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‘मल्टीप्लेक्स पॉपकॉर्न बेचने के लिए खोले गए हैं, उनके लिए बाजीराव मस्तानी या चौरंगा कोई मतलब नहीं रखता’

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फिल्म को  ‘चौरंगा’  नाम क्यों दिया? इसका अर्थ क्या है?

इसकी दो वजहें हैं. एक तो चौरंगा का मतलब ही होता है चार रंग. दूसरा फिल्म एक तरह से हमारी वर्ण व्यवस्था से जुड़ी हुई है. हिंदू वर्ण व्यवस्था के अनुसार समाज को चार जातियों में बांटा गया है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र. यह व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से हमारी संस्कृति और समाज का हिस्सा रही है, लेकिन पुराने समय में शायद जातियों के बीच दीवार नहीं रही होगी. ऐसा कहानियों में आता है कि वाल्मीकि शूद्र थे. वे डकैत हुआ करते थे. बाद में उन्होंने तपस्या की और फिर रामायण लिखी. इस तरह से वह शूद्र से ब्राह्मण हो गए. इसी तरह विश्वामित्र क्षत्रिय थे. उन्होंने तपस्या की और ब्राह्मण बन गए. धर्मशास्त्रों में कहा गया है, ‘जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात्भवेत द्विजः, वेद पाठात्भवेत्विप्रः ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः.’ मोटी-मोटा इसका अर्थ ये है कि व्यक्ति जन्म से शूद्र होता है लेकिन अपने कर्मों से बाह्मण हो जाता है. हालांकि समाज में जैसे-जैसे कर्मकांड बढ़ता गया वैसे-वैसे रूढ़िवादिता कायम होती चली गई. आप किसी भी परिवार (जाति) में पैदा हो जाएं और कुछ भी कर लें लेकिन आप उसी जाति के होकर ही मरेंगे. भले ही कर्म से आप कुछ भी बन जाएं. यानी अगर आप शूद्र पैदा हुए तो जीवनभर शूद्र ही रहेंगे. इससे गैर-बराबरी आई और ये व्यवस्था समाज में अपनी जड़ें और गहरी जमाती गई. हमारे यहां चुनाव के समय जातीय गठबंधन होते हैं और हम लोकतांत्रिक देश में रहते हैं. गांव या छोटे शहरों में आप देख सकते हैं कि हर कोई आपके घर नहीं आ सकता है. अगर कोई आता है तो आप उसको खिला सकते हैं या नहीं, वो आपके घर खा सकता है या नहीं, इसके बारे में अब भी सोचा जाता है. आप किसी भी अखबार के मेट्रीमोनियल पेज को देख लें उसमें जाति के साथ उपजाति और गोत्र तक समान होना चाहिए तब शादी की बात आगे बढ़ती है. ये हमारे आज के समाज की सच्चाई है. चौरंगा की कहानी इसी जाति व्यवस्था पर चोट करती है. यह चौदह साल के एक बच्चे की प्रेम कहानी है, जो चार रंगों से अपना पहला प्रेम पत्र लिखता है. चार रंगों वाला  पेन उसका बड़ा भाई उसे देता है. इन्हीं वजहों से हमारी फिल्म को चौरंगा नाम मिला.

फिल्म का मुख्य किरदार 14 साल का एक बच्चा है. बाल कलाकारों को केंद्र में रखकर फिल्म बनाते समय कलाकारों का चयन मुश्किल होता है. अक्सर बाल कलाकार फिल्मों में दोहराये नहीं जाते. आपने इन्हें कैसे ढूंढा? किसका अभिनय ज्यादा पसंद आया?

फिल्म में मुख्य किरदार चौदह साल का संतू है. यह किरदार सोहम मैत्रा ने निभाया है. इसके अलावा ऋद्धि सेन उसके बड़े भाई बजरंगी और एना साहा मोना के किरदार में हैं, जिससे संतू को प्यार होता है. ये तीनों बंगाली सिनेमा के जाने-पहचाने नाम हैं. हिंदी में ये उनकी पहली फिल्म है. ये तीनों मंजे हुए कलाकार हैं. ऋद्धि ने इससे पहले फिल्म ‘कहानी’ में भी काम किया है. और ऐसा नहीं है कि बच्चों को एक फिल्म के बाद दूसरी में नहीं लिया जाता. होता ये है कि बच्चे बहुत जल्दी बड़े होते हैं. किसी फिल्म के लिए आपको लगता है कि कोई बच्चा फिट है, लेकिन जब तक फिल्म शुरू होती है वह बच्चा बड़ा हो जाता है. ऐसा कोई परहेज नहीं है कि किसी बच्चे को दोबारा किसी फिल्म में नहीं लिया जा सकता. ये तीनों बच्चे ऑडिशन के जरिये आए. इससे पहले बहुत सारे बच्चों के साथ वर्कशॉप की थी. सबसे पहले ऋिद्ध मिला. सोहम एक ऐसे समय मिला जब लगा था कि उसके रोल के लिए कोई मिल ही नहीं पाएगा. एक बच्चे के साथ काम शुरू किया था, लेकिन ऐन वक्त उसे स्कूल से छुट्टी नहीं मिली पर किस्मत से सोहम मिल गया. वैसे ये तीनों अलग तरह के कलाकार हैं. सोहम बहुत ही स्वतः स्फूर्त, स्वाभाविक और सहज कलाकार है. ऋद्धि ने लंदन के रॉयल एकेडमी ऑफ आर्ट्स में ट्रेनिंग ली है. वह स्थितियों को बहुत ही अच्छे से समझता है और उसे बहुत ही इमोशनल तरीके से अपने अभिनय में उतार देता है. एना ने टीवी में काफी काम किया है. आजकल वह दक्षिण भारतीय फिल्मों में भी काम कर रही हैं.

छोटी जाति के लड़के और ऊंची जाति की लड़की के बीच प्रेम के मुद्दे पर फिल्म बनाने का विचार कैसे आया?

यह फिल्म एक असल घटना से प्रेरित है. 2008 में बिहार के कैमूर जिले के एक गांव में छोटी जाति के एक लड़के ने ऊंची जाति की एक लड़की को लव लेटर दे दिया था, जिसके बाद गांववालों ने बहुत ही बेरहमी से उसे ट्रेन के आगे फेंक दिया था और उसकी मौत हो गई. इसी घटना ने मुझे ‘चौरंगा’ लिखने के लिए प्रेरित किया. हां, लेकिन चौरंगा में बिल्कुल वही घटना नहीं है. इसमें बहुत बदलाव किए गए हैं. मैं झारखंड के एक गांव से आता हूं. मैंने कल्पना की कि अगर वह दर्दनाक हादसा मेरे गांव में होता तो क्या होता. मैंने फिल्म की कहानी मेरे गांव के हिसाब से बुनी है.

निर्देशक ओनीर और संजय सूरी का साथ कैसे मिला?

2010 की बात है. ओनीर मुझे एनएफडीसी के स्क्रीन राइटर्स लैब में मिले थे, जहां चौरंगा की स्क्रिप्ट पहली बार चुनी गई थी. ये उनसे पहली मुलाकात थी. ओनीर को चौरंगा की कहानी पसंद आई. उन्होंने फिल्म बनाने में मेरी मदद की बात कही और फिल्म के प्रोड्यूसर बन गए. उस समय वो फिल्म ‘आई एम’ बना रहे थे जो क्राउड फंडिंग से बनी भारत की पहली फिल्म है. उनके पास पैसे नहीं थे, लेकिन उन्होंने कहा कि हमें धैर्य रखने की जरूरत है. एक न एक दिन ‘चौरंगा’ जरूर बनेगी. आज उनकी बात बिल्कुल सच निकली. संजय ओनीर के साथ मिलकर काम करते हैं. इस तरह दोनों का साथ मिल गया.

रिलीज से पहले ही  ‘चौरंगा’  कई पुरस्कार जीत चुकी है. ओनीर ने तो यहां तक कह दिया है कि इसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना चाहिए?

अच्छा, ऐसा बोला ओनीर ने… देखिए, होता क्या है जब उनसे पूछा गया होगा कि फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना चाहिए तो उन्होंने कहा होगा कि हां, बिल्कुल मिलना चाहिए. जब कोई फिल्म बनाता है तो उसकी हमेशा इच्छा होती है कि फिल्म को हर तरह की सफलता मिले. अब कोई पूछेगा कि क्या आपकी फिल्म सौ करोड़ क्लब में शामिल हो पाएगी. अब हमें मालूम है कि नहीं जा पाएगी, लेकिन इच्छा की बात करें तो बिल्कुल इच्छा होती है. ओनीर ने जब ये कहा होगा कि राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना चाहिए तो दो चीजें हैं इसमें. एक तो ये है कि उन्हें फिल्म पर पूरा भरोसा है. दूसरा इस तरह की इच्छा हर फिल्म बनाने वाले की होती है.

‘चौरंगा’ जातिगत प्रेम पर आधारित फिल्म  ‘मसान’  और मराठी फिल्म  ‘फंड्री’  से आपकी फिल्म किस तरह से अलग है?

आपने सही कहा कि मसान में भी बहुत हद तक ये मसला आया है, लेकिन कोई फिल्म किसी एक मसले पर ही नहीं होती. चौरंगा का जो किरदार है वो मसान और फंड्री के किरदार से बहुत अलग है. इसकी कहानी भी अलग है. मुझे लगता है कि चौरंगा दूसरी फिल्मों से इसलिए अलग है क्योंकि यह एक ऐसी जगह की कहानी है जहां की कहानी शायद ही आपने देखी होगी. यह झारखंड के एक गांव की कहानी है. झारखंड और गांव दोनों ही हिंदी सिनेमा से लगभग नदारद हैं. जहां तक मुझे हिंदी सिनेमा का इतिहास पता है मेरे जेहन में ऐसी कोई फिल्म नहीं आती है, जिसमें चौदह साल का एक दलित किरदार हीरो है. इस मायने में मुझे लगता है कि चौरंगा अलग है. मसले के लिहाज से फंड्री और मसान में भी ये मुद्दा महत्वपूर्ण था. कुछ हद तक फिल्म कोर्ट में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी. मुझे बहुत ही अच्छा लगता है जब ऐसी फिल्मों के साथ चौरंगा का नाम जोड़ा जाता है, क्योंकि ये बहुत ही अच्छी फिल्में हैं और ऐसे लोगों ने बनाई हैं, जिन्हें मैं निजी तौर पर जानता हूं. मुझे अच्छा लगता है कि इन लोगों के बीच मुझे भी जगह मिल रही है.

पिछले कुछ सालों में क्षेत्रीय सिनेमा (खासकर मराठी और दक्षिण भारतीय फिल्मों) ने राष्ट्रीय स्तर पर बहुत ही मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है. क्या बॉलीवुड के लिए यह खतरे की घंटी है?

इस समय हिंदी सिनेमा की जो दिशा है वो ये है कि अच्छी विषयवस्तु वाली फिल्में अच्छा कर रही हैं. सिर्फ स्टारकास्ट के दम पर फिल्में नहीं चलतीं अच्छी फिल्मों के लिए अच्छी स्क्रिप्ट बहुत जरूरी मानी जाती है. इसे अब पूरी इंडस्ट्री स्वीकार कर रही है. ऐसा नहीं है कि आप शाहरुख खान या सबसे बड़े फिल्मकार के साथ फिल्म बना दें तो वह चल जाएगी. कहानी अच्छी होगी, दर्शक उससे जुड़ पाएंगे तभी वह चल पाएगी. मुझे लगता है कि पूरी इंडस्ट्री इसी दिशा में आगे बढ़ रही है. हिंदी सिनेमा के हिसाब से ये बहुत ही सकारात्मक बदलाव है क्योंकि पहले बहुत अराजनीतिक फिल्में बनती थीं. लोग हर ऐसी चीज से दूर रहना चाहते थे जिसे लेकर कोई राजनीतिक बहस शुरू हो सकती थी, लेकिन फिल्मकारों की जो नई पीढ़ी आई है वह बहुत ही जागरूक और सक्रिय है. वे तमाम मसलों पर अपना पक्ष रखते हैं. मुझे लगता है कि अच्छी कहानी और अच्छी कहानियां कहने वालों के लिए अच्छा वक्त आ रहा है.

जहां तक क्षेत्रीय सिनेमा की बात है तो इससे हिंदी सिनेमा को खतरा नहीं. हिंदी सिनेमा के साथ एक बहुत बड़ी दिक्कत है जो क्षेत्रीय सिनेमा के साथ नहीं है. हिंदी सिनेमा है तो क्षेत्रीय लेकिन इससे राष्ट्रीय स्तर की अपेक्षाएं की जाती हैं. मराठी फिल्म मराठी लोग बनाते हैं, मराठी कलाकारों के साथ बनाते हैं और उसे मराठी बोलने और समझने वाले देखते हैं. लेकिन हिंदी सिनेमा हिंदी बोलने वाले लोगों की तरह विस्थापित लोगों का सिनेमा है. जैसे मैं झारखंड का हिंदी भाषी हूं. फिल्म बनाने के लिए मुझे अपना शहर छोड़कर मुंबई आना पड़ता है, नहीं तो मेरी फिल्म हिंदी दर्शकों तक पहुंच ही नहीं पाएगी. हिंदी सिनेमा चूंकि विस्थापित लोगों का सिनेमा है इसलिए यह अलग तरह से विकसित हो रहा है.

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Untitled-1मैं पत्रकार रहा हूं. दिल्ली में जी-न्यूज में काम किया. फिर मुंबई आ गया सीएनबीसी आवाज में. इससे पहले छोटे-बड़े कई अखबारों में भी काम कर चुका था. ज्यादातर काम हिंदी अखबारों में किया है. हजारीबाग में ‘हजारीबाग टाइम्स’ व जमशेदपुर के एक सिंगल एडिशन अखबार में काम किया. रविवार को जनसत्ता का परिशिष्ट आता था ‘सबरंग’, उसमें मैं कहानियां लिखा करता था. प्रभात खबर अखबार में भी कभी-कभी लेख लिखता था

बिकास रंजन मिश्रा

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गत वर्षों में लगातार अर्थपूर्ण फिल्में आ रही हैं? क्या आपको लगता है कि मुद्दा या विषय आधारित फिल्में समाज की सोच बदल रही हैं?

देखिये, मुझे इस बात से दिक्कत है जब आप बोलते हैं कि चौरंगा विषय आधारित फिल्म हैं. मैं कहता हूं कि बाजीराव मस्तानी भी विषय आधारित फिल्म हैं. यह एक ब्राह्मण पेशवा की कहानी है. यह भी जात-पात के बारे में है और हर फिल्म एक तरह से जात-पात के बारे में होती है. हर फिल्म का हीरो ऊंची जाति का एक हिंदू होता है. हर फिल्म मुद्दा आधारित होती है, कुछ मुद्दों को नजरअंदाज करके मुद्दे बन जाते हैं, लेकिन जब आप चौदह साल के एक दलित बच्चे की कहानी सुनाते हो तो लोग कहते हैं कि ये फिल्म दलित मुद्दे पर बनी है. जब आप ऊंची जाति के युवा को लेकर फिल्म बनाते हैं तब आप नहीं बोलते हैं कि यह उच्च वर्ग के हिंदू की कहानी है. बाजीराव मस्तानी के बारे में कोई नहीं बोलता है कि यह बहु-पत्नी प्रथा पर आधारित कहानी है. ये एक दोहरा रवैया है कि जब आप हाशिये के लोगों की बात करते हो तो फिल्म को उस पर ही आधारित बता दिया जाता है, लेकिन जब बड़े बजट की फिल्म की बात होती है तो इस तरह के मुद्दे गायब हो जाते हैं.

