफ एक बड़े बदलाव के भी प्रमाण दिखाई दे रहे हैं. यह बदलाव प्रदेश में संघ और विहिप जैसे संगठनों की गतिविधियों में आया है.

जानकार बताते हैं कि मोदी ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में इनकी गतिविधियों पर एक अंकुश लगाए रखा था. विश्व हिंदू परिषद के प्रवीण तोगड़िया को, जो पूरे भारत में आग उगलते नजर आते थे, मोदी ने अपने प्रदेश में शांत करा दिया था. जानकार याद दिलाते हैं कि साल 2009 में विहिप और आरएसएस के कट्टर विरोध को दरकिनार करते हुए मोदी ने 200 से अधिक छोटे-बड़े मंदिरों को अतिक्रमण हटाने के लिए तुड़वा दिया था. मोदी के जमाने में यदि संघ के कार्यकर्ता राज्य में गोवध आदि को लेकर प्रदर्शन करते और वह जरा भी बेकाबू होता, तो पुलिस उन पर न सिर्फ लाठियां भांजती, बल्कि उन्हें जेल की हवा खिलाने भी ले जाती थी.

लेकिन अब ऐसा नहीं है. सामाजिक कार्यकर्ता रफीक पटेल कहते हैं, ‘जो भी कारण रहा हो, ये लोग मोदी के सीएम रहते काफी हद तक नियंत्रण में थे, लेकिन अब हालात बदल गए हैं. उनकी गतिविधियां पिछले छह महीनों में काफी बढ़ गई हैं. प्रदेश में आए दिन हो रही छोटी-बड़ी सांप्रदायिक घटनाएं इसका उदाहरण हैं.’

रफीक आगे कहते हैं, ‘बनारस में होनेवाली गंगा आरती की तर्ज पर गुजरात सरकार ने साबरमती नदी के किनारे आरती शुरू करा दी है. पहली आरती ईद के दिन खुद मुख्यमंत्री ने की थी.’

आनंदीबेन के कार्यकाल में संघ के बढ़ते रुतबे का पता दीनानाथ बत्रा की किताबों को गुजरात के सरकारी स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल कराए जाने से भी चलता है. बत्रा की ये किताबें विद्याभारती से संबद्ध स्कूलों में लंबे समय से पढ़ाई जा रही हैं. सरकार ने बत्रा की इन नौ किताबों के 42 हजार सेट प्रदेश के प्राइमरी और हाई स्कूलों में बंटवाने का निर्णय किया है. सरकार ने बत्रा से इन किताबों को एक मोटी रकम देकर खरीदा है. मूलतः हिंदी में लिखी गई इन किताबों का प्रदेश सरकार ने अपने खर्च से अंग्रेजी में अनुवाद भी कराया है.

प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर नजर रखने, वाले विशेषज्ञ बताते हैं कि पहले भी राज्य की शिक्षा व्यवस्था में संघ की भूमिका थी, लेकिन वह उच्च शिक्षा तक सीमित थी. वहां पर ये लोग अपने हिसाब से पाठ्यक्रम बनाने से लेकर कुलपतियों-शिक्षकों की नियुक्ति किया करते थे, लेकिन अब संघ के निशाने पर गुजरात के स्कूल हैं.

प्रदेश में कमर कस रहे आरएसएस का पता इससे भी चलता है कि आनंदीबेन के मुख्यमंत्री बनने के कुछ समय बाद ही जुलाई में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने प्रदेश के कई विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और कॉलेजों के प्रधानाचार्यों की प्रदेश के एक उद्योगपति के घर पर बैठक बुलाई थी. सूत्रों के मुताबिक उस बैठक में संघ प्रमुख ने उनसे अपने विश्वविद्यालय और कॉलेज में संघ की शाखा शुरू करने तथा संघ के लिए हर संस्थान में एक कार्यालय आवंटित करने की दिशा में तेजी से काम करने का मशविरा दिया. इसके साथ ही इस बैठक में उन्हें ऐसे नए पाठ्यक्रम डिजाइन करने की सलाह दी गई जिसके जरिए हिंदू संस्कृति की महानता के बारे में पूरे वैश्विक समुदाय को परिचित कराया जा सके. इसी बैठक में प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के साथ संवाद के लिए अलग-अलग प्रचारकों की टीम गठित करने पर भी चर्चा की गई.

संघ जनवरी 2015 में ही प्रदेश में बाल संसद का आयोजन कर रहा है. इस संसद में प्रदेश के 12 से 15 साल के बच्चे शामिल होंगे, जिन्हें संघ से जोड़ा जाएगा. बाल संसद के बारे में मीडिया से बातचीत में विश्व संवाद केंद्र के ट्रस्टी हरीश ठक्कर ने बताया, ‘इसके माध्यम से हम अपनी ताकत का प्रदर्शन करेंगे.’

देवेंद्र वीएचपी और आरएसएस में पिछले छह महीनों में आई सक्रियता की चर्चा करते हुए कहते हैं, ‘ये लोग मोदी के कार्यकाल में जितना दबाव महसूस करते थे, अब उतना नहीं करते.’ हालांकि ये संगठन इन बातों से सहमति नहीं जताते. गुजरात विश्व हिंदू परिषद के एक नेता कहते हैं, ‘यह कहना गलत है कि हमें कोई छूट मिल गई है. हम पहले भी समाज को जागरुक करने का काम कर रहे थे, अब भी कर रहे हैं.’

गाजियाबाद के गायब बच्चे

निशांत गोयल
निशांत गोयल

गाजियाबाद के विजयनगर में रहनेवाली रीना का नौ साल का बेटा मोहित सितंबर 2009 में अचानक ही घर से गायब हो गया. बेटे को तलाशने की सारी कोशिशें नाकाम होने की वजह से रीना मानसिक संतुलन खो बैठी और मोहित के पिता राजकिशोर ने खुद को शराब में डुबो दिया. यह केवल रीना और राजकिशोर की ही कहानी नहीं है. अपने बच्चों से दूर हो चुके सैकड़ों परिवारों में हर चेहरे पर सिर्फ मायूसी थी, लेकिन अब इनकी खुशियां लौट आई हैं. गाजियाबाद पुलिस ने ‘ऑपरेशन स्माइल’ को सार्थक बनाते हुए इन परिवारों की मुस्कुराहट वापस लौटा दी है.

लगातार बच्चों के गायब होने के मामलों से परेशान गाजियाबाद पुलिस ने इस साल 24 सितंबर से ऑपरेशन स्माइल की शुरुआत की थी. इस अभियान के तहत इसने ढाई महीने के भीतर 227 बच्चों को खोज निकाला है. 165 परिवारों की खुशियां लौट आई हैं और जिन बच्चों के परिवार नहीं मिल पाए हैं, उनको परिवारों से संपर्क होने तक अलग-अलग आश्रय स्थलों में रखा गया है.

घर लौटे इन बच्चों की कहानियों से खुलासा होता है कि देश में बच्चों को अवैध कामों में लगाकर पैसे कमानेवाले गिरोह का बड़ा जाल है. सितंबर 2009 में मोहित को पिता ने पढ़ाई न करने और फिल्म देखने की वजह से डांटा था, जिससे गुस्सा होकर मोहित ने घर छोड़ दिया और मुम्बई जाने का फैसला कर लिया. मोहित ने बताया, ‘पिता की डांट के बाद मैं घर से निकला और रेलवे स्टेशन जाकर ट्रेन में बैठ गया और जयपुर पहुंच गया. वहां मुझे सलमा नाम की एक आंटी मिली, जिसने मुझे खाना खिलाया और मेरा नाम बदलकर जावेद रख दिया.’ अगले दिन से उसने मोहित को स्टेशन पर भीख मांगने के काम में लगा दिया. जिस दिन भी वह 400 रुपये से कम मांगकर लाता, उस दिन उसे भूखा सोना पड़ता था और मार भी पड़ती थी. जावेद बनकर भीख मांगते हुए मोहित अपनी पहचान ही भूलने लगा था. लेकिन एक दिन जब उसने स्टेशन पर कुछ लोगों को गाजियाबाद के बारे में बात करते सुना, तो उसे लगा कि अब वह अपने घर वापस पहुंच सकता है.

वह 4 अक्टूबर का दिन था जब दो-तीन पुलिसवाले स्टेशन पर बात कर रहे थे. अगले दिन उसने देखा कि उनमें से ही एक पुलिसवाला सादी वर्दी में स्टेशन पर घूम रहा था. मोहित बताता है, ‘मैं दौड़कर उनके पास गया और बताया कि मैं भी गाजियाबाद का हूं. इसके बाद वह पुलिसवाले अंकल मुझे अपने साथ बड़ी मुश्किल से वापस लाए क्योंकि इतने सालों से मुझसे भीख मंगवा रही आंटी ने वहां पर हंगामा कर दिया.’

मोहित को वापस लाकर उसके मां-बाप से मिलवानेवाले सब इंस्पेक्टर माणिकचंद वर्मा ने बताया, ‘इस बच्चे की कहानी सुनने के बाद हम तय कर चुके थे कि किसी भी तरह उसे उसके घर पहुंचाना है. हम मोहित को जयपुर से लेकर गाजियाबाद आए और ईद के मुबारक दिन मोहित अपने परिवार के पास था.’

5 साल बाद बेटे को देखकर पहले तो उसके माता-पिता उसे पहचान ही नहीं पाए. उन्हें भरोसा ही नहीं हुआ कि उनके सामने उनका बेटा खड़ा है. पुलिस पर से भरोसा खो चुके राजकिशोर का कहना है कि उनके बेटे को सकुशल उनके पास पहुंचाकर पुलिस ने उनकी धारणा बदल दी है.

ऑपरेशन स्माइल के नोडल ऑफिसर डीएसपी कुमार रणविजय सिंह ने तहलका को बताया कि इस ऑपरेशन की भूमिका बाल मजदूरी के खिलाफ एक दिन के अभियान के बाद बनी. गाजियाबाद के एसएसपी धर्मेंद्र सिंह के नेतृत्व में 14 सितंबर को पुलिस ने 51 बच्चों को बाल मजदूरी से मुक्त करवाया था। सिंह बताते हैं, ‘इस अभियान के बाद हम लोगों ने ऑपरेशन स्माइल की रूपरेखा तैयार की. शुरुआत में हमने सोचा कि अगर हम जनपद से गुमशुदा हुए एक भी बच्चे को ढूंढ निकालते हैं तो हमारा अभियान सफल होगा.’

निशांत गोयल
निशांत गोयल

इस ऑपरेशन के लिए कुल 38 टीमों का गठन किया गया और प्रत्येक टीम की कमान एक सब इंस्पेक्टर को दी गई. हर टीम में पांच पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. ऑपरेशन में शामिल सभी पुलिसकर्मियों को बाल संरक्षण से संबंधित अधिनियमों एवं प्रक्रियाओं की पूरी जानकारी दी गई. शुरू में इस ऑपरेशन का मकसद केवल गाजियाबाद जिले से गुमशुदा बच्चों को तलाश कर वापस लाने का था, लेकिन अभियान के दौरान उनकी टीमों को देश के अलग-अलग हिस्सों के बच्चे मिले, जो अपने परिवारों से बिछुड़ चुके थे और अपने परिवारों के पास जाना चाहते थे. इसके बाद इन टीमों ने सभी बच्चों को गाजियाबाद लाने और उन्हें उनके परिवारों तक पहुंचाने के प्रयास शुरू किए.

धर्मेंद्र सिंह का कहना है कि इस ऑपरेशन को शुरू करना आसान नहीं था. रोजमर्रा के कामकाज से करीब 200 पुलिसकर्मियों को अलग करना कठिन था. इस ऑपरेशन के नाकाम होने का भी खतरा था, लेकिन जब उन्होंने बिछड़े बच्चों को अपनों से मिलते देखा तो लगा कि उनकी मेहनत सफल हुई है. वह कहते हैं, ‘कई स्थानों पर हमें बच्चों को वापस लाने में काफी विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन यह हमारी टीम की कामयाबी है कि हम इतने गुमशुदा बच्चों को उनके परिवारों तक पहुंचा पाए.’

इस ऑपरेशन के दौरान बरामद हुए 227 बच्चों में 201 लड़के और 26 लड़कियां हैं. इन बच्चों में से 190 बच्चे उत्तर प्रदेश के 60 जनपदों के हैं, जबकि 37 बच्चे दिल्ली, बिहार, हरियाणा सहित अन्य प्रदेशों के हैं. हैरत की बात यह है कि इनमें से सिर्फ 42 बच्चों की गुमशुदगी के मामले ही विभिन्न थानों में दर्ज हैं. इनमें से अधिकतर बच्चे निम्न मध्यम वर्ग या निम्न वर्ग के परिवारों से हैं. रणविजय सिंह ने तहलका को बताया कि इस अभियान के दौरान बरामद हुए बच्चों में से करीब 60 से 70 फीसदी बच्चों ने या तो माता-पिता की डांट से तंग आकर घर छोड़ा था या फिर खराब आर्थिक हालात के चलते घर से भागे थे.

रणविजय सिंह बताते हैं, ‘इनमें से भी अधिकांश बच्चों का कहना है कि वे पढ़ाई के दबाव को झेलने में नाकाम होकर यह कदम उठाने को बाध्य हुए. इसके अलावा कई परिवारों की खराब आर्थिक हालात ने भी बच्चों को घर छोड़ने को मजबूर किया.’

बच्चों का इस तरह घर छोड़ देना और आपराधिक गिरोहों का शिकार हो जाना केवल कानून व्यवस्था की ही नहीं बल्कि सामाजिक समस्या है. कई बार माता-पिता के बीच बढ़ती अनबन भी बच्चों को घर छोड़ देने को उकसाती है. इस ऑपरेशन के दौरान मुम्बई से बरामद हुई 15 वर्षीया शिवानी और उसके 11 वर्षीय भाई साहिल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. पिता से अलग रह रही मां की तलाश में ये दोनों आगरा पहुंचे और फिर वहां से जा पहुंचे मुम्बई.

शिवानी और साहिल के पिता संजीव वेद ने तहलका को बताया कि करीब एक साल पहले अनबन के चलते उनकी पत्नी आगरा जाने की बात कहकर घर से चली गई. मई के महीने में दोनों बच्चे मां की तलाश में घर से आगरा के लिए निकल पड़े और आगरा में उनके न मिलने पर मुम्बई पहुंच गए. मुम्बई पुलिस ने टीवी पर ऑपरेशन स्माइल की खबर देखकर गाजियाबाद पुलिस से संपर्क किया और उनके बच्चे उन्हें वापस मिले.

शिवानी ने बताया कि मां की तलाश में वह और साहिल आगरा से मुम्बई पहुंचे. वहां एक महिला उन्हें अपने घर ले गई, जहां से मोहल्लेवालों की सूचना पर पुलिस उन्हें अपने साथ ले गई और चाइल्ड होम में रखवा दिया. उन्हें कुछ दिन बाद गाजियाबाद पुलिस के पास भिजवाया गया जिसने उन्हें उनके पिता से वापस मिलवाया.

बच्चों की गुमशुदगी के मामले में कुछ और चौंकानेवाले तथ्य सामने आए हैं. इस ऑपरेशन के दौरान अधिकतर बच्चे विभिन्न पूजास्थलों या रेलवे स्टेशनों के आस-पास मिले हैं. इसके अलावा विभिन्न एनजीओ के आश्रय स्थलों से भी इन गुमशुदा बच्चों को बरामद किया गया है. इसका मतलब यह है कि अगर पुलिस सहित सभी संबंधित विभाग बच्चों की गुमशुदगी के मामले में मुस्तैदी दिखाएं तो अधिकांश बच्चों को इनके परिवारों तक पहुंचाया जा सकता है. लेकिन इस काम के आड़े आती है इन विभागों में इच्छाशक्ति की कमी और इनके बीच समन्वय का अभाव. केवल अलग-अलग राज्यों की पुलिस के बीच ही नहीं, बल्कि एक राज्य के अलग-अलग जिलों की पुलिस के बीच संवादहीनता भी इस मामले में नाकामी की वजह बनती है.

उत्तर प्रदेश के डीजीपी ने इस अभियान की सराहना करते हुए इसे पूरे प्रदेश में शुरू करने के आदेश दिए हैं. इसके अलावा दूसरे राज्यों की पुलिस भी इस ऑपरेशन की जानकारी और प्रशिक्षण लेने की पहल कर रही है. चंडीगढ़ पुलिस की एक टीम इस अभियान के विषय में जानकारी लेने गाजियाबाद आई. आजकल छत्तीसगढ़ पुलिस की कुछ टीमें गाजियाबाद आई हुई हैं और वे ऑपरेशन स्माइल की ट्रेनिंग ले रही हैं.

‘मेरी लड़ाई किसी मजहब या मर्द जाति से नहीं, एक व्यक्ति से है’

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तारा शाहदेव से 26 और 27 नवंबर को हुई दो मुलाकातें बहुत निराश और उदास माहौल में हुईं, 26 को शूटिंग रेंज में और 27 को अहले सुबह उनके घर पर. लेकिन तारा उम्मीद का दामन पकड़े हुए थीं, शूटिंग में अपने भविष्य की उम्मीदों का दामन. दो दिन में हुई दो मुलाकातों के दौरान बातों-बातों में वह रोना चाहती हैं लेकिन खुद को जज्ब किए रहती हैं. यह वही तारा हैं जो दो माह पहले राष्ट्रीय चेतना के केंद्र में थीं. उन्हें एक नए किस्म के कथित जेहाद का शिकार बताया जा रहा था- लव जेहाद. इसी नाम को केंद्र में रखकर झारखंड की राजधानी रांची के बड़ा तालाब इलाके के पास एक टूटे-फूटे मकान के बाहर ओबी वैनों की कतार कई दिनों तक लगी रही थी. दिल्ली-पटना-रांची से आए मीडियावालों का हुजूम लगा रहता था. भीड़ को चीरते हुए सायरन बजाती गाड़ियां भी दिन-भर आती-जाती रहती थीं तारा के घर. हर मिनट खबरिया चैनलों पर डरावने पार्श्वसंगीत के साथ खबरें एक-दूसरे से टकरा रही थीं- लव जेहाद की शिकार तारा.

