जुलाई, 2009 में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के एक पूर्व आतंकी चोंग्खम संजीत मेइतेई को मणिपुर पुलिस के हेड कांस्टेबल हेरोजित सिंह ने मुठभेड़ के नाम पर मारा था. एक अंग्रेजी दैनिक की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक हेरोजित ने माना है कि ये मुठभेड़ नहीं थी बल्कि उन्होंने संजीत को अपने वरिष्ठ अधिकारी के कहने पर गोली मारी थी. चौंकाने वाली बात ये रही कि इस फर्जी मुठभेड़ को न केवल दिनदहाड़े, सरेबाजार अंजाम दिया गया बल्कि जहां ये हुई वह जगह भी राज्य विधानसभा से बमुश्किल 500 मीटर दूर है.
आगे की तस्वीरों में संजीत की पुलिस के साथ फर्जी मुठभेड़ में हुई मौत का दुखद मंजर कैद है, जिन्हें ‘तहलका’ ने अगस्त, 2009 के अंक में प्रकाशित किया था.
27 वर्षीय चोंग्खम पीसीओ में है जहां एमपीसी के जवान उसे घेरे हुए हैं. कुछ जवान फॉर्मेसी के पास खड़े हैं (लाल तीर का निशान देखें)
जवानों से घिरे होने के बाद भी संजीत किसी तरह का प्रतिरोध या भागने की कोशिश करते हुए नहीं दिख रहें हैं
एमपीसी जवानों के साथ जाते हुए संजीत
एमपीसी का एक जवान अपनी रिवॉल्वर निकाल रहा है जबकि संजीत चुपचाप खड़े हैं
संजीत पहले विद्रोही संगठन पीएलए के सदस्य थे, लेकिन बाद में वे इससे अलग हो गए थे
एमपीसी जवानों ने अचानक संजीत को एक तरफ धकेलना शुरू कर दिया
संजीत को फॉर्मेसी के अंदर खींचकर ले जाते एमपीसी के जवान
कुछ देर के बाद संजीत का शव फॉर्मेसी से बाहर लाया गया
शव को बाहर खड़े ट्रक में डाल दिया गया, इस समय भी कैमरे से फोटो ली जा रही थीं लेकिन एमपीसी जवानों ने फोटो खींचने का कोई प्रतिरोध नहीं किया
ट्रक में पड़े संजीत के शव की फोटो लेने पर भी एमपीसी जवानों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई
ट्रक में एक महिला रबीना देवी का भी शव पड़ा है, जिसके बारे में पुलिस का कहना है कि यह महिला इस आतंकवादी का पीछा करते समय पुलिस फायरिंग में मारी गई, रबीना उस समय गर्भवती थी
स्ट्रेचर पर पड़ा संजीत का शव
संजीत के परिवारवालों का कहना था कि संजीत प्रतिबंधित विद्रोही संगठन पीएलए से अपने संबंध तोड़ चुका था.
चार बार मैं गणतंत्र दिवस का जलसा दिल्ली में देख चुका हूं. पांचवी बार देखने का साहस नहीं. आखिर यह क्या बात है कि हर बार जब मैं गणतंत्र समारोह देखता, तब मौसम बड़ा क्रूर रहता. छब्बीस जनवरी के पहले ऊपर बर्फ पड़ जाती है. शीतलहर आती है, बादल छा जाते हैं, बूंदाबांदी होती है और सूर्य छिप जाता है. जैसे दिल्ली की अपनी कोई अर्थनीति नहीं है, वैसे ही अपना मौसम भी नहीं है. अर्थनीति जैसे डॉलर, पौंड, रुपया, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा-कोष या भारत सहायता क्लब से तय होती है, वैसे ही दिल्ली का मौसम कश्मीर, सिक्किम, राजस्थान आदि तय करते हैं. इतना बेवकूफ भी नहीं कि मान लूं, जिस साल मैं समारोह देखता हूं, उसी साल ऐसा मौसम रहता है. हर साल देखने वाले बताते हैं कि हर गणतंत्र दिवस पर मौसम ऐसा ही धूपहीन ठिठुरनवाला होता है. आखिर बात क्या है? रहस्य क्या है? जब कांग्रेस टूटी नहीं थी, तब मैंने एक कांग्रेस मंत्री से पूछा था कि यह क्या बात है कि हर गणतंत्र दिवस को सूर्य छिपा रहता है? सूर्य की किरणों के तले हम उत्सव क्यों नहीं मना सकते? उन्होंने कहा, ‘जरा धीरज रखिए. हम कोशिश में हैं कि सूर्य बाहर आ जाए. पर इतने बड़े सूर्य को बाहर निकालना आसान नहीं हैं. वक्त लगेगा. हमें सत्ता के कम से कम सौ वर्ष तो दीजिए.’ दिए. सूर्य को बाहर निकालने के लिए सौ वर्ष दिए, मगर हर साल उसका छोटा-मोटा कोना तो निकलता दिखना चाहिए. सूर्य कोई बच्चा तो है नहीं जो अंतरिक्ष की कोख में अटका है, जिसे आप ऑपरेशन करके एक दिन में निकाल देंगे. इधर जब कांग्रेस के दो हिस्से हो गए तब मैंने एक इंडिकेटी कांग्रेस से पूछा. उसने कहा, ‘हम हर बार सूर्य को बादलों से बाहर निकालने की कोशिश करते थे, पर हर बार सिंडीकेट वाले अड़ंगा डाल देते थे. अब हम वादा करते हैं कि अगले गणतंत्र दिवस पर सूर्य को निकालकर बताएंगे.’ एक सिण्डीकेटी पास खड़ा सुन रहा था. वह बोल पड़ा, ‘यह लेडी (प्रधानमंत्री) कम्युनिस्टों के चक्कर में आ गई है. वही उसे उकसा रहे हैं कि सूर्य को निकालो. उन्हें उम्मीद है कि बादलों के पीछे से उनका प्यारा ‘लाल सूरज’ निकलेगा. हम कहते हैं कि सूर्य को निकालने की क्या जरूरत है? क्या बादलों को हटाने से काम नहीं चल सकता?’
मैं संसोपाई भाई से पूछ्ता हूं. वह कहता है, ‘सूर्य गैर-कांग्रेसवाद पर अमल कर रहा है. उसने डाक्टर लोहिया के कहने पर हमारा पार्टी-फार्म दिया था. कांग्रेसी प्रधानमंत्री को सलामी लेते वह कैसे देख सकता है? किसी गैर-कांग्रेसी को प्रधानमंत्री बना दो, तो सूर्य क्या, उसके अच्छे भी निकल पड़ेंगे.’ जनसंघी भाई से भी पूछा. उसने कहा, ‘सूर्य सेक्युलर होता तो इस सरकार की परेड में निकल आता. इस सरकार से आशा मत करो कि भगवान अंशुमाली को निकाल सकेगी. हमारे राज्य में ही सूर्य निकलेगा.’ साम्यवादी ने मुझसे साफ कहा, ‘यह सब सी.आई.ए. का षडयंत्र है. सातवें बेड़े से बादल दिल्ली भेजे जाते हैं.’ स्वतंत्र पार्टी के नेता ने कहा, ‘रूस का पिछलग्गू बनने का और क्या नतीजा होगा?’ प्रसोपा भाई ने अनमने ढंग से कहा, ‘सवाल पेचीदा है. नेशनल कौंसिल की अगली बैठक में इसका फैसला होगा. तब बताऊंगा.’ राजाजी से मैं मिल न सका. मिलता, तो वह इसके सिवा क्या कहते कि इस राज में तारे निकलते हैं, यही गनीमत है.’ मैं इंतजार करूंगा, जब भी सूर्य निकले.
इस देश में जो जिसके लिए प्रतिबद्ध है, वही उसे नष्ट कर रहा है. लेखकीय स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध लोग ही लेखक की स्वतंत्रता छीन रहे हैं. सहकारिता के लिए प्रतिबद्ध इस आंदोलन के लोग ही सहकारिता को नष्ट कर रहे हैं
स्वतंत्रता दिवस भी तो भरी बरसात में होता है. अंग्रेज बहुत चालाक हैं. भरी बरसात में स्वतंत्र करके चले गए. उस कपटी प्रेमी की तरह भागे, जो प्रेमिका का छाता भी ले जाए. वह बेचारी भीगती बस-स्टैंड जाती है, तो उसे प्रेमी की नहीं, छाता-चोर की याद सताती है. स्वतंत्रता-दिवस भीगता है और गणतंत्र-दिवस ठिठुरता है. मैं ओवरकोट में हाथ डाले परेड देखता हूं. प्रधानमंत्री किसी विदेशी मेहमान के साथ खुली गाड़ी में निकलती हैं. रेडियो टिप्पणीकार कहता है, ‘घोर करतल-ध्वनि हो रही है.’ मैं देख रहा हूं, नहीं हो रही है. हम सब तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं. बाहर निकालने का जी नहीं हो रहा है. हाथ अकड़ जाएंगे.
लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं, फिर भी तालियां बज रहीं हैं. मैदान में जमीन पर बैठे वे लोग बजा रहे हैं, जिनके पास हाथ गरमाने के लिए कोट नहीं है. लगता है, गणतंत्र ठिठुरते हुए हाथों की तालियों पर टिका है. गणतंत्र को उन्हीं हाथों की ताली मिलतीं हैं, जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिए गर्म कपड़ा नहीं है. पर कुछ लोग कहते हैं, ‘गरीबी मिटनी चाहिए.’ तभी दूसरे कहते हैं, ‘ऐसा कहने वाले प्रजातंत्र के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं.’
गणतंत्र समारोह में हर राज्य की झांकी निकलती है. ये अपने राज्य का सही प्रतिनिधित्व नहीं करतीं. ‘सत्यमेव जयते’ हमारा मोटो है मगर झांकियां झूठ बोलती हैं. इनमें विकास-कार्य, जनजीवन इतिहास आदि रहते हैं. असल में हर राज्य को उस विशिष्ट बात को यहां प्रदर्शित करना चाहिए, जिसके कारण पिछले साल वह राज्य मशहूर हुआ. गुजरात की झांकी में इस साल दंगे का दृश्य होना चाहिए, जलता हुआ घर और आग में झोंके जाते बच्चे. पिछले साल मैंने उम्मीद की थी कि आंध्र की झांकी में हरिजन जलते हुए दिखाए जाएंगे. मगर ऐसा नहीं दिखा. यह कितना बड़ा झूठ है कि कोई राज्य दंगे के कारण अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति पाए, लेकिन झांकी सजाए लघु उद्योगों की. दंगे से अच्छा गृह-उद्योग तो इस देश में दूसरा है नहीं. मेरे मध्यप्रदेश ने दो साल पहले सत्य के नजदीक पहुंचने की कोशिश की थी. झांकी में अकाल-राहत कार्य बतलाए गए थे. पर सत्य अधूरा रह गया था. मध्यप्रदेश उस साल राहत कार्यों के कारण नहीं, राहत-कार्यों में घपले के कारण मशहूर हुआ था. मेरा सुझाव माना जाता तो मैं झांकी में झूठे मास्टर रोल भरते दिखाता, चुकारा करनेवाले का अंगूठा हजारों मूर्खों के नाम के आगे लगवाता. नेता, अफसर, ठेकेदारों के बीच लेन-देन का दृश्य दिखाता. उस झांकी में वह बात नहीं आई. पिछले साल स्कूलों के ‘टाट-पट्टी कांड’ से हमारा राज्य मशहूर हुआ. मैं पिछले साल की झांकी में यह दृश्य दिखाता- ‘मंत्री, अफसर वगैरह खड़े हैं और टाट-पट्टी खा रहे हैं.
रेडियो टिप्पणीकार कहता है, ‘घोर करतल-ध्वनि हो रही है.’ मैं देख रहा हूं, नहीं हो रही है. हम सब तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं. बाहर निकालने का जी नहीं हो रहा है. हाथ अकड़ जाएंगे लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं, फिर भी तालियां बज रहीं हैं. मैदान में जमीन पर बैठे वे लोग बजा रहे हैं, जिनके पास हाथ गरमाने के लिए कोट नहीं है. लगता है, गणतंत्र ठिठुरते हुए हाथों की तालियों पर टिका है
जो हाल झांकियों का, वही घोषणाओं का. हर साल घोषणा की जाती है कि समाजवाद आ रहा है. पर अभी तक नहीं आया. कहां अटक गया? लगभग सभी दल समाजवाद लाने का दावा कर रहे हैं, लेकिन वह नहीं आ रहा. मैं एक सपना देखता हूँ. समाजवाद आ गया है और वह बस्ती के बाहर टीले पर खड़ा है. बस्ती के लोग आरती सजाकर उसका स्वागत करने को तैयार खड़े हैं. पर टीले को घेरे खड़े हैं कई समाजवादी. उनमें से हरेक लोगों से कहकर आया है कि समाजवाद को हाथ पकड़कर मैं ही लाऊंगा. समाजवाद टीले से चिल्लाता है, ‘मुझे बस्ती में ले चलो.’ मगर टीले को घेरे समाजवादी कहते हैं, ‘पहले यह तय होगा कि कौन तेरा हाथ पकड़कर ले जाएगा.’
समाजवाद की घेराबंदी है. संसोपा-प्रसोपावाले जनतांत्रिक समाजवादी हैं, पीपुल्स डेमोक्रेसी और नेशनल डेमोक्रेसी वाले समाजवादी हैं. क्रांतिकारी समाजवादी हैं. हरेक समाजवाद का हाथ पकड़कर उसे बस्ती में ले जाकर लोगों से कहना चाहता है, ‘लो, मैं समाजवाद ले आया.’ समाजवाद परेशान है. उधर जनता भी परेशान है. समाजवाद आने को तैयार खड़ा है, मगर समाजवादियों में आपस में धौल-धप्पा हो रहा है. समाजवाद एक तरफ उतरना चाहता है कि उस पर पत्थर पड़ने लगते हैं. ‘खबरदार, उधर से मत जाना!’ एक समाजवादी उसका एक हाथ पकड़ता है, तो दूसरा हाथ पकड़कर खींचता है. तब बाकी समाजवादी छीना-झपटी करके हाथ छुड़ा देते हैं. लहू-लुहान समाजवाद टीले पर खड़ा है.
इस देश में जो जिसके लिए प्रतिबद्ध है, वही उसे नष्ट कर रहा है. लेखकीय स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध लोग ही लेखक की स्वतंत्रता छीन रहे हैं. सहकारिता के लिए प्रतिबद्ध इस आंदोलन के लोग ही सहकारिता को नष्ट कर रहे हैं. सहकारिता तो एक स्पिरिट है. सब मिलकर सहकारितापूर्वक खाने लगते हैं और आंदोलन को नष्ट कर देते हैं. समाजवाद को समाजवादी ही रोके हुए हैं. यों प्रधानमंत्री ने घोषणा कर दी है कि अब समाजवाद आ ही रहा है.
मैं एक कल्पना कर रहा हूं. दिल्ली में फरमान जारी हो जाएगा, ‘समाजवाद सारे देश के दौरे पर निकल रहा है. उसे सब जगह पहुंचाया जाए. उसके स्वागत और सुरक्षा का पूरा बंदोबस्त किया जाए.’ एक सचिव दूसरे सचिव से कहेगा, ‘लो, ये एक और वीआईपी आ रहे हैं. अब इनका इंतजाम करो. नाक में दम है.’ कलेक्टरों को हुक्म चला जाएगा. कलेक्टर एसडीओ को लिखेगा, एसडीओ तहसीलदार को. पुलिस-दफ्तरों में फरमान पहुंचेंगे, समाजवाद की सुरक्षा की तैयारी करो. दफ्तरों में बड़े बाबू छोटे बाबू से कहेंगे, ‘काहे हो तिवारी बाबू, एक कोई समाजवाद वाला कागज आया था न! जरा निकालो!’ तिवारी बाबू कागज निकालकर देंगे. बड़े बाबू फिर से कहेंगे, ‘अरे वह समाजवाद तो परसों ही निकल गया. कोई लेने नहीं गया स्टेशन. तिवारी बाबू, तुम कागज दबाकर रख लेते हो. बड़ी खराब आदत है तुम्हारी.’ तमाम अफसर लोग चीफ सेक्रेटरी से कहेंगे, ‘सर, समाजवाद बाद में नहीं आ सकता? बात यह है कि हम उसकी सुरक्षा का इंतजाम नहीं कर सकेंगे. पूरा फोर्स दंगे से निपटने में लगा है.’ मुख्य सचिव दिल्ली लिख देगा, ‘हम समाजवाद की सुरक्षा का इंतजाम करने में असमर्थ हैं. उसका आना अभी मुल्तवी किया जाए.’
जिस शासन-व्यवस्था में समाजवाद के आगमन के कागज दब जाएं और जो उसकी सुरक्षा की व्यवस्था न करे, उसके भरोसे समाजवाद लाना है तो ले आओ. मुझे खास ऐतराज भी नहीं है. जनता के द्वारा न आकर अगर समाजवाद दफ्तरों के द्वारा आ गया तो एक ऐतिहासिक घटना हो जाएगी.
भोपाल के रेलवे स्टेशन पर हमीदिया रोड की तरफ खुले आसमान के नीचे 18 दिसंबर 2015 की कड़कड़ाती ठंड की रात 50-52 साल की औसत उम्र की लगभग 200 महिलाओं का समूह जद्दोजहद करता नजर आ रहा था. ये सोने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन अजनबी शहर में ये सो कैसे सकती थीं? एक तरफ कड़ाके की ठंड थी और दूसरी तरफ अनजाना-सा भय. ये सभी महिलाएं भोपाल से लगभग150 किलोमीटर दूर विदिशा जिले के गंज बासौदा और मंडी बामोरा क्षेत्र से चने की भाजी और झाड़ू बेचने के लिए यहां आईं थीं. अपनी सुरक्षा के मद्देनजर इन्हें सोना नहीं, बल्कि रातभर जागना था. आजीविका कमाने की इस कोशिश से उन्हें 200 से 300 रुपये हासिल होंगे और वे फिर वापस अपने कस्बों में लौट जाएंगी. क्यों आती हैं वे यहां, क्या वहीं उनकी कुछ कमाई नहीं हो सकती है? इस सवाल के जवाब में रामवती बाई कहती हैं, ‘हमारे यहां या तो लोग हमारा बनाया सामान खरीदते ही नहीं हैं या खरीदते भी हैं तो बहुत ही कम दाम देते हैं. खेतों में मजदूरी करते हुए हमें चने की ये भाजी काटने का मौका मिल जाता है और इसे बेचने भोपाल आना ही पड़ता है, क्योंकि यहां इसकी अच्छी कीमत मिल जाती है.’
