क्या विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की इतनी बड़ी जीत की उम्मीद आपको थी?
पूरा दो सौ प्रतिशत. जदयू और कांग्रेस के संग महागठबंधन बनने के दिन से ही उम्मीद थी. बिहार में राजग के किसी भी नेता में मुझे हरा देने का दम नहीं है. प्रचार के दौरान ही हमने देख लिया था कि लहर हमारे पक्ष में है.
बहुत सारे चुनाव सर्वेक्षणों में आपको या महागठबंधन को बढ़त में नहीं दिखाया गया या फिर ज्यादा भाव नहीं दिया गया. क्या आप इससे निराश हुए?
देखिए, हम राजनीति विज्ञान का पढ़ाई किया हूं और बहुत अच्छे से जानता हूं कि चुनाव सर्वेक्षण और एग्जिट पोल कइसे किया जाता है. जब आप लोगों का हाल-चाल लीजिएगा, उन लोगों के सुख-दुख में भागीदार बनिएगा त किसी भी परीक्षा में कभी फेल नहीं होइएगा, फिर चाहे उ विधानसभा या लोकसभा चुनाव ही काहे न हो.
आपने पहली बार नॉन प्लेइंग कैप्टन के रूप में 2014 के चुनाव का सामना किया और राजद 40 में से कुल 4 सीट ही जीत सकी. 2014 के चुनावों में आप इतनी बुरी तरह से क्यों हारे?
बिहार में एक कहावत है, जब परिवार बंटता है न त उसका नाजायज फायदा गांव का लोग उठाता है. हम और हमारा छोटा भाई नीतीश अलग-अलग रास्ता पकड़ लिया था, इसीलिए सांप्रदायिक ताकतों को लाभ मिला. अब जब हम एक हो गए हैं तब लोगों ने उन्हें दूर बिहार से उखाड़ फेंका.
आपको ऊंची जातियों का दुश्मन माना जाता है, खासकर जब आपने घोषणा की कि यह लड़ाई अगड़ों और पिछड़ों की है. क्या आप वाकई अगड़ों के दुश्मन हैं?
हम अगड़ा जाति के गरीबों के विरोध में कभी नहीं रहा हूं. हम उन लोगों को पिछड़ा मानता हूं क्योंकि उ सब जरूरी साधनों से वंचित रहे हैं. हम बांटो और राज करो की राजनीति में विश्वास नहीं करता हूं. हमारा विरोध समाज के शोषकों से है. ये वीपी सिंह थे जिन्होंने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किया. क्या वे पिछड़ी जाति के थे? वे हमारे नेता हैं. आज भी हमारी पार्टी में अगड़ी जाति के बहुत सारा नेता भरा हुआ है.
क्या आपको लगता है कि ध्रुवीकरण के बावजूद अगड़ी जातियों ने भी राजद उम्मीदवारों को वोट दिया?
बिहार का लोग जाति और संप्रदाय से ऊपर उठ रहा है. उन्होंने हमारी पार्टी और महागठबंधन की दूसरी पार्टियों को भी वोट दिया है. इनमें अन्य पिछड़ा वर्ग है, अति पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक, गरीब और अगड़ी जाति के शोषित लोग भी हैं. यह गणित और रसायन (केमिस्ट्री) दोनों के हिसाब से स्पष्ट बहुमत है.
तो क्या अगली सरकार नीतीश के नेतृत्व में बनने जा रही है?
हम पहले ही घोषित कर चुका हूं कि नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री होंगे. मेरे और उनके बीच कोई मतभेद नहीं है. वे परखे हुए मुख्यमंत्री हैं और बिहार में रहकर लोगों के कल्याण के लिए काम करेंगे.
हम और हमारा छोटा भाई नीतीश अलग-अलग रास्ता पकड़ लिया था, इसीलिए सांप्रदायिक ताकतों को लाभ मिला
राजग नेता यह दावा करते हैं कि जल्दी ही जंगलराज लौट आएगा और आपका व नीतीश कुमार का गठबंधन लंबे समय तक नहीं चल पाएगा.
हमारा दृढ़ विश्वास मंगलराज में है. हमने अपने 15 वर्ष के शासन के दौरान बेजुबान लोगों को जुबान दिया. हाशिये का लोग बंधुआ मजदूर का जीवन जी रहा था, हमने उनको बंधन से मुक्त कराया. और राजग नेताओं को हमारे गठबंधन के बारे में क्यों चिंता होती है? जल्द ही उनको पता चल जाएगा कि इस गठबंधन पर सदा के लिए मोहर लग गई है.
बढ़ती असहिष्णुता को देखते हुए लेखक, फिल्मकार और वैज्ञानिक अपने राष्ट्रीय सम्मान लौटा रहे हैं. क्या अब विरोध के तौर तरीके बदलेंगे?
अगर आपको याद हो तो इस साल की शुरुआत में जब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आए थे तो उन्होंने भारत में यहां बढ़ते रंगभेद/नस्लभेद के लिए चेताया था. अमेरिका लौटने के बाद ओबामा ने कहा था कि अगर महात्मा गांधी आज जिंदा होते तो वे दुखी होते. उनके इस वक्तव्य का क्या अर्थ था? भाजपा सत्ता के लिए लाशों पर राजनीति करती है. भाजपा के लिए आरएसएस एजेंडा सेट करती है. लेकिन जब तक हम जिंदा हूं तब तक ये ताकतें अपने मंसूबों में कामयाब नहीं होंगी.
आपका अगला लक्ष्य क्या है? क्या आप भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपना प्रचार जारी रखेंगे?
देखिए, अब हम सबसे पहले हाथ में लालटेन लेकर बुनकरों का हाल जानने बनारस जाऊंगा. मोदी ने कई मौकों पर कहा है कि गंगा मईया ने मुझे यहां लोगों की सेवा के लिए बुलाया है. हम देखूंगा कि मोदी ने उहां कौन सी सेवा की है. फिर कोलकाता जाऊंगा और उसके बाद दूसरे राज्यों में भी जाऊंगा. आखिर में हस्तिनापुर (दिल्ली) पहुंचूंगा. बिहार में महागठबंधन की महाविजय से मोदी घबरा गए हैं. अब वे गुजरात जाने की सोच रहे हैं.
असहिष्णुता के मुद्दे पर बयान देकर विवादों में घिरे बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान ने बुधवार को अपनी सफाई दी. आमिर ने अपने बयान में कहा है, ‘सबसे पहले मैं एक बात साफ करना चाहूंगा, न मेरा, न मेरी पत्नी का देश छोड़ने का कोई इरादा है. न हमारा ऐसा कोई इरादा था, न है और न होगा. जो कोई भी ऐसी बात फैलाने की कोशिश कर रहा है, उसने या तो मेरा इंटरव्यू नहीं देखा, या जानबूझकर गलतफहमी फैलाना चाह रहा है. भारत मेरा देश है, मैं इससे बेइंतहा प्यार करता हूं और यही मेरी सरज़मीं है.
दूसरी बात, इंटरव्यू के दौरान जो भी मैंने कहा है, मैं उस पर अटल हूं. जो लोग मुझे देशद्रोही कह रहे हैं उनसे मैं कहूंगा, मुझे गर्व है अपने हिन्दुस्तानी होने पर और इस सच्चाई के लिए मुझे न किसी की इजाजत की जरूरत है और न ही किसी के सर्टिफिकेट की. जो लोग इस वक्त मुझे गालियां दे रहे हैं, क्योंकि मैंने अपने दिल की बात कही है, उनसे मैं कहना चाहूंगा कि मुझे बड़ा दुख है कि वो मेरा कहा सच साबित कर रहे हैं और उन सारे लोगों का मैं शुक्रिया अदा करना चाहूंगा जो आज इस वक्त मेरे साथ खड़े हैं. हमें हमारे खूबसूरत और बेमिसाल देश के चरित्र को सुरक्षित रखना है. हमें सुरक्षित रखना है इसकी एकता को, इसकी अखंडता को, इसकी विविधता को, इसकी सभ्यता और संस्कृति को, इसके इतिहास को, इसके अनेकतावाद के विचार को, इसकी विविध भाषाओं को, इसके प्यार को, इसकी संवेदनशीलता को और इसकी जज्बाती ताकत को.’
आखिर में मैं रवींद्रनाथ टैगोर की एक कविता दोहराना चाहूंगा. कविता नहीं बल्कि यह एक प्रार्थना है-
जहां उड़ता फिरे मन बेखौफ और सर हो शान से उठा हुआ जहां ज्ञान हो सबके लिए बेरोकटोक बिना शर्त रखा हुआ जहां घर की चौखट सी छोटी सरहदों में न बंटा हो जहां जहां सच की गहराइयों से निकले हर बयान जहां बाजुयें बिना थके लकीरें कुछ मुकम्मल तराशें जहां सही सोच को धुंधला न पाएं उदास मुर्दा रवायतें जहां दिलो-दिमाग तलाशें नए ख्याल और उन्हें अंजाम दे ऐसी आजादी के स्वर्ग में, ऐ भगवान, मेरे वतन की हो नई सुबह
कांग्रेसियों के बारे में कहा जाता है कि जब वे सत्ता में होते हैं, तभी नियंत्रित रहते हैं, एकजुट रहते हैं. सत्ता से हटते ही अनुशासन का आवरण उनसे हटने लगता है आैैर बिखराव शुरू हो जाता है. इसके उलट समाजवादियों के बारे में कहा जाता है कि वे संकट के समय में ही एक रहते हैं, एक साथ आते हैं लेकिन सत्ता मिलते ही वे टूटने लगते हैं. बिहार में इसे थोड़ा और दिलचस्प बनाकर कहा जाता है कि कोई भी समाजवादी तीन साल से अधिक समय तक साथ नहीं रह सकता. यह बिखराव समाजवादियों को विरासत में मिला है और यही उनके लिए अभिशाप है. इस बार जब दो बड़े समाजवादी नेता लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार एक साथ हुए और बड़ी जीत हासिल की तो जीत के दिन से ही यह सवाल भी हवा में तैरने लगा कि क्या ये एक रह पाएंगे या फिर समाजवादी राजनीति की परंपरा को निभाते हुए अपनी राह अलग कर लेंगे?
यह सवाल बड़े स्तर पर भाजपा समर्थकों व सवर्णों द्वारा उठाया गया लेकिन ऐसा नहीं कि यह सवाल सिर्फ उनकी ओर से ही उठा. बिहार की चौपालों में भी यह सवाल इन दिनों छाया हुआ है और यह सवाल अगर उठ रहे हैं तो उसके पीछे कुतर्क या बेजा कारण की बजाय ठोस आधार है. इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो मोरारजी देसाई-चौधरी चरण सिंह, वीपी सिंह-चंद्रशेखर से लेकर लालू-नीतीश के अलगाव की कहानी का इतिहास रहा है. नीतीश ने 1993 में ही लालू से अलग राह बनानी शुरू कर दी थी. वह समय कोई मामूली समय नहीं था. वह मंडल राजनीति के उफान के दिन थे. तब लालू बिहार के बड़े नेता बनकर उभरे थे, देश-भर में हलचल थी लेकिन नीतीश कुमार ने अपनी अलग राह बनानी शुरू कर दी थी. इस बार लालू और नीतीश के साथ आने और भारी जीत दर्ज करने के दिन से ही अलग रास्ता अपनाने की बात कही जा रही है तो इसके पीछे सिर्फ इतिहास के इन पन्नों को पलटकर ही संभावना या आशंका नहीं जताई जा रही बल्कि और भी कई तर्क जोड़े जा रहे हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले दिनों में एक ही राजनीतिक स्कूल से निकलने के बावजूद दो ध्रुवों से राजनीति करने वाले दोनों दिग्गज आपस में ही टकराएंगे. दोनों के दो ध्रुवों से राजनीति करने की बात को कई लोग खारिज करते हुए कहते हैं कि इसे इस तरह से भी देखा जा सकता है कि नीतीश कुमार मूलतः लालू प्रसाद का ही विस्तार हैं. लालू ने सामाजिक न्याय की राजनीति की तो नीतीश ने उसका विरोध नहीं किया बल्कि उसका विस्तार किया और उसमें आवश्यक तत्व जातीय, लैंगिक और आर्थिक न्याय का फॉर्मूला जोड़ा. पिछड़ा को अतिपिछड़ा समूह में बांटकर जातीय न्याय के एजेंडे को आगे बढ़ाया, दलितों में से महादलित को आगे कर दलितों में जातियों को सशक्त किया और महिलाओं को आरक्षण के कई मौके देकर लैंगिक न्याय का परिचय दिया.