इस दौरान तारा से दुनिया-जहान के वायदे भी किए गए. किसी ने कहा, 2016 तक निश्चिंत रहो, सारा खर्चा देंगे. राजनाथ सिंह ने कहा था कि बस दिल्ली जा रहा हूं, सीबीआई जांच शुरू हो जाएगी. लेकिन दो माह का समय गुजर चुका है, जांच होनी बाकी है. वह तारा अपनी राइफल के साथ तनहा पीछे छूट चुकी हैं. न तो उनके अकाउंट में 2016 तक निश्चिंत रहने के लिए पैसे हैं, न उनके और रंजीत कोहली उर्फ रकीबुल के बीच के विवाद की सीबीआई जांच शुरू हुई है और न ही कोर्ट में मामला आगे बढ़ रहा है.

तारा अपने भाई द्वैत के साथ 15 दिसंबर से पुणे में होने वाली नेशनल चैंपियनशिप की तैयारी में लगी हैं. हर सुबह उठकर अपने घर का काम निपटाती हैं, नौ बजे तक शूटिंग रेंज में पहुंचती हैं, दिन उधर ही गुजारती हैं, शाम सात बजे तक वापस घर आती हैं, फिर वकीलों के चक्कर लगाती हैं और अगली सुबह फिर वही दिनचर्या. तारा अपने घर से मोटरसाइकिल से निकलती हैं, तो छह पुलिसवाले भी पीछे-पीछे बाइक पर चलते हैं, जो उन्हें गार्ड के तौर पर मिले हैं.

तारा की कहानी सबको पता है. उन्होंने एक कथित कारोबारी रंजीत सिंह कोहली से जुलाई 2014 में शादी की थी. बकौल तारा, शादी के अगले दिन रंजीत सिंह कोहली और उसकी मां ने तारा को निकाह करने को कहा और बताया कि उसका इस्लामिक नाम रकीबुल है. तारा अचानक पेश आई इस चुनौती को स्वीकार नहीं कर सकीं. उन्होंने आनाकानी की. इस पर उनकी प्रताड़ना का दौर शुरू हो गया, उन्हें मारा-पीटा गया, दागा-जलाया गया. अगस्त महीने में वह उस घर से भागने में सफल रहीं और बाहर निकलकर उन्होंने मीडिया और पुलिस के सामने अपने साथ हुई घटना बयान की. तारा की बातों के बाद रंजीत के किस्सों की पड़ताल शुरू हुई. जो कही-सुनी बातें अब तक सामने आ रही हैं, उनके मुताबिक रंजीत कई तरह के गैर कानूनी धंधों में शामिल रहा है. अनजान स्रोतों से उसने अथाह पैसा कमाया है. फिलहाल रंजीत अपनी मां के साथ जेल में है. तारा का केस हाईकोर्ट में है.

सामने पड़ी पहाड़-सी जिंदगी को आगे बढ़ाने के लिए 22 साल की तारा एक बार फिर हिम्मत जुटाकर शूटिंग रेंज में हैं. पढ़ाई जारी रखने के लिए वह ग्रेजुएशन में एडमिशन ले चुकी हैं. भारी तनाव के बावजूद वह शूटिंग में अपना भविष्य तलाश रही हैं. अपनी ओर से बताने के बजाय सीधे तारा की ही जुबानी सुनते हैं उनकी कहानी
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अोझल: अचानक देश की चेतना में शामिल हुई तारा शाहदेव फिलहाल गुमनाम जिंदगी बसर कर रही हैं. फोटो: अमित
अोझल: अचानक देश की चेतना में शामिल हुई तारा शाहदेव फिलहाल गुमनाम जिंदगी बसर कर रही हैं. फोटो: अमित

दो माह पहले तक आप इतने किस्म के लोगों से दिन-रात घिरी रहती थीं, अब अकेली हैं.
पता नहीं कहां से इतने लोग इकट्ठा हो गए थे. संगठन वाले, मीडियावाले, राजनीतिवाले. लेकिन मैं जानती थी कि यह कुछ दिनों की ही बात है. फिर कोई नहीं आएगा.

यानी आपको पहले से इसका अहसास था.
हां, अहसास था. कुछ मीडियावालों ने बताया भी था कि तारा, ये सब कुछ दिनों तक ही रहेगा. मैं भी आग्रह करती थी मीडियावालों से कि बस उस आदमी को जेल भिजवा दो, जिसे अपनी ऊंची पहुंच और ताकत का भ्रम है.

बाहर से भी बहुत लोग आए थे उस दौरान और बहुत से वायदे कर गए थे. वे अब भी याद करते हैं?
हां, बहुत सारे लोग आए थे, अब उनमें से नूतन ठाकुर से अक्सर बात होती रहती है. वह कोर्ट का मामला जानती-समझती हैं. वह कहती हैं कि हाईकोर्ट का फैसला आने दो उसके बाद देखेंगे. हाईकोर्ट का फैसला आए, तब आगे की योजना बनाएंगे.

हाईकोर्ट में क्या चल रहा है?
वहां तो अभी सिर्फ तारीख पर तारीख आ रही है. एक-डेढ़ माह में दो तारीख पड़ती है. सुनवाई का टाइम आता है, तो टाइम खत्म हो गया रहता है.

आपको लगता है कि वहां भी टालमटोल हो रहा है?
पता नहीं ऐसा क्यों हो रहा है. देख ही रहे हैं कैसे-कैसे लोगों के नाम रंजीत कोहली से जुड़े हुए हैं. हाईकोर्ट के जजों के ही नाम हैं तो और क्या कहा जा सकता है. शायद फैसला लेने में भी हिचक हो रही हो. अब देखिए कि 20 नवंबर को सुनवाई का दिन था. मेरा केस नंबर 54 था, लेकिन कोर्ट की कार्यवाही 25 पर ही आकर रुक गई.

एक खबर यह भी आई थी कि तारा और रंजीत का मामला सिर्फ दहेज उत्पीड़न का मामला है.
कोर्ट से ऐसा कोई फैसला नहीं आया है. यह बात सिर्फ मीडिया में आई थी, पुलिस डायरी के आधार पर. पुलिस ने चार्जशीट में जो लिखा था, उसे मैंने भी पढ़ा. उसमें दहेज का कोई मामला था ही नहीं. हो भी नहीं सकता. कोई चाहकर बना भी नहीं सकता. मेरा मामला दहेज का है ही नहीं.

फिर यह बात आई कहां से?
पता नहीं कहां से आई. पत्रकारों ने बताया कि ऐसी रिपोर्ट आ रही है. उन्होंने सुनी-सुनाई बातों पर कह दिया, इसलिए अगले दिन से कुछ लिखा भी नहीं.

आपने विरोध दर्ज नहीं कराया कि ऐसी मनमर्जी क्यों कर रहे हैं पत्रकार?
नहीं, मैंने कुछ नहीं पूछा. अब मैं कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रही हूं. अभी तो मैं जिंदा हूं और मुझे कोर्ट से उम्मीद है.

‘मुझे ईद की सेवईं आज भी पसंद है. अगर वह खुद इस्लाम मानता और मुझे फोर्स नहीं करता तो भी मुझे कोई समस्या नहीं थी’

अभी तो जिंदा हूं मतलब, जान का खतरा भी है क्या आपको?
आप तो देख ही रहे हैं कि जिनसे मेरी लड़ाई है वे कौन लोग हैं. छह गार्ड की बटालियन मेरे आगे पीछे किसलिए खड़ी है. लेकिन मैं अब मौत से नहीं डरती. जितना बुरा हो चुका है मेरे साथ, उससे ज्यादा बुरा नहीं हो सकता कुछ.

सीबीआई जांच की भी बात थी, वह भी नहीं हुई. राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा था.
हां, लेकिन कह रहे हैं कि अगली सुनवाई तक तय हो जाएगा. राजनाथ सिंह ने भी कहा था कि हो जाएगा छह-सात दिनों में. केंद्रवाले कह रहे हैं कि राज्य ने भेजा नहीं. राज्यवाले कह रहे हैं कि भेज दिया गया है. दोनों के बीच क्या मामला लटका है, क्यों लटकाया गया है, क्या कहें.

आप को राजनीति में भी ले जाने की बात की जा रही थी, कई राजनीतिक दल पहुंचे भी थे आपके पास.
वह तो इलेक्शन का टाइम था तो बातें हुईं. कई लोगों ने कहा कि आपको भाजपा ने चुनाव से पहले खड़ा किया है कि बवाल मचाओ. कुछ लोग कह रहे थे कि क्या चुनाव के पहले भाजपा ने आपको सामने लाकर राजनीति की है. मेरी तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि मेरे साथ जिंदगी में बुरा हो रहा है और लोग कैसे-कैसे सवाल पूछ रहे हैं. वैसे मेरी तो उम्र ही अभी 22 है तो मैं चुनाव में कैसे जा सकती हूं.

इतने तनाव में शूटिंग की प्रैक्टिस कैसे कर रही हैं. शूटिंग के लिए तो बहुत एकाग्रचित होना पड़ता है.
मैं रोजाना सुबह नौ बजे शूटिंग रेंज में जाती हूं, घर का सारा काम करके. सात बजे शाम तक वहीं रहती हूं. उसके बाद वकील के पास जाती हूं. तनाव तो रहता है, लेकिन मैं सब भूलकर हिम्मत जुटा रही हूं. लेकिन जब घर से निकलती हूं तो पहले की तरह फ्री होकर नहीं निकलती. अब वैसी बात तो रही नहीं. अब तो शाम सात बजे से ज्यादा समय हुआ तो घर से फोन आने लगते हैं. भाई हमेशा रहता है मेरे साथ.

एकाग्रचित: बिखरी हुई जिंदगी को पटरी पर लाने की जद्दोजहद में तारा शाहदेव. फोटो: अमित
एकाग्रचित: बिखरी हुई जिंदगी को पटरी पर लाने की जद्दोजहद में तारा शाहदेव. फोटो: अमित

आपके साथ दो तरह का छल हुआ है. एक तो आपके पति ने ही आपको धोखा दिया, दूसरा आपके साथ मजहब को भी जोड़ दिया गया यानी लव जेहाद. दोनों के बारे में आप क्या राय रखती हैं?
सच कहूं तो मुझे किसी से भी नफरत नहीं है. उस इंसान ने बेवजह मजहब को बीच में घसीटा. मजहब का इससे क्या लेना-देना था. मुझे ईद की सेवईं आज भी पसंद है. अगर वह खुद इस्लाम मानता और मुझे फोर्स नहीं करता तो भी मुझे कोई समस्या नहीं थी. धर्म को मानना न मानना तो आप पर निर्भर करता है. मेरे साथ जब यह सब चल रहा था और इस्लाम और लव जेहाद की बातें आ रही थीं, तो मेरे पास कई मुसलमान दोस्त आए और कहने लगे कि दीदी अब तो आप बात नहीं करोगी हमसे. तब मैंने उनसे यही कहा कि मुझे किसी व्यक्ति ने दगा दिया है, प्रताड़ना दी है, इसका मजहब से क्या लेना-देना.

हिंदू संगठन वाले भी आए थे? उन्होंने धरना-प्रदर्शन भी किया था.
उस समय विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और पता नहीं क्या-क्या नाम होता है, सब कह रहे थे कि आप हिंदू हैं, इसलिए इस्लाम कबूल न करके अच्छा किया.

कुछ लोगों ने आप पर यह कहकर सवाल उठाया था कि खुद को हिंदू कह रही हैं और लव जेहाद का शिकार बता रही हैं, लेकिन अपनी मां के गुजरने के तुरंत बाद आपने शादी कर ली थी.
बहुत सामान्य बात थी. मां का देहांत अचानक हुआ था. पिताजी की भी तबीयत खराब थी. लड़कियों को समाज में बोझ माना जाता है. लड़का 40 साल तक कुंवारा रहे तो कोई बुरा नहीं मानता, लड़की ने 22 पार किया तो बोझ बनने लगती है. पिता भी गुजर जाते तो कौन होता मेरा मालिक. इसलिए मैंने शादी कर ली.

इस पूरे प्रकरण में सबसे बुरा क्या लगता है आज आपको.
सबसे बुरा यही लगा कि लड़कियों को बोझ समझकर जल्दी शादी करने का दबाव रहता है. परिवार ने अपनी तरफ से जांच-परख कर ही शादी की थी. यह मेरी बदकिस्मती थी कि मेरा जीवन बर्बाद हो गया. लड़कियों की शादी करने में जल्दबाजी क्यों? बेटी होने की सजा भुगतनी पड़ी मुझे.

सबक क्या रहा?
सबक यह रहा कि सपना आपने देखा है, तो खुद पूरा करना होगा. किसी पर सपने को पूरा करने का विश्वास नहीं करना है.

अब तक पता नहीं चला कि शादी का प्रस्ताव कैसे आया था?
रंजीत के यहां से प्रस्ताव आया था. मुश्ताक अहमद नाम के विजिलेंस ऑफिसर आते थे रेंज में. उन्होंने ही भाई से बात की कि रंजीत शादी करना चाहता है. फिर घर पर बात चली तो यह राय बनी कि कहीं न कहीं तो करनी ही है.

इतनी कम उम्र में शादी करते वक्त करियर का खयाल नहीं आया?
मुझे नेशनल चैंपियनशिप खेलकर शादी करनी थी, लेकिन रंजीत की मां ने दबाव बनाना शुरू किया कि बेटा पता नहीं कब मेरे साथ क्या हो जाए. इस तरह सात जुलाई 2014 को शादी हो गई.

यह पता नहीं चला पाया है कि रंजीत का धंधा क्या था?
मुझे या मेरे घरवालों को इतना ही पता था कि वह कौशल बायोटेक में सीएमडी है, लेकिन अब तो पता चल चुका है कि वह लड़कियों का सेक्स रैकेट चलाता था. उसके यहां मिनिस्टर आते थे, बड़े लोग आते थे. बोरे में भरकर नोट आते थे. 19 अगस्त को जब मैं वहां से निकली, तब तक पूरा नहीं समझ सकी थी कि उसके क्या-क्या धंधे हैं.

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आपकी मदद का आश्वासन दिया था.
उन्होंने कुछ नहीं किया, सिर्फ इतना ही कहा कि कोई परेशानी हो तो बताना.

अगर अब जीवनसाथी की तलाश करेंगी तो क्या ध्यान रखेंगी?
अब तो शादी का सवाल ही नहीं उठता. मैं अकेले जिंदगी गुजार लूंगी. मुझे बस शूटिंग करनी है. मुश्किलें बहुत हैं. दिल्ली में एक माह की ट्रेनिंग फीस ही 40 हजार रुपये है, रहने का खर्च अलग से. मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं, लेकिन मैं खुद के बूते शूटिंग में ही अपनी पहचान बनाऊंगी.

नक्सलवाद पर मतभेद

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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में स्थित सचिवालय में 19 नवंबर को आम दिनों के मुकाबले चहल-पहल कुछ बढ़ गई थी. माहौल में कुछ तनाव भी महसूस हो रहा था. पहले तो लोगों को यह समझ नहीं आया कि साहब लोगों का मूड उखड़ा हुआ क्यों है, लेकिन धीरे-धीरे कारण स्पष्ट होने लगा. गृह मंत्रालय के अफसरों के तनाव की वजह एक पत्र था, जो उसी दिन केंद्रीय गृह मंत्रालय से उन्हें मिला था. गृह मंत्रालय की तरफ से रमन सिंह सरकार को लिखे गए पत्र में राज्य सरकार की 8 साल पुरानी उस मांग को खारिज कर दिया गया था, जिसमें नक्सल मोर्चे के जवानों पर होनेवाले 2400 करोड़ रुपये के खर्च को केंद्र सरकार द्वारा वहन करने की मांग की गई थी.

दरअसल केंद्र में भाजपा की सरकार आने के बाद से नक्सल मोर्चे की रणनीति और खर्च को लेकर केंद्र और राज्य सरकार में खींचतान और बढ़ गई है. इसमें नया तो कुछ भी नहीं है, लेकिन अचरज भरा जरूर है क्योंकि फिलहाल राज्य और केंद्र दोनों में इस वक्त भाजपा की सरकार है. पहले यह माना जा रहा था कि केंद्र में भाजपा सरकार आ जाने से नक्सलवाद के मोर्चे पर राज्य और केंद्र का आपसी सामंजस्य थोड़ा बेहतर हो जाएगा. लेकिन हो इसके उलट रहा है. राज्य और केंद्र के बीच तनातनी इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अकेले छत्तीसगढ़ के लिए पुरानी नीतियों में बदलाव नहीं किया जा सकता. इतना ही नहीं केंद्र ने सख्त संदेश देने की मंशा से ही छत्तीसगढ़ की वह मांग ठुकरा दी है जिसमें राज्य सरकार चाहती थी कि नक्सल मोर्चे के जवानों पर होनेवाले 2400 करोड़ रुपये को केंद्र वहन करे. इससे पहले यूपीए सरकार भी छत्तीसगढ़ सरकार की यह मांग ठुकरा चुकी है.

जब छत्तीसगढ़ के नक्सल मोर्चों पर तैनात अर्धसैनिक बलों के खर्च पर केंद्र और राज्य सरकार के बीच धुंधलका छाया हुआ था उसी दौरान एक दिसंबर की दोपहर को सुकमा जिले के चिंतागुफा इलाके में माओवादियों ने घात लगाकर सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स के 14 जवानों की हत्या कर दी. इनमें दो अधिकारी भी शामिल हैं. यह इस साल का सबसे बड़ा नक्सली हमला है. ऐसे में नक्सलवाद के सफाए की नीतियों को लेकर भाजपा की ही केंद्र और राज्य सरकारों की आपसी टकराहट कई सवाल खड़े करती है.

