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वाईटैलिटी महिला हाकी विश्व कप भारत ४० साल बाद अंतिम आठ में

भारत ने लंदन मेें खेले जा रहे वाइटैलिटी महिला विश्वकप के ‘क्रासओवर’ मैच में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए इटली को 3-0 से हरा कर क्वार्टर फाइनल मे प्रवेश कर लिया। यहां उसकी टक्कर आयरलैंड के साथ होगी। भारत के लिए पहला गोल नौवें मिनट में लालरेमसियामी ने ‘रिवर्स फ्लिक’ से किया। दूसरा गोल नेहा गोयल ने तीसरा क्वार्टर खत्म होने से कुछ क्षण पूर्व दागा। नेहा गोयल का ट्रर्नामेंट में यह दूसरा गोल था। तीसरा व अंतिम गोल वंदना कटारिया ने 55वें मिनट में किया।

इससे पूर्व 1978 में भारत क्वार्टर फाइनल में पहुंचा था। अब 40 साल बाद भारत को यह अवसर मिला है। उस समय भारत सातवें स्थान पर रहा था।

मैच के बाद भारतीय टीम की कप्तान रानी रामपाल ने कहा, ‘हम यहां मैच जीतने आए हैं। हम सभी को पता था कि यह मैच कितना महत्वपूर्ण है, पर हमारा सफर अभी खत्म नहीं हुआ है। हमें मौके मिले और हमने गोल किए। अब हमारा सारा ध्यान अगले मैच पर है।’ रानी ने कहा, ‘आयरलैंड के साथ रोमांचक मुकाबला होगा। हम पूल में उनसे खेल चुके हैं पर विश्वकप का क्वार्टर फाइनल एक अलग गेम होगी।

इससे पूर्व पांचवे पेनल्टी कार्नर पर कप्तान रानी रामपाल का गोल भारत को लंदन में खेले जा रहे वाईटैलिटी महिला हाकी विश्व कप के ‘क्रास ओवर ‘ मैच खेलने का अधिकारी बना गया। सातवीं वरीयता वाले अमेरिका को ‘क्रास ओवर’ मैच खेलने के लिए भारत पर जीत दर्ज करना ज़रूरी था जबकि भारत के लिए ‘ड्रा’ भी काफी था। हालांकि भारत ने इस टूर्नामेंट में अभी तक एक भी मैच नहीं जीता पर तीन में से दो मैच बराबर खेल कर वह गोलांतर के आधार पर अमेरिका को पछाडऩे में सफल रहा। 1974 के मैंडिल्यू (फ्रांस) विश्व कप के बाद जहां भारत को चौथा स्थान मिला था, अब 2018 में 44 साल बाद यह अवसर है कि वह अंतिम चार में प्रवेश कर सकता है।

विश्व की एक नंबर की टीम नीदरलैंडस छठे नंबर की जर्मनी, पांचवें नंबर की आस्ट्रेलिया और 16 वें नंबर की आयरलैंड अपने -अपने पूल में शीर्ष स्थान पर रह कर क्वार्टर फाइनल में प्रवेश पा चुके हैं। बाकी चार टीमों का फैसला क्रास ओवर मैचों के परिणामों के आधार पर होगा। यहां बैल्जियम, स्पेन, भारत, इटली, इंग्लैंड और दक्षिएा कोरिया दावेदार हैं। इन क्रास ओवर मैचों में बैल्जियम की टक्कर स्पेन से और विश्व की तीसरे नंबर की अर्जेंटीना का मुकाबला न्यूजीलैंड से होगा।

भारत की टक्क्र टूर्नामेंट में सबसे निम्न रैंकिंग 17 की टीम इटली से है। ध्यान रहे पूल मैच में इटली नीदरलैंडस से 1-12 से हार चुकी है। इस प्रकार भारत के लिए एक सुनहरी अवसर है। यदि भारत इस मैच को जीतता है तो फिर उसका मुकाबला 16वीं रैंकिंग वाली टीम आयरलैंड से होगा। हालांकि पूल मैच में आयरलैंड भारत को 1-0 से हरा चुका है, पर उस मैच में पलड़ा भारत का ही भारी था। इस कारण भारत को एक आसान रास्ता मिला है सेमी फाइनल में प्रवेश का, पर शर्त यह है कि भारतीय टीम गोल करने की अपनी क्षमता का पूरा लाभ उठाए। अब तक खेले तीन मैचों में भारत ने दो हीगोल किए और गोल करने के दसियों मौके गंवाए है। पेनल्टी कार्नर को भी वे गोल में नहीं बदल पाते। भारत की मज़बूती उसकी रक्षा पंक्ति में गोल रक्षक सविता बेजोड़ रही है। उसके अलावा रक्षा पंक्ति में सुनीता लाकड़ा और निक्की प्रधान चट्टान की तरह अडिग रही हंै। यही कारण है कि भारत ने विश्व की दो नंबर की टीम और मेजबान इंग्लैंड और सात नंबर की अमेरिका के साथ 1-1 से ‘ड्रा- खेला। ये दोनों ही मैच ऐसे थे जिनमें यदि रानी रामपाल के फारवर्ड या ड्रैग फ्लिकर गुरजीत कौर थोड़ा भी कर पाती तो भारत जीत दर्ज कर सकता था।

भारत का प्रदर्शन

टूर्नामेंट में भारत की शुरूआत इंग्लैंड के खिलाफ मैच से हुई। इसमें नेहा गोयल के गोल से भारत बढ़त पर रहा, पर अंतिम मिनटों में उसने बढ़त गंवा दी। यहां भारत पेनाल्टी कार्नरों को भी गोल में बदल नहीं पाया। अगला मैच 16 वें नंबर की टीम आयरलैंड के साथ था जिसने अमेरिका को 3-1 से परास्त किया था। इस मैच में 0-1 से पिछड़ा भारत लगातार हमलों और विपक्ष की ‘डी’ पर मंडराते रहने के बावजूद कोई गोल नहीं कर पाया। इस हार से भारत के बाहर होने का अंदेशा हो गया था। तीसरे पूल मैच में अमेरिका के खिलाफ जब 11वें मिनट में वह 0-1 से पिछड़ गया और आधे समय तक चार पेनाल्टी कार्नर गंवा चुका तो लगने लगा थ कि वह बाहर हो जाएगा। पर आधे समय के तुरंत बाद मिले पेनाल्टी कार्नर को कप्तान रानी रामपाल से सीधी हिट से गोल में पहुंचा कर भारत को बराबरी पर ला दिया (1-1)। इसके बाद अमेरिका ने कई हमले किए पर गोल न कर सके। इस प्रकार पूल के तीन मैचों में भारत ने दो ‘डाऊ’ और एक हार के साथ दो अंक हासिल किए। इन तीन मैचों में उसने दो गोल किए और तीन खाए। इस प्रकार उसका गोलांतर रहा माईनस एक। दूसरी ओर अमेरिका ने भी दो मैच ‘ड्रा’ खेले और एक 1-3 से आयरलैंड से हारा और उसके अंक भी थे दो पर वह माईनस दो के गोलांतर पर होने के कारण बाहर हो गया।

