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पुलवामा हादसे पर आक्रोश पर फिर भी ज़रूरी है बातचीत

कश्मीर में पिछले तीन दशकों से जैसी घटनाएं होती रही हैं वैसा ही हुआ था 14 फरवरी को भी पुलवामा में सीआरपीएफ के 40 कर्मी मारे गए। लेकिन यह घटना कुछ इस तरह से उभारी गई मानों पांच साल में राज्य में हो रही गतिविधियों के खिलाफ यह बड़ी प्रतिक्रिया थी भाजपा के नेतृत्व में राज्य में पाकिस्तान के लिहाज से जो नीतियां अमल में आती रही । उसके चलते ऐसा होना ही था।

उन्हीं हालात के चलते यह हुआ कि राज्य के निवासी आदिल अहमद डार नाम के नौजवान ने विस्फोटकों से लदी अपनी गाड़ी सीआरपीएफ की गाडिय़ों के काफिले से टकरा दी। यह हादसा जहां हुआ वहां से महज दस किलोमीटर दूर ही वह रहता था। सात महीने पहले तक वह पड़ोस में लकड़ी चीरने की फैक्टरी में काम करता था। लेकिन जैसे कश्मीर में यह रोजमर्रा सा होता है। एक सुबह उसने घर छोड़ दिया और फिर नहीं लौटा।

परिवार ने उसके लापता होने की खबर पुलिस थाने में दी। लेकिन न कुछ होना था और कुछ हुआ भी नहीं। एक महीने बाद डार की एक तस्वीर सोशल मीडिया में कलाशनकोव राइफल ताने हुए दिखी। उस तस्वीर में उसे जैश-ए-मोहम्मद का एक सदस्य बताया गया था। उसे देखते ही पिता गुलाम अहमद डार ने उसकी पत्नी से कहा,‘उसे भूल जाओ। वह अब मर चुका है’।

अपने परिवार से दूर डार पिछले कई महीनों से एक फिदायी के तौर पर प्रशिक्षण हासिल करता रहा। फिदायी उर्दू का एक शब्द है जो आत्मघाती बमबर्षक के तौर इस्तेमाल होता है। हमले से पहले उसने एक वीडियो बनाया। इसमे उसने बताया कि जो कुछ वह कर रहा है उसकी वजह क्या है। और बड़े धमाके के बाद ही वह वीडियो जारी हो गया।

दो दिन बाद सेनाओं ने पास के पिंग्लिना में जैश उग्रवादी को मार गिराया। इनमें दो पाकिस्तानी थे। बताया गया कि ये लोग पुलवामा धमाके के खास लोग थे जिन्होंने इस योजना को अंतिम रूप दिया था।  इस ऑपरेशन में एक मेजर, एक सिपाही और एक नागरिक मारा गया।

इस पूरी घटना की जिम्मेदारी जैश ने खुलेआम ली। सरकार ने इसे अंजाम देने के लिए पाकिस्तान को जिम्म्ेदार ठहराया और कहा कि इसका बदला लिया जाएगा। राजनीतिकों और मीडिया के जोर-शोर से चले बहस-मुबाहिसे में पाकिस्तान को इसके लिए मजा चखाने तक की बात हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मामले में कोई अपवाद नहीं बरता। उन्होंने तो अपराधियों और उनके समर्थकों को चेतावनी देते हुए कहा,‘आंसू की हर बूंद का बदला लिया जाएगा’। इसके जवाब में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा, किसी भी भारतीय हमले का जवाब देने में उनका देश पीछे नहीं हटेगा। इससे अब अरूचिकर स्थिति बन गई है। दोनों देश अब एक ताजे संकट को जान-समझ रहे हैं।

हालांकि पाकिस्तान ने काफी उग्रता से इस बात से इंकार किया है कि इस मामले में उसकी कोई भागीदारी है। हालांकि जैश ने इस धमाके की जिम्मेदारी ली है वह अलबत्ता पाकिस्तानी पंजाब में है इसके कारण पड़ोसी झंझट में पड़ गया है। यह सब तब हुआ जब भारत में जल्द ही आम चुनाव होने को हैं। इससे विभिन्न विश्लेषक भी अचंभित हैं कि आखिर क्या मकसद था इस भयंकर धमाके का। चुनाव को प्रभावित करना या पाकिस्तान पर भारतीय सेनाओं का हमला।

‘ये सब महज ख्याली पुलाव हैं। लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध होने की संभावना नहीं के बराबर है। लेकिन पुलवामा धमाके का असर आम चुनाव पर ज़रूर पड़ेगा।’ राजनीतिक विश्लेषक गुल मोहम्मद वानी का कहना है,‘इस हमले से विकास रूक गया है और भ्रष्टाचार पर जोर देने वाली चुनावी चर्चा अलबत्ता पिछड़ गई है। सुरक्षा, कश्मीर और पाकिस्तान आज बहस के मुख्य मुद्दे हैं। देखते हैं इन मुद्दों पर सामने क्या आता है।

वानी मानते हैं  कि मोदी अपनी कट्टर सोच के चलते पाकिस्तान और कश्मीर को अभी और आगे बढ़ाएंगे। ‘भाजपा अब तक दक्षतापूर्वक पुलवामा हमले पर बहस की बजाए अपनी कश्मीर नीति की असफलता पर बातचीत टालती रही है। इसने इस धमाके के बाद  अपनी नीति और संभावित कार्रवाई को और पुख्ता कर लिया है। यह अभी देखा जाना है कि जम्मू-कश्मीर में सरकार की अपनी जो खामियां रही हैं उन्हें विपक्ष कैसे उठाता है।

जो हो, पुलवामा धमाके का भावी चुनावों पर तो खासा असर पड़ेगा ही साथ ही एक लंबे समय के लिए भारत-पाक संबंधों में ठहराव आ जाएगा। साथ ही कश्मीर में बिगड़ रही स्थिति को संभालने में केंद्र की भूमिका भी तय हो जाएगी।

इसके साथ ही ‘कश्मीर की हालात को दुनिया किस नज़रिए से देखती है’ इससे भी पुलवामा की खासी भूमिका होगी।’ कहते हैं वानी।

जबकि सारी दुनिया कश्मीर में बढ़ रही हिंसा की निंदा कर रही है उसे इस बात की भी फिक्र होगी कि राज्य में हालात क्या रूप लेंगे और स्थानीय शांति के लिहाज से इसका असर क्या होगा।

भारत-पाक संबंध

धमाके के बाद से भारत-पाक संबंधों में खासी गिरावट आ गई है। भारत ने पाकिस्तान को मजा चखाने के लिए कई कदम भी उठा लिए हैं।  इसने ‘मोस्ट  फेवर्ड नेशन’ का दर्जा, जो पड़ोसी को दिया जाता है वह भी वापस ले लिया है। पाकिस्तान से आ रहे माल पर दो सौ फीसद टैक्स लगा दिया है। साथ ही यह तय किया है कि सिंधू जल  समझौते के तहत पाकिस्तान को दिए जाने वाले पानी को देना अब बंद कर देंगे। भारत अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पाकिस्तान को अलग-थलग करने की मुहिम छेडने को है।

प्र्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह भीचुके हैं कि अब इस्लामाबाद से बात करने का कोई औचित्य नहीं है।

अब देखना यह है कि क्या भारत पुलवामा धमाके के बाद अपने पड़ोसी देश पर सैनिक कार्रवाई करता है जिसकी ओर प्रधानमंत्री से लेकर उनके दूसरे वरिष्ठ मंत्री करते रहे हैं। यदि ऐसा  बेहद संगीन कदम वाकई उठाया भी जाता है तो चाहे वह सर्जिकल स्ट्राइक हो तो भी उससे देश के लोगों की नाराजगी दूर नहीं होगी। इसकी वजहें हैं- भारतीय सेना ने 2016 में सैनिक ठिकानों  पर बम बरसाए। लेकिन पाकिस्तान ने इसे खारिज किया और इसका असर भी सीमा पर कश्मीर में कोई खास नहीं दिखा। और तो और सुरक्षा लक्ष्य भी लगभग अछूते रह गए। यानी यदि पिछले पांच साल में यदि 488 सुरक्षा सैनिक मारे गए तो राज्य में आतंकवादी का अनुपात 1:2 था। ऐसे में पाकिस्तान के खिलाफ ताजी सैनिक कार्रवाई इतने बड़े पैमाने पर  होनी चाहिए कि वह नजऱ भी आए। यानी ऐसी कि नाराज़ जनता को सुबूत मिले और वह पाकिस्तानी सेना को खासा नुकसान भी पहुंचे। लेकिन यह जोड़-भाग अत्यंत अव्यवस्थित हो सकता है। क्योंकि तब पाकिस्तान भी मुकाबला करेगा। इमरान खान तो भारतीय हमले का मुंह तोड़ जवाब देने के लिए अपनी सेना को तैयार रहने को कह दिया है। पाकिस्तान की एक भी प्रतिक्रिया से बड़ी लड़ाई छिड़ सकती है। जो धीरे-धीरे पूरे युद्ध में बदल जाए और फिर दोनों देशों के ठिकानों का इस्तेमाल का अंदेशा बन सकता है। ‘कश्मीर ऑब्जर्वर’ के संपादकीय में है,‘यह विनाशकारी दृश्य होगा जिसे लेकर दुनिया में बेचैनी है और इस पूरे इलाके के लोगों को इस पर सोचना भी चाहिए’।

बहरहाल, सैनिक जवाब आएगा या न आए लेकिन पुलवामा धमाके ने ज़रूर चुनाव बाद भारत पाकिस्तान बातचीत को फिर शुरू होने की संभावनएं ज़रूर खारिज कर दी हैं।

मुंबई हमला 2008 में हुआ था। तब भारत-पाकिस्तान बातचीत से कश्मीर मसले का समाधान लगभग हो चला था। तब से दोनों देश बातचीत की तैयारी में जुटे रहे। कहते हैं, गौहर गिलानी।

‘अब पुलवामा धमाके के बाद दोनों देशों के लिए बातचीत फिर शुरू करना कठिन होगा। जब तक कि दोनों पक्ष इस बात पर एकमत होकर फैसला न ले कि मुद्दों का समाधान शांति से ही संभव है। न कि हिंसा और अस्थायित्व से।’