छत्तीसगढ़ में तैनात सीआरपीएफ, आईटीबीपी, बीएसएफ के जवानों के खर्च की यह लड़ाई उस वक्त से चली आ रही है जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी. एक जुलाई 2007 को नई दिल्ली में मुख्यमंत्री रमन सिंह ने यूपीए के गृहमंत्री पी चिदंबरम और वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी से मिलकर राज्य सरकार की स्थिति इस मामले में स्पष्ट कर दी थी. लेकिन यूपीए सरकार छत्तीसगढ़ की मांग पर राजी नहीं हुई थी. मोदी सरकार के आने के बाद मुख्यमंत्री रमन सिंह को लगा कि अब उनकी बरसों पुरानी मांग पूरी होने का वक्त आ गया है और उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से चर्चाकर दोबारा प्रस्ताव भेज दिया. लेकिन छत्तीसगढ़ की दाल एनडीए सरकार में भी नहीं गली. हालांकि केंद्र के इस फैसले को राज्य शासन केवल एक प्रशासनिक निर्णय के तौर पर देख रहा है. मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव अमन सिंह का कहना है, ‘यह पुरानी प्रक्रिया है, जिस पर केंद्र सरकार का जवाब आया है.’

राज्य के अपर मुख्य सचिव गृह एनके असवाल का कहना है, ‘केंद्र से इस बारे में फिर आग्रह किया जाएगा.’ दूसरी ओर केंद्रीय गृह मंत्रालय के अफसर नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘ऐसा नहीं हो सकता कि केंद्र में सरकार बदल गई है तो नियम भी बदल जाएं. कोई भी बदलाव सामुहिक निर्णय के आधार पर सभी के लिए एक समान होगा.’ गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू ने लोकसभा में जानकारी देते हुए साफ कर दिया है कि केंद्र ने छत्तीसगढ़ को बकाए के भुगतान में छूट देने से मना कर दिया गया है.

दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ सरकार का कहना है कि नक्सल समस्या से निपटने की जिम्मेदारी अकेले राज्य सरकार की नहीं है. इसमें केंद्र सरकार की भी उतनी ही जिम्मेदारी बनती है. यहां गौर करने वाली बात यह है कि एंटी नक्सल ऑपरेशन ग्रीन हंट के लिए वर्ष 2007 से छत्तीसगढ़ में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की बड़े पैमाने पर तैनाती हुई थी. इसके बाद छत्तीसगढ़ सरकार पर खर्चे का दबाव बढ़ गया और राज्य सरकार ने इसका भुगतान करने में असमर्थता जताई. ध्यान देनेवाली बात यह भी है कि नक्सल प्रभावित नौ राज्यों में सीआरपीएफ की 90 बटालियन तैनात हैं. इनमें आधी से अधिक यानी 48 बटालियन अकेले छत्तीसगढ़ में तैनात हैं.

राज्य के एक आला अफसर की मानें तो मुख्यमंत्री रमन सिंह ने राजनाथ सिंह को यह समझाने की कोशिश की थी कि राज्य में नक्सलियों से लड़ने के लिए सीआरपीएफ की तैनाती का पूरा खर्च केंद्र सरकार को उठाना चाहिए, क्योंकि यह एक राष्ट्रीय जवाबदेही है न कि किसी राज्य विशेष से जुड़ी कानून और व्यवस्था की समस्या. रमन सिंह ने राजनाथ सिंह को विशेष दर्जेेवाले नॉर्थ-ईस्ट राज्यों, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश का हवाला देते हुए यह कहा था कि इन राज्यों को केंद्रीय बलों की तैनाती का महज 10 प्रतिशत की भुगतान करना होता है जबकि बाकी राज्यों को पूरी रकम का भुगतान करना होता है.

मुख्यमंत्री का एक तर्क यह भी था कि उनके राज्य यानी छत्तीसगढ़ का कुल बजट 54,000 करोड़ रुपये है और वह किसी भी हालत में केंद्रीय सशस्त्र बलों की तैनाती के बदले 2,400 करोड़ रुपये का भुगतान करने की हालत में नहीं हैं.

मुख्यमंत्री ने बस्तर में और अधिक केंद्रीय बलों की तैनाती की जरूरत बताते हुए केंद्र से 26 और बटालियन भेजे जाने की भी मांग की. केंद्र सरकार ने राज्य को स्पष्ट कर दिया है कि अतिरिक्त केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती 2016 के पहले संभव नहीं है और उस हालत में भी इसका पूरा खर्चा राज्य सरकार को ही उठाना होगा.

नक्सलवाद के सफाए में लग रही भारी भरकम राशि का मसला सुलझा भी नहीं था कि 1978 बैच के आईपीएस अफसर दिलीप त्रिवेदी ने सेवानिवृत्त होते वक्त राज्य सरकारों की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए. 15 महीनों तक सीआरपीएफ के मुखिया रहे दिलीप त्रिवेदी के शब्दों में, ‘राज्य सरकारें नक्सलवाद रोकने को लेकर गंभीर नहीं है, बल्कि वे तो चाहती हैं कि नक्सलवाद बना रहे, ताकि वे इसके नाम से केंद्रीय सहायता के रूप में मोटी रकम वसूलते रहें.’ त्रिवेदी ने इस बात पर चिंता प्रकट की कि नक्सलियों को हथियारों की आपूर्ति रोकने में भी राज्य सरकारें गंभीर नहीं हैं. इतने वरिष्ठ अधिकारी ने अपनी यह राय अपने अनुभव के आधार पर ही बनाई होगी. त्रिवेदी ने यह भी कहा कि नक्सल प्रभावित राज्यों में नेतृत्व के स्तर पर इसे लेकर कोई बेचैनी नहीं दिखाई देती. इसकी वजह शायद यह है कि इसमें उनका कुछ भी दांव पर नहीं लगा है.

गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि छत्तीसगढ़ सरकार लंबे समय से सीआरपीएफ की तैनाती का खर्च माफ करने की गुहार लगा रही है. जब पी. चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे गृहमंत्री थे उस समय भी राज्य सरकार की ओर से कई बार पत्र लिखा गया था. लेकिन संप्रग सरकार ने ऐसा करने से मना कर दिया था. केंद्र में राजग सरकार आने के बाद रमन सिंह की उम्मीदें फिर से जगी और उन्होंने पिछले महीने खर्चे को माफ करने का औपचारिक अनुरोध किया.

मुख्यमंत्री रमन सिंह को दिल्ली में अपनी ही पार्टी की सरकार से काफी उम्मीदें थीं. खासकर उन मांगों के लिए जिसे यूपीए सरकार लंबे समय से नजरअंदाज करती रही थीं, लेकिन रमन सिंह को एनडीए सरकार से भी निराशा ही हाथ लगी है. राज्य में नक्सलियों से लड़ने के लिए सीआरपीएफ और अन्य केंद्रीय सशस्त्र बलों को तैनात किए जाने के मद में राज्य सरकार को केंद्र को इस रकम का भुगतान करना है. छत्तीसगढ़ सरकार ने 2007 के बाद से इस मद में केंद्र सरकार को कोई भुगतान नहीं किया है.

‘राज्य सरकारें नक्सलवाद रोकने को लेकर गंभीर नहीं हैं, वे चाहती हैं कि नक्सलवाद बना रहे और वे केंद्रीय सहायता के रूप में मोटी रकम वसूलते रहें’

यह अकेला मुद्दा नहीं है, जिसमें राज्य और केंद्र की खींचतान नजर आ रही है. नक्सलवाद के प्रति रवैये को लेकर भी दोनों में मतभेद हैं. छत्तीसगढ़ सरकार पर नक्सल मोर्चे पर लचीला रुख (सलवा जुडूम की बात छोड़ दें तो) अख्तियार करने का आरोप लगता रहा है. कुछ मायनों में यह सही भी है, क्योंकि गाहे-बगाहे मुख्यमंत्री रमन सिंह और उनके गृहमंत्री (जो पिछले तेरह सालों से बदलते रहे हैं) नक्सलियों से वार्ता का राग अलापते रहे हैं. वहीं नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के पहले ही अपने चुनाव कैम्पेन में नक्सलियों को ललकारना शुरु कर दिया था. केंद्र की नई सरकार बनते ही नक्सलवाद को नाम बदलकर वामपंथी उग्रवाद करने की प्रक्रिया शुरु कर दी थी. नए नाम को सुनकर ही यह बात साफ हो गई थी कि केंद्र का रवैया नक्सलियों के प्रति नरम या उदार नहीं रहनेवाला है. इसकी एक झलक तब दिखी जब केंद्र ने हस्तक्षेप करते हुए बस्तर के सात पुलिस कप्तानों को न केवल बदलवा दिया, बल्कि एसआरपी कल्लूरी को बस्तर का आईजी बनाकर नक्सलवाद के सफाए की कमान उन्हें सौंप दी. कल्लूरी को सरगुजा से नक्सलवाद का सफाया करने के लिए भी जाना जाता है. (ताड़मेटला में आदिवासियों के घर जलाने का आरोप भी कल्लूरी पर लग चुका है). उसके बाद से राज्य सरकार ने कल्लूरी को किनारे कर रखा था. कल्लूरी आईजी स्तर के ऐसे पहले अफसर हैं, जो आजकल सीधे केंद्रीय गृहमंत्रालय और गृहमंत्री राजनाथ सिंह को रिपोर्ट कर रहे हैं. इसका एक परिणाम यह हुआ कि पहली बार छत्तीसगढ़ में कथित रूप से नक्सलियों के आत्मसमर्पण और गिरफ्तारियों की खबरें आनी शुरू हो गई हैं. हालांकि इस पर कई सवाल भी उठाए जा रहे हैं. पिछले एक ही महीने की बात करें तो बस्तर में 63 नक्सलियों ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया है. इस वक्त छत्तीसगढ़ में करीब 40 माओवादी गुट सक्रिय हैं. जिनमें करीब 50 हजार सशस्त्र माओवादी शामिल हैं. इनमें एक तिहाई संख्या महिला नक्सलियों की है. इनके पास अत्याधुनिक हथियार तो हैं ही, साथ ही इन्हें गुरिल्ला वॉर से लेकर हेलीकॉप्टर तक को निशाना बनाने की जबर्दस्त ट्रेनिंग मिली है.

राज्य सरकार का पुलिस महकमा अपने पुराने वाहनों और पुराने हथियारों के साथ ही माओवादियों से दो-दो हाथ करने को मजबूर है. हमेशा से ही छत्तीसगढ़ सरकार अपने एंटी नक्सल ऑपरेशन के लिए सीआरपीएफ पर निर्भर रही है, लेकिन उसका खर्च उठाने में असमर्थता जाहिर करती रही है. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि यदि सुरक्षा बलों के खर्च के मुद्दे पर केंद्र ने अपना सख्त रवैया बरकरार रखा तो इसका नक्सली किस तरह से फायदा उठाएंगे या राज्य सरकार क्या इस बहाने अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेगी कि उसके पास धन की कमी है, तो एंटी नक्सल ऑपरेशन कैसे चलाए? केंद्र और राज्य के बीच एक ही पार्टी की सरकार होने के बावजूद इस तरह का टकराव अचरज पैदा करता है.

हम फिदा-ए-लखनऊ

‘किसी शहर का चरित्र खोजना है तो उसके जन में बसे किस्से-कहानियों में खोजा जाए.’ लखनऊ के संदर्भ में कही गई अमृतलाल नागर की ये पंक्ति इस शहर के मूल चरित्र की पहचान करने में बेहद सहायक है. खुद नागर जी का सम्पूर्ण साहित्य लखनऊ के ऐसे ही बेशुमार किस्से-कहानियां अपने अंतस में समेटे हुए है. अगर उन्हीं की राह चलते हुए लखनऊ को तलाशा जाए तो हम ऐसी कई कहानियों से मदद पा सकते हैं जो कि लखनवी समाज में पीढ़ियों से रची-बसी हैं. जैसे कि इस शहर में कोई नवाब हुआ करते थे जिन्होंने अंग्रेजों को गिरफ्तारी दे दी, लेकिन भागे नहीं, इसलिए क्योंकि उन्हें कोई जूता पहनाने वाला नहीं था और खुद जूता पहनना उनकी शान के खिलाफ था. हालांकि ऐतिहासिक रूप से गलत होने के बावजूद ये किस्सा लखनऊ के समाज में गहरे बसे स्वाभिमान और किसी हद तक सामंती प्रवृत्ति को रेखांकित तो करता ही है.

वैसे किस्से-कहानियां सिर्फ नवाबी के दायरे में ही नहीं सीमित, इसके बाहर भी बेशुमार हैं. महज कुछ दशक पहले तक नक्खास में वजीरू मियां का चाय का होटल हुआ करता था. जहां शेरो-अदब की महफिलें सजा करती थीं. होटल के अपने तय ग्राहक थे. अगर कोई नया ग्राहक पहुंच गया और चाय के लिए अधीर हुआ तो वजीरू मियां विशिष्ट लखनवी अंदाज़ में उससे कह देते- देखिए जनाब ! सब्र कीजिए, या फिर नक्खास में और भी दुकानें हैं. आपके पास तो पैसे हैं, आपको कोई भी चाय पिला देगा, इन हज़रात को चाय कौन पूछेगा, ये सब हमारे बाकीदार हैं. बाकीदारों को लेकर भी शिष्टाचार का ये आलम और कहां होगा.

इतिहास शहर के शानदार अतीत का एक गवाह छोटा इमामबाड़ा
इतिहास शहर के शानदार अतीत का एक गवाह छोटा इमामबाड़ा

इसी सिलसिले का एक आखिरी किस्सा कुछ यूं है कि एक साहब बम्बई से लखनऊ घूमने आए. जूतियां खरीदने की गरज से वे नज़ीराबाद जा पहुंचे. किसी दुकान पर एक जोड़ी पसंद आई. लेकिन दुकान की हालत देखकर और खुद से मुखातिब नौकर के हालात देखकर उन्हें लगा कि जूतियों की पैकिंग शायद वहां ठीक तरह से न हो पाए. लिहाजा उन्होंने नौकर से कहा- सुनो, इसको बराबर से पैक करना. इस पर दुकान के मुलाज़िम ने कहा- शहज़ादे, आप इतने बेचैन न होइए. अभी तो बेटी बाप के घर है, जब आप तक बेसलीका पहुंचे तब गिला कीजिएगा. ये है लखनवी अंदाज़, जो कि पढ़े-लिखों से लेकर अनपढ़ों तक और अमीरों से लेकर गरीबों तक एक सा फैला है. इस तरह के तमाम किस्से लखनऊ में बिखरे पड़े हैं, जो आपको बता देंगें, कि लखनऊ क्या है.

दरअसल लखनऊ अपने आप में वो अफसाना है कि जितना सुनते जाइए उतना ही दिलचस्प होता जाता है. जो भी इसका बयान सुनाता है, एक नई दास्तान सुनाता है. एक शहर, जिसका खयाल आते ही जहन में तहज़ीब की शमाएं रोशन हो उठती हैं. जिसका जिक्र छिड़ते ही दिल की गलियां गुलशन हो उठती हैं. जिसका नाम लेकर आशिक अहदे वफा करते हैं, सुखन-नवाज़ जिसके होने का शुक्र अदा करते हैं. क्या इतनी खूबियों से भरपूर मकाम सिर्फ एक अदद शहर हो सकता है ?

दरअसल लखनऊ वो तिलिस्म है जिसमें कैद हुआ शख्स कभी आज़ाद नहीं होना चाहता. जो दुर्भाग्य के कारण यहां से निकल भी जाते हैं वो अपनी आंखों में लखनऊ के मंजर लिए भटकते हैं और इसकी यादों को अपने कलेजे से हरदम लगाए रहते हैं. वाजिद अली शाह के हवाले से इतिहास गवाह रहा है कि ऐसे दीवाने जहां भी जाते हैं एक नया लखनऊ बसा देते हैं. लखनऊ वाले कहीं भी रहें लखनवी आदाब कभी नहीं भुलाते. पुरखों से विरासत में मिले तहज़ीब के लबालब खजाने को कैसे दोगुना-चौगुना करना है, ये उन्हें खूब आता है. अपने अंदाज़-ए-बयां से वे दुश्मन को भी अपना दीवाना बना सकते हैं. जीवन में कितनी भी कड़वाहट क्यों न हो लखनऊ वालों की जुबान पर इसका असर कभी नहीं दिखेगा. लखनऊ वाले जानते हैं कि बीमार से ये पूछना कि क्या आपके दुश्मनों की तबीयत नासाज है, ये सिर्फ एक जुमला नहीं है, बीमारी की रामबाण दवा है. हिंदुस्तान ने अपनी साम्प्रदायिक एकता की जान इस शहर में समोई हुई है. फिरकापरस्ती आज भी इस शहर में आते हुए शर्माती है. नज़ाकत लखनऊ की पहचान है. हिंदुस्तान का ऐसा कौन-सा दूसरा शहर है, जहां ककड़ी को ककड़ी कहने से महज इसलिए गुरेज किया जाता हो क्योंकि ककड़ी शब्द कानों को कुछ कर्कश लगता है या फिर शरीफे को शरीफा कहकर इनके दाम कभी पूछे-बताए न गए हों क्योंकि इसमें शरीफ लोगों की रुसवाई होती है, अगर ये पूछा जाए कि शरीफों के क्या दाम हैं ?

