Home Blog Page 1264

और कारवां गुज़र गया

”अब तो मज़हब कोई ऐसा चलाया जाए

जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए

आग बहती है यहां गंगा में झेलम में भी

कोई बतलाए कहां जाके नहाया जाए’’

इन शब्दों के रचयिता महान कवि व गीतकार गोपालदास ‘नीरज’ देश के मौजूदा हालात का दर्द अपने सीने में लिए चले गए। उनकी कलम ने मानवीय संवेदनाओं को बार-बार झिंझोरा। जहां एक ओर वे सामाजिक व्यवस्था के ताने बाने से बगावत करते नज़र आते हैं तो दूसरी ओर वे बेहद रोमानी हो जाते हैं। वे लिखते हंै-

”लिखे जो खत जो तुझे, वे तेरी याद में

हज़ारों रंग के नज़ारे बन गए’’

उनके नगमों में प्रेम अपनी उच्चतम अवस्था में दिखाई पड़ता है। उसमें एक पवित्रता दिखती है। कोई फूहड़पन नहीं। इसके साथ उनकी कविताओं, गज़लों और नगमों में सादापन साफ झलकता है। उनके शब्द भी सादे हैं, आम आदमी को समझ आते हैं। हर मानव उनसे प्रभावित होता है।

 उनकी कल्पना की उड़ान असीमित थी। एक जगह वो कहते हैं-

”हाथ थे मिले कि ज़ुल्फ चांद की सवार दूं

होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार लूं

और सांस यंू कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूं’’

किसी भी शायर या कवि के लिए उसकी कल्पना की उड़ान बहुत मायने रखती है। इसके साथ ही नीरज में एक क्रांतिकारी भी नज़र आता है। वह जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाता है। उस क्रांतिकारी की ये पंक्तियां ही सारी बात कह देती हैं। अपनी एक गज़ल में वे लिखते हैं-

”दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था

तुम्हारे घर का सफ़र इस कदर सख्त न था’’

”जो ज़ुल्म सह के भी चुप रह गया, न खौल उठा,

वो और कुछ भी हो मगर आदमी का रक्त न था’’

 यह विद्रोही भावना शायद उन्हें अपने जीवन के आरम्भ से ही मिली थी। बेहद मुफ्लिसी में अपने जीवन की शुरूआत करने वाले नीरज ने भूख को बहुत करीब से देखा था। उनका संघर्ष सभी के लिए एक प्रेरणा है। उनकी सोच में हमेशा सकारात्मकता रही है। वे कभी हतोत्साहित नज़र नहीं आते। उनकी पंक्तियां उत्साह बढ़ाती हैं। समय, काल और व्यवस्था को चुनौती देती है-

”है बहुत अंधियारा अब सूरज निकलना चाहिए

जिस तरह से भी हो यह मौसम बदलना चाहिए

छीनता है जब तुम्हारा हक कोई, उस वक्त तो

आंख से, आंसू नही शोला निकलना चाहिए’’

ऐसा नहीं है कि नीरज ने जीवन संघर्ष को एक ही ऐनक से देखा हो। उन्होंने संघर्ष में अध्यात्मवाद को भी महत्व दिया और धर्मांघता पर भी चोट की। वे लिखते हैं-

”जितना कम सामान रहेगा

उतना सफर आसान रहेगा

जितनी भारी गठरी होगी

उतना तू हैरान रहेगा’’

इसी $गजल में अगले शेयर की बानगी देखिए-

”जब तक मंदिर और मस्जिद हैं

मुश्किल में इंसान रहेगा’’

यहां अचानक अध्यात्मवाद और मोक्ष की बात करते-करते नीरज सांप्रदायिकता पर चोट कर जाते हैं। इतना ही नहीं वे देश के रहबरों पर भी तंज कसते हैं। साथ ही समाज में दबे कुचले लोगों को भी संघर्ष के लिए प्रेरित करते हैं। वे कहते हैं-

”खुशबू सी आ रही है इधर जाफरान की

खिड़की खुली है गा़लिबन उनके मकान की

हारे हुए परिंदे ज़रा उड़ के तो देख

आ जाएगी ज़मीन वे छत आसमान की’’

इसके पश्चात् उनका तंज आता है देश के नेताओं पर जब वे कहते हैं-

”बुझ जाए सरेआम ही जैसे कोई चिराग

कुछ यूं है शुरूआत मेरी दास्तान की

ज्यों लूट ले कहार ही दुल्हन की पालकी

हालत यही है आज कल हिंदुस्तान की’’

नीरज का जन्म चार जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश में इटावा महेवा के निकट पुरावली गांव में हुआ। उनका पूरा नाम गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ था। उन्होंने जो भी लिखा अपने ‘कलम’ के नाम ‘नीरज’ के नाम से लिखा। उनकी रचनाओं के लिए उन्हें 1991 में ‘पद्मश्री’ और 2007 में ‘पदम भूषण’ के खिताबों से नवाजा गया। वे धर्मसमाज कॉलेज अलीगढ़ में प्रोफेसर भी रहे। उनकी बहुत सी कविताएं और गाने हिंदी फिल्मों की शोभा बने और बहुत ही मकबूल हुए। उनमें 1965 में बनी फिल्म ‘नई उम्र की नई फसल’ का यह गाना ‘और हम खड़े-खड़े गुबार देखते रहे’ आज भी नई पीढ़ी के होठों से सुना जा सकता है।

नीरज शायद एकमात्र ऐसे गीतकार हैं जिन्हें तीन साल लगातार ‘फिल्म फेयर’ पुरस्कार मिलते रहे। 1970 में उन्हें फिल्म ‘चंदा और बिजली’ के गाने ‘काल का पहिया घूमे रह भैया’ 1971 में फिल्म ‘पहचान’ के गाने ”बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं, आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं’’ के लिए और 1972 में राजकपूर की सबसे मशहूर फिल्मों में से एक ‘मेरा नाम जोकर’ के इस गाने ”ए भाई ज़रा देख के चलो, आगे भी नही पीछे भी, ऊपर ही नहीं नीचे भी’’ के लिए इस पुरस्कार से नवाजा गया। इनके अलावा उनके छह सर्वश्रेष्ठ फिल्मी गानों में-

”फूलों के रंग से

दिल की कलम से

तुझको लिखी रोज़ पाती’’ (फिल्म- प्रेम पुजारी)

”शोखियों में घोला जाए

फूलों का शवाब

उसमें फिर मिलाई जाए थोड़ी सी शराब’’

(फिल्म- प्रेम पुजारी)

”रंगीला रे तेरे रंग में यूं

रंगा है मेरा मन’’ (फिल्म- प्रेम पुजारी)

”लिखे जो खत जो

तुझे वो तेरी याद में’’        (फिल्म- कन्यादान)

”खिलते हैं गुल यहां खिलके

बिखर जाने को’’   (फिल्म- शर्मीली)

”आज मदहोश हुआ

जाए रे मेरा मन’’ (फिल्म- शर्मीली) शामिल हैं।

एक टीवी साक्षात्कार मे नीरज ने खुद को दुर्भाग्यशाली कवि कहा क्योंकि उन्हें फिल्मी गाने लिखना छोडऩा पड़ा। इसका कारण उन्होंने बताया कि जिन संगीतकारों के साथ उन्होंने मशहूर गाने तैयार किए थे वे इस दुनिया से चल बसे। इस बारे में उन्होंने शंकर-जयकिशन की जोड़ी में से जयकिशन का नाम लिया। इसके अलावा उन्होंने सचिन देव बर्मन और राहुल देव बर्मन के नाम भी लिए। इनकी मृत्यु के बाद नीरज काफी निराश हो गए और उन्होंने फिल्मी दुनिया का अलविदा कह दिया।

19 जुलाई 2018 को 93 साल की उम्र में ‘कलम’ का यह शहंशाह इस नश्वर संसार को अलविदा कह गया।

पंचकूला हिंसा के आरोपी बरी, हनीप्रीत को राहत नहीं

करीब एक साल पहले डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम को यौन शोषण मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद हरियाणा के पंचकूला में भड़के दंगों और बड़े पैमाने पर हुई आगजनी के सभी आरोपियों को अदालत ने बरी कर दिया है। इस फैसले से विशेष जांच दाल (एसआईटी) को बड़ा झटका लगा है जिसने इस मामले की जांच और इन लोगों को आरोपित किया था। हालांकि बाबा की करीबी रही हनीप्रीत को इस मामले में कोई राहत नहीं मिली है।

गौतलब है कि ये दंगे 25 अगस्त, 2017 को हुए थे और उस दिन बड़े पैमाने पर आगजनी की गयी थी। उपद्रवियों ने एक टीवी चैनल की वैन सहित कई निजी वाहन जला दिए थे। इन दंगों में तीन दर्जन के करीब लोगों की जान चली गयी थी।

पंचकूला की सेशन जज रितु टैगोर की अदालत ने 30 जुलाई को सुनाये फैसले में 25 अगस्त के इन दंगों में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत के फैसले के मुताबिक, एसआईटी ने ज्ञानीराम, सांगा सिंह, होशियार सिंह, रवि, तरसेम और राम किशन को आरोपी बनाया था, जिनके खिलाफ एसआईटी सबूत जुटाने में अब तक असमर्थ रही। सबूतों के अभाव के कारण कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया है।

इन आरोपियों पर दंगे भडकाना आगजनी करना और मारपीट के आरोप में आईपीसी की धारा 148, 149, 186, 188, 436 के तहत किया मामले दर्ज किय गए थे। अदालत के फैसले की जानकारी आरोपियों की वकील पूजा नागरा ने दी है। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम को यौन शोषण मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद ये दंगे भड़के थे।

गुरमीत राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद पंचकूला समेत प्रदेश के अन्य हिस्सों में व्यापक पैमाने पर हिंसा, तोडफ़ोड़ और आगजनी की घटनाएं हुईं थीं। हिंसा में करीब 37 लोगों की मौत हुई थी। आरोपियों के खिलाफ पुलिस के पुख्ता सबूत न जुटा पाने के कारण मामला कमजोर पड़ गया। दिलचस्प यह है कि हिंसा, आगजनी की घटनाओं के इस मामले में कोर्ट ने 53 लोगों पर देशद्रोह जैसी गंभीर धाराएं हटाने के आदेश भी दिए हैं। इससे पहले सबूतों के अभाव में ही 15 लोग बरी हो चुके हैं।

हालांकि कोर्ट के फैसले में गुरमीत राम रहीम की नजदीकी रही हनीप्रीत को लेकर कुछ नहीं कहा गया है जिससे जाहिर होता है कि उसे कोर्ट की तरफ से कोइ राहत नहीं मिली है। हनीप्रीत इस समय जेल में है।

मानव तस्करी रोधक बिल 2018 संपूर्ण या त्रुटिपूर्ण?

