Home Blog Page 1361

एसटीएफ जवान बड़े लोगों के सब्जी-दूध ढो रहे हैं

IndiaTvf13bc4_bihar_police_ak47_maoist

बिहार में अपराध को लेकर रोजाना बयानों की टकराहट हो रही है. अपराध घटा है, बढ़ा है, ऐसी बयानबाजी, बहस का एक मसला हो सकता है लेकिन ये सच है कि राज्य में अपराधियों का हौसला बढ़ा है. पुलिस दबाव में दिख रही है और इसका कारण राजनीतिक है. यह कहा जाता रहा है और सच भी है कि 2005 से लेकर 2015 तक कभी भी जिले के एसपी वगैरह को आॅपरेट करने के लिए सीएम हाउस या पटना में सत्ता के किसी केंद्र से फोन नहीं गया लेकिन अब सूचना मिल रही है कि ऐसा हो रहा है. अब भी सीएम के लेवल पर या सीएम हाउस से ऐसा नहीं हो रहा लेकिन पटना में सत्ता के जो दूसरे केंद्र हैं वे ऐसा कर रहे हैं. ये एसपी को डिक्टेट करने की कोशिश कर रहे हैं. इससे ऊहापोह और ‘हाॅच-पाॅच’ की स्थिति बनी है. अव्यवस्था पैदा हुई है. यह तो एक बात हुई. इसके अलावा भी कई बातें हैं. अपराध पर बयानबाजी से बेहतर है कि कुछ ठोस उपाय हों. कुछ छोटी-छोटी बातों को समझने की जरूरत है. यह सामान्य तौर पर माना जाता है कि 50-55 की उम्र पार कर चुके पुलिस अधिकारियों को जिले में नहीं भेजना चाहिए. इस उम्र में आकर वे अपना रिटायरमेंट प्लान करने लगते हैं. पेंशन-पीएफ आदि पर ध्यान देने लगते है.

बिहार में दर्जनभर से अधिक जिले हैं, जहां पर इसी उम्र के लोग कमान संभाल रहे हैं या निर्णायक भूमिका में है. बात इतनी ही नहीं है. बिहार पुलिस में कोआॅर्डिनेशन का घोर अभाव है. यहां कानून व्यवस्था में सुधार के लिए एसटीएफ का गठन हुआ था. उसका असर भी राज्य में पड़ा था. छुटभैये गुंडे-मवाली से लेकर बड़े अपराधी तक उनसे भय खाने लगे थे लेकिन आज एसटीएफ के जवान या तो बाॅडीगार्ड बने घूम रहे हैं या फिर बड़े लोगों के बच्चों को स्कूल पहुंचा रहे हैं, सब्जी-दूध ढो रहे हैं. अब बिहार में बात-बात पर एसआईटी गठित करने का फैशन चल पड़ा है. हर अपराध के बाद तुरंत एसआईटी गठित कर दी जाती है. एसआईटी में कौन लोग होते हैं? वही थाने के थानेदार, डीएसपी वगैरह. सवाल यह उठता है कि क्या जिन थानेदारों को, डीएसपी को एसआईटी में शामिल किया जाता है, वे अपने नियमित काम से मुक्त होकर किसी केस में लगते हैं? इसका जवाब है, नहीं. वे नियमित काम भी कर रहे होते हैं और एसआईटी टीम में भी रहते हैं. ऐसे में किसी वारदात की जांच का क्या असर होगा, क्या कार्रवाई होगी, यह खुद ही सोच लेने वाली बात है. विशेश्वर ओझा हत्याकांड हो या बृजनाथी सिंह हत्याकांड, इन राजनीतिक हत्याओं को थानेदारों के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता.

इन दिनों तो एक गजब का प्रसंग सामने आया. नवादा विधायक राजवल्लभ यादव को गिरफ्तार करने गई पुलिस का कारनामा अजीब रहा. कुछ दिन पहले एक घटना घटती है. पुलिस सर्च वारंट का इंतजार करती है. ठीक है कि कानून के हिसाब से पहले सर्च वारंट जरूरी होता है लेकिन जब प्रथमदृष्टया अपराध की पुष्टि हो तो यह नियम कई बार टूटा भी है. लेकिन राजवल्लभ यादव के बलात्कार करने के एक सप्ताह बाद सर्च वारंट मिलता है. उसके बाद सर्च वारंट की खबर टीवी पर चलती है और फिर पुलिस सर्च करने जाती है, छापेमारी करती है. क्या कुछ हासिल होगा, यह तो सामान्य तरीके से सोचने वाली बात है. बिहार में कभी कुख्यात रहे शहाबुद्दीन को भी पुलिस ऐसे ही गिरफ्तार करने जाती थी. पुलिस के जाने के पहले खबरें चलती थीं- ‘शहाबुद्दीन को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस रवाना.’ फिर काहे को गिरफ्त में आते शहाबुद्दीन. इस तरीके से वह कभी गिरफ्त में नहीं आए. आखिर में सीबीआई से आए एक आईपीएस अधिकारी आरएस भट्टी को जिम्मा दिया गया. उन्हें एक रैंक बढ़ाकर डीआईजी बनाकर भेजा गया तब शहाबुद्दीन गिरफ्तार हुए.

बिहार में संगठित अपराध और फुटकर अपराध के अंतर को समझना होगा. दोनों से निपटने के तरीकों में बदलाव करना होगा. आज बिहार के जेल संगठित अपराध के सबसे सुरक्षित ठिकाने बन गए हैं. दरभंगा इंजीनियर हत्याकांड में संतोष झा गिरोह का हाथ सामने आया. संतोष झा जेल में ही हैं. विशेश्वर ओझा हत्याकांड में विश्वजीत मिश्र का नाम आ रहा है तो विश्वजीत मिश्र जेल में ही है. जेलों की क्या व्यवस्था है, इसे आंकना चाहिए. पूरे बिहार की जेलाें की बात छोड़िए पटना के बेउर केंद्रीय जेल को ही देख लेना चाहिए. वहां कभी जैमर लगा था. अब उसके ढांचे भी बचे हैं या नहीं, पता नहीं. ऐसी कई बातें हैं. अपराध पर सिर्फ तर्कबाजी, बहसबाजी करने और एक-दूसरे से सवाल-जवाब करने से कम नहीं होगा. अपराध कम है, ज्यादा है, घटा है या बढ़ा है, इससे राजनीतिक नफा-नुकसान हो सकता है, बिहार का भला नहीं होगा.

(निराला से बातचीत पर आधारित)

‘अगर दिल्ली में यमुना को खत्म कर देंगे तो इस शहर को नौवीं बार बसाना पड़ेगा’

l2016031178235WEB
Photo : PIB

पर्यावरणविद नदी के क्षेत्र में कोई भी निर्माण कार्य नहीं करने की बात करते हैं. इसके दो-तीन कारण हैं. नदी का क्षेत्र, जिसे खादर (फ्लड लेन) कहते हैं, नदी का एक अभिन्न हिस्सा होता है. दरअसल, नदी अपने आप में एक तंत्र है. नदी सिर्फ बहता पानी नहीं है. अगर नदी सिर्फ बहता पानी ही होती तो फिर नहर और नदी में क्या अंतर रह जाता? नदी की अपनी बायो-डायवर्सिटी होती है, नदी का अपना एक क्षेत्र होता है.

होता क्या है कि हिंदुस्तान में जो नदियां हैं, मानसून के समय में उनका स्वरूप कुछ और होता है, मानसून के अलावा दूसरे समय में उनका स्वरूप कुछ और होता है. मानसून के समय में नदियां फैलती हैं, अपनी जगह घेरती हैं और उस जगह का जो प्राकृतिक तंत्र है उसको जल प्रदान करती हैं और भूजल बनाती हैं. जितने चोए होते हैं, उनको पानी पिलाती हैं. आपके जितने भी कुएं हैं, बावड़ियां हैं पुरानी, सब के सब उससे रिचार्ज होते हैं. पर अगर आप नदी के क्षेत्र में अतिक्रमण कर लेंगे, उसके क्षेत्र का जो अपना नैसर्गिक स्वरूप है उसको खत्म करके कुछ और कर देंगे तो नदी का तंत्र खराब हो जाएगा. तब न वह ग्राउंड वाटर ढंग से रिचार्ज कर सकती है, न ही वह नदी के खादर में जो जीव-जंतु हैं, उनका सही तरीके से पालन-पोषण कर सकती है. ये जीव-जंतु नदी को स्वच्छ रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं. आर्ट ऑफ लिविंग जैसा कोई भी कार्यक्रम किसी भी नदी तट पर होने से उसका तंत्र गड़बड़ा जाता है.

देखिए अभी क्या हुआ है? इन्होंने पूरा का पूरा इलाका समतल कर दिया. वहां जो भी वनस्पतियां थीं उनको हटा दिया. ऊबड़-खाबड़ इलाकों के ऊपर डंपिंग कर दी गई. ऐसा करके नदी का अपना स्वाभाविक नैसर्गिक स्वरूप बिगाड़ दिया गया. इसके बाद नदी को अपने प्राकृतिक रूप में आने में बहुत समय लगता है. अब आपने अगर वहां कोई स्थायी निर्माण कर दिया, जैसे- वहां अक्षरधाम मंदिर बना दिया या खेल गांव तैयार कर दिया, तो ऐसा करके आपने नदी के बाढ़ क्षेत्र को कम करके उसे अवरुद्ध कर दिया. इससे सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि जो पानी उस क्षेत्र में फैलकर ग्राउंड वाटर बनता वह अब नहीं फैल पाएगा. अब पानी सिर्फ दो जगह जा सकता है. या तो आपके-मेरे घर में घुसेगा, या फिर नदी की धारा में बह जाएगा. तो जो पानी आपके चोए को मिलता, जो जमीन में जाकर भूजल बनता, अब आपके पास नहीं रहेगा. वह कहीं और चला जाएगा. अगर कभी बाढ़ आएगी तो पानी सीधे हमारे-आपके घर में घुसेगा. जिस प्रकार से चेन्नई में हुआ, जिस प्रकार से मुंबई में हुआ, जिस प्रकार से केदारनाथ में हुआ, जिस प्रकार से श्रीनगर में हुआ, पूर्वोत्तर में हुआ, हर साल कुछ न कुछ हो रहा है. इसलिए नदी के साथ छेड़छाड़ करना अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारना है.

हम पिछले 20 साल से यमुना और 30 साल से गंगा को साफ करने में लगे हैं और हुआ कुछ नहीं क्योंकि नदियों को लेकर हमारी समझ ही गलत है

दिल्ली में यमुना नदी का पानी नहीं है. यमुना नदी तो दिल्ली से 200 किलोमीटर पहले ही मर जाती है. यह जो पानी दिल्ली में आप देख रहे हो, यह तो पूरा का पूरा मल-मूत्र है. यह पूरा औद्योगिक अपशिष्ट है. पानी तो है ही नहीं. यहां यह नदी मर चुकी है और अब उसको आप मृत घोषित कर दो. इसके खादर पर भी अतिक्रमण कर दो. अगर यमुना के पुनर्स्थापन की, रेस्टोरेशन की कोई संभावना बनती भी है, तो आप इस तरह के कार्यक्रम करके उसको और खराब कर दो.

जब यमुना की हालत खराब होनी शुरू हुई उससे काफी समय पहले से ही बार-बार चेतावनी दी गई. इसलिए तो यमुना एक्शन प्लान, यमुना एक्शन प्लान-2, यमुना एक्शन प्लान-3… क्या-क्या नहीं हुआ. लेकिन कभी कोई प्रभावशाली कदम नहीं उठाया जा सका क्योंकि हमारी समझ ही नदियों के प्रति कमजोर है. हमने नदी को बहता पानी के अलावा कुछ नहीं माना. हमने हमेशा नदी को साफ करने को देखा. अरे भाई! नदी को साफ नहीं करना है, नदी को पुनर्जीवित करना है. अगर नदी को आपने पुनर्जीवित कर दिया तो साफ तो वह अपने आप हो जाएगी. इसे साफ करने के लिए आपको एक पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं है. पर हम यहां पिछले 20 साल से यमुना और 30 साल से गंगा को साफ करने में लगे हैं और हुआ कुछ नहीं, क्योंकि नदियों को लेकर हमारी समझ ही गलत है.

यमुना पर इतने खतरे के बावजूद इस तरह के कार्यक्रम की अनुमति दी गई तो इसमें पूरी गलती डीडीए की है. गलती डीडीए और साथ-साथ ‘आर्ट आॅफ लिविंग’ की भी है. डीडीए ने दो बार इनको मना किया कि हम अनुमति नहीं दे सकते, क्योंकि एक्टिव फ्लड एरिया में किसी भी प्रकार के कार्यक्रम के लिए राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने मना किया हुआ है, लेकिन फिर तो आप जानते हो कहां से दबाव डाला जाता है. बड़े-बड़े लोग हैं, जो दबाव डाल सकते हैं. उन्होंने दबाव डाला और डीडीए ने अनुमति दे दी.

हम इतने लंबे समय से ‘यमुना जिए अभियान’ चला रहे हैं. हमारे अभियान का सबसे बड़ा प्रतिफल यह मिला है कि अब लोग हमारे साथ आ रहे हैं. पूरा शहर इस मुद्दे पर साथ खड़ा हो रहा है, इस बारे में बात कर रहा है. वह इसलिए कि पिछले दस सालों से मेहनत हो रही है. कॉमनवेल्थ गेम के समय जब हम बस डिपो और मेट्रो के डिपो के निर्माण रोकने के लिए लगे थे तब हमारे साथ 10-15 से ज्यादा लोग नहीं थे. हम लोगों को समझाते हुए हार गए.

