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नेत्रदान तो दूर, लोग रक्तदान से पहले भी लाख बार सोचेंगे…

eye 52009 में जब नीरज अग्रवाल की दादी का निधन हुआ तब वे 85 वर्ष की थीं. नीरज ग्वालियर शहर में ही एक मेडिकल स्टोर के संचालक हैं, लिहाजा वह मरीजों का दर्द समझते हैं. जब उनकी दादी का निधन हुआ तो उन्होंने परिवार में सबकी मर्जी के खिलाफ जाकर उनकी आंखें दान करा दीं. सोचा कि आंखें किसी जरूरतमंद के काम आ जाएंगी. लेकिन हाल में उन्हें जयारोग्य अस्पताल में हुई घटना का पता चला तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई. अस्पताल के नेत्र विभाग को ही उन्होंने अपनी दादी की आंखें दान की थीं. नवीन का कहना है, ‘हमारे समाज के कुछ हिस्सों में माना जाता है कि मनुष्य अगर अपने शरीर का कोई अंग दान करता है तो अगले जन्म में वह उस अंग से वंचित रहता है. ऐसी रुढ़िवादी परंपराओं को तोड़कर मैंने दादी की आंखें दान की थीं, लेकिन देखिए अस्पताल के प्रबंधन को इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता. आखिर कैसे कोई इतनी अमानवीयता दिखा सकता है कि दान में दी गईं आंखों को कूड़े में फेंक दे?’ नवीन ने जब दादी की आंखें दान करने का फैसला किया था तो परिवार में उनकी काफी  आलोचना हुई थी और अब इस मामले के सामने आने के बाद अपने परिवार के लोगों का सामना करना उनसे मुश्किल हो रहा है. वे कहते हैं, ‘सुनने में आ रहा है कि 6 सालों में महज एक जोड़ी आंखें ही किसी जरूरतमंद को लगाई गई हंै. डाॅक्टरी का पेशा इन दिनों एक धंधा बन चुका है.’ एक पीड़ित राहुल गुप्ता की मां की दान की गईं आंखों को अस्पताल के रजिस्टर में दर्ज भी नहीं किया गया है. इस पर उनका मानना है कि और भी न जाने ऐसे कितने दानदाता होंगे जिन्हें नहीं पता कि उनकी ओर से दान में दी गईं आंखों का क्या किया गया. घटना के बाद नीरज जयारोग्य अस्पताल के नेत्र विभाग में अपनी दादी की आंखों के बारे में पूछने गए तो उनसे कहा गया, ‘आपकी दादी की आंखों से संबंधित जानकारी गोपनीय है. अगर हम आपको बता दें कि वे आंखें किसे लगाई गईं तो हो सकता है कि आप उससे या उसके परिजनों से पैसे की मांग करने लगें.’ नीरज ने बताया कि अस्पताल के स्टाफ का ये रवैया निहायत ही शर्मनाक है. वे कहते हैं, ‘चिकित्सा का पेशा तो पहले से ही बदनाम है. इस तरह की घटनाओं से लोगों का बचा-खुचा भरोसा भी खत्म हो जाएगा. आंखें दान करना तो दूर की बात है, लोग अब रक्तदान करने से पहले भी लाख बार सोचेंगे. क्या पता कहीं उसे भी बाल्टी में भर नाली में न बहा दिया जाए.’

अगर आप शरीर दान करने जा रहे हैं तो छुट्टी के दिन मरना मना है…

‘आंखें कचरे में फेंक दीं. इसमें कौन-सी चौंकाने वाली बात है? आप नेत्रदान की बात कर रहे हैं, जीआरएमसी में देहदान की भी कोई कद्र नहीं.’ ऐसा बोलते हुए अनिल शर्मा के चेहरे पर एक दर्दभरी मुस्कान उभर आती है. ग्वालियर के गोविंदपुरी इलाके के निवासी अनिल शर्मा के पिता स्वर्गीय लक्ष्मीनारायण शर्मा ने अपने जीते जी ही अपनी देहदान करने का फैसला लिया था. देहदान करने वाली ये बात बताते हुए अनिल शर्मा से हमने जानना चाहा कि क्या उन्हें भी लगता है कि उनके पिता की भी आंखें कचरे में फेंकी दी गईं होंगी? इस सवाल के जवाब में उन्होंने हमें जो बताया वह वाकई चौंकाने वाला और जीआरएमसी प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाने वाला भी था.

वह कहते हैं, ‘निधन से साल-दो साल पहले ही बाबूजी ने यह सोचकर अपना शरीर जीआरएमसी को दान कर दिया था कि उनका शव मेडिकल छात्र-छात्राओं के शोध करने और सीखने के काम में आएगा. उन्होंने सोचा था कि उनकी आंखें किसी का जहां रोशन कर सकेंगी.’ दुखी होते हुए वह आगे कहते हैं, ‘18 जून 2013 को पिताजी का निधन हुआ. वह छुट्टी का दिन था. हमने जयारोग्य अस्पताल से फोन पर संपर्क किया. जवाब मिला कि आज छुट्टी का दिन है, घर पर ही शव किसी फ्रीजर में रखवा दो, कल ले जाएंगे.’ आखिर यहां-वहां से दबाव बनाने के बाद वे राजी तो हुए. फिर अस्पताल का स्टाफ हमें पुलिस थाने तो कभी किसी दूसरे विभाग से सर्टिफिकेट ले आने के लिए भेजता रहा. दुख के समय में हम इस विभाग से उस विभाग के चक्कर लगा रहे थे और शव घर पर पड़ा था. ये सब करते-करते ही एक दिन बीत गया. अगले दिन अस्पताल का स्टाफ शव लेने के लिए घर आया. अस्पताल पहुंचने पर पिताजी का शव लावारिस शवों के साथ रखा जाने लगा. हमने ऐतराज किया तो किसी तरह उनके पार्थिव शरीर को ठीक तरीके से रखा गया.’

गिलास से एक घूंट पानी पीते हुए वे कटाक्ष करते हुए कहते हैं, ‘अगर आप शरीर दान करने जा रहे हैं तो छुट्टी के दिन मरना मना है. कम से कम जयाराेग्य अस्पताल के मामले में तो यही कहा जा सकता है. उन लोगों के अंदर का इंसान मर चुका है. वे शव की बेकद्री कर सकते हैं तो कचरे में आंखें फेंकना कौन सी बड़ी बात है? कम से कम मेरे लिए तो इसमें चौंकने जैसा कुछ भी नहीं. हां, बस ये लगता है कि अगर अस्पताल का स्टाफ आंखें फेंक दे रहा हैं तो शव का क्या करता होगा, ये एक बड़ा सवाल है.’ वे आगे बताते हैं, ‘जब शव दान किया था तब खूब जिल्लत झेलनी पड़ी. लोगों ने हमसे सवाल किए, क्या पैसे नहीं हैं दाह-संस्कार के? हमारे समाज ने ये कहकर हमसे दूरी बना ली कि हमारे यहां दाह-संस्कार नहीं हुआ. हम ब्राह्मण नहीं हैं. आज इस मामले के आने के बाद उन्होंने फिर से हमारा उपहास बनाना शुरू कर दिया है. ऐसे में इस तरह के धर्मार्थ और पुण्य के कामों को करने के लिए कोई कैसे आएगा. जयारोग्य अस्पताल में जो कुछ भी हुआ वह निंदनीय है. इस तरह की घटनाएं डॉक्टर और उसके पेशे काे ठेस पहुंचाती हैं. हमारे समाज में डॉक्टर को भगवान का दर्जा दिया गया है. इस घटना के जिम्मेदारों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए.’

मुझे चार माह का गर्भ था, जब मेरे पति का देहांत हुआ, उनकी आखिरी इच्छा थी नेत्रदान

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‘उनकी मौत एक सड़क दुर्घटना में हुई थी. वे हमेशा ही नेत्रदान करने के लिए कहा करते थे. उनका मानना था कि अगर माैत के बाद हम अपनी आंखों से किसी और की दुनिया रोशन कर सकें तो भला इससे अच्छा और क्या होगा? वे मां-बाबूजी का भी नेत्रदान का पर्चा भरवाने जाने ही वाले थे, लेकिन तब तक दुर्घटना के शिकार हो गए. बस आंखें दान करने को उनकी आखिरी इच्छा मानकर हमने आंखें दान कर दीं, लेकिन क्या पता था कि उस अस्पताल में आंखें कचरे में फेंक दी जाएंगी.’

ये बातें कहते हुए विनीता जैन की आंखें आंसुओं से भर जाती हैं. महज 30 वर्ष की उम्र में पति को खोना और उसके छह महीने बाद ही यह सुनना कि जिन आंखों को अपने पति की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए उन्होंने दान में दिया था, वह शायद कचरे में फेंक दी गई हैं, उनके ऊपर बिजली गिरने के समान था. सात वर्षीय रिद्धि और दुधमुंहे रिद्धिम की मां विनीता बताती हैं, ‘मेरा चार माह का गर्भ था, जब मेरे पति का देहांत हुआ. पिछले अक्टूबर की ही तो बात है. इतना आसान नहीं था सब कुछ भुलाना पर अब जब डॉक्टरों की ये घिनौनी करतूत सामने आई है तो जख्म फिर से हरे हो गए हैं.’ वह अस्पताल प्रबंधन पर सवाल उठाती हैं, ‘अगर आपके बस का नहीं है तो आखिर क्यों चला रहे हैं अस्पताल? क्यों लोगों की भावनाओं से खेल रहे हैं? अगर यह डॉक्टरों के खिलाफ षडयंत्र भी है तो हमें षडयंत्रकारियों के नाम क्यों नहीं बताते? इस षडयंत्र से हमारे दिलों को ठेस पहुंची है और हुआ तो यह सब उन डॉक्टरों के अंडर में ही, वही हेड थे न? जिम्मेदार वही हैं. बताइए आखिर ऐसा कैसे संभव है कि छह सालों में सिर्फ एक ही व्यक्ति की आंखें प्रत्यारोपण योग्य पाई गईं? शोध भी चल रहा है तो कहां हैं शोधार्थी और शोध के परिणाम? इस बीच विनीता के ससुर सुरेश जैन कमरे में दाखिल होते हुए कहते हैं, ‘ये कोई छोटी-मोटी गलती नहीं है जो हम उन्हें माफ कर देंगे. कुछ लोग कह रहे हैं कि अगर वाकई डॉक्टर गुनहगार हैं तो अपना गुनाह कबूल करने पर जनता उन्हें माफ कर देगी. ऐसे कैसे कर देगी? हमारी भावनाओं का क्या कोई मोल नहीं? हम तो सोचते हैं कि इंसान गया लेकिन अगर उसकी आंखें किसी की अंधेरी दुनिया को रोशन कर दें तो लगेगा कि वह अभी भी यहीं है और दुनिया देख रहा है. हमारे लिए तो यह दोहरे सदमे सा है. जवान बेटा खोया और फिर ये सब. अब तो कोई आंखें दान करेगा भी तो यही कहेंगे मत करो, वो लोग इंसान नहीं हैं, फेंक देंगे कचरे में.’ सुरेश जैन की आंसुओं से भरी आंखें बार-बार यही सवाल कर रही थीं, क्या हमारे जख्म हरे करने वालों को सजा मिलेगी? विनीता पूछती भी हैं, ‘सर, वो लोग सजा तो पाएंगे न?’

