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ग्रीनपीस के एक वालंटियर का इंटरनेशनल हेड कुमी को भेजा गया ई-मेल

कुमी

मैं आपसे ये चुप्पी तोड़कर कोई ठोस कदम लेने की गुजारिश करता हूं.

ग्रीनपीस इंडिया में ये सब बहुत लंबे समय से चल रहा है और अब तक दोषियों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया गया है.

क्या आपने कभी सोचा कि क्यों पुराने वालंटियर और कार्यकर्ता जो पूरे जोश से सार्थक और कुछ अलग करने के लिए ग्रीनपीस से जुड़े थे, अब संस्थान छोड़ चुके हैं या छोड़ रहे हैं? क्या आप भी वही कहेंगे जो सीनियर मैनेजमेंट ने कहा- कि अब इन कामों में उनकी दिलचस्पी नहीं या फिर उनकी प्राथमिकताएं बदल गई हैं?

कुमी, मैं निजी तौर पर आपको 10-15 उत्साही वालंटियर के नाम बता सकता हूं जिन्होंने ग्रीनपीस इंडिया इसलिए छोड़ दिया क्योंकि ये वो ग्रीनपीस नहीं रहा जिससे वो जुड़े थे. उनके और (मेरे लिए भी) ग्रीनपीस एक विचार है. हमने उस ग्रीनपीस को जॉइन किया था जो सच्चाई और न्याय के लिए सिर उठाकर खड़ा होता था. अब जो घटनाक्रम यहां हो रहे हैं हम उन से नाराज और दुखी हैं. हमारा मोहभंग हो चुका है.

मैं ये शिकायतें और किस्से काफी समय से सुनता आ रहा हूं. मुझे समझ नहीं आता कि इतना सब होने के बावजूद परवीन जैसी स्वार्थी व्यक्ति ग्रीनपीस में क्यों है? वो एक एचआर डायरेक्टर के रूप में पहले ही असफल हो चुकी हैं. हमारे पास उदाहरण हैं- यौन शोषण के मामलों को गंभीरता से न लेने के अलावा उन्होंने ग्रीनपीस इंडिया की नौकरियों में भर्ती के समय कुछ विशेष लोगों को अनुचित रूप से महत्व दिया. उन्होंने कई कर्मचारियों द्वारा लगातार की जा रही अनुचित गतिविधियों को ग्रीनपीस का ‘इनफॉर्मल कल्चर’ कहकर टाला.

किस बिना पर समित एच जैसा दंभी और अशिष्ट व्यक्ति ग्रीनपीस इंडिया में कार्यकारी निदेशक  के पद पर बना हुआ है? लगभग दो साल पहले, एक पत्रकार के बतौर (बद)किस्मती से मुझे उनसे मिलने का मौका मिला था और मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि मैं आज तक समित जितने दंभी और अहंकारी व्यक्ति से नहीं मिला.

क्या आपको लगता है कि मोदी सरकार की कार्रवाई से इतर अगर भारत में ग्रीनपीस को आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है तो इसके अनेक कारणों में से एक कारण कई प्रचारकों और सीनियर मैनेजमेंट का सार्वजानिक रूप से किया हुआ अहंकारी व्यवहार है?

जैसा कि मैंने अपने पिछले ईमेल में भी बताया मैंने मेनस्ट्रीम मीडिया में हमेशा ग्रीनपीस और इसके अभियानों का समर्थन किया है, उनके बारे में लिखा है. मैं जब भी किसी विश्वस्तरीय मंच पर खुद को ग्रीनपीस का कार्यकर्ता बताता हूं तो मुझे बहुत गर्व का अनुभव होता है. पर भारत के इस ग्रीनपीस को मैं नहीं स्वीकारता.

मैं आपसे निवेदन करता हूं कि बहुत हो चुका है, अब अपनी चुप्पी तोड़िए और कोई एक्शन लीजिए. अब तक मैंने यहां, ग्रीनपीस इंडिया में चल रहे नकारात्मक मामलों को बाहरी दुनिया के सामने उजागर नहीं किया है और यकीन मानिए, अगर जरूरत पड़ी तो मुझे इस मुद्दे को उजागर करने और ग्रीनपीस इंडिया को मीडिया ट्रायल में लाने में घंटे भर से भी कम समय ही लगेगा.

अगर मैं विश्व मीडिया में भारत सरकार द्वारा ग्रीनपीस के साथ हुए अन्याय के बारे में लिख सकता हूं तो ग्रीनपीस के कार्यकर्ताओं और कर्मचारियों के साथ हो रहे अन्याय के बारे में लिखना भी ईमानदारी ही होगी. और इसमें सबसे ऊपर यहां प्रचलित ‘इनफॉर्मल रेप कल्चर’ ही होगा. इस वक्त सबसे आखिरी चीज जिससे ग्रीनपीस जूझ सकता है वो है मीडिया.

कुमी, मैं ग्रीनपीस को गिरते हुए नहीं देख सकता. मैं आपसे फिर ये अनुरोध करता हूं कि आप इस मामले में संज्ञान लें और भारत में ग्रीनपीस की गिरती हुई साख को बचाएं.

धन्यवाद

अविक रॉय, (पत्रकार व ग्रीनपीस से लंबे समय से जुड़े वालंटियर)

‘हमने अपने पूर्व कर्मचारियों को बहुत निराश किया है, इसके लिए हम बेहद शर्मिंदा हैं और माफी मांगते हैं’

ग्रीनपीस के दो पूर्व कर्मचारियों पर आपकी ही एक पूर्व महिला कर्मचारी द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न और बलात्कार के आरोपों पर आपका क्या कहना है?

जी, संबंधित महिला ने 2012 में यौन उत्पीड़न के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी हालांकि उस शिकायत पर उचित तरीके से कार्रवाई नहीं हुई, जिसके लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. जहां तक बलात्कार के आरोप की बात है, ये घटना 2013 में एक निजी पार्टी में हुई थी और इसका जिक्र सबसे पहले फरवरी 2015 में एक फेसबुक पोस्ट में किया गया, फिर जून में एक ब्लॉग पर. संबंधित महिला इस बारे में न तो पुलिस में और न ही ग्रीनपीस में कोई शिकायत दर्ज करना चाहती हैं. ये उनका अपना फैसला है और हम इसका पूरी तरह सम्मान करते हैं. ग्रीनपीस इंटरनेशनल ने भी इस मामले की जांच कर समीक्षा की है और 16 जून को अपना निष्कर्ष दिया. ग्रीनपीस ने एक एक्सटर्नल ऑडिट करवाने का भी सोचा है. वैसे आंतरिक मूल्यांकन के बाद ग्रीनपीस इंडिया के पूर्व कार्यकारी निदेशक समित एच और प्रोग्राम डायरेक्टर दिव्या रघुनंदन ने इस्तीफा दे दिया है. अब हम कर्मचारियों को काम करने के लिए एक सुरक्षित माहौल देने के लिए आतंरिक प्रक्रियाएं और व्यवस्थाएं सुधारने की ओर कार्य कर रहे हैं.

पीड़िता का आरोप यह भी है कि ग्रीनपीस ने कभी भी उनकी शिकायतों पर गौर नहीं किया और ग्रीनपीस की आतंरिक शिकायत समिति ने भी कभी इस मामले की जांच नहीं की, जो कि विशाखा गाइडलाइंस और कार्यस्थल पर महिलाओं का शारीरिक शोषण एक्ट, 2013 का साफ-साफ उल्लंघन है.

हां, ये बात सही है कि स्टाफ के सदस्य की 2012 में की गई आधिकारिक शिकायत, विशाखा गाइडलाइंस पर बनी आंतरिक शिकायत कमेटी तक नहीं पहुंची थीं, जैसा कि उन्हें पहुंचना चाहिए था. ग्रीनपीस इंटरनेशनल के मूल्यांकन में ये बात सामने आई कि उस समय के एचआर मैनेजर की ये सबसे बड़ी गलती यही थी कि उन्होंने इस केस को सेक्सुअल हरासमेंट की श्रेणी में नहीं रखा.

2015 में बनी आंतरिक शिकायत कमेटी ने अपनी ओर से इस मामले को संज्ञान में लिया हालांकि कार्यस्थल पर महिलाओं के शारीरिक शोषण एक्ट, 2013 के अनुसार ये शिकायत खारिज हो चुकी थी. एक समय पर जब जांच की विश्वसनीयता पर संदेह हुआ तो कानूनी सलाह पर पूर्व कार्यकारी निदेशक ने आरोपी कर्मचारी को चेतावनी देने का निर्णय लिया. अब एक बाहरी ऑडिट किया जाएगा जिससे हमें सही फैसले लेने में मदद मिलेगी. जहां तक बलात्कार के मामले की बात है संबंधित महिला शिकायत दर्ज नहीं करवाना चाहतीं, जिसके बिना हम कोई जांच नहीं कर सकते हैं. हमने उन्हें एफआईआर और पुलिस जांच करवाने की भी सलाह दी थी पर वो ऐसा नहीं करना चाहतीं.

अब जब सभी शिकायतें सार्वजानिक हो चुकीं हैं, तो ग्रीनपीस ने इन शिकायतों पर क्या कार्रवाई की है?

जैसा मैंने बताया कि ग्रीनपीस इंटरनेशनल ने भारत ऑफिस में हुई जांच के मूल्यांकन के बाद कहा था कि आतंरिक प्रक्रियाओं में बहुत चूक हुई हैं. जिसके बाद तीन दिन तक ग्रीनपीस इंडिया के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने इस केस से जुड़ी पिछली बातचीत और दस्तावेजों की जांच की. समित एच और दिव्या रघुनंदन ने इन खामियों की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया जिसे बोर्ड ने मंजूर भी कर दिया. यौन प्रताड़ना के मामले के कथित आरोपी ने भी हाल ही में इस्तीफ़ा दे दिया. बलात्कार के कथित आरोपी ने भी पिछले दिनों अपना इस्तीफा सौंप दिया जिसके बाद हमने उन्हें नोटिस पीरियड पूरा किए बिना ही जाने को कह दिया.

क्या प्रबंधन एफआईआर दर्ज करने की सोच रहा है?

इस मामले में काफी स्पष्ट कानून हैं, जिनके अनुसार हम पीड़िता की सहमति के बिना कोई कदम नहीं उठा सकते. हमने उन्हें एफआईआर करवाने का अनुरोध किया है और कानूनी मदद देने का भी प्रस्ताव रखा है.

ग्रीनपीस महिला अधिकारों के प्रति सतर्कता और लोकतंत्र में उठती असंतुष्टों की आवाज सामने लाने का दावा करता रहा है, इस तरह देखें तो दफ्तर के माहौल में लोकतंत्र की कमी और असंतुष्टों की बात को तवज्जो न दिए जाने के पीड़िता के आरोप पर आपका क्या कहना है? इन आरोपों पर संस्थान ने क्या कदम उठाए हैं?