पर्यावरण जैसी चीज पर जब तक लोगों को यह नहीं लगता कि हम पर या हमारे जीवन पर कोई खतरा है तब तक कोई ध्यान नहीं देता. अगर दिल्ली में यमुना को खत्म कर देंगे तो 9वीं बार दिल्ली बसानी पड़ेगी. दिल्ली खत्म हो-होकर आठ बार बसाई गई है न, एक दिन यह शहर ही खत्म हो जाएगा. अगर यमुना वापस नहीं आई तो यह शहर खत्म हो जाएगा.

कोई भी मानवीय बसाहट बिना जलीय सुरक्षा के पनप नहीं सकती. पुराने जमाने में जितनी सभ्यताएं खत्म हुई हैं, वे तब खत्म हुई हैं, जब उनके पानी के साथ छेड़छाड़ हुई, खिलवाड़ किया गया. पानी ने दो काम किए- या तो आपको सूखा कर दिया या इतना भयानक जलजला आया कि सब नष्ट हो गया. दिल्ली में दोनों स्थितियां आने की संभावना है. या तो आप पानी के लिए तरस जाएंगे, एक-दूसरे को मार-मारकर खा जाएंगे, भगा देंगे, या इस शहर को छोड़कर चले जाएंगे, या फिर ऐसा जलजला आएगा कि आप उस पर विश्वास नहीं कर पाएंगे. पानी जीवन भी है और पानी से ही प्रलय भी आती है. इसे नहीं भूलना चाहिए.

यमुना को पुनर्जीवित करने के जितने प्रयास हुए, जितनी योजनाएं लाई गईं, उनका कोई असर नहीं पड़ा. सबसे बड़ा दुख तो यही है. 2015 में एनजीटी का फैसला आया, जिसका आर्ट आॅफ लिविंग के इस कार्यक्रम से उल्लंघन हुआ है. पहली बार ऐसा फैसला आया था जिसने सही रूप में सब कुछ सबके सामने रख दिया. लेकिन किसी ने उसको समझा ही नहीं. अब सब कह रहे हैं कि भाई जजमेंट की कॉपी भेज दो. अरे भई, जब जजमेंट आया था, तभी पढ़ लेते तो यह स्थिति ही न बनती. चलिए यह स्थिति बनी तो लोगों को एक सीख तो मिली. पूरा शहर पहली बार ऐसे कार्यक्रम के खिलाफ खड़ा हुआ है जिससे उसे कोई सीधा फर्क नहीं पड़ रहा है. पर फिर भी लोग इसके खिलाफ है क्योंकि उन्हें लग रहा है कि यह जो कुछ भी हो रहा है वह पर्यावरण के लिए ठीक नहीं है. फिर पूरे मीडिया का रवैया भी बदल गया क्योंकि मीडिया ने भी देखा कि यह गलत हो रहा है.

अब तक यमुना को बचाने या पुनर्जीवित करने पर तमाम पैसा खर्च हो चुका है. कोई कहता है कि 4,000 करोड़, कोई कहता है 1,500 करोड़ रुपये, कोई फिक्सड राशि कभी मिलती नहीं. लास्ट एस्टीमेट है 4,000 करोड़ रुपये. अब दिक्कत यह है कि इस तरह के कार्यों में अकेले कोई एनजीओ, दो एनजीओ, दस, पचास या हजार आदमी कुछ नहीं कर सकते. हम-आप अपना समय निकालकर थोड़ी देर के लिए नदी संवारने में कुछ योगदान कर देंगे. लेकिन ठोस तरीके से सिर्फ सरकारें ही कर सकती हैं. यह सरकारों का काम है, उनका धर्म है. इस तरह के काम के लिए प्रशासनिक अधिकारियों को तनख्वाह मिलती है. आखिर किसलिए उनको तनख्वाह मिलती है, इसलिए कि एनजीओ आकर काम करें? और अगर एनजीओ को ही करना है तो सरकार है क्यों? आप और हम दबाव डाल सकते हैं, समझा सकते हैं, आप और याचिका दे सकते हैं, लेकिन स्थायी तरीके से सरकार के अलावा कोई प्रभावी तरीके से कुछ नहीं कर सकता. जाहिर है कि सरकारों का रवैया बहुत लापरवाही भरा है. यह बात एनजीटी ने ही बोल दी है. हमको-आपको क्या बोलना है!

इन कारणों से आने वाली तबाही ऐसी चीज है जिसकी कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता. चेन्नई, मुंबई या केदारनाथ में जो हुआ, कोई भविष्यवाणी कर सकता था क्या? सिर्फ एक बार 24 घंटे बढ़िया बारिश होने दीजिए फिर देखिए क्या होता है. हम तबाही को आमंत्रण जरूर दे रहे हैं, लेकिन तबाही कब आएगी, यह काेई नहीं जानता.

इस समस्या के हल के लिए साधारण-सा सुझाव है कि कृपया 13 जनवरी, 2015 का एनजीटी का फैसला पढ़ लें और अपना भरसक प्रयास करें कि उस फैसले को जितनी जल्दी हो सके, लागू कर दें. उससे अच्छा रोडमैप इस नदी को दोबारा नहीं मिलेगा.

(लेखक ‘यमुना जिए अभियान’ के संयोजक हैं)
(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)

मेरा सुधार मां के जीवन की सबसे बड़ी चुनौती थी…

education-illu‘एैसेई मरता-मारता फिरता रै कर पूरा दिन. तुझै सरम तो बिल्कुल रई नाय. जब देखो तब कोई न कोई तेरी शिकायत ई लिए खड़ी रैवै है. मैं तो छक गई तुझसै. इससै तो अच्छा था पैदा होते ई तेरा टैंटवा दबा देती’
मां मुझे देखते ही ऐसे ही अक्सर चिल्लाया करती थीं. ‘चाची तुमारे चींटे ने मेरे लौंडे के सिर में ईंट मार दई, इननै हमारे बिटोरे की हंडिया फोड़ दई, मेरे खेत मैं सै चने उखाड़ लाया’ बचपन के दिनों में ऐसी न जाने कितनी ही शिकायतें मेरी रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा थे. सारी शिकायतें मां के पास जातीं. मां झल्ला कर मुझे गालियां देतीं. झाड़ू, बेलन, फुंकनी, चिमटा- जैसे खाना बनाने में सहयोग देने वाला जो भी सामान उनके हाथ लगता उसी से वह मेरी ‘खातिरदारी’ शुरू कर देतीं. साथ में ऐलान भी करतीं- ‘न तुझे कुछ खाने-पीने को दूंगी, न अपने पास सुलाऊंगी. वो भीख मांगने वाली आएगी तो अबकै तुझै ई दे दूंगी. मेरा पिंड तो छूटेगा. मै कहां तक रोज-रोज सबकी औगार (शिकायत) सुनूं.’ मां के इतने प्रयासों का यह असर होता कि मैं एक-दो दिन बिल्कुल शरीफ सधे हुए बच्चे की तरह रहता. एकदम अनुशासित. ऐसे में मां सुबह-सुबह बड़े प्यार से उठातीं. छुलुए में पानी लाकर मेरा मुंह धोतीं. अपनी साड़ी के पल्लू से मुंह पोंछतीं और भीमसैनी काजल आंखों में आंजकर माथे पर टीका भी लगातीं. फिर बालों में सरसों का तेल लगाकर बारीक दांतों की कंघी से बाल काढ़ती. कंघी का टूटा दांता खोपड़ी में चुभता तो मैं उचक जाता. मां कहतीं, ‘मेरा बेटा तो राजा है. कित्ता सोयना मलूक लग रिया है. बस लोगों की औगार लाना और बंद कर दे तो कित्ता अच्छा हो जाए.’ मां आगे कहतीं, ‘देख बेटा शैतानी मैं कुछ नाय रखा. पढ़ने-लिखने मैं ध्यान लगा. बे-पढ़े की इस दुनिया मैं कोई कदर नाय है.’

समय बीता उम्र के साथ-साथ समझदारी बढ़ी और शैतानियां कम हुईं. पढ़ने-लिखने में रुचि बढ़नी शुरू हुई. मां छोटी-छोटी सफलताओं पर भी खूब प्रोत्साहित करतीं. कहतीं, ‘आज मेरे बेटे ने कित्ता अच्छा इमला लिखा है. स्कूल मैं किसी कू इत्ते पहाड़े याद नाय जित्ते मेरे बबलू कू.’ मां के इन प्रोत्साहनों ने जैसे जीवन की धारा ही बदल दी. मां साक्षरता के नाम पर सिर्फ अपना नाम लिखना जानती थीं. इसलिए निरक्षरता के दर्द से भी भली-भांति वाकिफ थीं. अपने बच्चों को खूब पढ़ा-लिखा देखना उनका एकमात्र सपना था. बड़े भाई और बहन पढ़ने में अच्छे थे. इसीलिए अगर उन्हें जरा-सा भी यह आभास होता कि मैं शरारतें ही करता रहूंगा, पढ़ूंगा नहीं तो वे विचलित हो जातीं.

मां झाड़ू, बेलन, खाना बनाने में सहयोग देने वाला जो भी सामान उनके हाथ लगता, उसी से वह मेरी ‘खातिरदारी’ शुरू कर देतीं

छठी-सातवीं कक्षा तक आते-आते मैं पढ़ने में ठीक होने लगा था. मां-पिताजी के अलावा भाई-बहन सभी की कोशिशों ने मुझे सकारात्मक दिशा की ओर मोड़ दिया था. पढ़ाई पूरी करने के बाद जब नौकरी मिली तो मां ने छलछलाती आंखों के साथ कहा, ‘देख ले, नाय पढ़ा होता तो आज कहीं सड़ रिया होता पड़ा जेल मैं.’ मैं नौकरी जॉइन करने चला गया. बहन ने बताया कि मां कई रोज तक देवस्थानों पर प्रसाद चढ़ाती घूमीं. संभवतः मेरा सुधार उनके जीवन की सबसे बड़ी चुनौती थी, जिसमें वह जीत गई थीं.

पिछली गर्मियों में मैं अपने बेटे को किसी बात पर डांट रहा था. मां बोलीं- ‘इसै काय कू डांट रिया है. यो बी तो तेरा ई खून है. अपने दिन याद कर ले. जब तू इसकी उमर का था तो तू बी तो ऐसा ई था.’ मां की बात सौ फीसदी सही थी. पर मां को मैं कैसे बताता कि मैं जरूर ऐसा था, पर मेरी मां तुम थीं. तुम्हारी गालियां वे मंत्र थे जिन्होने मेरे जीवन को रस-रंग से अभिसिंचित कर दिया. अनायास ही ये लाइनें याद आती हैं…

लहलहाती रहीं उम्र की डालियां

काम ये कर गईं मां तेरी गालियां…

उम्मीद की डोर पर जिंदगी ‘कठपुतली’

DSC5297
जयपुर के प्रकाश भाट विपरीत परिस्थितियों में भी कठपुतली की कला जिन्दा रखने की जुगत में लगे हैं.
सभी फोटो- सुनील यादव

ओ लड़ी लूमा रे लूमा, ओ लड़ी लूमा रे लूमा, लूमा झूमा लूमा झूमा, म्हारो गोरबंद नखरालो.

किसी सांस्कृतिक मेले में इस तरह के राजस्थानी लोकगीत पर नाचती कठपुतलियां बरबस ही ध्यान खींच लेती हैं, पर मनोरंजन के साथ शिक्षा का माध्यम रहा कठपुतली का खेल आज अपनी पहचान बचाए रखने की जद्दोजहद कर रहा है. कठपुतली बनाने वाले कलाकार बमुश्किल ही अपनी रोजी कमा पा रहे हैं. जयपुर विधानसभा से मुश्किल से 500 मीटर दूर कठपुतली कॉलोनी की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों में ऐसी ही कई जिंदगियां अपने और इस खेल के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्षरत हैं.

मूलतः राजस्थान के नागौर जिले से आने वाले भाट समुदाय को परंपरागत भारतीय कठपुतली का जनक माना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि यही लोग कठपुतलियों को पश्चिम बंगाल और देश के दूसरे हिस्सों तक लेकर गए थे. छह महीनों तक शहरों और गांवों में घूम-घूमकर ये लोग राधा-कृष्ण की प्रेम गाथा या शाहजहां के समय के राजा अमर सिंह राठौड़ की कहानियां आमजन तक पहुंचाते थे. पर आज इस कला की स्थिति का पता जयपुर के रहने वाले एक ऑटोरिक्शा चालक से बात करने पर चलता है, जब वो बताते हैं, ‘मुझे याद नहीं आता कि मैंने कभी जयपुर में कठपुतली का कोई खेल देखा हो. पिछले दस सालों में तो नहीं! मैंने बचपन में ही इसे देखा था. हां, अगर आप किस्मत वाले हुए तो हो सकता है कि किसी गांव के मेले में ये आपको दिख जाएं.’

लगभग दो हजार सालों से भाट समुदाय को ही कठपुतलियों की इस कला का संरक्षक माना जाता है, पर अब स्थितियां बदल रही हैं. कठपुतलियां आसानी से बात करती, नाचती-गाती नहीं दिखेंगी. वह ऑटो ड्राइवर बताते हैं कि कठपुतली का खेल देखना है तो हवामहल जाइए या किसी महंगे होटल में. वे लोग ही विदेशी पर्यटकों के मनोरंजन के लिए ऐसी व्यवस्था रखते हैं.

