पंजाब में भाजपा-अकाली गठबंधन तय! औपचारिक घोषणा जल्द

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भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच 2027 पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले नए गठबंधन की संभावनाएं बढ़ी हैं।

दोनों दलों में बातचीत पूरी,भाजपा सीनियर की भूमिका निभाने पर डटी

लेखक: चरणजीत आहूजा

सीट-शेयरिंग पर बातचीत आगे बढ़ी, अकाली दल ने नेताओं को दी सलाह

सूत्रों के अनुसार, दोनों पार्टियों के बीच सीट-शेयरिंग पर बातचीत अच्छी तरह से आगे बढ़ी है। एक अहम संकेत यह है कि शिरोमणि अकाली दल ने अपने नेताओं से कहा है कि वे ग्रामीण इलाकों में सभी सीटों के लिए तैयारी न करें। भाजपा के वरिष्ठ नेता आर पी सिंह ने हाल ही में नई दिल्ली में अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल से उनके सुल्तानपुर आवास पर मुलाकात की और नांदेड़ हमले के बाद उनका हाल-चाल जाना।

आर पी सिंह: अकाली दल को ‘सकारात्मक, लचीला और कठोर न होने’ की भावना अपनानी होगी

आर पी सिंह ने माना कि गठबंधन के मुद्दे पर चर्चा हुई थी। उन्होंने कहा कि बस अकाली दल को ‘सकारात्मक, लचीला और कठोर न होने’ की भावना के साथ ‘लेन-देन’ (give-and-take) के रवैये को अपनाने की ज़रूरत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संकेत दिया है कि भाजपा अब पंजाब में ‘छोटे भाई’ की भूमिका में नहीं रहेगी।

भाजपा का सख्त रुख: सीनियर पार्टनर के तौर पर उभरने की तैयारी

हालांकि, भाजपा सार्वजनिक रूप से कहती रही है कि वह सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की योजना बना रही है। सूत्रों का कहना है कि यह सख्त रुख सीनियर पार्टनर के तौर पर उभरने या कम से कम बराबरी का दर्जा पाने के लिए अपनाया जा रहा है। भाजपा जानती है कि अकाली दल का पारंपरिक आधार कमजोर हो गया है, जबकि भाजपा ने हिंदू मतदाताओं के बीच अपना स्वतंत्र समर्थन बढ़ाया है।

बी एल संतोष और केवल सिंह ढिल्लों का बयान

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बी एल संतोष ने पंजाब दौरे के दौरान कहा कि पार्टी अकेले चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है। पंजाब भाजपा अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने भी गठबंधन की संभावना को खारिज कर दिया है।

25 साल का पुराना रिश्ता, कृषि कानूनों से टूटा

दोनों पार्टियां लगभग 25 वर्षों तक सहयोगी रहीं और 1997, 2007 और 2012 में एक साथ विधानसभा चुनाव जीते। कृषि कानूनों को लेकर उनके रिश्ते टूट गए और अकाली दल ने सितंबर 2020 में NDA छोड़ दिया।

अलगाव महंगा साबित हुआ: 2022 और 2024 के नतीजे

यह अलगाव महंगा साबित हुआ। 2022 में, अकाली दल ने केवल तीन सीटें जीतीं, जबकि 2017 में उसने 15 सीटें जीती थीं। भाजपा ने दो सीटें जीतीं, जो पहले तीन थीं। 2024 के लोकसभा चुनाव ने इस अलगाव को और पुख्ता कर दिया। 2019 में अकाली दल का वोट शेयर 27.5% से घटकर 13.5% हो गया, जबकि भाजपा का वोट शेयर 9.6% से बढ़कर 18.7% हो गया।

चुनावी गणित: 16 सीटें जीतने की संभावना

अगर 2022 में भाजपा और अकाली दल के वोट पूरी तरह से एक-दूसरे को ट्रांसफर हो जाते, तो थ्योरी के हिसाब से यह गठबंधन लगभग 16 विधानसभा सीटें जीत सकता था, जबकि असल में उन्हें कुल मिलाकर पांच सीटें ही मिली थीं। 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे गठबंधन की संभावना को और मज़बूत करते हैं।

चुनावी गणित का मतलब हमेशा राजनीतिक तालमेल नहीं होता

फिर भी, चुनावी गणित का मतलब हमेशा राजनीतिक तालमेल नहीं होता। अकाली दल के सामने अस्तित्व का संकट है, जबकि भाजपा को मुख्य रूप से हिंदू-समर्थक पार्टी के तौर पर देखा जाता है। फिलहाल, भाजपा का आधिकारिक रुख साफ है: वह सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। आने वाले महीनों में पता चलेगा कि यह सिर्फ़ राजनीतिक दिखावा है या किसी नए गठबंधन की शुरुआत।