हमें लगता है कि हमने अपने पूर्व कर्मचारियों को बहुत निराश किया है और इसके लिए हम बेहद शर्मिंदा हैं और माफी मांगते हैं. ये मामला रोशनी में तब आया जब इस साल फरवरी में पीड़िता के सोशल मीडिया अकाउंट पर एक पोस्ट आई, जिससे संस्थान में आक्रोश बढ़ गया. इसके बाद हमने कई आतंरिक स्टाफ मीटिंग की, जिससे ये फैसला हो सके कि हम किस तरह इस मुद्दे से वाकिफ हो सकें. बोर्ड ने इस केस में हुई चूकों को संज्ञान में लिया और स्थिति की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उस समय के कार्यकारी निदेशक और प्रोग्राम डायरेक्टर दोनों ने इस्तीफा दे दिया. हमारा संस्थान सभी के लिए सुरक्षित वर्क स्पेस की अवधारणा में पूरा विश्वास रखता है और इसे बेहद जरूरी भी समझता है. हम इन स्थितियों में सुधार लाने के लिए काम करेंगे. हम स्टाफ से सक्रिय बातचीत का सिलसिला बनाए रखेंगे.

अब जब इस मुद्दे से जुड़े हर व्यक्ति ने इस्तीफा दे दिया है, तो इसके प्रति जवाबदेह कौन होगा?

हम अपने किए हर वादे के लिए जवाबदेह हैं. ग्रीनपीस ही इसके लिए जिम्मेदार और जवाबदेह होगा.

क्या यौन उत्पीड़न की शिकार से सिर्फ माफी मांग लेना काफी है?

नहीं, पीड़िता माफी से कहीं ज्यादा की हकदार है. पीड़िता को समझना होगा कि दोषियों को सामने लाया जा चुका है. हमने पिछले कुछ दिनों में कुछ बेहद कठिन निर्णय लिए हैं जो हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं. जो हो गया उसे तो बदला नहीं जा सकता पर हम कोशिश करेंगे कि फिर ग्रीनपीस में ऐसा कभी न हो.

क्या उन आरोपियों के रिलीविंग लेटर पर उनके संस्थान छोड़ने का कारण स्पष्ट लिखा गया है?

जैसा मैंने पहले भी कई बार कहा कि बलात्कार के मामले की कोई जांच नहीं की गई थी. उत्पीड़न के मामले के दोषी को शिकायत के आधार पर ही संस्थान छोड़ने के लिए कहा गया था और ये बात उनके रिकॉर्ड में दर्ज होगी.

ग्रीनपीस ने माना है कि संस्थान के वर्क कल्चर और माहौल में खामियां हैं, अब सुधार की दिशा में क्या कदम उठाए जा रहे हैं?

नए बदलावों के लिए संस्थान में भरपूर ऊर्जा है. हम खुद से नाराज और निराश हैं और माहौल बदलना चाहते हैं. ये एक नई शुरुआत के लिए सही समय होगा. एक बार ऑडिट की रिपोर्ट आ जाने के बाद हमारे लिए व्यवस्थाएं सही करना आसान होगा.

इस केस में बातचीत के दौरान हमें ऐसे कई और मामलों का पता चला जिसमें अलग-अलग दफ्तरों में यौन उत्पीड़न की शिकायतें दर्ज कराई गईं पर ग्रीनपीस की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई. इन मामलों के बारे में आपका क्या कहना है? क्या मैनेजमेंट ने कभी ऐसी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया?

हम इन मामलों का ब्योरा गोपनीयता के चलते बता नहीं सकते. ग्रीनपीस अब बदलाव लाने के लिए प्रतिबद्ध है और कार्यस्थल पर सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है.

‘मामला आगे बढ़ाया तो ग्रीनपीस को एक वालंटियर कम होने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा’

मैंने 2014 की शुरुआत में ग्रीनपीस जॉइन किया था. ये मई का महीना था जब हमारी ट्रेनिंग बेंगलुरु ऑफिस के वेयरहाउस में चल रही थी. ट्रेनिंग का आखिरी दिन था और सबने ट्रेनिंग पूरी होने की खुशी में सेलीब्रेट करने के लिए बियर मंगाई. मेरी तबीयत उस दिन ठीक नहीं थी इसलिए मैं इसमें शामिल नहीं हुई और सोने चली गई. वालंटियर्स के सोने का इंतजाम वेयरहाउस में ही था. कुछ देर बाद एक वालंटियर आया और मुझे ठीक से याद नहीं कि उसने क्या कारण बताया और पूछा कि क्या मैं अपना बिस्तर इस तरफ शिफ्ट कर सकता हूं. मैं और मेरी एक दोस्त साथ थे तो हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं हुई. लगभग आधी रात को अचानक मेरी आंख खुली. वो लड़का मुझे अनुचित ढंग से छू रहा था. मैं घबरा गई. तबीयत भी ठीक नहीं थी तो मैं बाथरूम चली गई. वो वहां भी मेरे पीछे-पीछे आया और मुझसे बात करने की कोशिश करता रहा. मैंने खुद को अंदर बंद कर लिया था. मैं घबराई हुई थी, असहज थी. वो लड़का काफी देर तक बाहर खड़ा रहा. जब मुझे लगा कि वो चला गया होगा मैं वापस आ कर सो गई. उसने अगले दिन मुझसे बात करने की कोशिश की, मुझे बाद में भी कॉल और मैसेज करता रहा पर मैंने कोई जवाब नहीं दिया.

ऐसे अनुभवों को बताने में झिझक हमेशा ही रहती है, मेरे साथ भी यही हुआ. कुछ महीनों बाद मैंने एचआर मैनेजर को ईमेल के जरिये इन सब के बारे में बताया और यौन प्रताड़ना की शिकायत दर्ज करवाई. शुरुआत में मेरी शिकायत को लेकर उनका रवैया ठीक था पर दिन बीतने पर मुझे लगा वो जानबूझकर इसे बिना कोई फैसला दिए खींच रहे हैं. और फिर उनके निर्णय से ये पता चल गया कि ऐसी शिकायतों के प्रति प्रबंधन कितना लचर है! उन्होंने कहा कि वो मानता है कि वो दोषी है. वो अपने किए पर शर्मिंदा है और ऐसा सोचा गया है उसे साल भर के लिए बैन किया जाएगा और उसके बाद वो फिर जॉइन कर सकता है. साथ ही वो मुझसे लिखित में माफी मांगेगा. मैंने उनसे साफ कहा कि मैं इस फैसले से खुश नहीं हूं, उसे ग्रीनपीस से निकालना चाहिए. इस पर एचआर मैनेजर परवीन में मुझसे कहा कि हमें मानव स्वभाव को समझते हुए उसे एक मौका और देना चाहिए. अगर वो कह रहा है कि आगे कभी ऐसा नहीं करेगा तो उसे इस बात को साबित करने का मौका तो देना चाहिए. क्या ये सेक्सुअल हरासमेंट के मसलों से निपटने का तरीका है? ये बहुत दुखद है. मैं निराश हो गई थी फिर भी मैंने वालंटियर को-ऑर्डिनेटर अली से इस बारे में बात की. उन्होंने मुझसे कहा कि अगर मैंने इस मामले को और आगे बढ़ाया तो मुश्किल हो जाएगी. ग्रीनपीस को एक वालंटियर (मेरे रूप में) कम हो जाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

सुमन

‘मुझसे ऐसा व्यवहार किया गया जैसे मानो मैं अपराधी हूं’

बतौर वालंटियर ग्रीनपीस से मैं लंबे समय से जुड़ी रही मगर एक कर्मचारी के रूप में मैंने 2010 में जॉइन किया. वहां के माहौल में ही ये घटियापन घुल चुका है. आते-जाते कमेंट करना, महिलाओं की वेशभूषा पर टिप्पणी करना, अश्लील और भद्दे मजाक करना वहां आम है. चूंकि मैं उम्र और पद में बड़ी थी तो इन लड़कियों ने मुझे इस बारे में बताया. मैं इस तरह के मुद्दे मैनेजमेंट तक पहुंचाती, उस पर उनसे सवाल-जवाब करती. पर कभी भी इस बारे में उनका रवैया ठीक नहीं रहा. मुझे याद है एक एचआर डायरेक्टर सरेआम मुझ पर चिल्लाने लगा. उसने मुझसे कहा, ‘क्योंकि आपकी निजी जिंदगी के अनुभव ठीक नहीं रहे इसलिए आपको हर आदमी गलत ही लगता है. आप मानसिक रूप से असंतुलित हैं, आपको मनोचिकित्सक की सलाह की जरूरत है.’

उनका ये जवाब तब था जब मैंने उनसे एक महिला कर्मचारी द्वारा एक पुरुष सहकर्मी पर लगाए गए उत्पीड़न के आरोपों के बारे में बात करनी चाही. मेरा मानना है कि ग्रीनपीस जैसे नामी एनजीओ में इस तरह की घटनाएं होना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और उससे भी ज्यादा शर्मनाक है उनके प्रबंधन का रवैया. सीनियर मैनेजमेंट में दिव्या रघुनंदन, समित एच, विनुता गोपाल और प्रिया पिल्लई सब ये जानते थे, अगर उस समय कोई कड़ा कदम उठा लिया गया होता तो बलात्कार की ये घटना नहीं होती. उनके कड़े कदम से बाकी कर्मचारियों को भी चेतावनी मिल जाती. उन्होंने लगातार इसे छिपाया. जब इन लोगों ने कोई कार्रवाई नहीं की तब मैंने ये बात ग्रीनपीस बोर्ड में बताई पर उनके प्रबंधन से पूछने पर वे साफ मुकर गए कि ऐसा कोई केस यहां हुआ है. प्रिया पिल्लई ने मुझसे कहा था कि उनके पास इससे बड़े मुद्दे हैं और इसमें मुझे नहीं पड़ना है. इसके बाद से वे लोग मुझे निकालने के बारे में सोचने लगे. बार-बार अपमानित किया गया. इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया. एक दिन कहा गया कि आपकी मानसिक हालत ठीक नहीं है, या तो आप ‘कंपलसरी लीव’ पर जाइए या आपको अभी नौकरी से निकालकर बाहर कर दिया जाएगा. मैंने पूछा, ‘क्या इसके अलावा कोई विकल्प है?’ ‘इस्तीफा दे दीजिये’, जवाब मिला. मैंने ईमेल पर अपना इस्तीफा भेज दिया. आप यकीन नहीं करेंगे कि ईमेल भेजने के पांच मिनट के अंदर ही मेरा लैपटॉप छीन लिया गया, ऑफिशियल ईमेल आईडी बंद कर दी गई और एक घंटे में सामान लेकर निकल जाने को कहा गया. ऐसा व्यवहार किया गया जैसे मानो मैं अपराधी हूं… और अब अपराधियों को वे ‘गुड लीडरशिप’ सर्टिफिकेट से नवाज रहे हैं!

कीर्ति

चित्र कथा : बे-वतन बच्चे

कब तक पैदा होते रहेंगे बच्चे

बगैर किसी देश के, बगैर बचपन के

वह सपने देखेगा अगर कोई सपना देख सके

और धरती विदीर्ण है

 महमूद दरवेश, फिलस्तीनी शायर

ROHING 1
दिल्ली के मदनपुर खादर इलाके के शरणार्थी शिविर में एक अस्थायी घर से झांकती रोहिंग्या बच्ची. इस शिविर में म्यांमार से भागे 35 रोहिंग्या मुस्लिम परिवार रह रहे हैं. रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ लगातार बौद्ध हमलों से बचकर भागे हुए इन परिवारों ने भारत में शरण ली है.