मैंने मां की आंखें दान की थीं लेकिन लिस्ट में हमारा नाम नहीं

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‘हमारे भांजे को एनीमिया हुआ था. उसे हर हफ्ते-दस दिन में खून की जरूरत पड़ती थी. उस समय ऐसे-ऐसे लोगों ने हमें खून दान में दिया था जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. बस उसी समय माताजी ने मन बना लिया था कि उन्हें भी ऐसा कुछ करना है जिससे किसी के जीवन में खुशहाली आ सके. यही सोचकर उन्होंने मौत के बाद अपनी आंखें दान करने का फैसला लिया था.’

अपनी मां को याद करते हुए राहुल गुप्ता और अंकित गुप्ता थोड़ा भावुक हो उठते हैं. राहुत बताते हैं, ‘हमारी मां राधा गुप्ता का निधन एक जनवरी 2014 को हुआ था. उनकी अंतिम इच्छा आंखें दान करने की थी, इसलिए हमने जयारोग्य अस्पताल से संपर्क किया था. इसके बाद अस्पताल की एक गाड़ी से कुछ लोग आए थे मां की आंखें लेने. उस वक्त उन्होंने हमसे एक शपथ पत्र भी भरवाया था.’

शपथ पत्र दिखाते हुए वह कहते हैं, ‘दुख का समय ऐसा होता है जब हम कानूनी औपचारिकताओं की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाते हैं. शपथ पत्र पर न कोई सील है न सिक्का. आई बैंक के दानदाताओं के रजिस्टर में हमारी मां का नाम भी नहीं है. अस्पताल में पूछने पर वहां का स्टाफ कहता है कि आपके परिवार से तो आंखें दान ही नहीं की गई हैं. हमारे पास शपथ पत्र के अलावा कुछ भी नहीं है, अब कैसे साबित करूं की मेरी मां की मौत के बाद मैंने उनकी आंखे जयारोग्य अस्पताल के नेत्र विभाग को दान में दी थीं?’  अंकित बताते हैं, ‘मेरी मां की उम्र पचास वर्ष थी. आंखें निकालते वक्त डॉक्टर बोल भी रहे थे कि आंखें ठीक हैं, किसी को लग सकती हैं, इसीलिए हमने कोई जानकारी नहीं जुटाई कि आंखें किसी को लगीं या किसी दूसरे काम में ले ली गईं? अब पता चल रहा है कि अस्पताल में दान की गईं आंखे कचरे में फेंक दी गई थीं तो सदमा लगा. अगर अस्पताल प्रबंधन से जुड़े लोगों को आंखें फेंकनी ही थीं तो निकाली ही क्यों? उन्हें आंखें दान में ही नहीं लेनी चाहिए थीं. इससे अच्छा तो ये होता कि वे आंखें हमें वापस ही दे देते, हम गंगा में विसर्जित कर देते.’ राहुल कहते हैं, ‘अब तक आंखें दान करने के बारे में सोचकर बहुत अच्छा लगता था. सोचते थे कि मां की आंखें दान करके पुण्य का काम किया है, लेकिन इस तरह की घटनाओं से आगे कोई कैसे अपने परिजन की आंखें दान करने की हिम्मत जुटा पाएगा. शहर के सबसे बड़े और नामी अस्पताल और वहां के डॉक्टरों पर विश्वास किया और बदले में क्या हुआ? इस मामले की अच्छी तरह से जांच कर सच्चाई का पता लगाया जाना चाहिए. साथ ही इस निंदनीय घटना को अंजाम देने वाले जिम्मेदारों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए.’

 

दान की आंखें कूड़ेदान में

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‘कुछ लोगों के लिए मेरी आवाज ही मेरी पहचान है, क्योंकि वो मुझे देख नहीं सकते. हमारे देश में एक करोड़ से भी ज्यादा लोगों के पास आंखें नहीं हैं. आप देख रहे हैं ना, मैं क्या कह रहा हूं आप भी वो क्यों नहीं करते जो हमने किया अपनी आंखें किसी के नाम कर दें जिससे उनकी आंखें भी देख सकें वो सब जिसे वे सिर्फ आवाज से पहचानते आए हैं. लिखिए अमिताभ बच्चन को या जया बच्चन को केयर ऑफ, द आई बैंक एसोसिएशन ऑफ इंडिया  पर. आपकी आंखें किसी के जीवन में उजाला ला सकती हैं.’ 

बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की आवाज में नब्बे के दशक में जब यह विज्ञापन दूरदर्शन पर दिखाया जाता तब लोग टीवी के सामने चिपक जाते हैं. नेत्रदान करने की अपील के साथ यह विज्ञापन ‘द आई बैंक एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ की ओर से प्रसारित करवाया जाता था. हालांकि नेत्रदान के लिए प्रेरित करने वाले इस विज्ञापन का प्रसारण धीरे-धीरे सीमित और बाद में पूरी तरह से खत्म कर दिया गया. तमाम लोगों ने इस विज्ञापन को भी भुला दिया होगा, मगर बीते दिनों ग्वालियर में हुई एक घटना ने इस विज्ञापन की अचानक याद दिला दी. शहर के इस सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में लोगों की ओर से दान की गईं आंखें कूड़ेदान में पाई गईं. जागरूकता फैलाने वाले विज्ञापनों और आंखें दान करने को लेकर सरकार व सरकारी अस्पताल कितने सजग हैं, इस घटना ने उसकी कलई खोलकर रख दी है.

मामला ग्वालियर के जयारोग्य अस्पताल का है. यहां दान में मिली आंखें कूड़ेदान में पाई गईं हैं. अमिता गंभीर की मौत के बाद उनकी आंखें 22 अप्रैल को उनके परिवार ने अस्पताल को दान की थीं. जून के दूसरे हफ्ते में इस परिवार को पता चला कि दान की गई आंखों को कूड़े में डाल दिया गया है. परिवार के लोगों ने अस्पताल जाकर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की तो इस बड़ी घटना का खुलासा हुआ. जांच हुई तो अस्पताल के नेत्र विभाग की इमारत  के पिछले छज्जे पर लगे कूड़े के ढेर में कई आंखें मिलीं. आनन फानन में विभाग के डॉ. यूएस तिवारी, कॉर्निया यूनिट प्रभारी डॉ. डीके शाक्य सहित ओटी इंचार्ज लिसी पीटर को निलंबित कर घटना की मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दे दिए गए हैं. वहीं गजराराजा मेडिकल कॉलेज (जीआरएमसी) के डीन ने एक चार सदस्यीय समिति बनाकर मामले की तफ्तीश शुरू करा दी है. घटना की खबर फैलते ही नेत्रदान करने वाले दूसरे परिवारों के लोग भी अपने परिजन की आंखों का हिसाब-किताब मांगने अस्पताल पहुंच गए. फिलहाल अमृता गंभीर के बेटे किशन गंभीर ने दो आरोपियों डॉ. यूएस तिवारी व डॉ. डीके शाक्य के खिलाफ आईपीसी की धारा 405, 406, 415 और 420 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया है. मामले की जांच जारी है. इस मामले में दिलचस्प मोड़ तब आया जब घटना के अगले दिन कूड़े में मिली आंखों को गायब कर दिया गया और इसके दूसरे दिन जब पुलिस जांच के लिए पहुंची तो नाटकीय तरीके से आंखें वहीं से बरामद की गईं. इस वाकये ने पूरे घटनाक्रम को संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है.

अब हर दिन गुजरने के साथ डॉक्टरों पर आरोपों की संख्या बढ़ती जा रही है. दोनों डॉक्टरों के खिलाफ थाने में अब तक तकरीबन आधा दर्जन शिकायती आवेदन आ चुके हैं. इनमें से एक शिकायत पर केस दर्ज कर लिया गया है और बाकी आवेदनों पर डॉक्टरों से पूछताछ जारी है. एक आवेदन राहुल गुप्ता का है. राहुल बताते हंै, ‘अस्पताल के नेत्रकोष के नेत्र दानदाताओं की लिस्ट वाले रजिस्टर में मेरी मां का तो नाम ही नहीं है. पूरे मोहल्ले के सामने अस्पताल के डॉक्टर मां की आंखें ले गए थे लेकिन अब इंकार कर रहे हैं. अगर आंखें उनके पास नहीं हैं तो कौन ले गया? आखिर कहां गईं मेरी मां की आंखें?’

जीआरएमसी के डीन रिटायर होने वाले हैं. यह पद पाने के लिए एक डॉक्टर साजिश रच रहा है. स्थानीय स्तर पर इसमें कुछ पत्रकार भी शामिल हैं

किशन गंभीर कहते हैं, ‘आंखें दान कर के क्या हमें कोई आर्थिक लाभ होता है? बस यह सोचकर एक आत्मिक तसल्ली मिलती है कि हम किसी जरूरतमंद के काम आ सकेंगे. लेकिन अगर दान की आंखें कूड़ेदान में फेंक दी जाएं तो बताइए हम पर क्या बीतेगी? इस तरह तो नेत्रदान के लिए कोई आगे ही नहीं आएगा. यह घोर अमानवीय कृत्य है. इसके गुनाहगारों को सजा दिलाने के लिए मैं अंतिम सांस तक लड़ूंगा. मुझे धमकियां दी जा रही हैं कि केस वापस ले लूं लेकिन मैं पीछे हटने वाला नहीं. यह मेरी नहीं, समाज की लड़ाई है.’

