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सेना के व्यूह मेंफंसा पाक लोकतंत्र

सेना के बड़े तबके के अधिकारी छोटे देशों में जब अपने पद की महत्ता अपने अधिकार और अपनी ताकत का जायजा ले लेते हैं तो उनमें भी देश का राज-काज संभालने का जज़्बा उफान मारता है। देश जितना छोटा होगा उतने ही आसार होंगे सैनिक क्रांति के। यह बात एशिया, अफ्रीका में प्रमाणित भी है। बड़े देश मेें यह संभावना लगभग असंभव है क्योंकि सेना की परस्पर विरोधी इकाइयां साथ नहीं दे पातीं।

भारतीय उप महाद्वीप में पाकिस्तान में सेना तीन बार देश की बागडोर अपने हाथ में ले चुकी है लेकिन कुछ समय बाद देश और विदेश में जब लोकतंत्र की मांग बढ़ती है तो सेना की देखरेख में चुनाव होते हैं। अमूमन सैनिक समर्थक राजनेता ही सरकार चलाने का मौका पाते हैं। इस बार भी सेना की मर्जी से ही इमरान गद्दीनशीं हुए हैं। देश में आंतरिक सुरक्षा और विदेश नीति तो रहेगी सैनिक अधिकारियों के भरोसे। प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी होनी कि वह देश में बिजली, पानी, स्वास्थ्य, सड़क, शिक्षा आदि से संबंधित विकास योजनाएं अमल मेें लाए। इससे जनता का आक्रोश सेना के जिम्मे नहीं आएगा और सेना अपनी जिम्मेदारी निभाती रहेगी। जाहिर है कि जब जनता की आकांक्षाएं पूरी नहीं होगी तो नए प्रधानमंत्री को लोकतंत्र के नाम पर लाने का सिलसिला चलता रहेगा।

पाकिस्तान की आज़ादी के भी लगभग 70 साल हो चुके हैं। इसमें सेना ने खुले तौर पर देश में राज किया। भारत में हुए मुंबई हमलों के बाद 2008 मेे जनरल कयानी ने चुनाव की घोषणा थी। सेना अपनी वह छवि सुधारेगी जो जनरल मुशर्रफ की सत्ता के दौरान पाकिस्तान की बनी। सेना ने फौरन यह दिखाया कि भारत हमलावर की हैसियत में हमेशा रहता है। इससे बचे रहना ज़रूरी है। पाकिस्तान में सेना ने 1990 के दशक में चुनी हुई सरकारों को किस तरह पदों से मुक्त किया। यह सभी जानते हैं।

पाकिस्तान में पीपुल्स पार्टी की सरकार थी। इसने एक कोशिश की आईएसआई को लोकतांत्रिक सरकार के सामने जवाबदेह बनाने की। सेना ने इसका खासा प्रतिवाद किया। इसके बाद ही अमेरिकी नेवी एसईएएल के जवानों ने 2011 में एबोटाबाद में ओसामा बिन लादेन को मार डाला। सेना की खासी बदनामी ‘मेमोगेट’ कांड से भी हुई जिसमें पाकिस्तान के तब के वाशिटंगन राजदूत हुसैन हक्कानी पर पाक सेना के खिलाफ अमेरिकी सेना के साथ सहयोग करने का आरोप लगा था।

पाकिस्तान की सेना के लिए भारत हमेशा एक चुनौती रहा है। नवाज शरीफ, जिया उल हक के जमाने मेें बने राजनीतिक थे। उनका और सेना के बीच विवाद 1997 से शुरू हुआ। तब वे बतौर प्रधानमंत्री दूसरी बार चुने गए थे। उन्होंने खुद जनरल परवेज मुशर्रफ को सेना का प्रमुख चुना। भारत के प्रति सेना उनके उदार रुख को पसंद नहीं कर पाती थीं। साथ ही लाहौर डिक्लैरेशन और कारगिल के मुद्दे यों भी नासूर ही थे।

जब 2013 में तीसरी बार नवाज शरीफ प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने मुशर्रफ पर मुकदमा चला कर सेना को एक झटका दिया। साथ ही सेना की अनुमति बगैर वे नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री होने के मौके पर नई दिल्ली पहुंच गए। उन्होंने बाद में सेना में जनरल अशफाक परवेज कयानी के उत्तराधिकारी जनरल रहील शरीफ को चुना। जनरल शरीफ ने इमरान की नुक्कड़ रैलियों का इस्तेमाल किया और राजनीतिक समाधान की बात की। दिसंबर 2014 में पेशावर आर्मी स्कूल पर हमला हुआ जिसमें एक सौ से ज्य़ादा बच्चे मारे गए। इस पर जनरल के हाथ बंध गए और उन्होंने वजीरिस्तान में आतंकवादियों पर कार्रवाई की। लेकिन 2016 में जनरल और शरीफ के बीच तलखी और बढ़ी। यह तभी से साफ हो गया कि सेना कतई इस पक्ष में नहीं है कि पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) (पीएमएल (एन)) चुनाव जीते। डॉन दैनिक ने अक्तूबर 2016 में यह खबर दी थी कि नवाज शरीफ के भाई शहबाज शरीफ के साथ सिविल सरकार के सेना के बड़े अफसरों की बैठक हुई। इसमें शहबाज के जिहादियों के साथ सेना के संबंधों पर बातचीत हुई। यह दौर है जब उड़ी हमला हुआ था और भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक की थी।

जब सुप्रीम कोर्ट ने पनामा पेपर्स के मामले में नवाज को अपराधी घोषित किया तो उन्होंने कहा कि न्यायिक क्रांति के जरिए सेना ने उनसे पीछा छुड़ा लिया है।

डॉन मीडिया समूह के सीईओ हमीद हारून ने बीबीसी को एक साक्षात्कार में कहा था कि सेना ने मीडिया समूहों पर व अदालतों पर भी दबाव बना रखा है। सोशल मीडिया के ब्लॉगर और कार्यकर्ता रहस्यमय तरीके से अचानक गुम हो रहे हैं। अभी हाल इस्लामाबाद हाईकार्ट के जज ने आरोप लगाया था कि आईएसआई ने मुख्य न्यायाधीश से कहा था कि नवाज और उनकी बेटी मरियम को चुनाव होने तक जेल में रखने का फैसला सुनाए। इंटरसर्विसज पब्लिक रिलेशंस के मेजर जनरल आसिफ गफूर ने जज के आरोप को निराधार बताया और सुप्रीम कोर्ट से छानबीन को कहा। उन्होंने कहा कि सेना सिर्फ कानून और व्यवस्था का पालन कर रही है। चुनाव में इसकी कोई भूमिका नहीं है।

भाषा में एक हो जाती है सच्चाई और सपना

कविता के सिलसिले में सच्चाई और सपनों के बीच उतनी दूरी नहीं होती जितनी कि सामान्य जीवन में हम प्राय: मानते बरतते हैं। कविता में सच्चाई की डोर सपने में बंधी होती है और अक्सर सपने ही सच्चाई में बदलते हैं। कविता के बुनियादी तत्व स्मृति और कल्पना कभी कविता को अकेला नहीं छोड़ते। सच्चाई, सपने, स्मृति और कल्पना ही फिर कविता को जांचने-परखने के आधार बन जाते हैं।

नीलिमकुमार की असमिया कविता कई कई सपनों के बरामदों से पार होती रहती है। कभी हमें वह सपने से सच्चाई की ओर और कभी सच्चाई से सपने की ओर ठेलती है। इस कविता में आत्मविश्वास है पर अपनी विडंबना का तीखा अहसास भी। उसके भूगोल में बहुत सारी चीजें हैं- बारिश, धूप, नींद, दोपहर, जायदाद, दरवाजा, खाली घर, सुअर, अजगर, नदी, पेड़, आईना, आकाश, गाड़ी, मां, टूटा गिलास, खाने की मेज, जंगल, बगीचा, अतिथि, साथी, तारा शिलांग, समंदर, मात्रा, बटन, फुटपाथ, मोनोपॉज आदि। यह कविता हमें अपने आसपास और पड़ोसी की वे चीजें दिखा रही है जिन्हें हम अक्सर ध्यान नहीं देते। भाषा जिस मुकाम पर पलभर थामती हैं। वह ऐसी जगह है जहां सच्चाई और सपना एक हो जाते हैं। कविता जगह होती हैं। हमें उसमें ठहर, रम सकते हैं। वहां से दुनिया को अलग कोण से देख-महसूस कर सकते हैं। अपनी सच्चाई को बिछा कर उस पर स्मृति और सपने ओढ़ कर आराम कर सकते हैं। भागदौड़ और आपा-धापी में कुछ बिलंब सकते हैें।

कविता कम से कम नीलिम कुमार की कविता निपट लौकिकता में सनी-बंधी कविता है। वह हमारे समय और संसार से हमें कोई मुक्ति नहीं देती है पर अपनी स्थानीयता, लालित्य और सूक्ष्मता से हमें उनमें रमने, गृहस्थ होने का अवकाश देती है। वह अनुरोध करती है तुमसे तुम्हारे कंधे पर हाथ रख कर साथ चलने के लिए। वह सहचर कविता है। उसके होने से हमें लगता है कि हम साथ हैं और हैं, दूसरे हंै जैसे धूप दर-दर भटकती है। वैसे ही यह कविता भटकती है संग साथ की तलाश में।

हिंदी अनुवाद में धौली बुक्स से प्रकाशित नीलिम कुमार के इस संचयन का आना, हिंदी में हमारे समय के एक भारतीय कवि का हमारी भाषा में आगमन है जिसके लिए अनुवादक मित्रों का कृतज्ञ हुआ जा सकता है।