मनोरंजन के साथ शिक्षा का माध्यम रहा कठपुतली का खेल आज अपनी पहचान बचाए रखने की जद्दोजहद कर रहा है. कठपुतली बनाने वाले कलाकार इन दिनों बमुश्किल ही अपनी रोजी कमा पा रहे हैं

कठपुतली कॉलोनी की इन गलियों के जीर्ण होते मकानों में भाट समुदाय के कई अंतर्राष्ट्रीय कलाकार रहते हैं, जिनके पास अब अपने अतीत की सुनहरी यादों के अलावा कुछ बाकी नहीं है. अपने दोमंजिला मकान में 35 वर्षीय प्रकाश भाट अपने सर्टिफिकेट, तस्वीरों और कठपुतलियों का संग्रह दिखाते हुए गर्व से बताते हैं, ‘ये सब अवाॅर्ड मुझे विदेशों में मिले थे, जब मैं वहां प्रदर्शन करने गया था. मैं अब तक 20-25 देशों में जा चुका हूं.’ फिर वे अपना बिजनेस कार्ड दिखाते हैं, जिस पर फ्रेंच भाषा में ‘अनारकली कंपनी’ लिखा हुआ है. ये प्रकाश की कंपनी का नाम है. प्रकाश 2008 से विदेशी ग्राहकों के लिए लगातार फ्रांस जाते रहे हैं. इसी कारण उन्होंने अपनी कंपनी का नाम फ्रेंच में रखा. ‘मैं कभी-कभार ही जा पाता था, पर एक बार जाने के लिए ही मुझे एक लाख रुपये मिल जाते थे,’ प्रकाश बताते हैं. ऐसी विदेश यात्राओं के बावजूद, उनके लिए अपने घर के एक कमरे में कठपुतली कला पर वर्कशॉप चलाना मुश्किल भरा है. उनके घर में न तो पानी की अच्छी व्यवस्था है और न ही शौचालय है.

कभी आम जनता के बीच सड़कों पर होने वाला ये खेल अब जयपुर के आलीशान होटलों तक ही सीमित हो गया है. हालांकि, कलाकारों का मानना है कि अब भी अवसरों की कमी नहीं है, पर कुछ वजहों से इनकी कमाई मुश्किल भरी हो गई है. 70 साल के छोटमल बताते हैं, ‘हमारे प्रदर्शनों के लिए आने वाले फंड को वसूलने के लिए एनजीओ और सरकार साथ में आ जाते हैं.’ अपने जमाने में छोटमल कुवैत में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं. अपनी प्रसिद्धि के दिनों को याद करते हुए वे बताते हैं, ‘मैं उस समय एक दिन में 1500 रुपये तक कमाता था. तब लोग हमें इज्जत से देखा करते थे पर आज ऐसा नहीं है. ये बच्चे, जो आज ये काम कर रहे हैं, उन्हें उस समय का अंदाजा तक नहीं है, जब हम ये काम किया करते थे.’ एक अंतर्राष्ट्रीय कलाकार होने के बावजूद छोटमल रिटायर हो जाने के बाद भी काम कर रहे हैं. वे कहते हैं, ‘पेट पालने के लिए कुछ तो करना होता है.’ छोटमल के घर में उनके साथ भतीजे सुनील भाट भी रहते हैं. अपने चाचा की तरह सुनील भी इस कला के प्रदर्शन के लिए 20 से ज्यादा देशों में जा चुके हैं.

इनसे एक घर दूर दो कमरे के एक मकान में 45 साल के बबलू भाट, अपनी पत्नी, पांच बेटियों, दो बेटों और अपने भाई के परिवार के साथ रहते हैं. राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ अपनी तस्वीरें दिखाते हुए बबलू बताते हैं, ‘परिवार नियोजन या पोलियो उन्मूलन अभियान जैसी कई सरकारी योजनाओं के प्रचार के लिए राजस्थान सरकार कठपुतलियों की ही मदद लेती है, इसीलिए कठपुतली बच्चे-बड़ों सभी में लोकप्रिय है. हालांकि, इन योजनाओं के लिए मिला धन वही एनजीओ रख लेते हैं, जिन्हें इसका कॉन्ट्रैक्ट मिलता है. कठपुतली के खेल के लिए कलाकारों को बुलाने की बजाय ये एनजीओ बस कठपुतलियां खरीदकर खानापूर्ति करते हैं.’

पैसे कमाने की ऐसी जद्दोजहद के इतर कर्ज भी इस कॉलोनी के रहवासियों की एक समस्या है. इस कर्ज की राशि दस हजार से लाख रुपये तक है. प्रकाश एक घर की ओर इशारा करते हुए बताते हैं, ‘ये घर एक कठपुतली कलाकार का था, जो कर्ज न चुका पाने की वजह से घर छोड़कर भाग गया. अब जिससे उसने उधार लिया था, उस आदमी ने इस मकान पर कब्जा कर लिया और अब इसका मालिक कोई और ही है.’ अब इस घर में तीसेक साल की एक महिला रहती हैं. वह कठपुतली के लकड़ी के सिर से जुड़ने वाले कपड़े सिलती हैं. वह बताती हैं, ‘मुझे भी कर्ज चुकाना है. दिन भर में हम 10-12 कठपुतलियां बनाते हैं. इससे जो भी पैसा मिलता है वो कर्ज की किस्तें भरने में चला जाता है.’

गली के बच्चों को गुस्से से झिड़कते हुए बुजुर्ग रामपाल की उम्र लगभग 72 साल है. उनकी कहानी भी कर्ज के दलदल से जुड़ी है. कभी एक प्रसिद्ध कठपुतली कलाकार रहे रामपाल आज सड़क पर आ चुके हैं. वे अब फुटपाथ पर ‘काछी घोड़ी’ (घोड़े की कठपुतली) बनाते हैं. वे बताते हैं, ‘कुछ साल पहले बीबीसी लंदन ने मेरा इंटरव्यू किया था, तब कई अखबारों में मेरे बारे में छाप था. अब हाल ये है कि मैंने पिछले लगभग दस सालों से 15-20 हजार रुपये साथ में नहीं देखे हैं!’ रामपाल के ऊपर एक लाख रुपये से ज्यादा का कर्ज है, जिसे वो पिछले दो-ढाई साल से हर महीने करीब 4-5 हजार रुपये बचाकर चुकाते हैं. शारीरिक रूप से बेहद कमजोर रामपाल एक कमरे के इस मकान में अकेले रहते हैं. वे कहते हैं, ‘ऐसा लगता है कि भविष्य में मुझे अपने बेटों पर निर्भर रहना होगा या इन्हीं हालातों में काम करते रहना होगा!’

कभी प्रसिद्ध कठपुतली कलाकार रहे 72 साल के रामपाल अब ‘काछी घोड़ी’ (घोड़े की कठपुतली) बेचते हैं. उन पर अच्छा खासा कर्ज चढ़ा है
कभी प्रसिद्ध कठपुतली कलाकार रहे 72 साल के रामपाल अब ‘काछी घोड़ी’ (घोड़े की कठपुतली) बेचते हैं. उन पर अच्छा खासा कर्ज चढ़ा है

कुछ गली आगे मंजू और उनकी सास के पास भी दुखों की ऐसी ही कहानियां हैं. लंबे समय से मंजू के ससुर बीमार हैं, जिनका खर्च कठपुतली बनाकर मुश्किल से घर चला रहे मंजू और उनके पति ही उठाते हैं.

शुरुआत में जब ये कॉलोनी बसाई गई थी, तब तकरीबन डेढ़ हजार परिवार थे, पर धीरे-धीरे कई परिवार ये जगह छोड़ने को मजबूर हो गए. आज ये बस्ती सचिवालय और विधानसभा के बीच में आती है, जो बिल्डरों और व्यापारियों के लिए एक ‘प्राइम प्रॉपर्टी’ है. भाट समुदाय के एक व्यक्ति बताते हैं, ‘पिछली बार सरकार द्वारा प्रायोजित निर्माण योजना के नाम पर 250 परिवारों को कॉलोनी से निकाल दिया गया था. हालांकि, उन्हें क्वार्टर देने की बात कही गई थी, पर ऐसा नहीं हुआ. अब बिल्डरों ने कहा है कि या तो बाकी परिवार यहां से चले जाएं या निर्माण के लिए पैसे दें. ये जमीन राजा भवानी सिंह की थी, जो बाद में कूड़ाघर बना दी गई. हम लोगों ने ही इसे इस रूप में बदला, अब ये हमें ही यहां से निकल देना चाहते हैं.’

ये समुदाय कहीं और जा भी नहीं सकता क्योंकि किसी अनजान, नई जगह पर उनके हुनर को महत्व ही नहीं मिलेगा. भाट समुदाय के कुछ बच्चे बस्ती के बाहर ही एक सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं पर ज्यादातर लोग बच्चों को मिशनरी के सहायता केंद्र और पास ही खुले एक एनजीओ द्वारा चलाए जा रहे नए स्कूल में भेजते हैं क्योंकि वहां कपड़े, दवाई जैसी अन्य जरूरी व्यवस्थाएं भी हैं.

गरीबी के जाल में फंसा भाट समुदाय धर्म के नाम पर होने वाली राजनीति से भी बच नहीं सका है, कठपुतली की कला सिखाने की वर्कशॉप करवाने के एवज में उनसे ईसाई धर्म का प्रचार करने को कहा जाता है

गरीबी के जाल में फंसा ये समुदाय धर्म के नाम पर होने वाली राजनीति से भी बच नहीं सका है. प्रकाश बताते हैं, ‘शुरुआत में हमें अपने बच्चों को मिशनरी में भेजने से कोई परेशानी नहीं थी पर बच्चों और महिलाओं को कठपुतली की कला सिखाने की वर्कशॉप करवाने के एवज में ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए मुझसे कहा गया. आप ही बताइए, हम काली मां की पूजा करते हैं. रोटी के लिए हम अपना धर्म और संस्कृति कैसे छोड़ दें?’

रविवार होने के बावजूद प्रकाश के घर पर ये कला सीखने के लिए बच्चे इकट्ठा होना शुरू हो गए हैं. कई बैचों में बंटे 80 के करीब बच्चे यहां संगीत और कठपुतली के खेल की कला सीखने आते हैं. प्रकाश बताते हैं, ‘मैं इन बच्चों से कोई फीस नहीं लेता मैं बस चाहता हूं कि बच्चे ये हुनर सीखें. और ये बच्चे कैसे फीस देंगे जब मैं जानता हूं कि इनके पास कमाई का कोई जरिया ही नहीं है?’

प्रकाश की बातें सुनकर आप यह सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि राजस्थान से निकलकर पूरे विश्व में मशहूर हुई यह अनूठी कला इस हाल में कैसे पहुंच गई.

‘नायक नहीं आंदोलन महत्वपूर्ण है’

_0RC9298web
फोटो- अमरजीत सिंह

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के बाहर और भीतर पिछले दिनों जो कुछ हुआ वह एक राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना और चैनलों से लेकर अखबारों और सोशल मीडिया के साथ-साथ इंटरनेट पर उपलब्ध ई-पत्रिकाओं में भी उसकी भरपूर धमक रही. अंतरिम जमानत पर रिहाई के बाद जेएनयू के छात्रों के बीच दिया कन्हैया का भाषण अनेक चैनलों ने लाइव चलाया और बताते हैं कि इंटरनेट पर इसे 30 लाख से अधिक लोग देख चुके हैं. इसके बाद जो प्रतिक्रियाएं आईं उनमें उसे चे ग्वेरा से लेकर लेनिन तक कहा गया, प्रशंसा के पुल बांध दिए गए और एक आम मत था कि भारत को अपना नया नेता मिल गया है. इसी के बरअक्स उसे विलेन बनाने वालों की भी कोई कमी नहीं है. ऐसा लगता है कि कन्हैया को लेकर देश का जनमत दो हिस्सों में बंट गया है.

अगर देखें तो उसका भाषण महान नहीं था. बौद्धिक सेमिनारों और आयोजनों में जाने वाले जानते हैं कि उसमें कोई नई और मौलिक बात नहीं थी. कुछ तथ्यात्मक भूलें भी थीं. वैसे भी संघर्षों में तपे वामपंथी छात्र नेता पूरे कमिटमेंट के साथ बोलते हुए अच्छा भाषण देते ही हैं. लेकिन वह भाषण निश्चित तौर पर ऐतिहासिक था. सोचिए जरा जेल और इतने दमन के बाद अगर उसके भाषण में डर का कोई कतरा होता? प्रतिहिंसा का कोई कतरा होता? कोई अभद्र टिप्पणी होती? कोई हल्की बात होती? तो यह पूरा छात्र आंदोलन कमजोर पड़ जाता. वह किसी डिबेट में नहीं था, जेल से आने के कुछ घंटों के भीतर उस छात्र समूह के सामने था जो उसके साथ रहा तो उस मीडिया और जनता के सामने भी जिसका एक बड़ा हिस्सा उसको खत्म कर देने के लिए मुतमइन था. इसलिए वह देस-काल महत्वपूर्ण बन गया. उसे इतिहास ने एक मौका, एक जिम्मेदारी दी, जिसे उसने  बखूबी निभाया. इस अवसर पर जिस कमिटमेंट और विट के साथ उसने दक्षिणपंथी राजनीति पर हमला किया और आंबेडकरवादी तथा वामपंथी छात्र राजनीति को एक मंच पर आने का आह्वान किया वह संघर्ष की उस लंबी परियोजना की ओर इंगित करने वाला था, जिसके बिना फासीवाद के खिलाफ कोई लंबी लड़ाई भारत में नहीं लड़ी जा सकती.

