बदलते मोहरे

लचर प्रदर्शन के कारण मुख्यमंत्री बदलने को मजबूर भाजपा

 

राकेश रॉकी

 

भाजपा अब तक कांग्रेस की सरकारों को गिराकर अपनी सरकारें बना रही थी। अब अपनी ही सरकारों में मुख्यमंत्रियों को ताश के पत्तों की तरह फेंट रही है। विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा की इस कसरत ने कांग्रेस, टीएमसी और बाक़ी विपक्ष को यह अवसर दे दिया है कि वह भाजपा के मुख्यमंत्रियों को बदले जाने की वजह उनकी नाकामी को बताये।

उधर भाजपा के भीतर नेताओं में अपने भविष्य को लेकर अस्थिरता की भावना पैदा हो चुकी है। वरिष्ठ नेताओं को लगने लगा है कि उन्हें भी आडवाणी, जोशी और अन्य की तरह मार्गदर्शक मण्डल में बैठा दिया जाएगा। भाजपा में अब ऐसे नेताओं का दायरा बढ़ता जा रहा है, जो यह महसूस करने लगे हैं कि उनकी हैसियत सिर्फ़ मोहरों की रह गयी है। भाजपा में इस उठा-पटक का क्या असर है?

यह केंद्रीय मंत्री और आरएसएस के नज़दीकी नितिन गडकरी के जयपुर वाले बयान से सहज ही समझा जा सकता है, जिसमें उन्होंने कहा- ‘आज के हालात में हर कोई दु:खी है। कोई मंत्री न बनने से दु:खी है, तो मुख्यमंत्री। वे इसलिए दु:खी हैं कि पता नहीं कब हटा दिये जाएँगे।’ बात मज़ाक़ में कही गयी थी। लेकिन राजनीतिक तंज़ ऐसे ही मुहावरे बनाकर कसे जाते हैं।

इसी साल में अब तक भाजपा अपने चार मुख्यमंत्रियों को ठिकाने लगा चुकी है। जनता में सन्देश जा रहा है कि यह मुख्यमंत्री नाकाम हो चुके थे और पार्टी को चुनाव जिताने की स्थिति में नहीं थे, लिहाज़ा उन्हें बदल दिया गया। मुख्यमंत्रियों में अपनी कुर्सी बचाने की चिन्ता है। भाजपा अपने मुख्यमंत्रियों को किस तत्परता से फेंट रही है? इसका बड़ा उदहारण उत्तराखण्ड है, जहाँ पार्टी ने तीन महीने में ही दो मुख्यमंत्री बदल दिये। इससे भाजपा शासित राज्यों में विकास के कामों पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है और पार्टी के बीच ही अस्थिरता जैसी स्थिति बन चुकी है। कर्नाटक में जुलाई में ताक़तवर लिंगायत नेता बी.एस. येदियुरप्पा को कुर्सी छोडऩी पड़ी।

अपना नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने ‘तहलका’ से बातचीत में कहा कि इन फ़ैसलों से पार्टी को नुक़सान उठाना पड़ सकता है। उनके मुताबिक, ऐसा करने से पार्टी नेतृत्व अपनी असुरक्षा की भावना को उजागर कर रहा है, जो उसके लिए घातक भी साबित हो सकता है। उधर इस विषय पर ‘तहलका’ से बातचीत में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन कुमार बंसल ने कहा- ‘यह साफ़ हो गया है कि राज्यों में भाजपा की सरकारें फ्लॉप (नाकाम) हैं। लोगों में उनकी नाकामी से निराशा है। लेकिन इसमें एक और बात भी है। केंद्र की भाजपा सरकार अपनी नाकामियाँ छिपाने का ठीकरा भी अपने मुख्यमंत्रियों पर ही फोड़ रही है, ताकि लोगों का उनसे ध्यान हटाया जा सके। केंद्रीय मंत्रिमण्डल के हाल के फेरबदल में भी यही किया गया था। यह सन्देश देने की कोशिश की गयी कि ख़राब प्रदर्शन वाले मंत्री हटा दिये गये। जबकि कोविड, महँगाई और अन्य मोर्चों पर सरकार की नाकामी की सीधी ज़िम्मेदारी तो प्रधानमंत्री (पीएमओ) की है, जहाँ से सब कुछ संचालित होता है।’