यह सही भी है लेकिन दोनों के बीच टकराव होने की स्थिति बनने के पीछे जो तर्क दिए जा रहे हैं, उसमें भी दम है. एक बात कही जा रही है कि इतिहास यह रहा है कि जब भी कोई बड़ी जीत हासिल होती है तो उसमें विपक्ष भी छिपा होता है. इस बार की नीतीश और लालू की जीत में विपक्ष भी शामिल है. राजनीतिक कार्यकर्ता संतोष यादव कहते हैं, ‘मुझे अभी से ही दिख रहा है कि इस सरकार में ही विपक्ष के सारे तत्व छुपे हुए हैं और आने वाले समय में उसका स्वरूप दिखेगा.’ यह बात सिर्फ संतोष यादव नहीं कहते, कई लोग इसे प्रकारांतर से कहते रहे हैं. ऐसा कहने के पीछे के कई आधार हैं. एक तो महत्वाकांक्षाओं के टकराव का होना माना जा रहा है. ऐसी धारणा है कि लालू बिहार की राजनीति में अपने दोनों बेटों को स्थापित कराने के बाद अब देश की राजनीति में अपना दखल बढ़ाना चाह रहे हैं. इसके लिए अब उनकी कोशिश होगी कि वे दिल्ली में अपना ठीक-ठाक इंतजाम करें. बताया जा रहा है कि लालू खुद केंद्र की राजनीति में अब सिर्फ किंगमेकर की ही भूमिका निभा सकते हैं इसलिए वे पहले से बिसात बिछाना चाहेंगे. इसके लिए वे राज्यसभा में पत्नी राबड़ी देवी को भेजेंगे. कयास मीसा भारती को लेकर भी लगाए जा रहे हैं. वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर कहते हैं, ‘राबड़ी देवी की संभावना इसलिए ज्यादा है, क्योंकि राबड़ी के जाने से प्रमुख जगह पर आवास मिलेगा, जहां रहकर लालू एक केंद्र बनना चाहेंगे. मीसा को भेजने पर यह नहीं संभव होगा.’
नीतीश मूलतः लालू का ही विस्तार हैं. लालू ने सामाजिक न्याय की राजनीति की तो नीतीश ने उसका विस्तार किया और उसमें जातीय, लैंगिक व आर्थिक न्याय का फॉर्मूला जोड़कर उस एजेंडे को आगे बढ़ाया
फोटोः विजय पांडेय
लालू क्या करेंगे, यह तो वही जानें. संभव है दोनों को भेज दें, क्योंकि अब उनके पास वह ताकत है. दूसरा यह कि लालू 2019 के लोकसभा चुनाव तक खुद को राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े नेता और भाजपा विरोध की धुरी के तौर पर स्थापित करना चाहेंगे. इसका संकेत वे बिहार चुनाव परिणाम के दिन ही दे चुके हैं. उस रोज से वह बार-बार दोहरा रहे हैं कि वे अब केंद्र की राजनीति करेंगे और नीतीश को बिहार की राजनीति करने देंगे. लालू की आकांक्षा ऐसी ही है लेकिन बिहार में तीसरी पारी खेलने का जनादेश प्राप्त कर चुके नीतीश की भी खुद यही पुरानी इच्छा रही है और वे केंद्रीय राजनीति में अपनी बड़ी भूमिका की तलाश करते रहे हैं. इसे लेकर दोनों के बीच टकराव की स्थिति बनेगी. बिहार चुनाव में लाख कोशिश के बावजूद भले ही लालू ने बाजी अपने हाथ ले ली और उसके हीरो भी बन गए लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव तक केंद्रीय राजनीति में भाजपा विरोध की एक धुरी खुद नीतीश कुमार बनना चाहेंगे, क्योंकि तीन बार एक महत्वपूर्ण राज्य का मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी भी एक बड़ी हसरत देश की राजनीति में शीर्ष पर विराजने की रहेगी, रही भी है. टकराव के बिंदु सिर्फ यही नहीं होंगे, दोनों के काम करने का तरीका बिल्कुल अलग रहा है और उसे लागू करने का भी. वैसे यह भी कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार एक कुशल मैनेजर हैं इसलिए वे जब बिल्कुल विपरीत ध्रुव वाली भाजपा जैसी बड़ी पार्टी को दस सालों तक मैनेज करते रहे तो लालू को मैनेज करके रखना उनके लिए मुश्किल नहीं होगा. लेकिन यह कहना जितना आसान है, उसे कर दिखाना इतना आसान नहीं. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘अभी यह कहना जल्दबाजी है दोनों के बीच टकराव होंगे, क्योंकि इन दोनों दलों के टिकट पर जो लोग इस बार जीतकर आए हैं, वे लगभग एक ही राजनीतिक समूह से हैं. इनमें पिछड़े और दलित ही अधिक हैं और दोनों ही दल के विधायकों को नीतीश को या लालू को नेता मानने में कोई परेशानी नहीं होगी, इसलिए इस स्तर पर टकराव कम होगा, लेकिन टकराव इस बिंदु पर होगा कि लालू प्रसाद स्वाभाविक तौर पर सत्तालोभी रहे हैं, उनका लोभ जागेगा और फिर नीतीश के लिए यह मैनेज करना आसान नहीं होगा. और रही बात दोनों नेताओं के राष्ट्रीय राजनीति में आकांक्षा की तो यह अभी खयाली पुलाव जैसा है. बस इतना ही होगा कि बिहार की राजनीति में मजबूत होने से देश की राजनीति में दोनों का महत्व बढ़ेगा, दोनों और मजबूत होंगे और कुछ नहीं. इस समय देश में जयललिता, ममता बनर्जी, मुलायम सिंह यादव, नवीन पटनायक जैसे ढेरों नेता हैं, जो यही आकांक्षा रखते हैं और सब मजबूत भी हैं. लालू नीतीश को तो पूरे भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने से पहले पड़ोस के झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के ही इलाके में अपना प्रभाव दिखाकर खुद को साबित करना होगा.’
यह बात सही है कि दोनों दलों के विधायक एक ही राजनीतिक समूह से हैं, इसलिए टकराव की स्थिति कम बनेगी लेकिन संभावना सिर्फ विधायकों के बीच टकराव की नहीं. यहां महत्वपूर्ण यह भी है कि नीतीश कुमार पिछले दस सालों से भाजपा के साथ एक तरीके से स्वतंत्र रूप से काम करने के अभ्यस्त रहे हैं. वह सारे निर्णय और फैसले खुद लेने के अभ्यस्त हैं और बिल्कुल अपने तरीके से काम करने के लिए जाने जाते रहे हैं. जो नीतीश को जानते हैं वे यह भी जानते हैं कि नीतीश कुमार को ज्यादा हस्तक्षेप पसंद नहीं और वे उसे बर्दाश्त नहीं कर पाते. सवाल यह उठ रहा है कि क्या लालू यादव इतनी आजादी उन्हें देंगे. यह इतना आसान नहीं होगा. नीतीश तो फिर भी अपने कार्यकाल में सिर्फ बड़े अधिकारियों पर अपने नियंत्रण के लिए जाने जाते हैं, यही उनकी शैली रही है लेकिन लालू दारोगा, बीडीओ और डीएसपी तक के ट्रांसफर-पोस्टिंग का भी हिसाब-किताब रखने के लिए ख्यात हुए थे. बात इतनी ही नहीं होगी नीतीश और लालू साथ रहते हुए भी भविष्य में अपने लिए एक सुगम और संभावनाओं के द्वार बनाकर रखना चाहेंगे ताकि कभी अलगाव की स्थिति में उनका भविष्य सुरक्षित रखे. इसके लिए दोनों के रास्ते अलग होंगे. यह बिहार चुनाव चलने से लेकर चुनाव परिणाम के दिन तक दिखा. नीतीश बहुत शालीन तरीके से बोलते रहे कि बिहार की सभी जातियों ने उनका साथ दिया है, सवर्णों ने भी लेकिन लालू उनके सामने ही इस बात को काटते रहे और पिछड़ों, अतिपिछड़ों, दलितों और कुछ गरीब सवर्णों का साथ मिलने की बात करते रहे. नीतीश बिक्रम, बरबीघा, बक्सर जैसे सीटों को आधार बनाकर आगे की राजनीति करना चाहेंगे. ये कुछ ऐसी सीटें हैं, जहां सवर्णों ने खुलकर महागठबंधन का साथ दिया. लालू प्रसाद इसके उलट पिछड़ों, विशेषकर यादवों, दलितों और मुसलमानों को साथ रखकर राजनीति साधना चाहेंगे ताकि उनका राजनीतिक भविष्य सुरक्षित रहे. लालू प्रसाद इसलिए भी ऐसा बार-बार दिखाना चाहेंगे, क्योंकि इस बार की जीत का गणित उन्हें पता है. उन्हें पता है कि दलितों और पिछड़ों के गोलबंद होने से ही उनको यह भारी जीत मिली.
बहरहाल सिर्फ इतना ही नहीं होगा, टकराव की संभावना इसलिए भी बनेगी क्योंकि नीतीश केंद्र से बेहतर रिश्ते रखकर अपने सुशासन और गवर्नेंस के साथ विकास की योजनाओं को आगे बढ़ाकर भविष्य में खुद को मजबूत करना चाहेंगे और अपना एक आधार विकसित करना चाहेंगे जबकि लालू अब से लेकर 2019 तक लगातार नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार का विरोध कर अपने को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करना चाहेंगे. साथ ही बिहार में अपने पक्ष में या अपने नाम पर मिले अपार जनसमर्थन को ठोस रूप देना चाहेंगे ताकि अगले लोकसभा चुनाव में भी वह भाजपा विरोध के हीरो बने रहें. यानी सीधे शब्दों में कहें तो लालू प्रसाद अपने लिए अभी से ही लोकसभा चुनाव की तैयारी करेंगे जबकि नीतीश कुमार के लिए ऐसा करना मुश्किल होगा.
लालू के बारे में कहा जाता है कि वे ‘डेमोक्रेसी अगेंस्ट गवर्नेंस’ के प्रणेता रहे हैं जबकि नीतीश ‘डेमोक्रेसी विद गवर्नेंस एंड डेवलपमेंट’ के प्रणेता हैं. जानकार कहते हैं कि अब यह देखना दिलचस्प होगा कि दोनों के बीच समझौते के बिंदु क्या होंगे. एक तो बिंदु भाजपा को हराने का था, इसलिए उसका असर दिखा लेकिन अब आगे चुनौतियां हैं. अब अगर एजेंडे को ठोस कर पाएंगे तो दोनों में एकता रहेगी लेकिन अगर उस पर एकमत नहीं रहेंगे तो दुनिया की कोई ताकत इन्हें एक नहीं रख पाएगी. महेंद्र सुमन कहते है, ‘शिक्षा, स्वास्थ्य और खेती के लिए ठोस एजेंडा बनाकर दोनों काम करें. इससे दोनों को फायदा मिलेगा दोनों लेकिन ऐसा कर पाएंगे, यह संभव नहीं दिखता.’ यह आशंका ऐसे ही नहीं है. इसके पीछे भी ठोस आधार है. लालू ने देख लिया है कि रेल मंत्री रहते हुए उन्होंने विकास के एजेंडे को आगे बढ़ाया, लेकिन उसका उस तरह से फायदा नहीं हुआ, जिस तरह से मंडल-2 की बात कहने से हुआ था. इन सबके बाद कुछ और आशंकाओं के आधार पर अभी से अनुमान लगाया जा रहा है. एक तो यह कि नीतीश ने पिछले दस सालों में अपने लिए अलग किस्म का वोट बैंक डेवलप किया था. उन्होंने कांग्रेसी तरीके को अपने पाले में किया था, जिसके तहत भूमिहार और दूसरे सवर्णों के अलावा महादलित और अतिपिछड़े, उनके लिए ईवीएम का बटन दबाते थे. नीतीश अपनी इसी राजनीति को आगे भी बढ़ाना चाहेंगे, क्योंकि वे जानते हैं कि मंडल-2 की राजनीति में वे दूसरों से नहीं, लालू से ही पिछड़ जाएंगे, जबकि लालू मंडल-2 की राजनीति को ही तरजीह देकर अपनी सियासत को और मजबूत करना चाहेंगे. नीतीश ने अपने लिए महादलित, अतिपिछड़ा और मुसलमानों में पसमांदा जैसी कैटेगरी को राजनीतिक तौर पर खड़ा कर वोट बैंक बनाया था. साथ ही सवर्ण आयोग गठित कर अपने लिए एक इंतजाम किया था. वे फिर से वैसा ही कोई आधार बनाना चाहेंगे. यह आधार वे अगले लोकसभा चुनाव तक बनाना चाहेंगे. तब लालू प्रसाद ऐसे किसी भी आधार को बनाने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित होंगे. और बात सिर्फ इतनी नहीं होगी. इस बार के चुनाव में भाजपा को जो 34 प्रतिशत वोट मिला है, वह सिर्फ सवर्णों और वैश्यों का वोट नहीं है, उसमें दलितों और अतिपिछड़ों का भी वोट है.
चुनाव में मंडल-2 के नाम पर अतिपिछड़ों या महादलितों की बजाय पिछड़ों का और उसमें भी यादवों का जो उभार हुआ है, उसका असर निचले स्तर पर दिखाई पड़ेगा. सामाजिक समीकरण पर भी उसका असर पड़ेगा
चिंतक रामाशंकर आर्य कहते हैं, ‘नीतीश की जीत से हम सब खुश हैं. अभी बड़े दुश्मन यानी पुराने सामंतों के संरक्षक भाजपा को परास्त करना था तो दलितों ने नीतीश के नेतृत्व पर भरोसा जताया, लेकिन हमारे दलित नेता का उभार नहीं होना दलितों को चिंतित किए हुए है. इसके लिए नए सिरे से कोशिश होगी, लेकिन इसके साथ ही दलित जानते हैं कि पुराने सामंतों की तरह ही नवसामंतों यानी अपर क्लास पिछड़ों से भी दलितों को उतना ही खतरा है, इसलिए यह दलितों के लिए चिंता की बात है.’ बहरहाल यह माना जा रहा है कि इस बार के चुनाव में मंडल-2 के नाम पर अतिपिछड़ों या महादलितों की बजाय पिछड़ों का और उसमें भी यादवों का जो उभार हुआ है, उसका असर निचले स्तर पर दिखाई पड़ेगा. सामाजिक समीकरण पर भी उसका असर पड़ेगा. यादवों की राजनीतिक मजबूती दस सालों के बाद हुई है, उसका असर होगा.