इसके उलट दोनों आरोपी डॉक्टर किशन गंभीर पर ही आरोप लगा रहे हैं. डॉ. शाक्य कहते हैं, ‘जिस समय यह घटना हुई, उस समय मैं छुट्टी पर था. यह मेरी छवि खराब करने के लिए रची गई एक साजिश है, जिसका एक मोहरा किशन गंभीर है.’ दो जूनियर डॉक्टरों पर भी आरोप लगाते हुए वह कहते हैं, ‘हां, हमने 22 अप्रैल को अमृत गंभीर की आंखें निकाली थीं. 23 मार्च को उन्हें किसी और को लगाए जाने की पूरी तैयारी भी थी लेकिन आखिरी समय में ऑपरेशन रद्द करना पड़ा क्योंकि आंखें प्रत्यारोपण के लिए अनुपयुक्त पाई गईं. उसी समय हमने आंखें दो जूनियर डॉक्टरों के हवाले कर दी थी. तब से वह उन्हीं के पास थीं. इस साजिश में वे दोनों भी शामिल हैं.’

आखिर कौन कर रहा है उनके खिलाफ षडयंत्र? इसके जवाब में डॉ. शाक्य कहते हैं, ‘जीआरएमसी के डीन डॉ. जीएस पटेल जल्द ही रिटायर होने वाले हैं और वरिष्ठता सूची के हिसाब से नेत्र विभाग के अध्यक्ष डॉ. तिवारी डीन बनने की होड़ में पहले पायदान पर हैं. उनसे चार पायदान नीचे यानी छठे नंबर पर मेरा नंबर हैं. बीच में जो भी चार नाम हैं, वह किन्हीं कारणों से इस पद के अयोग्य हैं. इसलिए इस पद की महत्वाकांक्षा रखने वाले एक डॉक्टर, एक निजी अस्पताल के नेत्र विशेषज्ञ के साथ मिलकर साजिश रच रहे हैं. स्थानीय स्तर पर इसमें कुछ पत्रकार भी शामिल हैं.’ अपने नेत्रकोष का पंजीकरण ‘तहलका’ को दिखाते हुए वे कहते हैं, ‘हमारा नेत्रकोष पंजीकृत है, फिर कैसे यह प्रचारित किया गया कि वह बिना पंजीकरण काम कर रहा है.’

डॉ. शाक्य के आरोप के संबंध में ग्वालियर जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन दोनों जूनियर डॉक्टर का बचाव करते हुए इसे निराधार बता रहा है. एसोसिएशन के अध्यक्ष गिरीश चतुर्वेदी कहते हैं, ‘जूनियर डॉक्टर को आखिर उनके खिलाफ षडयंत्र कर के क्या हासिल होगा? हम विभागाध्यक्ष तो बन नहीं जाएंगे. सच तो ये है कि विभाग में सब कुछ सही नहीं चल रहा. आप नेत्रकोष की हालत ही देख लीजिए. दान की गईं आंखों को रक्त कोष के फ्रीजर में रखा जाता है. अगर हमको दोषी ठहराया जाता है तो हम न्यायिक जांच की मांग करेंगे.’

जीआरएमसी के डीन डॉ. जीएस पटेल पूरे मामले को डॉक्टरी पेशे को बदनाम करने वाला करार देकर कड़ी कार्रवाई का आश्वासन देते हुए कहते हैं, ‘विभागीय जांच पूरी कर ली गई है. डॉ. जेएस सिकरवार की अध्यक्षता में जांच समिति ने 200 पेजों की अपनी रिपोर्ट हमें सौंप दी है. अस्पताल की साख पर बट्टा लगाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा.’

बहरहाल उनकी बातों में कितना दम है इसका पता इस बात से ही चल जाता है कि जांच समिति की अध्यक्षता जयारोग्य अस्पताल के डॉ. सिकरवार को दी गई थी, जो खुद ओहदे में डॉ. यूएस तिवारी और डॉ. डीके शाक्य के कनिष्ठ हैं. इसलिए अस्पताल के अंदरुनी हलकों में दबी जुबान में ये जुमला खूब उछल रहा है, ‘जब सैंया भए कोतवाल, तब डर काहे का?’ अस्पताल के ही एक डॉक्टर बताते हैं, ‘जयारोग्य अस्पताल में बनी जांच समितियां महज खानापूर्ति के लिए ही होती हैं. इसी समिति का ही हाल देख लो. डॉ. शाक्य अनुसूचित जाति से आते हैं लेकिन समिति का कोई भी सदस्य एससी कोटे का नहीं है. कल को अगर फैसला डॉ. शाक्य के खिलाफ भी हुआ तो वह इस समिति के गठन को ही चुनौती दे देंगे. फिर किया-धरा सब बेकार.’

वैसे दोनों आरोपी डॉक्टर यह भी दावा कर रहे हैं कि कूड़ेदान में मिलीं आंखें इंसान की नहीं जानवर की हैं. इस पर किशन गंभीर ने पुलिस अधीक्षक ग्वालियर हरिनारायणचारी मिश्रा से आंखों के डीएनए परीक्षण की गुहार लगाई है. किशन कहते हैं, ‘पुलिस जांच जिस कछुआ गति से चल रही है उससे तो कोई निष्कर्ष निकलेगा, ऐसी उम्मीद कम है. अब तो बस मजिस्ट्रेट की जांच ही एकमात्र सहारा है.’ इस बीच दोनों आरोपी डॉक्टरों ने भी एक आवेदन देकर पुलिस का ध्यान कुछ अहम बिंदुओं की ओर आकर्षित कराते हुए षडयंत्रकारियों का पता लगाने की गुजारिश की है. इस मामले में कौन सही या कौन गलत यह तो भविष्य में पता चलेगा, फिलहाल मजिस्ट्रेट की जांच के नतीजे भी कुछ दिनों में सामने आने वाले हैं, तभी मामले की स्थिति साफ हो पाएगी.

नेत्र विभाग में सब कुछ ठीक नहीं

मामला सामने आने के बाद जयारोग्य अस्पताल के नेत्र विभाग की कार्यप्रणाली भी शक के घेरे में आ गई है. विभाग की खामियां एक के बाद एक उजागर होने लगी हैं. इससे विभागाध्याक्ष डॉ. तिवारी और कॉर्निया यूनिट प्रभारी डॉ. शाक्य की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे. नेत्र विभाग के नेत्रकोष में पिछले छह वर्षों के दौरान 15 बार आंखें दान की गईं, लेकिन इस दौरान क्रेटोप्लास्टी (कॉर्निया प्रत्यारोपण) सिर्फ एक बार ही हुई. बाकी 14 जोड़ी आंखों के बारे में बताया गया कि ये शोध के काम में ले ली गईं. अब सवाल उठता है कि अगर शोध हुआ तो शोध पत्र कब प्रकाशित हुए? शोध के लिए अस्पताल की एथिकल कमेटी से अनुमति क्यों नहीं ली गई? ऐसा आज से नहीं पिछले पंद्रह वर्षों से चला आ रहा था. तो क्या वे सभी आंखें भी कचरे में फेंक दी गईं?

‘जूनियर डॉक्टर को उनके खिलाफ षडयंत्र कर क्या हासिल होगा? हम विभागाध्यक्ष तो बन नहीं जाएंगे. सच तो ये है कि विभाग में सब ठीक नहीं चल रहा’

मामले में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के स्टेट प्रेसिडेंट डॉ. एएस भल्ला कहते हैं, ‘भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राष्ट्रीय अंधत्व नियंत्रण कार्यक्रम (एनपीसीबी), 2009 के तहत देश में नेत्र संग्रह के कुछ मानक तय किए गए हैं जिनके अनुसार अगर कॉर्निया क्रेटोप्लास्टी के योग्य नहीं पाया जाता है तो उसे शोध या शैक्षणिक प्रशिक्षण में प्रयोग किया जा सकता है, जिसके लिए किसी एथिकल कमेटी से अनुमति नहीं लेनी होती और जहां तक शोध पत्र का सवाल है तो शोध तो उन्होंने किया ही नहीं. उन्होंने मेडिकल छात्रों के प्रशिक्षण के लिए आंखों का इस्तेमाल किया है.’ अगर डॉ. भल्ला की ये बात मान ली जाए तो अस्पताल के नेत्रकोष का रजिस्टर कुछ और ही कहानी बयां करता है. इसमें आंखों को शोध में प्रयुक्त बताया जा रहा है. इस पर सफाई देते हुए डॉ. यूएस तिवारी इसे तकनीकी खामी बताते हैं. वे कहते हैं, ‘दान की आंखों का हमने क्या प्रयोग किया, रजिस्टर में यह एंट्री जूनियर डॉक्टर करते हैं. 20 वर्षों से हम यह रजिस्टर मेंटेन कर रहे हैं. शुरुआती सत्रों के जूनियर डॉक्टरों ने रजिस्टर में आंखों के आगे ‘शोध के उद्देश्य के लिए’ लिख दिया था, तब से ही यह परिपाटी चल पड़ी.’ लेकिन अगर ऐसा ही था तो इतने वर्षों में उन्होंने इसे सुधारने की कोई कोशिश क्यों नहीं की? इस सवाल का वह कोई जवाब नहीं दे पाते.

