एम. रियाज़ हाशमी
नई दिल्ली। राजधानी के रामलीला मैदान में रविवार को जुटे 19 विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को अपनी साझा राजनीतिक आवाज बनाया। ‘वोट चोरी’ और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर आयोजित रैली में नेताओं के भाषणों ने संकेत दिया कि विपक्ष इस मुद्दे को केवल चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी शिकायत तक सीमित नहीं रखना चाहता। मंच से उठे बयानों में 2024 के लोकसभा चुनाव की वैधता, उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव और केंद्र की सत्ता के खिलाफ राजनीतिक लामबंदी- तीनों के संकेत दिखाई दिए।
रैली के दौरान वरिष्ठ विपक्षी नेता कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास से खुले बस में मिंटो रोड पहुंचे और वहां से रामलीला मैदान तक मार्च किया। समर्थकों ने राष्ट्रीय ध्वज, दलों के झंडे और मतदाता सूची के एसआईआर के विरोध में तख्तियां लेकर नारे लगाए। दिल्ली पुलिस की ओर से सुरक्षा के लिए 4,000 से अधिक कर्मियों और 200 से ज्यादा सीसीटीवी कैमरों की तैनाती का दावा किया गया।
राहुल ने चुनावी आरोपों को मोदी-शाह तक पहुंचाया
राहुल गांधी ने अपने संबोधन में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी देते हुए कहा, “ज्ञानेश कुमार जेल जाएगा।” इसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करते हुए कहा, “ज्ञानेश कुमार के बाद अब आपकी बारी।” उन्होंने यह बातें गृह मंत्री अमित शाह के बयान के जवाब के तौर पर कहीं जिनमें पिछले दिनों कहा गया था, “मोदी कहीं नहीं जा सकता।” राहुल ने विपक्ष की लड़ाई को मोदी और गृह मंत्री अमित शाह तक पहुंचाने का संकेत दिया।
राहुल ने महाराष्ट्र, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों के चुनावों तथा 2024 के लोकसभा चुनाव में “वोट चोरी” का आरोप लगाया। उनके मुताबिक, ईवीएम और मतदाता सूची में नाम जोड़ने-काटने के जरिए चुनावी जनमत प्रभावित किया गया। उन्होंने कथित मतदाता-नाम कटौती को “राष्ट्र-विरोधी”, “देशद्रोह” और “दुर्लभतम मामलों में से एक” कहा।
राहुल ने 2024 के लोकसभा चुनाव को “अवैध” और “चोरी किया गया” बताते हुए दावा किया कि चुनाव के बाद मतदाता सूची से 15 प्रतिशत वोटरों के नाम हटाए गए। उन्होंने कहा कि आंकड़े चुनाव आयोग के ही हैं। राहुल ने आर्थिक असमानता का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि देश का धन दो-तीन उद्योगपतियों के हाथों में सिमट रहा है और बड़े पूंजीपतियों के हजारों करोड़ रुपये के कर्ज माफ किए जाते हैं, जबकि गरीबों को कर्ज के लिए अपमान झेलना पड़ता है। इस तरह उन्होंने चुनावी प्रक्रिया पर विपक्ष के आरोपों को आर्थिक न्याय और गरीबों के अधिकारों से जोड़ने की कोशिश की।
अखिलेश का निशाना 2027: यूपी से राष्ट्रीय सत्ता तक
समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने रैली को सीधे उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव से जोड़ा। उन्होंने दावा किया कि भाजपा और उसके सहयोगी दल 2027 के बाद उत्तर प्रदेश में सत्ता में वापस नहीं लौटेंगे। उन्होंने कहा कि भाजपा को उत्तर प्रदेश से ही नहीं, देश से भी हटाया जाएगा। अखिलेश ने रामलीला मैदान को “लोकतंत्र की हल्दीघाटी” बताते हुए इसे संभावित राजनीतिक बदलाव का संकेत कहा। अखिलेश ने 2022 के उत्तर प्रदेश चुनाव में “वोट चोरी” का आरोप लगाया और कहा कि चुनाव आयोग को हथियार बनाकर जीत हासिल करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने पश्चिम बंगाल के चुनाव से पहले एसआईआर के जरिए वोट कटने का आरोप भी लगाया।
उन्होंने भाजपा के “डबल इंजन” नारे पर तंज कसते हुए काशी में पार्टी को “डबल जीरो” मिलने की बात कही। अखिलेश के भाषण का सियासी संकेत यह था कि विपक्ष चुनावी प्रक्रिया पर उठाए सवालों को आगामी विधानसभा चुनावों की चुनौती और सत्ता परिवर्तन के दावे से जोड़ना चाहता है।