रामवती पिछले 28 साल से यही कर रही हैं. इनमें से हर दूसरी महिला के पास घर और खेती की थोड़ी बहुत जमीन थी, लेकिन जरूरतें पूरी करने के लिए उन्हें बेचना पड़ा. देश में अब तक यह आकलन हुआ ही नहीं कि साल-दर-साल समाज के एक तबके से उनकी पहचान और संपदा छिनती जा रही है और आजीविका के लिए उन्हें बड़े शहरों में शरणार्थियों जैसा जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है. देशभर में रामवती जैसे हजारों-लाखों लोग बेघर हैं या फिर बेघरों जैसी जिंदगी गुजर-बसर कर रहे हैं. इनमें से ज्यादातर हमेशा से बेघर नहीं थे. मंडी बामोरा की 58 साल की क्रांति बाई बताती हैं, ‘गांव में घर है, फिर भी आधी जिंदगी बेघर के रूप में ही गुजारी है.’ उन्हें यह जानकारी है कि शहरों में रैन-बसेरे बने हैं, जहां लोग रुकते हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि वहां ठहरने के लिए 20 रुपये देने पड़ते हैं. उनकी इस जानकारी को किसी ने दुरुस्त नहीं किया कि वे वहां बिना किसी शुल्क के रह सकती हैं.
भोपाल रेलवे स्टेशन पर यह समूह एक या दो रात ही दिखाई नहीं देता है. शहर में हर रोज इस तरह के बेघरों का एक कुनबा अलग-अलग इलाकों में बसता है और सुबह होते ही उजड़ जाता है. बहरहाल 20 सितंबर 2011 को सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिए थे कि सरकार द्वारा चलाए जा रहे आश्रय घरों और रैनबसेरों के बारे में प्रचार किया जाना चाहिए, लोगों को बताया जाना चाहिए कि वहां उन्हें बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी, लेकिन इस मामले में राज्य सरकारों ने तत्परता नहीं दिखाई.
‘बेघर होने से महिलाओं और बच्चों के शोषण की एक श्रृंखला जुड़ी होती है. उनका शारीरिक-मानसिक शोषण होता रहता है पर न्याय व्यवस्था उन्हें दुत्कारती है’
भोपाल के यादगार-ए-शाहजहांनी पार्क के नजदीक बने रैनबसेरे में एक सज्जन रह रहे हैं हरिसिंह कुशवाहा. सागर जिले की बंडा तहसील में छह एकड़ कृषि भूमि के मालिक हरिसिंह दो सालों से भोपाल मजदूरी करने आते हैं. कारण- बारिश नहीं हुई और कर्ज इतना बढ़ गया है कि गांव से बाहर निकलना पड़ा. जब उनसे पूछा गया कि मजदूरी तो सागर में भी मिल जाती, फिर परिवार छोड़कर यहां क्यों आए? वो थोड़ा सकुचाए, फिर बोले, ‘वहां कई रिश्तेदार रहते हैं, वो देखते तो बदनामी होती.’ अब वे भोपाल में मजदूरी करते हैं और रैन बसेरे में रहते हैं. डेढ़-दो महीने काम करेंगे और 3-4 हजार रुपये की मजदूरी कमाकर गांव लौट जाएंगे. एक आैैर कहानी है रहीम की, जिन्होंने पुराने शहर में दीवार से सटाकर प्लास्टिक की पन्नियों से अपना अस्थाई आशियाना बनाया है. फुटपाथ के 35 वर्गफुट के टुकड़े पर वे अपने परिवार के साथ रहते हैं. शहर आए उन्हें 3 साल हो चुके हैं. इस दौरान वे रैन बसेरे में गए, पर वहां उन जैसों के लिए कोई व्यवस्था नहीं है क्योंकि वे परिवारवाले हैं और उनके जैसे बेघरों को वहां आसरा नहीं मिल सकता. पत्नी और बच्चों के साथ वे वहां रह ही नहीं सकते थे.
रैन बसेरे में ही रहने वाले रामबाबू शर्मा ने कुछ देर तक बात नहीं की. कुछ देर देखते रहे और दूसरों से बात करते हुए सुनते रहे. फिर खुद बुलाकर अपने बारे में बताया. रामबाबू शर्मा शहर के व्यावसायिक इलाके के एक होटल में काम करते हैं. ऐसा नहीं है कि उनका घर नहीं है. चूंकि उन्हें भोपाल शहर के दूसरे कोने तक अपने घर आने-जाने में 50 रुपये खर्च करने पड़ते हैं, इसलिए वे 3 किलोमीटर पैदल चलकर इस रैनबसेरे में आकर रुक जाते हैं, ताकि अगले दिन सुबह काम पर जल्दी पहुंच सकें. बिहार के मुजफ्फरपुर से 1996 में मध्य प्रदेश आए रामबाबू ने मनोविज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की है, पर आज उनकी पहचान बस एक बेघर की ही है. अब्दुल रेहान इसलिए सड़क पर ही रहते हैं, क्योंकि उनके पास सामान की दो पोटलियां हैं. वही उनकी संपत्ति है. इसे रखने की रैन बसेरों में कोई व्यवस्था नहीं है.
स्त्रोतः सामाजिक-आर्थिक गणना
भोपाल के यादगार-ए-शाहजहांनी पार्क स्थित रैन बसेरे में एक समय में 200 से 300 लोग रात गुजारते हैं, इसके दूसरी तरफ महिलाएं पूरी तरह से खुले आसमान के नीचे रहती हैं क्योंकि रैन बसेरों को लेकर जिस तरह की संवेदनशील और सुरक्षित व्यवस्था बनाने की जरूरत थी, वह नहीं की गई है. महिलाओं के लिए बने रैन बसेरे खाली हैं और महिलाएं सड़कों रात बिता रही हैं.
आज के हालात यह हैं कि लोग बेघर होते नहीं हैं, बेघर किए जाते हैं. कुछ लोग इंसान और नागरिक नहीं होते हैं. वे महज अतिक्रमणकारी होते हैं. ऐसे लोग अक्सर मिट्टी, बांस और घास-प्लास्टिक की पन्नी जोड़कर एक ढांचा बनाते हैं ताकि खुद को ढक सकें. ऐसे लोग सरकार की निगाह में ‘अनाधिकृत और अपराधी’ हैं. दिसंबर 2015 के दूसरे सप्ताह में दिल्ली की ऐसे ही एक इलाके शकूरबस्ती पर रेल महकमे का कहर बरपा. जाड़े के मौसम में अतिक्रमण हटाने के नाम पर बस्ती को तहस-नहस कर दिया गया. इस कार्रवाई में एक बच्चे की माैत भी हो गई. यह कार्रवाई बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था किए और बिना ये सोचे हुई कि ठंड में ये लोग कहां जाएंगे? जिंदा भी रह पाएंगे कि नहीं? यह सब उस स्थिति में किया गया जब दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड नीति और दिल्ली लॉ (स्पेशल प्रोविजन) कानून, वर्ष 2006 से पहले बनी झुग्गी-बस्तियों को वैधानिक संरक्षण देता है.
आकलन बताते हैं कि जनगणना में बेघर लोगों की बहुत सीमित परिभाषा गढ़कर उनकी संख्या को सीमित कर दिया गया है
बात केवल शहरी बेघरों तक ही सीमित नहीं है. वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता अनुराग मोदी बताते हैं, ‘दिसंबर 2015 में मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के पीपलबर्रा और बोड गांव में आदिवासियों के 45 घर तोड़ दिए गए. फसलों को नष्ट कर दिया गया और कुंए में जहर डाल दिया, ताकि लोग गांव छोड़ कर चले जाएं. इन लोगों ने उन गांवों में 50 हजार फलदार पौधे लगाए हैं, पर वन विभाग उनकी फसल और वृक्षारोपण को अचानक नष्ट कर देता है.’
सर्वोच्च न्यायालय वर्ष 2010 से बेघर लोगों को आश्रय देने के लिए निर्देश दे रहा है. 20 जनवरी 2010 को पीयूसीएल बनाम भारत सरकार और अन्य के मामले में न्यायालय ने निर्देश दिए थे कि हर एक लाख की जनसंख्या पर एक ऐसा आश्रय घर होना चाहिए जिसमें सभी बुनियादी सुविधाएं जैसे साफ बिस्तर, साफ शौचालय और स्नानघर, कंबल, प्राथमिक उपचार की सुविधा आैैर पीने का पानी उपलब्ध हो. अक्सर शिकायत की जाती है कि रैन बसेरों में लोग नशे का सेवन करते हैं और बीमार होते हैं, इस मामले में निर्देश कहता है कि वहां नशा मुक्ति की व्यवस्था होनी चाहिए. सुरक्षा और सम्मान के नजरिये से 30 फीसदी आश्रय घर महिलाओं, वृद्धों के लिए होने चाहिए. दिशानिर्देशों के मुताबिक एक व्यक्ति के लिए आश्रय घर में कम से कम 50 वर्ग फिट जगह होगी जबकि सच यह है कि अभी एक व्यक्ति को 15 वर्ग फिट जगह मिल रही है यानी जितने में वह सिर्फ लेट पाता है.
स्त्रोतः सामाजिक-आर्थिक गणना
बेघर लोगों के लिए काम कर रहे लेखक आैैर सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर कहते हैं, ‘चूंकि समाज ही इन लोगों को भेदभाव की नजर से देखता है, इसलिए नीतिगत-राज्य व्यवस्था में इस विषय को केवल नजरअंदाज ही नहीं किया जाता, बल्कि खारिज किए जाने की पहल होती है. हम यह सोचते ही नहीं है कि सड़कों पर रहने वालों के पास एक अदद घर नहीं होता है, किंतु वे जिंदगी जीने के लिए सबसे ज्यादा श्रम करते हैं. बेघर होने से महिलाओं और बच्चों के शोषण की एक श्रृंखला जुड़ी होती है. उनका आर्थिक-शारीरिक और मानसिक शोषण होता रहता है पर न्याय व्यवस्था उन्हें दुत्कारती है.’
भारत में बेघर लोगः देश में आश्रय विहीन लोगों की स्थिति का एक आकलन जनगणना 2011 के आंकड़ों से किया जा सकता है. वर्ष 2001 में देश में बेघर लोगों की जनसंख्या 19.43 लाख थी, जो वर्ष 2011 में कम होकर 17.72 लाख रह गई है. इस दौर में देश में खूब शहरीकरण हुआ. इस अव्यवस्थित शहरीकरण के परिणामस्वरूप शहरों में बेघर लोगों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. जहां 2001 में शहरी इलाकों में 7.78 लाख बेघर लोग थे, यह संख्या दस साल बाद बढ़कर 9.38 लाख हो गई. ग्रामीण क्षेत्रों में बेघर लोगों की संख्या में कमी आई और ये 11.6 लाख से कम होकर 8.34 लाख रह गई. आकलन बताते हैं कि जनगणना में बेघर लोगों की बहुत सीमित परिभाषा गढ़कर उनकी संख्या को सीमित कर दिया गया है और इस परिभाषा को बदला जाना वक्त की जरूरत है.
परिभाषा की विसंगतिः नीति का ताना-बाना बनाने वाले समस्या को हल करने में उतने जुझारू और रचनात्मक नहीं होते हैं, जितना वे समस्या को छिपाने और उसकी गंभीरता को हल्का करने में होते हैं. वे सिद्धांतों और मूल्यों से ज्यादा परिभाषाओं को गढ़ते हैं और बदलाव दिखा देते हैं. बेघर की परिभाषा का ही संदर्भ लीजिए. जनगणना के मुताबिक, ‘बेघर वह है जो खुले में रहता है, सड़क के किनारे, फुटपाथ, फ्लाईओवर और सीढ़ियों के नीचे रहता है या पूजा स्थलों, मंडप, रेलवे स्टेशन आदि के खुले स्थानों में रहता है.’ इस परिभाषा के हिसाब से भारत की केवल 0.14 प्रतिशत जनसंख्या बेघर है, जबकि वास्तव में 12.5 प्रतिशत लोग बेघर हैं.
घरों की कमीः बारहवीं पंचवर्षीय योजना के तहत शहरी आवासों के लिए गठित तकनीकी समूह के मुताबिक इस योजना (वर्ष 2012 से 2017) की शुरुआत में भारत में बुनियादी जरूरतों के साथ 1.88 करोड़ घरों की कमी थी. ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में यह कमी 2.47 करोड़ थी. भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री ने तय किया है कि वर्ष 2022 तक एक भी परिवार बेघर नहीं होगा. वे जनगणना 2011 के आंकड़ों को आधार मान रहे हैं. जिसके मुताबिक 4.50 लाख परिवार बेघर हैं. यानी लक्ष्य है कि इतने घर बना दिए जाएं और लक्ष्य पूरा हो जाएगा. अगर हम समस्या को स्वीकार ही नहीं करेंगे या कम आंकेंगे, तो क्या सही किस्म का बदलाव आ पाएगा?
आश्रय घर चार तरह के होने चाहिएः पुरुषों के लिए, महिलाओं के लिए, परिवार के लिए और विशेष जरूरतों वाले लोगों के लिए
वास्तविकता का दूसरा पहलूः भारत सरकार ने सभी परिवारों की जातीय-सामाजिक-आर्थिक स्थिति का आकलन करने के लिए विशेष जनगणना की है. इसके मुताबिक ग्रामीण भारत में 17.96 करोड़ परिवारों में से 2.24 करोड़ यानी 12.5 प्रतिशत परिवार ऐसे घरों में रहते हैं, जिनकी दीवारें घास, बांस, प्लास्टिक और पॉलीथीन से बनी हुई हैं. इन्हें बेघर क्यों नहीं माना जाता है? जो लोग किन्हीं खास परिस्थितियों की मजबूरी में पन्नी या घास से एक ढांचा बना लेते हैं, सम्मानजनक जीवन के लिए इसे पर्याप्त तो नहीं ही माना जा सकता है. यह भी उल्लेखनीय है कि जनगणना 2011 ने भी यह जांचा था कि कितने लोगों के घरों की दीवारें घास या पन्नी की हैं. जनगणना 2011 के हिसाब से 2.29 करोड़ घर घास-पन्नी की दीवारों से बने हैं. इन दो आंकड़ों में 5 लाख का अंतर है. इससे पता चलता है कि बेघर लोगों को पहचानने और उन्हें स्वीकार करने के लिए हमारी व्यवस्था अब भी तैयार नहीं है.
इस संदर्भ में नेशनल फोरम फॉर हाउसिंग राइट्स के संयोजक इंदु प्रकाश सिंह कहते हैं, ‘जो दीवारें हवा का झोंका न झेल पाएं, जो छतें बारिश की फुहारों में टपकने लगें, उनमें रहने वालों को बेघर न मानना नीतिगत विसंगति और नैतिक अपराध है. वास्तव में हमें यह स्वीकार करना होगा कि लोगों के संसाधनविहीन हो जाने से आश्रयविहीनता बढ़ रही है. उन्हें तात्कालिक तौर पर आश्रय की सेवाएं और व्यापक तौर पर सम्मानजनक आश्रय का अधिकार देना ही होगा. बेघर होने और सामाजिक-आर्थिक गैर-बराबरी का गहरा संबंध है, इसका मतलब है कि आशय के अधिकार की नीति के साथ-साथ मौजूदा विकास की नीतियों की फिर से समीक्षा करने की जरूरत है, नहीं तो लोग बेघर होते ही रहेंगे.’
27 फरवरी 2012 को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक निर्देश में कहा था कि हमें लगता है कि आश्रय घरों के संचालन और व्यवस्था की निगरानी के लिए राज्यों को ऐसे नियम और नियामक व्यवस्था बनानी चाहिए, जिनका स्वरूप वैधानिक हो. हालांकि इस मामले में सरकारें कछुआ चाल चल रही हैं. उन्हें लगता है कि बेघर लोग इंतजार कर सकते हैं, अभी सरकारों के पास दूसरे जरूरी काम हैं. इन स्थितियों में जो मरते हैं, वे बेघर से लावारिस लाश की श्रेणी में तब्दील हो जाते हैं. इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता.
आश्रय घरों की स्थितिः मौजूदा मानकों के आधार पर देश के सभी राज्यों में 2,402 आश्रय घर बनाए जाने की जरूरत है. हालांकि 27 नवंबर 2015 तक 1,340 आश्रय घर ऐसे थे जिनके बनाए जाने पर स्वीकृति मिली थी या जिनका निर्माण शुरू हो चुका था.
सर्वोच्च न्यायालय में 27 नवंबर 2015 को केंद्रीय आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय द्वारा दाखिल हलफनामों से पता चलता है कि महाराष्ट्र में 409, उत्तर प्रदेश में 250, मध्य प्रदेश में 122, राजस्थान में 118 और दिल्ली में कुल 141 आश्रय घरों की स्थापना की जरूरत है.
अव्यवस्थित शहरीकरण से बेघर लोगों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. जहां 2001 में शहरों में 7.78 लाख बेघर थे, यह संख्या दस साल बाद बढ़कर 9.38 लाख हो गई
किसकी जिम्मेदारी? यहां उल्लेख करना जरूरी है कि अब यह जिम्मेदारी राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन के पास है कि वह बेघर लोगों के हकों की सुरक्षा करे. शहरी बेघर लोगों के लिए बनी योजना के मुताबिक केवल आश्रय घरों को बेघर लोगों के हकों की सुरक्षा के केंद्र के रूप में स्थापित किया जाना है. दिशा निर्देश कहते हैं कि बेघर लोगों को सामाजिक सुरक्षा पेंशन, राशन, पोषण आहार, परिचय पत्र, आर्थिक समावेश, शिक्षा, सस्ते आवास सरीखे अधिकारों से जोड़ा जाएगा. इनके संचालन के लिए जरूरी बजट में से 75 प्रतिशत केंद्र सरकार और 25 प्रतिशत राज्य सरकार को वहन करना है. जहां आश्रय घर (क्षमता- 50 लोग) चल रहे हैं, उनके संचालन के लिए भारत सरकार 6 लाख रुपये प्रति आश्रय घर सालाना उपलब्ध करवाएगी.