इस बे-मिसाल बा-कमाल शहर की लोक मान्यताएं हमें बताती हैं कि कभी ये भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण का शहर हुआ करता था. नाम था लक्ष्मणपुर, जो बाद में घिसते-घिसते लखनऊ हो गया. इतिहास हमें बताता है कि इस शहर ने अपनी आंखों से यहां कई-कई हुकूमतों को आते और जाते देखा है. लेकिन ये भी सच है कि लखनऊ के इतिहास का सबसे लोकप्रिय हिस्सा नवाबी और उसके बाद के कालखण्ड में लिखा गया है. खासकर सन 1775 से. जब आसिफुद्दौला अवध के नवाब बने और लखनऊ अवध सूबे की राजधानी बना. आसिफुद्दौला के जमाने से लखनऊ में नवाबी के जो जलवे शुरू हुए वो आखिरी नवाब वाजिद अली शाह के दौर तक कायम रहे. इसी दौर में लखनवी तहज़ीब की धूम पूरी दुनिया में फैली और लखनऊ कला, साहित्य एवं संस्कृति के गढ़ के तौर पर पहचाना जाने लगा. जब अंग्रेज़ों ने 1856 में वाजिद अली शाह को अपदस्थ करके कलकत्ता के पास मटियाबुर्ज़ में कैद कर दिया तो लखनऊ में नवाबी का अध्याय समाप्त हो गया. इसके अगले ही साल 1857 में लखनऊ बेगम हज़रत महल के नेतृत्व में भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम का और उसके बाद अंग्रेज़ों के भीषण दमन का साक्षी भी बना. 1857 के मुक्ति संग्राम से लेकर 1947 में देश को आज़ादी मिलने तक लखनऊ आज़ादी की लड़ाई का एक प्रमुख केंद्र बना रहा. 1916 और 1936 के अति महत्वपूर्ण कांग्रेस अधिवेशन यहीं हुए. खिलाफत आंदोलन का गढ़ लखनऊ ही था. गांधी और नेहरू एक-दूसरे से पहली बार लखनऊ में ही मिले और प्रगतिशील लेखक संघ की पहली कांफ्रेंस भी लखनऊ में ही हुई. कुल मिलाकर लखनऊ का इतिहास इतना समृद्ध है कि अक्सर कुछ लोग कहते हैं कि लखनऊ जो भी था अपने अतीत में था और वो लखनऊ अब गए दिनों का किस्सा हो गया. लेकिन ऐसा वही कहते हैं जिन्होंने लखनऊ को सिर्फ इतिहास की किताबों में पढ़ा है. आज के लखनऊ को नहीं देखा.

इस बे-मिसाल शहर की लोक-मान्यताएं हमें बताती हैं कि कभी ये भगवान राम के भाई लक्ष्मण का शहर लक्ष्मणपुर था, जो बाद में घिसते-घिसते लखनऊ हो गया

सच तो ये है कि समय के साथ ये शहर अपने क्षेत्रफल को चाहे जितना बड़ा कर ले इसका सांस्कृतिक गुरुत्व-केंद्र अटल रहता है. इतना बड़ा दिल दुनिया के बहुत कम शहरों के पास होता है कि हर आने वाले को अपना बना ले और खुद को उसका बना दे. असल में लखनऊ को नए लखनऊ और पुराने लखनऊ के खांचों में बांटने वाले भी वही हैं, जो इस शहर के संस्कारों से अछूते रह गए हैं. लखनऊ सिर्फ एक है और वो कभी नया या पुराना नहीं हो सकता, क्योंकि लखनऊ एक शहर का नहीं बल्कि एक संस्कृति का नाम है. इसीलिए चाहे पुराना कॉफी हाउस हो या नव-निर्मित ज़ायका, जनपथ हो या मरीन ड्राइव, दोनों ही जगह आपको एक ही सूरज से रोशन मिलेगी जिसका नाम लखनऊ है. लखनऊ वाले तो लखनऊ की मिट्टी के हर ज़र्रे को अपनी ज़िंदगी का आफताब समझते हैं. इसीलिए चौक की गलियों में चहल कदमी करते हुए उन्हें गेसु-ए-जानां के खम सुलझाने जैसा लुत्फ आता है, तो गोमती नगर की चौड़ी-चौड़ी सड़कों पर भी वे उसी तरह आवारगी करते हैं जैसे बाद-ए-सबा किसी चमन से होकर गुजरती है.

वास्तव में लखनऊ अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दिल से लगाए हुए अपने समय से कदम मिला रहा है. जिस तरह हर दिन व्यक्ति के कपड़े बदलने मात्र से उसकी आत्मा में कोई परिवर्तन नहीं होता, उसी तरह समय के अनुसार इस शहर में हुए तमाम बाहरी परिवर्तनों के बाद भी लखनऊ की रूह और उसके किरदार में जरा भी तब्दीली नहीं हुई है. लखनऊ अगर बदला भी है तो बेहतरी के लिए बदला है. आज यहां दस से ज्यादा विश्वविद्यालय हैं, तीस से ज्यादा इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट हैं, आधा दर्ज़न से ज्यादा केंद्रीय शोध संस्थान हैं, बहुत से अत्याधुनिक अस्पताल हैं, ढेर सारे बेहतरीन डिग्री कॉलेज हैं और कई उम्दा स्कूल हैं. निजी कंपनियों की शहर में आमद से यहां रोज़गार के अवसर भी बढ़े हैं.

इसी तरह से सुंदर सांस्कृतिक केंद्रों, व्यवस्थित प्रेक्षागृहों, चमचमाते बाज़ारों, मल्टीप्लेक्स, शॉपिंग मॉल, डिस्कोथेक-बार और एम्यूजमेंट सेंटर, क्लबों और खूबसूरत पार्कों की भी कमी नहीं है. दिलचस्प बात ये भी है कि चौक जैसे रिवायती इलाके में भी पांच से ज्यादा पूल और बिलियर्ड्स प्वाइंट हैं जो कि खचाखच भरे रहते हैं.

पढ़ने-लिखने के शौकीन इस शहर में पुस्तकालय पहले भी थे, लेकिन दिल्ली मुंबई की तर्ज पर अब लखनऊ में भी 300 स्टोरीज डॉट कॉम जैसे बेहतरीन ऑनलाइन पुस्तकालय हैं जो न सिर्फ घर बैठे आपको आपकी मनपसंद किताबें पहुंचा रहे हैं बल्कि आपके बच्चों में पठन-पाठन की आदतें विकसित करने के लिए भी काम कर रहे हैं. आज शहर से कई सारी प्रतिष्ठित पत्रिकाएं और लगभग सारे बड़े अखबार निकल रहे हैं. शहर अभी भी हिंदी-उर्दू के बड़े नामों का गढ़ है. साथ ही यहां युवाओं के द्वारा रोज नए बुक क्लब और लिटरेरी सोसाइटी शुरू हो रहीं हैं. रेजीडेंसी जैसी ऐतिहासिक जगह पर भी सुबह-सुबह युवाओं द्वारा ‘बेवजह मॉर्निंग’ जैसा ताजगी भरा आयोजन किया जा रहा है. यहां एक नहीं बल्कि दो-दो भव्य लिटरेचर फेस्टिवल होते हैं जिनमें देश-दुनिया के बड़े साहित्यकार लखनऊ शिरकत करते हैं. इस तरह से नए दौर के लखनऊ में आज वो सब कुछ है जो यहां पहले कभी नहीं था.

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अच्छी बात ये है कि नए दौर में होने के बावजूद गुजिश्ता दौर से भी इसने अपनी नातेदारी निभाए रखी है. संक्रमण काल से गुजर रहे किसी भी समाज के लिए ये बहुत कठिन काम होता है. लेकिन असल में लखनऊ को लखनऊ उसकी समन्वय की असीम क्षमता ही बनाती है. ये इसी शहर में हो सकता है कि एक ही वक्त में एक ही तरह के लोगों के द्वारा टुंडे के कबाब और बाजपेयी पूड़ी भंडार की पूड़ियां भी लंबी लाइन में लगकर खरीदीं जाएं और सहारा गंज के फूड कोर्ट में पास्ता या सिज़लर खरीदने के लिए भी गदर मचा रहे. मीर-ओ-गालिब पर भी गाहे-गाहे तब्सरा होता रहे और अमीश त्रिपाठी की भी पुरसिश होती रहे. वे बेगम अख्तर के मुरीद भी रहें और शकीरा के दीवाने भी. हज़रतगंज में ‘गंजिंग’ करने के भी शौकीन हों, तो नक्खास में इतवारी बाजार में भी तफरीह करते मिलें. चौक वाले चिकन के कुरते भी उन पर उतने ही फबते हों जितने प्रोवोग से लिए पश्चिमी परिधान. जहां गोमतीनगर, जानकीपुरम, एल्डिको और आशियाना में भी उतनी ही लखनवियत हो जितनी कश्मीरी मोहल्ले, शीश महल, राजा बाजार या सआदतगंज में मिलती है.

लखनवी तहज़ीब पर अक्सर ही अभिजात्य और जनविरोधी होने का आरोप लगता है, क्योंकि नफासत की आड़ में वह अवधी लोक संस्कृति से मुंह फेर लेती है

इन जैसी तमाम खुशगवार मिसालों के बावजूद अगर हमें वास्तव में लखनऊ के समन्वयकारी चरित्र को सलीके से समझना है तो यहां के सामाजिक ताने-बाने में गुंथी मिसालों को मद्दे नजर रखना चाहिए. जैसे अगर यहां झाऊ लाल का बनवाया इमामबाड़ा है, तो जनाबे आलिया का बनवाया हनुमान मंदिर भी है. पड़ाइन की बनवाई मस्जिद है, तो आसफुद्दौला का अता किया कल्याण गिरि मंदिर भी है. ये वो शहर है जहां मुसलमान बड़े मंगल पर हलवा-पूड़ी बटवाते हैं, जमघट पर पतंग उड़ाते हैं, होली में रंग खेलते हैं, कृष्ण जी की बारात में शामिल होते हैं, तो हिंदू मुहर्रम में अजादारी करते हैं, सबीले लगवातें हैं और रमज़ान में सहरी के लिए जगाते हैं, बल्कि इफ्तारी का इंतज़ाम भी करते हैं. ये रिवायतें तब से पूरी आबो ताब के साथ कायम हैं जबसे राजा झाऊलाल कर्बला की ज़ियारत के लिए इराक जाया करते थे और वाजिद अली शाह जोगिया चोले में कन्हैया बना करते थे. इसीलिए यहां अब तक हमको लोगों की जुबान पर वाजिद अली शाह की लिखी गई गणेश हनुमान स्तुतियां भी मिल जाती हैं और नानक चंद नानक के लिखे मर्सिए भी.

लखनऊ की एक मकबूलियत इसके दस्तरखान की वजह से भी है. शाकाहार के शौकीनों के लिए यहां पूड़ी-सब्जी, खस्ता-कचौड़ी, छोले-भटूरे, चाट, पानी के बताशे और बंद-मक्खन जैसे बेशुमार नज़राने हैं तो नॉनवेज का तो गढ़ ही लखनऊ है. दर्जनों तरह के कबाब लखनऊ से मंसूब हैं, साथ ही सैकड़ों तरह के और पकवान भी. टुण्डे कबाबी, रहीम की नहारी, नौशीजान और इदरीस की बिरयानी जैसी जगहें खाने-पीने के शौकीनों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं. यहां एक बात बता देना जरूरी है कि एक मुद्दत तक लखनऊ में बिरयानी को जानवरों की गिज़ा कहा जाता रहा. और पुलाव को उस पर तरजीह दी जाती रही, लेकिन आज दमपुख्त लखनवी बिरयानी भी यहां खूब खाई जाती है. अब्दुल हलीम शरर ने अपनी किताब गुजिश्ता लखनऊ में दोनों के बारीक अंतर को इस तरह समझाया है- ‘देहली में बिरयानी का खास रिवाज है. मगर लखनऊ की नफासत ने पुलाव को उस पर तरजीह दी. आवाम की नज़र में दोनों करीब-करीब एक ही हैं, मगर बिरयानी में मसाले की ज्यादती से सालन मिले हुए चावलों की शान पैदा हो जाती है, पुलाव के मुकाबिल बिरयानी नफासत पसंद लोगों की नज़र में बहुत ही लद्धड़ और बदनुमा गिज़ा है.’

लखनऊ की इन खूबियों के बावजूद अगर किसी बयान में सिर्फ खूबियां ही बताई जाएं तो ये बयान अधूरा ही कहा जाएगा. ये भी सच है कि अपनी तमाम खूबियों के बावजूद इस शहर के स्वभाव में कई ऐसी बातें हैं जिन्हें किसी भी नज़र से तहज़ीब के दायरे में नहीं रखा जा सकता. यहां हिंदू-मुस्लिम दंगे नहीं होते लेकिन बहरहाल दंगे तो हर साल होते ही हैं. यूं तो ये शहर ‘पहले आप’ के लिए मशहूर है लेकिन ये भी सच है कि बाहर वालों से मिलते समय लखनऊ वाले अपने शहर को लेकर एक सुपीरियॉरिटी कॉम्पलेक्स में घिरे रहते हैं. ऊपरी दिखावे में विश्वास रखते हैं और एक खास किस्म की आत्म-मुग्धता और विशिष्टता बोध के मारे भी होते हैं, जिस वजह से लखनवी तहज़ीब पर अक्सर ही सीमित वर्ग की सामंती, अभिजात्य, प्रतिगामी और जनविरोधी सभ्यता होने का आरोप भी लगता है, क्योंकि नफासत की आड़ में वह सहज-सरल अवधी लोक संस्कृति से मुंह फेरकर खड़ी हो जाती है. इसी वजह से अवध के कई चेतनाशील लोगों ने ही लखनवी तहज़ीब को कटघरे में खड़ा किया है. जिसके संकेत हमें रमई काका, कुंवर नारायन और रफीक शादानी तक की कविताओं में खूब मिल जाएंगें. दूसरों की ऐबजोई और मज़ाक उड़ाने और नीचा समझने में उन्हें खास लुत्फ मिलता है. मीर-तकी-मीर भी लखनऊ वालों के इस हमले से बच नहीं पाए थे, यही वजह है कि लखनऊ में लंबा वक्त गुज़ारने के बाद भी उन्हें लखनऊ कभी पसंद नहीं आया. एक बड़े शायर यगाना चंगेज़ी को  भी अदब-नवाज़ कहे जाने वाले लखनऊ  ने जिस तरह ज़लील किया वो लखनऊ के लिए कभी न मिटाया जा सकने वाला कलंक है. बात सिर्फ ये थी कि यगाना की शाइरी लखनऊ वालों को पसंद नहीं आती थी. मजाज़ लखनवी ने भी एक सर्द रात यहीं के एक शराबखाने की छत पर दम तोड़ दिया, लेकिन उनको बचाने के लिए कोई नहीं था. अभी कुछ वक्त पहले इस अहद के कबीर कहे जाने वाले शायर अदम गोंडवी लखनऊ में मदद की बाट जोहते हुए दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन एक और मरते हुए के लिए भी ये शहर अपनी धीमी चाल को तेज़ नहीं कर सका.

आप किसी भी लखनवी से इन कमियों का ज़िक्र कीजिए वह सर झुकाकर अपनी शर्मिंदगी का इज़हार करेगा, लेकिन साथ ही साथ लखनवी अंदाज़ में ये कहकर आपको लाजवाब भी कर देगा कि आप सेर भर बेर लेते हैं तो पाव भर गुठलियां भी आती हैं न?

आइवीएफ कारोबार: सेहत से खिलवाड़

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गीता (बदला हुआ नाम) की शादी को चार साल हो गए थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी. गीता और उनके पति की इकलौती चाहत यही थी कि उनका एक बच्चा हो. दोनों ने गाइनी सर्जन से संपर्क किया तो पता चला कि गीता की फैलोपियन ट्यूब में ट्यूबरकुलर इंफेक्शन है, जिसकी वजह से वह गर्भधारण नहीं कर सकतीं.

इसके बाद गीता ने करीब एक साल तक इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. फिर उनकी गाइनी ने उन्हें आइवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन – एक तरह का कृत्रिम गर्भाधान) कराने की सलाह दी. दंपत्ति ने इस बारे में रिसर्च की, जिसमें उन्हें पता चला कि आइवीएफ क्लीनिक सिर्फ दो बार ही आइवीएफ करवाने की सलाह देते हैं. सारी खोजबीन के बाद गीता और उनके पति नई दिल्ली के एक इनफर्टिलिटी क्लीनिक में गए और वहां पर ट्रीटमेंट शुरू हुआ. गीता और उनके पति ने दो बार कोशिश की, लेकिन दोनों बार नाकामयाब रहे. इस प्रक्रिया में उनके दो लाख से ज्यादा रुपये खर्च हो गए, लेकिन इसका फायदा कुछ नहीं हुआ.

इससे गीता और उनके पति को बहुत धक्का लगा. गीता बताती हैं, ‘डॉक्टरों ने हमसे कहा था कि इससे हमारे सपने पूरे हो जाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. हमारे सपने बिखर गए.’ गीता और उनके पति की तरह हजारों नि:संतान दंपत्ति संतान की चाहत में ऐसे क्लीनिकों के झांसे में आ जाते हैं, जिनका मकसद ग्राहकों से पैसा ऐंठना होता है. ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए वे ऐसे सफल मामलों का हवाला देते हैं, जिनमें दिखावा ज्यादा और सच्चाई कम होती है.

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आइवीएफ क्लीनिक तेजी से बढ़ रहे हैं क्योंकि सेरोगेसी का कारोबार काफी मुनाफे का सौदा है

आइवीएफ क्लीनिक के अंडरवर्ल्ड में आपका स्वागत है, जहां पर बच्चे का लालच देकर आपसे पैसे ऐंठे जाएंगे. आज पूरे देश में आइवीएफ तकनीक का बोलबाला है. इससे संबंधित विज्ञापन आपको जगह-जगह देखने को मिल जाएंगे, जिनमें इस बात का दावा किया गया होगा कि अब नि:संतान दंपत्तियों को निराश होने की जरूरत नहीं है, अब वे आइवीएफ तकनीक की मदद से संतान सुख पा सकते हैं. इन विज्ञापनों को पढ़कर संतान की चाहत लिए दंपत्ति जब वहां जाते हैं, तो बदले में उन्हें निराशा ही मिलती है.

