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कोलकाता का हाथ रिक्शा : मेहनत ज्यादा, मेहनताना कम

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पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता कई तरह की संस्कृतियों को अपने आप में समेटे हुए है. ‘सिटी ऑफ जॉय’ के नाम से मशहूर इस शहर में मौजूद तमाम धरोहरों में से एक हाथ रिक्शा  भी है. कोलकाता जा चुके लोग इससे भलीभांति परिचित होंगे. यह वही हाथ रिक्शा है, जिसे बिमल रॉय की फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ में अभिनेता बलराज साहनी खींचते नजर आते हैं. आप बेशक इन्हें कोलकाता या फिर पश्चिम बंगाल की धरोहर मान सकते हैं लेकिन जब आप इन रिक्शों पर सवार होकर सैर पर निकलेंगे तब आप जान पाएंगे कि यह धरोहर चंद लोगों की लाचारगी या बेचारगी से ज्यादा अब कुछ नहीं है.

कहते हैं कि विकास की इबारत लिखते वक्त सिर्फ उन्हीं किस्सों या फिर उन्हीं लोगों को जगह दी जाती है जिन्हें समाज में कुछ तवज्जो मिलती है. शायद यही वजह है कि आपको कोलकाता के मशहूर हाथ रिक्शों के इतिहास या फिर इनकी शुरुआत कहां से हुई, ऐसे सवालों को तलाशने में कुछ मुश्किलें हों. इनके इतिहास को खोजने में आपको काफी समय लगेगा.

आप इन रिक्शों को पालकी से जोड़कर देख सकते हैं. वही पालकी जिन पर शिमला की वादियों में शाही घरानों की महिलाएं सफर किया करती थीं. उन रास्तों से इन पालकियों को अपने कंधों पर रखकर प्रवासी मजदूर बड़ी मुश्किलों से उनकी मंजिल तक पहुंचाते थे.  शिमला की वादियों से निकली पालकी हाथ रिक्शा के रूप में कोलकाता की गलियों तक आ पहुचीं. कभी शाही परिवार की सवारी रहा हाथ रिक्शा ब्रिटिशराज में अफसरों की पत्नियों यानी मेमसाहबों की सवारी बन गया था. वह रोज शाम को इन रिक्शों पर सैर के लिए निकलती थीं.

हाथ रिक्शा ने धीरे-धीरे तरक्की की और फिर इसे एक ऐसे ठेले में तब्दील कर दिया गया जिसे खींचने की जिम्मेदारी एक बेबस और लाचार इंसान के हाथों पर होती थी. धीरे-धीरे हाथ से खींची जाने वाली यह गाड़ी कोलकाता के जमींदार और उच्च वर्गों के बीच लोकप्रिय होती गई और दूसरों को आराम पहुंचाने के लिए मजबूर मजदूर इसे खींचने के लिए तैयार होता गया.

कोलकाता के ‘शंभू महतो’

एक धरोहर के अलावा कोलकाता के हाथ रिक्शे अब सामंतवादी प्रथा का एक अमानवीय चेहरा भी बन गए हैं. यह रिक्शे आधुनिकता की ओर बढ़ते एक शहर के लिए किसी पराजय से कम नहीं हैं. ‘दो बीघा जमीन’ में बलराज साहनी ने उस किसान शंभू महतो की भूमिका निभाई है, जिसे अपनी जमीन छुड़ाने के लिए इस रिक्शे को खींचने के लिए मजबूर होना पड़ता है. कोलकाता में आज आपको ऐसे ही कई ‘शंभू महतो’ मिल जाएंगे जो कभी अपनी जीविका तो कभी किसी मजबूरी की वजह से इन रिक्शों को खींच रहे हैं.

दरअसल कोलकाता के इन हाथ रिक्शों की असली कहानी आपको वर्ष 1971 से देखने को मिलेगी. उस समय युद्ध के माहौल के बीच बांग्लादेश से कई प्रवासी यहां पहुंचे और इस शहर में अपनी गुजर-बसर के लिए पैसे कमाने के माध्यम के तौर पर उन्होंने हाथ रिक्शा चुना. उस दौर में रिक्शे के सामान्य किराये की वजह से रिक्शों का शहर में एक अलग दबदबा था. दूसरी ओर शहर में मौजूद परिवहन के दूसरे माध्यम भी अपनी लोकप्रियता  हासिल कर रहे थे. इसका नतीजा हुआ कि शहर के कई इलाकों में रिक्शे या तो बंद हो गए या फिर उनकी आवाजाही को सीमित कर दिया गया.

 प्रतिबंध की थी तैयारी

पश्चिम बंगाल में जब बुद्धदेब भट्टाचार्य की अगुवाई वाली कम्युनिस्ट सरकार थी, उस समय घोषणा की गई थी कि शहर में हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शा पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा. सरकार इसे मानवता के साथ अन्याय का प्रतीक मानती थी और चाहती थी कि शहर को इससे छुटकारा मिल जाए. इन रिक्शों पर कलकत्ता वाहन विधेयक (संशोधित)  के तहत पूरी तरह से प्रतिबंध सुनिश्चित किया गया था. इसे वर्ष 2006 में विधानसभा में पेश भी किया गया था.  

उस समय इस प्रस्ताव को रिक्शा चालकों की ट्रेड यूनियनों की ओर से खासे विरोध का सामना करना पड़ा. यूनियनें रिक्शा चालकों के पुनर्स्थापन से जुड़े पैकेजों को लेकर आश्वस्त नहीं थीं. सरकार भी उस समय इन रिक्शा चालकों की बेहतर जिंदगी से जुड़े विकल्पों को उनके सामने रखने में असफल रही. विधेयक के सामने लगातार चुनौतियां आती गईं और अंत में हाई कोर्ट ने इस पर स्टे लगा दिया.

हालांकि, वर्ष 2005 में हाथ से खींचने वाले रिक्शा के लिए लाइसेंस की व्यवस्था खत्म कर दी गई लेकिन रिक्शावाले यूनियनों की ओर से जारी समर्थन की बदौलत अपना काम करते रहे. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इस समय तकरीबन 6,000 लोग इस काम से जुड़े हुए हैं. वहीं ऑल बंगाल रिक्शा यूनियन के आंकड़ों पर अगर नजर डालें तो ये संख्या 6,000 नहीं बल्कि 24,000 है और इसमें गैर-लाइसेंसी रिक्शा चालक भी शामिल हैं. इन आंकड़ों में उन लाखों लोगों का कोई जिक्र नहीं है जो दो वक्त की रोजी रोटी के लिए इस रिक्शा पर निर्भर हैं. 

प्रवासी मजदूरों का पेशा

इन आंकड़ों को समझने और इस पूरे मामले पर नजर डालने के बाद आपको कोलकाता की गलियों में नंगे पैर और तन को सिर्फ एक लुंगी से ढंके हुए रिक्शा खींचते मजबूर लोग नजर आएं तो हैरान न हों. खुद को मिटाने की इनकी कोशिश उस घंटी के बिना पूरी नहीं हो पाती है, जिसके जरिए ये लोगों को आवाज लगाते हैं.

कोलकाता की सड़कों पर नजर आने वाले रिक्शा खींचने वाले ज्यादातर लोग अप्रवासी हैं. ये बिहार और झारखंड जैसे दूसरे राज्यों के विभिन्न शहरों से यहां आकर बसे हैं. घर के नाम पर अगर उनके पास कुछ है तो वह है डेरा यानी गैराज, रिपेयर सेंटर और शयनागार का एक मिलाजुला रूप. जो लोग इन ‘विलासिताओं’ का खर्च नहीं उठा पाते हैं वे सड़कों पर सोने को मजबूर हैं. वहीं डेरा मालिक इन रिक्शावालों को रोजाना कमीशन के आधार पर रिक्शा देते हैं. यहां पर आपको बता दें कि रिक्शावालों के कमरे का किराया इससे अलग होता है.

बहुत कम रिक्शावाले ऐसे हैं जिन्हें अपनी मेहनत का वाजिब हिस्सा मिल पाता है. एक दिन में इन्हें 150 से 250 रुपये ही हासिल होते हैं लेकिन इतनी कीमत के लिए इन्हें पूरे दिन धूप में तपना और पसीना बहाना पड़ता है और फिर शाम को इन्हीं पैसों में से एक बड़ा हिस्सा ये अपने मालिक को बतौर कमीशन अदा कर देते हैं.

 मानसून की सवारी

आप इन रिक्शों पर बैठकर कोलकाता की तंग और संकरी गलियों में घूमने का मजा ले सकते हैं. ऐसी गलियां जहां पर कार और दूसरे वाहनों को प्रवेश कभी-कभी नामुमकिन सा हो जाता है. ऐसी जगहों पर ये रिक्शावाले कोलकाता की निम्न मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग की जरूरतों को पूरा कर रहे हैं.

मानसून का समय आते ही इनकी मांग और बढ़ जाती है. उस समय परिवहन के दूसरे साधनों की आवाजाही बारिश में एकदम थम सी जाती है. यहां तक कि राज्यपाल जैसे उच्च पद पर आसीन व्यक्ति को भी इनकी ही मदद लेनी पड़ जाती है. इस मौसम में आप रिक्शावालों को कुछ भी ले जाते हुए देख सकते हैं. कभी इन पर सामान का बोझ लदा होता है तो कभी इन पर स्कूल से आते हुए बच्चे दिखाई पड़ जाते हैं. कुछ रिक्शावालों का तो कोलकाता के कुछ परिवारों से भी गहरा नाता जुड़ गया है. ऐसे में वह हर समय उनके लिए अपनी सेवाएं देने को तत्पर रहते हैं.

ऐसे ही एक रिक्शावाले हैं मोहम्मद खलील, जिनके दिन की शुरुआत तड़के ही हो जाती है. कभी-कभी इन्हें दोपहर को आराम करने का मौका मिल जाता है और फिर देर रात बीड़ी के कश के साथ ये अपना दिन खत्म करते हैं. खलील बिहार के मुजफ्फरपुर के रहने वाले हैं और बेनियापुकुर के अनवर हुसैन के डेरे में रहते हैं. 53 वर्ष के खलील 35 वर्षों से भी ज्यादा समय से रिक्शा चला रहे हैं. वहीं उनके बेटे दिल्ली में जामा मस्जिद के पास कपड़ों का बिजनेस करते हैं. खलील को अपने इस पेशे पर शर्म नहीं महसूस होती है. वह गर्व से इसे स्वीकारते हैं और कहते हैं कि बीमारी की हालत में भी वह रिक्शा चलाते हैं. वजह पूछो तो उनका जवाब होता है कि उन्हें यह अच्छा लगता है. 

भले ही खलील यह कहें कि उन्हें बीमारी की हालत में भी रिक्शा चलाना अच्छा लगता है लेकिन यह बात भी सही है कि यह बात कहीं न कहीं उनकी मजबूरी पर पर्दा डालने का काम करती है. परिवार से दूर खलील जैसे कई लोग रोजाना अपनी थकान मिटाने के लिए कभी जुआ खेलते हैं तो कभी शराब में अपना सुकून तलाशते हैं. कभी सेक्स वर्कर्स का सहारा लेते हैं तो कभी नशे की दूसरी आदतों से अपनी थकान को कम करते हैं.

वहीं दूसरी ओर अनवर हुसैन को ये कहने में गर्व महसूस होता है कि वह रिक्शा खींचने वालों के समूह के मालिक हैं. हालांकि उनके डेरे में पिछले कुछ वर्षों में रिक्शा चालकों की संख्या में कमी आई है. किसी जमाने में उनके डेरे में करीब 150 रिक्शावाले रहते थे लेकिन आज यह संख्या घटकर 50 रह गई है. अनवर कहते हैं, ‘रिक्शावालों की संख्या अब कम हो रही है. नई पीढ़ी का कोई युवा अब इस पेशे में नहीं आना चाहता है.’ अनवर सवाल उठाते हैं, ‘युवा अब इस पेशे में क्यों आएंगे जबकि कमाई के नाम पर तो कुछ नहीं मिलता. अगर कुछ मिलता है तो वह है गालियां और पुलिस की ओर से होने वाला शोषण.’ इस बीच हुसैन के पास एक फोन आता है. उन्हें बताया जाता है कि उनके एक रिक्शा को इसके चालक सहित पुलिस ने हिरासत में ले लिया है. कसूर सिर्फ इतना था कि वह रिक्शावाला उस सड़क से गुजर रहा था, जहां उसे रिक्शा ले जाने की अनुमति नहीं है. हुसैन कहते हैं, ‘कभी-कभी अतिरिक्त पैसे के लिए रिक्शावाले गलत गलियों में रिक्शा लेकर चले जाते हैं. उन्हें छुड़ाने के लिए जुर्माना अदा करना पड़ता है और फिर यह रकम उनकी आय से काट ली जाती है.’

बैटरी रिक्शा से उम्मीद

फिलहाल इन रिक्शावालों की उम्मीदें अब ‘पोरिबोर्तन’ का दावा करने वाली ममता बनर्जी की सरकार पर टिकी हैं. राज्य सरकार ने हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शा को बैटरी चालित रिक्शा के साथ बदलने का एक उपाय तलाशा है. ऑल बंगाल रिक्शा यूनियन के उपाध्यक्ष मुख्तार अली कहते हैं, ‘बैटरी से चलने वाले रिक्शों का विचार काफी उम्मीदों भरा नजर आता है क्योंकि इन रिक्शों की मदद से रिक्शावालों के पास एक दिन में 300 से 400 रुपये तक कमाने का मौका होगा.’ उनके मुताबिक रिक्शों को हाथ से खींचने का काम बेहद थकान और मेहनत वाला है. निम्न आय वर्ग के लोगों के पास कोई और हुनर न होने के कारण उन्हें इसी पेशे पर निर्भर होना पड़ता है.

मुख्तार अली ने बताया कि कोलकाता में रिक्शावालों की संख्या में कमी आ रही है और शहर को और ज्यादा रिक्शा चालकों की जरूरत है. ऐसे में सरकार की इस तरह की पहल से युवा पीढ़ी भी इस पेशे की ओर से देख सकती है. हालांकि मुख्तार अली बदलते दौर के साथ रिक्शावालों के लिए ट्रेनिंग की भी पुरजोर वकालत करते हैं.

बैटरी वाले रिक्शा का ट्रेंड आने से शहर में लाइसेंस की व्यवस्था भी होगी. इतना तो तय है कि गैर-लाइसेंस रिक्शावालों की बढ़ती तादाद के बीच बैटरी वाले रिक्शों के लिए लाइसेंस हासिल करना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं हो पाएगा.

वहीं इस मुद्दे पर मुख्तार अली इस बात का भरोसा दिलाते है कि लाइसेंसी और गैर-लाइसेंसी दोनों ही तरह के रिक्शावालों के पुनर्स्थापन के लिए एक वाजिब कार्यक्रम भी होगा. इस पूरे कार्यक्रम का लब्बो-लुआब यह है कि वह उम्रदराज व्यक्ति जो दशकों से रिक्शा चलाता आ रहा है या चलाना चाहेगा, वह इस नए विकल्प के अनुकूल होगा या नहीं. रिक्शा को हाथ से खींचने के इस काम की निंदा कई शब्दों के प्रयोग से कर सकते हैं लेकिन यह सत्य नहीं बदला जा सकता है कि स्वतंत्र भारत के पश्चिम बंगाल में रहने वाले अप्रवासियों के लिए रिक्शा खींचना ही फिलहाल उनके लिए कमाई का एकमात्र जरिया रहेगा. 

जैसे-जैसे यह तरीका बेकार होता जाएगा शायद यह व्यवसाय भी खुद की पहचान खोने लगेगा और लोग भी भुला दिए जाएंगे या फिर कहीं खो जाएंगे.                                               

​गिलगित-बाल्टिस्तान को लेकर पाकिस्तान से नाराज अलगाववादी

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Photo- AFP

कश्मीर के अलगाववादी नेता फिर एक बार गुस्से में हैं. हालांकि इस बार कारण भारत सरकार नहीं बल्कि पाकिस्तान सरकार है. पाकिस्तान सरकार ने गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान का संवैधानिक प्रांत बनाने का प्रस्ताव रखा है, जिसके बाद जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के अध्यक्ष यासीन मलिक ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को एक पत्र भेजा है. 12 जनवरी को लिखे गए इस पत्र में मलिक ने शरीफ से पाक अधिकृत कश्मीरी क्षेत्र की प्रांतीय स्थिति न बदलने का आग्रह किया है क्योंकि इससे कश्मीर विवाद बदतर हो जाएगा. मलिक लिखते हैं, ‘कई बार ये संभावनाएं उठती रही हैं कि आपकी सरकार में गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान में मिलाने पर आम सहमति बन सकती है. इससे जम्मू-कश्मीर पर चल रहा विवाद और उलझेगा. अगर पाकिस्तान गिलगित-बाल्टिस्तान को अपने संवैधानिक अधिकार में ले लेता है तो भारत को इसे कश्मीर के साथ एकीकृत करने का राजनीतिक और नैतिक अधिकार मिल जाएगा.’

हुर्रियत अध्यक्ष सैयद अली शाह गिलानी ने इस पर और कड़ी प्रतिक्रिया दी है. उनका कहना है कि सरकार के पास गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान में मिलाने का कोई संवैधानिक और नैतिक तर्क नहीं है, साथ ही ऐसा कोई कदम उठाना कश्मीरियों के साथ धोखा करने जैसा होगा. गिलानी कहते हैं, ‘साथ ही ऐसा करना कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के दिए गए प्रस्तावों का सीधा हनन है.’ वहीं हुर्रियत के उदारवादी धड़े के अध्यक्ष मीरवाइज़ उमर फारूक का कहना है कि पाकिस्तान के गिलगित-बाल्टिस्तान को अपना पांचवां प्रांत बनाने से भारत को लद्दाख को मिलाने का बहाना मिल जाएगा, जबकि अगर भौगोलिक रूप से देखें तो ये एक ही क्षेत्र यानी अविभाजित कश्मीर का ही हिस्सा है.

गिलगित-बाल्टिस्तान को लेकर छिड़े इस हो-हल्ले की शुरुआत नवाज़ शरीफ के एक सुधार कमेटी के गठन के बाद हुई, जिसे शरीफ ने इस प्रांत का एक रोडमैप तैयार करने की जिम्मेदारी दी थी. इस कमेटी के मुखिया, विदेशी मामलों में शरीफ के सलाहकार सरताज़ अज़ीज़ हैं. बीते कुछ महीनों में ये कमेटी इस्लामाबाद में तीन बैठकें कर चुकी है, जिसमें इस बात पर चर्चा की गई कि कैसे इस मुद्दे को संभाला जाए कि ऐसा करने पर कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान की स्थिति प्रभावित न हो.

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इस्लामाबाद की तरफ से इस प्रांत के मुद्दे पर जल्दबाजी करने की वजह लगभग 46 अरब डॉलर की लागत का चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा है. विवादित क्षेत्र में इस निवेश को कानूनी जामा पहनाने के लिए चीन कथित तौर पर पाकिस्तान पर दबाव बना रहा है. अरबों डॉलर के इस प्रोजेक्ट के लिए गिलगित-बाल्टिस्तान प्रवेश द्वार का काम करेगा. चीन इस क्षेत्र में औद्योगिक पार्क, हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट, रेलवे लाइन और सड़कें बना रहा है. इसके अलावा इस प्रोजेक्ट में काराकोरम हाईवे का विस्तार चीन के अशांत रहने वाले शिंजिआंग सूबे तक किया जाएगा. इससे घाटी तक चीन को मुक्त और ट्रेन से तेज रफ्तार पहुंच मिलेगी. एक बार गिलगित-बाल्टिस्तान और पाकिस्तान के अन्य प्रांतों तक रेलवे लाइन और सड़कों का काम पूरा हो जाने पर, ग्वादर, पासनी और ओरमारा में चीन द्वारा निर्मित नौसेना बेस के रास्ते आने वाले चीनी कार्गो को पाकिस्तान पहुंचने में सिर्फ 48 घंटे लगेंगे. अभी इसमें 16 से 25 दिन का समय लगता है.

ये मुद्दा इसलिए और जटिल है क्योंकि यह क्षेत्र अविभाजित कश्मीर का हिस्सा है और इसलिए इसे इस विवादित क्षेत्र से अलग नहीं किया जा सकता. इस मामले में न ही इस्लामाबाद से इस क्षेत्र के संवैधानिक संबंधों से मदद मिल रही है और न ही भारत का इस आर्थिक गलियारे को गिलगित-बाल्टिस्तान से गुजारने पर की गई आपत्ति से ही कोई फर्क पड़ा है.

एक हालिया बयान में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने कहा है कि पूरा जम्मू कश्मीर, जिसमें वर्तमान में पाक अधिकृत हिस्सा भी आता है, भारत का ही अभिन्न हिस्सा था. उन्होंने बताया कि सरकार के पास गिलगित-बाल्टिस्तान की राजनीतिक स्थिति से जुड़ी कई रिपोर्ट हैं, जिन पर वह संज्ञान ले रही है. स्वरूप ने मीडिया से कहा कि भारत का रवैया इस पर बिलकुल साफ है.