भारत भवन: समकालीन को समेटने की कोशिश

अमेरिका की रजर्स यूनिवर्सिटी में अध्यायन करने वाली अंजलि नर्लेकर ने मराठी-अंग्रेजी कवि अरूण कोलटक पर एक बहुत दिलचस्प पुस्तक लिखी है, ‘बांबे माडर्न: अरूण कोलटकर एंड बाइलिंगुएल लिटररी कल्चरÓ इसे भारत में स्पीकिंग टाइगर ने प्रकाशित किया है पुस्तक में साठोत्तरी कविता, छोटी पत्रिकाओं की भूमिका छोटे प्रकाशकों, अनुवाद लोकल और ग्लोवल पर अरूण की कविता और जीवन पर गहराई और समझ सहानुभूति से विचार किया गया है। ऐसी कोई आलोचना या अध्ययन हिंदी में किसी कवि या प्रवृति को लेकर लिखा गया हो, यह मेरे ध्यान में नहीं है।

अरूण कोलटकर का भारत भवन से अच्छा संबंध था। उसके विश्वकविता समारोह में उन छह भारतीय कवियों में से थे जिन्हें आमंत्रित किया गया था और जिन्होंने उसमें भाग लिया था। वे वहां के कवि भारती और एशिया कविता समारोह में भी आए थे। भारतीय समारोह के तहत अमेरिका में आयोजित भारतीय कविता समारोह और स्वीडन में हुए भारतीय साहित्य समारोह मेें भी वे शामिल हुए थे। अंजलि जी को, जो मुझसे भारत भवन के संबंध में मिलीं, यह याद था कि अमेरिकी कवि द्वय एलेन गिंसबर्ग और एन वाल्डमैन द्वारा चलाए जा रहे नरोपा इंस्टीच्यूट में अरूण, केदारनाथ सिंह और मैनें काव्यपाठ किया था।

अंजलि यह समझना चाह रही थीं कि उस समय भारत भवन में इतनी सारी भाषाओं के लेखकों से संपर्क, आवाजाही अनुवाद आदि किस दृष्टि से संभव हुए थे। उन्हें यह तो पता था कि साठोकिरी कविता की प्रवृति सिर्फ मराठी तक सीमित नहीं थी। मैंने उन्हें यह बताने की कोशिश की कि साठोत्तरी कविता लगभग अखिल भारतीय प्रवृति थी जो हिंदी बांग्ला, कन्नड़, मलयालम आदि अनेक भाषाओं में देखी जा सकती है। चूंकि भारत भवन की, मेरे कारण कविता में विशेष रु चि और सक्रियता थी उसे वहां एक बड़ा मंच भी मिल गया था।

फोर्ड फाउंडेशन की एक ग्रांट के अंतर्गत हमने कवियों और अनुवादकों को साथ बैठा कर उनके हिंदी अनुवाद कराए थे। इनमें बांग्ला के शंख घोष, और शक्ति चट्टोपाध्याय, मराठी के दिलीप चित्रे और मलयालम के सच्चिदान दन शामिल हुए थे। उनकी कविताओं के अनुवाद उस समय राजकमल से प्रकाशित भी हुए थे।

भारत भवन की आकांक्षा भारत की समकालीनों को उसकी सारी बहुलता, जीवतता, साहसिकता वैचारिक सुदृढ़ता प्रश्नवाचकता, प्रश्नवाचकता में समेटते और प्रस्तुत करने की थी। उसने लोक और शास्त्र के बीच की दूरी और अलगाव, विद्वत्ता और सृजन, भाषाओं आदि के बीच अलगाव को दूर करने की आयोजनात्मक कोशिश की। उसे तब इस प्रयत्न में व्यापक समर्थन मिला था। हिंदी के वामपंथियों में भारतभवन को लेकर मतभेद थे। हालांकि उनके सबसे महत्वपूर्ण सहर्ष आते थे। अन्य भाषाओं के वामपंथी इस पहल का मुखर-सक्रिय समर्थन करते थे। स्थानीय मीडिया का अधिकांश तो विरोध और लांछन में ही व्यस्त रहता था। अंजलि अभी भारतभवन पर एक लंबा अध्याय अपनी नई पुस्तक में लिखने जा रही है। पर कोई पुस्तक उस पर लिखी जाए इससे वे सहमत हैं। खास कर उस दौर पर।

मराठी कविता का समकाल

समकालीन 62 मराठी कवियों में जिनमेें अधिकांश युवा हैं पर जिनमें नामदेव ढसाल, मलिका अमर शेष आदि भी शामिल हैं। एक पुस्तक प्रकाश भातम्ब्रकर के संपादक और अनुवाद में हिंदी में विजयाबुक्स ने प्रकाशित की है। भाषा, दृष्टि, शैली आदि की जैसी विविधता ऐसे किसी संचयन में हिंदी में होगी वैसी ही मराठी में भी है। यह बात बार-बार दुहराने की है कि प्राय: हर भाषा में कविता अब आंदोलन मुक्त-वाद-मुक्त हो चुकी है। उसकी प्रासंगिकता और जीवंतता का यह एक प्रमुख आधार है।

प्रकाश खरात की कविता समाप्त होती है इन पंक्तियों से

न मैं रात का प्रतिनिधि हूं न दिन का दरवेश

फिर क्यों उजीचता रहूं अंधेरे को?

सान पर क्यों चढ़ा दूं तेग को?

भीतरी कशमकश का पुरजोश अब धीमा पड़ गया है

और पारा उतर गया है पुरकाशिश खालिश लम्हों का

टूट कर गिर चुका है पूर्ण चंद्र का झाडिफ़ानूस……

जन्म-मृत्यु की अफरा-तफरी में

बदजात जमाने के बरक्स

मैं छितर बिखर रहा हूं अब

हेमंत दिवते पूछते हैं

बासी बुसी सुखेड़ी खाए

भूखे बच्चे की भाषा का क्या हुआ?

आम बच्चों की भाषा का क्या हुआ?

खेल-खेल में टायर को

गांव के ओर-छोर घुमाने वाले

बच्चों की भाषा का क्या हुआ?

कंचे, अपड़ा-थपड़ी खेलने वाले

दिनकर मनवर की पंक्तियां हैं-

पानी स्पृश्य है या अस्पृश्य?

पानी पहले या कि ब्रहम?

पानी ब्राहमण है या कि क्षत्रिय या वैश्य

पानी शूद्र होता है या अति शूद्र

पानी सिर्फ पानी ही बना रह सकता

इस वर्तमान में।

चौकीदार नहीं, भागीदार: राहुल

अविश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के तेवर एकदम बदले हुए थे। बिना किसी दुराव- छिपाव के उन्होंने बड़ी ही शालीनता से अपनी बात सदन में रखी। वे तकरीबन 50 मिनट बोले। उनके भाषण के दौरान टोका-टाकी, शोर और खिसियाई हंसी के बावजूद अपनी बात रखने से राहुल नहीं चूके।

उन्होंने अपने भाषण में किसानों, दलितों और महिलाओं के साथ ही छोटे उद्योगों, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार पर सबका ध्यान खींचा। राहुल ने अपने भाषण में कहा कि रक्षामंत्री ने कहा था कि वे देश को राफेल हवाई जहाज का दाम बताएंगी। लेकिन फिर उन्होंने कहा कि करार के चलते वे ऐसा नहीं कर सकती। जबकि फ्रांस के राष्ट्रपति ने मुझसे कहा कि ऐसा कोई करार भारत पाक के बीच है ही नहीं।

प्रधानमंत्री का कुछ कारोबारियों के साथ अच्छे संबंध है। तो खर्च प्रधानमंत्री की मार्केटिंग में लगता है वह कौन उठाता है, यह सभी जानते हैं। चुनाव बाद ऐसे कारोबारियों को ही फिर हजारों करोड़ रुपए का लाभ मिलता है।

जुमले याद कीजिए- पहला था, हर व्यक्ति के खाते में 15 लाख रुपए मात्र आएंगे। दूसरा था,दो करोड़ युवाओं को रोज़गार मिलेगा। लेकिन पांचवा साल शुरू हो गया किसी को कुछ भी नहीं मिला।

दलितों-आदिवासियों पर अत्याचार होते हैं तो प्रधानमंत्री कुछ नहीं बोलते। उनके सहयोगी मंत्री ही हमलावरों को जाकर हार पहनाते हैं।

अपने आलोचकों द्वारा उन्हें हंसी का पात्र बनाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे शब्दों का भरे सदन में उन्होंने उल्लेख भी किया। उन्होंने खुद को शिवभक्त और हिंदू भी बताया। उन्होंने अपने भाषण और पूरे बॉडी लैंग्वेज से यह जता दिया कि वे मुद्दों पर भाजपा और आरएसएस का विरोध करते रहे हैं। उनके दिल में किसी के लिए कोई बैर नहीं है।

मेरे दिल में पीएम के खिलाफ गुस्सा या नफरत नहीं है। मैं तो पीएम, भाजपा और आरएसएस के प्रति आभारी हंू जिन्होंने मुझेे हिंदुस्तानी होने का अर्थ समझाया। वे लाठी मारें या झूठ बोलें लेकिन देश के प्रति प्यार होना चाहिए। आपने मुझे हिंदू होने का मतलब समझाया। आपका धन्यवाद। यह हमारे देश का इतिहास है। आपके लिए मैं पप्पू हंू। लेकिन मेरे दिल में आपके लिए नफरत नहीं है। मैं कांग्रेस हूं। आपके दिल से नफरत बाहर निकालूंगा। आप सबको कांग्रेस में बदलूंगा।

राहुल ने कहा, देश में जिस किसी को उठाकर पीट दिया जाता है पीएम चुप रहते हैं। उन्होंने कहा जब ऐसी बात होती है तो फजऱ् बनता है, देश को बताएं। सत्ता के शोर के बावजूद राहुल ने बोलना जारी रखा, जब भी किसी को पीटा कुचला जाता है तो यह अंबेडकर के संविधान पर हमला होता है। जब आपके मंत्री संविधान बदलने की बात करते हैं, तो देश के संविधान की ‘इंसल्टÓ करते हैं। हम ऐसा नहीं होने देंगे।

