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किसकी इच्छा से मृत्यु

सरकार और विभिन्न धर्म ‘लिविंग डेड’ के बारे में समान रूप से अनिश्चितताओं से घिरे हैं. इनके बीच एक समानता देख सकते हैं, वो ये है कि कैसे दोनों कुछ ‘विशेष’ लोगों को अपनी मृत्यु का अधिकार चुनने की आजादी दे रहे हैं. सरकार द्वारा जंग के मैदान में भेजे जाने वाले सैनिक और धर्म के पालन के नाम पर आहार छोड़कर मृत्यु के लिए उपवास कर रहे व्यक्ति दोनों अपनी परिणिति जानते हैं और ऐसे में कानून या धर्मों का इच्छा मृत्यु को वैध न मानना अस्वाभाविक है. देश के लिए जान देने वालों को शहीद कहते हैं और धर्म के लिए ये त्याग है. 42 साल तक अचेत रहते हुए भी अपने अस्तित्व के लिए लड़ी बलात्कार पीडि़ता अरुणा भी साहस की प्रतिमूर्ति कही जा रही हैं.

कुंठा में आकर मरीज खुद को मार देने की बात कहते हैं पर जैसे ही वो अपने करीबियों के बीच होते हैं तो अपनी कही ऐसी बातें भूल जाते हैं

इच्छा मृत्यु को लेकर चल रही तमाम पेचीदा बहसों के बावजूद जो इसका समर्थन करते हैं वो अपने विश्वास को लेकर दृढ़ हैं. गोवा की बर्नाडाइन अपनी मां के साथ घटे अनुभवों को दोहराना नहीं चाहतीं, वो अभी से अपने  बेटे को समझाती हंै, ‘मैं अब भी इच्छा मृत्यु को गलत नहीं मानती, कुछ भी हो जाए, पर उन्हें मुझे वेंटीलेटर पर मत रखने देना.’

 

उपेक्षा का दर्द

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लखनऊ का ऐतिहासिक रिफह-ए-आम क्लब फिलहाल मुशीर झंझानवी का शेर सुनाता मालूम होता है, ‘कांटा समझ के मुझसे न दामन बचाइए/गुजरी हुई बहार की इक यादगार हूं.’ कभी लखनऊ के इतिहास की आबरू रही ये जगह आज इतिहास का नौहा पढ़ रही है. गोलागंज इलाके में स्थित ये जगह शहर के स्वतंत्रता-संघर्ष, स्वाभिमान और प्रगतिशील चेतना की निशानी है, नया दौर जिसे मिसमार करने पर आमादा है.

अंग्रेजों के दौर में आम हिंदुस्तानियों के लिए खुला ये शहर का पहला क्लब था. इसीलिए इसका नाम रिफह-ए-आम (जन-हित) क्लब रखा गया था. इसी जगह को प्रथम विश्वयुद्ध के समय होमरूल लीग के जलसे के लिए चुना गया था, यहीं पर 1920 में सभा करके महात्मा गांधी ने लखनऊ वालों से असहयोग आंदोलन में जुड़ने की अपील की थी. खिलाफत काॅन्फ्रेंस भी यहीं हुई थी. 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ का पहला अधिवेशन भी यहीं हुआ था जिसकी अध्यक्षता करते हुए प्रेमचंद ने इसी जगह अपना ऐतिहासिक भाषण दिया था. मगर तारीख की दौलत से मालामाल ये जगह आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है. इसकी खूबसूरत इमारत को लोगों ने इस कदर नुकसान पहुंचाया है कि ये नीचे से एकदम कमजोर हो चुकी है. इसमें अवैध कब्जे हो रहे हैं.

इस पर अधिकार के लिए कई पक्षों में जंग छिड़ी हुई है. बिल्डरों और भू-माफिया की बुरी नजर भी इस पर है. इसका ऐतिहासिक मैदान कूड़ा डालने के लिए इस्तेमाल हो रहा है जिस कारण यहां गंदगी का अंबार है. ये नशेड़ियों का भी अड्डा है. इस पर गैर कानूनी ढंग से प्राइवेट बसें खड़ी की जा रही हैं, अवैध दुकानें लग रही हैं. लब्बो-लुअाब ये है कि अदब के शहर में इतिहास की इस धरोहर के साथ बेहद शर्मनाक सुलूक हो रहा है.

रिफह-ए-आम की बदहाली को लेकर शहर में जागरूक नागरिकों में बहुत रोष और निराशा है. वे अपने स्तर पर इसको बचाने की छोटी-मोटी कोशिश भी करते रहते हैं. पिछले दिनों एक स्कूल के छोटे-छोटे बच्चों ने सरकार से रिफह-ए-आम क्लब को बचाने की अपील करते हुए जुलूस निकाला. बच्चों ने आसपास के लोगों से इसे साफ रखने का निवेदन भी किया. लंबे समय से लखनऊ में ये मांग उठती रही है कि प्रदेश अथवा केंद्र की सरकार इस ऐतिहासिक जगह को अपने अधिकार में लेकर इसका कायाकल्प करे. लेकिन सरकारें नया लखनऊ आबाद करने में ही इस कदर मसरूफ रहती हैं कि पुराने लखनऊ की पामाली पर गौर करने के लिए उनके पास वक्त नहीं बचता. पिछले कुछ सालों में प्रदेश की अलग-अलग सरकारों ने नए लखनऊ में स्मारकों, पार्कों और मैदानों के निर्माण पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च किए हैं, मगर पुराने शहर की इस यादगार पर मामूली रकम खर्च करना भी सरकारों को गवारा नहीं है. केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भी इसके जीर्णोद्धार में दिलचस्पी नहीं लेते.

रिफह-ए-आम की बदहाली पर अवधी संस्कृति के  जानकार योगेश प्रवीन कहते हैं, ‘इस जगह की हालत राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक गौरव को लेकर हमारी शोशेबाजी की पोल खोलती है. पता चलता है कि इतिहास को लेकर हम असल में कितने संजीदा और संवेदनशील हैं. ये इस इमारत की बदकिस्मती है कि ये लखनऊ में है, जहां राष्ट्रीय इतिहास को कूड़े की वस्तु समझा जाता है. यही अगर किसी सही जगह होती तो देशप्रेमियों का तीर्थ कहलाती.’ क्लब के पास ही रहने वाले मासूम रजा चाहते हैं कि इसे बचाने के लिए सरकार आगे आए. वे कहते हैं, ‘आज जो स्थिति है उसमें बिना सरकार की मदद के इसे बचाया नहीं जा सकता. हम लोग लंबे वक्त से इसके लिए गुहार लगा रहे है. मीडिया बार-बार इस जगह का सवाल उठा रहा है लेकिन इसके बावजूद स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. ये कोई मामूली जगह नहीं है. सरकार को चाहिए कि इसे अपने अधिकार में लेकर यहां जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण का काम करवाए और फिर इसे राष्ट्रीय चेतना और प्रगतिशील साहित्य के केंद्र के रूप में विकसित करे, ताकि लोगों को इसके महत्व का अंदाजा हो सके.’

राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक ये देसी क्लब आज बंद और बदहाल है जबकि अंग्रेजों के अत्याचार वाला एमबी क्लब अपनी सभी क्रूर रिवायतों के साथ जिंदा है

सितम तो ये है कि इतनी  बेशकीमती इमारत के निर्माण की सही तिथि शहर में किसी को नहीं पता. हर किसी की इसे लेकर अलग-अलग राय है. इतिहासकार रौशन तकी इसे बादशाह नासिरूद्दीन हैदर के जमाने का यानी 1830 के आसपास का बताते हैं. महमूदाबाद राजघराने से ताल्लुक रखने वाले राजकुमार अली नकी खां इसे वाजिद अली शाह के दौर का यानी 1850 के आसपास का बताते हैं. वहीं लखनऊ के नवाबी खानदान से जुड़ाव रखने वाले जाफर मीर अब्दुल्ला इसे 1857 के गदर के बाद का बना हुआ बताते हैं. हालांकि निर्माण काल को लेकर अधिकृत संदर्भ या प्रमाण कोई नहीं दे पाता. बावजूद इसके इमारत की स्थापत्य कला और इसके निर्माण में इस्तेमाल हुई सामग्री को देखते हुए इतना तो तय हो जाता है कि ये खूबसूरत इमारत 19वीं सदी में ही वजूद में आई होगी. हालांकि लखनऊ में इस जगह की धूम इसके निर्माण के कुछ सालों बाद शुरू हुई. उस दौर में जब यहां रिफह-ए-आम नाम से एक अनूठा क्लब शुरू हुआ. इमारत के निर्माण काल की तरह ही क्लब की शुरुआत की सही तारीख किसी को नहीं मालूम पर इसके शुरू होने की कहानी बड़ी दिलचस्प है. एक दौर में लखनऊ में मोहम्मद बाग क्लब और यूनाइटेड सर्विसेज क्लब सिर्फ अंग्रेजों और उनके खास मेहमानों के लिए होते थे. आम आदमी का इसमें प्रवेश वर्जित था. इसी से क्षुब्ध होकर अंग्रेजी क्लबों के जवाब के बतौर अवध के कुछ राजाओं-तालुकेदारों ने मिलकर रिफह-ए-आम क्लब की स्थापना की थी. ये हिन्दुस्तानियों का क्लब था. यहां एमबी क्लब की तरह अंग्रेजी वेशभूषा की अनिवार्यता भी नहीं थी. कई तरह के खेल खेलने और लाइब्रेरी की सुविधा भी यहां थी. इस लोकप्रिय स्थल पर शहर के तमाम सार्वजनिक जलसे हुआ करते थे. आजादी के बाद इसकी रौनक धीरे-धीरे घटने लगी और अस्सी का दशक आते-आते ये जगह एक भूली हुई दास्तान लगने लगी.

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गुहार हाल ही में लखनऊ के एक स्कूल के बच्चों ने रैली निकालकर रिफह-ए-आम क्लब को बचाने की अपी की थी

प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक सज्जाद जहीर ने अपनी आत्मकथा ‘रौशनाई’ में रिफह-ए-आम क्लब की अजमत का विस्तार से वर्णन किया है. प्रलेस के पहले सम्मेलन के बारे में बताते हुए वे लिखते हैं, ‘एक जमाना था जब रिफह-ए-आम में बड़े-बड़े तारीखी जलसे और काॅन्फ्रेंस होती थीं. यहीं पर पहले विश्वयुद्ध के जमाने में होमरूल लीग का वह जलसा होना तय हुआ था जो एनी बेसेंट की गिरफ्तारी पर प्रतिरोध जताने के लिए शहर के राष्ट्र भक्तों ने बुलाया था. लेकिन अंग्रेज सरकार ने इसे गैर कानूनी करार दिया था. ये लखनऊ में अपने किस्म की पहली घटना थी. हथियारबंद पुलिस से रिफह-ए-आम भर गई थी और सारे शहर में जबरदस्त सनसनी फैल गई थी. 1920 में यहीं खिलाफत कॉन्फ्रेंस हुई जिसमें अली बंधुओं और मुल्क के तमाम बड़े लीडरों ने शिरकत की. इस मौके पर मौलाना मोहम्मद अली ने लगातार छह घंटे तकरीर की और रिफह-ए-आम के आहाते में अंग्रेजी कपड़ों के बड़े-बड़े अंबार जलाए गए थे. इसके बाद यहीं पर असहयोग आंदोलन के सिलसिले में कांग्रेसियों और खिलाफतियों ने लिबरल पार्टी की कॉन्फ्रेंस में हंगामा करके हॉल पर कब्जा कर लिया और उनके ही प्लेटफार्म से लिबरलों के खिलाफ रिजोल्यूशन पास करवाए थे.’