क्वार्टर फाइनल में प्रवेश के लिए अब भारत को इटली के साथ खेलना है। उसकी रैंकिंग 17 है और नीदरलैंडस ने उसे 12-1 से हराया है पर यह नहीं भूलना चाहिए कि पूल मैचों में उसने दो एशियाई देशों चीन को 3-0 से और दक्षिण कोरिया को 1-0 से परास्त किया था। 2015 हाकी वल्र्ड लीग सेमीफाइनल में भारत इटली से शूटआउट में जीता था। पर वह पुरानी बात है। पिछले तीन सालों में भारतीय हाकी में भारी सुधार हुआ है और उसकी रैंकिंग 13 से 10 पर पहुंच गई है। इटली पेनाल्टी कार्नर पर गोल करने में मज़बूत है। उसने अब तक के तीन मैचों में जो पांच गोल किए हैं उनमें से दो पेनाल्टी कार्नर से ही आए हैं।

भारत की समस्या

भारत की अब तक की समस्या वही है गेंद के साथ चिपके रहना। जल्दी पास न देना और गैप न बनाना। देखा गया है कि फारवर्ड खिलाड़ी ‘डी’ में पहुंच कर भी शॉट लेने में झिझक दिखाते हैं और मौका चूक जाता है। कई बार तो यह लगता है कि उनमें सोच की कमी है। 23 मीटर की लाइन के आगे जाते ही उनकी गति धीमी हो जाती है और अपने खाली खड़े साथी को देख नहीं पाते।

पेनाल्टी कार्नर लेने में भी उनके पास कोई विकल्प नहीं है। गुरजीत कौर को एक भी ऊंचा फ्लिक करते नहीं देखा। हर शॉट ज़मीनी होता है। उसमें कोई विविधता नहीं होती। अमेरिका के खिलाफ रानी रामपाल का गोल इसलिए हो गया क्योंकि गेंद उछल गई थी। नहीं तो भारत के खिलाफ तो विपक्षी गोल रक्षक पांच चार कदम भाग कर लेट जाता है और हिट की गई गेंद उसके शरीर से टकरा कर रूक जाती है। यदि भारत को जीतना है तो गुरजीत कौर को ऊंचे फ्लिक लगाने होंगे क्योंकि गोलरक्षकों की लेटने की प्रवृति में ये काफी प्रभावशाली साबित हो सकते हैं।

सीबीआई भी बालिका गृह के रख-रखाव पर चकित

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की  मुजफ्फरपुर स्थित बालिका गृह में रह रही बालिकाओं के यौन शोषण के मामले की सीबीआई से जांच कराने की घोषणा करने से एक तरफ विपक्ष की ओर से हो रहा विरोध थमा लेकिन लोकसभा चुनाव के लिहाज से यह मुद्दा काफी लंबा खिंचने को है।

मुजफ्फरपुर में साहू रोड स्थित बालिका गृह में रह रही बालिकाओं के यौन शोषण के मामला का खुलासा मुंबई के टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) की सामाजिक आडिट रिपोर्ट से हुआ। ऐसा इत्तफाक से ही हुआ। संस्थान ने राज्य के कई बालिका गृहों का सामाजिक आडिट किया था। मुजफ्फरपुर स्थित बालिका गृह में बालिकाओं के यौन शोषण की बात सामने आई।  राज्य सरकार को टीआईएसएस ने अपनी रिपोर्ट 27 अप्रैल को भेज दी थी। उस रिपोर्ट में आए तथ्यों की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने 26 मई को उच्चस्तरीय बैठक की और 31 मई को प्राथमिकी दर्ज कराई। उसके बाद तीन जून को बालिका गृह से जुड़े 10 अभियुक्तों  की गिरफ्तारी हुई। एक अभियुक्त फरार है। गिरफ्तार अभियुक्तों में बालिका गृह की देखरेख करने वाली सेवा संस्थान एवं विकास समिति के संचालक और मुजफ्फरपुर से प्रकाशित होने वाले एक दैनिक के संपादक व मालिक ब्रजेश ठाकुर, बालिका गृह के सीपीओ रवि रौशन प्रमुख हैं। पुलिस प्रशासन ने बालिका गृह की तालाबंदी कर दी है। लेकिन कहीं भी ब्रजेश ठाकुर की इस मामले में संलिप्तता लिखित तौर पर मिल नहीं रही है।

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) हरप्रीत कौर और जिले के दूसरे अधिकारियों की ओर से दिए गए तमाम जानकारियों के मुताबिक बालिका गृह में रह रही सात से लेकर 17 साल की उम्र की 44 बालिकाओं में 42 बालिकाओं का डाक्टरी जांच (मेडिकल जांच) कराई गई। इनमें दो बालिकाएं बीमार हैं। डाक्टरी जांच के बाद बता चला कि 29 बालिकाओं के साथ बलात्कार हुआ है। इन बालिकाओं के शरीर पर जलाने और सूई घोपने के निशान मिले। एक बालिका के बयान के मुताबिक एक बालिका की हत्या कर उसके शव को वहीं परिसर में दफना भी दिया गया। पुलिस ने जिले के जज के सामने वहां खुदाई की लेकिन शव नहीं मिला पर हड्डिया जरूर मिली। पर कंकाल मिले। जांच-पड़ताल में जुटे अधिकारियों को दूसरे जरूरी प्रमाण मिले हैें।

बालिका गृह की तालाबंदी करने के बाद वहां की बालिकाओं को पटना, मोकामा, मधुबनी स्थित बालिका गृहों में भेज दिया गया। गौरतलब है कि राज्य में 110 ऐसे गृह हैं जिनमें बेसहारा बालिकाओं, बालकों और महिलाओं को अलग-अलग रखा जाता है।

मुजफ्फरपुर के बालिका गृह में कमरे छोटे-छोटे और बिना खिड़की के हैं। बाहर से प्रकाश नहीं आता। दिन में भी बहुत कम प्रकाश रहता है। रात मेें प्रकाश कम, अंधेरा ज्यादा रहता है। बालिका गृह किसी जेल की कोठरी से कम नहीं दिखता। बालिकाओं को कुछ भी खाने को पर्याप्त तौर पर नहीं दिया जाता और कपड़े भी फटे-पुराने ही मिलते थे जिनसे किसी तरह से तन ढका जा  सकता था। आधा तन फिर भी दिखता ही रहता। इन्हें ऐसी हालत में इसलिए रखा जाता कि वे मजबूरी में वह सब कुछ करें, जो उनसे कहा जाता। किसी ने हिम्मत कर इनकार किया तो उनके साथ मारपीट की जाती।

बालिका गृह के बगल में ही सेवा संकल्प एवं विकास समिति के संचालक व स्थानीय दैनिक के संपादक ब्रजेश कुमार का बड़ा मकान और दैनिक का कार्यालय और छापाखाना है। इस अखबार की 300 प्रतियों छपती हैं लेकिन दावा किया जाता है कि राज्य में यह 60 हजार से भी ज्यादा बिकता है। ब्रजेश कुमार अपने इलाके में प्रभावशाली माने जाते रहे हैें। वे चुनाव भी लड़ चुके हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का चुनाव प्रचार भी किया। नीतीश कुमार उनके घर कई बार आ-जा चुके हैें। उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी से भी उनका मधुर संबंध है। प्रभावशाली नेताओं और सरकारी अधिकारियों से अच्छा संबंध है। कहते हैें किसी नेता और अधिकारियों की आवभगत करने में ब्रिजेशकोई कोताही नहीं होने देते थे। नीतीश कुमार के शासनकाल में वे काफी प्रभावशाली भी बने।