ट्रांसजेंडर (तीसरा लिंग) के मानवीय अधिकारों की पक्षधर निशा गुलर आज अपने कार्य पर गर्व महसूस कर रही है। कुछ साल पहले ऐसा नहीं था। उसने 17 साल की उम्र में अपना घर छोड़ दिया था। फिर वह एक ‘सेक्स वर्कर’ बन गई। वह भीख भी मांगती वह नहीं चाहती थी कि उसके परिवार को उसकी वजह से शर्मिदगी उठानी पड़े। उसे जीवन भर समाज की फब्तियां सुनने को मिलीं। हालांकि कुछ सालों बाद उसका परिवार उससे मिल गया।

आज निशा को इस बात का डर है कि नया कानून उससे सम्मानपूर्ण जीविका अर्जन का अधिकार छीन लेगा। निशा और उन जैसी कई और भी आज ‘सेक्स वर्कर’ के तौर पर और ‘भीख’ मांग कर अपना जीवन यापन करती हंै, और वे उसी पर निर्भर हैं। निशा का मानना है कि इसमें कोई शक नहीं है कि यदि इस बिल में कुछ फेर बदल नहीं हुआ तो यह ट्रांसजेंडर और सेक्स वर्कर समुदाय के सपनों को तोड़ देगा।

नए बिल ने सेक्स वर्करों और ट्रांसजेंडर को बेचैन कर दिया है। बिल में रोक, सुरक्षा और पुनर्वास की व्यवस्था की गई है। यह बिल लोकसभा में 26 जुलाई को पास हुआ। इसमें कई खामियां हंै। मानव तस्करी रोधक इस बिल के खिलाफ मानव तस्करी रोधक कार्यकर्ता, वकील और सिविल सोसायटी के लोग भी हैं। उनके अनुसार इस बिल में उस पुराने बिल की कमियों को दूर करने के लिए कुछ नहीं किया गया है। इन लोगों को अब राज्यसभा सदस्यों से उम्मीद है कि वे इसका पूरा विश्लेषण करके ही इसे पास करेंगे। उनकी मांग है कि यह बिल स्थाई समिति के हवाले किया जाए।

सामाजिक विज्ञानी मीना सरस्वती सिशु ने ‘तहलका’ को बताया कि वे लोग अब राज्यसभा के सदस्यों से मिल कर बात करेंगे। उनकी यही उम्मीद है कि यह बिल स्थाई समिति को भेज दिया जाए।

‘तहलका’ ने सवाल किया कि यदि राज्यसभा भी इसे पास कर देती है तो आप क्या करेंगे? सिशु ने कहा तब हमें अदालत में जाना पड़ेगा क्योंकि उसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है।

 महिला व शिशु विकास मंत्री मेनका गांधी ने विश्वास दिलाया कि यह बिल पीडि़त केंद्रित है और देश में मानव तस्करी के स्थाई समाधान की दिशा में पहला कदम। इस पर यह विवाद भी है कि इसमें गरीबी, कम वेतन या बेरोज़गारी, स्तर हीन शिक्षा, वर्ग और जाति उत्पीडऩ, खराब सामाजिक व आर्थिक हालात वगैरा का जि़क्र तक नहीं है, इनके बारे में सोचने की बात तो बहुत दूर की है।

महाराष्ट्र के सभी सेक्स वर्करस ने इक_े हो कर कहा कि बजाए इसके कि सरकार इससे प्रभावित होने वाले लोगों से बात करती, उनकी समस्याएं जानती, उनकी चिंता समझती, उनके प्रतिदिन होने वाल शोषण पर ध्यान देती, वह एक ऐसा बिल ले आई जो नैतिकता की सेना (मोरेल पुलिसिंग) को बढ़ावा देगा और सेक्स वर्करस का शोषण बढ़ाएगा।

 इसके अलावा बहुत से सामजिक संगठनों ने इस बिल का विरोध किया है। इनमें नेशनल नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्करस, आल इंडिया नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्करस, एचएयू सेंटर फॉर चाइल्ड वुमेन और न्यू ट्रेड यूनियन शामिल हंै।

ट्रांसजेंडर और सेक्स वर्करस के अधिकारों को समझना

नेशनल नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्करस (एनएनएसडब्ल्यू) इंडिया ने 19 और सेक्स वर्करस के संगठनों की तरफ से जारी बयान में इस विषय पर लोकसभा द्वारा की गई जल्दबाजी की आलोचना की है। उनका सबसे ज़्यादा गुस्सा महिला व शिशु विकास मंत्री की उस टिप्पणी पर है जिसमें उन्होंने कांग्रेस के सांसद शाशि थरूर के बारे में कहा था कि वे सेक्स वर्करस के प्रतिनिधियों के साथ आए थे न कि पीडि़तों के साथ। इससे सेक्स वर्करस में काफी गुस्सा है।

उन्होंने कहा,’ मैडम मनिस्टर क्या हमें मत्रियों, सरकारों और सांसदों को अपनी बात कहने का अधिकर नहीं है? आपके अनुसार क्या हम निंदा के पात्र हैं और आप हमारे आत्मसम्मान की कीमत पर हमारा मज़ाक उड़ा सकते है? क्या हम भारत के नागरिक नहीं जिन्हें सम्मान से जीने का अधिकार हो? क्या हम महिलाएं नहीं हैं?

मानवाधिकार कार्यकर्ता अकाई पद्माशली को इस बात पर नाराजगी है कि सरकार बिल में ट्रांसजेंडर (तीसरा लिंग) का जि़क्र तक करना भूल गई। अकाई ने मेनका गांधी को संबोधित करते हुए कहा,’ आप केबिनेट में उच्च पद पर हैं और एक महिला होने के नाते आप अपने कत्र्तव्य निर्भयन में विफल रहीं हैं और अपने ‘ट्रांसजेंडर’ (तीसरा लिंग) की शब्दावली का इस्तेमाल तक नहीं किया। जबकि देश की सर्वोच्च अदालत ने हमारे हक में फैसला दिया है। अदालत ने भारतीय संविधान के तहत हमारे अधिकारों को मान्यता दी है, तो आप उसे कैसे नहीं पहचानती। यह बिल पूरी तरह संवेदनहीन और गैर लोकतांत्रिक है, मैं इसकी निंदा करती हूं।

बिल की पृष्ठभूमि

इससे पहले भी मानव तस्करी को लेकर कई कानून हैं। इनमें आईपीसी की धारा 370 व 370ए, अनैतिक तस्करी (रोधक) कानून 1956 जिसमें किशोर न्याय (देखभाल और बाल सुरक्षा) कानून 2015 और कई कानून शामिल हैं। नए कानून से अपेक्षा थी कि वह पुराने सभी कानूनों की जगह एक संपूर्ण कानून बना देगा जो इसमें नहीं हुआ। इसकी बजाए बिल में कानून लागू करने वाली एजेसियों को और उहापोह की स्थिति में डाल दिया।

 ट्रैफिकिंग ऑफ परसनस (प्रीवेशन, प्रोटेकशन और रीहैवलिटेशन) बिल 2018 महिला व बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने 18 जुलाई को पेश किया और 26जुलाई को इसे पास कर दिया गया। ” ट्रैफिकिंग ऑफ परसनस’’ – यह शब्दावली आईपीसी की धारा 370 से ली गई है।

बिल की खामियां?

‘तहलका’ ने बिल में एक कमी देखी कि वह इसमें मानव अंगों और चमड़ी व्यापार के गैर कानूनी पहलू पर खामोश है। जो कि मानव तस्करी का ही हिस्सा है। यहां हजारों ऐसे लोग हैं जो आरोप लगाते हैं कि उन्हें पैसों का लालच दे कर उनके अंग निकाल लिए गए हैं। मिसाल के तौर पर तमिलनाडु के रामा पाथी (नाम बदला हुआ) का कहना है उसे गुर्दा देने के लिए सात लाख रुपए देने की बात हुई थी पर उसे केवल दो लाख ही मिले।

मानव तस्करी बिल ‘तस्करी’ की नई परिभाषा नहीं देता बल्कि पहली ही परिभाषा को धारा 370 के तहत नए रूप में जोड़ देता है। हां यह एक नया वर्ग ” ऐगरावेटिड फॉरम ऑफ ट्रैफिकिंग’’ बना देता है जिसमें कम से कम सजा 10 साल की है। जिसे उम्र कैद तक बढ़ाया जा सकता है। ‘एगरावेटिड’ में बंधुआ या जब्री मज़दूरी के लिए तस्करी, भीख मंगवाने के लिए तस्करी, शादी या बच्चा पैदा करने के लिए की जाने वाली तस्करी भी शामिल है लेकिन ये सभी तो आईपीसी की धारा 370 मे ंपहले से ही निहित हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरों (एनसीआरबी) के अनुसार 2016 में पुलिस ने जब्री मज़दूरी के 10,357 मामले दर्ज किए जबकि जब्री शादी के 349 और भीख मंगवाने के 71 मामले दर्ज किए गए थे। यह कहना कि ये सभी नए मामले हैं और मौजूदा कानूनों में इन पर काबू नहीं पाया जा सकता, पूरी तरह आधारहीन हैं।

कांग्रेस का दधीचि-भाव और आगत के आसार

नरेंद्र मोदी को बेदखल करना है तो कांग्रेस को इस बार देश भर में समान विचारधारा वाले राजनीतिक दलों का साथ लेना-देना पड़ेगा। उसे राहुल गांधी के प्रधानमंत्री पद की देगची को भी फिलहाल कम आंच वाले पिछले चूल्हे पर चुपचाप खदकने के लिए छोडऩा पड़ेगा। सवाल आज का है, इसलिए राज-धर्म का यह पालन कांग्रेस का कर्तव्य है। लेकिन कल की राजनीति देखें तो कांग्रेस अपने सिर पर दुधारी तलवार लटका रही है। यह तलवार मोदी और अमित शाह की भारतीय जनता पार्टी के थुलथुल होते जा रहे शरीर को कतर देगी। मगर क्या वह अब से पांच बरस बाद के कांग्रेसी-जिस्म की सेहत पर भी बुरा असर डालने से बाज आएगी?