इसके अलावा फिल्म से समाज बदलता है या नहीं, अपने आप में यह सवाल विवादास्पद है. ये शोध का मुद्दा है लेकिन सिनेमा कहीं न कहीं लोगों और उनकी सोच पर प्रभाव जरूर डालता है. फर्क इतना है कि सिनेमा लोगों के पहनावे और भाषा पर ज्यादा असर डालता है. लोग उसे फैशन के तौर पर अपनाते हैं. समाज की सोच पर प्रभाव पड़ता है या नहीं यह तो धीरे-धीरे पता चलेगा, लेकिन मुझे लगता है कि कहीं न कहीं फर्क तो पड़ता है, लेकिन ऐसा नहीं है कि अच्छी फिल्में बनाकर आप एक अच्छा समाज बना देंगे. ये है कि कई मुद्दे हैं जिन पर बात नहीं होती थी, अगर वे बातचीत का मुद्दा बन जाएं तो ये अपने आप में बहुत बड़ी बात होती है. अगर कॉलेज का कोई छात्र चौरंगा देखने पहुंचता है और उससे विचलित होता है तो यह मेरी फिल्म के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि होगी.

मल्टीप्लेक्स में फिल्में देखना लगातार महंगा होता जा रहा है. बड़ी बजट की फिल्मों की ही टिकट दर छोटी फिल्मों की भी रखनी पड़ती है. ऐसे में छोटी फिल्मों को नुकसान उठाना पड़ता है. क्या टिकट दर अलग-अलग होने चाहिए?

अभी मैंने एक रिपोर्ट पढ़ी जिसके मुताबिक, 2014 के मुकाबले 2015 में हिंदी सिनेमा का व्यापार छह से सात प्रतिशत तक नीचे आ गया और इसके लिए बड़ी फिल्में जिम्मेदार हैं, उनका बिजनेस कम हो गया. अच्छा बिजनेस छोटी फिल्मों ने किया. खैर यह एक पहलू है. मुझे लगता है कि इस मामले में सरकार को थोड़ी मदद करनी चाहिए. अभी सरकार फिल्मों से सिर्फ वसूली का काम करती है. फिल्म का जो बजट होता है उसका तकरीबन 40 प्रतिशत सरकार सर्विस टैक्स ले लेती है और टीडीएस कटता है. इसके बाद जब फिल्म बनकर आती है तो सरकार 40 से 100 प्रतिशत तक मनोरंजन कर लगाती है. इस पैसे से फिल्म इंडस्ट्री में वापस कुछ नहीं आता. हालांकि चौरंगा के मामले में मैं खुशनसीब हूं कि मुझे सरकार से पैसे मिले हैं. एनएफडीसी हमारी फिल्म की प्रोड्यूसर है. मुझे लगता है कि सरकार अगर इतना टैक्स लेती है तो उसे थोड़ा सहयोग भी करना चाहिए. बड़ी फिल्मों जैसे- दिलवाले, बाजीराव मस्तानी से सरकार पैसे कमाए, लेकिन जब छोटी फिल्में आएं तो उन्हें मनोरंजन कर से मुक्त रखना चाहिए. इसका फायदा दर्शकों को मिलेगा. इससे ज्यादा दर्शक आएंगे, इस तरह की फिल्में देखेंगे और एक बातचीत शुरू होगी.

दूसरी ओर मल्टीप्लेक्स पॉपकॉर्न बेचने के लिए खोले गए हैं. उनके लिए बाजीराव मस्तानी या चौरंगा कोई मतलब नहीं रखता. उनके लिए मतलब रखता है कि जो लोग आ रहे हैं वे कितना पॉपकॉर्न खा रहे हैं. उन्होंने मल्टीप्लेक्स बनाने में बहुत पैसा खर्च किया है और उन्हें उसकी भरपाई करनी है. इसलिए वहां टिकट महंगे होते हैं. यहां पर सोचने वाली बात ये भी है कि सरकार क्यों छोटी और बड़ी फिल्म के बीच भेद नहीं करती, सभी फिल्मों पर एक समान टैक्स क्यों लगाती है?

एक बच्चे की प्रेम कहानी पर आधारित चौरंगा को  ‘ए’  सर्टिफिकेट मिला है. सेंसर बोर्ड ने किन बातों पर आपत्तियां जताईं?

सेंसर बोर्ड ने फिल्म के कुछ सीन कटवा दिए हैं और कुछ डायलॉग्स में फेरबदल करवाए हैं. हाल ये है कि इस देश में फिल्म मस्तीजादे को भी ‘ए’ सर्टीफिकेट मिलता है और चौरंगा को भी. ऐसा क्यों होता है ये तो सेंसर बोर्ड जाने. समझ नहीं आता कि ये कैसे काम करता है. इस बोर्ड का नाम सेंसर बोर्ड नहीं है, उसका नाम है सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन. इस लिहाज से इनको फिल्म को सर्टिफिकेट देने का काम करना चाहिए. उन्हें फिल्म के सीन काटने के लिए कहना ही नहीं चाहिए. वे हमें ‘ए’ सर्टिफिकेट दें इससे हमें कोई परेशानी नहीं है, लेकिन वे ये कहते हैं पहले आप पांच सीन हटाइए फिर आपको ‘ए’ सर्टिफिकेट देंगे. यहां हमें दिक्कत है. इसका मतलब ये हुआ कि अगर मैं कहूं कि मैं इसके लिए तैयार नहीं तो वे कहेंगे कि सर्टिफिकेट नहीं देंगे. यानी आपकी फिल्म बैन हो गई.

ये अच्छा माहौल नहीं है. जो लोग फिल्म बनाते हैं, चाहे वो एक्टर हो या डायरेक्टर, वे बहुत मेहनत करते हैं. इससे वे फिल्म बनाने की कला को सीखते हैं. लेकिन जो फिल्म को सर्टिफिकेट देते हैं उन्होंने क्या किया है? फिल्म में क्या दिखाना चाहिए और क्या नहीं, जो ये बताने वाले हैं उनकी योग्यता क्या है. जो लोग ये निर्णय लेते हैं उन्हें अभिभावक बनकर वहां नहीं बैठना चाहिए. अभी श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक कमेटी बैठी हैं, जो इस पूरी प्रक्रिया की समीक्षा कर रही है. मैं उम्मीद करता हूं कि कमेटी की सिफारिशें आएं उसे लागू भी किया जाए. हालांकि अब तक ये सरकार सिर्फ वादों तक ही सीमित है. कई बार कहा गया था कि पहलाज निहलानी को हटा दिया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं है. पिछले साल सेंसर बोर्ड ने कुछ शब्दों के फिल्मों में इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया था. बोर्ड ने चौरंगा से भी एक शब्द (गाली) हटाने के लिए कहा था. जबकि अब उस शब्द से प्रतिबंध हटा दिया गया है. साफ तौर पर कुछ समझ नहीं आता कि सरकार करना क्या चाहती है. आखिरकार उस शब्द को हमें फिल्म से हटाना ही पड़ा.

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सेंसर बोर्ड द्वारा फिल्मों पर बैन और काट-छांट कहां तक सही है? क्या आप सिनेमा के लिए खतरा महसूस करते हैं?

हां, बिल्कुल खतरा महसूस करते हैं. आज हर कोई जेब में इंटरनेट लेकर घूम रहा है. ऐसे समय में फिल्मों पर बैन और काट-छांट मुमकिन ही नहीं. नई सरकार आई थी तो 276 पोर्न साइटों पर बैन लगा दिया था, वे स्वच्छ इंटरनेट कैम्पेन चला रहे थे लेकिन ये बैन हटाना पड़ा. सिनेमा में हर कोई अपनी नाक घुसेड़ना चाहता है. स्वास्थ्य मंत्रालय कहता है कि धूम्रपान के दृश्यों के समय स्क्रीन पर लिखना होगा कि यह हानिकारक है. सरकार फिल्मकारों को थोड़ी आजादी तो दे ताकि वे फिल्म बना सकें. ये ठीक बात है कि धूम्रपान से बहुत नुकसान होता है, लेकिन फिर आप सिगरेट बेचने क्यों देते हो, बंद कर दो!

देश और समाज में सब कुछ अच्छा चल रहा है, सिनेमा सिर्फ उतना दिखाने भर का माध्यम नहीं है. कई दफा ऐसा होता है कि आप कुछ देखते हैं, सोचते हैं, विचलित होते हैं. कुछ चीजें आपको इतना विचलित कर देती हैं कि आप उसकी कहानी दूसरों को सुनाना चाहते हो. ये जगह तो सरकार छीनती जा रही है. सरकार देश को सुधारे, वह सिनेमा को क्यों सुधारना चाह रही है? सिनेमा के अंदर देश की जो छवि दिखाई जाती है उसे वह क्यों सुधारने में लगी है? इससे कुछ नहीं होने वाला. ये झूठ होगा. ये सच होता तो उत्तर कोरिया विश्व का सबसे अच्छा देश होता. उन्हें कुछ मालूम ही नहीं कि उनके देश में क्या दिक्कतें हैं. एक ऐसा समाज क्यों बनाना चाहते हो जो भ्रम में रहता हो, जिसका सच्चाई से कोई राब्ता ही नहीं है. आप अच्छी दुनिया बनाओ तो हम अच्छी-अच्छी फिल्में बनाना शुरू कर देंगे, जिसमें सब कुछ अच्छा-अच्छा ही होगा.

 पत्रकार से फिल्मकार बनने के सफर के बारे में बताइए?

90 के दशक में मैं झारखंड के हजारीबाग में रहता था. मेरे बाबूजी एक सिनेमाघर के वकील हुआ करते थे. वहां वे खुद फिल्म देखते थे और जो अच्छी लगती थी मुझे भी दिखाने ले जाते थे. यहीं सिनेमा के साथ मेरा पहला वास्ता पड़ा. उसके बाद जमशेदपुर पढ़ाई करने के लिए आ गया. वहां कॉलेज के कैंपस में ही दो सिनेमाघर थे. उस दौरान वहां फिल्में ज्यादा देखी, पढ़ाई कम की. ये सिनेमाघर निर्देशक इम्तियाज अली का परिवार चलाता था. इम्तियाज अली हमारे कॉलेज में आए भी थे और स्क्रीन राइटिंग के बारे में वर्कशॉप भी की थी. फिल्म बनाने के बारे में यह मेरी औपचारिक शुरुआत थी. इसके अलावा जमशेदपुर में एक फिल्म सोसायटी थी, जहां देश-विदेश की फिल्में दिखाई जाती थीं. वहां मुझे विश्व सिनेमा के बारे में जानने-समझने का मौका मिला. उसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए ‘जामिया’ दिल्ली में आ गया. यहां मास कॉम की पढ़ाई की तो बाकायदा फिल्म बनाने के बारे में एक दरवाजा खुला. मैं फिल्म बनाना चाहता था. दिमाग में ये था कि इसका रास्ता बहुत आसान नहीं है. सो पढ़ाई के साथ नौकरी करता रहा.

मैं पत्रकार रहा हूं. दिल्ली में जी-न्यूज में काम किया. फिर मुंबई आ गया सीएनबीसी आवाज में. इससे पहले छोटे-बड़े कई अखबारों में भी काम कर चुका था. ज्यादातर काम हिंदी अखबारों में किया है. हजारीबाग में ‘हजारीबाग टाइम्स’ में काम किया. जमशेदपुर के एक सिंगल एडिशन अखबार में काम किया. कलकत्ता से रविवार को जनसत्ता का परिशिष्ट आता था ‘सबरंग’, उसमें मैं कहानियां लिखा करता था. प्रभात खबर अखबार में भी कभी-कभी लेख लिखता था.

चौरंगा तक के सफर की बात करूं तो 2010 में इसकी स्क्रिप्ट लिखकर एनएफडीसी के स्क्रीनराइटर्स लैब भेजा, इसे चुन लिया गया. उन्होंने स्विटजरलैंड के लोकार्नो में हुई एक कार्यशाला में भेजा. यही पर ओनीर बतौर प्रोड्यूसर फिल्म से जुड़ गए. चौरंगा की यात्रा ऐसी रही कि काफी जगहों से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग भी मिला. अक्टूबर 2014 में फिल्म बनकर तैयार हो गई. भारत के बाहर भी ये कई देशों में गई है और कई देशों में अवॉर्ड भी मिले हैं. अब फिल्म रिलीज हो गई है और लोगों को पसंद भी आ रही है, पर अभी ये शुरुआत भर ही है.

हिंदुत्व के नए ठेकेदार

गाजियाबाद के डासना में एक प्रसिद्ध देवी मंदिर है. मंदिर के प्रवेशद्वार पर टंगे बोर्ड को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. बोर्ड पर साफ लिखा है, ‘मंदिर में मुसलमानों का प्रवेश वर्जित है.’ मंदिर के अंदर एक किशोर लगभग दस साल के बच्चे को बुरी तरह पीट रहा है. बच्चा बुरी तरह रो रहा है, खुद को छोड़ने की भीख मांग रहा है. ये देख मंदिर का पुजारी हंस रहा है. जैसे ही वह किशोर छड़ी उठाने के लिए जाता है, बच्चा भागता है. किशोर उसे पकड़ने के लिए दौड़ता है पर बच्चा मंदिर परिसर से भाग निकलता है.

पुजारी से इस मारपीट के बारे में पूछने पर पता चलता है कि वह बच्चा मुस्लिम था और मंदिर के तालाब से पानी लेने आया था. इस तालाब के पानी को पवित्र समझा जाता है और उसका इस्तेमाल औषधि के तौर पर भी किया जाता है. किशोर के साथ मंदिर के महंत स्वामी नरसिंहानंद महाराज के पास जाते वक्त पुजारी कहता है, ‘मुझे समझ में नहीं आता कि जब यहां उनका (मुस्लिमों) प्रवेश वर्जित है तो वे आते ही क्यों हैं? ये बात उनकी समझ में क्यों नहीं आती.’

नरसिंहानंद, जो स्वामीजी के नाम से प्रसिद्ध हैं, किशोर उनके पैर छूने झुकता है और स्वामीजी गर्व से उसकी पीठ को थपथपाते हुए ‘आ मेरे शेर’ कहकर शाबासी देते हैं. इस किशोर का नाम प्रमोद है और वह मूक-बधिर है. वह बचपन से इस मंदिर में आ रहा है और अब मंदिर परिसर की निगरानी का काम करता है. राष्ट्रीय स्तर के जूडो खिलाड़ी प्रमोद ने हाल ही में गोवा में आयोजित एक प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता है. उसके लिए स्वामीजी किसी भगवान से कम नहीं हैं. वही प्रमोद का सारा खर्च उठाते हैं और उन्होंने उसका दाखिला मूक-बधिर बच्चों के स्कूल में भी कराया हुआ है.

उस युवक के अंदर कट्टरपंथ की भावना इस कदर भर दी गई है कि वह किसी मुस्लिम को देखकर ही अपना आपा खो बैठता है. वास्तव में, उसका जूडो सीखना इस्लामिक जिहादियों से लड़ने का ही प्रशिक्षण था

इन सब बातों से प्रमोद का भविष्य और करिअर उम्मीदों भरा लगता है पर कट्टरपंथ की जो शिक्षा उसे व उसके जैसे हजारों और बच्चों को स्वामीजी द्वारा दी जा रही है, उसके बाद ऐसा सोचना ही बेमानी हो जाता है. प्रमोद के अंदर कट्टरपंथ की भावना इस कदर भर दी गई है कि वह किसी मुस्लिम को देखकर ही अपना आपा खो बैठता है. वास्तव में, उसका जूडो सीखना इस्लामिक जिहादियों से लड़ने का ही प्रशिक्षण था. वह सांकेतिक भाषा में कहता है, ‘अगर मैंने दोबारा उन्हें (मुस्लिमों को) यहां देखा तो बंदूक से उड़ा दूंगा.’