67 साल की उम्र. 11 सालों तक खुद चुनाव नहीं लड़ने की स्थिति. पिछले लोकसभा चुनाव में पत्नी राबड़ी देवी और बेटी मीसा भारती, दोनों की बुरी हार. लोकसभा चुनाव के पहले ही दिल का ऑपरेशन और डॉक्टरों की सख्त हिदायत कि न ज्यादा भागदौड़ करनी है, न ही तनाव लेना है. कुल मिलाकर इस विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव इन्हीं स्थितियों के साथ खड़े थे. एक तरीके से टूटे हुए और बिखरे हुए भी. चुनाव शुरू होने के पहले जिस मुलायम सिंह यादव को ‘समधीजी-समधीजी’ कहकर लालू गले लगा रहे थे, वही ऐन मौके पर अलग हो गए. मुलायम सिर्फ अलग ही नहीं हुए, अपने बेटे अखिलेश को बिहार भेजकर लालू पर निशाना भी साधने-सधवाने लगे. इसके अलावा लालू को सहयोगी कांग्रेस द्वारा भी उपेक्षा ही मिल रही थी. राहुल-सोनिया द्वारा लालू को भाव न दिए जाने के किस्से सामने आ चुके थे. इतने के बाद उनके अपने दल के अंदर छुटभइये नेताओं की बगावत और विरोध अलग था. लालू की मुसीबत यहीं खत्म नहीं हो रही थी, नए-नवेले साथी बने नीतीश कुमार के दोस्त बन जाने के बाद भी उनसे अछूत की तरह बर्ताव कर रहे थे. रही-सही कसर मीडिया पूरी कर रहा था, जहां या तो नरेंद्र मोदी हीरो थे या फिर नीतीश कुमार.
इन तमाम कमजोरियों को देखते हुए ही विपक्षी भाजपा ने एक सुनियोजित रणनीति बनाई कि उसके नेता लगातार लालू यादव पर प्रहार करेंगे. लालू की इन कमजोर स्थितियों को देखते हुए बिहार में एक बड़े तबके ने यह माहौल बनाया कि नीतीश ने अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार ली है. वे लालू के साथ गए हैं, अब कहीं के नहीं रहेंगे, न तीन में बचेंगे, न तेरह में. देश के कई बड़े विश्लेषकों और बुद्धिजीवियों ने लिख दिया कि नीतीश कुमार ने अपना भविष्य तो दांव पर लगाया ही, बिहार का भविष्य भी दांव पर लगा दिया है. कुल मिलाकर इस बार के चुनाव में लालू के हिस्से में कांटे ही कांटे थे. कोई और नेता होता तो वह किसी तरह अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ता. कदम फूंक-फूंक कर रखता. अपने लक्ष्य को छोटा कर निर्धारित करता और फिर उसे ही पाने के लिए दिन-रात एक करता. लेकिन लालू ने सब उलटा किया, वह भी अपने तरीके से, अपने अंदाज में. डॉक्टरों ने ज्यादा भाग-दौड़ करने को मना किया तो वे बिहार में सबसे ज्यादा चुनावी सभा करने वाले नेता बन गए. विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने 11,600 किमी. चलकर 251 चुनावी सभाएं कीं. पप्पू यादव जैसे नेता रोजाना विरासत को चुनौती देते रहे तो वह जवाब में एक ही बात करते रहे कि पप्पू के बारे में लालू बोलेगा तो वह खुद को बड़ा नेता समझने लगेगा, इसलिए हम कुछ नहीं बोलेंगे. भाजपा ने जंगलराज कहकर निशाना साधना शुरू किया तो उसका जवाब उन्होंने अपने अंदाज में दिया. पहले एक पोस्टर जारी किया, जिस पर लिखा, ‘जब दिया गरीबों को आवाज, उसे कहता है जंगलराज.’ फिर एक वाक्य को सभी सभाओं में दोहराने लगे, ‘भाजपा वाला जंगलराज कहता है तो हम कहते हैं कि जंगल में तुम क्या करने आए हो, जाओ जंगल से बाहर.’ जिस कांग्रेस को लालू से परेशानी थी, उस कांग्रेस की बड़ी नेता सोनिया गांधी को सामने बिठाकर ही लालू ने यह एहसास करा दिया कि आप भ्रम में न रहें. साथ रहकर भी संकोच का आवरण ओढ़कर थोड़ा अलगाव-दुराव का भाव रखने वाले नीतीश को तो उन्होंने इतने तरीके से सिर्फ मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बना दिया और यह सब देखते-जानते हुए भी नीतीश कुछ कह सकने की स्थिति में नहीं रहे.
लालू ने चुनाव के दौरान सब उलटा किया, वह भी अपने अंदाज में. डॉक्टरों ने ज्यादा भाग-दौड़ करने से मना किया तो वे सबसे ज्यादा चुनावी सभा करने वाले नेता बन गए. विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने 11,600 किमी. चलकर 251 चुनावी सभाएं कीं
इसका नतीजा सबके सामने है. इतनी मुश्किल स्थितियों में लालू बिहार के चैंपियन बनकर उभरे हैं. तमाम राजनीतिक भविष्यवाणियों को झुठलाते हुए उन्होंने खुद के लिए 190 सीटों का लक्ष्य निर्धारित किया और 178 सीटें लाकर उसे प्राप्त करने के करीब भी पहुंच गए. यह सब कैसे हुआ? क्या नीतीश कुमार के साथ आने की वजह से? क्या जनता के मन में भाजपा के प्रति बढ़ी नाराजगी ने लालू को इतना बड़ा मौका दे दिया? क्या संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण वाले बयान ने उन्हें फिर से सबसे बड़ा नेता बन जाने का अवसर दे दिया? ऐसे तमाम सवाल हो सकते हैं और इसके जवाब भी लोग अपने हिसाब से दे रहे हैं, लेकिन जो लालू को जानते हैं, उनकी राजनीति को जानते हैं, वे यह भी जानते और मानते हैं कि सिर्फ इन वजहों से ही लालू प्रसाद को इस बार के चुनाव में ‘मैन ऑफ द मैच’ जैसा नहीं बन जाना था.
लालू की बड़ी जीत को जो नीतीश कुमार का साथ मिलना बता रहे हैं, उनसे यह पूछा जा सकता है कि फिर नीतीश कुमार खुद के लिए ऐसा करिश्मा क्यों नहीं कर पाए, जो लालू ने किया? नीतीश कुमार के पास तो प्रशांत किशोर जैसे चुनावी मैनेजर भी थे. ऐसे कई नेता भी थे, जो टीवी पर नीतीश का पक्ष संभालते थे. उनके पास अतिपिछड़ों, महादलितों और महिलाओं को ज्यादा हक देने का श्रेय भी था तो फिर वे उसे महागठबंधन के साथ ही अपने दल के पक्ष में भी उस तरह से क्यों नहीं करवा पाए. जबकि लालू इसमें सफल रहे. जो लोग मोहन भागवत के बयान को ही एकमात्र बड़ा कारण मानते हैं तो उनसे यह पूछा जा सकता है कि लालू तो संघ प्रमुख के बयान से पहले ही जातीय जनगणना को सार्वजनिक किए जाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे थे. जो लोग उनकी इस बड़ी जीत को सिर्फ जाति की राजनीति के जीत के चश्मे से देख रहे हैं और उसे ही स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं, उनसे यह भी पूछा जा सकता है कि जाति की राजनीति की शुरुआत तो भाजपा ने ही की. सबसे पहले उसने चक्रवर्ती सम्राट अशोक की जाति तय की और उसके बाद जीतनराम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा, रामविलास पासवान जैसे नेताओं को साथ मिलाकर बिसात बिछाई. खुद भाजपा ने प्रधानमंत्री को अतिपिछड़ा जाति का बताने से लेकर तमाम तरह की कोशिशें की. क्यों भाजपा का यह ऐलान भी काम नहीं आ सका कि जीत हासिल होने पर कोई पिछड़ा ही मुख्यमंत्री बनेगा? इतने के बाद बिहार में जिस एक बात को सबसे ज्यादा बार कहा जा रहा है, वह यह कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अगर आरक्षण का बयान नहीं दिया होता तो लालू इतने बड़े नेता नहीं बनते और भाजपा की इतनी बुरी हार नहीं होती. इन लोगों से यह पूछा जा सकता है कि लालू की यह जीत अगर सिर्फ संघ प्रमुख के बयान की वजह से ही हुई है तो फिर उस बयान का खंडन करने में प्रधानमंत्री से लेकर भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के 36 नेता क्यों सफल नहीं हो सके? वह यह बात बिहार की जनता को क्यों नहीं समझा पाए कि आरक्षण पर कोई संकट नहीं है. अकेले लालू कैसे यह समझाने में सफल हो गए कि आरक्षण पर खतरा है. और अगर ऐसा है, तब यह बात भी माननी चाहिए कि लालू की कनविंसिंग पावर प्रधानमंत्री समेत 36 बड़े नेताओं की तुलना में ज्यादा रही.
फोटोः कृष्ण मुरारी किशन
चुनाव के बाद बिहार में बहुत सारे लोग इस बात की हवा फैला रहे हैं कि परिणाम नीतीश या लालू की जीत से ज्यादा भाजपा की हार वाला है. भाजपा को हराने का अभियान था, इसलिए यह बड़ी जीत हासिल हुई? ऐसे तर्कों के एवज में यह सवाल भी बनता है कि जब किसी तरह भाजपा को हराने का ही अभियान था तो फिर पप्पू यादव जैसे नेता, जो पैसा लेकर अपनी पूरी ताकत लगा दिए, वे अपने कोसी के इलाके में भी प्रभावी क्यों नहीं हो सके. मायावती की बसपा आरक्षित सीटों पर भी जीत के लिहाज से न सही, वोट प्रतिशत बढ़ा लेने में सफल क्यों नहीं हो सकी. इस बार साथ होकर लड़े छह वाम दल ज्यादा सीटों पर जीत क्यों नहीं हासिल कर सके. इनमें सिर्फ माले ही तीन सीट को क्यों ला सकी. बिहार में कभी बहुत मजबूत रही भाकपा जैसी पुरानी पार्टी खुद को उभारने में क्यों सफल नहीं रही?
‘बिहार को हमसे ज्यादा कौन बूझेगा. हम बड़े विश्लेषकों और सर्वेक्षणों के फेर में नहीं पड़ता हूं. हम जनता की भीड़ देखकर समझ गए थे कि बाजी इस बार पलट गई है और हमारे हाथ में आने वाली है’
इतने सारे सवालों के जवाब बडे़-बड़े विश्लेषक अपने तरीके से देते हैं. वो जीत-हार के हजार कारण देते हैं लेकिन लालू एक लाइन में जवाब देते हैं, ‘बिहार को हमसे ज्यादा कौन बूझेगा. हम बडे़ विश्लेषकों और सर्वेक्षणों के फेर में नहीं पड़ता हूं. हम जनता की भीड़ देखकर समझ गया था कि बाजी इस बार पलट गई है और हमारे हाथ में आने वाली है, इसलिए मैं 190-190 कहता रहा और अपनी धुन में रहा. अपने मसले से टस से मस नहीं हुआ. मैं जनता की नब्ज जानता हूं.’
लालू प्रसाद का यह जवाब सही भी लगता है. वे जनता की नब्ज पकड़ने के उस्ताद नेता हैं. यह पहला मौका नहीं है जब लालू ने जनता की नब्ज को पकड़ा या समझा. कई बार वे नब्जों की गति को भी अपने हिसाब से ढाल लेते हैं. वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर कहते हैं, ‘इस बार के बिहार चुनाव में एक बड़ी चाल यह रही कि भाजपा लालू पर निशाना साधने की पूरी रणनीति बनाने में लगी रही और उसके अनुसार काम करती रही, लेकिन लालू ने अपनी चालों से पूरी भाजपा टीम को अपनी पिच पर लाकर मैच खेलने को मजबूर कर दिया. लालू की पिच पर उनसे बड़ा बल्लेबाज, बॉलर और फील्डर कोई हो ही नहीं सकता. आप देखिए कि भाजपा नीतीश कुमार को परास्त करने के लिए विकास बम से लेकर पैकेज बम तक फोड़ती रही और तमाम तरह की बातें करती रही लेकिन लालू ने मोहन भागवत का बयान आने से पहले से ही जातीय जनगणना को सार्वजनिक करने की मांग करके भाजपा को अपनी पिच पर लाने की कोशिश की. अंत में वह सफल भी रहे. भाजपा के बड़े नेताओं के साथ ही प्रधानमंत्री खुद लालू के बिछाए जाल में फंसे. वो भी जातिगत और सांप्रदायिक राजनीति की बात करने लगे. और उसी दिन लग गया कि अब लालू से पार पाना इनके बस की बात नहीं.’
राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘चुनाव में पिछड़ों की अभूतपूर्व गोलबंदी हुई है. 1995 वाली स्थिति बनी है. यह गोलबंदी सिर्फ और सिर्फ लालू प्रसाद ही करवा सकते थे. दरअसल लालू प्रसाद एक ऐसे नेता हैं, जिनकी 100 गलतियों को 100 वर्षों तक पिछड़े व दलित माफ करते रहेंगे और अगले 100 वर्ष तक अगड़े उनसे अलगाव का भाव बरतते रहेंगे.’ राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार मणि कहते हैं, ‘यह चुनाव परिणाम अब तक किसी को समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा कैसे हुआ, क्यों हुआ लेकिन यह सबको समझ में आ रहा है कि इस बार के चुनावी मैच में मैन ऑफ द मैच लालू प्रसाद ही रहे.’
मणि जीत के इस समीकरण को नीतीश और लालू के अलग-अलग फ्रेम में बांधते हैं. ऐसा सिर्फ वही नहीं कर रहे. पूरे बिहार में अब इस पर बात जारी है कि जीत के हीरो नीतीश हैं या लालू. यह बहस चुनाव परिणाम के बाद से शुरू हुई है और एक तरह से यह बेजा बहस है. बिहार के चुनाव को देखें तो यह साफ होगा कि नीतीश जीत के बाद हीरो बने या जीतकर भी वे उतने बड़े हीरो नहीं बन सके, जितने बड़े स्वाभाविक तौर पर लालू बन गए. इसका आकलन सिर्फ उन्हें या उनकी पार्टी को मिली सबसे ज्यादा सीटों से नहीं किया जा सकता बल्कि पूरे चुनाव में या चुनाव के पहले लालू ने जो नीति-रणनीति अपनाई, उससे वे हीरो बनते गए.
नीतीश की ही सभा में लालू ने बहुत आसानी से नीतीश और कांग्रेस दोनों को बैकफुट पर लाकर एक बड़ी चाल चल दी. ऐसा करके लालू ने पूरे बिहार में पिछड़ों को और उसमें भी विशेषकर यादवों को यह संदेश दे दिया कि वे गोलबंद हों
इसके लिए लालू प्रसाद यादव की रणनीति को लोकसभा चुनाव के बाद से ही देखना होगा. लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद लालू प्रसाद ने ही यह कहा था कि हमारे वोटों के बिखराव का फायदा बिहार में भाजपा या नरेंद्र मोदी को मिला है. लालू के इस बयान के बाद से ही हिसाब मिलाकर देखा गया तो आंकड़े गवाही देने लगे. लालू की ही पहल थी कि लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद नीतीश के साथ मिलकर बिहार में उपचुनाव लड़े और अच्छी जीत मिली. यह एक तरीके से टेस्ट करने जैसा था. उसके बाद लालू ही पहल करते रहे, बात आगे बढ़ती गई लेकिन इस बढ़ती हुई बात के बावजूद नीतीश, लालू की तरह आश्वस्त नहीं दिखे. लालू हमेशा इस महागठजोड़ में सफलता के सूत्र देखते रहे, आंकते रहे. नीतीश साथ आने को राजी होकर भी दूरी का भाव बरतते रहे. जब चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत हुई तो नीतीश कुमार के सलाहकार प्रशांत किशोर ने नीतीश के नेता के रूप में चयन हुए बिना ही पटना में ‘यूं ही बढ़ता रहे बिहार’, ‘एक बार और नीतीश कुमार’ वाले बड़े-बड़े पोस्टर टंगवा दिए. इसे लेकर नीतीश से सवाल हुए. उन्होंने कहा कि उन्हें जानकारी नहीं. उसके बाद नीतीश नेता चुने गए, लालू ने ही उनके नाम का ऐलान किया लेकिन नीतीश अकेले ही प्रचार अभियान चलाते रहे. पटना से लेकर बिहार के अलग-अलग हिस्सों में नीतीश के ही पोस्टर-होर्डिंग लगते रहे, गाने बजते रहे. इन सबसे लालू को दूर रखा गया. अब कहा जा रहा है कि यह प्रशांत किशोर के प्रचार अभियान का हिस्सा था कि लालू प्रसाद को पहले थोड़ा दूर रखा जाए, फिर बाद में पोस्टर पर लाया जाए, साथ होने का एहसास कराया जाए.
फोटोः सोनू किशन
अब ऐसे तमाम तर्क दिए जा रहे हैं कि सब कुछ रणनीति के तहत हुआ लेकिन यह एक तरीके से सच्चाई को झुठलाने वाली बात है. सच यही है कि जब नीतीश कुमार के बड़े और आकर्षक होर्डिंग लग रहे थे और पूरा पटना रातोंरात उनके पोस्टरों से पट रहा था तब भाजपा, पप्पू यादव और लोजपा जैसी पार्टियां भी उस पोस्टर वार में अपनी जगह तलाशने में लगे हुए थे. उस वक्त लालू अपने तरीके से चुनावी अभियान में लगे हुए थे. वे जातिगत जनगणना को जारी करने की मांग को लेकर पटना के गांधी मैदान में धरना-प्रदर्शन कर रहे थे. अपने समर्थकों के साथ राजभवन मार्च कर रहे थे. जब सबके पोस्टर चमकने लगे और सबने अपने-अपने रथ निकालने शुरू किए तो लालू राजधानी पटना में टमटम यात्रा निकालकर सबके अभियान की हवा निकाल रहे थे. उस टमटम यात्रा से ही अंदाजा लग गया था कि भाजपा या नीतीश कुमार कितना भी प्रचार कर लें, लालू कोई भी एक अभियान चलाकर सबका ध्यान अपनी ओर खींच लेंगे. उसके बाद भी नीतीश की उन्हें लेकर हिचक दूर नहीं हुई. वे दूरी का भाव बरतते ही रहे. सीटों का बंटवारा हो जाने, टिकट का वितरण हो जाने के बाद भी साझा प्रचार अभियान की कमी लगातार दिखती रही और बार-बार बताया जाता रहा कि नीतीश कुमार व उनके साथी ऐसा कर ‘चित भी मेरी, पट भी मेरी’ वाली स्थिति पाना चाहते थे. अगर लालू प्रसाद के साथ हार हुई तो भी वे अपनी छवि बचाकर रखना चाहते थे ताकि वे कह सकें कि उन्होंने कभी शालीनता नहीं तोड़ी, कभी जाति की बात नहीं कही और जीत जाएंगे तो सेहरा उनके माथे बंधेगा ही. लेकिन दूसरी ओर लालू प्रसाद इन तमाम किस्म की नीतियों-रणनीतियों से अलग अपनी धुन में लगे रहे. भाजपा को हराने से पहले उन्होंने नीतीश कुमार और कांग्रेस को चित किया, उन्हें बैकफुट पर लाने का काम किया. दोनों को चित करने के लिए और दोनों के तारणहार के तौर पर चुनाव से बहुत पहले उन्होंने खुद को बहुत ही चतुराई से स्थापित कर दिया. यह पटना के गांधी मैदान में आयोजित स्वाभिमान सम्मेलन में हुआ, जब उनके साथ नीतीश कुमार और सोनिया गांधी दोनों थे. उस सभा में एक वरिष्ठ नेता की तरह जब उन्हें सबसे अंत में बोलने का मौका मिला तो लालू ने भारी भीड़ को देखकर उसके अनुसार ही बोलना शुरू कर दिया. सबसे पहले उन्होंने कांग्रेस की सोनिया गांधी को समझाया कि वे उन्हें कमतर आंकने की कोशिश न करें और वे जो उन्हें उपेक्षित करती हैं, वह ठीक नहीं है. सोनिया के सामने ही दूसरे शब्दों में यह बात कहकर लालू ने एक तरीके से कांग्रेस को अपना संदेश दे दिया. उसके बाद उन्होंने कहा कि नीतीश डरते रहते हैं, इन्हें धुकधुकी लगी हुई है कि हम उनको सीएम बनाएंगे कि नहीं लेकिन हम यहां भारी भीड़ में उन्हें आश्वस्त करना चाहते हैं कि उनको ही सीएम बनवाएंगे, डरे नहीं. नीतीश कुमार की ओर से आयोजित सभा में लालू ने बहुत आसानी से नीतीश और कांग्रेस दोनों को बैकफुट पर लाकर एक बड़ी चाल आसानी से चल दी. ऐसा करके लालू प्रसाद ने आसानी से पूरे बिहार में पिछड़ों को और उसमें भी विशेषकर यादवों को यह संदेश दे दिया कि वे गोलबंद हों, क्योंकि महागठबंधन की जीत पर नीतीश भले ही सीएम बनें लेकिन असली हीरो और किंगमेकर लालू प्रसाद ही रहेंगे. लालू यादवों की नब्ज पकड़ चुके थे कि नीतीश और भाजपा द्वारा बार-बार खलनायक और जंगलराज का पर्याय बनाए जाने के बाद वे सत्ता में वापसी की छटपटाहट में हैं. ऐसी स्थिति में श्रेष्ठताबोध की राजनीति ही यादवों को गोलबंद होने का अवसर देगी. लालू ने सिर्फ उसी मंच से अपने को किंगमेकर जैसा साबित नहीं किया बल्कि बीच में जब-जब मौका आया, तब-तब उन्होंने इस संदेश को अधिकाधिक फैलाने की कोशिश की कि वे हीरो हैं, किंगमेकर रहेंगे.
जब सबने अपने-अपने रथ निकालने शुरू किए तो लालू राजधानी पटना में टमटम यात्रा निकाल सबके अभियान की हवा निकाल रहे थे. उससे ही अंदाजा लग गया था कि कितना भी प्रचार कोई कर ले, लालू सबका ध्यान अपनी ओर खींच ही लेंगे
लालू प्रसाद से यह पूछने पर कि नीतीश तो विरोधी थे आपको ही पछाड़कर आगे गए थे, फिर कैसे उनके साथ समीकरण बना रहे हैं और जीत का दावा कर रहे हैं? तब उनका जवाब था, ‘अरे हम नीतीश को भेजे थे हनुमान बनाकर दुश्मन के खेमे में कि जाओ और भेद लेकर आओ और लंका का दहन भी कर आओ. नीतीश ने हनुमान की भूमिका निभा दी है तो अब लौट आए हैं हमारे खेमे में.’ लालू ऐसी बातें कहकर खुद को बड़े नेता के तौर पर स्थापित करते रहे और चुनाव परिणाम आ जाने के बाद भी जब नीतीश को हीरो बनाने की तमाम कोशिशें होती रहीं और मीडिया ‘नीतीशगान’ में लगा रहा तब लालू ने एक बार में बाजी पलटकर फिर से संदेश दे दिया कि नीतीश उनके शागिर्द हैं, सेनापति भर हैं, असली हीरो, राजा, गुरु या किंगमेकर वही हैं. चुनाव परिणाम आने के दिन भारी भीड़ में एक बार फिर लालू ने कहा कि नीतीश ही सीएम बनेंगे और अब यहीं रहकर बिहार को संभालेंगे. मैं अब बनारस से लेकर दिल्ली तक जाकर राष्ट्रीय राजनीति को देखूंगा, समझूंगा और मोदी का विरोध करूंगा. ऐसा कहकर लालू जीत जाने के बाद भी बाजी को अपने हाथ में रख लिए कि नरेंद्र मोदी के विरोध और उस विरोध से निकली जीत के असली हीरो वही हैं.
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ऐसा कहकर लालू प्रसाद कोई आत्ममुग्धता वाली बात भी नहीं कर रहे बल्कि यह पूरे चुनाव में देखा भी गया कि वही हीरो रहे, जिन्होंने भाजपा की पूरी टीम का मुकाबला किया. बीच चुनाव में तो कई ऐसे मौके आए, जब उन्होंने न सिर्फ शब्दावलियों व मुहावरों को बदलकर भाजपा को नीतीश से लड़ने की बजाय खुद से लड़ने के लिए मजबूर किया बल्कि बातों में उलझाकर जाति और संप्रदाय की राजनीति पर भी आ जाने को विवश भी किया. इतना ही नहीं प्रचार के दौरान ऐसे कई मौके आए, जब उन्होंने अपने पहले से निर्धारित सभाओं में भी फेरबदल कर दिए और इसके लिए उन्हें किसी की सलाह या सुझाव की जरूरत नहीं रही. कई बार ऐसा हुआ, जब लालू ने फेर बदल कर अपनी सभा को वहां तय करवा दिया, जिस इलाके में नरेंद्र मोदी की सभा हुई. वो मोदी की सभा के पहले या तो उस इलाके में मोदी का खेल बिगाड़ते रहे या मोदी की सभा के बाद उनकी बातों की असर की धार को कमजोर करते रहे.
लालू प्रसाद ने भाजपा से पहले नीतीश से एक बड़ी बाजी सीटों के बंटवारे में जीती. सीटों के बंटवारे में नीतीश कुमार अपनी पार्टी के लिए ज्यादा सीट चाहते थे लेकिन लालू ने बराबरी के बंटवारे की शर्त रखी. बहुत दिनों तक मतभेद रहा लेकिन लालू एक बार अपनी बात कहकर फिर अपने अभियान में ही लग गए. नीतीश कुमार को मजबूर होना पड़ा कि वे लालू प्रसाद की शर्तों पर आएं. यह नीतीश की मजबूरी भी थी क्योंकि लोकसभा चुनाव में यह साबित हो गया था कि अलग-अलग लड़ने की स्थिति में लालू प्रसाद उनसे ज्यादा बड़े नेता साबित होंगे और ऐसा लोकसभा चुनाव में अधिक सीट और अधिक वोट पाकर लालू ने साबित भी कर दिया था.