ब्रजेश कुमार के परिवार के लोगों का कहना है कि उन्हें फंसाया जा रहा है। समाज कल्याण विभाग की ओर से दर्ज मामले में भीे उनका या किसी का नाम नहीं है। बालिका गृह में पुलिस जिन बालिकाओं को लाती है, उनका मेडिकल जांच पुलिस पहले से नहीं कराती रही है। ऐसे में  क्या गारंटी की बालिकाओं का पहले यौन शोषण नहीं हुआ। बालिका गृह के सीपीओ रवि कुमार रोशन की पत्नी ने सवाल उठाया कि समाज कल्याण विभाग की मंत्री मंजू वर्मा के पति चंद्रेश्वर किस अधिकार से बाल गृह जाते थे। इस पर मंजू वर्मा ने तुरंत कहा कि जांच में उनके पति दोषी पाए गए तो वे अपने पद से इस्तीफा दे देंगी।

मुजफ्फरपुर बालिका गृह के बालिकाओं के यौन शोषण का मामला सामने आ जाने पर राजद समेत सभी विरोधी पार्टियों ने विधानसभा में और सरकार को बाहर घेरना शुरू किया। उसने मामले की पटना हाई कोर्ट की निगरानी में सीबीआई से कराने की जोरदार ढंग से मांग उठाई। संसद में भी विरोधी पार्टियों ने इस मामले को उठाने में देर नहीं की। शुरू मेें सरकार ने विरोधियों को भरोसा दिया कि मामले पर सरकार सख्ती से कार्रवाई कर रही है। राज्य के सभी बाल गृहों की देखरेख करने की ऐसी व्यवस्था की जाएगी, ताकि ऐसी घटना कभी न हो। मामले में किसी भी दोषी व्यक्ति को नहीं बख्शा जाएगा। पुलिस महानिदेशक केएस द्विवेदी ने तो साफ कह दिया कि राज्य पुलिस की जांच और कार्रवाई से वे संतुष्ट हैं। सीबीआई की जांच की कोई जरूरत नहीं है। राजद की ओर से मामले की जांच कराने के लिए पटना हाईकोर्ट में भी अपील की गई।

राजद और कांग्रेस की ओर से नीतीश सरकार पर लगातार दबाव बढ़ाया गया। केंद्रीय गृह राजनाथ सिंह ने कह दिया कि राज्य सरकार चाहेगी, तो मामले की जांच सीबीआई करेगी। फिर जब समाज कल्याण मंत्री मंजू सिंह के पति पर ऊंगली उठ गई तो सरकार पहले से ज्यादा सांसत में पड़ गई। एकाएक मुख्यमंत्री ने 26 जुलाई को मामले की जांच सीबीआई से कराने का ऐलान कर दिया।

 

बच्चियों की सुरक्षा के बहाने करोड़ों की कमाई

सुजाता चौधरी

मानवता को शर्मसार करने वाली मुजफ्फरपुर बालिका गृह की घटना कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं है। जब भी कभी इस तरह के बालिका गृह में जाने का मौका मिला है, वहां अजीब सा दमघोंटू वातावरण देखने को मिला है। हमेशा लड़कियों को डरी, सहमी, हिरणी सी भयभीत, परकटे पक्षी की तरह फडफ़ड़ाते देखा है इन बालिका गृहों के अधिकतर संचालकों और कर्मचारियों के हाव-भाव भी फिल्मों में तीन नंबर के गुंडों जैसे होते है

संचालकों के इर्द-गिर्द रहने वाले लफंगे बालिका गृह की लड़कियों के साथ जिस तरह की अश्लील हरकतें करते हैं, उसे कोई व्यक्ति कुछ देर रहने के बाद ही अनुभव कर सकता है। इन बालिका गृहों में इन गुंडों के साथ कुछ पदों पर देवियंा भी काम करती हैं जो इन दुष्कर्मों में चंद पैसों और अपनी जीविका के लिए सहायक बन कर स्त्री और मां के महान गौरव को शर्मसार करती है।

एक पुरानी घटना है। एक बालिका गृह की गंूगी बच्ची इशारों में मूंछों पर संकेत देकर मुझे कुछ कहना चाहती थी। जब मैने समझने की कोशिश की तो वहां काम करने वाली देवियों ने हमें समझा दिया कि यह शादी करना चाहती है। मैंने उसकी शादी कराने में अपनी भूमिका का निर्वाह कर कर्तव्य की इतिश्री मान ली, लेकिन आज लग रहा है, हो सकता है, उसके साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा हो।

42 बच्चियों में 29 बच्चियों के साथ इतने दिनों से बलात्कार, वेश्यावृति कराया जाना इससे इंकार करने वाली बच्चियों की पिटाई और उनके शरीर को जगह-जगह से जलाया जाता रहा है। किस समाज में हैं हम? यह पता किया जाना चाहिए कि ये लड़कियां कहां सप्लाई होती थीं। विधायक, मंत्री, अधिकारी और रसूख वाले लोगों के सहयोग के बिना यह जघन्य अपराध चलता नहीं रह सकता।

सरकारें बालिका गृह के नाम पर हर साल कई सौ करोड़ रुपए खर्च करती हैं। क्या सरकार कई सौ करोड़ खर्च कर छोटी-छोटी लउ़कियों से वेश्यालय चलवा रही हैं। मैं थूकती हंू उन सभी बड़े लोगों पर जो इन मासूम बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाने में पशु से भी बदतर हो गए हंै। लानत है उन स्त्रियों पर जो इसमें सहायक हैं। ये राक्षस मासूम बच्चियों को सुरक्षा देने के नाम पर सिर्फ करोड़ों रुपए डकार नहीं रहे बल्कि उनके नाम पर पैसे खा रहे हैं और बच्चियों को वेश्या बना रहे हैं।

‘पद्मावती’ फिल्म के नाम पर पूरे देश में अपनी सेना के जरिए आग लगवाने वाले आज कहां मुंह छिपाए बैठे हैं।

जब चाहूं बन सकती हूं मुख्यमंत्री: हेमा

जानी-मानी अभिनेत्री और मथुरा से सांसद हेमामालिनी का कहना है कि जब वे चाहें तो एक मिनट में मुख्यमंत्री बन सकती हैं। दक्षिण भारत के तमिलनाडुु में जन्मी यह अभिनेत्री कभी यदि उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री बने तो देश की एका के लिहाज से बुरा नहीं।

लेकिन हेमा ने कहा कि इससे मेरा ‘फ्री मूवमेंटÓ रूक जाएगा। अपने निर्वाचन क्षेत्र में उन्होंने ने बहुत काम किया है। उन्हें कृष्णनगर के बृजवासी लोगों के लिए काम करना बहुत अच्छा लगता है। उन्हें बॉलीवुड में मिली प्रसिद्धि की वजह से जाना जाता है। इस प्रसिद्धि की ही महत्वपूर्ण भूमिका उन्हें सांसद बनाने में रही है।

उन्होंने कहा कि मैंने सांसद बनने से पहले भी पार्टी के लिए काफी कुछ किया है। उन्होंने चार वर्ष में अपने निर्वाचन क्षेत्र में सड़क निर्माण और विकास के ढ़ेरों काम किए हैं। जनता मुझे मानती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीबों, किसानों, महिलाओं के कल्याण के लिए काफी काम किया है। देश उनके नेतृत्व में आगे बढ़ रहा है। ऐसा प्रधानमंत्री मिलना मुश्किल है। दूसरी पार्टियों के नेता कुछ भी कहें। हमें ऐसा प्रधानमंत्री मिलना मुश्किल है। दूसरी पार्टियों के लोग कुछ भी कहें लेकिन यह देखना चाहिए कि आखिर इतने कम समय में कागजी कार्रवाई समेत सारी चीजें किसने की और ज़मीन पर विकास ला खड़ा किया।