विडंबना ये है कि राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक ये देसी क्लब आज बंद और बदहाल पड़ा है जबकि अंग्रेजों के अत्याचार वाला एमबी क्लब आज भी अपनी सभी क्रूर, अन्यायी और विभेदकारी रिवायतों के साथ जिंदा है. साधारण वेश-भूषा जैसे चिकन का कुरता-पैजामा और चप्पल पहनकर चलने वाले आम लखनवी का इसमें प्रवेश आज भी सख्ती के साथ वर्जित है. अंग्रेजों के जमाने में एमबी क्लब के ऐसे नियम लखनऊ वालों में रोष पैदा करते थे. अंग्रेजों के जाने के सत्तर साल बाद यही नियम लखनऊ वालों को स्टेटस सिंबल प्रदान करते हैं. उन्हें ‘तहजीब’ वाला बनाते हैं. उन्हें क्यों फर्क पड़े कि रिफह-ए-आम आज किस हालत में है. उनका एमबी क्लब तो बहरहाल गुलजार है… और अब तो यहां साहित्य पर बात करने के लिए महफिलें भी सजने लगी हैं. उसी साहित्य के बारे में बात करने के लिए, जिसके बारे में कभी प्रेमचंद ने रिफह-ए-आम में कहा था, ‘हम जब ऐसी व्यवस्था को सहन न कर सकेंगे कि हजारों आदमी कुछ अत्याचारियों की गुलामी करें तभी हम केवल कागज के पृष्ठों पर सृष्टि करके ही संतुष्ट न हो जाएंगे किंतु उस विधान की सृष्टि करेंगे जो सौंदर्य, सुरुचि, आत्म-सम्मान और मनुष्यता का विरोधी न हो. साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है. उसका दरजा इतना न गिराइए. वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है.’

रिफह-ए-आम को तो भुला दिया गया है. प्रेमचंद किसी को याद हैं?

सरकार का लेखा-जोखा

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मोदी की विदेश यात्राएं

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 बीते 12 महीने में 18 देशों की यात्रा

विदेशी यात्रा के दौरान 53 दिन बिताए

 यात्रा पर कुल खर्चः 317 करोड़ रुपये

57 द्विपक्षीय और 5 बहुपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर हुए

अर्थव्यस्था

16 मई 2014 को शेयर सूचकांक

22,702

17 मई 2015 को शेयर सूचकांक

27,234

मई 2014 में मुद्रास्फीति

7.02 %

अप्रैल 2015 में मुद्रास्फीति

4.87 %

जून 2014 को पेट्रोल* की दर

71.51 प्रति लीटर

मई 2015 को पेट्रोल* की दर

66.29 प्रति लीटर

जून 2014 को डीजल* की कीमत

57.28 प्रति लीटर

मई 2015 को डीजल* की कीमत

52.28 प्रति लीटर

अंतरराष्ट्रीय बाजार में

मई 2014 में कच्चे तेल की कीमत

$109 प्रति बैरल

मई 2015 में कच्चे तेल की कीमत

$66.31 प्रति बैरल

(*दिल्ली में)

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चुनाव
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26 अगस्त 2014: बिहार विधानसभा उपचुनाव में भाजपा ने 10 में से 4 सीटें जीतीं. पहले इन 10 सीटों में से 6 भाजपा की थीं

14 सितंबर 2014: उत्तर प्रदेश, राजस्थान और गुजरात के विधानसभा उपचुनावों में तगड़ा झटका लगा. इन राज्यों में महज चार महीने पहले आम चुनाव में प्रदर्शन जबरदस्त रहा था, लेकिन तीनों राज्यों के उपचुनाव में 24 सीटों में से भाजपा ने 13 सीटें गंवाई

19 अक्टूबर 2014: महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में 288 सीटों में से 122 पर भाजपा ने जीत दर्ज की और पहली बार राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनी

19 अक्टूबर 2014: हरियाणा विधानसभा चुनाव में 90 सीटों में से 47 पर भाजपा ने जीत दर्ज करते हुए बहुमत हासिल किया

23 दिसंबर 2014: भाजपा ने झारखंड चुनाव में 81 में से 37 और आजसू ने 5 सीटें हासिल कर बहुमत हासिल किया.

23 दिसंबर 2014:  जम्मू-कश्मीर में भाजपा को 87 में सेे 23 सीटें हासिल हुईं. भाजपा ने पीडीपी के सहयोग से राज्य में सरकार बनाई.

10 फरवरी 2015: भाजपा को दिल्ली विधानसभा में जोरदार झटका लगा. पार्टी को दिल्ली चुनाव में 70 में से सिर्फ तीन सीटें मिलीं.

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मोदी के जुमले
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 सबका साथ, सबका विकास

मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस

 शासक नहीं, सेवक

रेड कारपेट, नॉट रेड टेप

 मंदिर से पहले शौचालय

प्रधानमंत्री नहीं, प्रधान सेवक

3डीः डेमोक्रेसी, डेमोग्राफी, डिमांड

4पीः पीपुल, पब्लिक, प्राइवेट, पार्टनरशिप

5टीः देश के विकास के लिए सूत्र- टैलेंट, टूरिज्म, टेक्नोलॉजी, ट्रेडिशन, ट्रेड

भारत अब सपेरों का देश नहीं है, हमने दुनिया को माउस (तकनीकी प्रतिभा) से भी प्रभावित किया है

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विवाद
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 सरकार ने एक विधेयक को मंजूरी दी ताकि नृपेंद्र मिश्र को मोदी का प्रमुख सचिव बनाया जा सके.

 केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावेड़कर के जींस पहनने पर विवाद हुआ था.

मीडिया के एक धड़े का दावा है कि केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे के दुर्व्यवहार की खबर पर मोदी ने चुप्पी साध ली क्योंकि राजनाथ सिंह ने इस्तीफा देने की धमकी दी थी. इस मसले पर पीएमओ व भाजपा ने राजनाथ का बचाव किया.

 हिंदुवादी संगठनों का घर वापसी अभियान.

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) की प्रमुख लीला सैमसन ने सरकार पर हस्तक्षेप का आरोप लगाते हुए इस्तीफा दिया.

 मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे पर अपने नाम की धारीवाला सूट पहना.

एनजीओ खासकर ग्रीनपीस और फोर्ड फाउंडेशन पर सरकार नजर रखेगी. ग्रीनपीस से जुड़ी प्रिया पिल्लई के विदेश जाने पर पाबंदी लगाई गई.

 देश के अलग-अलग हिस्सों में कुछ चर्चों में तोड़फोड़ हुई.

 बड़ी संख्या में किसानों की आत्महत्या.

उद्योगपति गौतम अडाणी और मोदी के बीच अंतरंगता को लेकर विवाद बढ़ा. मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान एसबीआई अडाणी इंटरप्राइजेज की ऑस्ट्रेलियाई सहायक कंपनी को खनन के लिए 6000 करोड़ रुपये से ज्यादा ऋण देने पर हुआ. यह राशि क्वींसलैंड में खनन परियोजना के लिए बतौर ऋण के लिए दिए गए.

 मोदी के हालिया चीन दौरे के समय भी अडाणी ने कुछ और व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर किए.

 केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी की शैक्षिक योग्यता को लेकर विवाद गहराया. इसके बाद ईरानी के अमेरिका के येल यूनिवर्सिटी से डिग्री लेने को लेकर विवाद हुआ. स्मृति ने केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन भाषा को हटाकर संस्कृत पढ़ाने की बात की. चार साल के स्नातक पाठ्यक्रम को खत्म करने को लेकर भी विवाद हुआ.

 महाराष्ट्र और हरियाणा राज्य सरकार ने बीफ (गो मांस) पर प्रतिबंध लगाया.

बीबीसी की डॉक्युमेंट्री ‘इंडियाज डॉटर’ पर भारत में प्रतिबंध लगा.

विकास का चेहरा या सिर्फ मुखौटा!

Modi Lead

‘मैं नरेंद्र दामोदरदास मोदी ईश्वर की शपथ लेता हूं… 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री के रूप में शुरू हुई नरेंद्र मोदी की इस पारी के लिए काफी समय से जमीन तैयार की जा रही थी. इसके लिए 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज करने के लिए हरसंभव दांव खेले गए. मोदी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार बनने मात्र ने ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कैडर को उत्साह से भर दिया.

साधनों का बहुत ही चतुराई से उपयोग किया गया, विकास के सपने बेचकर वोट खरीदे गए और अंततः विपक्षियों को शिकस्त मिली. स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री ने अपने पहले भाषण में 10 साल के लिए सांप्रदायिकता, जातिवाद और हिंसा पर रोक की बात की तब उनकी इस अपील में नरसिम्हा राव द्वारा 1992 में इसी अवसर पर दिए गए भाषण की अनुगूंज सुनाई दी. नरसिम्हा राव ने अपने उस भाषण में दो-तीन साल के लिए आपसी मतभेदों को पाटने की अपील की थी और इस अपील के चार महीने बाद ही अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना घट गई थी.

मोदी ने अपनी वाकपटुता के दम पर 2014 का लोकसभा चुनाव जीत लिया और ऐसा संभव बनाने के लिए विकास के एजेंडे का सनसनीखेज तरीके से प्रचार किया, पर धीरे-धीरे विकास के इस सपने के रंग धुंधले पड़ रहे हैं क्योंकि साल भर होने के बाद भी वो चुनाव प्रचार के ही मूड में दिख रहे हैं. बीते साल सितंबर में अमेरिका का मैडिसन स्क्वायर गार्डन हो, चीन का शंघाई हो, लोक कल्याणकारी योजना के खर्चों में कटौती और सब्सिडी में कटौती करके उस पैसे का उपयोग बुनियादी ढांचों के लिए प्रोत्साहन पैकेज के तौर पर लाना हो या फिर सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा के लिए पैसा इकट्ठा करने का मामला, उन्होंने हर मुद्दे पर एक मसीहा या मुक्तिदाता के अंदाज में तीसरा ही रास्ता चुना.

अपनी शैली के बारे में वे खुद कहते हैं, ‘मेरी सोच तीसरे प्रकार की है. आपको गिलास आधा खाली दिख सकता है पर मेरे लिए ये पूरा भरा है आधा पानी से और आधा हवा से. यही वजह है कि मैं खुद को प्रकृति से ही आशावादी कहता हूं.’ ये सब बातें नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत से जीत दर्ज करने के चार दिन बाद संसद के सेंट्रल हाल में कही थीं. इसके हफ्तेभर बाद उन्होंने देश के 15वें प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली.