कुछ महत्वपूर्ण बातें जिन्हें समझने की जरूरत है
देशभर के बेघरों के संदर्भ में हमें ये बात समझनी चाहिए कि ये लोग भी इंसान हैं और बाकी समाज की तरह इनकी भी बुनियादी जरूरतें समझने की जरूरत है. विकास के इस दौर में, जबकि जमीन को सबसे कीमती संपत्ति माना जाता है, बेघरों का भी उसमें बराबरी का हक है. बेघर लोगों का समूह कोई एकरूप समूह नहीं है. उनमें अकेले पुरुष भी हैं, छोटे बच्चों के साथ एकल महिलाएं भी हैं, विकलांगता से प्रभावित विशेष जरूरतों वाले व्यक्ति और बुजुर्ग भी हैं. इन सबकी जरूरत के मुताबिक आश्रय घरों की सम्मानजनक व्यवस्था बनानी होगी. इस समूह की जरूरतों को पहचानते हुए, उन्हें पूरा करना भी राज्य की जिम्मेदारी है. उन्हें सस्ता राशन, सामाजिक सुरक्षा और रोजगार का हक मिले. उन्हें स्वास्थ्य और शिक्षा का अधिकार भी है. इन पहलुओं पर सजगता से पहल करके इनकी स्थिति को बदला जा सकता है. बदलते परिवेश में घर छोड़ने, सही मार्गदर्शन न मिलने, घरों में आजीविका के साधन न होने या शिक्षा में अच्छा प्रदर्शन न कर पाने के कारण किशोर उम्र के बच्चे (10 से 17-18 साल की उम्र) भी आश्रय विहीन हो जाते हैं. बहरहाल ऐसे बच्चों को संरक्षण देने के लिए किशोर न्याय अधिनियम में बाल संरक्षण की व्यवस्थाएं हैं, किंतु उनका अपना ढांचा इतना लचर और गुणवत्ताविहीन है कि ये बच्चे पूरी तरह से असंरक्षित हो जा रहे हैं. इनका कई स्तरों पर शोषण होता है. वे भयभीत भी होते हैं. अक्सर वे आपराधिक समूहों से जुड़ जाते हैं. स्वाभाविक है कि यदि सही संरक्षण नहीं मिलेगा, तो ऐसा होना लाजिमी ही है.
बहरहाल ये भी समझने की जरूरत है कि बेघरों की समस्या को केवल आश्रय घर या रैन बसेरे की इमारत तक ही सीमित नहीं रखा जाना चाहिए. यह एक बहुआयामी और बहु-विषय केंद्रित प्रतिबद्धता की मांग करता है. इतना ही नहीं नीतियां बनाने से जरूरी उन्हें उचित ढंग से लागू करवाना है वरना बेघर लोगों की जिंदगियां कभी भी पटरी पर नहीं लौट सकेगी.
रात के 11 बजे काठमांडू शहर नींद में डूब चुका था. कुछ गिनी चुनी टैक्सियों को छोड़कर सड़क पर हलचल का कोई निशान नहीं था. हमारे संपर्क सूत्र ने हमें बताया कि यहां इस समय टैक्सी मिलना मुश्किल है इसलिए यह अच्छा होगा कि हम बसअड्डे के पास ही किसी होटल में रुक जाएं. सितंबर माह से नेपाल ईंधन की कमी से जूझ रहा है. सार्वजनिक परिवहन पर इसका सबसे बुरा प्रभाव पड़ा है. यहां टैक्सियां कालाबाजारी से मिले ईंधन के सहारे चल रही हैं. इसी कारण टैक्सियों के मालिक मनमर्जी का किराया वसूल रहे हैं. 4-5 किमी की दूरी के लिए भी 1500-2000 रुपये (नेपाली) वसूल किए जा रहे हैं. ये नेपाल में हमारी पहली यात्रा नहीं है, हम यहां पहले भी आ चुके हैं, ऐसे में दक्षिण एशिया के सबसे हलचल वाले शहर को मुर्दा खामोशी से भरा देखकर ज्यादा निराशा हो रही थी.
संकट से जूझती नेपाल सरकार स्थिति को संभालने के लिए पूरी कोशिश कर रही है. इसी कोशिश में बिजली कटौती का रास्ता अपनाया जा रहा है. जब हम नेपाल पहुंचे तो नेपाल सरकार के इस प्रयोग का तीसरा दिन था.
हमारी होटल ढूंढने की पहली कोशिश नाकाम रही. हमने उत्तर दिशा की ओर बढ़ना शुरू किया. 10 डिग्री तापमान में जूतों में भी हमारे पैर सुन्न हो रहे थे. भूख भी लगी थी. करीब डेढ़ घंटे भटकने के बाद एक होटल में कुछ रोशनी दिखी. हालांकि होटल का दरवाजा बंद था लेकिन भीतर से आती आवाजों ने हमारे अंदर उम्मीद जगाई. दूसरे सामान्य दिनों में हम यूं रात-बिरात किसी होटल के थके-मांदे बाशिंदों को तंग नहीं करते लेकिन उस समय हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था. शिष्टाचार से ज्यादा जरूरी हमारा बचना था. हमारी किस्मत अच्छी थी कि हमें सकारात्मक प्रतिक्रिया भी मिली. होटल के मैनेजर गणेश थापा एक 30 साल के एक सज्जन थे. उन्होंने बताया कि सारा स्टाफ जा चुका है और खाने के लिए वे हमें बिस्कुट का आखिरी बचा पैकेट दे सकते हैं. इसके अलावा खाने-पीने का कोई इंतजाम नहीं है. यह विडंबना ही थी कि रिसेप्शन पर ‘वेलकम’ का पोस्टर हमारे सामने था!
हम भारत की नेपाल सीमा पर नाकाबंदी, जिसके बारे में अब तक सिर्फ सुना ही था, की असलियत जानने के लिए नेपाल के एक सिरे से दूसरे सिरे तक यात्रा कर रहे थे. धनगढ़ी कस्टम चौकी पर हम समाजवादी पार्टी (सपा) के विधायक रामकिशन से मिले, जिन्होंने दोनों ओर के लोगों के लिए संकट पैदा करने और मधेसी आंदोलन के बहाने भारत की ओेर से की गई नाकेबंदी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दोषी ठहराया. टीकापुर सीमा पर लमकी में हम एक विद्यार्थी बिश्वकर्मा मिले, जो एक छोटा एलपीजी सिलेंडर खरीदने के लिए काठमांडू से वहां तक आया था. अपनी पढ़ाई छोड़कर इस ठिठुरन भरे मौसम में वह बस से 14 घंटों का मुश्किल भरा सफर तय कर यहां आया ताकि नेपाल में आजकल ‘दुर्लभ’ हो रहे ऊर्जा संसाधन को खरीद सके. कालाबाजारी के चलते पेट्रोल भी 300 रुपये (नेपाली) प्रति लीटर मिल रहा है. आम दिनों में नेपाली विद्यार्थियों को सफर करते समय किराए में 20 प्रतिशत की छूट मिलती है, लेकिन ईंधन की अत्यधिक कमी के चलते बिश्वकर्मा का स्टूडेंट आईडी कार्ड अब किसी काम का नहीं है.
टैक्सियों के मालिक पर्यटकों से मनमाना किराया वसूल रहे हैं. 4-5 किलोमीटर की दूरी के लिए भी 1500-2000 रुपये (नेपाली) वसूल किए जा रहे हैं
बिश्वकर्मा ने बताया, ‘हमने काठमांडू में सिलेंडर खरीदने की कोशिश की थी लेकिन वहां एक सिलेंडर 12,000 रुपये (नेपाली) का मिल रहा है.’ बिश्वकर्मा को उम्मीद है कि नेपाल में माओवादी क्रांति फिर होगी. वह क्रांति को नेपाल की सभी समस्याओं के लिए रामबाण जैसा मानता है. उसका कहना है कि केवल क्रांति से ही भ्रष्टाचार, शोषण और अराजकता का अंत हो सकता है. अभी तक की यात्रा में हम ऐसे लोगों से मिले थे जो नेपाल की सभी समस्याओं के लिए 10 साल लंबे जनअसंतोष को जिम्मेदार ठहरा रहे थे, लेकिन बिश्वकर्मा के लिए ये साल सबसे अधिक रोमांचकारी और उम्मीदों से भरे थे.
नेपाल के लोग अपनी सरकार से नाराज हैं. हालांकि वर्तमान संकट की स्थितियों में वे भारत की भूमिका को समझते हैं पर इस पर भी वे अपनी ही सरकार से नाराज हैं कि क्यों वे अपनी समस्याओं (जो खुद उन्हीं की पैदा की गई हैं) का समाधान खुद ढूंढने की बजाय भारत की मदद पर निर्भर हैं. लोगों का गुस्सा स्वाभाविक है. 2014 में नेपाल की जीडीपी 5.48 प्रतिशत हो गई थी, जो वर्ष 2008 के मुकाबले काफी कम है, वह वर्ष जब नेपाल से राजतंत्र खत्म हुआ था.
पिछले साल अप्रैल में आए भयानक भूकंप के कारण हालात बद से बदतर हो गए. 9000 लोग मारे गए और लाखों बेघर हो गए. एक अनुमान के अनुसार इस त्रासदी ने करीब 7 लाख लोगों को गरीबी रेखा से नीचे धकेल दिया. मानव तस्करी बढ़ गई है, साथ ही पलायन भी.
सरकार में होते लगातार बदलावों के कारण नीति निर्धारण और पुनर्निर्माण के कार्य बाधित हुए. संविधान बनने के बाद जब नेपाल फिर से अपने पुनर्वास और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने को ही था कि भारत-नेपाल सीमा की नाकाबंदी ने इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया. काठमांडू में शुरू हुआ निर्माण कार्य वहीं रुक गया. सितंबर के महीने से नेपाल में रहना कई गुना महंगा हो गया है, मजदूर वहां से पलायन करके ऐसी जगहों पर बसने के लिए मजबूर हैं, जहां जीवन अपेक्षाकृत आसान है. पशुपतिनाथ मंदिर के पास काम करने वाले एक गार्ड का कहना है, ‘जिंदगी इतनी मुश्किल कभी नहीं थी.’
धनगढ़ी सीमा पर ट्रकों की लंबी कतार लगी है. क्लीयरेंस के लिए खड़े ये ड्राइवर तीन दिन के लंबे इंतजार से आजिज आ चुके हैं. एक ट्रक ड्राइवर बताते हैं, ‘मेरे ट्रक में दवाइयां हैं, फिर भी मुझे जाने नहीं दिया गया. एक ड्राइवर ने बताया, ‘सोनौली सीमा पर मैंने 45 दिनों तक क्लीयरेंस के लिए इंतजार किया.’ हमने पूछा, ‘पर भारत सरकार का मानना है कि वहां नेपाल में आप लोगों की जान को खतरा है?’ इस पर नोएडा से सामान ले जा रहे शब्बीर ने जवाब दिया, ‘नहीं! नेपाल में हमें कोई खतरा नहीं है.’
धनगढ़ी सीमा पर एक छोटा कस्टम चेक पॉइंट है. सामान्य दिनों में यहां से केवल 10-15 ट्रक गुजरते हैं लेकिन बीरगंज और सोनौली सीमा पर अशांति के बाद अब इस तरह की छोटी चेक पोस्टों से बड़ी संख्या में ट्रक से गुजर रहे हैं. कस्टम इंस्पेक्टर आरके सिंह बताते हैं, ‘कल यहां से 54 ट्रक गुजरे हैं. दो हफ्ते पहले तक यहां से केवल 15-20 ट्रक गुजरते थे, पर अब ये संख्या सौ तक पहुंच चुकी है. कल तो हमने ओवरटाइम भी किया. 8 बजे के बाद भी कुछ ट्रकों को जाने दिया. पर फिर सीमा सुरक्षा बल के एक अधिकारी ने हमें दोबारा ऐसा करने से मना कर दिया. हमारे ये कहने पर कि हमने ऐसा इंसानियत के नाते किया, उन्होंने कहा, ‘हम इंसानियत नहीं केवल आदेश समझते हैं.’
मुश्किल में महिलाएंः नेपाल में महिलाएं, बच्चे अपना ज्यादा समय लकड़ी ढूढने, कुकिंग गैस और डीजल के लिए लगी लंबी कतारों में बिता रहे हैं
क्लीयरेंस लेने की प्रक्रिया नए पासपोर्ट के लिए आवेदन करने जितनी जटिल है. पहले ड्राइवर को सरकार द्वारा नियुक्त निजी एजेंट के पास सारे दस्तावेज जमा करने होते हैं. इनकी जांच के बाद कस्टम अधिकारियों को ये दस्तावेज भेजे जाते हैं और अंत में सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी ट्रकों को सीमा पार जाने की अनुमति देते हैं. इसके बाद नेपाल सीमा में पहुंचकर भी ट्रक ड्राइवरों को इसी प्रक्रिया से गुजरना होता है यानी नेपाल के कस्टम अधिकारी, नेपाली पुलिस और कई बार नेपाली सेना द्वारा भी इनकी जांच की जाती है.
ड्राइवर अनिल यादव बताते हैं, ‘हमें सीमा के दोनों ओर हर 100 मीटर पर रिश्वत देनी पड़ती है.’ हालांकि कस्टम अधिकारी रिश्वत लेने के आरोप को नकारते हैं. आरके सिंह कहते हैं, ‘आप मुझे एक ड्राइवर दिखा दीजिए जो कह दे कि हम रिश्वत लेते हैं फिर आप जो चाहेंगे मैं वो करने को तैयार हूं.’ एक ड्राइवर बताते हैं, ‘जब कुछ ड्राइवरों ने नेपाल में प्रवेश करने की कोशिश की तो उन्हें पीटा गया और उनके लाइसेंस जब्त कर लिए गए. एक एजेंट परसों मेरे कागज ले गया था जो अब तक नहीं लौटाए गए हैं.’ जब हमने एक निजी एजेंट नरेंद्र चौधरी से बात करने की कोशिश की तो उसने हमें दूसरे अधिकारियों के पास जाने को कहा.
‘नेपाल की 60 प्रतिशत दवाएं भारत से आती हैं. ऐसे में जीवनरक्षक दवाओं और वैक्सीन की कमी सर्दी के मौसम में बच्चों के लिए घातक साबित हो सकती है’
नेपाल एक नेतृत्वविहीन समाज है. ये तब तक कोई समस्या नहीं थी जब तक माओवादी नेता प्रचंड ने विद्रोह का बिगुल नहीं बजाया था. इस बगावत के उभार के समय नेपाल के 80 फीसदी हिस्से पर माओवादी शासन था. कानूनी सरकार के अधिकार बस काठमांडू और पोखरा तक ही सीमित थे. माओवादियों का अपना संविधान था, अपने कानून और ‘जनता की सरकार’. वे स्कूल चलाते थे, डाक व्यवस्थाएं देखते थे, विदेशी और घरेलू व्यापार पर कर वसूलते थे. 2006 में, संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की मध्यस्थता के बाद माओवादी आगे आए और सात दलों के गठबंधन वाली सरकार के साथ एक शांति समझौता करने पर राजी हुए. तबसे माओवादी नेतृत्व द्वारा उठाया गया हर कदम बस उनके अस्तित्व को बचाए रखने के लिए है. नेपाल की यूनाइटेड कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) के एक सदस्य कहते हैं, ‘नेतृत्व की सोच को हेग (यूएन का मुख्यालय) ने खासा प्रभावित किया है. उन्हें डर है कि बगावत के समय मानवाधिकारों के हनन को लेकर उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है. इसी कारण वे लोगों से साफ बात कर पाने में असमर्थ हैं.’
माओवादियों का ये डर बेबुनियाद नहीं है. नवंबर 2015 में जेनेवा में हुई संयुक्त राष्ट्र की बैठक में नेपाल सरकार ने भारत द्वारा की गई नाकेबंदी का मुद्दा उठाने की कोशिश की थी, जिसके प्रतिरोध में भारत सरकार ने हिंसक विरोध करने वालों को सजा देने की बात कही. जिस पर दिसंबर में, दिल्ली में हुई एक पत्रकार वार्ता में नेपाल के फोरम फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ ह्यूमन राइट्स के प्रमोद काफले ने कहा, ‘अब भारत एक लोकतांत्रिक शक्ति को सजा देना चाहता है.’ जब मैंने यूनाइटेड कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) के एक सदस्य से पूछा कि वे अपने नेताओं के इस नाकाबंदी पर कड़े स्वर में न बोलने पर क्या राय रखते हैं तो उन्होंने कहा, ‘आईफोन, महंगे गैजेट्स, लैपटॉप, रंगबिरंगी वेशभूषा से उसे छला जा सकता है, जो कुछ जानता न हो. नेपाल वास्तव में एक अर्द्ध-आधुनिक समाज है जहां आज भी जीवन बचाने यानी सर्वाइवल को किसी भी और चीज से ऊपर रखा जाता है. लोगों को प्रचंड या किसी और की कोई परवाह नहीं है. उनके ऊपर आई मुसीबतों के लिए वे अपनी किस्मत को ही कोसते हैं.’
इस बीच बेतिया (बिहार) के अंजनी कुमार को जल्दी पैसे कमाने का एक जरिया मिल गया है. वो नेपाल में डीजल की तस्करी कर रहे हैं. बिहार में डीजल का दाम लगभग 50 रुपये प्रति लीटर है, जिसे वे काठमांडू में लगभग 250 रुपये नेपाली (भारतीय मुद्रा में करीब 160 रुपये) में बेच रहे हैं. जब हम काठमांडू छोड़ रहे थे, उसने कलंकी बस स्टॉप के एक छोटे से रेस्तरां में हमें पहचान लिया. उसने बताया कि इस यात्रा में उसने 15 हजार रुपये कमाए हैं. ये बताने के बाद कि वो एक नेपाली नागरिक है, उसने हमें आधार कार्ड की पर्ची भी दिखाई. ‘मेरे पिता चाहते थे कि मैं ये भी बनवा लूं. जिस तरह के काम मैं करता हूं, उसमें नेपाल की नागरिकता के साथ भारतीय पहचान पत्र होना भी बहुत जरूरी है.’ जब हमने चेताया कि ये गैरकानूनी हो सकता है तो उसने तुरंत कहा, ‘कई लोग ऐसा करते हैं.’