पाकिस्तान अब अपने द्वारा दिए गए एम्पावरमेंट एंड सेल्फ गवर्नेंस आॅर्डर, 2009 को संशोधित करना चाहता है. इस आॅर्डर के अनुसार गिलगित-बाल्टिस्तान में विधानसभा और गिलगित-बाल्टिस्तान काउंसिल बनीं, जिसने इस क्षेत्र के लोगों को अपनी सरकार चुनने का अधिकार दिया. इस तरह गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान का संवैधानिक हिस्सा बने बिना ही एक ‘डीफेक्टो’ (वास्तविक जैसा) क्षेत्र का दर्जा मिल गया, जिससे लगभग 15 लाख लोगों को अपनी सरकार और अपना मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार मिला. इस क्षेत्र में पहला चुनाव 2009 में हुआ, जिसमें पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी सत्ता में आई. 5 साल के कार्यकाल के बाद जून 2015 में दूसरे चुनाव हुए, जिसमें मौजूदा प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) को बहुमत मिला.

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हालांकि, असली सत्ता हमेशा से इस क्षेत्र के प्रशासन के जिम्मेदार रहे कश्मीरी मामलों और उत्तरी क्षेत्र के मंत्रालय के हाथ में ही रही, जिसने सिर्फ असंतोष को बढ़ाया.

एक पाकिस्तानी दैनिक के हवाले से, इस प्रस्ताव के लागू हो जाने के बाद गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तान के अस्थायी संवैधानिक हिस्सा हो जाएंगे. संविधान में शामिल होने के अलावा इस हिस्से से दो प्रतिनिधि पाकिस्तान की संसद में भेजे जाएंगे. हालांकि उन्हें पर्यवेक्षक का ही दर्जा दिए जाने की संभावना है.

पाकिस्तान से गिलगित-बाल्टिस्तान का रिश्ता 1947 में उसके इस क्षेत्र के आधिपत्य के बाद से काफी बदल गया है. तब 24 साल के मेजर ब्राउन ने जम्मू कश्मीर नरेश हरि सिंह द्वारा नियुक्त गवर्नर ब्रिगेडियर घंसारा सिंह को सत्ता से हटाकर गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान के हवाले कर दिया था. हालांकि, पाकिस्तान ने स्थानीय नेताओं द्वारा दिए गए विलय के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया क्योंकि इससे पूरे कश्मीर पर पाकिस्तान की दावेदारी कमजोर हो जाती. इस्लामाबाद में बैठी सरकार ये भी चाहती थी कि इस इलाके के ज्यादा से ज्यादा पाक समर्थक संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में होने वाले जनमत-संग्रह में भाग लें, जिससे उनके जीतने की संभावनाएं बढ़ जाएं.

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इस इलाके का क्षेत्रफल 85,793 वर्ग किमी. है पर 1970 में पाक सरकार ने इसे ‘आजाद जम्मू कश्मीर’ और उत्तरी इलाकों में बांट दिया था. जहां ‘आजाद जम्मू कश्मीर’ को 1974 में ‘सेमी-स्टेट’ का दर्जा मिल गया, ये उत्तरी इलाके संवैधानिक रूप से अधर में ही लटके रहे. 2009 में सरकार बनने के बाद स्थितियां बदलीं. इससे न केवल उत्तरी इलाकों को स्थानीय सरकार मिली, बल्कि गिलगित-बाल्टिस्तान का नाम भी मिला, जिससे यहां के लोगों पहचान मिली. पर अब इस इलाके के लोगों की और प्रामाणिक संवैधानिक पहचान की मांग को भारत ही नहीं बल्कि नियंत्रण रेखा के कश्मीरियों के भी कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है. सितंबर 2012 में गिलगित-बाल्टिस्तान की विधानसभा ने इस इलाके को प्रांतीय दर्जा देने के एक सुझाव को मंजूरी दी थी पर तुरंत ही इसे पाक अधिकृत कश्मीर की सरकार का प्रतिरोध भुगतना पड़ा. इसके बाद 13 जनवरी को, इस्लामाबाद सरकार के गिलगित-बाल्टिस्तान को प्रांतीय दर्जा देने की गंभीरता को समझते हुए, पाक अधिकृत कश्मीर की विधानसभा ने सम्मिलित रूप से, इस प्रस्तावित कदम के विरोध में दो सुझाव दिए.

पहले प्रस्ताव के अनुसार, गिलगित-बाल्टिस्तान को पांचवां पाकिस्तानी प्रांत बनाने से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाक जम्मू कश्मीर मुद्दे पर कमजोर पड़ जाएगा. दूसरा, गिलगित-बाल्टिस्तान जम्मू कश्मीर का हिस्सा है, और अगर कभी भी यहां के लोगों के बीच कोई जनमत-संग्रह करवाया जाता है तो जम्मू-कश्मीर के बाकी हिस्सों की तरह ही, यहां के लोगों को भी अपने भविष्य के बारे में फैसला लेने का अधिकार मिलना चाहिए. पाक अधिकृत कश्मीर सरकार के पुनर्वास मंत्री अब्दुल मजीद का कहना है, ‘जम्मू-कश्मीर को अलग करने के किसी भी कदम के विरोध में खड़े होना हमारी संयुक्त जिम्मेदारी है.’

इस तरह गिलगित-बाल्टिस्तान का क्षेत्र एक भू-राजनीतिक खेल में फंस गया है, जहां चीन इसको आर्थिक गलियारे के अपने फायदे के रूप में इस्तेमाल कर रहा है, जो कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है.

इस क्षेत्र को इसी स्थिति में रहने देने का अर्थ  होगा अविभाजित कश्मीर के साथ इसकी पहचान, जिससे यह क्षेत्र स्वतः ही भारत-पाक के बीच कश्मीर को लेकर चल रहे विवाद का हिस्सा बन जाता है. कश्मीरी अलगाववादियों का इस क्षेत्र को प्रांत का दर्जा देने पर भड़कना इस बात की ही पुष्टि करता है.

मलिक ने नवाज़ को लिखे पत्र में कहा है, ‘अगर आपकी सरकार गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान में मिलाती है और इसके परिणामस्वरूप अगर भारत पूरे कश्मीर पर संयुक्त रूप से अपना हक बताता है, तो ये लोगों कि उम्मीदों का सौदा करने जैसा होगा. कश्मीर मसला सिर्फ जमीन या क्षेत्र का ही तो नहीं है. ये लोगों के हक का है. जमीन के बदले इन हकों का सौदा लोगों की महत्वाकांक्षाएं कुचलना होगा.’

मौन मोदी !

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26 मई, 2014 को जब भारत के राष्ट्रपति ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई तब देश एक ऐसे नेता की उम्मीद कर रहा था जो उनके साथ संवाद करे क्योंकि उनके पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह पर अपने कार्यकाल के दौरान मौन रहने का आरोप लगता रहा था. नरेंद्र मोदी खूब बोलने के लिए जाने जाते हैं. इसके अलावा वे जनता के साथ संवाद के लिए नए माध्यमों का भी जमकर इस्तेमाल करते हैं. फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि पर उनकी सक्रियता जगजाहिर है. प्रधानमंत्री बनने के बाद से वे रेडियो पर मन की बात भी लगातार सुना रहे हैं. मजेदार बात यह है कि पिछले 21 महीनों में प्रधानमंत्री ने इतने भाषण दिए कि चुटकुले बनाए जाने लगे थे. कुछ का कहना है कि इसके पहले के प्रधानमंत्री कभी बोलते ही नहीं थे और एक मोदी जी हैं कि चुप होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं. लेकिन यह सिक्के का एक पहलू है.

इसका दूसरा पहलू यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल के दरम्यान उन तमाम मसलों पर चुप्पी साधे रखी जिन पर लाेगों ने उनसे बोलने की उम्मीद लगा रखी थी. यानी प्रधानमंत्री का संवाद एकतरफा रहा और वे उन तमाम मुद्दों पर कुछ नहीं बोले जिन पर इस दौरान देश में बहसें चल रही थीं. हालांकि इस बीच उनके ही पार्टी के अध्यक्ष, नेता, मुख्यमंत्री और कैबिनेट सहयोगी इन तमाम मसलों पर ऊलजलूल बयान देते रहे. फिर चाहे वह मसला हालिया हरियाणा जाट आरक्षण हिंसा, जेएनयू विवाद, रोहित वेमुला, दादरी, असहिष्णुता से लेकर पाकिस्तान में पटाखे फूटने और मसला ‘रामजादे-हरामजादे’ का ही क्यों न रहा हो. इस पर जब प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाए गए तो ऐसे आरोपों को उन्होंने विपक्ष की साजिश करार दिया.

हाल ही में एक जनसभा में वे कहते हैं, ‘कुछ लोगों को मेरा प्रधानमंत्री बनना हजम नहीं हो रहा है. उन्हें ये हजम नहीं हो रहा है कि एक चायवाला प्रधानमंत्री बन गया. जिस दिन से हमने इन लोगों की विदेशी फंडिंग की डीटेल मांगनी शुरू की है, इन्होंने मेरे खिलाफ गैंग बना लिया है और चिल्ला रहे हैं- मोदी को मारो, मोदी को मारो. अब हर रोज मेरी छवि खराब करने और मुझे खत्म करने की कोशिश हो रही है.’

हालांकि इस मसले पर ज्यादातर राजनीतिक चिंतक प्रधानमंत्री से इतर राय रखते हैं. राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘मोदी की चुप्पी जानी-बूझी रणनीति का हिस्सा है. रणनीति यह है कि विवादास्पद मुद्दों, विचारधारा के मुद्दों, सांप्रदायिक मुद्दों समेत जो भी पॉलिटिक्स का डर्टी जॉब है वह दूसरे लोग करते हैं. मोदी इस पर चुप रहते हैं. वे केवल चुनाव में भाषण देते हैं या तथाकथित विकास के मसले पर बयान देते हैं. यह उनके प्रधानमंत्री बनने के पहले ही दिन से जारी है. लाल किले से भाषण के दौरान वे कहते हैं कि दस साल के लिए इन मुद्दों को कूड़ेदान में डाल देना चाहिए. इस तरह के मुद्दों पर पाबंदी लगा देनी चाहिए, लेकिन भाजपा के केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक ऐसे मसलों पर लगातार बयानबाजी कर रहे हैं. हालांकि अब इस रणनीति की पोल खुल चुकी है. सबको इसका मतलब समझ में  आने लगा है.’

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शाहनवाज हुसैन, भाजपा प्रवक्ता
शाहनवाज हुसैन, भाजपा प्रवक्ता

प्रधानमंत्री पर चुप रहने का आरोप लगाना पूरी तरह तथ्य से परे है. भाजपा और सरकार के प्रवक्ता जो भी बोलते हैं उस पर पार्टी व प्रधानमंत्री की पूर्ण सहमति होती है. अब प्रधानमंत्री जिन मसलों पर बोलते हैं वह विपक्ष को सूट नहीं करता है, वह इस तलाश में रहता है कि प्रधानमंत्री से क्या छूट गया है उसे मुद्दा बनाया जाए. अब सरकार और पार्टी के प्रवक्ता भी तो हैं, जो प्रधानमंत्री से अलग आवाज नहीं हैं. प्रधानमंत्री हर मसले पर अपना बयान नहीं दे सकते हैं. अगर विपक्ष को प्रवक्ताओं की बात नहीं सुननी है तो वह भी अपने प्रवक्ताओं को हटा दे, सोनिया गांधी या दूसरे बड़े नेता ही हर मसले पर बोला करें. जहां तक बात भाजपा नेताओं की बयानबाजी की है तो जो पार्टी लाइन का बयान है वह प्रवक्ता देते रहते हैं. जिन लोगों ने निजी रूप से बयान दिया है, पार्टी ने उसका खंडन किया है. पार्टी ने हमेशा हर मसले पर अपनी राय साफ जाहिर की है.
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वहीं, लेखक सुभाष गाताडे कहते हैं, ‘जब जगह-जगह पर संविधान की अवहेलना हो रही है, कभी वकील हमला कर रहे हैं, कभी दादरी जैसी घटनाएं हो रही हैं. तो ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मौन एक सूचक मौन है. अब लोग यह भी सवाल उठा सकते हैं कि प्रधानमंत्री हर मसले पर क्यों बोलेंगे. लेकिन मेेरे ख्याल से जो व्यक्ति जिम्मेदारी के पद पर, संवैधानिक पद पर बैठा हुआ है वह ऐसे समय मौन रहता है जब उसके सामने तमाम घटनाएं घटित हो रही हों तो यह सूचक मौन है. यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक स्थिति है.’ बहरहाल इस दौरान दूसरे तमाम मुद्दों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संवाद तो जारी रहा, लेकिन वे उन कुछ चुनिंदा मसलों पर टिप्पणी करने से बचते रहे या जानबूझकर देरी करते रहे जिनसे उनकी पार्टी का हित टकरा रहा था.

लेखक और पत्रकार राशिद किदवई कहते हैं, ‘जहां तक इस दौरान हुए विवादों की बात रही तो इस दौरान दो तरह के विवाद रहे. कुछ ऐसे विवाद रहे जिनका निपटारा सही ढंग से नहीं हुआ. दूसरे ऐसे विवाद रहे जिन्हें राजनीतिक वजहों से विवादित बनाया गया. ऐसे में मोदी की चुप्पी रणनीति के तहत रही. सुषमा, वसुंधरा या दादरी का मसला पहली तरह का विवाद रहा, जहां मोदी चाहकर भी कुछ नहीं बोल पाए. दूसरा जेएनयू का मसला था, इसको राजनीतिक वजहों से विवादित किया गया. इसमें भी सत्ताधारी दल फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है. अब इंग्लैंड में प्रधानमंत्री के ऊपर राष्ट्रीय मसलों पर बोलने का नैतिक दबाव होता है, लेकिन कोई नियम, कायदा या कानून नहीं होता है. ठीक वैसा ही भारत में भी है. अब जेएनयू के मसले पर मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी के संसद में दिए गए बयान को प्रधानमंत्री सत्यमेव जयते लिखकर ट्वीट करते हैं तो यह साफ होता कि वे उस बयान से सहमत होते हैं. अगर हम यह कहते हैं कि प्रधानमंत्री जेएनयू के मसले पर चुप हैं तो ऐसा कहते वक्त हम सिर्फ तकनीकी रूप से बात कर रहे होते हैं, जबकि प्रधानमंत्री अपनी मंशा जाहिर कर चुके होते हैं.’

राशिद किदवई की बात से हम सहमत भी हो सकते हैं, क्योंकि हमारे लोकतंत्र में सामूहिक जिम्मेदारी की प्रणाली विकसित की गई है. देश के ज्यादातर प्रधानमंत्री बहुत मुखर नहीं रहे हैं. लेकिन क्या वाकई में प्रधानमंत्री लोगों की उम्मीदों पर खरे उतर रहे हैं? किदवई कहते हैं, ‘किसी भी सरकार के कार्यकाल के दौरान बहुत सारे उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. मोदी कई बार गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके थे, साथ ही बहुत दिनों बाद पूर्ण बहुमत की सरकार आई थी इसलिए लोगों की अपेक्षाएं बहुत ज्यादा थीं. हालांकि प्रधानमंत्री रहने के दौरान वे विपक्ष को साथ लेकर सदन को सुचारू रूप से चलाने में असफल रहे हैं.’

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रणदीप सुरजेवाला, कांग्रेस प्रवक्ता
रणदीप सुरजेवाला, कांग्रेस प्रवक्ता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केवल उन मुद्दों पर बोलते हैं जो उन्हें राजनीतिक तौर पर सुविधाजनक लगते हैं. देश के प्रधानमंत्री के तौर पर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को निभाने में वे पूरी तरह से नाकाम रहे हैं. नफरत फैलाने वाले, बांटने वाले, विभाजनकारी और विघटनकारी एजेंडे का वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समर्थन करते दिखते हैं. इसके लिए वे या तो चुप्पी साध लेते हैं या अपनी परोक्ष सहमति से बांटने वाली ताकतों को प्रोत्साहित करते हैं. यह भी पूरे देश ने देखा कि बांटने वालों के सरगना संजीव बालयान, साध्वी निरंजन ज्योति, साक्षी महाराज, राजकुमार सैनी, योगी आदित्यनाथ, गिरिराज सिंह आदि को प्रधानमंत्री ने अच्छे पदों और पुरस्कारों से नवाजा है. यह सूची काफी लंबी है और बढ़ती जा रही है. इसका संदेश बहुत ही स्पष्ट है- फूट डालो और राज करो. देश को बांटो, शासन करो. नफरत फैलाओ, विभाजन करो और शासन करो.
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वहीं वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक अरुण कुमार त्रिपाठी कहते हैं, ‘पिछले कुछ समय में मोदी ने जिस तेजी से लोकप्रियता के शिखर को छुआ था, उतनी ही तेजी से वह घट रही है. आम आदमी को रोटी खाने से मतलब होता है, लेकिन अ​भी तक अच्छे दिन का वादा जुमला साबित हुआ है. सरकार ने इस दौरान सिर्फ विघटनकारी और विभाजनकारी एजेंडे पर जोर-शोर से काम किया है. बाकी तमाम मुद्दे पीछे रह गए हैं. देश में किसान बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं. मजदूरों के पास काम नहीं है. मध्यवर्ग महंगाई से त्रस्त है. ऐसे में उनकी छवि पर भी लगातार सवाल उठे हैं. वे एक कमजोर प्रशासक साबित हो रहे हैं.’

जेएनयू के प्रो. सच्चिदानंद सिन्हा कहते हैं, ‘मोदी की भूमिका बहुत साफ है कि वे सभी मसलों पर मौन हैं. संसद में स्मृति ईरानी के भाषण को उन्होंने बहुत सराहा. मतलब साफ है कि सरकार की जो लाइन है, पार्टी की जो लाइन है, उससे वे सहमत हैं और उसके साथ हैं. देश भर में उपद्रवी तत्व अगर उत्पात मचाते हैं और सरकार कुछ नहीं बोलती तो समझना चाहिए कि उनको सरकार का समर्थन है.’

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केसी त्यागी, जदयू प्रवक्ता
केसी त्यागी, जदयू प्रवक्ता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन सारे मसलों पर चुप्पी साधे बैठे हैं जो उनकी राजनीतिक विचारधारा के करीब हैं. घर वापसी, बीफ, दादरी, जेएनयू, रोहित मसले पर उनकी चुप्पी है, बाकी दिन भर दहाड़ते ही रहते हैं. जो मसले सांप्रदायिक तनाव बढ़ाते हैं, लोगों को बांटते हैं, उनके जो मंत्री ‘हरामजादे’ जैसे बयान देते हैं, जो लोगों को पाकिस्तान भेजते हैं, उन पर भी मोदी चुप्पी साधे रहते हैं. दरअसल वे चाहते हैं कि ऐसे मसले उठते रहें. वरना जिसकी मर्जी पर स्टाफ में प्यून तक रखे जाते हैं, वह एक बार कह दे कि खबरदार कोई नहीं बोलेगा, तो शायद ही कोई बोले. पर वे खुद ही चाहते हैं कि धार्मिक ध्रुवीकरण होता रहे. इसलिए उद्देश्यपूर्ण चुप्पी धारण किए रहते हैं. गोधरा दंगे के चलते उन्हें दो बार गुजरात की कुर्सी मिल गई थी, इसलिए वे देश में भी ऐसा करना चाह रहे हैं. इसलिए धार्मिक उन्माद को रोकने की कोशिश ही नहीं की जा रही है. वरना कोई मंत्री या सत्तारूढ़ पार्टी का अध्यक्ष यह बयान कैसे दे सकता है कि यदि बिहार में जदयू जीत गई तो पाकिस्तान में पटाखे छूटेंगे? क्या हम पाकिस्तान के नागरिक हैं? साध्वी निरंजन ज्योति यह बयान कैसे दे सकती हैं कि जो हमें वोट दे रहे हैं वे रामजादे हैं बाकी सब बास्टर्ड हैं. अगर नेता न चाहे तो कोई ऐसा बयान दे ही नहीं सकता है. लेकिन मोदी खुद ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने के लिए ऐसे बयानों को मौन सहमति देते हैं.
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हालांकि वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय इससे इतर राय रखते हैं. वे कहते हैं, ‘शुरू से ही पूरा विपक्ष मोदी को निशाने पर लिए हुआ है. वह यह पचा नहीं पा रहा है कि मोदी प्रधानमंत्री हैं. कोई छोटी-सी भी बात हो तो एक मांग उठती है कि इस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोलें. कई बार घटनाएं इतनी छोटी रहती हैं कि प्रधानमंत्री को बोलने की कोई जरूरत नहीं होती है. जवाहर लाल नेहरू ने लोकसभा में यह बात कई बार कही है कि सरकार या प्रधानमंत्री को जनता ने कुछ करने के लिए चुना है और विपक्ष को बोलने के लिए चुना है. इसका मतलब विपक्ष को बोलने का हर अवसर मिलना चाहिए और सरकार को काम करने का हर अवसर मिलना चाहिए, लेकिन यहां हम पा रहे हैं कि विपक्ष मोदी को बोलने के लिए ज्यादा मजबूर कर रहा है और काम करने का पूरा मौका भी नहीं देना चाहता है. अपने यहां संसदीय लोकतंत्र की जो परिपाटी बनी है उसका पिरामिड उल्टा हो गया है. विपक्ष को लगता है कि प्रधानमंत्री हर छोटी बात पर बोलें. वे बोलेंगे तो गलती भी करेंगे और गलती पर वह मुद्दा बनेगा. ये विवेक भी शायद विपक्ष के पास नहीं है कि किस बात पर प्रधानमंत्री को बोलना चाहिए और किस बात पर उनके बोलने की जरूरत नहीं है. मेरे हिसाब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास यह विवेक है कि उन्हें कब बोलना चाहिए और कब चुप रहने की जरूरत है.’

