40 साल के बदलाव का राजः 64% तहसीलों में बढ़े भारी बारिश वाले दिन, 24% इलाकों में कभी सूखा तो कभी अत्यधिक बारिश; दिल्ली के पुराने ड्रेनेज सिस्टम से बढ़ा जलभराव का खतरा
एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
कांग्रेस का तंज, लेकिन असली चिंता बारिश का बदलता मिजाज
कांग्रेस ने नए संसद परिसर में जलभराव का वीडियो ट्वीट करते हुए दो दिन पहले विकास कार्यों पर तंज कसा था। दरअसल, दिल्ली में बारिश का मौसम आते ही जलभराव और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। लेकिन इस बार सवाल सिर्फ यह नहीं है कि राजधानी में कितनी बारिश हो रही है। असली चिंता बारिश के बदलते मिजाज को लेकर है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईडब्ल्यू) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि देश के बड़े हिस्से में मानसून अब पहले की तरह सामान्य और अनुमानित नहीं रह गया है। बारिश का एक बड़ा हिस्सा कम समय में तेज और भारी बारिश के रूप में गिर रहा है।
4,500 तहसीलों का विश्लेषण: 24% इलाकों में अनिश्चित मानसून
सीईडब्ल्यू ने देश की करीब 4,500 तहसीलों के स्तर पर बारिश के पैटर्न का विश्लेषण किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की करीब 24 फीसदी तहसीलें पिछले चार दशकों में कम और बहुत ज्यादा बारिश वाले वर्षों के बीच झूल रही हैं। यानी इन इलाकों में मानसून का व्यवहार लगातार एक जैसा नहीं रहा- कभी बारिश की कमी तो कभी अत्यधिक बारिश।
10 साल में बढ़े 15 एक्सट्रा बारिश वाले दिन
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक निष्कर्ष भारी बारिश को लेकर है। देश की करीब 64 फीसदी तहसीलों में भारी बारिश वाले दिनों की संख्या बढ़ी है। 2012 से 2022 के दौरान इनमें हर साल 1 से 15 अतिरिक्त भारी बारिश वाले दिन दर्ज किए गए। यानी समस्या सिर्फ बारिश की मात्रा नहीं, बल्कि उसके गिरने के तरीके में बड़ा बदलाव है। जो बारिश पहले पूरे मानसून में अपेक्षाकृत लंबे समय में फैलकर आती थी, उसका बड़ा हिस्सा अब कम अवधि की तेज बारिश के रूप में गिर रहा है। यही बदलाव अचानक आने वाली बाढ़ और शहरों में जलभराव का जोखिम बढ़ाता है।
24% तहसीलों में कभी सूखा, कभी बाढ़
सीईडब्ल्यू के अध्ययन के मुताबिक, करीब हर चार में से एक तहसील ने पिछले 40 वर्षों में कम और अत्यधिक बारिश वाले वर्षों का सामना किया है। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा के अलावा राजस्थान और गुजरात में यह बदलाव खास तौर पर दिखाई देता है। यानी, जिस इलाके में एक साल पानी की कमी हो सकती है, वही इलाका कुछ साल बाद अत्यधिक बारिश और बाढ़ से जूझ सकता है। सीईडब्ल्यू इसे मानसून के कम पूर्वानुमेय होने का संकेत मानता है।
हैरानी: 55% तहसीलों में बढ़ी मानसूनी बारिश
सीईडब्ल्यू के विस्तृत 2024 अध्ययन में 2012-2022 के दौरान देश की 55 फीसदी तहसीलों में दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश में 10 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई थी। इनमें राजस्थान, गुजरात, मध्य महाराष्ट्र और तमिलनाडु के पारंपरिक रूप से अपेक्षाकृत सूखे इलाके भी शामिल हैं। दूसरी तरफ 11 फीसदी तहसीलों में 10 फीसदी से ज्यादा बारिश की कमी दर्ज की गई। यानी भारत में मानसून की एक सी तस्वीर नहीं बन रही। कहीं बारिश बढ़ रही है तो कहीं घट रही है और कई जगह बढ़ी हुई बारिश भी ज्यादा दिनों तक फैली हुई बारिश के बजाय कुछ बेहद भारी बारिश वाले दिनों से आ रही है।
11% तहसीलों में बारिश घटी, खेती के लिए बड़ा खतरा
बारिश में कमी वाले 11 फीसदी तहसीलों में से 68 फीसदी में जून से सितंबर तक सभी महीनों में बारिश कम हुई, जबकि 87 फीसदी में जून और जुलाई में बारिश घटी। ये दोनों महीने खरीफ फसलों की बुवाई के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे इलाके सिंधु-गंगा के मैदान, पूर्वोत्तर भारत और हिमालयी क्षेत्र में बड़ी संख्या में मौजूद हैं। सिंधु-गंगा का मैदान देश के आधे से ज्यादा कृषि उत्पादन में योगदान देता है।
यानी बदलता मानसून एक तरफ शहरों में बाढ़ का खतरा बढ़ा रहा है तो दूसरी तरफ कई कृषि क्षेत्रों में बारिश की कमी और बुवाई के संकट की वजह बन सकता है।
अक्टूबर में भी बदल रहा बारिश का हिसाब
सीईडब्ल्यू के अध्ययन में एक और महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया। देश की करीब 48 फीसदी तहसीलों में अक्टूबर की बारिश में 10 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि देखी गई। इसके पीछे दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी में देरी एक संभावित कारण माना गया। दूसरी ओर, उत्तर-पूर्व मानसून की बारिश में भी बदलाव सामने आया है। पिछले दशक में तमिलनाडु की करीब 80 फीसदी तहसीलों, तेलंगाना की 44 फीसदी और आंध्र प्रदेश की 39 फीसदी तहसीलों में अक्टूबर-दिसंबर की बारिश 10 फीसदी से ज्यादा बढ़ी।
अब दिल्ली—खतरा आखिर क्यों बढ़ रहा है?
दिल्ली के लिए सबसे बड़ा सवाल यहीं से पैदा होता है। सीईडब्ल्यू की ताजा रिपोर्ट बताती है कि ज्यादातर शहरों की जलनिकासी व्यवस्था कई दशक पहले के बारिश के पैटर्न को ध्यान में रखकर तैयार की गई थी। ऐसी व्यवस्थाएं आम तौर पर 12-20 मिलीमीटर प्रति घंटे की बारिश की तीव्रता के हिसाब से डिजाइन की गई थीं। लेकिन अब बारिश का बड़ा हिस्सा कुछ घंटों में ही तेज बौछारों के रूप में गिर रहा है।
दिल्ली के मामले में सीईडब्ल्यू ने बताया है कि राजधानी की जलनिकासी व्यवस्था लंबे समय तक 1976 में तैयार किए गए ड्रेनेज ब्लूप्रिंट पर काफी निर्भर रही। हालांकि सितंबर 2025 में नया दिल्ली ड्रेनेज मास्टर प्लान लॉन्च किया गया। यही वह अंतर है जो भारी बारिश को जलभराव में बदल सकता है। बारिश कुछ घंटों में बहुत ज्यादा पानी गिराए और ड्रेनेज सिस्टम उतनी तेजी से पानी बाहर न निकाल पाए – तो सड़क, अंडरपास और निचले इलाके जलमग्न होना तय है।
देश में भारी बारिश बढ़ी, लेकिन शहरों की तैयारी कितनी?
सीईडब्ल्यू की रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर 2024 तक देश के 41 शहरों ने सिटी क्लाइमेट एक्शन प्लान तैयार कर लिया था या उसे तैयार करने की प्रक्रिया में थे। इसका उद्देश्य शहरों के स्तर पर जलवायु जोखिमों की पहचान करके स्थानीय स्तर पर तैयारी करना है। रिपोर्ट में गुजरात के नवसारी का उदाहरण दिया गया है। जुलाई 2024 में एक तूफान ने शहर के करीब पाँचवें हिस्से को पानी में डुबो दिया था। इसके बाद सीईडब्ल्यू और नवसारी नगर निगम ने 55 वर्षों के दैनिक बारिश के आंकड़ों के आधार पर वार्ड स्तर पर बाढ़ के खतरे का आकलन किया। इसमें सामने आया कि शहर के सभी इलाकों में खतरा एक जैसा नहीं था। अब इसी तरह के शहरी बाढ़ पैटर्न का अध्ययन दिल्ली, गुरुग्राम, बेंगलुरु और कटक में भी किया जा रहा है। सीईडब्ल्यू की रिपोर्ट का सबसे अहम संदेश यह है कि पूरे देश की औसत बारिश का आंकड़ा किसी शहर या तहसील की वास्तविक स्थिति नहीं बता सकता।
भारत में मानसून का व्यवहार अब इतना स्थानीय और असमान
भारत में मानसून का व्यवहार अब इतना स्थानीय और असमान होता जा रहा है कि किस इलाके में कितनी बारिश हुई, कितने भारी बारिश वाले दिन आए और कितनी बारिश कुछ घंटों में हुई – इन आंकड़ों को अलग-अलग समझना होगा। दिल्ली के लिए इसका मतलब साफ है। राजधानी को सिर्फ यह नहीं देखना होगा कि इस साल मानसून में कुल कितनी बारिश हुई। उसे यह भी देखना होगा कि कितनी बारिश कितने समय में हुई और उसकी जलनिकासी व्यवस्था उस पानी को निकालने में कितनी सक्षम है।
क्योंकि खतरा सिर्फ ज्यादा बारिश नहीं है
क्योंकि खतरा सिर्फ ज्यादा बारिश नहीं है। खतरा उस बारिश का है जो कम समय में बहुत ज्यादा पानी लेकर आती है। और अगर बारिश का यह नया मिजाज जारी रहता है, तो दिल्ली जैसे महानगरों के लिए पुरानी जलनिकासी व्यवस्था और बदलते मानसून के बीच का यह अंतर आने वाले समय में और बड़ी चुनौती बन सकता है।