सेना के प्रशिक्षण सरीखी यह ट्रेनिंग सात से आठ साल के मासूमों तक को भी दी जा रही है. स्वामीजी, उनके अनुयायियों और सहयोगियों ने इस तरह की ट्रेनिंग देने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐसे कई प्रशिक्षण केंद्र खोले हुए हैं, जिसे सांप्रदायिक तनाव के लिहाज से देश के सबसे संवेदनशील इलाकों में गिना जाता है. फोन पर स्वामीजी किसी से तेज आवाज में बात करते हुए कहते हैं, ‘मुसलमानों और हिंदुओं के बीच युद्ध में पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही युद्धस्थली होगा.’

रोचक यह भी है कि स्वामीजी उर्फ दीपक त्यागी कभी समाजवादी पार्टी (सपा) के यूथ विंग के प्रमुख सदस्य रह चुके हैं, उनके कई मुस्लिम दोस्त भी हुआ करते थे. हालांकि कुछ निजी वजहों के कारण उन्होंने ‘इस्लामिक जिहाद’ से लड़ने के लिए सपा छोड़कर कट्टरपंथी हिंदू संगठनों का हाथ थाम लिया.

1995 में मॉस्को से एमटेक करके आए स्वामीजी का मानना है कि इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) 2020 तक भारत पर आक्रमण करेगा और इसलिए इस्लामिक जिहाद से लड़ने के लिए हिंदुओं को प्रशिक्षित करना जरूरी है. मुसलमानों को गालियां देते हुए स्वामीजी ‘तहलका’ को बताते हैं, ‘देश में मौजूद हर एक मुसलमान उस वक्त आईएस का समर्थन करेगा इसलिए हिंदुओं का एक होना जरूरी है. हमें इन राक्षसों से अपने देश, अपनी बहन-बेटियों को बचाना है. अगर हम अब भी एक नहीं हुए तो बहुत देर हो जाएगी.’

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स्वामीजी और उन्हीं के जैसी सोच रखने वाले दूसरे लोगों ने पश्चिमी यूपी में हिंदुओं की भलाई के नाम पर ‘हिंदू स्वाभिमान संगठन’ बनाया है जिसका मकसद मुस्लिमों से लड़ना है. यह संगठन ‘सैफरन कॉरिडोर’ कहे जाने वाले पूरे पश्चिमी यूपी में गाजियाबाद से लेकर सहारनपुर तक सक्रिय है. हिंदू स्वाभिमान संगठन के सदस्य इस्लामिक जिहाद के फैलने से पहले इस संगठन की शाखाएं पूरे देश में स्थापित करने की चाहत रखते हैं.

अनिल यादव, इसके महासचिव हैं और पड़ोस के बम्हेटा गांव के रहने वाले हैं. यादव इस प्रशिक्षण के लिए संगठन में लड़कों की भर्ती करने में स्वामीजी की मदद करते हैं. यादव राज्य-स्तरीय पहलवान रहे हैं और अब अपने अखाड़े में सैकड़ों युवाओं को कुश्ती के गुर सिखाते हैं. बम्हेटा गांव कुश्ती की परंपरा के लिए जाना जाता है जिसने देश को कई अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पहलवान दिए हैं, जैसे- जगदीश पहलवान, विजयपाल पहलवान, सत्तन पहलवान लेकिन अब यह हिंदू कट्टरपंथी पैदा करने की जगह बन गया है.

हिंदुओं की भलाई के नाम पर ‘हिंदू स्वाभिमान संगठन’ बनाया गया है जिसका मकसद मुस्लिमों से लड़ना है. यह ‘सैफरन कॉरिडोर’ कहे जाने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद से लेकर सहारनपुर तक सक्रिय है

इन पहलवानों को एक योजनाबद्ध तरीके से कट्टरपंथ की शिक्षा के जरिये ‘तैयार’ करने के खतरे का एहसास तब होता है जब यादव कहते हैं कि इन पहलवानों को तैयार करने का काम ‘बेकाबू सांड’ को संभालने जैसा है. वे कहते हैं, ‘हम इन्हें कड़े अनुशासन में रखते हैं, दिन भर मेहनत करवाते हैं. अगर इन्हें सड़कों पर खुला छोड़ दिया जाए तो बड़ा हंगामा कर सकते हैं क्योंकि इनमें से हर कोई एक समय पर दस लोगों को आसानी से संभालने की कूवत रखता है.’ ऐसे हाल में सांप्रदायिक तनाव के समय ये लोग क्या कर सकते हैं, इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है.

हिंदूवादी सेना

ये हिंदू कट्टरपंथी खूंखार रणबीर सेना और सलवा जुडूम की तरह ही हजारों युवकों की एक निजी सेना बना रहे हैं. प्रशिक्षण के दौरान इन युवकों को तलवारबाजी, धनुष चलाना, मार्शल आर्ट्स और यहां तक कि पिस्तौल, राइफल व बंदूक चलाना भी सिखाया जा रहा है. जब बच्चों को हथियार चलाने के प्रशिक्षण के बारे में स्वामीजी से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ये सब ओलंपिक की तैयारी हो रही है. वो इसे सही ठहराते हुए कहते हैं, ‘क्या हम अपने मंदिर के अंदर खेलों का प्रशिक्षण नहीं दे सकते! इस सबमें गलत क्या है?’ शारीरिक प्रशिक्षण के अलावा युवाओं को ये भी बताया जा रहा है कि संसार की सभी समस्याओं की जड़ इस्लाम है और जो भी इसके अनुयायी हैं वे सब के सब राक्षस हैं.

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सभी फोटो- विजय पांडेय

मुस्लिमों के खिलाफ भड़काई जा रही इस नफरत का अंदाजा इस बात से लगता है कि एक आठ साल के बच्चे में भी मुस्लिमों के प्रति घृणा है. गाजियाबाद के रोड़ी गांव में प्रशिक्षण ले रहा एक बच्चा कहता है कि वह मुसलमानों से लड़ेगा क्योंकि वे हमारे देश के लिए एक खतरा हैं. जब उस बच्चे से पूछा गया कि मुस्लिम कौन हैं,  तब उसने कुछ देर रुककर बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, ‘जो मीट खाते हैं, वो मुसलमान हैं.’

हिंदू स्वाभिमान से जुड़े परमिंदर आर्य पूर्व सैन्यकर्मी हैं. वे अपने घर के अहाते में ऐसे ही एक प्रशिक्षण केंद्र का संचालन करते हैं. इस केंद्र में मेरठ और कभी-कभी देश के दूसरे हिस्सों से भी प्रशिक्षक आते हैं. यहां गांव के आठ से लेकर तीस साल तक की उम्र के लगभग 70 लोगों को प्रशिक्षित किया जा रहा है. कारगिल युद्ध का हिस्सा रहे सेवानिवृत्त परमिंदर कहते हैं, ‘मैं घर-घर जाकर बच्चों के माता-पिता से नहीं कहता कि बच्चों को प्रशिक्षण के लिए भेजो. वे खुद यहां आते हैं. मुस्लिमों को छोड़कर मेरे प्रशिक्षण केंद्र में सभी का स्वागत है.’

सितंबर 2011 में सेना से रिटायर परमिंदर ने लंबे समय तक उथल-पुथल के दौर में कश्मीर में अपनी सेवाएं दी हैं. परमिंदर कहते हैं कि वे हिंदुओं के लिए हमेशा से ही काम करते रहे हैं लेकिन कश्मीर से पंडितों को खदेड़े जाने के बाद उन्होंने कट्टरपंथ का रास्ता अपना लिया. वे मानते हैं कि कश्मीरी पंडितों के साथ जो दुर्व्यवहार हुआ, उसके बाद वे विश्वास करने लगे कि मुस्लिमों से लड़ाई के लिए हिंदुओं को एकजुट होना पड़ेगा. उन्माद से भरे हुए परमिंदर कहते हैं, ‘लाखों कश्मीरी पंडित या तो मार दिए गए या फिर अपना गांव-घर छोड़ने को मजबूर कर दिए गए. उनके पास यही विकल्प थे कि या तो वे अपने घर की औरतों का बलात्कार होते हुए देखें, कश्मीर छोड़ दें, या फिर इस्लाम स्वीकार करें.’

हिंदूवादी संगठनों की ओर से चलाए जा रहे केंद्रों में शारीरिक प्रशिक्षण के अलावा युवाओं को ये भी बताया जा रहा है कि संसार की सभी समस्याओं की जड़ इस्लाम है और जो इसको मानते हैं वे सभी राक्षस हैं

परमिंदर बताते हैं कि उन्होंने प्रशिक्षण केंद्र की शुरुआत चार साल पहले आईएस से लड़ने के लिए की थी. जब उनसे कहा गया कि चार साल पहले तक तो आईएस को कहीं कोई जानता ही नहीं था, तब उनका जवाब था, ‘मुझे पता था कि आने वाले सालों में इस्लामिक जिहाद बढ़ेगा इसलिए बच्चों को प्रशिक्षण देना शुरू किया ताकि वे देश की रक्षा कर सकें.’ हिंदुत्व के प्रति अपनी निष्ठा का प्रमाण देते हुए परमिंदर कहते हैं कि 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान उन्होंने अपने लड़कों को हिंदुओं की रक्षा करने के लिए वहां भेजा था.

रोड़ी गांव हिंदू बहुल है, यहां की बहुसंख्यक आबादी जाटों की है. गांव के एक कोने में मुसलमानों के परिवार हैं. गांव में सांप्रदायिक तनाव का अभी तक कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया है लेकिन दोनों समुदायों में झड़पें होती रही हैं. अब हिंदू बच्चों को ऐसा प्रशिक्षण दिए जाने से मुस्लिम जरूर चिंतित हैं. रोड़ी गांव में अपने घर के बाहर बैठे एक वृद्ध मुस्लिम चिंता जाहिर करते हुए कहते हैं, ‘हमें ऐसा लगता है कि गांव में हम मुस्लिम अलग-थलग कर दिए गए हैं. जब मैं छोटा था तो दोनों समुदाय के बच्चे एक-साथ खेला करते थे लेकिन अब एक खालीपन-सा है.’

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गांव में हिंदुओं को दिए जा रहे इस तरह के प्रशिक्षण ने एक अनकही दीवार खड़ी कर दी है. गांव के कुछ लोग बताते हैं कि यहां के सामाजिक ताने-बाने को तब भी धक्का लगा जब 22 अक्टूबर को दशहरे के अवसर पर गांव में अग्नि शस्त्र पूजन का आयोजन किया गया था. फिर रोड़ी गांव में कुुछ समय पहले हुई एक महापंचायत में फैसला लिया गया कि हिंदुओं को अब एकजुट होना पड़ेगा. आरोप है कि इस महापंचायत में वक्ताओं ने मुस्लिमों को गालियां दीं.

परमिंदर कहते हैं, ‘इस देश में हिंदुओं को सिर्फ मुसलमानों से ही लड़ना है. दुनिया में सभी आतंकवादी मुसलमान ही हैं. क्या आपने कभी देश में किसी हिंदू को आतंकवाद फैलाते देखा है?’, परमिंदर इस समय भाजपा का समर्थन कर रहे हैं. वे किसी भी उस पार्टी के साथ रहेंगे जो हिंदुओं के लिए काम करे, उनके अनुसार ऐसा इस वक्त मोदी कर रहे हैं.

जब उनसे प्रशिक्षण केंद्र चलाने के लिए फंडिंग और संसाधनों के प्रबंधन से जुड़े सवाल किए गए तो परमिंदर और उनके एक वकील सहयोगी कोई विश्वसनीय जवाब नहीं दे पाए. उन्होंने सिर्फ इतना कहा, ‘हम दान नहीं मांगते क्योंकि हिंदू सिर्फ ढोंगी बाबाओं को ही दान देते हैं.’ उन्होंने आगे बताया कि पश्चिमी यूपी से उनके जैसे स्वामीजी के भक्त इस काम के लिए संसाधन उपलब्ध कराते हैं.

शाम के प्रशिक्षण सत्र के लिए आने वाले बच्चे अखाड़े में प्रवेश से पहले ‘जय श्रीराम’ कहकर गुरुजी (परमिंदर आर्य) का अभिनंदन करते हैं. निखिल आर्य (17) और कुलदीप शर्मा (19) पिछले दो सालों से यहां प्रशिक्षण के लिए आ रहे हैं. जब उनसे पूछा गया कि हथियारों की ट्रेनिंग क्यों ले रहे हो तो उनका जवाब था, ‘आत्मरक्षा के लिए.’ एसएससी की तैयारी कर रहे निखिल ने कहा, ‘सभी आतंकवादी मुस्लिम हैं इसलिए उनसे खतरा है.’ कुलदीप ने बताया कि उसके और दूसरे बच्चों के पास मोबाइल में 10-12 ह्वाट्सएप ग्रुप हैं और हर ग्रुप में 150 से 200 लोग हैं. सोशल मीडिया का इस्तेमाल वे इसलिए कर रहे हैं ताकि अगर कोई प्रशिक्षण के लिए न आ पाए तो उसे कम से कम घटनाक्रम से तो अवगत रखा जा सके. हिंदू स्वाभिमान संगठन द्वारा ग्रुप में भेजी गई एक तस्वीर में लिखा है, ‘हिंदू क्यों भूल गया है शस्त्रों को?’

ये संगठन सात साल के बच्चों का भी ब्रेनवॉश करने में सफल हुए हैं. अब ये लोग अपने संगठन का विभिन्न रूपों में राजस्थान, हरियाणा, बिहार और झारखंड में विस्तार करने की महत्वाकांक्षा रखते हैं

परमिंदर और गांववाले कहते हैं कि वे बच्चों को सिर्फ इसलिए प्रशिक्षित कर रहे हैं ताकि इस्लामिक जिहादियों के आक्रमण के समय वे अपने परिवार और देश की रक्षा कर सकें. इससे प्रशासन को क्या परेशानी होनी चाहिए? उनके अनुसार समस्या तो मदरसों में है. परमिंदर ने यह भी बताया कि प्रशिक्षण के लिए तकरीबन 100 लोगों ने रिवॉल्वर, पिस्तौल और लाइसेंसी हथियार उपलब्ध कराए हैं. इस बीच उनका मोबाइल फोन बजता है. चेहरे पर बड़ी मुस्कान के साथ परमिंदर बताते हैं कि इंटेलिजेंस ब्यूरो से किसी का फोन था.

इन प्रशिक्षण केंद्रों की श्रृंखला सिर्फ रोड़ी गांव तक ही सीमित नहीं बल्कि मेरठ में भी ऐसे आठ केंद्र चल रहे हैं. हिंदू स्वाभिमान संगठन के मुताबिक उनका दायरा सहारनपुर और हरिद्वार तक फैला हुआ है. हालांकि सभी केंद्र खुलेआम नहीं चलाए जा रहे हैं. दिलचस्प बात ये है कि इस आंदोलन की प्रेरणा और आदर्श 107 साल के एक स्वामीजी हैं जो देवबंद में रहते हैं.

मेरठ के केंद्रों का संचालन चेतना शर्मा देखती हैं, जो पेशे से वकील हैं. जहां तक उनकी संगठन से जुड़ी पहचान का सवाल है तो चेतना के पास कई हैं, जिनका जरूरत के मुताबिक प्रयोग होता है. कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ‘दुर्गा वाहिनी’ की विभाग संयोजक रहीं चेतना को ‘अखंड हिंदुस्तान मोर्चा’ की जोनल इंचार्ज के तौर पर भी जाना जाता है.