सो, बावजूद इसके कि मैं मानता हूं कि नमोरोगियों की सियासत से हमारे मुल्क को मुक्ति दिलाने के लिए कांग्रेस को अभी सब-कुछ करना चाहिए; मुझे यह बात भी साल रही है कि भारत के वर्तमान के लिए कांग्रेस को अपना भविष्य दांव पर लगाना पड़ रहा है। महागठबंधन की यह राजनीति अगर सिर्फ़ लोकसभा चुनाव के लिए होती तो बात अलग थी। मगर इसकी शुरुआत मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में दिसंबर के चुनावों से होनी है। अब तक इन में से किसी भी प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा से इतर किसी तीसरी राजनीतिक शक्ति का फायदे से कोई आधार नहीं है। इस बार के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का समान विचार वाले दलों से होने वाला तालमेल पहली बार भले न हो, मगर पहली बार उसकी संरचना ऐसी होगी, जिससे कांग्रेसी-दस्तरखान पर वे ताकतें बाकायदा आ कर बैठेंगी, जो आगे चल कर कांग्रेस के थनों का ज़्यादा-से-ज़्यादा दूध अपने बर्तनों में दुहेंगी।

पहले ऐसा नहीं था, मगर अब भारत दो विचार-धुरियों का देश बन गया है। एक विचार है समावेशिता का। दूसरा विचार है बहिष्करण का। एक विचार है सामुदायिक एकात्मकता का। दूसरा विचार है सामुदायिक विभाजन का। अभी कई बरस दो पालों में बंटी इस सियासत की खाई पटने के कोई लक्षण दूर-दूर तक नहीं हैं। कांग्रेस पहली विचारधारा की शाश्वत प्रतिनिधि है। दूसरी विचारधारा संघ-कुनबे ने बरसों की कुचालों के बाद हमारे बहुसंख्यक समाज के एक तबके में परत-दर-परत जमाई है और भाजपा उसकी नुमाइंदगी में अपना सब-कुछ झौंके बैठी है।

आज की समस्या यह है कि संघ-कुनबे के विचार-जंगल के 99 फीसदी हिस्से पर भाजपा का कब्ज़ा है, जबकि सर्वसमावेशी विचार के बगीचे का प्रतिनिधित्व आधा दर्जन से अधिक शक्तियां कर रही हैं और वे कांग्रेस को अपना अगुआ मानने के बजाय उसे ‘समान कद वालों के बीच पहले क्रम परÓ देखने भर को तैयार हैं। सो, दो विचारधाराओं के बीच हो रहे संघर्ष के इस दौर में नरेंद्र मोदी और उनकी भाजपा तो अ-सुर शोर के एकाधिकारी हैं, मगर राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस सुरीले संगीत की धुनें अकेले तैयार करने के अधिकारी नहीं हैं। इसलिए भारत की राजनीति में आगे चल कर भाजपा के खल-नायकत्व पर रीझने वालों के समर्थन की शक्ति तो एकजुट रहेगी और कांग्रेस के नायकत्व को अपनी समर्थक-शक्ति की साझेदारी बहुतों के साथ करनी होगी। यह सकारात्मक विचार यात्रा के लिए तो फायदेमंद है, लेकिन यह भी ज़ाहिर है कि यह कांग्रेस के निजी-हित में नहीं है।

कांग्रेस के एकाधिकार वाले आंगन में धीरे-धीरे समान विचार वाले राजनीतिक समूहों की उपस्थिति का दायरा लगातार ऐसे ही नहीं बढ़ा है। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश और बिहार में अपने वैचारिक हमजोलियों को अपनी उंगली पकडऩे दी और आज वहां कांग्रेस उनकी उंगली पकड़ कर चलने की हालत में आ गई। कौन कह सकता है कि मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी-आंगन में इन्हीं हमजोलियों का प्रवेश, अब से पांच साल बाद 2023 में होने वाले विधानसभा चुनावों में, कांग्रेसी ज़मीन को सिकोड़ नहीं देगा? अब ऐसे राज्य बचे ही कितने हैं, जहां भाजपा का मुकाबला सीधे कांग्रेस कर रही हो? जब कांग्रेस कहीं भी भाजपा से जूझने वाला एकमात्र राजनीतिक दल नहीं रह जाएगा तो मजबूत कौन होगा?

इसलिए अरुण जेटली की यह बात सुन कर मुझे झुरझुरी होती है कि कांग्रेस-मुक्त भारत का पहला अध्याय भाजपा ने लिखा था और अब दूसरा अध्याय महागठबंधन लिखेगा। भीतर से मेरा मन आश्वस्त है कि वह दिन कभी नहीं आएगा, जब भारत कांग्रेस-मुक्त होगा। इसलिए कि वह दिन कभी नहीं आएगा, जब पूरा भारतीय समाज संघ-विचार का अनुगामी हो जाएगा। संघ-कुनबे के कुविचार-विरोध की धारा तो हमेशा कायम रहनी ही है। वह दिन भी आएगा, जब यह कुविचार पूरी तरह परास्त हो जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि इस संग्राम का प्रतिनिधित्व कांग्रेस करेगी या कुछ अलग-अलग कबीले? क्या कांग्रेस भी ऐसा ही एक कबीला भर रह जाएगी?

इस तथ्य से मुंह फेर कर बैठे रहना मूर्खता होगी कि आज उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, दिल्ली, त्रिपुरा, पूर्वोत्तर के कई राज्यों और ओडिशा में कांग्रेस की मौजूदगी नामलेवा है। दो-सवा दो सौ लोकसभा क्षेत्र ही ऐसे हैं, जहां भाजपा के खि़लाफ कांग्रेस सीधे ताल ठोक रही है। महागठबंधन से, आज नही ंतो कल, कांग्रेस की इस मज़बूती पर उलटा असर पडऩा कोई कैसे रोकेगा? लेकिन आज नरेंद्र मोदी की पराजय के लिए बन रहे वज्र में अपनी हड्डियों तक का दान कर देने के लिए दधीचि कांग्रेस नही तो कौन बनेगा? क्या इस प्रक्रिया में कांग्रेस यह ऐहतियात बरत सकती है कि आज अगर वह अपनी हडिड़यां गलाए तो कल उसके ज़मीनी वारिसों की पगडिय़ां तुर्रेदार हो जाएं!

कांग्रेस के दर्शनशास्त्र को अपनी गांठ में बांध कर सफर शुरू करने वाले राजनीतिक दलों के लिए यह तय करने का वक़्त आ गया है कि वे ‘केंद्र में कांग्रेस-राज्य में हमÓ की राह पकड़ें। ऐसा किए बिना विभाजनकारी विचारधारा का कारगर मुकाबला हो ही नहीं सकता। द्रमुक के करुणानिधि 94 साल के हैं। उनके वारिस स्टालिन भी 65 के हो गए हैं। देवेगौड़ा 85 के हैं। शरद पवार 77 के हैं। लालू प्रसाद 70 के, मुलायम सिंह यादव 78 के और फारूख अब्दुल्ला 80 के हैं। चंद्राबाबू नायडू 68 के हैं। मायावती 62 की हैं और ममता बनर्जी 63 की। नवीन पटनायक भी 71 साल के हैं। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि 2019 इसलिए हाथ से चला जाए कि सब को अपने-अपने राज्यों में भी सिरमौर रहना है और केंद्र में भी बढ़-चढ़ कर अपना हिस्सा चाहिए? ऐसे में अकेली कांग्रेस का दधीचि-भाव क्या कर लेगा? कांग्रेस इसी बार भाजपा से भिड़ंत के लिए अधिकतम त्याग करने से कतरा भी जाए तो 48 साल के राहुल गांधी के पास लोकसभा के 300 बंजर क्षेत्रों में ज़मीन की गुड़ाई करने के लिए 2024 तक का समय है। इसलिए जो बदलते मौसम की नब्ज़ नहीं पहचानेंगे, पाप करेंगे। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

साभार: नया इंडिया

रेहम ने खोले इमरान खान की जि़न्दगी के कई राज़

इमरान खान पाकिस्तान में नए प्रधानमंत्री का पद संभालने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में उनकी पूर्व पत्नी रेहम खान उन पर हमले पर हमले किये जा रही हैं।

हाल ही में उन्होंने न सिर्फ यह कहा कि पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ पार्टी के प्रमुख प्रधानमंत्री के पद की जि़म्मेदारियाँ ठीक से अदा नहीं कर पायेंगे बल्कि यह भी कहा कि इमरान खान की जीत की स्क्रिप्ट पहले से ही तय थी और वह निर्देशक के कहने के अनुसार भूमिका कर रहे थे। ‘इसके डायरेक्टर कोई और नहीं बल्कि पाकिस्तानी सेना है।’ रेहम ने हमला तेज करते हुए कहा, ‘पाकिस्तानी सेना को जूते पॉलिश करने वाला पीएम चाहिए था, वो मिल गया है।’