ममता का बंगाल पर आरोप, खड़गे की टकराव वाली भाषा
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, “हम बंगाल में हारे नहीं, हराया गया।” उन्होंने भाजपा पर बंगाल को “लूटने” का आरोप लगाते हुए कहा कि पार्टी को जाना होगा और वह इसका बदला लेंगी। ये बयान बंगाल के चुनावी नतीजों को लेकर ममता के आरोप और राजनीतिक चेतावनी हैं। साझा मंच पर इन्हें उठाने से विपक्ष की कोशिश अलग-अलग राज्यों की शिकायतों को चुनावी प्रक्रिया पर व्यापक सवाल के रूप में पेश करने की दिखती है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि ज्ञानेश कुमार “पाताल में क्यों न चले जाएं, हम उन्हें वहां से भी खोज लाएंगे।” उन्होंने यह भी कहा, “आप ईडी, सीबीआई लगा लो, हम डरेंगे नहीं।” खड़गे ने प्रधानमंत्री मोदी पर मतदाताओं में फूट डालने और वोटरों को चुनने का आरोप लगाया तथा केंद्र, बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारों को “चोरी की सरकारें” कहा। इन बयानों ने रैली का स्वर इस्तीफे की मांग से आगे बढ़ाकर केंद्र सरकार के साथ सीधे राजनीतिक टकराव का रूप दिया।
तेजस्वी ने सॉफ्टवेयर टेंडर और जवाबदेही पर उठाए सवाल
राजद नेता तेजस्वी यादव ने टीसीएस से जुड़े कथित सॉफ्टवेयर प्रबंध और सीमा खन्ना का उल्लेख करते हुए पूछा कि क्या इस सॉफ्टवेयर के लिए टेंडर जारी किया गया था। उन्होंने संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग की। तेजस्वी ने आरोप लगाया कि संवैधानिक संस्थाएं न्याय देने के बजाय सरकार के निर्देश पर काम कर रही हैं। यह सवाल रैली के आरोपों को चुनावी प्रक्रिया के तकनीकी और प्रशासनिक पक्ष तक ले जाता है। तेजस्वी ने रामलीला मैदान को “वोट चोरों के खिलाफ महाभारत” का मंच बताया और ज्ञानेश कुमार को जेल भेजने की मांग की। माकपा महासचिव एमए बेबी ने इसे “दूसरा आजादी का आंदोलन” बताते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग दोहराई। इन रूपकों से नेताओं ने चुनावी शिकायत को बड़े राजनीतिक संघर्ष के रूप में पेश किया।
फारूक अब्दुल्ला ने देशभक्ति के सवाल को जोड़ा
नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने मुसलमानों की देशभक्ति पर सवाल उठाए जाने का विरोध किया। उन्होंने कहा कि मुसलमानों ने देश के लिए अपना खून दिया है और आगे भी देते रहेंगे। उनके मुताबिक, मुसलमानों को “पाकिस्तानी” कहकर उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाए जाते हैं। यह बयान रैली के मुद्दे को मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया से आगे बढ़ाकर नागरिकता, देशभक्ति और अल्पसंख्यक पहचान की बहस से जोड़ता है।
विपक्षी दलों के साझा मंच की अगली कसौटी
पिछले 25 दिनों में विपक्ष इस मुद्दे पर सातवीं बार एकजुट हुआ। यह निरंतरता विपक्षी दलों के बीच साझा मंच बनाए रखने की कोशिश को दिखाती है। लेकिन रैली का राजनीतिक असर केवल नेताओं की मौजूदगी और तीखे भाषणों से तय नहीं होगा। इसकी अगली कसौटी यह होगी कि विपक्ष मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आरोपों को कितने ठोस, सार्वजनिक और जांचे जा सकने वाले प्रमाणों के साथ सामने रखता है; और क्या यह साझा मुद्दा अलग-अलग राज्यों में चुनावी रणनीति में बदल पाता है।
रैली के भाषणों में तीन राजनीतिक संकेत उभरे
राहुल गांधी ने चुनावी आरोपों को 2024 के जनादेश और मोदी-शाह नेतृत्व तक पहुंचाया; अखिलेश यादव ने इसे 2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव से जोड़ा; और तेजस्वी यादव ने चुनावी व्यवस्था के तकनीकी प्रबंध तथा दस्तावेजी पारदर्शिता पर सवाल उठाए। इस तरह विपक्ष ने चुनावी भरोसे को अपनी एकजुटता का आधार बनाया।




