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मास्टर

घुन खाए शहतीरों पर की बाराखड़ी विधाता बांचे

फटी भीत है, छत चूती है, आले पर बिसतुइया नाचे

बरसा कर बेबस बच्चों पर मिनट मिनट पर पांच तमाचे

दुखरन मास्टर गढ़ते रहते किसी तरह आदम के सांचे।

अरे अभी उस रोज़ वहां पर सरेआम जंक्शन बाज़ार में

शिक्षा मंत्री स्वयं पधारे, चम-चम करती सजी कार में

ताने थे बंदूक सिपाही, खड़ी रही जीपें कतार में

चटा गए धीरज का इमरित, सुना गए बातें उधार में

चार कोस से दौड़े आए जब मंत्री की सुनी अवाई

लड़कों ने बेले बरसाए, मास्टर ने माला पहनाई

संगीनों की घनी छांव में हिली माल, मूरत मुसकाई

तंबू में घुस गए मिनिस्टर, मास्टर पर कुछ दया न आई।

अंदर जाकर तंबू में ही चलो चलें दुख-दर्द सुनाएं

नहीं ‘अकेला मैं ही जाऊं, कहीं भीड़ में वह घबराएं

बचपन के परिचित ठहरे, हम क्यों न चार बात कर आएं

मौका पाकर विद्यालय की बुरी दशा पर ध्यान दिलाएं।’

सुन कर बात गुरूजी की फिर हां-हां बोले लड़के सारे

‘हम जब तक सुसता भी लेंगे आगे बढ़ कर कुआं किनारे।

हाथ हिला कर मास्टर बोला, जाओ बच्चों, जाओ प्यारे

चने चबाकर पानी पीना सूख रहे हैं हलक तुम्हारे।’

फाटक पर पहुंचे तो देखा, डटे हुए थे दो नेपाली

हाथों में संगीन संभाले, लटक रही थी निजी भुजाली

कहां जाएगा? वे गुर्राए, आंखों में उतराई लाली

दुखरन का यूं दिल दुखी हुआ, सुन सूखा तत सूखी गाली

मास्टर बोले, ‘यों मत कहना, पढ़ा लिखा हूं, मैं हूं शिक्षक

तुम भी हो जनता के सेवक, मैं भी हूं जनता का सेवक’।

फिर तो वे धकियाकर बोले, भाग भाग, जा मत कर बक-बक

हम फौजी हैं, नहीं समझते क्या होता है सिच्क्षक सेवक

कुछ दिन बीते मास्टर ने यह कड़ा विरोध पत्र लिख डाला

‘ताम झाम थे प्रजातंत्र के, लटका था सामंती ताला

मंत्री जी, इतनी जल्दी, क्या आज़ादी का पिटा दिवाला

अजी आपको उस दिन मैंने नाहक ही पहनाई माला’

और लिखा, ‘उस रोज आपसे भीख मांगने नहीं गया था

आप नए थे, नया ठाठ था, लेकिन मैं तो नहीं नया था

भूल गए क्या, अजी आपका छोटा भाई फेल हुआ था

और आपने मुझे जेल से मर्मस्पर्शी पत्र लिखा था।

प्रभुता पाइ काहि मद नाहीं, तुलसी बाबा भले कह गए

जिसमें वाजिद अली बह गया उसी बाढ़ में आप बह गए

आप बने शिक्षा मंत्री तो देहातों के स्कूल ढह गए

हम तो करते रहे पढ़उनी, जेल न जा के यहीं रह गए…

उपदेशों की धुंआधार में अकुलाता शिक्षक बेचारा

अजी आपको लगता होगा सुखमय यह भूमंडल सारा

लिखा अंत में ‘ध्यान दीजिए, बहुत दिनों से मिला न वेतन

किससे कहूं, दिखाई पड़ते कहीं नहीं अब वे नेता गण

पिछली दफे किया था हमने पटने में जा जा के अनशन’

स्वयं अर्थ मंत्री जी निकले, वह दे गए हमें आश्वासन

और क्या लिखूं इन देहाती स्कूलों पर भी दया कीजिए

दीन-हीन छात्र गुरूओं की कुछ भी तो सुध आप लीजिए

हटे मिटे यह निपटज हालत, प्रभु ग्रामीणों पर पसीजिए

कई फंड है उनमें से अब हमको वाजिब ‘एड’ दीजिए

नागार्जुन

प्रस्तुति: शुभनीत कौशिक

एशियन खेल 2018

जकार्ता-पालेमबांग में सम्पन्न 18 वें एशियाई खेल भारत के लिए जहां तक पदकों का सवाल है, सबसे सफल माने जा सकते हैं। इंडोनेशिया में दूसरी बार आयोजित इन खेलों में भारत ने 15 स्वर्ण, 24 रजत और 30 कांस्य पदकों सहित कुल 69 पदक जीते। पदकों की यह गिनती 1951 में दिल्ली में आयोजित पहले एशियाई खेलों की बराबरी करती है। इस प्रतियोगिता के दौरान भारतीय खिलाडिय़ों ने कई राष्ट्रीय कीर्तिमान स्थापित किए। इस के साथ ही देश ने पहली बार ‘सेप्कटेकरा’ में पदक हासिल किया। राही सरनोबत ने पहली बार महिला वर्ग में निशानेबाजी का स्वर्ण पदक अपने नाम किया। उधर कुश्ती में विनेश फोगाट स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनी। इन खेलों में भारत को झटका भी लगा जब भारतीय पुरुष कबड्डी टीम में लगातार सात स्वर्ण पदक जीतने के बाद सेमीफाइनल में हार गई। यही हाल भारतीय महिला कबड्डी का भी रहा।

एथलेटिक्स

भारत के लिए एथलेटिक्स में सर्वाधिक पदक आए। 15 स्वर्ण पदकों में से सात स्वर्ण पदक एथलेटिक्स में मिले। इन एथलीटों ने 10 रजत पदक और 2 कांस्य पदक भी हासिल किए। इंचियोन में आयोजित 17 वें एशियाई खेलों में भारत ने एथलेटिक्स में 13 पदक जीते थे। नीरज चोपड़ा ने भाला फेंक स्पर्धा में स्वर्ण पदक हासिल किया। हैप्टथलॉन में स्वपना बर्मन को कोई चुनौती नहीं थी। भारत की 4म400 मीटर महिला रिले टीम लगातार पांचवी बार इस स्वर्ण पदक की दावेदार बनी। 1500 मीटर दौड़ का स्वर्ण पदक भारत के हिस्से 20 साल बाद आया। जिनसन जॉनसन ने सभी प्रतिभागियों को पछाड़ते हुए यह पदक जीता। मनजीत सिंह ने 800 मीटर की दौड़ में सभी को हैरान करते हुए पहला स्थान हासिल किया। उसने इस दौड़ के सबसे मज़बूत दावेदार जिनसन जॉनसन को दूसरे स्थान पर धकेल दिया। भारत को यह स्वर्ण पदक 32 साल बाद मिला।