प्रवास पर लिखी गई फिलस्तीनी शायर महमूद दरवेश की यह नज्म अक्सर उन लोगों के लिए आईना बन कर उभरती है, जो अपने मादरे वतन से बिछड़े हुए हैं और अपने वतन लौटने की तमन्ना दिल में लिए अपने लोगों से मिलना चाहते हैं, अपनी जमीं में दफन होना चाहते हैं. उनके बच्चों के पास पासपोर्ट नहीं है. उन्होंने अपने माता-पिता से सिर्फ घर की कहानियां ही सुनी हैं. शायद उन्हें ये इल्म तक नहीं कि वो अपने घर वापस कभी नहीं लौट सकेंगे. घर लौटना उनके लिए महज एक ख्वाब बन कर रह गया है.

म्यांमार के रखाइन प्रांत में बौद्ध कट्टरपंथियों के जुल्मो-सितम के बाद बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुस्लिम देश से दूर भारत में पनाह लिए हुए हैं. उधर, पाकिस्तान में इस्लामिक कट्टरपंथियों के जुल्म के बाद हिंदुओं ने भी भारत में पनाह लेना ही मुनासिब समझा. पाकिस्तान और म्यांमार सहित, फिलस्तीन, अफगानिस्तान, इराक और सीरियाई लोगों ने भी ऐसी स्थितियों का सामना किया है. उन्हें भी कट्टरपंथियों के अत्याचारों के बाद अपना देश छोड़कर भागना पड़ा. उन तमाम सताए हुए लोगों में सिर्फ एक बात समान है और वह यह कि ये सब शरणार्थी हैं.

तमाम पीड़ितों में उन बच्चों की हालात सबसे ज्यादा खराब हैं जो पैदाइश के साथ ही अपने वतन से बेदखल कर दिए गए और वैसे मासूम जिनकी पैदाइश ही दूसरे मुल्क की सरजमीं पर हुई. देश में अगर नागरिकता ही पहचान का पैमाना तो बिना नागरिकता के अब ये मासूम कहीं के नहीं रहे. ‘तहलका’ ने कुछ देशों से आए ऐसे ही कुछ शरणार्थियों और उनके बच्चों से मुलाकात की. इन शरणार्थियों के लिए इज्जत भरी जिंदगी एक सपना ही है, जब तक वो अपने वतन न लौट जाएं या उन्हें भारत की नागरिकता न मिल जाए.

 

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हुसैन | 14 वर्ष |म्यांमार

यूनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजीज (यूएनएचसीआर) का एक शरणार्थी हुसैन, म्यांमार की लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू की का बड़ा फैन है. दूसरे रोहिंग्या मुस्लिमों की तरह हुसैन को भी ऐसा लगता है कि उनकी ये लोकतांत्रिक नेता उनके लिए खड़ी होंगी और उन पर हो रहे अत्याचारों को खत्म कर देंगी. दिलचस्प बात यह है कि हुसैन को सियासत का अच्छा खासा इल्म है. हुसैन के मुताबिक ‘आंग सान सू की हमारे लिए आवाज उठाना तो चाहती हैं पर कुछ राजनीतिक परेशानियों की वजह से उन्होंने चुप्पी साध रखी है. म्यांमार में चुनाव होने वाले हैं और चुनाव में वो मुस्लिमों को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं. मुझे पूरा यकीन है कि जब वह प्रधानमंत्री चुन ली जाएंगी तब वो हमें वापस बुलाने की व्यवस्था जरूर करेंगी. मैं उस दिन का इंतजार कर रहा हूं.’

2012 में रोहिंग्या के खिलाफ हुई हिंसा के बाद हुसैन अपने माता-पिता के साथ भारत आ गया था पर अब भी उसे घर लौटने की उम्मीद है. हुसैन ने यूएनएचसीआर की मदद से पास ही के एक स्कूल में दाखिला ले लिया है और वह शिविर के दूसरे बच्चों को अपने इतिहास के बारे में बताता है ताकि वह इतिहास गुमनाम बन कर न रह जाए.

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इमकार, बिल्लू, दर्शन, आकाश और दशरथ | पाकिस्तान

बकरियों के इस बाड़े में खेलते ये बच्चे पाकिस्तान से हैं. पास में ही फरीदाबाद की फ्रंटियर कॉलोनी के शिविर में रहते हैं. इस शिविर में सूरज छिपने से पहले का धुंधलका मानो इनकी जिंदगी में फैली अनिश्चितता के अंधेरे को दिखा रहा है. दिनभर खेल-कूद में डूबे ये बच्चे पढ़ाई के नाम से भी बेखबर हैं.

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जसप्रीत | 7 वर्ष | पाकिस्तान

जसप्रीत की जिंदगी भी उस मक्के की हरी पत्तियों जैसी ही उलझी है, जिसे वो भुट्टे से खींच रही है. सात साल की जसप्रीत का भाग्य भी कुछ यूं ही भारत और पाकिस्तान के बीच लटका है जैसे पास के ही झूले में उसकी छोटी बहन. वह हर रोज अपनी मां से जिद करती है कि उसे भी अपने घर कराची जाना है, जहां वह अपने दोस्तों और भाई-बहनों के साथ खेल सके.

फरीदाबाद के फ्रंटियर कॉलोनी के शिविरों में पनाह लिए दूसरे बच्चों की मानिंद जसप्रीत के भाग्य का फैसला भी भारत और पाकिस्तान की सरकारों पर निर्भर है, साथ ही उन तालिबानयों पर भी, जिन्होंने हजारों हिंदुओं और सिखों को उनके वतन से बेदखल कर दिया. 2008 में उसका परिवार टूरिस्ट वीजा ले कर भारत आया था और वापस न लौटने की सोची थी. पर अब पराए मुल्क में उनके ऊपर वापस जाने का दबाव बनाया जा रहा है.

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अब्दुल अज़ीज़ जान | 8 वर्ष | अफगानिस्तान

अब्दुल अज़ीज़ अफगानिस्तान के एक उदारवादी परिवार से ताल्लुक रखते हैं, जिसे अफगानिस्तान में बढ़ते हुए कट्टरपंथ ने परेशान कर रखा था. कट्टरपंथियों के अत्याचार से बचकर भागने की कोशिश में अब्दुल अज़ीज़ भूल ही गए हैं कि वो कहां से हैं. उन्होंने इस संवाददाता का अभिवादन तो किया पर फिर सकपका गए क्योंकि वो हमारी भाषा ही नहीं समझते. फिलहाल अब्दुल अज़ीज़ का परिवार पराए मुल्क में अमनो-चैन की तलाश कर रहा है.

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‘उसने कहा, मैं इतनी खूबसूरत हूं कि उसे खुद को याद दिलाना पड़ता है कि वो शादीशुदा है’

ये साल 2011 की बात है. दिल्ली में एक सहयोगी के जन्मदिन पर ग्रीनपीस के गेस्टहाउस में पार्टी थी. स्टाफ के लोगों को बुलाया गया था. मैं भी वहां पहुंची. उदय कुमार वहां पहले से मौजूद था. वह शराब के नशे में था. पूरा स्टाफ साथ में ही बैठा था, दिव्या रघुनंदन और समित एच भी थे. अचानक उदय कुमार उठा और उसने ने मुझ पर भद्दी टिप्पणी करनी शुरू कर दी. वो सब के सामने ये कह रहा था कि मैं कितनी खूबसूरत हूं कि जब उसने मुझे पहली बार देखा तब वो खुद पर काबू ही नहीं कर पाया, उसे खुद को बार-बार ये याद दिलाना पड़ा कि वो शादीशुदा है!

मेरे लिए ये सब सहना बहुत असहज था. इतना सब हुआ पर लोग उसकी ऐसी बात पर हंस रहे थे. मेरे पक्ष में किसी ने भी उठकर एक शब्द भी नहीं कहा. तब मैंने अपने एक सहकर्मी से मुझे घर छोड़ देने के लिए कहा. इस पर उदय कुमार मेरे सामने आकर खड़ा हो गया और बोला कि ऐसे भाग क्यों रही है, चलो बाहर घूमने चलते हैं! इसके बाद मैं वहां नहीं रुकी. अगले दिन मैंने दिव्या से इस बारे में बात की तब उसने सलाह दी कि मुझे उदय कुमार को चेतावनी देनी चाहिए. मैंने ऐसा ही किया पर उदय कुमार ने ऐसे व्यवहार के लिए कभी माफी नहीं मांगी. इस घटना के बाद मैंने ग्रीनपीस की किसी भी पार्टी में जाना बंद कर दिया क्योंकि मुझे डर था कि अगर कभी फिर ऐसा या इससे अधिक कुछ भी हुआ तब भी कोई मेरा साथ नहीं देगा, पर ये ऐसी किसी समस्या का हल नहीं है.

इस घटना के अलावा भी मैंने कई बार ऑफिस में भद्दे, अश्लील मजाक सुने हैं, जिन्हें साफ तौर पर स्त्री विरोधी कह सकते हैं. ग्रीनपीस में ‘मिसोजिनी’ (स्त्री जाति से द्वेष) का कल्चर है. वो घटिया लोग हैं. मैं दुनिया भर में ग्रीनपीस के कई दफ्तरों में गई हूं, वहां काम किया है पर ऐसा घटिया माहौल कहीं भी नहीं है. उनके घटियापन का पता आपको इस बात से चल सकता है कि जब मेरी एक सहयोगी मेघना ने एक पुरुष सहकर्मी पर बलात्कार का आरोप लगाया तो कुछ लोगों का कहना था कि उस लड़की का तो बलात्कार होना ही चाहिए था (शी डिजर्व्ड टू बी रेप्ड)!

सीमा

ग्रीनपीस : प्रताड़ना का पर्यावरण

Rape Victim

मैं एक वालंटियर के तौर पर 2009 में ग्रीनपीस से जुड़ी. 2012 में बेंगलुरु ऑफिस जॉइन किया. ग्रीनपीस इंडिया के माहौल में अजीब से लगने वाले द्विअर्थी मजाक आसानी से सुने जा सकते हैं. ये यहां हमेशा से होते रहे हैं पर शुरुआत में आप हर मजाक पर इस वजह से सवाल नहीं उठाते कि कहीं कोई आपको झगड़ालू न समझ बैठे. मेरे साथ भी यही हुआ. वहां स्त्री विरोधी और जेंडर संबंधी मजाक आम हैं पर मुझे इनसे तब तक ज्यादा फर्क नहीं पड़ा जब तक मैंने इस घटिया सोच को मेरे साथ हुए दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम में बदलते नहीं देखा.

 अक्टूबर, 2012 में ऑफिस के कई साथियों के साथ मैं हैदराबाद में टूर पर थी. सीनियर एडमिन मैनेजर उदय कुमार भी वहीं था. एक दिन अचानक रात में उसने मुझे फोन करके कहा कि अपना कमरा खाली करो और मेरे कमरे में सोने आ जाओ! ये बहुत ही घटिया बात थी. मुझे वो शराब के नशे में लग रहा था इसलिए मैंने बात ज्यादा नहीं बढ़ाई. इसके बाद वो हर जगह मेरा पीछा करता, मेरी असहजता भांपने के बावजूद करीब आने की कोशिशें करता. उसने कई बार मेरा हाथ पकड़ने की कोशिश की. मेरे जन्मदिन पर मुझे जबरदस्ती केक खिलाने लगा. मैं उससे परेशान हो गई थी. पूरी मेज पर जगह खाली होने के बाद भी नाश्ते के समय मेरे ही पास आकर बैठता.

