
₹2.60 करोड़ की साइबर ठगी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क की जांच तेज; ईडी को 163 एफआईआर में मिले एक ही नेटवर्क के ‘फिंगरप्रिंट’
एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
दोनों आरोपियों को 29 अगस्त तक पांच दिन की ED हिरासत
गोवा के चर्चित ‘डिजिटल अरेस्ट’ मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच अब अगले चरण में पहुंच गई है। गोवा की विशेष पीएमएलए अदालत ने गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों फहीम मोइन हुसैन सैयद और नईम मुईन सय्यद को पांच दिन की ईडी हिरासत में भेज दिया। दोनों को 29 अगस्त तक ईडी की कस्टडी में रखा जाएगा। ईडी ने दोनों को 23 अगस्त को धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 19 के तहत गिरफ्तार किया था।
जांच एजेंसी ने इस कार्रवाई के साथ कथित सिंडिकेट से जुड़े उन बैंक खातों को भी फ्रीज किया है, जिनमें ₹30 करोड़ से अधिक की शेष राशि थी। ईडी अब इन खातों, डिजिटल उपकरणों और बरामद दस्तावेजों के जरिए नेटवर्क के वास्तविक संचालकों और साइबर ठगी की रकम के अंतिम रास्ते का पता लगाने में जुटी है।
163 FIR में एक ही नेटवर्क के फिंगरप्रिंट मिलने का दावा
ईडी के मुताबिक, आरोपियों को 24 अगस्त को विशेष पीएमएलए अदालत के समक्ष पेश किया गया, जहां उन्हें 29 अगस्त तक पांच दिन की हिरासत में भेजा गया।
अब जांच का अहम हिस्सा यह पता लगाना है कि 400 से अधिक बैंक खातों को कौन नियंत्रित कर रहा था, इन कंपनियों के वास्तविक संचालक कौन थे और साइबर फ्रॉड से हासिल रकम को नकदी और फिर विदेशी मुद्रा में बदलने की पूरी व्यवस्था किसके निर्देश पर चल रही थी।
जांच एजेंसी के मुताबिक, पीड़ित की रकम कुछ ही घंटों में निष्क्रिय और नए खोले गए खातों की पहली परत में पहुंची। इसके बाद रकम को 400 से ज्यादा लाभार्थी खातों में ट्रांसफर, नकद निकासी, सेल्फ-चेक और पेमेंट गेटवे जैसे माध्यमों से बांटा गया।
यही रकम आगे कमोडिटी, ट्रेडिंग, ट्रैवल और विदेशी मुद्रा कारोबार से जुड़ी संस्थाओं तक पहुंची।
‘अलग कंपनियां’ नहीं, एक साझा वित्तीय पूल?
ईडी की जांच में एक महत्वपूर्ण पैटर्न सामने आया है। नेटवर्क से जुड़े खातों के संबंध में 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 330 पीड़ित शिकायतें और 163 एफआईआर दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। इन मामलों में रिपोर्ट किया गया कुल नुकसान ₹417.49 करोड़ है।
इनमें से 101 शिकायतों में एक ही पीड़ित की रकम उसी फ्रॉड के दौरान नेटवर्क की दो या उससे अधिक संस्थाओं में पहुंची।
ईडी के अनुसार, यह पैटर्न इस बात की ओर इशारा करता है कि अलग-अलग कंपनियों के नाम पर चल रहे बैंक खाते वास्तव में अलग-अलग कारोबारों की तरह काम नहीं कर रहे थे, बल्कि एक साझा वित्तीय पूल के तौर पर इस्तेमाल हो रहे थे।
यही बिंदु अब जांच के केंद्र में है कि कंपनियों के बीच वास्तविक नियंत्रण और आपसी समन्वय किस स्तर पर था।
₹30 करोड़ से ज्यादा वाले खाते फ्रीज, ₹3.25 करोड़ नकद जब्त