धूम धड़ाका और क्या

पुलवामा धमाके के बाद राजनीतिक और मीडिया के आख्यानों में कश्मीर की अनदेखी ही हुई। राज्य तो खबरों में तभी आया जब कश्मीरी छात्रों और व्यापारियों पर पूरे देश में हमले शुरू हो गए। यह आख्यान इस कदर पाकिस्तान और आतंकवाद को केंद्र में रख कर चलता है कि हमलों के पीछे के सवाल रह जाते हैं और इनके होने की जगह भी नजऱ अंदाज कर दी जाती है। खुफिया सूचना के भी समझने में खासी नाकामी रही है। बीस साल के कश्मीरी युवक ने वह धमाका किया। लेकिन किसी कश्मीरी नौजवान द्वारा किया गया यह पहला आत्मघाती धमका नहीं था। पहले भी कुछ कश्मीरी नौजवान फिदायीन हमलों में भाग लेते रहे हैं। लेकिन कश्मीर में ज़्यादातर विदेशी उग्रवादियों में आत्मघाती हमले किए हैं वे लश्कर या जैश से जुड़े रहे हैं।

लेकिन अब पुलवामा कांड से इस बात की पुष्टि हो गई है कि कश्मीरी आतंकवादी ने शायद रास्ता देख लिया है। हो सकता है कि जैश ने बाकी व्यवस्था मुहैया कराई हो। लेकिन यह एक स्थानीय युवक था जो स्थानीय भावनाओं और एक मकसद के नाम पर अपनी जान भी गंवा बैठा। यदि यह सिलसिला चल निकला तो कश्मीर आज की तुलना में खासी बड़ी रणभूमि में तबदील हो जाएगा।

यह कश्मीर में आज वाकई चिंता की बात है। लेकिन यह मुद्दा राष्ट्रीय  चर्चा से बाहर है। कहते हैं जम्मू एंड कश्मीर के शिक्षामंत्री नईम अख्तर। ‘इस पर बहुत कम बात होती है कि कैसे कश्मीर उस हालत में पहुंच गया है जहां एक नौजवान अपने शरीर को ही बम बना देता है और धधक उठता है।’

सच है, कश्मीर पांच साल में खासा बदला है । केंद्र में भाजपा नेतृत्व की गठबंधन सरकार और जम्मू-कश्मीर में पीडीपी की सरकार में तालमेल था। इस दौरान नए युग का आतंकवाद विकसित हुआ। इसमें स्थानीय युवक को स्थानीय पहचान बनाने के लिए एक दशक से भी ज़्यादा समय के बाद आतंकवाद को अपनाना पड़ा।

दरअसल 2015 से एक दशक में पहली बार स्थानीय आतंकवादियों की संख्या कश्मीर में विदेशियों से (बाहरी लोगों) से कहीं ज़्यादा हो गई। घाटी में कुल 182 सक्रिय आतंकवादियों में से 88 स्थानीय थे जबकि इसी तरह 2016 में आतंकवादियों की तादाद जो सरकार ने दी वह थी कि कुल 145 आतंकवादियों में 91 स्थानीय हैं जबकि बाहरी या विदेशी 54 हैं।

सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि कश्मीर में यह कैसा बदलाव आया है कि स्थानीय  युवक आतंकवाद की ओर जा रहा है, पूछते हैं गिलानी,‘लेकिन यह शुरू हुआ है जब से केंद्र में भाजपा के नेतृत्व की सरकार बनी। यह बात ही अपने आप में जवाब है सवाल का।

नई दिल्ली जिस तरह कश्मीर के मुद्दे को परखती है उसके लिए अधिकांश तौर पर भाजपा को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। इसने अपनी एक कट्टर नीति राज्य को दी। जिसका असर राज्य में मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक और सैनिक तौर पर पड़ा। मनोवैज्ञानिक तौर पर मोदी सरकार ने संविधान से धारा 35ए को हटा कर यहां की जनसंख्या संबंधी बदलाव लाने की कोशिश की जिसके तहत बाहरी लोगों को राज्य में बसने पर  रोक है। धारा 35ए की वैधता को चुनौती देती हुई छह याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल है। जब भी सुनवाई का वक्त आता है तो कश्मीर बेहद उद्विग्न हो उठता है और पूरा राज्य बंद रहता है।

राजनीतिक तौर पर राज्य की बहुसंख्यक समुदाय में राज्य के राजनीतिक खाने में अपनी भूमिका को हाशिए पर ही मान रखा है।

जबकि पीडीपी – भाजपा गठबंधन सरकार में भाजपा ने इस सोच को राज्य सरकार का एजेंडा तय करते हुए इस्तेमाल किया। जम्मू-कश्मीर के मौजूदा राज्यपाल सत्यपाल मलिक के बारे में यह कहा जाता है कि वह भाजपा के पुराने समय के एजेंडे  को ही अमल में लाने पर जुटे हैं। मलिक की यहां अपनी नियुक्ति के साथ ही बेहद जल्दबाजी में कानून बनाने जुटे हैं। वे ऐसे विवादास्पद आदेश जारी करते हैं जिन्हें किसी चुनी गई सरकार को ही आपस में समुचित राय-मश्विरे के बाद घोषित करना चाहिए।

ऐसा ही एक आदेश है लद्दाख को अलग डिवीजन का दर्जा देना जो अब तक कश्मीर घाटी का ही एक हिस्सा रहा है। हालांकि इसे डिवीजन बनाने की मांग अर्से से होती रही है । लेकिन ऐसी ही मांग तो जम्मू में पीर पंजाल और चिनाब घाटी में भी रही है। हालांकि प्रशासन ने उनकी मांगों पर कान नहीं दिया जब तक कि राज्य के राजनीतिक बोर्ड से सहमति नहीं मिले। लेकिन परिषद ने आदेश जारी भी कर दिया। उसकी इत्तला तक नहीं की।

यह कदम राज्य में इतनी समस्या खड़ी कर रहा है कि पीडीपी  नेता और जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने इस फैसले को गंभीर अपवाद माना।

‘आप (केंद्र) राज्य के मुस्लिम बहुलता की पहचान तोडऩेे की कोशिश कर रहा है। हम यह नहीं होने देंगे। यह बहुत ही खतरनाक होगा।’ उन्होंने लद्दाख को डिवीजन का दर्जा दिए जाने पर संवाददाता सम्मेलन में कहा। ‘ हम यह कहना चाहते हैं न केवल राज्यपाल से बल्कि भारत सरकार से भी कि आप आग से खेल रहे हैं। आप मुसलमानों को जम्मू और कश्मीर में कमज़ोर करना चाहते हैं। आप उन्हें अलग-अलग दर्जे में विभाजित कर रहे हैं मसलन शिया-सुन्नी, कश्मीरी-पंजाबी, गुज्जर और पहाड़ी।

बहरहाल यह नई दिल्ली की कठिन यु़द्धोत्सुक नज़रिया उस हालात के प्रति है जिससे कश्मीर में गुस्सा और अलगाव की भावना और बढ़ी है। यह पुलवामा धमाके में दिखा भी है। दक्षिण एशिया टेररिज्म पोर्टल के अनुसार  नागरिक, सुरक्षा दस्ते और आतंकवादी 2014 के बाद से खासे मारे गए हैं। जिनकी संख्या 1500 से भी ज़्यादा है। इनमें से 586 में 160 नागरिक, 267 कथित आतंकवादी और 159 सुरक्षा कर्मी  2018 में मारे गए। यह साल पूरे दशक में सबसे ज़्यादा मौतों का साल रहा।

इसी अवधि में कश्मीर में 2016 में बड़े पैमाने पर आक्रोश दिखा जब हिज्बुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी मारा गया। इस आक्रोश में 100 से ज़्यादा प्रदर्शनकारी मारे गए। कई सौ से ज़्यादा लोग बच्चे सुरक्षा दस्तों द्वारा इस्तेमाल की गई पेलैट्स गन के कारण अंधे हुए, घायल हुए। घाटी में प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के नाम पर लोगों की हत्याएं हुई। उन्हें अंधा कर दिया गया। इस कारण भी नई दिल्ली  के खिलाफ घाटी में नाराजग़ी बढ़ी है। जिसके कारण युवकों ने खुद को आतंकवादी बना लेना पसंद किया है।

‘सच्चाई यह है कि चार साल में कश्मीर घाटी में ऐसी  सैनिक कार्रवाई चल रही है जिसे पूरी तौर पर छूट है। कश्मीर में शांति के नाम पर हत्याएं हो रही हैं। इससे न केवल आतंकवादी मारे गए बल्कि जन प्रदर्शनकारी भी’ कहते हैं नसीर अहमद। नसीर स्थानीय निवासी है।’ पेलेटगन का इस्तेमाल हजारों कश्मीरियों को अंधा बनाने के तौर पर किया गया।

इससे घनघोर पीड़ा कश्मीरियों को हुई। लेकिन देश की मीडिया, सुरक्षा और राजनीतिक लोगों ने इस पर खुशियां मनाई। अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए टेलीविजन एंकरों ने बहते हुए कश्मीरी खून और कष्ट को खूब भुनाया। इस संघर्ष के चलते दोनों की ओर अमानुषिकता बढ़ी।

हम अब किस ओर

हालात अब बहुत ही अनिश्चित हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि भारत और पाकिस्तान ‘बहुत ही खतरनाक हालात’ से गुजऱ रहे हैं। भारत अब पाकिस्तान के खिलाफ जो भी बदले की कार्रवाई शुरू कर चुका है। उससे हालात और ज़्यादा बिगड़ गए हैं, सुधरने की बजाए और ज़्यादा नुकसान। भारत और पाकिस्तान में बातचीत की संभावना दूर-दूर तक नजऱ नहीं आती। बशर्ते नाटकीय तौर पर दोनों देशों के लिए कहीं कुछ बेहतर होता न दिखे। लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव और कश्मीर में हिंसा की वजहों के समाधान के लिए संवाद बहुत ज़रूरी है कहते हैं, ‘जम्मू और कश्मीर के इतिहासकार सिद्दीक वहीद अपने एक लेख में।’