मोदी समर्थकों का तर्क है कि महज सालभर बीतने पर सरकार की उपलब्धियां गिनाना जल्दबाजी होगी लेकिन अगर इन 365 दिनों को संकेत के रूप में देखा जाए तो मोदी खुद अपने प्रचार के जाल में फंस गए हैं. जनवरी में गुजरात में आयोजित वाइब्रेंट सम्मेलन में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि प्रचार से गति मिलती है और इससे सरकारी अधिकारियों के निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी तेजी आती है, साथ ही लाल-फीताशाही खत्म करने में भी मदद मिलती है. पर उम्मीदें दिखाने और उन पर खरे न उतरने से कहीं वो उस बहुमत को फिजूल में ही न गंवा दें जिसने उन्हें वहां तक पहुंचाया है.

Modi at inauguration of HN Reliance Foundation Hospital

वैसे भाजपा के वरिष्ठ सदस्य अरुण शौरी मोदी की अर्थनीति को पहले ही दिशाहीन कह चुके हैं. मोदी सरकार ने गिरते-पड़ते, शोर-शराबे और तमाम चुप्पियों के बीच आखिर बारह महीने पूरे कर ही लिए हैं. इस बीच कुछ महत्वपूर्ण सुधार भी हुए जैसे प्राकृतिक संसाधनों की नीलामी शुरू हुई, पर सरकार भूमि अधिग्रहण बिल, वस्तु एवं सेवाकर के मामले में फंसती दिखी. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नए महासचिव सीताराम येचुरी कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री विदेश में लोगों को अभी भी चुनावी अंदाज में संबोधित कर रहे हैं. वे विदेशों में भारतीय मूल के लोगों को संबोधित करने के दौरान विपक्षी दलों पर लगातार आरोप लगा रहे हैं और उनके खिलाफ टिप्पणियां कर रहे हैं. देश के इतिहास में शायद वो पहले प्रधानमंत्री होंगे जिन्होंने एक साल के अंदर 18 देशों की यात्राएं की हैं.’ कांग्रेस के आनंद शर्मा भी इस बात से सहमत होते हुए कह चुके हैं, ‘प्रधानमंत्री के विदेशों (जर्मनी और कनाडा) में दिए गए भाषण बहुत हल्के थे. यह साफ है कि वे अभी भी लोकसभा चुनावों के प्रचार की खुमारी से बाहर नहीं निकल पाए हैं.’

मोदी ने बहुत सारे अनछुए मुद्दों पर आवाज उठाई है पर कुछ जरूरी मामलों में उनकी चुप्पी बहुत खली, वो चाहे उनके कैबिनेट मंत्रियों की घटिया बयानबाजी हो, अल्पसंख्यकों के इबादत को लेकर दिए गए बयान हों या बेमौसम बारिश से बर्बाद हुई खेती के समय उठे विवाद, प्रधानमंत्री के कुछ न बोलने से बात बिगड़ती ही चली गई. इसके बावजूद, उत्तर प्रदेश के उन्नाव से भाजपा सांसद साक्षी महाराज मोदी की उपलब्धियां गिनाते हुए कहते हैं कि मोदी सरकार ने वो किया है जो कांग्रेस एक दशक में भी नहीं कर पाई. वो कहते हैं, ‘मोदी गुड गवर्नेंस के रोल मॉडल हैं और मुझे विश्वास है कि मोदी अगले 30-35 सालों तक देश का नेतृत्व करेंगे.’

मोदी अगर मतदाताओं की नजर में उठे हैं तो इसका कुछ श्रेय उन्हें मणिशंकर अय्यर के ‘चायवाला’ कहने को देना चाहिए और कुछ मनमोहन सिंह को

अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के लिए मोदी चार अक्षरों का एक नाम भर थे और रहेंगे पर अगर मोदी मतदाताओं की नजर में उठे हैं तो इसका कुछ श्रेय उन्हें मणिशंकर अय्यर के ‘चायवाला’ कहने को देना चाहिए और कुछ मनमोहन सिंह को. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में उजागर घोटालों और उनकी नीतियों की विफलता ने मोदी की सफलता की राह आसान की. मोदी ने खुद को देश का ‘प्रधान सेवक’ कहा, कुछ लोग उन्हें दूरद्रष्टा के तौर पर भी देखते हैं. कुछ का कहना ये भी है कि उन्हें बस कारोबार से मतलब है. मीडिया के एक धड़े ने उन्हें ऐसा राजनेता घोषित किया है जो देश को आगे ले जाने के लिए असीम ऊर्जा और उत्साह से भरा हुआ है. वो देशवासियों और दुनिया की नजर में भारत की छवि बदल देना चाहते हैं. (अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने टाइम पत्रिका में मोदी के बारे में लिखे एक लेख में उन्हें ‘इंडियाज रिफॉर्मर इन चीफ’ कहा था, और उनके जीवन को ‘फ्रॉम पावर्टी टू प्राइम मिनिस्टर’ का नाम दिया था.)

मोदी की छवि उस वक्त और चमकी जब स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अपने पहले ही भाषण में उन्होंने स्वच्छता, स्त्री-सुरक्षा, लैंगिक समानता जैसी बुनियादी बातें कहीं. उन्होंने अभिभावकों को समझाते हुए कहा कि अपने बेटों को स्त्रियों के प्रति संवेदनशील बनाएं, उनका सम्मान करना सिखाएं. उन्होंने ऐसे बुनियादी मुद्दों पर मुखर होकर अपनी बातें कहीं जो लालकिले से बोलना तो दूर, किसी सरकार के मुखिया के लिए विचारयोग्य ही नहीं मानी जाती थीं. एक कुशल वक्ता होने की वजह से मोदी ब्रांड बनते गए. पर कुशलता से गढ़ी गई इस छवि को तब चोट लगी, जब जनवरी में मोदी की अपने नाम का सूट पहनने की बात सामने आई. ‘एक नेता जो चायवाले के घर से आया है’ वाली जमीन से जुड़े होने की छवि इस ‘आत्म-केंद्रित, अपने नाम का सूट पहनने वाले नेता’ के नीचे दब गई. वोट देने वाली आम जनता ने उस छवि को वोट बटोरने की चाल समझा. इसका खामियाजा दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को भुगतना पड़ा. वो मतदाता जिसने लोकसभा चुनावों में रातोंरात मोदी को स्टार बनाया था, उसी मतदाता को उनकी कथनी और करनी में अंतर दिखने लगा. इस बीच संघ परिवार से जुड़े भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने भी सरकार की नीतियों के खिलाफ रोष भी प्रकट किया. मोदी की एक रौबीले प्रशासक होने की बात भी उठी जब खबरें आईं कि मोदी कैबिनेट मंत्रियों को जरिया बनाने की बजाय सचिवों से सीधे संपर्क में रहते हैं, साथ ही कुछ मंत्री ऐसे भी हैं, जिन्हें अपनी पसंद का निजी सेक्रेटरी भी नहीं रखने दिया गया. कुछ मंत्रियों को तो निर्देश भी मिले कि उन्हें किस मौके पर कैसी पोशाक पहननी है, किनसे मिलना है और कैसे बात करनी है. मोदी के बहुप्रचारित सिद्घांत ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ को उनके शपथ ग्रहण के कुछ महीनों के भीतर ही, तब झटका लगा जब मंत्रालयों को रैशनलाइज करने की कोशिश में एक ही मंत्री को कई मंत्रालय संभालने की योजना उस तरह नहीं चल पाई जैसा सोचा गया था.

modi and obama

हालांकि, सरकारी कार्यालयों में बायोमिट्रिक सिस्टम से उपस्थिति दर्ज करने को आम लोगों ने बहुत सराहा, पर दिल्ली के नौकरशाहों के एक वर्ग में इस बात को लेकर खासा रोष देखा गया. मोदी के प्रतिदिन 18 घंटे काम करने की बात का भी कई अधिकारियों ने विरोध किया. एक आईएएस अधिकारी व्यंग्यात्मक लहजे में ‘तहलका’ को बताते हैं, ‘आज, आप क्या करते हैं वह इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना ये कि आप इसे किस समय करते हैं. प्रधानमंत्री कार्यालय शाम को 6ः30 बजे तब काम शुरू करता है, जब सभी सरकारी कार्यालय बंद हो जाते हैं.’

‘सेल्फी’ खिंचवाने और भारतीयों को संबोधित करने के चलते वे विदेशों में तो बहुत लोकप्रिय होते जा रहे हैं पर अपने देश में उनकी विश्वसनीयता कम हो रही है

इसके अलावा सरकार के लिए मुश्किलें तब भी बढ़ी जब देशभर से लगभग 600 छोटे-बड़े सांप्रदायिक दंगों की खबरें आईं. पुणे में एक युवा आईटी कर्मचारी की हत्या का आरोप एक हिंदू अतिवादी संगठन पर लगा. मुजफ्फरनगर दंगों को भड़काने का आरोपी संजीव बालियान मोदी सरकार में शामिल हुआ. मुजफ्फरनगर दंगों के ही एक और आरोपी संगीत सोम को जेड प्लस सुरक्षा मुहैया कराई गई. इन मसलों पर मोदी की चुप्पी से लोगों का मोहभंग हुआ और सरकार से उम्मीदों को लेकर उनकी बेचैनी बढ़ी. सरकार के महिलाओं से जुड़े मुद्दों को हल न कर पाने की वजह से मोदी के इरादों को लेकर आशंकाएं प्रकट की जाने लगी. भाजपा के घोषणा-पत्र में खास तौर पर शामिल किया गया महिला आरक्षण विधेयक का मुद्दा अभी भी अधर में है. कुछ संस्थानों को भंग करना (योजना आयोग) भी विवादों  के विषय बने. ट्राई (संशोधित) विधेयक में बदलाव करना हो, नृपेंद्र मिश्रा की प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव के रूप में नियुक्ति हो या हर्षवर्द्घन से स्वास्थ्य मंत्रालय लेकर उन्हें विज्ञान व तकनीकी मंत्री बनाना, ये सभी ही विवादों से जुड़े रहे.

‘बीते एक साल में मैंने एक दिन का भी अवकाश नहीं लिया है. मैंने दिन-रात काम किया. क्या मैंने कोई छुट्टी ली? क्या मैं आराम कर रहा हूं? क्या मैं अपने वादे पूरे नहीं कर रहा?,’ मोदी ने शंघाई में विपक्षियों पर चुटकी लेते हुए ये कहा था. एक मौके पर उन्होंने यह भी कहा कि मेरे बिना थके-हारे, लगातार काम करने की आलोचना हो रही है, मानो ऐसा करना अपराध हो, पर मैं ऐसा करता रहूंगा. अपनी पीठ थपथपाने के अंदाज में उन्होंने आगे कहा, ‘समय बदल रहा है, दुनिया अब भारत की तरफ अलग अंदाज से देख रही है. इसकी वजह बीते एक साल में सरकार का बेहतरीन प्रदर्शन है और भारत के सभी नागरिकों के लिए ये गौरव की बात है.’