कुछ ही दिन पहले एक नया जुमला सुनने मे आया। यह एमएसपी का जुमला था। प्रधानमंत्री ने पूरे देश में दस हजार करोड़ मात्र का फायदा दिया। कर्नाटक की सरकार ने सिर्फ एक प्रदेश में 34 हजार करोड़ का फायदा दिया। किसान कहता है, प्रधानमंत्री जी हिंदुस्तान के सबसे अमीर लोगों का ढाई लाख करोड़ का कजऱ् माफ किया। हमारा भी थोड़ा कजऱ् माफ कीजिए। लेकिन वित्तमंत्री कहते हैं नहीं, किसानों का कर्जा माफ नहीं होगा।

‘सोशल मीडिया पर विपक्ष को ऑफेंसिव होकर जवाब देंÓ

विपक्ष जब भी सोशल मीडिया पर भाजपा के खिलाफ बोले तो कार्यकर्ता और नेता आफेंसिव होकर उसका जवाब दें। यह कहना है उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का। उन्होंने कहा विपक्ष सरकार को बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया पर तरह-तरह के हथकंडे अपना रहा है। जिसका मुकाबला पार्टी कार्यकर्ताओं को करना है। हमारा साथ 2014 के लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया ने भी दिया। लेकिन जनता दरबार में व्यापारी की खुदकुशी और शिक्षिका उत्तरा के मामलों के सकारात्मक संदेश भाजपा पार्टी के कार्यकर्ता नहीं पहुंचा सके।

बूथ मजबूती व लोकपर्वों में कार्यकर्ताओं का मेलमिलाप बढ़े

भाजपा कार्यकर्ताओं से कहा गया है कि वह एक-एक बूथ के मतदाताओं से लगातार संपर्क रखें। हर एक बूथ के मतदाता का डाटा मोबाइल पर हो। भाजपा सरकार की योजनाओं को मतदाताओं के वे बता सकें।

उत्तराखंड में और दूसरे प्रदेशों में छोटे-बड़े सभी लोकपर्वों में भाजपा कार्यकर्ता बढ़-चढ़ कर हिस्सा लें। इससे अपनत्व बढ़ सकेगा। उत्तराखंड सरकार के कामों को भाजपा कार्यसमिति की दो दिन की काशीपुर में हुई बैठक में मंजूरी मिल

गई।

१५ साल बाद आया अविश्वास प्रस्ताव

भारतीय संसद के इतिहास में मोदी सरकार के दौर में पेश अविश्वास प्रस्ताव 27वां है। जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी तो 15 बार अविश्वास प्रस्ताव आया। दो प्रस्ताव लालबहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री होने के दौरान, दो मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्रित्व में और तीन पीवी नरसिंहराव के प्रधानमंत्री रहने पर। राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी को भी नरेंद्र मोदी की तरह एक-एक अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा।

पहला अविश्वास प्रस्ताव 1963 में जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व में जेबी कृपलानी ने रखा था। सोनिया गांधी ने 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। तब वाजपेयी सरकार ने इस्तीफा दिया। मोरारजी देसाई ने 1979 में अधूरी बहस के दौरान ही इस्तीफा दे दिया था।

फसलों के बढ़े न्यूनतम समर्थन मूल्य की जानकारी किसानों को दें

केंद्र सरकार ने फसलों के बढ़े न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की है वह ऐतिहासिक है। उत्तराखंड सरकार यह व्यवस्था करेगी कि राज्य में वह अमल में आती दिखे। इससे किसानों के घर-घर जाकर कार्यकर्ताओं को बताना चाहिए।

कांगे्रस ने रविवार को अहम बैठक में लोकसभा की 300 सीटों पर जीत की रणनीति बनाई है। एनडीए के खिलाफ रणनीतिक गठबंधन होगा। लेकिन शर्त होगी नेतृत्व राहुल गाधी को और केंद्र में कांग्रेस।

चिदंबरम का मानना है कि 12 राज्यों में कांग्रेस मजबूत है। अगर अपनी क्षमताओं में तीन गुना इजाफा करे तो 150 सीटें मिल सकती हैं। दूसरे राज्यों में गठबंधन से 150 सीटें मिल सकती हंै।

राहुल का चेहरा और केंद्र में कांग्रेस की वकालत सचिन पायलट, शक्तिसिंह गोहील और रमेश ने की। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में जनार्दन द्विवेदी और दिग्विजय सिंह इस बैठक में नहीं दिखे। इन्हें राहुल ने नई सीडब्लूसी में शामिल नहीं किया। हालांकि इन्हें न्यौता गया। सोनिया गांधी मनमोहन वरिष्ठ सदस्य है। इस साल के विस चुनाव 2019 की लोकसभा के लिए पार्टी की कोर टीम गाठित होगी। पिछले दिन 31 सदस्यों की कार्यसमिति गठित हुई थी जिसमें 23 सदस्य 18 स्थाई आमंत्रित और दस विशेष आमंत्रित सदस्य थे। पिछले साल दिसंबर में कांग्रेस की कमान राहुल ने संभाली अनुभवी युवा नेताओं में संतुलन रखने की कोशिश की

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा 2022 तक किसानों की आमदनी दो गुनी करने के लिए कृषि क्षेत्र में 14 फीसद सवृद्धि दर की दरकार है जो कहीं दिखती नहीं। सोनिया ने कहा नरेंद्र मोदी की भाषण शैली में अब मायूसी नज़र आती है इससे लगता है उलटी गिनती शुरू हो गई है।

राहुल ने नई कांग्रेस कार्यकारिणी समिति (सीडब्लूसी) की पहली बैठक में पार्टी कार्यकर्ताओं से देश के दलितों और गरीबों के लिए लडऩे का आग्रह किया। उन्होंने कांग्रेस को भारत की आवाज बताते हुए कहा कि पार्टी पर भविष्य और वर्तमान की जिम्मेदारी है। सीडब्लूसी के पास अनुभव और ऊर्जा है यह अतीत वर्तमान और भविष्य के बीच एक सेतु है।

मोदी जीते अविश्वास प्रस्ताव राहुल ने दिखाया आत्मविश्वास बार-बार चीख कर आप देश को गुमराह कर रहे: मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (20 जुलाई) को संसद में लाए गए विपक्ष के प्रस्ताव को खानदानी जमाने की कोशिश करार दिया। उन्होंने कहा, यहां हैं क्योंकि हमारे पास संख्या बल है। सवा सौ करोड़ देशवासियों का हमें आशीर्वाद है। आप इस अविश्वास प्रस्ताव के जरिए उन लोगों का अपमान न करें।

सदन में पेश अविश्वास प्रस्ताव का जवाब दे रहे थे प्रधानमंत्री। उन्होंने कहा राफेल विवाद यहां छेड़ा गया। मैं कल्पना नहीं कर सकता कि सत्य को इस प्रकार रौंदा जाता है। बार-बार चीख कर आप देश को गुमराह करने का काम कर रहे हो। यह दुखद है कि इस सदन मेें लगे आरोप पर दो देशों को खंडन करना पड़ा। देश की जनता भली-भांति जानती है कि अब सुधरने का मौका है। मैं देशवासियों को विश्वास दिलाना चाहता हूं कि यह समझौता दो जिम्मेदार सरकारों के बीच पूरी पारदर्शिता से हुआ।

इसके पहले केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बहस में भाग लेते हुए कहा संसद में बेवजह अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। जो पार्टियां इसे लाई उनका आपस में भरोसा नहीं है। आज जो विपक्ष एकजुट दिख रहा है, नेता चुनने के वक्त यह बिखर जाएगा।

देश की सुरक्षा स्थिति को बेहतर बताते हुए उन्होंने कहा चार साल में एक भी बड़ी आतंकवादी घटना नहीं हुई। पूर्वोत्तर में उग्रवाद घटा है। हमने कभी अपने सैनिकों के हाथ नहीं बांधे, जिसका नतीजा है, वे आतंकियों का खुलकर मुकाबला कर रहे हैं।

लोकसभा में चर्चा में हिस्सा लेते हुए राहुल गांधी ने राफेल लड़ाकू विमान सौदे में अनियमितता का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, इस सौदे पर रक्षामंत्री ने भी असत्य कहा। प्रधानमंत्री चौकीदार नहीं, बल्कि भागीदार हैं। उन्हें यह बताना चाहिए कि राफेल सौदे का प्रारूप अचानक क्यों बदला गया। इसका जवाब देते हुए रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, समझौते की जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती।

संसद में कुल सदस्य हैं 533 इनमें सदन में अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष के 201 सदस्यों ने रखा था। इसमें 37 सदस्य गैर हाजिर थे। एनडीए के 295 सदस्य एकजुट थे। इस अविश्वास प्रस्ताव पर बहस की शुरूआत भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए में अभी हाल तक साथ रही तेलुगु देशम ने रखा जिसे कांग्रेस और अन्य पार्टियों ने समर्थन दिया। अविश्वास प्रस्ताव गिरने का अनुमान सभी विपक्षी नेताओं को था क्योंकि 2014 में प्रचंड बहुमत पाकर भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी थी।

लेकिन इस अविश्वास प्रस्ताव के जरिए विपक्ष ने देश में बढ़ती बेरोज़गारी, बढ़ते भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा में चूक, आदि मुद्दों को संसद के जरिए पूरे देश के सामने फिर रखा। सत्ता का नेतृत्व संभाल रही पार्टी ने वही पुराना राग कि हर बुराई की जिम्मेदार वह कंाग्रेस सरकार है जो 44 साल से राज करती रही है। फिर चार साल में नई सरकार ने क्या कुछ कर दिखाया। देश भर में धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए भीड़तंत्र के बहाने समाज में दहशत फैलाने के लिए हत्याएं और दंगे बढ़े ही हैं। साथ ही अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अपरोक्ष तरीके से बंधन और सख्त हुए हैं।