तमाम शोर के बाद ही खामोशी के साथ ही संवाद भी ठहर गया है। कि कैसे दक्षिण एशिया इस मुकाम पर पहुंच गया और हमें अब क्या करना है। जो कुछ सुनाई दे रहा है वह यही है कि कश्मीरियों में राक्षसी प्रवृतियां हावी हैं और पाकिस्तान को ‘कुचल डालो।’ वाहिद लिखते हैं, ‘भले ही यह घिसा-पिटा ही लगे पर कश्मीर फसाद पर बातचीत होनी ही चाहिए क्योंकि इसका न होना बहुत खतरनाक है।’

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आतंकवादी शिविरों पर भारतीय विमानों का धावा

पाकिस्तान में आतंकवादी शिविरों पर ज़ोरदार हमले हुए। भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों ने मंगलवार भोर (26 फरवरी) में पाकिस्तान के बड़े आतंकवादी शिविर पर हमला बोला।  पाकिस्तान के पख्तूनख्वाह प्रांत के बालाकोट में चल रहे बड़े प्रशिक्षण शिविर को नष्ट करके 300 से ज़्यादा आतंकवादियों के मारे जाने का दावा किया है। इस हमले में 12 मिराज-2000 और 30 सुखोई जेट भी शामिल थे। पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कहा भारत ने ‘लाइन ऑफ कंट्रोल’ तोड़ कर पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर यह हमला किया है। भारत का कहना है कि यह हमला आतंकवाद के खिलाफ था। भाजपा और कांग्रेस ने इस कार्रवाई का समर्थन किया है।

भारतीय वायुसेना का यह हमला मंगलवार की भोर में पौने चार बजे बालाकोट आतंकवादी शिविर पर आभा टॉप पर हुआ। इस कार्रवाई में चार-पंाच धमाके हुए। इस पूरे ऑपरेशन में करीब 21 मिनट का समय लगा। यह पूरा ऑपरेशन इसलिए किया गया क्योंकि ऐसी सूचना थी कि जैश भारत में अगली बड़ी आतंकवादी वारदात के लिए बड़ी तादाद में प्रशिक्षण शिविर बालाकोट में चला रहा है। इस शिविर को जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर का बहनोई मौलाना य्सुफ अजहर उर्फ उस्ताद धौरी चला रहा था। भारतीय वायुसेना के बड़े हमले में अनुमान है कि बड़ी तादाद में जैश आतंकवादी, प्रशिक्षक, कमांडर और जिहादियों के समूह नष्ट हुए।भारतीय वायु  सेना के इस हमले के घंटों बाद भारतीय विदेश सचिव विजय गोखले ने बताया कि यह हमला बेहद ज़रूरी था, क्योंकि यह संगठन भारत पर जल्दी ही बड़ी आतंकवादी कार्रवाई करने की तैयारी में जुटा था। उन्होंने कहा कि भोर में हुए इस हमले का निशाना बालाकोट का प्रशिक्षण शिविर था। यह पूरा हमला पूरी तौर पर किसी भी पाकिस्तानी सैनिक ठिकाने या नागरिक ठिकानों पर केंद्रित नहीं था। यह सब ‘प्री एंप्टिव’ था जिससे दूसरा आतंकवादी हमला न हो। इस हमले में बड़ी तादाद में आतकवादी मारे गए हंै। पूरी  कार्रवाई में यह ध्यान रखा गया है कि कोई नागरिक न तो घायल हो और न मारा जाए।

मंगलवार को पाकिस्तानी इलाके में भारतीस वायुसेना का यह हमला 1971 के बाद अब यानी 48 साल बाद हुआ। जब 1999 में कारगिल युद्ध हुआ तब भी भारतीय वायुसेना ने भारतीय सीमा में आ गई पाकिस्तानी सेना को हटाने के लिए कार्रवाई की थी । लेकिन इस मामले में तो यह ज़रूरी हो गया था कि भारत पुख्ता ज़मीन पर खड़े होकर आतंकवादी हरकतों पर रोक लगा सके।

भारत की इस कार्रवाई से पाकिस्तानी वायुसेना की क्षमताओं पर भी सवाल अब उठने लगे हैं। पहले भी ऐसी ही अक्षमता तब उभरी थी जब अमेरिकी नेवी टीम ने 2011 में पाकिस्तान में अपना ऑपरेशन किया और एबोटाबाद से ओसामा बिन लादेन को उठा कर ले गए थे। उसके बाद इस बार इतनी बड़ी तादाद में भारतीय वायुसेना के विमान भारत पाकिस्तान की सीमा से 80 किलोमीटर अंदर गए और इतनी बड़ी कार्रवाई करके लौट भी आए। कहीं  भी पाकिस्तानी वायुसेना ने कोई चुनौती स्वीकार नहीं की।

भारत सरकार ने विपक्षी दलों को पुलवामा हमले के बाद से साथ ले लिया था जिसके कारण नीतिगत विरोधाभास नहीं रहा। सरकारी फैसले का विपक्ष ने अनुमोदन ही किया। भारत सरकार ने जिस तरह इस सारे मामले में अंतरराष्ट्रीय  राजनयिक समुदाय को भी अपने फैसलों से जोड़े रखा, वह राजनीतिक कौशल ही है। चीन तक ने इसमें ज़्यादा कुछ नहीं कहा सिर्फ इस बात पर ज़ोर दिया कि दोनों देश नरमी बरतें और बातचीत करें।

कश्मीर के मसलों को सुलझाने का अब स्थानीय स्तर पर भी प्रयास होना चाहिए। प्रयास ऐसा कि कश्मीर के युवकों में जो असंतोष और नाराजग़ी है उसे दूर किया जाए। उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा जाए जिससे आतंकवादियों को जगह न मिल पाए। इसके लिए ज़रूरी है कि बातचीत के लिए दरवाजे खुले रखे जाएं।

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जबरदस्त हिंसा पर उतारू संगठन

कश्मीर घाटी में ढेरों आतंकवादी संगठन हैं जो भारतीय सुरक्षा सेनाओं पर हमले करते हैं।  इनमें कइयों के एक जैसे या मिलते-जुलते नाम हैं। ऐसे ही संगठनों में एक संगठन है जैश-ए-मोहम्मद। इसे मसूद अज़हर के संगठन के तौर पर जाना जाता है। यह संगठन खासा सक्रिय संगठन है। इस पर घाटी में एक दर्जन से ज़्यादा हमले करने का आरोप है। इसकी हिंसक वारदातों के कारण संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद में आतंकवादी संगठनों में इसका भी प्रमुख नाम है।

भारत लगातार यह मांग करता रहा है कि मसूद अज़हर के जैश-ए-मोहम्मद संगठन को काली सूची में डाला जाए। लेकिन भारत और अमेरिका के प्रयासों के बाद भी इसे काली सूची में नहीं डाला जा सका। जानकारों के अनुसार अज़हर ने पिछले तीन साल में अपने संगठन की सक्रियता और बढ़ा दी है। इसी सिलसिले में अज़हर ने अपने दो भतीजों को घाटी में भेजकर आंदोलन तेज भी किया। उसके भतीजों में एक था तलहा रशीद जिसकी अक्तूबर 2017 में हत्या हुई और दूसरा था उस्मान हैदर जिसकी हत्या 2018 में हुई।  लेकिन जैश-ए-मोहम्मद का मनोबल नहीं टूटा।

 पहली बार जैश-ए-मोहम्मद ने 2007 में भारतीय संसद पर हमला किया। इसमें खासा नुकसान हुआ। भारत और पाकिस्तान में युद्ध होने का अंदेशा भी बढ़ा। लेकिन उसे संभाल लिया गया। फिर जनवरी 2016 में पठानकोट में वायुसेना अड्डे पर हमला हुआ। इसमें सात सुरक्षा सैनिक मारे गए। इसके बाद ही इसी साल सितंबर में उरी हमला हुआ। इसमें बीस सिपाही मारे गए। इसके बाद ज़रूर भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक करके भारत- पाक सीमा पर स्थित  आतंकवादी ठिकानों को ध्वस्त किया।

जैश के लिए कार से ध्वंस करने की कार्रवाई भी नई नहीं रही। सन 2000 में स्कूल में पढऩे वाले 17 साल के एक किशोर ने श्रीनगर में 15 कोर आर्मी मुख्यालय से विस्फोटकों से भरी मारूति की टक्कर मार दी थी। इसके बाद ही यह शोर हुआ कि जैश घाटी में अब भी सक्रिय है। मौलाना मसूद अज़हर की घाटी में सक्रियता का सबूत यह धमाका था। इसके बाद ही विस्फोटकों से लदी मारूति के साथ 24 साल के ब्रिटिश नागरिक को 15 कोर मुख्यालय पर उड़ा दिया गया था। मौलाना मसूद अजहर को 1999 में अटल बिहारी सरकार ने कंधार में अपहृत भारतीय विमान आईसी 814 में सवार यात्रियों और विमान चलाने वाले दस्ते की रिहाई के एवज  में छोड़ा था। सन 2005 में जैश की एक आत्मघाती महिला ने अंवतिपुरा में खुद को राख कर लिया था।

 जानकारों के अनुसार पाकिस्तान में बहावलपुर में जैश का अड्डा है। तालिबान से इसका रिश्ता नाभि और नाल का है। नौ बटा ग्यारह की घटना के बाद जब पाकिस्तान और अमेरिका में नज़दीकियां बढ़ी तो जैश आर्थिक तौर पर और समृद्ध हुआ। इसने श्रीनगर में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के बाहर ही आत्मघाती हमला किया। इसमें 23 जानें गई। इस हमले की पाकिस्तान ने भी निंदा की थी। पाकिस्तान और जैश में थोड़ा मन-मुटाव तब बढ़ा जब 2013 में इसने राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ  की हत्या कराने की दोबारा कोशिश की।