जिस तरह संतान की चाहत रखनेवाले दंपत्ति होते हैं, ठीक उसी तरह एग डोनेट करनेवाले भी होते हैं, जो कुछ पैसों के लिए में एग बैंक को एग डोनेट करते हैं. अभी हाल ही में इसी मसले पर विकी डोनर नाम से एक फिल्म भी आई थी, जिसमें एग डोनेशन के इसी कारोबार का एक दूसरा पहलू दिखाया गया था. विज्ञान कहता है कि महिलाओं में हर महीने एग डेवलप होते हैं, जो गर्भधारण के लिए जरूरी होते हैं और ये हजारों की संख्या में होते हैं, जो बेकार हो जाते हैं, ऐसी ही बातें सुनाकर एग बैंकवाले अशिक्षित महिलाओं को एग डोनेट करने के लिए फुसलाते हैं. अगर ये कहें कि अब ऐसी महिलाओं के साथ एग्सप्लॉयटेशन (कोख का शोषण) हो रहा है, तो गलत नहीं होगा. अपनी सेहत की चिंता किए बगैर ये औरतें बिना किसी स्वास्थ्य जांच के एग डोनेट करती हैं, परिणामस्वरूप कई लाइलाज बीमारियों का शिकार हो जाती हैं.

अवैध तरीके से चलनेवाला आइवीएफ का व्यवसाय बड़ी तेजी से पूरे भारत में फैल रहा है. कई मायनों में यह कारोबार अनैतिक भी कहा जा सकता है, क्योंकि यह अवैध सेरोगेसी के व्यापार को बढ़ावा दे रहा है. संयुक्त राष्ट्र की एक टीम ने साल 2012 में इस बारे में एक सर्वेक्षण किया था, जिसके मुताबिक भारत में इससे संबंधित बाजार 40 करोड़ डॉलर का है. इसमें छोटे से लेकर बड़े स्तर तक के लोग जुड़े हुए हैं. एजेंट जरूरतमंदों को थोड़े पैसे का लालच देकर उनसे एग लेते हैं और फिर उस एग को जरूरतमंद दंपत्तियों को लाखों रुपये में बेचते हैं.

आइवीएफ की सफलता की दर काफी कम है. जिन लोगों को बच्चे का सपना दिखाया जाता है, उनमें से कुछ लोगों की ही चाहत पूरी हो पाती है, अधिकांश लोगों के हाथ निराशा ही लगती है

इस कारोबार पर तहलका ने जो पड़ताल की, उससे पता चलता है कि आइवीएफ का यह धंधा इंसानी लालच की एक जीती-जागती मिसाल है. इसके जरिए कुछ लोगों का गिरोह नि:संतान परिवारों की भावनाओं से खेल रहा है. समस्या यह है कि जो लोग संतान की चाहत रखते हैं, उनकी इच्छा फिर भी पूरी नहीं हो रही है. क्लीनिक उनकी भावनाओं पर अपने धंधे की उड़ान भर रहे हैं. आइवीएफ की सफलता की दर काफी कम है. जिन लोगों को बच्चे का सपना दिखाया जाता है, उनमें से कुछ लोगों की ही चाहत पूरी हो पाती है, अधिकांश लोगों के हाथ निराशा ही लगती है.

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भारत बन सकता है दुनिया का सेरोगेसी कैपिटल

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सेरोगेसी से जुड़ी औरतों के स्वास्थ्य के प्रति चिंतित लोगों और चिकित्सा जगत के बीच चल रहा द्वंद्व जल्द ही खत्म होे सकता है. केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में इस बारे में एक विधेयक- असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजीज रेगुलेशन बिल पेश किया जानेवाला है. इस विधेयक के कानून का रूप ले लेने के बाद भारत दुनिया का सरोगेसी कैपिटल बन सकता है.

साल 2008 में उच्चतम न्यायालय ने यह टिप्पणी की थी कि कॉमर्शियल सेरोगेसी ने व्यवसाय का रूप ले लिया है, क्योंकि अमीर परिवार अपने घरों में टेस्ट ट्यूब संतानों की किलकारियां सुनना चाहते हैं और गरीब औरतें कुछ पैसों के बदले अपनी कोख किराए पर दे रही हैं. उसी साल इस विधेयक का मसौदा तैयार किया गया, ताकि इस बाजार का नियमन किया जा सके.

इस विधेयक को 2010 और 2013 में संशोधित किया गया, लेकिन इन दोनों ही विधेयकों में आशय स्पष्ट था. यह विधेयक कुछ सुरक्षा शर्तों के साथ सेरोगेसी और एग डोनेशन को अनुमति देता है, लेकिन इन कामों से जुड़ी चिकित्सा प्रक्रियाओं के संभावित दुष्परिणामों को देखते हुए महिला स्वास्थ्य विशेषज्ञ इन शर्तों को सुरक्षित नहीं मानते.

अठारहवें विधि आयोग ने साल 2008 में बने इस विधेयक के मूल रूप का विश्लेषण किया था और यह टिप्पणी की थी- ‘भारत में कोख किराए पर है, जो विदेशियों के लिए बच्चे पैदा करती है और भारतीय सेरोगेट माताओं के लिए डॉलर.’ कॉमर्शियल सेरोगेसी का विरोध करते हुए आयोग ने व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए सेरोगसी पर रोक लगाने का सुझाव दिया था.

इस विधेयक के कानून का रूप ले लेने के बाद भारत यूक्रेन, जॉर्जिया और थाइलैंड जैसे देशों की सूची में शामिल हो जाएगा, जहां इसकी अनुमति है. इस विधेयक को उचित ठहराते हुए केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि भारतीय परिवारों के लिए वंश परंपरा काफी अहम होती है. तहलका ने आयुर्वेदिक और यूनानी डॉक्टरों के अलावा बांझपन उपचार से जुड़े केंद्रों के अधिकारियों से जो बातचीत की, उससे भी यह संकेत मिला िक नवविवाहित जोड़ों पर बच्चे के लिए परिवार और समाज की ओर से बराबर दबाव बनाया जाता है. इस संदर्भ में गृह मंत्रालय ने दिशा-निर्देश जारी किया कि केवल विपरीतलिंगी विवाहित जोड़े ही आइवीएफ का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस दिशा-निर्देश के तहत सिंगल विमेन, गे और लेस्बियन जोड़ों को इस तकनीक का इस्तेमाल करने से मना किया गया है.

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इतना ही नहीं, अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए ये लोग एग डोनर की सेहत की भी अनदेखी करते हैं. सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी हजारों औरतें इनकी लच्छेदार बातों में आकर थोड़े से पैसों के लिए एग डोनेट करने को तैयार हो जाती हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि एग डोनेट करने के बाद सेहत को जो नुकसान होता है, उसका पता एकदम से तो नहीं चलता, लेकिन इसका असर कुछ दिनों बाद दिखना शुरू हो जाता है. मोटे तौर पर एक अनुमान है कि उचित सावधानी अपनाए बगैर एग डोनेशन करने की वजह से लगभग 40 से 45 हजार औरतें गंभीर बीमारियों का शिकार हो चुकी हैं.

दिल्ली के कापसहेड़ा की रहनेवाली विमलेश देवी ने अपने आपको बड़ा भाग्यशाली समझा, जब उन्हें ऐसा मौका मिला. उनके पड़ोसियों की आंखें खुली की खुली रह गईं, जब उन्होंने देखा कि उनके पति राजेश, सिक्योरिटी गार्ड का काम करनेवाले, ने नई बाइक खरीद ली. उसके बाद जल्दी ही उनके छोटे से घर में सुख-सुविधा की सारी चीजें भर गईं. फिर पड़ोसियों को पता चला कि 25 वर्षीया विमलेश की इस समृद्धि की वजह उनका सेरोगेट मदर बनना है.

विमलेश की छोटी उम्र में ही शादी हो गई थी. चार बच्चे होने के बाद उनके पति की मौत हो गई. उसके बाद उनकी मां ने उनकी शादी राजेश से करवा दी, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति खराब ही बनी रही. उसके बाद एक एजेंट ने उन्हें आसानी से पैसे कमाने का लालच देकर एग डोनेट करने के लिए राजी कर लिया. विमलेश और उनकी एक करीबी रिश्तेदार एक एजेंट के जरिए एग डोनेट करने लगीं, जो इससे मिले पैसों में से अपना हिस्सा भी लेता था.

दो बार एग डोनेट करने के बाद विमलेश की जिंदगी में जैकपॉट तब लगा, जब उन्हें सेरोगेट मदर बनने का मौका मिला. इससे उन्हें तीन लाख रुपये मिले. जब बच्चा हो गया, तो उन्हें पैसे मिल गए. इस तरह विमलेश को पैसों का चस्का लग गया. यह बात और है कि एक पैन कार्ड थमा कर उनके पति ने उन्हें यह झांसा दे दिया था कि यह उनके उस खाते का डेबिट कार्ड है, जिसमें उनके पैसे जमा हैं. भले ही उनके साथ यह ठगी हो गई हो, लेकिन अब उनकी तरक्की हो गई थी. वह अब साधारण एग डोनर से एजेंट बन गई थीं. विमलेश अब अपने पड़ोस की महिलाओं को जल्दी पैसे कमाने के लिए एग डोनेट करने के लिए उत्साहित करने लगीं.

विमलेश की यह कहानी ईशानी दत्ता के वृत्तचित्र वॉम्ब्स ऑन रेंट (किराए पर कोख) में दिखाई गई उन चुनिंदा कहानियों में से एक है, जो देश के शहरी इलाकों में चल रही धोखाधड़ी और शोषण की गाथा पेश करती हैं.

कभी-कभी एग डोनेट करनेवाली महिला से संकोचशील सेरोगेट मदर और फिर चालाक एजेंट बनने तक की विमलेश की कहानी इस कारोबार में शामिल लालच और धोखाधड़ी को बखूबी बयान करती है.

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खुशियां दिलाने के वादों का कारोबार

डॉक्टर गोपीनाथन ने 1996 में दो लाख रुपये लगाकर केरल के इडप्पल में सीआइएमएआर इनफर्टिलिटी क्लीनिक खोला था. आज वह 150 करोड़ रुपये के चिकित्सा व्यवसायी बन गए हैं. उनके इनफर्टिलिटी क्लीनिक और अस्पताल केरल, तमिलनाडु के साथ-साथ संयुक्त अरब अमीरात में भी हैं.

इस हॉस्पिटल चेन पर गलत तरीके से काम करने के कई आरोप हैं, लेकिन इसके बावजूद यह बांझपन के उपचार के नाम पर अभी भी फल-फूल रहा है. तहलका की जांच में यह बात सामने आई कि इनकी आमदनी का मुख्य स्रोत एग डोनेट करनेवाले लोग हैं, जो झारखंड, उड़ीसा, पूर्वोत्तर के राज्यों और नेपाल से लाए जाते हैं.

इसके अलावा सीआइएमएआर की ओर से सरोगेट माताओं के लिए कोच्चि के काडावान्त्रा में अस्पताल चलाया जा रहा है. जब तहलका ने एग डोनेट करनेवालों, उनको दिए जानेवाले पैसों और उनकी स्वास्थ्य सुरक्षा के बारे में पूछताछ की, तो अस्पताल के अधिकारियों ने बताया कि ये सारी चीजें हमारे बिचौलिए निपटाते हैं. इस तरह काफी सहजता से अस्पताल ने इसकी पूरी जिम्मेदारी इन बिचौलियों पर डाल दी. दुख की बात यह है कि ऐसे सारे केंद्रों की यही कहानी है.

केरल दरअसल बांझपन उपचार कारोबार का एक केंद्र बन चुका है. विदेशों में रहनेवाले केरल के लोगों के अलावा अरब देशों से भी लोग यहां पर इस काम के लिए आते हैं.

क्लीनिक पर यह आरोप लगते रहे हैं कि अधिक से अधिक पैसे वसूलने के लिए यह आइवीएफ उपचार की अवधि को जरूरत से अधिक खींचने की कोशिश करता है. हालांकि इस अनैतिक कारोबार में अकेले यही लोग नहीं लगे हैं. ग्राहकों में आइवीएफ उपचार के बारे में जानकारी के अभाव की वजह से यह कारोबार जोरों से फल-फूल रहा है.

जब कोई एग या सीमेन डोनेट करना चाहता है, तो उसके लिए बहुत सारे नियमों का पालन करना होता है. इसमें कई चिकित्सा जांच भी शामिल होती हैं, लेकिन कोई भी क्लीनिक इन दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करते हैं. कुछ मामलों में ग्राहकों से डॉक्टर यह वादा करते हैं कि वे बड़ी जाति के पुरुष, खास तौर पर ब्राह्मण का स्पर्म मुहैया कराएंगे. इसके लिए ये लोग ग्राहक से भारी कीमत वसूलते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि स्पर्म किसी भी पुरुष से एकत्र कर लिया जाता है.
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तहलका की जांच में पता चला है कि कापसहेड़ा की अधिकांश महिलाएं आज विमलेश की कहानी दोहराना चाहती हैं. हालांकि इन महिलाओं को इसकी पूरी प्रक्रिया नहीं पता, लेकिन उनमें भी अपने पति पर निर्भर रहे बगैर कम समय में ज्यादा पैसा कमाने की चाहत पैदा हो गई है. दूसरी ओर विमलेश अपना खुद का बच्चा पैदा नहीं करना चाहती हैं क्योंकि ऐसे में वह फिर से सेरोगेट मदर नहीं बन पाएंगी.

हमारी जांच में यह पता चला कि इस पूरे धंधे में काफी प्रभावशाली समूह लगे हैं, जिनमें चिकित्सक और एजेंट शामिल हैं. बेहतर जिंदगी का भुलावा और थोड़े से पैसों का लालच देकर औरतों के शरीर और स्वास्थ्य के साथ चल रहा यह खिलवाड़ भयावह है. और जब ये औरतें इस कारोबार में एजेंट की भूमिका में उतर जाती हैं, तब तो वे इस दुष्चक्र के लिए आपूर्ति करने का हिस्सा ही बन जाती हैं.

हमारे देश में विमलेश जैसी हजारों युवतियां हैं, जो एग डोनेशन और सेरोगेसी के इस धंधे में उतरकर अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ कर रही हैं. अपनी जरूरतों और वित्तीय समस्याओं से जूझ रही ये महिलाएं जब इस तरह के मौके पाती हैं, तो उन्हें यथार्थ से पीछा छुड़ाकर आगे बढ़ने का यह जरिया आसान लगने लगता है.

किसी भी नई तकनीक और उपचार प्रक्रिया की ही तरह आइवीएफ को भी नि:संतान दंपत्तियों के लिए एक वरदान की तरह माना जाता है, लेकिन इस उद्योग में चल रहे अवैध तरीकों की वजह से हजारों निर्दोष जानें खतरे में पड़ रही हैं. पता चला है कि हजारों महिला एग डोनर स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर विसंगतियों से जूझ रही हैं.

जब एग डोनेट करने वाली ये औरतें इस कारोबार में एजेंट की भूमिका में उतर जाती हैं, तब तो वे इस दुष्चक्र के लिए आपूर्ति करने का हिस्सा ही बन जाती हैं

महानगरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक आपको आइवीएफ क्लीनिक के होर्डिंग लटके मिल जाएंगे, लेकिन देशभर में बड़ी संख्या में ऐसे क्लीनिक खुल जाने के बावजूद आइवीएफ प्रक्रिया के बारे में समझ विकसित नहीं हो सकी है. औरतों और स्वास्थ्य से संबंधित मसलों पर काम करनेवाली संस्था समा के आंकड़ों के मुताबिक बेहद कम समय में आइवीएफ क्लीनिकों की संख्या 500 से बढ़कर 2500 तक पहुंच गई है. इनकी संख्या में अचानक हुई यह बढ़ोतरी समाधान पेश करने के बजाय समस्याएं बढ़ानेवाली साबित हो रही है.

आइवीएफ उद्योग का कारोबार काफी तेजी से बढ़ रहा है. कुछ समय पहले की एक रिपोर्ट के मुताबिक यह कारोबार बीस हजार करोड़ रुपये सालाना के आंकड़े तक पहुंच चुका है. शोषण से की जानेवाली यह मोटी आमदनी मुख्य रूप से उन डॉक्टरों और दलालों की जेब में जा रही है, जो भारत के प्रेगनेंसी टूरिज्म इंडस्ट्री में योगदान कर रहे हैं. सुसंस्कृत शब्दों में कहे जानेवाले स्वास्थ्य पर्यटन का यह एक भयावह संस्करण है.

एग डोनेशन ग्रामीण इलाकों में पैसे कमाने का आसान जरिया बन गया है
एग डोनेशन ग्रामीण इलाकों में पैसे कमाने का आसान जरिया बन गया है

बांझपन के उपचार के नाम पर डॉक्टर ही इस शोषण के मुख्य कर्ताधर्ता हैं. यही वजह है कि बहुत सारे स्त्रीरोग विशेषज्ञ आइवीएफ डिप्लोमा कर इस धंधे को अपनाने को आतुर हैं. यह पूरी तरह से चिकित्सा के सभी नैतिक नियमों के खिलाफ है क्योंकि पैसे कमाने के लिए यहां सभी नियम-कानूनों को ताक पर रख दिया जाता है.

मेडिकल एंथ्रोपॉलिजिस्ट डॉक्टर सुनीता रेड्डी का कहना है, ‘भारत में बांझपन की समस्या से जुड़े अधिकांश विशेषज्ञ दरअसल स्त्रीरोग विशेषज्ञ हैं. कुछ सालों तक प्रैक्टिस करने के बाद ये कुछ मूलभूत कलाएं सीख लेते हैं और महानगरों या छोटे शहरों में क्लीनिक खोल लेते हैं.’