सत्ता पक्ष ने विपक्ष की इस चुनौती से निपटने की पूरी तैयारी कर ली थी। हालांकि उसे विपक्ष के संख्या बल की कमज़ोरी का पूरा ध्यान था। फिर भी अपने संख्याबल के साथ ही ह्विप जैसे मजबूत हथियार को भी साथ रखा। जिसके चलते पार्टी के अंदर बैठे आलोचक भी कुछ न बोल सके। यह ज़रूर साफ हुआ अविश्वास प्रस्ताव पर बहस से कि अब भाजपा मूल मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए संसद में और बाहर संसद की गरिमा, नियम-कानून और परंपरा पर नई बहस छेड़े। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सदन के अंदर बैठे हुए प्रधानमंत्री की झप्पी ली। लेकिन प्रधानमंत्री शिष्टाचार में खड़े भी न हो सके। उधर राहुल अपनी मंशा पूरे देश और दुनिया को जताने में कामयाब रहे।

 अविश्वास प्रस्ताव के बहाने विश्वास बटोरने की तस्वीर बनाने की कोशिश को भुलाया नहीं जा सकता। अविश्वास प्रस्ताव पर तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के गुंटूर से सांसद जयदेव गल्ला ने कहा कि केंद्र सरकार ने आंध्र प्रदेश की जनता के साथ धोखाधड़ी की। केंद ने राज्य को विशेष दर्जा देना था। लेकिन यह वादा भी पूरा नहीं हुआ। अविश्वास प्रस्ताव चार कारणों से लाने पर हम मजबूर हुए हैं- 1 विश्वास में कमी 2 भेदभाव 3 प्राथमिकता की कमी और 4 वादों को लेकर जनता से धोखा है। आज वादों और नैतिकता की लड़ाई है। आंध्र की जनता केंद्र सरकार की अनदेखी पर उसे श्राप दे रही है।

वहीं भाजपा के हरी बाबू खंबपत्ति ने कहा विशेष राज्य का दर्जा देने का वादा भाजपा ने ज़रूर किया लेकिन 14 वे वित्तआयोग की सीमाओं के चलते हम यह दे नहीं सके। लेकिन बिना नाम दिए राज्य को सुविधा दे रहे हैं।

तेलंगाना राष्ट्र समिति के विनोद कुमार ने कहा कि केंद्र सरकार ने तेलंगाना से खम्माम जि़ले के सात मंडल आंध्र प्रदेश को दिए थे। आंध्र प्रदेश पुर्नगठन अधिनियम में संशोधन करके ये मंडल वापस तेलंगाना को लौटाने चाहिए।

तमिलनाडु से अन्नाद्रमुक के केपी वेणुगोपाल ने कहा सरकार को भीड़तंत्र पर रोक लगानी चाहिए जिससे हत्याएं रुक सकें। राज्यों के बीच नदी विवादों का समाधान होना चाहिए। कई योजनाओं में केंद्र ने बकाया राशि नहीं दी वह देनी चाहिए।

तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत राय ने कहा कि केंद्र के प्रति अविश्वास का प्रस्ताव एनडीए के ही एक घटक तेलुगु देशम ने रखा। यह सरकार में भाजपा की सहयोगी रही है। बीजू जनता दल और शिवसेना के सदस्यों के सदन में मौजूद न रहने से भी बात साफ है।

तेलुगु देशम पार्टी के सांसद एम शिवप्रसाद ने प्रधानमंत्री पर टिप्पणी की। उस पर नाराज हुई रक्षामंत्री। उन्होंने उसे लोकसभा की कार्यवाही से हटाने की मांग की। संसदीय कार्य मंत्री अनंत कुमार ने और कुछ अन्य सदस्यों ने भी इसका समर्थन किया।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सदन में अपनी बात रखने के बाद जब प्रधानमंत्री के पास पहुंच कर उन्हें गले लगाया तो भाजपा सांसद और केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर ने कहा यह संसद है। मुन्ना भाई का पप्पी-झप्पी एरिया नहीं है। फिल्मों में ऐसा होता है। अगर आप मुन्ना भाई बनना चाहते हैं तो मुंबई जाएं।

माकपा के पश्चिम बंगाल के रायगंज से सांसद नेता मोहमद सलीम ने कहा, सरकार विकास के दावे तो करती है लेकिन सही आंकड़ें नही दिखाती। जब पूछा जाता है कि कितनों को रोज़गार दिया तो कोई लेखा जोखा होना चाहिए लेकिन वह नहीं दिया जाता। सरकार ने कहा काला धन वापस आ रहा है, लेेकिन आंकड़ें नहीं हैं। कालेधन पर रोक लगाने के लिए नोटबंदी की, लेकिन आज तक नही पता कि कितना काला धन मिला और कितने नोट वापस आए। नोटबंदी से पहले जितने नोट बाजार में थे इससे कहीं ज़्यादा नोट बाजार में आज हैं। किसानों, युवाओं को इस सरकार ने धोखा दिया। प्रधानमंत्री भाषणों से सिर्फ चुनावी गोल करते हैं।

संसद में पेश अविश्वास प्रस्ताव 2018

नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का परिणाम क्या होगा यह तो पहले से ही पता था, लेकिन इस प्रस्ताव के बहाने विपक्ष को अवसर मिल गया सरकार को बहुत ही गंभीर मुद्दों पर कटघरे में खड़ा करने का।

खास कर ऐसे समय में जब सरकार 2019 के चुनावों को ध्यान में रख कर अपनी उपलब्धियां गिनवा रही थी। प्रस्ताव के पक्ष में 126 और विपक्ष में 325 वोट पड़े। शिवसेना, बीजू जनता दल और तेलंगाना राष्ट्र समिति ने सदन से ‘वाकआऊट’ किया।

पिछले 15 साल में यह पहला अविश्वास प्रस्ताव है। पिछले बजट सत्र में लोकसभा अध्यक्ष ने विपक्ष को यह प्रस्ताव रखने की अनुमति नहीं दी थी। क्योंकि उस समय बैंक घोटालों की वजह से मोदी सरकार इसका सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थी। असल में अविश्वास का यह प्रस्ताव सत्ताधारी एनडीए सरकार और विपक्ष के लिए 2019 के चुनावों में अपना-अपना एजेंडा आगे बड़ाने का अवसर बन गया।

चौकीदार बनाम भागीदार

विपक्षी दलों का प्रतिनिधित्व करते हुए कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर निशाना साधा। खासतौर पर उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने महिलाओं, दलितों और आम लोगों की वास्तविक मांगों के बारे में किए गए वादों को पूरा नहीं किया।

बहस की शुरुआत करते हुए टीडीपी के सांसद ने सरकार के बहुत से वादों की याद दिलाई जो उसने आंध्रप्रदेश के साथ किए थे। उन्होंने अपने राज्य को विशेष दर्जा देने की मांग की। टीडीपी का समर्थन करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि यह 21वीं सदी का सबसे बड़ा हथियार है। इससे केवल आंध्र ही नहीं बल्कि और भी कई पीडि़त हैं। इस हथियार का नाम है – ‘जुमला स्ट्राईक’। किसान, दलित, कबायली इलाके के लोग, युवा और महिलाएं इस हथियार के शिकार हैं।

मोदी के इस वादे पर कि हर साल दो करोड़ युवाओं को रोज़गार दिया जाएगा, कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि पिछले चार सालों में केवल चार लाख नौकरियां दी गई हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने इसके उत्तर में मुद्रा योजना और दूसरी योजनाओं का जि़क्र किया जिनसे नौकरियां पैदा होनी थीं। बहुत से विशेषज्ञों ने इस तर्क को विवादास्पद बताया है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह जिसकी आय थोड़े से समय में 16000 गुणा बढ़ गई, की तरफ इशारा करते राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री खुद को ‘चौकीदार’ होने का दावा करते हैं पर असल में वे हैं ‘भागीदार’।

राहुल गांधी के इस आरोप पर कि एनडीए सरकार किसानों और छोटे व्यापारियों की कीमत पर बड़े पूंजीपतियों के हितों की रक्षा कर रही है, मोदी ने उन योजनाओं की जानकारी दी जो उनके हिसाब से गरीबों के हक की थीं। हालांकि कुछ विशेषज्ञों ने इसे शक्तिशाली आलोचना की कमज़ोर रक्षा बताई। इस आरोप के जवाब में कि भाजपा की नीतियों के कारण भारतीय बैंक कजऱ् में डूबी कंपनियों जैसे बन गए हैं, प्रधानमंत्री ने इसके लिए पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार को दोषी ठहराया।

टरकाऊ तरीका

प्रधानमंत्री का 90 मिनट का भाषण पूरी तरह रक्षात्मक रहा। एक विशेषज्ञ ने इसे छल की संज्ञा दी। इसका कारण था कि वे गंभीर मुददों को भी टालते नज़र आए और इन्हें आंकडों के खेल से फंसाने की कोशिश करते रहे। रैफल समझौते का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए। वे केवल इस समझौते की ‘सीक्रेट’ धारा का जि़क्र करते रहे जिसके तहत कुछ सूचनाएं नहीं दी जा सकती। राहुल गांधी के यह कहने पर कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने कीमत के बारे में ऐसी किसी धारा का जि़क्र नहीं किया। हालांकि फ्रांस और भारत दोनों सरकारों ने राहुल की इस बात से इंकार किया। लेकिन राहुल ने कहा, ”मैंने जो कहा मैं उस पर अडिग़ हंू। अगर वे (फ्रांस) इससे इंकार करते हैं तो करते रहें’’।

मोदी के भाषण में वही आंकड़े और बातें थीं जो उनके लोग महीनों से कहते आ रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि मोदी ने जो दावे पेश किए हैं वे पहले ही विवादों के घेरे में हैं। जब उन्होंने अपनी उपलब्धियों की बात भी कही तो कई महत्वपूर्ण मुद्दे छोड़ दिए जो विपक्ष दिन भर उठाता रहा था। राफेल समझौते पर उनका अस्पष्ट सा जवाब, और दलितों और अल्पसंख्यक लोगों की सुरक्षा पर भी उनका चुप रहना आलोचना का कारण बना।