इसके बाद कश्मीर घाटी में कुछ समय शांति का रहा। इसकी दो वजहें थीं एक तो पाकिस्तान से इसका संपर्क टूटा और खुफिया एजेंसियों में घुसे इसके लोगों से भी इसका संपर्क अब नहीं था। 2004 में कश्मीर में रह रहे जैश के तमाम बड़े सिपहासालार लोलाब में हो रही एक बैठक में मारे गए। खुफिया जानकारी के अनुसार साजिद  जो जैश कश्मीर का अगुआ था वह मार्च 2011 में मारा गया। इसी तरह एक स्थानीय कमांडर नूर मोहम्मद तांत्रे उर्फ नूर त्राली 25 सितंबर 2017 को पुलवामा में मारा गया।

त्राली की मौत के बाद पाक नागरिक मुफ्ती वकास के पास कश्मीर में नेतृत्व आया। सीआरपीएफ के प्रशिक्षण शिविर में 31 दिसंबर 2017 को दो आत्मघाती लोगों ने खुद को उड़ाया इसमें पांच सुरक्षा कर्मी मारे गए। जिन आत्मघाती लोगों ने यह काम किया वे दोनों ही स्थानीय थे। एक तो एक सिपाही का बच्चा था तो दसवीं में पढ़ता था और दूसरा पुलवामा में टैक्सी चलाता था। मार्च 2018 में वकास अवंतीपुरा में मारा गया।

फिर वहीं लेटपुरा में ही सीआरपीएफ को फिर निशाना बनाया गया। जैश की कोशिश है कि भारत और पाकिस्तान मे कभी दोस्ती के संबंध ने बनें।

letters@tehelka.com

जुटे हैं अच्छा करने में

भारत के ढेरों पड़ोसी हैं। लेकिन पाकिस्तान अलग है। यह एक ऐसा पड़ोसी है जो अकेले ही भारत को तकलीफ देने अैर परेशान करने में जुटा रहता है। उसे इसकी भी परवाह नहीं होती कि इससे उसे लाभ होगा या इसके अपने हितों को नुकसान पहुंचेगा। इसके एक पूर्व प्रधानमंत्री ने तो कहा था कि भारत से अगर एक हज़ार साल भी लड़ाई छिड़ी रही तो घास खाकर भी गुजारा कर लेंगे।

ऐसे पड़ोसी से निभा पाना सहज नहीं है। भारत ही नहीं दूसरे पड़ोसी भी यही मानते हैं। अफगानिस्तान के विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में शिकायत की थी कि किस तरह यह अफगानिस्तान सरकार की अनदेखी करके तालिबान से सीधे संपक में है। यह न केवल तमाम शांति प्रयासों की अनदेखी करता है बल्कि अफगानिस्तान का सार्वभौमिकता और संयुक्त राष्ट्रसंघ सुरक्षा प्रस्ताव 1989 का हनन भी करता है।

अभी हाल ईरान के 27 रिवाल्यूशनरी गार्ड मारे गए। रिवाल्यूशनरी गाडर््स के प्रमुख मेजर जनरल मोहम्मद अली जाफरी ने अपराधियों को सुरक्षित राह दिखाने के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया। ‘क्यों पाकिस्तान की सेना और सुरक्षा बल क्रांतिविरोधी समूहों का साथ देते हैं? पाकिस्तान को ज़रूर एक बड़ी कीमत चुकानी होगी।’ जाफरी ने कहा।

पाकिस्तान आज एक कैनटोनमेंट या कहें मिलिट्री की बैरक की तरह है। जिसे इसकी सेना या आईएसआई नेतृत्व चला रही है। सैनिक-औद्योगिक कांप्लेक्स एक तरह की पाकिस्तान की सेनाओं में एक है जहां इस्लाम, राष्ट्रीय गौरव, भारत और अमेरिका पर संदेह का सिलसिला चल रहा है। यह दशकों से लिखा है स्टीव कोल ने डायरेक्टोरेट एस में। सेना में इस्लामी बदलाव और भारत के बात के चलते दशकों में भारत में आतंक का सिलसिला रहा। जुल्फिकार अली भुट्टो ने उस भारत की तस्वीर उभारी थी जिसमें भारत पर कटाव के हजारों जख्म लगे है और उनसे खून रिस रहा हो। पाकिस्तान आज भी उसी नीति पर चल रहा है। बिना यह देखते हुुए कि आज किसके पास राजनीतिक ताकत है, एक ताकत जो सिर्फ ख्याली पुलाव नहीं है। क्योंकि यह ताकत सेना और आईएसआई के पास है।

पाकिस्तान आज आतंकवाद का एक तरह से वैश्विक भूकंप का केंद्र बना हुआ है जो अब न तो रहस्य है और न गोपनीय ही है। सारी दुनिया यह जानती है। कोई भी इस बात को अमेरिकी ब्हाइट हाउस के बयान में पड़ सकता है जो सीआरपीएफ के दस्ते पर हुए हमले के बाद जारी हुआ।

‘संयुक्त राष्ट्र पाकिस्तान से कहना है कि वह सारे आतंकवादी समूहों को संरक्षण और समर्थन देना बंद करे जो इसकी धरती से सक्रिय हैं।

इनका कदम सिर्फ पूरे क्षेत्र में हिंसा और आतंक फैलाना है। ट्रंप के प्रेस सेके्रटरी की ओर से जारी इस बयान में यह कहा गया है। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने पाकिस्तान का नाम ज़रूर नहीं लिया लेकिन खुल कर जैश-ए-मोहम्मद को जिम्मेदार तो ठहराया है। यह एक संगठन है जो बहावलपुर पाकिस्तान में सक्रिय या पुलवामा हमले में।

पाकिस्तान को अब बदलना चाहिए। यह वैश्विक बदलाव की बात करता है। दुख तो यह है कि हमारे पास आतंकवाद की परिभाषा पर भी वैश्विक मतैक्य नहीं है। अपने हितों का ध्यान रखते हुए अमेरिका और चीन ने पाकिस्तान में इस राक्षस को संरक्षण देना बंद कर दिया है, खास कर सैन्य आईएसआई संस्थान को। पाकिस्तान के नेतृत्व ने दूहरी बातें करना और बातों से छकाने की कला में महारत हासिल कर ली है।

इस तमाम फसाद का केंद्र बिंदु है कश्मीर। दुर्भाग्य से भारत की बड़ी समस्या कश्मीर घाटी में  क्षेत्रीय आख्यान से है। जिसका लाभ पाकिस्तान को मिलता है।  यह अख्यान है अलगाव का – सहज या असहज – यह हालात पर निर्भर  है यानी अलगाव और बलिदान। कश्मीर के स्थानीय क्षेत्र अब भी इस बात से पूरी तरह रच-बस नहीं पाए हैं कि 70 साल बाद भी आज वे भारत के अभिन्न अंग हैं और देश के किसी भी नागरिक की ही तरह हैं। वे भारत के साथ अपने संबंध को खास मानते हैं। जिसके लिए उन्होंने बड़ा बलिदान 1948 में दिया था। उन्होंने पाकिस्तान के साथ नहीं बल्कि भारत के साथ रहने का फैसला लिया था। जिसके कारण भारत देश और लोग उनके हमेशा आभारी है।

कश्मीरियों की कई पीढिय़ां कश्मीर के क्षेत्रीय नेतृत्व के झूठ पर यकीन करती रहीं हैं। उनका मानना है कि अब जम्मू और कश्मीर ही नहीं बल्कि 540 आजाद राज्यों और रियासतों ने 1947-48 में उसी दस्तावेज के तहत शामिल होने का फैसला किया गया था जिसे ‘इंस्ट्रमेंट ऑफ एक्सेशन’ कहते हैं। आज ये देश के अभिन्न हिस्से हैं। लेकिन घाटी में अपने लोगों को यह नहीं समझाया जाता। इसकी बजाए उन्हें दर्जे की बात कही जाती है। वे भारतीय संविधान की धारा 370 का उल्लेख करते हैं। यह धारा अस्थाई और क्षणिक व्यवस्था थी। जो काफी समय चली। इससे घाटी में न केवल विमुख्ता बल्कि अलगाववाद को ही बल मिला। और ध्यान मे रखिए यह धारा पूरे जम्मू और कश्मीर राज्य के लिए है। जम्मू और लद्दाख के भी उसी के हिस्से हैं वहां ऐसा क्यों नहीं है। क्योंकि इन क्षेत्रों के नेतृत्व ने यहां की जनता को यह बता रखा है कि पूरे देश की जनता की ही तरह वे भी भारत के अभिन्न अंग हैं।

एक आम कश्मीरी देश के किसी भी और नागरिक की ही तरह है। लेकिन नेता उसे आतंकवादी या अलगाववादी या पत्थर फेंकने वाले में तब्दील कर देते हैं। धारा 370 तब खत्म हो जब वहां की सरकार फैसला ले। लेकिन घाटी के इन नेताओं को साधना ज़रूरी है जो लगातार अलगाव का राग अलापते रहते हैं।

हमने इन्हें काफी वक्त दिया। इस उम्मीद से ज्य़ादा कामकाज होगा तो समन्वय खासा बनेगा दुर्भाग्य से कश्मीरी लोगों ने तो खुले दिल-दिमाग से अपने भारतीय होने को पसंद किया लेकिन क्षेत्रीय नेताओं ने हमेशा अलगाववाद की लौ जलाए रखी। अब समय आ गया है जब हम उन्हें घाटी में महत्वहीन कर दें। वैसे  ही जैसा राज्य के दो क्षेत्रों में कर पाए।   घाटी में वही आख्यान होना चाहिए जो भारतीय होने का है।

अब यह जिम्मेदारी देश की है। इसके नेताओं और जनता की। देश के लोगों को यह याद रखना चाहिए कि जब वे कहते हैं कि ‘कश्मीर हमारा है’ तो इसका यह भी मतलब है कि ‘हर कश्मीरी हमारा है’ यदि उसे बहकाया गया है, यदि वह शैतानी करे तो उसे सजा दो यदि वह धोखेबाज है तो उसे निकाल बाहर करो। लेकिन उसे बताओ कि वह भारतीय है। उसमें भारतीयता है। 125 करोड़ की जनसंख्या इतनी अशक्त नहीं है कि वह मुट्ठी भर आतंकवादियों और उनके मालिकों को दुरूस्त न कर सके। लेकिन असली ताकत किसी से घृणा में नहीं बल्कि उसके साथ सही राह पर चलने में है।