 वापस आकर लगभग डेढ़ महीने बाद मैं उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत जुटा पाई. तब मुझे पता चला कि नवंबर 2011 में उदय एक और महिला कर्मचारी सीमा से भी बदतमीजी कर चुका है. मैं उसके ओछे स्वभाव को समझ चुकी थी इसलिए मैंने अपनी शिकायत में उसके लिए ‘रिपीट ऑफेंडर’ (अपराध दोहराने वाला) शब्द का प्रयोग किया. दिसंबर 2012 में ही सीमा ने भी एक-दो दिन के अंतराल पर उदय के खिलाफ अपनी शिकायत दर्ज कराई थी. बाद में (2015 में) पता चला कि एचआर मैनेजर ने उस शिकायत को यौन प्रताड़ना की श्रेणी में रखा ही नहीं था जिससे इसकी जांच आंतरिक शिकायत समिति द्वारा हो पाती.

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पढ़ेंं: ‘मुझसे ऐसा व्यवहार किया गया जैसे मानो मैं अपराधी हूं’
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‘ये लड़ाई मेरी अकेली नहीं उन सब महिलाओं की है जो इस सो-कॉल्ड ‘सिविल’ सोसाइटी में बिना किसी उत्पीड़न या शोषण के डर के अपने अधिकारों की जमीन तलाश रही हैं’

 हम दोनों लड़कियों से इस बारे में कोई आधिकारिक बातचीत नहीं हुई कि उदय को क्या सजा मिली है पर हमने ऐसा सुना कि क्योंकि दोनों घटनाएं आउटस्टेशन टूर पर हुई थीं इसलिए उदय को एक साल के लिए टूर पर बाहर नहीं भेजा जाएगा. इसके बावजूद उसे एक टूर पर भेजा गया. वैसे ये सभी फैसले ऑर्गनाइजेशनल डायरेक्टर अनंत ने लिए थे, जिस पर पहले ही एक और महिला कर्मचारी उत्पीड़न का आरोप लगा चुकी थी. 2013 में ग्रीनपीस में कार्यरत मेरे एक दूसरे सहकर्मी ने अचेतावस्था में मुझसे बलात्कार किया. वह खुद को मेरा दोस्त कहता था. इस हादसे ने मुझे तोड़कर रख दिया. मैं दहशत में थी. मामले की शिकायत दर्ज कराना तो दूर, मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि इसके बारे में किसी दोस्त को बता सकूं. बाद में पता चला कि वह व्यक्ति और भी कई महिला कर्मचारियों के साथ बदतमीजी कर चुका था, जिसमें कई वालंटियर्स भी शामिल थीं. एक बार उसने एक वालंटियर को अपने निजी अंगों की तस्वीरें भी भेजी थीं. ये मेरा दुर्भाग्य था कि मेरे बलात्कारी के साथ मुझे काम करना पड़ता था. उसकी घटिया नजरों का सामना करना मेरे लिए बहुत मुश्किल था और जब मेरी सहनशीलता जवाब दे गई तो मैंने नौकरी छोड़ दी. तब मैंने अपने मैनेजर को इस्तीफा देने की बात कही तो उसने हंसते हुए कहा, चलो अच्छा है… अब मुझे तुम्हारा पेपरवर्क तो नहीं करना पड़ेगा! किसी संस्थान को अपना सौ प्रतिशत देने के बाद आप इस तरह के व्यवहार की तो उम्मीद नहीं रखते!

 ये बहुत मुश्किल समय था. एक बड़े शहर में मुझे खुद को हर तरह से संभालना था. मैं मानसिक रूप से बहुत परेशान थी. पर धीरे-धीरे मैंने साहस जुटाया जिसका परिणाम इस साल फरवरी में फेसबुक पोस्ट के रूप में सामने आया. मैंने इस पोस्ट में मेरी आपबीती लिखी और प्रबंधन के ढुलमुल रवैये पर सवाल खड़े किए. इसके कुछ दिनों बाद ग्रीनपीस ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके मुझसे माफी मांगी. एचआर मैनेजर परवीन ने मुझे ईमेल पर बताया कि मामले की दोबारा जांच होगी (पर पहली बार तो कभी जांच हुई ही नहीं थी!) मैंने अब तक अपने और कुछ दूसरी लड़कियों के मामले को लेकर ग्रीनपीस इंटरनेशनल से भी संपर्क किया था, उन्होंने बात तो सुनी पर किसी कार्रवाई के नाम पर चुप्पी साध ली.

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पढ़ें : ‘उसने कहा, मैं इतनी खूबसूरत हूं कि उसे खुद को याद दिलाना पड़ता  है कि वो शादीशुदा है’
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 कुछ दिनों बाद पता चला कि एक नई समिति बनी है जो मामले कि जांच करेगी पर फिर भी हम दोनों लड़कियों से कोई संपर्क नहीं किया गया. इस समिति ने उदय कुमार को निकलने का फैसला लिया पर कार्यकारी निदेशक समित एच ने पता नहीं किन कारणों से समिति भंग करके उदय की सजा को एक लिखित माफीनामे तक सीमित कर दिया. गौर करने वाली बात ये है कि लगभग ढाई साल बाद उदय कुमार ने अपने किए की माफी मांगी, वो भी ईमेल में. ईमेल की भाषा बहुत भ्रामक और अस्पष्ट थी. उसने लिखा था, ‘मैं अपने संवेदनहीन व्यवहार के लिए माफी मांगता हूं… आशा है हम अच्छे दोस्त बने रहेंगे.’ क्या ये कोई स्कूली बच्चों का झगड़ा था? वो किस बात के लिए माफी मांग रहा था जिसका जिक्र तक उसने नहीं किया? ये बहुत ही निराशाजनक था. क्या यौन उत्पीड़न भोग चुका इंसान उस व्यक्ति को माफी दे सकता है?  मेरे कई सवाल हैं पर जवाब देने वाले संस्थान से एक-एक कर के इस्तीफा दे के जा चुके हैं. इस बीच मेरे बारे में बहुत-सी घटिया बातें की गईं. मुझे ग्रीनपीस को बदनाम करने की साजिश करने वाला भी कहा गया पर मुझे अब कोई फर्क नहीं पड़ता. ये मेरे अकेले की लड़ाई नहीं है. ये उन सब महिलाओं के लिए है जो इस सो-कॉल्ड ‘सिविल’ सोसाइटी में बिना किसी उत्पीड़न या शोषण के डर के अपने अधिकारों की जमीन तलाश रही हैं. मैं डरना छोड़ कर जीना सीख चुकी हूं. मेरी सच्चाई लोगों की छोटी सोच से बड़ी है.

अपनी एक कर्मचारी की ओर से बलात्कार के आरोप लगाए जाने पर ये रवैया उस संस्था का था जो मानव अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध होने का दावा करती है

ये व्यथा मेघना की है. ग्रीनपीस की पूर्व कर्मचारी मेघना 2009 में संस्था से जुड़ी थीं. मेघना ने बीते फरवरी में अपने साथ हुई इस घटना का सोशल मीडिया पर जिक्र किया. मामले के सामने आने के साथ ही जो ग्रीनपीस संस्था मेघना के छेड़खानी और बलात्कार के आरोपों को लंबे समय से नजरअंदाज करती आई थी वो एकाएक हरकत में आ गई. आनन फानन में संस्था ने कुछ आरोपी कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाने के साथ ही पूरे मामले को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया और कहा हमसे गलती हो गई.

मेघना बताती हैं, ‘इस साल फरवरी में हिम्मत जुटाकर मैंने फेसबुक पर अपनी आपबीती एक पोस्ट में अपने दोस्तों से शेयर की, जिसके बाद ग्रीनपीस की ओर से एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके मुझसे माफी मांगी गई और उस कथित आरोपी ने मुझे ईमेल में सॉरी लिख के भेजा! क्या माफ कर देना इतना आसान होता है! फिर मैंने एचआर मैनेजर से फोन पर बलात्कार की शिकायत दर्ज कराने को लेकर बात की, पर वो बोलीं कि कोई पूर्व कर्मचारी आंतरिक शिकायत समिति में कोई शिकायत दर्ज नहीं करा सकता. हालांकि बाद में भेजे गए एक ईमेल में वो अपनी ही इस बात से पलट गईं. तब उन्होंने कहा कि मैं शिकायत दर्ज करा सकती हूं. उनकी बातों में इतने विरोधाभास थे कि किसी शिकायत के संदर्भ में मैं उन पर विश्वास ही नहीं कर पाई.’ मेघना के अनुसार, ‘2012 में एक आउटस्टेशन टूर के दौरान वो यौन उत्पीड़न की शिकार हुई. उसके बाद फिर 2013 में उनके एक सहकर्मी ने उनके साथ अचेतावस्था में बलात्कार किया.’ बकौल मेघना, ‘मैं इस घटना से पूरी तरह से टूट गई थी, डिप्रेशन में थी. उत्पीड़न की शिकायत पर मैं प्रबंधन का नकारा रवैया भी देख चुकी थी. मेरा साथ देने वाले गिने-चुने ही लोग थे. कुछ लोगों का कहना था कि मैंने लोगों को छूट दी कि वो मेरे साथ ऐसा व्यवहार करें. जब मैं लोगों के ताने-फब्तियां नहीं सह पाई तो नौकरी छोड़ दी.’

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पढ़ें: ‘हमने अपने पूर्व कर्मचारियों को बहुत निराश किया है, इसके लिए हम बेहद शर्मिंदा हैं और माफी मांगते हैं’
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सोशल मीडिया पर ये मामला सामने आने के बाद मेघना से संस्थान की कई दूसरी कर्मचारियों ने भी संपर्क कर अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में जानकारी दी (देखे बाॅॅक्स, मामला आगे बढ़ाया तो…). इस संबंध में ग्रीनपीस के कई वालंटियर्स ने ग्रीनपीस इंटरनेशनल के प्रमुख कुमी नायडू को ईमेल कर उचित कार्रवाई के लिए कहा पर उन्हें कोई जवाब नहीं मिला.

अपनी एक महिला कर्मचारी की ओर से बलात्कार जैसे गंभीर आरोप लगाए जाने पर ये रवैया उस संस्था का था जो मानवाधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध होने का दावा करती है. जो न्याय की बात करती है और जिसका ध्येय एक ऐसे विश्व का निर्माण है जहां शांति हो. लेकिन दुनिया में शांति को स्थापित करने की लालसा पालने वाली ये संस्था अपने संस्थान में ही छेड़खानी और बलात्कार से उठने वाली चीखों को या तो सुन नहीं पाई या उसने सुनकर भी अनसुना कर दिया. एक महिला कर्मचारी सालों तक संस्था में कथित तौर पर छेड़खानी और दुष्कर्म का शिकार होती रहीं लेकिन प्रबंधन के कान पर जू तक नहीं रेंगी. उसने प्रबंधन से छेड़खानी और दुष्कर्म करने वाले की शिकायत की. उन्हें कई बार मेल किया, कार्रवाई करने की विनती की, लेकिन संस्था ने उन शिकायतों को कूड़े के ढेर पर फेंक दिया. उसने आरोपों की जांच कराने तक की सुध नहीं ली. सबसे शर्मनाक और चौंकाने वाला तथ्य तो ये है कि मेघना का मामला अपवाद नहीं है. ‘तहलका’ ने अपनी पड़ताल में पाया कि ग्रीनपीस में मेघना जैसी तमाम कर्मचारी हैं जो ग्रीनपीस इंडिया के अलग-अलग दफ्तरों में छेड़खानी और हाल में अस्तित्व में आए नए रेप कानून के तहत बलात्कार बने इस कृत्य का शिकार हुई हैं. लेकिन इन सभी के साथ भी संस्था ने वही सलूक किया जो मेघना के साथ किया था.