राम बहादुर राय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी को सही बताते हुए संसदीय लोकतंत्र का सहारा लेते हैं. साथ ही वे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को उद्धृत करते हुए कहते हैं, ‘जहां तक बोलने की बात है तो वाजपेयी जी अक्सर कहा करते थे कि बोलने के लिए सिर्फ बुद्धि की जरूरत होती है और चुप रहने के लिए बुद्धि व विवेक दोनों की जरूरत होती है. नरेंद्र मोदी अगर चुप हैं तो वे अपनी बुद्धि और विवेक के कारण चुप हैं. ऐसा भी नहीं है कि प्रधानमंत्री चुप्पा हो गए हैं. जब उन्हें ठीक लगता है तो वे बोलते हैं. प्रधानमंत्री पर चुप्पी का आरोप लगाने वाले विपक्ष से मेरा एक सवाल है कि आप संसदीय प्रणाली में रह रहे हैं या फिर राष्ट्रपति प्रणाली में जी रहे हैं. यह सही बात है कि 2014 का आम चुनाव अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनाव की तर्ज पर लड़ा गया. इसके बावजूद हम संसदीय लोकतंत्र में रह रहे हैं. संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री के अलावा मंत्रिमंडल, राज्यों के मुख्यमंत्री, सरकारी प्रवक्ता बहुत सारे लोग हैं. ऐसे में किसी मामले पर प्रधानमंत्री बोले या फिर उनका मंत्री या कोई प्रतिनिधि अगर बयान देता है तो वह भी ठीक होता है. अमेरिका में यह हो सकता है कि आप हर बात के लिए ओबामा की तरफ देखें और वे उसका जवाब दें. हमारे यहां संसदीय लोकतंत्र में इसकी जरूरत नहीं है. भारत में इसके पहले भी जो प्रधानमंत्री थे वे संबंधित मंत्रालयों और विभागों के मुखिया को ही संसद के अंदर व बाहर जवाब देने के लिए कहते रहे हैं. हमने लोकतंत्र में सामूहिक जिम्मेदारी की प्रणाली विकसित की है. ऐसा इसलिए भी होता है.’

हालांकि इसके साथ ही एक सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी ही पार्टी के नेताओं और अपनी ही सरकार के मंत्रियों के ऊटपटांग बयानों से बेखबर हैं? यदि नहीं, तो फिर उन्होंने आज तक इन बयानों की आलोचना क्यों नहीं की? यदि भाजपा दादरी कांड समेत अन्य घटनाओं के विरुद्ध है, तो उसने अपने विधायकों और सांसदों पर लगाम क्यों नहीं कसी? इसके पहले भी उसके अनेक नेता सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने वाले बयान देते रहे हैं लेकिन पार्टी ने कभी उन पर किसी तरह का अंकुश नहीं लगाया. क्या शीर्ष नेताओं का सिर्फ यह कह देना पर्याप्त है कि पार्टी ऐसी घटनाओं के विरुद्ध है? क्या इससे यह जाहिर नहीं होता है कि पार्टी जानबूझकर वोटबैंक के लिए ऐसे तत्वों को बढ़ावा दे रही है?

अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘यह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति नहीं है. यह एक से अधिक घोड़ों की सवारी करने की कोशिश है. एक तरफ हम देखेंगे कि विकास के मसले पर भी सरकार काम करती रहेगी और सांप्रदायिक मुद्दे पर भी सरकार काम करती रहेगी. जब चुनाव नजदीक आएंगे तो रणनीतिकार बैठकर सोचेंगे कि कौन-सा मुद्दा काम करेगा. इसलिए सारे मसलों को जिंदा करके रखो. रणनीतिकार अगर देखेंगे कि विकास से लोग नाखुश हैं तो सांप्रदायिकता के कार्ड को आगे बढ़ा देंगे. जहां तक भाजपा सांसदों, विधायकों और नेताओं द्वारा की जाने वाली फूहड़ बयानबाजी का सवाल है तो वे यह मानते हैं कि उदारवादी लोगों को ये बातें भले ही खराब लगंे, लेकिन उनका जो जनाधार है उसके मन में इस तरह के बयानों से गुदगुदी होती है. जब हम भाजपा की आलोचना करते हुए कहते हैं कि वह सांप्रदायिक है तो हमें लगता है कि हमने आलोचना की, लेकिन भाजपा वाले इसे तारीफ की तरह लेते हैं. मैं अपनी किसी भी डिबेट में भाजपा को मुस्लिम विरोधी कहता ही नहीं हूं क्योंकि भाजपाई इसे भी अपनी तारीफ ही समझते हैं.’

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आशुतोष, आप प्रवक्ता
आशुतोष, आप प्रवक्ता

ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री बोलते नहीं हैं, वे सेलेक्टिवली बोलते हैं. बोलना होता है तो खूब बोलते हैं, नहीं तो चुप्पी साधकर बैठे रहते हैं. प्रधानमंत्री एक तरफ रोहित वेमुला के मसले पर, जेएनयू के मसले पर, दादरी के मसले पर तो नहीं बोलते हैं, लेकिन अगर मैक्सिको में किसी खिलाड़ी की मौत हो जाए तो उस पर तुरंत ट्वीट करते हैं. प्रधानमंत्री ने यह मौन जान-बूझकर धारण किया है. वह चाहते हैं कि देश का ध्रुवीकरण हो, समाज बंट जाए, ये वोट बैंक की राजनीति है. दरअसल बात ये है कि अगर देश का प्रधानमंत्री खुद को एक पार्टी का, एक संगठन का पीएम समझने लगे तो ऐसी दिक्कतें सामने आती हैं. दुर्भाग्य से मोदी खुद को आज भी भाजपा का प्रधानमंत्री ही मानते हैं. ऐसे में उन मसलों पर जिन पर भाजपा को फायदा मिलने की उम्मीद होती है, उन पर तो वे बोलते हैं. लेकिन जहां देश हित की बात हो, देश को जोड़ने की बात हो वहां पर वे मौन धारण कर लेते हैं.

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वहीं सुभाष गाताडे भी इस बात से सहमत दिखते हैं. वे कहते हैं, ‘अपने मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, सांसदों और विधायकों के अनर्गल बयानों पर रोक न लगा पाने को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की असफलता मान सकते हैं, लेकिन मेरे ख्याल से यह जानबूझकर प्राप्त की जा रही असफलता है. मोदी एक सख्त प्रशासक हैं. इस पर भी बहस किए जाने की जरूरत है, क्योंकि जब 2002 में वे गोधरा के समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे. उस दौरान बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक मारे गए थे, तो वे कितने सख्त प्रशासक थे, इसकी पड़ताल किए जाने की जरूरत है. यह एक मिथक तैयार किया गया था जिसकी असलियत उजागर हो रही है. वैसे भी देश में जो हालात हैं उसका फायदा व्यक्तिगत तौर पर मोदी और संघ को मिल रहा है. क्योंकि जो भी विचार के वाहक व्यक्ति हैं उनके हिसाब से सब ठीक ही हो रहा है.’

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हालांकि राशिद किदवई इस बात को दूसरे नजरिये से देखते हैं. वे कहते हैं, ‘मोदी के मंत्रियों, सांसदों और पार्टी नेताओं की बयानबाजी हमें भले ही खराब लगती है, लेकिन यदि हम कहें कि इसके पीछे एक राजनीतिक सोच है, तो ये सारी बातें गौण हो जाती हैं. हर व्यक्ति की लिए मर्यादा, विचार, सोच की परिभाषाएं अलग-अलग होती हैं. अगर हम कहें कि पिछले 50 सालों से एक तरह की बातें चली आ रही थीं, उसके इतर कुछ करने की कवायद है तो चीजें बदल जाती हैं. जैसे जेएनयू है यह सिर्फ पांच, दस लोगों का मसला नहीं है. अगर हम इसके पीछे की सोच को देखें तो यह साफ है कि अब राष्ट्रवाद क्या होता है, इसके क्या पैमाने हैं, ऐसी तमाम बातों को तय करने की शुरुआत हो गई है. इसका मकसद यह है कि एक पार्टी जो लंबे समय तक विपक्ष में रही है, उसके मिजाज को भी समझा जाए और उसे आगे बढ़ाया जाए. ये प्रयास इसीलिए है.’

वहीं राम बहादुर राय इस सबसे बि​ल्कुल इतर राय रखते हैं. वे कहते हैं, ‘जहां तक सांसदों के बोलने पर प्रधानमंत्री द्वारा अकुंश न लगाए जाने की बात है तो हमारे यहां जो भी सांसद चुनकर आते हैं उनके प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है. ब्रिटेन में ऐसी व्यवस्था बनी हुई है. हमारे यहां चुनाव जीतने के आधार पर ही उम्मीदवारों का चयन होता है. ऐसी स्थिति में कई बार अलग-अलग विचार सामने आ जाते हैं. इसके अलावा राजग के सांसदों के विचारों में भी एकरूपता नहीं है. एक तरीके से यह अच्छा और बुरा दोनों है. हर सांसद अलग-अलग तरह का विचार रखता है. इसलिए भी अक्सर सरकार को परेशानी में डालने वाले बयान सामने आ जाते हैं.’

राय के अनुसार ऐसा भी नहीं है कि यह पहली बार हो रहा है. वे कहते हैं, ‘1971 में जब इंदिरा प्रचंड बहुमत से जीती थीं तब लोकसभा में कांग्रेस के अंदर दो फोरम काम करते थे. एक नेहरू फोरम, दूसरा सोशलिस्ट फोरम. नेहरू फोरम अलग सुर में बोलता था तो सोशलिस्ट फोरम के सांसद अलग राग अलापते थे. इसके अलावा कुछ लोगों ने मिलकर युवा तुर्क गुट भी बना रखा था जो हर बात पर अपनी तीसरी राय रखता था. इसी तरह भाजपा में भी जो लोग बोलते हैं तो इसका कारण यह नहीं है कि प्रधानमंत्री उन्हें बोलने देते हैं. इसका कारण यह भी नहीं है कि प्रधानमंत्री उनके बोलने पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं. वैसे भी कोई सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्र और अपने वोटबैंक की अनदेखी नहीं कर सकता है. मुझे लगता है इतनी विविधता बनी रहनी चाहिए. यह लोकतंत्र के लिए बेहतर ही होता है.’

वैसे अगर हम मान भी लें कि मोदी का यह आरोप सही है कि उनके विरोधी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रहे हैं, तो इस कोशिश को नाकाम करने के लिए सत्तारूढ़ भाजपा और केंद्र सरकार क्या कर रही है? उन्होंने इस ध्रुवीकरण को रोकने के लिए अब तक क्या कदम उठाए हैं और उनकी भविष्य की योजना क्या है?

अरुण त्रिपाठी कहते हैं, ‘जब हम यह सवाल सरकार से पूछते हैं, तो हमें यह भी समझने की जरूरत होगी कि इस ध्रुवीकरण से फायदा किसको हो रहा है. अगर चुनावी लि​हाज से देखें तो इसका सीधा फायदा भाजपा को है. कई बार लगता है कि यह कवायद आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए है. यह एक तरह से आगामी लोकसभा का सेमीफाइनल मैच है. इस दौरान ध्रुवीकरण की राजनीति की परीक्षा भी हो जाएगी. हालांकि मेरे ख्याल से भाजपा की यह राह समाज और देश के लिए बहुत ही खतरनाक साबित होने वाली है. अगर सिर्फ ध्रुवीकरण करके उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतना है तो उन्हें पश्चिम से लेकर पूरब तक सांप्रदायिक विद्वेष फैलाना होगा. यह बहुत ही मुश्किल काम है. लेकिन गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनाने वालों के लिए यह असंभव काम भी नहीं है.’

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हालांकि इस दौरान बहुत सारे लोगों का कहना रहा कि भारतीय जनता पार्टी ने संघ के दबाव में काम किया है. बिहार चुनाव से लेकर बृहत्तर भारत या हिंदूवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने में संघ ने अहम भूमिका अदा की है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों का एक धड़ा लगातार इस बात को प्रचारित करता रहा है कि वे संघ के दबाव में कुछ नहीं बोल रहे हैं, जबकि उनके एजेंडे में विकास सर्वोपरि है. गुजरात में मुख्यमंत्री रहने के दौरान उन्होंने विकास के एजेंडे को ही आगे बढ़ाया और उन्होंने एक सख्त प्रशासक की छवि निर्मित की है.

हालांकि अभय कुमार दुबे इस बात को पूरी तरह से खारिज कर देते हैं. वे कहते हैं, ‘मुझे नहीं लगता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी के दबाव में हैं. मोदी की चुप्पी जानी-बूझी समन्वित रणनीति है. इसमें मोदी, संघ, भाजपा सबके रणनीतिकार शामिल हैं. इसमें कभी-कभी गलतियां भी होती हैं, तो मामला बहुत फूहड़ हो जाता है. कई बार ये लोग सफल भी हो जाते हैं. जेएनयू के मसले को जिस तरह उठाया गया, उसके पीछे सोची-समझी रणनीति लग रही है. हालांकि स्मृति ईरानी की एक गलती से सारा मामला राष्ट्रवाद से हटकर दलित, आदिवासियों और पिछड़ों के खिलाफ चला गया.’

वहीं राशिद किदवई कहते हैं, ‘जहां तक सख्त प्रशासक की बात होती है तो इसका कारण थोड़ा अलग है. मोदी इसके पहले गुजरात के मुख्यमंत्री रहे हैं. जहां तक राज्य के मुख्यमंत्री का सवाल होता है तो वह विदेश, रक्षा, आर्थिक आदि मसलों पर पूरी जिम्मेदारी उठाने से बचा रहता है. साथ में यदि विपक्ष कमजोर है तो आप खुद को बहुत बेहतर दिखाने में सफल रहते हैं, लेकिन देश के साथ ऐसा नहीं होता है. यहां राज्यसभा और लोकसभा दोनों सदन होते हैं. विपक्ष यहां मजबूती से आपका प्रत्युत्तर देने के लिए खड़ा रहता है. इसके अलावा केंद्र में आप अपने मंत्रियों पर भी निर्भर होते हैं. करीब 20 मंत्रालय ऐसे हैं जहां पर आपको जिम्मेदार और योग्य लोगों को नियुक्त करने की जरूरत होती है. मुझे लगता है कि मोदी के मत्रिमंडल में भी योग्य लोगों की कमी है. इसके चलते उनकी सख्त प्रशासक की छवि धूमिल हो रही है.’

राम बहादुर राय भी संघ के दबाव की बात से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, ‘नरेंद्र मोदी देश के दूसरे प्रधानमंत्री हैं जो संघ की पृष्ठभूमि से राजनीति में आए हैं. इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने थे. अब अगर हम वाजपेयी की बात करें तो उस समय भाजपा के पास बहुमत लायक सीटें नहीं थीं. इसके अलावा उनकी राजनीतिक समझ मोदी की तुलना में बहुत ज्यादा थी. इस नाते संघ से उनका तालमेल बेहतर था. वे संघ को यह बात याद दिलाते रहते थे कि देखिए सरकार तो मैं चलाऊंगा, आप सिर्फ सलाह दे सकते हैं. नरेंद्र मोदी के साथ भी यह किस्सा है. वे संगठन के आदमी रहे हैं. वाजपेयी की तरह वे संघ के साथ तालमेल बिठाने में सफल तो रहे हैं. संघ अभी तक सार्वजनिक रूप से सरकार की आलोचना करता नहीं दिखा है, जो बेहतर तालमेल की पुष्टि करता है. हां, जब लोग कहते हैं कि संघ सरकार चला रहा है तो यह सिर्फ आरोप है.’

फिलहाल मोदी ने विकास और रोजगार का वादा करके प्रधानमंत्री बनने का सफर तय किया था लेकिन देश के लोग अब भी सात फीसदी की दर से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था को महसूस नहीं कर पा रहे हैं. दो साल का सूखा, फसल की बर्बादी, ग्रामीणों और शहरी आम आदमी की आमदनी में गिरावट आने से जनता मोदी सरकार से निराश है. यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री इससे निपटने के बजाय लोगों के हाथ में राष्ट्रवाद का झुनझुना पकड़ा रहे हैं. यह देखने वाली बात होगी कि राष्ट्रवाद और विद्वेष के इस झुनझुने से उन्हें कितना फायदा होता है और जनता को अपनी मुश्किलों से कितनी राहत मिलती है.

क्या हम वास्तव में राष्ट्रवादी हैं?

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यह तो हम पहले भी जानते थे और अब भी जानते हैं कि साधारण भारतवासी राष्ट्रीयता का अर्थ नहीं समझता, और यह भावना जिस जागृति और मानसिक उदारता से उत्पन्न होती है, वह अभी हम में बहुत थोड़े आदमियों में आई है. लेकिन इतना जरूर समझते थे कि जो पत्रों के संपादक हैं, राष्ट्रीयता पर लंबेे-लंबे लेख लिखते हैं और राष्ट्रीयता की वेदी पर बलिदान होने वालों की तारीफों के पुल बांधते हैं, उनमें जरूर यह जागृति आ गई है और वह जात-पांत की बेडि़यों से मुक्त हो चुके हैं, लेकिन अभी हाल में ‘भारत’ में एक लेख देखकर हमारी आंखें खुल गईं और यह अप्रिय अनुभव हुआ कि हम अभी तक केवल मुंह से राष्ट्र-राष्ट्र का गुल मचाते हैं, हमारे दिलों में अभी वही जाति-भेद का अंधकार छाया हुआ है. और यह कौन नहीं जानता कि जाति भेद और राष्ट्रीयता दोनों में अमृत और विष का अंतर है. यह लेख किन्हीं ‘निर्मल’ महाशय का है और यदि यह वही ‘निर्मल’ हैं, जिन्हें श्रीयुत ज्योतिप्रसाद जी ‘निर्मल’ के नाम से हम जानते हैं, तो शायद वह ब्राह्मण हैं. हम अब तक उन्हें राष्ट्रवादी समझते थे, पर ‘भारत’ में उनका यह लेख देखकर हमारा विचार बदल गया, जिसका हमें दुख है. हमें ज्ञात हुआ कि वह अब भी उन पुजारियों का, पुरोहितों का और जनेऊधारी लुटेरों का हिंदू समाज पर प्रभुत्व बनाए रखना चाहते हैं जिन्हें वह ब्राह्मण कहते हैं पर हम उन्हें ब्राह्मण क्या, ब्राह्मण के पांव का धूल भी नहीं समझते. ‘निर्मल’ की शिकायत है कि हमने अपनी तीन-चौथाई कहानियों में ब्राह्मणों को काले रंगों में चित्रित करके अपनी संकीर्णता का परिचय दिया है जो हमारी रचनाओं पर अमिट कलंक है. हम कहते हैं कि अगर हममें इतनी शक्ति होती, तो हम अपना सारा जीवन हिंदू-जाति को पुरोहितों, पुजारियों, पंडों और धर्मोपजीवी कीटाणुओं से मुक्त कराने में अर्पण कर देते. हिंदू-जाति का सबसे घृणित कोढ़, सबसे लज्जाजनक कलंक यही टकेपंथी दल हैं, जो एक विशाल जोंक की भांति उसका खून चूस रहा है, और हमारी राष्ट्रीयता के मार्ग में यही सबसे बड़ी बाधा है. राष्ट्रीयता की पहली शर्त है, समाज में साम्य-भाव का दृढ़ होना. इसके बिना राष्ट्रीयता की कल्पना ही नहीं की जा सकती. जब तक यहां एक दल, समाज की भक्ति, श्रद्धा, अज्ञान और अंधविश्वास से अपना उल्लू सीधा करने के लिए बना रहेगा, तब तक हिंदू समाज कभी सचेत न होगा. और यह दल दस-पांच लाख व्यक्तियों का नहीं है, असंख्य है. उसका उद्यम यही है कि वह हिंदू जाति को अज्ञान की बेडि़यों में जकड़ रखे, जिससे वह जरा भी चूं न कर सके. मानो आसुरी शक्तियों ने अंधकार और अज्ञान का प्रचार करने के लिए स्वयंसेवकों की यह अनगिनत सेना नियत कर रखी है.