दलाल मुख्य रूप से गांवों को ही अपना निशाना बनाते हैं, क्योंकि वे एग डोनर के तौर पर गांवों की औरतों को शिकार बनाते हैं. दलाल लोग अमीर नि:संतान दंपत्तियों से मोटी रकम वसूलते हैं, लेकिन अपने एग डोनेट करनेवाली इन औरतों को काफी कम पैसे देते हैं.

बांझपन के उपचार के नाम पर डॉक्टर ही इस शोषण के मुख्य कर्ताधर्ता हैं. यही वजह है कि बहुत सारे स्त्रीरोग विशेषज्ञ आइवीएफ डिप्लोमा कर इस धंधे को अपनाने को आतुर हैं

सच तो यह है कि बांझपन के उपचार से जुड़ी इन प्रक्रियाओं का मुख्य उद्देश्य पैसे कमाना होता है. उन्हें इस बात से कोई लेना-देना नहीं होता है कि एग डोनेट करनेवाली महिलाओं की सेहत खराब हो रही है या फिर आइवीएफ करानेवाले जोड़े को संतान का सुख मिल रहा है या नहीं. जब नि:संतान दंपत्ति बच्चे की चाह में डॉक्टर से आइवीएफ इलाज के लिए संपर्क करते हैं, तो वे इसके लिए उनके सामने मोटी रकम की मांग रख देते हैं. उसके बाद धोखाधड़ी के तरीके अपनाकर और दंपत्तियों में जानकारी के अभाव का फायदा उठाकर ये डॉक्टर उन लोगों से और अधिक रकम वसूलते हैं. हालांकि डॉक्टरों का यह दावा होता है कि वे एग डोनेट करनेवालों को अच्छी-खासी राशि देते हैं, जबकि सच यह है कि इन लोगों को केवल बीस-पच्चीस हजार रुपये ही दिए जाते हैं. बाकी का सारा पैसा डॉक्टर और एजेंट के जेब में जाता है.

तहलका की जांच में पता चला है कि एग डोनेट करनेवाले ज्यादातर लोग अशिक्षित होते हैं. कई तो ऐसे होते हैं, जिन्हें यह भी पता नहीं होता कि पैसे गिनते कैसे हैं. इस संबंध में जेएनयू के सोशल मेडिसिन डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर प्राचीन घोडाजकर का कहना है, ‘पूरी जानकारी अच्छी तरह से देकर सहमति नहीं लिया जाना बड़ी चिंता का विषय है. बहुत सारी औरतें, जिनसे एग डोनेट करने के लिए संपर्क किया जाता है, आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ी पृष्ठभूमि की होती हैं.’

Surrogate mothers pose for a photograph inside a temporary home for surrogates provided by Akanksha IVF centre in Anand town

एग डोनेशन की प्रक्रिया की बात करें तो एग के प्रोडक्शन की फ्रीक्वेंसी में वक्त की काफी अहम भूमिका होती है, लेकिन पैसे के लालच में एजेंट और डॉक्टर इस बात की परवाह नहीं करते और अपना एग डोनेट करनेवालों के लिए जरूरी चिकित्सा जांच कराए बगैर उनका लगातार शोषण करते रहते हैं. इसकी वजह से एग डोनेट करनेवालों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है. दरअसल कई ऐसे मामले पाए गए हैं जिनमें महिलाओं ने एक महीने में आठ बार अपने एग डोनेट किए.

एग के उत्पादन की क्षमता को बढ़ाने के लिए हार्मोन्स के इंजेक्शन के भारी डोज और दवाएं एग डोनेट करनेवालों को दी जाती हैं.  इस पूरे अमानवीय उपचार के बाद इनसे दवाओं के नाम पर 15 से 20 हजार रुपये वसूल लिए जाते हैं ताकि वे इन प्रक्रियाओं के दुष्प्रभावों से बच सकें.

उस वक्त न तो दलाल और न ही डॉक्टर, कोई भी इन्हें दुष्प्रभावों से बचाने में मदद नहीं करता. नतीजतन ये गरीब औरतें धीरे-धीरे कोमा में चली जाती हैं या फिर मौत की शिकार हो जाती हैं.

दरकता दंभ

फोटोः तहलका अर्काइव
फोटोः तहलका अर्काइव

महाराष्ट्र में राजनीतिक उथल-पुथल थम चुकी है. भारतीय जनता पार्टी के अकेले सरकार बनाने के लगभग डेढ़ महीने बाद अब शिवसेना उनके साथ आ गई है और प्रदेश में इन दोनों के गठबंधनवाली सरकार बन चुकी है. लेकिन अलगाव के इस छोटे दौर में शिवसेना की वह फजीहत हुई, जिसकी उसने शायद ही कल्पना की हो.

बदले हुए राजनीतिक समीकरणों के बीच अपनी कमजोर स्थिति को स्वीकार करने में शिवसेना को कुछ वक्त लगा. इसकी वजह से आखिरकार वह भाजपा के साथ सरकार में शामिल तो हो गई, लेकिन उसे न तो उपमुख्यमंत्री का पद मिला और न ही गृह मंत्रालय. परिस्थितियां कुछ ऐसी बदलीं कि शिवसेना को भाजपा के साथ आने के लिए मजबूर होना पड़ा. शिवसेना की धमक और इसके संस्थापक बाल ठाकरे की हनक को याद करें, तो शिवसेना के लिए यह अप्रत्याशित है. विधानसभा चुनावों के दौरान घटी घटनाओं और जानकारों की राय से अगर शिवसेना की मौजूदा स्थिति के बारे में कोई तस्वीर बनानी हो तो यही तस्वीर उभरती है कि, एक तो बदली हुई स्थितियों में अपनी कमजोर स्थिति का आकलन करने में उनसे गंभीर चूक हुई और दूसरी बात, उन्होंने इस दौरान राजनीतिक अपरिपक्वता की भी कई मिसालें पेश कीं, मसलन चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री के पिताजी को निशाना बनाना या फिर आदित्य ठाकरे जैसे अनुभवहीन युवा को सीटों के बंटवारे की जिम्मेदारी सौंपना आदि.

पिछले लगभग पांच दशकों के दौरान महाराष्ट्र की राजनीति में ठाकरे परिवार एक तरफ रहा है, तो प्रदेश की बाकी राजनीति एक तरफ. इसकी वजह रही है बाल ठाकरे की छवि और शिवसेना का रोचक इतिहास.

बाल ठाकरे, जिन्हें उनके चाहनेवाले बालासाहेब या सिर्फ साहेब कहकर संबोधित करते थे, का जन्म 23 जनवरी 1927 को पुणे में एक चंद्रसेनीय कायस्थ परिवार में हुआ था. उनके पिता प्रबोधनकार ठाकरे का मूल नाम केशव सीताराम ठाकरे था, लेकिन उनकी पत्रिका ‘प्रबोधन’ की बदौलत उन्हें यह उपनाम दिया गया था. वह समाज सुधारक ज्योतिबा फूले के अनुयायी थे और जातिवाद, बाल विवाह, दहेज प्रथा और दकियानूसी परंपराओं के खिलाफ संघर्षरत थे. वह संयुक्त महाराष्ट्र समिति के संस्थापक सदस्यों में थे और मुंबई व बेलगाम के महाराष्ट्र में समावेश की पैरवी करते थे. इस तरह बाल ठाकरे को सामाजिक मूल्य उनके पिता से विरासत में  मिले थे.

भारत में जन्मे ब्रिटिश मूल के लेखक विलियम मेकपीस ठाकरे से प्रबोधनकार ठाकरे इतने प्रभावित थे कि उन्होंने अपने उपनाम ठाकरे की अंग्रेजी में स्पेलिंग विलियम की स्पेलिंग से बदल ली जो आज तक चल रही है. यह बात और है कि उन्हीं के बेटे बाल ठाकरे ने बाद में अंग्रजों के दिए गए नाम बॉम्बे को बदलकर मुंबई कर दिया.

बाल ठाकरे, मार्मिक और शिवसेना

बाल ठाकरे ने अपने करियर की शुरुआत ‘फ्री प्रेस जर्नल’ अखबार में कार्टूनिस्ट के तौर पर की थी. साल 1959 में उन्होंने वहां से इस्तीफा दे दिया और व्यंग्य चित्रों की एक साप्ताहिक पत्रिका निकालने के बारे में अपने पिता से चर्चा की, जिसके बाद अगस्त 1960 में ‘मार्मिक’ पत्रिका का जन्म हुआ. किसे पता था कि आनेवाले दिनों में यही पत्रिका बाल ठाकरे को कार्टूनिस्ट से नेता बनानेवाली थी.

मार्मिक के जरिए ठाकरे ने मराठी लोगों के अधिकारों की लड़ाई शुरू की, साथ ही मुंबई में गुजरातियों, मारवाड़ियों और दक्षिण भारतीयों के मुंबई में बढ़ते प्रभाव के खिलाफ अभियान चलाया. मार्मिक में उन्होंने यह मसला उठाया कि दूसरे राज्यों से मुंबई आए लोगों के पास नौकरी है, लेकिन स्थानीय लोग नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं. कई बार महाराष्ट्र की विभिन्न संस्थाओं में कार्यरत ऐसे अधिकारियों के नामों की सूची पत्रिका में छापी जाती थी, जो दूसरे राज्यों से थे. एक बार उन्होंने सरकारी और निजी अस्पतालों में कार्यरत गैर-मराठी डॉक्टरों के नामों की सूची छापी और मुद्दा उठाया कि स्थानीय मराठी लोगों को नौकरी नहीं दी जा रही है. 5 जून 1966 को उन्होंने मार्मिक में शिवसेना स्थापित करने की घोषणा की और लिखा, ‘हम दक्षिण भारतीयों (यंडू-गंडू) के हमलों का जवाब देंगे.’ गौरतलब है कि उस समय मुंबई के सरकारी और निजी दफ्तरों में काफी संख्या में दक्षिण भारतीय लोग कार्यरत थे.

इसके बाद 19 जून 1966 को शिवसेना की स्थापना की गई. फिर 23 अक्टूबर को मार्मिक में यह घोषणा जारी की गई कि 30 अक्टूबर 1966 को दादर के शिवाजी पार्क में शिवसेना की सभा होने वाली है और सभी स्वाभिमानी मराठी बंधुओं से प्रार्थना है कि वे सभा में शामिल हो कर खुद के ही प्रदेश में हो रही अपनी अवेहलना को समाप्त करने के लिए आगे आएं. बाल ठाकरे के इस आह्वान का जोरदार स्वागत हुआ. शिवसेना की पहली सभा में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में लोग शिवाजी पार्क पहुंचे. खुद ठाकरे को भी यह उम्मीद नहीं थी कि शिवाजी पार्क लोगों से खचाखच भर जाएगा.

बाल ठाकरे की लोकप्रियता की एक बड़ी वजह उनकी बात करने की शैली थी. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक कुमार सप्तऋषि, जिनके बाल ठाकरे से निजी संबंध थे, बताते हैं, ‘बालासाहेब एक बेहतरीन कार्टूनिस्ट थे, वह जब बोलते भी थे, चित्रशैली में बोलते थे. एक बार उन्होंने एक वरिष्ठ राजनेता को मेंढक कह दिया था. जब उनसे पूछा गया कि आपने ऐसा क्यों कहा, तो उन्होंने जवाब दिया, यह राजनैतिक दल बदलते रहते हैं, इधर से उधर कूदते रहते हैं. जब मैं इन्हें देखता हूं, तो मुझे मेंढक दिखाई देता है.’

शिवसेना के गठन के बाद से इसका एजेंडा बदलता रहा है. पहले उन्होंने दक्षिण भारतीयों का विरोध किया, फिर वामपंथियों का, फिर उत्तर भारतीयों का

महाराष्ट्र के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री वसंत राव नाईक का समर्थन बाल ठाकरे को प्राप्त था. इसकी वजह थी कम्युनिस्ट ट्रेड यूनियनों का बढ़ता प्रभाव. नाईक चाहते थे कि ठाकरे शिवसेना के जरिए कम्युनिस्टों पर नकेल कसें. साल 1967 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने वीके कृष्ण मेनन को उत्तर पूर्व मुंबई से टिकट देने से मना कर दिया. माना जाता है कि गैर-मराठी होने की वजह से उनका टिकट काट दिया गया था. इसके बाद मेनन ने इस सीट से निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ा, लेकिन शिवसेना की मदद लेते हुए मराठियों के मुद्दे को हवा देकर कांग्रेस ने उनको हरा दिया. इसके बाद शिवसेना की लोकप्रियता में काफी बढ़ोतरी हुई.

पुराने दिनों को याद करते हुए सप्तऋषि बताते हैं, ‘बालासाहेब का शिवसैनिकों से आत्मीय रिश्ता था. वह खुद चालों में जाया करते थे, लोगों से मिलते थे, उनकी परेशानियां पूछते थे. आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए वह उन्हें प्रोत्साहित करते थे. बालासाहेब  जात-पांत में यकीन नहीं रखते थे. वह शिवसैनिकों से बस वफादारी और आदेशपालन की उम्मीद रखते थे.

साल 1975 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल घोषित कर दिया, तब ठाकरे ने मार्मिक में आपातकाल के समर्थन में एक संपादकीय लिखा. माना जाता है कि मार्मिक में छपे संपादकीय ने शिवसेना को प्रतिबंधित होने से बचा लिया था.

शिवसेना के गठन के बाद से कई बार इसका एजेंडा बदल चुका है. पहले उन्होंने दक्षिण भारतीयों का विरोध किया, फिर वामपंथियों का, उसके बाद उत्तर भारतीयों का. अस्सी के दशक में शिवसेना हिंदुत्व के एजेंडे को लेकर आगे बढ़ी, जिसके समर्थन में नवंबर 1987 में मार्मिक में एक संपादकीय भी लिखा गया था.

राज ठाकरे की एक न चली
ऐसा कहा जाता है कि बाल ठाकरे की असली विरासत के हकदार उनके भतीजे राज ठाकरे थे, लेकिन उन्होंने शिवसेना की जिम्मेदारी अपने सबसे छोटे बेटे उद्धव ठाकरे को दे दी. बाल ठाकरे का यह कदम कई राजनीतिक विश्लेषकों की सोच के विपरीत था. वरिष्ठ पत्रकार महेश विजापुरकर कहते हैं, ‘प्रमोद महाजन सोचते थे कि राज ठाकरे शिवसेना की कमान संभालेंगे, क्योंकि उनका व्यक्तित्व भी अपने चाचा की तरह करिश्माई है, लेकिन कमान आई उद्धव ठाकरे के हाथ.’

इसके बाद 2005 में राज ठाकरे ने शिवसेना से इस्तीफा दे दिया और 2006 में अपनी पार्टी महाराष्ट्र  नवनिर्माण सेना (मनसे) बना ली. गौरतलब है कि राज ठाकरे का काम करने का तरीका और उनकी भाषण शैली अपने चाचा बाल ठाकरे जैसी है, जबकि उद्धव शांत स्वभाव के हैं.

बाल ठाकरे की ही तरह राज ठाकरे भी एक कार्टूनिस्ट हैं और वे खुद भी मार्मिक में कार्टून बनाया करते थे. उनकी ही तरह राज ठाकरे ने भी दूसरे राज्यों से मुंबई आने -वाले लोगों के खिलाफ अभियान चलाया, लेकिन वह कभी भी उस तरह का जादू नहीं जगा पाए, जिसके लिए बाल ठाकरे जाने जाते थे. लगभग चार दशकों तक बाल ठाकरे का मुंबई पर इतना वर्चस्व था कि उनके एक इशारे पर पूरा मुंबई शहर थम जाता था. 2009 के विधानसभा चुनाव में मनसे ने 13 सीटों पर जीत दर्ज की थी, लेकिन 2014 के विधानसभा चुनाव में उसे महज एक सीट पर जीत मिली.

 

फोटोः तहलका अर्काइव
फोटोः तहलका अर्काइव

पिता की विरासत और उद्धव
बाल ठाकरे के सबसे छोटे बेटे उद्धव ठाकरे शुरुआती दौर में शिवसेना के मुखपत्र सामना का कामकाज संभालते थे. 2003 में उन्हें शिवसेना का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था. 2004 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना-भाजपा की हार के बाद नारायण राणे ने उनके खिलाफ बगावत के सुर बुलंद कर दिए और शिवसेना से इस्तीफा देकर कांग्रेस में शामिल हो गए.

बाल ठाकरे के सबसे बड़े बेटे बिंदुमाधव की 1996 में एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. उनके मंझले बेटे जयदेव ठाकरे परिवार से अलग रहते हैं. जयदेव ठाकरे ने अपने पिता बाल ठाकरे की वसीयत को लेकर कोर्ट में मुकदमा दायर किया हुआ है. उनका कहना है कि वसीयत गलत है. वसीयत के मुताबिक अधिकांश संपत्ति उद्धव ठाकरे के नाम पर है, जबकि जयदेव और उनके बड़े भाई बिंदुमाधव की पत्नी के नाम वसीयत के मुताबिक कुछ भी नहीं दिया गया है.

बाल ठाकरे की ही तरह राज भी एक कार्टूनिस्ट हैं. उनकी शैली भी वैसी ही है, लेकिन वह कभी भी बाल ठाकरे जैसा जादू नहीं जगा पाए

नवंबर 2012 में बाल ठाकरे का निधन हो गया. उनके निधन के लगभग दो महीने बाद जनवरी 2013 में उद्धव ठाकरे शिवसेना के प्रमुख बने. सप्तऋषि कहते हैं, ‘उद्धव ठाकरे राजनीति में नहीं आना चाहते थे, लेकिन उनका चुनाव बालासाहेब ने बहुत सोच-समझकर किया. जरूरी नहीं है कि पार्टी चलाने के लिए हर वक्त उग्रता ही काम आए. उद्धव पार्टी को चलाने के लिए काबिल व्यक्ति हैं, लोग भले ही उन्हें कम आंकें. इस चुनाव में अकेले दम पर 63 सीटें जीतकर उन्होंने अपनी काबिलियत साबित कर दी है.’