ये हमले सार्वजनिक तौर पर तब से जारी हैं जबसे पूर्व बीबीसी पत्रकार और इमरान खान की दूसरी पत्नी ने अपनी आत्मकथा लिखी है। इसमें उन्होंने एक बड़ा हिस्सा अपने और इमरान खान के रिश्तों को काफी जगह दी है। याद रहे कि दोनों की शादी सिर्फ 10 महीने ही चली थी।

रेहम ने अपनी आत्मकथा ‘रेहम खान’ में इमरान खान को लेकर कई खुलासे किए थे। आम चुनाव से पहले रिलीज़ हुई ये किताब पूर्व क्रिकेटर के कई अनछुए पहलुओं को उजागर करती है।

किताब के मुताबिक इमरान खान को खूबसूरत मर्द आकर्षित करते थे। रेहम लिखती हैं कि इमरान जिस तरह सकलैन मुश्ताक के बारे में बातें करते थे। उससे लगता था कि उनका दिल सकलैन पर आया हुआ है। पाकिस्तान स्पिनर सकलैन अपनी आकर्षक मुस्कान और खूबसूरती के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने जिस तरह सकलैन के प्रति अपने आकर्षण का इजहार किया उसने मुझको डिस्टर्ब कर दिया। याद रहे सकलैन पाकिस्तान के जाने माने ऑफ स्पिनर थे। जिनका टेस्ट करियर 1995 में शुरू हुआ था। उन्होंने 49 टेस्ट में 208 विकेट लिये जबकि 169 वन-डे में 289 विकेट लेने वाले गेंदबाज बने। वर्ष 2004 में उन्होंने इंटरनेशनल क्रिकेट से संन्यास ले लिया।

ट्रांसजेंडर्स में भी पाकिस्तान के भावी प्रधानमंत्री की रुचि बताई गयी है। रेहम लिखती हैं कि ‘एक महिला पत्रकार मुझसे मिली। जिसने पाकिस्तान फिल्म एक्ट्रैस रेशम का हवाला देते हुए कहा कि ट्रांसजेंडर डांसर रिमाल आजकल इमरान को अपनी सेवाएं दे रहा है। मैं हैरान रह गई और मेरी हैरानी से वह पत्रकार हतप्रभ थी कि मैं इमरान के बारे में कितना कम जानती हूं।’

इस किताब में, जिसका ई-संस्करण अमेजन डॉट कॉम पर उपलब्ध है, ये भी कहा गया है कि इमरान खान बहुत कम उम्र से ही महिलाओं से सम्बन्ध बनाने लगे थे। ‘इमरान ने बचपन में ही अपनी उस नौकरानी के साथ शारीरिक रिश्ते बनाए, जो उनकी देखरेख में लगाई गई थी। उन्होंने रेहम से बातचीत के दौरान एक बार यह भी कहा कि उनकी उनसे बड़ी कजन ने तब खुद को उनके साथ छूने के लिए दबाव डाला जबकि वो दस साल के भी नहीं थे।’ रेहम की आतमकथा के अनुसार ड्रग्स के शौकीन थे इमरान। उनकी पूर्व पत्नी लिखती हैं कि इमरान ने पहली बार कोकीन तब ली जब उनकी पहली पत्नी जेमिमा बच्चों को उनसे दूर ले गईं। उनकी पार्टी के संस्थापक सदस्य उनकी आदत से वाकिफ थे। रेहम से उन्होंने बताया था कि कोकीन उसी तरह है जैसे आधी गिलास वाइन।

रेहम ने अपनी पुस्तक में यह भी आरोप लगाया है कि इमरान ने पहली शादी लालच की वजह से की थी। ‘उनको लगता था कि उनके ससुर उनका जीवन संवार सकते हैं। वो ब्रिटेन के सबसे धनी और राजनीतिक तौर पर काफी संपर्कों वाले शख्स थे जिन्होंने 90 के दशक में रेफरेंडम पार्टी बनाई।’

इस किताब ने जहां एक तरफ लेखिका को मशहूर किया है वहीं लोग उनसे नाराज़ हैं। इमरान खान ने हाल ही में कहा कि उनकी जि़ंदगी की सबसे बड़ी गलती उनकी दूसरी पत्नी रेहम खान से शादी करना थी। पाकिस्तान में कई लोग रेहम की इस किताब पर मुकदमा भी ठोक चुके हैं।

छात्रों के लिए हरियाणा का अनूठा अभियान आएगी समृद्धि विदेशी भाषा से

हरियाणा सरकार ने छात्रों को कक्षा पहली से अंग्रेज़ी में पढऩे, लिखने और बोलने में सक्षम बनाने के उद्देश्य से एक नई और अनूठी पहल की है। ”मुझे अंगे्रज़ी से डर नहीं लगता’’ कार्यक्रम के तहत छात्रों को हर दिन एक वाक्य सिखाने के लिए एक जूनियर बेसिक ट्रेनिंग अध्यापक और ब्लाक में एक ‘ब्लाक रिसोर्स पर्सन’ को प्रशिक्षित और नियुक्त किया गया है। पूरे अभ्यास का उद्देश्य प्रत्येक वर्ग में 10 महीने के लिए हर महीने न्यूनतम 20 वाक्यों को सिखाना है।

इस तरह की पहल करने वाला हरियाणा पहला राज्य बन गया है। अंग्रेज़ी भाषा अकादमिक और पेशेवर करियर में महत्वपूर्ण बन गई है, लेकिन अंग्रेज़ी में अच्छे संचार कौशल को विकसित करना चुनौतीपूर्ण है। सबसे बड़ी चुनौती अंग्रेज़ी सीखने को आनन्ददायक बनाना है। जो खुशी के लिए पढ़ते हैं वे स्वायत्त भाषा सीखने वाले हैं, जो स्वंय को पढऩे में तल्लीन कर लेते हैं और उसे दिल से सीखते हैं उनके लिए भाषा सीखना एक सुखद अनुभव बन जाता है। इस प्रकार की पढ़ाई बहुत शक्तिशाली होती है क्योंकि आनन्द घटक किसी भी चिंता, दुख और समझने के डर के बिना भाषा सीखने का कारण बन जाता है।

प्राथमिक शिक्षा निदेशक राजनारायण कौशिक ने बताया कि सरकारी प्राथमिक स्कूलों में पढ़ रहे बच्चे ”मुझे अंगे्रज़ी से डर नहीं लगता’’ कार्यक्रम का लाभ उठा सकेंगे। जिसका पहला उद्देश्य कक्षा पहली से अंग्रेज़ी भाषा को शुरू करना है। यह बच्चों को अंग्रेज़ी पढऩे, लिखने और बोलने में मदद करने के लिए अध्यापकों को सक्षम बनाता है।

पारंभिक शिक्षा निदेशक राजनारायण कौशिक के अनुसार यह कार्यक्रम 180 प्राथमिक स्कूलों में शुरू किया गया है और मौजूदा अकादमिक सत्र में इसे 238 और स्कूलों में शुरू किया जाएगा।

1000 वाक्यों वाली एनसीईआरटी की एक किताब तैयार की गई है। इसमें ग्रेड एक से ग्रेड पांच तक प्रत्येक ग्रेड के लिए 200 वाक्य हैं। एक प्राथमिक अध्यापक और ब्लाक रिसोर्स पर्सन को छात्रों को एक वाक्य हर दिन सीखने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। इस तरह छात्र अगले स्तर तक कम से कम 1000 वाक्यों को पढऩे और लिखने में सक्षम बन जाएंगे।

इसके अलावा राज्य भर में चयनित मॉडल संस्कृति स्कूलों में डिजिटल भाषा सीखने और छात्रों को सुनने, बोलने के कौशल में सुधार करने के लिए छह भाषा प्रयोगशालाएं स्थापित की गई हैं। ऐसी कई प्रयोगशालाएं बाद में अन्य स्कूलों में भी स्थापित की जाएंगी। एनजीओ ‘हुमाना पीपल टू पीपल इंडिया’ के साथ साझेदारी में 180 प्राथमिक स्कूलों में इसे शुरू किया गया है जिसने कक्षा पहली और दूसरी के बच्चों को बैग फ्री बना दिया है उन्हें लार्कस प्रदान किए गए हैं। धीरे-धीरे राज्य के अन्य स्कूलों में भी भाषा प्रयोगशालाएं स्थापित की जाएंगी। राज्य के चयनित 180 सरकारी प्राथमिक स्कूलों में प्रथम और दूसरी श्रेणी के लिए बैग मुक्त अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल शुरू किए गए हैं। इसके अलावा सकेण्डरी शिक्षा विभाग ने 310 चयनित स्कूलों में कक्षा नौवी से विज्ञान और गणित की पुस्तकें अंग्रेज़ी में शुरू की हैं।

पिछले साल उत्तराखंड सरकार ने भी इस तरह की मुहिम शुरू की थी। राज्य के 18000 स्कूलों में विभिन्न चरणों में आदेश देने के माध्यम को हिंदी से अंग्रेजी में बदला गया था।

”मुझे अंगे्रज़ी से डर नहीं लगता’’ हरियाणा सरकार का यह नारा और उद्देश्य एक बार समस्या की पहचान के साथ -साथ इसे सुलझाने का एक संभावित तरीका भी बताता है। शिक्षा की वार्षिक रिपोर्ट जो कि ग्रामीण इलाकों में बच्चों के सीखने का अनुमान लगाती है, उससे पता चला है कि ग्रामीण इलाकों में अंग्रेज़ी में सरल वाक्यों को पढऩे की छात्रों की क्षमता अच्छे स्तर की नहीं है। 2016 में कक्षा तीन के केवल 32 फीसद छात्र भाषा के सरल वाक्य पढ़ सकते थे। आमतौर पर सह सभी प्राथमिक कक्षाओं के मानदंड हैं। इस तरह की रुकावटों को दूर करने की तत्काल आवश्यकता है।