पद्मश्री से सम्मानित और भरतनाट्यम की नृत्यंागना हेमा मालिनी एक धार्मिक कार्यक्रम में भाग लेने पिछले दिनों मथुरा के पास बासवाड़ पहुंची थी।

होलसेल प्राइस इंडेक्स में वृद्धि यानी ढेर सारी मुसीबतें

भारत की होलसेल प्राइस इन्फ्लेशन (थोक बिक्री कीमत में वृद्धि) फिर सबकी निगाहों में हैं। इसकी एक वजह 54 महीनों में सबसे ज्य़ादा जून 2018 में बढ़ी महंगाई है। होलसेल मूल्य महंगाई में बढ़ती ऊंचाई की वजह पेट्रोल की बढ़ती जाती कीमत, महंगा भोजन दूसरे बनाए गए माल और सेवाओं के चलते हैं। लेकिन होलसेल प्राइस इन्फ्लेशन सबसे बड़ी महंगाई साढ़े सात साल में 5.77 फीसद पर रहता है। ऊंचा रहना देश के लिए चिंता का मुद्दा था।

होलसेल प्राइस से हुई महंगाई में बढ़ोतरी से रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) को भले कोई चिंता नहीं हो क्योंकि आरबीआई रिटेल इन्फ्लेशन पर ही ध्यान देता है क्योंकि तब ब्याज दरें बढ़ानी पड़ती हैं।

कुल मिला कर सारी मोनेटरी पालिसी (मुद्रा नीति) के तमाम सूत्र कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स पर निर्भर करते हैं लेकिन ये होलसेल प्राइस इंफ्लेशन पर भी निर्भर हैं। बहुत कम ही ऐसा होता है कि होलसेल प्राइस इंडेक्स का महत्व न हो।

देश का संकट बढ़ाने में रिटेल इंफ्लेशन का कम हाथ नहीं है। जो ज्य़ादातर उछाल ही दिखती है। सिर्फ मई 2018 में उपभोक्ता मूल्य सूचांक ने चार फीसद की उछाल ली और अब यह पांच फीसद तक हो गया है। चार फीसद पर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक सिर्फ एक फीसद होता है यानी यह खतरे के निशान छह फीसद से एक ही फीसद कम है। ऐसी स्थिति में इस बात का नोटिस लिया जाना कि आरबीआई को रेपो रेट को 25 बेसिस (आधार) प्वाइंट से मई 2018 में बढ़ाना पड़ा। जब उपभोक्ता मूल्य सूचकांक चार फीसद हो गया।

दोहरी मार

ऐसे परिदृश्य में आरबीआई के पास और कोई चारा नहीं होता कि वह ब्याज दर बढ़ाए जिससे महंगाई पर रोक लग सके। आरबीआई को ऐसा कदम इसलिए उठाना पड़ता है जिससे गरीबों को वर्तमान और भविष्य में मूल्यवृद्धि से बचाया जा सके। जब भी ऐसा होता है तो नुकसान उद्योग का होता है क्योंकि इस आरबीआई से अपनी दरों में कटौत की उम्मीद नहीं होती। लेकिन उत्पादन क्षेत्र और सेवा क्षेत्र ज़रूर इसके प्रभाव में आते हंै और वृद्धि दर तो अपने आप प्रभावित होती ही है।

कच्चे तेल की कीमतों में पिछले दिनों बढ़ोतरी के अंदेशे पर ‘तहलकाÓ ने अपनी स्टोरी ‘फयूएल ऑन फायरÓ में चेतावनी दी थी। जून के औद्योगिक उत्पादन के ब्यौरे से साफ होता है कि कितने मैक्रो इकॉनामिक क्रियाकलापों पर जून 2018 में 214 बेसिस प्वाइंट का असर रहा। इन तमाम मुद्दों के चलते महंगाई जो फरवी 2018 में 4.55 प्वाइंट पर भी वह बढ़कर जून में 16.18 फीसद पहुंच गई। आहार, फल और सब्जियों के भाव मई में जहां 2.5 फीसद थे वे जून में 8.12 हो गए। उत्पादन क्षेत्र में भी महंगाई ने खासी उछाल ली। इसमें एलॉय स्टील कोएिटंग, स्टेनलेस, स्टीलट्यूब से तांबे की प्लेट और एल्यूमिनियम शीट्स पर भी महंगाई का असर 17.34 फीसद रहा।

आईएमएफ की भविष्यवाणी

अपनी नवीनतम रिपोर्ट में इंटरनेशनल मोनेटरी फंड (आईएमएफ) ने भारत की वृद्धि दर दस बेसिस प्वाइंट से घटा कर 7.3 फीसद 2018-19 के लिए रखी है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने विकास दर को 30 बेसिस प्वाइंट से 7.5 फीसद पर घटा कर 2019-20 के लिए तया किया गया है। इससे महंगाई कितनी बढ़ेगी जबकि सरकार ने पहले ही खरीफ फसल के लिए अधिकतम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित कर दिया है जिसका असर मंहगाई बढ़ाने पर पड़ेगा ही।

देश के आम चुनाव को साल भर से भी कम समय है। उम्मीद है कि सरकार कई लोकप्रिय योजनाएं घोषित करेगी जिससे मतदाता सत्तासीन दल को अपना वोट दें। इससे और ज्य़ादा वित्तीय घाटा बढ़ेगा और आर्थिक विकास पर असर पड़ेगा। मानसून इस साल भी खासा कमज़ोर है इससे भी अर्थ-व्यवस्था पर असर पड़ेगा।

एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) ने भी भारत में महंगाई का अंदेशा 2018-19 में 4.6 फीसद से बढ़ा कर पांच फीसद आंका है। इसके भी तर्क कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी रु पए की डांवाडोल स्थिति और न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी पर आधारित है। एशियन डेवलपमेंट आउटलुक (एडीओ) ने अप्रैल में अपनी रपट में महंगाई के ऊंचे ग्राफ को दिखाया था जिसकी वजह तेल की ज्य़ादा कीमत और पिछले कुछ महीने में रु पए का डांवाडोल होना और चार जुलाई को घोषित गर्मी की फसलों के लिए घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य है। सरकार इसमें इसलिए दखल देती है जिससे बाजार में कृषि उत्पादकों की रक्षा हो साथ ही कृषि उत्पाद मूल्य में तेजी से गिरावट न आए। आईएमएफ ने भारत के विकास लक्ष्य को दस बेसिस प्वाइंट से घटा कर 7.3 फीसद कर दिया और तेल की बढ़ती कीमतों और आरबीआई की ब्याज दरों में बढ़ोतरी को बताया।

उमीद है अभी भी

एडीवी का कहना है कि भारत अपनी पुरानी विकास दर यानी 2018-19 में 7.3 फीसद 2019-20 में 7.6 फीसद हासिल कर सकता है यदि इसे गुड्स एंड सर्विस टैक्स से 2017-18 में ज्य़ादा आमदनी हो। 2017-18 में यह भारतीय अर्थ-व्यवस्था बढ़ कर 6.7 फीसद हुई। एडीबी का कहना है कि विकास को गति मिली 2017-18 के क्यू 4 में जहां जीडीपी का विस्तार बढ़ कर 7.7 हो गया।

जो रपट एडीबी की है उसमें बताया गया है कि विकास के दूसरे पैमाने हैं उनमें जनता में खपत में बढ़ोतरी और निर्यात से आमदनी और नए जीएसटी टैक्स के चलते काम शुरू करते हुए लगने वाली पूंजी में कमी के बल पर है। निजी खपत में बढ़ोतरी हो सकती है जो 2016 में हुई नोटबंदी से प्रभावित हुआ था। कैपेसिटी यूटीलाइजेशन की दरें पिछले चार सालों में अपनी खासी ऊंचाई पर आ चुकी हैं और इन्हें अब उन फर्म केा मदद देनी चाहिए जो निवेश करना चाहें।