एनपीसीबी के जिन दिशा-निर्देशों को ढाल बनाकर दोनों डॉक्टर बचने का प्रयास कर रहे हैं, वही दिशा-निर्देश उन्हें एक दूसरे मामले में सवालों के कठघरे में खड़ा करते हंै. एनपीसीबी गाइडलाइंस में स्पष्ट बताया गया है कि एक नेत्रकोष के लिए रेफ्रीजरेटर और बिजली का निर्बाध संचालन जरूरी है. नेत्रकोष की खस्ता हालत को अनजाने में डॉ. शाक्य खुद स्वीकारते हैं. उनके अनुसार दान में आईं आंखों को ‘रक्त कोष’ के फ्रीजर में रखा जाता है क्योंकि नेत्रकोष में कोई पावर बैकअप सिस्टम ही नहीं है. यह भी सवाल उठता है कि 15 में से 14 जोड़ी आंखें किस आधार पर प्रत्यारोपण के लिए अनुपयुक्त पाई गईं? इसका जवाब कुछ जूनियर डॉक्टर दबी जुबान में इस प्रकार देते हैं, ‘विभाग के पास आंखें जमा करने के लिए जरूरी यंत्र ही नहीं हैं. होना तो यह चाहिए कि दान की आंखों को आठ से दस घंटे के अंदर प्रत्यारोपित कर दिया जाए पर हमारे वरिष्ठ लापरवाही कर देते हैं और कॉर्निया अपनी उपयोगिता खोकर प्रत्यारोपण योग्य ही नहीं रह जाता. इसी लापरवाही के चलते पिछले कुछ समय से क्रेटोप्लास्टी ही नहीं हो पा रही है, जबकि जरूरतमंदों की वेटिंग लिस्ट कहीं अधिक लंबी है.’

नेत्रकोष की वैधता सवालों के घेरे में

अस्पताल का नेत्र विभाग भले ही लाख दावे करे कि उसका नेत्रकोष ह्यूमन ऑर्गन ट्रांसप्लांट एक्ट, 1994 के तहत पंजीकृत है, लेकिन सच ये है कि नेत्रकोष का रजिस्ट्रेशन वर्ष 2013 में कराया गया. इससे पहले यह दशकों तक अवैध रूप से चलाया जाता है. इसकी पुष्टि एनपीसीबी का ‘परिशिष्ट 21’ करता है. इसमें दिए देशभर के नेत्रकोषों की सूची में इसका नाम नहीं है. इससे पता चलता है कि सभी दिशा-निर्देशों को ताक पर रखकर जयारोग्य अस्पताल का नेत्र विभाग वर्षों तक अवैध रूप से आई बैंक संचालित करता रहा.

नेत्र दान से मोहभंग

मामले में कितनी सच्चाई है इस बारे में तो अभी कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन इसका असर ये हुआ है कि लोगों का नेत्रदान के प्रति मोहभंग हो गया है. लोगों का कहना है कि भले ही यह डॉक्टरों के खिलाफ कोई साजिश हो लेकिन आंखें तो फेंकी ही गई हैं न. सबसे अहम ये है कि लोग नेत्रदान को लेकर असमंजस में हैं. आंखें दान कर चुके एक परिवार के सदस्य सुरेश जैन कहते हैं, ‘साहब क्या होगा? सब बड़े लोग ही तो हैं कुछ नहीं बिगड़ेगा उनका. व्यापमं का ही उदाहरण ले लीजिए. जो असली गुनहगार हैं वो बच निकलेंगे और फंसेगा कोई लिसी पीटर जैसा ओटी इंचार्ज. जांच चलती रहेगी पर हमारी भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले को क्या कोई सजा मिल पाएगी? ये व्यवस्था अंदर तक खोखली है.’

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प्रतिबंध लगाकर आप किसी चीज काे बदल नहीं सकते, इसलिए मैं स्वतंत्र प्रेस को तरजीह दूंगा…

kuldeepप्रिय प्रधानमंत्री महोदया

मुझे लगता है कि आपका ये कहना गलत है कि किसी भी पत्रकार ने कभी जेपी की या उनके सशस्त्र बल को बुलाने की आलोचना नहीं की. उनकी टिप्पणियों पर सभी बड़े अखबारों ने उनकी गंभीर निंदा की थी. मुझे यकीन है कि वैसी ही कुछ टिप्पणियां आपने भी सहन की होंगी. इसी तरह, प्रेस काउंसिल पर लगा ये आरोप भी गलत है कि उसने कुछ अपमानजनक और मिथ्या लेखों का विरोध नहीं किया. एक सदस्य के बतौर मैं बता सकता हूं कि आपके और आपके परिवार के विरोध में उस गैर-जिम्मेदाराना आलेख को लिखने वाले संस्थान के संपादक को अच्छी फटकार मिली थी. दुर्भाग्य से, लंबी और बोझिल प्रकियाओं के चलते फैसले की घोषणा टल गई.

ये तो आप भी स्वीकार करेंगी कि सांप्रदायिकता के खिलाफ सभी प्रमुख अखबारों ने लगातार सरकार के विरोध का साथ दिया है. कुछ की शिकायत ये है कि प्रशासन सांप्रदायिक तत्वों के खिलाफ नरम रवैया अपना रहा है. प्रेस काउंसिल ‘सांप्रदायिक’ और ‘ओछे’ लेखों को छापने वाले कई अखबारों को चेतावनी दे चुका है. यदि अखबारों ने सरकार की आलोचना की भी है तो उसका बड़ा कारण सुस्त प्रशासन, धीमा आर्थिक विकास और किए गए वादों का पूरा न होना है. अगर मैं यहां तक भी कहूं कि सरकार के पास कोई अच्छा मामला भी हो तब भी वह नहीं जानती कि इससे कैसे जनता के सामने रखना है, तो ये अतिश्योक्ति नहीं होगी. उदाहरण के लिए, प्रशासन के कामों पर कभी कोई सरकारी पत्र सामने नहीं आए..प्रकाशन के लिए यहां-वहां से तथ्य जुटाने पड़ते हैं.

महोदया, एक पत्रकार के लिए क्या बताना है-क्या नहीं, इसका निर्णय लेना हमेशा ही कठिन होता है और इस पूरी प्रक्रिया में, कहीं न कहीं, किसी न किसी को नाराज या रुष्ट करने का खतरा हमेशा बना रहता है. सरकार के मामले में कुछ छिपाना और बाद में उसके जाहिर होने का डर, किसी व्यक्ति के मामले से बहुत अधिक होता है. पता नहीं क्या कारण हैं कि प्रशासन में काम करने वालों को लगता है कि सिर्फ वे ही ये जानते हैं कि जनता को कब, कैसे और क्या जानकारी दी जाए. और जब कोई ऐसी खबर जो वो नहीं बताना चाहते हैं, प्रकाशित हो जाती है तो वो नाराज हो जाते हैं.  ऐसे में जो बात नहीं समझी जाती वो ये कि ऐसे तरीके अपनाने से आधिकारिक तथ्यों के प्रति विश्वसनीयता कम होती है. यहां तक कि सरकार के ईमानदार दावों पर भी सवाल उठने लगते हैं. ऐसे लोकतंत्र में जहां विश्वास पर ही जनता का रवैया टिका हो, वहां सरकार को अपने किए या कहे किसी काम पर संदेह की गुंजाइश भी नहीं रहने देनी चाहिए. आपातकाल के बाद से आप लगातार ये बात कह रही हैं कि आपका विश्वास है कि एक मुक्त समाज में जनता को सूचित रखना, जानकारियां देना प्रेस की ही जिम्मेदारी होती है. कई बार ये एक अप्रिय काम होता है, फिर भी इसे करना होता है क्योंकि एक मुक्त समाज कि नींव मुक्त सूचनाओं पर ही टिकी होती है. यदि प्रेस सिर्फ सरकारी घोषणाएं व आधिकारिक बयान ही छापेगी (जो वो अब कर ही रही है) तो कोई चूक या कमी कौन दुरुस्त करेगा?

मैं कई बार 3 दिसंबर 1950 को, ऑल इंडिया न्यूजपेपर एडिटर्स कॉन्फ्रेंस में नेहरु की कही बात को पढ़ता हूं, ‘मुझे इस बात पर कोई शक नहीं हैं कि सरकार प्रेस के द्वारा ली जा रही स्वतंत्रता को पसंद नहीं करती, और इसे खतरनाक भी समझती है, पर प्रेस की आजादी में दखल देना गलत होगा. प्रतिबंध लगाकर आप किसी चीज को बदल नहीं सकते, आप बस उस बात की अभिव्यक्ति पर रोक लगा सकते हैं, उसके पीछे छिपे भाव और अंतर्निहित विचार को आगे बढ़ने से रोक सकते हैं. इसीलिए, मैं एक दबे या सुनियंत्रित प्रेस की तुलना में एक पूरी तरह से स्वतंत्र प्रेस को तरजीह दूंगा भले ही उसमें इस स्वतंत्रता के दुरुपयोग का खतरा ही क्यों न शामिल हो.’ जिस तरह की सेंसरशिप अभी लगाई गई है ये किसी भी नई पहल, सवालों-जवाबों के लिए खुले माहौल और खुली सोच का गला घोंट देगी. मुझे यकीन है कि आप ऐसा तो नहीं चाहेंगी.

कुलदीप नैयर

आपातकाल की आपबीती

Indra gandhi on emergency

1975 में इंदिरा गांधी के खिलाफ जब चुनावों में धांधली के आरोप के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आने वाला था तब जगमोहनलाल सिन्हा जज थे. मैं तब ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में काम किया करता था. हम सब, जो जयप्रकाश नारायण या जेपी आंदोलन से जुड़े थे वो तो यही चाहते थे कि फैसला इंदिरा जी के खिलाफ ही हो पर मन ही मन हम ये भी समझते थे कि उस वक्त इतनी मजबूत और ताकतवर इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला देने की हिम्मत आखिर किस न्यायाधीश में होगी! 1971 में जब उन्होंने पाकिस्तान के दो हिस्से किए थे तब अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें ‘दुर्गा’ कहा था. इंदिरा के खिलाफ जब फैसला आया तब जाहिर है हम सब खुश हुए पर तब तक कभी सोचा ही नहीं था कि इसके क्या परिणाम हो सकते हैं. जेपी का हेडक्वार्टर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ हुआ करता था, जब भी वे दिल्ली आते तो विभिन्न संस्करणों के संपादकों से मिलते थे.