अगर हिंदू समाज को पृथ्वी से मिट नहीं जाना है, तो उसे इस अंधकार-शासन को मिटाना होगा. हम नहीं समझते, आज कोई भी विचारवान हिंदू ऐसा है, जो इस टकेपंथी दल को चिरायु देखना चाहता हो, सिवाय उन लोगों के जो स्वयं उस दल में हैं और चखौतियां कर रहे हैं. निर्मल, खुद शायद उसी टकेपंथी समाज के चौधरी हैं, वरना उन्हें टकेपंथियों के प्रति वकालत करने की जरूरत क्यों होती? वह और उनके समान विचारवाले उनके अन्य भाई शायद आज भी हिंदू समाज को अंधविश्वास से निकलने नहीं देना चाहते, वह राष्ट्रीयता की हांक लगाकर भी भावी हिंदू समाज को पुरोहितों और पुजारियों ही का शिकार बनाए रखना चाहते हैं. मगर हम उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि हिंदू-समाज उनके प्रयत्नों और सिरतोड़ कोशिशों के बावजूद अब आंखें खोलने लगा है और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि जिन कहानियों को ‘निर्मल’ जी ब्राह्मण-द्रोही बताते हैं, वह सब उन्हीं पत्रिकाओं में छपी थीं, जिनके संपादक स्वयं ब्राह्मण थे. मालूम नहीं ‘निर्मल’ जी ‘वर्तमान’ के संपादक श्री रमाशंकर अवस्थी, ‘सरस्वती’ के संपादक श्री देवीदत्त शुक्ल, ‘माधुरी’ के संपादक पं. रूपनारायण पांडे, ‘विशाल भारत’ के संपादक श्री बनारसीदास चतुर्वेदी आदि सज्जनों को ब्राह्मण समझते हैं या नहीं, पर इन सज्जनों ने उन कहानियों को छापते समय जरा भी आपत्ति न की थी. वे उन कहानियों को आपत्तिजनक समझते, तो कदापि न छापते. हम उनका गला तो दबा न सकते थे. मुरव्वत में पड़कर भी आदमी अपने धार्मिक विश्वास को तो नहीं त्याग सकता.  ये कहानियां उन महानुभावों ने इसीलिए छापीं, कि वे भी हिंदू समाज को टकेपंथियों के जाल से निकालना चाहते हैं, वे ब्राह्मण होते हुए भी इस ब्राह्मण जाति को बदनाम करने वाले जीवों का समाज पर प्रभुत्व नहीं देखना चाहते. हमारा खयाल है कि टकेपंथियों से जितनी लज्जा उन्हें आती होगी, उतनी दूसरे समुदायों को नहीं आ सकती, क्योंकि यह धर्मोपजीवी दल अपने को ब्राह्मण कहता है. हम कायस्थ कुल में उत्पन्न हुए हैं और अभी तक उस संस्कार को न मिटा सकने के कारण किसी कायस्थ को चोरी करते या रिश्वत लेते देखकर लज्जित होते हैं. ब्राह्मण क्या इसे पसंद कर सकता है, कि उसी समुदाय के असंख्य प्राणी भीख मांगकर, भोले-भाले हिंदुओं को ठगकर, बात-बात में पैसे वसूल करके, निर्लज्जता के साथ अपने धर्मात्मापन का ढोंग करते फिरें. यह जीवन व्यवसाय उन्हीं को पसंद आ सकता है, जो खुद उसमें लिप्त हैं और वह भी उसी वक्त तक, जब तक कि उनकी अंधस्वार्थ भावना प्रचंड है और भीतर की आंखें बंद हैं. आंखें खुलते ही वह उस व्यवसाय और उस जीवन से घृणा करने लगेंगे. हम ऐसे सज्जनों को जानते हैं, जो पुरोहित कुल में पैदा हुए, पर शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद उन्हें वह टकापंथपन इतना जघन्य जान पड़ा कि उन्होंने लाखों रुपए साल की आमदनी पर लात मार स्कूल में अध्यापक होना स्वीकार कर लिया. आज भी कुलीन ब्राह्मण पुरोहितपन और पुजारीपन को त्याज्य समझता है और किसी दशा में भी यह निकृष्ट जीवन अंगीकार न करेगा. ब्राह्मण वह है, जो निस्पृह हो, त्यागी हो और सत्यवादी हो. सच्चे ब्राह्मण महात्मा गांधी, मदनमोहन मालवीय जी हैं, नेहरू हैं, सरदार पटेल हैं, स्वामी श्रद्धानंद हैं. वह नहीं जो प्रातःकाल आपके द्वार पर करताल बजाते हुए- ‘निर्मलपुत्र देहि भगवान’ की हांक लगाने लगते हैं, या गणेश-पूजा और गौरी पूजा और अल्लम-गल्लम पूजा पर यजमानों से पैसे रखवाते हैं, या गंगा में स्नान करने वालों से दक्षिणा वसूल करते हैं, या विद्वान होकर ठाकुर जी और ठकुराइन जी के श्रृंगार में अपना कौशल दिखाते हैं, या मंदिरों में मखमली गावतकिये लगाये वेश्याओं का नृत्य देखकर भगवान से लौ लगाते हैं.

हिंदू बालक जब से धरती पर आता है और जब तक वह धरती से प्रस्थान नहीं कर जाता, इसी अंधविश्वास और अज्ञान के चक्कर में सम्मोहित पड़ा रहता है और नाना प्रकार के दृष्टांतों से मनगढ़ंत किस्से कहानियों से, पुण्य और धर्म के गोरखधंधों से, स्वर्ग और नरक की मिथ्या कल्पनाओं से, वह उपजीवी दल उनकी सम्मोहनावस्था को बनाए रखता है. और उनकी वकालत करते हैं हमारे कुशल पत्रकार ‘निर्मल’ जी, जो राष्ट्रवादी हैं. राष्ट्रवाद ऐसे उपजीवी समाज को घातक समझता है और समाजवाद में तो उसके लिए स्थान ही नहीं. और हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं उसमें तो जन्मगत वर्णों की गंध तक न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय. उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी ब्राह्मण होंगे, या सभी हरिजन होंगे. कुछ मित्रों की यह राय हो सकती है कि माना टकेपंथी समाज निकृष्ट है, त्याज्य है, पाखंडी है, लेकिन तुम उसकी निंदा क्यों करते हो, उसके प्रति घृणा क्यों फैलाते हो, उसके प्रति प्रेम और सहानुभूति क्यों नहीं दिखलाते, घृणा तो उसे और भी दुराग्रही बना देती है और फिर उसके सुधार की संभावना भी नहीं रहती. इसके उत्तर में हमारा यही नम्र निवेदन है कि हमें किसी व्यक्ति या समाज से कोई द्वेष नहीं, हम अगर टकेपंथीपन का उपहास करते हैं, तो जहां हमारा एक उद्देश्य यह होता है कि समाज में से ऊंच-नीच, पवित्र-अपवित्र का ढोंग मिटावें, वहां दूसरा उद्देश्य यह भी होता है कि टकेपंथियों के सामने उनका वास्तविक और कुछ अतिरंजित चित्र रखें, जिसमें उन्हें अपने व्यवसाय, अपनी धूर्तता, अपने पाखंड से घृणा और लज्जा उत्पन्न हो, और वे उसका परित्याग कर ईमानदारी और सफाई की जिंदगी बसर करें और अंधकार की जगह प्रकाश के स्वयंसेवक बन जाएं. ‘ब्रह्मभोज’ और ‘सत्याग्रह’ नामक कहानियों ही को देखिए, जिन पर ‘निर्मल’ जी को आपत्ति है. उन्हें पढ़ कर क्या यह इच्छा होती है कि चौबे जी या पंडित जी का अहित किया जाए? हमने चेष्टा की है कि पाठक के मन में उनके प्रति द्वेष न उत्पन्न हो, हां परिहास द्वारा उनकी मनोवृत्ति दिखाई है. ऐसे चौबों को देखना हो, तो काशी या वृंदावन में देखिए और ऐसे पंडितों को देखना हो तो, वर्णाश्रम स्वराज्य संघ में चले जाइए, और निर्मल जी पहले ही उस धर्मात्मा दल में नहीं जा मिले हैं, तो अब उन्हें चटपट उस दल में जा मिलना चाहिए, क्योंकि वहां उन्हीं की मनोवृत्ति के महानुभाव मिलेंगे. और वहां उन्हें मोटेराम जी के बहुत से भाई-बंधु मिल जाएंगे, जो उनसे कहीं बड़े सत्याग्रही होंगे. हमने कभी इस समुदाय की पोल खोलने की चेष्टा नहीं की, केवल मीठी चुटकियों से और फुसफुसे परिहास से काम लिया, हालांकि जरूरत थी बर्नाड शाॅ जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति की, जो घन से चोट लगाता है.

हिंदू बालक जब से धरती पर आता है और जब तक वह धरती से प्रस्थान नहीं कर जाता, इसी अंधविश्वास और अज्ञान के चक्कर में सम्मोहित पड़ा रहता है और नाना प्रकार के दृष्टांतों से मनगढ़ंत किस्से कहानियों से, पुण्य और धर्म के गोरखधंधों से, स्वर्ग और नरक की मिथ्या कल्पनाओं से, वह उपजीवी दल उनकी सम्मोहनावस्था को बनाए रखता है

निर्मल जी को इस बात की बड़ी फिक्र है कि आज के पचास साल बाद के लोग जो हमारी रचनाएं पढ़ेंगे, उनके सामने ब्राह्मण समाज का कैसा चित्र होगा और वे हिंदू समाज से कितने विरक्त हो जाएंगे. हम पूछते हैं कि महात्मा गांधी के हरिजन आंदोलन को लोग आज के एक हजार साल के बाद क्या समझेंगे? यह कि हरिजनों को ऊंची जाति के हिंदुओं ने कुचल रखा था. हमारे लेखों से भी आज के पचास साल बाद लोग यही समझेंगे कि उस समय हिंदू समाज में इसी तरह के पुजारियों, पुरोहितों, पंडों, पाखंडियों और टकेपंथियों का राज था और कुछ लोग उनके इस राज को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न कर रहे थे. निर्मल जी इस समुदाय को ब्राह्मण कहें, हम नहीं कह सकते. हम तो उसे पाखंडी समाज कहते हैं, जो अब निर्लज्जता की पराकाष्ठा तक पहुंच चुका है. ऐतिहासिक सत्य चुप-चुप करने से नहीं दब सकता. साहित्य अपने समय का इतिहास होता है, इतिहास से कहीं अधिक सत्य. इसमें शर्माने की बात अवश्य है कि हमारा हिंदू समाज क्यों ऐसा गिरा हुआ है और क्यों आंखें बंद करके धूर्तों को अपना पेशवा मान रहा है और क्यों हमारी जाति का एक अंग पाखंड को अपनी जीविका का साधन बनाए हुए है, लेकिन केवल शर्माने से तो काम नहीं चलता. इस अधोगति की दशा सुधार करना है. इसके प्रति घृणा फैलाइए, प्रेम फैलाइए, उपहास कीजिए या निंदा कीजिए सब जायज है और केवल हिंदू-समाज के दृष्टिकोण से ही नहीं जायज है, उस समुदाय के दृष्टिकोण से भी जायज है, जो मुफ्तखोरी, पाखंड और अंधविश्वास में अपनी आत्मा का पतन कर रहा है और अपने साथ हिंदू-जाति को डुबोए डालता है. हमने अपने गल्पों में इस पाखंडी समुदाय का यथार्थ रूप नहीं दिखाया है, वह उससे कहीं पतित है, उसकी सच्ची दशा हम लिखें, तो शायद निर्मल जी को तो न आश्चर्य होगा, क्योंकि वह उसी समुदाय के एक व्यक्ति हैं, लेकिन हिंदू समाज की जरूर आंखें खुल जाएंगी, मगर यह हमारी कमजोरी है कि बहुत सी बातें जानते हुए भी उनके लिखने का साहस नहीं रखते और अपने प्राणों का भय भी है, क्योंकि यह समुदाय कुछ भी कर सकता है. शायद इस सांप्रदायिक प्रसंग को इसीलिए उठाया भी जा रहा है कि पंडों और पुरोहितों को हमारे विरुद्ध उत्तेजित किया जाए.

निर्मल जी ने हमें ‘आदर्शवाद’ और कला के विषय में भी कुछ उपदेश देने की कृपा की है, पर हम यह उपदेश ऐसों से ले चुके हैं, जो उनसे कहीं ऊंचे हैं. आदर्शवाद इसे नहीं कहते कि अपने समाज में जो बुराइयां हों, उनके सुधार के बदले उनपर परदा डालने की चेष्टा की जाए, या समाज को एक लुटेरे समुदाय के हाथों लुटते देखकर जबान बंद कर ली जाए. आदर्शवाद का जीता-जागता उदाहरण हरिजन-आंदोलन हमारी आंखों के सामने है. निर्मल जी जबान में तो इस आंदोलन के विरुद्ध कुछ कहने का साहस नहीं रखते, लेकिन उनके दिल में घुसकर देखा जाए तो मंदिरों का खुलना और मंदिरों के ठेकेदारों के प्रभुत्व का मिटना, उन्हें जहर ही लग रहा होगा, मगर बेचारे मजबूर हैं, क्या करें?

निर्मल जी हमें ब्राह्मण द्वेषी बता कर संतुष्ट नहीं हुए. उन्होंने हमें हिंदू द्रोही भी सिद्ध किया है, क्योंकि हमने अपनी रचनाओं में मुसलमानों को अच्छे रूप में दिखाया है. तो क्या आप चाहते हैं, हम मुसलमानों को भी उसी तरह चित्रित करें, जिस तरह पुरोहितांे और पाखंडियों को करते हैं? हमारी समझ में मुसलमानों से हिंदू जाति को उसकी शतांश हानि नहीं पहुंची है, जितनी इन पाखंडियों के हाथों पहुंची और पहुंच रही है. मुसलमान हिंदू को अपना शिकार नहीं समझता, उसकी जेब से धोखा देकर और अश्रद्धा का जादू फैलाकर कुछ ऐंठने की फिक्र नहीं करता. फिर भी मुसलमानों को मुझसे शिकायत है कि मैंने उनका विकृत रूप खींचा है. हम ऐसे मुसलमान मित्रों के खत दिखा सकते हैं, जिन्होंने हमारी कहानियों में मुसलमानों के प्रति अन्याय दिखाया है. हमारा आदर्श सदैव से यह रहा है कि जहां धूर्तता और पाखंड और सबलों द्वारा निर्बलों पर अत्याचार देखो, उसको समाज के सामने रखो, चाहे हिंदू हो, पंडित हो, बाबू हो, मुसलमान हो, या कोई हो. इसलिए हमारी कहानियों में आपको पदाधिकारी, महाजन, वकील और पुजारी गरीबों का खून चूसते हुए मिलेंगे, और गरीब किसान, मजदूर, अछूत और दरिद्र उनके आघात सहकर भी अपने धर्म और मनुष्यता को हाथ से न जाने देंगे, क्योंकि हमने उन्हीं में सबसे ज्यादा सच्चाई और सेवा भाव पाया है. और यह हमारा दृढ़ विश्वास है कि जब तक यह सामुदायिकता और सांप्रदायिकता और यह अंधविश्वास हम में से दूर न होगा, जब तक समाज को पाखंड से मुक्त न कर लेंगे तब तक हमारा उद्धार न होगा. हमारा स्वराज्य केवल विदेशी जुए से अपने को मुक्त करना नहीं है, बल्कि सामाजिक जुए से भी, इस पाखंडी जुए से भी, जो विदेशी शासन से कहीं अधिक घातक है, और हमें आश्चर्य होता है कि निर्मल जी और उनकी मनोवृत्ति के अन्य सज्जन कैसे इस पुरोहिती शासन का समर्थन कर सकते हैं. उन्हें खुद इस पुरोहितपन को मिटाना चाहिए, क्योंकि वह राष्ट्रवादी हैं. अगर कोई ब्राह्मण, कायस्थों के करारदाद की, उनके मदिरा सेवन की, या उनकी अन्य बुराइयों की निंदा करे, तो मुझे जरा भी बुरा न लगेगा. कोई हमारी बुराई दिखाए और हमदर्दी से दिखाए, तो हमें बुरा लगने या दांत किटकिटाने का कोई कारण नहीं हो सकता. मिस मेयो ने जो बुराइयां दिखाई थीं उनमें उसका दूषित मनोभाव था. वह भारतीयों को स्वराज्य के अयोग्य सिद्ध करने के लिए प्रमाण खोज रही थीं. क्या निर्मल जी मुझे भी ब्राह्मण-द्रोही, हिंदू-द्रोही की तरह स्वराज्य-द्रोही भी समझते हैं?

अंत में मैं अपने मित्र निर्मल जी से बड़ी नम्रता के साथ निवेदन करूंंगा कि पुरोहितों के प्रभुत्व के दिन अब बहुत थोड़े रह गए हैं और समाज और राष्ट्र की भलाई इसी में है कि जाति से यह भेद-भाव, यह एकांगी प्रभुत्व, यह खून चूसने की प्रवृत्ति मिटाई जाए, क्योंकि जैसा हम पहले कह चुके हैं, राष्ट्रीयता की पहली शर्त वर्णव्यवस्था, ऊंच-नीच के भेद और धार्मिक पाखंड की जड़ खोदना है. इस तरह के लेखों से आपको आपके पुरोहित भाई चाहे अपना हीरो समझें और मंदिर के महंतों और पुजारियों की आप पर कृपा हो जाए, लेकिन राष्ट्रीयता को हानि पहुंचती है और आप राष्ट्र-प्रेमियों की दृष्टि में गिर जाते हैं. आप यह ब्राह्मण समुदाय की सेवा नहीं, उसका अपमान कर रहे हैं.

अफीम की घुट्टी है राष्ट्रवाद

UP Dalit by Shailendra Pandey P (39) web

भाजपा सरकार एक तरफ आंबेडकर को अपना नायक बताने की कोशिश करती है और दूसरी तरफ दलित बुद्धिजीवियों समेत दलित समुदाय पर हमले भी कर रही है. बात एकदम साफ है. आंबेडकर का एक तरह से एप्रोप्रिएशन यानी अपनाने की प्रक्रिया तो बहुत पुरानी स्थिति है. यह एक ऐतिहासिक तथ्य है. पहले भी यह कहा जाता था कि ये तो प्रात: स्मरणीय हैं. इनकी फोटो लगानी चाहिए, लेकिन आप देखेंगे कि वह सब 92 के बाद शुरू होता है. जब यह देखने में आया कि बहुजन समाज पार्टी अब उठान पर है, दलित समाज में आत्मनिर्भर राजनीति की तरफ रुझान है तो यह हुआ कि अब किसी तरह से इस समुदाय को रोका जाए. उसको रोकने के लिए इन्होंने, जो गैर-जाटव था, गैर-चमार था, उसे रोकने का प्रयास किया. जो छोटी-छोटी जातियां थीं, जैसे धोबी था, वाल्मीकि है, पासी है, कोरी है, उन सबको कोआॅप्ट करना शुरू किया. लेकिन वास्तविकता तो यही है कि उनके नायक बाबा साहब आंबेडकर की फोटो को अंगीकार कर सकते हैं, लेकिन उनकी विचारधारा को अंगीकार नहीं कर सकते. क्योंकि उनकी विचारधारा हिंदू सामाजिक व्यवस्था पर बहुत बड़ा प्रहार करती है और इसकी जो श्रेणीबद्ध और असमानता वाली संरचनाएं हैं, उनका रहस्योद्घाटन करती हैं, उनका पर्दाफाश करती हैं कि दलितों की आज जो स्थिति है वह दरअसल धर्मग्रंथों और ब्राह्मणवाद के कारण है. क्या यह भाजपा या आरएसएस को स्वीकार्य होगा? हमें नहीं लगता कि स्वीकार्य होगा. अगर स्वीकार्य नहीं है तो सिर्फ अंगीकरण तो हो ही नहीं सकता. मुझे लगता है कि जो छद्मवाद था कि केवल और केवल फोटो लगाकर उन्हें कोआॅप्ट किया जाए, उनका स्मारक बना दिया जाए, उन पर अंक निकाला जाए, उनका बंगला खरीद लिया जाए, लंदन में उनकी मूर्ति लगा दी जाए, हिंदू मिल की जमीन उनको दे दी जाए, तो ये जो भौतिक प्रतीक के रूप में उनको अंगीकार करना है. वास्तविकता में इससे बाबा साहब अांबेडकर की फोटो का जो अंगीकार है उसका अर्थ दलित जनों को अंगीकार करना नहीं है. यह भी देखा जा सकता है कि बाबा साहब अांबेडकर की फोटो का तो आपने कोआॅप्शन किया ही किया बाद में कुछ दलित लीडरों को भी अपने साथ कर लिया. रामदास अठावले, रामविलास पासवान, उदित राज उर्फ रामराज… तो ये लोग ऐसे लीडर हैं जिनके पास कोई जनाधार अब नहीं बचा था. इसे बिहार चुनाव में देखा जा सकता है, जहां रामविलास पासवान कितनी बुरी तरह परास्त होते हैं. मांझी को कोआॅप्ट कर लेते हैं आप, लेकिन मांझी भी शिथिल हो जाते हैं. तो ये सब यह बताता है कि बाबा साहब की फोटो और दलित नेताओं को अंगीकार करने से यह जरूरी नहीं है कि दलितों का भी अंगीकार हो सके. ये अलग-अलग बातें हैं.

पिछली कांग्रेस की सरकार में छह ऐसे दलित थे, जो राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता के सीधे भागीदार थे. स्पीकर थीं मैडम मीरा कुमार, वे दलित थीं. गृहमंत्री जो थे, वे दलित थे, पहली सांस्कृतिक मंत्री जो थीं, वे भी दलित थीं और सशक्तीकरण एवं न्याय मंत्री तो दलित होता ही होता है. खड़गे रेलवे मंत्री थे. इसके साथ ही पीएल पुनिया को भी मंत्री बनाया गया था. तो छह-सात लोग दलित वर्ग से दिखाई पड़ते थे. आज अगर भारतीय जनता पार्टी की सरकार में देखें तो 10 मंत्री ब्राह्मण हैं. एक मंत्री है जो दलित है.. मैं कैबिनेट मंत्री की बात कर रहा हूं. पार्लियामेंट्री बोर्ड में 12 सदस्य हैं जिनमें से 7 ब्राह्मण हैं और बाकी एक सदस्य ही दलित है. लेकिन न उसमें आदिवासी है, न ही महिला है. तो इस तरह यह साफ दिखाई दे रहा है कि बाबा साहब की फोटो और दलित नेताओं के कोआॅप्शन का यह मतलब नहीं है कि दलितों को प्रतिनिधित्व भी मिलेगा. अगर प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा तो सत्ता में भागीदारी कैसे करेंगे?