पूर्व भाजपा सांसद बीएल शर्मा, जिन्होंने विहिप और बजरंग दल की सेवा करने के लिए राजनीति छोड़ी और फिर 2009 में वापस भाजपा में शामिल हो गए, इस अखंड हिंदुस्तान मोर्चा के संस्थापक हैं. चेतना बीएल शर्मा की बेटी जैसी हैं और उनकी संभावित वारिस भी. चेतना ‘लव जिहाद’ के मामले पर अभियान चलाने को लेकर विवादों में रह चुकी हैं.

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यहां रोचक पहलू ये है कि ये लोग किसी भी राजनीतिक विचारधारा के प्रति निष्ठा रखने की बात दरकिनार करते हैं लेकिन किसी न किसी रूप में एक राजनीतिक विचारधारा की छत्र-छाया में ही फल-फूल रहे हैं. सबसे बड़ी बात है कि जिन क्षेत्रों में ये संगठन सक्रिय हैं, वहां ये सात साल के बच्चों का भी ब्रेनवॉश करने में सफल हुए हैं. अब ये संगठन का विभिन्न रूपों में राजस्थान, हरियाणा, बिहार और झारखंड में विस्तार करने की महत्वाकांक्षा रखते हैं.

सहारनपुर में कपड़े की दुकान चलाने वाले दिनेश वर्मा, अब दिनेश ‘हिंदू’ के नाम से जाने जाते हैं. वे इस क्षेत्र में हिंदू स्वाभिमान संगठन का काम देखते हैं. उनके अनुसार वे ‘हिंदुओं से जुड़े सभी मसलों पर काम करते हैं, चाहे वो लव जिहाद का मामला हो या गोहत्या का.’ डासना के स्वामीजी से उनका संपर्क ह्वाट्सएप के जरिये हुआ था, जिसके बाद उनकी सोच बदल गई. उनका दृढ़ विश्वास है कि यदि अब भी जिम्मेदारी नहीं ली गई तो हिंदुओं को न सिर्फ पश्चिमी यूपी बल्कि पूरे देश से निकाल दिया जाएगा. वे कहते हैं, ‘उन्होंने पहले पाकिस्तान में ऐसा किया, फिर बांग्लादेश में. अगर भारत भी हाथ से निकल गया तो हिंदुओं के लिए दुनिया में कोई देश नहीं रहेगा. हम कहां जाएंगे?’ हालांकि इस संगठन के प्रभाव से क्षेत्र में बढ़ी कट्टरता साफ महसूस की जा सकती है. यहां एक और बात है, जिस पर डासना के स्वामीजी, अनिल यादव और परमिंदर आर्य समान रूप से सहमत हैं. उनके अनुसार अगर कोई संकट आता है तो ये प्रशिक्षित बच्चे न केवल हिंदुओं की रक्षा करेंगे बल्कि ऐसा खूनखराबा करेंगे कि पश्चिमी यूपी का वह क्षेत्र ‘पवित्र’ हो जाएगा. पर ये सभी सामान्य रूप में उनके द्वारा प्रशिक्षित बच्चों द्वारा कानून हाथ में लेने की स्थिति में उस कानून के उल्लंघन की जिम्मेदारी लेने से साफ इंकार करते हैं. फिर वे ये कह कर चौंका देते हैं कि यदि उनके द्वारा प्रशिक्षित बच्चे कोई गलत काम ही क्यों न करें, वे उसका साथ देंगे.

इन सबके बीच उत्तर प्रदेश पुलिस को इस मामले की कोई जानकारी ही नहीं है. मोदीनगर के डीएसपी राजेश कुमार सिंह बताते हैं, ‘हमें हिंदू कट्टरपंथ के इस तरह हो रहे विस्तार के बारे में कोई जानकारी नहीं है.’ फिर वे आश्वस्त भी करते हैं कि वे इस मामले में संज्ञान लेंगे और उचित कार्रवाई करेंगे. हालांकि दिलचस्प बात ये है कि डासना के स्वामीजी द्वारा दिए गए एक भड़काऊ भाषण पर मोदीनगर में ही एफआईआर हुई, जिसके प्रतिरोध में मोदीनगर में ही एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित की गई थी.

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इसी बीच हिंदू महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष कमलेश तिवारी द्वारा पैगंबर मोहम्मद पर दिए गए विवादित बयान ने इस धार्मिक राजनीति की बहस को गरमा दिया है. बिजनौर के मौलाना अनवर-उल-सादिक ने ये घोषणा की थी, ‘जो कमलेश तिवारी का सिर कलम करेगा, उसको 51 लाख रुपये इनाम दिया जाएगा.’ पश्चिमी यूपी के स्योहारा में सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने तिवारी को सजा-ए-मौत देने की मांग की है. इस तरह के विरोध देशभर में कई जगह हुए, हाल ही में पश्चिम बंगाल के मालदा और बिहार के पूर्णिया में भी इसी को लेकर हिंसक झड़प हुई थी.

कम ही लोग जानते हैं कि कमलेश डासना के स्वामीजी के शिष्य हैं. गुस्से से भरे स्वामीजी कहते हैं, ‘अगर कमलेश मारे गए तो परिणाम बहुत बुरा होगा, ऐसा होता है तो फिर पूरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश देखेगा कि हम उनके (मुस्लिमों) साथ क्या करेंगे!’

‘बसपा इस क्षेत्र में अपनी जमीन तैयार कर रही है और 2017 का विधानसभा चुनाव जीत सकती है. पर  सांप्रदायिक तनाव बना रहा तो मुकाबला सीधे-सीधे हिंदू-मुस्लिम यानी भाजपा और सपा के बीच होगा’

रोड़ी गांव के रहवासी प्रीतम, जो ब्लॉक ऑफिस में काम करते हैं, बताते हैं कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी इस क्षेत्र में अपनी जमीन तैयार कर रही है और 2017 के विधानसभा चुनावों में बहुमत से जीत सकती है. पर अगर इस तरह का सांप्रदायिक तनाव बना रहा तो मुकाबला सीधे-सीधे हिंदू-मुस्लिम यानी भाजपा और सपा के बीच होगा.

ये बात सोचने को मजबूर करती है कि अगर ये सब 2017 की सियासी लड़ाई की तैयारी है तो क्या जब इसके राजनीतिक उद्देश्य पूरे हो जाएंगे, तब समाज में बनाई जा रही इस खाई, खूनखराबे और कट्टरपंथ का भी अंत हो जाएगा? ऐसी संभावना नहीं दिखती.

क्या घाटी का मुस्लिम समाज कश्मीरी पंडितों की वापसी चाहता है?

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कहां से : कश्मीर घाटी

कब से : 1989

कितने :  तकरीबन 3,00,000

घाटी से कश्मीरी पंडितों को विस्थापित हुए 26 साल हो गए. पंडितों की एक नई पीढ़ी सामने है और सामने है यह प्रश्न भी कि क्या कभी ये लोग वापस अपने घर कश्मीर जा पाएंगे.

14 सितंबर, 1989 को भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष टिक्कू लाल टपलू की हत्या से कश्मीर में शुरू हुआ आतंक का दौर समय के साथ और वीभत्स होता चला गया. टिक्कू की हत्या के महीने भर बाद ही जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता मकबूल बट को मौत की सजा सुनाने वाले सेवानिवृत्त सत्र न्यायाधीश नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई. फिर 13 फरवरी को श्रीनगर के टेलीविजन केंद्र के निदेशक लासा कौल की निर्मम हत्या के साथ ही आतंक अपने चरम पर पहुंच गया था. घाटी में शुरू हुए इस आतंक ने धर्म को अपना हथियार बनाया और इस के निशाने पर आ गए कश्मीरी पंडित. एक विस्थापित कश्मीरी पंडित रमाकांत याद करते हैं, ‘उस समय आतंकवादियों के निशाने पर सिर्फ कश्मीरी पंडित थे. वे किसी भी कीमत पर सभी पंडितों को मारना चाहते थे या फिर उन्हें घाटी से बाहर फेंकना चाहते थे. इसमें वे सफल हुए.’ रमाकांत के मुताबिक हिंदुओं को आतंकित करने की शुरुआत तो बहुत पहले ही हो चुकी थी मगर 19 जनवरी को जो हुआ वह ताबूत में अंतिम कील थी.

वे बताते हैं, ‘पंडितों के घरों में कुछ दिन पहले से फोन आने लगे थे कि वे जल्द-से-जल्द घाटी खाली करके चले जाएं या फिर मरने के लिए तैयार रहें. घरों के बाहर ऐसे पोस्टर आम हो गए थे जिनमें पंडितों को घाटी छोड़कर जल्द से जल्द चले जाने या फिर अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहने की नसीहत दी गई थी. लोगों से उनकी घड़ियों को पाकिस्तानी समय के साथ सेट करने का हुक्म दिया जा रहा था. सिंदूर लगाने पर प्रतिबंध लग गया था. भारतीय मुद्रा को छोड़कर पाकिस्तानी मुद्रा अपनाने की बात होने लगी थी.’

जिन मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से कभी इबादत की आवाज सुनाई देती थी आज उनसे कश्मीरी पंडितों के लिए जहर उगला जा रहा था. एक अन्य कश्मीरी पंडित अजय बताते हैं, ‘ये लाउडस्पीकर लगातार तीन दिन तक इसी तरह उद्घोष करते रहे थे. ‘यहां क्या चलेगा, निजाम-ए-मुस्तफा’, ‘आजादी का मतलब क्या ला इलाहा इल्लल्लाह’, ‘कश्मीर में अगर रहना है, अल्लाह-ओ-अकबर कहना है’ और ‘असि गच्ची पाकिस्तान, बताओ रोअस ते बतानेव सान’ जिसका मतलब था कि हमें यहां अपना पाकिस्तान बनाना है, कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ लेकिन कश्मीरी पंडितों के बिना.’

जब तक कश्मीर घाटी में सहिष्णुता नहीं आती तब तक पंडितों की वापसी मुश्किल है

दिलीप पडगांवकर

कश्मीर मसले पर केंद्र द्वारा नियुक्त वार्ताकारों की टीम के सदस्य और वरिष्ठ पत्रकार

कश्मीरी पंडितों के संगठन पनुन कश्मीर के अश्विनी चंग्रू कहते हैं, ‘उस दौरान कर्फ्यू लगा हुआ था फिर भी कर्फ्यू को धता बताते हुए कट्टरपंथी सड़कों पर आ गए. कश्मीरी पंडितों को मौत के घाट उतारने, उनकी बहन-बेटियों का बलात्कार करने और हमेशा के लिए उन्हें घाटी से बाहर खदेड़ने की शुरुआत हो चुकी थी.’

आखिरकार 19 जनवरी, 1990 को लगभग तीन लाख कश्मीरी पंडित अनिश्चितकाल के लिए अपना सब कुछ छोड़कर घाटी से बाहर जाने को विवश हो गए. इन्हीं लोगों में शामिल शिवकुमार कहते हैं, ‘कश्मीरी पंडितों को सिर्फ दो चीजें ही आती हैं. एक पढ़ना और दूसरा पढ़ाना. ऐसे में उन लोगों का मुकाबला करना, जो हमारे खून के प्यासे थे, संभव ही नहीं था.’ 

23 साल हो गए इन घटनाओं को. पिछले 23 साल से ही कश्मीरी पंडित अपने घर से दूर शरणार्थियों का जीवन गुजार रहे हैं. उस समय घाटी से जान बचाकर शरण की आस में लगभग तीन लाख कश्मीरी पंडित जम्मू, दिल्ली समेत देश के अन्य दूसरे इलाकों में चले गए. जम्मू में पहुंचने के बाद ये लोग वहां अगले 20 साल तक लगातार कैंपों में रहे. शुरुआती पांच साल तक तो ये लोग टेंट वाले कैंपों में रहे. अंदाजा लगाया जा सकता है कि पांच साल तक लगातार पूरे परिवार ने छोटे-से टेंट में किस तरह से सर्दी-गर्मी-बरसात बिताये होंगे. खैर, एक लंबे समय के बाद इन्हें टेंट के स्थान पर ‘घरों’ में शिफ्ट कर दिया गया.

घर के नाम पर उन मकानों में पूरे परिवार के लिए सिर्फ एक कमरा था जहां औसतन पांच सदस्यों के एक परिवार को रहना था. इसके अलावा एक बड़ी दिक्कत यह थी कि ये कश्मीर घाटी में रहने वाले लोग थे जहां की जलवायु जम्मू से बिल्कुल अलग है. जम्मू में लंबे समय तक रहने का नतीजा यह रहा कि ज्यादातर कश्मीरी पंडित स्वास्थ्य की गंभीर समस्याओं से जूझने लगे.

विभिन्न रिपोर्टों में यहां तक कहा गया कि पिछले 23 साल में कश्मीरी पंडितों की जनसंख्या तेजी से कम हुई है. 60 वर्षीय हरिओम इसकी वजह बताते हैं, ‘एक कमरे में पूरा परिवार रहता था. मां-बाप भाई-बहन सब. पिछले 23 साल में पर्सनल स्पेस जैसी कोई चीज नहीं रह गई थी. यही कारण है कि जनसंख्या में गिरावट दिखाई देती है. इसके अलावा जिस तरह की आर्थिक समस्या से समाज गुजर रहा था उसमें किसी नए सदस्य को दुनिया में लाना उसके साथ अन्याय करने के समान था.’

आज कश्मीरी पंडितों की बड़ी आबादी को उस एक कमरे के घरों वाले कैंपों, जहां वे लगातार 20 साल तक रहे, से निकालकर उनके लिए बनाई गई कालोनियों में बसा दिया गया है. इस तरह के पुनर्वास पर अजय चंग्रू कहते हैं, ‘कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास की समस्या तो कश्मीर में ही रहने से हल होगी. सरकार ये सोचे कि कश्मीर के बाहर किसी जगह पर उनके लिए रहने की व्यवस्था करा देने से मामला हल हो जाएगा तो ऐसा नहीं है.’

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कश्मीरी पंडितों के विभिन्न संगठनों की मांग है कि उन्हें कश्मीर में ही एक अलग केंद्रशासित होमलैंड का निर्माण करके बसाया जाए. पनुन कश्मीर संगठन के प्रवक्ता वीरेंद्र कहते हैं, ‘कौन कहां जाना चाहता है हमें इससे मतलब नहीं है, हमें कश्मीर में ही रहना है और भारतीय संविधान के अंदर ही रहना है.’

कश्मीरी पंडितों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिनके कश्मीर स्थित घरों को आग लगा दी गई या फिर उन्हें तोड़ दिया गया. जमीन पर स्थानीय लोगों ने अवैध कब्जा कर लिया या फिर दो जून की रोटी की व्यवस्था के लिए इन्हें उसे कौड़ियों के भाव बेचना पड़ा. ऐसे ही एक पीड़ित अजय कुमार भट्ट कहते हैं, ‘नरसंहार की उस घटना के बाद मैं अपने परिवार के साथ यहां जम्मू स्थित रिफ्यूजी कैंप में रहने लगा. जो कुछ हमारे पास था सब पीछे छूट चुका था. न पैसे थे न रोजगार. ऐसे में अपनी जमीन बेचने के अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं था. घर का खर्च चलाने के लिए हमें अपनी जमीन कौड़ियों के भाव बेचनी पड़ी. खरीदने वाला भी जानता था कि हम मजबूर हैं इसलिए उसने जमीन की कीमत नहीं बल्कि सांत्वना राशि हमें दी थी.’

गाहे-बगाहे घाटी स्थित विभिन्न तबकों द्वारा कश्मीरी पंडितों की वापसी को लेकर की जाने वाली बयानबाजी अब इन लोगों में किसी उत्साह के बजाय गुस्से का संचार करती है. विस्थापित कश्मीरी पंडित अश्विनी कहते हैं, ‘घाटी के वे पृथकतावादी लोग हमें घाटी में वापस देखने को बेकरार हैं जिन्होंने हमारे लोगों का कत्लेआम किया, बहन बेटियों की इज्जत लूटी. इन लोगों को तो जेल में होना चाहिए था क्योंकि सब कुछ इन्हीं की देखरेख में हुआ.’