इस पहल का उद्देश्य बच्चों को दुनिया और नौकरी बाजार का सामना करने के अनुकुल बनाना है। डिजिटल सीखने की सुविधा और छात्रों के सुनने और बोलने के कौशल में सुधार के लिए राज्य में छह प्रयोगशालाएं स्थापित की गई हैं।

खूनी मौसम के खिलाफ ‘पोस्टर वार’

शशि नारायण ‘स्वाधीन’ समाज से जुड़े कवि थे। हैदराबाद के एक दैनिक में ज़मीनी स्तर पर बतौर संवाददाता काम करते हुए उन्होंने कइयों के चेहरे पर चिपकते- उखड़ते चेहरों की परतें देखी। लोकतंत्र, धर्म और पाखंड के जरिए समाज से धन उगाही और समाज के कमज़ोर वर्ग को हाशिए पर खड़ा रखने के तौर-तरीकों को उन्होंने जाना समझा। उन्होंने बेहद ईमानदारी, संवेदनशीलता और ऊष्मा के साथ कविताएं रची।

अहिंदी भाषी शहर हैदराबाद में रहते हुए उन्होंने तेलुगु, हिंदी,उर्दू और अंग्रेज़ी सीखी और समाज के दबे- कुचले लोगों की आवाज़ को अपनी धार दी। तेलंगाना मुक्ति संग्राम के वे एक कवि सिपाही थे।

स्वाधीन के कविता संग्रहों में ‘पोस्टरवार’ ग्यारहवां कविता संग्रह है। उनकी लंबी-कविता ‘पोस्टरवार’ है जो जहां संसदीय विसंगतियां उभरती नज़र आती है। समाज में इंसान ही इंसान की मदद करता है लेकिन उसे पिछले कुछ समय से जिस तरह धर्म, संप्रदाय, जाति में बांट कर एक दूसरे से डराने की प्रवृति शुरू हुई है उसका उन्होंने हमेशा विरोध किया। उन्होंने लिखा है-

समय की धीमी आंच पर

पक रहा है जो घाव

वह तुम्हारी

धर्म की राजनीति की देन है।

कोई भी धर्म इस मुल्क में

आदमी से अधिक ऊँचा कहलाता है।

जब आदमी ही नहीं होगा तो धर्म का क्या मतलब। यह समझाने की कोशिश स्वाधीन ने अपनी कविताओं में की है। यह उनकी विशेषता है। आप देखिए-

ठंड से बचाती है

जिस तरह आग

कविता मेरे साथ रही।

मैंने आवाज़ लगाई

सूरज का रथ रुका नहीं

दौड़ता चला गया

मैं अपने पथ पर

अकेला चलता रहा

तमाम संकेतों के बावजूद।

स्वाधीन ने जनसंघर्ष का एक महत्वपूर्ण माध्यम पोस्टरवार को माना है। यदि तेलंगाना आज साकार हो सका तो उसमें शाशि नारायण ‘स्वाधीन’ की आहुति भी कम महत्व नहीं रखती है। अपनी कविताओं के जरिए वे लगातार पोस्टरवार में शामिल रहे। वे तेलंगाना मुक्ति संग्राम में हमेशा सक्रिय थे। उनकी कविताएं तेलंगाना के जन-जन को साथ लेती हंै। उन्हें लंबी लड़ाई के लिए तैयार करती हैं।

उनकी कविता प्रतिबद्ध इंसानों की कविता है वह रंगीन प्रासादों की मद्धिम होती रोशनी में वासना के रंगों में प्रतिबिंबित नहीं होती। उनका प्रेम हकीकत की भूमि पर होता है। उनकी सोच है कि जिस दिन प्रेम इस दुनिया का मिजाज बन जाएगा, उस दिन यह दुनिया रहने लायक हो जाएगी। स्वाधीन की प्रेम कविताएं सपनों में हकीकत का रंग भरती दिखती है।

पिछली यादों में

खिड़की से

लफ्ज़ तुम्हारे

मुझ तक आकर

पीली धूप पहन लेते थे।

स्वाधीन की कविता हमेशा संघर्षशील लोगों को लडऩे और आगे बढऩे के लिए उत्साहित करती है।

लड़ो

और आगे बढ़ो

जिसने तुम्हारी सोच को

ताबूत में सुलाना चाहा

उसके इरादों में कील ठोंक दो

यह समय

तपते लोहे के सुर्ख होने का है

कड़ी धूप सह कर

करना है हमें सूरज का मुकाबला।

उर्दू हिंदी की प्रगतिशील कविताओं और कवियों में ज़्यादातर से उनका निजी परिचय था। हैदराबाद में हिंदी-उर्दू मुशायरों और हिंदी मुस्लिम एकता का परचम लहराने वालों में वे और उनके साथी अहमद फरीदी नवाब, मकदूम मोहियुद्दीन हैदराबाद के ही बड़े शायर सक्रिय दिखते थे। उन्होंने हैदराबाद में बरसों पहले तरक्की पसंद शायरी की ज़रूरत जताई थी, और जो लोकप्रिय भी थे। उन्हीं की दिखाई राह पर शशि नारायण स्वाधीन और अनगिनत कवि- रचनाकार चले। लेकिन स्वाधीन में बदलाव का जो ज़ज्बा उनमें और उनकी रचनाओं में था उसके चलते उनकी पूरी जिंदगी ज़रूर संघर्ष में गुजरी लेकिन आने वाली पीढिय़ों के लिए वे अपनी रचनाओं में ज़रूर सुगंध छोड़ गए जिनसे अगली पीढ़ी को आगे बढऩे की राह मिल जाती है।

शशि नारायण ‘स्वाधीन’

जन्म-15 मई 1966 निधन -21 जुलाई 2018

कुछ कविताएं

मौजूदगी

एक पुराना दिन

तुम्हें

बाहों में समेटे आज

खिड़की में खड़ा है।

मैं तुम्हें छूता हूं

अनुभवता हूं

बिछड़ा पल संजोता हूं।

सहभागी है

सिर्फ समय

डर

यह दुनिया

न्यूक्लियर बेड़े के डर से

रजाई में दुबकी पड़ी है।

आंखों में ख्वाब लहू लहू

ख्वाहिशें फिर भी

तुम्हारी बांहों सी खुलती जाती हैं।

दरवाजे बंद हैं।

चक्र

शहर के चारागर1

जाने किस वास्ते

मेेरा पता पूछते ही नहीं।

मेरे दिल में रकम2

आरजू3 की कहानी

जो तुम से जुड़ी है

अपने खात्मे पर

किसी और चेहरे से जुड़ जाएगी।

यूं ही फलक दर फलक

सूरज की लाली

रात के स्याह हाथों से मिट जाएंगी।

वे मुजाहिद4 के जिसने

मुल्क के वास्ते

सब कुछ त्यागा

कल हमें छोड़ कर

अपने मिट्टी के मंका से

चला गया है।

शहर पहले भी तन्हा था

तन्हा है अब भी

जिसकी बेदार आंखें

सवालों में गुम

आज हमें देखती हैं

ये गली भी किसी रोज़ सो जाएगी।

वक्त बढ़ता रहेगा बरसा बरस

अजनबी रास्तों की हवा में कहीं

याद की लौ किसी रोज़ बुझ जाएगी।

धुंध में रास्ते सिमट जाएंगे

मंजिलें दूर कदमों से हो जाएंगी

फिर आएगी कोंपल पे इक दिन बहार

फिर बारिश में मिटृटी संवर जाएगी

धूप निकलेगी ख्वाबों की फिर से यहां

बीज रस्तों में दुनिया के बो जाएगी।

शब्दार्थ:

  1. चिकित्सक 2. निहित
  2. इच्छा 4. स्वतंत्रता सेनानी

नई सदी की लड़की

तुम नई सदी हो

तुम्हारे अंदर मेरा पिछला

वक्त छिपा है।

तुम्हारा चेहरा

नई सुबह की मुस्कुराहट

चांद के भीतर छिपी

मेरी इबारत

जेहन में इक गुलाबी रंग सा

लहरा रहा है।

रेज़ा रेज़ा

कोई जैसे तस्वीर तुम्हारी बना रहा है।

मैं अपने लहू की गर्दिशों में

रोज तुम को पा रहा हूं

उंगलियों का लम्स1 तुम्हारा

मेरे बदन को जगा रहा है।

ये लम्स जैसे

इक आग है

जो दिल के पर्वत पर जागती है

तो जमीं से आस्मां तक

परिंदों की जुबान बन कर

फासलों को नापती है।

जो तुम है वो तुम हो

जो मैं है वो मैं हूं

इन्ही जाबियों2 में

ये छोटा सा घर है

अपना सफर है।

शब्दार्थ:

  1. स्पर्श 2. कोणों

जान लेने के लिए क्या सोशल मीडिया ने उकसाया?