फैसला आने के एक या दो दिन बाद जब जेपी दिल्ली आए तो उन्होंने हम सभी को बुलाया. उन्होंने पूछा, ‘अब क्या करना चाहिए?’ सभी ने कहा कि अब जब वो (इंदिरा गांधी) सुप्रीम कोर्ट में अपील करने वाली हैं तो हम बस इंतजार कर सकते हैं. पर फिर भी हम ये चर्चा करने लगे कि मान लो अगर उन्हें पद से हटाया जाता है तब चुनाव होंगे. जेपी का कहना था कि चुनाव के बारे में बात करना फिजूल है क्योंकि वो वापस सत्ता में आ ही जाएंगी. असल में उनके शब्द थे, ‘मैं सोचता हूं कि यदि चुनावों की घोषणा होती है तो हमें इसमें भाग लेना चाहिए या नहीं न सोचकर, इनका बहिष्कार क्यों नहीं कर देना चाहिए?’ उस समय हम में से कुछ ने जवाब दिया, ‘जेपी हो सकता है कि आप सही हों पर रिपोर्टरों, संपादक को आ रहे पत्रों से मिले फीडबैक के आधार पर हम ये तो कह सकते हैं कि लोगों में बहुत गुस्सा है, भले ही वो इसे जाहिर करे या न करें.’ यहां डर एक महत्वपूर्ण पहलू था. फिर प्रस्ताव रखा गया कि लोगों का मिजाज भांपने के लिए हम अगले दिन के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में एक प्रविष्टि छापेंगे कि उसी दिन शाम के 5 बजे रामलीला मैदान में जेपी एक जनसभा को संबोधित करेंगे.

पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने उन्हें आपातकाल लगाने की सलाह दी. आपातकाल के पीछेे असली मास्टरमाइंड रे ही थे

और फिर जो हुआ वो अविश्वसनीय था. रामलीला मैदान को छोड़िए, कनाॅट प्लेस तक लोगों का हुजूम ही हुजूम था. उस समय रामनाथ गोयनका ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मालिक थे, और तब उन्होंने मुझसे कहा कि अब हमें इस मुद्दे के साथ आगे बढ़ना चाहिए. मैं तब फील्ड में काम किया करता था. मैं सबसे पहले जगजीवन राम से मिला. वहां मैंने देखा कि उन्होंने अपने फोन का रिसीवर उठा के अलग रखा हुआ था. मैंने पूछा कि ऐसा क्यों तो उन्होंने कहा, ‘हमें नहीं पता पर हो सकता है वे (इंदिरा गांधी) मेरे फोन कॉल टैप करवा रही हों. और मुझे ऐसा भी लगता है कि किसी भी वक्त मुझे गिरफ्तार किया जा सकता है.’ फिर मैं कमलनाथ के पास गया. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के बोर्ड का तब पुनर्गठन हुआ था और रामनाथ गोयनका की जगह केके बिरला अध्यक्ष बनाए गए थे. कमलनाथ बोर्ड के सदस्य थे. मैं कमलनाथ को जानता था.. वो मुझे पंजाबी में हैलो कहा करते थे, मैं उनसे एक बार मिला भी था. वे संजय गांधी के करीबी थे. उन्होंने मुझसे कहा, ‘तुम संजय गांधी से क्यों नहीं कहते कि वो हमारे लिए लिखें?’ मैंने कहा कि हां अगर वो कुछ करते हैं तब मैं जरूर ऐसा करूंगा. उन्होंने पूछा, ‘क्या तुम उनसे मिलना चाहते हो?’ मैंने जवाब दिया, ‘अभी तो नहीं पर हां कभी तो मिलूंगा.’ आपातकाल के बाद मैंने उन्हें उनका वादा याद दिलाया और संजय गांधी से मिलने मैं श्रीमती गांधी के घर पहुंचा. मुझे आज भी याद है कि वो बरामदे में थीं.

वो हार चुकी थीं, सब जगह कागज बिखरे हुए थे, ये घर उस समय प्रधानमंत्री आवास ही था. संजय गांधी एक पेड़ के नीचे बैठे थे. मुझे देख कर वो आईं पर मैंने उनसे कहा, ‘नहीं आज मैं आपका नहीं संजय का इंटरव्यू लेने आया हूं.’ मैंने संजय से पूछा, ‘आपको कैसे लगा था कि इतना सब कर के आप आगे जा पाएंगे?’ उन्होंने कहा, ‘इसमें परेशानी ही क्या थी? बंसीलाल की मदद के साथ हम अच्छा ही कर रहे थे. (बंसीलाल उस समय रक्षा मंत्री थे, इससे पहले वो हरियाणा के पहले मुख्यमंत्री रह चुके थे पर बाद में संजय उन्हें दिल्ली ले आए). शायद मुझे कहीं कोई और बंसीलाल भी मिल सकता.’ उन्होंने आगे कहा, ‘मैंने जो स्कीम बनाई थी उसमें आने वाले 30 सालों तक कोई चुनाव नहीं था, मैंने एक नोट भी बनाया था.’ उन्होंने उस नोट की एक प्रति मुझे भी दी जिसमें एक ऐसी नई व्यवस्था थी जो संसदीय नहीं बल्कि अध्यक्षीय थी यानी समग्र शक्तियां एक व्यक्ति पर ही केंद्रित थीं. यहां चुनाव प्रत्यक्ष नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष थे. यानी सभी चीजें अप्रत्यक्ष रूप से ही ‘मैनेज’ की जा सकती थीं.

न्यायाधीश

इन सब के बीच मैंने सोचा कि मुझे इलाहाबाद जाकर उन जज (जगमोहन सिन्हा) से तो जरूर मिलना चाहिए. वहां पहुंच कर मैंने उनके घर के बारे में पता किया और उनके पास पहुंच गया. जब वे मुझसे मिले तब मैंने उनसे कहा कि जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा अचरज में डाला वो थी आपका फैसला आने से पहले उसके बारे में किसी को अंदाजा तक नहीं हुआ कि वो क्या होगा. ‘आपने ये कैसे किया?’ उनसे मिलने पर मैंने सबसे पहले यही सवाल पूछा. उन्होंने बताया कि उन्होंने केस के इतिहास आदि से जुड़े हिस्से अपने स्टेनो को बोलकर लिखवाए थे पर बाकी पूरा फैसला उन्होंने अपने हाथ से लिखा था. स्टेनो को भी फिर छुट्टी पर भेज दिया. उनके एक साथी जज ने सिन्हा को ये भी बताया कि उन्होंने किसी से ये भी सुना है कि धवन (आरके धवन, इंदिरा गांधी के निजी सचिव) सिन्हा को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने की सोच रहे हैं. ऐसा मुझे सिन्हा ने बताया कि वो साथी उन्हें कुछ और ही संदेश देना चाह रहे थे. और जैसा मैंने अपनी किताब ‘द जजमेंट: इनसाइड स्टोरी ऑफ द इमरजेंसी इन इंडिया’ में भी लिखा है कि चरण सिंह ने सिन्हा का पता लगाया और उन्हें सजा भी दी. सिन्हा ने मुझे बताया कि वे साधु-संतों को बहुत मानते थे तो उन्होंने (श्रीमती गांधी के मददगारों ने) कुछ साधु-संतों के मेरे पास भेजा जिससे कि वो मेरे फैसले के बारे में कुछ जान सकें. सिन्हा ने आगे बताया, ‘जब मैंने उनका पूरा गेम प्लान देखा और उस केस की सभी बहसों को पढ़ने के बाद नतीजे पर पहुंचा तो मेरे दिमाग में ये साफ हो चुका था कि उन्होंने (इंदिरा गांधी ने) अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया है और मैं उन्हें इसकी सजा दूंगा’. सिन्हा पर काफी दबाव डाला गया… उनके परिवार को परेशान किया गया पर न ही वे नरम पड़े न ही अपने फैसले से डिगे.

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आपातकाल के विरोधी देश में आपातकाल लागू होने से पहले एक रैली को संबोधित करते जयप्रकाश नारायण

सलाहकार

फैसले के बाद जब इंदिरा गांधी को पद से हटा दिया गया था तब वे दिल्ली में ही थीं और एक समय पर उन्होंने गंभीरता से राजनीति को छोड़ने का सोचा था. पर तब संजय ने मोर्चा संभाला. वो रैलियां आयोजित करते जिसमें धवन सारी जिम्मेदारियां और व्यवस्था देखते, जिससे श्रीमती गांधी को ऐसा लगे और विश्वास हो जाए कि जनता इस निर्णय को जजों के द्वारा की गई एक साजिश के रूप में देख रही है. इस निर्णय के बाद और आपातकाल के पहले प्रेस स्वतंत्र था. प्रेस पर दबाव तो था पर इंदिरा गांधी की परेशानी का सबब था कि प्रेस लगातार इस बारे में लिख रहा था, लोग भले ही डरे हुए थे पर वो अब इस बारे में बात करने लगे थे कि अब वो क्या कर सकती थीं? या तो वो ये सब छोड़ देती या इससे निपटने का कोई और रास्ता तलाशतीं. ऐसे में सिद्धार्थ शंकर रे (पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री) ने उन्हें आपातकाल लगाने की सलाह दी. यानी आपातकाल के पीछे के असली मास्टरमाइंड सिद्धार्थ शंकर रे ही थे. मुझे याद है उस रात या अगली सुबह मुझे कलकत्ता जाना था और रे और मैं एक ही फ्लाइट में सफर कर रहे थे. वो बार-बार कॉकपिट में जा रहे थे. ये मुझे बाद में पता चला कि वो इस बारे में पूछ रहे थे कि आपातकाल की आधिकारिक घोषणा हुई या नहीं! नियमानुसार आपातकाल कैबिनेट से सलाह लेने के बाद ही लगाई जा सकती है पर यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ था. उन्होंने (इंदिरा गांधी) कैबिनेट की मीटिंग बाद में बुलाई यानि ये घोषणा और बाकी सब निर्णय पूर्वव्यापी थे.

कमलापति त्रिपाठी

मुझे याद है दिल्ली में एक समय था जब जगजीवन राम को लगता था कि आपातकाल अस्थायी होगा और शायद श्रीमती गांधी उन्हें अगले चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए चुनेंगी पर उनके (श्रीमती गांधी) दिमाग में कोई और ही नाम था, पुराने वफादार और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी.