विश्वास की खाई कितनी गहरी है यह इस बात से पता चलता है कि जब कुछ समय पहले ही प्रदेश के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्विटर पर बयान दिया था कि कश्मीरी पंडितों के बिना कश्मीर अधूरा है, तो उनकी इस बात पर भरोसा करने वाला एक भी कश्मीरी पंडित दिखाई नहीं दिया.

कश्मीर घाटी में हम पंडितों की वापसी का स्वागत करते हैं. इसमें हमारी तरफ से कोई रुकावट नहीं है

सैयद अली शाह गिलानी

पृथकतावादी नेता

आखिर क्यों? पंडित चमनलाल कहते हैं, ‘यह लिप सर्विस  है. दुनिया को वे यह दिखाना चाहते हैं कि देखिए साहब कश्मीरी पंडितों के लिए हम घाटी में कब से पलक पांवड़े बिछाए हुए हैं. वही हैं जो आना नहीं चाहते. असली सवाल यह है कि क्या सरकार पंडितों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने को तैयार है. और फिर यह जानना भी जरूरी है कि घाटी के मुसलमान पंडितों की वापसी के लिए कितने उत्साहित हैं. क्योंकि आखिर में रहना तो उन्हीं के साथ है.’

कश्मीरी पंडितों के मन में इस बात को लेकर भी पीड़ा है कि घाटी की मुस्लिम आबादी ने उस दौरान उनका साथ नहीं दिया जब उन्हें वहां से खदेड़ा जा रहा था, उनके साथ कत्लेआम हो रहा था. अश्विनी कहते हैं, ‘अगर कश्मीर के मुसलमान उस समय हमारे साथ खड़े होते तो किसी आतंकवादी में ये हिम्मत नहीं होती कि वह किसी कश्मीरी पंडित को चोट पहुंचाने की सोच पाता. लेकिन उन्होंने उस समय हमारा साथ देने के बजाय कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेक दिए.’   

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष वजाहत हबीबुल्ला ने विभिन्न मौकों पर कश्मीरी पंडितों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने का सुझाव राज्य सरकार को दिया लेकिन राज्य सरकार ने इसमें कोई रुचि नहीं दिखाई. पंडित संगठनों का कहना है कि जिस तरह के नरसंहार से पंडितों को राज्य में गुजरना पड़ा और अल्पसंख्यक होने के नाते उनकी जो स्थिति है उसे देखते हुए उनके समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलना चाहिए था. मगर ऐसा नहीं हुआ और जम्मू कश्मीर में आज तक अल्पसंख्यक आयोग का गठन तक नहीं हुआ है. अजय कहते हैं, ‘आज भी राज्य सरकार इस पर विचार करने को तैयार नहीं है. दरअसल वह बहुसंख्यक आबादी को अल्पसंख्यक आयोग का गठन करके नाराज नहीं करना चाहती.’ 

वर्ष 1990 में जो कुछ भी हुआ उसको कश्मीरी पंडित जेनोसाइड अर्थात नरसंहार और एथनिक क्लींजिंग का नाम देते हैं. वीरेंद्र कहते हैं, ‘जो हुआ वह सिर्फ कोई आतंकी घटना नहीं थी बल्कि कट्टरपंथियों की ये सोची-समझी रणनीति थी कि कश्मीर में हर उस प्रतीक को खत्म कर दिया जाए जो उनके इस्लामिक राज्य की स्थापना में बाधक हो रहा है. पहले उन लोगों ने पंडितों का कत्लेआम शुरू करके भय का माहौल बनाया जिससे सारे हिंदू यहां से भाग जाएं. उसके बाद उनके घरों को आग लगी दी, मंदिरों और पूजा स्थानों को तोड़ा और जलाया. वे कश्मीर से पंडितों की पूरी पहचान हमेशा-हमेशा के लिए मिटाना चाहते थे. जो लोग हमें वहां बुलाना चाहते हैं, वे जरा एक बार ये शोध करके यह बताएं कि आज घाटी में पंडितों से जुड़ी हुई कितनी पहचानें सुरक्षित बची हैं.’

सवालों के घेरे में डीजीपी की नियुक्ति

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नए साल की शुरुआत के साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार ने 15 वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दरकिनार करके एस जावीद अहमद को राज्य का पुलिस महानिदेशक बनाया तो यह तय हो गया कि पुलिस सुधारों की बातें अभी दूर की कौड़ी है. जावीद अहमद 1984 बैच के अधिकारी हैं जो कि अब तक पुलिस महानिदेशक (रेलवे) के पद पर तैनात थे. प्रदेश में रंजन द्विवेदी सबसे वरिष्ठ अधिकारी हैं, जो 1979 बैच के आईपीएस हैं. कायदे से इस पद पर उनकी दावेदारी बनती थी, लेकिन उनके साथ 14 अन्य अधिकारियों को नजरअंदाज करके यह नियुक्ति हुई. वरिष्ठता क्रम में द्विवेदी के बाद 1980 बैच के डीजी आईपीएस सुलखान सिंह का नंबर था. राज्य पुलिस महानिदेशक पद के दावेदार 15 अधिकारियों को दरकिनार करके जावीद अहमद को नियुक्त किए जाने को लेकर तमाम सवाल उठे कि क्या सभी 15 वरिष्ठ अधिकारी इस पद के लिए अयोग्य थे? इस पद से डीजीपी जगमोहन यादव के रिटायर होने के बाद अधिकारी महकमे में जबरदस्त लॉबिंग शुरू हुई थी. चर्चा है कि जाति, धर्म, वफादारी, खेमेबाजी आदि सब मुद्दे उछाले गए और अंतत: नौकरशाही में सियासत की बाजी जावीद अहमद के हाथ लगी. आरोप हैं कि जावीद अहमद को अखिलेश यादव सरकार ने आने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अपने चुनावी कार्ड के रूप में चुना है क्योंकि 15 अधिकारियों को दरकिनार कर किसी जूनियर अधिकारी को प्रमोट करने का मसला गंभीर सवाल खड़े करता है.

जावीद अहमद अब उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक के रूप में मार्च 2020 तक सेवाएं देंगे. उत्तर प्रदेश में 2017 में विधानसभा चुनाव हैं. माना जा रहा है कि यह नियुक्ति आगामी चुनाव के मद्देनजर उत्तर प्रदेश सरकार के गुणा-गणित का परिणाम है. अधिकारियों की बिरादरी में यह आम धारणा है कि नियुक्तियां और तबादले उत्तर प्रदेश और बिहार के सबसे बड़े उद्योगों में से हैं जो पर्दे के पीछे चलते हैं. जब-जब इस तरह की नियुक्ति या पुलिस प्रताड़ना की कोई घटना होती है, तब तब यह सवाल उठता है कि करीब चार दशक से लंबित पुलिस सुधारों की शुरुआत कब होगी?

पूर्व आईएएस अधिकारी आरके मित्तल ने इस बारे में कहा, ‘मेरा मत है कि अगर सरकार की नीयत ठीक है तो यह नियुक्ति ठीक है, क्योंकि एक-एक, दो-दो महीने वाली नियुक्तियां तो किसी भी तरह से ठीक नहीं हो सकतीं. नियुक्तियों में थोड़ा-बहुत राजनीतिक फैक्टर तो होता है, लेकिन अगर व्यापक तौर पर मंशा ठीक है तो किसी भी नियुक्ति में कोई बुराई नहीं है. दूसरे, यहां पर राजनीतिक बाध्यताएं भी काम करती हैं. पार्टियां यह तो जरूर ध्यान में रखती हैं कि कौन सा अधिकारी उनके लिए मुफीद रहेगा. अगर नियुक्ति के पीछे कोई दुर्भाव नहीं है तो वह गलत नहीं है.’

‘पुलिस सुधार होगा, लेकिन समय के साथ होगा. कभी ऐसा उफान आएगा कि सुधार करना अनिवार्य बन जाएगा, जैसे चुनाव सुधार हुए’

हाल ही में गुजरात में हुए राज्य पुलिस प्रमुखों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुलिस को अपने कामकाज में संवेदनशील होने की बात कही थी. बेशक पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार की वकालत मौजूं है. पुलिस सुधार के जरिये कानून-व्यवस्था संबंधी तमाम खामियों को तंत्र से दूर किया जा सकता है. लेकिन इसकी शुरुआत कहां से होगी जब तक कि इस तरह से राजनीतिक फायदे-नुकसान की बिना पर तबादले और नियुक्तियां होती रहेंगी?

पुलिस तंत्र को संवेदनशील और कार्यकुशल बनाने के प्रधानमंत्री के सुझाव पर अमल की शुरुआत किसकी तरफ से होगी? क्या केंद्रशासित प्रदेशों में केंद्र कोई नजीर पेश करके राज्यों से वैसा करने  के लिए कहेगा? क्या केंद्र पुलिस सुधार की दिशा में कोई गाइडलाइन जारी करेगा? क्या राज्य इस दिशा में खुद से पहल करेंगे या फिर पुलिस सुधार चर्चा पिछले चार दशकों की तरह आगे भी जारी रहेगी?

पुलिस सुधार की बहस चलते हुए चार दशक से ज्यादा हो चुके हैं. इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट की एक दशक पुरानी गाइड लाइन पर अब तक केंद्र या राज्य सरकारों की ओर से कोई ठोस पहल सामने नहीं आ सकी है. प्रधानमंत्री ने जो सुझाव दिए, इस तरह के सुझाव पहले भी विभिन्न मंचों से आते रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट भी लंबे समय से 1861 में बने भारतीय पुलिस कानून में बदलाव लाने का दिशा-निर्देश जारी कर चुका है और कई बार केंद्र व राज्य सरकारों को तलब भी कर चुका है. विडंबना यह है कि कोर्ट के दिशा-निर्देशों पर केंद्र या राज्य की ओर से कोई अमल नहीं किया गया. कोर्ट के निर्देश के बाद कुछ राज्यों ने पुलिस सुधार का दिखावा जरूर किया. सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को आए दस साल होने को हैं, बीच में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर राज्यों से जवाब भी मांगा था, लेकिन राज्यों की ओर से उदासीनता की स्थिति में सुप्रीम कोर्ट लाचार ही नजर आया. अब सिर्फ यह चारा बचा है कि सुप्रीम कोर्ट अपने दिशा-निर्देशों को लेकर समय निर्धारित करे और कड़ी निगरानी के साथ इसे लागू करवाए.

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आपातकाल के दौरान पुलिसिया दमन अपने खौफनाक चेहरे के साथ सामने आया था. 1977 में जब केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी तो पुलिस सुधार का मुद्दा व्यापक चर्चा का विषय बना. उस समय की मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार ने जाने-माने पूर्व आईएएस अधिकारी डॉ. धर्मवीर की अध्यक्षता में पुलिस आयोग का गठन किया. 1977 से लेकर 1981 के बीच इस आयोग ने आठ रिपोर्ट पेश की और पुलिस सुधार के लिए बेहद अहम सुझाव दिए. आयोग ने मॉडल पुलिस एक्ट का एक प्रारूप भी प्रस्तुत किया था लेकिन उन पर कभी किसी ने ध्यान नहीं दिया. 1996 में उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके पुलिस सुधार की मांग की. याचिका में उन्होंने अपील की थी कि कोर्ट केंद्र व राज्यों को यह निर्देश दे कि वे अपने-अपने यहां पुलिस की गुणवत्ता में सुधार करें और जड़ हो चुकी व्यवस्था को प्रदर्शन करने लायक बनाएं. इस याचिका पर न्यायमूर्ति वाईके सब्बरवाल की अध्यक्षता वाली बेंच ने सुनवाई करते हुए 2006 में कुछ दिशा-निर्देश जारी किए. न्यायालय ने केंद्र और राज्यों को सात अहम सुझाव दिए. इन सुझावों में प्रमुख बिंदु थे- हर राज्य में एक सुरक्षा परिषद का गठन, डीजीपी, आईजी व अन्य पुलिस अधिकारियों का कार्यकाल दो साल तक सुनिश्चित करना, आपराधिक जांच एवं अभियोजन के कार्यों को कानून-व्यवस्था के दायित्व से अलग करना और एक पुलिस शिकायत निवारण प्राधिकरण का गठन. उस वक्त मेघालय, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और हिमाचल प्रदेश ने इन सभी सुझावों से सहमति जताई थी. कई राज्यों ने कोर्ट के दिशा-निर्देश के कुछ बिंदुओं पर आपत्ति जताई और उन पर अमल को नामुमकिन करार दिया था. उस वक्त यह दलील भी सामने आई थी कि संविधान के तहत कानून-व्यवस्था राज्य-सूची का विषय है, इसलिए यह कार्यपालिका के अधिकार-क्षेत्र में आता है. इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश राज्यों के अधिकार-क्षेत्र में दखलंदाजी है. कोर्ट के इस दिशा-निर्देश को दस साल बीत चुके हैं और अब तक कोई कारगर पहल नहीं हो सकी है. इस उदासीनता के चलते पुलिस सुधार का एजेंडा अभी तक लंबित है.

इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में फिर से हस्तक्षेप करते हुए उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के मुख्य सचिवों को अदालत में तलब किया. इन अधिकारियों की ओर से कहा गया था कि वे एक हफ्ते के अंदर अदालत को बताएंगे कि उसके आदेश को लागू करने की दिशा में क्या रुकावटें आ रही हैं? उस दौरान इस मामले में न्यायमित्र यानी एमिकस क्यूरी रहे महाधिवक्ता जीएम वाहनवती ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि राज्य सरकारों ने पुलिस सुधारों पर न के बराबर अमल किया है. इसके बाद अदालत ने राज्यों से सुधार की दिशा में आ रही बाधाओं के बारे में पूछते हुए कहा कि उसके निर्णय पर समग्रता से अमल किया जाए. इसके लिए अदालत और ज्यादा इंतजार नहीं कर सकती.

इससे पहले भी देश में पुलिस सुधार के लिए कई आयोग व कमेटियां बनाई जा चुकी थीं और बाद में उनकी सिफारिशों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया. इसी क्रम में विधि आयोग, रिवेरियो कमेटी, पद्मनाभैया कमेटी, मलिमथ कमेटी तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया. इन सभी की ओर से समय-समय पर पुलिस सुधार के तमाम उपाय सुझाए गए लेकिन उनमें से किसी पर अमल नहीं किया गया. पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह जैसे तमाम अधिकारी इस बात को स्वीकार करते हैं कि सरकारें अपने फायदे के लिए पुलिस का दुरुपयोग करती हैं. राज्यसत्ता के पास पुलिस ऐसी ताकत है जो विरोधियों से निपटने से लेकर अपनी नाकामी छुपाने तक में काम आती है. यह एक मुख्य वजह है कि जिसके कारण सरकारें पुलिस प्रणाली में सुधार करने के लिए तैयार नहीं हैं.