ऐसा ही कारनामा त्रिकूद में अरपिंदर पाल सिंह ने किया। उसने 48 साल बाद यह पदक भारत की झोली में डाला।

एथलेटिक्स ने इस बाद हैरान कर देने वाले परिणाम दिए हंै। कुल 69 पदकों में से 19 पदक अकेले एथलेटिक्स में आए हैं। पदकों की इस बरसात की शुरूआत तेजिंदरपाल सिंह तूर ने की। उन्होंने गोला फेंक स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। 23 साल के इस एथलीट ने नया खेेल रिकार्ड भी बनाया।

रजत पदक जीतने वालों में मोहम्मद आनास याहिया और हिमा दास शामिल हैं। इन दोनों ने पुरुषों और महिलाओं की 400 मीटर दौड़ में रजत पदक जीते। इसके बाद दास, याहिया, राजीव आरेकिया और एमआर पूवामा ने 4म400 मीटर की मिश्रित रिले में दूसरा स्थान पा कर रजत जीता। इसके अलावा भारत की 4म400 मीटर रिले दौड़ में भी रजत पदक भारत के हिस्से आया।

दुत्ती चंद ने महिलाओं की 100 मीटर और 200 मीटर की दौड़ों में रजत पदक हासिल किए। धरून आप्पासामी ने पुरुषों की 400 मीटर बाधा दौड़ में और सुधा सिंह ने 3000 मीटर स्टीपल चेंज़ में रजत पदकों पर कब्जा जमाया। महिलाओं की लंबी कूद का रजत पदक नीना वराकिल ने जीता।

इनके अलावा चित्रा उन्नीकृष्णन ने महिलाओं की 1500 मीटर की दौड़ और पुनिया ने चक्का फेंक(डिस्क थ्रो) स्पर्धा में कांस्य पदक हासिल किया।

निशानेबाजी

एथलेटिक्स के बाद भारत को सर्वाधिक पदक निशानेबाजी में मिले। भारत के लिए दोनों स्वर्ण पदक अप्रत्याशित रूप से आए। 16 साल के सौरभ चौधरी ने पुरुषों की 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में सभी को पछाड़ कर हतप्रभ कर दिया। दूसरी और राही सरनोबत ने 25 मीटर एयर पिस्टल मुकाबले में मनू भाकर को पछाड़ कर स्वर्ण जीता।

निशानेबाजी में भारत को चार रजत पदक भी मिले। डबल ट्रैप में युवा निशानेबाज शरदूल विहान ने रजत जीता। यही कारनामा लक्ष्य ने ‘ट्रैप’ मुकाबले में कर दिखाया। दीपक कुमार ने 10 मीटर एयर रायफल मुकाबले में और संजीव राजपूत ने 50 मीटर रायफल तीन पोजीशन में चांदी के मेडल जीते।

निशानेबाजों ने तीन कांस्य पदक भी हासिल किए। अभिषेक वर्मा ने 10 मीटर एयर पिस्टल मुकाबले में कांस्य पदक जीता। जबकि सिधू ने महिला वर्ग के 10 मीटर एयर पिस्टल मुकाबले में कांस्य पदक पाया। रवि कुमार और अपूर्वी चंदेला ने 10 मीटर एयर रायफल की मिश्रित टीम प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता।

कुश्ती

भारत ने अपने पारंपरिक खेल कुश्ती में तीन पदक पाए। सबसे पहले बजरंग पुनिया ने 65 किलोग्राम भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीता। उसके बाद विनेश फोगाट ने महिलाओं की 50 किलोग्राम भार वर्ग में सोने का पदक पाया। दिव्या ककरान को 68 किलो भार वर्ग में कांस्य पदक मिला।

नौकायन

नौकायन में भी भारत को अप्रत्याशित रूप से एक स्वर्ण पदक मिला। इसके साथ उन्हें दो कांस्य पदक भी हासिल हुए। स्वर्ण पदक उन्हें ‘क्वाडरूयल स्कल’ के पुरुष वर्ग में स्वर्ण सिंह, दत्तू मोकानल, ओम प्रकाश, और सुखमीत सिंह की टीम ने जीता।

दुष्यंत ने लाईट वेट स्कलस में कांस्य पदक पाया। भारत को दूसरा कांस्य पदक रोहित कुमार और भगवान सिंह की जोड़ी को डबल स्कलस मुकाबले में मिला।

टेनिस

टेनिस में एक स्वर्ण पदक रोहन बोपन्ना और दिविज शरण ने पुरुष युगल मुकाबलों में जीता। पुरुष एकल में प्रांजेश गुन्नी स्वर्ण ने कांस्य और अंकिता रैणा ने महिला एकल में कांस्य पदक जीते। इस प्रकार भारत को टेनिस में एक स्वर्ण व दो कांस्य पदक मिले।

बैडमिंटन

भारतीय महिलाओं के लिए यह प्रतियोगिता अच्छी रही। भारत की दोनों प्रमुख खिलाडिय़ों पीवी सिंधू और सायना नेहवाल ने व्यक्तिगत मुकाबलों में एक-एक पदक जीता। सिंधू ने रजत और नेहवाल ने कांस्य पदक हासिल किया। यह पहला मौका है जब देश की दो महिलाओं ने इन खेलों की व्यक्तिगत स्पर्धा में पदक जीते। इससे पूर्व सैयद मोदी ने दिल्ली में 1982 में आयोजित खेलों में कांस्य पदक जीता था। इस तरह 36 साल बाद देश को बैडमिंटल के मुकाबलों में पदक मिले। भारत की दोनों महिला खिलाड़ी नेहवाल और सिंधू को चाईना ताई पे की विश्व की एक नंबर की खिलाड़ी ताय तेजू यिंग ने परास्त किया । उसने नेहवाल को 21-17, 21-14 से सेमीफाइनल में हराया और फिर फाइनल में सिंधू को 21-13, 21-16 से परास्त किया।

इन दो महिला खिलाडिय़ों के अलावा और कोई भी भारतीय खिलाड़ी कुछ खास नहीं कर पाया। खास तौर से किंदबी श्रीकांत और एचएस प्रणाय ने निराश किया। ये दोनों खिलाड़ी शुरूआती मुकाबले में ही हार गए। श्रीकांत को हांगकांग के वांगविंग की विंसेंट ने सीधे गेमों में 23-21,21-19 से पराजित किया जबकि प्रणाय को थाईलैंड के कंताफन वांगशेरोन ने तीन गेमो में 21-12, 15-21, 21-15 से परास्त किया। इनके अलावा अश्वनी पोनप्पा और एन सिदकी रेड्डी की जोड़ी महिला युगल में