ईडी ने मामले में अब तक की कार्रवाई के दौरान ₹30 करोड़ से अधिक शेष राशि वाले सिंडिकेट खातों को फ्रीज किया है। इसके अलावा तलाशी के दौरान ₹3.25 करोड़ नकद भी जब्त किया गया है। ईडी ने 17 जुलाई को पीएमएलए की धारा 17 के तहत मुंबई और गोवा में 20 परिसरों की तलाशी ली थी। इसके बाद 21 अगस्त को भी आगे की तलाशी कार्रवाई की गई। तलाशी में नकदी के अलावा डिजिटल उपकरण, बही-खाते, दस्तावेज और वैधानिक रजिस्टर बरामद किए गए हैं। इनकी जांच से बैंकिंग लेन-देन और कंपनियों के वास्तविक नियंत्रण से जुड़े नए तथ्य सामने आने की संभावना है।
₹2.60 करोड़ की ठगी से सामने आया मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क
मामला नॉर्थ गोवा साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में दर्ज उस एफआईआर से शुरू हुआ, जिसमें एक गोवा निवासी महिला को ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर कथित तौर पर डराया गया।
ईडी के मुताबिक, महिला को यह विश्वास दिलाया गया कि वह किसी जांच के घेरे में है। उसे लगातार वीडियो कॉल पर निगरानी में रखा गया और 21 मई से 2 जून 2025 के बीच ₹2,60,33,634 अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया। इन खातों को कथित तौर पर ‘सीक्रेट सुपरविजन अकाउंट्स’ बताया गया था।
जांच में सामने आया कि रकम एक खाते में नहीं रुकी। कुछ ही घंटों में इसे कई खातों में बांट दिया गया और फिर अलग-अलग कारोबारी संस्थाओं तक पहुंचाया गया।
इन संस्थाओं के खातों में ₹27,850 करोड़ से अधिक का बैंकिंग लेन-देन हुआ। करीब ₹2,904 करोड़ नकद जमा किया गया, जिसमें ₹584.70 करोड़ 61,448 बल्क नोट एक्सेप्टेंस मशीन लेन-देन के जरिए जमा किए गए।
ईडी का आरोप है कि साइबर फ्रॉड की रकम को पहले बैंकिंग क्रेडिट के रूप में सिस्टम में लाया गया, फिर नकदी में बदला गया और उसके बाद आरबीआई से लाइसेंस प्राप्त फुल-फ्लेज्ड मनी चेंजर (एफएफएमसी) कंपनियों के जरिए विदेशी मुद्रा में बदलने की व्यवस्था की गई।
कागजों पर सामान्य लोग, कंपनियों पर करोड़ों का कारोबार
जांच में यह भी सामने आया कि नेटवर्क से जुड़ी कुछ कंपनियां बेहद सामान्य आर्थिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के नाम पर शामिल की गई थीं। इनमें कर्मचारी, ड्राइवर और एक-कमरे के मकानों में रहने वाले लोग शामिल थे।
उन्हें रिकॉर्ड में डायरेक्टर दिखाया गया, जबकि ईडी के मुताबिक कंपनियों के बैंक खाते और वास्तविक कारोबारी गतिविधियां दूसरे लोगों के नियंत्रण में थीं।
अब ईडी की पांच दिन की हिरासत में यह पता लगाने की कोशिश होगी कि इन कंपनियों का वास्तविक नियंत्रण किसके पास था और साइबर ठगी से हासिल रकम को विदेशी मुद्रा तक पहुंचाने की व्यवस्था में आरोपियों की भूमिका क्या थी।
‘डिजिटल अरेस्ट’ से सावधान
ईडी ने लोगों को फिर चेताया है कि भारत में ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है। कोई जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं करती और न ही ‘वेरिफिकेशन’ या ‘सुपरविजन’ के नाम पर किसी खाते में पैसे जमा कराने को कहती है।
ऐसी कॉल आने पर तुरंत कॉल काटें और मामले की सूचना राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 या cybercrime.gov.in पर दें।
गोवा का यह मामला अब केवल ₹2.60 करोड़ की साइबर ठगी की जांच नहीं रह गया है। पांच दिन की ईडी हिरासत और ₹30 करोड़ से ज्यादा वाले खातों के फ्रीज होने के बाद जांच का अगला फोकस उस कथित नेटवर्क के वास्तविक संचालकों और साइबर ठगी की रकम के अंतिम वित्तीय रास्ते पर है।