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अखिलेश सरकार को लगता होगा कि किसी मुस्लिम को डीजीपी बनाकर वोटबैंक को प्रभावित कर पाएंगे

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उत्तर प्रदेश में नियमों का उल्लंघन कोई नई बात नहीं है. यह लगातार हो रहा है. सपा ने अब तक छह डीजीपी बना लिए हैं. किसी में भी नियमों का अनुपालन नहीं हुआ. हर सरकार का अपना नजरिया है. वे देखते हैं कि किस अधिकारी को नियुक्त करने पर उनके वोट बैंक पर असर पड़ेगा. यही मैं जावीद अहमद के बारे में कहूंगा. फिर भी जिस तरह के अधिकारी आजकल नियुक्त हो रहे हैं, उनको देखते हुए कहना चाहिए कि जावीद अहमद अच्छे अधिकारी हैं. उनकी छवि अच्छी है. हालांकि, वोट बैंक पर असर हो रहा हो तो खराब छवि के लोग भी तैनात हो जाते हैं. ऐसे कई लोग नियुक्त हो चुके हैं. इस तरह की नियुक्तियों से पुलिस महकमे में निराशा होती है. इस नियुक्ति से कुछ लोग निराश जरूर होंगे. तमाम अच्छे अधिकारी भी हैं जो डीजीपी नहीं बन पाए. क्यों नहीं बन पाए, ये अखिलेश यादव जानें. रंजन द्विवेदी का नाम बार-बार आया लेकिन उनको नहीं बनाया गया. एके गुप्ता भी अच्छे अधिकारी थे. अखिलेश सरकार को लगता होगा कि किसी मुस्लिम को डीजीपी बनाकर वोटबैंक को प्रभावित कर पाएंगे. हालांकि, यह सही है कि जावीद अहमद अपने आप में अच्छे अफसर हैं.

प्रकाश सिंह, पूर्व डीजीपी, उत्तर प्रदेश  [/box]

2015 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की 153 अति महत्वपूर्ण सिफारिशों पर रायशुमारी करने के मकसद से मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन बुलाया. इस सम्मेलन में पुलिस सुधार का रोडमैप तैयार किया जाना था. पुलिस जांच, पूछताछ के तौर-तरीके, जांच विभाग को विधि-व्यवस्था विभाग से अलग करना, महिलाओं की भागीदारी 33 फीसदी बढ़ाना और पुलिस की निरंकुशता की जांच के लिए विभाग बनाना, इस सम्मेलन का एजेंडा था. दिलचस्प है कि इस सम्मेलन में ज्यादातर राज्यों के मुख्यमंत्री आए ही नहीं. इस वजह से यह सम्मेलन बेनतीजा रहा और कोई रोडमैप नहीं बन सका. पुलिस सुधार के लिए गृह मंत्रालय ने राज्यों से राय मांगी तो मात्र आधा दर्जन राज्यों ने अपनी राय भेजी. राज्य सरकारों के इस रवैये से साफ पता चलता है कि राज्य सरकारें नहीं चाहतीं कि पुलिस की जंग लगी प्रणाली में कोई बदलाव हो. प्रकाश सिंह ने ‘तहलका’ को बताया, ‘सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में ही गाइडलाइन जारी की थी लेकिन उसे उत्तर प्रदेश ने या किसी दूसरे प्रदेश ने लागू नहीं किया. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को तलब किया. यूपी के मुख्य सचिव दो बार तलब हुए और उन्हें फटकार भी लगी लेकिन कोई खास फर्क नहीं पड़ा. अब भी शायद वह मामला कोर्ट में है. दो तीन बार मैंने निजी स्तर पर कोशिश की कि इसे लागू कराया जाए. सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका पेंडिंग है, देखिए अब क्या नोटिस लेते हैं. जस्टिस ठाकुर जब तक मुख्य न्यायाधीश नहीं बने थे, तब तक उन्होंने इस पर कोई संज्ञान नहीं लिया. उनकी जानकारी में ये बात लाई गई पर मुझे लगा कि उनका दृष्टिकोण बहुत ज्यादा उदार था.’

सरकारें फायदे के लिए पुलिस का दुरुपयोग करती हैं. सत्ता के पास पुलिस ऐसी ताकत है, जो विरोधियों से निपटने से लेकर नाकामी छुपाने तक में काम आती है

इस मसले के कोर्ट में दो दशक तक लटके रहने के सवाल पर प्रकाश सिंह ने कहा, ‘मैंने तो जितना हो सकता था किया. अब मैं अपनी लड़ाई विरासत में छोड़ जाऊंगा. जहां तक ले जा पाऊंगा, ले जाऊंगा, उसके बाद अगली पीढ़ी उसे आगे बढ़ाएगी. कुछ लड़ाइयां बहुत लंबी चलती हैं. इस देश में जो दो सबसे पावरफुल आॅर्गनाइजेशन हैं- ब्यूरोक्रेसी और राजनीतिक तबका, दोनों ही इसका विरोध कर रहे हैं. ये दोनों जिसका विरोध करें, वह इस देश में बिल्कुल नहीं हो सकता. ये दोनों मिलकर सेना तक को हतोत्साहित कर देते हैं, फिर इनके आगे पुलिस की क्या बिसात है. पुलिस सुधार न लागू करने की कोशिश खास तौर से ब्यूरोक्रेसी और राजनीतिक तबके की है क्योंकि सुधार की पहल नहीं होने से दोनों को ही फायदा है. सुप्रीम कोर्ट के सामने यह भी दिखाना है कि हम कुछ कर रहे हैं, इसलिए सुधार का स्वांग रचा गया है. असलियत में जांचने पर पता चलता है कि स्थिति कुछ और है. ब्यूरोक्रेसी और राजनीति के लोग चाहते हैं कि चीजें यथास्थिति बनी रहें. घोड़े की सवारी सभी को अच्छी लगती है. पुलिस पर आपका रौब हो तो बहुत अच्छी बात है.’

आरके मित्तल का कहना है, ‘शॉर्ट टर्म में राजनीति पुलिस का फायदा उठाती है. पुलिस सुधार लागू करना उनके लिए अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा लेकिन लॉन्ग टर्म में यह लागू नहीं होता. उत्तर प्रदेश में पिछले तीन बार से कोई सरकार दोबारा नहीं लौटी. वे शॉर्ट टर्म भर का ही फायदा उठा पाते हैं. बड़े काम करते तो शायद दो-तीन टर्म की सरकारें चला सकते थे. पुलिस सुधार होगा, लेकिन समय के साथ होगा. कभी ऐसा उफान आएगा कि सुधार करना अनिवार्य बन जाएगा, जैसे चुनाव सुधार हुए. इस मामले में केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट कड़े कदम उठाएं तो बात बन सकती है.’

क्यों न जाएं मंदिर में महिलाएं?

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फोटोः एसके मोहन

केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी सदियों पुरानी रोक पर कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर संज्ञान लेते हुए मंदिर के ट्रस्ट से इस पाबंदी को हटा लेने के लिए कहा है. राज्य के दूसरे मंदिरों में भी माहवारी के दौरान महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर पाबंदी है, लेकिन सबरीमाला मंदिर में 10-50 की उम्र की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने पर पूरी तरह से रोक लगा रखी है.

जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने त्रावणकोर देवाश्वम बोर्ड के वकील केके वेणुगोपाल से पूछा है, ‘किस तर्क के आधार पर बोर्ड ने महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर रोक लगाई हुई है.’ बेंच ने यह भी कहा कि कोई भी मंदिर या इसका प्रशासनिक निकाय महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने से नहीं रोक सकता क्योंकि यह उनका संवैधानिक अधिकार है. कोर्ट ने मंदिर की ओर से पेश होने वाले वकील से इस बाबत सबूत भी देने के लिए कहा कि मंदिर के पिछले 1500 वर्ष के इतिहास में एक भी महिला ने मंदिर में प्रवेश नहीं किया है.

मंदिर के वकील और कोर्ट की विशेष बेंच के बीच आधे घंटे की बहस में वेणुगोपाल ने कहा कि यह पाबंदी मंदिर की प्राचीन विशिष्ट प्रथा के आधार पर लगी हुई है. उन्होंने बताया कि कड़े प्रायश्चित के लिए भक्त 41 दिनों तक सादगी से जीवन जीने के लिए इस मंदिर में आते हैं. इस अवधि में उन्हें सांसारिक सुखों से दूर रहना होता है. इसके अलावा मंदिर के प्रमुख देवता अयप्पा सनातन संन्यासी हैं. बहरहाल कोर्ट ने सुनवाई की अगली तिथि 8 फरवरी दी है. कोर्ट ने अगली सुनवाई से पहले राज्य सरकार से इस बाबत नया शपथ-पत्र जमा करने के लिए भी कहा है.

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को अनुमति देने के सवाल पर केरल में पिछले दो दशकों से बहस जारी है. तीर्थ यात्रा के हर सीजन में यह बहस परवान चढ़ती है और सीजन खत्म होते ही यह भी खत्म हो जाती है. पिछले सीजन में एक सरकारी बस में बैठे सबरीमाला के तीर्थयात्रियों ने एक महिला को बस में नहीं चढ़ने दिया. महिला की शिकायत के बाद अब केरल राज्य सड़क परिवहन निगम (केएसआरटीसी) ने दूसरे यात्रियों के साथ महिलाओं को भी विशेष सबरीमाला बसों में यात्रा करने की अनुमति दे दी है. गुरुवयूर मंदिर में गैर हिंदुओं का प्रवेश और सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश ये दो धार्मिक सवाल हैं, जिन पर पिछले कुछ वर्षों से लगातार बहस चल रही है.लगातार होने वाला यह बवाल पारंपरिक मान्यताओं तथा प्रगतिशील विचारों के बीच टकराव का परिणाम है.

सीपीएम के राज्य समिति सदस्य और पूर्व देवाश्वम मंत्री जी. सुधाकरण ने कहा, ‘आज के युग में इस तरह की प्रथा को जारी रखने का कोई मतलब नहीं है. इस संबंध में इंडियन यंग लॉयर एसोसिएशन ने जो याचिका दायर की है वह मेरे मंत्रीत्व में ही उनके द्वारा सुप्रीम कोर्ट में जमा शपथ-पत्र पर आधारित है. उन्होंने यह शपथ-पत्र तब जमा किया जब 2006 में महिला वकीलों ने त्रावणकोर राजपरिवार की महिलाओं के मंदिर में जाने का पक्का सबूत देते हुए कोर्ट में सबरीमाला मंदिर की इस पाबंदी पर सवाल उठाए थे. इस पर कोर्ट ने राज्य सरकार का पक्ष तलब किया था.’

‘यह कहना बिलकुल वाहियात है कि मंदिर में बैठा एक देवता महिला की उपस्थिति में अपनी पवित्रता खो देगा. क्या वह देवता अपने ब्रह्मचर्य को सुरक्षित रखने में असमर्थ है’

सुधाकरण का यह भी कहना है, ‘अगर तीर्थयात्रा के दौरान महिलाओं के लिए सुरक्षा का सवाल कोई है तो उनके लिए विशेष समय नियत किया जाना चाहिए ताकि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके. यह मसला एक या दो दिन में हल होने वाला नहीं है, क्योंकि इससे कई लोगों के हित प्रभावित होंगे. इसके लिए कोर्ट को समाजशास्त्री,  कानूनविद और वैदिक विशेषज्ञ को लेकर एक समिति तैयार करनी चाहिए.’

इस बीच राज्य सरकार ने कहा है कि वह भक्तों की आस्था की रक्षा के लिए नया शपथ-पत्र जमा करेगी. देवाश्वम मंत्री वीएस शिवकुमार का कहना है, ‘केरल की यूडीएफ सरकार की नीति मंदिर की उन परंपराओं और प्रथाओं की रक्षा करने के लिए है जो सदियों से चली आ रही हैं. जब हम शपथ-पत्र जमा करेंगे तो हम लोगों की आस्था और परंपरा को ध्यान में रखेंगे.’

त्रावणकोर देवाश्वम बोर्ड (टीडीबी) का कहना है, ‘सदियों से सबरीमाला में चली आ रही परंपरा को बदलने का उनका कोई इरादा नहीं है.’ टीडीबी के अध्यक्ष प्रयार गोपालकृष्णन का कहना है, ‘पूर्व की एलडीएफ (लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट) सरकार सुप्रीम कोर्ट के इस प्रकार के अवलोकन के लिए जिम्मेदार है. पूर्व सरकार द्वारा जमा किया गया यह शपथ-पत्र गलत था, जिसकी वजह से यह स्थिति पैदा हुई. कोर्ट ने मंदिर की परंपरा के आधार और मंदिर के देवता की विशिष्टता को बिना समझे अपना वक्तव्य दिया है.’

गोपालकृष्णन यह भी साफ करते हैं, ‘टीडीबी भक्तों के हित में केस लड़ेगा. मंदिर की प्रथाएं सदियों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा हैं. टीडीबी का यह कर्तव्य है कि वह किसी भी कीमत पर इनकी रक्षा करे.’ शिवकुमार और गोपालकृष्णन के तर्कों को सुधाकरण खारिज कर देते हैं. वे कहते हैं, ‘यह फैसला लेने वाले वे दोनों कौन होते हैं? यह बेवकूफी है. महिलाओं को उनके मौलिक अधिकारों से कोई वंचित नहीं कर सकता. इसके अलावा सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश करने के कई उदाहरण हैं.’

स्कूल ऑफ भगवद्गीता के संस्थापक स्वामी संदीपानंदगिरि का कहना है, ‘तर्क दिया जा रहा है कि यह हिंदू आस्था के खिलाफ है. यह कहना बिलकुल वाहियात है कि मंदिर में बैठा एक देवता महिला की मौजूदगी में अपनी पवित्रता खो देगा. क्या वह देवता अपने ब्रह्मचर्य को सुरक्षित रखने में असमर्थ है और लालसाओं से मुक्त नहीं हुआ है? अगर महिलाओं की इच्छा है तो उन्हें मंदिर में जाने देना चाहिए.’ सुधाकरण मंदिर से जुड़े पुजारियों की भी आलोचना करते हुए कहते हैं कि पैसा उनकी प्राथमिकता है, भक्तों का कल्याण नहीं. वहीं प्रसिद्ध कवियत्री और पर्यावरणविद सुगाथा कुमारी का कहना है, ‘मैं सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को अनुमति देने के किसी भी फैसले का विरोध करूंगी. हमें कुछ परंपराओं का सम्मान करना ही चाहिए और महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में जाने की कोई जरूरत नहीं है. पहाड़ से नीचे भी बहुत से अयप्पा मंदिर हैं, वे वहां जा सकती हैं और पूजा कर सकती हैं.’

इस बीच एक माह पूर्व गोपालकृष्णन द्वारा दिए गए विवादित वक्तव्य की प्रतिक्रिया में ‘हैप्पी टू ब्लीड’ अभियान की शुरुआत करने वाली निकिता आजाद ने तहलका से बातचीत में कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट का वक्तव्य वाकई प्रशंसनीय है. कोर्ट के वक्तव्य ने हमारे अभियान में जान फूंक दी है और मैं वकीलों को धन्यवाद कहना चाहूंगी जिन्होंने यह याचिका कोर्ट में दायर की है. मुझे लगता है कि इससे माहवारी के समय महिलाओं के मंदिरों में प्रवेश करने के विषय पर चर्चा को बढ़ावा मिलेगा.’

वह कहती हैं, ‘सारे देश और विशेषकर केरल के युवाओं ने हमारे अभियान को शानदार प्रतिक्रिया दी. अभियान ने इस बहस को लोकतांत्रिक बनाने में मदद की है. यह अभियान और वकीलों का दृढ़ निश्चय था जिसने इस बहस को आगे बढ़ाया.’

हिंदू ऐक्यवेदी संगठन के राज्य महासचिव आरवी बाबू कहते हैं, ‘यह मसला हिंदू धर्म का आंतरिक मसला है और इससे हिंदू भावनाओं को चोट पहुंचने की संभावना है, इसलिए कोर्ट को इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए था. बेहतर हो कि पुजारी और मंदिर प्राधिकारी इस बारे में फैसला करें.’ उनका कहना है हिंदू ऐक्यवादी संगठन को बदलते समय के अनुसार प्रथाओं और कर्मकांडों में बदलाव लाने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन ऐसा विचार-विमर्श के बाद ही होना चाहिए.