ठाकरे परिवार की अगली पीढ़ी से उद्धव ठाकरे के 24 वर्षीय पुत्र आदित्य ठाकरे की राजनीतिक पारी शिवसेना की युवा शाखा ‘युवा सेना’ के अध्यक्ष के रूप में शुरू हो चुकी  है. 2010 में शिवसेना की दशहरा रैली में बाल ठाकरे ने उनका परिचय युवा सेना के अध्यक्ष के रूप में शिवसैनिकों से कराया था. इस बार विधानसभा चुनाव से पहले पिता उद्धव ने उन्हें और बड़ी जिम्मेदारी दे दी.

चुनाव से पहले भाजपा के साथ सीटों के बंटवारे के बारे में चर्चा की जिम्मेदारी उद्धव ने आदित्य को दी थी. उनके इस कदम का भाजपा के वरिष्ठ नेता एकनाथ खड़से ने विरोध भी जताया था. उन्होंने कहा था, ‘सीटों की चर्चा के लिए सेना को किसी वरिष्ठ नेता को भेजना चाहिए था न कि आदित्य ठाकरे को.’  आदित्य का नाम साल 2010 में विवादों में तब आया था, जब उन्होंने लेखक रोहिंटन मिस्त्री की किताब ‘सच अ लॉन्ग जर्नी’ को मुंबई यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम से निकलवा दिया था. उनका मानना था कि किताब में मराठियों और शिवसेना का अपमान किया गया है. अपने चार वर्षों के करियर में आदित्य ठाकरे का ध्यान युवाओं और शहरी मुद्दों पर केंद्रित रहा है.

भाजपा-सेना और विधानसभा चुनाव

पच्चीस वर्षों तक एक-दूसरे का साथ निभाने वाली भाजपा और शिवसेना विधानसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे को लेकर एक-दूसरे से अलग हो गई थीं. हालांकि इस बारे में केवल अटकलें ही लगाई जा सकती हैं कि विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और शिवसेना के बीच अलगाव जैसी स्थिति आने पर बाल ठाकरे क्या करते। वरिष्ठ पत्रकार महेश विजापुरकर कहते हैं, ‘बाल ठाकरे इस उथल-पुथल को उद्धव ठाकरे से कुछ अलग तरह से हल करते, यह सिर्फ एक अनुमान है. बालासाहेब  के फैसले अप्रत्याशित होते थे, इसलिए यह कह पाना मुश्किल है कि वे क्या करते.

भाजपा और सेना का गठबंधन 1988 से चल रहा है. विजापुरकर बताते हैं, ‘1988 में भाजपा-सेना की एक बैठक के दौरान भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था, “हमारे पास बुद्धिबल है, आपके पास भुजबल है, हो जाए समझौता.” वाजपेयी की इस पेशकश को बाल ठाकरे ठुकरा नहीं सके थे.’  इसके अलावा प्रमोद महाजन और बाल ठाकरे के बीच के आत्मीय संबंधों के चलते भी दोनों दल एक-दूसरे के साथ आए.

भाजपा तब से सेना पर निर्भर थी. शिवसेना के बिना भाजपा के बंद भी कामयाब नहीं होते थे. इसके अलावा दोनों दलों के बीच गठबंधन की वजह से भाजपा के मतदाताओं को बहुत सारी सीटों पर शिवसेना को ही वोट देना पड़ता था, लेकिन इस बार स्थितियां बदल गईं. भाजपा के मतदाता को पहली बार अपने दल को वोट देने का विकल्प मिला और उसने अपनी इच्छानुसार वोट डाला.

विजापुरकर मानते हैं कि शिवसेना की स्थिति कमजोर हुई है, वरना शिवसेना के कद्दावर नेता पहली बार चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों से नहीं हारते. इस बार शिवसेना के दिग्गज सुभाष देसाई भाजपा की विद्या ठाकुर से हार गए. हालांकि विजापुरकर यह भी मानते हैं कि भाजपा और मनसे के साथ मुकाबला करते हुए उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी को जिस तरह 63 सीटें जिताकर लाए हैं, वह भी बाल ठाकरे के बगैर, यह छोटी बात नहीं है. उन्होंने सेना की छवि को थोड़ा सौम्य बनाने की कोशिश की है.

‘मोदी से मुलाकात ने चुनाव में मुझे बराबरी का मौका दिया है’

फोटोः फैजल खान
फोटोः फैजल खान

मोदी से मुलाकात से आपकी राजनीति में क्या बदलाव आए हैं?
हमें चुनाव के नतीजों का इंतजार करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि हमारी पार्टी का प्रदर्शन कैसा रहता है. इसी से पता चलेगा कि मोदी साहब के साथ मेरी मुलाकात फायदेमंद साबित हुई है या नुकसानदेह. मेरे समर्थक इस मुलाकात से खुश हैं. प्रधानमंत्री के साथ मेरी मुलाकात ने मुफ्ती और अब्दुल्ला को नाराज किया है. उस मुलाकात के बाद मुझे जो बराबरी का मौका मिला है उससे वे दुखी हैं. इससे पहले वे आसानी से मुझे आतंकवादी करार दे देते थे और इस बात ने प्रशासनिक और सुरक्षा मशीनरी को मेरे खिलाफ कर दिया. अब वे मेरे साथ वह सब नहीं कर सकते जो पहले करते थे. प्रधानमंत्री के साथ हुई मुलाकात ने मेरे प्रति विरोध की भावना को खत्म कर दिया है. एक वक्त था जब अपनी पत्नी के वीजा के लिए मैंने तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम से मिलना चाहा था और मेरा अनुरोध दो साल तक लंबित रहा. नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी और कांग्रेस को उम्मीद नहीं थी कि अब ऐसा होगा. यह बात उनके भीतर असुरक्षा पैदा कर रही है.

अगर चुनाव में बढ़िया प्रदर्शन के बाद भाजपा आपको मुख्यमंत्री बनाने की पेशकश करती है तो आप क्या करेंगे?
मैं उनसे कहूंगा कि मैं बहुत सामान्य-सा आदमी हूं, मैं मुख्यमंत्री बनूंगा, लेकिन मैं सत्ता में आने के लिए वे सारे काम नहीं करूंगा जो अब्दुल्ला और मुफ्ती ने किया. मैं उनसे कहूंगा कि आइए मिलकर राज्य के सभी तीन क्षेत्रों के विकास के लिए काम करते हैं. लेकिन मैं राज्य के हित और अपनी राजनीति के साथ समझौता नहीं करूंगा. और जो लोग मुझ पर इल्जाम लगाते हैं कि मैं भाजपा के एजेंडे को आगे बढ़ा रहा हूं, वे पहले अपने अंदर झांककर देखें कि उन्होंने सत्ता के लिए क्या-क्या किया है.

मैं मोदी साहब से कुछ मिनट के लिए मिला और मुफ्ती साहब चेतावनी दे रहे हैं कि अनुच्छेद 370 को खतरा है. मेरी मीडिया से यही शिकायत है कि कोई भी अनुच्छेद 370 हटाने की बात नहीं कर रहा है. राज्य की राजनीति में जो गिरावट आई है उसके लिए मुफ्ती जिम्मेदार नहीं हैं? क्या उमर अब्दुल्ला का परिवार इस बर्बादी में शामिल नहीं था? तो फिर मीडिया उन्हें अनुच्छेद 370 के रक्षक के तौर पर क्यों पेश कर रही है? अगर अनुच्छेद 370 कोई 10 मंजिला इमारत थी, तो आज वह महज एक मंजिला रह गई है. ये पार्टियां केवल डर पैदा कर रही हैं. कुछ लोग भयभीत भी हैं. उनको पता ही नहीं है कि दरअसल डरने की बात है भी या नहीं. मुफ्ती और अब्दुल्ला इस हालत के लिए जिम्मेदार हैं.

आपकी राजनीति क्या है? अलगाववाद को छोड़कर मुख्यधारा की राजनीति में आने के बाद भी लोगों को साफ समझ में नहीं आ रहा है. कश्मीर समस्या के हल के लिए आपने जो ‘अचीवेबल नेशनहुड’ का फार्मूला तय किया था, उसी के हिसाब से राजनीति करेंगे?
जी हां मैं ‘अचीवेबल नेशनहुड’ से प्रभावित रहूंगा.बल्कि इसके हर शब्द से. लेकिन मुझे यह भी पता है कि उसमें लिखे शब्द ईश्वर के लिखे नहीं हैं. मेरी इच्छा है कि एक बहस शुरू हो. एक बार बहस पैदा हो जाए तो फिर हम आम सहमति से हल निकाल सकते हैं. ‘अचीवेबल नेशनहुड’ के आर्थिक पहलू एक सभ्य समाज के लिए बेहद व्यावहारिक हैं. हमें खुद को अंदर और बाहर से आर्थिक तौर पर आजाद करना होगा. मैं लोगों का आर्थिक सशक्तीकरण चाहता हूं. मेरा तात्पर्य है, केंद्र हमें आर्थिक रियायतें दे न कि खैरात. जहां तक बात राज्य के राजनीतिक सशक्तीकरण की है, तो हम केंद्र और राज्य के बीच सत्ता में साझेदारी के समझौते और राज्य की संपन्नता के बारे में बात कर रहे हैं. मेरा मानना है कि राज्य में संपन्नता और सक्षमता होनी चाहिए. मैं आंतरिक स्वायत्तता की बात नहीं कर रहा हूं.

आपकी पत्नी आस्मा जो जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के संस्थापक अमानुल्ला खां की बेटी और एक पाकिस्तानी नागरिक हैं, मोदी के साथ आपकी मुलाकात पर उनकी क्या प्रतिक्रिया रही?
वह मुझसे क्या कहेंगी? उनके अपने प्रधानमंत्री मोदी से मिलते हैं. प्रधानमंत्री से मिलना कोई पाप नहीं है. मुफ्ती भी उनसे मिलते हैं, अब्दुल्ला भी मिलते हैं और उनको इसमें कोई शर्म नहीं है. इसका असर उनकी राजनीति पर नहीं दिखता.

इस चुनाव में आपको लेकर जो विवाद उठे हैं उन्हें देखते हुए क्या आप अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं?
जी हां,  मैं डर महसूस करता हूं. इस चुनाव से पहले कभी मुझे लेकर इतनी नकारात्मक बातचीत नहीं हुई. मैं हमेशा अपने समर्थकों के बीच रहा. कुछ भी हो सकता है. कुछ खुफिया खबरें भी हैं. यही वजह है कि मैंने कम से कम प्रचार अभियान के दिनों में जैमर लगाने का अनुरोध किया था लेकिन वह मिल नहीं सका.

आतंकवाद की नई सीमा : बांग्लादेश!

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बर्धमान में दो अक्टूबर को हुए धमाके के बाद उत्तर-पूर्व भारत में सक्रिय सभी जेहादी समूहों की गतिविधियां आंतरिक सुरक्षा के लिए नई परेशानी बनकर प्रकट हुए हैं. पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले के खागरगढ़ गांव में स्थित एक घर में हुए विस्फोट के बाद बंगाल से लेकर असम तक कई संदिग्ध लोगों को गिरफ्तार किया गया. पकड़े गये सभी लोगों का संबंध बांग्लादेश के प्रतिबंधित संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन से बताया जा रहा है.

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने बर्धमान मामले की जांच में पाया कि असम के कई क्षेत्रों में इस्लामी आतंकियों ने पनाह ले रखी है. असम में जेहादी तत्वों को बढ़ानेवाले प्रमुख संदिग्ध शाहनूर आलम समेत कई लोगों की गिरफ्तारियां हुई हंै. जबकि दो अन्य संदिग्धों को लगभग दो महीने तक फरार रहने के बाद पकड़ा गया है. ऐसा पहली बार हुआ जब दिल्ली से दूर गुवहाटी में केंद्रीय गृहमंत्री ने सभी राज्यों के डीजीपी और आईजीपी के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर बैठक की. गुवाहाटी को इस बैठक के लिए चुनकर शायद गृह मंत्रालय पूर्वोत्तर राज्यों में आंतकवाद को बढ़ावा देनेवाले समूहों को कड़ा संदेश देना चाहता है.

इस बैठक में सुरक्षा मामलों के सभी शीर्ष अधिकारियों ने हिस्सा लिया. इस कॉन्फ्रेंस में सभी राज्यों के डीजीपी, आईजीपी, संघशासित प्रदेश और सभी अर्ध सैनिक बलों (बीएसएफ, डीसीपीडब्लू, एनसीआरबी, एनएचआरसी) के प्रमुख शामिल हुए. सूत्रों के हवाले से आ रही जानकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर बैठक को गुवाहाटी में कराए जाने का निर्णय लिया गया. पीएम ने गृह मंत्रालय को दिए निर्देश में स्पष्ट किया है कि देश के सभी हिस्सों में इस तरह के कार्यक्रम होते रहने चाहिए. इसके जरिए पिछड़े और दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचने की कोशिश है. गुवाहाटी हमेशा से उग्रवादी गतिविधियों के कारण भी चर्चा में रहा है. अब जब गुवाहाटी आतंकवाद के संभावित केंद्र के रूप में सामने आ रहा है, तब केंद्र सरकार ने इस इलाके में सुरक्षा प्रमुखों की बैठक करके चरमपंथियों को एक संदेश देने की कोशिश की है. मौजूदा सरकार आतंकी समूहों को यह संदेश भी देना चाहती है कि पिछली सरकार के उलट यह सरकार किसी सूरत में आतंकी गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं करेगी और उनसे सख्ती से निपटेगी.

दो दिनों के कॉन्फ्रेंस की शुरुआत गृहमंत्री राजनाथ सिंह के उद्घाटन भाषण से हुई. इस मौके पर राजनाथ सिंह ने ईराक में सक्रिय आतंकवादी संगठन आईएसआईएस को लेकर चिंता जाहिर की और कहा देश की सुरक्षा के लिए यह बड़ा खतरा है. उन्होंने कहा, ‘इस्लामिक स्टेट को हम खतरनाक चुनौती मानते हैं. हमारे देश में भी कुछ युवा उनके विचार से प्रभावित हो रहे हैं.’ साथ ही उन्होंने अलगाववादी ताकतों को यह संदेश भी दिया कि देश की एकता और अखंडता के लिए सभी देशवासी संगठित हैं. उन्होंने कहा कि देश की आजादी के लिए मुसलमानों ने भी उसी तरह त्याग किया है, जैसे हिंदुओं ने. अलकायदा जैसे संगठन अपने इरादों में कभी कामयाब नहीं हो सकते, लेकिन इन संगठनों से जुड़े खतरे को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते.

असम का इस्तेमाल घुसपैठियों ने पश्चिम बंगाल तक पहुंचने के लिए एक सुरक्षित रास्ते के रूप में किया है. एनआईए के अनुसार कुछ गैर सरकारी संगठनों ने असम में बांग्लादेश के प्रतिबंधित संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन को असम में अपना बेस स्थापित करने में मदद की. जांच एजेंसी के राडार पर ऐसे कम से कम आठ एनजीओ हैं. इन संगठनों ने प्रत्यक्ष तौर पर जमात-उल-मुजाहिदीन को अपनी स्थिति मजबूत करने में सहायता की. जमात-उल-मुजाहिदीन ने दो चरणों में इस ऑपरेशन को अंजाम दिया. खुफिया विभाग की जानकारी के मुताबिक पिछले चार सालों के दौरान लगभग 180 घुसपैठिए भारत आए हैं. असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने भी स्वीकार किया है कि अलकायदा असम के जमीन पर अपना संगठन बनाने की कोशिश कर रहा है.

असम के रास्ते घुसपैठिए पश्चिम बंगाल तक सुरक्षित पहुंच जाते हैं. एनआईए के अनुसार कुछ गैर सरकारी संगठन इसमें जमात-उल-मुजाहिदीन का सहयोग कर रहे हैं

शाहनूर आलम के एनआईए और असम पुलिस के हत्थे चढ़ने के बाद कई चौंकानेवाली जानकारियां सामने आई हैं. आलम की पत्नी सुजिना बेगम भी उसके साथ ही पकड़ी गई थी. आलम जमात-उल-मुजाहिदीन के वित्तीय मामलों का प्रमुख था. बेगम की ट्रेनिंग बंगाल के सिमुलिया मदरसे में हुई थी. अपने पति की ही तरह सुजिना बेगम भी संगठन की गतिविधियों में सक्रिय थी. उसका काम मुख्य रूप से असम में महिलाओं के बीच जेहाद की भावना मजबूत करना था. इस काम के लिए उसे खास तौर पर एक ही महीने में तीन बार ट्रेनिंग भी दी गई थी. साथ ही उसके साथ राज्य की कुछ और महिलाओं को भी मदरसे में इसी तरह की ट्रेनिंग दी गई. असम के आतंकी संगठनों का संपर्क पिछले कई सालों से बांग्लादेश के आतंकी संगठनों खास तौर पर हरकत-उल-जिहादी इस्लामी के साथ है. इसी सहयोग के बदौलत हैदराबाद में हुजी-बी शाहिद बिलाल के नेतृत्व में अपना संगठन कायम करने में सफल हो सका.

गुवहाटी के प्रतिष्ठित पत्रकार राजीव भट्टाचार्य बताते हैं, ‘केंद्र सरकार असम की राजधानी में कॉन्फ्रेंस कर अलगाववादियों और आतंकी सगठनों को कड़ा संदेश देना चाहती है. इस बैठक के जरिये सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि पूर्वोत्तर के राज्य सरकार की प्राथमिकता में हैं.’ असम के पूर्व डीजीपी हरे कृष्ण डेका का कहना है कि इस कॉन्फ्रेंस के गुवहाटी में होने के पीछे कई तर्क हैं. सबसे प्रमुख बात यह है कि पूरे देश में सुरक्षा की दृष्टी से यह संवेदनशील और महत्वपूर्ण क्षेत्र है.