इस वक्त चल रहे मधेसी आंदोलन की एक महत्वपूर्ण मांग देशीयकृत नागरिकता या दत्तक नागरिकता से जुड़ी है. नए संविधान के अनुसार दत्तक नागरिक किसी बड़े सरकारी पद पर नहीं रह सकते. मधेसी नेताओं को डर है कि यह अनुछेद अस्पष्ट है और इसके अनुसार मधेसी मूल के किसी भी नेपाली नागरिक को किसी संवैधानिक पद के लिए अयोग्य साबित किया जा सकता है. वहीं दूसरी तरफ गैर-मधेसी नेताओं का मानना है कि इस अनुच्छेद में नरमी करना भविष्य में नेपाल के हित में नहीं होगा. नेपाल में मधेसियों के प्रति कोई भेदभाव नहीं है, ये साबित करने के लिए इस समय सत्तारूढ़ यूनिफाइड लेनिनिस्ट-मार्कसिस्ट पार्टी (यूएलएम) के कार्यकर्ता दीनानाथ खनल नारायणघाट में बताते हैं कि नेपाल के पहले राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति भारतीय मूल के ही थे. वे कहते हैं, ‘राजतंत्र जाने के बाद सरकार और अन्य क्षेत्रों में मधेसियों का प्रतिनिधित्व बढ़ा है. हां, अब भी बहुत सी समस्याएं हैं, पर उन्हें धीरे-धीरे बातचीत के द्वारा सुलझाया जा सकता है.’
नाकाबंदीः भारत की ओर से ये नाकाबंदी पहली बार नहीं की गई है. 1989 में भी भारत ने तकरीबन सालभर तक नाकाबंदी की थी
हालिया एक घटना ने भी भारत की छवि को गलत तरीके से सामने रखा है. भारत और चीन के बीच 15 मई को हुए लिपू-लेख व्यापारिक समझौते पर नेपाल में कड़ा विरोध जताया गया. लिपू-लेख दर्रा नेपाल चीन और भारत, तीनों की सीमा से सटा इलाका है, जो पश्चिमी नेपाल के कालापानी में आने वाला विवादित क्षेत्र है. नेपाल की संसदीय समिति ने अपने दोनों पड़ोसियों के बीच, नेपाल के सहमति के बिना हुए इस समझौते को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के विरुद्ध बताया है. इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा विरोध प्रचंड की यूनाइटेड कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) की ओर से हुआ. इसने भारत और चीन दोनों को ही इस समझौते को रद्द करने के लिए पत्र भी लिखे थे.
हमेशा से भारत का प्रयास इस पार्टी को सत्ता से बाहर रखने का रहा है. यहां तक कि संविधान बनने के बाद नेपाल में सरकार बनाने को लेकर तीनों बड़े राजनीतिक दलों के बीच आपसी समझ को भी तोड़ने को कोशिश की गई थी. तीनों दलों में ये सहमति बहुत पहले से ही बन चुकी थी कि संविधान आने के बाद संसदीय चुनावों तक सुशील कोइराला की जगह केपी ओली प्रधानमंत्री बनेंगे. आखिरी वक्त पर सुशील कोइराला ने इस बात का विरोध किया पर अपनी ही पार्टी के नेताओं के दबाव में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. तब भारत ने अपना आखिरी दांव खेला, उसने नेपाल में जरूरी सामान और ईंधन की आपूर्ति पर रोक लगा दी.
काठमांडू और पोखरा जैसे शहर पूरी तरह से पर्यटन पर निर्भर हैं. पर इस साल यहां बमुश्किल ही पर्यटक दिखाई दे रहे हैं. काठमांडू में बिताए दो दिनों में हमने शायद ही वहां कोई विदेशी पर्यटक देखा हो. सुनधारा के चाइना बाजार में जूतों की दुकान चलाने वाले युबराज घिमिरे का दावा है कि इस साल नेपाल आने पर्यटकों की संख्या में 50 प्रतिशत से ज्यादा गिरावट आई है. दिसंबर में ‘पीक सीजन’ के कारण उन्हें अच्छा बिजनेस होने की उम्मीद थी पर पर्यटक हैं ही नहीं. वे कहते हैं, ‘जो यहां आने की हिम्मत कर भी रहे हैं, वो यहां अभाव की स्थितियों के कारण ज्यादा समय तक नहीं रुक रहे हैं.’ उनकी इस बात की पुष्टि हमारी स्थिति ही कर देती है. हमने काठमांडू में तीन दिन रुकने की सोची थी पर हमारे रिकॉर्डर चार्ज नहीं थे, मोबाइल फोन और कैमरे में बैटरी नहीं थी इसलिए हम वहां दो दिन भी नहीं रुक सके. युबराज बताते हैं, ‘पर्यटक यहां आराम करने आते हैं, पर इस समय जो स्थितियां हैं उसमें वे यहां आने से बच रहे हैं.’ पिछले साल इस समय उन्होंने हर दिन 50 से 60 हजार तक के जूते बेचे थे पर इस बार बिक्री 10 से 15 हजार पर आ गई है.
न्यू रोड ट्रेड फेडरेशन के महेंद्र नौपाने बताते हैं, ‘ज्यादातर पर्यटक भारत के रास्ते ही नेपाल आते हैं, पर सीमा पर चल रही अशांति के चलते कोई नेपाल आने का साहस ही नहीं कर पा रहा है.’ इस फेडरेशन में लगभग 600 सदस्य हैं. वे सभी उम्मीद करते हैं कि सीमा पर ये नाकाबंदी जल्द ही खत्म होगी और चीजें पहले जैसी हो जाएंगी.
‘इस समय जो स्थितियां हैं उसमें पर्यटक नेपाल आने से बच रहे हैं. इस साल यहां आने पर्यटकों की संख्या में 50 प्रतिशत से ज्यादा गिरावट आई है’
स्मृति सेंट मैरी स्कूल की नवीं कक्षा में पढ़ती हैं. वो बताती हैं, ‘स्कूल जाना मुश्किल हो गया है. बसें बुरी तरह भरी हुई हैं. लोग बसों की छतों पर बैठ कर सफर करने को मजबूर हैं. हमारी पढ़ाई इससे बुरी तरह से प्रभावित हो रही है.’ वर्तमान स्थिति पर यूनिसेफ ने चेताया है कि नेपाल में 2 लाख से ज्यादा भूकंप प्रभावित परिवार अब भी अस्थायी घरों में रह रहे हैं और जरूरी सामान और दवाइयों के इस अभाव की सबसे बुरी मार उन्हीं पर होगी. यूनिसेफ का कहना है, ‘नेपाल की 60 प्रतिशत दवाएं भारत से आती हैं. ऐसे में जीवनरक्षक दवाओं और वैक्सीन की कमी सर्दी के इस मौसम में बच्चों के लिए घातक साबित हो सकती है.’
नेपाल में चल रहे संकट की सबसे बड़ी शिकार नेपाली महिलाएं हैं. ग्लोबल रिस्क इनसाइट्स की एक रिपोर्ट कहती है, ‘संकट (खासकर प्राकृतिक आपदा या आर्थिक मंदी) के समय महिलाएं और बच्चे सबसे ज्यादा जोखिम में होते हैं. महिलाओं पर वैसे ही बाहर के काम, बच्चों की देखभाल, पानी की व्यवस्था और घरेलू कामों जैसी कई जिम्मेदारियां हैं, वे इस समय अपना ज्यादा समय जलाने के लिए लकड़ी ढूंढने और कुकिंग गैस के लिए लगी लंबी कतारों में बिता रही हैं. ईंधन की इस कमी का बोझ सबसे ज्यादा नेपाली महिलाओं पर ही पड़ा है, चाहे वो शारीरिक हो या मानसिक.’
वैसे ये पहली बार नहीं है जब भारत की ओर से ऐसा कोई प्रतिबंध लगाया गया है. 1989 में भी भारत ने तकरीबन साल भर के लिए सीमा पर नाकाबंदी की थी, पर उस समय लोग भारत से आने वाले ईंधन पर इतने निर्भर नहीं थे. लोगों ने जल्दी ही उस मुसीबत की घड़ी को भुला भी दिया था पर अब ऐसा नहीं हो पाएगा. आज के सोशल मीडिया और स्मार्टफोन के युग में युवा इस मुद्दे को लेकर बेहद संवेदनशील हैं. उनके दिलों में भारत-विरोधी भावनाएं घर कर गई हैं, जिन्हें निकट भविष्य में मिटा पाना मुश्किल होगा. पशुपतिनाथ मंदिर के रहवासी मनोज भट्ट कहते भी हैं, ‘हम इस समय को कभी नहीं भूल पाएंगे.’
वशिष्ठ नारायण सिंह बिहार में जदयू के प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद हैं. उन्हें वशिष्ठ बाबू या दादा कहकर पुकारा जाता है. वे लालू यादव के प्रिय हैं और नीतीश कुमार के भी विश्वासपात्र हैं. वे धाराप्रवाह बोलने के लिए जाने जाते हैं लेकिन 30 दिसंबर को वे अचानक बोलते-बोलते रुक गए और फिर संतुलित होते हुए बात को पूरा किया.
उस रोज वे बिहार में अपराध पर भाजपा द्वारा सरकार पर दागे जा रहे ताबड़तोड़ सवालों और राजद के मुखिया लालू प्रसाद द्वारा निर्देश देने के अंदाज में नीतीश को अपराध पर लगाम लगाने के लिए दी गई नसीहत के बाद अपनी बात रख रहे थे. वशिष्ठ नारायण सिंह एकसुर में कह रहे थे, ‘नीतीश सुशासन के लिए ही जाने जाते हैं, उनके सुशासन मॉडल से पूरा देश सीख ले रहा है. नीतीश के पहले बिहार में सामाजिक जकड़न का आलम था, नीतीश ने उससे पार पाया है. इसलिए सुशासन के मसले पर हमें, हमारे दल या नीतीश को, किसी को भी नसीहत देने की जरूरत नहीं.’ इतना बोलने के बाद वे रुक गए और फिर ‘खासकर भाजपा और उसके कुनबे को नसीहत देने की जरूरत नहीं’ कहकर अपनी बात खत्म की.
वशिष्ठ नारायण सिंह लालू प्रसाद द्वारा अपराध नियंत्रण के बहाने सुशासन कायम करने के लिए नीतीश को दी गई नसीहत का जवाब देते हुए लालू पर निशाना साध गए. फिर उन्हें लगा कि वे ज्यादा बोल गए और उन्होंने भाजपा वाली बात जोड़कर बयान को संतुलित करने की कोशिश की कि वे नीतीश को नसीहत न दे. अगले दिन इस बयान को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी यह कहकर संतुलित करने की कोशिश की कि लालू प्रसाद यादव सही कह रहे हैं, सुशासन कायम करना हमारी पहली प्राथमिकता है, हम वैसा करेंगे.
दो इंजीनियरों की हत्या के बाद से नीतीश के लिए बड़ी चुनौती यह साबित करने की है कि लालू या राजद के साथ जाने से उनके कामकाज पर कोई फर्क नहीं पड़ा है
खैर, नीतीश कुमार और वशिष्ठ नारायण सिंह ने जिस तरह की समझदारी दिखाई वैसी जदयू व राजद के दूसरे नेता नहीं दिखा पाए. वे सीधे-सीधे भिड़ गए. ऐसा लगा मानो वे भूल गए हों कि अब वे पिछले एक दशक की तरह एक-दूसरे के जानी दुश्मन नहीं बल्कि जिगरी दोस्त बन चुके हैं. दोनों दल साथ मिलकर बिहार की सरकार चला रहे हैं. सबसे बड़ी भिड़ंत राजद के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह और जदयू के प्रवक्ता संजय कुमार सिंह के बीच हुई. रघुवंश प्रसाद ने कहा कि बिहार में सरकार के 41 दिन हो गए हैं और काम के नाम पर पासिंग मार्क देने की भी स्थिति नहीं. उन्होंने यह भी कह डाला कि जनता जानती है कि सरकार चलाने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री की होती है इसलिए वह अपराध पर नियंत्रण करें. रघुवंश प्रसाद ने सरकार के साथ सीधे-सीधे नीतीश को भी निशाने पर लिया तो जदयू की ओर से प्रवक्ता संजय प्रसाद सिंह ने जवाब देते हुए कहा कि रघुवंश प्रसाद सिंह सठिया गए हैं. लोकसभा चुनाव में रमा सिंह से हारने के बाद औकात का अंदाजा हो गया है इसलिए उनके दिमाग पर असर हुआ है और वे डिरेल्ड हो गए हैं.
इस बहस से मामला गरम हो गया तो लालू प्रसाद बीच-बचाव में उतरे. उन्होंने रघुवंश प्रसाद सिंह को तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उन्होंने जदयू प्रवक्ता संजय सिंह को सार्वजनिक तौर पर डपटते हुए कहा कि महानुभाव नेता, विशेषकर प्रवक्ता, जो अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए अल-बल बोलते रहते हैं, वे परहेज करें और बोलना नहीं आता तो अपने घर में सोएं. लालू प्रसाद ने संजय सिंह को नसीहत देकर यह भी कहा कि आपस में झगड़ रहे नेताओं को मालूम नहीं है कि भाजपा वाले इससे कितने खुश हो रहे हैं.
लालू प्रसाद की यह चिंता वाजिब भी थी, क्योंकि इस पूरे झगड़े का भाजपा ने भरपूर मजा लिया. भाजपा नेता सुशील मोदी हंसते हुए कहते हैं, ‘लोग देख ही रहे हैं कि बिहार में सुपर सीएम कौन है? नीतीश तो बस 14 मंत्रियों के मुख्यमंत्री हैं लेकिन लालू 16 मंत्रियों के साथ सुपर सीएम बने हुए हैं और वे रिमोट से सरकार चला रहे हैं. इसलिए बढ़ते हुए अपराध पर उन्होंने नीतीश को सलाह या सुझाव न देकर, आदेश जैसा दिया.’ भाजपा की ओर से मजा सिर्फ सुशील मोदी ने ही नहीं, कई और लोगों ने भी लिया.
कुछ दिनों बाद अब फिर से दोनों पक्षों में शांति है. नीतीश कुमार समीक्षा बैठक आदि कर फिर से सरकार को पटरी पर लाने की कोशिश में लग गए. वे चाह रहे हैं कि जनता का ध्यान बढ़ते अपराधों के मुद्दे से हटकर विकास की योजनाओं पर रहे लेकिन दरभंगा में दो इंजीनियरों की दिनदहाड़े हत्या और उसके तुरंत बाद पूर्णिया के बौंसी कांड ने राज्य में बढ़ते अपराध के संकेत दे दिए हैं. बौंसी में जो कुछ भी हुआ उसे पश्चिम बंगाल के मालदा में हुई घटना का विस्तार माना जा रहा है. बौंसी में एक संप्रदाय विशेष के लोगों ने धार्मिक आधार पर थाने को आग के हवाले किया और जमकर उत्पात मचाया. संभव है कुछ दिनों बाद इस मामले पर बातचीत बंद हो जाए, लेकिन दो इंजीनियरों की हत्या का मामला इतनी जल्दी दब जाएगा, इसके आसार नहीं दिख रहे. यह मामला अभी चर्चा का विषय है. नीतीश कुमार की लाख कोशिशों के बावजूद इस पर बहस बंद नहीं होने वाली, क्योंकि दरभंगा की इस घटना के बाद बिहार में एक के बाद एक कई घटनाएं हुई. दरभंगा कांड के ठीक अगले दिन समस्तीपुर में एक डॉक्टर के यहां गोलीबारी और आरा-छपरा के बीच गंगा नदी पर बन रहे पुल को नक्सलियों द्वारा लेवी (धन उगाही) के लिए उड़ाने की कोशिश जैसी घटनाएं भी हुईं. इन घटनाओं का सार ये है कि बिहार में सुशासन की लय लड़खड़ा गई है.
दरभंगा की घटना को लेकर नीतीश कुमार और उनके सुशासन के मॉडल को क्यों कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, इसे समझने की जरूरत है. दरभंगा में एक निर्माण कंपनी के दो इंजीनियरों को संतोष झा गिरोह के सरगना मुकेश पाठक ने रंगदारी नहीं देने के आरोप में दिनदहाड़े गोलियों से भून डाला. इस हत्या के बाद निर्माण कंपनी चड्ढा एंड चड्ढा ने साफ कह दिया था कि वह ऐसे हालात में काम करने को तैयार नहीं और अगर काम करना है तो फिर सरकार त्रिस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था का इंतजाम करे. सरकार आननफानन में राजी हो गई. सरकार के पास दूसरा रास्ता नहीं था, क्योंकि बात सिर्फ एक दरभंगा कांड या चड्ढा एंड चड्ढा कंपनी की नहीं थी. यह कंपनी बिहार के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस कंपनी के साथ बिहार सरकार ने 123 किलोमीटर सड़क निर्माण का करार किया है, जो 725 करोड़ रुपये का है.
वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर कहते हैं, ‘दरभंगा मामले को सिर्फ दरभंगा कांड के नजरिये से देखे जाने की जरूरत नहीं है. सरकार अगर कंपनी को सुरक्षा व्यवस्था दे भी देती है तो भी भविष्य में ऐसी घटनाओं पर नकेल कस पाना संभव नहीं होगा. पहली बात तो यह कि चड्ढा एंड चड्ढा कंपनी को तो यह सुरक्षा मिल गई लेकिन बिहार में सभी कंपनियों को यह सुरक्षा मिलना संभव नहीं.’ वह आगे कहते हैं, ‘दरभंगा कांड तो साफ-तौर पर राज्य पुलिस की नाकामी का मामला है. दरभंगा में जिस संतोष झा गिरोह ने इस वारदात को अंजाम दिया, उसके बारे में सब जानते हैं कि उसका मन आज किसने इतना बढ़ाया है! वह साधारण अपराधी था, बाद में रंगदारी वसूलने वाले गिरोह का सरगना बन गया. वह 2012 में रांची से पकड़ा गया था. उसका गुर्गा मुकेश पाठक भी पकड़ा गया था. हालांकि कुछ महीनों में ही संतोष जेल से भागने में सफल हो गया था. यह सब जानते हैं कि वह सफल नहीं हुआ था बल्कि पुलिस ने ही उसके भागने की योजना को सफल होने दिया था.’ उसके गुर्गे मुकेश के जेल से भागने की कहानी और दिलचस्प है. वह जेल में शादी करने के बाद पुलिसवालों को मिठाई खिलाकर बड़े आराम से भाग निकला था.