लेखक भाजपा के राष्ट्रीय सचिव

साभार: इंडियन एक्सपे्रस

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हज़ारों नम आंखों ने दी वीरों को विदाई

उत्तराखंड वासी देश और समाज की खातिर अपने प्राणों की आहुति देना अपने जीवन काल का सर्वोच्च यज्ञ मानता है। पड़ोसी देश पाक की नापाक हरकतों से देवभूमि वासी $गम और गुस्से में हैं। पुलवामा हादसे और दो होनहार अफसरों की शहादतों ने पूरे उत्तराखंड में उबाल ला दिया। ‘खून का बदला खून’ और ‘पाकिस्तान हो बर्बाद हो बर्बाद’ के नारों से गूंज रहा आसमान 26 फरवरी को तब शांत हुआ जब पाक सीमा पर जैश के आतंकी ठिकानों को भारतीय वायु सेना के जांबाजों ने शमशान में तब्दील कर दिया। 350 से ज्यादा जैश-ए-मोहम्मद के खूंखार आंतकवादी इस एयर स्ट्राइक में ढेर हो गए।

14 फरवरी 2019 को जब पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकी हमले में 40 जवान शहीद हुए। अभी इन जवानों की चिता ठंडी भी नहीं ही हुई थी कि देहरादून के मेजर चित्रेश बिष्ट और मेजर विभूति शंकर ढोंडियाल की शहादतों ने फिर से एक बार देशवासियों को झकझोर कर रख दिया। पुलवामा हमले में सीआरपीएफ के एएसआई मोहनलाल रतूड़ी और वीरेंद्र सिंह राणा भी शहीद हुए।

उत्तराखंड पुलिस के एक कर्तव्यनिष्ठ सेवानिवृत्त पुलिस इंस्पेक्टर एस एस बिष्ट के बेटे मेजर चित्रेश बिष्ट के पुलवामा हमले के दो दिन बाद शहीद होने की खबर आई तो पूरा राज्य शोक में डूब गया। 16 फरवरी को मेजर बिष्ट जम्मू सेक्टर में एक आईईडी डिफ्यूज करते समय हुए धमाके में शहीद हो गए। पिता के लिए इस सदमे को सहन कर पाना असंभव है, हालांकि उन्होंने 26 फरवरी की सर्जिकल स्ट्राइक के लिए भारतीय वायु सेना को बधाई दी है। बेटे की कमी ताउम्र पूरी नहीं हो सकती बेशक पूरे सैन्य सम्मान के साथ मेजर चित्रेश की अंतिम यात्रा में उमड़े हजारों की तादात में शोकाकुल शहर वासियों ने यह संदेश दे दिया कि शहीद चित्रेश बिष्ट अमर हो गए हैं।

एयर सर्जिकल स्ट्राइक के बाद एक टीवी चैनल पर चर्चा के लिए बुलाए गए शहीद मेजर चित्रेश के पिता ने सरकार और वायु सेना को बधाई देते हुए कहा कि आतंकवाद के खात्मे के लिए सैन्य बलों को नियमित रूप से ऐसे ऑपरेशन जारी रखने चाहिए। अभी मेजर चित्रेश की चिता की आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि देहरादून के ही एक और होनहार अफसर मेजर विभूति शंकर ढोंढियाल के शहीद होने की खबर ने दून घाटी में एक बार फिर से उबाल ला दिया। मेजर विभूति का 10 माह पूर्व विवाह हुआ था। पति की शहादत के बाद उनकी पत्नी निकिता के अदम्य साहस को देखकर सब चकित थे।

मेजर विभूति की अंतिम यात्रा शुरू होने से पूर्व पत्नी निकिता ने शहीद पति का माथा चूमा और वहां उपस्थित लोगों से अनुरोध किया कि उनकी मौत पर सहानुभूति न जताएं बल्कि उनकी कुर्बानी जिम्मेदारी और देश के प्रति एहसास को समझें। शहीद पति की अर्थी के पास खड़े होकर निकिता ने आखिरी सैल्यूट करने से पूर्व जो हृदयस्पर्शी मार्मिकतापूर्ण अपनी भावनाएं प्रकट की उसने वहां एकत्र हर छोटे बड़े को रुला कर रख दिया। 19 फरवरी को शहीद मेजर विभूति शंकर ढोंडियाल की अंतिम यात्रा में भी हज़ारों की तादाद में लोगों ने बारिश होने के बावजूद शिरकत की। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत समेत कैबिनेट मंत्रियों, सेना और पुलिस के अधिकारियों ने श्रद्धांजलि दी।

आंतकवाद का पोषण करने वाले पाकिस्तान के खिलाफ अभी देशवासियों का गुस्सा बरकरार ही था कि शुक्रवार 22 फरवरी को उत्तर प्रदेश पुलिस ने सहारनपुर के देवबंद इलाके से जैश के दो आतंकियों को गिरफ्तार कर लिया। आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सक्रिय सदस्यों के रूप में गिरफ्तार किए इन आतंकवादियों की पहचान शहनवाज तेली और आकिब अहमद मलिक के रूप में हुई। उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह ने बताया कि यह दोनों आतंकी एक हॉस्टल में छात्र बनकर रह रहे थे। उनके फोन से ऐसे वीडियो, फोटो और जेहादी चैट मिले हैं जिससे यह बात पुख्ता हो गई कि यह दोनों आतंकी इस इलाके में युवाओं को आतंकवादी बनाने के लिए प्रेरित करने के अभियान में लगे हुए थे। पुलिस ने उनके पास से 32 बोर की पिस्टल कारतूस भी बरामद किए हैं। गिरफ्तार दोनों आतंकियों से पूछताछ में एक सनसनी पूर्ण खुलासा यह भी हुआ कि पुलवामा हमले की इनको पहले से जानकारी थी। देश की सीमाओं पर शहादतों, प्रदर्शनों और गुस्से के माहौल के बीच एक और दुर्भाग्यपूर्ण मामला यह हुआ कि यहां पढ़ाई कर रहे कश्मीरी छात्र छात्राओं में अचानक पैदा हुई असुरक्षा की भावना के कारण 100 से अधिक छात्राओं को पढ़ाई छोडक़र वापिस अपने राज्य को पलायन करना पड़ा। जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की पार्टी के सांसद $फैयाज़ अहमद मीर चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल लेकर देहरादून पहुंचे। कई हिंदूवादी संगठनों ने शिक्षण संस्थाओं के बाहर प्रदर्शन किए जहां कश्मीरी छात्र छात्राएं पढ़ रहे थे। हालांकि अभद्र टिप्पणी करने वाले एक छात्र को तो पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और दूसरे को निलंबित कर दिया गया। लेकिन फिर भी एहतियात के तौर पर पीडीपी सांसद कश्मीरी छात्रों को दो बसों में सुरक्षा की दृष्टि से अपने साथ कश्मीर ले गए। उधर इसी अफरातफरी के माहौल के बीच दिल्ली की जवाहरलाल यूनिवर्सिटी छात्र संघ की पूर्व अध्यक्ष शहला राशिद के एक ट्वीट के खिलाफ यहां पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया है। पुलिस महानिदेशक कानून-व्यवस्था अशोक कुमार ने हालांकि आश्वस्त किया कि देश के प्रत्येक नागरिक की सुरक्षा करना पुलिस की जिम्मेदारी है। प्रदेश भर में सुरक्षा का माहौल है।

