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धू-धू लपटों में हुई नई रचना

अपने को बड़े-बड़़े अर्थशास्त्रियों से ज़्यादा समझदार समझने के गरूर में अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की गुलाबी फसल काटने की ऐवज में हम से पचास दिन मांगे थे तो अब उन्हें अपना झोला उठा कर चुपचाप घर चले जाना चाहिए। अगर उन्होंने ऐसा साजि़शन किया था तो हमें उन्हें चौराहे पर बुला कर सचमुच उनसे जवाब तलब कर घर भेज देना चाहिए। भारत, गौतम और गांधी का देश है तो क्या हुआ? उन्होंने हमें ऐसा कब सिखाया कि अन्याय और अत्याचार को अपने पीठ पर सवारी करने दें?

नोटबंदी के बाद के दो बरस ने देश की कमर तोड़ दी है। बावजूद इसके भारतवासी कभी इतने रीढ़हीन नहीं हो सकते कि आतताइयों को अपने कंधों पर बिठाए नाचते रहें। भले ही नरेंद्र मोदी को लगता हो कि मां गंगा ने उन्हें बुलाया है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि ईश्वर ने उन्हें किसी सकारात्मक काम के लिए धरती पर भेजा है। ऐसा होता तो कोलकाता के बेल्लूर मठ, अल्मोड़ा के अद्वैत आश्रम और राजकोट के रामकृष्ण मिशन में से किसी ने तो उन्हें दीक्षा देने की हामी भरी होती।

संतई के संसार में अवांछित तत्वों के प्रवेश को समय रहते रोक देने की दिव्य दृष्टि रखने वाले महापुरुष हर समय मौजूद रहे हैं। मगर राजनीति की दुनिया के संचालकों के पास भी ऐसी दूरदृष्टि होने के दिन अब लद गए। सो, साढ़े चार साल पहले मतदान केंद्रों तक पहुंचे लोगों में से दो तिहाई से ज़्यादा की ‘नहींÓ के बावजूद नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गए।

जिन्हें नरेंद्र मोदी का घट पुण्यों से लबालब लगता है, वे भी अब इतना तो मानने ही लगे हैं कि नोटबंदी का पाप उनके सारे पुण्यों पर भारी है। बैंकों के सामने लगी कतारों में एडिय़ा रगड़ते-रगड़ते जो खुद चल बसे और जिनके परिवार के लोगों ने इलाज के लिए पैसे खाते से न निकल पाने की वजह से जान दे दी, उनकी हाय से नरेंद्र मोदी कैसे बचेंगे? होते-सोते भी जो अपनी बहन-बेटियों के हाथ पीले नहीं कर पाए, उनके आंसुओं का तेज़ाब नरेंद्र मोदी के चेहरे पर धब्बे कैसे नहीं छोड़ेगा? जिन लाखों लोगों के हाथों से नोटबंदी के बाद काम छिन गया, उनके परिवारों के भूखे पेट नरेंद्र मोदी की सलामती का कौन-सा भजन गा रहे होंगे? बोहनी के इंतज़ार में सारा-सारा दिन गुज़ार देने वाले दुकानदारों की बद्दुआओं से नरेंद्र मोदी को मुंबई के बांद्रा में पाली हिल्स की पचास अरब रुपए वाली इमारत बचाएगी या अहमदाबाद के एसजी रोड का शांतिवन हाउस?

मुझे नहीं लगता, लेकिन अगर नरेंद्र मोदी अपनी आत्मा को अब भी अपने हाथों से धोना चाहें तो उन्हें नोटबंदी की अपनी ग़लती मान लेनी चाहिए। उन्हें हाथ जोड़ कर देश से माफ़ी मांग लेनी चाहिए। मगर अगर उनकी जन्म-कुंडली में ऐसा कोई भाव जन्म से होता तो उन्हें हमने कई बार क्षमा मांगते देखा होता। आखिऱकार उन्होंने यह कोई पहला काम तो किया नहीं है, जिसके लिए उन्हें क्षमा मांगनी चाहिए। हम ग़लतियों के लिए क्षमा मांगने का अनुरोध उनसे ही तो करते हैं, जो इतने समर्थ हैं कि उनके दोषों के लिए हम उन्हें सज़ा देने की हैसियत ही नहीं रखते हैं। वरना तो नरेंद्र मोदी क्षमा के अधिकारी नहीं, दंड के भागी हैं। पर चूंकि हम बुद्ध, महावीर और गांधी का जाप करते-करते बड़े हुए हैं, इसलिए मैं तो नरेंद्र मोदी से यही गुज़ारिश कर सकता हूं कि वे अपनी आत्मा को थोड़ी देर भिगो कर रखें ताकि जि़द्दी दाग़ दूर हो जाएं। फिर वे इस देश को रगडऩे के बजाय अपनी आत्मा को रगड़ें, इस देश को निचोडऩे के बजाय अपनी आत्मा को निचोड़ें और फिर उसे सूखने के लिए कुछ देर इस देश के जन-मानस की धूप में टांग दें। ईश्वर ने चाहा तो इसके बाद नरेंद्र मोदी को भी शांति मिलेगी और इस देश को भी गहरा सुकून मिलेगा।

मैं खूब जानता हूं कि मेरा यह सपना पूरा होने वाला नहीं है। मुझे पूरा विश्वास है कि अभी तो भारतवासियों को और भी बहुत कुछ झेलना है। यह पहली बार है कि भारत में चील-दृष्टि वाली एक ऐसी सरकार बनी है, जिसकी निगाह से कोई नहीं बच सकता। जब करवा चौथ और होली-दीवाली की दशकों से जमा मां-बहनों की पूंजी इस निगा़ह से नहीं बच सकी तो रिज़र्व बैंक की जमा-पूंजी को ही कौन-सा नजऱबट्टू इस निग़ाह से बचा लेगा? पोटली भींच कर बगल में दबाए घूम रहे रिज़र्व बैंक के गवर्नर को या तो अपनी गठरी अंतत: सेंधमारों के हवाले करनी पड़ेगी या देर-सबेर ‘चल खुसरो घर आपनेÓ गुनगुनाना पड़ेगा। जिन्हें देश की नहीं, अपने कबीले की अर्थव्यवस्था से लेना-देना होता है, वे ऐसे ही बेमुरव्वत होते हैं कि पसीने से अर्जित दूसरों की संदूकची ज़ोर-जबरदस्ती से हड़पने में एक क्षण भी न गंवाएं।

यह तो गनीमत है कि सभ्यताओं का इतिहास बहुत लंबा होता है। तमाम उत्थान-पतन के बावजूद उसमें अपने आधारभूत मूल्यों को सुरक्षित रखने की क्षमता होती है। एक नरेंद्र मोदी के किए-धरे से यह बुनियाद बर्बाद होने वाली होती तो कभी की हो गई होती। लेकिन मुद्दे की बात यह है कि हम एक ऐसे प्रधानमंत्री के राज में, पता नहीं कितने दिन और बिताने को अभिशप्त हैं, जिसने हमारी परंपराओं की सदियों से पली-बढ़ी हर जड़ में म_ा डालने में कोई कसर बाकी नहीं रखने की ठान रखी है। नरेंद्र मोदी आश्वस्त हैं कि वे सृजन कर रहे हैं, मगर उन्हें यह भान ही नहीं है कि विचार और संवेदना की गहराई को मापे बिना सृजन का बीड़ा उठाना मुमकिन ही नहीं है। बाकी सबको नीचा दिखाने की भावना से, बाकी सबको अपना मातहत समझने के अहंकार से और बाकी सबको अपने ठेंगे पर रखने की ऐंठ से सृजन नहीं, विनाश होता है। पिछले साढ़े चार साल से इसीलिए भारत विनाश-मार्ग पर लुढ़क रहा है। इस ढलान पर रपटते-रपटते हम कहां पहुंचेंगे, कौन जाने!

भारत का मुक्ति-मार्ग अब सिफऱ् एक है। यह व्यक्ति से नहीं, प्रवृत्ति से मुक्ति का मार्ग है। भारतीय जनतंत्र में पनपी एकाधिकार की ताजा प्रवृत्ति से मुक्ति के मार्ग पर अगर हम खुद नहीं बढ़ेंगे तो कोई शक्ति हमारा उद्धार नहीं कर पाएगी। नरेंद्र मोदी ने तो हमें अच्छे दिनों के आने की उम्मीद दिखा कर हमारे सुखों को वहां टांग दिया है, जहां तक हमारे हाथ पहुंचते ही नहीं हैं। इसलिए अपना उजाला तो अपने नन्हे हाथों से हमें खुद ही हासिल करना होगा। बिना आंखें खोले हम इस उजाले को कैसे देखेंगे? और, अगर इतना सब हो जाने पर भी हमारी आंखें नहीं खुलेंगी तो फिर कब खुलेंगी?

तकिए के नीचे ख्वाब सजाए रखने का वक़्त अब गया। रुक कर इंतज़ार करने का वक़्त अब गया। अब तो एड़ी लगाने का समय है। इन सर्दियों के आते-आते शुरू हुआ यह समय अगले साल की गर्मियां आते-आते चला जाएगा। जो इस समय का सदुपयोग करेंगे, भारतीय लोकतंत्र का नया ऋग्वेद लिखेंगे। जो नहीं करेंगे, बाद में अपनी छाती पीटेंगे। सवाल भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस का नहीं है। सवाल नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी का नहीं है। सवाल इस-उस की तरफ़दारी और मुख़ालिफ़त का नहीं है। सवाल तो इस बात का है कि जब लपटें धू-धू कर रही हों तो हम अपने-अपने फव्वारे ले कर बाहर निकलेंगे कि नहीं निकलेंगे!

(लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

सच्चाई नोटबंदी की

दो साल बीत जाने के बाद भी आज तक नोटबंदी की सच्चाई सामने नहीं आई है। बात साफ नहीं हुई पर शब्दों की जंग जारी है। वित्तमंत्री अरु ण जेटली ने अपने ‘ब्लाग’ में लिखा – ‘भारतीय अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए सरकार ने जो भी फैसले लिए उनमें ‘नोटबंदी’  सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। नोटबंदी की दूसरी वर्षगांठ पर कांग्रेस पार्टी ने देश भर में विरोध प्रदर्शन किए।

वित्तमंत्री ने कहा कि सरकार ने सबसे पहले विदेशों के काले धन पर निशाना साधा। लोगों से पैसा लाकर उस पर कर का भुगतान करने को कहा। जिन लोगों ने ऐसा नहीं किया उनके खिलाफ कालाधन कानून के तहत कार्रवाई की जा रही है। जिन लोगों के खातों और संपत्ति की जानकारी सरकार तक पहुंच गई है उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरह के करों के लिए व इसका विस्तार करने के लिए टेक्नालोजी का पूरा सहयोग लिया जा रहा है। कमज़ोर वर्गों को औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाने के लिए व्यक्तियों और विभिन्न संगठनों का इससे जुड़ा एक महत्वपूर्ण कदम है। जनधन योजना से ज्य़ादातर लोग बैंक प्रणाली के साथ जुड़े हैं। आधार कानून ने सरकारी व्यवस्था के सभी लाभ सीधे लोगों के बैंक खातों में पहुंचा दिए हंै। जीएसटी से परोक्ष व प्रणाली बहुत आसान हो गई है। अब कर प्रणाली को धोखा देना बहुुत कठिन हो गया है।

भारत नकदी की अर्थव्यवस्था रही है। नकदी के कारण काफी लेन-देन छुपा छुपाया रह जाता था। यह बैकिंग प्रणाली से बाहर हो जाता और लोगों को कर चोरी का मौका देता था। नोटबंदी के कारण लोग अपना पैसा बैंक में जमा करने पर मजबूर हो गए। इस के बाद 17.42 लाख खाता धारकों का पता चला और उन्होंने खुद इसकी जानकारी दी। कानूनों की अनदेखी करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की गई है। इसमें से ज्य़ादातर पैसा निवेश के लिए ‘म्युचुअलफंड’ में डाल दिया गया। यह एक औपचारिक व्यवस्था का हिस्सा बन गया।

नोटबंदी की यह कह कर आलोचना की जा रही है कि सारा पैसा बैंकों में वापिस आ गया है। जबकि मुद्रा को पकडऩा नोटबंदी का लक्ष्य नहीं था। इसका विस्तृत लक्ष्य था पैसे का औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाना और जिनका पैसा है उनसे कर वसूल करना। भारत को नगदी में डिजिटल बनाने के लिए मौजूदा व्यवस्था को झंझोरना ज़रूरी था। इस सीधा असर ज्य़ादा कर वसूलने और इसके आधार को विस्तृत करने पर पड़ा है।

डिजिटल विकास

यूपीआई (यूनाइटेड पेमेंट इंटरफेस) 2016 में शुरू की गई थी। इसके तहत लेन-देन जो अक्तूबर 2016 में 0.5 बिलियन था सितंबर 2018 में 598 बिलियन रु पए तक पहुंच गया। ‘द भारत इंटरफेस ऑफ मनी (बीएचआईएम)एक ऐसी एप्लीकेशन है जिसे एनसीसीआई ने बनाया है जिससे यूपीआई के द्वारा बहुत तेजी से पेमेंट हो जाती है। इस समय इसका इस्तेमाल 1.25 करोड़ लोग कर रहे हैं। बीएचआईएम के द्वारा लेन-देन जो सितंबर 2018 में 0.02 बिलियन रु पए का था सितंबर 2018 में 70.6 बिलियन रु पए का हो गया। बीएचआईएम का इसमें जून 2017 तक का योगदान 48 फीसद हो गया।

व्यक्तिगत आयकर पर भी नोटबंदी का असर हुआ है। 2018-19 में (31.10.18 तक) इसके तहत जो पैसा इकट्ठा हुआ वह पिछले साल की तुलना में 20.2 फीसद ज्य़ादा है। यहां तक की कॉरपोरेट टैक्स भी 19.5 फीसद बढ़ गया है। नोटबंदी से पहले यह बढ़ोतरी 6.6 फीसद और 9 फीसद थी नोटबंदी के दो साल में यह 14.6 फीसद बढ़ गई। 2017-18 में यह बढ़ोतरी 18 फीसद रही। इसी प्रकार 2017-18 में टैक्स की रिटर्न की गिनती 6.86 करोड़ पहुंच गई यह पिछले साल की तुलना में 25 फीसद ज्य़ादा है। इस साल 30.10.18 तक 5.99 करोड़ रिर्टनस भरी जा चुकी हैं जो कि पहले से 54.33 फीसद ज्य़ादा है। इस साल 86.35 लाख नए लोग जुड़े हैं। मई 2014 में जब यह नई सरकार बनी थी, उस समय रिटर्न भरने वाले 3.8 करोड़ थे। इस सरकार के पहले चार साल में यह संख्या 6.86 करोड़ पहुंच गई। अर्थव्यवस्था के सुधार से करदाताओं की जो संख्या 64 लाख थी वह जीएसटी के बाद 120 लाख हो गई।

उधर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का कहना है कि नोटबंदी में देश की 86 फीसद मुद्रा सर्कुलेशन से बाहर कर दी गई। जिससे पूरी अर्थव्यवस्था ही रु क गई। उन्होंने कहा कि नोटबंदी स्वयं किया हुआ हादसा है, यह एक आत्महत्या का प्रयास था जिसने लाखों लोगों के जीवन तबाह कर दिए और छोटे व्यापार को तहसनहस कर दिया। इसका सबसे बुरा प्रभाव $गरीब से $गरीब आदमी पर पड़ा। वे लोग अपनी थोड़ी सी बचत को बचाने के लिए घंटों लाइनों में खड़े रहे। इसके साथ ही जैसे-जैसे समय बीता नोटबंदी के लक्ष्य भी बदलते गए। पहले यह उस मुद्रा को काबू करने के लिए किया गया था जो पैसा आतंकवादियों की सहायता करता था, साथ ही कालेधन को खत्म करने के लिए। बाद में इसे डिजिटल लेन-देन से जोड़ा जाने लगा। पर सरकार का एक भी लक्ष्य पूरा नहीं हुआ।

मराठों के आरक्षण का रास्ता साफ

महाराष्ट्र राज्य पिछड़े आयोग की रिपोर्ट में मराठों को पिछड़ा माने जाने के चलते जहां एक ओर उनको आरक्षण मिलने का रास्ता साफ हो गया है वहीं दूसरी ओर सूबे के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को भी उनके कार्यकाल के पांचवे साल में राहत मिलती नजर आ रही है।

महाराष्ट्र में सत्ता पर काबिज होने के साथ ही मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मराठों को आरक्षण का आश्वासन दिया था।

हालांकि फडणवीस के पहले कांग्रेस-एनसीपी की सत्ता में मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान ने आरक्षण की घोषणा कर दी थी लेकिन मामला कोर्ट में चले जाने से यह सिर्फ  घोषणा बन कर रह गई थी। दरअसल फडणवीस के लिए यह मसला उग्र उस उस वक्त बना जब अहमद नगर जिले में एक नाबालिग मराठा लड़की के बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। उस लड़की के आरोपियों को न्याय दिलाने के लिए निकले मोर्चा ने धीरे धीरे मराठा आरक्षण का रूप ले लिया और आरक्षण की मांग के चलते दर्जन लोगों ने आत्महत्या कर ली।

मूक मोर्चा से शुरू आंदोलन के हिंसक और उग्र हो जाने से महाराष्ट्र में सत्ता धारियों के हाथ पैर फूल गए थे।  आयोग की रिपोर्ट में मराठा समाज को सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक आधार पर पिछड़ा माना गया है अब शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरी में आरक्षण मिलने का रास्ता साफ हो जाएगा।

80 के दशक से मराठा आरक्षण की मांग उठने लगी थी। 2009 में विधानसभा चुनावों में यह मांग फिर से उठी थी। 2014 तक आरक्षण का मुद्दा गरमा गया था और राज्य में सत्ता परिवर्तन के साथ ही नयी सरकार के लिए गले की फांस।

19 नवंबर से शुरू होने जा रहे हैं शीतकालीन अधिवेशन से पहले इतवार को होने वाली मंत्रिमंडल की बैठक में इस रिपोर्ट को मंजूरी के लिए प्रस्तुत किया जाएगा।  मिली जानकारी के मुताबिक मराठा समाज को आरक्षण दिए जाने के मसले पर सभी जाति समाज के लोगों ने अपना समर्थन दिया है। 98.30 फीसद मराठा समाज के लोगों ने आरक्षण का समर्थन किया है। 89.56 फीसद कुनबी समाज 98.83 फीसद ओबीसी समाज और 89.39 फीसद अन्य जातियों ने मराठा आरक्षण को अपना समर्थन दिया है।

आरक्षण के मुद्दे पर मराठा समाज से पूछे गए सवालों के जवाब में 20.94 फीसद लोगों ने नौकरी 12 फीसद लोगों ने शिक्षण और 61.78 फीसद लोगों ने शिक्षा और नौकरी दोनों में आरक्षण की मांग की है। मराठा समाज के 74.4 फीसद लोग शहरी क्षेत्रों में और 68.2 फीसद लोग ग्रामीण इलाकों में रहते हैं।  पिछले 10 सालों में जिन 345 लोगों ने आत्महत्या की है उनमें से 277 लोग मराठा समाज के हैं।

मराठा समाज के 37.28 फीसद लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजार रहे हैं 70.56 फीसद लोग कच्चे मकानों में रहते हैं और 62.70 फीसद लोग अल्पभूधारक हैं। मराठों को आरक्षण देने के मामले में न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) एसडी गायकवाड़ की अध्यक्षता वाले महाराष्ट्र राज्य पिछड़ी जाति आयोग में 15 नवंबर 2018 को अपनी रिपोर्ट पेश कर दी।

मराठा समाज को आरक्षण देने की बाबत आयोग ने मानक के तौर पर 25 प्वाइंट्स तय किए थे जिनमें आर्थिक मामले में मराठा समाज को 7 में से 6 सामाजिक मुद्दों पर 10 में से 7.5 प्वाइंट्स और शैक्षणिक मामले में 8 में से 8 प्वाइंट्स मिले यानी कुल मिलाकर 25 में से 21.5 प्वाइंट्स मराठा समाज को मिले जिससे उनके लिए आरक्षण का रास्ता साफ  हो गया।

अक्षय कुमार को सम्मन दिए जाने पर विवाद

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टल अमरिंदर सिंह ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विशेष जांच दल द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उनके बेटे व पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल और अभिनेता अक्षय कुमार को बुलाए जाने में उनकी सरकार की कोई भूमिका नही थी। एसआईटी 2015 में हुई पवित्र गं्रथों के अपमान और पुलिस गोलीबारी की घटनाओं की जांच कर रही है।  होमी भाभा अस्पताल का उद्घाटन करने के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए एक सवाल के जवाब में उन्होंने  कहा कि एसआईटी एक स्वतंत्र इकाई है और बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के काम कर रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार का काम एसआईटी को विधानसभा की सर्वसम्मति के निर्णय के अनुसार गठित करना था और अब जांच का दायित्व एसआईटी का है।

हालांकि अक्षय कुमार के बारे में चलती इन चर्चाओं के दौरान अभिनेता ने ट्वीटर पर एक बयान जारी कर राम रहीम के साथ उनकी भागीदारी के बारे से फैली सभी बातों से इंकार किया है। उन्होंने सुखबीर बादल के साथ मुलाकात को झूठ बताया। अक्षय कुमार ने कहा कि ‘मैं जीवन में कभी राम रहीम से नहीं मिला। मैंने सोशल मीडिय से जाना कि गुरमीत राम रहीम कुछ समय मुंबई में जुहू इलाके में मेरे घर के पास रहा लेकिन हम कभी एक दूसरे से नहीं मिले।