 ग्रीनपीस की इन पूर्व पीड़ित कर्मचारियों से बातचीत करने पर पता चलता है कि कैसे संस्था के भीतर लंबे समय से स्त्री विरोधी माहौल है. जहां छेड़खानी और महिलाओं को लेकर तंग नजरिया बेहद आम है. उतना ही आम है इनको लेकर संस्था का रवैया. अपने ही दफ्तरों में हुए महिला उत्पीड़न के खिलाफ कदम उठाने में ग्रीनपीस इंडिया पूरी तरह नाकाम रही है. उसने कभी यौन उत्पीड़न को यौन उत्पीड़न न मानकर आरोपी को माफ करने या फिर दूसरा मौका देने के लिए कहा, तो कभी पुरुष कर्मचारियों की भद्दी टिप्पणियों को ‘हार्मलेस जोक’ ठहराया.

मेघना इसके पीछे ग्रीनपीस के वर्क कल्चर को दोष देती हैं. वो कहती हैं, ‘ग्रीनपीस का वर्क कल्चर ही ऐसा है. अनौपचारिक व्यवहार के नाम पर पुरुष कर्मचारी अनुचित छूट लेते हैं. शुरुआत छोटे-छोटे मजाक से होती है जिन पर अमूमन लड़कियां प्रतिक्रिया नहीं करतीं पर बात धीरे-धीरे बढ़ते हुए कंधे पर हाथ रखने, जबरन हाथ पकड़ने और जबरदस्ती नजदीक आने की कोशिशों में बदल जाती है.’

 एक अन्य पीड़िता सीमा अपनी व्यथा साझा करते हुए कहती हैं, ‘साल 2०11 की बात है. मेरे साथ संस्था के एक वरिष्ठ अफसर ने शराब के नशे में बदतमीजी की. उस समय संस्थान के तमाम वरिष्ठ लोग वहां मौजूद थे. किसी ने उसको न रोका न ही विरोध किया. मैंने इसकी शिकायत दर्ज करवाई पर बाद में पता चला कि एचआर मैनेजर ने इसे यौन उत्पीड़न की श्रेणी में ही नहीं रखा था. इसके बाद ऐसी किसी घटना के दोहराव के डर से मैंने दफ्तर की किसी भी पार्टी या कार्यक्रम में जाना ही बंद कर दिया.

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पढ़ें: ‘मामला आगे बढ़ाया तो ग्रीनपीस  को एक वालंटियर कम होने से कोई  फर्क नहीं पड़ेगा’
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संस्था के वर्क कल्चर के बारे में बताते हुए मेघना कहती हैं, ‘वहां हाईस्कूल की क्लास जैसा माहौल है, जहां किसी भी महिला का पुरुष सहयोगी से बात करना, उसके साथ कॉफी पी लेना, कही बाहर चले जाना, नई-नई अफवाहों को जन्म दे देता है. वहां आपके ड्रेसिंग सेंस से लेकर आपकी शारीरिक बनावट तक पर टिप्पणियां की जाती हैं, अश्लील द्विअर्थी मजाक होते हैं. ऐसे माहौल में उन्हें आगे बढ़ने का हौसला तब मिल जाता है जब इसकी शिकायत पर इसे ‘हार्मलेस जोक’ कहकर टाल दिया जाता है. वहां सिर्फ कागजों में महिला अपराधों के मामले में जीरो टॉलरेंस की बात की गई है, पर ऐसा कभी अमल में नहीं लाया गया. महिलाओं का शराब पीना उनके लिए अजूबे की तरह है और सड़कछाप, जाहिल लोगों की तरह वे शराब पीने, दोस्तों के साथ पार्टी करने वाली लड़कियों को आसानी से उपलब्ध समझने लगते हैं.’

‘वहां आपके ड्रेसिंग सेंस से लेकर आपकी शारीरिक बनावट तक पर लगातार टिप्पणियां की जाती हैं. इसकी शिकायत पर इसे ‘हार्मलेस जोक’ कहकर टाल दिया जाता है’

ग्रीनपीस इंडिया की एक पूर्व कर्मचारी कहती हैं, ‘इन मामलों के बारे में संस्थान को भनक भी होती है पर जिन ‘वेल एजुकेटेड’ व्यक्तियों के खिलाफ ये असंतुष्टि थी वे उच्च पद पर थे तो उन्हें कोई क्यों और कैसे नाराज करना चाहेगा!’ महिला उत्पीड़न के लेकर संस्था के नजरिए पर चर्चा करते हुए एक पीड़िता कहती हैं, एक बार जब एक वालंटियर ने अपने सहकर्मी पर यौन प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए उसे कड़ी सजा की मांग की तब उसे जवाब मिला कि जो सजा मिली है वो ठीक है. (सजा के नाम पर उसे संस्थान से साल भर के लिए बैन करने की बात कही गई थी.) प्रबंधन का कहना था कि आरोपी ने उन्हें ये विश्वास दिलाया है कि वो आगे से ऐसा नहीं करेगा. लेकिन अगर तुम मामला आगे ले जाओगी तो ग्रीनपीस को एक वालंटियर के जाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा.’

 इन महिलाओं से हुई बातचीत को आधार मानें तो पिछले कुछ सालों में ग्रीनपीस इंडिया में महिला उत्पीड़न की तमाम घटनाएं हुई हैं. कुछ मामले प्रकाश में आए जहां महिलाओं ने आगे बढ़कर प्रबंधन से इनके खिलाफ शिकायत की. लेकिन उन मामलों की संख्या और ज्यादा है जहां नौकरी की मजबूरी के चलते महिलाओं ने चुप रहना बेहतर समझा. क्योंकि ऐसे भी कई मामले संस्थान में हुए जहां सवाल उठाने पर किसी महिलाकर्मी को इस कदर प्रताड़ित किया गया कि उसे अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी. जबकी उसी समय जिन लोगों पर आरोप थे वे बेतकल्लुफी से वहां काम करते रहे.

 ऐसी ही कहानी कीर्ति की है. कीर्ति ने इस एनजीओ में हुए शारीरिक उत्पीड़न के मामलों को जब सीनियर मैनेजमेंट टीम के सामने उठाया तो उन्हें पागल और मानसिक रूप से असंतुलित करार देते हुए नौकरी से निकालने की धमकी दी गई. उनके अनुसार, ‘उन्होंने मेरी निजी जिंदगी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आपके जीवन में सब ठीक नहीं चल रहा इसलिए आपको हर पुरुष से परेशानी है. कौन छेड़ेगा आपको!’ वह कहती हैं, ‘मामला मेरा नहीं उन बच्चियों का था पर उनका उद्देश्य बस मेरी बेइज्जती करना था. मेरे मैनेजर ने सरेआम मुझ पर चिल्लाते हुए कहा कि 47 साल की उम्र में आपको पता होना चाहिए कि आपके पास नौकरी के क्या विकल्प हैं! वो कहना चाहता था कि अगर मैं वहां पर बनी रहना चाहती हूं तो मुझे अपने काम से काम रखना चाहिए. पर फिर भी मैंने ये शिकायत ग्रीनपीस के बोर्ड तक पहुंचाई, जहां उन्होंने (समित एच) साफ झूठ बोल दिया कि यौन शोषण का कोई मामला नहीं हुआ है. इसके बाद मुझे मानसिक रोगी करार देते हुए इस्तीफा देने को मजबूर कर दिया गया. प्रबंधन ने अगर तब यौन शोषण के उन मामलों को गंभीरता से लेते हुए कथित आरोपियों के खिलाफ कड़े कदम उठाए होते तो बलात्कार की दुर्भाग्यपूर्ण घटना होती ही नहीं. पुरुष सहकर्मियों को पहले से ही एक चेतावनी मिल गई होती पर ऐसा हुआ नहीं.’

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पढ़ें: ग्रीनपीस के एक वालंटियर का इंटरनेशनल हेड कुमी को भेजा गया ई-मेल
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एक पीड़िता कहती हैं, ग्रीनपीस ने मार्च 2015 में अपनी आतंरिक शिकायत समिति में यौन प्रताड़ना से जुड़े कुछ मामलों को उठाया तो सही लेकिन किसी पीड़िता से कोई बात नहीं की. बाद में पता चला कि उन्होंने आरोपियों को पीड़िताओं से क्षमा मांगने का कहकर मामले को रफा-दफा कर दिया गया. मामले पर नवनियुक्त अंतरिम कार्यकारी निदेशक विनुता गोपाल सफाई देते हुए कहती हैं, ‘आतंरिक प्रक्रियाओं में बहुत चूक हुई है.’

 ग्रीनपीस ने फरवरी में मेघना के फेसबुक पोस्ट के बाद प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपनी गलती मान पीड़िता से माफी मांगी है और जांच करवाने की बात भी कही है. जून में उनकी वेबसाइट पर लिखे गए एक ब्लॉगपोस्ट में भी कमोबेश यही बातें कही गई हैं. इसमें लिखा है कि अब हमारा उद्देश्य खुद में बदलाव लाना है, हमें ग्रीनपीस इंडिया का कल्चर बदलना है और ख्याल रखना है कि आगे से ऐसी कोई शिकायत न हो. पर फिर भी अगर दुर्भाग्य से कभी ऐसा हुआ तो हमारी पूरी कोशिश रहेगी कि संबंधित व्यक्ति को न्याय मिले. ग्रीनपीस की बात पर भरोसा तो किया जा सकता है पर गौर करने वाली बात ये रहेगी कि जिसे ग्रीनपीस ‘नैतिक जिम्मेदारी’ लेना कह रहा है, ये फजीहत से बचने के लिए किया गया ‘डैमेज कंट्रोल’ न हो!

(सभी पीड़िताओं के नाम बदले गए हैं.)

जंग से तंग

Arvind Graphic

‘दिल्ली के साथ केंद्र जो सौतेला व्यवहार कर रहा है वो ठीक नहीं है. इसे रोकें. एक तरफ तो इनकम टैक्स और सेल्स टैक्स पर बैठ जाते हैं. इसका जायज शेयर नहीं देते. ऊपर से जब हम बस स्टॉप, बस डिपो या नए अस्पताल खोलने के लिए जमीन मांगते हैं तो कहतें हैं, 10 करोड़ रुपये प्रति एकड़ में ले लो. चार करोड़ रुपये प्रति एकड़ में ले लो. ये जो समस्या है वो बहुत गंभीर है. इसकी ओर ध्यान दिलाना जरूरी है. दिल्ली का हक मांग रहे हैं. दिल्ली के हक के लिए आवाज उठाते रहेंगे. हम कोई खैरात थोड़े मांग रहे हैं लेकिन कोई बात नहीं हम यह भी जानते हैं  कि न रहबर से मिलेगा न, रहगुजर से मिलेगा, ये हमारे पांव का कांटा है हम ही से निकलेगा’

25 जून की शाम आम आदमी पार्टी सरकार का पहला बजट पेश करते हुए दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने ये बातें विधानसभा में कहीं. साल 2015-16 के लिए 41,129 करोड़ रुपये के प्रावधान वाले बजट को पेश करते हुए सिसोदिया करीब एक घंटे तक सदन में बोले लेकिन उनके भाषण के कुछ शुरुआती मिनटों में ही यह साफ हो गया कि मौजूदा केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के बीच सब कुछ सामान्य नहीं है. देश में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तल्खी और तनातनी कोई नई बात नहीं है. फिर दिल्ली में तो ऐसी तल्खी बेहद आम बात है, क्योंकि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल नहीं है. दिल्ली सरकार के इतिहास में पहले भी ऐसा कई बार हो चुका है जब मुख्यमंत्रियों ने इस बात की शिकायत की है कि पूर्ण राज्य का दर्जा न होने की वजह से वो जनता के लिए ठीक से काम नहीं कर पा रहे हैं. हमेशा से ऐसे आरोप-प्रत्यारोप के केंद्र में दिल्ली के उप राज्यपाल रहे हैं. हम यहां जिस विवाद की चर्चा कर रहे हैं उसके केंद्र में भी दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग हैं.