हालांकि कई विचारक इस अंदेशे को नहीं नकारते कि आरबीआई जल्द ही दरों में बढ़ोतरी नहीं करेगा। आरबीआई ने छह जून 2018 को रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाईट बढ़ाए और उसे 6.25 फीसद कर दिया। यह दर बढ़ाने का चार साल में पहला मौका था क्योंकि ऐसा अंदेशा था कि महंगाई बढ़ सकती है।

जो आर्थिक सर्वे 2017-18 का 29 जनवरी 2018 को आया था उसमें अनुमानित था कि प्रति बैरेल दस डालर की बढ़ोतरी होने पर तेल की कीमतों में आए उछाल से आर्थिक विकास 0.2-0.3 फीसद पवाइंट घटता है और यह होलसेल इन्फ्लेशन को 1.7 फीसद प्वाइंट बढ़ाता है और वर्तमान खाते में जो घाटा डालर 9-10 बिलियन का है वह और बढ़ जाता है।

दरअसल हो यही रहा है और सह थ्योरी फिर वही साबित हो रहा है कि होलसेल प्राइस इंडेक्स में बढ़ोतरी का मतलब है अर्थ-व्यवस्था के लिए ढेर सारी मुसीबतें।

आतंकवाद के मुकाबले के लिए ब्रिक्स में सहमति

इस सम्मेलन में भाग लेने वाले देशों में विभिन्न मुद्दों पर बात चीत हुई। आर्थिक मुद्दों से आतंकवाद तक जमकर राय-मश्विरा हुआ। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विभिन्न राष्ट्राध्यक्षो से अलग-अलग मुलाकात की। आतंकवाद पर बातचीत भी हुई लेकिन आतंकवाद के लिए चर्चित गुटों का नाम ब्रिक्स की विज्ञप्ति नें इस बार नहीं आया। जबकि साल भर पहले शंघाई में हुई बैठक के बाद जारी विज्ञप्ति में लश्कर-ए-तोएबा और जैश-ए-मोहम्मद का नाम आतंकवादी संगठनों बतौर शामिल किया गया था।

जोहानिसबर्ग डिक्लेरेशन मे जोरदार तरीके से आतंकवाद से मुकाबला करने की बात तो है लेकिन कोई नाम नहीं दिया गया है। इसमें कहा गया है ब्रिक्स में शामिल कुछ देशों में अब भी विभिन्न रूपों में जारी आतंकवादी घटनाओं की निंदा करते हैं। आतंकवाद को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ के तत्वावधान में मजबूत अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत ऐसा मिला जुला प्रयास होना चाहिए जिससे आतंकवाद का मजबूती से मुकाबला किया जा सके। हम सभी देशों को आतंकवादी गतिविधियों के लिए अपनी सीमाओं से धन न देने की पुरजोर व्यवस्था हो। सभी देश मिलजुलकर आतंकवाद का मुकाबला करें साथ ही वे लोगों के दिमाग को उग्रवाद की ओर ले जाने के प्रशिक्षण को बंद कराएं, उन्हें मिलने वाले धन को रोकें और उन तक पहुंचने वाले हथियार को रोकें। यह व्यवस्था भी हो कि नवीनतम सूचना तकनॉलोजी उन तक न पहुंच सके।

इससे पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिन कर यात्रा पर रवांडा पहुंचे थे। वहां उन्होंने गरीब गांव वासियों को 200 गाएं तोहफे में दी। इसका मकसद वहां के राष्ट्रपति पॉल कगामा के गरीबी खत्म करो और बच्चों में कुपोषण के खत्मे के कार्यक्रम की सहायता करना था। कगामा ने 2006 में गिरिंका कार्यक्रम शुरू किया था। इसके तहत हर गरीब परिवार को एक गाय दे कर उसे वित्तीय सुरक्षा प्रदान की जाती है।

नरेंद्र मोदी ने गिरिंका कार्यक्रम की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत के लोग यह देख कर हैरान हो जाएंगे की रवांडा में गऊओं को कितना महत्व दिया जा रहा है और इसे देश में आर्थिक समृद्धि लाने का स्त्रोत समझा जाता है।

वह भूख से नहीं बीमारी से मरा होगा

जो इस नश्वर संसार में आया है उसे एक दिन जाना ही है। यही एक सत्य है। कैसे जाना है? यह पता नहीं। हमारे देश में ज़्यादातर लोग सड़क और रेल हादसों में मरते हैं। कुछ बीमारी का शिकार होते हैं। कई आत्महतया कर लेते हैं। कुछ दंगों का शिकार हो जाते है। पर कहीं ज़्यादा बवाल नहीं होता। पर जब कोई भूख से मरता है तो हंगामा हो जाता है। बात भी सही है जिस देश में अन्न की बहुतायत हो वहां लोगों का भूख से मरना स्तब्ध कर देता है। विश्वास नहीं होता। सारा प्रशासन यह साबित करने पर लग जाता है कि मौत भूख से नहीं बीमारी से हुई है।

जब डाक्टर पोस्टमार्टम के बाद कह दे कि मृतक ने आठ दिनों से कुछ नहीं खाया था, तो बेचारे मेजिस्ट्रेट को अपनी रपट में मौत का कारण दस्त लगना बताना पड़ता है। साथ ही कुछ सवाल खड़े करने पड़ते है, कुछ शंकांए पैदा करनी पड़ती है, जैसे किसी ने विष दे दिया होगा, अभी विसरा की रिपोर्ट आनी है। तभी पता चलेगा कि असलयित क्या है। प्रशासन इसे हैजा बता दे या कोई और भंयकर बीमारी पर वह इस बात को कभी सहन नहीं करेगा कि मौत भूख से हुई। पर न मानने से क्या असलीयत बदल जाती है।

हमारी बिरादरी सही है। हम कभी भूख से नहीं मरते क्योंकि हमें चारा या घास खाने के लिए राशनकार्ड की ज़रूरत नहीं होती। न कार्ड होते हैं, न दूसरी जगह जाने पर उन्हें रद्द करवाना पड़ता है और न नए बनवाने पड़ते हैं हमारा ‘रेजिडेंस प्रूफÓ भी कोई नहीं पूछता। हमें जहां हरियाली दिखी वहीं पहुंच जाते है चरने। पर ये गरीब लोग चाहे उस आंगनवाडी के पास ही रहे जो गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा और मुफ्त भोजन देनेे के लिए बने हैं, पर जिसके पास राशन कार्ड नहीं, उसे राशन नहीं जिसे राशन नहीं, उसे भूख अपने जबड़े में ले ही लेती है। पर ऐसे गरीबों के मरने से किसे क्या फर्क पड़ता है। उल्टा देश में गरीबों की संख्या कम होती है।