उनका पूरा बयान इस प्रकार है यह मेरी जानकारी में आया है कि सुखबीर बादल से जुड़ी एक फर्जी बैठक के बारे में और गुरमीत राम रहीम नामक व्यक्ति के साथ मेरी भागीदारी के बारे में सोशल मीडिया पर कुछ अफवाहें और झूठ व्यक्त किए जा रहे हैं। विनम्रता के साथ मैं निम्न तथ्यों को बताना चाहता हूं कि- (1) मैंने कभी भी अपने जीवन में गुरमीत राम रहीम से मुलाकात नहीं की। (2) मैंने सोशल मीडिया से जाना कि गुरमीत राम रहीम कुछ समय के लिए मुंबई में मेंरे घर के पास रहा। लेकिन हम कभी एक दूसरे से नहीं मिले। (3)पिछले कुछ सालों में मैंने पंजाबी संस्कृति और सिख धर्म के समृद्ध इतिहास और परंपरा को बढ़ावा देने वाली फिल्में जैसे सिंह इज किंग, केसरी (सारागढ़ी के युद्ध पर आधारित) बनाई। मुझे पंजाबी होने पर गर्व है और सिख धर्म के लिए बहुत सम्मान है। मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूंगा जो मेरे पंजाबी भाइयों और बहनों की भावनाओं को ठेस  पहुंचाए, जिनके लिए मेरे मन में बहुत सम्मान और प्यार है। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनका बयान पूर्ण सत्य है और चुनौतीपूर्ण है अगर कोई भी इसे गलत साबित कर सके। छानबीन से पता चला है कि विशेष जांच दल (एसआईटी) ने बेहबल कलां में पुलिस गोलीबारी की घटनाओं की जांच करते हुए 17 नवंबर को पूर्व मुख्यंमत्री प्रकाश सिंह बादल को बुलाया था। 19 नवंबर को पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल और अभिनेता अक्षयकुमार को 21 नवंबर को बुलाया था। अक्षय कुमार को 21 नवंबर को अमृतसर में सर्किट हाउस  में आने के लिए कहा गया है। एक आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार एसआईटी  के सदस्य और आईजी रैंक अधिकारी कुंवर विजय प्रताप सिंह द्वारा तीनों के लिए सम्मन आदेश अलग-अलग जारी  किए गए थे।

एसआईटी 2015 में राज्य में  पवित्र ग्रंथों के अपमान की शृंखला के बाद फरीदकोट में कोटकपुरा और बेहबल कलां में हुई पुलिस गोलीबारी की घटनाओं की जांच कर रही है। बेहबल कालां में हुई पुलिस गोलीबारी में दो व्यक्ति मारे गए थे।

विशेष रूप से पवित्र ग्रंथों के अपमान के मामले पर न्यायमूर्ति रंजीत सिंह आयोग की रिपोर्ट में अभिनेता के नाम का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल और डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम के बीच एक बैठक फिल्म ”एमएसजी’’ के रिलीज के सिलसिले में मुंबई में अक्षय के फ्लैट में अयोजित की गई थी। रंजीत सिंह आयोग की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि बैठक गुरमीत राम रहीम को ईश निंदा के मामले में माफी मांगने  से पहले आयोजित की गई थी। सीआरपीसी की धारा 160 के तहत सम्मन जारी किए गए हैं। जिसमे बरगारी  में पवित्र ग्रंथों के अपमान के मामले और बेहबल कलंा और कोटकपुरा में पुलिस गोलीबारी की घटनाओं से संबंधित जांच में उपस्थिति ज़रूरी है।

नोटिस का कहना है कि अपराध की जांच  के उद्देश्य से उस व्यक्ति की मौजदूगी ज़रूरी है जिस पर इल्जाम लगे हंै। उसे उस कथित अपराध से संबंधित सारी जानकारी देनी होगी जो भी उसके पास है। एसआईटी ने पहले एडीजीपी जितेंद जैन की जांच की फिर आईजी बठिंडा, आईजीपी परमराज सिंह उमरानंगल, तब आयुक्त लुधियाना, आईजीपी अमर चहल, फिर डीआईज्ी फिरोजपुर रेंज, एमएस जग्गी, फिर डीसी फरीदकोट, एसएस मान,  फिर एसएसपी फरीदकोट, बीके स्याल तब एसडीएम फरीदकोट तत्कालीन कोटकपुरा विधायक मंतर सिंह बरार की। राज्य  में पवित्र ग्रंथों के अपमान के मामलों की जांच  के  लिए गठित न्यायमूर्ति (सेवानिवृत) रंजीत सिंह आयोग ने बरगारी में ग्रंथों के अपमान की घटना और बेहबल कलंा पुलिस गोलीबारी की घटना पर अंतिम रिपोर्ट 30 जून 2018 को सौंपी। उन्होंने पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को रिपोर्ट सौंपी थी जिन्होंने इसे समय पर राज्य गृह सचिव और अधिवक्ता जनरल को जांच के लिए भेजा था, ताकि दोषी जल्दी पकडें जा सकें।

बुर्ज जवाहर वाला, बरगारी, गुरूसर और मल्के में  पवित्र गुस् गं्रथ साहब और अन्य धार्मिक ग्रंथों के अपमान के मामलों की जांच के लिए कांग्रेस सरकार द्वारा जांच अधिनियम 1952 की धारा 11 केे तहत अप्रैल 2017 में आयोग गठित किया था। घटनाओं के कारण राज्य के विभिन्न हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और बेहबल कलां और कोटकपुरा में पुलिस गोलीबारी में दो लोग मारे गए। मुख्यमंत्री ने पहले अकाली-भाजपा सरकार द्वारा गठित जोरा सिंह आयोग की जांच को खारिज कर दिया था।

प्रदेश का विकास राजधानी से नहीं

छत्तीसगढ़ को कभी ”धान का कटोरा’’ कहा जाता था। आज नए प्रदेश छत्तीसगढ़ की अपनी राजधानी है नया रायपुर में। एक प्रदेश का विकास उसकी राजधानी देखकर नहीं लगाया जा सकता क्योंकि राजधानी का वैभव सरकारी होता है। यानी राज्य की असीमित धन राशि से सुंदर चमचमाती सड़कें, नई लग्जरी कारें, सड़कों पर रोशनी और साफ-सुथरी अलीशान इमारतें। अभी पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव की पहली प्रचार रैली में शुक्रवार (9 नवंबर) को कहा, ‘कांग्रेस को नक्सलियों के खिलाफ बोलना चाहिए। नक्सलवाद शैतान मनोवृति वाला राक्षस है। उन्होंने कहा कि राज्य की पूर्ववर्ती सरकारों ने बस्तर क्षेत्र के विकास के लिए काम नहीं किया। कांग्रेस आदिवासियों का मखौल उड़ाती है। उन्होंने कहा बस्तर को बचाना है। बस्तर के नौजवानों का भविष्य बदलना है। दूरदर्शन के हमारे कैमरामैन अच्युतानंद साहू यहां कैमरे में लोकतंत्र को उतार रहे थे। वे मारे गए।

उधर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पंखाजूर नगर में एक बड़ी जनसभा में कहा राज्य की रमनसिंह सरकार ने गद्दी संभालने से पहले राज्य के किसानों से जो वादे किए थे उन्हें ही वह भूल गई। उन्होंने कहा, प्रधानमंत्री ने वादा किया था कि वे हर व्यक्ति के खाते में 15 लाख रुपए जमा कर देंगे। उन्होंने 100 करोड़ लोगों को रोजग़ार देने और कृषि कजऱ् काफ करने का वादा किया था। लेकिन इनमें से एक भी वादा पूरा नहीं किया गया।

उन्होंने रमनसिंह सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि, ‘राज्य में कथित चिट फंड घोटालों में 15 हजार करोड़ रुपए का घोटाला हुआ। साथ ही नागरिक आपूर्ति घोटालों की जांच क्यों नहीं कराई जाती। उन्होंने कहा कि राज्य में कांग्रेस की यदि सरकार बनी तो दो साल का बकाया बोनस दिया जाएगा जिसकी घोषणा रमनसिंह सरकार ने की लेकिन उसे दिया नहीं। उन्होंने कहा, किसानों से धान रुपए 2500 प्रति क्विंटल की दर से खरीदा जाएगा। साथ ही किसानों को हर साल खरीदे गए धान पर बोनस भी दिया जाएगा। राज्य में बढ़ती अशिक्षा को दूर करने के लिए उन्होंने कहा कि शिक्षा विभाग में सभी खाली पद भरे जाएंगे। नोटबंदी पर उन्होंने कहा कि उसके कारण आज गरीब महिलाएं, छोटे व्यापारी और आम लोग परेशान हैं। छोटे-मोटे रोजग़ार खत्म हो गए।

छत्तीसगढ़  में लगातार 15 साल से भाजपा की सत्ता संभाल रहे डाक्टर रमन सिंह अपने कार्यकाल से पूरी तौर पर संतुष्ट हैं। उनका कहना है कि बस्तर में नक्सलियों के प्रति काफी नाराजग़ी और गुस्सा है। सत्ता में आने पर उनकी कोशिश यहां शांति लाने की होगी।

राज्य निर्वाचन आयोग और नक्सलियों के बीच पोस्टरवार काफी दिलचस्प है।  निर्वाचन आयोग ने बड़े-बड़े बैनर,  पोस्टरों में ‘वोट पैंडम’ (वोट उत्सव) मनाने के लिए मतदान में भाग लेने की अपील की हैं कई मतदान केंद्रों को तो भव्य मंदिर की तरह सजाया भी गया है। उधर नक्सलियों ने दंतेवड़ा और सुकुमा के भीतरी  इलाकों में अपने पोस्टर लगा कर लोगों से मतदान में भाग न लेने की अपील की है।

छत्तीसगढ़ में दो चरणों में चुनाव होने हंै। पहले चरण में विधानसभा की 18 सीटों और शेष 72 सीटों के लिए 20 नवंबर को वोट पडेंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शहरी नक्सलियों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि ये लोग नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रिमोट कंट्रोल से आदिवासी बच्चों का जीवन तबाह कर रहे है। वें उन्हें कलम की जगह बंदूकें थमा रहे हैं। जबकि अपने बच्चों को वे विदेश में पढ़ाते हैं।

छत्तीसगढ़ में पहले चरण में 70 फीसद मतदान

छत्तीसगढ़ के कथित माओवादी इलाकों के 18 विधानसभा क्षेत्रों में 70 फीसद मतदान 12 नवंबर को हुआ। छत्तीसगढ़ में संपन्न पहले चरण के मतदान के साथ ही पांच राज्यों की विधान सभाओं में मतदान का सिलसिला शुरू हो गया। इस चुनाव को चुनावी पंडित अगले साल होने वाले आम चुनाव का सेमीफाइनल बता रहे हैं। चुनाव आयोग के अनुसार मतदान फीसद में और भी बढ़ोतरी की संभावना है। माओवादियों ने जनता से चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा न लेने के लिए कहा था लेकिन उनकी अपील पर जनता ने ज्य़ादा ध्यान नहीं दिया। सुरक्षा सैनिकों ने भी मतदान के इच्छुक लोगों को पूरी मदद दी