क्वार्टर फाइनल में ही परास्त हो गई। इस प्रकार भारत को बैडमिंटन में एक रजत और एक कांस्य पदक हासिल हुआ।

मुक्केबाजी

मुक्केबाजी में भारत के हाथ मात्र एक स्वर्ण और एक कांस्य पदक लगा। देश को स्वर्ण पदक भी मुक्केबाजी मुकाबलों के अंतिम दिन मिला जब 49 किलोग्राम भार वर्ग में अंकित पंघाल ने ओलंपिक चैंपियन हसनबॉय दसमातोव को पराजित किया।

हालांकि देश को मुक्केबाजी में कुछ और पदकों की उम्मीद थी पर मंगोलिया, कज़ाकिस्तान और उज्बेकिस्तान के मुक्केबाजों का मुकाबला करने के लिए हमारे मुक्केबाजों को अभी काफी मेहनत करनी पड़ेगी।

कबड्डी

भारत को सबसे ज़्यादा निराशा उसके अपने खेल कबड्डी में मिली। इस खेल में 1990 से भारत का दबदबा रहा है। भारतीय पुरुष टीम ने अभी कुछ ही महीने पहले कबड्डी मास्टर्स टूर्नामेंट में ईरान को 44-26 से परास्त किया था । इस बार मात खा गया। सेमीफाइनल में उसे ईरान ने 27-17 से पराजित कर बदला चुकाया। पर देखने की बात यह है कि कबड्डी मास्टर्स में उसने दोयम दर्जे की टीम उतारी थी जबकि जकार्ता में वह पूरी ताकत के साथ मौजूद था। इसके अलावा देश की अब तक की अजेय महिला टीम भी फाइनल में पराजित हो गई। उसे भी ईरान की महिलाओं ने 27-24 से पराजित किया।

स्क्वैश

भारतीय महिला स्क्वैश टीम फाइनल में हांगकांग से हार गई और उसे दूसरी बार एशियाई खेलों में रजत पदक से संतोष करना पड़ा। भारतीय पुरुषों की टीम को हांगकांग ने सेमीफाइनल में हराया और भारतीय पुरुषों कीे टीम कांस्य पदक ही हासिल कर पाई। महिला सिंगल्स में दीपिका पल्लीकल और जोशना चिनप्पा ने कांस्य पदक जीते तो वहीं पुरुष सिंगल्स में सौरव घोषल ने भी कांस्य पदक जीता।

तीरंदाजी

तीरंदाजी में भारत ने दो रजत पदक जीते। भारत की तरफ से मुस्कान किरर, मधुमिता कुमारी और सुरेखा ज्योति ने कंपाउडं टीम इवेंट में रजत पदक जीता। वहीं पुरुष कंपाउडं टीम स्पर्धा में अभिषेक वर्मा, अमन सैनी और रजत चौहान ने मिलकर रजत पदक जीता। दोनों ही टीमों को फाइनल में कोरिया की टीम ने हराया।

कुराश

कुराश में भारत को एक रजत और एक कांस्य पदक मिला। भारत की पिंकी बलहारा ने महिलाओं के 52 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीता वहीं इसी वर्ग में यलप्पा मालाप्रभा ने कांस्य पदक पर कब्जा किया।

टेबल टेनिस

इस खेल में भारत ने दो कांस्य पदक हासिल किए। भारत ने पुरुष टीम और मिक्स्ड डबल में कांस्य पदक जीते।

घुडसवारी

घुडसवारी में भारत को दो रजत पदक मिले। एकल इवेंट में फौद मिजऱ्ा ने रजत पदक पर कब्जा किया और टीम स्पर्धा में राकेश कुमार, आशीष मलिक, जितेंदर सिंह और फौद मिजऱ्ा ने मिलकर रजत पदक जीता।

वुशु

वुशु में भारत ने 4 कांस्य पदक हासिल किए। महिला 60 किलोग्राम वर्ग में रोशीबिना देवी और 56 किलोग्राम वर्ग में संतोष कुमार, 60 किलोग्राम में भानुप्रताप सिंह और 65 किलोग्राम वर्ग में नरेंद्र ग्रेवाल ने कांस्य पदक हासिल किए।

ब्रिज

इस खेल में भारत ने एक गोल्ड और दो कांस्य समेत तीन पदक जीते। भारत की ओर से पुरुष टीम और मिक्स्ड टीम ने कांस्य पदक जीते। तो वहीं पर पुरुष पेयर टीम ने स्वर्ण पदक जीता।

सेलिंग

भारत ने इस खेल में तीन पदक हासिल किए एक रजत और दो कांस्य। वरूण ठक्कर अशोक और चेनगप्पा गणपति केलापंडा ने पुरुष स्पर्धा में कांस्य अपने नाम किया। 20 साल की वर्षा और 27 साल की श्वेता ने महिला स्पर्धा में 15 रेस के बाद 40 अंक बटोर कर भारत को कांस्य पदक दिलवाया। इसके अलावा 15 साल की हर्षिता तोमर ने ओपन लेसर 4.7 इवेंट में कुल 62 अंक हासिल करके कांस्य पदक अपने नाम कर लिया।

स्वर्ण पदक जीतने वाल सबसे उम्रदराज खिलाड़ी

भारत के प्रणव वर्धन इंडोनेशिया में सम्पन्न हुए 18 वें एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले सबसे उम्रदराज खिलाड़ी हंै। 60 वर्ष के वर्धन ने ‘ब्रिज’ की पुरुषों की युगल स्पर्धा में अपने 56 वर्षीय जोड़ीदार शिवनाथ सरकार के साथ मिलकर फाइनल में चीन को पछाड़ते हुए 384 अंक हासिल कर स्वर्ण पदक जीता। ये दोनों खिलाड़ी पिछले 20 साल से एक दूजे का जोड़ीदार बन ‘ब्रिज’ खेल रहे हैं। यह पहला मौका है कि जब ब्रिज को एशियाई खेलों में शामिल किया गया है। इस प्रतियोगिता का रजत पदक चीन ने 378 अंकों के साथ जीता।