कुछ विश्लेषकों के अनुसार जिस तरह भाजपा सांसदों ने विमुद्रीकरण और जीएसटी जैसे गंभीर मुद्दों पर तंज कसे या उन्हें टालने का प्रयास किया उसका कोई अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा, पिछले समय में यही दो सुधार हैं जो सरकार कर पाई है। किसी समय विमुद्रीकरण का प्रचार यह कह कर किया गया था कि कालाधन निकालने का यह सबसे प्रभावी तरीका है। पर कुछ हुआ नहीं, यह पूरी तरह ‘फ्लाप शो’ रहा। इसी प्रकार जीएसटी जिसे पूरी तरह सिर पर चढ़ा लिया गया था उसकी भी हवा निकल गई। यही कारण था कि भाजपा का कोई सांसद इन दोनों मुद्दों पर नहीं बोला। इसकी बजाए विपक्ष ने इन दोनों पर ही अपना निशाना साधे रखा और बताया कि इन दोनों फैसलों ने किस तरह आम लोगों का नुकसान किया है।

विपक्ष ने जब देश के खराब हो रहे सामाजिक ताने बाने पर जोरदार हमला बोला तो प्रधानमंत्री को मुंह खोलना पड़ा। उन्होंने कहा जो भीड़ में इकट्ठे होकर लोगों की हत्या कर रहे हैं उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

एक विशेपज्ञ का कहना था कि मोदी ने भले विश्वास मत जीत लिया है पर विपक्ष ने पलड़ा अपने हक में झुका लिया है।

बाधाओं के बाद भी राजद व लालू में निराशा नहीं

बिहार में राजद को जद (एकी) और भाजपा का विकल्प मानने वाले हालांकि अब निराश होने लगे हैं। लेकिन निराशा की वजह यह नहीं कि जद (एकी) और भाजपा अपनी स्थिति मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं बल्कि यह कि राजद के नेताओं के बीच का तालमेल गड़बड़ा रहा हैं। किसका हुक्म बजाएं और किसका नहीं, पार्टी के साधारण नेता और कार्यकर्ता तय करते वक्त दुविधा से घिरने लगे हैं। लालू प्रसाद सोच रहे हैं कुछ और हो रहा है। अगर उनके दोनों बेटे आने वाले दिनों के संकट को ठीक से नहीं भांप पाए और निपटने की तैयारी नहीं कर पाए तो इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

महागठबंधन की सरकार के वक्त स्थिति राजद के अनुकूल थी। लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव के बीच शुरु खटपट इतनी विकराल हुई कि महागठबंधन की सरकार इससे बच नहीं पाई। नीतीश कुमार ने एकाएक अपने पद से इस्तीफा दे भाजपा के साथ हाथ मिला राजग की सरकार बना ली। उस वक्त भी राजद के अनुकूल स्थिति थी। नीतीश कुमार और भाजपा के खिलाफ वातावरण बना।

नीतीश कुमार की आलोचना इसलिए हुई कि उन्होंने फिर भाजपा से हाथ मिला लिया और उन पर यह आरोप भी लगा कि उन्होंने ऐसा सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने के लिए किया। भाजपा की आलोचना इसलिए हुई कि वह तिकड़म से सत्तासीन होती है। आम लोगों में राजद के प्रति सहानुभूति हुई। नीतीश कुमार धोखा नहीं देते तो महागठबंधन यानी राजद पूरी मियाद तक सत्ता में रहता। सबसे अधिक राजद के विधायक होने पर भी वादे के मुताबिक नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया गया। राजद के समर्थक और वोटर सहानुभूति के चलते राजद के पक्ष में एकजुट हुए। तख्तापटल होने के बाद सूबे में हुए उपचुनाव में राजद की जीत इसका संकेत थी।

लालू प्रसाद की सूझबूझ से सूबे में उनकी पार्टी दस साल बाद सत्ता में आई थी। सत्ता में आने के बाद उनकी कोशिश यह हुई कि उनके दोनों बेटे (तेजस्वी प्रसाद यादव और तेज प्रताप यादव) राजनीति में जम जाए और अपने बल बूते पर सूबे की बागडोर संभालने लायक बन जाए। दोनों पहली बार विधायक बने और मंत्री भी। लेकिन बीच में ही अच्छा-खासा व्यवधान खड़ा हुआ कि वे सत्ता से बाहर हो गए। नीतीश कुमार करते भी क्या, काफी ऊब गए थे और मान-सम्मान पर आघात होने लगा था। लालू प्रसाद सब कुछ समझ रहे थे। लेकिन वे अपने बेटों पर नियंत्रण करनेे में सफल नहीं हुए। वे चुप रहे और उनकी चुप्पी को बेटों का बचाव माना गया। परिवारवाद का आरोप तो बहुत पहले से झेल रहे थे। वे अपने बेटों पर नियंत्रण कर पाए होते और नीतीश कुमार के मान-सम्मान की रक्षा करते तो आज स्थिति दूसरी होती।

राजनीतिकों का तो कहना यह है कि राजद के समर्थकों और वोटरों में आ रही निराशा का एक बड़ा कारण लालू प्रसाद के दोनों बेटों के बीच चल रहा शीत युद्ध है। पार्टी पर सबसे ज्यादा वर्चस्व किसका हो। पार्टी किसका सबसे ज्यादा हुक्म बजाए। इसी तरह के तमाम सवालों को लेकर तेज और तेजस्वी में शीत युद्ध है। उनके बीच चल रहे शीत युद्ध से उनके समर्थकों और वोटरों के बीच गलत संदेश यह जा रहा है कि वे दोनों आपस में लड़-भिड़ रहे हैं, तो उनका (समर्थक और वोटर) भला क्या होगा। साफ-साफ यह कि लालू प्रसाद के ‘माईÓ समीकरण यानी यादवों और मुस्लिमों का क्या होगा।

जानकार बताते हैं कि तेज और तेजस्वी के बीच शीत युद्ध के लिए खुद लालू प्रसाद ही जिम्मेदार हैं। तेज का मानना है कि लालू प्रसाद ने उनकी उपेक्षा की है और भेदभाव बरता है। परिवार में ही उनकी हकमारी हुई है। वे तेजस्वी के बड़े है और किसी गुण में कम भी नहीं है। इसके विपरीत तेजस्वी यह मानते है कि उनके गुणों और कौशल को देख कर ही उन्हें आगे रहने का मौका मिला है। तेज प्रताप चाहते हैं कि पार्टी वे चलाएं और विधानसभा व विधायकों को तेजस्वी संभाले। लेकिन तेजस्वी को यह मंजूर नहीं। दोनों भाइयों में मनमुटाव उसी दिन से शुरू हो गया था जब तेजस्वी को उप मुख्यमंत्री और तेज को केवल मंत्री बनाया गया था। उस समय तो मनमुटाव दबा रह गया लेकिन बाद में, खासकर सत्ता से बाहर होने के बाद फूट पड़ा है। लालू प्रसाद शुरू में जब उन्हें संभाल नहीं पाए, तो अब संभालना आसान भी नहीं रह गया है। अब तो उन्हें चारा घोटाले में सजा हो गई है और दिनोंदिन स्वास्थ्य भी बिगड़ा है।

जानकार याद भी दिलाते हैं कि 2005 में सूबे में राजद की दुर्गति की एक बड़ी वजह परिवारवाद ही था। मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के दोनों भाइयों (सुभाष यादव और साधु यादव) की पार्टी और सरकार में कम चलती नहीं थी। पार्टी में उनका और उनके कार्यकलापों की आलोचना करने की हिम्मत किसी नेता (शिवानंद तिवारी को छोड़ कर) में नहीं थी। लेकिन जब लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के हाथ से सूबे की सत्ता चली गई, तब उन्हें पता चला कि वजह क्या है। राबड़ी देवी के दोनों भाइयों को पार्टी से अलग होना पड़ा। फिलहाल वही स्थिति लालू प्रलाद के दोनों बेटों की है। सवाल उठ ही सकता है कि क्या वैसा ही नुकसान होगा जैसा कभी सुभाष-साधु की वजह से हुआ था।

लोकसभा चुनाव के मद्देनजर नीतीश कुमार और भाजपा के नेता ऐसी स्थिति पैदा कर रहे हैं जिससे दो बातें साफ हो जाएं। एक, नीतीश कुमार और भाजपा की एकता मजबूत है। दूसरे, नीतीश कुमार ही सूबे में राजग के सर्वेसर्वा हैं। नीतीश कुमार और भाजपा के नेता इन बातों से राजद के राजग विरोधी अभियान को बेअसर करना चाहते हैं। बात भी यह है कि राजद के पास इन बातों की काट नहीं है। विपक्षी दल के नेता के रूप में तेजस्वी विभिन्न मुद्दों को लेकर नीतीश कुमार और सरकार को तो घेर रहे हैं लेकिन नीतीश कुमार और सरकार अपने पलट जबाव से साफ बच रहे हैं। सरकार को घेरने का जो असर होना चाहिए, वह हो नहीं पा रहा है। वजह यह कि विधानसभा के बाहर राजद के नेता-कार्यकर्ता नीतीश कुमार और सरकार के खिलाफ सड़क पर नहीं उतर पा रहे हैं। तेज और तेजस्वी किसी दूसरी बात में उलझे हैं।

मराठा आरक्षण की आग में झुलसता महाराष्ट्र

अभी तो ये अंगड़ाई है आगे और लड़ाई है’ आम तौर पर जुलूसों और प्रदर्शनों में लगने वाला यह उद्घोष मराठा क्रांति मोर्चा के आंदोलन पर सटीक और प्रासंगिक बैठता है। मराठों को आरक्षण दिए जाने की मांग को लेकर पिछले दिनों समूचा महाराष्ट्र आंदोलित रहा। वैसे तो यह आंदोलन शांतिपूर्ण चल रहा था पर औरंगाबाद में एक युवक द्वारा गोदावरी नदी में छलांग लगाकर खुदकुशी करने के बाद मराठा आंदोलनकारी हिंसक हो गए और उन्होंने पूरे राज्य को हिंसा में झोंक दिया। राज्य की देवेंद्र फड़णवीस सरकार की चूलें हिल गईं। पूरे महाराष्ट्र बंद के बाद आखिर में राजधानी मुंबई, ठाणे और आसपास के इलाकों में बंद रखा गया। मराठा समाज ने लाखों की तादाद में जुलूस, मोर्चे निकाले। ये जुलूस यानी शांतिपूर्ण जन आंदोलन कैसा होता है, उसकी एक मिसाल था। इन 58 मोर्चों, जुलूसों ने दुनिया के सामने एक आदर्श स्थापित किया। आंदोलन के दूसरे चरण में मराठा क्रांति मोर्चा ने बंद का आह्वान किया था, मराठों का आक्रोश तो उबाल पर था ही पर फडणवीस सरकार के उदासीन रवैये के चलते वो और भड़क गया।

चुनाव के मद्देनजर भड़की आग

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 72 हजार सरकारी नौकरियों में मराठों को 16 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा के बाद भी आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा है। 2019 के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वहीं माना जा रहा है कि महाराष्ट्र में भी अगले साल चुनाव हो सकते हैं, ऐसे में भाजपा के लिए मराठा आंदोलन एक चुनौती बन गया है।

क्या है मराठों की मुय मांगें?