ज्ञानेश्वर कहते हैं, ‘दरभंगा कांड के बहाने कुछ खास बातों पर गौर करने की जरूरत है. सरकार जिस कंपनी के दो इंजीनियरों के मारे जाने पर सक्रिय हुई है, उस कंपनी के कर्मचारियों पर खतरा पहले से ही था. पिछले ढाई माह से उन्हें रंगदारी के लिए धमकाया जा रहा था. पुलिस ने कर्मचारियों को सुरक्षा भी दे रखी थी लेकिन जिस दिन उनकी सुरक्षा हटी उसी दिन दोनों इंजीनियरों की हत्या कर दी गई. अब सवाल ये है कि आखिर सुरक्षा हटते ही अपराधियों को इसकी खबर कैसे लग गई?’
दरभंगा कांड के बाद राज्य की कानून व्यवस्था पर ढेरों सवाल उठाए जाने लगे हैं. दरभंगा कांड के पहले शिवहर जिले के एक गांव मेंे विद्युतीकरण में लगी एक कंपनी के सुपरवाइजर की भी हत्या हुई थी. वह बात दब गई. अब शिवहर के इलाके में उस पर बात शुरू हो गई है. जिस दरभंगा कांड में संतोष झा और मुकेश पाठक का नाम सामने आया है उनके बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने नया क्या किया है! जेल में रहते हुए संतोष ने मुकेश के जरिये सीतामढ़ी, शिवहर, मोतिहारी, बेतिया, गोपालगंज और मुजफ्फरपुर के इलाकों में रंगदारी के लिए लगातार आतंक मचा ही रखा था. क्या पुलिस उसके आतंक से अनजान थी? अगर अनजान नहीं थी तो फिर चुप्पी क्यों साधे रही! अब बिहार में इस बात का डर फैलता जा रहा है कि मुकेश या संतोष झा गिरोह पर कोई कार्रवाई नहीं होगी तो साफ है कि वह बिहार के तमाम हिस्सों में रंगदारी वसूलने का काम जारी रखेगा. इसे दूसरे छोटे-छोटे अपराधी, जो वर्षों से खामोश रहे हैं, उन्हें भी सिर उठाने का मौका मिल जाएगा.
इसी आशंका के चलते नीतीश कुमार दरभंगा कांड के बाद से परेशान हैं. वे इतने तनाव में हैं कि उन्होंने पुलिसवालों को सार्वजनिक तौर पर फटकार लगाई. नीतीश कुमार को इन स्थितियों से गंभीरता से जूझना होगा, क्योंकि अब कानून-व्यवस्था बनाने के साथ ही उनके लिए एक बड़ी चुनौती यह साबित करने की भी है कि लालू या राजद के साथ जाने से उनके कामकाज पर कोई फर्क नहीं पड़ा है. वे सुशासन के मॉडल हैं और बने रहेंगे. नीतीश कुमार को यह भी मालूम है कि वे कुछ सालों पहले तक जिस तरह बड़ी से बड़ी घटनाओं पर चुप्पी साधे रहते थे, अब वैसा नहीं चलेगा.
ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद पटना में हुए बवाल से लेकर फारबिसगंज के भजनपुर में पुलिस द्वारा अल्पसंख्यकों के मारे जाने और नवरंगिया में पुलिस फायरिंग से आदिवासियों की मौत जैसी घटनाओं से नीतीश ने मौन साधकर पार पा लिया था क्योंकि तब विपक्ष में राजद हुआ करती थी जो ताकतवर नहीं थी. अब विपक्ष में नीतीश कुमार के साथ करीब नौ साल तक सत्ता में सहभागी रही भाजपा है और वह राजद की तरह संख्या में कम नहीं हैं यानी अब विपक्ष के हालात बदल गए हैं. भाजपा जो कर रही है या करेगी वह ज्यादा परेशानी का सबब नहीं है, क्योंकि भाजपा विपक्ष में है, उसका काम ही सरकार को घेरना है, लेकिन लालू प्रसाद और उनके दल की ओर से उठाए गए सवाल नीतीश को ज्यादा परेशान करने लगे हैं.
बिहार के राजनीतिक जानकार बता रहे हैं कि अभी तो अपराध के मामले पर दोनों के बीच टकराव या एक दल ने दूसरे दल को औकात बताने की शुरुआत की है. अभी तो ऐसे कई मौके आने वाले हैं, जिसमें नीतीश कुमार को भाजपा से ज्यादा राजद से परेशान होना होगा. जब-जब नीतीश-लालू के बीच मतभेद होगा या दोनों एक-दूसरे के विपरीत जाकर बात या व्यवहार करेंगे, उनके नेता-कार्यकर्ता एक-दूसरे से भिड़ने में लग जाएंगे. जानकार जो अनुमान लगा रहे हैं, वह गलत भी नहीं है. नीतीश और लालू के बीच कई ऐसे मसले होंगे, जिन पर दोनों के बीच मतभेद होगा और जिससे टकराव की स्थितियां बनेंगी. अभी तो नीतीश कुमार के दो महत्वपूर्ण फैसलों पर ही लालू प्रसाद या उनकी पार्टी से टकराव होना संभावित है. एक फैसला शराबबंदी का है, दूसरा पंचायत चुनाव में घर में शौचालय वाले व्यक्ति को ही चुनाव योग्य घोषित करने का. पिछले महीने नीतीश कुमार ने जोर-शोर से शराबबंदी की घोषणा की थी. इस निर्णय से पलटते हुए उन्होंने कहा कि पूर्णतया शराबबंदी की बजाय बिहार में देसी शराब की बिक्री बंद होने वाली है. जाहिर सी बात है, लालू प्रसाद समय आने पर नीतीश के इस फैसले का विरोध करेंगे. एक तो लालू शुरू से ही देसी शराब की बंदी के पक्ष में कभी नहीं रहे हैं और देसी शराब बंद कर सिर्फ विदेशी बेचने देने की इजाजत का राजनीतिक असर भी लालू प्रसाद जानते हैं. वे जानते हैं कि इससे उनके कोर वोटर ही सबसे ज्यादा नाराज होंगे. पंचायत चुनाव में भी जिस तरह से नीतीश कुमार ने सिर्फ घर में शौचालय रखने वालों के ही चुनाव लड़ने की बात कही है, देर-सबेर लालू प्रसाद उसका भी विरोध करेंगे क्योंकि नीतीश के इस फैसले से जो भी लोग चुनाव लड़ने से वंचित हो जाएंगे, वे लालू के कोर वोटर न भी हों तो भी वे उनके राजनीति करने के लिए एक बड़ी जमीन जरूर मुहैया कराते हैं. एक मतभेद पठानकोट एयरबेस पर हुए आतंकी हमले के बाद भी देखने को मिला. लालू प्रसाद ने जहां इस घटना के लिए सीधे नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा तो दूसरी ओर नीतीश कुमार ने मोदी की तारीफ की कि वे पाकिस्तान से बातचीत करने की दिशा में आगे बढ़े हैं तो बढ़ना चाहिए, यह अच्छी शुरुआत होगी. वैसे तो दोनों ही नेता किसी भी घटना पर अपनी राय रखने के लिए स्वतंत्र हैं पर मोदी विरोधी लालू को नीतीश का मोदी की प्रशंसा करना हजम होगा कि नहीं, ये देखने वाली बात है.
2005 से लेकर अगले चार साल में बिहार के अलग-अलग हिस्सों में 50 हजार अपराधियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए, सुनवाई हुई और कई नामचीन व छुटभैये अपराधी जेल गए
बिहार में आपसी पेंच फंसाने का जो खेल दिखने वाला है, वह कुछ माह बाद बिहार में होने वाले राज्यसभा चुनाव के दौरान भी दिखेगा. अगले छह महीने में राज्यसभा की पांच सीटें खाली हो रही हैं. दो सीटें राजद के हिस्से में आने वाली हैं. राजद में ज्यादा पेंच नहीं. लालू जिसे चाहेंगे, आसानी से भेज देंगे. इन पांच सीटों में नीतीश कुमार को दो सीटें तभी मिलेंगी, जब कांग्रेस साथ देगी. अगर कांग्रेस ने पेंच फंसा दिया तो नीतीश एक ही सांसद भेज पाएंगे, क्योंकि 40 विधायकों पर एक राज्यसभा सांसद भेजे जाने का मामला बनता है और चूंकि नीतीश कुमार 80 विधायकों की संख्या पूरा नहीं करते इसलिए उन्हें कांग्रेस पर आश्रित होना होगा. सूत्र बता रहे हैं कि लालू प्रसाद कांग्रेस को शह दे रहे हैं ताकि वह नीतीश को समर्थन देने की बजाय अपने दल से एक राज्यसभा सांसद भेजे और समर्थन देने के लिए नीतीश पर दबाव बनाए. कांग्रेस ऐसा कर भी सकती है, क्योंकि उसे वर्षों बाद 27 सीटें मिली हैं यानी भारी जीत. कांग्रेस अपने दल से बिहार कांग्रेस प्रभारी सीपी जोशी को बिहार से राज्यसभा भेजना चाहती है, लालू प्रसाद भी यही चाहते हैं. अभी दोनों के बीच ऐसे ही कई मसलों पर आपसी टकराव की स्थिति बनेगी और नीतीश के लिए यही परेशानी का सबब बनेगा, वरना जिस कानून व्यवस्था को बहाल करने की बात को लेकर नीतीश कुमार को एकबारगी से कमजोर प्रशासक बताया जाने लगा है, उस अपराध को नियंत्रित करके सुशासन स्थापित करने में वह एक्सपर्ट रहे हैं और वे कोशिश करेंगे तो आने वाले दिनों में बेपटरी हुई व्यवस्था पटरी पर आ भी जाएगी. इसकी उम्मीद नीतीश कुमार के शासन के इतिहास को देखकर की जा सकती है.
नीतीश कुमार दरभंगा कांड के बाद खुद सक्रिय हुए हैं, इसलिए यह उम्मीद और बढ़ गई है. उनके पुराने कार्यकाल बताते हैं कि नीतीश ने कैसे बिहार में अपराध को नियंत्रित किया था. 2005 में नीतीश कुमार जब सत्ता में थे, तब उन्होंने कानून व्यवस्था और सुशासन को ही प्राथमिकता में रखा था. न सिर्फ प्राथमिकता में रखा बल्कि इसे साबित करके भी दिखाया था. 2005 से लेकर अगले चार साल में बिहार के अलग-अलग हिस्सों में 50 हजार अपराधियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए. उन मुकदमों की सुनवाई तेज हुई थी. कई नामचीन और छुटभैये अपराधी जेल भेजे गए थे. नीतीश ने फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन कर देशभर में नाम कमाया और सुशासन के प्रतीक बन गए. कई सालों तक इसका असर रहा, बिहार में आपराधिक घटनाओं पर लगाम लगी लेकिन बाद के वर्षों में इसमें तेजी आई. अब आंकड़े बता रहे हैं कि 2008 से 2013 के बीच प्रतिवर्ष करीब 10 से 12 हजार अपराधियों को सजा सुनाकर जेल भेजा गया था. विगत दो सालों में यह आंकड़ा औसतन आठ हजार पर रुक गया है. ये आंकड़े बिहार के भयावह भविष्य के संकेत देते हैं. नीतीश और लालू के बीच तकरार शुरू होने की बात भी बेहतर राजनीतिक भविष्य की ओर संकेत नहीं देती लेकिन इन सबके बीच नीतीश कुमार के होने से यह उम्मीद जगती है कि वे शासन और राजनीति में माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं, इसलिए वे दोनों को साध लेंगे.
मैं और नेशनल कैपिटल टेरिटरी क्रिकेट एसोसिएशन (एनसीटी) पिछले कई सालों से दिल्ली डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) में हो रही धोखाधड़ी की जांच कर रहे हैं. इस दौरान जिस बात ने हमें सबसे ज्यादा चौंकाया वो ये थी कि किस तरह बहुत आसानी से साल दर साल वही अधिकारी दफ्तरों में बने रहे. हम मैनेजमेंट और कुछ अफसरों (जो डीडीसीए की कार्यकारी समिति के चुनावों में गड़बड़ी के उद्देश्य से काम कर रहे थे) द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार आवाज उठाते रहे थे पर इसका कोई फायदा नहीं हुआ.
अभी पिछले दिनों मैंने जो सीडी जारी की है, उसमें साफ दिखाया गया है कि डीडीसीए की कार्यकारी समिति के ये चुनाव कितने हास्यास्पद हैं. इतना कपट तो शायद पाकिस्तान या अफ्रीकी देशों के तानाशाहों ने नहीं किया होगा! डीडीसीए कम्पनीज एक्ट, 1956 के सेक्शन 25 के तहत बनी एक लाइसेंसशुदा कंपनी है, जिसका मूल आधार लाइसेंस की सेवा शर्तें हैं, जिन्हें एक मेमोरेंडम के रूप में दर्ज किया गया है. डीडीसीए की समिति के इस मेमोरेंडम ऑफ आर्टिकल्स का अनुच्छेद 37 चुनावों में प्रॉक्सी वोटिंग को अनुमति देता है. यह कम्पनीज एक्ट, 1956 के सेक्शन 176 और कम्पनीज एक्ट, 2013 के सेक्शन 105 से मेल खाता है. यह अनुच्छेद कंपनी के किसी भी सदस्य को कंपनी की किसी मीटिंग में भाग लेने और वोट करने का अधिकार देता है, साथ ही उन्हें ये अधिकार भी मिलता है कि वे किसी भी अन्य व्यक्ति (भले ही वो कंपनी का सदस्य हो या न हो) को प्रॉक्सी के बतौर चुन सकते हैं. यह व्यक्ति उनकी जगह मीटिंग में भाग ले सकता है और वोट भी दे सकता है. यहां साफ कहा गया है कि अपनी ओर से प्रॉक्सी नियुक्त करने वाले व्यक्ति को नियुक्त किए जाने वाले व्यक्ति विशेष का नाम देते हुए उसे मीटिंग में भाग लेने और वोट करने के लिए अधिकृत करना होगा यानी एक प्रॉक्सी फॉर्म भरकर ये जानकारी एसोसिएशन में देनी होगी.
कम्पनीज एक्ट, 1956 में उल्लिखित इसी नियम का दुरुपयोग डीडीसीए में हुआ है. इस नियम, जिसे इसलिए बनाया गया था कि ज्यादा से ज्यादा सदस्य मीटिंग में भाग लेकर किसी भी प्रस्ताव के पक्ष या विपक्ष में वोट कर सकें, का अनुचित उपयोग करके ही डीडीसीए के कुछ सदस्य लगभग 35 सालों से डीडीसीए में बने हुए हैं. कुछ सदस्यों ने एग्जीक्यूटिव कमेटी के सदस्य, जो फ्री पास या मुफ्त की चीजें बांटने के अनैतिक काम में संलिप्त थे, को लुभाकर कोरे प्रॉक्सी फॉर्म जारी करवाए. इन फॉर्म पर सिवाय उस सदस्य के दस्तखत के कोई भी जानकारी नहीं थी कि उस सदस्य ने किस व्यक्ति को प्रॉक्सी नियुक्त किया है.
इन प्रॉक्सी फॉर्म का दुरुपयोग तब हुआ जब खाली फॉर्म लेने के बाद उसमें प्रॉक्सी होल्डर का नाम भरकर उस सदस्य द्वारा फॉर्म जमा करवाया गया. उदाहरण से समझिए. 2011-12 में एग्जीक्यूटिव कमेटी के गठन के लिए हुए चुनावों के समय अपने नाम पर सीके खन्ना ने 864, एसपी बंसल ने 130, अरुण जेटली ने 164, राकेश बंसल ने 612, रवि जैन ने 213, विवेक गुप्ता ने 143, रविंदर मनचंदा ने 310, मंजीत सिंह ने 247, सुभाष शर्मा ने 109, एनके बत्रा ने 11, रजनीश अग्रवाल ने 102 और गंगा प्रसाद गुप्ता ने 210 प्रॉक्सी फॉर्म दायर किए थे. इन फॉर्म्स को देखने पर साफ पता चलता है कि हैंड राइटिंग, दस्तखत, प्रॉक्सी होल्डर के नाम का कॉलम और इन्हें जारी करने की तारीख कोई मेल नहीं खाते. साथ ही, सीके खन्ना द्वारा दायर किए 864 प्रॉक्सी फॉर्म पर प्रॉक्सी होल्डर में केवल उनका ही नाम लिखा है.
‘सीडी में साफ दिखता है कि डीडीसीए की कार्यकारी समिति के ये चुनाव कितने हास्यास्पद हैं. इतना कपट तो अफ्रीकी देशों के तानाशाहों ने नहीं किया होगा’
इलेक्शन ऑफिसर के द्वारा इन सभी सदस्यों द्वारा दायर किए गए प्रॉक्सी फॉर्म की छानबीन में ये बात सामने आई कि कई बार एक व्यक्ति विशेष ने संबंधित डीडीसीए सदस्य के दस्तखत के बिना ही, कोरे प्रॉक्सी फॉर्म दायर किए गए थे. 2012 में ऐसे 3 बार हुआ, वहीं 2013 में ऐसी 6 घटनाएं सामने आईं.
एसपी बंसल (जो पिछले 25 सालों से महासचिव थे) के भाई राकेश बंसल ने उनके नाम पर 612 प्रॉक्सी फॉर्म जमा किए. जांच में सामने आया कि किसी भी सदस्य ने प्रॉक्सी होल्डर का नाम नहीं भरा था, बस खाली फॉर्म जमा कर दिए गए थे जिन पर संबद्ध सदस्य के इतर किसी और व्यक्ति ने राकेश बंसल का नाम भरा था. सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह थी कि सभी 612 फॉर्म एक ही हैंड राइटिंग में हैं. यही समान तरीका सीके खन्ना, सुनील देव, स्नेह बंसल, मंजीत सिंह, विनोद गर्ग, रविंदर मनचंदा, गंगा प्रसाद गुप्ता और बाकियों ने भी अपनाया है. और तो और जमा किए गए 50 फीसदी से ज्यादा, लगभग 2,150 प्रॉक्सी फॉर्म केवल 5 सदस्यों स्नेह बंसल, राकेश बंसल, सीके खन्ना, सुनील देव और मंजीत सिंह द्वारा दायर किए गए थे. चुनावी प्रक्रिया का इससे बड़ा मजाक क्या होगा!