जब आप राष्ट्रवाद पर बहस करेंगे तो जनसामान्य के मुद्दे गौण हो जाएंगे. भूख, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, किसानों की आत्महत्या, दलितों का शोषण, जातीय शोषण, धार्मिक शोषण, ये सब का सब गौण हो जाएगा. तो जब इनके मुद्दे पर कोई बात नहीं करेगा तो कीमत तो यही लोग चुकाएंगे. राष्ट्रवाद की बनावट में यह है, कि वह शोषण और शोषित, दोनों को नहीं देखती. यह अफीम की घुट्टी होती है.

वे किसी तरह की डिबेट नहीं चाहते. ग्वालियर में ‘बाबा साहब के सपनों का भारत’ विषय पर बहस थी, जिस कार्यक्रम में मैं भी था. आंबेडकर विचार मंच ने कार्यक्रम रखा था. दलित श्रोता थे, दलित वक्ता और दलित मंच. अब इसके विरोध में आप हिंसात्मक प्रदर्शन करें, तो यह तो कोई बात नहीं हुई. अंदर घुसने से मना करने पर उन्होंने गोली चलाई

जिन प्रोफेसरों पर हमला हुआ, वे सब चर्चा करते हैं और तथ्यात्मक चर्चा करते हैं. लेकिन आपके राष्ट्रवाद में जो छद्म है, उसमें झंडा, जमीन और जवान, ये तो दिखाई पड़ रहा है, लेकिन आप लोगों की बात नहीं कर रहे हो. लोगों की बात जब आप नहीं करते तो आप बड़ी सतही जमीन पर टिके हैं, इसलिए ये लोग वाद-विवाद या चर्चा नहीं चाहते, ये सीधे मारकर हटा देना चाहते हैं. यह इनका तरीका है कि जब हिंसक होकर आप आएंगे तो फिर कौन डिबेट करेगा आपसे. वे डिबेट नहीं चाहते. ग्वालियर में ‘बाबा साहब के सपनों का भारत’ विषय पर बहस थी, जिस कार्यक्रम में मैं भी था. आंबेडकर विचार मंच ने कार्यक्रम रखा था. दलित श्रोता थे, दलित वक्ता और दलित मंच. अब इसके विरोध में आप हिंसात्मक प्रदर्शन करें, तो यह तो कोई बात नहीं हुई. वे हिंसात्मक होकर सीधे अंदर चले आए थे और उन्होंने हिंसा की. अंदर घुसने से मना करने पर उन्होंने गोली चलाई.

राष्ट्र और राष्ट्रवाद दो अलग चीजें हैं और राष्ट्र-राज्य तीसरी चीज है. राष्ट्र एक सामाजिक अवधारणा है जिसके भीतर ‘हम’ की भावना होती है और सांस्कृतिक पूंजी, सांस्कृतिक धरोहर होती है जो ऐतिहासिक काल से लगातार चली आ रही है. उसके साझा मूल्य से राष्ट्र बनता है. ये धर्म, भाषा और प्रांत इन सबका कोई मतलब नहीं है राष्ट्रवाद से. लेकिन राष्ट्रवाद वैचारिक अवधारणा है. इसे कई आधारों पर सृजित किया जा सकता है. इसमें सबसे बड़ी बात दूसरेपन की भावना. यानी कि ये दूसरे लोग हैं, बाहर के लोग हैं. इसमें इनसाइडर और आउटसाइडर की डिबेट होती है.

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भारतवर्ष में दो धर्म हैं, विशेष रूप से. एक है ईसाई और दूसरा है इस्लाम. इनको आक्रांताओं वाला धर्म कहा जाता है, बाहर से आए हुए. अब इस आधार पर इन्हें मिलाया कैसे जाए. तो इसके आधार पर इनके खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सकती है और दूसरों को लामबंद किया जा सकता है. यह कहा जाता है कि इन लोगों की पुण्यभूमि तो बाहर है, ये इस राष्ट्र के कैसे हो सकते हैं और अगर इनको होना है तो फिर इनको बदलना पड़ेगा. गुरु गोलवलकर की जो ‘बंच आॅफ थॉट्स’ है उसमें वे क्या कहते हैं? वे कहते हैं कि हम इन पर कैसे भरोसा करें? बाहर के हैं ये. इनको अपना सब कुछ बदलना पड़ेगा, अपना इतिहास भूलना पड़ेगा, इन्हें यहीं का होकर रहना पड़ेगा. तो यह जो अवधारणा है, यह तो राजनीतिक अवधारणा है. इसके भीतर सामाजिकता, ‘हम’ की भावना, शेयर्डनेस, खुशी में खुशी और दुख में दुखी, इस प्रकार की धरोहर को संजोकर चलने की प्रक्रिया कहां है, बताइए. इसमें कहां दिखाई पड़ रही है? इसमें तो ये कह रहे हैं कि ‘भई माइट इज राइट’, मैं जो कह रहा हूं, वही सही है.

देशप्रेम क्या है? देश क्या है, यह नहीं समझ में आ रहा. आप कह रहे हैं, झंडा और टेरेटरी देश है. लेकिन लोग कहां गए उसमें? भारत के टुकड़े-टुकड़े करने का मतलब हुआ कि यहां के लोगों को खंड-खंड करना. राष्ट्र की जो अवधारणा है, वह है अधिकार के साथ व्यक्तियों का स्वप्रतिनिधित्व. जब अधिकार होंगे तो ही आप गवर्न कर पाएंगे न? बिना अधिकारों के कोई राष्ट्र सृजित नहीं होता, यह बाबा साहब भी मानते थे. अगर भाषा के आधार पर राष्ट्र सृजित होता तो अमेरिका और इंग्लैंड एक होने चाहिए थे, वे एक ही होते. क्योंकि वे दोनों ही अंग्रेजी बोलते हैं, साउथ अफ्रीका भी अंग्रेजी बोलता है. तो भाषा अगर आधार है, तो दो राष्ट्र, तीन राष्ट्र, पांच राष्ट्र कैसे हो गए? और भारतवर्ष में भी कुछ-कुछ अंग्रेजी बोली जाती है. कुछ पर्सेंट तो बोलते ही बोलते हैं. धर्म के आधार पर भी राष्ट्र सृजित नहीं होता. अगर ऐसा होता तो हिंदुस्तान और नेपाल दो राष्ट्र नहीं होते. तो इसलिए बाबा साहब का मानना था कि राष्ट्र की अवधारणा दर्शन के तौर पर तो एक विचार है लेकिन वास्तविकता में यह कई समूहों का जमावड़ा है. अगर राष्ट्र का सृजन होना है तो सभी समूहों के अनुपातिक अधिकारों को स्वतः प्रतिनिधित्व के लिए दिया जाना चाहिए, तब राष्ट्र बनेगा. अर्नेस्ट रेनन, कैलनर या मार्शल मोजेज, ये सब यही बता रहे हैं. लेकिन आप यह देखिए कि हम कर क्या रहे हैं. हम रिड्यूस कर रहे हैं, प्रतीकों के माध्यम से, व्यक्तियों को छोड़ रहे हैं, समूहों को छोड़ रहे हैं. समूहों के अधिकारों की तिलाजंलि देकर हम केवल प्रतीकों के माध्यम से राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र की बात कर रहे हैं. बड़े ही सेलेक्टिव ढंग से हम प्रतीक चुनते हैं. कभी गाय में राष्ट्रवाद ढूंढ़ने लगते हैं, कभी झंडे में ढूंढ़ने लगते हैं, कभी हम जमीन में ढूंढ़ने लगते हैं और कभी जेएनयू में ढूंढ़ने लगते हैं. और हमारा राष्ट्रवाद क्या इतना क्षीण है कि चार लड़कों के नारों से यह टूट जाएगा? तो कहीं न कहीं गहरी राजनीतिक साजिश दिखाई पड़ती है. आप कह सकते हैं कि व्यक्ति को छोड़कर, व्यक्ति के अधिकारों को छोड़कर, उनकी पीड़ा, उनका शोषण, उनकी उलाहना छोड़कर आप केवल और केवल ध्वज की बात कर रहे हैं, टेरिटरी की बात कर रहे हैं.

धर्म के आधार पर भी राष्ट्र सृजित नहीं होता. अगर ऐसा होता तो हिंदुस्तान और नेपाल दो राष्ट्र नहीं होते. बाबा साहब का मानना था कि राष्ट्र की अवधारणा एक विचार है लेकिन वास्तविकता में यह कई समूहों का जमावड़ा है. अगर राष्ट्र का सृजन होना है तो सभी समूहों के अनुपातिक अधिकारों को स्वतः  प्रतिनिधित्व के लिए दिया जाना चाहिए, तब राष्ट्र बनेगा

मेरा यह मानना है कि बाबरी मस्जिद की घटना हुई, क्या बाबरी मस्जिद घटना राष्ट्रवाद की निशानी है? 2002 में जो गुजरात में हुआ, क्या वह राष्ट्रवाद की घटना थी? आजकल गोडसे की सराहना की जा रही है, क्या वह राष्ट्रवाद की घटना है? तो राष्ट्रवाद में यदि आप समायोजित सांस्कृतिक समरसता की बात कर रहे हैं तो व्यक्तियों के प्रतिनिधित्व के अधिकार की भी तो बात करेंगे आप! उस पर बहस क्यों नहीं चलाई जा रही है? आप सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जो बात कर रहे हैं, मुझे नहीं लगता है कि उस परिभाषा के अंदर भारतीय समाज संगठित या एकत्रित रह सकता है, क्योंकि आप किसी भी राष्ट्र पर एकात्म तरीके से एकाधिकारवादी प्रवृत्ति के तहत केवल एक विचारधारा को नहीं थोप सकते. यहां विभिन्न विचारधाराएं पनपती हैं और विभिन्नता में एकता हम लोग पढ़ते-पढ़ते बुढ़ा गए हैं.

अब शिवाजी जयंती पर महाराष्ट्र में क्या हुआ? एक मुस्लिम पुलिसवाले को जबरदस्ती क्या-क्या कहना पड़ा. तो यह तो पराकाष्ठा हो गई न. उसके बाद आप वेमुला का केस देखिए. अब उसमें आप ये तक कहने लगे कि वह दलित नहीं है. उसकी मौत पर भी जाति अस्मिता का संज्ञान लेने की आवश्यकता पड़ती है. और भड़ाना में क्या हुआ, पानीपत में क्या हुआ? उधर लव जिहाद भी चला, घर वापसी भी चली और अभी कोसी परिक्रमा दोबारा शुरू होने वाली है. मेरा यह मानना है कि जो घटनाएं हैं वे स्वतः प्रमाणित करती हैं कि असहिष्णुता कहीं न कहीं बढ़ रही है. संस्कृतिकर्मियों ने अपना मैडल वापस कर दिया, मैं उनकी बात नहीं कर रहा क्योंकि भारत की संस्कृति केवल और केवल उनके माध्यम से नहीं है. इस संस्कृति का एक बृहत आयाम है, जिसके भीतर हजारों-लाखों गांवों के रहने वाले लोग, आदिवासी लोग हैं. वे संस्कृति को चला रहे हैं और जिसका आप नाम भी नहीं लेते हैं, जिनके ऊपर हमारी भारतीय संस्कृति टिकी हुई है.

(लेखक  जेएनयू में प्रोफेसर हैं)

(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)

अपना-अपना राष्ट्रवाद

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जिस समय भारतीय संसद में राष्ट्रवाद पर बहस हो रही थी, उसी समय देश के कई हिस्सों में कथित राष्ट्रवादी समूहों की उच्छृंखल कार्रवाइयां भी जारी थीं. कई जगहों पर हिंदूवादी संगठन बुद्धिजीवियों के साथ मारपीट करने और सेमिनार आदि में व्यवधान डालने जैसे कारनामे कर रहे थे. करीब एक दर्जन विश्वविद्यालयों में आरएसएस की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) छात्रों से या शिक्षकों से भिड़ी हुई है. एबीवीपी का कहना है कि वे लोग ‘देशद्रोही’ हैं और ‘देशद्रोही गतिविधियों’ में लिप्त हैं.

23 फरवरी को डीयू के प्रोफेसर अपूर्वानंद ने इंडियन एक्सप्रेस अखबार में एक लेख लिखा, जिसे लखनऊ के समाजशास्त्र के प्रोफेसर राजेश मिश्रा ने फेसबुक पर शेयर किया. उन्होंने पोस्ट पर लिखा, ‘यह राजनीतिक विचारधारा में अंतर के बावजूद अभिव्यक्ति के लोकतांत्रिक अधिकारों का समर्थन करने के लिए है.’ उनकी इस पोस्ट पर एबीवीपी ने उनका पुतला फूंका. कक्षाएं नहीं चलने दीं. एबीवीपी के एक सदस्य अनुराग तिवारी ने बयान दिया कि ‘वे देशद्रोही हैं. जब वे यूनिवर्सिटी परिसर में आएंगे, तो मैं जूतों का हार पहनाकर उनका स्वागत करूंगा.’ विश्वविद्यालय ने प्रोफेसर को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया. हालांकि, उस लेख के लेखक अपूर्वानंद और अखबार पर कोई सवाल नहीं है. एबीवीपी को आपत्ति इसलिए है कि वह लेख जेएनयू विवाद के बाद चर्चा में आए उमर खालिद के समर्थन में था.

‘राष्ट्रवाद का यह जो छद्म है, यह फासीवाद की ओर ले जाता है. फासीवाद इसी पर टिका होता है. यह हिस्ट्री रिपीट्स इटसेल्फ वाला मामला है. बुद्धिजीवियों पर हमला उसी प्रयोग की पहली कड़ी है’

अपूर्वानंद कहते हैं, ‘अब देखिए कि मूर्खता किस हद तक जा रही है कि वह लेख राजेश मिश्रा ने लिखा नहीं है, सिर्फ शेयर किया है. उस लेख में कोई हिंसा का आह्वान नहीं है. लेकिन उनके खिलाफ हिंसा होती है और उन्हीं को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया जाता है. हम लोग धीरे-धीरे कहां जा रहे हैं?’

इसी तरह जम्मू विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र विभाग में 18 फरवरी को ‘कश्मीर में बहुलतावाद’ पर सेमिनार हुआ, जिसमें कई विद्वान और पत्रकार शामिल हुए. हिंदूवादी संगठनों ने इसे ‘देशविरोधी’ और ‘पाकिस्तान समर्थक’ गतिविधि बताया, आपत्ति जताई और कुलपति ने विभाग को नोटिस जारी कर दिया.

जनवरी की शुरुआत में ही सामाजिक कार्यकर्ता व मैग्सेसे पुरस्कार विजेता डॉ. संदीप पांडेय को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से बर्खास्त कर दिया गया. वे वहां गेस्ट फैकल्टी थे. उन पर धरना-प्रदर्शन जैसी ‘नक्सली और देशद्रोही’ गतिविधियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया. संदीप पांडेय पर भी यह आरोप एबीवीपी का था, जिसकी शिकायत पर यूनिवर्सिटी प्रशासन ने कार्रवाई की. संदीप पांडेय का कहना है, ‘मैं आपसे पूछता हूं कि अगर मैं नक्सली या देशविरोधी हूं, तो केस दर्ज कर मुझे जेल में डालना चाहिए या फिर मेरा निष्कासन होना चाहिए? दरअसल, यह एक वैचारिक लड़ाई है. हम संघ की विचारधारा के विरुद्ध हैं, इसीलिए ये लोग हमसे परेशान हैं.’ संदीप पांडेय ने अपनी बर्खास्तगी को हाई कोर्ट में चुनौती दी है.

महाराष्ट्र में लातूर जिले के पानगांव में 19 फरवरी को शिवाजी की जयंती मनाने के लिए जमा हुए कुछ लोग भगवा झंडा फहरा रहे थे. यह इलाका सांप्रदायिक तौर पर संवेदनशील है. पानगांव पुलिस चौकी पर तैनात असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर एएसआई यूनुस शेख ने उन्हें भगवा फहराने से रोक दिया. अगले दिन भीड़ ने पुलिस चौकी पर हमला किया और एएसआई यूनुस शेख को पकड़कर उनकी बुरी तरह पिटाई की और उनके हाथ में भगवा झंडा पकड़ाकर पूरे गांव में परेड कराई. भीड़ ने यूनुस से ‘जय भवानी, जय शिवाजी’ के नारे भी लगवाए.

इन सभी घटनाओं के मद्देनजर ही भारतीय संसद में राष्ट्रवाद पर बहस हुई. बहस में राष्ट्रवाद की तमाम परिभाषाएं तो दी गईं लेकिन यह सवाल अनुत्तरित रह गया कि इस तरह की घटनाएं रोकी जाएंगी या नहीं. यह बहस भी इसलिए हुई क्योंकि जेएनयू में कथित देशविरोधी नारे लगने की घटना के बाद वहां के छात्रों पर कार्रवाई को लेकर बहस और आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ. राष्ट्रवाद की इस बहस के बीच हैदराबाद, जेएनयू, इलाहाबाद, बनारस, लखनऊ, ग्वालियर और जम्मू विश्वविद्यालय में अकादमिक जगत पर हुए हमलों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं.

21 फरवरी को ग्वालियर में आंबेडकर विचार मंच की ओर से ‘बाबा साहब आंबेडकर के सपनों का भारत’ विषय पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था. कार्यक्रम में जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार भी शिरकत करने पहुंचे थे. आरोप है कि उनके व्याख्यान के दौरान भारतीय जनता युवा मोर्चा और एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने वहां पहुंचकर उपद्रव शुरू कर दिया. इन कार्यकर्ताओं ने वहां तोड़फोड़ की और हवाई फायर भी किए गए.

प्रो. विवेक कुमार के मुताबिक, ‘वह कोई राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था. आंबेडकर पर केंद्रित अकादमिक कार्यक्रम में व्यवधान डालने का सीधा मतलब है कि वे कार्यक्रम नहीं होने देना चाहते. हिंदूवादी आंबेडकर का नारा तो लगाते हैं, लेकिन यह उनकी मजबूरी है. वे दलितों के विचार-विमर्श को भी रोकना चाहते हैं. कार्यक्रम अांबेडकर विचार मंच ने रखा था. दलित श्रोता थे, दलित वक्ता और दलित मंच. अब इसके विरोध में आप हिंसात्मक प्रदर्शन करें, तो ये कोई बात नहीं हुई. वे एकदम से हिंसात्मक मुद्रा में सीधे अंदर चले आए थे. अंदर घुसने से रोकने पर उन्होंने गोली चलाई.’

‘बुद्घिजीवियों पर हमले इसलिए हो रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ये सब हिंदुत्ववाद या किसी एक तरह की विचारधारा के खिलाफ हैं. देश का नारा है अनेकता में एकता, लेकिन ये लोग एकता में एकता चाहते हैं’

25 फरवरी को इलाहाबाद में वकीलों ने प्रदर्शन कर रहे लोगों पर हमला किया और उनके साथ जमकर मारपीट की. प्रदर्शन करने वाले लोग वामपंथी संगठनों व सिविल सोसायटी के लोग थे. वे रोहित वेमुला और जेएनयू प्रकरण के विरोध में इलाहाबाद कचहरी में धरना-प्रर्दशन कर रहे थे. हमलावर लोगों ने प्रदर्शन कर रहे लोगों को ‘देशद्रोही’ और ‘पाकिस्तान समर्थक’ कहा और उन्हें दौड़ाकर पीटा. हमले में ट्रेड यूनियन के एक कार्यकर्ता अविनाश मिश्रा का सिर फट गया. प्रदर्शन में शामिल महिलाओं को भी पीटा गया. अविनाश का आरोप है, ‘हमला करने वाले वकीलों की ड्रेस में थे, लेकिन वे सभी वकील नहीं थे. यह भाजपा के गुंडों का काम है.’ कथाकार दूधनाथ सिंह ने बताया, ‘हम लोग धरने पर थे. वकील लोग आए. पहले भागने को कहा, मना करने पर मारपीट शुरू कर दी. वहां पर लगे पोस्टर-बैनर सब फाड़ दिए.’

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में 15 फरवरी को एक कार्यक्रम आयोजित था, ‘हाशिये का समाज और आधुनिकता’. जेएनयू के प्रो. बद्रीनारायण इसके मुख्य वक्ता थे. उनके अलावा व्योमेश शुक्ला, चंद्रकला त्रिपाठी, बलिराज पांडे, राजेंद्र शर्मा, नीरज खरे अादि कवियों का काव्य पाठ भी था. ऐसा आरोप है कि इस कार्यक्रम में भी एबीवीपी के करीब सौ लड़कों ने पहुंचकर उपद्रव किया. कार्यक्रम के बीच पहुंचकर उन्होंने ‘बाहर निकालो गद्दारों को, जूता मारो सालों को’ जैसे नारे लगाते हुए माथे पर भगवा पट्टी बांधी और तिरंगा लिए छात्र व्याख्यान कक्ष में घुस गए और कार्यक्रम रुकवा दिया. बद्रीनारायण ने बताया, ‘कार्यक्रम चल रहा था, उसी समय एबीवीपी के कार्यकर्ता आ गए. काफी हंगामा और तोड़फोड़ की. राष्ट्रवाद का यह जो छद्म है, यह फासीवाद की ओर ले जाता है. फासीवाद इसी पर टिका होता है. यह हिस्ट्री रिपीट्स इटसेल्फ वाला मामला है. बुद्धिजीवियों पर हमला उसी प्रयोग की पहली कड़ी है.’