सरकारी नौकरियों के साथ ही कॉलेजों में आरक्षण मराठों की मुख्य मांग हैं। 2014 में एनसीपी-कांग्रेस की गठबंधन सरकार ने मराठों को 16 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया था। उसके लिए पहली बार आर्थिक रूप से पिछड़ों की कम्युनिटी बनाई गई थी। उस कारण कुल आरक्षण 51 प्रतिशत से अधिक हो जाने से अदालत ने इस आरक्षण को रद्द कर दिया था।

कोर्ट रद्द न कर सके, ऐसा आरक्षण चाहिए

अदालत ने कहा था कि मराठों को आरक्षण नहीं दिया जा सकता, जबकि मराठा चाहते हैं कि सरकार उन्हें ऐसा आरक्षण दे जिसे अदालत रद्द न कर सके। इस मामले में आखिरी फैसला न आए तब तक राज्य में होने वाली 72 हजार से अधिक भर्तियां रोक दी जाएं।

कुल आबादी में मराठों की संया 33 फीसदी

महाराष्ट्र की कुल आबादी में मराठों की तादाद 33 फीसदी है। यह समुदाय राज्य में होने वाले किसी भी चुनाव के नतीजों को प्रभावित करने में सक्षम है। 1960 में महाराष्ट्र राज्य के गठन के बाद से अब तक कुल 17 मुख्यमंत्रियों से 10 मुख्यमंत्री तो मराठा रहे हैं। इतना ही नहीं करीब आधे विधायक मराठा ही हैं। 288 सदस्यीय विधानसभा में 145 विधायक मराठा हैं। ये विधायक सभी प्रमुख दलों कांग्रेस, भाजपा, शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस में हैं। महाराष्ट्र की करीब 50 शैक्षणिक संस्थाओं पर मराठों का नियंत्रण है।

राज्य की अर्थव्यवस्था पर मराठों का दबदबा

महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था में शक्कर मिलों का बड़ा महत्व है। गुजरात में जैसे तेलिया राजा होते हैं वैसे ही महाराष्ट्र में ‘सुगर किंग।’ राज्य की 200 में से 168 शक्कर मिलों पर मराठों का आधिपत्य है। इसी तरह, 70 प्रतिशत सहकारी बंैक भी मराठों के नियंत्रण में है। अब तक मराठों का आरक्षण आंदोलन एकदम शांतिपूर्वक चल रहा था। वे विशाल रैलियां निकाल रहे थे। जबकि कोपर्डी रेप केस और अब एक युवक द्वारा आरक्षण की मांग को लेकर आत्महत्या करने से यह आंदोलन उग्र और हिंसक हो गया है।

क्रांति दिवस यानि नौ अगस्त को तीसरा चरण शुरू करना भी तय हुआ है। मराठों के इस पूरे आंदोलन के पीछे मुख्य मांग आरक्षण की है और वह फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है। न्यायालय के फैसले की प्रतीक्षा है। भारतीय संविधान में आरक्षण का प्रतिशत तय है, वह 50 प्रतिशत है। मराठा समाज की मांग 16 प्रतिशत है। यदि वह मंजूर होती है तो कुल आरक्षण 68 प्रतिशत हो जाएगा। अन्य पिछड़े वर्ग अर्थात ओबीसी को हासिल आरक्षण के साथ छेड़छाड़ न करते हुए मराठों का आरक्षण देना सरकार के लिए बेहद जटिल है। तमिलनाडु में जयललिता अपने मुख्यमंत्रित्व काल में आरक्षण को 69 प्रतिशत ले गई। वह आज भी जस की तस है, इसलिए महाराष्ट्र सरकार को भी मराठा आरक्षण मंजूर है।

सवाल, केवल आरक्षण का नहीं है, मराठा समाज मुख्य रूप से कृषक समाज है और कृषि के साथ ही डेयरी व अन्य पूरक कृषि उद्योग आज संकट में हैं। मराठा समाज का जीवन संघर्ष ऐसा बहुआयामी है। उसे गंभीरतापूर्वक समझने के लिए उदार मन ज़रूरी है, अन्यथा आत्महत्या करने वाले सर्वाधिक किसान मराठा समाज के हैं, यह कहने की नौबत मराठा आंदोलनकारियों पर नहीं आती। मराठा आंदोलनकारियों से शांति बनाये रखने की अपील करते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 602 पाठ्यक्रमों के दो लाख छात्रों को शिक्षा शुल्क का 50 प्रतिशत वापस देने की बात कही है। वैसे ही प्रत्येक जिले में होने वाले छात्रावासों में से दो पूर्ण होने का भी उल्लेख किया है। युवा उद्यमियों को प्रोत्साहन देने के लिए अण्णा साहेब पाटील महामंडल के काम करने का उल्लेख मुख्यमंत्री ने किया है। मुख्यमंत्री ने मराठा समाज की अन्य मांगों पर सरकार के गंभीरतापूर्वक काम करने का आश्वासन भी दिया है पर मराठा क्रांति मोर्चा का कहना है कि एक मजबूत व्यवस्था बनाई जाए और इस व्यवस्था पर नजर रखने के लिए विधायक दबाव प्रशासन पर रखा जाए।

मुख्यमंत्री के बयान के बाद मराठा समाज के गणमान्य वरिष्ठों ने भी उस पर अत्यंत संतुलित व दूरदृष्टिपूर्ण प्रतिक्रिया दी। वे भी स्वागतयोग्य हैं। एनडी पाटील और न्यायमूर्ति बीएन देशमुख ने छत्रपति शिवाजी के वंशजों से आत्महत्या या जलसमाधि न करने की अपील करते हुए शांतिपूर्वक कानूनी लड़ाई लडऩे की बात कही। उन्होंने सरकार से भी अपील की कि वे आंदोलनकारियों की भावना समझें। उन्होंने यह भी कहा कि हिंसक आंदोलन से कुछ हासिल नहीं होने वाला है। उससे मूल एजेंडा एक तरफ रह जाता है और मूल मुद्दे बाजू में रह जाते हैं।

आंदोलन की बलि चढ़े 3 युवक

मराठा आरक्षण आंदोलन में अब तक कुल 3 युवक बलि चढ़ चुके हैं। औरंगाबाद की मुकुंदवाड़ी के प्रमोद पाटील (उम्र 31) ने रविवार, 29 जुलाई की रात्रि 9 और 10 के बीच रेल्वे के सामने छलांग लगाकर अपनी ईहलीला समाप्त कर ली। प्रमोद पाटील ने रविवार को दोपहरढ़ाई बजे फेसबुक पर एक पोस्ट डालकर अपने फैसले की जानकारी दे दी थी। उसने अपनी पोस्ट में लिखा कि चलो आज एक और मराठा जा रहा है…पर कुछ करिये मराठा आरक्षण के लिए…जय जीजाऊ…आपका प्रमोद पाटील। उसके बाद उसने पौने पांच बजे एक और पोस्ट की। यह पोस्ट उसने रेल पटरी पर सेल्फी लेते हुए डाली थी। उसमें लिखा था…’मराठा आरक्षण जान जाएगीÓ इस पोस्ट के बाद उसके मित्र परिवार सभी ने विनती की थी कि ‘भाऊ, ऐसा कुछ मत कर…प्लीज ऐसा कुछ मत करो…मुझे कॉल करो…आदि। इसके बाद उसने रात्रि 9 और 10 बजे के बीच रेल्वे के सामने छलांग लगाकर अपनी जान दे दी।

मराठा आंदोलन के दौरान औरंगाबाद जिले में आत्महत्या यह तीसरा तीसरा मामला है। इसके पहले 23 जुलाई को काकासाहब शिंदे ने गोदावरी नदी में छलांग लगाकर जान दे दी थी। उसके दूसरे दिन जगन्नाथ सोनवणे ने जहर खाकर अपना जीवन समाप्त कर लिया था। प्रमोद की खुदकुशी के बाद उसके परिजन आहत हैं। उसके माता पिता ने साफ कहा है कि जब तक मराठा आरक्षण के बारे में सरकार ठोस निर्णय नहीं लेती तब तक उसका शव नहीं लेंगे। मराठा आंदोलन में अब तक हुई तीन मौतों के कारण मराठा आंदोलनकारियों में बेहद गुस्सा है। सरकार के खिलाफ उनमें आक्रोश है और मराठा आरक्षण आंदोलन कब खत्म होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता।

बंद का ऐलान वापस

शिक्षा और नौकरी में आरक्षण की मांग कर रहे मराठा क्रांति मोर्चा के संयोजकों ने मुंबई बंद वापस की घोषणा करते हुए कहा कि पिछले दो सालों से मराठा समाज को झूठे आश्वासन देकर बहलाया जा रहा था जिसके चलते मूक (मौन) मोर्चा के बदले ठोक मोर्चा का रास्ता अपनाना पड़ा। आयोजकों ने सहयोगी संगठनों का आभार जताया और शांति बनाए रखने की अपील की। मुंबई, ठाणे और नवी मुंबई में बंद वापसी की घोषणा के बाद स्थिति सामान्य होने की ओर है।