हाकी में हार के मायने

भारतीय पुरुष हाकी के लिए ऐन मौके पर हार को गले लगा लेना कोई नई बात नहीं। चाहे 2000 के सिडनी ओलंपिक का पोलैंड के खिलाफ खेला सबसे महत्वपूर्ण लीग मैच हो या जकार्ता के एशियाड में मलेशिया के खिलाफ खेला सेमीफाइनल हर बार भारत अंतिम क्षणों में अपने ऊपर गोल करवाता ही रहा है। इसी वजह से वह 2000 ओलंपिक के सेमीफाइनल में पहुंचने से महरूम रहा। उस मैच में भारत अंतिम मिनट तक 1-0 की बढ़त पर था और पोलैंड केवल गोल बराबरी की कोशिश कर रहा था। अंतिम क्षणों में पोलैंड के फारवर्ड ने उस समय के कप्तान रमणदीप को छक्का कर दांए छोर से भारत की ‘डी’ में प्रवेश कर पहली ही हिट से गोल का तख्ता खड़का दिया। जकार्ता में भी ऐसा ही कुछ हुआ। जब भारत का सेमीफाइनल में प्रवेश तय लग रहा था और 58.13 मिनट का खेल हो चुका था यानी मात्र एक मिनट 47 सेकैंड उसे काटने थे। जो वे कर ही नहीं पाए। मलेशिया के हमले को रोकने के लिए आगे जाने की बजाए हमारे रक्षक अपनी ‘डी’ में घुसते गए और पेनाल्टी कार्नर दे बैठे। यह पेनाल्टी कार्नर भी रुकना चाहिए था पर श्रीजेश बहुत कमज़ोर साबित हुए।

भारत की इस हार पर सबसे पहली और बहुत ही महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया टीम के कोच हरेंद्र सिंह ने दी। ”हमने बेतहाशा गलतियां की। यह इसलिए नहीं हुई की विरोधी टीम का हम पर कोई दवाब था पर ये ‘अनफोर्सड’ ग़लतियां थीं। ये क्षमा योग्य नहीं हैं, यह आत्महत्या थी’’। यदि साधारण भाषा में कहें तो विजय को इतना करीब देख भारतीय खिलाड़ी बौखला से जाते हैं। यहां भी 2-1 की बढ़त और मात्र एक मिनट 47 सेकेंड का समय था। मलेशिया को पेनाल्टी कार्नर मिला। हरेंद्र ने कहा पहले तो बराबरी का गोल खाना ही नहीं चाहिए था और यह पेनाल्टी कार्नर को भी मलेशियाई टीम को मिलने से रोक सकते थे। गेंद ‘डी’ से बाहर थी। किसी न किसी को आगे बढ़ कर उसे टैकल करना चाहिए था। पर किसी ने यह नहीं किया। फिर जब गेंद ‘डी’ में आ गई तो वहां जैसे भगदड़ मच गई। हम टैकल करते हुए अपनी हाकी ‘स्टिक्स’ इधर-उधर फंसाने की कोशिश में लग गए। हम पीछे हटते गए, हटते गए जबकि गेंद की ‘डी’ से बाहर रोकना चाहिए था।

चंडीगढ़ खेल विभाग के पूर्व सहनिदेशक केएस भारती का कहना था कि भारतीय टीम में विश्वास की कमी साफ झलकती है। हल्की टीमों के साथ वे पूरे आत्मविश्वास से खेलते हैं पर जैसे ही कोई बड़ी टीम आती है तो वे सारी कला भूल जाते हैं। हालांकि मलेशिया तो कोई ऐसी टीम भी नहीं है।

इस हार से भारत को 2020 के टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालीफाइंग मुकाबले खेलने होंगे। इस तरह का उनका पहला टूर्नामेंट तो मात्र तीन महीने दूर है। अब एशियाड के सेमीफाइनल में हारा भारत कितनी चुनौती पेश कर सकेगा यह तो समय पर ही पता चलेगा, पर पिछले कई दशकों से भारतीय टीम की अंतिम क्षणों में गोल खाने की प्रवृति से कैसे छुटकारा मिले यह एक यक्ष प्रश्न है।

बेटे का पदक छूने की हसरत लिए चले गए पिता

दो साल से कैंसर की बीमारी ये जूझ रहे कर्म सिंह ने तब तक प्राण नहीं त्यागे जब तक उनके पुत्र तेजिंदर पाल सिंह तूर ने एशियन खेलों में नए कीर्तिमान स्थापित करते हुए स्वर्ण पदक नहीं जीत लिया। एक पिता के लिए इससे बड़ा सपना क्या हो सकता था। पर उनके भाग्य में उस पुत्र को गले में पदक डाले देखने का समय नहीं बचा था। तेजिंदर पाल ने अपना यह पदक अपने पिता को समर्पित किया।

अपनी अंतिम ‘थ्रो’ में 20.75 मीटर तक गोला फेंक कर 23 वर्षीय तेजिंदर पाल सिंह तूर ने न केवल स्वर्ण पदक जीता बल्कि एशियाई और राष्ट्रीय रिकार्ड भी ध्वस्त कर दिए। उस समय तेजिंदर ने कहा,”मेरे परिवार और मेरे दोस्तों ने मेरे लिए बहुत बलिदान किए है। आज मैंने उनकी तमन्ना पूरी कर दी। अब मैं अपने पिता से मिलूंगा, पर मैं वहां मात्र दो दिन ही रह सकूंगा।’’

तेजिंदर पाल को अपने पिता की बीमारी के बारे में पूरी जानकारी थी। वह खेलों में व्यस्त था, पर उसकी योजना थी कि वह भारत पहुंच कर मोगा (पंजाब) जाएगा और पिता से मिलेगा।

पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। रात को वह एयरपोर्ट पर उतरा और सवेरे ही भारतीय एथलेटिक फेडरेशन को तूर के पिता के देहांत का दुखद समाचार मिला। जब उसे यह समाचार मिला तब वह मोगा के पास अपने गांव खोसा पांडो जा रहा था। उसने एक बेटे के तौर पर बहुत कोशिश की कि वह अपना स्वर्ण पदक अपने पिता के हाथ में दे दे जो उनकी अंतिम इच्छा थी, पर यह नही हो सका।

तेजिंदर को याद है कि उसके पिता और परिवार ने उसे एक सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनाने के लिए कितना संघर्ष किया था। उसके पिता दिल्ली के सैनिक अस्पताल में भर्ती रहे। वहां उनकी हालत बिगड़ी। राष्ट्रमंडल खेलों में तेजिंदर पाल आठवां स्थान ही ले पाया। पिता की बीमारी उसके इस बुरे प्रदर्शन का एक बड़ा कारण थी। राष्ट्रमंडल खेलों के बाद अप्रैल में उसके पिता की हालत बिगड़ती गई।

तेजिंदर के लिए यह सबसे कठिन समय यही था। उसे हर शनिवार को पटियाला में अपनी ट्रेनिंग छोड़ कर पिता को मिलने दिल्ली जाना पड़ता था। इस बात ने उसके कोच एमएस ढिल्लों को गहरी चिंता में डाल दिया था। ढिल्लों ने एएफआई से निवेदन किया कि तेजिंदर की ट्रेनिंग का स्थान धर्मशाला कर दिया जाए ताकि वह अपनी ट्रेनिंग पर पूरा ध्यान दे सके। ऐसा ही किया गया। इसका परिणाम यह निकला कि उसने एशिया रिकार्ड तोड़ कर स्वर्ण पदक जीत लिया।