राष्ट्रवाद का चरम दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में दिखा जब हाथ में तिरंगा लेकर कुछ लोग जेएनयू के छात्रों को पीट रहे थे और महिलाओं को, वकीलों को गाली दे रहे थे. मोटी लाठी में बंधा लहराता तिरंगा, भारत माता की जय का नारा और साथ में मां-बहन की गालियों के अनूठे संगम से राष्ट्रवाद का जो चेहरा दिखता है वह बेहद भयानह है.

दूधनाथ सिंह कहते हैं, ‘बौद्धिक जगत का जनता पर बहुत अधिक असर होता है. उनकी संख्या बढ़ ही रही है. अब मसला यह है कि भाजपा और संघ के लोग एक खास तरह का विचार सारी जनता पर लादना चाहते हैं. देश को एकरूपता देना चाहते हैं. देश में जहां इतनी विविधता है, उस पर एक विचार थोपना चाहेंगे तो यह तो संभव नहीं है. इलाहाबाद में हम लोगों पर हमला दिल्ली की घटना का दोहराव था. बौद्धिक जगत पर हमले इसलिए हो रहे हैं कि उन्हें लगता है कि ये सारे प्रोफेसर हिंदुत्ववाद के, किसी एक तरह की विचारधारा या एकरूपता के खिलाफ हैं. जो देश का पुराना नारा है अनेकता में एकता, वह नारा ये लोग नहीं चाहते. ये लोग एकता में एकता चाहते हैं. अब उसमें ये सफल नहीं हो पा रहे हैं तो मारपीट और हिंसा पर उतरते हैं.’

वकीलों के पार्टी या सरकार के पक्ष में हमलावर होने पर चिंता जताते हुए दूधनाथ सिंह कहते हैं, ‘यह वकीलों का मामला बेहद आश्चर्यजनक है. वकील जो न्याय प्रक्रिया से संबंधित है, उसका दिमाग इस तरह से बंद क्यों है? हो सकता है कि दिल्ली की कोर्ट में जो हुआ, उससे इलाहाबाद के वकीलों ने प्रेरणा ली. उस सामान्य धरने से वकीलों को, सरकार को या संघ को क्या परेशानी हो सकती थी?’

जेएनयू के प्रोफेसर सच्चिदानंद सिन्हा कहते हैं, ‘लखनऊ के अध्यापक ने अपूर्वानंद का लेख सिर्फ शेयर किया था, लेकिन उन्हें उसके लिए कारण बताओ नोटिस दे दिया गया. फिर तो अपूर्वानंद को जेल में होना चाहिए था. जबकि वह लेख एक बहुत प्रभावशाली वक्तव्य है. इससे जाहिर है कि वह तबका जिसके पास कोई तर्क नहीं है, वह घबराया हुआ है. क्योंकि जनमानस को यह बात जिस दिन समझ में आती है, वह अपनी पोजिशन लेने को तैयार हो जाता है. जब आम आदमी के बीच बरगलाने वाली बातों को खुलासा होता है, और जनता जागरूक होती है तो ऐसे तबके को सबसे ज्यादा खतरा नजर आता है जिसके पास कोई तर्क नहीं हैं. डंडे के जोर से अपनी बात मनवाना चाहते हैं.  राजनीति में धर्म और लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल हो रहा है. इसका नतीजा यह होने वाला है कि लोगों के बीच बिखराव होगा. जितना ही यह बढ़ेगा, आपको अपना हित साधने का और ज्यादा मौका मिलेगा. यह एक नए तरीके का अछूतवाद या अस्पृश्यतावाद है. पहले जाति के नाम पर था, अब यह धर्म और सोच-विचार के नाम पर किया जा रहा है. मसलन आप लेफ्ट हो, आप जेएनयू वाले हो, आप मुसलमान हो वगैरह. अखबारों या चैनलों को यह भी नहीं मालूम था कि उमर खालिद कश्मीरी नहीं है, लेकिन कोई उसे कश्मीर भेज रहा था, कोई उसे पाकिस्तान भेज रहा था.’

‘जो राष्ट्रवाद पहले से स्वीकृत है, वह बेहद समावेशी है. वह तरह-तरह के विचारों, जीवनशैलियाें व संस्कृतियों को जगह देता है. संघ का राष्ट्रवाद एक ही तरह के राष्ट्र और विचार को स्थापित करना चाह रहा है’

इन घटनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए संघ विचारक राकेश सिन्हा ने कहा, ‘विवेक कुमार की सभा में एबीवीपी का कोई हाथ नहीं था. एबीवीपी के कोई लोग नहीं थे और यह जांच का विषय है कि कभी-कभार किसी संस्था को बदनाम करने के लिए ऐसी हरकतें की जाती हैं. जैसे जो भगवा ध्वज काॅन्स्टेबल को दिया उसकी जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं है. सभी लोगों ने उसकी आलोचना की. लेकिन अगर कोई ताकत इसी तरह का काम करना चाहेगी तो वह इसकी जिम्मेदारी लेगी. कभी-कभी किसी विचारधारा को बदनाम करने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाए जाते हैं.’

दूधनाथ सिंह कहते हैं, ‘देशप्रेम ही तो राष्ट्रवाद है कि हम एक देश में रहते हैं, जिसकी एक व्यवस्था है. इससे अलग राष्ट्रवाद क्या चीज है? अब इनका एजेंडा हिंदू राष्ट्रवाद है. गुरु गोलवलकर की किताब ‘इंडिया डिवाइडेड’ संघ की विचारधारा का आधार है. यह हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद का नारा है. लेकिन आप यह बताइए कि इस देश में केवल हिंदू तो नहीं रहते हैं! अब अगर आप हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के मुताबिक चलेंगे तो देश के और टुकड़े होंगे क्योंकि हर आदमी आपका राष्ट्रवाद नहीं मानेगा. यह हर कहीं आरएसएस का एजेंडा लागू करने की कोशिश है. हमारी जनता की चेतना शायद इस स्तर तक नहीं पहुंची है कि वह चीजों की भीतरी तहों को समझ सके. भाजपा इसी का फायदा उठा रही है.’

बद्रीनारायण कहते हैं, ‘यह जो मुहिम चलाई जा रही है कि हमसे जो असहमत हैं वे राष्ट्रविरोधी हैं, यह बहुत गलत है. जो हमसे सहमत हैं, वे राष्ट्रवादी हैं, जो विरोधी हैं वे राष्ट्रविरोधी हैं, यानी हमारे राष्ट्रवादी स्वरूप का जो समर्थन करता हो, वही राष्ट्रवादी है. किसी दूसरे स्वरूप का समर्थन करने वाला राष्ट्रवादी नहीं है. राष्ट्रवाद का विकास राष्ट्र को आलोचनात्मक ढंग से देखने पर होगा. वही राष्ट्र परिपक्व माना जाता है, जो अपनी आलोचना भी सहता है. जो राष्ट्रवाद अपने यहां पहले से स्वीकृत है, वह बेहद समावेशी है. तरह-तरह के विचारों, तरह-तरह की जीवनशैलियाें, तरह तरह की संस्कृतियों को जगह देता है. ये राष्ट्रवाद जो बार-बार टकराव की स्थिति उत्पन्न कर रहा है, यह एक ही तरह के राष्ट्र और विचार को स्थापित करना चाह रहा है.’

भाजपा के दोहरे मापदंड को रेखांकित करते हुए बद्रीनारायण कहते हैं, ‘भाजपा आंबेडकर को अपना नायक बता रही है, लेकिन उनके लोग हर जगह दलितों पर ही हमला कर रहे हैं. दलितों और दलित राजनीति से भाजपा का संबंध बेहद जटिल रहा है. यह उनके लिए वैसा ही है कि न निगलते बने न उगलते बने. भाजपा दलित समूहों से मेल-मिलाप की कोशिश तो कर रही है, लेकिन वह जानती है कि उनका जो कोर समर्थक है, वह इसे स्वीकार नहीं करेगा. भाजपा का राष्ट्रवाद दरअसल एक छद्म है. लेकिन छद्म को अगर सौ बार बोलो तो वह सच लगने लगता है. वह भावनाओं का दोहन करता है. वह राष्ट्रवादी डिस्कोर्स के साथ भावनाओं का इस्तेमाल करता है. वह राष्ट्र से प्रेम की जो भावनाएं जुड़ी होती हैं, उनका दोहन करता है.’

इन घटनाओें पर प्रतिक्रिया देते हुए इतिहासकार इरफान हबीब कहते हैं, ‘इस पूरी बहस के सहारे कोशिश की जा रही है कि भाजपा और आरएसएस के खिलाफ जो भी लोग हैं उन्हें राष्ट्रविरोधी घोषित किया जाए. यह मुहिम जनता में बंटवारे की कोशिश है. राष्ट्र काफी पुराना शब्द है, उसका मतलब एक देश से होता है. एक ऐसा मुल्क जिसके लोग चेतना संपन्न हों, उन्हें यह एहसास हो कि हम इस मुल्क के हैं और हमारी हुकूमत होनी चाहिए. वह राष्ट्र बनता है. 1947 से पहले तो वही लोग देशभक्त कहे जा सकते थे जो अंग्रेजों के विरोधी हों. उसमें तो आरएसएस और हिंदू महासभा ने कोई खास काम नहीं किया. आरएसएस ने तो बिल्कुल नहीं. 1947 तक इन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ कोई मुहिम नहीं चलाई. मुसलमानों और कांग्रेस का विरोध करते रहे. यह समझ में नहीं आता कि ये कैसी देशभक्ति है! जब देश को देशभक्ति की जरूरत थी तब तो आप मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए. अब बुद्धिजीवियों पर हमले करके यह कोशिश की जा रही है कि वे और लोगों की आवाज बंद कर दें. सरकार जो कर रही है, वह सब राष्ट्रवाद के लिए तो बिल्कुल नहीं है. क्योंकि इससे राष्ट्र को फायदा हो रहा है या वह और बदनाम हो रहा है? ​इससे हमें क्या फायदा होगा? जितना नुकसान वे कर सकते थे, वह कर चुके हैं. राष्ट्रवाद का अर्थ गुंडागर्दी तो बिल्कुल नहीं होता है.’

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राष्ट्रवाद की बहस पुनर्जीवित हुई है

RSS Camps. Photo by Prakash Hatvalne/Tehelka

राष्ट्रवाद की परिभाषा और राष्ट्रवाद का वर्तमान संदर्भ दोनों को समझना पडे़गा. वर्तमान संदर्भ फिर से उस बहस को पुनर्जीवित कर रहा है जिस बहस को 1920 में रोक दिया गया था. मैं 1920 इसलिए कह रहा हूं कि बाल गंगाधर तिलक का निधन 1920 में हुआ था. औपनिवेशिक काल में एक ऐसा युग आया जब महर्षि अरविंद, बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, राजनारायण बसु ऐसे तमाम लोग जो अलग-अलग भाषा और प्रांतों के लोग थे, उन्होंने राष्ट्रवाद की बहस को भारतीय संदर्भ में शुरू करने की कोशिश की. इस बहस ने भारत के राष्ट्रवाद को एक मजबूत धरातल पर प्रस्तुत किया था. राष्ट्रवाद में जो एक नकारात्मकता थी, उसमें एक सकारात्मकता जोड़ने की कोशिश की थी. उनके पूरे मूल्यांकन में, उनकी बहस में प्रगतिशील भारतीय संस्कृति के तत्व थे. उन्होंने कभी रूढ़िवादी तत्वों को इसमें नहीं रखा, प्रगतिशील तत्वों को रखा ताकि राष्ट्रवाद को ताकत मिले. लेकिन हुआ यह कि इन लोगों के बाद राष्ट्रवाद की पूरी बहस यूरोप द्वारा स्थापित मापदंडों के आधार पर शुरू हो गई. यूरोप ने जो राष्ट्रवाद की परिभाषा, जो मापदंड दिया उसके आधार पर शुरू हो गई. वही बहस आज तक चलती रही है. इस बहस में जिन लोगों ने भी हस्तक्षेप करने का काम किया, या तो उनमें मौलिकता नहीं थी या मौलिकता थी तो वह बहुत विवेचनापूर्ण नहीं थी. जिससे तथ्यात्मक बहस पुनर्जीवित नहीं हो पाई. आज जेएनयू की घटना इस बहस को पुनर्जीवित करने का एक निमित्त बन गई. मैं एक संदर्भ तो यह मानता हूं.

मैंने यूरोप की बात इसलिए की, क्योंकि यूरोप और भारत की राष्ट्रवाद की परिभाषा में एक बुनियादी अंतर है. ऐसा नहीं है जो मैं कह रहा हूं यूरोप में सब लोग वही मानते हैं पर मोटे तौर पर, यूरोप के राष्ट्रवाद को पढ़ने से समझ में आता है कि राष्ट्रवाद ने राष्ट्र पैदा किया. साधारणतया देखें तो वहां राष्ट्रवाद पर विमर्श तब शुरू हुआ जब प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद राष्ट्रों का टूटना और जुड़ना शुरू हुआ. भाषा के आधार पर राष्ट्र बनते गए, जातीयता के आधार पर राष्ट्र बनते गए. इसके कारण प्रथम विश्वयुद्ध के बाद, खासकर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वहां राष्ट्रवाद पर विमर्श बहुत तेज हो गया. राष्ट्रवाद पर बहुत-सी किताबें लिखी गईं.

भारतीय राष्ट्रवाद की प्रकृति अलग है. भारत में हमारा मानना है कि राष्ट्र ने राष्ट्रवाद को पैदा किया. वे मानते हैं कि राष्ट्रवाद आधुनिकता का प्रतीक है, आधुनिकता का उत्पाद है और हम मानते हैं कि राष्ट्रवाद एक सनातन सत्य है. इसका आधुनिकता से और पुरातनता से कोई लेना-देना नहीं. इसका मैं एक प्रमाण देता हूं. राधा कुमुद मुखर्जी ने आजादी के बाद जब इस बहस को पुनर्जीवित करने की कोशिश भारतीय विद्या भवन में शुरू की थी तो उन्होंने एक पुस्तिका लिखी और उस पुस्तिका में वेदों में 68 श्लोकों का एक संग्रह प्रस्तुत किया जिसमें राष्ट्र और राष्ट्रवाद यानी मातृभूमि का विशेष उल्लेख है. इस तरह भारत की कल्पना यूरोप की कल्पना से भिन्न है.

कभी-कभी किसी विचारधारा को बदनाम करने के लिए तमाम  हथकंडे अपनाए जाते हैं. मैं यह मानता हूं कि जो लोग आरएसएस के खिलाफ जहर उगलते हैं, अनर्गल बातें करते रहते हैं, क्या वह अभिव्यक्ति पर हमला नहीं है?

दूसरी बात, महर्षि वाल्मिकी ने जो लिखा ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’, इससे एक सकारात्मक राष्ट्रवाद का संकेत  मिलता है कि हम अपनी जन्मभूमि को स्वर्ग से भी ज्यादा बहुमूल्य और महत्वपूर्ण मानते हैं. तो अब मैं कहता हूं कि भारतीय परिवेश में राष्ट्रवाद का तात्पर्य होता है कि राष्ट्र के प्रति सरोकार रखना. राष्ट्र के प्रति सरोकार रखने में सिर्फ भूमि के लिए सरोकार नहीं है बल्कि भूमि, भूमिपुत्र यानी यहां के लोग, यहां की विरासत, यहां का इतिहास, हमारी संस्कृति इन सबके प्रति जब आप सरोकार रखते हैं तो वह राष्ट्रवाद कहलाता है. उस सरोकार का तात्पर्य यह नहीं है कि आप क्रिटिकल नहीं हैं, आप यहां की भूमि, यहां के भूमिपुत्र, यहां की संस्कृति या सरोकार के प्रति क्रिटिकल हों. हमारे पूरे विमर्श में आलोचनात्मकता को बहुत महत्व दिया गया है. लेकिन राष्ट्रवाद में जो विमर्श हो, उसमें सृजनशीलता हो. उसका मैं एक उदाहरण देता हूं. राष्ट्रवाद के महत्व में सबसे महत्वपूर्ण हस्तक्षेप रवींद्रनाथ टैगोर ने किया था. बाकी लोगों ने भी राष्ट्रवाद पर बातें कहीं पर रवींद्रनाथ टैगोर जी का हस्तक्षेप सैद्धांतिक हस्तक्षेप है. यूरोपियन राष्ट्रवाद के समांतर उन्होंने उस विवेचन को देखने की कोशिश की.

उस वक्त राष्ट्रवाद शब्द इसलिए नकारात्मक बन गया था क्योंकि यूरोप ने राष्ट्रवाद का ही इस्तेमाल करके द्वितीय विश्वयुद्ध में मानवता को धकेल दिया था. राष्ट्रवाद का जो यूरोपीय दृष्टिकोण है उसने ही फासीवाद को पैदा किया, नाजीवाद को पैदा किया, जापानी सैन्यवाद को पैदा किया. इस कारण राष्ट्रवाद के प्रति एक भ्रांति बनी.

टैगोर ने उस संदर्भ में राष्ट्रवाद की आलोचना करते हुए एक वैकल्पिक स्वरूप दिया. उन्होंने राष्ट्रवाद का तात्पर्य बताया और उन्होंने उस शब्द को छोड़कर एक नई शब्दावली देने की कोशिश की. उन्होंने राष्ट्रवाद के मूल तत्व जो भारत का मूल तत्व है, जो तिलक में दिखाई दिया, जो विपिन चंद्र पाल में दिखाई पड़ा, बंकिमचंद्र में दिखाई पड़ा, उन तत्वों को ही उभारने की कोशिश की इसलिए मैं उनकी आलोचनाओं को उस पृष्ठभूमि में जो यूरोपीय राष्ट्रवाद की विसंगतियां थीं, उसकी आलोचना मानता हूं. उसे भारतीय राष्ट्रवाद की आलोचना नहीं मानता. शब्द भले ही दोनों जगह एकसमान थे पर उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद की आलोचना नहीं की. भारत में राष्ट्र की जो एक सांस्कृतिक विरासत है, यह सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक बहुलतावाद विश्व में कहीं और नहीं मिलता है. आध्यात्मिक लोकतंत्र जो भारत के समाज में मौजूद है वह राष्ट्रवाद को वैश्विक परिवेश में ले जाता है. इसी कारण से हिंदू राजा चिरामन ने केरल में मंदिर को मस्जिद में बदल दिया ताकि अरब से आने वाले व्यापारियों को पूजा का स्थान मिल सके और यह दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी मस्जिद है. जिसकी चर्चा भारत की टेक्स्टबुक में नहीं होती है. जैसे दारा शिकोह की बहुत चर्चा नहीं होती है, जो तत्व भारत में धर्मों के बीच संवाद, धर्मों के बीच सत्संग की बात करते हैं उन तत्वों को मार्क्सवादी इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों ने बाहर रखा है. इसके दो उदाहरण हैं, चिरामन और दाराशिकोह.

जहां तक भारत में फासीवाद की आहट का सवाल है तो फासीवाद कोई अनऑर्गेनाइज्ड विचार नहीं है. फासीवाद का मतलब होता है कि राज्य के प्रश्रय में राज्य की सहमति से संगठित पार्टी द्वारा किसी अभिव्यक्ति के विचार पर हमला करना और उसे हिंसा से शांत करना. जो आपने एक काॅन्स्टेबल के साथ घटी घटना का जिक्र किया उसकी निंदा पूरे भारतीय समाज ने की है. उससे पहले भी वकीलों ने पत्रकारों पर हमला किया और पूरे भारतीय समाज ने उसकी आलोचना की. ऐसी घटनाएं यदा-कदा इस देश में घटित होती हैं. ग्वालियर में विवेक कुमार की सभा में हमले को लेकर एबीवीपी पर आरोप लगे. उसमें एबीवीपी का हाथ नहीं था. एबीवीपी के कोई लोग नहीं थे और यह जांच का विषय है कि कभी-कभी किसी संस्था को बदनाम करने के लिए ऐसी हरकतें की जाती हैं. जैसे जो भगवा ध्वज कांस्टेबल को दिया उसकी जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं है. सभी लोगों ने उसकी आलोचना की. लेकिन अगर कोई ताकत इसी तरह का काम करना चाहेगी तो वह इसकी जिम्मेदारी लेगी. कभी-कभी किसी विचारधारा को बदनाम करने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाए जाते हैं. मैं यह मानता हूं कि जो लोग आरएसएस के खिलाफ जहर उगलते हैं, अनर्गल बातें करते हैं, क्या वह अभिव्यक्ति पर हमला नहीं है?