हालांकि मराठा क्रांति मोर्चा ने महाराष्ट्र बंद के ऐलान के वक्त ही इसे हिंसक न होने देने की ताकीद दी थी लेकिन सोमवार को काका साहेब शिंदे नामक आंदोलनकारी के जलसमाधि की घटना के बाद इस आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया और वह राज्य भर में फैल गया।

पहली बार मराठा समाज का मोर्चा आक्रामक दिखाई दिया। हाइवे जाम कर दिया गया। आटो रिक्शा, बस, गाडिय़ों की तोड़ फोड़ की गई। आगजनी की घटनाएं हुईं। पुलिस पर पथराव किया गया, आंदोलनकारी और पुलिस आमने-सामने आ गए। सबसे ज्यादा परेशानी स्टुडेंट्स को हुई। सुबह-सुबह छात्र स्कूल, कॉलेज पहुंच गए नौ दस बजे से आंदोलनकारियों ने रोड़ जाम करना शुरू कर दिया था। शैक्षणिक संस्थान दुविधा में रहे और स्टुडेंटस के अभिभावकों को उन्हें वापस घर लाने में बड़ी दिक्कतें हुईं।

मराठा क्रांति मोर्चा के वीरेंद्र पवार ने कहा, ‘हम मराठा हैं, हमारा मकसद किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था। हमारा बंद कामयाब रहा। बच्चों और महिलाओं के सड़कों पर होने और बढ़ती हिंसा की वजह से हमें अपना बंद वापस लेना पड़ा है। हम भी सामान्य नौकरी पेशा हैं, हमें विश्वास था कि किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं होगी। हम पता लगाएंगे कि हिंसा कहां से शुरू हुई? असामाजिक तत्वों का समावेश हो सकता है इस हिंसा में।

संविधान में संशोधन से हो सकता है निराकरण: शरद पवार

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को मराठों की पार्टी माना जाता है, उसका आधार भी मराठा ही हैं। इसी कारण वो महाराष्ट्र की चार प्रमुख पार्टियों—भाजपा, कांग्रेस और शिवसेना के मुकाबले खड़ी है। एनसीपी यानि राष्ट्रवादी कांग्रेस के सुप्रीमो शरद पवार का कहना है कि भारतीय संविधान के विशेष अनुच्छेद में संशोधन से मराठा आरक्षण की मांग का हल निकल सकता है। शरद पवार ने कोल्हापुर में कहा कि महाराष्ट्र और केंद्र में भाजपा सत्ता में है, उन्हें संशोधन करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए। राज्यसभा में बहुमत नहीं है तो भी अन्य विरोधी दलों के समर्थन की जिम्मेदारी मैं लेता हूं।

पवार ने कहा कि संविधान में संशोधन के कारण दूसरे राज्यों की जातियों को भी न्याय मिलेगा। यदि किसी ने सकल मराठा समाज के आंदोलन में फूट डालने की कोशिश की तो उसे कंकर जैसा बाहर निकाल फेंके। उन्होंने मराठा समाज को एकजुट रहने की सलाह देते हुए कहा कि इस बारे में उन्होंने देश के प्रमुख वकीलों से भी चर्चा की है। संविधान में संशोधन से ही इसका रास्ता निकल सकता है। उसके लिए लोकसभा में आवश्यक बहुमत लगेगा, जो मौजूदा सरकार के पास है।

फिर हुआ वही खून-खराबा

मंगलवार 17 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने ‘मॉब लीचिंग’ की बढ़ती घटनाओं पर एक अहम फैसला देते हुए कहा था कि, ‘कोई नागरिक अपने आप में कानून नहीं बन सकता। लोकतंत्र में भीड़ तंत्र को इजाज़त नहीं दी जा सकती’।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड की पीठ ने भीड़ और कथित गौरक्षकों द्वारा की जाने वाली हिंसा से निपटने के लिए निरोधात्मक, उपचारात्मक और दंडात्मक प्रावधानों पर दिशा निर्देश देते हुए साफ कह दिया कि, ‘गाय के नाम पर खून खराबा अब और नहीं चलेगा, संसद इस पर सख्त कानून बनाए।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश के चार दिन बाद ही शनिवार 21 जुलाई को राजस्थान के अलवर जिले की भीड़ ने एक युवक को गो तस्कर समझ कर पीट-पीट कर मार डाला। वारदात रामगढ़ क्षेत्र के ललावड़ी गांव में शुक्रवार 20 जुलाई की रात को हुई। शुक्रवार की देर रात ललावड़ी गांव के जंगलों में गोवंश को लेकर हरियाणा जा रहे 28 वर्षीय अकबर और उसके साथी असलम की गांव वालों ने लाठियों से बुरी तरह पिटाई कर दी, अकबर बुरी तरह मरणासन्न हो गया। लेकिन असलम भागने में सफल हो गया। सवा साल में इस जिले में भीड़ ने यह तीसरी जान ली है। इससे पहले एक अप्रैल 2017 को बहरोड़ में हरियाणा के पहलू खां की मौत हो गई, 10 नवम्बर 2017 को गोविंदगढ़ के बिन्दुका के उमर खान की हत्या कर दी गई और 8 दिसम्बर 2017 को तस्लीम खान को मार डाला गया। पुलिस ने शुरुआती दौर में हत्या का मामला दर्ज कर धर्मेन्द्र यादव और परमजीत नामक युवकों को गिरफ्तार कर अपने दायित्वों की इतिश्री कर ली।

पुलिस ने हमलावरों के मामले में आरोपियों के किसी संगठन से जुडऩे की बात भी हवा में उड़ा दी। उधर मुख्यमंत्री ने भी घटना को गंभीरता से नहीं लिया और किताबी बयान देकर मामले को रफा-दफा कर दिया कि ‘घटना निंदनीय है, लिहाजा दोषियों को कड़ी सजा दी जाएगी। यही लिपे-पुते लफ्ज गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने भी दोहराए और चुप्पी साध ली। लेकिन घटना की असलियत तब बेनकाब हुई जब, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस वारदात को ‘मोदी का क्रूर भारत’ की संज्ञा देते हुए बर्रे का छत्ता हेड़ दिया कि, ‘इस क्रूर इंडिया में मानवता की जगह नफरत ने ले ली है और लोगों को कुचला जा रहा है। उनका कहना था, ‘भीड़ के शिकार मरणासन्न अकबर को अस्पताल पहुंचाने में पुलिस को तीन घंटे क्यों लगे? आखिर क्यों लोग कुचले जा रहे हैं और मरने के लिए छोड़े जा रहे हैं?

हालांकि केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने यह कहते हुए पलटवार करने की कोशिश की कि, ‘राहुल गांधी के परिवार ने 1984 में भागलपुर जैसे दंगों में नफरत की अगुवाई की और वह भी गिद्ध राजनीति के जरिए वही काम कर रहे है। लेकिन घटना को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन में स्मृति ईरानी का पटाखा फुस्स हो गया, नतीजतन मामला संसद में भी गूंज गया और राहुल गांधी द्वारा सवाल उठाए जाने पर हकीकत पर पर्दा उठने लगा कि, ‘पुलिस वालों ने पहली ज़रूरत को दरकिनार किया और अकबर को 250 मीटर पर स्थित अस्पताल पहुंचाने में तीन घंटे लगाए जबकि पीडि़त तब तक जीवित था।

सरकार सक्रिय हुई और पुलिस महानिदेशक ओ.पी. गल्होत्रा ने संयुक्त जांच टीम बनाई तो मौके से जान बचाकर भागे अकबर के साथी असलम ने सनसनीखेज खुलासा कर दिया कि लालवाड़ी के पास पहले भीड़़ ने फायरिंग की फिर हमला कर दिया। इस सवाल पर कि गायों को रात में क्यों ले जा रहे थे? असलम का कहना था कि, ‘दिन में गायों के बिदकने का खतरा रहता है, इसालिए एहतिहात के तौर पर सफर रात को किया जा रहा था। उधर पुलिस की संयुक्त जांच रिपोर्ट भी चौंकाने वाली थी कि, ‘स्थानीय पुलिस ने अकबर की चोटों को गंभीरता से अनुमान लगाने की बजाय पहले गायों को गौशाला पहुंचाने की जल्दी मचाई, नतीजतन अकबर समय रहते अस्पताल नहीं पहुंच सका।

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट इस मामले में काफी कुछ कह देती है। रिपोर्ट के मुताबिक, ‘मृतक के एक हाथ में फ्रेक्चर था, उसकी पीछे की पसलियां टूटी हुई थी। फेफड़ों में चोट और अत्यधिक खून बहना पाया गया तो जाहिर है कि, अकबर के साथ पूरी निर्ममता बरती गई। पुलिस जिस समय मौकाए वारदात पर पहुंची, अकबर मिट्टी में सना खेत में पड़ा था। जिस हालत में अकबर पड़ा हुआ था, पुलिस को उसे संभालकर उठाना और गाड़ी में लाना था, लेकिन उसे तो अद्र्धचेतन अवस्था में भी लात-घूंसों पर धर लिया गया। आखिर यह कौन सी पुलिसिया कार्रवाई थी? घायल अकबर को पहले अस्पताल ले जाना ज़रूरी था या थाने? एएसआई मोहन सिंह उसे पहले थाने ले जाने की जि़द पर अड़े थे और अब जबकि घटना ने तूल पकड़ लिया तो वे शर्मिन्दगी के साथ इस बात पर हामी भी भरते नजर आते हैं।

लेकिन इस बात ने तो पुलिस की कार्यशैली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर पुलिस घायल अकबर को अस्पताल ले जाने की बजाय थाने क्यों ले गई? जो वक्त उसके उपचार में खर्च होना था वो थाने की खानापूर्ती में जाया हो गया, नतीजतन मरणासन्न अकबर को तो दम तोडऩा ही था?