गली-गुलियां धीमी गति से गलियों को जानना

विरासतों के अपने देश में कई सौ नगर होंगे जिन्हें हमने दादा-परदादा के मुंह से जाना होगा। इन पुराने शहरों की गलियां एक पूरे शहर की जि़ंदगी की नसें हैं जिनमें हर सुबह जिंदगी रवां होती है।

ऐसा ही एक शहर है दिल्ली। दिल्ली यानी पुराना शहर दिल्ली जहां गलियां किसी ज़माने में खाने-पीने के विभिन्न व्यंजनों, उनके जायके और सुगंध के लिए जानी जाती थी। दिल्ली के लोगों में तब जाति-धर्म की इतनी कटुता भी नहीं थी। इन गलियों का असर इंसान और पूरे समाज पर पड़ता है।

 पुरानी दिल्ली पर ढेरों फिल्में बनी हैं। लेकिन फिल्म ‘गली -गुलियां’ की कहानी बेहद अलग और निहायत अलग सी है। इस कहानी को जानने-समझने के लिए फिल्म देखना ज़रूरी है। यह एक फिल्म है जिसमें एक इंसान की आंखों से आप पुरानी दिल्ली की गलियों को, उनके खंडहर होते रूप को जान-समझ सकते हैं। ये गलियां खुद कहीं नहीं जाती। इनमें खड़ी हवेलियों -घरों की छतें एक -दूसरे से ऐसी मिलती हैं कि आप एक छत पर हैं तो छतों से ही गली के दूसरे छोर पर पहुंच सकते हैं। इन गलियों की खासियत यह है कि यहां आप सूरज की रोशनी को महसूस कर सकते हैं लेकिन उसे अपनी आंखों से देख नहीं सकते। आकाश में इंद्रधनुष देखना हो तो लालकिले के मैदान या सड़क पर जाना पड़ेगा।

इस फिल्म की खासियत यह है कि आपको लगेगा कि इन गलियों में गुजरा हुआ दिन आज है और जो आज है वह भी दसियों साल पुराना । दसियों साल गुजर जाते हैं और लगता है हम तो जहां के तहां हैं। ऐसे में क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि खडूस (मनोज वाजपेयी) आखिर अपना क्या खो रहा है। वह क्या दीवारों से बात करता है? वह अपने कैमरों से किसकी जासूसी करता है? वह किसे देखना चाहता है या सुनना चाहता है। उसकी इददू (ओम सिंह) में क्या दिलचस्पी है। उसे क्यों लगता है कि किददू अकेला है उसे मदद की ज़रूरत पड़ सकती है। मसलन उसकी ही।

 गली गुलिया में अकेलापन खासा उभरा है। जहां कुद्दूस का भाई उससे 23 साल बाद मिलता है । वह कहता है उससे कि उसे तो यहा पता ही नहीं था कि वह पुराने पड़ोस में है। अलबत्ता कुद्दूस का भाई गनेशी (शोरेे) आता रहता है कभी खाने का सामान लेकर और कभी सिर्फ मिलने। कुद्दूस को देखे बिना बीतते जाते हैं कई दिन।

अपने को छिपाए रखने में मनोज वाजपेसी ने गजब का अभिनय किया है। फिल्म की धीमी गति ज़रूर बेचैन करती है पर यही इस फिल्म की जान है। आप देखें ज़रूर।

वक्त के साथ सपनों का यूँ बिखर जाना

आज अचानक याद आ रही है पंजाबी के महान कवि अवतार सिंह पाश की ये लाइनें ‘सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना।’ दुनिया के सबसे बड़े शोमैन राजकपूर के सपनों की मौत सामने दिख रही है। पूर्वी मुंबई के पॉश इलाके चेंबूर में दो एकड़ में फैला हिंदी फिल्म-जगत के महानतम शोमैन राजकपूर के रुपहले परदे के सपनों का महल आरके स्टूडियो एक बार फिर सुर्खियों में है। राजकपूर के परिवार ने आपसी सहमति से अब इस ऐतिहासिक फिल्मी विरासत को बेचने का फैसला कर लिया है। परिवर्तन संसार का नियम है, पर कुछ बदलाव यादों और सपनों के पिटारे भी हमेशा के लिए अपने साथ ले जाते है। राजकपूर ने जागती आँखों से जो सपने बुने और दर्शकों की पीढिय़ां जिन्हें देख कर बड़ी हुई है, वे सपने टूटने जा रहे हैं। राज ने अपनी फिल्मों के जरिये रुपहले परदे पर जो संसार रचा था वह ज़्यादातर इसी स्टूडियो में शूट हुआ था। हिंदी सिने जगत के जो ऐतिहासिक स्टूडियो समय के साथ बिक चुके है उनमें अब 68 साल पुराने आरके स्टूडियो का नाम भी जुडऩे वाला है।

24 साल की कम उम्र में अभिनेता रणबीर राज कपूर यानी राज कपूर निर्माता-निर्देशक भी बन गए थे। पर आम धारणा के विपरीत राज कपूर ने आरके स्टूडियो अपनी पहली फिल्म ‘आग (1948)’ बनाने से पहले नहीं बल्कि अपनी दूसरी फिल्म ‘बरसात (1949)’ की जबरदस्त सफलता के बाद 1950 में खरीदा था। ‘बरसात’ एक करोड़ की कमाई के साथ तब तक के इतिहास की सफलतम भारतीय फिल्म थी। उसके बाद एक के बाद एक लीक से हटकर अलग-अलग विषयों पर बनी समसामयिक और हिट फिल्में आर.के. फिल्म्स के बैनर तले राज ने बनाई जो आरके. स्टूडियो में शूट हुई । इनमें ‘आवारा (1951), बूटपालिश (1954), श्री 420 (1955), जागते रहो (1956), अनाड़ी (1959), जिस देश में गंगा बहती है (1960), तीसरी कसम (1966) और मेरा नाम जोकर (1970) जैसी कालजयी फिल्में भी शमिल हैं। ‘आवारा’ के लिए हिंदी फिल्मों का पहला ड्रीम सीक्वेंस गाना ‘घर आया मेरा परदेसी’ भी आरके स्टूडियो में ही शूट हुआ था।