देश भर के तमाम इंसाफपसंद लोग जो सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक उनकी लड़ाई लड़ रहे हैं… ये सब हीरो हैं. सब इसमें बराबरी के हिस्सेदार हैं

और यह प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है. देश में एक के बाद एक छात्र आंदोलनों की कड़ियां जुड़ती जा रही हैं. शुरुआत एफटीआईआई के आंदोलन से हुई जब एक औसत से भी निचले स्तर के कलाकार गजेंद्र चौहान को सिर्फ इस आधार पर इस प्रतिष्ठित संस्था की कमान सौंप दी गई कि वे सत्ताधारी पार्टी से जुड़े हुए हैं. वह आंदोलन कैंपस से बाहर निकला और जेएनयू ही नहीं अनेक विश्वविद्यालयों और अन्य शिक्षण संस्थानों के छात्रों, फिल्म से जुड़े गंभीर लोगों और बुद्धिजीवी समाज ने उसे पूरा समर्थन दिया. उसके बाद केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीय विश्वविद्यालयों की शोध फेलोशिप बंद किए जाने के खिलाफ एक ऐतिहासिक आंदोलन हुआ जिसमें छात्रों ने यूजीसी कार्यालय के सामने 88 दिनों तक लगातार धरना दिया. इसमें जेएनयू ही नहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय सहित तमाम जगहों के छात्र शामिल थे और उनके समर्थन में देश भर में धरना प्रदर्शन हुए. अंततः सरकार को फेलोशिप तो देनी पड़ी लेकिन इसे बढ़ाने की उनकी मांग ठुकरा दी गई. हैदराबाद के आंबेडकरवादी छात्र संगठन के कार्यकर्ता रोहित वेमुला के केंद्रीय मंत्रियों के दबाव में छात्रावास से निष्कासन के बाद आत्महत्या जैसा कदम उठाने के बाद तो आत्महत्या के  लिए जिम्मेदार लोगों को सजा देने की मांग के साथ देश के भीतर ही नहीं बाहर भी आंबेडकरवादी, वामपंथी और प्रगतिशील विचारधारा के लोगों ने जबरदस्त प्रतिरोध दर्ज कराया. हर बार की तरह इस बार भी जेएनयू इस प्रतिरोध में अपनी पूरी ताकत के साथ खड़ा था.

इलाहाबाद में छात्रों ने अपनी अध्यक्ष ऋचा सिंह के नेतृत्व में विषैले बयानों के लिए चर्चित सांसद आदित्यनाथ को प्रवेश करने से रोका तो उनके खिलाफ जो कुचक्र रचे जा रहे हैं वे आज तक जारी हैं. केंद्र में नई सरकार आने के बाद जिस तरह कैंपसों में हिंदुत्व का वैचारिक एजेंडा लागू करने के लिए कोशिशें हुईं उसमें यह स्वाभाविक था कि इसका दुष्परिणाम झेलने वाले तबके एक साथ आते और प्रतिरोध दर्ज कराते. जेएनयू में हुई एक घटना के बाद जिस तरह तीन छात्रों को राजद्रोह (भाषा की अपनी राजनीति होती है जिसके तहत ब्रिटिशकालीन राजद्रोह कानून को मुख्यधारा के चैनल देशद्रोह में बदल देते हैं) के आरोप में गिरफ्तार किया गया, वह तमाम तार्किक लोगों को गैरजरूरी और अतिरेकी कदम लगा और इसीलिए देश-विदेश से तमाम प्रगतिशील लोगों, विश्वविद्यालयों, शिक्षक संघों, बुद्धिजीवियों और आम जनता ने इसका कड़ा प्रतिवाद दर्ज कराया. छात्रसंघ अध्यक्ष के रूप में कन्हैया के भाषण को इन्हीं परिप्रेक्ष्यों में देखा जाना चाहिए लेकिन मसीहा की तलाश में पागल हमारा समाज केजरीवाल से कन्हैया तक के कंधों पर अपनी अकूत उम्मीदों का बोझ डालने के लिए बेकरार है. उसे उद्धारक चाहिए जो पांच साल में दुनिया बदल दे और खुद बस एक बार जाकर वोट डालना हो. जाहिर है उसे हर बार धोखा खाना ही होगा. एक कमजोर और आत्मविश्वास से हीन समाज ही मसीहा तलाशता है लेकिन इतिहास का अनुभव बताता है कि समाज जनता बदलती है नेता नहीं. आंदोलन नेता पैदा करते हैं, नेता आंदोलन नहीं पैदा करते. व्यक्ति को आंदोलन से ऊपर खड़ा कर देने की प्रवृत्ति सत्ता और उसके समर्थकों के लिए तो लाभकारी होती है जो आज उसे कुछ साल पहले मिली सजा से लेकर एक मित्र के साथ सामान्य-सी तस्वीर को अपने कुत्सा प्रचार का हिस्सा बनाकर निजी हमलों की आड़ में व्यापक सवालों को छिपा रहा है लेकिन शिक्षा के बाजारीकरण और भगवाकरण के खिलाफ जो एक देशव्यापी आंदोलन सुगबुगा रहा है, उसके समर्थकों का इसे स्वीकार करना घातक होगा. 

‘हर विश्वविद्यालय जेएनयू जैसा होना चाहिए’

DSC_7259web
Photo- Tehelka Archive

सालों से हम इस बहस में उलझे थे कि क्या जेएनयू की दुनिया नॉर्थ गेट पर जाकर वाकई खत्म हो जाती है? इसका जवाब ‘हां’ भी था और ‘ना’ भी. तमाम बहस-मुबाहिसे जेएनयू की चौहद्दी पर पहुंचते ही दम तोड़ देते थे. हालांकि ‘राष्ट्रवाद’ और ‘राष्ट्रद्रोह’ के मुद्दे पर जेएनयू और सारा भारत एक साथ बहस में उलझ जाएगा. आज जेएनयू और सारा देश एक साथ सोच रहा है और उम्मीद हैं कुछ समय बाद एक जैसा सोचने लगेगा.  

किसने सोचा था कि जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार का भाषण यू-ट्यूब पर लाखों लोग सुनेंगे. 30 लाख से ज्यादा लोग सोशल मीडिया पर शेयर करेंगे. वो ट्विटर से लेकर फेसबुक तक वर्ल्डवाइड ट्रेंड कर जाएगा. इतनी लोकप्रियता कि कन्हैया अमेरिका के राष्ट्रपति पद के उम्मीद्वार डोनॉल्ड ट्रम्प को पीछे छोड़कर नंबर एक ट्रेंड हो जाएगा. यह तो विश्वास से परे था कि जब कन्हैया जेल से बाहर आकर जेएनयू में छात्रों को संबोधित करेगा तो तकरीबन दर्जन भर न्यूज चैनल उसके पूरे भाषण का एक घंटे तक सीधा प्रसारण करेंगे. शुरुआती दिनों में संघ के दुष्प्रचार से पैदा हुआ जेएनयू-विरोधी उन्माद शांत होने के बाद लोगों ने पूछना शुरू कर दिया कि भाई ऐसी ‘आजादी’ मांगने में देशद्रोह क्या है? हम सबने चैन की सांस ली कि चलो कन्हैया का ये वाक्य लोगों के जेहन में उतर गया कि ‘देश से नहीं मेरे भाई देश में आजादी चाहिए.’

गंगा ढाबा से लेकर साबरमती ढाबे तक चाय की चुस्कियों में समूचे ब्रह्मांड को मथ देने का बहसबाज हौसला आज औचक खड़ा है. उसे पता नहीं था कि उसकी दुनिया का इतना तीव्र विस्तार होने वाला है. जिन लोगों ने जेएनयू को सबक सिखाने की योजना बनाई थी, जेएनयू उनके अनुमान से कहीं ज्यादा बिगड़ा निकला. छद्म राष्ट्रवाद के घोड़े पर सवार संघ परिवार अभी फिलहाल उन्माद में चल रहा है. लेकिन उसे पता होना चाहिए कि उन्माद जितनी तेजी से चढ़ता है, उतर भी जाता है. जेएनयू ने जितने सवाल मोदी सरकार और संघ परिवार के खिलाफ हवा में उछाल दिए हैं, कुछ समय बाद यही सवाल जब जनता पूछने लगेगी तो सारा भारत जेएनयू हो जाएगा.

जेएनयू में एक जुमला बहुत लोकप्रिय है- ‘जो जेएनयू आज सोचता है, देश कल सोचता है.’ जेएनयू में अपनी बौद्धिकता को लेकर यह गुमान बहुत पुराना है. आखिरकार बौद्धिक होना जोखिम का काम है. आप उस चश्मे से दुनिया नहीं देख सकते जिससे आम इंसान देखता है. आपको लोगों के लिए न सिर्फ समस्याओं को बारीकी से समझना है बल्कि उनका समाधान भी सुझाना है. इस मामले में जेएनयू के छात्र-छात्राएं अपनी दुनिया-जहान को और बेहतर बनाने की राह तलाशते रहते हैं. इस लिहाज से वो बौद्धिक राजनीतिज्ञ हैं.

ऐसा नहीं है कि इससे पहले जेएनयू ने देश को राजनेता नहीं दिए, लेकिन राजनीति हरगिज नहीं दी. जेएनयू हर कहीं-हर किसी के संघर्ष में बिन बुलाए साथ खड़ा रहा. जब निर्भया बलात्कार कांड हुआ, ये जेएनयू के छात्र-छात्राएं थे जिन्होंने सबसे पहले जाकर वसंत कुंज थाने का घेराव किया. रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या की खबर आते ही जेएनयू अपने आप उद्वेलित हो गया. सोनी सोरी से लेकर इरोम शर्मिला तक जेएनयू के लिए रोज-रोज लड़े जाने वाले संघर्ष हैं.

यहां तो हर विश्वविद्यालय जेएनयू जैसा होना चाहिए. उसकी बौद्धिकता की धाक पूरी दुनिया में मानी जाती रही. जेएनयू ने अंतरराष्ट्रीय विमर्शों में खालिस भारतीय दृष्टिकोण से अपना पक्ष रखा. जेएनयू विभिन्न मत रखने वालों और कभी-कभी धुर विरोधी सोच रखने वाले तमाम लोगों का समुच्चय है. यहां तर्क दिए जाते हैं और उन तर्कों के खिलाफ भी तर्क रखे जाते हैं. हम जेएनयू वाले शायद तर्क और संशय की प्राचीन भारतीय परंपरा के सबसे बड़े वारिस हैं. जेएनयू में कथित तौर पर देशविरोधी नारे लगाने वाले कौन हैं? शायद इस बात का जवाब सिर्फ भारत का गृह मंत्रालय ही दे सकता है; अगर देना चाहे तो. एक बात तय है कि वे लोग जेएनयू के नहीं थे. तो फिर कौन थे? यह पता लगाना सिर्फ पुलिस के बूते की बात है. हम लोग बल्कि कहें जेएनयू में ज्यादातर लोग चाहते हैं कि सरकार उनको गिरफ्तार करे.

इस बात से कोई इनकार नहीं करता कि जेएनयू में मुट्ठी भर ऐसे लोग भी हैं जो कि तमाम मसलों पर काफी अलग सोच रखते हैं. मसलन एक-डेढ़ दर्जन लोगों के एक समूह का मानना है कि कश्मीर को आजाद हो जाना चाहिए. यही लोग अफजल गुरु की फांसी पर सवाल खड़े करते हुए उसे शहीद का दर्जा भी देते हैं. सवाल उठता है कि ऐसे लोगों के साथ क्या सलूक होना चाहिए? खालिस भारतीय राष्ट्र की परंपरा की बात करें तो आजादी की लड़ाई से निकला राष्ट्रवाद बड़े दिल का राष्ट्रवाद है. आजादी के कुछ ही सालों के भीतर तमिलनाडु ने अलग राष्ट्र की मांग कर दी थी. जवाहरलाल नेहरू और लालबहादुर शास्त्री सरीखे प्रधानमंत्रियों ने अलगाव की मांग करने वाले नेताओं पर कोई राजद्रोह नहीं लगाया बल्कि उनके साथ हरसंभव तरीके से बातचीत की कोशिश की. कुछ ही सालों में उनके सबसे बड़े नेता सीएन अन्नादुरई ने 1967 में भारतीय संविधान के तहत तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. आज कोई कह सकता है कि ये वो ही तमिलनाडु है जो कभी अलग होने के नारे लगा रहा था.

अफजल गुरु और कश्मीर की आज़ादी के नारे लगाने वाले भले ही भटके हुए लोग हैं, लेकिन वो हमारे लोग हैं यानी उस भारतीय राष्ट्र का हिस्सा हैं जिस पर हमें नाज है. अगर हम उन राज्यों के लोगों के साथ दुश्मन जैसा बर्ताव करने लगे तो इसका मतलब कि हमें अपने राष्ट्र की ताकत पर खुद ही यकीन नहीं है. दरअसल जेएनयू पर हमला इसलिए नहीं है कि यहां के कुछ छात्र और शिक्षक ‘देशभक्त’ नहीं हैं बल्कि इसलिए है कि जेएनयू के अधिकांश छात्र और शिक्षक देश के सामने सांप्रदायिकता और फासीवाद के खतरे को बखूबी पहचानते हैं और इसीलिए बड़े देशभक्त हैं. 

(लेखक ने जेएनयू से शोध किया है)

होली खेले आसफुद्दौला वजीर…

Photo- commons.wikimedia.org
Photo- commons.wikimedia.org

लखनऊ की होली के क्या कहने साहब ! होली क्या है हिंदुस्तान की कौमी यकजहती की आबरू है. जो ये मानते हैं कि होली सिर्फ हिंदुओं का त्योहार है वह होली के दिन पुराने लखनऊ के किसी भी मोहल्ले में जाकर देख लें. पहचानना मुश्किल हो जाएगा रंग में डूबा कौन-सा चेहरा हिंदू है कौन-सा मुसलमान. शहर के दिल चौक की मशहूर होली की बारात आजादी के जमाने से हिंदू-मुस्लिम मिलकर निकालते हैं. लखनऊ की साझी होली की पहचान बन चुकी ये बारात चौक, विक्टोरिया स्ट्रीट, अकबरी गेट और राजा बाजार जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों से होकर ही निकलती है. इसमें मुसलमान न सिर्फ रंग खेलते, नाचते गाते आगे बढ़ते हैं बल्कि मुस्लिम घरों की छतों से रंग-गुलाल और फूलों की बरसात भी होती है. और ये सिर्फ एक-दो साल की खुशफहमी नहीं है. इस तरह की मिली जुली होली लखनऊ पिछले सैकड़ों सालों से मनाता आ रहा है.