मोदी विदेशी दौरों पर ‘सेल्फी’ खिंचवाने और वहां के भारतीयों को संबोधित करने के चलते वे विदेशों में तो बहुत लोकप्रिय होते जा रहे हैं पर अपने देश में उनकी विश्वसनीयता कम हो रही है. अपनी स्वीकार्यता और पहुंच बढ़ाने के लिए इससे पहले भी प्रधानमंत्री अपनी विदेश नीति का ही सहारा लेते आए हैं पर अगर किसी सरकार का मुखिया अपने कार्यकाल के शुरुआती दौर में ही इसका सहारा लेने लग जाए तो यह न तो प्रधानमंत्री के लिए और न ही सरकार के लिए अच्छा है.

पढ़ें : मोदी सरकार का लेखा-जोखा

रसूखदार दागी

sanjeev bhatt

मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) की परीक्षाओं में हुए व्यापक भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस जहां राज्य की भाजपा सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है, वहीं उसके ही एक पूर्व नेता संजीव सक्सेना पर कदाचार के इतने आरोप लगे हैं कि कांग्रेस अपने ही मुद्दे पर कमजोर पड़ गई.

संजीव सक्सेना से भले ही कांग्रेस ने पीछा छुड़ा लिया है लेकिन उनसे जुड़े विवादों का जिन्न पार्टी की छीछालेदर करने के लिए बार-बार बोतल से बाहर आ जाता है. व्यापमं घोटाले में फंसने के बाद हवालात में दिन गुजार रहे संजीव सक्सेना अपनी करतूतों के कारण बार-बार चर्चा में आ ही जाते हैं. व्यापमं घोटाले में उनकी भूमिका पर चर्चा करने से पहले उनसे जुड़े ताजा विवाद पर एक नजर डालते हैं.
भोपाल का मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मैनिट) मध्य प्रदेश के अलावा उससे लगे छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों के लिए जाना पहचाना नाम है. मैनिट और पूर्व कांग्रेस नेता संजीव सक्सेना का नाम एक बार फिर चर्चा में है. दरअसल मैनिट से संजीव के परिवार को बर्खास्तकर फिर दूसरे ही दिन बहाल कर दिया. जी हां, सक्सेना ने अपनी ऊंची रसूख के चलते मैनिट जैसे संस्थान में अपने आधे परिवार को ही नियुक्त करवा दिया था. संजीव सक्सेना की बहन अर्चना सक्सेना (असिस्टेंट लाइब्रेरियन), पत्नी अरुणा सक्सेना (ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट ऑफिसर) और बहन अंशु गुप्ता (असिस्टेंट प्रोफेसर) अलग-अलग पदों पर मैनिट में नौकरी कर रही थीं. इनके अलावा अभय शर्मा (असिस्टेंट प्रोफेसर) और कविता देहलवार (असिस्टेंट प्रोफेसर) को भी नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था. सभी पांच लोगों की नियुक्ति काफी समय से विवादों में रही है और दो बार जांच में नियुक्ति के लिए योग्य नहीं पाए जाने के बाद मैनिट के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स (बीओजी) ने इनकी नियुक्ति रद्द करने का आदेश जारी किया था. लेकिन इस फैसले को पलटते हुए डायरेक्टर डॉ. अप्पू कुट्टन ने इस फैकल्टी को फिर से बहाल कर दिया. इससे ही सक्सेना परिवार की रसूख का अंदाजा हो जाता है. संजीव सक्सेना व्यापमं घोटाले के कारण भले ही जेल में बंद हैं लेकिन उनके जलवे अब भी बरकरार हैं. इस मामले में मैनिट के डायरेक्टर डॉ. अप्पू कुट्टन का कहना है कि सीबीआई ने नियुक्ति को क्लिनचिट दी है. जबकि मैनिट के बीओजी की बैठक में सीबीआई की रिपोर्ट को नहीं रखा गया था. इसलिए बर्खास्तगी का गलत फैसला ले लिया गया था. बाकी मुझे इस बारे में और कुछ नहीं कहना.

संजीव सक्सेना की पहुंच का अंदाजा इस बात से लगाया जाता रहा है कि नौकरी से निकाले जाने के बाद भी उनके परिजनों की बहाली कर दी गई

संजीव सक्सेना की पत्नी अरुणा सक्सेना की नियुक्ति ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट ऑफिसर, बहन अर्चना सक्सेना की असिस्टेंट लाइब्रेरियन और अरुणा सक्सेना की बहन अंशु गुप्ता की असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर नियुक्ति 2005 में हुई थी. इनके अलावा अभय शर्मा और कविता देहलवार की असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर भी नियुक्ति हुई थी. इन सभी की नियुक्ति अवैध ठहराई गई थीं. इन नियुक्तियों में गड़बड़ी की शिकायत मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) पहुंची थी. एमएचआरडी के निर्देश पर सबसे पहले रिटायर्ड आईएएस एमएन बुच को इसकी जांच सौंपी गई. बुच की रिपोर्ट के बाद एमएचआरडी ने मैनिट के चेयरमैन को मामले की विस्तार से जांच करने के निर्देश दिए तो एसएम शुक्ला की अध्यक्षता में इसकी जांच शुरू हुई जो बाद में सीबीआई को सौंप दी गई. करीब पांच सालों तक यह मामला चलता रहा. 2010 में मैनिट के बोर्ड ऑफ गवर्नर ने एसएच लोधा और आरके त्रिपाठी को मामले की न्यायिक जांच करने की जिम्मेदारी दी. जांच में सामने आया कि 2005 में की गईं ये नियुक्तियां नियमों के मुताबिक सही नहीं थी और न ही नियुक्तियों के दौरान ऑल इंडिया काउंसिल ऑफ टेक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) के नियमों का पालन किया गया. इस समिति ने 2005 में हुई सभी नियुक्तियों को रद्द करने की सिफारिश की थी. पिछले साल मैनिट ने हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एमए सिद्दीकी की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति की जांच फिर से करवाई. समिति की रिपोर्ट के आधार पर इन पांच लोगों की नियुक्ति रद्द कर दी गई.
संजीव सक्सेना का मैनिट में काफी प्रभाव माना जाता है. वह मैनिट से पढ़े हैं. इसके बाद किसी न किसी रूप में संस्थान में उनकी सक्रियता बरकरार रही. जब मैनिट की इमारत बन रही थी, तब इसके निर्माण का ठेका भी उनके पास ही था. उस वक्त सक्सेना ठेकेदारी पर भवन निर्माण का कार्य भी करते थे. संजीव सक्सेना का एक निजी इंजीनियरिंग कॉलेज भी है. पिछले साल मैनिट के छात्रों ने ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट ऑफिसर अरुणा सक्सेना (संजीव की पत्नी) पर आरोप लगाया था कि वे मैनिट में कैंपस सेलेक्शन के लिए आनेवाली कंपनी को उनके पति के कॉलेज भेज देती हैं. इसके बाद उनके साथ एक और ऑफिसर अटैच किया गया था.
डॉ. संजीव सक्सेना मूलतः भिंड के रहने वाले हैं. उनका एक भाई अभिषेक सक्सेना पार्षद रहे हैं और अभी वर्तमान में भोपाल के एक वार्ड से उनकी भाभी कांग्रेस पार्षद हैं. ये कन्नड़ फिल्मों की अभिनेत्री भी रह चुकी हैं. खुद सक्सेना 2013 में भोपाल पश्चिम विधानसभा सीट से पूर्व गृह मंत्री उमाशंकर गुप्ता के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं. उनके चुनाव प्रचार के लिए राजीव शुक्ला और रवीना टंडन जैसी हस्तियां भोपाल पहुंची थीं. सक्सेना का राजनीति में प्रवेश भी कम नाटकीय नहीं है. कुछ वर्ष पूर्व भोपाल में एक नाबालिग बच्ची की लाश मिलने के बाद सक्सेना ने कई आंदोलन और प्रदर्शन किए थे. अपने धनबल के जरिए इन आंदोलनों में भीड़ भी जुटाई थी. बस इससे प्रभावित होकर कांग्रेस ने संजीव सक्सेना को अपनी पार्टी का अहम कार्यकर्ता बना दिया था. उस वक्त मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सुरेश पचौरी थे. उनकी सिफारिश पर ही सक्सेना को विधानसभा का टिकट दिया गया था. सक्सेना 2005 में भी मेडिकल की प्रीपीजी परीक्षा का पर्चा लीक करने का आरोपी भी रहे हैं. व्यापमं घोटाले की जांच कर रही एसटीएफ (स्पेशल टास्क फोर्स) ने सक्सेना के खिलाफ दुग्ध संघ जूनियर सप्लाई ऑफिसर भर्ती परीक्षा 2012 और आरक्षक भर्ती परीक्षा 2012 में फर्जीवाड़े के मामले में चार अलग-अलग केस दर्ज कर रखें हैं. तीन मामलों में जमानत मिल चुकी है लेकिन एक मामले में अदालत ने जमानत नहीं दी है और वे जेल में हैं.
पुलिस जांच में सक्सेना के पास अकूत संपत्ति पाई गई है. सक्सेना ने भोपाल के अलावा दिल्ली और केरल में भी संपत्ति में निवेश कर रखा है. भोपाल में उनके पास श्यामला हिल्स और कोटरा जैसे पॉश इलाकों में भूखंड हैं. अमरावदखुर्द और कुशलपुरा में 100 एकड़ जमीन है. भोपाल के ही संजय कॉम्प्लेक्स, सात नंबर स्टॉप, शिवाजीनगर में दुकानें हैं. चूनाभट्टी और शाहपुरा में बंगलें भी हैं. सक्सेना राधा रमण कॉलेज के नाम से भोपाल व मध्य प्रदेश के दूसरे शहरों में शिक्षण संस्थान भी संचालित करते हैं. संजीव सक्सेना कांग्रेस नेता आरिफ मसूद के करीबी भी माने जाते हैं.