‘चुनाव में पिछड़ों की अभूतपूर्व गोलबंदी हुई है. यह गोलबंदी सिर्फ लालू ही करवा सकते थे. वह ऐसे नेता हैं, जिनकी 100 गलतियों को 100 वर्षों तक पिछड़े व दलित माफ करते रहेंगे और अगले 100 वर्ष तक अगड़े उनसे अलगाव का भाव बरतते रहेंगे’
महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘लालू प्रसाद यादव का कोई भी काम योजनाबद्ध नहीं होता और यही उनके काम करने का अंदाज है.’ सुमन की बातों का विस्तार करें तो उसे कई स्तरों पर देख सकते हैं और तब साबित होता है कि वे नब्ज समझने के साथ ही रणनीतियों को मन ही मन बनाने और फिर खुद से ही उसे लागू कर देने के उस्ताद नेता रहे हैं. इसका एक बेहतरीन नमूना और मिलता है. उसे एक किस्से के रूप में एक बड़े पत्रकार सुनाते हैं जो अपने एक साथी को लेकर लालू प्रसाद यादव के पास गए थे. यह वह समय था जब नीतीश कुमार परेशान से थे. आचार संहिता लगने के कोई एक सप्ताह पहले की बात है. नीतीश पटना में दो महत्वपूर्ण योजनाओं का उद्घाटन करने की हड़बड़ी में थे. उन्हें पटना के बेली रोड पर बने फ्लाईओवर और बेली रोड पर ही बन रहे राज्य संग्रहालय का उद्घाटन करना था. तब तक दोनों में से किसी का काम पूरा नहीं हो सका था. फ्लाईओवर बन गया था लेकिन एक तरफ का काम बाकी था और राज्य संग्रहालय तो अब तक पूरा नहीं हो सका है. नीतीश कुमार तब दोनों के उद्घाटन की तिथि एकबारगी से तय कर दोनों महत्वपूर्ण निर्माण कार्यों का श्रेय अपने पास रखकर भविष्य में अपने काम का हिसाब जोड़ने में व्यस्त थे. उस समय भाजपा की ओर से एक बयान आया कि उसने देश को पहला पिछड़ा प्रधानमंत्री दिया. लालू प्रसाद उस समय उसी वरिष्ठ पत्रकार और उनके साथी के साथ बैठे हुए थे. वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि जिस समय अमित शाह का यह बयान आया उस समय लालू को इसके बारे में बताया गया. तब लालू कुछ नहीं बोले. वह पत्रकार कहते हैं कि उन्होंने लालूजी से कहा कि भाजपा झूठ बोल रही है, पहले पिछड़े प्रधानमंत्री तो देवगौड़ा थे, जो आप लोग ही दिए थे. यह सुनते ही लालू प्रसाद तुरंत गति में आ गए. उनके दिमाग से यह बात निकली हुई थी. तुरंत देवगौड़ा को फोन मिलवाया. सीधे पूछे कि किस जाति के हैं आप देवगौड़ाजी. जवाब मिला. लालू प्रसाद ने तुरंत मीडिया वालों को फोन मिलवाया कि मेरा बयान जारी करवाओ की भाजपा झूठ बोल रही है, पहला पिछड़ा प्रधानमंत्री हम लोगों ने दिया था-देवगौड़ा के रूप में. अमित शाह को जवाब दो. वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि लालू प्रसाद को वे और उनके साथी समझाते रहे कि शाम को आराम से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताइए, आप सब काम अचानक, बिना प्लानिंग के, इतनी हड़बड़ी में क्यों करते हैं. तब लालू ने जवाब दिया कि इतना मौका राजनीति में नहीं मिलता. हम नहीं बोलेंगे, कोई दूसरा बोल देगा तो लालू एक मौका खो देगा, मुंह देखता रह जाएगा. वह पत्रकार वहीं बैठे रहे, पांच मिनट में लालू ने अमित शाह को जवाब देकर अपने बयान को देश भर में चर्चित करवा दिया. पत्रकार कहते हैं कि उनके साथ चुनाव प्रबंधन का जो उस्ताद साथी गया था, वह एकटक लालू प्रसाद यादव को देखता ही रह गया कि इतने तेज दिमाग के नेता को चुनाव प्रबंधक की क्या जरूरत है.
ऐसा नहीं कि लालू यादव ने उस रोज अनायास ही यह किया. वह रोजाना की राजनीति में बहुत कुछ अनायास, बिना प्लानिंग करते रहते हैं लेकिन कुछ भी प्लानिंग के साथ न करके सब कुछ प्लानिंग के साथ ही करते हैं. उन्होंने 1997 में राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री भी बनाया था तो सबने कहा था कि यह अचानक बिना सोचे समझे फैसला ले रहे हैं, अब इनकी नइया डूब जाएगी. रसोई से निकाल एक महिला को सत्ता के शीर्ष पर बिठाकर अपनी राजनीति खत्म कर रहे हैं. लेकिन उस समय लालू प्रसाद ने अगर यह फैसला नहीं लिया होता और राबड़ी देवी की जगह किसी और को मुख्यमंत्री बना दिया होता तो आज वह बिहार के राजनीतिक इतिहास में दफन हो चुके होते. लालू प्रसाद ने अपने सालों को आगे बढ़ाया, उससे बदनामी हुई तो समय रहते ही कैसे अलग हुआ जाता है, उसे भी दिखाया. लालू प्रसाद ने समझदारी के साथ पहले अपनी बेटी मीसा को ही राजनीति में लाकर आजमाया, जब बात नहीं बनी तो मीसा को भविष्य की राजनीति के लिए सुरक्षित रख दिया.
‘अरे हम नीतीश को भेजे थे हनुमान बनाकर दुश्मन के खेमे में कि जाओ, भेद लेकर आओ और लंका का दहन भी कर आओ. नीतीश ने हनुमान की भूमिका निभा दी है तो अब लौट आए हैं हमारे खेमे में’
इस बार जब पप्पू यादव से लेकर तमाम दूसरे नेता दोनों बेटों को राजनीति में लाने को लेकर उन पर हमला बोलते रहे, राजद के नेता भी इसका विरोध करते रहे लेकिन लालू प्रसाद जान गए थे कि इस बार नहीं तो फिर आगे कभी नहीं. और लालू प्रसाद ने इस बार अगड़ा-बनाम पिछड़ों की लड़ाई भी एक बार सही समय पर ही शुरू की. उनके दल में सवर्ण नेताओं की भरमार रही है. राजपूत जाति से उनके दल में बड़े नेता रहे हैं लेकिन लालू लोकसभा चुनाव में ही जान गए थे कि राजपूतों की निष्ठा उनके दल के प्रति नहीं बल्कि राजपूत उम्मीदवारों के प्रति ज्यादा है, इसलिए इस बार उनके दल के नेता रघुवंश प्रसाद सिंह जो भी बोलते रहे, लालू प्रसाद ने ज्यादा नोटिस नहीं लिया. जगतानंद सिंह जैसे दिग्गज नेता मौन साधे रहे, लालू प्रसाद ने उस पर ध्यान नहीं दिया. लालू ने इस बार अगर सीधे तौर पर भूमिहारों का विरोध किया और अपने दल से एक भी भूमिहार को टिकट नहीं दिया तो यह भी सिर्फ इस चुनाव में अगड़ा बनाम पिछड़ा होने की कहानी नहीं थी. लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद एक बार भूमिहारों की शरण में जाकर, भूराबाल साफ करो जैसे नारे पर माफी मांगकर, अपने कार्यकर्ताओं को भूमिहारों को सामंत न कहने की हिदायत आदि देकर आजमा चुके थे कि इसका उन्हें कोई फायदा नहीं मिला था, भूमिहार उनसे नहीं जुड़ सके थे. महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘लालू प्रसाद जानते हैं कि वे एक ऐसे नेता हैं, जो अगले कई साल तक बिना गलती के भी सवर्णों के बीच खलनायक ही बने रहेंगे, इसलिए उन्होंने इस बार आखिरी बार की तरह आर पार की लड़ाई छेड़ी.’ कहने का मतलब यह कि लालू प्रसाद एक ऐसे नेता हैं, जो स्थितियों को देखकर अपना दांव, अपनी रणनीति सब बदलते रहते हैं. हालांकि पिछले 25 वर्षों से उन्होंने सिर्फ एक बात में बदलाव नहीं किया है और वह है भाजपा विरोध.
भारत में बढ़ती असहिष्णुता को लेकर देश छोड़ने के बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान के बयान को लेकर बवाल मचा हुआ है. सरकार ने इसे देश में डर फैलाने की कोशिश बताया है. आमिर के इस बयान के बाद सरकार ने कहा कि आमिर देश में सुरक्षित हैं और देश छोड़ने की बात कहकर उन्होंने अपने चाहने वालों का अपमान किया है. केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि हम आमिर को देश छोड़कर नहीं जाने देंगे. वे यहां सुरक्षित हैं. उन्होंने ये भी कहा कि उनका बयान राजनीति से प्रेरित है. सरकार के साथ ही पाकिस्तानी मूल के लेखक तारिक फतह ने भी आमिर के बयान की आलोचना की है. तारिक ने कहा, ‘हिंदुस्तान मुसलमानों के लिए सबसे सुरक्षित जगह है. अगर आमिर यहां असुरक्षित महसूस करते हैं, तो हर जगह असुरक्षित महसूस करेंगे.’
सोमवार को नई दिल्ली में आमिर ‘रामनाथ गोयनका पुरस्कार’ समारोह में बोल रहे थे जब उन्होंने कहा कि देश में बिगड़ते माहौल को लेकर एक बार उनकी पत्नी किरण राव ने देश छोड़ने की बात कही थी. वे बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं.
आमिर ने देश की छवि को धक्का पहुंचाया : सरकार
केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू ने कहा कि आमिर खान ने ऐसा बयान देकर देश की छवि को चोट पहुंचाई है. आंकड़े बताते हैं कि एनडीए सरकार में सांप्रदायिक घटनाएं कम हुई हैं, ऐसे में यह कहना कि असहिष्णुता बढ़ी है, गलत है. समस्याएं हैं, पर उन्हें मिलकर सुलझाना होगा.
विपक्ष ने सरकार पर साधा निशाना
विपक्ष ने आमिर खान के बयान के जरिए सरकार पर फिर निशाना साध लिया है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, ‘आमिर खान देशभक्त हैं और अगर वे किसी मुद्दे पर सवाल उठा रहे हैं, तो सरकार को उनकी बात सुननी चाहिए. हर उस व्यक्ति की देशभक्ति पर सवाल उठाया जा रहा है, जो सरकार के खिलाफ आवाज उठा रहा है.’ वहीं भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि आमिर डर नहीं रहे हैं, बल्कि लोगों को डरा रहे हैं और राहुल गांधी सहिष्णुता का पाठ न पढ़ाएं. सबसे ज्यादा असहिष्णुता कांग्रेस के शासन में ही फैली है.
दो खेमों में बंटा सोशल मीडिया
आमिर के बयान को लेकर सोशल मीडिया भी दो खेमों में बंट गया है. जहां बॉलीवुड अभिनेता अनुपम खेर ने ट्विटर पर उनके बयान की आलोचना की, वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उनका समर्थन किया. अनुपम खेर ने लिखा, ‘आमिर ने ऐसा बयान देकर असहिष्णुता की लौ को हवा दी है’. वहीं केजरीवाल का कहना है कि आमिर का कहा एक-एक शब्द सही है. सोशल मीडिया पर हैशटैग आमिर खान और हैशटैग इंटॉलरेंस पर लोग अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं.
पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट काम करने के लिए दिया जाने वाला ‘रामनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म’ अवार्ड इस साल कुल 57 पत्रकारों को दिया गया. पुरस्कार वितरण समारोह सोमवार को नई दिल्ली के आईटीसी मौर्या होटल में संपन्न हुआ. समारोह के मुख्य अतिथि वित्त और सूचना प्रसारण मंत्री अरुण जेटली थे.
ये पुरस्कार 2013-14 के लिए दिए गए थे, जिसमें सरोकारी पत्रकारिता करने के लिए मशहूर ‘तहलका’ को तीन पुरस्कार मिले. इसमें 2013 के लिए दो और 2014 के लिए एक पुरस्कार शामिल हैं. 2013 का ‘सर्वश्रेष्ठ हिंदी पत्रकारिता- प्रिंट’ श्रेणी का पुरस्कार राहुल कोटियाल और अतुल चौरसिया को ‘हत्याग्रही गांधी’ (तहलका हिंदी, अंक 31 मई 2013) के लिए मिला, वहीं 2014 में इसी श्रेणी में बृजेश सिंह की रिपोर्ट ‘क्यों छोड़े कोई आतंकवाद’ (तहलका हिंदी, अंक 15 अप्रैल 2014) को इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया. ‘सर्वश्रेष्ठ अंग्रेजी पत्रकारिता- प्रिंट’ (2013) श्रेणी में ‘तहलका’ के ही रियाज़ वानी को ये पुरस्कार मिला.