लखनऊ का ये सद्भाव असल में यहां के नवाबों की देन है. नवाबों के खानदान से ताल्लुक रखने वाले जाफर मीर अब्दुल्ला कहते हैं, ‘लखनऊ में मुसलमान होली तो मनाते ही हैं साथ ही होली का प्रभाव उनके अपने त्योहारों पर भी साफ दिखता है. ईरानी नव वर्ष ‘नौरोज’ जो कि होली के ही आस-पास हर साल 21 मार्च को पड़ता है यूं तो पूरे देश में और देश के बाहर भी मनाया जाता है लेकिन सिर्फ लखनऊ में नौरोज के दिन होली की तर्ज पर रंग खेला जाता है. नवाबीन-ए-अवध खुद ज़ोरदार होली खेलते थे. दरअसल वे चाहते थे कि लखनऊ में कोई भी बड़ा त्योहार किसी एक फिरके का त्योहार बन कर न रह जाए.’ नवाबों के वक्त में इस शहर में मोहर्रम और होली के त्योहार हिंदू-मुस्लिम मिलकर मनाते थे. इस बात की गवाही लखनऊ की उर्दू शायरी भी देती है. जहां प्यारे साहब रशीद, नानक चंद नानक, छन्नू लाल दिलगीर, कृष्ण बिहारी नूर जैसे हिंदू शायरों के लिखे मर्सिये आज भी मोहर्रम की मजलिसों की जान हैं वहीं लखनऊ के मुस्लिम शायरों ने भी लखनऊ की होली का बयान अपनी शायरी में खूब किया है.

खुदा-ए-सुखन मीर तकी मीर की लखनऊ से बेजारी के चर्चे सबने सुन रखे हैं, लेकिन इस शहर की होली के वे भी दीवाने थे. मीर जब दिल्ली से लखनऊ आए और उन्होंने तब के नवाब आसफुद्दौला को रंगों में सराबोर होली खेलते देखा तो उनकी तबीयत भी रंगीन हो गई, और उन्होंने पूरी मिस्नवी नवाब आसफुद्दौला की होली पर लिख डाली.

‘होली खेले आसफुद्दौला वजीर,
रंग सौबत से अजब हैं खुर्दोपीर
दस्ता-दस्ता रंग में भीगे जवां
जैसे गुलदस्ता थे जूओं पर रवां
कुमकुमे जो मारते भरकर गुलाल
जिसके लगता आन कर फिर मेंहदी लाल’

बाद के सालों में तो मीर को लखनऊ की होली ने इस कदर मस्त किया कि इसका रंग जब तब उनके अशआर में झमकता रहा.

आओ साथी बहार फिर आई
होली में कितनी शादियां लाई
जिस तरफ देखो मार्का सा है
शहर है या कोई तमाशा है
फिर लबालब है आब-ए-रंग
और उड़े है गुलाल किस किस ढंग
थाल भर भर अबीर लाते हैं
गुल की पत्ती मिला उड़ाते हैं

सिर्फ मीर ही नहीं, दिल्ली छोड़कर लखनऊ तशरीफ लाने वाले एक और शायर सआदत यार खां ‘रंगीन’ भी लखनऊ की होली में सरापा रंगे हुए थे. रंगीन की चंचल शोख रेख्ती (खड़ी बोली) ने लखनऊ को बहुत बदनामी भी दिलाई लेकिन इस शहर की होली उनके मिजाज से बहुत मिलती थी. नमूना मुलाहिजा हो-

भरके पिचकारियों में रंगीन रंग
नाजनीं को खिलायी होली संग
बादल आए हैं घिर गुलाल के लाल
कुछ किसी का नहीं किसी को ख्याल
चलती है दो तरफ से पिचकारी
मह बरसता है रंग का भारी
हर खड़ी है कोई भर के पिचकारी
और किसी ने किसी को जा मारी
भर के पिचकारी वो जो है चालाक
मारती है किसी को दूर से ताक
किसने भर के रंग का तसला
हाथ से है किसी का मुंह मसला
और मुट्ठी में अपने भरके गुलाल
डालकर रंग मुंह किया है लाल
जिसके बालों में पड़ गया है अबीर
बड़बड़ाती है वो हो दिलगीर
जिसने डाला है हौज में जिसको
वो यह कहती है कोस कर उसको
ये हंसी तेरी भाड़ में जाए
तुझको होली न दूसरी आए’

लखनऊ स्कूल के सबसे बड़े उस्तादों में एक ख्वाजा हैदर अली ‘आतिश’ भी अपने शहर की होली से मुतासिर हुए बगैर नहीं रह सके.

होली शहीद-ए-नाज के खूं से भी खेलिए
रंग इसमें है गुलाल का बू है अबीर की

लखनऊ की तारीख में जो शख्स होली के सबसे बड़े दीवाने के तौर पर मशहूर है उसका नाम है वाजिद अली शाह ‘अख्तर’ जिसे आज तक उसका शहर जान-ए-आलम कहकर याद करता है. कौमी यकजहती की निशानी के तौर पर अमर हो चुके लखनऊ के इस बांके नवाब ने बेशुमार लोक-गीत होली पर रचे.

मोरे कान्हा जो आए पलट के
अबके होली मैं खेलूंगी डट के
उनके पीछे मैं चुपके से जाके
ये गुलाल अपने तन से लगाके
रंग दूंगी उन्हें भी लिपट के
अबके होली मैं खेलूंगी डट के

वाजिद अली शाह की होली को लेकर लखनऊ में मशहूर किस्सों में एक किस्सा यह भी सुनाई देता है कि एक दफा मोहर्रम और होली एक ही दिन पड़ गए. पहले आप की तहजीब वाले लखनऊ में हिंदुओं ने फैसला किया कि इस बार वे होली नहीं मनाएंगे. जबकि मुसलमानों का मानना था कि जैसे मोहर्रम को हिंदू अपना ही त्योहार मानते हैं वैसे ही होली हम भी मनाते हैं इसलिए मोहर्रम की वजह से होली न टाली जाए, लिहाजा कोई और रास्ता निकलना चाहिए. वाजिद अली शाह ने एक ही दिन में होली खेले जाने का और मोहर्रम के मातम का अलग अलग वक्त तय किया. इस तरह पूरा लखनऊ होली और मोहर्रम दोनों में शरीक हुआ. ऐतिहासिक रूप से पता नहीं यह घटना कितनी सच्ची है, लेकिन अपनी मिली-जुली तहज़ीब में यकीन रखने वाला हर लखनवी इसे पूरे ईमान से तस्लीम (स्वीकार) करता है.

उर्दू के एक और बड़े शायर इंशा अल्लाह खां इंशा ने भी नवाब सादत अली खां के होली खेलने की तारीफ गद्य और शायरी दोनों में की है. इंशा लिखते हैं- ‘जो शख्स भी इस बात से गुमान करता है कि मैं उनकी खुशामद कर रहा हूं तो उसके लिए होली के जमाने में बिल-खुसूस हुजूर की खिदमत में हाजिर होना शर्त है कि वो खुद देख ले कि राजा इंद्र परियों के दरम्यान ज्यादा खुश मालूम होते हैं या वली अहद हूरों के दरम्यान.’ शायरी में होली का बयान इंशा इस तरह करते हैं-

संग होली में हुजूर अपने जो लावें हर रात
कन्हैया बनें और सर पे धर लेवें मुकट
गोपियां दौड़ पड़े ढ़ूंढें कदम की छैयां
बांसुरी धुन में दिखा देवें वही जमना तट
गागरे लेवें उठा और ये कहती जावें
देख तो होली जो बज्म होती है पनघट

लखनऊ में नवाबी उजड़ने के बाद भी मुसलमानों का होली खेलना और होली पर शायरी करना पहले की तरह ही जारी रहा. स्वतंत्रता सेनानी और अज़ीम शायर हसरत मोहानी जिनका रकाबगंज स्थित मज़ार आज पूरी तरह गुमनाम है, उन्होंने भी होली पर खूब शायरी की.

मोसे छेड़ करत नंदलाल
लिए ठाड़े अबीर गुलाल
ढीठ भई जिनकी बरजोरी
औरन पर रंग डाल डाल

शायरे इंकलाब जोश मलीहाबादी की शायरी भी होली के रंगों से सराबोर है, आम तौर पर अपनी नज़्मों और गजलों के लिए मशहूर जोश ने कई गीत भी लिखे हैं जिनमे होली का जिक्र मिलता है-

गोकुल बन में बरसा रंग
बाजा हर घर में मिरदंग
खुद से खुला हर इक जूड़ा
हर इक गोपी मुस्काई
हिरदै में बदरी छाई

अपने तंजो मिज़ाह (हास्य-व्यंग्य) के लिए मशहूर सागर खय्यामी और उनके भाई नाजिर खय्यामी भी होली की मस्ती के मतवाले थे. दोनों होली पर दोस्ताना महफिलें भी सजाते थे. सागर साहब की होली-ठिठोली मुलाहिजा हो-

छाई हैं हर इक सिम्त जो होली की बहारें
पिचकारियां ताने वो हसीनों की कतारें
हैं हाथ हिना रंग तो रंगीन फुवारें
इक दिल से भला आरती किस किस की उतारें
चंदन से बदन आबे गुले शोख से नम हैं
सौ दिल हों अगर पास तो इस बज्म से कम हैं

यहां तो लखनऊ के सिर्फ चंद मुसलमान शाइरों के होली के रंग में डूबे कलाम दिए गए हैं. वास्तव में इस शहर के अनगिनत मुस्लिम शायरों ने होली पर अपनी शायरी के जरिए न सिर्फ लखनऊ की होली की महानता बयान की है बल्कि पूरी दुनिया को धार्मिक सद्भाव का संदेश भी दिया है. नाजिर खय्यामी का यह पैगाम ही देखिए.

ईमां को ईमां से मिलाओ
इरफां को इरफां से मिलाओ
इंसां को इंसां से मिलाओ
गीता को कुरआं से मिलाओ
दैर-ओ-हरम में हो न जंग
होली खेलो हमरे संग!

एक था चंदू

Photo- AISA

दुनिया में वामपंथ का सबसे मजबूत किला ढह चुका था. दुनिया तेजी से पूंजीवाद की ओर बढ़ रही थी. उदारीकरण भारत की दहलीज लांघकर अपने को स्थापित कर चुका था. तमाम धुर वामपंथी आवाजें मार्क्सवाद के खात्मे की बात कह रही थीं. उसी दौर की बात है, जब जेएनयू कैंपस में एक युवा छात्रनेता अपने साथियाें से कह रहा था, ‘हम अगर कहीं जाएंगे तो हमारे कंधे पर उन दबी हुई आवाजों की शक्ति होगी जिनको बचाने की बात हम सड़कों पर करते हैं. अगर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा होगी तो भगत सिंह जैसे शहीद होने की महत्वाकांक्षा होगी, न कि जेएनयू से इलेक्शन में गांठ जोड़कर चुनाव जीतने और हारने की महत्वाकांक्षा होगी.’ दबी हुई आवाजों को बचाने की अलख जगाने वाले इस युवक का नाम था चंद्रशेखर, जिसे उसके दोस्त प्यार से कॉमरेड चंदू कहा करते थे. जो लोग चंदू को नहीं जानते, उनके मन में सवाल उठेगा कि वे आजकल कहां हैं? जवाब है कि वे भगत सिंह की तरह अंग्रेजी साम्राज्यवाद से लड़ते हुए शहीद तो नहीं हुए, लेकिन लड़ते हुए मारे जाने की उनकी  महत्वाकांक्षा पूरी हो गई. वे अब हमारे बीच नहीं हैं.

Photo- AISA
Photo- AISA

जेएनयू में उठे विवाद और छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया की गिरफ्तारी के बाद उनको पूरा देश जान गया. उनके हर भाषण का वीडियो वायरल हो गया. तमाम लोगों ने कन्हैया में एक तेज-तर्रार नेता की छवि देखी. हालांकि, उसी अनुपात में उनकी आलाेचना भी हुई. कन्हैया की लोकप्रियता, उनका जज्बा, उनकी ऊर्जा चंद्रशेखर की याद दिलाती है. दोनों में बहुत असमानताओं के साथ समानता यह है कि दोनों में व्यवस्था से टकराने का माद्दा है. दोनों ही जेएनयू छात्रसंघ की पैदावार हैं. दोनों के सरोकार गरीबों, मजदूरों, दलितों और महिलाओं को संबोधित करते हैं. हां, कन्हैया और चंद्रशेखर में फर्क यह है कि कन्हैया की शुरुआत एक ऐसी गिरफ्तारी से हुई, जिसमें शुरुआती तौर उन्हें बढ़त मिलती दिख रही है. लेकिन चंद्रशेखर बिहार की जनता के लिए एक उम्मीद बनकर उनके बीच काम करने गए थे और बाहुबल की राजनीति ने उन्हें लील लिया.

20 सितंबर, 1964 को बिहार के सीवान जिले ​में जन्मे चंदू आठ बरस के थे जब उनके पिता का देहांत हो गया. सैनिक स्कूल तिलैया से इंटरमीडियट तक की शिक्षा के बाद वे एनडीए प्रशिक्षण के लिए चुने गए. लेकिन वहां उनका मन नहीं लगा और दो साल बाद वापस आ गए. इसके बाद उनका वामपंथी राजनीति से जुड़ाव हुआ और एआईएसएफ के राज्य उपाध्यक्ष के पद तक पहुंचे. बाद में वे जेएनयू पहुंचे तो कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया लिबरेशन की छात्र इकाई आइसा के साथ अपना राजनीतिक सफर शुरू किया. एक छात्र नेता के रूप में वे बहुत तेजी से उभरे और लोकप्रिय हुए. 1993-94 में जेएनयू छात्रसंघ के उपाध्यक्ष चुने गए और फिर लगातार दो बार अध्यक्ष चुने गए. इसके बाद वे जमीनी स्तर पर काम करने के म​कसद से अपने गृह जिले सीवान गए, जहां उनका मुकाबला संगीन अपराधियों की खूनी राजनीति से होना था.