सरकार के मुताबिक आतंक का नया रूप जिहादी आतंकवाद है. पुलिस के आधुनिकीकरण की मांग के साथ सभी राज्यों के पुलिस प्रमुख एक बात पर एकमत दिखे कि देश में नये तरह के आतंक का स्वरूप उभर रहा है. राज्यों के डीजीपी के साथ हुई बैठक में एक बात स्पष्ट हो गई कि देश की सुरक्षा के लिए चिंता अब नक्सलवाद के अलावा बांग्लादेश के रास्ते आ सकनेवाला आतंकवाद भी है. धर्म के नाम पर फैल रहा यह जहर धीरे-धीरे पूरी दुनिया पर अपना असर दिखा रहा है और इतना तय है कि भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा.

उपन्यास अंश: और सिर्फ तितली

Titli

वह शायद तितली ही थी. तितली जैसी खूबसूरत. तितली की ही तरह उड़ती थी. कभी इधर फुदक कर बैठती तो कभी उधर. रंग-बिरंगी तितलियों जैसे ही उसके सपने रंग-बिरंगें थे. सपने थे कि उससे कई बार रूठे, लेकिन उसने तितली जैसी अपनी सोच नहीं बदली. तितली तो ऊंची उड़ान भर नहीं सकती थी. लेकिन उसके सपनों में ऊंची उड़ाने आती थीं. उड़ने के लिए वह कई बार तितली से चील बन जाती थी. घोसले से अपना निवाला खींच लाने वाली शिकारी निगाहों के साथ. असल में वह चील बनना नहीं चाहती थी. वह तितली ही रहना चाहती थी. दमकते और महकते रंग-बिरंगे फूलों के बगीचों को ही अपना रैन बसेरा बनाना चाहती थी. लेकिन उसे तितली नहीं रहने दिया गया और वह चील बन गई. दिलचस्प यह था कि उसने चील के गुणों को अपनाया दुर्गणों को नहीं. चील की तरह कभी उसने अपने भाई-बंधुओं को अपना निवाला नहीं बनाया. कई बार उसे इस बात पर असमंजस भी होता था कि आखिर वह चील है या कि तितली. इस द्वंद्व के बावजूद वह चील में तितली बनी रही. तितली. सिर्फ तितली.

उस दिन की सुबह कुछ अजीब सी थी. सोफिया स्कूल की हवा में उदासी भी थी और खुशी का आलम भी. जनवरी के दिन थे. सूरज तो पूरब से निकला था. लेकिन कोहरे के बीच में उसकी चमक धुंधला सी गई थी. किरणें तो उससे फूटी थीं लेकिन बादलों को चीरने का उनमें शायद माद्दा नहीं था. घंटी बज चुकी थी. एसेम्बली के लिए बच्चे मैदान में एकत्रित हो गए थे. अधिकांश बच्चों ने अपने वजन से अधिक ऊनी कपडे़ पहन रखे थे. कुछेक बच्चों के पास ठंड से लड़ने वाले पर्याप्त स्वेटर और जैकेट नहीं थे. ऐसे बच्चों के गालों पर गुलाबी चमक साफ दिख रही थी. शायद ठंड से उनके गाल जल गए थे. वे दांत किटकिटाकर ठंड से लड़ने की अधूरी लड़ाई लड़ रहे थे. कहने को तो सोफिया स्कूल इंटरनेशनल स्कूल था. लेकिन गरीब बच्चों को यहां दलितों की ही तरह देखा जाता था. स्कूल में ये बच्चे कोढ़ में खाज की तरह थे. स्कूल मैनेजमेंट को गरीब बच्चों को लेना अनिवार्य था, क्योंकि वे सरकारी जमीनों में बने थे और तमाम अनाप-सनाप सुविधाएं लेते थे. लेकिन मैनेजमेंट गरीब कोटे से आने वाले छात्रों के साथ वह हर बदसलूकी करता था, जिससे वह अपनानित हों और खीज कर घर बैठ जाएं. कई बच्चे तो घर बैठ भी जाते थे. लेकिन कुछ बच्चे पूरी ढिठाई के साथ जमे रहते थे. वे यह मान लेते थे कि अच्छे स्कूल में पढ़ने के लिए यदि वे पैसे नहीं दे सकते हैं तो उन्हें अपमान से उसकी कीमत चुकानी ही होगी. ऐसे ही बच्चों में एक था उदय प्रकाश.

बात छूट न जाए खुशी और उदासी की. असल में उस दिन बच्चों को अपने मन का ब्रेकफास्ट लाने की उनकी तान्या मैम ने छूट दी थी. वजह थी उनका क्लास में आखिरी दिन होना. स्कूल में घर से खाने-पीने का सामान लाने की मनाही थी. स्कूल में ही उन्हें कांटीनेंटल से लेकर देसी हर तरह का खाना-नाश्ता मिलता था. खाने के नाम पर मैनेजमेंट मोटी फीस वसूलता था. उस दिन सैंडविचेस, चिप्स, चाकलेट, केक्स, पास्ता वगैरह-वगैरह सब कुछ मेनू में था. सबकी अपनी-अपनी पसंद का. यहां बात जरूर बता देना चाहिए कि गरीब बच्चों के हिस्से स्कूल से मिलने वाले खाने का एक टुकड़ा भी नहीं आता था. वे अपनी रूखी-सूखी घर से लाते थे. बच्चों के लिए दुख की बात यह थी कि अब अगली क्लास में उनकी तान्या मैम उनके साथ नहीं रहेंगी. इसलिए बच्चों के चेहरों में एक अजब सी उदासी थी. पहली कक्षा के इतने छोटे बच्चे भी सामूहिक रूप से उदास हो सकते हैं किसी के लिए, यह यहां देखने की बात थी. उदासी और खुशी के बीच क्लास रूम में जबर्दस्त पार्टी हुई. सबने मिलकर खाया-पीया. नो लड़ाई-झगड़ा. पार्टी के बाद सभी बच्चे स्कूल बस में बैठ कर स्पोर्ट कामप्लेक्स गए. वहां फोटो सेशन होना था. बस में सभी बच्चे तान्या मैम के साथ सीट साझा करना चाहते थे. लेकिन तान्या मैम तो अकेली थी सबके साथ बैठ नहीं सकती थीं. बच्चे आपस में तान्या मैम के साथ बैठने के लिए बस में गुत्थम-गुत्था हो गए. तभी तान्या मैम जोर से चीखीं- ‘तुम सब इस तरह से करोगे तो मैं बस से उतर जाऊंगी और फोटो भी नहीं खिचवाऊंगी.’

इस चीख के साथ ही बच्चे एक-एक करके अपनी सीटों में चुपचाप जा बैठे. तान्या मैम ने तय किया कि वह सारन्या के साथ बैठेंगी. सारन्या तान्या मैम पर अपना अधिकार समझती थी. तान्या की असल चेप थी सारन्या. जहां-जहां तान्या मैम वहां-वहां सारन्या. अपनी छोटी से छोटी बात वह तान्या मैम को बता देती थी. सारन्या देखने में भी बिल्कुल गुड़िया सी थी. तान्या मैम भी किसी गुड़िया से कम नहीं लगती थीं. छोटे कद की गोल-मटोल. खिला-खिला रंग. गालों में डिंपल. और काटन के रंग-बिरंगे एथनिक कपड़ों की शौकीन. टिच-विच रहने वाली. दिल्ली में यह उनके करियर की पहली नौकरी थी. उनकी उम्र कोई ज्यादा नहीं थी. स्कूल में सभी टीचर उन्हें बच्चा टीचर समझते थे. वजह थी कि अधिकांश टीचरों की उम्र चालीस के आसपास थी या फिर उससे ज्यादा. उपदेश देना तो उनका बनता था. कुछ अधेड़ टीचरें भी थीं, जो शायद टीचिंग को नौकरी से ज्यादा कुछ नहीं समझती थीं. कम उम्र की होने के चलते हर टीचर तान्या मैम को उपदेश दे कर चलते बनता था. वैसे थी वह बेहद होशियार. मौके की नजाकत के चलते ही वह टीचरों के मुंह नहीं लगती थी. वह तर्कों के साथ पलटवार कर सकती थी, लेकिन नौकरी कच्ची होने के चलते वह ऐसा नहीं करती थी. वैसे वह चाह ले तो किसी की भी ऐसी-तैसी करने में पूरी सक्षम थी. अतीत के कारनामे उनके बेहद हैरतंगेज और खतरनाक रहे हैं. उनके कारनामों पर आगे कहीं.

सारन्या को किसी ने कभी चुप बैठे नहीं देखा था. चुलबुली. शैतानों की नानी. उस दिन वह तान्या मैम के पास बस चलने के बाद काफी देर तक चुप बैठी रही. मौका देख कर उसने तान्या मैम के गालों में हाथ फेरते हुए हवा में एक किस उछाल दिया. फिर धीरे से बोली- ‘मैम आप गुस्सा न करो तो मैं एप्पल जूस पी लूं.’

इतनी प्यारी रिक्वेस्ट के आगे तान्या मैम न ना कर सकीं. उन्होंने हां में अपना सिर हिला दिया. तान्या ने अपने बैग से एप्पल जूस निकाला और चोरी-चोरी शिप करने लगी. बस के दूसरी ओर सीट पर बैठी सुप्रिया गुलाटी को यह नागुजार लगा. वह अंदर से सुलग उठी. वैसे तो वह तत्कालिक प्रतिक्रिया दे सकती थी. लेकिन बात को मन में लेकर बैठ गई. ऐसे मामलों में वह किसी की परवाह नहीं करती थी. एक बार तो उसने स्कूल की एकेडमिक हेड इशीता पास्ता को पेपर वेट खींच कर मार दिया था. उस इशीता पास्ता को जिससे पूरा स्कूल थरथराता है. उनका गुनाह सिर्फ इतना था कि उन्होंने अपने ऑफिस में सुप्रिया के गाल प्यार से थपथपा दिए थे.

बस स्पोर्टस कामप्लेक्स पहुंच चुकी थी. मैडम  तान्या सबसे पहले बस से नीचे उतरी और एक-एक कर बच्चों को उतारने लगीं. तभी सारन्या अपने नन्हें हाथों में अपना और मैडम का बैग लिए उतरी. तिरछी नजरों से उसने पहले मैडम को देखा. कुछ-कुछ तुतलाते हुए लाड़ से बोली- ‘आप भी मैम कितनी भुलक्कड़ हो कि अपना बैग ही सीट पर छोड़ आईं. अगर मैं न होती तो बैग कोई चुरा लेता.’

इस पर तान्या मैम मुस्करा दीं और उसके नन्हे हाथों से उन्होंने बैग ले लिया. सारन्या की इस अदा पर तान्या मैम को दुलार आ गया और उन्होंने उसे गोद में उठा लिया. सारन्या को मैम की गोद में देख कर सुप्रिया अंदर से भभक पड़ी. वह कुछ हरकत करती की उससे पहले सारे बच्चे फोटो सेशन के लिए कामप्लेक्स में बने एक स्टेज पर की ओर बढ़ गए. तान्या मैम ने लंबाई के हिसाब से बच्चों का जमाना शुरू किया, ताकि किसी बच्चे का फोटो में चेहरा न छिप जाए. सुप्रिया की लंबाई कुछ बच्चों से ज्यादा थी. नतीजतन उसे दूसरी पंक्ति में दाहिने ओर जगह मिली. उसने देखा कि मैम की चहेती सारन्या पहली पंक्ति में बीचों बीच खड़ी है. अब सुप्रिया के गुस्से की कोई सीमा नहीं रही. वैसे भी कोई कैसे सोचता है, क्या करता है, क्या बोलता है, वह इन सबसे बेपरवाह थी. वह क्लास में भी अकेले रहने वाली लड़की थी. दूसरे बच्चे उससे दूरी बना कर ही चलते थे. वह आवाज, सुंगध, स्पर्श, प्यार, घूरने आदि किसी बात पर रिएक्ट कर सकती थी. उसे दुनिया के हर शख्स से संवाद में मुश्किल होती थी. अपने माता-पिता से भी. उसकी अपनी दुनिया थी या फिर यूं कहा जा सकता है कि वह उसमें बचपन से जकड़ी हुई थी. असल में सुप्रिया ऑटिज्म नामक बीमारी से ग्रस्त थी. ऑटिज्म एक प्रकार का न्यूरो बिहैविरल डिसआर्डर है. इसके लक्षण तीन-चार साल की उम्र से दिखने लगते है. आसपास के बच्चे जब खेलकूद में लगे रहते थे, तो सुप्रिया अपनी दुनिया में खोई रहती थी. उसे खिलौनों से भी नफरत थी. उसने कीमती से कीमती खिलौनों को कबाड़ बना दिया था.

सुप्रिया को असमाजिकता का दौरा पड़ा. वह अपने से बाहर हो गई. पंक्ति को तोड़ते हुए वह सीधे फोटोग्राफर के पास पहुंची और उसके कैमरे की बेल्ट से लटक गई. वैसे तान्या मैम और बच्चे उसकी ऐसी हरकतों से वाकिफ थे, तो तमाशा को सबने तमाशा न समझा. तान्या मैम सारन्या की ही तरह सुप्रिया का भी बहुत ख्याल रखती थी. उन्होंने सुप्रिया को काबू करने की कोशिश की, लेकिन वह काबू नहीं हुई. अंतत: वह फोटो शूट में शामिल नहीं हुई. उसके बिना ही फोटो शूट हुआ. तान्या मैम को इस बात से बहुत दुख हुआ. वह स्कूल लौटते हुए बस से लेकर क्लास तक उसके साथ रहीं. उसे दुलारा-पुचकारा. वह तब जा कर शांत हुई, जब तान्या मैम ने सायोना के कैमरे उसे उसके साथ फोटो खिंचवाई.

लंच ब्रेक की घंटी बज चुकी थी. पार्टी तो पहले ही हो चुकी थी, तो सबके पेट फुल थे. बच्चे अपने-अपने कैमरे से मैम के साथ फोटो खिंचवाने लगे. तभी उदय प्रकाश ने अपने टिफिन से केक का एक टुकड़ा निकाला. बीते कल उसका जन्मदिन था. वैसे तो हर बच्चे के जन्मदिन पर क्लास में हैप्पी बर्थडे मनाया जाता था. जिस बच्चे का जन्मदिन होता था, वह बच्चा अपने घर से सबके लिए कुछ न कुछ गिफ्ट लाता था. और केक भी कटता था. लेकिन उदय प्रकाश के पिता के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह क्लास की इस रस्म को पूरा कर सकते. वे एक सामान्य से चौकीदार की नौकरी करते थे और कल्लन साहब की कोठी के आउट हाउस मे रहते थे. कल्लन साहब नेक दिल इंसान थे. उन्हीं की बदौलत उदय प्रकाश को सोफिया इंटरनेशनल में एडमीशन मिल गया था. पिता तो पिता ठहरे. वे उदय प्रकाश का मन नहीं दुखाना चाहते थे. इसीलिए उन्होंने उदय प्रकाश का मन रखने के लिए अपने घर में ही एक छोटा सा केक कटवा दिया था, ताकि उसे दुख न हो. उसी केक का एक टुकड़ा वह अपनी गुरू मैम के लिए लाया था. शायद गुरू दक्षिणा के तौर पर. सहमे हुए उसने केक का टुकड़ा मैम की तरफ यह कहते हुए बढ़ाया- ‘मैम इनकार मत करियेगा. बडे़ दिल से लाया हूं. कल मेरा जन्मदिन था. खाने से इंकार करेंगी तो मैं तो नाराज नहीं होऊंगा ये केक नाराज हो जायेगा.’

तान्या मैम इमोशनल हो गईं उसकी इस बात पर. उन्होंने कहा- ‘ये तो मैं खा ही लूंगी पर तुमने कल क्यों नहीं बताया कि तुम्हारा जन्मदिन था. हम सब मिलकर मनाते. चलो कोई बात नहीं आज हम सेलीब्रेट करेंगे तुम्हारा जन्मदिन. बिलेटेड़ हैप्पी बर्थ डे.’

प्यार भरी फटकार उदय प्रकाश को सुनाने के बाद तान्या मैम ने कैंटीन से सैंडविच और चाकलेट मंगवाए. और धूमधाम से उदय प्रकाश का जन्मदिन मनाया. जो बच्चे उदय प्रकाश को अपने से अलग मानते थे, उन्होंने भी उसे विश किया. असल में इस तरह के स्कूलों में नव कुबेर के बच्चे पढ़ते हैं. उनकी दुनिया अमीरी और गरीबी में बंटी होती है. उनके विकास की पहली अंतिम शर्त भेदभाव होती है. ऐसा उनके परिवार के लोग सिखाते हैं. ऐसी बात उन्हें सिखाई जाती है, जो उनके निश्छल मन में होती ही नहीं है. ये गंदा है वो गंदा है, यहां से चीजें शुरू होती है. तान्या मैम ने उनके मनों में उदय प्रकाश के प्रति हमदर्दी पैदा करके इस खाई को पाटने की कोशिश की. लेकिन वे जिस समाज में रहते हैं, क्या वे इस सबक को याद रख पायेंगे. याद रखने की कोशिश भी करें ये तो भी शायद ये ज्ञान की ऊंची इंटरनेशनल दुकानें उन्हें ऐसा न करने दें. आखिर गंदा है पर धंधा जो ठहरा.

अब विदाई का समय आ गया था. बच्चों को पता था कि उनका आज इस क्लास में आखिरी दिन है. तान्या मैम अब अगले क्लास में उन्हें नहीं मिलने वाली हैं. बच्चों की आंखें भर आईं थीं. नंदनी ने तान्या मैम को अपने हाथों से बनाया एक चित्र भेंट किया. उस चित्र में रंग बिरंगें फूल थे. उसमें एक तितली भी थी. उसमें लिखा था- ‘आई लव यू तान्या मैम…’

(वाणी प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित)