
अब ‘डीपीआर’ से कंट्रोलः 50 हजार किमी एक्सेस-कंट्रोल्ड कॉरिडोर की तैयारीः 4 और 6 लेन हाईवे में ट्रैफिक के हिसाब से सड़क, स्ट्रक्चर और जमीन की चौड़ाई होगी तय; हर एंट्री-एग्जिट पहले से नोटिफाइड, बाहरी किनारे पर 1 मीटर ऊंची बाउंड्री वॉल
— एम. रियाज़ हाशमी, तहलका
नई दिल्ली — 22 सितंबर, 2026 — भारत में बनने वाले अगले दौर के हाई-स्पीड राष्ट्रीय राजमार्ग अब अलग-अलग परियोजनाओं के हिसाब से अलग डिजाइन मानकों पर निर्भर नहीं होंगे। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने एक्सप्रेसवे से अलग एक्सेस-कंट्रोल्ड हाई-स्पीड राष्ट्रीय राजमार्गों की योजना और डिजाइन के लिए पहली बार व्यापक समान दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसका सीधा असर आने वाले 4 और 6 लेन के ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड हाई-स्पीड कॉरिडोर की डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट), लेन क्षमता, स्ट्रक्चर, कॉरिडोर की चौड़ाई, इंटरचेंज और एंट्री-एग्जिट व्यवस्था पर पड़ेगा।
नई गाइडलाइन का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि हाई-स्पीड कॉरिडोर का आकार ट्रैफिक आकलन से जोड़ा गया है। यानी जिस कॉरिडोर पर जितना ट्रैफिक अनुमानित है, उसी के आधार पर लेन और स्ट्रक्चर की क्षमता तय होगी। 15 हजार वाहनों तक के ट्रैफिक वाले कॉरिडोर में 4 लेन हाईवे और 4 लेन स्ट्रक्चर के लिए 60 मीटर चौड़ाई निर्धारित की गई है।
15 हजार से 25 हजार वाहनों वाले कॉरिडोर में हाईवे 4 लेन का रहेगा, लेकिन स्ट्रक्चर 6 लेन का होगा और कॉरिडोर की चौड़ाई 70 मीटर होगी। वहीं, 25 हजार से 40 हजार वाहनों के ट्रैफिक वाले कॉरिडोर में 6 लेन हाईवे और 6 लेन स्ट्रक्चर के लिए 70 मीटर चौड़ाई निर्धारित की गई है। इसका अर्थ यह है कि भविष्य के हाई-स्पीड हाईवे की जमीन और संरचनात्मक जरूरतें केवल मौजूदा ट्रैफिक को देखकर नहीं, बल्कि विस्तृत ट्रैफिक आकलन के आधार पर तय की जाएंगी।
डीपीआर में ही तय होगा कहां से मिलेगा हाईवे में प्रवेश
नई व्यवस्था का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू एक्सेस कंट्रोल है। एनएचएआई ने हाई-स्पीड ट्रैफिक के लिए एंट्री और एग्जिट प्वाइंट की पहले से सूचना देने की व्यवस्था पर जोर दिया है। इसका उद्देश्य यह है कि वाहन चालक अचानक किसी निकास या प्रवेश बिंदु के सामने न आए और हाई-स्पीड ट्रैफिक के बीच अनियोजित क्रॉसिंग की स्थिति पैदा न हो। एक्सप्रेसवे, राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य राजमार्ग और अधिक ट्रैफिक वाले महत्वपूर्ण मार्गों के क्रॉसिंग पर रैंप वाले इंटरचेंज का प्रावधान किया जाएगा। इसके अलावा बंदरगाह, एयरपोर्ट, मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क (एमएमएलपी), औद्योगिक क्षेत्र और प्रमुख पर्यटन स्थलों जैसे बड़े ट्रैफिक जनरेट करने वाले स्थानों से जुड़ने वाली सड़कों को भी इंटरचेंज व्यवस्था से जोड़ा जाएगा।
सिर्फ सड़क नहीं, 1 मीटर वॉल भी एक्सेस कंट्रोल का हिस्सा
हाई-स्पीड कॉरिडोर में अनधिकृत प्रवेश, अतिक्रमण और आवारा पशुओं की समस्या को रोकने के लिए सड़क के बाहरी किनारे पर 1 मीटर ऊंची बाउंड्री वॉल बनाने का प्रावधान किया गया है। यह प्रावधान खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक्सेस-कंट्रोल्ड सड़क की सुरक्षा केवल लेन और इंटरचेंज डिजाइन से नहीं, बल्कि बाहरी प्रवेश को नियंत्रित करने से भी जुड़ी है।
पुरानी व्यवस्था में थी डिजाइन की गुंजाइश, अब समान ढांचा
एनएचएआई के अनुसार अब तक एक्सप्रेसवे से अलग एक्सेस-कंट्रोल्ड हाई-स्पीड राष्ट्रीय राजमार्गों की योजना और डिजाइन के लिए अलग समान मानक नहीं थे। अलग-अलग कॉरिडोर की डीपीआर तैयार करते समय डिजाइन और तकनीकी मानकों में अंतर देखा गया था। नई गाइडलाइन इसी अंतर को खत्म करने के लिए लाई गई है। यानी बदलाव का असर केवल निर्माण एजेंसी या ठेकेदार के स्तर पर नहीं होगा। परियोजना की शुरुआत में तैयार होने वाली डीपीआर ही अब हाई-स्पीड कॉरिडोर के डिजाइन, क्षमता और एक्सेस व्यवस्था का ज्यादा स्पष्ट तकनीकी आधार बनेगी।
50 हजार किमी का लक्ष्य, नई गाइडलाइन भविष्य के लिए
एनएचएआई ने इन दिशा-निर्देशों को सरकार के विकसित भारत 2047 के तहत 50 हजार किमी एक्सेस-कंट्रोल्ड हाई-स्पीड कॉरिडोर विकसित करने की दीर्घकालिक योजना से जोड़ा है। हालांकि एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह घोषणा अपने आप में 50 हजार किमी सड़क के निर्माण या किसी नई परियोजना की मंजूरी का प्रमाण नहीं है। यह मुख्य रूप से आने वाली परियोजनाओं की योजना और डिजाइन के लिए मानकीकरण का ढांचा है।
2047 तक देश के रोड इन्फ्रा में क्या बदलेगा जमीन पर?
नई गाइडलाइन के बाद आने वाले हाई-स्पीड राष्ट्रीय राजमार्गों में तीन चीजें पहले से ज्यादा स्पष्ट होंगी- कितने ट्रैफिक के लिए कितनी लेन चाहिए, हाईवे से प्रवेश और निकास कहां होगा और किन प्रमुख मार्गों व आर्थिक केंद्रों को इंटरचेंज से जोड़ा जाएगा। यही वह बदलाव है जो इसे महज सड़क की चौड़ाई तय करने वाली गाइडलाइन से आगे ले जाता है।