सीवान पहुंचकर चंदू ने ​बिहार के बाहुबली नेता शहाबुद्दीन के खिलाफ उनके गढ़ में ही बिगुल फूंक दिया. उन्होंने बिहार की राजनीति में अपराध, बाहुबल, घोटालों और भ्रष्टाचार के मुद्दों को बहुत प्रमुखता से उठाया. जनता से उनको बेहतर प्रतिक्रिया मिल रही थी. चंदू भारत के राजनीतिक परिदृश्य को बदलने का सपना देख रहे थे और इसकी शुरुआत भी कर दी थी. बिहार में जनसंहारों और घोटालों के विरोध में 2 अप्रैल, 1997 को बंद बुलाया गया था. ​इस बंद के लिए 31 मार्च शाम चार बजे जेपी चौक पर एक नुक्कड़ सभा को संबोधित करते हुए चंदू और उनके सहयोगी श्याम नारायण को गोलियों से भून दिया गया. इस गोलीबारी में एक ठेलेवाले भुटेले मियां भी मारे गए.

प्रतिलिपियों से भरी इस दुनिया में चंदू मौलिक होने की जिद के साथ अड़े रहे. हमारी दोस्त प्रथमा कहती थी, ‘वह रेयर आदमी हैं.’ हमारा नारा था, ‘पोएट्री, पैशन एंड पाॅलिटिक्स’

चंद्रशेखर की हत्या के बाद भाकपा माले ने आरोप लगाया, ‘अब तक हमारे कई नेताओं कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है. श्याम नारायण और चंद्रशेखर की हत्या में राजद सांसद शहाबुद्दीन का हाथ है. वही सूत्रधार हैं. जिस समय हत्या हुई, हमारे कार्यकर्ता वहां पर मौजूद थे, जिन्होंने हत्यारों को पहचाना. वे शहाबुद्दीन के साथ के लोग थे. हत्या की वजह राजनीतिक है. हमारी पार्टी ने पिछले चुनाव में शहाबुद्दीन को सशक्त चुनौती दी थी. हमने चुनाव में अपराध के खिलाफ एजेंडा तैयार किया था. शहाबुद्दीन अपराध शिरोमणि हैं. अपराध को एजेंडा बनाने के बाद हमारे कार्यकर्ताओं पर चुन-चुनकर हमला हो रहा है.’

भाकपा माले के नेता रमेश एस. कुशवाहा ने उस समय बयान दिया था, ‘शहाबुद्दीन एक पेशेवर अपराधी रहे हैं. इसके पहले बिहार के बुद्धिजीवी उनके खिलाफ एक शब्द नहीं बोलते थे. पत्रकार कलम चलाने से डरते थे. हम लोगों ने पहली बार अपराध को एजेंडा बनाया और उनके खिलाफ बोलना शुरू किया.’ यह सही है कि इसके पहले भी बिहार चुनाव में कई वामपंथी कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी थी. लोगों को वोट देने से रोकने के लिए अपराधी नेताओं के गुंडे झुंड में पहुंचकर गोलियां चलाते थे और विरोधी पार्टी के मतदाताओं को मतदान से रोकते थे.

हत्या के बाद देश भर में प्रदर्शन शुरू हो गए. चंद्रशेखर के गांव बिंदुसार में देश भर से हजारों छात्र पहुंचे और चंदू की मां के नेतृत्व में मार्च निकाला गया. इस सभा को संबोधित करते हुए चंदू की बूढ़ी मां कौशल्या देवी ने कहा था, ‘मेरा बेटा मर कर भी अमर है और सदा अमर रहेगा. मेरी झोपड़ी को झोपड़ी मत आंकना. इस झोपड़ी की बहुत कीमत है… मेरा बेटा मरा नहीं है. ये हजारों लाल मेरे बेटे हैं.’ चंदू के गांव से चलकर हजारों नौजवानों का जुलूस सीवान के जेपी चौक पहुंचा. बताते हैं कि इतना बड़ा जुलूस सीवान में शायद ही कभी निकला था. दिल्ली में छात्र और बुद्धिजीवियों ने भारी विरोध मार्च निकाला. यह प्रदर्शन पूरे देश में हुआ और शहाबुद्दीन और साधु यादव को सजा देने की मांग की गई. जेएनयू के छात्रों के विरोध मार्च पर पुलिसिया लाठीचार्ज में बड़ी संख्या में लड़के लड़कियां घायल हुए. चंदू की हत्या के बाद दो अप्रैल का बंद और व्यापक हो गया और करीब करीब हिंसक भी रहा. पूरे बिहार में जनता सड़क पर उतरी.

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने राहत राशि के रूप में एक लाख रुपये का चेक भेजा तो चंदू की मां ने यह कहकर लौटा दिया कि ‘बेटे की शहादत के एवज में मैं कोई भी राशि लेना अपमान समझती हूं… मैं उन्हें लानतें भेज रही हूं जिन्होंने मेरे बेटे की जान की कीमत लगाई. एक ऐसी मां के लिए, जिसका इतना बड़ा बेटा मार दिया गया हो और जो यह भी जानती हो कि उसका कातिल कौन है, एकमात्र काम हो सकता है, वह यह है कि कातिल को सजा मिले. मेरा मन तभी शांत होगा महोदय. मेरी एक ही कीमत है, एक ही मांग है कि अपने दुलारे शहाबुद्दीन को किले से बाहर करो या तो उसे फांसी दो या फिर लोगों को यह हक दो कि उसे गोली से उड़ा दें.’

तत्कालीन सरकार से मांग की गई कि शहाबुद्दीन की संसद सदस्यता खारिज की जाए और बिहार आवास पर प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर गोली चलाने वाले साधु यादव को गिरफ्तार किया जाए. प्रधानमंत्री गुजराल ने इन मांगों को अव्यवहारिक बताया. सांसद शहाबुद्दीन गिरफ्तार हुए, लेकिन उनके खिलाफ ठोस सबूत और गवाह नहीं मिले. वे जमानत पर छूट गए. अदालत में यह मामला 15 साल तक खिंचा. आखिरकार बाहुबली नेताओं से संबंध रखने वाले तीन शार्प-शूटरों को उम्रकैद की सजा मिली. शहाबुद्दीन को जेल तो हुई लेकिन अन्य मामलों में. उनके खिलाफ चंद्रशेखर हत्याकांड और अन्य कई मामलों में गवाहों पर इतना अधिक दबाव डाला गया कि कई गवाह घर छोड़कर भाग गए या फिर गवाही से पलट गए. उस दौर में बिहार में शहाबुद्दीन की तूती बोलती थी. 

चंदू जब जेएनयूएसयू के उपाध्यक्ष थे, तभी प्रणय कृष्ण अध्यक्ष थे. प्रणय कहते हैं, ‘प्रतिलिपियों से भरी इस दुनिया में चंदू मौलिक होने की जिद के साथ अड़े रहे. हमारी दोस्त प्रथमा कहती थी, ‘वह रेयर आदमी हैं.’ 91-92 में जेएनयू में हमारी तिकड़ी बन गई थी. राजनीति, कविता, संगीत, आवेग और रहन-सहन- सभी में हम एक से थे. हमारा नारा था, ‘पोएट्री, पैशन एंड पाॅलिटिक्स.’ चंदू इस नारे के सबसे ज्यादा करीब थे. समय, परिस्थिति और मौत ने हम तीनों को अलग-अलग ठिकाने लगाया, लेकिन तब तक हम एक-दूसरे के भीतर जीने लगे थे. चंदू कुछ इस तरह जिये कि हमारी कसौटी बनते चले गए. बहुत कुछ स्वाभिमान, ईमान, हिम्मत, मौलिकता और कल्पना- जिसे हम जिंदगी की राह में खोते जाते हैं, चंदू उन सारी खोई चीजों को हमें वापस दिलाते रहे.’

भाकपा माले की नेता कविता कृष्णन कहती हैं, ‘चंद्रशेखर का मामला और अब कन्हैया का मामला, इन दोनों घटनाओें में काेई समानता तो नहीं है, लेकिन ये जेएनयू की भूमिका को जरूर दिखाती हैं. जेएनयू पर इस बार का हमला भाजपा का पहले से प्लान किया हुआ है. इसके पहले भी कोशिश होती रही है जेएनयू को निशाना बनाने की. इस बार उन्होंने इसे लॉन्च किया. चंद्रशेखर की जो हत्या हुई, उसमें कई लोगों की पहले से हत्या हो चुकी थी. चंद्रशेखर यह जानते थे कि वहां खतरा है लेकिन उन्होंने चुना कि मैं वहां का हूं और वहीं जाकर काम करूंगा. वे वहां गए और वहां राजद सांसद ने उनकी हत्या करवाई. दोनों का राजनीतिक संदर्भ है लेकिन दोनों में अंतर है.’

चंदू के व्यक्तित्व के बारे में वे कहती हैं, ‘जितने लोग चंद्रशेखर को जानते थे, वे जानते थे कि उनमें कुछ खास बात थी. वे कोई बहुत करिश्माई नेता नहीं थे. उनकी खास बात थी कि वे 24 घंटे लोगों के लिए समर्पित रहते थे. साधारण से साधारण छात्र कभी भी उनके पास जाकर मदद मांगता था और वे प्रस्तुत रहते थे. जनता के लिए उनमें वास्तविक प्रेम था. वे बहुत समर्पित रहते थे. यह समर्पण उनकी खास बात थी. उनके  सीवान जाने के बाद विरोधियों को पता था कि वे एक जननेता के रूप में उभर रहे हैं. इस खतरे से बचने के लिए उनकी हत्या कर दी गई.’

उनके अनन्य सहयोगी रहे प्रणय कृष्ण के पास उनके बारे में बहुत सारे किस्से हैं. वे बताते हैं, ‘दिल्ली के बुद्धिजीवियों, शिक्षकों, छात्रों आैैर पत्रकारों के साथ उनका गहरा रिश्ता था. वे बड़े से बड़े बुद्धिजीवी से लेकर रिक्शावालों, डीटीसी के कर्मचारियों और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों को समान रूप से अपनी राजनीति समझा ले जाते थे. महिलाओं में वे प्राय: लोकप्रिय थे क्योंकि जहां भी जाते खाना बनाने से लेकर, सफाई करने तक और बतरस में उनके साथ घुलमिल जाते. छोटे बच्चों के साथ उनका संवाद सीधा और गहरा था. हाॅस्टल में उनका कमरा अनेक ऐसे छात्रों और विद्रोह करने वालों, विरल संवेदनाओं वाले लोगों की आश्रयस्थली था जो कहीं और एेडजस्ट नहीं कर पाते थे. मेस बिल न चुका पाने के कारण छात्रसंघ का अध्यक्ष होने के बावजूद उनके कमरे में प्रशासन का ताला लग जाता. उनके लिए तो जेएनयू का हर कमरा खुला रहता, लेकिन अपने आश्रितों के लिए वे चिंतित रहते. एक बार मेस बिल जमा करने के लिए उन्हें 1600 रुपये इकट्ठा करके दिए गए. अगले दिन पता चला कि कमरा फिर भी नहीं खुला. चंदू ने बड़ी मासूमियत से बताया कि 800 रुपये उन्होंने किसी दूसरे लड़के को दे दिए क्योंकि उसे ज्यादा जरूरत थी.’

‘हम कहीं जाएंगे तो हमारे कंधे पर उन दबी आवाजों की शक्ति होगी जिनको बचाने की बात हम करते हैं. अगर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा होगी तो भगत सिंह जैसे शहीद होने की महत्वाकांक्षा’ 

जेएनयू के छात्र आज जिस तरह देश भर के दलितों, महिलाओं, मजदूरों, छात्रों आदि के मुद्दे पर सक्रिय रूप में आंदोलन छेड़ते हैं, इसकी बुनियाद में चंदू का बहुत बड़ा योगदान है. जेएनयू में फीस न बढ़ने देने, आरक्षण लागू होने, विश्वविद्यालय के निजीकरण का विरोध करने जैसे मुद्दों पर उन्होंने निर्णायक लड़ाई लड़ी.

प्रणय कृष्ण बताते हैं, ‘जेएनयू छात्रसंघ को उन्होंने देश भर यहां तक कि देश से बाहर चलने वाले जनतांत्रिक आंदोलनों से जोड़ दिया. चाहे बर्मा का लोकतंत्र बहाली आंदोलन हो, चाहे पूर्वोत्तर के राज्यों में जातीय हिंसा के खिलाफ बनी शांति कमेटियां हों, नर्मदा  बचाओे आंदोलन हो या टिहरी आंदोलन हो- चंद्रशेखर उन सारे आंदोलनों के अनिवार्य अंग थे. उन्होंने बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर-पूर्व प्रांत के सुदूर क्षेत्रों की यात्राएं भी की थीं. आजाद हिंदुस्तान के किसी एक छात्र नेता ने छात्र आंदोलन को ही सारे जनतांत्रिक आंदोलनों से जोड़ने का इतना व्यापक कार्य अगर किया तो सिर्फ चंद्रशेखर ने. यह अतिशयोक्ति नहीं है.’