भीड़ के हाथों हत्या के बढ़ रहे मामलों में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका सामने आ रही है। आरोप है कि यह अफवाहों को गति देता है और भीड़ बिना छानबीन किए किसी को भी अपना शिकार बना लेती है। अब बच्चा चुराने की अफवाहों ने सबसे ज्यादा जानें ली है। नंदिता सेनगुप्ता की रिपोर्ट

सोशल मीडिया पर ‘बच्चे चुराने वालोंÓ के बारे में संदेश वायरल हुआ इसने आसाम, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात और आंध्र प्रदेश समेत नौ राज्यों में न केवल 27 लोगों की जान ले ली। बल्कि यह भी प्रश्न छोड़ दिया कि भारत में इंटरनेट का प्रयोग करने वालों की बढ़ती संख्या के साथ क्या सोशल मीडिया अच्छे की बजाए बहुत बुरा कर रहा है।

अगर आंकड़ों पर विश्वास करें तो भीड़ द्वारा हत्या अधिकतर राज्यों में नई बात नहीं हैं। सोशल मीडिया के अविष्कार और इस्तेमाल से पहले भी ‘डायनÓ बताकर निर्दोष लोगों का जीवन दांव पर लगा दिया जाता था। मुख्य रूप से इसका निशाना महिलाएं होती थी।

नेशनल अपराध ब्यूरो (एनसीआरबी) के आकंड़ों के आधार पर गृह मंत्रालय का कहना है कि 2016 में ‘जादू-टोनेÓ करने की अफवाह में 134 लोगों की हत्या कर दी गई। झारख्ंाड में ऐसी अधिकतम 27 हत्याएं हुई ओडिशा (24), मध्यप्रदेश (19), छत्तीसगढ़ (17) गुजरात (14) और तेलंगाना(11) आसाम, हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल में भी इस तरह के मामलों की सूचना है।

2016 में भीड़ द्वारा हत्या के आठ मुख्य कारणो में ‘जादू-टोनाÓ एक मुख्य कारण था। इसके अन्य कारण सड़क पर हिंसा, अतिवाद, नक्सलवाद, जातिवाद, डकैती, बलात्कार, वर्ग संघर्ष और राजनीतिक हैं।

एनसीआरबी की 2015 की रिर्पोट के अनुसार इस तरह के मामलों की संख्या 2014 में 157 थी जिसमें से ऐसी 30 फीसद (127) हत्याएं अकेले झारखंड राज्य के जनजातीय बहुल क्षेत्रों में हुई इसके अलावा ओडिशा (32) मध्यप्रदेश (24) और छत्तीसगढ़ (16) में ऐसे मामले सामने आए। ब्यूरो ने बताया कि 2000 और 2012 के बीच इस तरह की 2097 हत्याएं हुई इनमें ‘जादू-टोनाÓ मुख्य कारण था।

भारत के ग्रामीण इलाकों में भीड़ के हमले के मामलों में पुलिस जांच से पता चला है कि इन सब मामलों में एक जैसी मानसिकता रही है चाहे आसाम के चाय के बगान हों या ओडिशा, झारखंड़ के खदान।

एक युवा वकील सीमा झुइंया ने गुवाहटी उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की है जो विशेष रूप से भीड़ के हाथों हत्या के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करती है। उनका तर्क है कि ”हमारे कानून के अनुसार किसी भी व्यक्ति को कानून के अधिकार के साथ दंडित नहीं किया जा सकता। अगर कोई व्यक्ति अपराध करता है तो उसे कानून की स्थापित प्रक्रिया से गुज़र कर ही दंडित किया जा सकता हैÓÓ।

उसने कहा, हालांकि आजकल देखा गया है कि लोग अक्सर भीड़ तंत्र की तरफ जाते हैं और व्यक्ति को बिना किसी कानूनी प्राधिकार प्रक्रिया के दंड दे रहे हैं। किसी भी व्यक्ति के लिए जीवन सरंक्षण एक महत्वपूर्ण अधिकार है और राज्य को इसकी रक्षा करनी चाहिए। भीड़ के हाथों हत्या की ऐसी घटनाएं सविधान की धारा 14 और 21 के उल्लंघन का नतीजा है। इस तरह की घटनाएं हमारे लोकतंत्र पर धब्बा हंै। क्योंकि हमारे पास लोकतंत्र है भीड़तंत्र नहीं। यह जनहित याचिका जून महीने में दायर की गई है। जनहित याचिका को इस साल जून में दो युवाओं की हत्या के बाद दायर किया गया।आसाम के करबी एंग्लोंग जि़ले के एक गांव में दो युवाओं नीलोटपाल और अभिजीत नाथ को 250 लोगों की भीड़ ने बच्चे चुराने वाला होने के शक में पीटकर मार डाला।

एक युवक ने ग्रामीणों को सूचित किया था कि उनके गांव पनीजुरी से बच्चा चुराने वाले दो युवाओं (दास और नाथ) ने एक लड़के का अपहरण कर लिया है और उसे अपनी गाड़ी में ले जा रहे हैं तो ग्रामीणों ने नोलोटपाल और अभिजीत को उनकी काले रंग की गाड़ी से बाहर घसीट लिया और उनकी हत्या कर दी।

जादू टोने के मामले

झारखंड

झारखंड के खुंती जि़ले के दादगामा गांव में अज्ञात लोगों की भीड़ ने एक बुजुर्ग युगल पर हमला किया और डायन होने का आरोप लगा कर उन्हें मार डाला और बुजुर्ग महिला का सिर काट दिया। छह अज्ञात लोगों के गिरोह ने पीडि़त जिनकी पहचान सतरी मुंडा (55) और उनकी पत्नी जवनी देवी(50) के रूप में हुई है उनके घर में घुस कर उन पर हमला किया। जब बच्चेे डर कर रोने लगे तो भीड़ ने बच्चों को धमकाया और अपमानित किया। पुलिस ने इस भयानक हमले के बाद कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया। जिनमें से कुछ को जमानत मिल गई क्योंकि पुलिस उनके खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाने में विफल रही। झारखंड जादू टोने के मामलों की जांच के लिए विशेष कानून रखने वाले सात राज्यों में से एक होने के बाद भी आदिवासी समाज प्रचलित अंधविश्वास के कारण इस तरह के मामलों से संघर्ष कर रहा है।

असम

असम में हुए इस तरह के संदिग्ध हमलों में एक अक्तूबर 2014 में करबी एंग्लोंग जि़ल में एथलीट देवजानी बोरा पर हुआ हमला और अप्रैल 2017 में कोकराझार जि़ले में एक आदिवासी युगल की हत्या का है। कोकराझार जि़ले के पलाशगुड़ी गांव में यह हमला तब हुआ जब वे अपनी झोपड़ी में सो रहे थे। उनके बच्चों को दूसरी झोपड़ी में बंधक बनाया गया था क्योंकि वे मदद के लिए चिल्ला रहे थे। तब से नागाओं जि़ले के अनाथालय में इन पांच बच्चों की देखभाल की जा रही है। 2016 में गुहाटी हाईकोर्ट के कहने के बाद राज्य विधानसभा ने ‘डायन-विरोधीÓ कानून पास किया जिसे हाल में केंद्र से मंजूरी मिली है।

ओडिशा

ओडिशा के कयोंझर जि़ले के गांव मुंडाशाही में 40 वर्षीय आदिवासी गुरू मुंडा के परिवार पर हुआ हमला ‘डायनÓ बता कर किए गए हमलों में से एक था। ओडिशा में झारखंड के बाद सबसे ज़्यादा डायन हत्या के हमले हुए हैं। मुंडा उनकी पत्नी बुद्धिनी, दो बेटियां और दो बेटों की 30 मिनट की अवधि में क्रूरता से हत्या कर दी गई थी। पुलिस के अनुसार ओडिशा के 2014 ‘विच हंटिगÓ रोकथाम अधिनियम का केंद्र महिलाएं थी, परन्तु कई मामलो में पुरूषों को भी पीडि़त पाया गया है।

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जिसने कुछ साल पहले डायन-हत्या और अन्य अंध विश्वासों, प्रथाओं के खिलाफ कानून बनाने की कोशिश की। यह कुछ धार्मिक समूहों के विरोध के कारण प्रारंभिक स्तर पर असफल रहा, वे यह मानते थे कि कानून को धार्मिक रीतियों और पुरानी परंपराओं से दूर रहना चाहिए। 2013 में राज्य में बने मानव बलि और अन्य अमानवीय बुराईया, अघोरी प्रथाओं की रोकथाम और उन्मूलन अधिनियम के बाद राज्य में डायन हत्याओं के हमलों में गिरावट आई है।

डायन हत्या

 कम से कम 12 राज्य ‘डायन हत्याÓ की गिरफ्त में है। कुछ ने इस तरह के खतरनाक प्रथा के मूल कारणों को समझने की कोशिश की है। एक एनजीओ ‘पार्टनर फॉर ला इन डेवलमेंटÓ ने अध्ययन किया कि डायन हत्या की जड़ें वित्तीय विवाद, अंधविश्वास, पितृसत्ता, और अन्य व्यक्तिगत और सामाजिक संघर्ष में निहित है। अक्सर ये संघर्ष पीडि़त और उसके रिश्तेदारों, दोस्तों या परिचितों के बीच ईष्र्या और तनाव के कारण उत्पन्न होते हैं। दूर-दराज के क्षेत्रों में उचित चिकित्सा सुविधाओं की कमी के कारण अक्सर लोग ओझा का सहारा लेते हैं, जो अक्सर गांव में एक परिवार या महिला को डायन के रूप में दोषी ठहराते हैं। जिसके परिणामस्वरूप इस तरह की हत्या होती है। दंड का दायरा घरों से निर्वासित करने से लेकर मौत की सज़ा तक होता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

गुवाहाटी मेडिकल कालेज और अस्पताल की मनोविज्ञान की सहायक प्रोफेसर दीपांजली मेधी का कहना है कि ग्रामीणों की खराब आर्थिक-सामाजिक स्थिति के अलावा, आतंकवाद, दंगे, और हिंसक आदोलन और कानून लागू करने वाली एजेसियों की इस तरह के अपराध में शामिल लोगों का दंडित करने में विफलता लोगों को ‘तत्काल न्यायÓ के लिए कानून को अपने हाथों में लेने के लिए उकसाती है।

उन्होंने कहा, जब लोग दूसरों को गोली मार कर हत्या कर देते हंै, बम विस्फोट में मौंते होती हैं और अक्सर पीडि़त को न्याय नहीं मिलता तो मृत्यु का डर कम हो जाता है और वे