‘तहलका हिंदी’ को लगातार पांचवें साल ‘सर्वश्रेष्ठ हिंदी पत्रकारिता- प्रिंट’ का रामनाथ गोयनका पुरस्कार मिला है. समारोह में शिरकत करने वाली हस्तियों में अभिनेता-निर्देशक आमिर खान, कांग्रेस नेता शशि थरूर, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला, पूर्व वित्त मंत्री पी.चिदंबरम, भाजपा नेता राजीव प्रताप रूडी और भाजपा सांसद मनोज तिवारी शामिल थे.
दिल्ली के पटपड़गंज पश्चिम इलाके में बना ये घर विभिन्न कलाओं का केंद्र कहा जा सकता है. ये घर बहल परिवार का है. बहल परिवार यानी मां नवनिंद्र बहल, पिता ललित बहल और बेटे कनु बहल.
नवनिंद्र बहल पंजाबी साहित्य की पढ़ाई के बाद पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी के नाटक विभाग में पढ़ा चुकी हैं. उन्होंने थिएटर के लिए नाटक लिखे, उनका निर्माण किया साथ ही अभिनय में भी हाथ आजमाया. रंगमंच अभिनेता के रूप में उनके पति ललित बहल भी काफी सक्रिय रहे हैं. देश में जब टीवी इंडस्ट्री शुरुआती दौर में थी, तब ही बहल दंपत्ति उसमें हाथ अाजमा चुके थे. उस दौर में पंजाब में मची उथल-पुथल पर गुलजार की फिल्म ‘माचिस’ बाद में आई, उससे पहले ही ललित इस समस्या पर चर्चित टीवी धारावाहिक ‘अफसाने’ और टेलीफिल्म ‘हैप्पी बर्थडे’ और ‘तपिश’ बना चुके थे. वैसे नवनिंद्र तो हिंदी फिल्मों में छोटी लेकिन यादगार भूमिकाएं निभा चुकी हैं. बड़े परदे पर नवनिंद्र आखिरी बार विकास बहल की फिल्म ‘क्वीन’ में दिखीं थीं, जहां वे उस पंजाबी एनआरआई आंटी के किरदार में थीं, जो टूटी-फूटी फ्रेंच बोलती हैं. ललित को कभी फिल्मों में हाथ आजमाने का मौका नहीं मिला था लेकिन ये कमी भी तब दूर हो गई जब दो साल पहले उन्हें दिबाकर बनर्जी और यशराज फिल्म्स के बैनर तले बनने वाली फिल्म ‘तितली’ में ‘डैडी’ के किरदार के लिए चुना गया. यहां बात हालिया रिलीज फिल्म तितली के निर्देशक कनु बहल के परिवार की हो रही है , जिनके खून में ही रंगमंच, सिनेमा और अभिनय बसा हुआ है.
कनु की पहली फिल्म ‘तितली’ काफी वाहवाही बटोर रही है. यह कार चोरों के एक परिवार की कहानी है, जो दिल्ली के एक उपनगर में रहता है. इस तरह की कहानियां ही लोगों में उत्सुकता जगाने के लिए काफी होती हैं लेकिन दिलचस्पी तब और बढ़ जाती है जब मुख्य किरदार निभा रहे अभिनेता निर्देशक के पिता हों और फिर पता चले कि फिल्म के किरदारों के चयन की प्रक्रिया और भी मजेदार रही थी.
फिल्म में दिखाया गया है कि परिवार में कितनी बातें एक से दूसरे में आती हैं और ज्यादातर समय उन्हें भी इस बात का एहसास नहीं होता
बिना लाग-लपेट बोलने वाले कनु बताते हैं, ‘फिल्म में ‘डैडी’ के किरदार के रूप में अपने पिता को लेने का निर्णय एक जरूरत के मद्देनजर लिया गया. फिल्म की स्क्रिप्ट का पहला ड्राफ्ट बिल्कुल अलग था, यह अपने समय से आगे की कहानी थी. फिर भी मुख्य किरदार तितली के अलावा बड़े भाई का किरदार काफी बचकाना लग रहा था. इस पर मेरे और फिल्म के सह-लेखक शरत कटारिया के बीच काफी सोच-विचार और बहस हुई. कथानक पर हो रही बहस के बीच ही पिता का किरदार जेहन में आया. उसके बाद डैडी की भूमिका को निभाने के लिए एक अभिनेता को खोजने की जद्दोजहद शुरू हुई. ये पात्र ज्यादा अर्थपूर्ण नहीं था और तमाम वरिष्ठ अभिनेता इस तरह के किरदार सरलता से निभा लेते हैं, लेकिन मुझे एक ऐसा अभिनेता चाहिए था जो नैचुरल लगे.’ बहरहाल फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर अतुल मोंगिया के साथ काफी माथापच्ची करने के बाद ललित बहल को इस भूमिका के लिए चुना गया. कनु बताते हैं, ‘बड़े होने के दौरान मेरा और मेरे पिता का रिश्ता तनावपूर्ण रहा है, इसलिए ‘डैडी’ किरदार के पीछे के कुछ पहलुओं से वे पहले से ही वाकिफ थे.’
एक असामान्य परिवार के इर्द-गिर्द कहानी गढ़ने का विचार कनु के जीवंत अनुभवों से निकला था. वे बताते हैं, ‘तितली से पहले मैं किसी दूसरी स्क्रिप्ट पर काम कर रहा था जो बन नहीं पा रही थी. फिर मुझे लगा कि शायद वह एक अच्छी स्क्रिप्ट नहीं थी और मैं उसे पूरी ईमानदारी से नहीं लिख पा रहा था. व्यक्तिगत तौर पर तब मैं अपने तलाक के तनाव से जूझ रहा था और तब मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि आखिर मैं फिल्में बनाना ही क्यों चाहता हूं! ‘तितली’ की कहानी वास्तव में तब निकलकर सामने आई जब मैंने खुद से कहा कि आगे जो भी करूंगा वह निजी और ईमानदार होगा.’
तब एक बड़े भाई की ज्यादतियों से परेशान होकर घर छोड़कर भागने की योजना बनाने वाले लड़के की कहानी सहज रूप में कनु के जेहन में आई. कनु मानते हैं कि जब कथानक लिखा जा रहा था तब ये कहानी पितृसत्ता, पारिवारिक हिंसा और भाग जाने को लेकर बुनी गई थी लेकिन फिल्म एक अलग ही रूप में निकलकर सामने आई. कनु बताते हैं, ‘फिल्म एक चक्र में चलती है. फिल्म में दिखाया गया है कि परिवार में कैसे, कितनी बातें एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे में आ जाती हैं और ज्यादातर समय खुद उन्हें भी इस बात का एहसास नहीं होता.’ यहां ललित भी हामी भरते हुए बताते हैं, ‘फिल्म में ऐसी ही कुछ बारीकियों को शामिल किया गया है. उदाहरण के लिए, आप जिस तरह दांतों को साफ करते हैं, कभी आप ध्यान दें तो पता लगेगा कि ये आप बिल्कुल अपने पिता की तरह ही करते हैं. अगर आप अपने परिवार से दूर भी हैं तब भी ये आपके अंदर ही, आपके साथ चलता है.’
साफगोई कनु को शायद उनके पिता से ही मिली है, जिन्होंने शुरुआत में फिल्म में कोई भी किरदार निभाने से साफ-साफ इंकार कर दिया था. इस फैसले के पीछे उनके अपने कारण थे. ललित कहते हैं, ‘मेरे दिमाग में कहीं ये था कि ये हम दोनों के लिए ही पहली फिल्म है. मेरा उसके साथ वैसे ही खटास भरा रिश्ता था. मैं इसलिए भी परेशान था कि कहीं अगर फिल्म चल नहीं पाई या मैं अपने किरदार से न्याय नहीं कर पाया तो इस असफलता के लिए कसूरवार मुझे ठहराया जाएगा.’ इसी के चलते उन्हें किरदार निभाने के लिए राजी करने के लिए दोस्तों और परिवार की जरूरत पड़ी लेकिन एक बार जब वे फिल्म के सेट पर पहुंच गए तो उन्हें समझ आ गया कि फिल्म के विषय पर कनु की पकड़ काफी मजबूत है.
कनु के मुताबिक, ‘वे अपने साथ वह संजीदगी और मजबूती लेकर आए जो किरदार के लिए चाहिए थी.’ लेकिन उनके पिता को फिल्म के सेट पर कभी भी स्क्रिप्ट नहीं दिखाई गई इसलिए वे इसका अंदाजा भी नहीं लगा पाए कि फिल्म आखिर है किसके बारे में. ललित मानते हैं कि फिल्म की शूटिंग से पहले होने वाली वर्कशॉप में जाने से उन्हें थोड़ा अंदाजा जरूर हो जाता था कि फिल्म किस दिशा में बढ़ रही है. फ्रांस में स्क्रीनिंग के वक्त ही ललित ने इस फिल्म को पहली बार देखा. ललित मानते हैं कि फिल्म में कुछ तत्व हैं जिनसे वह सहमति नहीं रखते लेकिन एक अभिनेता होने के नाते वह अपने निर्देशक को अलग रचनात्मक सोच रखने की आजादी देने को तैयार थे. हालांकि कनु बताते हैं कि फिल्म की शूटिंग के वक्त वे उत्सुकता से अपने पिता से ये पूछते थे कि उन्होंने अपने किरदार के लिए थोड़ी सी भी तैयारी की है या नहीं. तब ललित निष्पक्षता से जवाब देते कि उन्हें अपने निर्देशक की सोच में विश्वास है और वे वही करते हैं जो उनसे कहा जाता है.
बाप-बेटे के बीच इस तनावपूर्ण रिश्ते का कारण कनु के बचपन में छिपा है. नवनिंद्र बताती हैं, ‘सृजनात्मकता हमारे परिवार में रही है. मेरे पिता नाटककार थे और मां अभिनेत्री इसीलिए जब मैंने और ललित ने भी उसी दिशा में कदम बढ़ाए तो अपने ही बेटे को समय नहीं दे सके.’
जब 80 के दशक में लोग परिवार के साथ फिल्में देखने जाने लगे तब पारिवारिक फिल्मों को सिर्फ खुशियां मनाने तक सीमित कर दिया गया
यहां नवनिंद्र को बीच में रोकते हुए ललित बताते हैं, ‘अब कनु की फिल्म देखकर लगता है कि बड़े होने के दौरान उसने खुद को कितना उपेक्षित महसूस किया होगा.’ ललित ने अपनी पहचान खुद बनाई है और वे कनु के भविष्य को लेकर खासे चिंतित थे. उन्हें लगता था अभिनय कनु के लिए सबसे अच्छा विकल्प होगा. कनु अपने माता-पिता के टीवी धारावाहिकों का छोटा-मोटा हिस्सा भी बने पर धीरे-धीरे उनके माता-पिता समझ ही गए कि उन दोनों की प्राथमिकता भले ही अभिनय हो पर उनका बेटा ये नहीं करना चाहता. जब कनु ने फिल्म निर्देशक बनने की ख्वाहिश जाहिर की, तब उनके पिता को उन पर संदेह था. ललित बताते हैं, ‘वो खुद एक बच्चा था, उसमें निर्देशन के लिए जरूरी गंभीरता कैसे आ सकती थी, वो कैसे ऐसा निर्देशन कर सकता था जो अपरिपक्व न लगे.’
वैसे जब सिनेमा से जुड़े पारिवारिक संबंधों की बात आती है तब एक सवाल हमेशा खड़ा होता है कि भारतीय सिनेमा में परिवारों को एक सीमित परिधि में ही क्यों बांध दिया जाता है? 90 के दशक की फिल्में देखने वालों के लिए पारिवारिक फिल्म का मतलब सिर्फ ‘हैप्पी एंडिंग’ होता है.
पर नवनिंद्र ऐसा नहीं मानतीं. उनका कहना है कि 50 और 60 के दशक में भी अच्छी पारिवारिक फिल्में बनी हैं, ‘मदर इंडिया’, ‘दो बीघा जमीन’ इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं. नजरिया तब बदला जब 80 के दशक में लोग परिवार के साथ फिल्में देखने जाने लगे और पारिवारिक फिल्मों को सिर्फ सेलिब्रेशन यानी खुशियां मनाने तक सीमित कर दिया गया. कनु भी अपनी मां के विचार से सहमत हैं. वे मानते हैं कि कोई भी फिल्म उस दौर को ही दर्शाती है, जिसमें वह बनी है.
कनु विस्तार से बताते हैं कि किस तरह आजादी के बाद का भारतीय सिनेमा आदर्शवाद से प्रभावित था. फिर सत्तर के दशक की फिल्मों में गुस्सा दिखाई दिया जो इस आदर्शवादी व्यवस्था के अधूरे वादों से उपजे मोहभंग की अभिव्यक्ति था और जब इस गुस्से से भी कोई फर्क नहीं पड़ा तो 80-90 के दशकों में इसका स्तर घटना स्वाभाविक ही था. और फिर 90 के उदारीकरण के बाद फिल्मों को उत्पाद के रूप में देखा जाने लगा, तभी से ही सिनेमा ने अपनी ताकत खो दी. कनु को हाल ही में आई फिल्म निर्देशकों की नई ब्रिगेड से काफी उम्मीदें हैं. ‘बदलापुर’, ‘एनएच 10’ और ‘दम लगा के हईशा’ जैसी फिल्मों की सफलता ने इस उम्मीद को पक्का किया है. पर भारतीय सिनेमा में कोई ‘आंदोलन’ चल रहा है, वे ऐसा नहीं मानते. वे खंडन करते हुए कहते हैं, ‘वास्तव में सत्यजीत रे और ऋत्विक घटक के समय के बाद दुनिया भारत को फिर से एक फिल्म बनाने वाले देश के रूप में पहचान रही है. मैं मानता हूं कि चंद निर्देशकों की पहली फिल्में बहुत अच्छी थीं लेकिन आंदोलन सिर्फ एक फिल्म बनाने से तो नहीं होते. यहां देखने वाली बात होगी कि हम दूसरी फिल्में कैसी बनाते हैं. तभी हमारा काम करने का तरीका यह दर्शा सकता है कि कोई आंदोलन है या नहीं.