विवाद को लेकर उप राज्यपाल और मुख्यमंत्री राष्ट्रपति और गृहमंत्री से मिले व अपना-अपना पक्ष रखा. लेकिन मामला अभी भी थमा नहीं है

मई के दूसरे सप्ताह से दिल्ली सरकार और उप राज्यपाल के बीच तनातनी बनी हुई है. हालिया विवाद उस वक्त शुरू हुआ जब दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव केके शर्मा दस दिन की छुट्टी पर गए. शर्मा के छुट्टी पर जाने के बाद उप राज्यपाल ने ऊर्जा सचिव शकुंतला गैमलिन को कार्यकारी मुख्य सचिव नियुक्त कर दिया. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस नियुक्ति को असंवैधानिक करार देते हुए उप राज्यपाल को चिट्ठी लिखी. चिट्ठी में केजरीवाल ने कहा, ‘आपने चुनी हुई सरकार को नजरअंदाज किया है. आप एक संवैधानिक पद पर हैं. आप पर चाहे जैसा दबाव हो, आपको संविधान के मुताबिक काम करना चाहिए.’ इस चिट्ठी में केजरीवाल ने शकुंतला की नियुक्ति को लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को प्रभावहीन करने की कोशिश बताया है. इस मामले में उप राज्यपाल की तरफ से जारी बयान में यह कहा गया कि नियमों के मुताबिक मुख्य सचिव के पद को 35 घंटे से ज्यादा खाली नहीं रखा जा सकता. इसी के चलते जब दिल्ली सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया तो उन्होंने कार्यवाहक मुख्य सचिव के पद पर वरिष्ठता के हिसाब से शकुंतला गैमलिन की नियुक्ति कर दी. केजरीवाल ने शकुंतला को पद ग्रहण करने से मना किया लेकिन उन्होंने पद ग्रहण किया. शकुंतला के पद ग्रहण करने के साथ मामला थमा नहीं बल्कि हर रोज बढ़ता गया.

16 मई को अरविंद केजरीवाल ने शकुंतला की नियुक्ति का आदेश निकालने वाले प्रधान सचिव (सेवा) अनिंदो मजूमदार को उनके पद से हटाकर उनका कामकाज प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार को सौंप दिया. उसी दिन उप राज्यपाल ने मुख्यमंत्री के इस आदेश को खारिज कर मजूमदार को अपने पद पर बने रहने का आदेश दिया. उप राज्यपाल का तर्क था कि इस फैसले के बाबत मुख्यमंत्री ने उनसे सलाह-मशविरा नहीं किया था. अगले दिन मजूमदार दिल्ली सचिवालय स्थित अपने दफ्तर पहुंचे तो वहां उन्हें ताला लगा मिला. जानकारी मिली की मुख्यमंत्री के आदेश से उनके दफ्तर में ताला लगाया गया है. यहां से शुरू हुआ विवाद राष्ट्रपति भवन, गृह मंत्रालय से होता हुआ कोर्ट-कचहरियों तक पहुंचा. दिल्ली के मुख्यमंत्री और उप राज्यपाल बारी-बारी से राष्ट्रपति और गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिले. दोनों ने अपना पक्ष रखा. फिर भी मामला थमा नहीं. समय के साथ-साथ इस तनाव ने राजनीतिक रंग भी ले लिया. दिल्ली की सत्ता संभाल रही आम आदमी पार्टी और केंद्र की सत्ता पर काबिज भाजपा आमने-सामने आ गए. टीवी स्टूडियो में होने वाले बहसें तेज हुईं और दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगे.

मनीष सिसोदिया ने इस मसले पर मीडिया से बात करते हुए कहा कि केंद्र की भाजपा सरकार उप राज्यपाल के जरिए जनता द्वारा चुनी गई सरकार का तख्ता पलट करवाना चाह रही है. वहीं केजरीवाल ने ट्विटर पर दिल्ली वालों से पूछा कि क्या दिल्ली के मुख्यमंत्री को अपने हिसाब से एक अधिकारी तक रखने का अधिकार नहीं है. उप राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच जारी टकराव का दूसरा राउंड तब शुरू हुआ जब केजरीवाल ने भ्रष्टाचार निरोधी शाखा (एसीबी) की निर्भरता दिल्ली पुलिस पर से खत्म करने की कोशिश के तहत बिहार से एसीबी में अधिकारी शामिल करने की इच्छा जताते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से संपर्क किया. बिहार सरकार ने दिल्ली सरकार की तरफ से की गई इस मांग को मंजूरी दे दी और बिहार पुलिस के तीन निरीक्षक और दो उप निरीक्षक दिल्ली सरकार के एसीबी में शामिल होने के लिए दिल्ली आ गए लेकिन उप राज्यपाल ने मुख्यमंत्री के इस आदेश को भी खारिज कर दिया. उनका कहना है कि एसीबी दिल्ली पुलिस का ही एक हिस्सा है. इस नाते एसीबी से जुड़ा कोई भी फैसला मुख्यमंत्री अकेले नहीं ले सकते. मुख्यमंत्री का फैसला निरस्त करने के बाद उप राज्यपाल ने एसीबी पर अपना अधिकार साबित करने की मंशा से दिल्ली पुलिस के एक संयुक्त आयुक्त मुकेश मीणा को एसीबी का प्रमुख बना दिया. इस पर दिल्ली सरकार की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया जताई गई.

‘उप राज्यपाल केंद्र की शह पर काम कर रहे हैं, जो पूरी तरह से असंवैधानिक है. ऐसी हालात में एक निर्वाचित सरकार के लिए काम करना मुश्किल होगा’

 फिलहाल दिल्ली में एसीबी के दो प्रमुख हैं. एक हैं- मुख्यमंत्री की ओर से नियुक्त एसीबी प्रमुख एसएस यादव  और दूसरे हैं मुकेश कुमार मीणा, जिनकी नियुक्ति उप राज्यपाल ने की थी. इस मामले को लेकर दिल्ली सरकार हाई कोर्ट तक पहुंच गई है. सरकार की तरफ से दायर याचिका में कहा गया है कि एसीबी में संयुक्त आयुक्त के पद का कोई प्रावधान नहीं है. सरकार के मुताबिक जब ऐसे किसी पद का प्रावधान ही नहीं है, तो एसीबी में  संयुक्त आयुक्त के पद पर मीणा की नियुक्ति गैरकानूनी और असंवैधानिक है. याचिका में दिल्ली सरकार ने ये दलील भी दी है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ पहले ही एसीबी में हवाला के आरोपों की जांच चल रही हो, उसे कैसे एसीबी का सर्वेसर्वा बनाया जा सकता है. हालांकि हाई कोर्ट ने कह दिया है कि मामले की अगली सुनवाई तक मीणा पद पर बने रहेंगे. मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त को होगी. उसी दिन फैसला होगा कि वह पद पर बने रहेंगे या नहीं.

उप राज्यपाल और दिल्ली सरकार के बीच पिछले एक महीने से चल रही रस्साकशी पर जस्टिस काटजू का कहना है, ‘उप राज्यपाल पूरी तरह से केंद्र की शह पर काम कर रहे हैं, जो गलत ही नहीं पूरी तरह से असंवैधानिक है. ऐसी हालात मे एक निर्वाचित सरकार के लिए काम करना मुश्किल होगा. सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी इस मामले में जीएनसीटी एक्ट (गवर्नमेंट ऑफ एनसीटी एक्ट) 1991 की 42वीं धारा का हवाला देते हुए कहते हैं, ‘जिन मुद्दों पर दिल्ली विधानसभा को कानून बनाने का अधिकार नहीं है वहां उप राज्यपाल अपने विवेक से काम कर सकते हैं. दिल्ली में ऐसे दो मुद्दे हैं. पहला जमीन और दूसरा पुलिस. इन दोनों जगहों पर उप राज्यपाल अपने विवेक से फैसला ले सकते हैं, लेकिन मुख्य सचिव की नियुक्ति का मामला उनके विशेषाधिकार में नहीं आता है. विधान मंडल की सिफारिश के आधार पर ही ऐसे मामलों में उप राज्यपाल को फैसला लेना चाहिए.’

दूसरी तरफ आप के पूर्व मार्गदर्शक रहे वरिष्ठ वकील अधिवक्ता शांति भूषण का मानना है कि अरविंद केजरीवाल बिना वजह इस लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं. मीडिया से हुई एक बातचीत में शांति भूषण कहते हैं, ‘केजरीवाल या तो यह समझ नहीं पा रहे या समझना नहीं चाहते कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं, बल्कि केंद्र शासित प्रदेश है. संविधान की धारा 239 में स्पष्ट है कि केंद्र शासित प्रदेश का शासन, केंद्र की चुनी हुई सरकार उप राज्यपाल के माध्यम से करेगी. स्थानीय शासन को, विधायकों को कोई अधिकार नहीं है. उन्हें सिर्फ यही अधिकार है कि जो फैसला वह लें उसे उप राज्यपाल को भेजें. अगर उप राज्यपाल को सही लगेगा तो वह लागू होगा, वरना वो मामले को केंद्र को भेज सकते हैं. केंद्र के फैसला लेने तक मामले में उप राज्यपाल के निर्देश लागू होंगे. आज जो स्थिति है उसमें केंद्र सरकार जब चाहे तब राष्ट्रपति शासन लगा सकती है, विधानसभा को भंग कर सकती है. केंद्रीय गृह मंत्रालय पहले ही एक गजट अधिसूचना लाकर यह साफ कर चुका है कि इस लड़ाई में उप राज्यपाल का पक्ष जायज है.’ इस मसले पर केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यह साफ किया है, ‘दिल्ली में शक्तियों के बंटवारे को लेकर पैदा विवाद राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक मुद्दा है.’

हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि महीने भर पहले अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले से शुरू हुआ विवाद आज पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है. इस लड़ाई में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का समर्थन पहले ही मिल चुका है. अगर राजनीतिक दलों की बात करें तो सीपीएम नेता सीताराम येचुरी और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख अजय माकन इस मसले पर दिल्ली के मुख्यमंत्री के साथ खड़े दिख रहे हैं. अजय माकन का कहना है, ‘लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार के मत का सम्मान होना चाहिए. अधिकारियों की नियुक्ति में मुख्यमंत्री का अधिकार होना चाहिए. उप राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच समुचित तालमेल होना चाहिए.’ वहीं सीपीएम नेता सीताराम येचुरी का मानना है, ‘केंद्र को राज्यों के अधिकार का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए. अगर केंद्र उप राज्यपाल के जरिए राज्य सरकार के अधिकारों में अतिक्रमण करेगा तो यह गलत है. हम इसका विरोध करते हैं.’