चंद्रशेखर के समय आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके वी. शंकर कहते हैं, ‘चंदू मास लीडर था. वह होता तो जनता का नेता होता. वह हमारा बहुत महत्वपूर्ण कॉमरेड था. जेएनयू में अध्यक्ष बनने के बावजूद उसने गांव जाकर काम करने को तवज्जो दी और वहां उसे खूब समर्थन मिल रहा था. चंदू की हत्या के बाद सीवान में हुई रैली ऐतिहासिक थी. वह बेहद पढ़ा लिखा, समझदार और जनता की आकांक्षाओं को समझने वाला नेता था, जिसे मार दिया गया.’

कन्हैया में जिन्हें युवा नेतृत्व की संभावना दिखती है, वे सही हैं. लेकिन चंद्रशेखर एक ज्यादा बड़ी उम्मीद का नाम था, जिसे यह देश संभाल नहीं पाया. चंदू में एक अंतरराष्ट्रीय नेता के रूप में उभरने की संभावनाएं भी मौजूद थीं. प्रणय अपने एक लेख में लिखते हैं, ‘1995 में दक्षिणी कोरिया में आयोजित संयुक्त युवा सम्मेलन में वे भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. जब वे अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ राजनीतिक प्रस्ताव लाए तो उन्हें यह प्रस्ताव सदन के सामने नहीं रखने दिया गया. समय की कमी का बहाना बनाया गया. चंद्रेशेखर ने वहीं आॅस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश और तीसरी दुनिया के देशों के अन्य प्रतिनिधियों का एक ब्लाॅक बनाया और सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया. इसके बाद वे कोरियाई एकीकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे जबरदस्त कम्युनिस्ट छात्र आंदोलन के भूमिगत नेताओं से मिले और सियोल में बीस हजार छात्रों की एक रैली को संबोधित किया. यह एक खतरनाक काम था जिसे उन्होंने वापस डिपोर्ट कर दिए जाने का खतरा उठाकर भी अंजाम दिया.’

भाकपा माले नेता कविता कृष्णन का आरोप है कि ‘चंदू की हत्या के मुख्य आरोपियों को तो सजा नहीं हुई. वे कहती हैं,  ‘शूटरों को सजा हुई थी. लेकिन अब  ऐसा सुनने में आ रहा है कि उन्हें भी छोड़ने की कोशिश की जा रही है. हालांकि, हम लोग इसे लेकर सतर्क हैं. ऐसा होता है तो हम विरोध करेंगे.’

चंदू के बारे में एक मशहूर घटना है. 1993 में छात्रसंघ के चुनाव के दौरान छात्रों से संवाद में किसी ने उनसे पूछा, ‘क्या आप किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए चुनाव लड़ रहे हैं?’ इसके जवाब में उन्होंने कहा था, ‘हां, मेरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है- भगत सिंह की तरह जीवन, चे ग्वेरा की तरह मौत.’ उनके दोस्त गर्व से कहते हैं कि चंदू ने अपना वायदा पूरा किया.

एक और ‘नायर साहब’ की जरूरत

इस देश में सिनेमा का जादू ऐसा है कि कोई भी इससे बच नहीं सकता. फिल्में किसी को कम किसी को ज्यादा लेकिन प्रभावित जरूर करती हैं. सिनेमा का प्रभाव इतना भव्य है कि हर तरह के दर्शक के लिए यहां कुछ न कुछ मिल ही जाता है. दर्शकों पर छाए जादू की वजह से भारतीय सिनेमा सौ बरस से ज्यादा की उम्र पार कर चुका हैै. यह कहानी है ऐसे ही एक दर्शक की जो न सिर्फ सिनेमा से प्रभावित हुआ बल्कि आगे चलकर उसका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली हो गया कि भारतीय सिनेमा भी उससे प्रभावित हुए बिना न रह सका.

सिनेमा और उसके इस खास दर्शक की प्रेम कहानी की शुरुआत 40 के दशक में होती है. केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में उस वक्त गिनती के सिनेमाघर हुआ करते थे और जो सिनेमाघर थे भी उन तक बिना अभिभावकों की इजाजत के बच्चों की पहुंच मुश्किल थी. उस जमाने में टेंट में अस्थायी तौर पर विकसित किए गए एक सिनेमाघर में सात से आठ साल का एक लड़का रेत पर बैठकर के. सुब्रमण्यम की कोई धार्मिक फिल्म देख रहा होता है. सिनेमा के साथ अपने पहले ही अनुभव में वह लड़का उसे अपना दिल दे बैठता है और उसकी आगे की जिंदगी भारतीय सिनेमा के नाम हो जाती है.

PK Nair 3WEB

सिनेमा को इस जुनूनी अंदाज में चाहने वाले शख्स का नाम है परमेश कृष्णन नायर, जिन्हें फिल्म इंडस्ट्री में पीके नायर के नाम से जाना-पहचाना जाता है. तिरुवनंतपुरम में जन्मे नायर साहब को बचपन से ही सिनेमा के टिकट जमा करने का शौक था. इसके अलावा आपने विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर अब ‘विलुप्तप्राय’ की श्रेणी में आ चुकी वजन नापने की मशीन तो देखी ही होगी, जिसमें सिक्का डालने पर एक टिकट निकलता था, जिसके एक तरफ वजन की जानकारी और दूसरी तरफ किसी अभिनेता और अभिनेत्री की तस्वीर के साथ आपके लिए शुभकामना संदेश होता था. उस वक्त नायर साहब की चिंता अपने वजन से ज्यादा टिकट के दूसरी ओर प्रकाशित कलाकार की तस्वीर की और उसे अपने संग्रह में जमा करने की होती थी. किसी चीज को संजोने और संवारने का उनका शौक ताजिंदगी बना रहा. फिल्में देखते हुए वे बड़े हुए और फिल्म बनाने का सपना उनकी आंखों में पलने लगा.

1953 में केरल विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक होने के बाद फिल्म निर्माण में अपना भविष्य बनाने के लिए 1958 में उन्होंने मुंबई का रुख किया था. उस जमाने में इस तरह के शौक और सपनों के लिए परिवार में कोई जगह नहीं होती थी. ऐसे सपनों को किस नजर से देखा जाता था यह बताने की जरूरत नहीं. सो, तब के बंबई पहुंचने का उनका सफर परिवारवालों की सहमति के बिना ही पूरा हुआ. मुंबई पहुंचने के बाद उन्हें बिमल रॉय, ऋषिकेश मुखर्जी और महबूब खान का साथ मिला. भारतीय सिनेमा को दिशा देने वाली इन महान शख्सियतों के बीच कुछ समय तक फिल्म निर्माण के गुर सीखने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि  उनमें फिल्म निर्माण के लिए जरूरी योग्यता नहीं है. इसके बाद सिनेमा से जुड़े अपने शौक पर ध्यान केंद्रित करते हुए उन्होंने फिल्म से जुड़ी किसी तरह की शिक्षा लेने की सोची.

सेल्यूलॉयड मैन, सिनेमाई एनसाइक्लोपीडिया जैसे उपनामों से मशहूर पीके नायर एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपने काम को वास्तव में जिया

अब जरा सोचिए, भारतीय सिनेमा के ‘मूक युग’ (1899-1930) के दौरान तकरीबन 1700 फिल्में बनाई गई थीं, जिनमें से सिर्फ नौ फिल्में आज देखने के लिए उपलब्ध हैं. ऐसा इसलिए हुआ कि उस जमाने में फिल्मों को सहेजने का कोई ‘बैंक’ नहीं हुआ करता था और न ही इस तरफ किसी ने कभी विचार ही किया. गिनती की ये मूक फिल्में उस ‘बैंक’ की वजह से बच गईं जिसे नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया यानी राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय के नाम से जाना जाता है, जिसकी नींव पीके नायर ने पुणे में रखी थी.

मुंबई में फिल्म निर्माण की विधा से मन उचटने के बाद उन्होंने पुणे स्थित फिल्म ऐंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) का रुख किया. वर्ष 1961 में वे बतौर शोध सहायक इस संस्थान से जुड़े. यहां उन्हें वह लक्ष्य मिल गया जिसकी वजह से भारतीय सिनेमा की तमाम क्लासिक फिल्मों को बचाया जा सका. एफटीआईआई से जुड़ने के बाद ही उन्हें लगा कि एक स्वायत्त संस्थान होना चाहिए जहां फिल्मों का संग्रह किया जा सके. एफटीआईआई में काम के दौरान उन्होंने इसके लिए अथक प्रयास करने शुरू कर दिए, जिसके बाद एफटीआईआई परिसर में ही 1964 में राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय अस्तित्व में आ सका. 1965 में उन्हें इस संग्रहालय का सहायक निरीक्षक बनाया गया और फिर वे इसके पहले निदेशक बनाए गए. 1991 में रिटायर होने तक वे संग्रहालय के निदेशक रहे.

बीते चार मार्च को पीके नायर ने जब इस दुनिया को अलविदा कह दिया तो यह खबर अखबारों के पिछले पन्नों में दबकर रह गई. सोशल मीडिया पर उनके लिए ‘आरआईपी’ (रेस्ट इन पीस) लिखने वाले भी न के बराबर नजर आए और बजट सत्र की बहस के बीच देश के राजनीतिज्ञों को उनके जाने की भनक भी नहीं लग पाई!

जिन दादा साहब फाल्के को हम भारतीय सिनेमा के जनक के तौर पर जानते हैं और जिन्होंने 1913 में भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई, उनसे पहचान करवाने की वजह नायर साहब और राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय ही बने. उन्हें जानने वाले बताते हैं कि ‘पाथेर पांचाली’ से लेकर ‘मुगल-ए-आजम’ तक उन्हें अधिकांश फिल्मों के सीन दर सीन जबानी याद थे. यह कुछ ऐसा था जैसे कोई अंधा व्यक्ति कोई चीज छूकर उसकी पहचान कर लेता था, ठीक वैसे ही नायर साहब सिर्फ फिल्म की रील छूकर बता देते थे कि उसमें कौन-सा सीन दर्ज है. उनकी याददाश्त फिल्मों के प्रति उनके सच्चे लगाव को दर्शाती थी.

रिटायर होने तक अपने 26 साल के कार्यकाल में फिल्म आर्किविस्ट नायर ने तकरीबन 12 हजार फिल्मों का संग्रह किया. इनमें से आठ हजार भारतीय और बाकी विदेशी भाषा की फिल्में हैं. फिल्मों की रील जमा करने के लिए उन्होंने भारत के सुदूर इलाकों की यात्राएं कीं. उन्होंने हर उस फिल्म को संग्रहित करने की कोशिश की, जिसे संग्रहीत करने की जरूरत थी या उन्हें मौका मिला. फिर वह चाहे विश्व सिनेमा हो, हिंदी की कोई फिल्म या फिर क्षेत्रीय सिनेमा, राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय में हर तरह की फिल्मों का संग्रह मौजूद है. यहां तक कि वे विश्व सिनेमा को गांवों तक भी ले जाने के लिए प्रयासरत रहे.

[symple_box color=”red” text_align=”left” width=”100%” float=”none”]

सेल्यूलॉयड मैन

PK Nair 1web

पीके नायर की जिंदगी और उनके काम पर आधारित शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर की डॉक्यूमेंट्री ‘सेल्यूलॉयड मैन’ साल 2013 में तीन मई को रिलीज हुई थी. संयोग से यह ठीक वही समय था जब भारतीय सिनेमा ने अपनी यात्रा के सौ बरस पूरे किए थे. हालांकि सिनेमा के सौ बरस पूरे होने पर खास तौर से बनाई गई फिल्म ‘बॉम्बे टॉकीज’ की चर्चा के आगे यह फिल्म कहीं खो-सी गई थी, लेकिन 60वें राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में इस फिल्म ने जोरदार धमक दिखाते हुए दो पुरस्कार अपने नाम किए. इसे बेस्ट एडिटिंग और बेस्ट बायोग्राफिकल ऐंड हिस्टोरिकल रिकंस्ट्रक्शन का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. इस फिल्म को तकरीबन 50 फिल्म महोत्सवों में प्रदर्शित किया गया. कुछ ही भारतीय फिल्मों के साथ ऐसा हो पाता है कि वे इतने फिल्म महोत्सवों में प्रदर्शन के लिए चुनी जाएं. इसमें उन फिल्मकारों और शख्सियतों के इंटरव्यू दिखाए गए हैं जो किसी न किसी रूप से पीके नायर से प्रभावित थे. इसमें गुलजार, बासु चटर्जी, नसीरुद्दीन शाह, कमल हासन, जया बच्चन, दिलीप कुमार, सायरा बानो, सितारा देवी, संतोष सीवन, राजकुमार हिरानी, श्याम बेनेगल, महेश भट्ट, रमेश सिप्पी, यश चोपड़ा, मृणाल सेन आदि की बातचीत शामिल की गई. इसके अलावा इस डॉक्यूमेंट्री में भारतीय सिनेमा की शुरुआत की कुछ मास्टरपीस फिल्मों के फुटेज भी दिखाए गए हैं.
[/symple_box]

उन पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘सेल्यूलॉयड मैन’ बनाने वाले उनके शिष्य शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर ऑनलाइन डेली ‘द सिटीजन’ से बातचीत में बताते हैं, ‘थियेटर के अंधेरे में नायर साहब का साया मुझे याद आता है. देर रात तक सिनेमा देखते हुए, फिर रुक-रुककर पॉकेट टॉर्च की रोशनी में अपनी छोटी-सी डायरी में उसके बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां लिखते हुए, बीच-बीच में प्रोजेक्शनिस्ट पर चिल्लाते और हमेशा कोई न कोई फिल्म देखते हुए. हमें उनसे थोड़ा डर भी लगता था. किसी फिल्म को देखने का आग्रह करने के लिए उनके ऑफिस में बनी लकड़ी की सीढ़ियां चढ़ते हुए हमें काफी साहस जुटाना पड़ता था. अब तक मेरे लिए वही एकमात्र व्यक्ति थे जो ये बता सकते थे कि फिल्म की किस रील में कौन-सा सीन मिल सकता है.’ वे आगे कहते हैं, ‘नायर साहब कभी भी खुद पर फिल्म बनाने के पक्ष में नहीं रहे. जब मैंने उन पर फिल्म बनाने की बात कही तो उन्होंने कहा कि अगर यह फिल्म संग्रह करने को लेकर होगी तभी वे उसका हिस्सा बन सकते हैं. डॉक्यूमेंट्री की शूटिंग के समय मैंने कभी भी उनसे नहीं कहा कि ये उनके काम पर आधारित है. जब भी हम उनके पास कुछ शूट करने के लिए पहुंचते तो वे कहा करते कि मेरे बारे में इतना कुछ क्यों शूट कर रहे हो. डॉक्यूमेंट्री बनने के बाद ही उन्हें इस बात का एहसास हो सका कि वह किस पर बनी है.’