हमारे समाज में लंगर लगाने और भंडारे चलाने की एक परंपरा है। पर बदकिस्मती से इसका लाभ भी बहुत गरीब लोग नहीं उठा सकते। इंसान शायद ज़्यादा पढ़ा-लिखा है इसलिए उसके पास ई-मेल, व्हट्स एप, इंटरनेट से फुर्सत नहीं वह ‘फेसबुकÓ पर अपने कथित मित्रों की संख्या बढ़ता है। वह गरीबी और भुखमरी के आंकड़े नहीं देखता, पर हम जाहिल जानवर हैं, धोबी का बोझा ढोते हैं पर हमें मालूम है बाबर की मौत हमंायू से 26 साल पहले हो गई थी, हमें मालूम है तक्षशिला कहां है, हम जानते है कौन सा संत किस शताब्दी में पैदा हुआ। हमें मालूम है देश में सबसे बड़ा अकाल 1935 में पड़ा था। 1968 में राजस्थान में अकाल पड़ा। राजस्थानी लोग साहसी हैं वे पूरे देश में रोज़ी रोटी तलाश करने लगे। बंगाल के कई नगरों में तो वे आज स्थानीय लोगों से भी ज्य़ादा तादाद में हैं। वे वहां की अर्थव्यवस्था चला रहे हैं। रूसी क्रांति के नायक लेनिन के बारे में कहा जाता है कि वे उतना ही खाना लेते थे जितनी ज़रूरत होती थी। माओ तो यदि खाना खाते समय समझ जाते कि खाना ज्य़ादा है तो उसे कटोरी में भरकर अपनी जेब में रख लेते और जब भूख लगती तभी खाते। हमारे यहां तो बचा खाना जानवरों को खिला दिया जाता है। शहरों में अन्न फेंकना सभ्यता मानी जाती है। क्या इससे देश का विकास होता है? विकास तो क्या पिछले 71 सालों में देश में व्यवस्था नहीं बना पाए जिसमें कोई भूखा न सोए। हमारे अध्यात्मिक लोगों का भगवान पर अटल विश्वास है। वे कहते हैं, ”वो (भगवान) भूखा उठाता है, पर भूखा सुलाता नहीÓÓ। फिर आठ दिन तक भगवान कहां था हमें तो पता नहीं।

जानवरों के अस्तित्व को मान्यता एक ऐतिहासिक फैसला

Indian tourists ride horses in rented fur coats at Snow Point on Rohtang Pass, Manali, India

नैनीताल में स्थित उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नेपाल और भारत के बीच घोड़ों की गतिविधियों को सीमित करने वाली एक याचिका पर सभी जानवरों जिनमें पक्षी और मछलियां तक भी शामिल हैं, के कानूनी अस्तित्व को मान्यता दी है। जानवर कल्याण और जानवरों के अधिकारों की वकालत करने वालों ने इस फैसले पर जश्न मनाया है।

जानवरों के अधिकारों को पहचान देना एक महत्वपूर्ण बात है। इससे भी ज्य़ादा ज़रूरी है मानव को जानवरों की देखभाल के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना। सुप्रीमकोर्ट ने ‘परवेंशन ऑफ क्र्रूऐलिटी टू एनीमलस एक्ट 1960 की धारा के तहत जानवरों की देखभाल को अनिवार्य बताया है। जानवर कल्याण बोर्ड बनाम-ए-नागराज और दूसरे मामले की सुनवाई करते हुए देश की सर्वाेच्च अदालत ने कहा है कि जानवरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी मानव की है। अदालत ने कहा कि जानवरों के अधिकारों और मानव जिम्मेदारी को एक सामजस्य में समझना चाहिए।

यह घोषणा जानवरों के साथ हमारे संबंधों पर आत्मनिरीक्षण करने का अवसर है जिसे हम दुनिया के साथ सांझा कर सकते हैं। ज्य़ादातर संबंध उनके शोषण का माध्यम हैं। हम लोग जानवरों के साथ बातचीत के संबंध भी तब बनाते हैं जब हम उनको मारने के लिए ले जाते हैं या जब हम उन्हें वैज्ञानिक प्रयोग के लिए इस्तेमाल करते हैं। हम व्यापार के लिए उनकी संख्या बढ़ाते हैं और उनकी प्रकृति में भी दखल देते हैं।

जानवरों को वस्तुओं के रूप में माना जाता है जिसकी हमारे पास उपयोग करने के अलावा और कोई उपयोगता नहीं। यह निर्णय जानवरों को जीवित और संवेदनशील प्राणियों के रूप में पहचानने के लिए शुरूअत की है। शिक्षा प्रणाली में ऐसी साम्रगी शामिल होनी चाहिए जो सभी जीवित प्राणियों के लिए रु चि और सम्मान पैदा करे। इन उद्देश्यों को ज्ञान प्रदान करके सबसे अच्छा उद्देश्य है कि जानवरों को जीवित, संवेदनशील जीवों के रूप में

मानता है कि ये मनुष्यों के साथ पर्यावरण सांझा करते हैं।

इस ऐतिहासिक फैसले को साकार करने के लिए मानव की सोच में एक स्थायी और व्यापक बदलाव ज़रूरी है। इसमें जानवरों का शोषण और उपेक्षा को रोकने और प्राकृतिक रहन सहन की रक्षा के लिए मानव चेतना और व्यवहार में एक परिवर्तन आना चाहिए।

भारत सरकार को गैर-मानव जानवरों के प्रति अपने मौलिक कर्तव्यों को पहचानना चाहिए, जैसा कि धारा 48ए और 51ए(जी) में निहित है और इस देश के न्यायालयों द्वारा दोहराया गया है और पत्र और भावना में पशु कल्याण कानूनों को लागू किया गया है। केवल तभी हम राष्ट्र के रूप में जीवन के पूरे समुदाय की रक्षा और संरक्षण कर सकते हैं।

नरेंद्र मोदी का अमर रथ

अमर सिंह बम-बम हैं। दुकान चल गई है। देश के तमाम उद्योगपतियों को मालूम हो गया है कि ‘अमर सिंहजीÓ अब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ब्रांड एंबेसडर हैं। प्रधानमंत्री निवास से लेकर वित्त मंत्री पीयूष गोयल, धर्मेंद्र प्रधान, अमित शाह सबके यहां उनकी फोन लाइन जुड़ गई होंगी। सचमुच वक्त और भाग्य का कमाल देखिए कि जिस प्रधानमंत्री ने यह कसम खा कर दिल्ली का तख्त संभाला था कि वे दिल्ली के पॉवरब्रोकर, इनसाइडरों, दलालों को अपने और अपनी सरकार के पास फटकने नहीं देंगे वे नरेंद्र मोदी अब अमर सिंह, अमिताभ बच्चन, अनिल अंबानी की उस तिकड़ी से घिरे दिख रहे हैं, जिसका अर्थ पूरा देश कई दशकों से जानता है।

उस नाते कौतुक अमर सिंह का नहीं है, बल्कि नरेंद्र मोदी, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ का है! इनके आंगन में यदि अमर सिंह अब ‘अमर सिंह जीÓ हुए हैं और चुनावी उपयोग के लिए अमर रथ आ खड़ा हुआ है तो क्या यह बदले वक्त का गवाह नहीं है? 29 जुलाई 2018 का दिन अमर सिंह के जीवन का अभूतपूर्व दिन था तो नरेंद्र मोदी-अमित शाह की राजनीति में भी मोड़ था। एक झटके में नरेंद्र मोदी ने देश को बताया कि उन्हें अब अपने पर भरोसा नहीं। वे 2019 के लोकसभा चुनाव में अमर सिंह के रथ पर बैठ कर उत्तर प्रदेश का महाभारत लड़ेंगे।

सोचो, भगवा वस्त्रधारी योगी आदित्यनाथ, कथित हिंदू चाणक्य अमित शाह और हिंदुओं के आज के पृथ्वीराज चौहान को अपने आप पर हिंदू बनाम मुस्लिम कराने का वह भरोसा नहीं है, जो 2014 और 2017 में 56 इंची छाती से खम ठोंक पैदा किया गया था। तभी तो अमर सिंह के रथ को बनवा कर उससे ‘बुआ-बबुआÓ एलायंस के आगे मोर्चेबंदी कराई जा रही है और हल्ला बनाया जा रहा हैं कि ‘अमरसिंहजीÓ का जीवन नरेंद्र मोदी को समर्पित है!