कनु इस बात को भी नहीं मानते कि फिल्म सिर्फ उसके लेखक से संबंधित होती है. वे मानते हैं कि फिल्म उन सब की होती है, जो फिल्म बनाने में शामिल रहते हैं. ‘तितली’ भी किसी एक व्यक्ति से प्रभावित नहीं बल्कि खुद में ही एक सशक्त फिल्म है. ललित भी इस बात का समर्थन करते हैं. वे दृढ़ता से कहते हैं कि ये फिल्म उभरते भारत पर एक टिप्पणी है. कनु को संशय है पर ललित मानते हैं कि इस फिल्म की तुलना ‘दो बीघा जमीन’ से की जा सकती है, जिस तरह ‘द डेथ ऑफ ए सेल्समैन’ टूटे हुए अमेरिकी ख्वाब का प्रतिबिम्ब थी, उसी तरह फिल्म ‘तितली’ भी मौजूदा समय का आईना है.
बिहार की जनता को बधाई. यह भाजपा के खिलाफ एक जरूरी जनादेश है. यह चुनाव राष्ट्रीय संदर्भ में लड़ा गया था. राष्ट्रीय संदर्भ ही इसमें प्रधान बन गया था. 17 माह की सरकार में ही केंद्र की सरकार ने जो माहौल बना दिया है, उसमें सामंती और सांप्रदायिक ताकतों का परास्त होना जरूरी था.
भाजपा के खिलाफ जनादेश पर आप ज्यादा जोर दे रहे हैं. इसे नीतीश और लालू के पक्ष में भी तो कहा जा सकता है?
यह लालूजी या नीतीशजी के पक्ष में नहीं बल्कि भाजपा के खिलाफ जनादेश है. लालूजी और नीतीशजी का गठजोड़ बेहतर बन गया तो जनता ने फिर से मोहलत दे दी.
कुछ लोग अभी से ही यह बात करने लगे हैं कि नीतीश और लालू चूंकि बिल्कुल अलग-अलग तरीके के लोग हैं, इसलिए पांच साल साथ रह नहीं पाएंगे.
कुछ गड़बड़ियां तो हैं. नीतीश दस सालों से सरकार में हैं और गरीबों व मजदूरों की जो समस्या है, वह बढ़ी ही है.
जब भाजपा के खिलाफ यह जनादेश है तो फिर वामपंथ को और मजबूत विकल्प बनना चाहिए था. छह वाम दल एक साथ मिलकर चुनाव तो लड़े लेकिन जीत तो सिर्फ आपकी पार्टी की हुई.
वामपंथ विकल्प बनने की स्थिति में अभी नहीं था. ऐसे ध्रुवीकरण के बीच तीन सीटें हमें मिली हैं, इसे इस तरह से देखिए कि वामपंथ पर लोगों का भरोसा जगा है.
वामपंथियों ने आपस में गठजोड़ तो किया, लेकिन वे सही तरीके से साथ नहीं चल सके, ऐसा भी कहा जा रहा है.
गठजोड़ पहले से हो जाता तो प्रचार की धार को और मजबूत किया जा सकता था. लेकिन बिहार ने दिशा दी है. वामपंथियों में इससे उत्साह बढ़ेगा.
आप लोगों का वोट प्रतिशत तो घटा है, सीट भले ही तीन मिल गईं?
जिन महत्वपूर्ण सीटों पर हम 2010 में चुनाव लड़े थे या 2014 के लोकसभा में लड़े, उन सीटों पर हमारा वोट प्रतिशत बढ़ा है और संख्या के हिसाब से वोट भी. आप देखिए कि मीडिया जिसे दिन रात एक कर तीसरा मोर्चा बनाने में लगी हुई थी, उनका क्या हुआ? यह तो साफ हुआ कि यहां तीसरी ताकत वामपंथी हैं. वामपंथी तत्काल विकल्प देने की स्थिति में नहीं हैं लेकिन हम लोकतांत्रिक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे और जनता की आवाज बनने की कोशिश करेंगे.
आपकी पार्टी तो बिना विधायक के होने के बावजूद विपक्ष की भूमिका निभाती रही है. इस बार फिर नीतीश सत्ता में आए हैं. आपकी रणनीति क्या रहेगी?
बिहार में अब भी सामंती ताकतें हैं. सरकार उन्हें संरक्षण देती रही है. निश्चित तौर पर हम योजना बनाकर लड़ेंगे लेकिन ऐसा नहीं करने वाले कि नीतीश को समय दिया जाएगा कि अभी तो सरकार बनी है, एक साल का समय दिया जाए. नीतीश का यह ग्यारहवां साल है और लालू का भी सोलहवां साल है. बिहार का आंदोलन हम तुरंत शुरू करेंगे. भूमि सुधार के सवाल पर, कृषि में सरकारी निवेश के लिए, वेतनमान के लिए. ऐसे कई मसले हैं, जिन पर आंदोलन तुरंत शुरू किया जाएगा.
बिहार में तो सभी वामदल साथ मिलकर चुनाव लड़े. आगे भी कई राज्यों में चुनाव हैं. वामदलों का यह गठजोड़ अभी बना रहेगा या फिर इस पर पुनर्विचार होगा?
नहीं, यह गठजोड़ अभी बिहार के लिए था. इस पर फिर से विचार होगा. कुछ मसलों पर हमारी एकता रही है, वह रहेगी लेकिन चुनावी गठजोड़ पर विचार होगा. अब देखिए कि पश्चिम बंगाल में भी चुनाव है. वहां सिंगुर-नंदीग्राम जैसे मसले रहे हैं, जिस पर सीपीएम ने अभी तक माफी भी नहीं मांगी है. अफसोस तक नहीं जताया है. आत्म आलोचना तक नहीं की है. यह सब देखते हुए आगे विचार होगा.
क्या इस चुनाव परिणाम को इस नजरिये से भी देखें कि आइडेंटिटी पॉलिटिक्स के कल्चर में भी बदलाव हुआ है क्योंकि दलितों की राजनीति के एक बड़े चेहरे के तौर पर जीतनराम मांझी उभरे, लेकिन दलित उनके साथ नहीं गए.
आइडेंटिटी पॉलिटिक्स की भी कुछ आवश्यक शर्तें होती हैं. पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी भारतीय जनता पार्टी के साथ चले गए. उस पार्टी के साथ जो रणवीर सेना के हत्यारों की संरक्षक रही है. यह तो व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए दिवालियापन की तरह था. जीतनराम मांझी एक बड़े नेता हैं, महत्वपूर्ण नेता हैं तो लोगों ने उनका सम्मान किया. उन्हें एक सीट पर जनता ने विजयी बना दिया लेकिन भाजपा के साथ जाना लोगों को अच्छा नहीं लगा था तो उन्हें सबक भी सिखाया. रही बात रामविलास पासवान या मांझी की ओर से वोट ट्रांसफर नहीं करवा पाने की तो यह भाजपा खुद कितना वोट ट्रांसफर करवा सकी.
एक बात परिणाम के दिन से ही कही जा रही है कि अब नीतीश या लालू के लिए राष्ट्रीय राजनीति में संभावना बन गई है और 2019 के लोकसभा चुनाव पर इसका गहरा असर पड़ेगा.
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी. अभी देखा जाएगा. भाजपा के साथ क्या हो रहा है. भाजपा ने जो नहीं कहा था, वह कर रही है और जो कहा था, वह नहीं कर रही. इसलिए भाजपा के खिलाफ अभी सिर्फ लेखक, कलाकार नहीं, मजदूर-छात्र-नौजवान और किसान सब लड़ रहे हैं. हां, बिहार के चुनाव परिणाम से उन्हें लड़ने की ताकत मिलेगी. यह साफ हो गया कि संसद के अंदर अब सरकार को मुश्किल होगी. लेकिन नीतीश कुमार और लालूजी काे अभी देखा-परखा जाना है इसलिए अभी से ही 2019 के चुनाव के बारे में बोलना जल्दबाजी है.
मनोरंजन हर तबके के लोगों के जीवन का एक खास हिस्सा होता है और हिंदुस्तान में फिल्में मनोरंजन का पसंदीदा साधन हैं. सिनेमा का हिंदुस्तान में वही महत्व है जो यूरोपीय देशों में किताबों का, हर वर्ग का व्यक्ति कमोबेश फिल्मों का शौकीन है. फिल्में आम आदमी की जिंदगी का अहम हिस्सा हैं पर मल्टीप्लेक्सों की चमक देश के सबसे निचले तबके तक नहीं पहुंच पाती और सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल लगातार बंद हो रहे हैं, जहां जाना भी उनकी सीमित आय के चलते मुमकिन नहीं है. पर औद्योगिक विकास का प्रतीक बने नोएडा की कई गलियों में चल रहे सिनेमा पार्लर बॉलीवुड फिल्मों को समाज के आखिरी सिरे तक पहुंचा रहे हैं. टिनशेड में चल रहे ये सिनेमा पार्लर दिन भर की मेहनत-मजदूरी के बाद आए मुफलिसों के लिए खुशी का जरिया हैं. ‘तहलका’ एक ऐसे ही सिनेमा पार्लर तक पहुंचा और जाना कि कैसे 150 रुपये के पॉपकॉर्न युग में 15 रुपये में ‘सलमान भाई’ की फिल्म का लुत्फ उठाया जा सकता है.
नोएडा के सेक्टर 63 से सटे ममूरा गांव के आखिरी छोर पर बना है सत्यम पैलेस. यहां तक पहुंचने का रास्ता टेढ़ी-मेढ़ी गलियों और गंदगी से अटी पड़ी नालियों के बीच से होकर गुजरता है. जाहिर सी बात है कि ‘पैलेस’ बस इसके नाम में ही है. लगभग सौ गज में टिनशेड के बने सत्यम पैलेस की हालत यहां आने वाले दर्शकों की माली हालत जैसी ही है. अंदर घुसते ही टूटी-फूटी बेंच और उखड़ा हुआ फर्श आपका स्वागत करेंगे. लंबाई में बने इस कमरे के शुरू में ही एक प्रोजेक्टर रूम है, जिसमें इस पैलेस के मालिक ने अपने रहने की व्यवस्था की हुई है. यहीं से लोगों को फिल्म का टिकट दिया जाता है और अगर खुले पैसे नहीं हैं तो बाकी बचे पैसों के बदले गुटखा थमा दिया जाता है.
पैलेस के मालिक हैं तीस साल के हरिंदर बैंसला, जो उत्तर प्रदेश के बागपत के एक निर्धन परिवार से ताल्लुक रखते हैं. बचपन में ही उनके पिता की असमय मृत्यु हो गई, जिसके बाद परिवार की जिम्मेदारी मां पर आ गई. चूंकि वे घर में बड़े थे तो 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़कर मां की जिम्मेदारी कम करने की सोची. पढ़ाई छोड़ने के बाद उन्होंने कुछ साल नोएडा के दादरी में कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में काम किया. उसमें अनुमानित सफलता नहीं मिली न ही काम में मन लगा. दादरी में उन्होंने ऐसे कई सिनेमा पार्लर देखे थे, वहीं से ये सिनेमा पार्लर बनाने का विचार आया और ममूरा आकर हरिंदर ने साल 2011 में सत्यम पैलेस की शुरुआत की. इसके संचालन में हरिंदर की मदद करते हैं 22 साल के दिनेश पांडेय. पांडेय इटावा के रहने वाले हैं और जैसे-तैसे 12वीं पास कर पाए हैं. पिता पंडिताई का काम करने के साथ-साथ 20 बीघा खेती की देखभाल भी करते हैं. एक छोटा भाई है जो अभी पढ़ाई कर रहा है. मालिक हरिंदर के मुकाबले उनके सहायक पांडेय के घर की स्थिति थोड़ी बेहतर है लेकिन अपने पैरों पर खड़े होने की चाहत उन्हें नोएडा खींच लाई. मालिक और सहायक का एक-दूसरे पर अटूट विश्वास है और दोनों का आपसी व्यवहार बहुत दोस्ताना है. पांडेय यहां पर काम को नौकरी की तरह न लेकर सह-मालिक के रूप में जिम्मेदारी संभालते हैं.
यहां एक नियम है. अगर आप किसी शो के शुरू होने के बाद पहुंचते हैं तो आप अगले शो में दिखाई जाने वाली फिल्म भी उसी टिकट पर देख सकते हैं यानी एक टिकट में दो फिल्मों का मजा
हम जब वहां पहुंचे तो फिल्म ‘अंजाम’ का 3 से 6 का शो खत्म होने को था. उस शो में कुल 12 दर्शक मौजूद थे. यहां सामान्य सिनेमा हालों से उलट हर शो में अलग-अलग फिल्में दिखाई जाती हैं. किसी एक फिल्म को पूरे दिन दोहराया नहीं जाता. यहां आने वाले दर्शक शहर में कुछ छोटी लेकिन जरूरी सेवाएं देते हैं, जैसे- रिक्शा चलाना, बेलदारी, जमादारी, पंचर लगाना, ढाबों पर काम करने वाले नाबालिग, सिक्योरिटी गार्ड आदि. शो देखने आने वाले लोगों का उम्र वर्ग 14 साल से लेकर 55 साल तक है. हालांकि नौजवानों की संख्या अधिक रहती है.