गुजरात में भाजपा ने जिस तरह भूपेंद्र यादव की नयी सरकार के गठन में विजय रूपाणी के मंत्रिमण्डल के सभी मंत्रियों की छुट्टी करने जैसा प्रयोग किया, उससे ज़ाहिर होता है कि मोदी-शाह के गृह राज्य में लोगों की पिछली सरकार और मंत्रियों से कितनी नाराज़गी रही होगी। अन्यथा ऐसा कभी नहीं होता कि नये मुख्यमंत्री को नया मंत्रिमण्डल देते हुए पुराने सभी मंत्रियों को बाहर कर दिया जाए। इससे तो यही संकेत जाता है कि इन सभी मंत्रियों का प्रदर्शन ख़राब रहा। लेकिन प्रदेशों में मुख्यमंत्री बदलने के पीछे भाजपा आलाकमान का एक और सन्देश भी अपने संगठन के लोगों को है। वह यह कि ‘पार्टी में नरेंद्र मोदी और अमित शाह ही सर्वशक्तिमान हैं।’

मुख्यमंत्री बदलने का संकेत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए भी है। बंगाल के विधानसभा चुनाव में मिली हार के तुरन्त बाद हुए उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव में भाजपा की हार के बाद सर्वशक्तिमान नेतृत्व ने जिस मुख्यमंत्री को सबसे पहले बदलने की क़वायद की थी, वह योगी ही थे। यह क़वायद सफल होती, उससे पहले ही आरएसएस (संघ) का बयान आ गया कि उत्तर प्रदेश के अगले चुनाव भाजपा योगी के ही नेतृत्व में लड़ेगी। इस दौरान योगी भी दिल्ली में तलब किये गये या कहें कि ख़ुद चले गये थे और शीर्ष नेतृत्व से मिले। बहुत-से लोग कहते हैं कि यह कोई बहुत सम्मानजनक मुलाक़ातें नहीं थीं। लगभग उन्हीं दिनों में अपने प्रदेश के कुछ विकास विज्ञापनों और होर्डिंग्स में योगी सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फोटो लगाने से परहेज़ किया था। बहुतों को योगी सरकार का यह फ़ैसला दिलचस्प और कुछ को हैरानी भरा लगा था। कहते हैं भाजपा शीर्ष नेतृत्व में इसे लेकर भी योगी के प्रति बहुत नाराज़गी थी। योगी को बहुत सारे राजनीतिक जानकार नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री की कुर्सी को चुनौती मानते हैं; भले योगी एक प्रधानमंत्री और पार्टी के सर्वोच्च नेता के रूप में मोदी के प्रति पूरा सम्मान दिखाते हैं। राजनीतिक गलियारों में यह कहा जाने लगा है कि योगी की पार्टी के भीतर ही बहुत-सी दुश्वारियाँ हैं।

बहुत दिलचस्प बात तो यह है कि भाजपा के कट्टर हिन्दुत्व समर्थकों वाली टोलियों के बीच योगी भी मोदी की तरह ही लोकप्रिय हैं। कई लोग तो उन्हें मोदी से भी ज़्यादा पसन्द करते हैं। पार्टी के बीच योगी का एक अलग समर्थक वर्ग बन चुका है, जो उनके भाषणों के तरीक़े और धर्म आधारित कटाक्षों का दीवाना है।

यह वही वर्ग है, जो सोशल मीडिया पर अपने सन्देशों में जमकर धर्म आधारित ज़हर उगलता है और योगी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित करता है। इसमें एक सन्देश यह भी है- ‘देश का अगला प्रधानमंत्री मर्यादा पुरषोतम श्रीराम की जन्मभूमि से।’

ज़ाहिर है योगी के यह समर्थक प्रधानमंत्री के उत्तर प्रदेश के वाराणसी से चुनाव जीतकर सांसद बनने के बावजूद उन्हें राज्य का नहीं मानते। दिलचस्प बात यह भी है कि सोशल मीडिया का ही एक वर्ग योगी को भी बाहरी बताता है। इस वर्ग के सन्देश कहते हैं कि योगी तो उत्तराखण्ड के हैं। अब सोशल मीडिया के इस वर्ग के प्रचार के पीछे कौन है? यह तो राम ही जानें। लेकिन यह तय है कि दोनों की ही तरफ़दारी करने वाले भाजपा के ही लोग हैं। बीच में इसी सोशल मीडिया पर यह चर्चा भी ख़ूब चली कि केंद्र उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में विभाजित करना चाहता है। कहा जाता है कि यह प्रचार योगी को दबाव में लाने के लिए था। लब्बोलुआब यह है कि भाजपा के भीतर ही सौ लड़ाइयाँ और दाँव-पेच हैं। बाहर से भले कुछ भी दिखे, मगर भाजपा के भीतर भी एक छद्म युद्ध लड़ा जा रहा है, जिसका औज़ार में सोशल मीडिया है।