संजीव सक्सेना के संबंध भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं से भी रहे हैं. इसका खुलासा व्यापमं घोटाले के उजागर होने के बाद हुआ

संजीव सक्सेना की पहुंच का अंदाजा इस बात से लगाया जाता रहा है कि मैनिट के 11 साल पहले के नियुक्ति मामले में एक बार नौकरी से निकाले जाने के बाद भी सक्सेना के परिजनों की बहाली कर दी गई थी. मैनिट प्रबंधन ने बहाली के बाद तर्क दिया था कि सीबीआई की रिपोर्ट के आधार पर बहाली की गई है, जबकि हाईकोर्ट के दो रिटायर्ड जजों की कमेटियों की रिपोर्ट नजरअंदाज कर दी गई. यूपीए सरकार में जब सीबीआई इस मामले की जांच कर रही थी, तो उसे इन नियुक्तियों में कोई गड़बड़ी नहीं मिली थी.
वर्ष 2005 में मैनिट में 60 नियुक्तियां हुई थीं. शुरुआती जांच में इन सभी पर सवाल उठाए गए थे, लेकिन आखिर में उनके परिवार से जुड़ी पांच नियुक्तियां ही संदिग्ध मानी गई थीं. 2005 में ही रिटायर्ड आईएएस अधिकारी एमएन बुच ने मामले की जांच की थी और दोबारा जांच की अनुशंसा की. वर्ष 2008 में एसएम शुक्ला की कमेटी ने सीबीआई को रेफर करने की अनुशंसा की थी. लेकिन सीबीआई ने जांच के बाद मामले में सभी को क्लीनचिट दे दी. 2010 में जस्टिस लोढा और आरके त्रिपाठी कमेटी ने पूरी भर्ती प्रक्रिया को ही नियम विरुद्ध माना. वर्ष 2014 में जस्टिस एमए सिद्दीकी की कमेटी ने पांचों नियुक्तियों को गलत मानते हुए निरस्त करने की सिफारिश की.
संजीव सक्सेना के संबंध भाजपा के बड़े नेताओं से भी रहे हैं. इसका खुलासा व्यापमं घोटाले के उजागर होने के बाद हुआ. पुलिस आरक्षक-उपनिरीक्षक परीक्षा भर्ती घोटाले के दो अलग-अलग मामलों में कांग्रेस नेता संजीव सक्सेना और खदान व्यवसायी सुधीर शर्मा की संलिप्तता पाई गई थी. संजीव सक्सेना पर आरोप है कि उन्होंने भाजपा नेता सुधीर शर्मा के जरिए व्यापमं के अधिकारियों से सांठ-गांठकर फर्जी तरीके से परीक्षा में चयन कराया है. खुद एसटीएफ ने अदालत में पेश प्रतिवेदन में यह बात कबूली है. संजीव सक्सेना की ओर से पेश अग्रिम जमानत अर्जी के विरोध में एसटीएफ ने यह प्रतिवेदन अदालत में पेश किया था. विशेष सत्र न्यायाधीश संजीव कालगांवकर की अदालत में पेश प्रतिवेदन में एसटीएफ ने बताया कि पुलिस आरक्षक भर्ती परीक्षा में संजीव सक्सेना ने दुर्गेश सिंह, बृजेश साहू और भरत सिंह ठाकुर के चयन के लिए व्यापमं के अधिकारियों को 3 लाख रुपये दिए थे. उपनिरीक्षक भर्ती घोटाले में भी सक्सेना ने सुधीर शर्मा के जरिए व्यापमं के अधिकारियों को पैसे देकर फर्जी तरीके से चयन कराया है.
जब सक्सेना का व्यापमं घोटाले में नाम आया तो वे फरार हो गए लेकिन जब कोर्ट ने उनकी संपत्ति राजसात करने की चेतावनी दी तो उन्होंने भोपाल जिला न्यायालय के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) पंकज सिंह माहेश्वरी की अदालत में 12 मई 2014 को आत्मसमर्पण कर दिया. इससे पहले सक्सेना ने मीडिया से चर्चा के दौरान कहा था कि उन्होंने तत्कालीन गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता के खिलाफ चुनाव लड़ा था, इसलिए उनके खिलाफ साजिश कर उन्हें आरोपी बनाया गया है. छह महीने तक फरार रहने के सवाल पर उनका कहना था कि वे फरार नहीं हुए थे, बल्कि गिरफ्तारी से बचने के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट गए थे. संजीव सक्सेना ने मीडिया के सामने खुद स्वीकार भी किया था कि उनके भाजपा नेता और खनिज कारोबारी सुधीर शर्मा और व्यापमं के चीफ सिस्टम एनालिस्ट नितिन महिंद्रा से अच्छे संबंध हैं. शर्मा और महिंद्रा भी इस फर्जीवाड़े में आरोपी हैं.
सुधीर सक्सेना का कांग्रेस के ही बड़े-बड़े नेताओं से करीबी संबंध रहा है. पूर्व केंद्रीय मंत्री सुधीर पचौरी ने उसे विधानसभा चुनाव का टिकट दिलाया था. मध्यप्रदेश के प्रभारी बनकर पहुंचे वरिष्ठ कांग्रेस नेता मोहन प्रकाश से भी सक्सेना ने नजदीकियां बढ़ा ली थी.
भाजपा नेता हितेश बाजपेयी बताते हैं, ‘देखिए मैं इस विषय पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता. जहां तक व्यापमं घोटाले और इसमें संजीव सक्सेना या किसी अन्य की संलिप्तता की बात है तो इतना जरूर कह सकता हूं कि यह प्रशासनिक चूक का मामला है. कानून अपना काम कर ही रहा है. इसे राजनीति से जोड़कर देखा जाना ठीक नहीं है. हालांकि यह अलग बात है कि इसमें राजनीतिक लोगों की लिप्तता ही पाई गई है. इसलिए इस मामले में टिप्पणी करना ठीक नहीं है.’ वहीं कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता केके मिश्रा कहते हैं, ‘सक्सेना का कांग्रेस से कोई रिश्ता नहीं. हम उन्हें निष्कासित कर चुके हैं इसलिए उन पर बात करने का कोई औचित्य नहीं है. व्यापमं घोटाले में नाम आने के बाद हमने सक्सेना को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. मैनिट में उनकी भूमिका को लेकर बहुत सारी बातें होती रही हैं लेकिन जब वह कांग्रेस में हैं ही नहीं, तो बात करने का कोई मतलब नहीं है.’
फिलवक्त संजीव सक्सेना को हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एएम खानविलकर व जस्टिस आलोक आराधे की युगलपीठ ने सक्सेना की दुग्ध संघ जूनियर सप्लाई ऑफिसर की भर्ती मामले में 25 लाख रुपये के मुचलके पर जमानत तो दे दी है लेकिन संविदा शिक्षक मामले में जमानत नहीं मिलने के कारण वे जेल में हैं.
गिरफ्तारी के बाद एसटीएफ की ओर से संजीव सक्सेना के खिलाफ संविदा शिक्षक भर्ती मामले का चौथा प्रकरण दर्ज किया गया था. बहरहाल, भले ही व्यापमं घोटाले में नाम आने के बाद कांग्रेस ने दोहरे मापदंड से बचने के लिए संजीव सक्सेना को पार्टी से बर्खास्त कर दिया हो लेकिन भाजपा उनका नाम ले-लेकर कांग्रेस की लानत मलानत करने से नहीं चूक रही.

फिर बारूद पर बस्तर

Naxal Maoist by Shailendra (49)

छत्तीसगढ़ में एक बार फिर गृह युद्ध जैसी स्थितियां बनती नजर आ रही हैं. उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद बंद किया गया ‘सलवा जुडूम’ एक बार फिर एक नए नाम से शुरू करने का शंखनाद कर दिया गया है. महेंद्र कर्मा के परिवार समेत सलवा जुडूम के पुराने नेता ‘बस्तर विकास संघर्ष समिति’ के बैनर तले इकट्ठा होकर नए आंदोलन की रूपरेखा तय कर रहे हैं. समिति की अगुवाई कर्मा के दूसरे बेटे छविंद्र कर्मा कर रहे हैं. कांग्रेस ने जहां इस अभियान से दूरी बनाने का ऐलान किया है, वहीं भाजपा एक बार फिर इसका स्वागत करती नजर आ रही है. उधर इस समिति को लेकर नक्सलियों के भी कान खड़े हो गए हैं. नक्सलियों ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारीकर छविंद्र कर्मा को जान से मारने की धमकी देते हुए समिति की ओर से शुरू होनेवाले आंदोलन वापस लेने की चेतावनी दी है.

सलवा जुडूम यानी ‘शांति का कारवां’ साल 2005 में शुरू किया गया था. हैरानी की बात ये है कि शांति के इस कारवां पर अतीत में हिंसा के अनगिनत आरोप लग चुके हैं. इतने आरोप लगे कि 2011 में सलवा जुडूम का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और वहां इसे अवैध घोषित कर दिया गया. अब एक बार फिर बस्तर सुलगने लगा है. एक तरफ माओवादी लगातार अर्द्धसैनिक बलों के साथ ग्रामीणों की हत्या कर रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ महेंद्र कर्मा के बेटे छबिंद्र कर्मा, सलवा जुडूम से शुरुआती दौर से जुड़े रहे चैतराम अटामी और सुखदेव ताती जैसे नेताओं को ‘बस्तर विकास संघर्ष समिति’ के बैनर तले एकजुट करके फिर से आंदोलन शुरू कर रहे हैं. महेंद्र कर्मा ने जिसे कभी सलवा जुडूम का नाम दिया था, यह समिति भी बिलकुल वैसी ही है. जैसे नई बोतल में पुरानी शराब.

नए आंदोलन पर बात करने से पहले सलवा जुडूम के आगाज और अंजाम पर एक नजर दौड़ाना जरूरी है. अपने राजनीतिक कॅरियर की शुरुआत में कम्युनिस्ट नेता रहे महेंद्र कर्मा ने कांग्रेस का दामन थामने के बाद सलवा जुडूम आंदोलन की शुरुआत की. इस आंदोलन को लेकर तर्क दिया गया था कि यह बस्तर के आदिवासियों का स्वतः स्फूर्त आंदोलन है, जो नक्सलियों के खिलाफ है. इस अभियान में ग्रामीणों को माओवादियों के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार किया गया. 2005 में जब सलवा जुडूम की विधिवत शुरुआत हो रही थी, तब छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार बन चुकी थी.

रमन सिंह मुख्यमंत्री बन चुके थे. रमन सिंह को सलवा जुडूम अभियान अच्छा लगा. विरोधी पार्टी की सरकार होने के बाद भी रमन सिंह ने कांग्रेस के इस अभियान को हर मंच पर सराहा. राज्य सरकार का समर्थन मिलने से कई ग्रामीण आदिवासियों को हथियार देकर स्पेशल पुलिस ऑफिसर (एसपीओ) बनाया गया. इसके तहत उन्हें 1500 से 3000 रुपये तक भत्ता भी दिया जाता था.

सलवा जुडूम में शामिल ग्रामीणों ने नक्सलियों को गांवों में शरण और राशन देने से इंकार कर दिया. इस अभियान को सफलता भी मिली. आदिवासियों की मदद से माओवादियों की जंगलों में चल रही विरोधी गतिविधियों और ठिकानों की जानकारी सुरक्षा एजेंसियों को मिली. उसी दौरान नक्सलवाद से निपटने के लिए आतंकवाद विशेषज्ञ और पंजाब के वरिष्ठ पुलिस अफसर केपीएस गिल की भी सेवाएं ली गईं, लेकिन वांछित सफलता नहीं मिल सकी. सलवा जुडूम के चलते नक्सली और ग्रामीणों के बीच तकरार बढ़ा और 644 से अधिक गांव खाली हो गए. उस वक्त स्थिति ऐसी थी कि 23 राहत शिविरों में हजारों लोग रहते थे.