बंगलुरु इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के एग्जिक्यूटिव आर्टिस्टिक डायरेक्टर विद्याशंकर कहते हैं, ‘भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में दस्तावेजीकरण और संग्रह की स्थिति बहुत मजबूत नहीं है. सिनेमा भी इससे अछूता नहीं है. इस कमजोरी को पीके नायर ने चुनौती दी और अपनी प्रतिबद्धता और कठिन परिश्रम के दम पर उन्होंने स्थिति को अपवाद साबित कर दिया. अगर उन्होंने ऐसी प्रतिबद्धता नहीं दिखाई होती तो मेरी पीढ़ी के तमाम लोग सिनेमा से तमाम महान कार्यों को देख-समझ नहीं पाते.’

सेल्यूलॉयड मैन, भारतीय सिनेमा के अभिभावक, सिनेमाई एनसाइक्लोपीडिया जैसे उपनामों से मशहूर पीके नायर एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपने काम को वास्तव में जिया. जब तक रहे, सिनेमा को समृद्ध और विभिन्न फिल्मों की रील संग्रह करने का काम करते रहे. उनके काम को उनके द्वारा संग्रहीत की गईं फिल्मों की संख्या से नहीं आंका जा सकता. उनके काम से कई पीढ़ियां प्रभावित हुईं. खास तौर से मणि कौल, अदूर गोपालकृष्णन, केतन मेहता, सईद अख्तर मिर्जा, जाहनू बरुआ, गिरीश कसरावल्ली, जॉन एब्राहम (निर्देशक), विधु विनोद चोपड़ा और कुंदन शाह. उनके जाने के बाद शायद ही कोई दूसरा पीके नायर हो सके और सिनेमा के अलावा शायद ही किसी को उनके जाने का फर्क पड़े, लेकिन हमें इस बात को समझना चाहिए कि भारतीय सिनेमा को एक और ‘नायर साहब’ की जरूरत अब आन पड़ी है.                                 

‘राम आडवाणी का जाना लखनऊ देखने के आईने का बिखरना है’

Ram-AdwaniWEB
Photo by- Dheeraj Dhawan

चार साल पहले की बात है. लखनऊ का दिल कहे जाने वाले हजरतगंज में किताबों की एक दुकान पर एक शोधार्थी पहुंचा. उसने चार हजार रुपये से अधिक की किताबें निकालीं पर जब पैसे देने की बारी आई तो उसकी जेब से मुश्किल से दो हजार रुपये ही निकले. उसने बिल कैंसिल करने की गुजारिश करते हुए अगली बार किताबें ले जाने की बात कही. यह देखकर दुकान के मालिक ने उसे बैठाया. बातचीत का सिलसिला चला तो उसके शोध के विषय से लेकर किताबों पर लंबी बात हुई. इसके बाद मालिक ने किताबें ले जाने और अगली बार आने पर पैसे देने की बात कही. आज के समय में एक अनजान ग्राहक पर इस तरह का विश्वास करने वाले दुकान के मालिक थे- राम आडवाणी.
क्या ‘राम आडवाणी बुक सेलर्स’ के मालिक अपने यहां आने वाले किसी भी शख्स पर इस तरह आंख मूंदकर भरोसा कर लेते हैं, इस पर राम आडवाणी का कहना था, ‘ऐसा नहीं है. दुकान में आने वाले शख्स की नजर और उसका किताबें देखने का सलीका बता देता है कि वह किताबों से कितनी मोहब्बत करता है और जो किताबों से मोहब्बत करता है, वह यहां बार-बार आना चाहता है और आता भी है. ऐसे में पैसे न देने का सवाल ही नहीं उठता. यह मेरा 90 साल की जिंदगी का तर्जबा है.’ बचपन में नाना से किताबों की दुकानदारी की बारीकियां जानने वाले राम आडवाणी विभाजन के समय परिवार के साथ रावलपिंडी से पहले शिमला आए, फिर लखनऊ. यहां जेबी कृपलानी के सहयोग से हजरतगंज स्थित गांधी आश्रम परिसर के एक कोने में किताबों की दुकान की नींव डाली गई, फिर कुछ समय बाद वे मेफेयर बिल्डिंग में अपनी किताबों की दुनिया लेकर पहुंच गए. इस दुनिया से उन्हें कितनी मोहब्बत थी इसका अंदाजा उनकी इस बात से मिल जाता था, ‘जब हमारे अधिकतर दोस्त पढ़-लिखकर डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वकील और जज बनने का ख्वाब देखते थे, तब मैं एक अच्छी किताबों की दुकान खोलने का सपना बुनता था.’
किताबें बेचने के साथ-साथ पढ़वाने के फलसफे में यकीन रखने वाले राम आडवाणी अपनी पारखी नजर से पुस्तक प्रेमियों को पहचानने में देर नहीं लगाते थे. पुस्तक प्रेमी भी उनके अनुभव व लखनवी संस्कृति के किस्से-कहानियों का भरपूर लाभ उठाते थे. लखनऊ और अवध पर वे शोधार्थियों के लिए संदर्भ केंद्र का काम करते थे. लखनवी तहजीब में गहरे रचे-बसे राम आडवाणी किसी भी पुस्तक प्रेमी का एक मेहमान की तरह स्वागत करते थे. इतिहासकार आलोक बाजपेयी बताते हैं, ‘25 साल पहले झिझकते हुए उनकी दुकान पर गया तो वे मुस्कुराकर मिले. पहले मेरी झिझक तोड़ी फिर पसंद पूछी और खुद उठकर किताबें दिखाने लगे. उस दिन से एक जान-पहचान बन गई और अब तक जब भी लखनऊ जाता तो वहां जरूर जाता.’
राम आडवाणी के पास बैठना एक तरह से लखनऊ के पास बैठना था. उन्होंने लखनऊ को दुल्हन की तरह सजते-संवरते और इठलाते हुए देखा था. यानी बग्घी के दौर से लेकर ऑडी फिर बीएमडब्ल्यू तक का जमाना देखा. किताबी दुनिया से सरोकार रखने वाले जब गंजिंग (लखनऊ के हजरतगंज इलाके में तफरीह करना) के लिए निकलते तो उनकी दुकान के सामने से निकलते हुए उन्हें एक नजर देखने की इच्छा रखते. उनमें लखनऊ धड़कता था. बातचीत में अगर लोग गलती से उन्हें मूल स्थान से रेखांकित करते तो वे मुस्कुराते हुए यह कहने में संकोच नहीं करते कि ‘मैं सिंधी नहीं, लखनवी हूं.’ वे लखनऊ को देखने, जानने और समझने का आईना थे. उनका निधन एक तरह से लखनऊ के आईने का बिखरना है तो सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षति भी.
एक शख्स चुपचाप किताबों का व्यवसाय करते हुए किस तरह एक संस्था बन जाता है, राम आडवाणी इसका साक्षात उदाहरण थे. उनकी या उनकी दुकान की लोकप्रियता का कारण यह भी था कि वे उसे महज व्यवसाय नहीं मानते थे. उनका मानना था कि किताबों की दुनिया में गोता लगाने के दौरान अच्छे लोग मिलते हैं. जानकारों से बात करने का अवसर मिलता है. आदमी अच्छे मिलते हैं तो आपका जीवन भी अच्छा बनता है. अपने इसी फलसफे के कारण उनकी दोस्ती का दायरा लखनऊ और हिंदुस्तान ही नहीं, दुनिया के अनेक देशों तक फैला. उनके यहां देशी-विदेशी शोधार्थियों के आने का क्रम बना रहता था. उनके दोस्तों में रस्किन बॉन्ड से लेकर रोजी लवलेन जोंस, वीएस नायपॉल, विक्रम सेठ, विलियम डेलरिंपल, अमिताव घोष, मार्क टुली, प्रो. मुशीरुल हसन आदि न जाने कितने लेखक शामिल थे. इस तरह वे अंग्रेजी किताबों के व्यवसायी व लखनऊ के जानकार के तौर पर देशी-विदेशी शोधार्थियों के बीच ख्यातिलब्ध थे. अवध और लखनऊ पर किताबें लिखने वाली रोजी के लखनऊ प्रेम को देखकर उन्होंने रोजी को अपने घर लॉरेंस टैरेस में रहकर किताब लिखने की अनुमति दी थी. अनेक लेखक उनके जरिए ही देश-विदेश से किताबें मंगवाते थे. लेखक विलियम डेलरिंपल ने बताया था, ‘लॉन्च होने के बाद जिस किताब का हम लंदन में तीन दिन तक इंतजार करते वह राम आडवाणी के यहां 48 घंटे में मिल जाती.’

उनमें लखनऊ धड़कता था. बातचीत में अगर लोग गलती से उन्हें मूल स्थान से रेखांकित करते तो आडवाणी मुस्कुराते हुए यह कहने में संकोच नहीं करते कि ‘मैं सिंधी नहीं, लखनवी हूं.’ 

एक वाकया प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भी जुड़ा है. आडवाणी बताते थे, ‘एक बार इंदिरा गांधी के पीए का फोन आया कि दिल्ली में ‘पीस ऑफ माइंड’ किताब खोजकर थक गया हूं. इंदिरा जी ने आपके पास फोन करने को कहा है. मैंने कहा कि मेरे पास किताब है और उन्हें भिजवा दी.’ प्रधानमंत्री नेहरू भी एक बार राम आडवाणी के यहां किताब खरीदने पहुंचे थे तो सुचेता कृपलानी, गोविंद बल्लभ पंत, संपूर्णानंद जैसे अनेक नेता उनके स्थायी ग्राहक हुआ करते थे. वे किताब लेने पहुंचते थे तो लंबी बातचीत का खाका बुन जाता था. यही वजह थी कि राम आडवाणी के पास संस्मरणों का भरपूर खजाना था. वे सकारात्मक सोचते थे. इसी बात का ख्याल रखते हुए वे लोगों की नकारात्मक बातें बताने से परहेज करते थे. उनका मानना था कि लोगों को उनके अच्छे काम से याद करना चाहिए. उसका समाज में अच्छा संदेश जाता है.
राम आडवाणी की दुकान में एक विजिटर बुक रखी रहती है. वे उसमें अपने यहां आए प्रमुख लोगों की राय लिखवाते थे. हिंदी के आलोचक वीरेंद्र यादव बताते हैं, ‘उनकी विजिटर बुक में नेहरू, इंदिरा गांधी, फिरोज गांधी से लेकर जाने कितने ख्यात पुस्तक प्रेमी राजनेता, नौकरशाह, शिक्षक थे.’ एक मुलाकात में विजिटर बुक के बारे में बात की तो उन्होंने बताया कि वे ये बातें अपनी अगली पीढ़ी तक पहुंचाना चाहते हैं. वे बच्चों को बताते थे कि पढ़ने-लिखने वालों से उन्हें कैसे और क्या सीखना चाहिए. बढ़ती उम्र के बावजूद उनकी सक्रियता कम नहीं थी. उन्होंने खुद को कभी रिटायर नहीं होने दिया. दुकान चलाने के साथ वे किताबों और संस्कृति से जुड़े आयोजनों में बराबर शरीक होते थे. अपना यह पुस्तक प्रेम उन्होंने बेटे रुकुन में भी पैदा किया, जो अंग्रेजी लेखक होने के साथ-साथ एक प्रकाशन के मालिक हैं. राम आडवाणी की सक्रियता देखकर युवाओं को भी रश्क होता था. कम लोगों को पता होगा कि वह गोल्फ के अच्छे खिलाड़ी भी थे. 90 साल की उम्र तक गोल्फ खेलते रहे. लखनऊ गोल्फ क्लब के संस्थापक सदस्यों में उनका नाम है. साथ ही वे पियानो और शास्त्रीय संगीत के दीवाने थे. उनके बारे में कहा जाता है कि उनमें अंग्रेजी को लेकर श्रेष्ठता भाव था, लेकिन पांच साल में अनेक मुलाकातों और घंटों की बातचीत में इस बात का कभी अहसास नहीं हुआ. हां, इतना अवश्य था कि वे समय के पाबंद थे. इसमें कोताही करने वालों को वह कभी गंभीरता से नहीं लेते थे.
पिछले दस महीने से उनकी सक्रियता में कमी आई थी. पिछले साल जून में पत्नी का निधन हुआ, फिर नवंबर में गिरने से उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई. तब से वे चलने-फिरने की स्थिति में नहीं थे और अंततः बीती नौ मार्च की सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली. उनकी दोनों संतानें लखनऊ से बाहर हैं. ऐसे में पुस्तक प्रेमियों के मन में सवाल है कि क्या अब यह दुकान उसी स्वरूप में मौजूद रहेगी. जिस बिल्डिंग में यह दुकान है, पहले उसमें लखनऊ की पहचान मेफेयर सिनेमा बंद हुआ, फिर ब्रिटिश काउंसिल लाइब्रेरी. काश… यह सिलसिला आगे न बढ़े और राम आडवाणी की खेती को खाद-पानी मिलता रहे.