हाल के महीनों में योगी सरकार ने अपने चार साल के कार्यकाल की उपलब्धियों को लेकर जमकर प्रचार किया है। यह किसी भी भाजपा शासित राज्य के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा है। हालाँकि योगी सरकार की कई मोर्चों पर नाकामियों का ज़िक्र भी मीडिया में ख़ूब हुआ है- क़ानून व्यवस्था से लेकर कोरोना वायरस के कहर के दौरान स्वास्थ्य कुप्रबन्धन, श्मशानों और क़ब्रिस्तानों में लम्बी-लम्बी क़तारों और दुष्कर्म की घटनाओं तक। इसे लेकर भाजपा के ही कुछ बड़े नेता गाहे-बगाहे बोलते रहे हैं। योगी का यह प्रचार सिर्फ़ विधानसभा चुनाव से पहले अपनी विकास पुरुष की छवि गढऩे भर के लिए नहीं है, भाजपा के अंतर्विरोधों से निपटने के लिए भी है। भाजपा में यह पहला मौक़ा नहीं है, जब पहली बार जीते विधायक को मुख्यमंत्री बनाया गया है। हिमाचल में सन् 1997 में पहला चुनाव जीतने के बाद प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री बनाया गया था। हालाँकि वह इससे पहले तीन बार सांसद और प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रह चुके थे और उनके पास संगठन के अलावा प्रशासनिक अनुभव था। कल्पना करें कि यदि भाजपा उनके बेटे अनुराग ठाकुर को अगले साल के विधानसभा चुनाव के बाद हिमाचल में मुख्यमंत्री का ज़िम्मा देना चाहेगी, तो अनुराग भी पहली बार विधायक बनकर ही मुख्यमंत्री हो जाएँगे। हालाँकि पिता की तरह वह भी चार बार सांसद बनने के अलावा दो बार मंत्री बन चुके हैं। लिहाज़ा उनका प्रशासनिक अनुभव तो है ही।

उत्तर प्रदेश में सन् 2017 के विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ पहली बार विधायक बनकर ही मुख्यमंत्री बन गये थे। उससे पहले वह पाँच बार सांसद रहे थे। हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर पहली पारी में जब मुख्यमंत्री बने, तो वह विधायक भी पहली बार बने थे। कुछ पुरानी बात करें, तो गुजरात में सन् 2001 में नरेंद्र मोदी को जब मुख्यमंत्री बनाया गया था, तब तो वह विधायक भी नहीं थे। उसके बाद वह दो बार और मुख्यमंत्री बने। आज वह दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बन चुके हैं। ऐसे प्रयोग कांग्रेस में भी हुए हैं; लेकिन भाजपा ने निश्चित ही यह प्रयोग ज़्यादा किये हैं। इसके पीछे उसका मक़सद भविष्य का नेतृत्व तैयार करने का रहा है।  ख़ात बात यह है कि इसमें आरएसएस की भी बड़ी भूमिका रही है।

 

 