इस लड़ाई में नीतीश कुमार और ममता बनर्जी का समर्थन पहले ही केजरीवाल को मिल चुका है. माकपा और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस भी साथ दिख रहे हैं

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप राज्यपाल नजीब जंग के बीच छिड़ी लड़ाई पर सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटी (सीएसडीएस) में एसोसिएट प्रोफेसर अभय कुमार दुबे का मानना है, ‘भाजपा दिल्ली में उप राज्यपाल के मार्फत शासन करना चाह रही है जिसका अधिकार उसे जनता ने दिया ही नहीं है. भाजपा बड़ी गलती कर रही है. जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को उप राज्यपाल के जरिए जिसे, खुद केंद्र की सरकार कुर्सी पर बिठाती है इस कदर परेशान करना ठीक बात नहीं है. जो संदेश दिल्ली और देश के बाकी हिस्सों में जा रहा है वह यह है कि नरेंद्र मोदी सरकार अरविंद केजरीवाल को काम नहीं करने दे रही है.’

अभय दुबे इस लड़ाई का असर बिहार में होने वाली विधानसभा चुनाव में भी देख रहे हैं. वो कहते हैं, ‘बिहार में चुनाव होने हैं. आप के नेता पहले ही यह कह चुके हैं कि वो बिहार चुनाव में भाजपा के विरोध में प्रचार करेंगे. कल्पना कीजिए एक तरफ भाजपा के नेता चुनाव प्रचार के दौरान केंद्र की ‘सुशासन सरकार’ पक्ष में गीत गाएंगे और उसी बिहार में आप के नेता ये बताएंगे कि दिल्ली में इसी ‘सुशासन सरकार’ ने जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को किस-किस तरह से परेशान किया. नतीजा आप खुद सोच लीजिए.’ राजनीति से इतर जब हम अभय कुमार दुबे से यह जानने की कोशिश करते हैं कि इस लड़ाई में क्या सारी गलती एक ही पक्ष यानी उप राज्यपाल की है. अरविंद केजरीवाल भी तो सहयोग के लिए तैयार नहीं दिखते. फिर दिल्ली में न तो पहली बार उप राज्यपाल का पद बना है और न ही पहली बार कोई मुख्यमंत्री चुनकर आया है. इस सवाल के जवाब में वह कहते हैं, ‘बिल्कुल सही कह रहे हैं आप. ये दोनों पद लंबे समय से दिल्ली में हैं और यह भी सच है कि इनके बीच अधिकारों को लेकर खींचतान पहले भी होते रहे हैं. अरविंद से पहले भी कई मुख्यमंत्रियों ने यह कहा है कि उप राज्यपाल की वजह से उनके हाथ बंधे हुए हैं लेकिन उन्होंने कभी अपने अधिकारों के लिए लड़ाई नहीं लड़ी. अरविंद लड़ रहे हैं. इनकी स्थिति बाकी के मुख्यमंत्रियों से अलग है. वो जन आंदोलन से निकले हैं. इन्हें जनता को हमेशा यह संदेश देना होगा कि वो जनता के लिए सभी से लड़ रहे हैं. जनता की उम्मीदें बहुत बड़ी हैं और उसे पूरा करने के लिए इन्हें अधिकार भी चाहिए. ये बाकी मुख्यमंत्रियों की तरह केवल ‘हाथ बंधे हैं’ जैसा बयान देकर चुप नहीं बैठ सकते.’

आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष यह मानने को कतई तैयार नहीं हैं कि इस लड़ाई से दिल्ली में जनता के काम प्रभावित हो रहे हैं

अरविंद केजरीवाल के साथी रह चुके प्रो. आनंद कुमार ऐसा नहीं मानते हैं कि सब मिलकर अरविंद केजरीवाल को परेशान कर रहे हैं. वह कहते हैं, ‘दिल्ली के मुख्यमंत्री को उप राज्यपाल के साथ मेलजोल बनाकर ही काम करना होता है. यह पूर्ण राज्य नहीं है. यहां अधिकार बंटे हुए हैं. अरविंद को हमेशा टकराव की भूमिका में नहीं रहना चाहिए. कोई भी मुख्यमंत्री दिल्ली में बिना उप राज्यपाल के सहयोग के शासन नहीं कर पाएगा.’ हालांकि आप के प्रवक्ता आशुतोष इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं हैं कि अरविंद केजरीवाल, नजीब जंग से टकराव मोल ले रहे हैं. इस बारे में वो कहते हैं, ‘सरकार क्यों उप राज्यपाल से टकराव चाहेगी? लेकिन वे दिल्ली सरकार के अधिकारों का हनन करेंगे तो सरकार चुप कैसे रह जाएगी?हमने जनता से वोट लिया है. हमने वायदे किए हैं. कल हमें चुनाव में फिर से जाना है. हम दिल्ली में एक साफ-सुथरी सरकार देने का वायदा करके आए हैं और सबसे बड़ी बात दिल्ली की जनता ने अरविंद केजरीवाल को चुना है और मुख्यमंत्री बनाया है.’ यह पूछने पर कि इस टकराव से ही दिल्ली की जनता के लिए मुश्किलें खड़ी हो रही हैं. जनता के हित के कई काम रुके  हैं. सफाई कर्मियों को समय से वेतन नहीं मिल पाया. उन्हें हड़ताल करना पड़ा. इसके जवाब में वे कहते हैं, ‘कोई काम रुका नहीं है. देखिए, एक के बाद एक कई काम हो रहे हैं. महिलाओं की सुरक्षा के लिए दिल्ली की हर बस में मार्शल्स तैनात किए जा रहे हैं. बजट सरकार पेश कर चुकी है. सरकार काम भी कर रही है और अपने अधिकारों के लिए केंद्र सरकार और उप राज्यपाल से लड़ भी रही है.’

बहरहाल इस खींचतान को शुरू हुए एक महीना हो गया है, लेकिन अभी तक यह साफ नहीं है कि ऊंट किस करवट बैठेगा. उप राज्यपाल की तरफ से जो बयान आते हैं उसमें वो अपने फैसलों को सही ठहराते हैं. वहीं दिल्ली सरकार की तरफ से जो बयान दिए जाते हैं उसमें दिल्ली सरकार और मुख्यमंत्री के फैसलों को सही ठहराया जाता है.

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tomarफर्जी डिग्री और ‘आप’ के फर्जी वायदे

आठ जून की सुबह दिल्ली के तत्कालीन कानून मंत्री और आम आदमी पार्टी के विधायक जितेंद्र सिंह तोमर को दिल्ली पुलिस ने फर्जी डिग्री मामले में गिरफ्तार किया. फिलहाल तोमर न्यायिक हिरासत में हैं और मामला अदालत के समक्ष है. गिरफ्तारी के अगले दिन तोमर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. आप ने तोमर के इस्तीफे के बाद करावल नगर से विधायक कपिल मिश्रा को दिल्ली का नया कानून मंत्री बनाया है. तोमर के फर्जी डिग्री मामले को जिस तरीके से पार्टी और खुद अरविंद केजरीवाल ने हैंडल किया उससे यह साफ हो जाता है कि पार्टी द्वारा राजनीति को बदलने के बारे में जो-जो कहा गया वो शायद एक जुमला भर था. इस मामले में तोमर की गिरफ्तारी तक पूरी पार्टी और खुद केजरीवाल बार-बार यह कहते रहे कि केंद्र की भाजपा सरकार दिल्ली पुलिस के जरिए उनके नेता को बिना वजह गिरफ्तार करवा रही है.

केजरीवाल ने खुद कई मौकों पर यह कहा कि तोमर की डिग्रियां सही हैं. उन्होंने उसकी जांच कर ली है. उसमें कुछ भी गलत नहीं है. लेकिन जब जितेंद्र तोमर की गिरफ्तारी हुई और पुलिस की शुरुआती जांच से यह लगने लगा कि उनकी डिग्रियों में कुछ बड़ा झोल है तो 23 जून को विधानसभा में बोलते हुए केजरीवाल ने कहा कि तोमर ने उन्हें भी अंधेरे में रखा. वहीं केजरीवाल के पुराने साथी योगेंद्र यादव ने 28 जून को मीडिया से बात करते हुए यह दावा किया कि अंधेरे में रखने वाली बात गलत है. केजरीवाल को पहले दिन से इस बात की जानकारी थी. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा अंधेरे में रखने की जो बात कही गई है वो असल में किसी के भी गले नहीं उतर रही. अभय कुमार दुबे इस बात को सिरे से खारिज करते हैं कि इतनी बड़ी बात अरविंद से कोई छुपा भी सकता है. वो कहते हैं, ‘इस मामले में मैं केजरीवाल को सौ फीसदी दोषी मानता हूं. अंधेरे में रखने वाली बात समझ ही ही नहीं आ रही. मैं यह मान ही नहीं सकता कि उन्हें कोई अंधेरे में रख रहा हो और वो पार्टी से टिकट पा जाए. चुनाव जीत जाए और तो और कानून मंत्री भी बन जाए. इस मामले में ऐसा लगता है कि केजरीवाल ने सब कुछ जानते-समझते हुए भी अपनी आंखे बंद रखी.’ जितेंद्र तोमर जेल में हैं. मामला अदालत के सामने है. क्या सही और क्या गलत का फैसला भी अदालत से ही होगा. दिल्ली को नया कानून मंत्री मिल चुका है. विपक्षी दल भाजपा और कंग्रेस हर रोज इस मसले पर कोई न कोई प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजनीति में आने के दौरान और चुनाव लड़ने के दौरान अरविंद केजरीवाल ने जिस राजनीतिक शुचिता की दुहाई बार-बार दी और वो इस मामले में ताक पर रखते नजर आए.

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उप राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच की रस्साकशी

घटनाक्रम : उप राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच की रस्साकशी