इस संवेदनशील मामले में केन्द्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल का बयान स्तब्ध करने वाला था कि, ‘जैसे जैसे मोदी जी लोकप्रिय होते जाएंगे, ऐसी घटनाएं बढ़ेगी। चुनाव के समय पहले भी ऐसा हुआ था, 2019 में कुछ और होगा, ये मोदी जी की योजनाओं का रिएक्शन है।’ मेघवाल का बयान वायरल हुआ तो वे विवाद में फंसते नजर आए। नतीजतन उन्होंने यह कह कर बचने की कोशिश की कि, ‘मेरे बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है।

गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने जब मौके पर जाकर हालात देखे तो उन्होंने इस मामले में बड़ा बयान देते हुए माना कि, अकबर की मौत पुलिस हिरासत में हुई है। राज्य सरकार ने अब इस मामले में न्यायिक जांच कराने का फैसला लिया है। इसके साथ ही गृहमंत्री कटारिया ने दोषियों को सजा दिलाने का वादा करते हुए कहा कि किसी को भी किसी की जान लेने का हक नहीं है। इस बीच स्पेशल डायरेक्टर जनरल पुलिस एन आर के रेड्डी ने अकबर की मौत को पुलिस की चूक बताते हुए कहा कि, ‘जो हुआ, उसे टाला जा सकता था। उधर सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में सख्ती बरतते हुए राज्य सरकार से तत्काल रिपोर्ट तलब की है। उधर गृह मंत्रालय ने भी घटना के ब्यौरे के साथ-साथ आरोपियों पर हुई कार्रवाई के बारे में जल्द से जल्द ब्यौरा देने को कहा है।

इस मामले को लेकर प्रदेश के एक दैनिक का कहना है, ‘प्रदेश में भीड़ फैसले कर रही है, मानों वही सरकार हो? कुल मिलाकर सरकार का रवैया हैरान करने वाला है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद आखिर वह कौनसी मजबूरी है जो राज्य सरकार को भीड़ के खिलाफ कानून बनाने से रोक रही है? वो भी तब, जब आए दिन भीड़ के पैरों तले कानून और व्यवस्था कुचली जा रही है?

इरादे साफ हैं भले ही पहनता हूं सूट-बूट: मोदी

मेरे इरादे साफ हंै’। अगर उद्योगपतियों की बगल में सूट-बूट पहने हुए मैं दिखता हूं तो इसलिए क्योंकि मेरे इरादे साफ हैं। मुझे उनके साथ खड़े होने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती क्योंकि ‘इरादे’ बड़े साफ है। व्यापारी भारत के विकास में मदद करते रहे है। गांधी जी के भी इरादे इतने नेक और शुद्ध थे कि उन्हें बिड़ला परिवार में रहने में कभी कोई संकोच नहीं रहा।

प्रधानमंत्री के इस बयान पर कांग्रेस ने कहा, यह उनके विवेक पर है कि वे किन उद्योगपतियों के साथ दिखते हैं। वे जो भारतीय बंैक प्रणाली को लूट कर देश के बाहर हो जाते हैं या दूसरे। कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि वे अपनी तुलना गांधी से कर रहे हैं यह कितना हास्यास्पद है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ में सोमवार को विपक्ष की आलोचना करते हुए कहा, ‘पब्लिक में मिलना नहीं, पर्दे के पीछे सब कुछ करना है। वे डरते रहते हंै। पूर्व सपा नेता अमर सिंह यहां बैठे हुए हैं। ये आपको पूरा ब्यौरा दे सकते हैं। क्या हमने कभी (उद्योगपतियों और व्यापारियों) को ‘चोर’ और ‘लुटेरे’ कह कर कभी गाली दी। जो देश के साथ गलत करते हैं उन्हें देश छोडऩा पड़ता है या फिर अपने दिन जेल में गुजारने पड़ते हैं। क्या आपको यह पता नहीं कि वे किसके जहाज में घूमते थे। लखनऊ में हुआ भव्य समारोह राज्य में 60 हजार करोड़ रुपए के निवेश पर आयोजित था। इसमें देश के जाने माने उद्योगपति आदित्य बिड़ला समूह के अध्यक्ष कुमारमंगलम बिड़ला, अडानी समूह के अध्यक्ष गौतम अडानी, एसेंल समूह के अध्यक्ष सुभाष चंद्रा और आईटीसी के प्रबंध निदेशक संजीव पुरी ही नहीं बल्कि वाल्मार्ट के संचालक भी मौजूद थे।

इस मौके पर प्रधानमंत्री ने कहा कि जो लोग उनकी आलोचना करते हैं वे दशकों पुरानी समस्याएं भूल जाते हैं। कृप्या ध्यान दीजिए। आप उनके राज के 70 साल याद कीजिए और मेरे पास तो सिर्फ चार साल हैं। जबकि आपके पास तो 70 साल हैं। दरअसल देश में कांग्रेस का शासनकाल 54 साल का है। सत्ता में मोदी के नेतृत्व में राज पांच साल का है। जबकि अटल बिहारी वाजपेयी एक साल सत्ता में रहे। सहयोगी गठबंधन रूप में तीन साल भाजपा ने पहले राज किया था जब मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे।

‘कुछ लोग इसे भूमि पूजन समारोह कहते हैं लेकिन यह रिकार्ड ब्रेकिंग समारोह है। इतने कम समय में पुराने तौर-तरीके बदल गए हैं। और उद्योगपतियों का भरोसा हासिल किया गया है। मुझे खुशी है कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में निवेश का महत्वपूर्ण माहौल, कार्य संस्कृति बदल कर बनाया गया है। उन्होंने कहा कि ऊर्जा क्षेत्र को खास तौर पर तवज्जुह दी गई है। प्रधानमंत्री ने जिन परियोजनाओं की आज आधारशिला रखी उससे राज्य में औद्योगिकीकरण बढ़ेगा। अगले लोकसभा चुनाव के पहले राज्य में बड़े औघौगिकीकरण का लक्ष्य पूरा हो चलेगा।

राज्य के उद्योग मंत्री सतीश महाना ने कहा कि इन उद्योगों से दो लाख लोगों से ज़्यादा लोगों को नौकरियां मिल सकेंगी। प्रधानमंत्री अपने विपक्षियों पर हमला करने से नहीं चूके जो बाहर की उनकी यात्राओं का उपहास उड़ाते हैं। वे ऐसा कह कर लोकसभा चुनाव में अपनी हार के अंदेशे से घबराए हुए हैं।

खुद के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि ‘इस राज्य का मैं सांसद हूं। मैं यहां दो बार, पांच बार,नहीं दस बार आऊंगा। मैं आता रहूंगा।’ दरअसल वे समाजवादी पार्टी के नेताओं की टिप्पणी पर बोल रहे थे जिसमें उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री महीने भर में छह बार तो राज्य में आते हैं। उनकी इस महीने में राज्य की यह छठी और लखनऊ की दूसरी बार हुई यात्रा थी।

कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा, सवाल बहुत सीधा है प्रधानमंत्री किस तरह के उद्योगपतियों के साथ दिखते हैं, बात करते हैं। एक, जो भारतीय बैंक को नुकसान पहुंचा कर लापता हो जाते हैं जिनके साथ उनके फोटो भी दिखते हैं। दूसरे आप किस तरह के उद्योगपतियों – पूंजीपतियों को बढ़ावा दे रहे हैं। हम सूट बूट की सरकार के मेलजोल पर अपनी बात कह रहे हैं। बहुतों की कीमत पर कुछ को लाभ नहीं पहुंचना चाहिए।

एक अलग मगर दिलचस्प ‘मुल्क’

सालों बाद बालीवुड से एक फिल्म आई है ‘मुल्क’। यह फिल्म अदालती दृश्य से शुरू होती है और एक-एक कर दर्शक को समाज, संबंध और प्रेम की पूरी कहानी समझ में आने लगती है। यह फिल्म देशभक्ति, राष्ट्र प्रेम की बात तो करती है लेकिन यह किसी धार्मिक चौखटे में नहीं आती। इस लिहाज से यह फिल्म देखने लायक है।

यह फिल्म ढेरों पूर्वाग्रहों से मुक्त है। फिल्म आप यदि देखे तो यह आपको शुरू से आखिर तक बांधे रखती है। यह फिल्म अपने उदाहरणों से गंगा-जमुनी तहजीब भारतीय रीति-रिवाज, समाज को इक्कीसवीं सदी में उभरे बाजारवाद के बरक्स एक निहायत पुराने मगर तहजीबदार ‘मुल्क’ को पेश करती है। जिसे आप देख कर ही समझ पाएंगे।

इस फिल्म की नायिका है तापसी पन्नू। यह उनकी पहली हिंदी फिल्म है। वे इस फिल्म की कहानी सुन कर ही खासी रोमांच से भर गई थी। उन्होंने बड़ी लगन से अपनी भूमिका निभाई है। इस फिल्म के नायक हैं जाने-माने अभिनेता ऋषि कपूर। जिनके पास पीढिय़ों से अभिनय का सलीका रहा है। वे खुद इस फिल्म को ‘प्रमोट’ करने में जुटे भी रहे हैं। वे मानते हैं कि यह फिल्म हर हिंदुस्तानी को पसंद आने वाली फिल्म है।

 ‘मुल्क’ के निर्देशक अभिनव सिन्हा हैं। उनका मानना है कि यह फिल्म उनकी बनाई दूसरी फिल्मों में काफी बेहतर है। खुद छोटे शहरों से बड़े शहर में आए अभिनव मानते हैं कि भारतीय संस्कृति छोटे शहरों में कहीं बेहतर है। वहां अच्छा भाईचारा है और एक दूसरे के प्रति सम्मान और जानने-सीखने की इच्छा है। ‘मुल्क’ को जानने- समझने के लिए इसे ज़रूर देखें।