अाडवानी ने जो रथ यात्रा निकाली उसके बाद भारत की धर्मनिरपेक्षता पर एक नई और खुली बहस शुरू हुई. उसी तरह राष्ट्रवाद पर बहस कई दशकों से रुकी थी. मुझे लगता है कि जेएनयू के बहाने अब यह बहस लंबे समय तक चलेगी

मैं एक सवाल आपसे पूछना चाहता हूं कि क्या आप मान रहे हैं कि आरएसएस एक समृद्ध संगठित ताकत है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती? यह भारतीय राजनीति और सामाजिक जीवन का यथार्थ है यह भी आप मानेंगे. अब बताइए जब भारत के न्यायालय ने अपने निर्णय में आरएसएस को गांधी की हत्या से कहीं जोड़कर नहीं देखा. उसके बाद 1960 के दशक में कपूर कमीशन बना. खोसला कमीशन और कपूर कमीशन, दोनों की रिपोर्ट सबके सामने हैं. खोसला न्यायाधीश थे और कपूर कमीशन बाद में बना. कपूर कमीशन ने फिर से जांच-पड़ताल शुरू की क्योंकि संसद में हंगामा हुआ था कि अप्रत्यक्ष रूप से आरएसएस के लोग शामिल थे. कपूर कमीशन ने कहीं पर भी आरएसएस के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हाथ का जिक्र नहीं किया. जबकि कपूर कमीशन की नियुक्ति भारत सरकार द्वारा की गई थी. तब बार-बार ऐसे बुद्धिजीवियों का यह कहना कि आरएसएस के लोग गांधी के हत्यारे हैं. अब आप यह बताइए कि सांस्कृतिक विचारधारा को लेकर चलने वाला संगठन जिसके साथ सबसे बड़ा मजदूर संगठन हो, जिसके साथ सबसे बड़ा विद्यार्थी संगठन हो, जिससे जुड़ी हुई पार्टी देश की सत्ता में हो, उसको एक बुद्धिजीवियों का वर्ग लगातार खुलेआम गांधी का हत्यारा कह रहा हो. यदि राजनीतिक लोग कह रहे हों तो मैं उन्हें माफ कर सकता हूं. लेकिन जो बुद्धिजीवी अखबारों के संपादक रह चुके हों, जो अंतरराष्ट्रीय मंच पर जाते हैं, वे आरएसएस को फासीवादी कहते हैं. ये जो घटना घटी, इसके बाद उन्होंने फासीवादी कहा? मैं मान लूं कि चार घटनाएं घटीं, क्या इन चार घटनाओं से पहले कभी आरएसएस को फासीवादी नहीं कहा गया? अगर घटना घटने के बाद कोई कहता तो इसे बौद्धिकता मान सकता हूं. जिस संगठन को बिना घटना घटे सांप्रदायिक, बिना घटना घटे फासीवादी कहते हैं, मैं समझता हूं यह अभिव्यक्ति एक बौद्धिक फासीवाद है. बौद्धिक फासीवाद में आरएसएस का जो हस्तक्षेप था उसे अवैधानिक घोषित करने की पूरी कोशिश की गई. उसकी प्रतिक्रिया में कुछ बुद्धिजीवियों की सभाओं में कुछ लोग विरोध करने आते हैं और इस विरोध की उत्तेजना पैदा करने वाले ये ही बुद्धिजीवी होते हैं जो अनर्गल बातें लगातार कहते रहते हैं. अगर किसी स्थानीय स्तर पर विरोध होता है तो मैं उसे भी गलत मानता हूं. ऐसा विरोध नहीं होना चाहिए. अगर आपकी कोई अनर्गल आलोचना कर रहा है तो उसे करने दीजिए.

महाराष्ट्र में काॅन्स्टेबल पर हमला हुआ. मैं संघ से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ हूं इसलिए जिस दिन हमला हुआ उस दिन मुझे पता चला. जिस दिन घटना घटी उसकी अगली सुबह पहला ट्वीट मैंने उस घटना की निंदा करते हुए किया. सिर्फ यह नहीं कहा कि ऐसी घटना नहीं होनी चाहिए बल्कि इसे भारतीय परंपरा और कानून का उल्लंघन भी बताया. यह गलत है, आप किसी को बाध्य नहीं कर सकते झंडा पकड़ने के लिए या पूजा करने के लिए. इसलिए यह कहना गलत है कि अगर किसी के हाथ में भगवा दिया जाए तो इसके लिए संघ ही जिम्मेदार है. मैं किसी को तिरंगा या भगवा पकड़ा दूं तो इसके लिए मार्क्सवाद कम्युनिस्ट जिम्मेदार नहीं है.

जेएनयू में या देश के अन्य हिस्से में, टेलीविजन पर या अखबारों में प्रतिदिन सरकार की आलोचना हो रही है. आलोचनाओं की मात्रा और गुणात्मकता दोनों बढ़ गई है, क्या उन अखबारों के दफ्तरों पर हमले हुए हैं? राजीव गांधी के कार्यकाल में इंडियन एक्सप्रेस को बंद कराने की कोशिश की गई थी. आज असहमति पर हमले की बात कहने वाले लोग क्या उसे फासीवाद कहेंगे? जब इंडियन एक्सप्रेस अखबार को बंद कराने की कोशिश की गई थी, स्टेट्समैन अखबार के ईरानी संपादक उनको परेशान किया गया, कोलकाता में टेलीग्राफ को परेशान किया गया. मोदी सरकार बनने के बाद क्या कोई भी अखबार यह कह सकता है कि मोदी की आलोचना करने के कारण उस अखबार को परेशान किया गया? क्या कोई टेलीविजन चैनल यह कह सकता है?

भारत के न्यायालय ने अपने निर्णय में आरएसएस को गांधी की हत्या से कहीं जोड़कर नहीं देखा. लेकिन बुद्धिजीवी बार-बार कहते हैं कि आरएसएस के लोग गांधी के हत्यारे हैं. वे फासीवादी कहते हैं, मैं समझता हूं यह अभिव्यक्ति बौद्धिक फासीवाद है

यदि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अफजल गुरु की फांसी की सजा पर उसे ज्यूडिशियल किलिंग कहते हुए सिर्फ बहस होती तो किसी का ध्यान नहीं जाता. कोई विरोध करना भी चाहता तो विरोध नहीं कर पाता. यदि वहां पर ‘हम लड़कर लेंगे कश्मीर, छीनकर लेंगे कश्मीर’ के नारे लगाए जाते हैं तो यह कौन छीनने वाले लोग हैं, कौन लड़ने वाले लोग हैं? कश्मीर तो हमारे पास है, यदि वहां पीओके को लेकर नारा लगता कि हम लड़कर लेंगे पीओके, छीनकर लेंगे पीओके तो समझ आता कि किस से लड़ने की बात हो रही है. वहां पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे वह राष्ट्रद्रोह वास्तव में है कि नहीं यह तो न्यायालय ही बताएगा. लेकिन वे नारे एक शब्द में कहें तो एंटीनेशनल हैं. किसी भी संप्रभु राष्ट्र में यदि संसद के सामने कोई कहता है कि पाकिस्तान जिंदाबाद तो यह नैतिक अधिकार है कि उसकी जांच हो. यह सब जेएनयू में खुल्लमखुल्ला हो रहा है, यह तो अभिव्यक्ति की आजादी को राष्ट्रवाद की बहस में ले जा रहे हैं. अब यह मामला न्यायालय में है और न्यायालय ही इसे दूध का दूध और पानी का पानी करेगा. अब अगर इसमें सरकार की गलती होगी तो हम सरकार की आलोचना करेंगे, अगर गलती नहीं होगी तो सराहना करेंगे. कोई भी बुद्धिजीवी सरकार का बंधुआ मजदूर नहीं होता और न होना चाहिए. पर सरकार पर बुद्धिजीवियों का निर्णय दे देना कहां तक सही है? जेएनयू के प्रोफेसर यह बताएं कि दस दिनों तक ये नारे लगाने वाले छात्र गायब थे, अचानक विश्वविद्यालय में आ गए और उनकी सभा में जेएनयू के शिक्षक सम्मिलित थे. कल तक मैं मानता था कि कन्हैया के लिए वे बोलते थे. अब उमर खालिद और उनके साथियों के साथ वे खड़े हो गए और पुलिस और राज्य को चुनौती देते रहे कि पुलिस को यहां भेजकर गिरफ्तार करो. जेएनयू क्या एक अलग टापू है क्या? क्या राष्ट्र के भीतर एक राष्ट्र है क्या?

दूसरी बात मैं और कहना चाहता हूं, गलतफहमी थोड़ी दूर करनी चाहिए. मैं आधिकारिक रूप से कहना चाहता हूं कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, उस्मानिया विश्वविद्यालय का भी शिक्षा के क्षेत्र में तनिक भी कम योगदान नहीं है. जितनी सुविधाएं जेएनयू को दी जा रही हैं यदि उनकी सुविधाएं इनको भी दी जाएं तो संभवत इनका योगदान और भी अधिक हो सकता है. छात्रों को जो सब्सिडी जेएनयू में मिल रही है वह बीएचयू में, अलीगढ़ में, जामिया में, उस्मानिया में नहीं मिल पा रही है. यह दावा करके दूसरे विश्वविद्यालयों को नीचा दिखाने का काम नहीं करना चाहिए. जेएनयू हमारे लिए गर्व का कारण है. लेकिन वह लालगढ़ के रूप में है. वाम मार्ग की प्रयोगशाला है. मैं कहता हूं माओवाद पर बहस हो लेकिन एक चीज बता दीजिए जब 76 सीआरपीएफ के जवान मारे जाते हैं, उसे सेलिब्रेट करना कम से कम मानवीय दृष्टि से तो अनुचित है. जेएनयू ने जिन विकृतियों को जन्म दिया है, उन विकृतियों से लड़ने, उनसे असहमति जताने को वे अभिव्यक्ति के साथ जोड़ देते हैं, यह नाइंसाफी है.

राम जन्मभूमि के समय में लालकृष्ण अाडवानी ने जो रथ यात्रा निकाली उसके प्रति सहमति-असहमति पर अलग-अलग लोग अलग-अलग धारणाएं रखते हैं, अलग-अलग व्याख्याएं होती हैं. एक बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि 1989 से भारत की धर्मनिरपेक्षता पर एक नई और खुली बहस शुरू हुई. उसी तरह राष्ट्रवाद पर बहस कई दशकों से रुकी थी, राष्ट्रवाद पर जो बहस होती थी वो लगता था जैसे यूरोप की पाइपलाइन से हम बहस करते थे, उनके द्वारा प्रमाणित मापदंड के आधार पर कर रहे थे. मुझे लगता है राष्ट्रवाद पर बहस में कई विकृतियां थीं, जब बहस होती है तो विकृतियों के साथ होती है. कोई भी चीज जब नई शुरू होती है तो उसमें विकृतियां आती हैं, लेकिन यह बहस अब लंबे समय तक चलेगी. राष्ट्रवाद की जो हमारी अपनी धारणा है, भारतीय परिवेश में राष्ट्रवाद की क्या भूमिका है, यह बहस जेएनयू के बहाने शुरू हुई है. इस बहस को मैं तिलक और बिपिनचंद्र पाल के काल से जोड़ता हूं.

संघ के प्रति मुस्लिम विरोधी होने की एक धारणा बना दी गई है. यह धारणा 1925 से 1945 तक नहीं थी. इसका कारण मैं बताता हूं कि जब पहली बार मध्य प्रांत की लेजिस्लेटिव  कांउसिल में 7-8 मार्च, 1934 को दो दिनों तक संघ पर बहस हुई है. भारत के इतिहास में पहली बार हुआ कि संघ पर दो दिनों तक लेजिस्लेटिव काउंसिल में बहस हुई. उस बहस में एक एमएस रहमान जो मध्यप्रांत के सबसे लोकप्रिय नेता थे, उन्होंने संघ का समर्थन किया और सरकार से पूछा कि क्या संघ के खिलाफ एक भी शिकायत आई है? तो सरकार ने कहा नहीं. 6 मई, 1945 को पहली बार ‘डान’ जो मुस्लिम लीग का अखबार है, उसने संघ पर संपादकीय लिखा और मांग की कि संघ पर प्रतिबंध लगाया जाए. लेकिन वह यह भी जिक्र नहीं कर पाया कि संघ के संस्थापक कौन हैं? यह मांग करते हुए उसने गांधी, नेहरू से अपील की कि वे सहयोग दें. 13 मई, 1945 को उसने दूसरा संपादकीय लिखकर गांधी-नेहरू की आलोचना की कि वे उसकी मांग का समर्थन नहीं कर रहे. 1945 के बाद दूषित प्रचार कर संघ की छवि मुसलमान विरोधी बना दी गई, लेकिन आप हाल के वर्षों में देखेंगे कि सभी पैमाने पर तो नहीं कहूंगा लेकिन मुसलमानों का एक वर्ग संघ के साथ संवाद कर रहा है और संघ भी संवाद कर रहा है. जो परंपरागत मुस्लिम नेतृत्व है वह असहज महसूस नहीं कर रहा है. जहां तक दलितों का सवाल है, दलितों का वह वर्ग जो ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में है, जो लिबरेशन थ्योरी के प्रभाव में है, उनके एनजीओ में है, वह संघ का घोर विरोधी है लेकिन दलित बुद्धिजीवी वह चाहे जेएनयू में हो या इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हो, वह संघ को क्रिटिकली देखते हैं, वे संघ की धारणा के विरोध में नहीं हैं. आखिर में इसका मैं एक और प्रमाण दे दूं कि गांधी जी ने संघ के बारे में जो भी चाहे अच्छा या बुरा बोला, जिस राष्ट्रीय आंदोलन में लगभग वर्ष 1925 से 1930 के बाद जितने नेता थे सबने संघ पर टिप्पणी की. अपने पूरे जीवन काल में बाबा साहेब आंबेडकर ने उस संगठन के बारे में, जो महाराष्ट्र में ही सबसे ज्यादा प्रबल था और जिसके बारे में बार-बार यह आरोप लगता था कि ब्राह्मणों का वर्चस्व है, उस संघटन के बारे में एक भी टीका-टिप्पणी नहीं की. एक भी शब्द संघ के खिलाफ उन्होंने नहीं कहा. संघ लगातार उनसे संवाद करता रहा, वे संघ के स्वयंसेवक तो नहीं बने. संघ के प्रति उनकी असहमति तो थी, पर संघ की नीयत पर उन्हें कभी शक नहीं था कि दलितों के प्रति संघ की नीयत साफ है. और आज बड़े पैमाने पर संघ जमीनी स्तर पर दलितों के बीच काम कर रहा है. इसी का परिणाम है कि भारतीय जनता पार्टी में दलित सांसदों की संख्या, ट्राइबल सांसदों की संख्या सबसे अधिक है.

(लेखक संघ के विचारक हैं)

(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)

हममें से देशद्रोही कौन नहीं है?

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राष्ट्रवाद या यूं कहें कि ऑफिशियल राष्ट्रवाद इन दिनों सुर्खियों में है. एक तरफ ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाते हुए और दूसरे ही सुर में मां-बहनों के नाम अपशब्दों की बौछार करते हुए लंपटों के गिरोह हर स्वतंत्रमना व्यक्ति को लातों-मुक्कों से, या जैसा कि बीते दिनों इलाहाबाद की कचहरी में देखने को मिला, लोग लाठियों की मार से राष्ट्रवाद का असली मतलब समझा रहे हैं. शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर टूट पड़ते दिख रहे इन निक्करधारी गिरोहों के साथ जगह-जगह खाकी वर्दीधारियों की भी मौन सहमति नजर आ रही है. और दिख रहा है कि आप अगर किसी को मार भी डालें और सफाई में यह कह दें कि वह पाकिस्तान जिंदाबाद कह रहा था तो उसे माफ कर दिया जाएगा.

विडंबना ही है कि इन दिनों देश की किस्मत के आका कहे जाने वाले लोग नकली ट्वीट की बैसाखी के सहारे ऐसे तमाम उत्पातों, उपद्रवों और उद्दंडता को वैधता का जामा पहनाते नजर आ रहे हैं. आए दिन हो रही संविधान की इस खुल्लमखुल्ला अनदेखी को लेकर संविधान को सबसे पवित्र किताब का दर्जा देने वाले वजीर-ए-आजम मोदी भी अपना मौन बनाए हुए हैं. अंधराष्ट्रवाद की आंधी चलाने की तेज होती कोशिशों को देखते हुए बरबस राजेश जोशी की बहुचर्चित कविता की पंक्तियां साकार होती दिख रही हैं कि ‘जो इस कोलाहल में शामिल नहीं होंगे मारे जाएंगे.’

ध्यान रहे कि अब तक ऐसे स्वयंभू राष्ट्रभक्तों की नजर में ‘समुदाय विशेष’ के लोग ही राष्ट्र के पंचम स्तंभ अर्थात भेदिये थे- मिसाल के तौर पर, संघ के सुप्रीमो गोलवलकर ने अपनी किताब ‘बंच ऑफ थॉट्स’ अर्थात ‘विचार सुमन’ में बाकायदा कुछ समुदायों को चिह्नित किया है जिसमें वे लिखते हैं, ‘बाहरी आक्रमणकारियों की तुलना में देश के अंदर मौजूद दुश्मन तत्व ही राष्ट्र की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हैं.’ किताब के आंतरिक खतरे नामक अध्याय में वे मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को इस श्रेणी में रखते हैं और उसके बाद एक लंबे आलेख में इन समूहों की देशभक्ति को संदेह के दायरे में रखते हैं (देखें- रामचंद्र गुहा, ‘द हिंदू,’ 28 नवंबर, 2006). मगर मामला अब काफी आगे बढ़ गया है. अब हर वह शख्स उनकी निगाह में राष्ट्रद्रोही है जो उनकी हां में हां नहीं मिलाता है, उनके साथ कदमताल करने को तैयार नहीं है और सबसे बढ़कर असहमति की आवाजों का होना जनतंत्र का प्रमुख गुण समझता है.

फिर कोई रोहित वेमुला जैसा प्रचंड प्रतिभाशाली दलित युवक और डॉ. आंबेडकर के विचारों को साकार करने में मुब्तिला उसका संगठन ‘आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ एंटीनेशनल अर्थात राष्ट्रद्रोही की कतार में आ सकता है, तो उधर, सोनी सोरी जैसी छत्तीसगढ़ की आदिवासी स्त्री- जिसके यौनांगों में पत्थर भरकर उसे किसी रणबांकुरे पुलिस अफसर ने राष्ट्र के असली मायने समझाने की कोशिश की थी- और जो आज भी कॉरपोरेट लूट के खिलाफ अलख जगा रही है, उस पर भी दोबारा एसिड से हमला करके उसे उन्हीं ‘राष्ट्रद्रोहियों’ की कतार में खड़ा किया जा सकता है या तमिल लोकगायक कोवन सरकार की शराब नीतियों का अपने गीतों में विरोध करने के लिए देशद्रोह के आरोपों के तहत जेल में ठूंसा जा सकता है या कोई प्रिया पिल्लई जो पर्यावरण को लेकर कॉरपोरेट साजिशों का खुलासा करने का जोखिम उठा सकती है, वह भी एंटीनेशनल करार दी जा सकती है.

यह अकारण नहीं कि जी. संपथ ‘द हिंदू’ के अपने आलेख में लिखते हैं, ‘संघ परिवार की इस राष्ट्रवादी नामकरण शैली में अब मध्य भारत के आदिवासी, दलित छात्र, वामपंथी बुद्धिजीवी, मानवाधिकार कार्यकर्ता, एक खास धार्मिक अल्पसंख्यक, नाभिकीय ऊर्जा विरोधी कार्यकर्ता, बीफ खाने वाले, पाकिस्तान से नफरत न करने वाले, अंतरधर्मीय जोड़े, समलैंगिक, मजदूरों के संगठनकर्ता सभी राष्ट्रद्रोही हैं.’ (देखें- द हिंदू, 17 फरवरी, 2016)

वैसे इन दिनों इन स्वयंभू राष्ट्रवादियों ने देश के अग्रणी विश्वविद्यालयों में से एक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को ही राष्ट्रद्रोहियों का अड्डा साबित करने की मुहिम छेड़ी है और जिसके लिए 9 फरवरी की रात में वहां आयोजित एक कार्यक्रम को बहाना बनाया गया है. निश्चित ही हुक्मरानों को लगता है कि देशद्रोह के इर्द-गिर्द हौवा खड़ा करके वह अपनी तमाम नाकामियों, अपनी आर्थिक असफलताओं, अपनी अमीरपरस्त नीतियों पर परदा डाले रख सकते हैं और सबसे बढ़कर इस देश के पूंजीपतियों को कई लाख करोड़ रुपये के कर्जे से एक ही रात में मुक्ति दिलाने के उनके कदम के प्रति उठ रहे विरोध के स्वर को दबा सकते हैं. लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं है कि इस बहस को खड़ा करके उन्होंने अपने विवादास्पद इतिहास के प्रति भी लोगों में रुचि नए सिरे से जगा दी है. आजादी का आंदोलन ऐसा दौर रहा है जब इन स्वयंभू राष्ट्रवादियों के पुरखों की तमाम ‘बहादुरी’ सामने आई थी. मगर इसके पहले कि हम उसकी बात करें चंद लफ्ज ‘देशद्रोह’ की इस बहस को लेकर.

वैसे देशद्रोह को लेकर जो इतना हंगामा खड़ा किया जा रहा है, उसके कानूनी पक्ष बिल्कुल स्पष्ट हैं. जाने-माने कानूनविद और संविधान विशेषज्ञ फली एस. नरीमन इंडियन एक्सप्रेस में 17 फरवरी, 2016 को प्रकाशित अपने एक आलेख में लिखते हैं, ‘भारत में देशद्रोह असंवैधानिक नहीं है, वह अपराध तभी होता है जब उच्चारे गए शब्द, भले वह लिखे या बोले गए हों, उनके साथ हिंसा और अव्यवस्था जुड़ जाती है या वह हिंसा या अव्यवस्था को बढ़ावा देते हों. महज हुल्लड़बाजी, अव्यवस्था, अन्य किस्म की हिंसा- जो भले ही दंड संहिता के अन्य प्रावधानों के तहत सजा देने लायक हो, मगर वह दंड विधान की धारा 124 ए के तहत सजा लायक नहीं होती. इसी तरह, अपनी सरकार के प्रति नफरत यहां तक कि उसके प्रति जबरदस्त घृणा भी देशद्रोह नहीं समझी जाती. जब किसी व्यक्ति को ‘भारतविरोधी’ कहा जाता है तो वह भारत के नागरिकत्व के प्रति असम्मान है, मगर ‘भारतविरोधी’ होना आपराधिक कार्रवाई नहीं है और निश्चित ही वह ‘देशद्रोह’ नहीं है.’