‘आवारा’ राजकपूर के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण फिल्म थी जिसने न सिर्फ देश-विदेश में जबरदस्त कमाई की बल्कि राजकपूर को एक अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। फिल्म की पृष्ठभूमि में सामाजिक समरसता और साम्यवादी संदेश छुपा होने के कारण यह फिल्म विदेशों में, खासतौर पर रूस और चीन में बहुत पसंद की गई। इस फिल्म का गीत ‘आवारा हूँ’ हिंदी भाषा समझ में नहीं आने पर भी उस समय रूसियों की जुबान पर था। फिल्म को पूर्वी एशिया, मध्य एशिया, अफ्रीका और मध्य-पूर्व से लेकर यूरोप तक जबरदस्त प्रतिसाद मिला। 1951 में आई ‘आवारा’ की भारत और दुनिया-भर में कमाई करीब पौने छह करोड़ थी जो आज के हिसाब से 750 करोड़ होती है।

1970 में आई ‘मेरा नाम जोकर’ भले ही व्यावसायिक रूप से असफल रही हो, ये फिल्म राजकपूर के दिल के सबसे करीब थी। इस फिल्म की असफलता ने राजकपूर को व्यथित कर दिया था। उनकी फिल्म के वितरकों ने उन्हें इस फिल्म के लिए पहले आगाह किया था। एक निर्माता-निर्देशक के रूप में राजकपूर का आत्मविश्वास इस फिल्म के बाद कुछ कम हो गया था। उसके बाद की उनकी बड़ी फिल्म ‘बॉबी’ (1973) से राज अपनी फिल्मों के एक से अधिक क्लाइमेक्स शूट करने लगे थे। वो सभी क्लाइमेक्स फिल्म की रिलीज से पहले अपने वितरकों को दिखाते थे, फिर वितरकों की सलाह से ही वह फिल्म का क्लाइमेक्स तय करते थे।

आरके फिल्म्स की बनाई फिल्मों में इस्तेमाल किये गए ज्यादातर परिधान अब भी आरके.स्टूडियो में सहेज कर रखे गए हैं। इस स्टूडियो की चारदीवारी के अंदर आरके फिल्म्स के अलावा भी हिंदी फिल्म जगत का बहुत कुछ इतिहास रचा गया है। राजकपूर के अलावा मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और ऋषिकेश मुखर्जी ने अपनी कई फिल्मों की शूटिंग यहाँ की है। कई और फिल्में, टीवी सीरियल और रियलिटी शो भी यहाँ शूट हुए हैं।

आरके स्टूडियो अपनी होली और गणेशोत्सव समारोहों के लिए भी बहुत प्रसिद्ध था। जब तक राज कपूर थे, इन त्योहारों पर पूरा फिल्म जगत आरके स्टूडियो आता था। आरके स्टूडियो की होली विशेषकर प्रसिद्ध थी। होली पर जब फिल्मी दुनिया की हस्तियां आरके स्टूडियो आती थी तो उनका स्वागत उन्हें पानी में फेंककर किया जाता था। मस्ती और उल्लास के माहौल में घंटों गाना-बजाना, होली खेलना और खाना-पीना चलता था।

1988 में राज कपूर के निधन के बाद आरके फिल्म्स के बैनर तले पिछले तीस सालों में उनके बेटों ने वैसे भी बहुत कम फिल्में बनाई हंै और उनमें से राजकपूर की फिल्मों जैसी सफलता तो किसी को भी नहीं मिली है। ऐसे में स्टूडियो का व्यावसायिक उपयोग बहुत सीमित हो रहा था। शूटिंग के लिए बाहर के निर्माता-निर्देशकों की बुकिंग भी कम होती थी क्योंकि अब शूटिंग के लिए पश्चिमी मुंबई में अँधेरी और गोरेगाँव ज्यादा मुफीद हैं। ऐसे में इतनी बड़ी जगह के रखरखाव का खर्च भी उसकी कमाई की तुलना में बहुत ज़्यादा था। फिर सितम्बर 16, 2017 को स्टूडियो में लगी भीषण आग ने स्टूडियो को जीवित रखने की आखिरी उम्मीद भी खत्म कर दी। उस आग में स्टूडियो में सहेजी हुई कई पुरानी बेशकीमती चीजें जल गई थी। पहले से धन की कमी से जूझ रहे आरके स्टूडियो को अब पुराने स्वरूप में लाने के लिए और बड़ी रकम की आवश्यकता थी। आखिर में परिवार ने भारी मन से वक्त के मुताबिक फैसला लिया और स्टूडियो को बेचने का मन बना लिया।

जिस इलाके में ये स्टूडियो स्थित है वहाँ की वर्तमान दर के हिसाब से इस जमीन का बाजार मूल्य 500 करोड़ रूपए है। जाहिर है कि राजकपूर की पत्नी कृष्णा कपूर सहित राजकपूर के तीनों बेटों रणधीर, ऋषि और राजीव, और दोनों बेटियां रीतू नंदा और रीमा जैन की सहमति से लिया गया इस स्टूडियो को बेचने का फैसला मूर्त रूप लेगा, पर जाते-जाते वह राजकपूर और उनकी फिल्मों के लाखों प्रशंसकों के लिए बस पुरानी यादें बन कर रह जाएगा और उसके साथ राजकपूर की फिल्मों से जुड़ी अनगिनत यादें भी हमेशा के लिए गुम हो जाएंगी। उसके साथ ही हिंदी फिल्मों के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय भी समाप्त हो जाएगा।

 

अमरीश सरकानगो

(लेखक फिल्म समीक्षक है)

‘सहकारिता आंदोलन’ की छाप

अदिति चहार

जैसे-जैसे विज्ञान ने तरक्की की, ज्ञान ने तरक्की की और नई टैक्नोलोजी आई वैसे ही सहकारिता आंदोलन भी बहुत तेजी से बढ़ा है। कोई व्यक्ति अकेला किसी काम को नहीं कर सकता इसलिए सहकारी समिति बनाता है। फिर वह पंजीकृत होती है। उसके सदस्यों के चरित्र की जांच रिपोर्ट पुलिस से ली जाती है। पर अब यह आंदोलन बहुत आगे बढ़ गया है। जिस तरह अब कोई नौकरी स्थाई नही रही, कोई रिश्ता स्थाई नहीं, लोग ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में रहना पसंद करने लगे हैं, इसी प्रकार अब सहकारी समिति को भी पंजीकृत करवाने की ज़रूरत लोगों को नहीं रही है। जब ज़रूरत हो एक नारा दो, और सब इक_े हो जाओ, सड़कों पर पीट-पीट कर किसी की हत्या कर दो, और सब इधर-उधर हो जाओ। खेल खत्म। पकड़ेंगे किसे? हो गया न हत्या करने का सहकारी तरीका।