ये चुनाव भी, पिछले 35 सालों में हुए चुनावों की तरह भ्रष्टाचार की राह ही पर ही मुड़ा और डीडीसीए के चंद लोगों ने प्रॉक्सी सिस्टम का नाजायज फायदा उठाया. जब डीडीसीए के 99 प्रतिशत सदस्य दिल्ली के रहवासी हैं तो इस तरह लगातार प्रॉक्सी सिस्टम का अनुचित लाभ क्यों उठाया जा रहा है?
डीडीसीए में ऐसी कोई व्यवस्था भी नहीं है जहां सदस्यों से जुड़ी जानकारी दर्ज होती हो, जिसे समय-समय पर अपडेट किया जाता हो, जहां उनका पता और वर्तमान स्थिति दर्ज हो कि वे जीवित भी हैं या नहीं. ऐसी अनभिज्ञता की स्थिति में, जो इलेक्शन ऑफिसर इन सभी प्रॉक्सी फॉर्म को जांचने के लिए अधिकृत है, वो इस जानकारी और समय से अपडेट किए गए दस्तखत के अभाव में ऐसा करने में असमर्थ है. इन तथ्यों को जांचना कि प्रॉक्सी फॉर्म क्या उसी सदस्य द्वारा जारी किया गया है, या वह सदस्य जीवित भी है या नहीं, या फिर उस फॉर्म पर किए गए हस्ताक्षर रिकॉर्ड में दर्ज हस्ताक्षर से मिलते हैं कि नहीं, असंभव नहीं है. अगर हस्ताक्षर रिकॉर्ड से नहीं मिलते हैं तो प्रॉक्सी फॉर्म खारिज हो जाता है.
हालांकि आश्चर्यजनक बात ये है कि साल 2012 और 2013 में किसी ने भी नहीं देखा कि फॉर्म पर नाम गलत लिखे थे और जानकारी में कोई साम्य नहीं है. उस पर वे चाहते हैं कि मैं डीडीसीए के अफसरों की इस बात को मानलूं की लगभग 25 से ज्यादा प्रॉक्सी सदस्य 85 साल से ज्यादा उम्र के हैं. ऐसा लगता है कि डीडीसीए में जीवन प्रत्याशा (लाइफ एक्स्पेक्टेंसी) राष्ट्रीय स्तर से कुछ ज्यादा ही है!
2012 में इलेक्शन ऑफिसर द्वारा जारी किया गया डाटा बताता है कि डीडीसीए में 24 सदस्यों के दस्तखत का कोई रिकॉर्ड ही मौजूद नहीं है. इससे ही प्रॉक्सी में बरती गई अनियमितताओं और उसके अवैध प्रयोग की बात साफ हो जाती है. ये भी पाया गया कि कई सदस्यों ने अपने पते की जगह डीडीसीए के कई अफसरों के ही पते दर्ज किए हुए थे. साथ ही ये भी साफ है कि ये सदस्य अपना वार्षिक सदस्यता शुल्क भरना भी बंद कर चुके हैं और इनकी ये सदस्यता उनकी जगह फीस भर के, उनके पते की जगह अपना पता भर के हथिया ली गई है.
लोढ़ा कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद इस प्रॉक्सी सिस्टम, जिसका राजनीतिज्ञों ने पूरा दुरुपयोग किया, का खत्म होना लगभग तय है. मैं पूरी निष्ठा से चाहता हूं कि हम जल्द ही ज्यादा से ज्यादा पेशेवर प्रबंधकों और क्रिकेटर्स को लाने में सफल हों ताकि राज्यों की क्रिकेट एसोसिएशन और बीसीसीआई का काम सुचारु रूप से चल पाएं.
2013 में जेलर की हैसियत से बाराबंकी जेल में मेरी तैनाती हुई थी. रोजाना रात में मैं जेल की गश्त पर निकलता था. दिसंबर की उस रात की हाड़ कंपाती ठंड से बचने के लिए जेल का हर कैदी गुड़ी-मुड़ी होकर काले मोटे कंबलों की आगोश में था. जेल की बैरकें सींखचों से बनी होती हैं ताकि हर कैदी को बाहर से देखा जा सकता है. ठंडी हवा से बचाव के लिए इन्हें तीन से चार कंबल दिए जाते हैं.
उस रात गश्त करते हुए मेरी नजर एक बैरक के अंदर जाकर टिक गई. वहां एक आदमी मोटे ऊनी काले कंबल पर बिना कुछ ओढ़े औंधा लेटा हुआ था. बदन पर केवल एक बदरंग स्वेटर और कमर के नीचे पटरेवाला जांघिया था. इसके पहले कि मैं अपने साथ ड्यूटी पर चल रहे सिपाही से कुछ पूछता, वो मुझे हैरान देखकर खुद ही बोल पड़ा, ‘अरे! इ तो लोहा है साहब.’ तब तक बैरक के अंदर पहरा लगा रहा कैदी पहरेदार शफीक भी वहां आ गया और बोला, ‘अभी-अभी गिना साहब इस बैरक में सभी 59 कैदी ठीक-ठाक हैं.’ मैं नाराजगी से बोला, ‘ठीक-ठाक कहां सो रहे हैं सब, इस कैदी को तो ओढ़ने को कंबल भी नहीं मिला है शायद.’ ‘अरे नहीं सर! ये कभी कुछ नहीं ओढ़ता, इसे कई बार तीन-तीन कंबल दिए गए हैं, लेकिन हर बार ये उन्हें चौपत कर सिरहाने पर रख देता है. रात में कोई ओढ़ा भी दिया तो फिर फेंक देता है. इ अइसहिं रहता है सब दिन.’ शफीक बताता जा रहा था और मेरी हैरानी का कोई ठिकाना नहीं था, ‘अरे देखो! ठीक-ठाक है भी कि नहीं.’ ‘हां, सर बिल्कुल फिटफाट है.’
ये तसल्ली होने पर कि वह व्यक्ति जिसे सब लोहा बुलाते हैं, सकुशल है और बिना कुछ ओढ़े सोने के लिए उसने अपने जिस्म को ढाल रखा है, मैं आगे बढ़ गया और बैरक के दूसरे छोर पर शफीक को इशारे से बुलाकर पूछा, ‘यह कैदी ऐसे क्यों रहता है?’ शफीक ने बताना शुरू किया, ‘आप नए हैं न साहब, वरना इस कैदी को सभी जानते हैं. नंगे पैर, नंगे सिर, वनमानुष की तरह रहता है. अभी सुबह होने दीजिए, सबसे पहले उठकर नहा धोकर अलाव जलाकर रख देगा, जब तक सब कैदी तापेंगे तब तक लोहा झाड़ू लिए सारी बैरक, अहाता, नाली साफ करके रख देगा. इसके बाद पूरे दिन निराई, गुड़ाई करते खटता रहेगा. सफाई के लिए कोई और झाड़ू या कुदाल उठाता नहीं कि लोहा की आंखें उसे घूर कर ऐसा न करने की समझाइश दे देती हैं. बदन तो देख ही रहे हैं आप (लोहा की कद-काठी अच्छी खासी थी) लेकिन आज तक उसने किसी कैदी को कोई तकलीफ नहीं पहुंचाई. उल्टा बंदियों के बीमार होने पर उनकी पूरी सेवा करता है.’
आजीवन कारावास की सजा काट रहे लोहा से घरवाले यदा-कदा ही मिलने आते हैं. उसे न किसी ने कभी खुश देखा, न उदास
इस कहानी को जानकर लोहा की जिंदगी में मेरी दिलचस्पी बढ़ती ही जा रही थी. मैं गश्त खत्म कर घर आकर रजाई में लेट तो गया मगर मन अब भी लोहा और उसकी कहानी जानने के लिए बेचैन था. सुबह आॅफिस (जेल) पहुंचते ही सबसे पहले मैंने वो रजिस्टर मंगाया जिसमें बंदियों का समूचा ब्योरा दर्ज रहता है. लोहा का नाम रजिस्टर में भी लोहा ही दर्ज था-लोहा, पुत्र बृजकिशोर, उम्र 48 वर्ष, धारा 302 आईपीसी के तहत आजीवन कारावास की सजा से दंडित.
इसके बाद मैंने एक सिपाही से लोहा को बुला लाने को कहा. सुबह के वक्त नहाया धोया हुआ लोहा काले ग्रेनाइट के बुत की तरह चमक रहा था. आॅफिस में काम करने वाले राइटर ने उसके सामने ही बताना शुरू किया कि लोहा को अपने गांव के किसी आदमी की हत्या के जुर्म में आजीवन कारावास हुआ है. घरवाले यदा-कदा ही मिलने आते हैं, लेकिन लोहा उनसे भी केवल इशारों में बात करता है. घरवाले जो सामान उसे देते हैं, वह दूसरे बंदियों में बांट देता है. लोहा को न किसी ने कभी खुश देखा, न उदास, न रोते, न हंसते. उसे बस थक के चूर हो जाने तक किसी न किसी काम में खटते देखा गया था. बारहों मास दोनों समय नहाना. मैं लोहा के कंधे पर हाथ रखकर उससे बात करने की कोशिश कर रहा था. मगर लोहा मेरी आंखों में अपनी पथरीली आंखें धंसाए बिल्कुल बुत बना खड़ा रहा. मैंने उसकी ठुड्डी हाथ से ऊपरकर स्नेह से कहा, ‘लोहा! कुछ तो बोलो यार.’ जवाब में उसकी पथरीली आंखों से पिघलते हुए आंसू टप टप कर बहने लगे. कुछ बूंदें मेज के खुले पड़े उस रजिस्टर के पन्ने पर जा पड़ीं, जहां उसके जुर्म का ब्योरा दर्ज था. यह खराब न हो जाए, इस गरज से लोहा ने हाथ से तुरंत आंसू की वो बूंद पोंछ दी. यूं भी पश्चाताप के इन आंसुओं से कागज पर लिखी सख्त तहरीरें कहां पसीजनी थीं. उसने अतीत में जो भी किया है, लेकिन अब जब भी उसकी ओर देखता हूं तो उससे जिंदगी को लोहे की तरह जीने की हिम्मत लगातार मिलती है.
हर धर्म में कुरीतियां होती हैं. भारत का एक धर्म क्रिकेट भी है. इस धर्म में भी एक कुरीति है- सट्टेबाजी. भारत क्रिकेट में सट्टेबाजी का विश्व का सबसे बड़ा बाजार है. सट्टेबाजी के इस शास्त्र ने भारतीय क्रिकेट को कई ऐसे जख्म दिए हैं जो कभी भरे नहीं जा सकते. सट्टेबाजी पर यूं तो देश में कानूनन रोक है. घुड़दौड़, रमी और लॉटरी को छोड़ दिया जाए तो सट्टा अवैध है. फिर भी यह भीतरखाने धड़ल्ले से जारी है. सरकारी मशीनरी इसकी रोकथाम में विफल रही है. इसलिए क्रिकेट पर पड़ते इसके दुष्प्रभावों को देख समय-समय पर क्रिकेट सट्टेबाजी को वैध करने की मांग उठती रही है. लेकिन पहली बार यह मांग कानूनी हलकों से बाहर आ रही है. देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश आरएम लोढ़ा ने क्रिकेट सुधार पर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी है. इस तीन सदस्यीय लोढ़ा समिति ने क्रिकेट सट्टेबाजी को कानूनी बनाने की सिफारिश की है. लोढ़ा समिति ने कहा है, ‘क्रिकेट पर सट्टा कानूनी होगा तो खेल भ्रष्टाचार मुक्त होगा. सट्टे पर कानूनी निगरानी होने से कालेधन पर लगाम लगेगी. पारदर्शिता आएगी. खेल से हवाला रैकेट का सफाया होगा. देश को कर के रूप में मोटा राजस्व भी मिलेगा.’
दोहा की संस्था अंतर्राष्ट्रीय खेल सुरक्षा केंद्र (आईसीएसएस) के मुताबिक भारत में अवैध सट्टेबाजी का बाजार करीब दस लाख करोड़ रुपये का है. भारत जिस एकदिवसीय मैच में खेलता है, उस पर दुनियाभर में लगभग 1320 करोड़ रुपयेे दांव पर लगते हैं. पिछले दिनों ईडी के हवाले से भी खबर आई थी कि भारत में यूके की बैटफेयर डॉट कॉम 2010 से सक्रिय है. यह क्रिकेट पर सट्टा लगवाती है. इस वेबसाइट पर भारत की दस लाख आईडी से लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपये अवैध तौर पर भेजे गए हैं. इससे देश में क्रिकेट पर सट्टे का अर्थगणित समझा जा सकता है. कुछ मीडिया रिपोर्ट के अनुसार फिक्की भी मानता है कि क्रिकेट पर सट्टा वैध करने से भारत को सालाना 12 से 20 हजार करोड़ रुपयेे के राजस्व की प्राप्ति हो सकती है. इस मामले में ब्राजील का जिक्र करना जरूरी होगा. वहां फुटबाल के लिए ऐसी ही दीवानगी है जैसी भारत में क्रिकेट के लिए. वहां भी फुटबॉल पर सट्टा प्रतिबंधित है. लेकिन सरकार की डांवाडोल अर्थव्यवस्था को संभालने के विकल्प के तौर पर सट्टा वैध बनाने के प्रयास होते रहे हैं. इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि एक देश की पूरी अर्थव्यवस्था को संभालने की कूवत रखने वाले सट्टा बाजार में कितना पैसा हो सकता है.
क्रिकेट एक्सपर्ट आशीष शुक्ला कहते हैं, ‘सट्टा हम रोक नहीं पा रहे. यह गुप्त रूप से चलता रहेगा. अच्छा यही है कि इसे वैध कर दें. पर्दे के पीछे होने वाली चीजें फिर सामने तो आएंगी. यहां बहुत कालाधन है. लेकिन इससे मोटा राजस्व मिलेगा, इस पर शंका है. जो मोटा पैसा है वो 365 डॉट कॉम, बैटफेयर डॉट कॉम जैसी विदेशी वेबसाइटों पर ही जाएगा. क्योंकि बड़ा सट्टा कोई व्हाइट मनी से तो लगाएगा नहीं. ऐसा भी नहीं है कि पचास लाख लेकर दुकान पर पहुंच जाएं और कहें कि लगा दो मैच पर. बावजूद इसके कहूंगा कि यह एक सराहनीय पहल है. सट्टा समाज का हिस्सा बन चुका है इसे वैध करने में ही भलाई है.’
‘सट्टा मीठा जहर है. पहले आप छोटे दांव खेलकर जीतते हैं और फिर लालच में एक ही बड़े दांव में सब गंवा देते हैं. यह आपको पराश्रित कर देता है’
भारतीय क्रिकेटरों की बात करें तो वहां भी इस पर दो राय बनती दिख रही है. मनिंदर सिंह का कहना है, ‘कुछ सालों पहले मैंने भी देश में क्रिकेट सट्टा वैध करने की बात कही थी. फिर बाद में विचार आया कि वैध करने से भी कौन सा अवैध सट्टेबाजी रुक जाएगी. चेक से कौन सट्टा लगाना चाहेगा? बैंक से पैसा निकालकर कौन देगा? हम टैक्स चोरी में वैसे ही माहिर हैं. फिर सट्टा जीतने पर टैक्स चुकाना चाहेंगे? कोई व्यक्ति अपनी कमाई घर खर्च में दिखाना चाहेगा या जुए में? ऊपर से इस पैसे पर टैक्स भी ज्यादा लगता है.’
इसके परे अगर बात करें क्रिकेट सट्टे को देशभर में वैधता देने में आने वाली अड़चनों की तो इसे वैधता देना न तो बीसीसीआई के हाथ है और न ही सुप्रीम कोर्ट के. पब्लिक गैम्बलिंग एक्ट 1867 सट्टेबाजी पर प्रतिबंध लगाता है. सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला इसकी व्याख्या करते हुए खेलों को दो श्रेणी में बांटता है, कौशल वाले खेल (games of skills) और अवसर वाले खेल (games of Chance). कौशल वाले खेलों पर सट्टेबाजी की अनुमति है. फिलहाल घुड़दौड़ और रमी पर ही देश में सट्टा लगाया जाता है. इस लिहाज से तो क्रिकेट की दावेदारी मजबूत दिखती है, क्रिकेट में कौशल लगता है लेकिन सट्टा राज्यों का विषय है. कानून राज्य सरकारों को अधिकार देता है कि वे अपने यहां सट्टा या लॉटरी जैसी व्यवस्था को अनुमति दे या न दें. केरल, गोवा, सिक्किम और पंजाब सरकार ने ही वर्तमान में अपने यहां सट्टेबाजी को वैधता प्रदान कर रखी है. यहां रमी, घुड़दौड़ और लॉटरी पर सट्टे खेले जाते हैं लेकिन यहां पूरे देश में क्रिकेट सट्टे को वैधता देने की बात हो रही है. इसके लिए केंद्र सरकार की पहल जरूरी है. उसे गैम्बलिंग एक्ट पर पुनर्विचार करना होगा. पर इस मामले में पिछला अनुभव कड़वा रहा है. 2013 में जब आईपीएल सट्टेबाजी और स्पॉट फिक्सिंग कांड सामने आया था, तब भी यही मांग उठी. उस समय केंद्र में यूपीए की सरकार थी. कपिल सिब्बल कानून मंत्री थे. उन्होंने यह कहते हुए इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया था कि इससे समाज पर दुष्प्रभाव पड़ेंगे. जनता बाद में इसके लिए सरकार को कोसती नजर आएगी. इस आधार पर कह सकते हैं कि वर्तमान सरकार भी इस पर शायद ही ऐसा कोई जोखिम उठाए. देश के कानून मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा ने ऐसे संकेत भी दे दिए हैं. इकोनॉमिक्स टाइम्स को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा, ‘क्रिकेट पर सट्टेबाजी को वैध बनाने के बारे में तब सोचा जाए जब हम हर स्तर पर इसे रोक पाने में असमर्थ साबित हों. देश का वर्तमान कानून और सरकार सट्टेबाजी को खत्म करने में सक्षम है.’