इस बीच भाजपा की ओर से सधा हुआ बयान आया है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कुम्मनम राजशेखरण ने कहा है, ‘बेहतर होगा कि मंदिर की प्रथाओं पर फैसला लेने का अधिकार धार्मिक विद्वानों पर छोड़ दिया जाए और कोर्ट केवल अवलोकन करे.’

‘मैं लेखक बनना चाहता था, लेकिन सिर्फ यह खत लिख सका’

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गुड मॉर्निंग

जब आप यह खत पढ़ रहे होंगे, तब मैं आपके पास नहीं होऊंगा. मुझसे नाराज मत होइएगा. मैं जानता हूं, आप में से कई लोग मुझे दिल से चाहते हैं, प्यार करते हैं और मेरा ख्याल रखते रहे हैं. मुझे किसी से शिकायत नहीं है. मुझे हमेशा खुद से समस्याएं रही हैं. मैं अपनी आत्मा और अपने शरीर के बीच के फासले को बढ़ता हुआ महसूस कर रहा हूं. मैं एक राक्षस बन गया हूं. मैं हमेशा से एक लेखक बनना चाहता था. कार्ल सेगन जैसा विज्ञान का लेखक. हालांकि अंत में, मैं सिर्फ यह खत ही लिख पा रहा हूं.

मैंने विज्ञान से, सितारों से और प्रकृति से प्यार किया, लेकिन यह जाने बगैर कि लोग कब का प्रकृति का साथ छोड़ चुके हैं. हमारी भावनाएं दोयम दर्जे की हैं. हमारा प्यार बनावटी है. हमारी मान्यताएं झूठी हैं. हमारी मौलिकताएं कृत्रिम हैं. वास्तव में अब यह असंभव हो गया कि बिना दुख पहुंचाए‌ किसी को प्यार किया जा सके.

एक इंसान की कीमत उसकी पहचान एक वोट… एक संख्या… एक वस्तु तक सिमट कर रह गई है. कोई भी क्षेत्र हो, अध्ययन में, राजनीति में, मरने में, जीने में, कभी भी एक व्यक्‍ति को उसकी बुद्धिमत्ता से नहीं आंका गया.

इस तरह का खत मैं पहली दफा लिख रहा हूं. आखिरी खत लिखने का यह मेरा पहला अनुभव है. अगर यह कदम सार्थक न हो पाए तो मुझे माफ कीजिएगा.

हो सकता है इस दुनिया, प्यार, दर्द, जिंदगी और मौत को समझ पाने में, मैं गलत था. कोई जल्दी नहीं थी, लेकिन मैं हमेशा जल्दबाजी में रहता था. एक जिंदगी शुरू करने की हड़बड़ी में था. इसी क्षण में, कुछ लोगों के लिए जिंदगी अभिशाप है. मेरा जन्म मेरे लिए एक घातक हादसा है. अपने बचपन के अकेलेपन से मैं कभी उबर नहीं सका. अतीत का एक क्षुद्र बच्चा.

इस वक्त मैं आहत नहीं हूं… दुखी नहीं हूं, मैं बस खाली हो गया हूं. अपने लिए भी बेपरवाह. यह दुखद है और इसी वजह से मैं ऐसा कर रहा हूं. लोग मुझे कायर कह सकते हैं और जब मैं चला जाऊंगा तो स्वार्थी, या मूर्ख भी समझ सकते हैं. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुझे क्या कहा जा रहा है. मैं मौत के बाद की कहानियों… भूतों या आत्माओं पर विश्वास नहीं करता. अगर किसी बात पर मैं विश्वास करता हूं तो वह यह है कि मैं अब सितारों तक का सफर कर सकता हूं. और दूसरी दुनिया के बारे में जान सकता हूं.

जो भी इस खत का पढ़ रहे हैं, अगर आप मेरे लिए कुछ कर सकते हैं, तो मुझे सात महीने की फेलोशिप‌ मिलनी बाकी है जो एक लाख और 75 हजार रुपये है, कृपया ये कोशिश करें कि वह मेरे परिवार को मिल जाए. मुझे 40 हजार रुपये के करीब रामजी को देना है. उसने कभी इन पैसों को मुझसे नहीं मांगा, मगर कृपा करके ये पैसे उसे दे दिए जाएं.

मेरी अंतिम यात्रा को शांतिपूर्ण और सहज रहने दें. ऐसा व्यवहार करें कि लगे जैसे मैं आया और चला गया. मेरे लिए आंसू न बहाएं. यह समझ लें कि जिंदा रहने की बजाय मैं मरने से खुश हूं.

‘परछाइयों से सितारों तक’

उमा अन्ना, मुझे माफ कीजिएगा कि ऐसा करने के लिए मैंने आपके कमरे का इस्तेमाल कर रहा हूं.
एएसए (आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोशिएशन) परिवार के लिए, माफ करना मैं आप सबको निराश कर रहा हूं. आपने मुझे बेहद प्यार किया. मैं उज्ज्वल भविष्य के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं दे रहा हूं.

आखिर बार के लिए

जय भीम

मैं औपचारिकताएं पूरी करना भूल गया. मेरी खुदकुशी के लिए कोई जिम्मेदार नहीं है.

किसी ने ऐसा करने के लिए मुझे उकसाया नहीं किया, न तो अपने शब्दों से और न ही अपने काम से.

यह मेरा फैसला है और मैं अकेला व्यक्ति हूं, जो इस सबके लिए जिम्मेदार है.

कृपया मेरे जाने के बाद, इसके लिए मेरे मित्रों और शत्रुओं को परेशान न किया जाए.

‘रोहित ने आत्महत्या नहीं की, हमारी व्यवस्‍था ने उसे मार डाला’

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हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या करने से पहले जो पत्र लिखा उसमें उन्होंने खालीपन के अहसास को आत्महत्या जैसा कदम उठाने का कारण माना है. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ब्राह्मणवादी करतूतों का विरोध करते हुए खालीपन के अहसास से भर जाना बहुत बड़ी त्रासदी है. यह हमारी सामूहिक त्रासदी है. रोहित जैसे न जाने कितने लोग व्यवस्था के खिलाफ लड़ते हुए इस खालीपन से भर जाते हैं. यह एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जिसे हम देखकर भी अनदेखा कर देते हैं. रोहित को याद करने और उनकी स्मृति को सम्मान देने का सबसे अच्छा तरीका यह होगा कि हम इस खालीपन को भरने के लिए एक-दूसरे के करीब बने रहें. कमियों की अनदेखी करके संवाद बनाए रखने की कोशिश करें.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे संगठनों की जनविरोधी विचारधारा और पूंजीवाद की विचारहीनता ने हमारे देश के माहौल को इतना जहरीला बना दिया है कि बदलाव की छोटी-मोटी कोशिशें अपने छोटे दायरे में ही दम तोड़ देती हैं. अगर प्रगतिशील ताकतों में एकजुटता रहे तो यह छोटा दायरा बड़ा भी हो सकता है.
रोहित के लिए अपने संघर्ष को जारी रखना कितना मुश्किल बना दिया गया था इसे समझने के लिए उस मामले को ठीक से समझना होगा जिसने अंत में रोहित की जान ले ली. पिछले साल अगस्त में दिल्ली विश्‍वविद्यालय में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्यों और अन्य हिंदूवादी संगठनों के सदस्यों ने हिंसा की धमकी देकर ‘मुजफ्फरनगर बाकी है’ नाम की डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग रोक दी थी. भारतीय लोकतंत्र के लिए यह बहुत शर्मनाक घटना थी. जब देश की राजधानी में ऐसा हो सकता है तो दूसरी जगहों पर क्या-क्या हो सकता है इसकी कल्पना करके ही दिल भय और निराशा से भर जाता है. हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में इस घटना का विरोध हुआ और बाद में इस कैंपस में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक सदस्य ने रोहित और दूसरे छात्रों पर हिंसा का आरोप लगाया. जांच-पड़ताल के बाद यह आरोप झूठा सिद्ध हुआ. लेकिन इसके बाद कुछ ऐसा हुआ जो हमारे देश की ब्राह्मणवादी व्यवस्था की मानसिक गंदगी और कुटिलता को हमारे सामने लाता है.

भयानक गरीबी का सामना करते हुए उच्च शिक्षा तक पहुंचने वाले इन छात्रों ने ऐसा कौन-सा अपराध कर दिया था जिसके लिए उन्हें इतनी बड़ी सजा दी गई? यह अपराध था अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की हिंसात्मक और अलोकतांत्रिक गतिविधियों का विरोध करना

भाजपा विधायक रामचंद्र राव ने इस मामले में ‘दोषियों’ को सजा दिलाने की मुहिम छेड़ दी. बंडारू दत्तात्रेय ने तो मानव संसाधन विकास मंत्रालय को पत्र लिखकर ‘राष्ट्रविरोधी’ छात्रों को सजा दिलवाने की मांग की थी. पुराने वीसी के कार्यकाल में प्रशासन ने मेडिकल रिपोर्ट में मारपीट की बात के गलत साबित होने के बावजूद भाजपा के दबाव में रोहित और चार दूसरे दलित छात्रों को निलंबन की सजा दे दी. बाद में जब विद्यार्थियों ने इस सजा का जोरदार विरोध किया तो यह सजा वापस ले ली गई और नई जांच समिति गठित करने की घोषणा की गई. नए वीसी ने इस समिति को भंग करके नई समिति बनाई जिसने संबंधित पक्षों से पूछताछ किए बिना रोहित और उनके चार साथियों के हॉस्टल, प्रशासनिक भवन समेत मेस, लाइब्रेरी जैसी सार्वजनिक जगहों पर जाने पर पाबंदी लगा दी.

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आप रोहित के रूप में एक व्यक्ति को एक तरफ रखिए और दूसरी तरफ हमारे शासन तंत्र को. हमें रोहित की आत्महत्या को सही राजनीतिक संदर्भों में देखना होगा. जब आपको इस बात का अहसास हो जाए कि पूरा तंत्र आपके खिलाफ खड़ा है तो आप क्या महसूस करेंगे? इस पाबंदी को कैंपसों में जाति प्रथा लागू करने के उदाहरण के तौर पर ही देखा जाना चाहिए. चार दलित छात्रों के पिता खेतिहर मजदूर हैं. एक के माता-पिता गुजर चुके हैं. भयानक गरीबी का सामना करते हुए उच्च शिक्षा तक पहुंचने वाले इन छात्रों ने ऐसा कौन-सा अपराध कर दिया था जिसके लिए उन्हें इतनी बड़ी सजा दी गई? यह अपराध था अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की हिंसात्मक और अलोकतांत्रिक गतिविधियों का विरोध करना. हम भारत के शिक्षा संस्थानों के भगवाकरण को रोकने में नाकामयाब हो रहे हैं. रोहित इस सामूहिक नाकामयाबी से उपजी निराशा से उबरने की कोशिश कर रहे थे.
उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण लागू होने के बाद अनुसूचित जाति-जनजाति और ओबीसी के विद्यार्थियों की मौजूदगी बढ़ी है. हालांकि जनसंख्या के अनुपात के हिसाब से यह मौजूदगी संतोषप्रद नहीं है, लेकिन असमानता और शोषण को ही जीवन मूल्य मानने वाले लोग इस बदलाव से न केवल चिढ़ते हैं बल्कि इस प्रक्रिया को रोकने के लिए कोई भी कदम उठाने को तैयार रहते हैं. जब हैदराबाद केंद्रीय विश्‍वविद्यालय कैंपस में पानी की दिक्कत चल रही थी तब इस कैंपस के सौंदर्यीकरण के नाम पर फव्वारे लगाए गए. यही हाल तमाम दूसरे कैंपसों का है. रोहित को सात महीने से फेलोशिप नहीं मिली थी. उन्होंने आत्महत्या से पहले लिखे अपने पत्र में इस पैसे को अपने घरवालों तक पहुंचाने का अनुरोध किया है. पैसे की यह दिक्कत उन लाखों विद्यार्थियों को होती है जो तमाम असुविधाओं का सामना करते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखते हैं. यूजीसी ने फेलोशिप बंद करने का जो फैसला सुनाया है उसका सबसे खराब असर दलितों और महिलाओं पर पड़ेगा.

हम अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की हिंसक गतिविधियों को तो फिर भी देख लेते हैं लेकिन उसके मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बौद्धिक हिंसा पर उतना ध्यान नहीं दे पाते जितना देना चाहिए. जब 2011 में एके रामानुजम के प्रसिद्ध निबंध ‘300 रामायणें : पांच उदाहरण और अनुवाद पर तीन विचार’ को दिल्ली विश्‍वविद्यालय के इतिहास के पाठ्यक्रम से हटाया गया तब यही हिंसा काम कर रही थी. वेंडी डोनिगर की हिंदुओं पर लिखी किताब को नष्ट करवाने वाली हिंसा भी हमारी चिंता के दायरे में होनी चाहिए. यही हिंसा दीनानाथ बत्रा जैसे लोगों को बौद्धिकता का तमगा देकर रोमिला थापर के सामने खड़ा कर देती है. इस बौद्धिक हिंसा की काट ढूंढ़े बिना रोहित जैसे लोगों का संघर्ष हर दिन ज्यादा जटिल और कठिन होता जाएगा. तमाम शिक्षा संस्थानों में अयोग्य दक्षिणपंथियों को बड़े पदों पर बैठाना भी इसी हिंसा का हिस्सा है. यही लोग रोहित जैसे साथियों की जिंदगी को इतना बोझिल और कष्टप्रद बना देते हैं कि उन्हें आत्महत्या का विकल्प चुनना पड़ता है.

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अभी यह खबर मिली है कि हैदराबाद केंद्रीय विश्‍वविद्यालय में रोहित के शव के इर्द-गिर्द खड़े प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने बेरहमी से पीटा है और आठ विद्यार्थियों को गिरफ्तार किया गया है. दिल्ली में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सामने विरोध-प्रदर्शन कर रहे लोगों पर वाटर कैनन से पानी डाला गया है. जनवरी की ठंड में पुलिस की लाठी-ठंडे और पानी का सामना करते हुए कैंपसों के भगवाकरण का विरोध कर रहे ये लोग ही हमारे लोकतंत्र के असली पहरेदार हैं. जो जैसा चल रहा है उसे वैसा ही चलने दो, इस मानसिकता ने हमारे देश को दलितों, स्त्रियों, मजदूरों आदि के लिए खुली जेल बना दिया है. एक तरफ इस जेल के कैदी आत्महत्या कर रहे हैं तो दूसरी तरफ वैश्विक पूंजी के बाजार में हमारे देश को विश्व की उभरती ताकत के रूप में पेश किया जा रहा है. इस बौद्धिक अश्लीलता पर जितनी जल्दी रोक लगे उतना अच्छा होगा.