पिछले दो-चार साल में यह ‘सहकारिता आंदोलन’ बहुत तेजी से बढ़ा है। और क्यों न बढ़़े आखिर गांधीवादी सोच और वामपंथी विचारधारा सहकारिता की बात तो करते हैं। यदि एक आदमी लुक छिप कर किसी की हत्या कर दे तो वह हत्यारा, पर यदि यही काम 20-50 लोग मिल कर कर दे तो राष्ट्रभक्ति। बात तो ठीक है, हमारी संस्कृति में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं, हम सबसे ज़्यादा शांतिप्रिय लोग हंै। ‘हमारे इतिहास में कोई अक्रांता पैदा नहीं हुआ। हम सबसे अधिक सहनशील हैं’। इस तरह के अलफाज़ मैं और मेरी बिरादरी दशकों से सुनते आ रहे हैं। हमें खुद पर गर्व था। पर अचानक इस शांति के अग्रदूत देश में जैसे भूचाल सा आ गया। प्यार-मोहब्बत के प्रमुख प्रहरी समाज में ‘लव जिहाद’ जैसे शब्द पैदा हो गए। ‘ऑनर किलिंग’ का ‘कांसेप्ट’ दिखा। कलमकारों पर गोलियां बरसती देखी, हमने 47 देखा, हमने 84 देखा, 2002 देखा। हमने महात्मा की हत्या होते देखी, हमने ‘गौड मैन’ (बाबा) बलात्कार के मामले में सज़ा काटते देखे। हमने गौरी लंकेश देखी। यह सब होते देखा शांति के पैरोकारों के देश में। उस देश में जहां सहिसुष्णता सबसे ज़्यादा है। जहां अनेकता में एकता है वहां हमने सड़कों पर भीड़तंत्र को देखा, मूक-बधिर बना प्रशासन देखा। बरसों लगाने वाली न्याय प्रक्रिया देखी। हमने हत्यारों का सम्मान करते मंत्री देखे। हमने बलात्कारियों के हक में प्रदर्शन करते सत्तासीन लोग देखे। यह सब हमने और हमारी बिरादरी ने अपनी आंखों से देखा। पर हम चुप हैं। किस से कहें।

यह सभी कुछ उस सहकारिता आंदोलन के ही रूप हैं जिसे हम सभी सफल बनाना और फैलाना चाहते हैं। यह सब सहकारिता के तहत ही हो रहा है, इसकी इससे बड़ी मिसाल यह है कि लाखों लोगों की सड़कों पर हुई हत्या के मामले में एक भी व्यक्ति को सज़ा नहीं हुई है। यदि किसी एक-आध को हो भी गई तो हमारी जनतांत्रिक सरकारों ने उन्हें बचाने में अपनी जी जान लगा दी। यह है सहकारिता आंदोलन। मतलब हत्या करो पर अकेले नहीं ‘सहकारिता’ के साथ। भई मतलब तो खून खराबा करने से है, फिर अकेले बहादुरी दिखाने की क्या ज़रूरत है। ‘सब का साथ-सबका हाथ’ इस नारे के आधार पर अपने जैसे 10-20 लोग इक_े कर लो और कोई भी लांछन लगा कर दिन-दहाड़े खुली गली में या, सड़क पर पीट-पीट कर दो काम तमाम। पुलिस से घबराने की ज़रूरत नहीं वह तो सहकारिता की रक्षा के लिए तैनात है। यदि कोई सहकारिता आंदोलन से भी बच निकले तो उसे आतंकी कह कर पुलिस से गोली मरवा दो। कौन पूछेगा? आका आपके साथ और फिर मामला सहकारिता आंदोलन का जो है।

देखा आपने जो काम अदालतें सालों में नहीं कर पाती वह सड़कों पर आसानी से हो जाता है। वैसे भी पुलिस की हिरासत में अदालत ले जा रहे ‘सहकारिता आंदोलन’ विरोधी लोगों की पिटाई कर देना देश के बहादुर लोगों के लिए गर्व की बात होती है। पुलिस उस समय हस्तक्षेप करती है, जब वह व्यक्ति पिट जाए। यह दीगर बात है कि ऐसी पिटाई से बच निकले कुछ लोग पीएचडी कर राजनीति में आ जाते हैं और इस तरह की ‘सहकारिता’ करने वालों के पैरों तले की ज़मीन खिसक जाती है। पर क्या करें यह भी एक प्रक्रिया है।

जो भी हो ‘सहकारिता आंदोलन’ चलता रहना चाहिए। लोकतंत्र में लोग ही महत्वपूर्ण होते हैं, फिर वे चाहे ‘सहकारिता आंदोलन’ चलाने वाले ही क्यों न हों। हम लोगों में बहुत सहनशक्ति है, पर हर सहनशीलता की एक सीमा होती है। इस कारण पता नहीं सड़कों पर मरने वालों की सहनशक्ति कब जवाब दे दे?

आज ४ बजे राफेल पर ‘बड़ा खुलासा’ करेगी कांग्रेस

राफेल पर पहले से ही मोदी सरकार पर हमलावर कांग्रेस ने ऐलान किया है कि मंगलवार शाम ४ बजे वह राफेल खरीद को लेकर ”बड़ा खुलासा” करेगी। यूपीए सरकार में रक्षा मंत्री रहे एके एंटनी ने प्रेस कांफ्रेंस करके सरकार पर राफेल डील को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं।

एंटनी नई आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने राफेल की नई डील में देश की सुरक्षा के बड़ा समझौता किया है। उन्होंने सवाल उठाया कि पहले समझते में जब १२६ राफेल विमान खरीदने की बात थी तो नया समझौता ३६ विमान तक क्यों सिमट गया। उन्होंने सवाल किया कि यदि भाजपा के मुताबिक उनकी डील यद् सस्ती है तो १२६ की जगह ३६ विमान ही क्यों खरीदे जा रहे?

पूर्व रक्षा मंत्री ने कहा कि मोदी सरकार का राफेल खरीद समझौता एक बड़ा घोटाला है और इसे देश की जनता के सामने लाया जाएगा। उन्होंने कहा की वायुसेना ने १२ विमानों की ज़रुरत जताई थी। लेकिन मोदी सरकार ने अपनी डील को सस्ता बताने के बावजूद ३६ ही विमान खरीदे। ”यह हास्यास्पद लगता है। सस्ता होने पर तो ज्यादा प्लेन खरीदे जाने चाहिए थे। लेकिन मोदी सरकार ने १० के करीब जहाज काम खरीदे”।