तत्काल कानून न्याय के लिए अपने हाथों में ले लेते हैंÓ।

कानूनी सुरक्षा

मुंबई के एक वकील सदाशिव नारलेकर जो भीड़ हिंसा के पीडितों के लिए कार्य कर रहे एक एनजीओ के साथ काम कर रहे हैं उनका कहना है कि हाल में हुई हत्याओं के लिए सोशल मीडिया का दुरुपयोग वजह है। अधिकतर ग्रामीण सच्ची और झूठी खबरों के बीच अंतर करने में असमर्थ हैं, और इस प्रकार के संदेशों से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। वे जल्दी से कार्रवाई में कूद जाते हैं- यह बच्चा चुराने वाले और डायन के रूप में पहचाने गए लोगों पर हमला कर देते हैं। उन्होंने कहा,’ लोगों का एक ऐसा वर्ग जो सोशल मीडिया का ज्ञान रखता है इस तरह की स्थिति का लाभ उठाता है। किसी से बदला लेने के लिए और परिवार के प्रत िव्यक्तिगत असंतोष के लिए।Ó

अभी हाल में करबी एंग्लोंग जि़ले में दो युवकों की हत्या की जांच में भी यही तथ्य सामने आया। एक युवक जिसकी इस हत्याकांड में मुख्य आरोपी के रूप में पहचान और गिरफ्तारी हुई उसने पुलिस को बताया की नीलोटपाल और अभिजीत के साथ उसका छोटा सा झगड़ा हुआ। उसने ग्रामीणों को बताया कि दोनो बच्चों को चुराने वाले हैं। ग्रामीणों ने उसका भरोसा किया और उन दोनों को पकड़ लिया और मार डाला।

एशियाई मानव अधिकार आयोग, हांगकांग स्थित मानव अधिकार संगठन ने कहा कि,’भारत में भीड़ द्वारा हत्या को अपराधी सिद्ध करने और दंडित करने के लिए कोई विशेष दंड कानून नहीं है, इसलिए ऐसी गतिविधियों और हत्याओं में भाग लेने वाले भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत ही लाए जाते हैं। एनजीओ ने बताया कि,’ यहां हत्या के लिए धारा 302, गैर इरादतन हत्या के लिए धारा 304, हत्या का प्रयास करने के लिए धारा 307, स्वेच्छा से चोट पहुंचाने के लिए धारा 323, धारा 325 जानबूझ कर गंभीर चोट पहुंचाने के लिए और जब बड़ी संख्या में लोगों के समूह द्वारा अपराध करने की बात आती है तो धारा 34 आम इरादे के लिए, धारा 141 गैर कानूनी ढंग से इक_ा होने के लिए, आपराधिक षडय़ंत्र के लिए धारा 120 बी के साथ ही दंगों को अपराधी बनाने वाले प्रासंगिक वर्ग भी शामिल है।

इस दौरान भारत में एनजीओ ने नेशनल अभियान बैनर के तहत भीड़ के हाथों की गई हत्या के खिलाफ और दंड के लिए एक अभियान शुरू किया है।

मुख्यमंत्री की शिक्षिका पत्नी ने लगाई गुहार

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने पिछले जनता दरबार में एक शिक्षिका उत्तरा पंत बहुगुणा के फरियाद पूरी सुने बिना ही उसे कस्टडी में लेने का हुक्मनामा सुना दिया था। अब मुख्यमंत्री की शिक्षिका पत्नी सुनीता रावत ने गुरू वार देर रात डालनवाला थाने में एक मुकदमा अपने कथित विरोधी पर दर्ज कराया है। यह कथित विरोधी हैं भाजपा के पूर्व कार्यकर्ता सुभाष शर्मा।

यह मुकदमा सुभाष शर्मा, निवासी औली रोड, रायपुर के खिलाफ है। एसएसपी निवेदिता कुकरेती अनुसार सुभाष शर्मा ने सोशल मीडिया के साथ ही प्रेस मुलाकात मेें सुनीता रावत की शैक्षिणक योग्यता पर सवाल उठाए थे। पिछली 30 जून को सुभाष शर्मा ने शिक्षा विभाग को कटघरे में लेते हुए कहा था कि सुनीता रावत की शिक्षा तय मानकों के अनुरूप नहीं है। उनकी योग्यता भी तदनुसार नहीं है। ऐसे में उनकी नियुक्ति गलत है।

शर्मा ने सोशल मीडिया, फेसबुक और कई दूसरे माध्यमों पर दावा किया था कि सुनीता रावत को यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के रहमोकरम पर टीचर की नौकरी मिली थी। उनके शैक्षणिक दस्तावेज भी फर्जी हैं।

अपनी तहरीर में सुनीता रावत ने लिखा है कि वे 1992 से शिक्षा विभाग में सेवारत हैं और वर्तमान में अजब-पुरकलां में तैनात हैं। इसके पहले वे गौडल, कालसी, और खिर्सूं पौड़ी गढ़वाल के स्कूलों में ड्यूटी निभाती रही हैं। उनकी छवि को धूमिल करने और शिक्षा विभाग के प्रति गलत माहौल बनाने की यह साजिश है।

पुलिस ने तत्काल सुभाष शर्मा के खिलाफ धारा 569, 504 और 66 आई टी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया हैं। पूरे मामले की तहकीकात की जिम्मेदारी इंस्पेक्टर डालनवाला राजीव के सिपुर्द की गई है। एसएसपी के अनुसार जांच पूरी होते ही कार्रवाई की जाएगी।

शिक्षा ही काटेगी सांप्रदायिकता का जाल

मुस्लिम समाज के मुद्दों को लेकर कानूनों में बदलाव किए जा रहे हैं। उन पर भी बहस। और लाजिमी है कि कोई मौलवी भड़केगा, किसी महिला पर। महिला भी बोलेंगी, भाषा व व्यवहार अभ्रद होगा, हाथापाई होगी। अब चैनलों को एक और मुद्दा मिलेगा बहस का। मुद्दे ऐसे उठाओ जिसमें मुसलमान भी आपस में लड़ते रहे टीवी चैनलों पर। ऐसे मुद्दों पर बहस कराओ जो सुनने में तो सही लगते हैं किंतु उसमें मुस्लिम समाज का अंतर्विरोध उनकी कमियां निकल कर आएं। आपस में ही लड़ाओ और फिर मजे लेते रहो कि देखो मुसलमान तो होते ही ऐसे है। ऐसा लगता है जैसे सारी बुराईयां मात्र मुस्लिम समुदाय में ही हो।

केंद्रीय मंत्री गिरिराज दंगों के आरोपी से जेल में मिलते हैं और कहते हैं कि ”गिरफ्तारी नहीं सौहार्द चाहिएÓÓ। दूसरे केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा झारखंड हत्याकांड के आरोपियों को उनके मतदाता होने के कारण मिलते हैं, फूलों की माला डाली जाती है। सही बात है सौहार्द की ही तो ज़रुरत है आज देश में। मगर सत्ताधारी दल की ओर से दर्द, इंसानियत, शराफत औऱ ताजातरीन राष्ट्रीयता की परिभाषाएं अब धर्म देख कर बनाई जा रही हैं।

22 जून 2017 को हरियाणा में चलती ट्रेन में चाकू से गोद कर मारे गये 17 साल के हाफिज जुनैद की मां के शब्द बार-बार मुझे कोचते हैं। साल बाद इस ईद पर उनको मिला। इस ईद पर भी वह उतनी ही मायूस थी। उसकी मायूसी व्यवस्था को लेकर ज़्यादा थी कि कैसे अपराधी लोगों को अदालतें छोड़ रही हैं जिन्होंने एक बच्चे की इस तरह हत्या की। खुदा न करे किसी के साथ ऐसा खेल हो। आखिर उन पर दवाब किस बात का है? क्या अपने बच्चे के लिए भी वैसा ही दबाव महसूस करते?

दुबारा मिलने पर उन्होंने कहा कि गांव के कुछ लोग दवाब देते हैं समझौता करने पर किन्तु जब तक हमारी जिं़दगी रहेगी हम अपने बच्चे के लिए इंसाफ के लिए लड़ेंगे। हाफिज जुनैद के हत्यारों में से एक को छोड़ बाकी को अदालतों ने जमानत दे दी।

18 जून 2018 में हापुड़ के गांव में जिस तरह कासिम जो तथाकथित रूप से जानवर के कत्ल का दोषी मानकर मंदिर से एलान किया और जिस वहशीपन से उसकी हत्या की गई वो हत्यारों के बनाये विडियो से मालूम होता है कि एक इंसान तड़प रहा है और बहुत से युवा लड़के उसका वीडियो बना रहे हैं, चारों तरफ खड़े होकर उसे गालियां दे रहे हैं। 62 साल के सैमुद्दीन की दाढ़ी पकड़ कर उसे झूठ सच स्वीकार करने को कहा जा रहा है।

इसी विडियों पर पिलखुआ के थानाध्यक्ष लक्ष्मण वर्मा जी ने ‘अमन की पहलÓ के प्रतिनिधि मंडल को बताया कि वे इन सब युवाओं की मांओं को ढाई घंटे समझाकर, बिना किसी गिरफ्तारी किए लौटे हंै। वे 23 जून को उसी दिन कासगंज से यंहा ड्यूटी पर आए। वर्मा कासगंज की घटना पर बनी एसआईटी में थे।

उत्तर प्रदेश के कासगंज में 26 जनवरी को तिरंगा यात्रा के नाम पर जो उन्मादी घटना हुई, जिसमें चुनौती देकर 60 से ज्यादा बाइकर्स पतली सी गली वाले मुस्लिम मोहल्ले में घुसते हैं और वहां चल रहे तिरंगे के कार्यक्रम को बाइक से पार करने की कोशिश करते हैं। जिसके बाद लोगों के दबाव में वह बाइकों को छोड़कर भागते हैं और शहर में दूसरी जगह मुसलमानों पर हमले होते हंै। दुकानें जला दी जाती है। गिरफ्तार 60 के करीब गरीब मुसलमान हुए।