मिज़ोरम में अचानक बदला चुनाव अधिकारी

मिज़ोरम  में चुनाव सिर पर होते हुए भी मुख्य चुनाव आयुक्त ने राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त  को बदल दिया। राज्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आवाज उठाने वालों की मांग को एक सप्ताह पहले राज्य के मुख्य सचिव ने माना और संभावित चुनाव अधिकारियों की सूची मुख्य चुनाव आयुक्त को भेज दी।

राज्य की 12वीं विधानसभा के लिए इसी महीने के आखिर में चुनाव होने हैं। मिज़ोरम इस समय कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार का आखिरी राज्य है। मिज़ोरम के मुख्य सचिव अरविंद रे ने कुछ दिनों पहले राज्य सरकार की ओर से बुलाई गई बैठक की अध्यक्षता की थी। इस बैठक में गैर सरकारी संगठनों के समन्वयकों ने हिस्सेदारी की।

इस बैठक में प्रमुख सचिव (गृह) लालनन-माविया चुआंगो के खिलाफ शिकायत की गई कि राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी शशांक ने कुछ चीजें मुख्य चुनाव आयुक्त को भेजी हंै। शशांक ने लिखा था कि चुआंगों ने चुनावी प्रक्रिया में दखलंदाजी की है। ऐसी हालत में ज़रूरी है कि चुनाव के दौरान अतिरिक्त सुरक्षा कुमुक भेजी जाए। साथ ही ब्रू मतदाताओं के पहचान पत्रों पर भी आपत्ति जताई। मिज़ो संगठनों का मानना था कि चुआंगों को चुनाव आयोग द्वारा हटाया जाना अनुचित था। चुआंगो मिज़ो आइएएस अधिकारी हैं। इसके साथ ही ‘विशेष व्यवस्था’ ब्रू मतदाताओं के लिए की गई जो त्रिपुरा के शरणार्थी शिविरों में हैं। उनके विरोध का भी असर हुआ है। ब्रू शरणार्थियों को मतदान का अधिकार है या नहीं यह भी मिज़ोरम में एक मुद्दा है। इस पर अब नए चुनाव अधिकारी के साथ बातचीत करनी होगी।

चुनाव आयोग से चार दिनों में दो बार चुनाव अधिकारियों की टीमों ने मिज़ोरम का दौरा किया। पहली टीम के खिलाफ काफी प्रदर्शन हुए। दूसरी टीम जब आई तो इसने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की जिन्होंने यह साफ तौर पर कहा कि यदि चुनाव आयोग उनकी मांगे नहीं मानता तो मिज़ोरम में चुनाव नहीं होंगे।

भाजपा पूरी कोशिश में है कि इस बार मिज़ोरम उसके कब्जे में रहे। मिजो नेशनल फ्रंट के अध्यक्ष जोरामथंगा इस कोशिश में हैं कि इस बार वे सत्ता में आ जाएंगे। वे 1998 से 2008 तक मुख्यमंत्री थे। लेकिन राज्य में जो सत्ता विरोधी लहर हुई, उसमें उनकी सरकार भी गई और दो

सीटों पर वे उम्मीदवार थे, वहां  भी उन्हें हार मिली। भाजपा ने चुनाव बाद उन्हें समर्थन देने का संकेत दिया है।

विकल्प तो और भी हैं

एन चंद्र बाबू नायडू ने हाल में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी से मिले। इस मुलाकात से उत्साहित नायडू ने कहा, ‘कोई भी नरेंद्र मोदी से कहीं बेहतर तरीके से देश को संभाल सकता है।’ इस आत्मविश्वास के साथ नायडू विपक्ष को एक करने की भूमिका में हैं।

देश की आज की स्थिति को भांपते हुए विपक्षी दल तालमेल की ज़मीन तैयार करने में एक अर्से से जुटे हुए हैं। पत्रकार और पिछली एनडीए सरकार में मंत्री रहे अरुण शौरी ने कहा कि बदलाव कि यह नई फिजां है। पुराने दुश्मन एक साथ हो रहे हैं। इससे पता चलता है हवा के रुख का। इससे उनकी बुद्धिमत्ता का अनुमान होता है। विपक्षी दलों को लगता है कि यह ज़रूरत है और उपयुक्त मौका भी। नायडू आज विपक्षी एकता के सूत्रधार हैं। हालांकि वे और उनकी पार्टी तेलुगु देशम अब तक कांग्रेस विरोधी राजनीति में सक्रिय रही है। लेकिन अब नायडू ने राहुल से उनके घर पर जाकर बातचीत की। नायडू ने कहा कि नरेंद्र मोदी को जनता ने बहुत बड़ा जनादेश दिया था लेकिन उन्होंने देश को नीचा दिखाया, देश के साथ धोखाधड़ी की। इस मुलाकात के बाद राहुल ने ट्वीट किया ,’मैं देखूंगा कि आज हमारी जो बातचीत हुई है वह आगे भी होती रहे यह हमारी कोशिश होगी। इस बातचीत को हम जारी रखेंगे। मिलकर काम करेंगे।’

तकरीबन साढ़े चार साल तक नायडू और मोदी में परस्पर सहयोग रहा। लेकिन मोदी ने वादा करके भी राज्य को स्पेशल आर्थिक पैकेज नहीं दिया। आखिर दोनों घनिष्ठ अलग-अलग हुए।

इससे अब यह बात भी पुष्ट होती है कि मोदी के अलावा और भी विकल्प हैं। नायडू जब यह कहते हैं कि मोदी नही ंतो कोई भी और देश का नेतृत्व कर सकता है तो मोदी का महत्व घटता है। भाजपा बार-बार विपक्ष पर टीना फैक्टर यानी कोई विकल्प नहीं जैसे नारे को उछालती रहती है उसमें भी अब दम नहीं है। भाजपा लगातार कहती रही है कि मोदी -शाह नाम के चुनावी तीरदंाजों के पास कई तरह की रणनीति है।

नायडू का एक ही सप्ताह में दूसरी बार देश की राजधानी में आगमन हुआ था। उन्होंने एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार के साथ लंच भी किया और नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारूख अब्दुल्ला से भी मुलाकात की। तीनों में इस बात पर सहमति बनी कि तीनों गैर भाजपा नेता एक रफ्तार बनाते हुए देश और लोकतंत्र को बचाने की मुहिम छेड़ेंगे।

समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष अजित सिंह और माकपा के सीताराम येचुरी से भी नायडू की मुलाकात हुई। उन्होंने कहा कि आज यह देश में लोकतंत्रिक ज़रूरत है कि उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ मिलकर संघर्ष करे जिससे देश को बचाया जा सके।

तेलुगु देशम ने देश को ‘विकल्प देने में हमेशा अह्म भूमिका निभाई है। कभी देश ने ऐसी हालत नहीं देखी कि जहां हर किसी को भय और आतंक में रहना पड़ रहा हो। देश की अर्थव्यवस्था चैपट हो गई है। बेरोजग़ारी, मंहगाई बढ़ी हो और लोकतंत्र के तमाम संस्थान खत्म किए जा रहे हों।

अरुण शौरी ने भी नायडू से दिन में मुलाकात की। दोनों ने बातचीत के दौरान महसूस किया कि प्रधानमंत्री की पकड़ से कहीं दूर है प्रशासन। यह उनके हाथ से छिटक कर पार्टी अध्यक्ष के पास पहुंच गया है। सवाल यह है कि क्या चंद्रबाबू नायडू अपनी मुहिम में सफल होंगे। फिर इसमें भी महत्वपूर्ण यह है कि क्या मतदाता इसे हाथों-हाथ लेगा? पहले 1996 में भी उन्होंने ऐसी कोशिश की भी थी। दूसरी बात है कि यदि विपक्षी एका हुआ तो क्या कांग्रेस भी इसमें शामिल होगी। तेलंगाना में जानकारों के अनुसार जो चुनावी समीकरण बन रहा है उसके तहत दोनों में तालमेल लगभग हो गया है।

पहले तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव ने फेडरल फ्रंट बनाने की पहल की थी। इसमें उन्होंने भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी रखने की बात कही थी। तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने उसमें रुचि ली लेकिन बाद में जब यह पता चला कि इस फ्रंट को बाद में भाजपा से ही मेल-मिलाप बढ़ाना था तो वे वापस लौट आई। फ्रंट भी बीते दिन की बात बन गया।

नायडू की सक्रियता का असर छह प्रदेशों पर साफ दिख रहा है। एक तो उत्तरप्रदेश जहां मायावती और अखिलेश यादव का आपसी तालमेल महत्वपूर्ण होगा। बिहार, जहां विपक्षी दल लगभग एकजुट हैं। महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी का बड़ा खेल संभव है। झारखंड, कर्नाटक और आंध्र में विपक्षी एका का असर प्रभावी हो सकता है। यदि इन राज्यों में सीधी चुनावी टक्कर हुई तो खासा प्रभाव मतदाताओं पर पड़ेगा।

मीडिया की सबसे बड़ी पीड़ा विपक्ष में किसी एक नेता का उभार न दिखना है। भाजपा समर्थित मीडिया बार-बार यह सवाल उठा कर मतदाताओं को भ्रम में डालता है जबकि बार-बार विपक्षी दल के नेता यही कहते रहे हैं कि चुनाव में विपक्षी दलों को जीत हासिल होगी। उसके आधार पर नेता का चुनाव कर लिया जाएगा। विपक्ष के पास मंहगाई, बेरोजग़ारी, सीबीआई, रिजर्व बैंक, राफेल, नोटबंदी, भ्रष्टाचार और किसानों के विभिन्न मुद्दे हैं। विपक्षी दलों में यदि एका रहता है तो उनके कार्यकर्ताओं और नेताओं की बदौलत अच्छी स्थिति बनेगी। बस शर्त यह है कि मतदान मशीनें मतों के साथ खिलवाड़ न करें। इसके लिए उनके कार्यकर्ताओं और नेताओं को लगातार चैकस रहना पड़ेगा। दूसरी तरफ भाजपा और संघ परिवार रात-दिन एक करके देश का ध्रुवीकरण करने में जुटा है। उत्तरपद्रेश में रामजन्म भूमि निर्माण और दक्षिण में सबरीमाला मंदिर में युवा महिलाओं के प्रवेश पर उनकी जि़द से समुदायों में ही नहीं बल्कि जेंडर में भी खासी अलगाव दिखने लगा है।

अब देश की जनता को देखना है कि उसे बढ़ती मंहगाई, बेरोजगारी और समाज में भय, आतंक चाहिए या नही।

मध्यप्रदेश: मुद्दा विहीन राजनीति में मुद्दे

कृषि से किसानों की समस्याएं, पिछले डेढ़  दशक में 24000 से ज़्यादा किसानों की आत्महत्याएं, अमरकंटक से लेकर बड़वानी तक होता बेरहम विस्थापन, तिल-तिल कर मरते लोग और चैपट होती सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं, स्वास्थ्य सेवाओं का बढ़ता निजीकरण, जानबूझकर ढहा दी गई सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली, बच्चों और महिलाओं में जबरदस्त कुपोषण, महिलाओं पर अपराध में अव्वल प्रदेश, रोजग़ार की तलाश में पलायन करते लाखों नागरिक, बढ़ती बेरोजगारी, बंद होते पारंपरिक व्यवसाय (हाथकरधा – हस्तशिल्प) तमाम ग्लोबल इन्वेस्टर मीट के बीच घटता औद्योगिक निवेश, असफल होता औद्योगिककरण, आदिवासियों और दलितों पर बढ़ते अत्याचार, दिनों दिन कमज़ोर होती कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार का चरम पर पहुंच जाना, शहरों और गांवों में पीने के पानी की गहराती समस्या, शासकीय रोडवेज को बंद कर निजी व्यक्तियों को सौपनें से उपजी यातना, आदि- अनादि। एक अंतहीन फेहरिस्त है मध्यप्रदेश में समस्याओं या चुनावी मुद्दों की परंतु सारा पक्ष व विपक्ष न जाने किन मुद्दों पर चुनाव लडऩा चाहता है, या लड़ रहा है, यह वास्तव में रहस्य का विषय है।

भौगोलिक तौर पर और कहें तो संस्कृति सभ्यता के लिहाज से भी मध्यप्रदेश को मालवा, निमाड, महाकौशल, बुंदेलखंड, व बघेलखंड (विंध्य) जैसे अंचलों में विभक्त किया जा सकता है। इनका रहन-सहन वेशवूषा, भाषा बोली एक दूसरे से भिन्न हंै लेकिन समस्याएं एक सी हंै। परंतु सरकार मानती है कि मध्यप्रदेश अब पिछड़ा राज्य नहीं रहा वह अब कई कदमों की छलांग लगाकर अगले राज्यों की कतार में शामिल होने को तत्पर है। मध्यपद्रेश एक ऐसे मुख्यमंत्री द्वारा शासित है जो निरंतर यात्राओं पर ही रहता है। राजधानी भोपाल में रहना उन्हें ज़्यादा पसंद नहीं है और दूसरी ओर वर्तमान संसदीय प्रणाली के दिमाग में अध्यक्षीय प्रणाली का दौरा पड़ गया है। अतएव मुख्यमंत्री राज्यों में और केंद्र में प्रधानमंत्री के अलावा अन्य मंत्री अर्थहीन होते जा रहे हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार व प्रशासनिक अकर्मण्यता के जितने भी आरोप लगाए जा सकते हैं, लग चुके हैं, पर वे अविचलित हैं। यह वास्तव में बेहद विचारणीय व चिंतनीय विषय है।

यदि शाीर्ष नतृेत्त्व की बात करें तो भारतीय जनता पार्टी के पास मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के अतिरिक्त कोई और प्रदेश स्तरीय चेहरा ही नहीं है। जो मालवा के हैं उन्हें बघेलखंड के मतदाता नहीं पहचानते और बुंदेलखंड वाले नेता को निमाड़ के लोग नहीं जानते। जबकि कांग्रेस के पास कमलनाथ, दिग्विजय सिंह , ज्योतिरादित्य सिंधिया और अजय सिंह, कांतिलाल भूरिया, अरुण यादव ऐसे युवा नेता हंै जिनकी प्रदेश स्तरीय पहचान है। परंतु इस उपलब्धि को कांग्रेस की कमी के रूप में देखा जा रहा है, गोया कि अब दलों में एक नेता से ज़्यादा का उभरना, लोकतंत्र के अशुभ है? कांग्रेस की स्वंय ही यह समस्या है कि वह अपनी इस संपत्ति को एनपीए में परिवर्तित कर लेना चाहती है। अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने से कौन कब किसी को रोक पाया है। मध्यप्रदेश विधानसभा में कुल 230 सदस्य हैं। पिछली विधानसभा में भाजपा के 165 कंाग्रेस के 58 व अन्य दलों व निर्दलीय 7 विधायक थे। भाजपा ने मध्यप्रदेश के सभी अंचलों एवं उनमें शामिल आदिवासी अंचलों में भी जबरदस्त पैठ बनाई थी। वहीं दूसरी ओर केंद्र में भी भाजपा सरकार के आने से जनता को उम्मीद जगी थी कि अब प्रदेश में बेहतर ढंग से विकास और शासन हो पाएगा। परंतु हुआ इसका ठीक उलटा। कुपोषण से ग्रस्त मध्यप्रदेश में पोषण आहार को लेकर जबरदस्त अनिमितताओं के चलते, न्यायालय की शरण में जाना पड़ा और वहां से भी आधी- अधूरी राहत मिल पाई। मुख्यमंत्री स्वंय को मामा कहलवाते हैं, परंतु उनकी संवेदनाएं अंतत: दिखावटी ही जान पड़ती है। विधानसभा सत्रों के दौरान  जब भी विपक्ष सरकार  को कटघरे में  लेता था तब समय से पहले ही विधानसभा का लगातार सत्रावसान कर दिया जाता रहा है। इससे यह भी समझ में आता है कि दो-तिहाई बहुमत के बावजूद सरकार सदन में सवाल जवाब को लेकर स्वंय पर विश्वास नहीं कर पर रही थी। उधर दूसरी ओर विपक्ष भी उतना ही पंगु बना  रहा। कांग्रेस पिछले पांच सालों में एक भी बड़ा आंदोलन सरकार के खिलाफ खड़ा नहीं कर पाई थी। हां, कमलनाथ के प्रदेशाध्यक्ष बनने के बाद थोड़ी चेतना अवश्य दिखी, परंतु वह भी चुनाव की वजह से सामने आई दिखती है। बहरहाल देर आए दुरूस्त आए। यही कहा जा सकता है।

वैसे शुरूआती फेहरिस्त में दो समस्याएं और जोडऩा आवश्यक है जो आने वाले चुनावों में महत्वपूर्ण साबित हो सकती हंै। ये है बढ़ती सांप्रदायिकता और बढ़ता जातिवाद। बढ़ती सांप्रदायिकता ने कमोवेश भाजपा के लिए काफी अनुकूल परिस्थितियां बना दी थीं। वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ (आरएसएस) का शासन-प्रशासन में सीधा हस्तक्षेप समस्याएं भी खड़ी कर रहा था। परंतु मुख्यमंत्री ने किसी तरह इसको संभाल लिया और कई मसलों पर समानांतर शासन व्यवस्था अघोषित रूप से मान्य भी कर दी गई। परंतु अनुसूचित जाति-जनजाति पर अत्याचार हेतु आपराधिक कार्रवाई को लेकर आए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को संसद द्वारा बदल दिए जाने के बाद हालात काफी बदले। निर्णय आने के बाद अनुसूचित (दलित) वर्ग सड़कों पर उतरा था और उसने काफी आक्रामक रुख अपनाया था। संसद के अधिनियम पारित  करने के पश्चात यथास्थिति कायम हो जाने से सवर्ण व अन्य पिछडा वर्ग (ओबीसी) बेहद नाराज हो गए और उनका संगठन एकाएक अत्यंत सक्रिय हो गया। इधर दलित संगठन तो पहले से ही सक्रिय था। सरकार की अदूरदर्शिता ने इन दोनों संगठनों की भाजपा से दूरी बना दी और अनजाने में ही कांग्रेस लाभ की स्थिति में पहुंच गई। उधर बसपा की हां-न-हां के बीच कांग्रेस से गठबंधन की स्थितियां नहीं बन पाई। छत्तीसगढ़ में बसपा और अजीत जोगी के समझौते ने आग में घी का काम किया। कांग्रेस का समाजवादी पार्टी से भी समझौता नहीं हो पाया। इस पूरे घटनाक्रम को देखकर स्पष्ट आभास होता है कि दोनों ही ओर से गठबंधन को लेकर अनिच्छा थी। इसी दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को प्रदेश दौरे के दौरान मिली अपार लोकप्रियता ने जहां कांग्रेस को आशान्वित किया वहीं भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई। यह स्वाभाविक भी था क्योंकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के दौरे में भाजपा अपेक्षित जमावड़ा कर पाने में सफल नहीं हो पाई थी।

इस बार के चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) भी एक गंभीर प्रतिद्वंदी के रूप में उतरने का प्रयास कर रही है।। नर्मदा बचाओ आंदोलन के वरिष्ठ कार्यकर्ता आलोक अग्रवाल इसका नेतृत्व कर रहे हैं और मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी हैं। आप ने बड़ी संख्या में उम्मीदवारों को चुनावी मैादान में उतारा भी है । यदि आप बेहतर कर पता है, तो यह मध्यप्रदेश की राजनीति के लिए शुभ ही होगा। परंतु संगठन के स्तर पर अभी अधिक काम किए जाने की आवश्यकता है। वही गोडंवाना गणतंत्र पार्टी का महाकौशल में थोड़ा प्रभाव ज़रूर है। पश्चिमी मध्यप्रदेश में जय आदिवासी युवा शक्ति (जयश) एक मजबूत राजनीतिक व सामाजिक संगठन के रूप में तेजी  से अपना स्थान बना रहा था। परंतु कांग्रेस की घाघ नीतियों के चलते धराशायी होकर बिखर गया। सपाक्स को हाल ही में राज्य स्तरीय राजनीतिक दल के रूप में मान्यता मिल गई है और वह भी सभी स्थानों से चुनाव लडऩे का मन बना रहा है। यह छोटे दल कहीं पर भाजपा तो कहीं कांग्रेस को मुश्किल में डाल सकते हैं। इन दलों की वजह से जीत-हार का अंतर काफी कम हो सकता है।

जहां भाजपा को अपने 15 वर्षों के सतत् शासन व केंद्र में अपनी सरकार का होना चौथी बार चुनाव जीतने का आश्वासन प्रदान कर रहे हैं। वहीं कांग्रेस में काफी वर्षों बाद इतनी ऊर्जा दिखाई दे रही है। वह बुंदेलखंड एवं बघेलखंड में आगे दिखाई देती दिख रही है। वहीं महाकौशल में कमोवेश बराबरी पर है। मालवा क्षेत्र कृषि एवं उद्योग दोनों में प्रदेश में सबसे आगे है। गोलीकांड का शिकार मंदसौर क्षेत्र इसी में स्थित है। यह सोयाबीन का भी बड़ा उत्पादक है। साथ ही लहसुन का भी। पिछले दिनों यहां लहसुन मात्र एक से दो रुपए किलो बिक गया। वहीं अभी सोयाबीन भी न्यूनतम खरीदी मूल्य से नीचे बिक रही है। भावांतर का फायदा अधिकांशत व्यपारियों को ही मिल पा रहा है। वहीं औद्योगिक क्षेत्रों में भी अशांति हैं । कारखाने या तो बंद हो रहे हैं या बड़े पैमाने पर श्रमिकों की छटनी होने से असंतोष बढ़ता जा रहा है। निमाड़ क्षेत्र नर्मदा स्थित बांधों जिसमें सरदार सरोवर बांध प्रमुख है, की वजह से उबल सा रहा है। गुजरात की मनमानी व केंद्र की शह से पानी न बरसने के बावजूद निमाड़ का बड़ा हिस्सा अवैध रूप से डूब में आ रहा है। ये बातें भी भाजपा को संकट में डाल सकती हंै।वहीं जीएसटी के प्रकोप से सभी छोटे व मध्यम कारोबारी हैरान व हताश हैं।

कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र (मेनिफेस्टो) में कुल 50 बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा की है। इसमें कृषि, हस्तशिल्प, हाथकरधा, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, रोजग़ार आदि सभी महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं। वैसे भी कमलनाथ प्रतिदिन मुख्यमंत्री से एक मसले पर प्रश्न पूछ रहे है। यह 40 प्रश्नों की एक शंृखला है परंतु एक का भी जवाब नहीं मिल रहा है। यही आधुनिक राजनीति का लब्बोलुआब भी है। सवाल यही उठता है कि क्या कांग्रेस व अन्य दल इसका लाभ उठा पाएंगे? टिकट वितरण को लेकर दोनों ही दलों में असंतोष चरम पर है। मुद्दाविहिन चुनाव प्रचार अभी तो आपसी दोषारोपण के सहारे चल  रहा है। उम्मीद ही की जा सकती है कि आने वाले समय में चुनाव में आम जनता के मुद्दे सड़क, पानी बिजली के अलावा भी उभरेंगे।

 चेस्टरटन ने लोकतंत्र के लिए कहा था,” दि वल्र्ड विल  नेवर बी सेफ फार डेमोक्रेसी – इट इस ए डेंजरस ट्रेड” अर्थात लोकतंत्र निष्कंटक तो शायद ही नहीं होने पाएगा । इसे निष्कंटक बनाने की कोशिश एक खतरे से भरा काम है। गांधी कहते हैं,” मैंने उस जनगणना करने वाले भाई को जवाब देते हुए अपने को धर्म संस्थापक नहीं कहा था, राजनीतिज्ञ कहा था। अहिंसा का स्थान तो सभी धर्मों में है। मगर राजनीति में शक्ति के विकेंद्रीकरण  के द्वारा जो अहिंसा स्थापित होगी वह अपने आप में धर्म होगी।  “क्या हम विकेंद्रीकरण देख पा रहे हैं?  पुरातन ग्रीस और रोम के सिक्कों पर मतदान पेटी में मत डालते व्यक्ति को दिखाया गया है। 2500 वर्ष पश्चात भारत में मतपेटी  का स्थान ईवीएम मशीन ने ले लिया है। परंतु लोकतंत्र उसी मतदान पेटी के पास कदमताल करता नजर आ रहा है। क्या आने वाला चुनाव कुछ कदम आगे बढ़ पाएगा?

भाजपा में बगावत भड़की

राजस्थान में दोनों मुख्य राजनीतिक दल भाजपा और कांग्रेस फिलहाल 7 दिसम्बर को होने वाले चुनाव के निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं। कांग्रेस तो टिकट वितरण को लेकर अंदेशों की सरहद पर खड़ी है। हालांकि सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस ने 120 सीटों पर सहमति बना ली है। लेकिन फिलहाल सूची इस मंथन पर अटकी हुई है कि मध्यप्रदेश की तर्ज पर प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट और अशोक गहलोत चुनाव लड़ें या फिर कांग्रेस को जीत दिलाने के लिए हर सीट पर प्रचार करने पर फोकस करें? अगर दोनों को टिकट मिलता है तो गहलोत जोधपुर की सरदारपुरा ओर पायलट दोसा या अजमेर की सीट पर चुनाव लड़ सकते हैं? उधर भाजपा की 131 उम्मीदवारों की सूची जारी होते ही पार्टी में बगावत की आग भड़क उठी है और धरने प्रदर्शन का दोर शुरू हो गया है। टिकट कटने से नाराज मंत्री सुरेन्द्र गोयल ने पद और पार्टी से इस्तीफा देे दिया है और निर्दलीय चुनाव लडऩे की घोषणा कर दी है। इसी तर्ज पर भाजपा के नागोर विधायक हबीबुर्रहमान ने भी भाजपा से किनारा कर लिया है। उनका कहना है, ‘निर्दलीय लड़ूंगा या किसी और पार्टी से नाता जोड़ूंगा, जल्दी ही फैसला करूंगा? देवस्थान मंत्री राजकुमार रिणवा के रतनगढ़ से टिकट कटने के अंदेशों को लेकर उनके समर्थक भाजपा मुख्यालय पर प्रदर्शन के लिए उलट पड़े हैं। रामगंजमंडी की भाजपा विधायक चंद्रकांता मेघवाल ने टिकट कटने पर हालांकि खुलकर कुछ नहीं कहा है लेकिन समझा जाता है कि वे दो सीटों को खासा नुकसान पहुंचा सकती है। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि अपना टिकट कटने के लिए उनका खौलता गुस्सा पार्टी के ही विधायक प्रहलाद गुंजल पर निकलेगा। ऐसे में गुंजल के निर्वाचन क्षेत्र में सेंध लगा सकती है। अब जबकि पार्टी ने रामगंजमंडी से संघनिष्ठ मदन दिलावर को टिकट दिया है तो चंद्रकांता मेघवाल उनके वोटों में बारूद की सुरंगे बिछा सकती है। सूत्रों का कहना है कि भाजपा इस सीट पर मचे घमासान को रोकने के लिए डेमेज कंट्रोल की कोशिश में है, लिहाजा संभावना है कि चंद्रकांता को डग अथवा केशवरायपाटन की आरक्षित सीट से टिकट मिल जाए? बहरहाल चंद्रकांता मेघवाल का टिकट काटे जाने से नाराज रामगंजमंडी मंडल अध्यक्ष नरेन्द्र काला और अन्य पदाधिकारी भाजपा से इस्तीफा दे चुके हैं। बहरहाल टिकट वितरण में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और आरएसएस का बखूबी दखल रहा है।

भाजपा में बगावत की आग छह मंत्रियों समेत 46 विधायकों के टिकट कटने को लेकर है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने पहले ही दो टूक शब्दों में इनको ‘ड्रॉपÓ करने की मंशा जता दी थी। शाह का कहना था, ‘जो नहीं जीतेगा, उसका टिकट काटो …..। उन्होंने बड़ी बेबाकी से जता दिया था कि,’राजस्थान में सरकार फिर से बनानी है, तो किसी को ‘कृतार्थÓ नहीं करना है। इधर वसुंधरा इस बात पर अड़ गई है कि, जो लोग पार्टी और उनके साथ लंबे समय से जुड़े हैं, उनकी अनदेखी करना उचित नहीं होगा। लेकिन फिर भी कमोबेश अनदेखी होकर रही। सूत्रों का कहना है कि शाह की मंशा सिर्फ जिताऊ उम्मीदवार को ही टिकट देने की थी। शाह इस मामले में कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। सूत्रों का कहना है कि सिर्फ इसी आधार पर किसी को टिकट नहीं दिया जा सकता कि, वो वरिष्ठ नेता या मंत्री है? राजनीतिक विश्लेषकों का कहना कि,’टिकट वितरण में भाजपा नेतृत्व वसुंधरा राजे को खुली छूट देने को कतई तैयार नहीं था। पार्टी अध्यक्ष शाह के निकटतम सूत्रों का कहना है कि,’हमने जो सूचियां तैयार की उसका आधार पार्टी द्वारा करवाया गया सर्वे है। टिकट वितरण में अपनी अवहेलना से राजे के तल्ख तेवर साफ नजर तो आए लेकिन स्पष्ट रूप से कुछ भी कहने से बचती रही। हालांकि नाराज़गी का नजारा छिपा भी नहीं रह सका, जब वे पहली नवम्बर को केन्द्रीय चुनाव समिति की बैठक से किनारा कर गई।

इस बीच मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के टिकट वितरण में जिस तरह भाजपा के मुख्यमंत्रियों की पसंद को तवज्जो दी गई उससे वसुंधरा राजे को भी अपनी मन की करने का मौका मिल गया था। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से जो सूचियां जारी हुई, उनमें बड़ी संख्या में मौजूदा विधायक टिकट पाने में सफल रहे। लेकिन फिर भी वसुंधरा राजे इस तर्क को भुना पाने की कोशिश में तो कामयाब नहीं हुई।

राजनीतिक रणनीतिकारों का कहना है कि शाह और वसुंधरा ‘दोनों का मकसद राज्य में भाजपा की सत्ता को बरकरार रखना है। फर्क बस इतना है कि, शाह ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर प्रत्याशी तय करने का सुझाव दे रहे थे और वसुंधरा राजे प्रदेश इकाई के पैनल में आए सभी प्रत्याशियों की हिमायत में खड़ी थी। राजे की हठधर्मी के पीछे विश्लेषक उनका दोहरा दांव भांप रहे हैं। जीतने पर तो उनका छत्र हिलने का सवाल ही नहीं। पराजय हुई तो उनके ‘निष्ठावानÓ विपक्षी नेता का ताज किसी गैर के सिर पर नहीं रखने देंगे। बावजूद इसके सार्वजनिक निर्माण मंत्री यूनुस खान, उद्योग मंत्री राजपाल सिंह शेखावत, आपूर्ति मंत्री बाबूलाल वर्मा, चिकित्सा मंत्री कालीचरण सर्राफ , श्रम मंत्री जसवंत सिंह और पीएचडी मंत्री हेमसिंह भडाना के टिकट कट कर ही रहे। सूत्रों का कहना है कि यूनुस खान की गतिविधियों से संघ बुरी तरह खफा था, राजपाल शेखावत की सीट से आरएसएस अपने खेमे के प्रचारक को टिकट दिलवाना चाहता है, जबकि बाबूलाल वर्मा के प्रति स्थानीय नाराज़गी ही उन्हें ले डूबी। कालीचरण सर्राफ मौजूदा सरकार के सबसे चर्चित मंत्रियों में गिने जाते हैं, लेकिन तबादलों में उनके बेटों की संदिग्ध गतिविधियों ने सर्राफ की लुटिया डुबो दी। हेमसिंह भडाना और जसवंत सिंह यादव अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों की नाराजगी से ही टिकट से वंचित कर दिए गए।