संदेह नहीं जंग में सब कुछ जायज होता है। सो, मोदी-शाह-योगी क्यों न उत्तर प्रदेश में अमर सिंह का उपयोग करें? मगर ऐसा होना अपने आपमें प्रमाण है कि उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-लोकदल-कांग्रेस के एलायंस को मोदी-शाह कितना खतरनाक माने हुए हैं, और इसकी चिंता में नरेंद्र मोदी किसी को भी गले लगाने को तैयार हैं। वे कुछ भी करेंगें। मायावती, अखिलेश, अजित सिंह, राहुल गांधी को नंगा कराने के लिए अमर सिंह जैसे कपड़े खींचने वाले, काटने वाली असंख्य ताकतों को आगे ऐसे दौड़ा दिया जाना है, जिससे राजनीति की तमाम हदें टूट जानी है। इसलिए 29 जुलाई 2018 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ में कारोबारियों के सम्मेलन में जो कहा उसके गंभीरता से अर्थ बूझने चाहिए। एक वाक्य से अमर सिंह को मायावती-अखिलेश-राहुल के पीछे छोड़ दिया- सामने अमर सिंह जी बैठे हैं, सबकी हिस्ट्री खोल कर रख देंगे।

और जान लें अमर सिंह हिस्ट्री खोलने में ही नहीं, बल्कि घर में कलह पैदा करने, पार्टियों में तोडफ़ोड़ करने, चरचे-परचे-खरचे और ग्लैमर का वह कीचड़ बनाने में सौ टका समर्थ हैं, जो मोदी-शाह के लिए आगे कमल खिलवा दे!

उस नाते अमर सिंह का ‘अमर सिंहजीÓ होना प्रमाण है कि 2014 के बाद गंगा-यमुना में कितना पानी बह गया है और मोदी-शाह-योगी यूपी में विपक्ष का एलायंस न होने देने के लिए कितनी तरह के जतन करेंगें! अमर सिंह एंड पार्टी की ताकत से मोदी-शाह को उत्तर प्रदेश में कितना धक्का मिलता है यह तो वक्त बताएगा लेकिन इतना तय मानें कि अमर सिंह मौका नहीं चूकेंगें। उनका बड़बोलापन चालू हो गया है। वे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पटा कर लखनऊ में शासन, अफसरों और मंत्रियों पर बहुत जल्दी अपनी पकड़ बना लेने वाले हैं। यों भी योगी के पास सलाहकार नहीं हैं। इसलिए वे अपनी ठाकुरशाही में ठाकुर अमर सिंह से राजकाज की शिक्षा-दीक्षा न लें यह संभव ही नहीं है। आगे संभावनाएं असंख्य हैं। अमर सिंह चुनावी पैकेज डील बना कर खुद अखिलेश यादव के खिलाफ खड़े हो सकते हैं, वह जया प्रदा को भी भाजपा के चुनाव चिन्ह पर आजम खान के खिलाफ चुनाव लड़वा सकते हैं तो अजित सिंह को तोडऩे के लिए उनकी पुरानी महिला मंडली को सक्रिय बनवा सकते हैं।

हां, अमर सिंह कलाकार हैं तो क्षमतावान भी। आखिर चंद्रशेखर की चिरकुटी से नरेंद्र मोदी के ‘अमर सिंहजीÓ बनने का अमर सिंह का सफर यूं ही नहीं हुआ। यह अलग बात है कि 40 साल के उनके इतिहास का एक निचोड़ यह भी है कि जिस-जिस के साथ अमर सिंह रहे, उनके घरों में भाई-भाई में झगड़े हुए। कलह हुई और अंतत: सब डूबे। जिस घर में उनके पांव पड़े उसमें कलह के साथ घर टूटा और नेता ने सत्ता भी गंवाई! मगर हां, अमर सिंह की अपनी दुकान जरूर चमकी रही। दुकान के बोर्ड पर विविध ब्रांड जुड़ते गए।

क्या वह इतिहास नरेंद्र मोदी, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के भगवा घरों में अमर सिंह के पांव रखे जाने से दोहराया नहीं जाएगा?

जवाब वक्त देगा। इतना तय मानें कि अमर सिंह उधम मचाने में कसर नहीं रख छोड़ेंगे। बहुत संभव है अपनी बातों, अपनी राजनीति से वे उत्तर प्रदेश में अब योगी आदित्यनाथ के बाद भाजपा के नैरेटिव बनवाने वाले नंबर दो के नेता बन जाएं। यों भाजपा अध्यक्ष उन्हें पार्टी में औपचारिक तौर पर शामिल करें, यह संभव नहीं लगता है। आखिर कुछ भी हो उत्तर प्रदेश को, उसकी तासीर को, उसके कलाकार अमर सिंह को अमित शाह बखूबी, जानते समझते हैं। यदि अमर सिंह भाजपा में शामिल हुए और योगी आदित्यनाथ के साथ ठाकुर नजदीकी में कर्ता-धर्ता बन गए तो अमित शाह के कंट्रोल में फिर क्या रहेगा?

हां, तय मानें नरेंद्र मोदी के जरिए योगी आदित्यनाथ का कर्ता-धर्ता बनना अमर सिंह की दीर्घकालीन उड़ान का टेकऑफ है। वे योगी को अहसास करा देंगें कि आपका भगवा चेहरा मोदी-शाह की मजबूरी है। आपके कारण प्रदेश में हिंदू-मुस्लिम होता है। आप हिंदुओं के, भगवा राजनीति के असली आईकॉन हैं। आप ही आगे के प्रधानमंत्री हैं और आपको ऐसे राजनीति करनी है, जिससे आपके खास लोग टिकट पाएं। वे जीतें और आप अखिल भारतीय इमेज पा कर देश की राजनीति में निर्णायक बनें।

जान लें यह सब अमर सिंह की बेसिक फितरत है। चंद्रशेखर, माधव सिंह सोलंकी, माधवराव सिंधिया, बच्चन परिवार से ले कर मुलायम सिंह यादव सबके यहां एंट्री बनते ही अमर सिंह ने हमेशा पहले इर्द-गिर्द जमे हुए लोगों को उखाड़ा। नेता को अपने ऊपर निर्भर बनाया। उसके चरचे, परचे, खरचे और ग्लैमर का ऐसा बंदोबस्त किया कि उसके दरबार का सौ टका टेकओवर अमर सिंह का बना। वैसा योगी आदित्यनाथ का आगे  हो सकता है और ‘अमर सिंहजीÓ की उपयोगिता देख नरेंद्र मोदी ने अपने प्रधानमंत्री निवास में यदि उनको पूरी एक्सेस दे दी तो वह वक्त अकल्पनीय नहीं है कि अमित शाह भी मोदी के यहां से आउट हो जाएं और ‘अमर सिंहजीÓ ही चुनाव के बाद उनके लिए सहयोगी पार्टियों के जुगाड़ के कर्ता-धर्ता बनें!