‘हमें हथियार बनाना आता है फिर भी नौकरी नहीं मिली’

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Photo- Amarjeet Singh

कौन: ऑर्डिनेंस फैक्ट्री के हजारों पूर्व प्रशिक्षु

कब: दिसंबर, 2015 से

कहां: जंतर मंतर, दिल्ली 

क्यों

‘मैंने ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में प्रशिक्षण देश सेवा के लिए लिया था. मेरा मानना है कि सेना के लिए हथियार बनाने वाली इन फैक्ट्रियों का महत्व सीमा पर लड़ने वाले सैनिकों जितना ही है.’ ये कहना है नवनिर्मित राज्य तेलंगाना के मेंढक जिले के क्रांति कुमार का. क्रांति ने फिटर ट्रेड से मार्च 2013 में अपना प्रशिक्षण पूरा किया गया था. उनकी फैक्ट्री में सारथ टैंकर के पुर्जे बनते थे. लेकिन नौकरी न मिलने के चलते बीएससी की पढ़ाई पूरी कर चुके क्रांति वेब डिजाइनर का काम कर रहे हैं. इतने समय से दिल्ली में रहने के चलते अब वह अच्छी हिंदी भी बोलने लगे हैं. वे आगे बताते हैं, ‘अगर हम जैसे युवा इन फैक्ट्रियों में काम करके सेना के लिए गोला-बारूद समेत अन्य हथियार नहीं बनाएंगे तो हमारे सैनिक आपात स्थिति में युद्ध कैसे लड़ेंगे लेकिन अब ये सारी बातें सिर्फ सपना लगती हैं. खुली भर्ती होने के बाद से भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया है. कई खुली भर्तियों पर सीबीआई जांच चल रही हैं. पुणे के देबू रोड स्थित ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में 203 लोगों का चयन खुली भर्ती के तहत किया गया था. इसमें से 41 एक ही गांव के थे. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि खुली भर्ती में किस तरह भ्रष्टाचार हो रहा है. ऐसे में हमारे सामने सिर्फ प्रदर्शन का ही रास्ता बचता है.’ क्रांति कुमार करीब पिछले डेढ़ महीने से दिल्ली के जंतर-मंतर पर ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों द्वारा प्रशिक्षित किए गए हजारों पूर्व प्रशिक्षुओं के साथ धरने पर बैठे हुए हैं. ये सारे लोग अप्रेंटिस (संशोधन) एक्ट-1961 की धारा-22 के तहत अप्रेंटिस भर्ती पॉलिसी लागू करने के लिए अनिश्चितकालीन धरने पर हैं. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमएसडीएस) के तहत अप्रेंटिस एक्ट-1961 की धारा 22 की उपधारा 1 में संशोधन किया. इस अधिनियम की धारा 22 में यह साफ लिखा है कि प्रत्येक नियोक्ता ऐसे प्रशिक्षु को, जिसने उसके संस्थान में प्रशिक्षुता प्रशिक्षण लिया है, ऐसे प्रशिक्षुओं को भर्ती करने के लिए अपनी स्वयं की नीति तैयार करेगा. गौरतलब है कि लोकसभा ने 14 अगस्त, 2014 और राज्यसभा ने 26 नवंबर, 2014 को अप्रेंटिस (संशोधन) एक्ट-1961 को पारित कर दिया था. यहां तक कि राष्ट्रपति ने भी इस एक्ट पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. इसके बाद इसे गजट में प्रकाशित भी किया गया, लेकिन एक्ट में संशोधन के बाद एक साल का समय गुजर चुका है, पर अब तक इस संबंध में ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड कोलकाता एक्स ट्रेंड अप्रेंटिसों को नौकरी मुहैया कराने से संबंधित नीति नहीं बना सकी है. इस मामले को लेकर सारी प्रक्रिया बहुत ही धीमी गति से चल रही है और सरकार द्वारा कानून में संशोधन के बावजूद अब भी सीधी भर्तियां निकल रही हैं. ऐसे में प्रशिक्षण पूरा कर चुके क्रांति जैसे युवा रोजगार के वैकल्पिक माध्यमों से अपना जीवन निर्वाह कर रहे हैं. प्रदर्शन कर रहे पूर्व प्रशिक्षु सत्येंद्र सिंह कहते हैं, ‘यह पहली बार नहीं है जब खुली भर्ती का विरोध करते हुए ऑर्डिनेंस फैक्ट्री के पूर्व प्रशिक्षु धरने पर बैठे हैं. हम इससे पहले पिछले साल 27 जुलाई को जंतर-मंतर पर चार दिन तक धरने पर बैठ चुके हैं. तब जल्द समाधान के आश्वासन के बाद हमने अपना धरना खत्म कर दिया था लेकिन इसके बाद भी छह माह का वक्त गुजर गया है और किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है. इसलिए अब हमें अनिश्चितकाल के लिए धरने पर बैठना पड़ा है. हम राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, कौशल विकास मंत्री सभी के सामने गुहार लगा चुके हैं, लेकिन अब तक आश्वासन के अलावा कुछ और हासिल नहीं हुआ है.’ मजेदार बात यह है कि जो युवक खुली भर्ती के जरिए रोजगार हासिल करते हैं, उन्हें फैक्ट्री में दोबारा उतना ही प्रशिक्षण दिया जाता है जितना पहले प्रशिक्षुओं को दिया जा चुका है. इसके अलावा प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षण के दौरान स्टाइपेंड दिया जाता था, लेकिन जिन अप्रशिक्षित लोगों को नियुक्ति दी जाती है उन्हें प्रशिक्षण के दौरान पूरी तनख्वाह दी जाती है. अब इस दौरान वे कितना गुणवत्तापूर्ण कार्य कर पाते हैं यह देखने वाली बात होगी, लेकिन एक बात निश्चित तौर पर कही जा सकती है कि इस पूरी प्रक्रिया में सरकार के पैसे और संसाधनों की बर्बादी होती है. वैसे साल 2010 से पहले ऐसे वरिष्ठता के आधार पर ऐसे प्रशिक्षुओं को ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में नियुक्ति दी जाती थी, लेकिन साल 2010 में संप्रग सरकार के दौरान इसमें बदलाव कर दिया गया और ऐसी नियुक्तियां खुली भर्ती परीक्षा के जरिए होने लगीं. प्रदर्शन कर रहे युवाओं में से एक प्रशांत कुमार कहते हैं, ‘हमें हथियार बनाना सिखाया गया लेकिन नौकरी नहीं दी गई है. यहां प्रदर्शन कर रहे हर युवक को अलग-अलग तरह के हथियार बनाने की ट्रेनिंग दी गई है. कोई आरडीएक्स का काम जानता है तो तो कोई पिस्तौल बनाना जानता है. किसी को बारूद, किसी को गोली तो किसी को बम शेल बनाना आता है. हालांकि किसी एक को यह काम पूरी तरह नहीं आता है लेकिन सभी मिलकर इस तरह का काम कर सकते हैं. हमारे देश में निजी क्षेत्र में यह काम इतना नहीं होता है कि हमें बाहर नौकरी मिल सके. हमने अपने जीवन के दो-तीन साल ऐसे काम में लगा दिए हैं, जिसका बाहर कोई महत्व ही नहीं है. ऐसे में हमारे पास सरकार से अपनी मांगे मनवाने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है.’

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ऐसे होती है ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में प्रशिक्षुओं की नियुक्ति

हाईस्कूल या आईटीआई की परीक्षा पास करने के बाद प्रतियोगी परीक्षा के जरिये ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में प्रशिक्षुओं की नियुक्ति होती है. आईटीआई करके आए प्रशिक्षुओं को एक साल और हाईस्कूल पास करके आने वाले प्रशिक्षुओं को तीन साल गोले, हथियारों के पार्ट्स, नाइट विजन डिवाइस, हथियार, बारूद, आरडीएक्स, टैंक और मिसाइल के पार्ट बनाने जैसे कई कार्यों से संबंधित प्रशिक्षण दिया जाता है. प्रशिक्षण पूरा करने के बाद प्रशिक्षु को राष्ट्रीय प्रशिक्षुता प्रमाण-पत्र (नेशनल अप्रेंटिसशिप सर्टिफिकेट) परीक्षा में बैठना होता है. परीक्षा पास करने के लिए प्रशिक्षु को तीन मौके दिए जाते हैं. किसी भी प्रयास में परीक्षा उत्तीर्ण करने वालों को श्रम एवं रोजगार मंत्रालय राष्ट्रीय प्रशिक्षुता प्रमाण-पत्र प्रदान करता है.

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देश भर में इस तरह के प्रशिक्षुओं की संख्या लगभग 8 से 10 हजार है, जिसमें ज्यादातर लोग बेरोजगार हैं. कुछ प्रशिक्षु नक्सल प्रभावित आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के हैं. यदि ऐसे प्रशिक्षु बेरोजगारी की वजह से असामाजिक तत्वों के बहकावे में आ जाएं तो सरकार के लिए एक नई समस्या खड़ी हो जाएगी. असामाजिक तत्वों को इन युवाओं को प्रशिक्षण भी नहीं देना होगा क्योंकि हमारी सरकार ने इन लोगों को प्रशिक्षण देकर बेरोजगार छोड़ दिया है. धरने पर बैठे इन प्रशिक्षुओं का मामला संसद में भी उठ चुका है. हाल ही में महाराष्ट्र के रावेर से भाजपा सांसद रक्षा खड़से ने ये मामला सदन में उठाया. इसके पहले 16 मार्च, 2015 को श्रम और रोजगार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बंडारु दत्तात्रेय ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित जवाब में बताया था कि प्रशिक्षु (अप्रेंटिस) अधिनियम, 1961 में संशोधन किया गया है व इसे 22 दिसंबर, 2014 से प्रभावी किया गया है. अधिनियम में संशोधन किए जाने से पहले प्रतिष्ठानों के लिए नियमित रोजगार के लिए अपने कम से कम 50 प्रतिशत प्रशिक्षुओं को काम पर रखना अनिवार्य  नहीं था. संशोधन के बाद अधििनयम में यह प्रावधान है कि हर नियोक्ता किसी ऐसे प्रशिक्षु, जिसने उसके प्रतिष्ठान में शिक्षुता प्रशिक्षण की अवधि पूरी कर ली है, की भर्ती हेतु अपनी स्वयं की नीति बनाएगा. हालांकि इसके बाद भी स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है और प्रशिक्षु अब भी जंतर मंतर पर बैठे हुए हैं. कौशल विकास और उद्यमशीलता प्रशिक्षण महानिदेशालय ने सूचना के अधिकार के तहत दी जानकारी में बताया कि प्रशिक्षु अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए पहले श्रम एवं रोजगार मंत्रालय जिम्मेदार था, अब इसकी जिम्मेदारी कौशल विकास एवं उद्यमशीलता मंत्रालय के पास है. यह जानकारी 12 जून, 2015 को दी गई थी. धरने पर बैठने के बाद प्रशिक्षुओं ने 7 दिसंबर, 2015 को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री को पत्र लिखे. इसके संबंध में प्रधानमंत्री कार्यालय से 10 दिसंबर को उचित कार्रवाई करने संबंधी जवाब आया लेकिन इसके एक माह बाद भी स्थिति जस की तस है. प्रशिक्षुओं का धरना जारी है. रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने पांच जनवरी, 2016 को इन प्रशिक्षुओं से मिलने का वक्त दिया था लेकिन पठानकोट आतंकी हमले की वजह से यह मुलाकात भी स्थगित हो गई.

तमिलनाडु में जल्लीकट्टू पर रोक जारी

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सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगा दिए जाने के चलते तमिलनाडु में पारंपरिक त्योहार पोंगल के दौरान खेले जाने वाला जल्लीकट्टू खेल नहीं हो पाया. राज्य में जल्लीकट्टू पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद चार साल से पाबंदी थी. लेकिन गत आठ जनवरी को नरेंद्र मोदी सरकार ने अधिसूचना जारी करते हुए कुछ नियमों के साथ इस खेल पर लगी पाबंदी हटा दी थी. इसके खिलाफ भारत पशु कल्याण समिति, पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) और एक गैर-सरकारी संस्था की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी. जिस पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय और तमिलनाडु सरकार के इस अनुरोध को ठुकरा दिया कि जल्लीकट्टू प्राचीन परंपरा व संस्कृति का हिस्सा है और इसे नहीं रोका जाना चाहिए क्योंकि सरकार की अधिसूचना में सुरक्षा के पर्याप्त प्रावधान हैं. हालांकि इस फैसले के बाद से राज्य में जल्लीकट्टू के समर्थकों द्वारा विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शन भी किया गया.

जल्लीकट्टू तमिलनाडु में पोंगल के त्योहार के हिस्से के तौर पर मट्टू पोंगल के दिन आयोजित किया जाता है . केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया था कि समुदाय के रीति-रिवाजों या परंपराओं के तहत तमिलनाडु में जल्लीकट्टू और महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा में बैलगाड़ी दौड़ जैसे कार्यक्रमों में सांड़ों को प्रदर्श पशु (परफॉर्मिंग एनिमल) के तौर पर प्रदर्शित या प्रशिक्षित करना जारी रखा जा सकता है. दरअसल तमिलनाडु में कुछ ही महीने में विधानसभा चुनाव होने हैं और जानकारों का मानना है कि संभवतः चुनाव के मद्देनजर केंद्र सरकार ने यह फैसला किया था.

फसल बीमा योजना

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क्या है योजना?

देश में लगातार दो साल से सूखे की स्थिति के बीच केंद्र सरकार ने एक नई फसल बीमा योजना को मंजूरी दी है. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के जरिये अब किसान कम प्रीमियम देकर फसल बीमा का पूरा लाभ उठा सकते हैं. यह बहु-प्रतीक्षित योजना इस साल खरीफ सत्र से लागू होगी. नई योजना मौजूदा राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एनएआईएस) और परिवर्तित एनएआईएस की जगह लेगी. इनमें कुछ खामियां थीं, जिसे इस योजना के जरिये दूर करने की कोशिश सरकार ने की है. फसल बीमा को व्यापक बनाते हुए इसमें खेत में फसलों की बुवाई से लेकर खलिहान तक को समेट लिया गया है. भारतीय कृषि बीमा कंपनी लिमिटेड के साथ निजी बीमा कंपनियां इस योजना का कार्यान्वयन करेंगी.

कितना प्रीमियम भरेंगे किसान?

अनाज एवं तिलहन फसलों के बीमा के लिए अधिकतम दो प्रतिशत प्रीमियम रखा गया है. बागवानी व कपास की फसलों के लिए अधिकतम पांच प्रतिशत प्रीमियम रखा गया है. रबी के अनाज एवं तिलहन फसलों के लिए डेढ़ प्रतिशत, जबकि खरीफ के अनाज तथा तिलहन के लिए दो प्रतिशत प्रीमियम राशि देनी होगी. बाकी प्रीमियम केंद्र और राज्य सरकारें बराबर-बराबर देंगी. कम से कम 25 प्रतिशत क्लेम राशि सीधे किसानों के बैंक खाते में आएगी. शेष राशि भी 90 दिनों के भीतर मिल जाएगी. अभी कर्ज लेने वाले किसानों के लिए फसल बीमा लेना जरूरी है. नई योजना सभी किसानों के लिए होगी. इतना ही नहीं प्राकृतिक आपदा की वजह से बुवाई न होने पर भी किसानों को बीमा राशि मिलेगी. फसल कटने के 14 दिन तक अगर फसल खेत में है और कोई आपदा आती है तो नुकसान होने पर बीमा का लाभ मिलेगा. योजना पर साल में 17,600 करोड़ रुपये खर्च आने का अनुमान है. इसमें से 8,800 करोड़ रुपये केंद्र सरकार देगी, जबकि इतनी ही राशि राज्य सरकारें देंगी.  

नई योजना का क्या है दावा?

नई फसल बीमा योजना से दावा किया रहा है कि जोखिम वाली खेती पूरी तरह सुरक्षित हो जाएगी. योजना से देश के कम से कम आधे इलाके की फसलों को कवरेज मिलने की उम्मीद है. इसका ज्यादा फायदा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड, विदर्भ, मराठवाड़ा और तटीय क्षेत्रों के किसानों को मिलेगा. इसके अलावा अभी तक सरकारी सब्सिडी की ऊपरी सीमा तय होती थी. इसके चलते किसानों के नुकसान की पूरी भरपाई नहीं हो पाती थी. इन बीमा योजना में पूरी बीमित राशि किसानों को दी जाएगी. इसके कारण सरकार ने फसल बीमा को मौजूदा 23 फीसद रकबे से बढ़ाकर 50 फीसद तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है.