सूत्रों का कहना है कि राजपाल सिंह शेखावत और कालीचरण सर्राफ की सर्वे रिपोर्ट ही उनको ले डूबी। राजपाल सिंह का नाम तो एन वक्त पर काट दिया गया। सूत्रों का कहना है कि समूचे मामले में भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व अपनी बात पर अड़ा रहा कि,’इस बार चाहे किसी का भी टिकट काटना पड़े, लेकिन निर्वाचन क्षेत्र में तब्दीली नहीं की जाएगी। अभी भाजपा की दूसरी सूची जारी नहीं हुई है। लेकिन श्रीगंगानगर से भाजपा के मंत्री सुरेन्द्र पाल सिंह टीटी की सीट भी खतरे में बताई जाती है। पंचायत राजमंत्री धनसिंह रावत के सिर पर भी तलवार लटक रही है। सूत्रों का कहना है कि, रावत सांप्रदायिक मामलों में गलत बयानबाजी देकर फंस गए। हालांकि इससे पहले भी वे गलत बयानबाजी के कारण कई मौकों पर पार्टी को मुश्किल में डाल चुके हैं।

कांग्रेस की केन्द्रीय चुनाव समिति ने राजस्थान के 120 विधानसभा क्षेत्रों के प्रत्याशियों के नामों पर अंतिम मुहर लगा दी है। इनमें राज्य के दो पूर्व सांसदों समेत ज्यादातर मौजूदा विधायकों के नाम शामिल है। हालांकि स्क्रीनिंग कमेटी की अध्यक्ष शैलजा का कहना है कि, चुनाव समिति ने अभी सिर्फ प्रत्याशियों के नामों की चर्चा की है। अभी सूची को अंतिम रूप नहीं दिया है। अलबत्ता जिन नामों पर सहमति बनी है उनमें अशोक गहलोत, शांति धारीवाल, रघुवीर मीणा, आदि शामिल हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि राजस्थान की स्क्रीनिंग कमेटी ने दो दिनों की मैराथन बैठक के बाद केन्द्रीय चुनाव समिति को 120 नामों की सूची भेजी थी। केन्द्रीय चुनाव समिति की राहुल गांधी की अध्यक्षता में ढाई घंटे लंबी चली बैठक में एकल पैनल वाली 120 सीटों पर मुहर लगा दी गई। लेकिन बीस सीटों ने कांग्रेस आलाकमान को दुविधा में डाल दिया है। यह नौबत स्क्रीनिंग कमेटी की रिपोर्ट और कांग्रेस के सहप्रभारियों की रिपोर्ट में भारी अंतर से आई है। दुविधा की वजह सहप्रभारियों की ग्राउंड रिपोर्ट में कई पैराशूट प्रत्याशियों के अलावा आपराधिक आरोपों में फंसे लोगों की सिफारिश थी। सूत्रों के अनुसार ऐसे लोगों की संख्या 20 बताई गई थी। कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि, ‘अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सहप्रभारी सचिवों से कराया गया आकलन का प्रयोग सफल नहीं रहा। इन्हें पहले तो बाहर का रास्ता दिखा दिया गया लेकिन बाद में विवाद के अंदेशे में वापस साथ ले लिया गया। राहुल गांधी ने एक बात पूरी तरह साफ कर दी है- युवाओं को तरजीह और हर जिले से एक महिला को टिकट।

उधर विश्लेषक सन्नी सेबेस्टियन का कहना है कि, सत्तारूढ पार्टी के उम्मीदवारों की पहली सूची साफ इशारा कर रही हे कि वह पूरी तरह वसुंधरा राजे के नेतृत्व पर निर्भर है और इसीलिए अपने सहयोगी रहे मौजूदा विधायकों पर ही दांव खेल रही है। जारी हुई 131 उम्मीदवारों की पहली सूची में 85 विधायकों को फिर से टिकट देना इस तर्क को और ताकत देता है कि केन्द्रीय नेतृत्व को वसुंधरा राजे पर भरोसा रखना पड़ रहा है। प्रश्न उठता है कि पार्टी अगर ऐसा नहीं करती तो क्या उसके पास उनके अतिरिक्त कोई विकल्प भी शेष था? सन्नी कहते हैं, सूची की महत्वपूर्ण बात यह रही कि इसके आरएसएस का खास दखल रहा नतीजतन संघ के 25 नए चेहरों को टिकट दिया गया। इनमें केवल तेरह महिलाएं हैं और मुस्लिम एक भी नहीं है। एक मुस्लिम विधायक हबीबुर्रहमान का तो टिकट ही काट दिया गया। सन्नी कहते हैं, ‘क्या भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने बिल्कुल ही आशा छोड़ दी है, अन्यथा खराब आचरण और भ्रष्टाचार में लिप्त वर्तमान विधायकों और मंत्रियों को फिर से टिकट देने का फैसला क्यों किया गया? विश्लेषक कहते हैं कि,’हो सकता है कुछ लोगों को लगे कि राजे और संघ परिवार मिल कर जीत दिला सकते हैं।

सियासी विरासत की चर्चा

मारवाड़ से एक बहुचर्चित मानी जाने वाली ओसियां विधानसभा क्षेत्र से पूर्व मंत्री भंवरी सेक्स प्रकरण में यहां की जेल में बंद महिपाल मदेरणा की पत्नी लीला मदेरणा इस बार विधानसभा चुनाव लडऩे की कोश्शि में है। इनकी पुत्री दिव्या मदेरणा ने इसकी पुष्टि की है।ं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का पुत्र वैभव गहलोत भी राजनीति की राह पर चलने को आतुर है, पर उनका जनाधार नहीं बन पा रहा है। अभी वह प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री पद पर है। अगर पूरे राजस्थान के कई प्रतिष्ठित राजनेताओं के परिवार पर नजर डालें तो राजनीति की फिसलन भरी रपटीली राह पर इनके वंशज कुछ उभरे तो कुछ फिसल कर शून्य हो गए। कुछ गिने-चुने राजनीतिक परिवार ऐसे हैं जिनमें बेटियो ंने अपना दमखम दिखाया।

कांग्रेस ने अपने समय के कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे व प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके रामनारायण चौधरी की बेटी रीटा मंडाया विधानसभा क्षेत्र में पिता की विरासत संभाल चुकी है। जमींदारा पार्टी की विधायिका कामिनी जिंदल अपनी पार्टी का अलग परचम लहरा रही है। ऐसे कुछ नेता पुत्र भी है जो अपने पिता की राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए विधानसभा चुनाव में टिकट हासिल करने की कोशिशों में जुटे हैं। रतनगढ़ से विधायक व उपमुख्यमंत्री रहे हरिशंकर भाभड़ा के पुत्र सुरेन्द्र भाभड़ा भी टिकट के दावेदार हैं? जयपुर से छह बार सांसद रहे और जनजन के लाल गिरधारी लाल के नाम से अपनी पहचान रखने वाले गिरधारी लाल भार्गव के पुत्र मनोज भार्गव भी टिकट की दावेदारी में है। भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष रघुवीर सिंह कोैशल के पुत्र अतुल कौशल, ललित किशोर चतुर्वेदी के पुत्र लोकेश भी टिकट की कतार में है। भैरोसिंह शेखावत के नाती भी विद्याधर नगर से टिकट के दावेदार हैं। कुछ राजनीतिक परिवार ऐसे हैं जिन्होंने प्रदेश की राजनति में वर्चस्व तो रखा लेकिन उनकी दूसरी पीढ़ी राजनीति में सफल नहीं हो पाई। नागौर जिले के खौबरार क्षेत्र से लोकदल और जनता दल से विधायक रहे चैधरी गंगाराम के पुत्र हनुमान बेनीवाल अपनी पारिवारिक राजनैतिक विरासत को संभाले हुए है। भानू प्रकाश शास्त्री, गुलाबचंद कटारिया, शिव किशोर सनाढय सहित अनेक ऐसे दिग्गज है जिनकी दूसरी पीढ़ी राजनीति से कोसों दूर हेै। पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाडिय़ा के पुत्र ने राजनीति में आने की कोशिश की पर पार नहीं पड़ी। ऐसे ही राज्य की राजनीति में वर्षों तक अपना परचम लहराने वाले मोहनलाल सुखाडिय़ा, टीकाराम पालीवाल, रामकिशोर व्यास, बरकतुल्ला खां का परिवार राजनीति में आगे नहीं बढ़ पाया। जोधपुर में तो इनके नाम पर भव्य स्टेडियम तक बना हुआ है।

कुछ उभरे, कुछ दो-चार कदम बढ़े पर फिसल गए। प्रदेश कांगेस अध्यक्ष सचिन पायलट के माता-पिता सांसद रह चुके हैं। इसी प्रकार भरतपुर राजघराने के विश्वेन्द्र सिंह के पिता भी सांसद रह चुके हैं। नटवर सिंह के पुत्र जगतसिंह राजनीति में फिट हो गए। एक बार कांग्रेस से तो दूसरी बार भाजपा से विधायक बन चुके। ऐसे ही बाड़मेर से गंगाराम चैधरी की पोैत्री भी राजनीति में दांव लगा चुकी पर सफलता नहीं मिल पाई। जबकि दूसरी और प्रताप सिंघवी ने अपने पिता चन्द्र प्रकाश सिंघवी की राजनीतिक विरासत को संभाला है। सिंघवी छबड़ा से विधायक चह चुके हैं। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के समय भैरोसिंह शेखावत राज्य विधानसभा के सदस्य नहीं थे। उनके लिए चंद्रप्रकाश सिंघवी ने ही छबड़ा की सीट खाली की थी। बात करें गंगानगर की तो बेगाराम के पुत्र निहालचंद मेघवाल भी पिता की विरासत संभाले हुए है। बेगाराम लोकदल और जनता दल से सांसद बने पुत्र निहालचंद सांसद भी बने, विधायक बने, भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष बनने के साथ-साथ मोदी सरकार के मंत्री भी बने। ऐसे ही कई नेता पुत्र अपने पिता की विरासत संभालने को आतुर है।

लगभग सभी बड़े दलों की सीढिय़ां चढ़कर उतर चुके चन्द्रराज सिंघवी की राजनीतिक विरासत को संभालने में इनके परिवार को दिलचस्पी नहीं है। सांसद तथा इंदिरा गांधी के विश्वस्त रहे भुवनेश चतुर्वेदी, कृष्ण कुमार गोयल, रामकिशन वर्मा, शांती धारीवाल, हरिकुमार ओदिच्य, भैरवलाल काला बादल सहित करीब 37 पूर्व मंत्री, पार्टियों, स्वायत्त शासी निगमों आदि के अध्यक्षों की राजनीतिक विरासत में कोई चेहरा दमदारी से नहीं उभरा।

इस बार के विधानसभा चुनावों में कुछ ऐसे दावेदार निपट सकते हेैं जो राजनीति में सिर्फ हवाई उड़ाने भरते हैं तो कुछ की किस्मत साथ दे सकती है। जोधपुर में ओसियां विधानसभा क्षेत्र में धाक जमाये मंत्री रहे नरेन्द्र सिंह भाटी का परिवार राजनीति में शून्य है तो यहां के पूर्व राजघराने के परिवार में कोई सक्रियता, कोई राजनीतिक दावेदारी नजर नहीं आती। अशोक गहलोत के करीबी जुगल काबरा, मानसिंह देवड़ा दिवंगत हो चुके हैं। जवाहर सुराणा गहलोत के विश्वस्त रहकर भी कोई विशेष पद, लाभ हासिल किये बगैर ही चल बसे। अब देखना यह है कि कौनसा युवा नेता अपने खानदान की राजनैतिक विरासत की मशाल को जलाए रख सकेगा।