शाह कमीशन

1977 में भारत सरकार द्वारा शाह कमीशन का गठन किया गया. इसका मूल उद्देश्य आपातकाल के दौरान यानी 1975 से 1977 के बीच हुई ज्यादतियों के बारे में पता करना था. इसके अध्यक्ष जस्टिस जेसी शाह थे जो इससे पहले देश के चीफ जस्टिस रह चुके थे. उन्होंने जांच की और बताया कि आपातकाल घोषित होने के पीछे कोई खुफिया रिपोर्ट या सूचना नहीं थी. न लॉ और आर्डर को कोई खतरा था, न ही उसकी कार्यप्रणाली में कोई व्यवधान पड़ रहा था. ऐसा कहीं कुछ गड़बड़ नहीं था, कहीं नही. शाह कमीशन के अनुसार आपातकाल सिर्फ इंदिरा गांधी के उनके खिलाफ आए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से खुद को बचाने का प्रयास था, जिसमें उन्हें छह साल के लिए चुनावों के लिए अयोग्य ठहराया गया था. पर श्रीमती गांधी का असली बचाव जस्टिस कृष्णा अय्यर ने किया, जिन्होंने कहा था कि हां, इंदिरा गांधी संसद में भाग ले सकती हैं, उनके पास सभी अधिकार होंगे बस वो केवल मतदान नहीं कर सकतीं. तो इस तरह असली मदद तो जस्टिस कृष्णा अय्यर ने ही की हालांकि वो एक वामपंथी थे.

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आपातकाल का मास्टरमाइंड सिद्धार्थ शंकर रे (बांए से दूसरे) ही वो व्यक्ति थे, जिन्होंने इंदिरा गांधी को आपातकाल लागू करने की सलाह दी थी

प्रेस सेंसरशिप और मीडिया की भूमिका

इंदिरा गांधी मीडिया को खामोश कर देना चाहती थीं और इसीलिए प्रेस सेंसरशिप और बिना किसी जांच के लोगों को नजरबंद और हिरासत में लेना शुरू हुआ. मुझे याद है कि मैं उस वक्त प्रेस काउंसिल का सदस्य था और अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज थे. मैंने उनसे कहा कि वो एक मीटिंग बुलाएं और इस सेंसरशिप के विरोध में निंदा प्रस्ताव पारित करें. इस पर उन्होंने कहा, ‘इसका क्या फायदा होगा? कोई भी इसे (निंदा प्रस्ताव) नहीं छापेगा.’ मैंने कहा इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई इसे छापे या न छापे, कम से कम ये बात इतिहास में दर्ज तो होगी कि इस ज्यादती के खिलाफ कोई स्टैंड तो लिया गया था. तब उन्होंने कहा, ‘मैं कुछ स्थानीय सदस्यों से बात कर के देखता हूं.’ आपको ये जानकार बहुत आश्चर्य होगा कि प्रेस काउंसिल के एक भी स्थानीय सदस्य ने मेरा साथ नहीं दिया. जब भी मैं वो सब याद करता हूं, मुझे बस डर का माहौल ही याद आता है… पत्रकार डरे हुए थे. और श्रीमती गांधी तो आपातकाल के निर्णय पर कह भी चुकी थीं कि एक कुत्ता भी नहीं भौंका (नॉट अ सिंगल डॉग बार्क्ड). उनसे मिलने के बाद कुछ व्यक्तियों ने मुझे बताया कि उस वाक्य में वो मुझे संबोधित कर रहीं थीं.. ‘वो संपादक जो हेडलाइंस लगाता था, लिखता था, देखो उसका क्या हाल हुआ!’

‘उस नोट में एक ऐसी व्यवस्था का जिक्र था जो संसदीय नहीं बल्कि अध्यक्षीय थी यानी समग्र शक्तियां एक व्यक्ति पर ही केंद्रित थीं. यहां चुनाव प्रत्यक्ष नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष थे’

मैं आपातकाल हटाने (क्योंकि ये लोकतंत्र के खिलाफ थी) और सेंसरशिप के खिलाफ एक निंदा प्रस्ताव बनाकर उस पर पत्रकारों के दस्तखत लेने के लिए अखबारों के दफ्तरों में घूमता था. विद्याचरण शुक्ल, जो आपातकाल के दौरान सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे, मेरे मित्र थे. उन्होंने मुझसे पूछा, ‘वो दस्तखत किया हुआ प्रेमपत्र कहां हैं? मैं उन पत्रकारों को ठीक करता हूं.’ मैंने कहा, ‘मुझे माफ करें, मैं वो आपको नहीं दे सकता.’ वो बोले, ‘अच्छा ठीक है, पर कम से कम आ कर मुझसे मिल तो लो.’ फिर मैं उनसे मिलने गया. उन्होंने मुझे ये कहकर धमकाया कि हो सकता है मुझे गिरफ्तार कर लिया जाए. मैंने कहा, ‘क्या होगा यदि मुझे गिरफ्तार कर भी लिया गया? मैंने तो यही सुना है कि सभी नेता कभी न कभी गिरफ्तार हुए थे और गिरफ्तारी के बाद उनका राजनीतिक कद बढ़ा ही था.’ मैंने श्रीमती गांधी को एक पत्र (बॉक्स देखें) लिखा था जिसमें मैंने नेहरू की बात दोहराई थी, ‘मैं एक दबे या सुनियंत्रित प्रेस की तुलना में एक पूरी तरह से स्वतंत्र प्रेस को तरजीह दूंगा भले ही उसमें इस स्वतंत्रता के दुरुपयोग का खतरा ही क्यों न शामिल हो.’ हिरासत में तीन महीने रहने के बाद जब मैंने दोबारा शुरुआत करने की कोशिश शुरू की तब भी किसी पत्रकार ने मेरा साथ नहीं दिया. हर कोई अपनी नौकरी खोने या जेल जाने के डर से भयभीत था. गिरिलाल जैन, जो तब टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ थे, ने तो मुझसे तो पूछा भी था कि जेल में शुष्क शौचालय होते हैं या फ्लश शौचालय! मैंने कहा, ‘शुष्क.’ वो बोले, ‘ये तो समस्या है.’ बात को न बढ़ाकर अगर मोटे तौर पर समझें तो हां पत्रकारों पर दबाव था, पर जैसा लालकृष्ण आडवाणी ने कहा है कि जब उन्हें झुकने को कहा गया तब वो रेंगने लगे. समय बदल रहा था. अब मालिक ताकतवर हो गए थे क्योंकि उन्होंने देख लिया था कि वो पत्रकार जो बड़े-बड़े लेख लिखते हैं, कितनी आसानी से सरकार के काबू में आ गए. तो यहां दबाव सरकार का नहीं बल्कि मालिकों का था. सरकार मालिकों से संपर्क साधती और उनके माध्यम से प्रेस को संचालित करती.

जेपी आंदोलन

जेपी आंदोलन ने एक अलग ही तरह का माहौल तैयार कर दिया था, जो बहुत जरूरी भी था. उस समय राजनीति में भ्रष्टाचार को लेकर कोई संदेह ही नहीं रह गया था क्योंकि ओडिशा में नंदिनी सतपथी पर अपने चुनावी अभियान में भ्रष्टाचार करने के आरोप लग चुके थे. जेपी ने इंदिरा गांधी से शिकायत भी की थी कि एक चुनावी अभियान पर इतना धन क्यों बर्बाद किया जा रहा है. हालांकि श्रीमती गांधी ने इस बात से साफ इंकार किया कि चुनावों में अधिक धन खर्चा गया है.

पीएन हक्सर

पीएन हक्सर (जो इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव थे) का सिर्फ ये कहना था कि अब समय आ गया है कि अपने समाजवाद के उस सपने को वास्तविकता में बदला जाए जिसके बारे में उन्होंने स्कूल-कॉलेज में पढ़ा था. उन्होंने मुझसे कहा कि अब ये काम करने का समय है. हालांकि सच ये है कि हक्सर ने कुछ समय तक इस उम्मीद में संजय गांधी का साथ दिया था कि शायद ये कोई नई तरह की व्यवस्था है, एक नया निजाम है पर वामपंथी होने की वजह से संजय ने उन्हें सचिव के पद से हटा दिया. इस पद से हटा कर उन्हें योजना आयोग भेज दिया गया. ये बिलकुल वैसा ही था जैसा उनसे पहले इंदर कुमार गुजराल के साथ हुआ था. गुजराल को भी तब योजना आयोग का रास्ता दिखा दिया गया था जब उन्होंने संजय गांधी से कहा था कि वो उनकी मां की कैबिनेट के मंत्री हैं और संजय उन्हें आदेश नहीं दे सकते.

गुजराल को तब योजना आयोग का रास्ता दिखाया गया जब उन्होंने संजय गांधी से कहा कि वो प्रधानमंत्री के कैबिनेट मंत्री हैं, संजय उन्हें आदेश नहीं दे सकते

प्रणब मुखर्जी

प्रणब मुखर्जी भी इन सब का हिस्सा थे. भले ही आज वे अपने संस्मरण में कुछ भी कहें, वो इस बात से हट नहीं सकते क्योंकि उस दौर में वो संजय गांधी के दाएं हाथ जैसे थे, उनके खासमखास थे. वस्तुतः तो उन्हें उस उच्च संवैधानिक दफ्तर का भी प्रयोग नहीं करना चाहिए जहां बैठकर वो अपने संस्मरण लिखते हैं. हम उस कार्यालय का सम्मान करते हैं पर अब उस कार्यालय को चुनौती देना सही नहीं होगा.