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विपक्ष कहां, अब तो सिर्फ भाजपा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अद्र्धकुंभ पर प्रयागराज में संगम में डुबकी लगाई। पूजा-अर्चना की। स्वच्छता अभियान में जुटे सफाई कर्मचारियों के चरण धोए। एक प्रधानमंत्री ने खुद को चक्रवर्ती प्रधानमंत्री साबित किया। उन्होंने देश के एक करोड़ किसानों के खाते में रु पए 2,021 करोड़ मात्र की धनराशि भी डाली।  विपक्ष शायद देश में है ही नहीं।
देश में एक ओर जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में विस्फोटकों से भरी गाड़ी सीआरपीएफ जवानों की बस से एक आत्मघाती आतंकवादी ने टकरा दी। इसमें 40 जवान मारे गए। पाकिस्तान में पनाह लिए हुए आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने जिम्मेदारी ली। भारतीय खुफिया एजंसियों की चूक का खुलासा हुआ। भारत भर में शोक और पाकिस्तान से आरपार की लड़ाई लडऩे का जोश छाया रहा हैैं।  प्रधानमंत्री ने घोषित किया कि इस शहादत का बदला लिया जाएगा। सेनाओं को ‘फ्री’ कर दिया गया है। फिर वे चुनाव प्रचार में भी जुटे रहे।
पुलवामा कांड के बाद भारत सरकार ने ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ की पाकिस्तान को दी गई अपनी मान्यता वापस ले ली। सेनाओं को आतंकवादियों से निपटने की खुली छूट दे दी। भारत-पाक के बीच सिंधु नदी जल बंटवारे का अतिरिक्त जल जो पाकिस्तान जाता था उसे रोकने के भी संकेत दे दिए गए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने पुलवामा हमले की निंदा की। उधर देश की भाजपा चुनाव प्रचार करती रही। जनता के लिए चुनावी सौगातों की घोषणा भी होती रही। पूरे देश में भाजपा के प्रति मतदाताओं मे भरोसा बढ़ा है।
उत्तरप्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है। यहां लोकसभा की सबसे ज्य़ादा सीटें हैं। यहां के मतदाताओं का हर तरह से साधने के प्रयास में अर्से से यही पार्टी जुटी है। यह अद्र्धकुंभ पूरे प्रदेश और देश से आए लोगों को तरकीबन तीन महीने तक  रोशनी, स्वच्छता और हिंदुत्व की भावनाओं से ओत-प्रोत किया गया। प्रदेश में जहां कांग्रेस की नई सचिव प्रियंका के आने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अद्र्धकुंभ पर प्रयागराज में संगम में डुबकी लगाई। पूजा-अर्चना की। स्वच्छता अभियान में जुटे सफाई कर्मचारियों के चरण धोए। एक प्रधानमंत्री ने खुद को चक्रवर्ती प्रधानमंत्री साबित किया। उन्होंने देश के एक करोड़ किसानों के खाते में रु पए 2,021 करोड़ मात्र की धनराशि भी डाली।  विपक्ष शायद देश में है ही नहीं।
देश में एक ओर जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में विस्फोटकों से भरी गाड़ी सीआरपीएफ जवानों की बस से एक आत्मघाती आतंकवादी ने टकरा दी। इसमें 40 जवान मारे गए। पाकिस्तान में पनाह लिए हुए आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने जिम्मेदारी ली। भारतीय खुफिया एजंसियों की चूक का खुलासा हुआ। भारत भर में शोक और पाकिस्तान से आरपार की लड़ाई लडऩे का जोश छाया रहा हैैं।  प्रधानमंत्री ने घोषित किया कि इस शहादत का बदला लिया जाएगा। सेनाओं को ‘फ्री’ कर दिया गया है। फिर वे चुनाव प्रचार में भी जुटे रहे।
पुलवामा कांड के बाद भारत सरकार ने ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ की पाकिस्तान को दी गई अपनी मान्यता वापस ले ली। सेनाओं को आतंकवादियों से निपटने की खुली छूट दे दी। भारत-पाक के बीच सिंधु नदी जल बंटवारे का अतिरिक्त जल जो पाकिस्तान जाता था उसे रोकने के भी संकेत दे दिए गए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने पुलवामा हमले की निंदा की। उधर देश की भाजपा चुनाव प्रचार करती रही। जनता के लिए चुनावी सौगातों की घोषणा भी होती रही। पूरे देश में भाजपा के प्रति मतदाताओं मे भरोसा बढ़ा है।
उत्तरप्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है। यहां लोकसभा की सबसे ज्य़ादा सीटें हैं। यहां के मतदाताओं का हर तरह से साधने के प्रयास में अर्से से यही पार्टी जुटी है। यह अद्र्धकुंभ पूरे प्रदेश और देश से आए लोगों को तरकीबन तीन महीने तक  रोशनी, स्वच्छता और हिंदुत्व की भावनाओं से ओत-प्रोत किया गया। प्रदेश में जहां कांग्रेस की नई सचिव प्रियंका के आने के बाद मतदाताओं में बदलाव की बयार उठी थी वह अब वह देशभक्ति की आंधी में कहीं दब गई है। चुनावी पंडित भी अब यह मानते हैं कि यदि जल्दी चुनाव की तारीखें घोषित हो जाएं तो चुनाव रण में विजयी रहेगी। पहले जहां यह अनुमान था कि भाजपा का सवा सौ से डेढ़ सौ सीटें मिलें वहीं अब ढाई सौ से तीन सौ सीटों की बात भाजपा मुख्यालयों में सुनाई देती है।
महागठबंधन यदि विपक्षी दल बनाएं तो वह महा मिलावटी है यह प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने बताया। लेकिन भाजपा के अपने एनडीए के गठबंधन से निकल भागने की जुगत में लगी शिवसेना को पार्टी अध्यक्ष ने आखिर साध ही लिया। भाजपा अध्यक्ष अमितशाह के कब्जे में आज मतदाता की नब्ज है। अब देश की जनता-जनार्दन का ध्यान अयोध्या में राममंदिर निर्माण की ओर नहीं है। अब तो देशभक्ति सभी मुद्दों में सबसे तगड़ा ‘बियरर चेक’ है।
केंद्र की भाजपा सराकर ने अभी हाल सरकारी कर्मचारियों का महंगाई भत्ता, ईपीएफ पर ब्याज, देश के दो करोड़ किसानों के खाते में नकदी जमा कराने में जो तेजी दिखाई है उसका लाभ भाजपा और उसके गठबंधन को मिलेगा ही।
चुनावी जानकार मानते हैं कि बिहार में भी नीतीश अपने गठबंधन को घाट देने में अब कामयाब हो जाएंगे।
भाजपा ने पुलवामा और सर्जिकल स्ट्राइक से यह अब जान लिया है कि देश में मतदाताओं के जोश को किस तरह उकसाते रहना है। कोई भी विपक्षी नेता यदि कभी, कहीं सवाल पूछे तो उसे डपट दो। उसकी देशभक्ति को चुनौती दो और देश की जनता को जता दो कि भाजपा की मोदी सरकार ने ही देश को सुरक्षित और एकजुट रखा है।
कम से कम अगले कुछ महीने देशभक्ति की यह भावना काम करेगी। इसके साथ ही धार्मिक भावनाएं जैसे सिख, हिंदू, मुसलमान को उकसाना है। नए खतरों फिर सीमा पर चौकस सिपाही की जायकारे में जनता जुटी ही रहेगी। वह नोटबंदी, बेरोज़गारी, जीएसटी, महंगाई सब भूल जाएगी।
पिछले 70 साल में विपक्ष की ढेरों सरकारें केंद्र में बनीं और गिरीं। पर पांच साल में देश ने ‘सबका साथ लेकर सबका विकास’ हर क्षेत्र में किया। चाहे वह ग्रामीण या झुग्गी झोपडिय़ों में गैस व गैस सिलिंडर पहुंचाने की योजना हों या पूरे देश में बिजली पहुंचाने का काम या फिर आयुष्मान सेहत कार्ड हो, किसान कजऱ् हो या फिर ऊँचे तबकों के गरीब लोगों के लिए दस फीसद आरक्षण। सभी पार्टियों ने भी इसका पक्ष लिया।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हमेशा यह कहते रहे हैं कि उत्तरप्रदेश में पार्टी को कम से कम 75 सीटें मिलेगी। देश में भाजपा की बढ़ी लोकप्रियता से ऐसा लगता है कि यह संख्या बढ़ भी सकती है।
निश्चय की भाजपा नेतृत्व की केंद्र सरकार को बधाई दी जानी चाहिए। उन्होंने कितनी सफाई से पुलगामा में सुरक्षा सैनिकों की शहादत में सुरक्षा एजंसियों की सतर्कता में हुई लापरवाही के मामले को दबा दिया। पूरे देश में देश प्रेम और सेनाओं के प्रति देशवासियों के लगाव की भावना को न केवल तेज किया बल्कि अपना चुनाव प्रचार भी साथ-साथ जारी रखा। अपने गठबंधन को और भी संगठित करते हुए दूसरे गठबंधनों को मिलावटी करार दिया।
भारत एक अर्से से आतंकवादियों के निशाने पर है। चूंकि भारतीय प्रशासन में पार्टीवाद अब हावी है इसलिए उसका असर सरकारी कामकाज पर दिखाई देता है। याद करें तो संसद पर हमला करने में मसूद अज़हर ही आगे था और पुलवामा के धमाके की जिम्मेदारी भी उसके ही आतंकवादी संगठन ने ली। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और उनके अधीन सक्रिय एजंसियों यदि पहले से सुरक्षा दस्तों को सतर्क कर पातीं तो शायद इतने बड़े पैमाने पर जनबल की शहादत न होती। लेकिन यह सूझ बूझ प्रधानमंत्री की ही थी कि उन्होंने देश में देशभक्ति और सुरक्षा सेनाओं के मनोबल को ऊँचा रखने के लिए सेना को आतंकवादियों के सफाए के लिए ‘फ्री’ कर दिया। इससे पूरे देश में यह जोश जगा कि पाकिस्तान स्थित आतंकवादी अड्डे नष्ट करने के लिए आर-पार की लड़ाई हो। भारतीय मीडिया और विपक्षी दल सब ने प्रधानमंत्री का सम्मान रखा।
उधर फ्रांस और ब्रिटेन के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बात उठी और पाकिस्तान के आतंकवाद को समर्थन देने के खिलाफ माहौल संयुक्त राष्ट्र संघ में बना। इसका असर भारतीय जनमानस पर पड़ा। जिसका बखूबी उपयोग भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रधानमंत्री ने भावी 17वीं लोकसभा के लिए आम चुनाव के लिए पार्टी और अपने गठबंधन जीत के लिए उन्होंने जमीन काफी हद तक पुख्ता कर ली।
पुलवामा कांड के पहले तक देश की राजनीति में खासा उतार-चढ़ाव दिख रहा था। विपक्षी दल आपस में गठबंधन के प्रयास में जुटे थे। जनता के बीच जो मुद्दे उठ रहे थे उसमें बेरोजगारी, नोटबंदी, जीएसटी और राफेल जेट विमान की खरीद में घोटाले के आरोप उभर रहे थे। लेकिन पुलवामा में हुई 40 जवानों की शहादत बड़ा मुद्दा बना। इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान मे बसे आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ली। पाकिस्तान ने इंकार किया। लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद ने बैठक के बाद जारी प्रस्ताव में इस हमले की निंदा की और पाकिस्तान को निर्देश दिया कि वह इस मामले में कार्रवाई करे। पाकिस्तान ने इस संगठन पर पाबंदी (22 फरवरी)  लगाई और सेना भी सक्रिय हुई।
लेकिन असल मुद्दा यह है कि आखिर कश्मीर का मसला भारत सरकार ठीक से क्यों नहीं हल कर पाई। आखिर भाजपा नेतृत्व की एनडीए सरकार भी इसका हल पांच साल में क्यों नहीं कर सकी। पुलवामा कांड के बाद पाकिस्तान और भारत के बीच आर-पार की लड़ाई की बातें अब जोर पकड़ रही हैं। शहरतें से गांवों तक देशभक्ति और सेनाओं के मनोबल को ऊँचा रखने की बात जोर पकड़ रही है। जबकि आम चुनाव के लिहाज से दूसरे मुद्दे शायद काफी पीछे छूट गए हैं।