देहरादून के बोर्डिंग में छात्रा से गैंगरेप

हरियाणा में टापर छात्रा से गैंगरेप के सभी आरोपी अभी पकड़े नहीं जा सके हैं कि एक और शर्मनाक खबर उत्तराखंड के देहरादून से आई है। वहां एक बोर्डिंग में पड़ने वाली दसवीं की छात्रा से गैंगरेप किया गया है। इस मामले में सबसे शर्मनाक बात यह है कि छात्रा की शिकायत के बावजूद स्कूल प्रबंधन ने  इस मामले पर पर्दा डालने की कोशिश की। छात्रा का गर्भ गिराने का आरोप भी लगाया गया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक पीड़िता देहरादून के बोर्डिंग स्कूल की दसवीं की छात्रा है और उसकी एक और बहन वहीं पढ़ती है। गैंगरेप की घटना १४ अगस्त की बताई गयी है। पुलिस ने इस मामले में स्कूल के निदेशक, प्रिंसिपल, वाइस प्रिंसिपल और चार आरोपी छात्रों समेत नौ लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। आरोप है कि स्कूल प्रबंधन ने घटना को दबाने की कोशिश की लेकिन घटना की जानकारी एसएसपी तक पहुँची तो उन्होंने तुरंत कार्रवाई की। वैसे इस मामले की बात सामने तब आई जब छात्रा गर्भवती हो गई और आरोप के मुताबिक उसका गर्भपात करवाने की कोशिश की गयी।

जिन छात्रों पर रेप का आरोप लगा है वे सभी नाबालिग बताये जा रहे हैं। वे सभी पीड़िता के सीनियर हैं। जैसे ही छात्रा के गर्भवती होने की जानकारी एसएसपी निवेदिता कुकरेती के संज्ञान में आई उन्होंने जांच के आदेश जारी किये। पुलिस एसडीएम विकासनगर और बाल कल्याण समिति के साथ स्कूल पहुंची और मामले की जानकारी जुटाई। स्कूल और हॉस्टल में प्राथमिक जांच के बाद घटना के सही होने के संकेत मिले। पुलिस ने स्कूल और हॉस्टल प्रबंधन से भी पूछताछ की। मामला दून के ग्रामीण इलाके में स्थित एक बोर्डिंग स्कूल का है।

रिपोर्ट्स में बताया गया है कि बोर्डिंग में पड़ने वाली इन दोनों बहनों की पेरेंट्स के बीच कथित तौर पर  झगड़ा है और इसी के चलते उन्होंने बोर्डिंग में दाखिल कर रखा है। कुछ रोज पहले छोटी बहन की तबीयत खराब हुई तो उसने बड़ी बहन को सारी घटना की जानकारी दी और उसपर दुष्कर्म करने वाले छात्रों के नाम भी बताये। स्कूल प्रबंधन को  जैसे ही इस घटना की जानकारी मिली उनके पैरों टेल ज़मीन सरक गयी। लेकिन बजाये पुलिस को बताने के उन्होंने मामले को दबाने की तैयारी कर ली।  आरोप है कि प्रबंधन के लोगों ने छात्र पर गर्भपात करवाने का दबाव डाला। छात्र काफी दिन से अपने खिलाफ हुए दुष्कर्म को लेकर प्रवंधन को बता रही थी लेकिन कुछ नहीं किया गया। उलटे उसे मुंह बंद रखने को कहा गया। प्राथमिक जांच में घटना के सही होने के संकेत मिलते ही छात्रा का मेडिकल कराया गया। मामले में नौ लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

आज़ादी में कांग्रेस का बड़ा योगदान : भागवत

भाजपा और पीएम नरेंद्र मोदी के भाषणों और दावों के विपरीत कि पिछले ७० साल में देश में कुछ नहीं हुआ और कांग्रेस ने कुछ नहीं किया, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दिल्ली के विज्ञान भवन में  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की तीन दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला के पहले दिन कहा कि आजादी की लड़ाई में कांग्रेस का योगदान अहम था। ”इस तथ्य को आरएसएस ने कभी भी नहीं नकारा। उसने देश को कई महापुरुष दिए ”। मंगलवार को आज संघ के कार्यक्रम का दूसरा दिन है।

इस मौके पर भागवत ने तिरंगे के प्रति आरएसएस के नजरिये से लेकर संघ के प्रति कुछ धारणाओं तक विस्तार से कहा। भागवत ने कहा कि ”अक्सर ये सवाल किया जाता है कि तिरंगे के प्रति संघ का नजरिया क्या है। इस मौके पर साफ कर देना चाहते हैं कि भगवा ध्वज को आप किसी खास नजरिए से न देखें। ये ध्वज भारत की संस्कृति का वाहक है। संघ भारत के तिरंगे का सम्मान करता है और इसके साथ ही भगवा ध्वज को गुरु भी मानता है। देश में संघ अपने दबदबे की अभिलाषा नहीं रखता है। इस तरह की सोच रखने वालों को संघ को संपूर्णता में समझना होगा”।

संघ को लेकर उन्होंने कहा – ”संघ के बारे में नकारात्मक सोच रखने वालों को अपनी सोच में बदलाव करना चाहिए। हमने अनुशासन की एक पद्धति बनाई। हम संघ का प्रभुत्व नहीं चाहते। इतिहास में यदि यह बात सामने आती है कि संघ के प्रभुत्व के चलते कुछ काम अच्छा हुआ तो यह संघ की पराजय है। देश में कुछ अच्छा हुआ तो देश के लोगों के कारण हुआ, इतिहास में इस बात का जिक्र होना चाहिए। -हाल के 20 वर्षों में हम क्या कर रहे हैं, इसका हम ब्योरा रखते हैं। हम प्रसिद्धि के पीछे भागते नहीं। हम अपनी पीठ नहीं थपथपाते। यह कोई उपकार नहीं है। यह समाज और देशहित के लिए काम है। चार अच्छे काम करने के लिए पीठ थपथपाने की जरूरत नहीं है। सभी मिलकर अच्छा कार्य करें। मोहन भागवत की रोज तस्वीरें छपें यह अच्छी बात नहीं है। संघ का उद्देश्य समाज का आचरण अच्छा बनाना है”।

भागवत ने कहा कि आप संकीर्ण सोच के साथ किसी विचारधारा की अवहेलना नहीं कर सकते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि देश के निर्माण में जिन लोगों ने भी भूमिका अदा की संघ से उनका स्वागत किया। विचारों के स्तर पर एक दूसरे को विरोध करने का हक है। लेकिन संकीर्ण सोच के जरिए विरोध की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। ”हमारे देश में इतने सारे विचार हैं लेकिन इन सारे विचारों का प्रस्थान बिंदु एक है। विविधताओं से डरने की बात नहीं है, विविधताओं को स्वीकार करने और उसका उत्सव मनाने की जरूरत है। अपनी परंपरा में समन्वय एक मूल्य है। समन्वय मिलजुलकर रहना सीखाता है”।

पहले दिन बॉलीवुड के कुछ सितारों समेत समाज के विभिन्न प्रतिनिधियों ने इस कार्यक्रम में शिरकत की हालाँकि भाजपा के विरोधी या समर्थक दलों के नेता इसमें ज्यादा दिखाई नहीं दिए।