मेरी गिरफ्तारी

मेरे गिरफ्तार होने के एक दिन पहले ‘मेनस्ट्रीम’ के निखिल चक्रवर्ती ने मुझसे कहा था कि अपना घर साफ कर लो. उसी दोपहर रामनाथ गोयनका ने मुझसे कहा, ‘मुझे नहीं पता वो तुम्हारे साथ क्या करने वाले हैं पर आजकल मैं जहां भी जाता हूं बस तुम्हारा ही नाम सुन रहा हूं… कि कैसे इस व्यक्ति ने लेख लिख-लिखकर इंदिरा गांधी के खिलाफ एक माहौल तैयार कर दिया है. वो सब तुम्हारे खिलाफ हैं.’  तो अगले दिन सुबह जब पुलिस मेरे घर आई तो मैंने उनसे कहा कि वो मेरे पूरे घर की तलाशी ले सकते हैं, पर वो बोले, ‘हम आपके घर की तलाशी लेने नहीं बल्कि आपको गिरफ्तार करने आए हैं!’ ये मेरे लिए अप्रत्याशित था क्योंकि इस बारे में तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था. इससे पहले मैं कभी जेल नहीं गया था तो जब मैं वहां पहुंचा तो मैंने देखा कि मेरे वार्ड में 28 और लोग भी थे. उनमें से अधिकतर जनसंघ के लोग थे. हालांकि मैं उनके खिलाफ लिखता था पर वे मेरा सम्मान करते थे. मेरी सुनते भी थे. जब उन्होंने मुझसे कहा कि वे लोग आने वाले स्वतंत्रता दिवस का बहिष्कार करने की सोच रहे हैं, तब मैंने कहा, ‘क्यों? हम क्यों स्वतंत्रता दिवस का बहिष्कार करें? हमें इंदिरा गांधी ने आजादी नहीं दिलाई! ये हमारे पूर्वजों ने एक लंबी लड़ाई लड़ कर हासिल की है, इसलिए हमें झंडा फहराना चाहिए और वो सहमत भी हुए.’ मुझे तब ही हिरासत में लिया गया था जब मैंने इंदिरा गांधी को वो पत्र लिखा था. पर मेरी पत्नी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के बिना, इंदिरा में मुझे छोड़ा न होता. मेरा केस सुनने वाले जजों को बाद में ट्रांसफर या पद अवनति (डिमोशन) के रूप में सजा मिली. एक समय पर ओम मेहता (जो इंदिरा गांधी सरकार में गृह राज्यमंत्री, स्वतंत्र प्रभार थे) ने मुझसे पूछा था कि क्या मुझे जेल खराब लगी. ‘बहुत ज्यादा’, मैंने जवाब दिया. तो उस पर उन्होंने मुझे मुंहतोड़ जवाब देते हुए कहा कि आपको अशोका होटल थोड़े न भेजा था.

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जारी रहेगी प्रफुल्ल बिदवई की लड़ाई

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प्रफुल्ल जी के लिए ऐसे अचानक श्रद्धांजलि लिखनी पड़ेगी, कभी सोचा न था. मैं 1990 के शुरुआती वर्षों में अर्थनीति और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर उनके लेख पढ़ते हुए बड़ा हुआ. तब के अखबारी लेखक पीछे छूटते गए, लेकिन बाद में नई दिल्ली स्थित जेएनयू में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पीएचडी करते हुए भी उनका लिखा उतना ही काम आया. वे एक विद्वान, पेशेवर, प्रतिबद्ध पत्रकार और बुद्धिजीवी थे. परमाणु निरस्त्रीकरण और अणु ऊर्जा, दक्षिण एशिया से लेकर फिलस्तीन तक के मुद्दे, पर्यावरण की वैश्विक राजनीति और उसका जनपक्ष, सांप्रदायिकता और सेकुलरिज्म, बाजार का अर्थशास्त्र और लातिन अमेरिका के जन केंद्रित प्रयोग जैसे हर मुद्दे पर गहन रिसर्च और उनकी तह तक जाना उनकी खासियत थी. भारत के अकादमिक जगत और पत्रकारिता दोनों की व्यापक दरिद्रता के दौर में एक मिसाल थे प्रफुल्ल बिदवई.

वे कभी वामपंथी दल के मेंबर नहीं रहे. नंदीग्राम-सिंगूर से लेकर सामाजिक न्याय व अन्य लोकतांत्रिक मुद्दों पर खुली आलोचना की लेकिन वे वामपंथ के भरोसेमंद दोस्त थे, इसमें किसी को कभी कोई शक न हुआ.

1977 में उन्होंने परमाणु ऊर्जा विभाग पर खोजी रिपोर्ट लिखी और सुरक्षा-खामियों को सार्वजनिक करने पर देशद्रोही तक कहलाए, 1984 में भोपाल गैस कांड  के बाद उनके पड़ताली लेख इंसाफ तलाशते भुक्तभोगियों का संबल बने. 90 के दशक में सांप्रदायिकता के तांडव और बाजार की नृशंसता पर उनकी कलम ने चोट किया. 1998 में युद्धप्रेमी राष्ट्रवाद के कानफोड़ू शोर के बीच उन्होंने निर्भीकता से परमाणु परीक्षणों की निंदा की और शोधपरक लेखों के माध्यम  समझाया कि क्यों अणु बम दक्षिण एशिया में सुरक्षा नहीं देते बल्कि हमें हथियारों की होड़ में झोंकते हैं और पश्चिमी देशों पर निर्भर बनाते हैं.

परमाणु मुद्दे से उनका केंद्रीय सरोकार रहा और मनमोहन सिंह सरकार के तहत हुई परमाणु डील का प्रफुल्ल बिदवई ने मुखर विरोध किया. उसके राजनीतिक, पर्यावरणीय और मिलिट्री खतरों से आगाह किया. 2010 में परमाणु दुर्घटनाओं से होने वाले नुकसान की भरपाई का बोझ विदेशी कंपनियों से हटाकर भारतीय आमजन के कंधे पर डालने की सरकारी कोशिशों के विरोध में उन्होंने डटकर लिखा और बोला. 2011 में जापान के फुकुशिमा परमाणु दुर्घटना के बाद एक बार फिर उन्होंने भारत में सुरक्षा कमियों और अणु ऊर्जा के अंतर्निहित व असाध्य खतरों ओर ध्यान दिलाया और इस प्रकरण में जुबानी सरकारी आश्वासनों की पोल भी खोली. उसी दौरान महाराष्ट्र के जैतापुर, तमिलनाडु के कुडनकुलम, गुजरात के मीठीविर्दी, आंध्रप्रदेश के कोव्वाडा, हरियाणा के गोरखपुर व देश के अन्य कई इलाकों में प्रस्तावित अणु ऊर्जा परियोजनाओं खिलाफ स्थानीय ग्रामीणों के आंदोलनों का सशक्त समर्थन किया.

पिछले साल जब मोदी सरकार ने आते ही वह आईबी रिपोर्ट जारी की जिसके अनुसार कुछ ‘देशद्रोही’ लोग व संस्थाएं ‘विकास’ से जुड़ी परियोजनाएं रोककर भारत की वृद्धि दर दो प्रतिशत कम कर रहे हैं, तो उसमें प्रफुल्ल और उनके बनाए परमाणु बम व अणु ऊर्जा विरोधी मंच ‘सीएनडीपी’ का नाम शुरुआती पन्नों पर था. तब मोदी का शबाब चरम पर था लेकिन प्रफुल्ल बिदवई ने कॉनस्टीट्यूशन क्लब में प्रेसवार्ता कर निडरता से इस दुष्प्रचार का मुंहतोड़ दिया और सरकार को आरोपों को साबित करने की खुली चुनौती दी. विकास की जनविरोधी परिभाषा को अंतिम सत्य मानकर उसे पुलिस मैन्युअल में बदल देने और सभी असहमतों को ठिकाने लगाने वालों को दी गयी प्रफुल्ल बिदवई की वह चुनौती हमें आगे बढ़ानी है.

परमाणु डील के मुद्दे पर विपक्ष में रहते समय विरोध करने वाली भाजपा के मौजूदा प्रधानमंत्री हर विदेशी दौरे में परमाणु समझौतों और मुआवजे की शर्तों में विदेशी कंपनियों के ढील देने को ट्रॉफी तरफ चमकाते हैं. इन करारों की आखिरी मार उन किसानों-मछुआरों पर पड़नी है जिनके यहां फुकुशिमा के बाद पूरी दुनिया में नकारे गए ये परमाणु प्लांट लगाए जा रहे हैं. प्रफुल्ल ने मोदी सरकार के एक साल पूरे होने पर शायद जो आखिरी लेख लिखा, वह आने वाले कई सालों तक हमें दिशा दिखाएगा क्योंकि साल-निजाम बदलते रहते हैं लेकिन आम जनता और प्रफुल्ल बिदवई सरीखे उसके भरोसेमंद दोस्तों की लड़ाई जारी रहती है.

‘महिलाओं की समस्या सुनना मेरा काम है, लोग आरोप लगाते हैं तो लगाएं’

Barkha Singhआप पर एक गंभीर आरोप लगाया जाता है कि आपने दिल्ली महिला आयोग के अध्यक्ष पद का राजनीतिकरण कर दिया है. ऐसा लगता है कि दिल्ली महिला आयोग एक पार्टी विशेष के लोगों के खिलाफ कुछ ज्यादा ही सक्रिय है.

जब से आम आदमी पार्टी की सरकार सत्ता में आई है तभी से आरोप लग रहे हैं. ये संयोग ही है कि जब इस पार्टी की पिछली सरकार थी तब भी उनके एक नेता के खिलाफ शिकायत हुई और जब पार्टी दोबारा सत्ता में आई है तब भी शिकायतें मिल रही हैं. मुझे इस कुर्सी पर कांग्रेस की सरकार ने बिठाया था, लेकिन जिस वक्त मैं इस कुर्सी पर हूं तब मैं केवल आयोग की अध्यक्ष हूं मेरा काम है महिलाओं के हित के लिए उनके साथ खड़ा होना. उनकी मदद करना. उनकी रक्षा करने की कोशिश करना और पिछले कई सालों से मैं यही कर रही हूं. यहां कोई पार्टी-वार्टी नहीं है. यहां केवल पीड़िताएं आती हैं और हम पूरे मन से उनकी परेशानी और शिकायतें सुनते हैं. जब दूसरी बार इस पार्टी की सरकार बनी तो एक मामले में कुमार विश्वास का नाम आया. हम किसी को भी बुलाने नहीं जाते हैं. पीड़िता खुद आयोग के सामने आती हैं और जो मामला हमारे सामने आएगा हम उसका पक्ष सुनेंगे ही. आयोग का यही काम है. इसके बाद भी लोग आरोप लगाते हैं तो लगाएं.

क्या आपको लगता है कि दिल्ली महिला आयोग ने आप नेता कुमार विश्वास और दिल्ली के पूर्व कानून मंत्री सोमनाथ भारती के मामले को प्रेस के सामने ले जाने में थोड़ी जल्दबाजी की? आप पर आरोप है कि इन दोनों ही मामलों को सुलझाने की कोशिश करने के बजाय आपने प्रेस वार्ता आयोजित करने में ज्यादा रुचि ली.