सवाल पूछने का नहीं जवाब देने का समय

लोकसभा चुनाव 2019 के पहले जो परिदृश्य राष्ट्रीय स्तर पर उभर कर आ रहा है वह केंद्र में भाजपा नेतृत्व की एनडीए सरकार के लिए खतरे की घंटी है। असम, उत्तरपूर्वी राज्यों, बंगाल, आंध्रप्रदेश में जबरदस्त नाराजग़ी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अभी हाल ही में असम और आंध्र प्रदेश में विरोध का सामना करना पड़ा।
‘गो-बैक’ के नारे लगे, काले झंडे दिखाए गए। पुतले फंूके गए।
उधर राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव में भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ी। कंाग्रेस ने भाजपा के गढ़ में न सिर्फ चुनौती दी बल्कि सत्ता से बाहर का रास्ता भी दिखा दिया। इन तीनों राज्यों के विधानसभा चुनाव में कंाग्रेस ने यह जता दिया है कि चुनावी जंग में भाजपा को न सिर्फ पराजित किया जा सकता है बल्कि उसे सत्ता से हटाया भी जा
सकता है।
पूरे देश में किसान आंदोलन संगठित स्तर पर उभर कर सामने आया है। एनडीए सरकार में सहयोगी बने दल भी अब आंखे तरेर रहे हैं। इन में उत्तर प्रदेश में अपना दल और भासपा (ओमप्रकाश राजभर) जैसे सहयोगी हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना, बिहार में जद(यू), पंजाब में अकाली दल भी खासे खफा हैं। राजनीतिक समीकरण की दृष्टि से इसे हल्के से नहीं लिया जा सकता।
नागरिकता के कानून पर उत्तरपूर्व राज्यों की पार्टियां जो भाजपा के साथ थीं अब खासी सशंक्ति हैं। असम में असम गण परिषद, जम्मू-कश्मीर में पीडीपी, आंध्र में टीडीपी, बिहार में उपेंद्र कुशवाहा भाजपा से अलग-थलग हैं। नोटबंदी और जीएसटी से देश में आर्थिक संकट गहराया है। बेरोजग़ारी बेइंतहा बढ़ी है। छोटी, मझोली फैक्टरियां बंद हो गई हैं। देश और प्रदेश में आर्थिक परेशानी गहराती जा रही है।
उत्तरप्रदेश में अद्र्ध कुंभ को पूर्ण कुंभ जैसा प्रसारित करने के बाद भी जनता अभी कमल की ओर जाती नहीं दिख रही है। खुद मुख्यमंत्री के अपने ही गढ़ में हुए उपचुनाव में हुई पराजय खासी महत्वपूर्ण है जिसकी जनता को याद है। उत्तरप्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य भी फूलपुर लोकसभा सीट नहीं बचा पाए। इसी तरह कैराना लोकसभा सीट और नूरपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भी भाजपा हारती ही रही। सपा बसपा गठबंधन से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और भाजपा नेता व प्रधानमंत्री की बेचैनी अलबत्ता बढ़ी है।
कांग्रेस की ओर से पूर्वी उत्तरप्रदेश में प्रियंका गांधी के सचिव पद पर आने और ज्योतिरादित्य सिंधिया के पश्चिमी उत्तरप्रदेश में सचिव बनने से भाजपा को तिकोने मुकाबले में सांस लेने का मौका ज़रूर मिला है। लेकिन राजनीति किस ओर करवट लेगी इसे दावे के साथ बता पाना कठिन है। लखनऊ में कांग्रेस के नए महारथी अपने रोड शो से जैसे उभरे हैं उससे यह संभावना है कि पूर्वांचल की 27 सीटों पर हवा का रूख बदल सकता है। तिकोने संघर्ष में भी सबसे अधिक खमियाजा भाजपा को ही उठाना पड़ेगा क्योंकि कांग्रेस, सपा और बसपा के पास खोने के लिए यहां कुछ नहीं है।
मध्यप्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का व्यापक व्यापम घोटाला जिस तरह उनके 15 साल के राजकाज छिनने की वजह बना, वैसी ही शुरूआत उत्तरप्रदेश में अपने राज के दो ही साल में भाजपा ने कर दी है। 68,500 शिक्षकों की भर्ती के मामले में व्यापक धांधली पर पहले जो जांच बिठाई गई उसमें शिक्षा विभाग के अधिकारी भी रखे गए। हाईकोर्ट ने तब राज्य की योगी सरकार को फटकार लगातेे हुए टिप्पणी की थी कि जो विभाग घोटाले में शामिल है वह अपने ही ‘भ्रष्टाचार’ की जांच कैसे कर सकता है। कोर्ट ने शिक्षक भर्ती घोटाले की जांच का निर्देश सीबीआई से कराने का आदेश दिया। हालांकि हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार की विशेष अपील को स्वीकार करके एकल पीठ के सीबीआई जांच के आदेश को रद्द कर दिया है।
राज्य सरकार को ज़रूर राहत मिली लेकिन शिक्षक भर्ती की परीक्षा में बैठे लाखों छात्रों के मन में आशंकाएं तो हंै ही, क्योंकि व्यापक पैमाने पर इस शिक्षक भर्ती में धांधली तो जबरदस्त हुई जिसके कारण बेरोजग़ार युवाओं का भविष्य चौपट हो गया।
अब बनारस की गंगा का प्रदूषण और स्मार्ट सिटी बनारस के पुननिर्माण के मुद्दे भी इसी साल 2019 के आम चुनाव में प्रमुख मुद्दे तो रहेंगे ही। आज बनारस और आसपास वह माहौल नहीं है जो 2014 में था। अब ‘हर हर और घर घर’ के मंत्र घोष की हवा निकल चुकी है। लोग सच्चाई से वाकिफ हैं।
बनारस के पक्का महाल में विश्वनाथ मंदिर कारिडोर और गंगा पाथवे के निर्माण के बहाने 200 से भी अधिक घर, मंदिर और गलियां ध्वस्त कर दी गईं। लोकसभा चुनाव के दौरान इस मुद्दे पर जनता ज़रूर अपनी बेचैनी जताएगी। इतिहास को तोडऩे-मरोडऩे, गलत जानकारी देने का मुद्दा भी चुनावी विमर्श का हिस्सा होगा। इससे इंकार नहीं किया जा सकता।
आज जो माहौल बना है उसके लिए प्रधान सेवक ही जिम्मेदार है। कोई और नहीं। नोटबंदी और जीएसटी से किसको फायदा हुआ है? यह एक बड़ा सवाल है।
अब 2014 की तरह अब की मौका सवाल पूछने का नहीं, बल्कि खुद प्रधानसेवक के जवाब का इंतजार है बनारस की जनता को।
सुरेश प्रताप