आशीष शुक्ला कहते हैं, ‘पहली बात तो विधेयक ही आगे नहीं बढ़ेगा. इसका कड़ा विरोध किया जाएगा. कारण है कि सट्टेबाजी एक गुप्त रूप से चलने वाली गतिविधि है. समाज इसे इतनी आसानी से स्वीकार नहीं करेगा कि सब खुले में हो और सरकार जन भावना के खिलाफ जाएगी नहीं. यह कुछ-कुछ शराबबंदी वाली स्थिति है.’
सुप्रीम कोर्ट में वकील अशोक अग्रवाल कहते हैं, ‘सट्टा एक सामाजिक बुराई है. इसका अंत करने की जरूरत है न कि बढ़ावा देने की. इसने न जाने कितने ही घर बर्बाद किए हैं. ये एक बुरी लत बन जाती है.’
सोचा जाए तो बात सही भी जान पड़ती है. शेयर बाजार के वैध सट्टे में न जाने कितने ही लोग बर्बाद हो चुके हैं. कईयों ने तो स्वयं का जीवन ही समाप्त कर लिया. शेयर बाजार के एक सट्टा कारोबारी बताते हैं, ‘सट्टा मीठा जहर है. पहले आप छोटे-छोटे दांव खेलते हैं, जीतते हैं और फिर लालच में एक ही बड़े दांव में सब गंवा देते हैं. यह आपको एक तरह से पराश्रित कर देता है. आप काम पर ध्यान कम देते हैं. एक झटके में पैसा बनाने पर ज्यादा.
वर्तमान में कुछ ही देशों में खेलों पर सट्टेबाजी वैध है, इनमें यूके, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, अमेरिका के कुछ राज्य और यूरोप का कुछ भाग शामिल है. क्रिकेट पर सट्टेबाजी केवल यूके में होती है. अगर भारत में भी इसे मान्यता मिलती है तो लोगों का क्रिकेट देखने का नजरिया ही बदल जाएगा.
सट्टे की भाषा में कहा जाता है कि मैच की हर गेंद कीमत रखती है. क्रिकेट पर सट्टा वैध होने के बाद हर क्रिकेट प्रेमी हर गेंद की कीमत का आकलन करता नजर आएगा क्योंकि जिस देश में क्रिकेट धर्म हो, वहां इसके भक्त भला कैसे उससे जुड़े किसी उपक्रम से दूर रह सकते हैं.
‘ओवर की आखिरी गेंद… सचिन ने फाइन लेग की तरफ खेल दिया है … और इस एक रन के साथ ही सचिन का शतक पूरा..’
कमेंटटेर की आवाज के बीच अचानक से टीवी पर क्रिकेट प्रसारण रुक जाता है. फेयरनेस क्रीम का विज्ञापन आने लगता है. दो मिनट बाद प्रसारण शुरू होता है. सचिन नए ओवर की पहली गेंद खेल रहे होते हैं.
यह तो महज एक उदाहरण था. हम अक्सर टीवी पर क्रिकेट देखते समय ऐसी स्थिति से रूबरू होते ही रहते हैं. कभी-कभी तो ओवर की आखिरी गेंद फेंके जाने से पहले ही टीवी स्क्रीन पर विज्ञापन आ जाता है तो कभी ओवर की पहली गेंद देखने से चूक जाते हैं.
विज्ञापन क्रिकेट पर इतना हावी है कि यह खेल प्रसारण कंपनियों के लिए पैसा बनाने की मशीन बन गया है. केवल ब्रेक के ही दौरान विज्ञापन नहीं दिखाए जाते, प्रसारण के दौरान भी हर वक्त टीवी स्क्रीन पर विज्ञापन की पट्टी चलती रहती है. चौके-छक्के और विकेट के रिप्ले तक विज्ञापन के साथ दिखाए जाते हैं. इस कारण दर्शक कई ऐसे क्षण, जो एक दर्शक की भावनाओं को खेल से जोड़ते हैं, देखने से चूक जाते हैं.
विज्ञापनों के इस अर्थगणित के बीच पहली बार लोढ़ा समिति ने इस खेल से जुड़ी दर्शकों की भावनाओं की बात की है. समिति ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपी अपनी रिपोर्ट में विज्ञापन प्रसारण की गाइडलाइन तय की है. इसके अनुसार मैच के दौरान विज्ञापन केवल लंच और टी ब्रेक के समय ही दिखाए जाएंगे. अगर ऐसा होता है तो भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के लिहाज से यह एक ऐतिहासिक फैसला होगा, लेकिन बीसीसीआई का पूरा अर्थतंत्र गड़बड़ा जाएगा. बीसीसीआई के राजस्व के एक बहुत बड़े हिस्से का स्रोत टीवी प्रसारण अधिकार हैं. वर्तमान में साल में 650 करोड़ रुपये की कमाई वह इन्हें बेचकर करता है. 2018 तक यह अधिकार स्टार इंडिया के पास हैं. बीसीसीआई ने उसके साथ 2012 में 3,851 करोड़ रुपयेे का अनुबंध छह सालों के लिए किया था. वह एक मैच के प्रसारण का अमूमन 45 करोड़ रुपये बीसीसीआई को देता है. अगर लोढ़ा समिति की सिफारिशें मानने के लिए बीसीसीआई बाध्य होता है तो उसे स्टार इंडिया के साथ अपने अनुबंध को नए सिरे से करना होगा. उस स्थिति में बीसीसीआई को एक बड़ा आर्थिक नुकसान सहना पड़ सकता है. ब्रॉडकास्टिंग कंपनियों के अार्थिक गणित को समझें तो वह अपना पैसा विज्ञापन और चैनल की सब्सक्रिप्शन फीस के जरिए निकालती हैं. सब्सक्रिप्शन फीस मामूली होती है. लंच और टी ब्रेक के दौरान ज्यादा विज्ञापन चला नहीं सकते. दर्शक चैनल बदल देता है. इससे विज्ञापन से होने वाली उनकी कमाई न के बराबर हो जाएगी. इस स्थिति में वह अपनी सब्सक्रिप्शन फीस तो बढ़ा सकते है पर वह पर्याप्त नहीं होगी. यह भार बीसीसीआई पर ही आएगा और अनुबंध राशि में भारी कमी आएगी. ऐसे में बोर्ड प्रयास करेगा कि ऐसा संभव न हो.
क्रिकेट विशेषज्ञ आशीष शुक्ला कहते हैं, ‘नुकसान उठाना पड़ेगा लेकिन बोर्ड का अर्थ नहीं बिगड़ेगा. पर्याप्त धन है उसके पास. विश्व का सबसे धनी बोर्ड है. विश्व क्रिकेट के अर्थ में 70 फीसदी हिस्सा उसका है लेकिन विज्ञापन हटाना जनहित में है. इससे मैच का रोमांच बिगड़ता है. वैसे भी आईपीएल तो इससे मुक्त है, वहां से बनाइए पैसा.’ क्रिकेट प्रेमी सौरभ अरोड़ा कहते हैं, ‘खेल के दौरान कई ऐसे क्षण आते हैं जब आपकी भावनाएं चरम पर होती हैं. आप खेल से भावुकता की हद तक जुड़ जाते हैं लेकिन विज्ञापन का दखल आपकी भावनाओं का मजाक उड़ाता जान पड़ता है. हम भी देखना चाहते हैं कि दर्द से कराहता एक चोटिल खिलाड़ी देश के लिए मैदान पर डटे रहने का जज्बा कहां से और कैसे लाता है. ओवर समाप्ति के बाद वह अपने दर्द को नए ओवर की शुरुआत के पहले कैसे पी जाता है. आखिरी बॉल तक चलने वाले करीबी मुकाबलों में ब्रेक के दौरान खिलाड़ी कैसे रणनीति बनाते हैं. दबाव दूर भगाते हैं लेकिन अभी तो स्थिति यह है कि स्क्रीन पर चलने वाली विज्ञापन की पट्टी के कारण हम स्कोर ही नहीं देख पाते हैं. अब ऐसी सिफारिश की गई है तो इस पर अमल होना चाहिए.’ एक अन्य क्रिकेट प्रेमी राहुल काले कहते हैं, ‘हम दर्शक ही हैं जिनकी दीवानगी क्रिकेट को इतना लोकप्रिय बनाती है. इसी लोकप्रियता को बीसीसीआई पैसे के रूप में भुनाता है. पैसा देखने से पहले उसे दर्शकों की भावनाओं की कद्र करनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट का फैसला आए उससे पहले ही उसे विज्ञापन मुक्त प्रसारण की घोषणा कर देनी चाहिए.’ आशीष शुक्ला कहते हैं, ‘पैसे और प्रसारण का नेक्सस टूटना चाहिए. मैंने दूसरे देशों में भी रहकर क्रिकेट को फॉलो किया है. वहां निर्बाध प्रसारण होता है. विज्ञापन नहीं, खाली समय में भी क्रिकेट पर चर्चा होता है.’
बहरहाल अगर लोढ़ा समिति की इस सिफारिश पर अमल होता है तो देश में क्रिकेट के प्रसारण की तस्वीर ही बदल जाएगी. यह दूसरे खेलों के लिए भी नजीर साबित होगा. जहां तक बीसीसीआई को होने वाले आर्थिक नुकसान की बात है तो उसकी क्षतिपूर्ति लोढ़ा समिति की अन्य सिफारिशों से होती दिखती है. जैसे कि सदस्य राज्य संघों को आत्मनिर्भर बनकर अपने पास उपलब्ध संसाधनों से स्वयं ही राज्य में क्रिकेट के विकास के लिए पैसा जुटाने के प्रयास करने होंगे. इसके तरीके भी सुझाए गए हैं. इन सिफारिशों से बोर्ड द्वारा उन्हें दी जानी वाली वार्षिक अनुदान राशि में कमी आएगी. जिससे प्रसारण अधिकार से होने वाले घाटे की भरपाई हो सकती है.
‘जस्टिस लोढ़ा समिति की सिफारिशें देश में केवल क्रिकेट ही नहीं, अन्य खेलों के लिए भी नजीर पेश करने वाली हैं. जितनी गहराई में वे गए हैं, उतनी गहराई से भारतीय क्रिकेट का पोस्टमार्टम कभी नहीं हुआ’
ये शब्द पूर्व भारतीय क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी के हैं, जो क्रिकेट में सुधार को लेकर लोढ़ा समिति द्वारा पेश रिपोर्ट पर ‘तहलका’ से चर्चा करते हुए उन्होंने कहे.
इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग कांड ने भारतीय क्रिकेट में भूचाल ला दिया था. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पूर्व जस्टिस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था. समिति को क्रिकेट में सुधार की गुंजाइशें तलाशने का काम सौंपा गया था ताकि देश में ‘धर्म’ माने जाने वाले इस खेल को भ्रष्टाचारमुक्त बनाया जा सके. पिछले दिनों लोढ़ा समिति ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी है. 159 पृष्ठीय इस दस्तावेज में कई क्रांतिकारी सुझाव दिए गए हैं. अगर इन्हें लागू किया जाता है तो देश में क्रिकेट के एक नए युग की शुरुआत होगी और क्रिकेट के प्रशासन से लेकर प्रसारण तक की तस्वीर ही बदल जाएगी. यह रिपोर्ट समिति द्वारा क्रिकेट से किसी न किसी रूप में जुड़ाव रखने वाले 74 व्यक्तियों से चर्चा करने के बाद तैयार की गई है.
रिपोर्ट में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं. रिपोर्ट के हवाले से लोढ़ा समिति कहती है, ‘देश में क्रिकेट का कर्ता-धर्ता बीसीसीआई है पर वह हमेशा ही विवादों से घिरा रहता है. निर्णयों में पारदर्शिता और जबावदेही की कमी होती है. अपने पदाधिकारियों, कर्मचारियों और खिलाड़ियों के हितों के टकराव को बढ़ावा देने वाले कामों की अनदेखी की जाती है. चहेतों का दखल बोर्ड में बनाए रखने के लिए बार-बार नियम बदले जाते हैं. प्रभावी शिकायत तंत्र उपलब्ध नहीं है. गलत कार्यों के प्रति उदासीन रवैया अपनाकर रखा जाता है. सट्टेबाजी व मैच फिक्सिंग में खिलाड़ी और पदाधिकारी लिप्त पाए जाते हैं. बोर्ड सार्वजनिक इकाई है लेकिन कहा जाता है कि यहां कामकाज बंद दरवाजे या गुप्त रास्तों से होता है. वहीं न तो यह अपने फैसलों से प्रभावित होने वालों के प्रति जवाबदेह है और न ही इस खेल में सबसे ज्यादा हित रखने वाले प्रशंसकों के लिए. इसलिए इस खेल से प्यार करने वाले करोड़ों लोगों का विश्वास और जुनून दांव पर है.’
159 पृष्ठीय दस्तावेज में कई क्रांतिकारी सुझाव दिए गए हैं. अगर इन्हें लागू किया जाता है तो देश में क्रिकेट के एक नए युग की शुरुआत होगी
इन्हीं तथ्यों के आधार पर जो सिफारिशें लोढ़ा समिति ने की हैं, वे अक्सर विवादों में घिरे रहने वाले बीसीसीआई के ताबूत में आखिरी कील ठोकने जैसी हैं. सबसे पहले तो बोर्ड के अंदरूनी ढांचे पर ही प्रहार किया गया है. मंत्री और अफसरों की भागीदारी पर रोक लगाने की बात कही गई है. पदाधिकारियों की उम्र सीमा को अधिकतम 70 साल कर दिया गया है. कोई भी पदाधिकारी बोर्ड में नौ वर्ष से अधिक नहीं रह सकता है. नौ वर्ष का यह कार्यकाल भी उसे तीन चरणों में पूरा करना होगा, लगातार दूसरी बार उसका चुना जाना अवैध होगा. साथ ही बीसीसीआई का जो पदाधिकारी होगा, वो इस दौरान अपने राज्य की इकाई में कोई पद नहीं रख सकेगा. मतलब एक व्यक्ति एक वोट. इसके साथ ही सुझाव दिया गया है कि बोर्ड ‘एक राज्य-एक सदस्य-एक वोट’ की नीति पर चले. देश के सभी राज्यों में क्रिकेट बोर्ड हों और वही बीसीसीआई के पूर्ण सदस्य हों. सर्विस क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड, ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी और रेलवे स्पोर्ट्स प्रमोशन बोर्ड की पूर्ण सदस्यता समाप्त कर एसोसिएट सदस्य का दर्जा दिया जाए. समान नियम क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया और नेशनल क्रिकेट क्लब पर भी लागू हों.
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इससे यह तो स्पष्ट है कि अब कोई भी पदाधिकारी बोर्ड में स्थायी नहीं रहेगा. लंबे समय से बोर्ड में जमे रहकर अपना आर्थिक हित तलाशने वालों की बोर्ड से छुट्टी हो जाएगी. लेकिन एक व्यक्ति एक वोट का फैसला कितना असरकारक होगा, इस पर संशय है. लोढ़ा समिति का कहना है, ‘बोर्ड और अपने संबंधित राज्य संघ दोनों में पदाधिकारी होने पर व्यक्ति बोर्ड की शक्तियों का अनुचित लाभ उठाकर अपनी राज्य इकाई को फायदा पहुंचाता है, जिससे राज्य संघों के बीच असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. इसलिए यह नियम जरूरी है.’
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महिला क्रिकेट को मिलेगी आवाज
बोर्ड की कार्यसमिति में महिलाओं का अब तक कोई प्रतिनिधित्व नहीं रहा है. उनका घरेलू क्रिकेट सत्र केवल एक माह का ही होता है और न ही पुरुषों की तरह महिला क्रिकेटरों को बीसीसीआई कोई सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट देता है. क्रिकेट से उनकी नाममात्र की कमाई होती है. अन्य देशों में कॉन्ट्रैक्ट की व्यवस्था है. इन सब बातों को ध्यान में रख समिति ने बोर्ड में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की भी सिफारिश रखी है. महिला क्रिकेटरों की आवाज न दबे इसके लिए एक महिला क्रिकेट समिति के साथ महिला क्रिकेटर संघ बनाने की सिफारिश भी की गई है. साथ ही बोर्ड की अपेक्स काउंसिल में भी एक महिला सदस्य को रखा गया है. कुछ ऐसा ही प्रावधान विकलांग क्रिकेटरों के लिए भी किया गया है. उनके लिए भी विकलांग क्रिकेटर संघ व विकलांग क्रिकेट समिति की बात कही गई है. यह समिति देशभर में विभिन्न श्रेणी के विकलांगों द्वारा खेले जाने वाले क्रिकेट को एक संयुक्त मंच पर लेकर आएगी. फिलहाल विकलांग क्रिकेट को बोर्ड कितनी गंभीरता से लेता है इसे इस बात से ही समझा जा सकता है कि बीसीसीआई देश में क्रिकेट की कर्ता-धर्ता है लेकिन न तो उसकी वेबसाइट पर विकलांग क्रिकेट से संबंधित कोई जानकारी मिलती है और न ही कभी इसके कर्ता-धर्ता मीडिया में इस पर बात करते नजर आते हैं. [/box]
वर्तमान में बोर्ड अध्यक्ष शशांक मनोहर तीन वोट (एक कोई फैसला टाई होने पर) और अनुराग ठाकुर, अमिताभ चौधरी, अनिरूद्ध चौधरी, राजीव शुक्ला अपने पास दो-दो वोट का अधिकार रखते हैं. इस नियम के बाद सीधे तौर पर बोर्ड में इनके प्रभाव में कटौती हो जाएगी. लेकिन इस नियम में पूरी संभावना है कि इसका इलाज राज्य संघों में डमी उम्मीदवार को खड़ा करके किया जाएगा.
ऐसे कई राज्य और केंद्रशासित प्रदेश हैं, जो बीसीसीआई की सदस्यता तक से वंचित हैं. वहां क्रिकेट का कोई ढांचा नहीं है. क्या वहां प्रतिभाएं नहीं हैं?