और वैसा होना बड़ा मजेदार होगा। मैं अमर सिंह को चिरकुटी दिनों से बहुत गहराई से जानता हूं इसलिए अपना मानना है कि नरेंद्र मोदी ने 29 जुलाई 2018 के दिन भारत के नंबर एक ऐयार को ऐसे पंख लगाए हैं कि मायावती, अखिलेश, अजित सिंह, राहुल गांधी को वे चाहे जैसे घायल करें लेकिन असली खेल तो भाजपा के भीतर योगी के टेकओवर या नरेंद्र मोदी के टेकओवर का होगा। देखते जाएं, क्या-क्या गुल खिलते हैं!

साभार: नया इंडिया

निहत्थे संन्यासी पर हमला

स्वामी अग्निवेश के साथ झारखंड के एक जिले भाकुड़ में उन्यत्त भीड़ ने जो व्यवहार किया है वह इतना शर्मनाक और वहशियाना है कि उसकी भत्र्सना के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। एक संन्यासी पर आप जानलेवा हमला कर रहे हैं और ‘जय श्रीरामÓ का नारा लगा रहे हैं।

आपको राम देखते तो अपना माथा ठोंक लेते। आप तो खुद को रावण की औलाद सिद्ध कर रहे हैं। आप अपने आपको हिंदुत्व का सिपाही कहते हैं। अपने आचरण से आप हिंदुत्व को बदनाम कर रहे हैं। क्या हिंदुत्व का अर्थ कायरपन है?

इससे बढ़ कर कायरता क्या होगी कि 80 साल के निहत्थे संन्यासी पर उन्मादी भीड़ टूट पड़े? उसे डंडे और पत्थरों से मारे? उसके कपड़े फाड़ डाले, उसकी पगड़ी खोल दे। उसे जमी पर पटक दे।

स्वामी अग्निवेश पिछले 50 साल से मेरे अभिन्न मित्र रहे हैं संन्यासी बनने से भी पहले से। वे तेलुगुभाषी परिवार की संतान हैं और हिंदी के कट्टर समर्थक हैं। वे महॢष दयानंद के अनन्य भक्त हैं। वे कट्टर आर्यसमाजी हैं। संन्यास लेने से पहले वे कोलकाता में प्रोफेसर थे। अत्यंत संपन्न और सुशिक्षित परिवार के बेटे होने के बावजूद वे संन्यासी बने।

ऐसे व्यक्तित्व को पाकिस्तान का एजंट कहना कितनी बड़ी मूर्खता है। उन्हें गोमांस-भक्षण का समर्थक बताना किसी पाप से कम नहीं। उन्होंने और मैंने हजारों आदिवासियों, ईसाइयों और मुस्लिम भाइयों को मांसाहार लेने से विरत किया है। स्वामी अग्निवेश को ईसाई मिशनरीयों का एजंट बताने वाले यह नहीं जानते कि अकेले आर्यसमाज ने विदेशी मिशनरियों को भारत से खदेड़ा।

अग्निवेश ने जिस शिष्टता से उन हमलावर प्रदर्शनकारियों को मिलने के लिए अतिथिगृह में अंदर बुलाया यह उनकी सहजता थी। लेकिन उसका जैसा जवाब उन्होंने दिया वह जंगली जानवरों की करतूत थी। स्वामी के कुछ विचारों और कामों से मैं भी सहमत नहीं हो पाता। उनकी आलोचना भी करता हूं, लेकिन उनके साथ जानवरपन करने का अधिकार किसी को नहीं है।

यदि ये हमलावर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, और भाजपा से जुड़े हैं तो मैं मोहन भागवत और अमित शाह से कहूंगा कि वे इन्हें फौरन अपने से जुड़े संगठनों ने निकाल बाहर करें और इन्हें कठोरतम सजा दिलाएं।

ऐसे ही लोगों के खिलाफ कठोर कानून बनाने की सलाह ही सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को दी है। लेकिन सरकार का हाल किसे पता नहीं है। वह किंकर्तव्यविमूढ़ है। उसे पता ही नहीं है कि उसे क्या करना है। देश में उन्मादी भीड़ द्वारा हत्या की कितनी घटनाएं हो रही हैं लेकिन दिन-रात भाषण झाडऩे वाले हमारे प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर अपना मुंह खोलने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते। यदि संघचालक मोहन भागवत भी चुप रहेंगे तो राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के बारे में जो शशि थरूर ने कहा है उसे सच्च होने में देर नहीं लगेगी।

आडवाणी से मिलीं, सोनिया और केजरीवाल से मिलेंगी ममता

असम में नेशनल रजिस्‍टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) की सूची में ४० लाख लोगों के भारतीय नागरिक न होने के दावे के वाद सक्रिय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अब राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हो गयी हैं। वे पहले ही इस मामले में गृह युद्ध छिड़ने का खतरा बता कर इसका मुखर विरोध कर चुकी हैं। अब ममता आज यानी बुधवार को दिल्ली में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के अलावा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से भी मिलेंगी जबकि वे पहले ही राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता शरद पवार से मिल चुकी हैं।

ममता दिल्ली पहुँच चुकी हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक ममता जब संसद परिसर में थीं तो उन्होंने भाजपा मार्गदर्शक मंडल के सदस्य पूर्व उपप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के पाँव छुए और उनसे बातचीत की। वे आडवाणी से उनके संसद भवन के कमरा नंबर ४ में मिलीं और करीब १५ मिनट उनके साथ रहीं।

ममता इस बहाने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश करती दिख रही हैं। आज राज्य सभा और लोक सभा दोनों में इस मसले पर खूब हंगामा हुआ है। लोक सभा हंगामे के बाद १२ बजे तक स्थगित की गयी। उधर ममता अब यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी से मुलाकात करेंगी। दिलचस्प यह है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी इस मसले पर ममता बनर्जी के साथ दिख रहे हैं। केजरीवाल के आज शाम ममता से मिलने की सम्भावना है।

पिछले कुछ महीनों से विपक्षी एकता की कोशिशों के बीच नेशनल रजिस्‍टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) की सूची एक बड़ा मुद्दा बन गया है। केजरीवाल और ममता की आज की संभावित  मुलाकात राजनीतिक हलकों में तीसरे मोर्चे के गठन की गंभीर कोशिश मानी जा रही है। सम्भावना है कि इस मुलाकात में दोनों नेता राजनीतिक मसलों पर भी बात करेंगे। दरअसल लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष गंभीरता से एक होने की कोशिश में जुटा है ताकि भाजपा और मोदी के खिलाफ मजबूत साझा मोर्चा बनाया जा सके।

कुछ राजनीतिक हलकों में बेस स्तर पर यह चर्चा रही है कि राहुल गांधी दरअसल कांग्रेस को २०१९ नहीं अपितु २०२४ के लिए तैयार कर रहे हैं। ऐसे दूसरे दलों के बड़े नेता, जिनमें ममता भी शामिल हैं, अपने लिए पीएम पद की संभावनाएं देख रहे हैं। ममता एनसीपी, शिवसेना, टीआरएस, टीडीपी, आरजेडी और सपा के नेताओं के भी संपर्क में हैं। उनके मुखर होने के पीछे बड़ा कारण एनआरसी के मसले पर कांग्रेस का मुखर न होना भी है।

उधर भाजपा अब असम के बाद पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों में भी एनआरसी की मांग करने लगी है जिससे यह मुद्दा पूरे देश में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। जबकि ममता का कहना है कि  ”आज असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर जो कुछ हो रहा है उसमें बंगाली लोग ही नहीं पिस रहे। इसमें अल्पसंख्यक, हिंदू, बिहारी सब को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। 40 लाख से ज्यादा लोगों को आज अचानक उनके अपने ही देश में रिफ्यूजी बना दिया गया है जो एक बड़ी चिंता का विषय है।”