  • 16/05/15:  दिल्ली के मुख्य सचिव केके शर्मा छुट्टी पर गए. उप राज्यपाल ने शकुंतला गैमलिन को कार्यवाहक मुख्य सचिव बनाया. केजरीवाल ने इसे नकारते हुए गैमलिन को चार्ज नहीं लेने को कहा. केजरीवाल परिमल राय को कार्यवाहक मुख्य सचिव बनाना चाहते थे. लेकिन वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शकुंतला गैमलिन ने सुबह दफ्तर पहुंच कर औपचारिक तौर पर कामकाज संभाल लिया.
  • 17/05/15:  केजरीवाल ने कहा गैमलिन बिजली कंपनियों के लिए लॉबिंग करती थीं, इसलिए सरकार का उन पर भरोसा नहीं. गैमलिन की नियुक्ति को मंजूरी देने वाले अधिकारी अनिंदो मजूमदार को सचिव (सेवा) के पद से हटाकर उनका कामकाज प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार को दिया. प्रधान सचिव के पद पर राजेंद्र कुमारी की नियुक्ति के एक घंटे बाद ही उप राज्यपाल ने आदेश नामंजूर कर दिया
  • 18/05/15:  उप राज्यपाल से विवाद के बाद केजरीवाल ने अनिंदो मजूमदार को फिर बहाल कर दिया. एक रैली में उन्होंने केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि गैमलिन के काम पर नजर रखेंगे
  • 19/05/15:  मंगलवार को राष्ट्रपति से मिलकर केजरीवाल ने उप राज्यपाल की शिकायत की. केजरीवाल ने अरविंद राय को प्रशासनिक विभाग का प्रधान सचिव बनाया. इससे पहले अरविंद राय के पास प्रशासनिक विभाग का अतिरिक्त चार्ज था. उप राज्यपाल ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह से की मुलाकात. उधर, केजरीवाल के समर्थन में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि मुख्य सचिव की नियुक्त मुख्यमंत्री का अधिकार. उन्होंने केंद्र सरकार को जनमत का सम्मान करने की सलाह दी
  • 20/05/15:   उप राज्यपाल ने गृहमंत्री से सलाह के बाद राज्य सरकार द्वारा पिछले चार दिनों में की गई सभी नियुक्तियों को रद्द कर दिया. इस पर केजरीवाल ने खुलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार के ऊपर भी आरोप लगाए. दिल्ली में तैनात 83 आईएएस अफसरों में से केजरीवाल ने 39 अफसरों की सूची तैयार कर केंद्र सरकार से उन्हें हटाने को कहा
  • 22/05/15:   केंद्र सरकार ने विवाद में दखल देते हुए नोटिफिकेशन जारी कर एलजी को सुप्रीम बता दिया. संविधान के अनुच्छेद 293एए (69वां संशोधन अधिनियम, 1991) का दिया हवाला. केजरीवाल ने कहा कि उनकी लड़ाई उपराज्यपाल से नहीं, बल्कि पीएम नरेंद्र मोदी से है. केजरीवाल ने कहा कि केंद्र दिल्ली सरकार की कार्रवाई से डर गया है, इसलिए वे भ्रष्ट कर्मचारियों को बचाना चाहता है
  • 23/05/15:   कानूनी विशेषज्ञों से केजरीवाल ने सलाह ली. कई केजरीवाल के पक्ष में तो कई उप राज्यपाल से सहमत दिखे. केंद्र के नोटिफिकेशन के बाद अनिंदो मजूमदार ने दिल्ली में फिर से प्रधान सचिव (सेवा) का कामकाज संभाला. केजरीवाल ने केंद्र के नोटिफिकेशन के मामले को अदालत में ले जाने के संकेत दिए.
  • 25/05/15:   हाई कोर्ट ने माना कि 21 मई को जारी की गई गृह मंत्रालय की अधिसूचना ‘संदिग्ध’ है. फैसला दिया कि एसीबी के पास पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार करने का अधिकार है. कोर्ट ने एक हेड कांस्टेबल की याचिका को खारिज कर दिया जिसे एसीबी ने भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार किया था
  • 27/05/15:   केंद्र ने उच्चतम न्यायालय में दिल्ली हाई कोर्ट  के  फैसले को चुनौती दी
  • 01/06/15:   बिहार पुलिस के पांच कर्मचारी एसीबी में शामिल हो गए. केजरीवाल ने बिहार सरकार से इस बाबत मदद मांगी थी
  • 02/06/15:   इस नियुक्ति को उप राज्यपाल ने खारिज कर दिया
  • 06/06/15:   एसीबी ने 2002 के 100 करोड़ रुपये के कथित सीएनजी फिटनेस घोटाले की जांच दोबारा शुरू की
  • 08/06/15:   उप राज्यपाल नजीब जंग ने दिल्ली पुलिस के एक संयुक्त आयुक्त एमके मीणा को एसीबी का प्रमुख नियुक्त कर दिया. अभी तक इस पद पर एसएस यादव कार्यरत थे. यादव की नियुक्ति मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने की थी
  • 09/06/15:   उप राज्यपाल द्वारा नियुक्त भ्रष्टाचार निरोधी शाखा (एसीबी) प्रमुख मुकेश मीणा को दिल्ली सरकार ने पदग्रहण करने से रोका. मीणा की एसीबी में नियुक्ति करने वाले दिल्ली के गृह सचिव धर्मपाल के तबादले का आदेश दिल्ली सरकार ने दिया लेकिन उप राज्यपाल ने इस आदेश को नामंजूर कर दिया
  • 15/06/15:   मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात कर उप राज्यपाल नजीब जंग से सरकार के टकराव पर चर्चा की
  • 26/06/15:   दिल्ली सरकार द्वारा एसीबी के प्रमुख बनाए गए  एसएस यादव ने उप राज्यपाल द्वारा नियुक्त मुकेश मीणा पर धमकी देने, दबाव डालने और सरकारी कामकाज को बाधित करने का आरोप लगाया
  • 28/06/15:   दिल्ली सरकार ने राज्यपाल द्वारा एमके मीणा को एसीबी का प्रमुख बनाए जाने को उच्च न्यायालय में चुनौती दी
  • 29/06/15:    उच्च न्यायालय ने मीणा की नियुक्ति को चुनौती देने वाली दिल्ली सरकार की याचिका पर कहा कि वह एसीबी के प्रमुख अगली सुनवाई तक बने रहेंगे. हाई कोर्ट ने इस मामले में केंद्र को नोटिस भेजकर जवाब मांगा. मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त को होगी

अर्जुन के लक्ष्य पर अकबर का निशाना

Arjun Munda -1MJ-Akbar

 

21 जून की शाम झारखंड की राजधानी रांची के भाजपा कार्यालय में गहमागहमी का माहौल था. दिल्ली से उड़ान भरकर वरिष्ठ पत्रकार और भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता एमजे अकबर वहां पहुंचे थे. झारखंड में एक साल के लिए खाली हुई एक राज्यसभा सीट पर उन्हें भेजने की घोषणा हुई थी. अचानक हुई यह घोषणा कोई चौंकानेवाली नहीं थी. राज्य के लगभग सभी दलों में लंबे समय से यह परंपरागत तौर पर होता रहा है. जब अकबर भाजपा कार्यालय मे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से बतिया रहे थे, तब राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा के वरिष्ठ नेता अर्जुन मुंडा भी मौजूद थे. लगभग खामोश से. क्यों, कोई नहीं जानता लेकिन जानने वाले यह जानते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव में अपने सीट से हार जाने के बाद चाय में गिरी मक्खी की तरह निकालकर अलग रख दिए गए मुंडा को यह उम्मीद थी कि कम से कम पार्टी इस छोटे-से अवसर पर स्वाभाविक तौर पर उन्हें ही याद करेगी. लेकिन ऐसा हो न सका. मुंडा को यह उम्मीद करना गैरवाजिब भी नहीं था. राज्य बनने के बाद भाजपा की ओर से वे तीन बार मुख्यमंत्री बने हैं. देशभर में तेजी से आदिवासी नेताओं के बीच पहचान कायम करने वाले नेता रहे हैं. ऐसी तमाम संभावनाओं व खासियतों के बावजूद पिछले विधानसभा चुनाव में हार के बाद वे जिस तरह से एकदम से किनारे कर दिए गए, उससे कई सवाल भाजपा के अंदरखाने में ही उठते हैं. कुछेक मानते हैं कि अर्जुन मुंडा को महज एक चुनाव हारने के बाद इस तरह से उपेक्षित किया जा रहा है तो उसकी वजह सिर्फ चुनाव हारना नहीं बल्कि यह राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री रघुबर दास से वर्षों तक चले 36 के आंकड़े का परिणाम है, जिसे अब रघुबर के सत्ता में आने के बाद उन्हें भुगतना पड़ रहा है. कुछेक यह बताते हैं कि चूंकि मुंडा घोषित तौर पर आडवाणी खेमे के नेता रहे हैं, इसलिए नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद आडवाणी की चेलई की कीमत उन्हें चुकानी पड़ रही है. ऐसी ही कई और वजहें लोग बताते हैं. वजह जो भी हो लेकिन खुद भाजपा के अंदर भी एक बड़ा खेमा यह मानता है कि इस तरह से मुंडा को उपेक्षित करना पार्टी के स्वरूप के अनुसार ठीक नहीं दिखता. चुनाव हारने वाले लोग केंद्र में अहम मंत्री बनाए गए हैं. चुनाव न लड़ने वाले लोग भी बहुत महत्व पा रहे हैं. एक वर्षों के लिए राज्यसभा की एक खाली हुई सीट पर मुंडा के नाम पर एक बार भी विचार नहीं किए जाने के बाद ऐसे तमाम सवाल भाजपा के अंदर ही उठने शुरू हो गए हैं.

सबको मालूम है कि ये सवाल धरे के धरे रह जाएंगे. सूत्र बताते हैं कि झामुमो से आने के बाद भाजपा में छा जाने वाले अर्जुन मुंडा अगर चुनाव हारने के बाद से एकदम से खामोश हैं और चुपचाप पार्टी के हर सभा-सम्मेलन में शामिल हो रहे हैं तो उनकी इस खामोशी में भी एक राजनीति है, जिसका स्वरूप आने वाले दिनों में देखा जा सकता है. क्या एक समय में बाबूलाल मरांडी को अपदस्थ कर मुख्यमंत्री बनने वाले मुंडा भी कभी मौका पाकर बाबूलाल की तरह राह अपनाने का साहस जुटा पाएंगे? क्या मुंडा तब तक एक अनुशासित ‌सिपाही की तरह रघुबर दास को उनके कार्यकाल के बीच में ही हटा दिए जाने की उम्मीद में टकटकी लगाए रखेंगे? क्या अर्जुन मुंडा वक्त की नजाकत तो समझकर अभी चुपचाप ही रहेंगे, क्योंकि केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार है. और एक बार भी मुंह खोलना उन्हें भारी झमेले में फंसा सकता है. ऐसे कई सवाल मुंडा को लेकर आए दिन भाजपा कार्यालय में सुनने को मिलते रहते हैं.

जिस दिन एमजे अकबर के नाम की घोषणा हो रही थी, उस दिन भी कार्यालय के बाहर भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच बतकही में एक विषय मुंडा थे. जाहिर सी बात है कि यह सवाल अर्जुन मुंडा से पूछने का मतलब नहीं था कि आपकी ओर पार्टी ने ध्यान क्यों नहीं दिया, आपके नाम पर एक बार विचार तक क्यों नहीं हुआ? मुंडा का सीधा जवाब होता कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व फैसला करता है और उनका हर फैसला सिर आंखों पर होगा. एमजे अकबर हमारी पार्टी के बड़े और योग्य नेता हैं, इसलिए यह फैसला लिया गया. यही सवाल दूसरे तरीके से एमजे अकबर के सामने रखा जाता है कि आप तो 1989 में बिहार के किशनगंज से चुनाव लड़े और जीत दर्ज की थी. दोबारा भी लड़े मगर जीत नहीं सके. लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा में शामिल हुए और फिर अचानक झारखंड से उम्मीदवार बनने कैसे आ गए. एमजे अकबर कहते हैं, ‘मैंने पत्रकारिता के दौरान बहुत समय झारखंड में गुजारा हैं, इसलिए मेरा झारखंड से रिश्ता बहुत पुराना और गहरा है. यह मेरा सौभाग्य है कि झारखंड की सेवा करने का मौका मिला है.’

खैर! आगे क्या होगा, आगे की बात है. अकबर का राज्यसभा जाना तय है. भाजपा के पास खुद का अंकगणित है. बाबूलाल मरांडी की पार्टी को तोड़ देने के बाद यह गणित और मजबूत हो चुका है. आजसू पार्टी का साथ उसके पास है ही. हालांकि इस बहाने झामुमो ने अपनी स्थिति मजबूत जरूर कर ली है. झामुमो ने पार्टी की ओर से हाजी हुसैन का नामांकन करवाया है. हाजी हुसैन जीत भले न सके लेकिन हेमंत सोरेन ने हाजी के बहाने पूरे विपक्ष को एकजुट कर उसका सिरमौर नेता बनने की कवायद की और यह उनकी सफलता भी रही.