भाजपा में भी अब आलाकमान

कांग्रेस संगठन से जुड़ा एक शब्द मशहूर रहा है- ‘आलाकमान’। भाजपा दशकों तक इस स्थिति से बचती रही। दूसरे भाजपा में उच्चतम स्तर की ताक़त कांग्रेस के गाँधी परिवार की तरह किसी परिवार के पास नहीं थी। वहाँ भाजपा के अध्यक्ष की अपनी हैसियत थी और प्रधानमंत्री की अपनी। लेकिन अब भाजपा में जिस तरह सारी ताक़त प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के आसपास सिमट गयी है, उसने उन्हें भाजपा की आलाकमान की हैसियत दे दी है। उनकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी भाजपा में नहीं हिलता; यह भाजपा के ही लोग अब खुलकर कहने लगे हैं। मोदी-शाह के अलावा तीसरी किसी ताक़त की भाजपा में यदि चलती है, तो वह आरएसएस है। याद करिए, जब प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा का सन् 2019 का चुनाव जीतने के बाद पार्टी के लोगों को सम्बोधित किया था। मोदी ने सांसदों को सलाह दी थी कि वे बयानबाज़ी से बचें। यह एक तरह से उन्हें सुझाव था कि यह काम आलाकमान का है, आपका नहीं। वही तय करेंगे कि क्या और कितना बोलना है? पिछले कुछ वर्षों पर नज़र डालिए, भाजपा का कोई मंत्री आधिकारिक पत्रकार वार्ता (प्रेस कॉन्फ्रेंस) को छोडक़र कभी चलते-फिरते पत्रकारों से बात करने में हिचकता है। पहले ऐसा कभी नहीं होता था। इसे सत्ता का वैसा ही केंद्रीयकरण कह सकते हैं, जैसा इंदिरा गाँधी के ज़माने में था। इसके नुक़सान बाद में कांग्रेस को उठाने पड़े। उसका संगठन लचर और पंगु हो गया; क्योंकि सरकार और संगठन एक ही व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमट गये। मुख्यमंत्री बदलने की भाजपा की रफ़्तार मोदी-शाह की जोड़ी के समय में बहुत तेज़ हुई है। देखें तो इन दोनों के समय में अब तक 13 राज्यों में भाजपा के 19 मुख्यमंत्री बने हैं। इनमें योगी आदित्यनाथ, हिमंता बिस्व सरमा, सर्वानंद सोनोवाल, देवेंद्र फडऩवीस, त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत, पुष्कर सिंह धामी, जयराम ठाकुर, बिप्लब देब, मनोहर लाल खट्टर, रघुबर दास, लक्ष्मीकांत पारसेकर, प्रमोद सावंत, बीरेन सिंह, पेमा खांडू, आनंदी बेन पटेल, विजय रूपाणी, भूपेंद्र पटेल, बासवराज बोम्मई शामिल हैं। इन 19 में से छ: को पार्टी नेतृत्व हटा चुका है।

 

 

आज के हालात में हर कोई दु:खी है। कोई मंत्री न बनने से दु:खी है, तो मुख्यमंत्री इसलिए दु:खी हैं कि पता नहीं कब हटा दिये जाएँगे। समस्या सबके सामने है। पार्टी में है। पार्टी के बाहर है। परिवार में है। आज़ूबाज़ू में है।’’

नितिन गडकरी

केंद्रीय मंत्री (जयपुर के एक कार्यक्रम में)

 

 

अब किसकी बारी?

भाजपा में आजकल बहुत दिलचस्प शर्तें लग रही हैं। वैसे भाजपा से बाहर भी लग रही हैं। शर्त यह कि ‘बताओ अब भाजपा के किस मुख्यमंत्री का नंबर लगने वाला है?’ यानी अब मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने की बारी किसकी है? भाजपा ने जिस तरीक़े और रफ़्तार से मुख्यमंत्री बदले हैं, वह आम जनता में भी दिलचस्पी जगा रहा है। चर्चाओं के मुताबिक, राजस्थान में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को किनारे कर दिया गया है और भाजपा शायद ही उन्हें अगली बार मुख्यमंत्री बनाए। जहाँ तक मुख्यमंत्रियों की बात है, रूपाणी के बाद अब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का बिस्तर गोल हो सकता है। पार्टी मानती है कि इस बार उनका कार्यकाल बहुत ख़राब रहा है और उनके नेतृत्व में चुनाव में जाने पर पार्टी की लुटिया डूबने की पूरी सम्भावना है। पार्टी वहाँ भी कोई नया चेहरा ला सकती है। हिमाचल के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के प्रदर्शन पर भी ढेरों सवाल हैं। कहा जा रहा है कि बहुत विवादित न होने के बावजूद एक मुख्यमंत्री के रूप में जयराम सरकार की छाप छोडऩे में बुरी तरह नाकाम रहे हैं। यहाँ तक कि उनके अपने गृह ज़िले मंडी में ही लोग ज़्यादा ख़ुश नहीं हैं। इस पहाड़ी सूबे में अगले साल के आख़िर में चुनाव होने हैं। हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर पिछले चुनाव में ही भाजपा को बहुमत नहीं दिला पाये थे और भाजपा को सरकार बनाने के लिए दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी (जजपा) से गठबन्धन करना पड़ा था। खट्टर को दूसरी पारी मिल गयी; लेकिन किसान आन्दोलन से जिस ख़राब तरीक़े से खट्टर ने निपटा है, उससे हरियाणा भाजपा में बहुत बेचैनी है। बहुत सम्भावना कि खट्टर का पत्ता भी पार्टी नेतृत्व काट दे। हरियाणा में वैसे विधानसभा चुनाव अक्टूबर, 2024 होने हैं, लिहाज़ा हो सकता है कि खट्टर को अभी कुछ वक़्त और मिल जाए।