वरिष्ठ पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी अपनी एक किताब में लिखते हैं कि लोगों को ट्रकों में भरकर सलवा जुडूम कैंपों में लाकर छोड़ा जा रहा था. गांव के गांव खाली करवाए जा रहे थे. आदिवासी या तो सलवा जुडूम कैंप में आने के लिए मजबूर थे या फिर भागकर जंगल की शरण ले रहे थे. माओवादी ‘सलवा जुडूम’ से काफी नाराज थे. वे भी लगातार सलवा जुडूम कैंपों पर या जुडूम नेताओं पर हमला कर रहे थे. धीरे-धीरे सलवा जुडूम आंदोलन ने तो दम तोड़ दिया. शिविर से कुछ लोग अपने गांव लौट गए तो कुछ पड़ोसी राज्यों में पलायन कर गए. तमाम लोग अब पड़ोसी राज्यों से भी लौट रहे हैं. मानवाधिकार कार्यकताओं ने सलवा जुडूम को खूनी संघर्ष बढ़ानेवाला अभियान बताया. उन्होंने इसके औचित्य पर प्रश्नचिह्न उठाए. उनका कहना था कि मासूम गांववालों को सरकार माओवादियों और नक्सलियों के खिलाफ हथियार बनाकर लड़ रही है. 2011 में मानवाधिकार कार्यकर्ता नंदिनी सुंदर मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहुंचीं और उच्चतम न्यायालय ने सलवा जुडूम को अवैध घोषित किया. आरोप ये भी लगे कि सलवा जुडूम को आपसी रंजिश का बदला लेने के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया. इसकी आड़ में अवैध उगाही की खबरें भी आईं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार को एसपीओ से हथियार वापस लेने पड़े.

25 मई 2013 को नक्सलियों ने जगदलपुर के पास झीरम घाटी में घात लगाकर महेंद्र कर्मा समेत 27 कांग्रेस नेताओं की हत्या कर दी. महेंद्र कर्मा सलवा जुडूम शुरू करने के बाद से ही नक्सलियों की हिट लिस्ट में थे. उन पर इसके पहले भी कई बार जानलेवा हमला हो चुका था, हर बार वे बच निकले थे. लेकिन झीरम में उनकी बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी गई. सलवा जुडूम बंद होने के बाद उसके कई नेता मारे गए. उनके नामों की सूची बहुत लंबी है. बाकी बचे हुए नेता या तो शहरों में शरण लिए हुए हैं, या फिर बंदूकों के साए में जीने को मजबूर हैं.

अब यही सारे लोग फिर से बस्तर संघर्ष समिति के बैनर तले मजबूत होना चाहते हैं. सलवा जुडूम के पुराने नेताओं ने कर्मा परिवार के साथ मिलकर एक बार फिर नक्सलियों के खिलाफ आंदोलन छेड़ने का ऐलान कर दिया है. 25 मई 2015 को महेंद्र कर्मा की दूसरी पुण्यतिथि के मौके पर आंदोलन की रणनीति तय की जानी है.

आंदोलन का ऐलान होते ही नक्सलियों के दंडकारण्य जोनल कमेटी के प्रवक्ता गुडसा उसेंडी ने विज्ञप्ति जारीकर छविंद्र कर्मा से आंदोलन वापस लेने की चेतावनी भी दे दी है. नक्सलियों ने छविंद्र को मारने की धमकी भी दी है. वहीं दिंवगत नेता महेंद्र कर्मा के पुत्र छविंद्र कर्मा कहते हैं, ‘सलवा जुडूम बंद नहीं होता तो कम से कम दक्षिण बस्तर से नक्सलवाद को हम खत्म कर चुके होते. लेकिन दुर्भाग्यवश सलवा जुडूम ही बंद कर दिया गया और इस कारण महेंद्र कर्मा समेत हमारे कई बड़े नेता मारे गए. अब हम फिर एकजुट हो रहे हैं. नक्सलियों का बयान यह साबित करता है कि वे हमसे डर गए हैं.’

छविंद्र कर्मा, कांग्रेस के भी नेता हैं लेकिन उनकी ही पार्टी उनके इस अभियान का विरोध करती नजर आ रही है. छत्तीसगढ़ के नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव ने साफ कर दिया है कि आंदोलन से कांग्रेस का कोई लेना-देना नहीं है. वहीं भाजपा ठीक 2005 ही की तरह कर्मा परिवार की इस कवायद का स्वागत कर रही है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक कहते हैं, ‘इसमें गलत क्या है. गांववाले एक बार फिर नक्सलियों का विरोध कर रहे हैं. हम इस आंदोलन का समर्थन करते हैं.’

इन सब के बीच छत्तीसगढ़ पुलिस ने मौन धारण कर रखा है. राज्य के पुलिस महानिदेशक एनएन उपाध्याय इस विषय पर बात नहीं करना चाहते. हालांकि हकीकत ये भी है कि बस्तर में पिछले कुछ सालों में नक्सल गतिविधियों में तेजी आई है. आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2005 से अप्रैल 2015 तक छत्तीसगढ़ में 2232 लोगों की हत्या नक्सलियों के हमले में हुई है. इस हिसाब से राज्य में नक्सल हमले में औसतन दो दिनों में एक मौत हुई है. 11 सालों में 896 सुरक्षा बल के जवान, 667 आम नागरिकों की मौत हुई है तो दूसरी तरफ पुलिस द्वारा 709 नक्सलियों को मार गिराने का दावा किया गया है. सर्वाधिक मौत का आंकड़ा 2006 में दर्ज है. इस साल 361 की मौत हुई थी. 2007 में 350, 2009 में 345 और 2010 में 327 लोगों की मौत हुई थी. 2015 में ही पांच महीनों में अभी तक 30 लोगों की मौत हुई है, जिनमें 17 सुरक्षा बल के जवान, नौ नागरिक व दो नक्सली शामिल हैं. 11 सालों में नक्सली हमले में 2232 झारखंड में 1344, आंध्र प्रदेश में 712, ओडिशा में 612 एवं महाराष्ट्र में 424 लोगों की मौत हो चुकी है.

बहरहाल अविभाजित मध्य प्रदेश से अलग हुए छत्तीसगढ़ को नक्सलवाद विरासत में मिला है. सलवा जुडूम जैसा आंदोलन भी छिटपुट रूप से नब्बे के दशक में आकार लेने लगा था. भले ही 2005 में यह व्यापक रूप में सामने आया. सलवा जुडूम के दौरान बस्तर के आदिवासियों ने मौत का नंगा देखा है. दोनों तरफ से चलती बंदूकों के बीच फंसा निर्दोष आदिवासी एक बार फिर चिंतित है कि वह किसके पाले में जाए और किससे दूर रहे क्योंकि मरना तो उसे दोनों तरफ से है. उसे तो बस यह
चुनने की आजादी मिली है कि वह किसकी गोली से मरना चाहता है.

‘मन की पहली परत वही थी कि कम उमर में शादी ठीक होवे है’

Child_Abuseकुछ दिन पहले दो इत्तेफाक एक साथ हुए. पहला इत्तेफाक यह कि दिल्ली से जिस ट्रेन से वर्धा के लिए वापसी थी, उसी ट्रेन में 2 साल पहले बिल्कुल वही कोच और सीट मिली थी. वापसी के लिए जब टिकट कन्फर्म हुआ था तो इस इत्तेफाक को महसूस करना अच्छा लग रहा था- वही कोच और वही सीट. मुझे उस वक्त तक यह नहीं पता था कि दूसरा इत्तेफाक भी आज इसी ट्रेन और इसी सफर से जुड़ा था.

ट्रेन दिल्ली से गुजर रही थी और मैं 2 साल पहले की गई यात्रा को याद कर रही थी. धुंधली सी यादें. कुछ भी स्पष्ट नहीं दिख रहा था. मथुरा जंक्शन आया. खिड़की से बाहर नजर दौड़ाई. हल्की-हल्की बारिश हो रही थी. काफी देर तक बाहर देखती रही. यह अहसास हुआ कि सामनेे की खाली सीट पर लोग आ गए हैं. बारिश और हवा की गति भी तेज हो गई थी तो मैंने खिड़की के शीशेवाले पल्ले को नीचे खींच लिया. फिर मुड़कर बैठ गई. बैठते ही देखा कि सामनेवाली सीट पर जो व्यक्ति बैठा था, वह कुछ दिन पहले नागपुर से मथुरा आया था. एक-दूसरे को देख हम दोनों मुस्कुराए और मुझे इस दूसरे इत्तेफाक को उसी दिन अपने साथ जीना पड़ा. इस बार वो मेरे साथ मथुरा से नागपुर जा रहे थे.

पत्नी और बेटी भी साथ थी. पहली मुलाकात में उनकी कड़क आवाज से मुझे कुछ गलतफहमी भी हुई थी. लेकिन बाद में समझ में यह आया कि इस आदमी पर अभी शहर की चालाकी की छींट नहीं पड़ी है. दिल्ली आते वक्त यह व्यक्ति अकेला था. मुझे उसकी बातचीत का टोन अच्छा लग रह था. मैं एक-दो सवाल करती और वह आराम से उसका जबाव देता. अपने खेत, अपने गांव के परिवेश के बारे में बताते हुए मुझे यह समझ में आया कि वह किसी रिश्तेदारी से नागपुर से मथुरा लौट रहा है. दिल्ली से मेरी वापसी पर उसने अपने पत्नी और बेटी से परिचय कराया.

पत्नी मुस्कुराई और पहला सवाल पूछा कि अकेली हो? मैंने मुस्कुराते हुए बस हामी भरी. उसके चेहरे पर मैंने अपने लिए उपहास महसूस किया. उसकी नजर जब कहीं टिक गई तो मैंने नजर बचाकर उसे देखा. पत्नी गाढ़ी नीली सलवार और लाल पर तीखे हरे रंग का चौकोर पत्थर जड़ा हुआ समीज पहने हुए थी. माथा रंग-बिरंगे सूती दुपट्टे से ढका था. हाथ में दर्जनभर रंग-बिरंगी कांच की चूडि़यां और पोले ट्रेन की चलती लय के साथ हिल रहे थे. हथेली को देखकर उसकी कर्मठता का अंदाजा लगाया जा सकता था. चांदी-सी पायल एड़ी से झांक रही थी. चप्पल भी चमचमाता हुआ कुछ नया-सा था.

लड़की थोड़ी निनुवा (ऊंघ) रही थी. वह जींस और नारंगी-हरे रंग की टीशर्ट पहने हुए थी. जींस जो थोड़ी छोटी हो गई थी. हल्का पीला रूमाल उसके जींस की जेब से बाहर झांक रहा था. कलाई में स्टील-सी दिखनेवाली पतली चूड़ी पहन रखी थी. नेलपेंट ने पैर के नाखून पर अपना निशान छोड़ दिया था. उसने अपने पैर में चरचरी (वेलक्रो टेप) की आवाजवाली भूरी चप्पल डाल रखी थी. मेरा अंदाजा यह था कि वह तीसरी या चौथी कक्षा में पढ़ रही होगी. टिकट निरीक्षक के कोच में घुसते ही झूलती बोगी की चुप्पी टूट गई. इस बीच वह व्यक्ति तरोताजा होकर लौट आया था.

लड़की ने मां के कान में कुछ बुदबुदाया. मां और बेटी उठकर शायद वॉशरूम की ओर चले गए. उस व्यक्ति ने अचानक से कहा कि कल सुबह ही नागपुर से फोन आया कि आ जाओ, सब लोग देख लें तो फिर शादी कर देंगे. ‘अच्छा-अच्छा’ कहकर मैं दिमाग पर थोड़ा जोर देने लगी कि पिछली मुलाकात में क्या बात हुई थी. बस ध्यान में यह आया कि पिछली यात्रा में किसी रिश्तेदारी की बात इन्होंने कही तो थी. उसके चेहरे पर उतावलेपन को साफ पढ़ा जा सकता था. मुझे भी लगा कि थोड़ी जिज्ञासा दिखा देनी चाहिए और इस लिहाज से मैंने पूछ लिया कि कितनी बेटियां हैं? इस बीच मां और बेटी भी आ गईं. पिता ने सफेद पायजामे से ढंके पैर को मोड़ा और खिड़की से टिककर बैठ गए. यही है, रजनी नाम है.