बुन्देलखण्ड राज्य नहीं, फिर आए चुनाव

मध्य प्रदेश में चुनावी घमासान अपने उफान पर है पर इस बार मध्य प्रदेश के हिस्से वाला बुन्देलखण्ड बदलाव के मूड है। बुन्देलखण्ड में कांग्रेस और भाजपा के दिग्गज नेताओं और उनके बेटों को टिकट न मिलने से इन दोनों पाटिर्यों के नेताओं ने बगावती सुर बुलंद करते हुए बसपा और सपा का दामन थाम लिया है। बुन्देलखण्ड में वैसे भी बसपा और सपा के प्रत्याशी चुनाव जीतते रहे हैं। पर इस बार बसपा और सपा का वर्चस्व बढ़ता दिख रहा है। बुन्देलखण्ड में कांग्रेस और भाजपा का चुनावी समीकरण बसपा और सपा आसानी से बिगाडऩे में लगी हंै। मौजूदा चुनावी बिसात में कांग्रेस के दिग्गज नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी के बेटे नितिन चतुर्वेदी ने राजनगर विधान सभा से सपा के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरकर साफ तौर पर बता दिया है कि बुन्देलखण्ड में सपा का वजूद है। बुन्देलखण्ड के 6 जिलों में 30 विधान सभा सीटें है।

अब बात करते है छतरपुर जिले की जहां पर बगावती कांग्रेस के नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ही नही है बल्कि भाजपा के नेता व पूर्व सांसद जीतेन्द्र सिंह बुन्देला भी बगावती तेवर लिए बैठे हैं। सबसे दिलचस्प चुनाव छतरपुर विधान सभा सीट का है सत्यव्रत चतुर्वेदी के परिवार के ही आलोक चतुर्वेदी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे है। यहां के स्थानीय लोगों का कहना है कि एक परिवार की आपसी लड़ाई का फायदा कहीं दूसरे दल को न मिल जाये क्योंकि पार्टी कार्यकर्ता आलोक चतुर्वेदी के चुनाव प्रचार में खुलेमन से प्रचार करने से कतराते रहे है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व कार्यकर्ता सत्यव्रत चतुर्वेदी के सामने आलोक चतुर्वेदी के चुनाव प्रचार में जाने से कतरा रहे है। यहीं हाल भाजपा के नेताओं का है कि जीतेन्द्र सिंह बुन्देला को टिकट न मिलने से खासे नाराज हैं।

पन्ना जिले में पिछले चुनावों की तुलना में इस बार यहां काफी रोचक मुकाबला है। कांग्रेस और भाजपा के बीच चली आ रही चुनावी लड़ाई अब बदलाव की ओर दिख रही है। भाजपा अभी तक पन्ना से कुसुम महदेले को चुनाव में उतारती रही है और कुसुम चुनाव भी जीतती रही पर इस बार उनको भाजपा ने टिकट न देकर भाजपा ने बुन्देलखण्ड में लोधी वोटों को साधने  के लिये  ब्रजेन्द्र प्रताप सिंह  को  चुनाव मैदान में उतारा है। वहीं बसपा ने भी लोधी वोटों में सेंध लगाने के लिये बसपा से महेन्द्र पाल वर्मा को इस बार टिकट दिया है। कांग्रेस में चली आ रही गुटबाजी को तोड़ कर पार्टी की एकजुटता का प्रयास किया जा रहा है इस बार कांग्रेस ने शिवजीत सिंह राजा भैया को चुनाव मैदान में उतारा है। पर इनको जनता के बीच का नेता कम बल्कि कांग्रेस आला कमान वाला नेता माना जाता है। चुनावी प्रचार में जो चल रहा है उसमें कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा सरकार को बदला जा सकता था पर टिकट में जमीनी नेताओं को नजरअंदाज किया गया है इसलिये कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के प्रचार अभियान में कम ही जोश दिखने को मिल रहा है। दतिया जिले में भाजपा और कांग्रेस के बीच बगावती तेवर तो नहीं दिख रहा पर बसपा और सपा की भी अपनी दावेदारी को लेकर खासे उत्साहित है। भाजपा के नेता नरोत्तम मिश्रा की दतिया जिले में अच्छी पकड़ है ऐसे में भाजपा के नेताओं का कहना है कि दतिया में भाजपा का जादू बरकरार है। टीकमगढ़ जिले में भाजपा ने इस बार राकेश गिरी को चुनाव मैदान में उतार कर पूर्व भाजपा विधायक केके श्रीवास्तव की अनदेखी की है। इससे भाजपा में हलचल पैदा हो गई है। पर भाजपा आला कमान के दखल से फिलहाल मामला शांत है पर भाजपा नेताओं का कहना है कि आपसी तनातनी चुनाव परिणाम में न बदल जाये जिससे भाजपा को खासा नुकसान हो सकता है। टीकमगढ़ जिले की खरगापुर सीट पर केन्द्रीय मंत्री व टीकमगढ़ जिले से सटी सीट से सांसद उमा भारती के भतीजे राहुल सिंह चुनाव मैदान में हैं। खरगापुर सीट में भाजपा का माहौल दिख रहा है। पर यहां के लोगों को कहना है  कि चुनाव जीत में यह माहौल कितना तब्दील होता है यह तो चुनाव परिणाम ही बतायेगा। टीकमगढ़ विधानसभा सीट से कांग्रेस ने कांग्रेस के पूर्व विधायक व मंत्री यादवेन्द्र सिंह को चुनाव मैदान में उतारा है। बताया जाता है कि यादवेन्द्र सिंह की ज़मीनी नेता की छवि है ।

सागर जिले में चुनाव बड़ा ही दिलचस्प है। कांग्रेस ने यूथ कोटे से नेमी जैन को चुनाव मैदान में उतारा है तो भाजपा ने अपने विधायक शैलेन्द्र जैन पर भरोसा जताते हुये चुनाव में जीत का भरोसा किया है। सागर जिले के स्थानीय समाजिक कार्यकर्ता पवन जैन का कहना है कि दोनों पार्टियों ने जैन प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतार कर भाजपा के प्रत्याशी शैलेन्द्र के वोट बैंक में सीधे सेंध लगाने का प्रयास किया है।  नेमी जैन काफी समय से कांग्रेस की ओर से चुनाव की तैयारी कर रहे थे। दमोह जिले में भाजपा के नेता व मंत्री जयंत मलैया पर भरोसा जताया है तो कांग्रेस ने राहुल सिंह को चुनाव मैदान में उतारकर जयंत मलैया को टक्कर देने का प्रयास किया है। जयंत मलैया को व्यापारियों का नेता माना जाता है। ऐसे में राहुल सिंह सीधे किसानों और जीएसटी कानून लगने से जो व्यापारी नाराज़ हैं उन व्यापारियों को साध रहे हैं वह दावा कर रहेे हैं कि चुनाव में जो वादे वह कर रहे हैं उनको हर हाल में पूरा किया जायेगा। कांग्रेस के प्रवक्ता व पूर्व मंत्री मध्य प्रदेश पवई विधान सभा सीट से ताल ठोंक रहे  हैं। इसी पवई सीट से भाजपा ने लोधी वोट को साधने के लिये पहलाद लोधी को चुनाव मैदान में उतारा है। मुकेश नायक का कहना है कि भाजपा के शासन काल में केन्द्र और प्रदेश की जनता काफी परेशान हैं मंहगाई और भ्रष्टाचार से ऐसे में जनता अबकी बार भाजपा को हटाकर कांग्रेस की सरकार बनाएगी। दमोह जि़ले से भाजपा के पूर्व सांसद मध्य प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया को भाजपा ने टिकट न देकर भाजपा कार्यकर्ताओं में अच्छा खासी नाराज़गी ली है। रामकृष्ण कुसमरिया बगावती तेवर अपनाये हुये हैं उन्होंने दमोह और पथरिया से दोनों विधानसभा सीट से दावे कर निर्दलीय चुनाव लड़े का फैसला किया है। रामकृष्ण कुसमरिया का कहना कि भाजपा में टिकट का बंटवारा सही नहीं हुआ है उन्होंने दो दशकों से अधिक समय से भाजपा की और यहां के जनता की सेवा की है ऐसे में उनको टिकट मिलना चाहिये पर भाजपा भटक गयी है इसलिये अब वे निर्दलीय चुनाव जीतकर जनता की सेवा करेंगे।

अब बात करते है नये नवेले जिला निवाड़ी की यहां भाजपा , कांग्रेस और सपा के प्रत्याशी चुनाव में एक क्रम से जीतते रहे हैं ऐसे में यहां पर चुनाव पूरी तरह से फंसा हुआ है। जि़ला बनवाने का श्रेय अनिल जैन विधायक लेना चाह रहे हैं वे चुनाव सभाओं में दावा कर रहे है कि सरकार बनेगी तो निवाड़ी में कारखाने लगवाये जायेंगे। सपा दीपक यादव और कांग्रेस ने सुरेन्द्र यादव को चुनाव मैदान में उतार कर यादव वोटों पर सेंध लगाई है। ऐसे में निवाड़ी विधान सभा सीट पर दोनों यादवों की चुनावी लड़ाई में भाजपा को लाभ मिल सकता है। निवाड़ी के काग्रेसी कार्यकर्ता संतोष कुमार का कहना है कि कांग्रेस ने टिकट बंटवारे के समय सारे पहलुओं पर अध्यन किया होता तो यादव वोट का बंटवारा न होता चुनाव एकतरफा परिणाम देता पर टिकट बंटवारा सही नहीं हुआ है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी का कहना है कि मध्य प्रदेश में खास कर बुन्देलखण्ड में कांग्रेस ने टिकट वितरण के दौरान उन बारीक से बारीक जानकारियों को नजरअंदाज किया है जो बड़े  परिणाम जीत के दे सकते थे। उन्होंने कहा कि नितिन चतुर्वेदी ने सपा से टिकट लेकर जो किया है वो ठीक किया है और जो भी वो करते है खुलकर करते है। बसपा के नेता सुरेन्द्र वर्मा का कहना है इस बार बसपा का वोट प्रतिशत ही नहीं बढ़ेगा बल्कि बसपा की भी सीटें बढ़ेगी।  हांलांकि सपा के सुप्रीमों  अखिलेश यादव चुनावी बिसात बिछने से पहले ही छतरपुर में कह चुके है सपा इस बार चुनाव में बुन्देलखण्ड के साथ ही पूरे मध्य प्रदेश में वोट प्रतिशत के साथ विधायकों की जीत को बढ़ाकर पार्टी का विस्तार करेगें।