देखिए… ऐसा है. आरोप चाहे जो भी लगाए जाएं. सच्चाई यह है कि मैंने दोनों ही मामलों में प्रेस वालों को बुलाने या उन्हें कुछ बताने की कोई कोशिश नहीं की. सोमनाथ भारती पर इससे पहले भी एक मामला बना था तब वो दिल्ली के कानून मंत्री थे. उस वक्त नाइजीरियन महिलाएं खुद आयोग के सामने उनके खिलाफ आरोप लेकर आई थीं. उस वक्त भी मुझ पर यह आरोप लगाया गया था कि हमने प्रेस को बताया कि महिलाओं ने शिकायत की है. मीडिया के लोग खुद बहुत सक्रिय रहते हैं अगर उन्हें किसी मामले की जानकारी हो जाती है और वो उसे खबर बना देते हैं. इसमें मैं कुछ नहीं कर सकती. इस बाबत लोगों ने आयोग से आरटीआई के माध्यम से भी जानकारी मांगी है. उन्हें भी हमने यही कहा कि आयोग ने कोई प्रेस वार्ता आयोजित नहीं की थी.

सोमनाथ भारती की पत्नी लीपिका मित्रा आपके घर पर प्रेस से बात कर रही थीं. जब वहां सोमनाथ भारती की मां आईं तो आपने उन्हें अपने घर में आने से रोक दिया. आपने उन्हें दफ्तर आने को कहा… क्यों?

बिल्कुल. यहां यह समझना होगा कि कौन किस इरादे से क्या कर रहा है. आप मेरे दफ्तर आए हैं. बाहर लोगों की भीड़ खड़ी है. वो सब महिलाएं हैं. मैं सबको सुनूंगी. जिस कुर्सी पर मैं बैठी हूं उसकी यही जिम्मेदारी है. इनमें से एक भी महिला मुझसे नाराज होकर नहीं जाएगी. मेरी न तो सोमनाथ भारती से दुश्मनी है और न ही मुझे उनकी माताजी से कोई परेशानी है. उस दिन भारती ने अपनी दो महिला वकीलों को मेरे घर में जबरदस्ती घुसवा दिया. ये कहां से सही है? मैं किसी मामले को तमाशा बनाने में विश्वास नहीं करती. बाद में मैंने अखबार में विज्ञापन देकर सोमनाथ भारती की मां को बुलाया. उस दिन उनकी माता जी अपने आप वहां नहीं आई थीं, उन्हें भेजा गया था. अब वो आएं. दफ्तर में आएं. घर पर आएं. जहां चाहे वहां आएं और मिलें लेकिन अब वो नहीं आएंगी. कई बार बुलाने के बाद भी वो नहीं आईं. एक बात और बताना चाहती हूं. लीपिका ने अपनी सास के खिलाफ कभी एक शब्द नहीं बोला.

मुझे भी उस घटना का अफसोस है लेकिन एक बात सोमनाथ भारती को भी समझनी चाहिए. वो इतने पढ़े-लिखे हैं फिर भी वो अपनी मां का इस्तेमाल कर रहे हैं. ये शर्म की बात है.

…कुमार विश्वास के मामले में क्या हुआ?

उस मामले में तो कुमार विश्वास दोषी थे ही नहीं. हमने तो उन्हें बतौर गवाह आयोग के सामने आने के लिए कहा था क्योंकि जिस महिला का मामला था उसका पति बार-बार यह कह रहा था कि जब तक कुमार मीडिया के सामने यह नहीं कहेंगे कि उनका मेरी पत्नी से कोई संबंध नहीं है तब तक मैं उसे अपने साथ नहीं रखूंगा. हमने तीन दिन तक उस आदमी को यहां घंटों समझाया. वो गांव-देहात का आदमी था. हमारी कोई बात उसने नहीं मानी तब हमने कुमार विश्वास को बुलाने की बात कही. मैं क्या करती? जिस महिला का मामला था वो आम आदमी पार्टी की कार्यकर्ता थी. कुमार विश्वास जब अमेठी से चुनाव लड़ रहे थे तो वो उनके साथ थी. अव्वल तो यह मामला आयोग के सामने आना ही नहीं चाहिए था. कुमार विश्वास और अरविंद केजरीवाल को ही मामले को संभाल लेना चाहिए था लेकिन उन्होंने उसकी पीड़ा को समझा ही नहीं. उस बेचारी का पति आज भी उसे अपने से अलग रखता है.

‘मकान मालिक को तुमसे दिक्कत है, तुम अपने इलाके में जाओ’

pigeonsस्नातक की पढ़ाई के दौरान एक न्यूज चैनल में इंटर्नशिप करने दिल्ली आया था. साल 2013 के दिसंबर का सर्द महीना था. मेरा दोस्त नोएडा सेक्टर 12 में रहता था. उसने कह रखा था एक महीने की ही बात है मेरे यहां रह लेना. नई दिल्ली रेलवे स्टेशन उतरकर उसे फोन किया और उसके यहां पहुंच गया. सुबह तैयार होकर दफ्तर के लिए निकल गया. करीब सात दिन हुए होंगे. दफ्तर से वापस आकर कमरे पर सो रहा था कि किसी ने दरवाजे की घंटी बजाई. दरवाजे पर दो आदमी कुछ कागजात लेकर खड़े थे. इससे पहले मैं उनसे कुछ पूछ पाता उन्होंने एक साथ तीन-चार सवाल दाग दिए ‘कौन हो तुम? तुम तो यहां नहीं रहते? यहां जो रहता है वह कहां गया? आईकार्ड दिखाओ.’

मैं घबरा गया और सोचा ये क्या बला है. खैर मैंने उन्हें अपना नाम बताया और उनसे बैठने को कहा फिर दोस्त को फोन करके बुलाया. दोस्त ने आने के बाद मुझे अंदर जाने को कहा और उन लोग से बातचीत करने लगा. मैं फिर से सो गया. उठने के बाद दोस्त से पूछा कि वो लोग कौन थे और क्यों आए थे? उसने बताया, ‘वो ब्रोकर थे जिन्होंने ये मकान किराये पर दिलवाया है. ये पता करने आए थे कि यहां कोई और रहने आया है क्या, शायद मकान मालकिन ने उन्हें बता दिया है कि कोई और यहां रह रहा है. मैंने उन्हें बताया मेरा भाई है. कुछ दिनों में चला जाएगा पर वे माने ही नहीं, उनका कहना है तुम यहां नहीं रह सकते हो.’

मेरा नाम सुनकर न तो कोई ब्रोकर मकान देता, न मकान मालिक. कुछ की शर्त यह थी कि साथ में कोई हिंदू हो तब ही मकान देंगे

मैंने कहा कि उनसे कहो कि एक महीने का किराया ज्यादा ले लें. उसने कहा ठीक है कल ब्रोकर से मिलकर बात करते हैं. दूसरे दिन हम दोनों ब्रोकर से मिलने गए. बातचीत हुई हमने कहा कि एक महीने का किराया कुछ बढ़ाकर ले लो, उसमें क्या हर्ज है? ब्रोकर ने कहा हमें कोई हर्ज नहीं पर मकान मालकिन को है, वो भी तुमसे. मैंने मजाक में कहा, ‘क्यूं मैं कोई चोर हूं क्या?’ उन्होंने अजीब से लहजे में कहा, ‘नहीं, फिर भी मकान मालकिन को तुमसे दिक्कत है और उन्होंने मना किया है, इसलिए बोल रहा हूं कि तुम अपने इलाके में चले जाओ.’ मैंने पूछा अपना इलाका मतलब? पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. मैंने कहा ठीक है मैं सीधा मकान मालकिन से ही बात करता हूं. तब उन्होंनेे कहा, ‘देखो मकान मालकिन अपने घर में किसी मुसलमान को नहीं रखना चाहती और हमें भी मुसलमानों का रेंट एग्रीमेंट बनवाने में दिक्कत आती है. इसलिए यहां मुसलमानों को किराये पर मकान नहीं मिलते. वैसे मुझे आप लोगों से कोई दिक्कत नहीं है पर मैं मजबूर हूं. किसी मुस्लिम इलाके में मकान ले लो आसानी से मिल जाएगा.’

यह सब सुनकर अजीब-सा लगा. जिंदगी में पहली दफा ऐसा महसूस हुआ मानो मैं औरों से अलग हूं. चूंकि तब तक मेरे साथ ऐसा कभी नहीं हुआ था इसलिए शायद मुझे ऐसा लग रहा था वरना आए दिन ये सब पढ़ने को मिल ही जाता है. जैसे ही हम वापस घर पहुंचे, मकान मालकिन दरवाजे पर खड़ी मिलीं, मैंने सोचा बात करके देखता हूं पर मेरे बोलने से पहले ही उन्होंने पूछ लिया कि कब जा रहे हो यहां से? मैंने कुछ भी बोलना मुनासिब न समझा और यह बोलकर ऊपर चला गया कि एक-दो दिन में चला जाऊंगा. उस दिन मकान मालकिन ने मेरे दोस्त की अच्छी तरह से खबर ली और मुझे जल्द भगाने को कहा.

खैर, दूसरे ही दिन से मैंने कमरा ढूंढना शुरू कर दिया पर वहां कमरा मिलना मुश्किल था. मेरा नाम सुनकर न तो कोई ब्रोकर मकान दे रहा था, न ही कोई मकान मालिक. उनमें से कुछ की शर्त यह थी कि साथ में कोई हिंदू हो तब ही मकान दिया जाएगा. मकान ढूंढने के दौरान मैं मकान मालकिन से छिपकर दोस्त के यहां आता था. जब भी आता दोस्त को फोन कर पूछ लेता था कि मकान मालकिन गेट पर तो नहीं है. इशारा मिलते ही मैं चुपके से अंदर चला जाता. फिर मैंने आसान रास्ता अख्तियार किया और जामिया नगर आ गया. यहां किसी को मेरे नाम की परवाह भी नहीं थी. शायद मुझे ‘अपने इलाके’ में छत मिल गई.