मुझसे रहा नहीं गया और मैंने पूछ ही लिया कि किस क्लास में पढ़ती हो? उसके बदले में मां ने जवाब दिया ‘5वीं में…’ पिता ने बीच में टोकते हुए कहा इसकी ही शादी की बात करने नागपुर गया था.

मैं इतना ही कह पाई कि इसकी! फिर नजर बचाते हुए मैं तीनों को देख रही थी. मां को, पिता को, बेटी को, जिसे शहरी बनने की पूरी इच्छा थी, कोशिश भी की थी लेकिन मन की पहली परत वही थी कि कम उमर में शादी ठीक होवे है.

(लेखिका पत्रकार हैं और वर्धा में रहती हैं)

‘तुम लोग धरना देने में उस्ताद हो, देते रहो’

कौन

दिल्ली के सरकारी स्कूलों के अतिथि शिक्षकJantar Manter

कब
5 मई 2015 से जारी

कहां
जंतर मंतर

क्यों
मैं और मेरे साथी दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बतौर अतिथि शिक्षक पढ़ाते हैं लेकिन स्थाई शिक्षक के आते ही हमें हटा दिया जाता है. कब नौकरी चली जाए कोई भरोसा नहीं. ऊपर से वेतन भी कम मिलता है, अब बताइए दिल्ली जैसे शहर में 10 से 12 हजार रुपये में कैसे खर्चा चले हम सबका. आखिर पढ़ाने का ही काम तो हम भी करते हैं तो फिर स्थाई को अधिक वेतन और हमें कम क्यों. यह सवाल है दिल्ली में अतिथि शिक्षक के रूप में पढ़ा रहे शोहेब राजा का. शोहेब, अस्मिता, प्रवीण, मनीष, आलोक समेत सात और साथियों के साथ अतिथि शिक्षकों की मांगों को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे हैं.

इसके अलावा तमाम दूसरे शिक्षक बारी-बारी से अपने हक की लड़ाई के लिए यहां जुटते हैं. इनकी पूरी मागें जानने से पहले आवश्यक है कि हम यह जान लें कि अतिथि शिक्षक कौन हैं और इनकी नियुक्ति कैसे होती है. अतिथि शिक्षक की भर्ती मेरिट के आधार पर होती है. इनसे लगभग 6 महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर लिया जाता है. इन्हें 600 रुपये रोज के हिसाब मानदेय दिया जाता है. शनिवार, रविवार सहित किसी प्रकार की सरकारी और गैर सरकारी छुट्टी होने पर इन्हें मानदेय नहीं मिलता है. दिल्ली में लगभग 17,000 अतिथि शिक्षक कार्यरत हैं. और सभी की यही कहानी है.

दिल्ली सरकार से इनकी मांग है कि इन्हें नियमित करने के साथ स्थाई तौर पर एक निश्चित वेतन दिया जाए, ताकि ये एक सम्मानजनक जिंदगी जी सकें और बच्चों का भविष्य संवार सकें. दिल्ली के द्वारका में दिल्ली सरकार के एक स्कूल में अतिथि शिक्षक के रूप में पढ़ानेवाले गौरव साहनी बताते हैं, ‘शिक्षकों के लिए आखिरी भर्ती 2009 में निकाली गई थी. इसका परिणाम 2014 में आया. अगर सरकार इसी तरह लचर भर्ती प्रक्रिया चलाती रही तो और अतिथि शिक्षकों की जरूरत पड़ेगी लेकिन हमारे प्रति सरकार के उदासीन रवैये के कारण हमारा शोषण हो रहा है.’

अतिथि शिक्षक गजेंद्र सिंह बताते हैं, ‘जंतर मंतर पर बैठने से पहले हम लोगों ने दिल्ली सचिवालय के सामने धरना दिया था. उस समय दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया से भी मिले थे. उन्होंने कहा था कि हमें तो यह भी नहीं पता कि दिल्ली में अतिथि शिक्षक भी हैं. उन्होंने हम सबको भाजपा का दलाल कह दिया था. फिर हम मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मिले तो उन्होंने कहा कि तुम लोग तो धरना देने में उस्ताद हो, धरना देते रहो कुछ न कुछ हो जाएगा. मुख्यमंत्री ने यह भी कहा था कि उनके द्वारा किए गए कुल वादों में से 30 से 40 प्रतिशत भी पूरे हो जाएं तो काफी है. अब आप ही बताइए क्या इस 30-40 प्रतिशत में हमारे वादे भी हैं? जबकि पिछली बार जब 49 दिनों की सरकार बनी थी तभी उन्होंने वादा किया कि अतिथि शिक्षकों को स्थाई कर दिया जाएगा.’

‘मुझे उस छोटे से शहर से प्यार है, जहां से मैं हूं’

कंगना, आपने परिवार के खिलाफ जाकर फिल्मों की तरफ रुख किया था. अब जबकि आप राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता बन चुकी हैं तो परिवार की क्या प्रतिक्रिया है?

पापा बेहद खुश हैं. उन्होंने कहा है कि यह मेरे जन्मदिन का सबसे बड़ा तोहफा है. मेरा जन्म 23 मार्च को हुआ था और मुझे यह खबर भी उसी दौरान मिली थी. तो इससे बड़ा तोहफा और क्या होगा. ऐसा नहीं था कि मेरे पैरेंट्स मुझसे प्यार नहीं करते थे या मुझ पर ज्यादती किया करते थे. मैं जिस जगह से आई हूं. वाकई वहां कभी किसी ने ऐसा काम नहीं किया था. तो उनके लिए यह सबकुछ अजीबोगरीब था. और वे मुझे लेकर चिंतित थे. इसलिए साथ नहीं दिया. लेकिन धीरे-धीरे मैंने पहचान बनानी शुरू की तो उन्हें भी एहसास हो गया कि मैं समझदार हूं, सही कदम उठाऊंगी. हां, शुरुआती दौर में चूंकि परिवार साथ नहीं था तो सलाह की कमी में मैंने बहुत सारे पैसे बर्बाद किए, लेकिन अब सब ठीक है.

राष्ट्रीय पुरस्कार क्या मायने रखता है?
मेरे जैसी लड़की जिसे कुछ भी पता नहीं था कि वह मुंबई जाकर करेगी क्या, कैसे रहेगी. जब मेहनत-लगन से इतना महान पुरस्कार मिलता है तो जाहिर-सी बात है यह बहुत मायने रखता है. आत्मविश्वास बढ़ता है और ऐसा लगता है कि मेरी जैसी छोटे शहर की बाकी लड़कियां जो यह सोचकर बैठ जाती हैं कि उनका जन्म तो सिर्फ पति की सेवा करने के लिए हुआ है. वह कहीं न कहीं मेरे से प्रभावित होती हैं और उन्हें हौसला मिलता है. वे उदाहरण दे सकती हैं कि कंगना भी छोटे शहर की थी. उसने इतना सब कर दिया तो हम भी कर सकते हैं.

अपनी बातों में आप अपने छोटे शहर की लड़की होने का जिक्र जरूर करती हैं. इसकी कोई खास वजह?
हां, चूंकि हो सकता है कि ये बात बड़बोली लगे. लेकिन हकीकत ये है कि यह इंडस्ट्री नए खासतौर से छोटे शहर से आए लोगों को तुरंत स्वीकार नहीं लेती. लोग आपका मजाक उड़ाते हैं. आपकी बातचीत के ढंग, भाषा, पहनावे-ओढ़ावे, हर चीज पर कटाक्ष होते हैं. हमसे उम्मीद की जाती है कि हम उनके अनुयायी बनें, जो बाकियों ने किया है. इस तरह के लोग आपको पीछे की तरफ खींचने की कोशिश करते हैं. अगर आप इंडस्ट्री का हिस्सा नहीं हैं तो आपको भी इस दुनिया को समझने में वक्त लगता है, ढलने में वक्त लगता है, मुझे भी लगा. मैंने सब कुछ सीखा किया. सीखने की यह प्रक्रिया आज भी जारी है. और इसलिए मुझे उस छोटे से शहर से प्यार है, जहां से मैं हूं. मेरा शहर मेरे साथ चलता है.

नए लोग जो इस क्षेत्र में आना चाहते हैं, उन्हें आप क्या सलाह देना चाहेंगी?
देखिए मैंने अपनी राह खुद बनाई क्योंकि मैं इस बात को लेकर स्पष्ट थी कि मुझे सिर्फ दिल की बात सुननी है और किसी की सलाह मानकर आगे नहीं बढ़ना. तो जब मैंने किसी दूसरे की सलाह नहीं मानी तो किसी और को कैसे अपने को फॉलो करने को कहूं. यह तो गलत होगा. हर किसी की जिंदगी के अलग अनुभव होते हैं और उन्हें उसी तरह, उसी आधार पर अपने लिए उद्देश्य तय करने पड़ते हैं. हां, मगर इतना जरूर कहूंगी कि सोच कर आएं कि कोई काम छोटा नहीं होता. बड़ा ब्रेक शुरुआत में ही मिल जाए जरूरी नहीं. कुछ न कुछ करते रहना चाहिए. और हमेशा सीखने की प्रक्रिया में विश्वास रखें.

नाकामयाबी का मुकाबला कैसे किया?
मैं यह नहीं कहूंगी कि मैं बाकी लोगों की तरह डिप्रेशन में नहीं गई. मुझे चिंता नहीं हो रही थी कि आगे मेरा क्या होगा. एक दौर में मेरे पास सिर्फ चरित्र भूमिकावाले किरदार करने के ऑफर आ रहे थे. या फिर ऐसी फिल्में जिसमें मुझे सिर्फ नाममात्र के लिए रखा गया है. कई सह-कलाकार तो मेरा मजाक भी उड़ाते थे. मैं नाम नहीं लूंगी. फब्तियां कसते थे. कई लोगों ने कहा कि मेरे पैकअप का टाइम आ गया है. अब मुझे बैग पैक कर चले जाना चाहिए. लेकिन मैंने उस वक्त भी मन में ये बात रखी थी कि वापस नहीं जाऊंगी. चाहे जो हो जाए. फिर मुझे ‘तनु वेड्स मनु’ जैसी फिल्म मिली और मैं वापस से ट्रैक पर आ गई. इसके बाद तो मुझे केंद्रीय भूमिकावाले किरदार निभाने का मौका मिलने लगा. भले ही ‘रज्जो’ और ‘रिवॉल्वर रानी’ बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलीं, लेकिन मेरे दिल के बेहद करीब हैं ये फिल्में.