यह बात महत्वपूर्ण है कि मौजूदा हुकूमत का वरदहस्त पाए गिने-चुने पत्रकारों और अन्य ‘चीअरलीडर्स’ को छोड़ दें तो देशद्रोह कानून के बढ़ते इस्तेमाल को प्रश्नांकित करते हुए वाम से लेकर उदारपंथियों तक ही नहीं, बल्कि आर्थिक मामलों में नवउदारवाद के समर्थक कहे जा सकने वाले बुद्धिजीवियों/पत्रकारों की ओर से भी प्रश्न उठ रहे हैं.

‘देशद्रोह कानून के अधिनायकवादी इस्तेमाल की भाजपा सरकार की कोशिशों’ को प्रश्नांकित करते हुए स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर (देखें- इकोनॉमिक टाइम्स, 17 फरवरी 2016) वर्ष 1933 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अनुभव का हवाला देते हैं. उनके मुताबिक, ऑक्सफोर्ड यूनियन ने एक विवादास्पद प्रस्ताव पर बहस रखी थी जिसका फोकस था ‘यह सदन किसी भी सूरत में राजा और मुल्क के लिए संघर्ष नहीं करेगा.’ छात्र यूनियन द्वारा अपने इस मोशन पर मतदान भी कराया गया जिसमें 275 लोगों ने प्रस्ताव के पक्ष में और 153 लोगों ने विपक्ष में मत दिया. इस ‘ऑक्सफोर्ड प्रतिज्ञा’ को बाद में ग्लासगो और मैनचेस्टर के विद्यार्थियों ने भी अपनाया जिससे समूचे ब्रिटेन में हंगामे की स्थिति बनी. जनाब अय्यर के मुताबिक इन छात्रों को डरपोक, राष्ट्रद्रोही और कम्युनिस्ट हमदर्द कहा गया मगर किसी ने यह नहीं सोचा कि उन पर मुकदमा चलाया जाए.

स्वतंत्रता आंदोलन के समूचे दौर से हर हिंदुस्तानी वाकिफ रहा है. 20वीं सदी के पूर्वार्ध में नए परवान चढ़े इस दौर में एक तरफ मजूदर-किसानों के बीच एक नई जागृति सामने आ रही थी, मध्यम वर्ग के लोग आंदोलित थे, जाति व्यवस्था की सदियों पुरानी संस्था के खिलाफ और ब्राह्मणवादी मूल्यों की जकड़न के विरोध में दलितों-पिछड़ों में एक नई अंगड़ाई उठती दिख रही थी लेकिन हलचलों, आंदोलनों और उभार के इस चुनौती भरे कालखंड में संघ व उसके कार्यकर्ता दूर खड़े थे. गौरतलब है कि संघ ने अपनी तरफ से स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने का एक भी कार्यक्रम कभी हाथ में नहीं लिया था. संघ के साहित्य में उसके संस्थापक डाॅ. हेडगेवार को स्वतंत्रता आंदोलन के एक अग्रणी नेता के रूप में पेश किया जाता है गोया उन्होंने उस समय के विभिन्न आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया हो. लेकिन इसमें जानने योग्य है कि उन्होंने इस हलचल भरे कालखंड में कांग्रेस के नेतृत्व में चले आंदोलन में कार्यकर्ता के तौर पर हिस्सा लिया था और जेल गए थे. और वह भी इस मकसद से कि इसके जरिये लोगों को अपनी राजनीति की ओर आकर्षित किया जा सके.

ध्यान रहे कि जिन विनायक दामोदर सावरकर की विरासत आगे बढ़ाने का हिंदुत्ववादी दावा करते हैं- वाजपेयी की अगुआई वाली सरकार के दिनों में उनकी तस्वीर संसद भवन में अकारण नहीं लगाई गई थी- उन ‘स्वातंत्र्यवीर’ सावरकर के बारे में यह बात भी विदित है कि अंडमान की अपनी जेल यात्रा के दौरान अंग्रेजों के सामने माफीनामा लिख कर देने में (देखें, आरसी मजूमदार द्वारा लिखित किताब ‘पीनल सेटलमेंट्स इन अंडमान्स’ गैजेट्स यूनिट, डिपार्टमेंट ऑफ कल्चर, मिनिस्ट्री ऑफ एजुकेशन एंड सोशल वेलफेयर, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, 1975, पेज 221) और उनके निर्देशानुसार बाद में अपनी गतिविधियां चलाते रहने में कोई गुरेज नहीं किया.

1942 में जबकि समूचे हिंदुस्तान की जनता बर्तानवी हुक्मरानों के खिलाफ खड़ी थी, उन दिनों ब्रिटिश फौज में हिंदुओं की भर्ती की मुहिम सावरकर चलाते रहे. बहुत कम लोगों को यह बात मालूम है कि जिस मुस्लिम लीग के खिलाफ रात-दिन सावरकर जहर उगलते रहे, उसी के साथ 40 के दशक की शुरुआत में बंगाल में ‘हिंदू महासभा’ की साझा सरकार चलाने में भी उन्हें किसी तरह के द्वंद्व से गुजरना नहीं पड़ा, जब ऐतिहासिक भारत छोड़ो आंदोलन के तहत लाखों लोग जेलों में डाले गए थे.

दरअसल सावरकर की ‘वीरता’ का महिमामंडन करने में जुटे मिथक निर्माता इस बात को बताना नहीं चाहते कि भारत में मजहब के आधार पर दो राष्ट्रों की मौजूदगी की बात जिन्ना के पहले सावरकर ने पेश की थी. अगर कथित तौर पर बंटवारे की वैचारिकी पेश करने के लिए साधारण जनमानस में जिन्ना को ‘खलनायक’ का दर्जा हासिल है तो फिर क्या वही पैमाना सावरकर पर लागू नहीं होना चाहिए कि उन्होंने भी जिन्ना के काफी पहले यही बात कही थी. अहमदाबाद में आयोजित हिंदू महासभा के 19वें सालाना अधिवेशन (1937) में अध्यक्षीय भाषण देते हुए उन्होंने न केवल हिंदुत्व की अपनी समझदारी स्पष्ट की थी बल्कि इस बात का भी ऐलान किया था कि भारत में दो राष्ट्र बसते हैं.

‘भारत में दो राष्ट्र बसते हैं, कई बचकाने राजनेता यह भयानक गलती कर बैठते हैं कि भारत आज ही एक सदभावपूर्ण राष्ट्र बन चुका है या इस तरह ढाला जा सकता है बशर्ते ऐसी इच्छा हो. सदइच्छा रखने वाले मगर अविचारी महानुभाव अपने सपनों को ही हकीकत मान लेते हैं. इसी वजह से वह सांप्रदायिक विवादों को लेकर अधीर हो जाते हैं और उनके लिए सांप्रदायिक संगठनों को जिम्मेदार ठहराते हैं. मगर ठोस हकीकत यही है कि यह कथित सांप्रदायिक प्रश्न हिंदू और मुसलमानों के बीच सदियों से चले आ रहे सांस्कृतिक, धार्मिक और राष्ट्रीय अंतर्विरोधों की ही परिणति है. भारत को एक एकीकृत एवं समरूप देश नहीं माना जा सकता बल्कि इसके विपरीत उसमें दो राष्ट्र मौजूद हैं: हिंदू और मुस्लिम राष्ट्र.’ (देखें- विनायक दामोदर सावरकर, समग्र सावरकर वांगमय हिंदू राष्ट्र दर्शन, सावरकर की संकलित रचनाएं, खंड-6, महाराष्ट्र प्रांतिक हिंदूसभा, पूना, 1963, पेज 296)

गौरतलब है कि एक तरफ सुभाषचंद्र बोस जैसे लोग थे, जो ब्रिटिश सेनाओं को परास्त करने के लिए आजाद हिंद फौज का गठन कर रहे थे और दूसरी तरफ यह ‘वीर’ जनांदोलन की उमड़ती बयार के दमन को मुमकिन बनाने के लिए ब्रिटिश सरकार की कोशिशों को मजबूती दिलाने के लिए हिंदुओं का आह्वान कर रहा था कि वे इस फौज में शामिल हों. जानने योग्य है कि हिंदू राष्ट्र के हिमायती इस गल्प को परोसते नहीं थकते कि जर्मनी रवाना होने के पहले सुभाषचंद्र बोस ने कथित तौर पर सावरकर से मुलाकात की थी. कहने का तात्पर्य यही होता है कि बोस ने जो किया उसे सावरकर का आशीर्वाद था. लेकिन वे कभी इस अंतर्विरोध से बाहर निकलने की भी कोशिश नहीं करते कि सावरकर ने कथित तौर पर बोस को शुभकामनाएं दी थीं और दूसरी तरफ सावरकर खुद उसी बर्तानवी फौज को मजबूती दिलाने के लिए उनके सेना भर्ती अभियान के सदस्य बने थे.

मकसद यही था कि अधिक से अधिक हिंदुओं को बर्तानवी सेना में भर्ती किया जाए ताकि हिंदुओं के ‘स्त्रीकरण’ को उलटाया जा सके, जो सावरकर के मुताबिक, बर्तानवी शासन के दिनों से चल रहा था क्योंकि मार्शल कौमों को सेना में भर्ती करने को लेकर ब्रिटिश नीति चल रही थी. हिंदुओं की ब्रिटिश सेना में भर्ती उसमें हिंदू-मुस्लिम अनुपात को हिंदुओं के पक्ष में कर देगी और ऐसा अनुपात सावरकर के हिसाब से नई राष्ट्रीय सेना को ढालने में या उसकी वफादारी को सुनिश्चित करने के लिए निर्णायक होगा. (देखें- द सैफ्रन वेव, पेज 249, थॉमस हानसेन, ऑक्सफोर्ड, 2001)

लोग लाठियों की मार से राष्ट्रवाद का असली मतलब समझा रहे हैं. शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर टूट पड़ते दिख रहे इन निक्करधारी गिरोहों के साथ जगह-जगह खाकी वर्दीधारियों की भी मौन सहमति नजर आ रही है. और दिख रहा है कि आप अगर किसी को मार भी डालें और सफाई में यह कह दें कि वह पाकिस्तान जिंदाबाद कह रहा था तो उसे माफ कर दिया जाएगा

यही वह कालखंड है जब कांग्रेस तथा समाज के अन्य रेडिकल तत्व बर्तानवी हुक्मरानों के खिलाफ ‘करो या मरो’ का नारा बुलंद किए हुए थे, वहीं सावरकर की अगुआई वाली हिंदू महासभा सिंध और बंगाल में मुस्लिम लीग के साथ साझा सरकारें चला रही थीं. साफ है कि सावरकर ने यहां के साझे और सर्वसमावेशी राष्ट्रवाद पर हमला बोला था; दूसरी तरफ, उन्हें इस बात पर भी कोई मलाल नहीं था कि वे कांग्रेस तथा अन्य पार्टियों पर ‘मुसलमानों के तुष्टीकरण’ का आरोप मढ़ रहे थे.

‘व्यावहारिक राजनीति में भी महासभा जानती है कि हमें यथार्थवादी समझौतों के साथ आगे बढ़ना चाहिए. आप देखें कि किस तरह सिंध हिंदू सभा ने लीग के साथ गठबंधन सरकार चलाने की जिम्मेदारी ली है. बंगाल के मामले को आप जानते ही हैं. लीग के लोग जिन्हें कांग्रेस भी मना नहीं पाई वह जब हिंदू महासभा के संपर्क में आए तब समझौते के लिए तैयार हो गए और जनाब फजलुल हक की अगुआई में और हमारे सक्षम नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर गठबंधन सरकार सफलतापूर्वक एक साल से अधिक समय तक चलती रही जिसका दोनों समुदायों को फायदा हुआ.’ (देखें- विनायक दामोदर सावरकर, समग्र सावरकर वांगमय हिंदू राष्ट्र दर्शन, सावरकर की संकलित रचनाएं, खंड-6, महाराष्ट्र प्रांतिक हिंदूसभा, पूना, 1963, पेज 479-80)

क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि ऐसे तमाम कामों के बावजूद जिन्हें स्वतंत्रता आंदोलन से शुद्ध द्रोह कहा जा सकता है, विनायक दामोदर सावरकर को हिंदुत्व ब्रिगेड के मुरीद महान ‘देशभक्त’ बनाने की कोशिश में आज भी जुटे हैं. यहां तक कि अब जबकि भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला है तो सावरकर को ‘भारत रत्न’ की पदवी से नवाजने की चर्चाएं जोरों से चल रही हैं.

अगर हम संघ की ओर लौटें तो देख सकते हैं कि बर्तानवी साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष के प्रति संघ की उदासीनता/तटस्थता की चरमसीमा 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय खुलकर सामने आई थी जिन दिनों गोलवलकर सरसंघचालक पद पर विराजमान थे. तब संघ इस उग्र जन आंदोलन से सिर्फ दूर ही नहीं रहा, बल्कि उसने इस आंदोलन को ही निरर्थक बताया. इस आंदोलन की शुरुआत के कुछ समय पहले गोलवलकर गुरुजी के विचारों की झलक 8 जून, 1942 को उनके दिए भाषण में देखी जा सकती है जिनमें उन्होंने अंग्रेज शासकों को निरपराध घोषित किया था.

‘समाज की पतित अवस्था के लिए संघ दूसरों को दोष नहीं देना चाहता. जब लोग दूसरों के सिर पर दोष मढ़ने लगते हैं तब उसके मूल में उनकी दुर्बलता रहती है. दुर्बलों पर होने वाले अन्याय का दोष बलवानों के माथे मढ़ना व्यर्थ है. दूसरों को गाली प्रदान करना या उनकी आलोचना करने में अपना अमूल्य समय नष्ट करने की संघ की इच्छा नहीं है. यदि हम यह जानते हैं कि बड़ी मछली छोटी मछली निगलती है, तो उस बड़ी मछली को दोष देना सरासर पागलपन है. निसर्ग नियम भला हो, बुरा हो, वह सब समय सत्य ही है. वह नियम यह कहने से कि वह अन्यायपूर्ण है, बदलता नहीं.’ (देखें- श्री गुरुजी समग्र दर्शन, खंड 1, पृष्ठ 11-12)

1942 में जब हिंदुस्तान की अवाम बर्तानवी हुक्मरानों के खिलाफ खड़ी थी, उन दिनों ब्रिटिश फौज में हिंदुओं की भर्ती की मुहिम सावरकर चलाते रहे. जिस मुस्लिम लीग के खिलाफ रात दिन सावरकर जहर उगलते रहे, उसी के साथ 40 के दशक की शुरुआत में बंगाल में ‘हिंदू महासभा’ की साझा सरकार चलाने में भी उन्हें किसी तरह के द्वंद्व से गुजरना नहीं पड़ा

अंग्रेज सरकार के आदेश पर संघ ने पहले से चले आ रहे सैनिक विभाग भी बंद किए थे लेकिन इसके पीछे का तर्क तत्कालीन सरसंघचालक गोलवलकर गुरुजी द्वारा संघ के वरिष्ठ संगठनकर्ताओं को 29 अप्रैल, 1943 को भेजे परिपत्र (सर्कुलर) में मिलता हैः

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‘हमने सैनिक कवायद तथा यूनिफॉर्म के बारे में सरकार के आदेश का पालन करते हुए यह फैसला लिया है. ताकि कानून का पालन करने वाली हर संस्था की तरह हम भी अपने काम को कानून के दायरे में जारी रख सकें. यह उम्मीद करते हुए कि परिस्थितियां जल्दी बदल जाएंगी हमने प्रशिक्षण का एक हिस्सा ही रोक दिया था लेकिन अब हम परिस्थिति में तब्दीली का इंतजार किए बगैर इस काम को बिल्कुल समाप्त कर रहे हैं.’ (The Brotherhood in Saffron: The RSS and Hindu Revivalism- Walter K. Andersen and Shridhar K Damle- Vistaar Publications, New Delhi, 1987) 

यह अकारण ही नहीं था कि संघ की गतिविधि पर 1943 में तैयार की गई आधिकारिक रपट में गृहमंत्री ने निष्कर्ष निकाला कि यह कहना संभव नहीं है कि कानून और व्यवस्था के लिए संघ से कोई फौरी खतरा है. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हुई हिंसा के संदर्भ में बंबई के गृहविभाग की टिप्पणी थी, ‘संघ ने खुद को कानून के दायरे में रखा है और अगस्त 1942 में चले उत्पातों में शामिल होने से उसने खुद को बचाया है.’(संदर्भः वही)

स्वतंत्रता आंदोलन को लेकर संघ के गोलवलकर द्वारा ‘विचार नवनीत’ में प्रस्तुत विचार गौर करने लायक हैं. इसमें वे संघ की कार्यशैली में अंतर्निहित नित्यकर्म की चर्चा करते लिखते हैं, ‘नित्यकर्म में सदैव संलग्न रहने के विचार की आवश्यकता का और भी एक कारण है. समय-समय पर देश में उत्पन्न परिस्थिति के कारण मन में बहुत उथल-पुथल होती रहती है. 1942 में ऐसी उथल-पुथल हुई थी. उसके पहले 1930-31 में भी आंदोलन हुआ था. उस समय कई लोग डॉक्टरजी के पास गए थे. इस ‘शिष्टमंडल’ ने डॉक्टरजी से अनुरोध किया था कि इस आंदोलन से स्वातंत्र्य मिल जाएगा और संघ को पीछे नहीं रहना चाहिए. उस समय एक सज्जन ने जब डॉक्टरजी से कहा कि वे जेल जाने के लिए तैयार हैं, तो डॉक्टरजी ने कहा, ‘जरूर जाओ. लेकिन पीछे आपके परिवार को कौन चलाएगा?’ उस सज्जन ने बताया, ‘दो साल तक केवल परिवार चलाने के लिए ही नहीं तो आवश्यकता अनुसार जुर्माना भरने की भी पर्याप्त व्यवस्था उन्होंने कर रखी है.’ तो डॉक्टरजी ने कहा, ‘आपने पूरी व्यवस्था कर रखी है तो अब दो साल के लिए संघ का ही कार्य करने के लिए निकलो. घर जाने के बाद वह सज्जन न जेल गए न संघ का कार्य करने के लिए बाहर निकले.’ (देखें- श्री गुरुजी समग्र दर्शन खंड 4, नागपुर, प्रकाशन तिथि नहीं, पृष्ठ 39-40)

‘समाज की पतित अवस्था के लिए संघ दूसरों को दोष नहीं देना चाहता. जब लोग दूसरों के सिर पर दोष मढ़ने लगते हैं तब उसके मूल में उनकी दुर्बलता रहती है. दुर्बलों पर होने वाले अन्याय का दोष बलवानों के माथे मढ़ना व्यर्थ है. दूसरों को गाली प्रदान करना या उनकी आलोचना करने में अपना अमूल्य समय नष्ट करने की संघ की इच्छा नहीं है. बड़ी मछली छोटी मछली निगलती है, तो उस बड़ी मछली को दोष देना सरासर पागलपन है’

ब्रिटिश सरकार से प्रत्यक्ष टकराव टालने की यही वह नीति थी तथा अपने आप को ‘सांस्कृतिक’ कामों तक सीमित रखने का यही वह सिलसिला था कि संघ परिवार की निगाह में भी श्रद्धेय कहे जाने वाले सावरकर ने, जिनका अपना व्यक्तित्व भी बेहद समझौतापरस्त था, गोलवलकर की अगुआई में निर्मित हो रही स्वयंसेवकों की पीढ़ी को लताड़ते हुए लिखा था, ‘संघ के स्वयंसेवक का यही मृत्युलेख लिखा जाएगा, वह जन्मा, शाखा में गया और मृत्युलोक को प्राप्त हो गया.’ (देखें- ब्रदरहुड इन सैफ्रन- एंडरसन एंड दामले)

याद रहे कि उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष से संघ परिवार का आधिकारिक तौर पर दूर रहना एक ऐसी स्थापित चीज है कि उसके लिए विशेष प्रमाणों की जरूरत भी नहीं है. और यह अकारण नहीं था कि दिल्ली की गद्दी पर वाजपेयी की अगुआई में अपने प्रथम कार्यकाल (1998-2004) के दौरान भाजपा सरकार ने इतिहास के पुनर्लेखन की जो कोशिश की उसका अहम पहलू स्वतंत्रता आंदोलन से उसकी इस दूरी पर किसी न किसी तरह परदा डाले रखना था. वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल की शुरुआत में ही चर्चित इतिहासकार सुमित सरकार और केएन पणिक्कर द्वारा संपादित किताब ‘टूवार्ड्स फ्रीडम’ के प्रकाशन पर पाबंदी लगा दी गई थी. दरअसल इंडियन काउंसिल आॅफ हिस्टॉरिकल रिसर्च की ओर से प्रकाशित किए जा रहे प्रस्तुत शोधग्रंथ में तमाम ऐसे प्रमाण मौजूद थे जो बताते थे कि किस तरह 1930-40 के दिनों में संघ परिवार के लोगों ने बर्तानवी आकाओं के प्रति समझौतापरस्ती का परिचय दिया था.

(लेखक सामाजिक कार्यकर्त्ता और चिंतक हैं)