बहरहाल, 6 से 9 के शो में मात्र 20 दर्शक मौजूद हैं. इस शो में संजय दत्त और सलमान खान की फिल्म ‘चल मेरे भाई’ दिखाई जाने वाली है. सत्यम पैलेस में चलने वाली फिल्में पुरानी होती हैं लेकिन यहां आने वाले दर्शक उन्हें इस उत्साह और चाव से देखते हैं जैसे कि वे आज ही रिलीज हुईं हों. पूरे दिन की थकान उतारने का शायद ये उनका सबसे बेहतर जरिया होता है. यहां फिल्म का टिकट मात्र 15 रुपये है लेकिन दर्शकों को ये भी ज्यादा लगता है. मगर एकाकीपन दूर करने और दूसरे साथियों के साथ फिल्म देखने की चाहत इन्हें यहां खींच ही लाती है. शहर में अलग-थलग पड़े ये लोग जब साथ इकट्ठा होते हैं तो नजारा देखते ही बनता है. सभी अपनी परेशानियों को भूल फिल्म देखने में मशगूल हो जाते हैं.
यहां एक और नियम है. अगर आप किसी शो के शुरू होने के बाद पहुंचते हैं तो आप अगले शो में दिखाई जाने वाली फिल्म भी उसी टिकट पर देख सकते हैं यानी एक टिकट में दो फिल्मों का मजा. किसी दिन 8 से 10 लोग अगर किसी फिल्म की मांग कर दें तो उनकी फरमाइश हरिंदर खुश होकर स्वीकार कर लेते हैं. दिन में दिखाई जाने वाली फिल्मों की सूची सुबह ही पैलेस के बाहर चस्पा कर दी जाती है ताकि दर्शक अपनी पसंद के हिसाब से शो का चुनाव कर सकें. आमतौर पर पूरे दिन में तकरीबन 100 से 125 लोग यहां फिल्म देखने पहुंचते हैं. शनिवार और रविवार को दर्शकों की संख्या बढ़ जाती है. वैसे यहां हर रविवार 6 से 9 के शो में भोजपुरी फिल्में ही चलती हैं.
फिल्मों के प्रदर्शन की तकनीक के बारे में हरिंदर बताते हैं, ‘सीडी और प्रोजेक्टर के माध्यम से हम फिल्मों का प्रदर्शन करते हैं. पुरानी फिल्मों की सीडी खरीदते हैं और फिर उन्हें प्रोजेक्टर के जरिए पर्दे पर दिखाते हैं.’ जगह की कमी के चलते पर्दे के आस-पास ही टूटी-फूटी बेंचों को दर्शकों के बैठने के लिए जमाया गया है मगर इससे कोई समस्या नहीं. सबको बस फिल्म देखने से मतलब होता है, इसलिए शिकायत का तो कोई सवाल ही नहीं. हां, बीच-बीच में गाना आने पर आवाज घटाने या बढ़ाने की मांग जरूर उठती रहती है. तालियों और सीटियों के बीच गाने का पूरा आनंद लिया जाता है.
इसके संचालन के बारे में हरिंदर बताते हैं, ‘2011 में जब मैंने इस पैलेस की शुरुआत की तो दर्शकों की संख्या अच्छी-खासी रहती थी. एक-एक शो में दर्शकों की संख्या 80 से 100 के आस-पास रहती थी लेकिन अब ये बंद होने के कगार पर पहुंच गया है. कमाई तो छोडि़ए अब इसे चलाने का खर्च भी बड़ी मुश्किल से निकल पा रहा है.’ खर्च के बारे में उन्होंने बताया, ‘इसको चलाने में महीने का कुल खर्च 48 से 50 हजार रुपये पड़ता है और कमाई मात्र 60 से 65 हजार के आस-पास हो पाती है. यानी महीने के अंत में हमारे पास कमाई के नाम पर 10-15 हजार रुपये बचते हैं. इतने पैसों में हम क्या करें! इसी से मुझे अपने सहायक को भी तनख्वाह देनी होती है. पोस्टर लगाने वाले लड़के का खर्च भी इसी से निकालना पड़ता है.’ हरिंदर बाकायदा हर हफ्ते 3,000 रुपये मनोरंजन कर का भुगतान भी करते हैं, साथ ही 5 हजार रुपये के करीब बिजली का बिल आता है. इस जगह का किराया भी 5 हजार रुपये प्रतिमाह है. जेनरेटर के लिए डीजल, फिल्मों के पोस्टर, रख-रखाव, मशीनों की खराबी आदि का बिल जोड़कर कुल खर्चा पचास हजार के करीब बैठता है. हर साल लाइसेंस का नवीनीकरण भी कराना होता है. हरिंदर बताते हैं, ‘जब तक चल रहा है चल रहा है. वरना हम इसे बंद करके कुछ और काम करेंगे.’ प्राइवेट सेक्टर में नौकरी के बारे में पूछने पर वे कहते हैं, ‘पढ़ाई हमने इतनी की नहीं कि कोई अच्छी नौकरी मिल जाए. बाकी फिर दूसरे लोगों के अनुभव से पता चलता है कि प्राइवेट सेक्टर में कितना काम लिया जाता है. इसीलिए जैसे-तैसे गाड़ी खींच रहे हैं.’ हरिंदर की तरह ही बाकी लोग भी घटती कमाई के चलते परेशान हैं और कई तो अपने सिनेमा पार्लरों पर ताला जड़कर किसी दूसरे धंधे में लग गए हैं.
इस बातचीत के दौरान नशे में धुत एक व्यक्ति आया और हरिंदर से पैसे व मुफ्त टिकट मांगने लगा. काफी मना करने के बाद भी वह शख्स आधा घंटे तक वहीं हंगामा करता रहा जिसे जबरदस्ती बाहर निकाला गया. हरिंदर इस पर कहते हैं, ‘ये यहां रोज का काम है.’ ये पूछने पर कि टिकट का किराया क्यों नहीं बढ़ाते, उनका जवाब था, ‘एक बार किराया बढ़ाकर 20 रुपये किया था लेकिन फिर लोगों ने आना ही बंद कर दिया. इसलिए मजबूरन हमें फिर से टिकट 15 रुपये का करना पड़ा. दरअसल मल्टीमीडिया फोन इतने सस्ते हो गए हैं कि लोग उन पर ही आसानी से फिल्में देख लेते हैं तो हमारे पास क्यों आएं?’
बहरहाल, 6 से 9 वाला शो साढ़े आठ से कुछ पहले खत्म हुआ. 9 बजे तक के खाली समय में हरिंदर पुराने गाने दिखाते हैं. अगर आम मध्यमवर्गीय लोग फिल्म देखने जाते हैं तो सबसे पीछे की सीट चुनते हैं लेकिन यहां स्थिति अलग है. जो पहले आता है वह सबसे आगे की बेंच पर बैठने की कोशिश करता है ताकि स्क्रीन और बड़ी नजर आए.
यहां आने वाले दर्शक भी अनूठे हैं. हॉल में करीब 25-30 लोग मौजूद हैं. इसमें आरा, बिहार के रहने वाले विजय भी हैं. 38 साल के विजय बेलदारी का काम करके महीने में 9 हजार रुपये तक कमा लेते हैं और ममूरा में ही किराये पर चार लोगों के साथ कमरा साझा करते हैं. कुल मिलाकर 500 रुपये कमरे का किराया पड़ता है. खाने का खर्च निकालकर बाकी बचे पैसे घर भेज देते हैं. आज 9 से 12 के शो में फिल्म ‘नो एंट्री’ देखने पहुंचे हैं. विजय बताते हैं, ‘कमरे पर टीवी नहीं है. दूसरा यहां कई लोगों के साथ बड़े पर्दे पर फिल्म देखने में मजा आता है. फिर 15 रुपये में आजकल मिलता ही क्या है! यही देखकर खुश हो लेते हैं. आपकी तरह महंगी जगहों पर तो जा नहीं सकते.’
अगली बेंच पर मुलाकात होती है उत्तर प्रदेश के कासगंज के सतवीर से. पूरे दिन की थकान और तनाव सतवीर के चेहरे पर साफ-साफ दिखाई देते हैं. 25 साल के सतवीर पिछले साल दीवाली के ही वक्त बेलदारी का काम करने नोएडा आए थे. सतवीर की माली हालत बेहद खराब है. मुश्किल से बात करने को तैयार हुए सतवीर कहते हैं, ‘घर में 6 भाई हैं और कुल 4 बीघा जमीन है. ऐसे में बेलदारी नहीं करेंगे तो और क्या करेंगे! जैसे-तैसे खाना-पीना चल रहा है बस.’ वह रहते कहां हैं, यह पूछने पर मायूसी के साथ बताते हैं, ‘रहने का कोई ठिकाना नहीं है. कभी पार्क में सो जाते हैं तो कभी फुटपाथ पर.’ किसी के साथ कमरा साझा करने की सलाह पर वे कोई जवाब नहीं देते.
‘साहब कमरे पर टीवी नहीं है. यहां कई लोगों के साथ बड़े पर्दे पर फिल्म देखने में मजा आता है. फिर 15 रुपये में आजकल मिलता ही क्या है! यही देखकर खुश हो लेते हैं
वहीं पास में बैठे हैं मुनिंदर. मुनिंदर 25 साल के हैं और सेक्टर 62 के एक अपार्टमेंट में जमादार का काम करते हैं. साढ़े सात हजार रुपये कमाने वाले मुनिंदर ममूरा में ही किराये के कमरे में अपने भाई के साथ रहते हैं. मुनिंदर काफी खुशमिजाज हैं, वे कहते हैं, ‘हमारा यही मनोरंजन है. इसी में खुश हैं हम. ज्यादा पैसा आपकी शांति छीन लेता है. और फिर घर में अकेले पड़े रहने से अच्छा है कि अपने भाई-बंधुओं के बीच थोड़ा टाइमपास कर लें. वरना कल से तो गाड़ी उसी पटरी पर दौड़नी है. लोगों के साथ सिनेमा देखने में मजा आता है. यहां लोग हंसते हैं सीटी, ताली बजाते हैं. इसी में मन हल्का हो जाता है. रविवार की छुट्टी के दिन तो यहां खड़े होने की भी जगह नहीं होती. गर्मियों में तो लोग यहां सिर्फ सोने के लिए आते हैं क्योंकि कूलर चलने से यहां बहुत ठंडा रहता है.’
इसके बाद बात हुई कोने में चुपचाप बैठे रामबाबू से. रामबाबू बिहार के मधुबनी के रहने वाले हैं और नोएडा में रिक्शा चलाते हैं. परेशान और थके हुए रामबाबू से जब उनकी उम्र के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, ‘हमारी उम्र पूछकर आप क्या करोगे.’ काफी पूछने पर बोले, ‘मैं चालीस साल का हूं. बीवी खत्म हो गई, बच्चे थे ही नहीं. 10 साल पहले नोएडा आए थे तबसे बिहार वापस ही नहीं गए. आज तबियत खराब थी तो रिक्शा भी नहीं चला पाए.’ रहते कहां हैं? ‘यहीं पास की झुग्गियों में.’ रात के साढ़े ग्यारह बजे आखिरी शो खत्म होता है. सभी दर्शकों की पृष्ठभूमि लगभग विजय, सतवीर, मुनिंदर और रामबाबू जैसी ही है. कम उम्र के होने के बावजूद वे बेहद उम्रदराज नजर आते हैं. नींद के आगोश में डूबे दर्शक एक-एक कर बाहर निकलते हैं और अपने-अपने ठिकानों की ओर चल पड़ते हैं. सुबह से शाम तक की जी-तोड़ मेहनत के बाद अगले दिन इनमें से तमाम लोग फिर सत्यम पैलेस का रुख करेंगे.
एक आम आदमी के पास बेशक मनोरंजन के अनेक साधन हो सकते हैं लेकिन शहरों में छोटे-मोटे काम करने वाले इन लोगों के पास सीमित विकल्प हैं. इनमें भी इन्हें दस बार सोचना पड़ता है क्योंकि जेब हमेशा इसकी इजाजत बड़ी मुश्किल से देती है. फिर भी इन्हें कोई शिकायत नहीं, जहां दो पल चैन मिल जाए, ये वहीं खुश हैं. लेकिन दुख की बात है कि इनके मनोरंजन का इकलौता साधन भी बंद होने की कगार पर है. ममूरा से लगभग 10 किमी दूर सिनेमा पार्लर के गढ़ कहे जाने वाले भंगेल कस्बे के सभी सिनेमा पार्लर बंद हो चुके हैं. आस-पास के लोगों ने बताया कि उन्हें बंद हुए 2 साल हो गए. वहां अब या तो गोदाम हैं या फिर बाजार बन चुके हैं. बढ़ते खर्चों और दर्शकों की घटती संख्या के कारण शहर में मौजूद इक्का-दुक्का सिनेमा पार्लर भी आने वाले समय में नदारद हो जाएंगे. फिर ऐसे लोग अपने मनोरंजन का साधन कहां तलाशेंगे?