अफगानिस्तान में गूंजतीं खतरे की घंटियां

अमेरिका ने फैसला लिया है कि उसकी सेनाएं अफगानिस्तान से हटेंगी। यानी वहां 14,000 सैनिक अब घट कर सात हजार ही रह जाएंगे। इनकी मौजूदगी में काबुल में तालिबान की सरकार बनेगी। यह फैसला न तो युद्ध में ध्वंस देश के हित में है और न दुनिया के लिए।
इसकी वजह यह बताई जाती है कि अब यह स्थिति आ गई है जबकि डोनाल्ड टं्रप प्रशासन यह चाहता है कि अब अफगानी अपनी सुरक्षा सेनाओं पर ही भरोसा करें न कि विदेशी भूंिम से आ रही सेनाओं पर। हालांकि सच्चाई यह है कि अफगान नेशनल आर्मी इस मामले में भी बड़ी लाचार रही है कि अशरफ गनी की सरकार के हुकुमनामों पर पूरे अफगानिस्तान में  अमल हो। आज भी आधे अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा है। ऐसे में यह अनुमान किया जा सकता है कि अफगान सुरक्षा दस्ते देश के हालात पर किस हद तक काबू पर सकेंगे।
फिर लगता है कि अफगानिस्तान के नब्बेे के दशक के वे दिन फिर लौट आएंगे जब पूरा देश तालिबान के अधिकार में था। अब इतना ही बदलाव हो सकता है कि राजकाज के कुछ तौर तरीके में थोड़ा बहुत बदलाव दिखे लेकिन देश फिर पहले की ही तरह हिंसा की पौधशाला बन जाए। ऐसे में आज ज़रूरत है कि काफी कुछ तैयारियां कर ली जाएं।
क्या अमेरिका और बाकी दुनिया को यह नहीं देखना चाहिए कि अमेरिका मुख्य भूमि पर हमले के बाद पिछले 17 साल से अफगानिस्तान पर हमला कर बिलियन से भी कहीं ज़्यादा डालर खर्च करने के बाद क्या सेना हटाने का यह उचित फैसला है? क्या इससे पूरी दुनिया में सुरक्षा रहेगी? क्या इससे यह संदेश सब जगह नहीं जाएगा कि जब इसने आतंकवाद को जड़ों को खत्म करने की सोची थी वहीं अब शंाति  की बात करके यह अपनी नाकामी स्वीकार कर रहा है? ऐेसे ही और भी कई सवाल लोगों के दिमाग में उठेंगे जब लोगों को अमेरिकी नीति में बदलाव से होने वाले खतरों का अंदेशा उभरेगा।
शायद यही वजह थी जब कुछ सप्ताह पहले ट्रंप प्रशासन के फैसले के उजागर होने के बाद पूरी दुनिया दंग सी रह गई थी। विदेशी मामलों के ज़्यादातर विशेषज्ञ इस बात पर एकमत हैं कि अफगानिस्तान से अमरीकी सेनाओं के हटने से आतंकवादी जहां भी हैं, उन्हें उनकी ताकत में इज़ाफा करने में मदद मिलेगी।
ट्रंप प्रशासन का यह बेहद अतार्किक फैसला है जिसके चलते तालिबान की जीत और आतंकवाद के फैलाव को कुचलने और खत्म करने की नीयत पर संदेह होता है। ऐसी हालत में तमाम आतंकवादी ताकतों को प्रेरणा मिलेगी तालिबान से। वे सब अपने अधूरे काम पूरे करने में जुट जाएंगे। जिन्हें पूरा करने में अभी तक उन्हें खासी परेशनियां उठानी पड़ रही थीं। अब उन्हें अपने कार्यकर्ताओं को अपने विनाशकारी एजेंडे को अमल में लाने के लिए कहना होगा। क्योंकि अब उनके सिर पर कामयाबी का ताज आ रहा है। कितने अफसोस की बात है यह।
अब देखिए पुलवामा आतंकवादी हमले में सीआरपीएफ के 40 कर्मी मार दिए गए। अभी कितने ही घायल हैं। इस मामले को भी इसी लिहाज से देखा-परखा जाना चाहिए।
सारी दुनिया के आतंकवादी संगठन और उनके कर्मी खुशियां मनाएंगे जब अफगानिस्तान की धरती से आखिरी अमेरिकी सैनिक भी अपने देश को लौट रहा होगा। तालिबान की मांगों में यह प्रमुख मांग थी जो ट्रंप प्रशासन से उनकी बातचीत सामंजस्य और हिंसा की राह छोड़ देने पर हो रही थी। जिससे काबुल में राजनीतिक फेरबदल का हिस्सा बन सकें। भारत विरोधी उग्रवादी तो इससे ज़्यादा तो कुछ नहीं मांग सके।
यानी अफगानिस्तान में शांति की कोई भी पहल इस समय तालिबान के ही हाथों में जा रही थी। शर्तों को भी कोई अच्छा नहीं मान पाता था। ऐसा लगता था कि चारों तरफ से भूमि से ही जुड़े देश के लोगों को भेडिय़ों के हवाले करने की सोची जा रही है। जब भी कोई तर्क देता कि अफगानिस्तान का राजकाज अफगानों के ही हाथ में सौंप दो जब यहां कोई विदेशी सेना  न हो तो माना जाता कि या तो ऐसा कहने वाले को सच्चाई की जानकारी नहीं है या वह अफगानो का शुभचिंतक नहीं है।
सवाल है कि क्या अफगानिस्तान अपना राजकाज खुद चला सकता है वह भी बिना किसी विदेशी सुरक्षा चक्र के? इस सवाल का जवाब पक्ष में इसलिए नहीं बन पाता क्योंकि तालिबान आत्मघाती गुटों के हमले थमते नहीं। सबसे पहली बात तो यह है कि विभिन्न तालिबान गुटों ने बर्बादी की अपनी राह से तौबा कर ली है। इसी कारण अमेरिकी सेनाएं देश से हट रही हैं। यही सही तर्क है कि यदि शंति होगी तभी प्रगति होगी और नए अवसर बनेंगें कि अच्छाई की खातिर अफगान अपना भाग्य बदल सकें।
अमेरिकी फैसले पर जबरदस्त गहमागहमी है जबकि इस्लामाबाद में तालिबान के साथ बातचीत इसलिए टूट गई क्योंकि उग्रवादी आंदोलन सोच थी । इसके कुछ प्रतिनिधि या नेता पाबंदियों के चलते पाकिस्तानी राजधानी नहीं पहुंच पाएंगे क्योंकि उन पर अमेरिका ने पाबंदी लगा रखी है और सयुंक्त राष्ट्रसंघ अभी भी अड़ा है। अब बातचीत दोहा में होगी जो कतर की राजधानी है जहां सुलह-सफाई का पहल दौर हो भी चुका है।
इस्लामाबाद बातचीत रद्द होने के पहले तालिबान के प्रतिनिधि मास्को बुलाए गए जहां उन्हें वैसी ही शांति वार्ता करने बुलाया गया था। इस्लामाबाद में तो बातचीत ठप्प ही रही क्योंकि तभी दो तरह की घटनाएं हुई। एक पुलवामा में आतंकवादी आत्मघाती ध्वंस दूसरे सऊदी अरेबिया के राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान का आगमन। पुलवामा में हुई वारदात में भारतीय सुरक्षा संगठन सीआरपीएफ के 40 लोग मारे गए। इससे ऐसा माहौल बना जिसमें शायद सऊदी शंहशाह ने अपनी नाराजग़ी जताई हो कि तालिबान को किसी भी प्रकार की बातचीत की अनुमति क्यों दी गई जबकि उसी समय और स्थान पर वे भी हों।
एक दूसरी वजह जिसके चलते इस्लामाबाद में होने वाली बातचीत रद्द हुई हो यह भी जान पड़ती है कि अफगानिस्तान सरकार ने अपनी कई प्रतिक्रिया उस दोस्ताना सलूक पर जताई थी । यह देखा कि तालिबानी प्रतिनिधियों से भी वैसी ही दोस्ताना सुलूक रखा जा रहा है जिन्हें मौत और बर्बादी का पिशाच माना जाता है। तालिबानी गुट आज भी अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हुए लोगों को अपनी आतंकवादी धारा से जोड़ते हैं।
आश्चर्यजनक यह है कि अमेरिकी प्रशासन क्यों इस बात पर आमादा है कि यह तालिबान को शांत कर रहा है और आतंकवादी संगठनों के प्रतिनिधियों से उसकी बातचीत करा रहा हेै जबकि उसकी इस पहल का तगड़ा विरोध अमेरिकी प्रशासन में हो रहा है। रक्षामंत्री जेम्स मैटिंस ने जब इस्तीफा दिया तो इससे यह जाहिर हुआ। ट्रंप प्रशासन का यह विवादास्पद फैसला दिसंबर महीने का था जब बहुत से विशेषज्ञों का यह मानना था कि अमेरिका के लिए यह लगभग असंभव होगा कि वह अफगानिस्तान में अपनी प्रतिबद्धता पूरी कर सके। मसलन अफगानी सेनाओं को प्रशिक्षण और जब ज़रूरत पड़े तो तालिबानी और दूसरे सैन्य संगठनों पर हवाई कार्रवाई, जब जहां जैसी ज़रूरत जान पड़े। अमेरिका ने अब भी कोई दिलचस्पी उन लोगों की प्रतिक्रिया पर नहीं जताई है जो इसकी नई अफगान नीति से असहज महसूस करते रहे हैं।
अब समय है जब दुनिया की प्रभावशाली राजधानियों में भी अमेरिकी नीतियों को लेकर भूचाल सा आ गया है जो उग्रवाद और आतंकवाद पर हैं और जिनसे अफगानिस्तान -पाकिस्तान क्षेत्र में इन ताकतों को नेस्तानाबूद करने का सपना संजोया जा रहा है। अब पाकिस्तान पर है कि वह इस समस्या का क्या निदान करता है, हालांकि अब तक वह समस्याओं को और बढ़ाता ही रहा है। इस्लामाबाद की दिलचस्पी अफगानिस्तान में महज इतनी है कि वह इसका इस्तेमाल रणनीति बतौर ही करे जो वह अब तक करता भी रहा है।
भारत चाहे तो विश्व समुदाय को इस बात पर अपने साथ कर सकता है कि हिंसक अतिवाद को खत्म किया जा सकता है बशर्ते अफगानों को आर्थिक विकास और स्थायित्व में अपनी भागीदारी बढ़ाने का मौका मिले। अफगानिस्तान में भारत के प्रति रूझान इसलिए भी है क्योंकि इसने अफगानिस्तान के पुननिर्माण में भारी पूंजी निवेश किया है। इससे यह बात जाहिर होती है कि देश में आर्थिक कार्यक्रमों को चलाकर किस तरह जनता को हिंसा से दूर किया जा सकता है।

दिल्ली के सीजीओ काम्प्लेक्स में लगी आग, बुझाई गयी

दिल्ली के सीजीओ कॉम्प्लेक्स में स्थित अंत्योदय भवन में बुधवार सुबह आग लग गयी। अब इस आग पर काबू पा लिया गया है। किसी जान-माल के नुक्सान की खबर नहीं है।
जानकारी के मुताबिक आग भवन के  ५वें फ्लोर पर लगी, जिसपर काबू पाने के लिए मौके पर दमकल की २४ गाड़ियां भेजी गई थीं। यह आग सुबह करीब ८:३० बजे शार्ट सर्किट से लगी। फिलहाल कूलिंग की प्रक्रिया चल रही है। आग लगने का कारण शार्ट सर्किट बतया गया है। पहले आशंका थी कि आग जब भड़की तो यह आशंका भी जताई गयी कि नीचे की मंजिलें भी आग की चपेट में  न आ जाएँ।
दिल्ली के चीफ फायर ऑफिसर अतुल गर्ग ने बताया कि आग दीनदयाल अंत्योदय भवन में सुबह साढ़े आठ बजे लगी। ”अभी तक आग से किसी के भी हताहत होने की सूचना नहीं है।” इस बिल्डिंग में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के साथ-साथ कई अन्य सरकारी दफ्तर भी हैं।
आग लगने के कुछ समय बाद इसपर काबू पा लिया गया और कूलिंग ऑपरेशन चलाया गया। अंत्योदय भवन में पयार्वरण मंत्रालय, अल्पसंख्यक मंत्रालय समेत कई महत्वपूर्ण कायार्लय हैं।

जैश सरगना मसूद का भाई पाक में गिरफ्तार

खबर है कि पकिस्तान में पाकिस्तान ने जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) के सरगना मसूद अजहर के भाई मुफ्ती अब्दुर रऊफ को गिरफ्तार कर लिया गया है। उसके अलावा वहां आतंक से जुड़े कमसे काम ४४ और लोगों को भी गिरफ्तार किया गया है। हाल में  भारत ने डोजियर में इन लोगों के नाम दिए थे।
मिली जानकारी के मुताबिक पुलवामा में ४० सीआरपीएफ जवानों की आत्मघाती विस्टॉफ में हत्या के बाद जिस तरह पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दवाब बना है यह उसीका नतीजा है। हमले के बाद भारत की तरफ से लगातार पाकिस्तान की इसके पीछे हाथ होने के आरोप लगे हैं।  मुफ्ती अब्दुर रऊफ बहावलपुर में जैश के मदरसे का इंचार्ज है।
अब पाकिस्तान की इमरान खान सरकार ने जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अजहर के भाई मुफ्ती अब्दुर रऊफ को गिरफ्तार करके यह दिखाने की कोशिश कि उसका आतंकियों को संरक्षण नहीं है। यह भी जानकारी मिली है कि अज़हर के भाई के अलावा एक और आतंकी हम्ज़ा अज़हर को भी गिरफ़्तार कर लिया गया है।
इन दोनों के साथ प्रतिबंधित संगठन के ४४ और लोगों को भी गिरफ़्तार किया गया है।  गौरतलब है कि मुफ़्ती अब्दुल रऊफ़ ने ही मसूद अजहर को छुड़ाने के लिए आईसी – ८१४ विमान का अपहरण किया था। भारत के लिहाज से इसे बड़ी कामयाबी माना जा सकता है।