तीनों खान अभिनेताओं के साथ काम करने का कोई इरादा?
ऐसा नहीं है कि मानकर बैठी हूं कि उनके साथ फिल्में नहीं करनी. लेकिन मुझे अपने लिए मजबूत किरदारों वाली भूमिका ही चाहिए. अब पीछे मुड़कर नहीं देखूंगी. काफी संघर्ष कर लिया है. अब जो समय आया है, उसमें मुझे अच्छी और बेहतरीन फिल्में करनी हैं. ‘क्वीन’ से लोगों ने मुझमें जो विश्वास जगाया है, उससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ गया है. मुझे दर्शकों की उम्मीदों पर खरा उतरना है.

कंगना तेरा स्वैगर लाख का…

Kangna

दूसरी लड़कियों की तरह वह भी आईने के सामने खड़ी होकर घंटों खुद को निहारा करती थीं, लेकिन कभी उन्होंने खुद में माधुरी या श्रीदेवी को तलाशने की कोशिश नहीं की. हमेशा उन्होंने आईने के उस पार अपनी पहचान को ढूंढने की कोशिश की है. सिंड्रेला जैसे किस्से-कहानियों से बचपन से ही उन्हें लगाव नहीं था. भाग्य के सहारे वह अपनी जिंदगी नीलाम नहीं करना चाहती थीं, बल्कि अपनी मर्जी से जीना चाहती थीं. बाकी लड़कियों की तरह इतराने की बजाय इसका विरोध करतीं. उन्हें इस बात से चिढ़ थी कि वह सिर्फ इसलिए भाग्यशाली कहला रही थीं, क्योंकि उनके बाद उनके भाई का जन्म हुआ है. झूठी वाहवाही उन्हें खैरात में हरगिज नहीं चाहिए थी. हां, उनका ख्वाब कभी अभिनेत्री बनना नहीं था. उन्हें इतना जरूर पता था कि वह जो भी बनेंगी अपने बलबूते बनेंगी.

जिस उम्र में लड़कियां पापा से खिलौनों की डिमांड करती हैं, उस उम्र में उन पर दूसरी ही धुन सवार थी. एक बार तो उन्होंने अपने पिता को पलटकर कह दिया कि दोबारा हाथ उठाएंगे तो मैं भी हाथ उठा दूंगी. हां, एक बात उन्होंने हमेशा गांठ बांधे रखी वह यह कि वह सिर्फ खुद की सुनेंगी और किसी की नहीं. अपने पापा की लाडली रानी भले ही न बन पाई हों लेकिन आज वह बॉलीवुड की ‘क्वीन’ हैं, कंगना रनौत. बेशक कंगना हिमाचल प्रदेश की बेटी हैं लेकिन सफलता उन्हें आसानी से नहीं मिली. उन्होंने संघर्षों के पहाड़ काटकर रास्ते बनाए और आज सफलता की ऊंची चोटी पर विराजमान हैं. कंगना उत्साहित हैं. लेकिन रुकी नहीं हैं. वे खुद को निखारने में जुटी हुई हैं. इसका प्रमाण आप ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ में उनके दोहरे किरदार ‘दत्तो’ और ‘तनु’ के रूप में देख सकते हैं. अपनी भाव भंगिमा, डांसिंग स्किल और हरियाणवी संवाद को उन्होंने बेहतरीन अंदाज में ‘दत्तो’ के रूप में ढाला है. उन्होंने दोनों किरदारों में जान डालने के लिए कड़ी मेहनत की है.

अभिनय के अलावा स्क्रिप्ट राइटिंग का प्रशिक्षण

बॉलीवुड में ‘क्वीन’ फिल्म जैसी सफलता हासिल करने के बाद अभिनेत्रियां जहां उसे भुनाने में जुट जाती हैं और प्रयोग करने से कतराने लगती हैं. ऐसे दौर में कंगना ने तय किया कि वे न्यूयॉर्क फिल्म अकादमी जाएंगी और वहां स्क्रिप्ट राइटिंग का प्रशिक्षण लेंगी. कंगना का मानना है कि उन्हें हमेशा खुद को साबित करना होगा और इसलिए उन्होंने सीखना जारी रखा. अंग्रेजी को लेकर उनकी खिल्ली उड़ाई गई तो उन्होंने न सिर्फ अपनी अंग्रेजी सुधारी, बल्कि अपने फैशन स्टेटमेंट पर भी काम किया. आज अपनी स्टाइलिंग वे खुद करती हैं. कंगना को ये बातें चुभती थीं कि लोग उनके घुंघराले बालों का मजाक बनाते हैं. कंगना ने अपनी जिंदगी की पहली हिंदी फिल्म दूरदर्शन पर देखी थी, जिसमें अमिताभ बच्चन और परबीन बॉबी थे. जब वह काफी छोटी थीं तब दादी मां के साथ टीवी देखा करती थीं.

उन्हें आज भी उस फिल्म का नाम याद नहीं है. और संयोग देखें वही लड़की जब बड़ी होती है और फिल्मी दुनिया का हिस्सा बनती है तो फिल्म ‘वो लम्हे’ में उन्हें परबीन बॉबी से प्रेरित किरदार निभाने का मौका मिलता है. कंगना मानती हैं कि बचपन में ही कोई न कोई कनेक्शन हो चुका था कि मुझे फिल्मों में ही आना है शायद. कंगना इस इंडस्ट्री से नहीं थीं. कंगना स्वीकारती हैं कि उन्होंने ‘गैंगस्टर’ फिल्म के लिए आॅडिशन दिया था. वे इस फिल्म के लिए विकल्प थीं. इसमें पहले चित्रांगदा सिंह अभिनय करनेवाली थीं लेकिन अचानक उन्होंने मना कर दिया था. सो, भट्ट कैंप से कंगना के पास फोन आया और उन्हें उनकी पहली फिल्म मिल गई.

पुरुष कलाकार की भूमिका निभाई

ये बात कहते हुए वह अपने दिल्ली में रहने के समय की चर्चा करती हैं कि किस तरह उन्हें अचानक सुप्रसिद्ध व वरिष्ठ रंगकर्मी अरविंद गौड़ की वर्कशॉप में पहली बार बतौर मॉनीटर के रूप में क्लास हैंडल करने को कहा गया. उस वक्त पहली बार कंगना को इस बात का एहसास हुआ कि उनके परिवार को भी उन पर भरोसा नहीं लेकिन कोई व्यक्ति तो है जो उनमें नेतृत्व क्षमता देख रहा है. वह थियेटर ग्रुप में भी बैक स्टेज का ही काम किया करती थीं. लेकिन एक रोज जब अचानक एक पुरुष कलाकार की तबीयत खराब हुई तो अरविंद के कहने पर कंगना ने उस कलाकार की भूमिका निभाई और उन्हें इसमें बेहद आनंद आया. उस वक्त उन्होंने महसूस किया कि शायद उन्हें अभिनय की राह चुननी चाहिए. उन्होंने थियेटर में ही पूरा जी लगा लिया. अरविंद गौड़ ने ही कंगना को सुझाया कि वह अभी काफी युवा हैं, उन्हें फिल्मों में कोशिश करनी चाहिए. तब कंगना ने मुंबई आने का निर्णय लिया. और उनके एक नए सफर की शुरुआत हुई.

कंगना जब पर्दे पर ‘गैंगस्टर’ की सिमरन बनी तो उसने उन सारे किंतु-परंतु जैसे शब्दों को निराधार कर दिया. पहली ही फिल्म में वह ट्रैजेडी क्वीन बनकर दर्शकों के सामने आईं. एक के बाद एक उन्होंने इंटेंस किरदार निभाने शुरू किए. लोग उन्हें पहली फिल्म में ही मीना कुमारी की उपाधि से नवाजने लगे थे. ‘वो लम्हे’, ‘लाइफ इन अ मेट्रो’ उनमें से एक थी. कंगना लेकिन वहां थोड़ी ठहरी. उन्होंने अपनी इमेज तोड़ी. फिर उनके सामने ‘तनु वेड्स मनु’ आई. कंगना मानती हैं कि ‘तनु वेड्स मनु’ में तनु के किरदार को एक पुरुष किरदार से अधिक शक्तिशाली दिखाया गया. कंगना कहती हैं कि जिंदगी में अगर ‘क्वीन’ की रानी के किरदार की तरह मेरे साथ कोई करे तो मैं उसे मजा चखाऊंगी. असल जिंदगी में वह खुद को ‘रिवॉल्वर रानी’ ही मानती हैं. तीन फिल्मों में लीड किरदार निभाने के बाद जब उनके पास ‘फैशन’ फिल्म आई तो वह चौंकी कि उन्हें चरित्र किरदार आॅफर हो रहे हैं. मतलब उनका कॅरियर संकट में है. लेकिन फिल्म रिलीज होने के बाद जब हर तरफ उसके छोटे-छोटे दृश्य व संवाद याद रखे जाने लगे, तब उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने कितना प्रभावशाली किरदार निभाया है.

शुरुआती दौर में कंगना भी अन्य अभिनेत्रियों की तरह ‘खान्स’ की हीरोइन बनना चाहती थीं. लेकिन अब उनका नजरिया बदल चुका है. डिप्रेशन के दौरान उन्होंने खुद को क्रिएटिव राइटिंग में उलझाए रखा. उन्होंने शॉर्ट फिल्में बनाईं. ‘द टच’ कंगना द्वारा बनाई गई ऐसी ही एक फिल्म है. यह वही कंगना हैं, जो कभी अंग्रेजी बोलने में लड़खड़ा जाया करती थी. अब अंग्रेजी भाषा में अपनी पहली शॉर्ट फिल्म बनाती है. फिल्म क्वीन की रानी की तरह कंगना कभी किसी लड़के से शादी के लिए मिन्नते नहीं कर सकतीं. कंगना को अभी शादी में कोई दिलचस्पी नहीं.

नाडिया की बायोपिक

उनकी मां की शादी 21 साल में हो गई थीं और उनके परिवार वाले भी चाहते थे कि कंगना 26 की होने के साथ ही व्याह रचा लें. लेकिन मातापिता की ‘हां’ में ‘हां’ मिलानेवालों में से वे नहीं. शायद कंगना के इस व्यक्तित्व से अब इंडस्ट्री के गंभीर फिल्मकार भी वाकिफ हो चुके हैं. तभी तो विशाल भारद्वाज उन्हें लेकर नाडिया (जिन्हें गॉड आॅफ स्टंट इन बॉलीवुड माना जाता था) पर बननेवाली बायोपिक की परिकल्पना कर रहे हैं. कंगना भी विशाल के साथ काम करने के लिए उत्सुक हैं. कंगना बहन रंगोली के बेहद करीब हैं. वे हर बात उनसे शेयर करती है. जब उनकी बहन एसिड अटैक का शिकार हुई थीं तो कंगना भी सदमे में चली गई थीं. कंगना को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने की खबर भी सबसे पहले रंगोली ने ही दी थी. कंगना बताती हैं, ‘मैं बहुत मुंहफट और हंसमुख लड़की हूं. जो मेरे करीब हैं, वे इस बात से वाकिफ होंगे. मुझे तो डेटिंग भी उस व्यक्ति के साथ पसंद है जो कूल हो न कि बहुत अधिक बुद्धिजीवी. सेट पर भी मैं खूब मौज मस्ती करती हूं.’

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