इस तिरंगा यात्रा में नेतृत्व कर रहे एक युवक चंदन की गोली से हत्या होती है जिस के जुर्म में दो मुसलमान जो इलाके के रसूख वाले व्यापारी परिवार से संबंधित हैं को गिरफ्तार किया जाता है। स्वर्गीय चंदन को तुरंत मुख्यमंत्री के यहां से लाखों की सहायता दी जाती है। हम मानते है कि मिलनी भी चाहिए। किन्तु उसी समय चली गोली में घायल अहमद जो कि एक हिंदू पत्थर वाले के यहंा पत्थर ढुलाई का काम करता था उसका ब्यान तक नही लिया गया किसी तरह की सहायता तो दूर की बात। वर्मा पिलखुवा हत्याकांड में शामिल लोगों को समझा कर लौट आए।

2015 में हरियाणा के फरीदाबाद जिले के अटाली गांव में एक मस्जिद के साथ ही देवी का एक स्थान गांव वालों ने बनाया इसी बात पर झगड़ा करके मस्जिद पर हमला हुआ मुसलमानों के घर पर हमले हुए घर जला दिए गए स्वर्गीय न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर के साथ हमने घरों की दीवारों को देखा और पाया सभी घर पूर्व योजना के तहत जलाए गए थे हालत इतनी गंभीर थे कि मुस्लिम महिलाओं और परिवारों को महीनों थाने में शरण लेनी पड़ी।

अभी ये चंद डरावनी घटनाएं हैं जहंा मातमपुर्सी में जा पाया। मुश्किल यह होती है कि आप कहीं खड़े हैं कोई बात शुरू करें बात तुरंत मुसलमान के ऊपर आ जाती है। चाहे वह देश के विकास का मसला हो, वह चाहे राम रहीम या आसाराम जैसे तथाकथित साधुओं का हों इस बात के लिए आरएसएस व भाजपा का आईटी सेल बहुत मेहनत से काम करता रहा है। पिछले 70 साल की बोई फसल को 4 साल में जिस तरह सरकारी खाद पानी से, नीतियों से, आभासी दुनिया से जिस तरह लहलहा दिया गया है वह कभी बदल पायेगा? यह एक बड़ा प्रश्न है इतिहास नई करवट ले रहा है।

इंदिरा गांधी के खिलाफ आपात्तकाल में आरएसएस को साथ लेना एक ऐतिहासिक भूल जय प्रकाश नारायण ने की। वे नही जान पाये की आरएसएस के नेता इंदिरा से पूर्ण सहयोग का वादा करके जेल से बाहर निकलने के माथा रगड़ रहे थे। जनसंघ के साथ बनी जनता दल की सरकार के समय जो सांप्रदायिकता का बीज सरकारी अमलों में फैलाया गया वो पेड़ बन कर भारत की पूरी धर्मनिरपेक्ष धरती को ढक गया है। जेपी यह नहीं भाप पाए थे कि आरएसएस कितने छद्मी भेष बदलकर काम करती है। अब सब सामने आ गया है। 2014 से जिस तरह आरएसएस का महिमामंडन हुआ है, हिंदू राष्ट्र की उनकी कल्पना जैसे साकार होती दिख रही हो।

यूपी बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी जैसे लोग भी नई सरकार के तलवा चाट बन रहे हैं। तीन तलाक जैसे मुद्दों पर जो कि सुनने जानने में तो बहुत प्रोग्रेसिव लगता हैं, किंतु असल में मुसलमानों को विभाजित करना, प्रताडि़त करना उसका एक छुपा उद्देश्य है। पिछले 4 सालों में कहीं भी दक्षिण भारत की देवदासी प्रथा पर कोई प्रहार नहीं है, जिक्र तक नहीं। दूसरी तरफ खोद-खोद कर मुसलमानों की धार्मिक आस्थाएं, उनके रहन सहन की, खाने पीने के, सामाजिक तौर तरीके, परंपराएं, पहनावे सब पर आलोचनात्मक खुली चर्चा हो रही है। मुस्लिम त्योहारों तक पर गंदगी की गई है। इंदौर की एक महिला विधायक ने बकरईद पर बकरे की जगह अपने बच्चे की कुर्बानी देनी चाहिये जैसी घटिया बात तक उछाली।

देश के पूरे ताने-बाने को हिंदू-मुसलमान में पुरजोर तरीके से बुनने की कवायद चालू है। अब जैसे-जैसे 2019 चुनाव नजदीक आएंगे यह गंदगी और बढ़ेगी।

हत्याओं जैसे मुद्दे पर भी मुसलमानों की कहीं कोई उत्तेजित प्रतिक्रिया नहीं आई। आरएसएस यह मानकर खुश हो सकती है कि मुसलमान उनसे डर गए। वैसे वह भी चाहती है कि कहीं कोई मुसलमान इन सब बातों से परेशन होकर गोली चला दे या बम चला दे मुसलमानों की सब्र को तोडऩे की कोशिश कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि सब्र टूटे ताकि फिर वह मुसलमानों पर आक्रमक पलटवार कर सकें। आरएसएस मुखिया भागवत के शब्दों में आरएसएस के स्वयंसेवक युद्ध के लिये तीन दिन में तैयार हो जाएंगे। वह जानते हैं सीमा पर काली टोपी वाले कभी नहीं जा सकते। पिछले 4 साल में 70 साल के फैलाये जहर का सफल परिक्षण किया गया है। नतीजे में कहीं भी बिना किसी लंबी तैयारी किये, भीड़तंत्र खड़ा करके गाय के नाम पर हमले करने पर जो सफलता हासिल की है उससे वे आश्वस्त हैं कि हिंदू राष्ट्र के लिए संघर्ष करने को आरएसएस तैयार हैं। देश भर में आरएसएस किसके खिलाफ रोज हथियारबंद होकर अभ्यास करता हैं। हिंदू आतंकवाद शब्द पर वह बिलबिला जाते हैं यह बिलबिलाना ही बताता है कि हिंदू आतंकवाद देश में बहुत तेजी से फैला है। भीड़तंत्र का नाम बहुत हल्का नाम है। ये हिंदू आतंकवाद है। आरएसएस की सफलता ये भी रही कि उन्होंने जो भी काम किए अब उनको बदलने की हिम्मत विपक्षी दलों की नहीं रही बल्कि उन्होंने कांग्रेस के हिंदू चेहरे को उभारा है।

26 जनवरी 2018 की कासगंज की घटना हो या गाय के नाम पर देश भर में हुई हत्याएं। इसमें विपक्षी दल कांग्रेस बसपा समाजवादी पार्टी भी चुप नजर आई है। आखिर मुजफ्फरनगर समाजवादी पार्टी के समय की ही देन है हिंदू वोटों के डर से अपराध को अपराध की तरह नही देखा गया।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि इस राजनैतिक संरक्षण प्राप्त हिन्दू आतंकवाद का मुसलमान क्या उत्तर दें?

आने वाले चुनावों में ज़रूर मुसलमानों को विपक्षी दलों का साथ देना पड़ेगा मगर मुस्लिम युवाओं को यह समझ जाना चाहिए कि आरएसएस के बिछाए जा रहे इस जाल से अगर निकलना है तो उन्हें लिखाई पढ़ाई में आगे आना होगा। देश भर में आंदोलन की शक्ल में उन्हें शिक्षा की मुहिम को बढ़ाना होगा। मदरसों में हिंदी, अंग्रेजी और अन्य विषयों को भी बेहतर तरीके से पढ़ाना होगा। हर एक पढ़े लिखे मुस्लिम को गरीब और कमजोर तबके के मुसलमानों को बेहतर शिक्षा देने के लिए काम करना होगा। अखलाक की हत्या के अलावा ज़्यादातर हत्याएं गरीब अनपढ़ और दूरस्थ इलाकों में रहने वाले तबकों के मुसलमानों की हुई हंै। 18 जून को हापुड़ में हुई कासिम की हत्या के परिवार वाले अनपढ़ हैं वह अपनी चि_ी तक नहीं लिख सकते। उनके आस-पास भी कोई ऐसा नहीं जो ऐसे तमाम लोगों की मुकदमे भी आगे कैसे बढ़ पाएंगे। ये समस्या हर केस में आने वाली है।

मुसलमानों के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि वे सच्चर समिति की रिपोर्ट को जिसे कांग्रेस ने भी लागू नही किया और इस सरकार से लागू कराने की तो अपेक्षा ही नहीं रखनी चाहिए। किंतु उसमें बहुत सारी चीजें ऐसी हैं जो मुसलमानों को खुद आगे बढ़कर अपने समाज के लिए करनी चाहिए। सभी समाजो में समय के साथ कुरितियंा भी पनपती जाती हंै। ज़रुरत है कि इन कुरीतियों पर टीवी चर्चाओं में बहस न करके समाज को शिक्षित किया जाये। टीवी की बहस सिर्फ बदनाम करने का ही तरीका है। मुसलमानों को यह साबित करने की कोई ज़रुरत नही की वे कितने देशभक्त है। देश में आरएसएस के बनाये जा रहे मुस्लिम विरोधी वातावरण को, हवा में फैलाये जा रहे जहर को, आरएसएस के बिछाये जाल को तोडऩे का तरीका एक शैक्षिक आंदोलन ही होगा। राजनैतिक समझ के लिये, कानूनी लड़ाईयों के लिये, अपने समाज को ऊंचा उठाने के लिये, इस्लाम की सही बातों को सामने लाने के लिये मुस्लिम युवाओं को ही आगे आना होगा। यह बड़ी चुनौती उनको उठानी ही होगी।

मुझे यह आशा बनी अलीगढ़ की घटना के बाद। मई, 2018 के पहले हफ्ते में देश के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर भगवाधारियों की फैमिली के बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी विश्वविद्यालय के छात्रों पर के विरोध प्रदर्शन पर पुलिस द्वारा नाजायज हमला किया गया उनकी परीक्षाओं के दिन में उनको मारा पीटा गया मुकदमे लादे गए। किंतु कोई उत्तेजनात्मकपूर्ण प्रतिक्रिया छात्रों की और से नहीं आई वे शांतिपूर्ण धरना देते रहे धरने पर अपनी किताबें भी पढ़ते रहे परीक्षाओं की तैयारी भी करते रहे।