वहीं ‘एक राज्य-एक सदस्य-एक वोट’ की नीति पर क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार (कैब) के सचिव और पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता आदित्य वर्मा का कहना है, ‘आगे बढ़ने का अधिकार सबका है. बीसीसीआई का वर्तमान ढांचा भेदभावपूर्ण है. एक तरफ तो महाराष्ट्र के पास बोर्ड में चार वोट का अधिकार है, गुजरात के पास तीन वोट हैं. तो दूसरी तरफ ऐसे कई राज्य और केंद्रशासित प्रदेश हैं, जिन्हें बीसीसीआई की सदस्यता तक प्राप्त नहीं है. वहां क्रिकेट का ढांचा तक नहीं है. क्या वहां प्रतिभाएं नहीं हैं?’ वहीं क्रिकेट एक्सपर्ट आशीष शुक्ला कहते हैं, ‘सर्विस, रेलवे और यूनिवर्सिटी के वोट चुनाव के वक्त अपने पक्ष में करना सबसे आसान होता है. मान लीजिए बोर्ड अध्यक्ष रेल मंत्री के करीबी हैं तो रेल मंत्री से सिफारिशी आवेदन लगवाकर रेलवे के वोट को प्रभावित कर दिया जाता है. यहां सौदेबाजी होती है.’
हालांकि असली विवाद तो महाराष्ट्र और गुजरात में खड़ा होगा. पूर्व भारतीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेटर मनिंदर सिंह कहते हैं, ‘महाराष्ट्र और गुजरात में तीन-तीन संघ हैं. तीनों बोर्ड के पूर्ण सदस्य हैं. तीनों घरेलू क्रिकेट में अपनी टीम उतारते हैं. यह सिफारिश लागू होने के बाद हर राज्य से दो संघों को अपनी पूर्ण सदस्यता छोड़नी होगी. हालांकि वे बोर्ड के एसोसिएट सदस्य बने रहेंगे लेकिन कौन छोड़ना चाहेगा अपनी पूर्ण सदस्यता! यहां बड़ा विवाद होगा. उसका निपटारा कैसे होगा, किसका वोटिंग अधिकार बरकरार रखा जाएगा? इस पर स्थिति साफ नहीं है.’ वैसे विशेषज्ञों का मानना है कि यह नीति देश में क्रिकेट की लोकप्रियता को बढ़ाने वाली साबित हो सकती है. इससे कई नए राज्यों में क्रिकेट का ढांचा खड़ा होगा और क्रिकेट का प्रसार देश के कोने-कोने तक हो जाएगा. उत्तर पूर्व भारत के राज्य जहां स्पोर्टिंग टैलेंट तो हैं पर खेल के लिए जरूरी संसाधन नहीं, वहां भी क्रिकेट अपनी पहुंच बना लेगा.
एक सिफारिश यह भी है कि बोर्ड खिलाड़ियों का एक संघ बनाए. पर यह पहली बार नहीं है जब खिलाड़ियों का संघ बनाने की बात उठी हो. इससे पहले भी कई पूर्व खिलाड़ियों ने संघ बनाने के प्रयास किए हैं पर बोर्ड उन्हें साम, दाम, दंड, भेद के सहारे कुचलता रहा है. पूर्व भारतीय खिलाड़ी अरुण लाल के अनुसार, ऐसा ही एक प्रयास कुछ वर्ष पहले भी हुआ था. कुछ पूर्व खिलाड़ियों ने मिलकर प्लेयर्स एसोसिएशन का गठन किया था, जिसके अध्यक्ष नवाब पटौदी थे और संस्थापक सदस्यों में सचिन तेंदुलकर, सौरभ गांगुली जैसे दिग्गज थे. लेकिन बीसीसीआई ने उसे मान्यता नहीं दी. मनिंदर सिंह बताते हैं, ‘हमारी परेशानी यही रही है कि बोर्ड को लगता है कि अगर खिलाड़ी संघ बन गया तो क्रिकेट पर उसका एकाधिकार समाप्त हो जाएगा. उसके समकक्ष खिलाड़ियों का एक ऐसा संगठन खड़ा हो जाएगा जो उसे चुनौती दे सकेगा. इसलिए जब भी ऐसे प्रयास हुए बोर्ड ने हमें किसी न किसी हथकंडे का प्रयोग कर इसे तोड़ दिया.’ वह आगे कहते हैं, ‘प्लेयर्स एसोसिएशन कोई समकक्ष संस्था नहीं होती. बोर्ड को यह समझना होगा. यह खिलाड़ियों और शासकों को जोड़ने की कड़ी है. कुछ इस तरह समझिए, अभी होता यह है कि साल के बीच बोर्ड को कभी भी खाली समय मिला वो कोई सीरीज फिक्स कर देता है. अब मान लीजिए अगर प्लेयर्स एसोसिएशन अस्तित्व में है तो खिलाड़ी उसके सामने अपनी बात रख सकते हैं. वे कह सकते हैं कि हम पर खेल का दबाव ज्यादा है और शरीर को आराम का मौका नहीं मिल रहा. एसोसिएशन बोर्ड पर दबाव डाल सकती है, लेकिन फिलहाल तो तानाशाही है. खिलाड़ियों को जैसे चाहे जोत लो.’ अरुण लाल कहते हैं, ‘अभी समिति ने केवल कोर्ट के समक्ष अपनी सिफारिशें रखी हैं. यह तय नहीं हुआ है कि खिलाड़ियों का संघ बन ही रहा है. यह तो भविष्य बताएगा कि क्या होता है.’ मनिंदर सिंह कहते हैं, ‘क्रिकेट एसोसिएशन बनती है तो खिलाड़ियों पर दबाव कम होगा और उनके खेल में भी सुधार आएगा.’ इससे उन खिलाड़ियों की भी आवाज बुलंद होगी जो आर्थिक तौर से क्रिकेट पर ही निर्भर हैं और बीसीआईआई के खिलाफ आवाज उठाने का जोखिम नहीं उठा पाते.
‘क्रिकेट जनता की धरोहर है. फिर जनता को उसके बारे में जानने का हक क्यों नहीं है? यह ताकतवर लोगों की जागीर नहीं है’
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लोकपाल की नियुक्ति से बोर्ड की कार्यप्रणाली में आएगा सुधार
रिपोर्ट में बोर्ड पदाधिकारियों, कर्मचारियों और खिलाड़ियों पर हितों के टकराव, सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग के मामले में नजर रखने के लिए एथिक्स ऑफिसर (नैतिक अधिकारी), निष्पक्ष चुनाव के लिए चुनाव अधिकारी और बोर्ड के आंतरिक मसलों को निपटाने के लिए एक लोकपाल की व्यवस्था की भी बात की गई है. इससे संभावना है कि हमेशा विवादों में घिरे रहने वाले बीसीसीआई की कार्यप्रणाली में सुधार आएगा. वर्तमान स्थिति यह है कि कई मामलों में बीसीसीआई देश के विभिन्न न्यायालयों में मुकदमे लड़ रहा है. इसके बाद उम्मीद है कि ऐसे मामलों मे कमी आ सकती है. साथ ही बोर्ड के वित्तीय लेन-देन पर नजर रखने के लिए कैग के अधिकारी की नियुक्ति की बात भी की गई है. यही संरचना बोर्ड के हर सदस्य संघ को भी अपनानी होगी. देखा गया है कि अधिकांश राज्य क्रिकेट इकाईयां विवादों की शिकार हैं, जिससे खेल और खिलाड़ियों का प्रदर्शन भी प्रभावित हो रहा है. बिहार, राजस्थान, पुडुचेरी के संघों का बोर्ड से विवाद बना हुआ है. दिल्ली क्रिकेट संघ अपने ही आंतरिक भ्रष्टाचार से जूझ रहा है. सिक्किम और छत्तीसगढ़ के संघ भी पूर्ण सदस्यता की मांग के लिए बोर्ड से जूझते ही रहते हैं. मणिपुर क्रिकेट संघ से भी बोर्ड के मधुर संबंध नहीं हैं. वहीं मैचों के आवंटन को लेकर भी विवाद होते रहते हैं. लोकपाल की नियुक्ति के बाद इस स्थिति में निश्चित रूप से सुधार होने की संभावना है. साथ ही आईपीएल की गवर्निंग काउंसिल में पारदर्शिता लाने इसका ढांचा बदला गया है. अब इसमें नौ सदस्य होंगे जिनमें से चार बोर्ड से बाहर के होंगे. [/box]
लोढ़ा समिति की सिफारिशों की लगभग सभी पूर्व खिलाड़ियों ने सराहना की है लेकिन एक मुद्दा है जिस पर मतभेद बना हुआ है. टीम के चयन में पारदर्शिता लाने और इसे भाई-भतीजेवाद से दूर रखने के लिए समिति ने राष्ट्रीय चयन समिति को पांच की जगह केवल तीन सदस्यों तक ही सीमित रखने को कहा है. पूर्व खिलाड़ियों का मानना है कि भारत ऑस्ट्रेलिया नहीं है जहां कुछ चुनिंदा टीमें ही घरेलू क्रिकेट में हैं. भारत में क्रिकेट का ढांचा बहुत बड़ा है. केवल तीन चयनकर्ता सक्षम नहीं होंगे कि वह देशभर के खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर नजर रख सकें. मध्य प्रदेश क्रिकेट संघ के अध्यक्ष व पूर्व राष्ट्रीय चयनकर्ता संजय जगदाले कहते हैं, ‘तीन चयनकर्ताओं का फॉर्मूला व्यावहारिक नहीं होगा. इससे उन पर आवश्यकता से अधिक दबाव होगा.’ मनिंदर सिंह भी कुछ ऐसा ही सोचते हैं. वह कहते हैं, ‘चयनकर्ता तो पांच ही होने चाहिए थे. हां, अच्छी बात यह है कि एक क्रिकेट टैलेंट समिति भी बना दी गई है जो देशभर से प्रतिभा खोजने का काम करेगी. इससे चयनकर्ताओं पर दबाव कम होगा.’ पर आशीष शुक्ला का कहना है, ‘कैसा दबाव? चयनकर्ता घंटेभर में टीम का चयन कर लेते हैं. सारे खिलाड़ी वही होते हैं. विवाद तो बस अपने-अपने जोन के चहेते खिलाड़ियों को तवज्जो देने पर होता है. अब चयन प्रभावी होगा.’
लेकिन बोर्ड का सबसे बड़ा सिरदर्द है सूचना का अधिकार कानून. जस्टिस लोढ़ा बोर्ड को इसके दायरे में लाना चाहते हैं. वैसे तो पहले भी बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे में लाने की बात उठती रही है लेकिन बोर्ड हमेशा इससे बचने का प्रयास करता रहा है. बोर्ड तर्क देता है कि वह एक स्वतंत्र संस्था है, जो सरकार से किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं करता इसलिए उसे इसके बाहर रखा जाना चाहिए. यह उसकी स्वायत्तता पर हमला होगा. लेकिन जस्टिस लोढ़ा इस पर अलग ही राय रखते हैं. उनका मानना है कि बोर्ड सार्वजनिक कार्यों का निर्वहन करता है. इसलिए लोगों को अधिकार है कि वह बोर्ड की गतिविधियों पर सवाल उठाए. आशीष शुक्ला कहते हैं, ‘क्रिकेट जनता की धरोहर है. फिर जनता को उसके बारे में जानने का हक क्यों नहीं है? यह ताकतवर लोगों की जागीर नहीं है. जो लोग विरोध कर रहे हैं वे सिर्फ संरक्षक हैं और संरक्षक भी इसलिए क्योंकि हम इस खेल को पसंद करते हैं.’ मनिंदर भी आरटीआई के तहत बोर्ड को लाने के समर्थन में हैं. लेकिन उन्हें इस बात का भी डर है कि कल को अगर टीम के चयन पर भी आरटीआई लगाई जाने लगी तो क्या होगा? लेकिन आदित्य वर्मा का कहना है, ‘टीम में चयन प्रदर्शन के आधार पर होता है और प्रदर्शन दिखता है.’ मनिंदर इससे इत्तेफाक नहीं रखते. वह कहते हैं, ‘प्रदर्शन एक तो वह होता है कि खिलाड़ी घरेलू क्रिकेट में रनों का पहाड़ खड़ा कर दे या विकेटों की झड़ी लगा दे. और एक वह होता है कि खिलाड़ी में माद्दा कितना है. वह विपरीत परिस्थितियों में कैसे खुद को ढालता है. कई बार देखा गया है कि घरेलू सत्र में सर्वाधिक रन बनाने और विकेट लेने वाले खिलाड़ी का चयन राष्ट्रीय टीम में नहीं होता, उससे आधे रन या विकेट वाले का हो जाता है. ऐसा सिर्फ इसलिए कि भले ही कम रन बनाए पर जिन हालातों में बनाए वे बहुत कठिन थे. अब कल को होगा ये कि अगर सत्र के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज, गेंदबाज या ऑलराउंडर का चयन टीम में नहीं होगा तो लगा दो आरटीआई. इस चयनकर्ताओं की जरूरत ही नहीं रह जाएगी. सिर्फ जिसके आंकड़े सबसे ज्यादा प्रभावित हों, उसे ही खिलाइए.’ आशीष शुक्ला भी ऐसी संभावना जताते हैं पर यह भी मानते हैं कि अगर किसी काम से दस बुराइयों का अंत हो रहा है और एक पनप रही है तो उस काम को करना चाहिए. वह कहते हैं, ‘आज बोर्ड में इतना गड़बड़ घोटाला है कि अगर इसे आरटीआई के दायरे में नहीं लाया गया तो देश में क्रिकेट सिर्फ पैसा बनाने का एक हथियार बनकर रह जाएगा.’ पर क्या बीसीसीआई इसके लिए राजी होगा?
‘बोर्ड में इतना गड़बड़-घोटाला है कि अगर इसे आरटीआई के दायरे में नहीं लाया गया तो देश में क्रिकेट पैसा बनाने का हथियार बनकर रह जाएगा’
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कुछ अन्य सिफारिशें
राष्ट्रीय चयन समिति का हिस्सा केवल वही खिलाड़ी होंगे जिन्होंने टेस्ट मैचों में देश का प्रतिनिधित्व किया है.
टीवी पर मैच के प्रसारण के दौरान केवल ड्रिंक/टी ब्रेक और लंच ब्रेक के दौरान ही विज्ञापन दिखाए जाएंगे. साथ ही पूरी टीवी स्क्रीन पर मैच का प्रसारण ही होगा. कोई विज्ञापन नहीं दिखाया जाएगा.
आईपीएल और बीसीसीआई के संचालन के लिए अलग-अलग तंत्र होगा.
खिलाड़ियों को आराम देने के लिए आईपीएल के सत्र और राष्ट्रीय कैलेंडर में 15 दिन का अंतराल रखना होगा.
खिलाड़ियों के एजेंटों का पंजीकरण करना होगा.
कमेंटेटर के साथ होने वाले अनुबंध से बोर्ड को वह शर्त हटानी होगी जो उन्हें बोर्ड की नीतियों की आलोचना से रोकती है.
बोर्ड से संबंधित हर गतिविधि, दस्तावेज और लेन-देन से संबंधित जानकारी वेबसाइट पर डालनी होगी. राज्य संघ भी इसके लिए बाध्य होंगे.
बोर्ड की रोजमर्रा की नान क्रिकेटिंग कार्रवाई के लिए पेशेवरों की टीम सीईओ के नेतृत्व में नियुक्त की जाए. जिससे बोर्ड की कार्यप्रणाली पेशेवर रूप ले.
मैच के दौरान स्टेडियम में किसी भी परिस्थिति में टिकट का कोटा 10 प्रतिशत से अधिक नहीं रखा जाएगा. इससे अब जनता के लिए अधिक सीटें उपलब्ध होंगी.
टिकट विक्रय और स्टेडियम की सुविधाओं से संबंधित शिकायत लोकपाल से की जा सकेगी.
मैच फिक्सिंग को आपराधिक कृत्य बनाया जाए और भारतीय कानून के मुताबिक सजा हो.
फिक्सिंग से निपटने बोर्ड पुलिस में एक अपना विशेष जांच दस्ता बनाए, जो फिक्सिंग के मामले सामने आने पर सक्रिय हो जाए. इस दस्ते का खर्चा बोर्ड उठाए. [/box]
बोर्ड की हालिया स्थिति देखी जाए तो जस्टिस लोढ़ा द्वारा फेंके गए बाउंसर को वह न तो खेलने की स्थिति में है और न छोड़ सकता है. आगे क्या करना है इस पर बोर्ड का रूख अभी स्पष्ट नहीं है. फिलहाल बोर्ड सचिव अनुराग चौधरी ने सभी राज्य संघों को ई-मेल कर इन सिफारिशों पर उनके सुझाव मांगे हैं. उनसे पूछा गया है कि इन सिफारिशों से आपका संघ कितना प्रभावित होगा? लेकिन बोर्ड के लिए आगे की राह मुश्किल नजर आती है. देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश आरएम लोढ़ा जैसी शख्सियत रखते हैं, उसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनकी सिफारिशों को सिरे से खारिज करने की संभावनाएं कम ही हैं. यहां बोर्ड पूरी तरह से फंसा हुआ है. वह न तो सभी सिफारिशों का अस्वीकार कर सकता है और न ही चुनिंदा को मानने की स्थिति में है. वह उच्चतम न्यायालय के आदेश पर निर्भर है. या तो उसे सभी सिफारिशों को मानना पड़ सकता है या फिर किसी को भी नहीं. वहीं इन सिफारिशों से जिनके हित प्रभावित हो रहे हैं, उनमें खलबली मची हुई है. मुंबई क्रिकेट संघ (एमसीसी) के संयुक्त सचिव पीवी शेट्टी कहते हैं, ‘हम इन सिफारिशों से सहमत नहीं हैं. इन पर विचार कर बीसीसीआई को बताया जाएगा.’ गौरतलब है कि एमसीसी के अध्यक्ष शरद पवार फिर से बोर्ड अध्यक्ष बनने का सपना पाले हुए हैं. लेकिन उनकी उम्र 70 के पार हो चुकी है.
अब यह देखना रोचक होगा कि क्या यह सिफारिशें लागू होती हैं और देश के क्रिकेट में लोढ़ा युग की शुरुआत होती है या फिर पहले की तरह ही खेल के साथ खिलवाड़ होता रहेगा.