विपक्ष की रणनीति या बिखराव? भाजपा साझी दुश्मन इसलिए दिल्ली में साझी सियासत

केंद्र में राहुल के साथ खड़े क्षत्रप अपने प्रभाव वाले राज्यों में क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के चलते कांग्रेस से लगातार टकरा रहे, राजधानी में लोकतंत्र और चुनावी निष्पक्षता की लड़ाई में विपक्षी एकजुटता का प्रदर्शन, लेकिन राज्यों में सीटों, सत्ता और नेतृत्व के लिए कांग्रेस से संघर्ष; इनमें अखिलेश यादव से ममता बनर्जी तक चुनावी नतीजों से पहले खुद को बड़ी सियासी ताकत मानने की भूल करते रहे, क्या अब सुधार दिखेगा?

एम. रियाज़ हाशमी | नई दिल्ली
दिल्ली में लोकतंत्र और चुनावी निष्पक्षता के सवाल पर विपक्षी दलों का एक मंच पर आना क्या बीजेपी के खिलाफ किसी सुनियोजित राजनीतिक रणनीति का संकेत है या फिर साझा दुश्मन के कारण पैदा हुई अस्थायी एकजुटता? यह सवाल इसलिए अहम है, क्योंकि राजधानी में राहुल गांधी के साथ खड़े कई क्षेत्रीय क्षत्रप अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस से ही राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। दिल्ली में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर सवाल और लोकतांत्रिक अधिकारों की पैरवी के बीच विपक्षी एकता दिखाई देती है। मगर राज्यों में आते ही यह तस्वीर बदल जाती है। यहां साझा एजेंडे पर सहमति के मुकाबले सीटों, सत्ता और नेतृत्व की महत्वाकांक्षाएं ज्यादा ताकतवर हो जाती हैं।

विपक्षी एकजुटता की बुनियाद फिलहाल बीजेपी का विरोध और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर उठाए जा रहे सवाल हैं। लेकिन क्या साझा विरोध के सहारे टिकाऊ चुनावी गठबंधन खड़ा किया जा सकता है? दिल्ली में संयुक्त कार्यक्रमों के दौरान समन्वय की कमी ने इस सवाल को प्रासंगिक बनाया। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के आकाशवाणी भवन के बाहर अचानक धरने पर बैठने के घटनाक्रम ने सहयोगी दलों के बीच संवाद और तालमेल को लेकर असहजता उजागर की। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की कांग्रेस के कुछ कार्यक्रमों से दूरी को भी इसी संदर्भ में देखा गया। हालांकि, बाद में राहुल गांधी के आह्वान पर सुप्रीम कोर्ट तक निकाले गए मार्च में अखिलेश यादव की भागीदारी ने यह भी स्पष्ट किया कि मतभेदों के बावजूद साझा मुद्दों पर विपक्षी दल साथ आने की गुंजाइश बनाए हुए हैं।

यानी, बीजेपी का विरोध विपक्ष को एक मंच पर ला रहा है, लेकिन इस एकजुटता को टिकाऊ राजनीतिक रणनीति में बदलने के लिए संवाद, समन्वय और नेतृत्व के सवालों का हल अब भी जरूरी है। यह महज किसी एक कार्यक्रम में शामिल होने या न होने का सवाल नहीं है। असल चुनौती यह है कि क्या विपक्षी दल साझा राजनीतिक लड़ाई का नेतृत्व किसी एक पार्टी के हाथ में देने को तैयार हैं, या हर दल अपनी स्वतंत्र पहचान और प्रभाव को सुरक्षित रखते हुए ही साथ चलना चाहता है।

अखिलेश से ममता तक, ताकत के आकलन की चुनौती

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में साथ मिलकर अच्छा प्रदर्शन किया। समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं। इस सफलता ने गठबंधन की उपयोगिता साबित की, लेकिन विधानसभा चुनावों से पहले सीटों और संगठनात्मक विस्तार को लेकर दोनों दलों के हित फिर आमने-सामने आ सकते हैं। अखिलेश यादव के लिए उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का नेतृत्व और वर्चस्व सर्वोपरि है, जबकि कांग्रेस अपने कमजोर संगठन को दोबारा खड़ा करने के लिए अधिक राजनीतिक जगह चाहती है।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस का रिश्ता भी इसी विरोधाभास को सामने लाता है। राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के खिलाफ सहयोग की संभावना के बावजूद बंगाल में दोनों दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बनी हुई है। ममता बनर्जी का राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति में प्रभाव बढ़ाने का प्रयास अपनी जगह है, लेकिन राज्य में कांग्रेस को जगह देने का सवाल अलग है।

अखिलेश यादव से ममता बनर्जी तक क्षेत्रीय नेताओं के सामने एक चुनौती यह भी रही है कि चुनावी नतीजों से पहले अपनी ताकत और राजनीतिक स्वीकार्यता का आकलन कितना सही किया जाए। चुनावी सफलता से पैदा हुआ आत्मविश्वास अगर सहयोगियों की ताकत और संगठन की सीमाओं को नजरअंदाज करने लगे, तो गठबंधन की संभावनाएं कमजोर पड़ती हैं। सवाल है कि क्या इस बार क्षेत्रीय दल और कांग्रेस पिछले अनुभवों से सबक लेकर पहले से बेहतर तालमेल बना पाएंगे?

पंजाब से तमिलनाडु तक, सत्ता की गणित भारी

पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सीधे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं। दोनों दल राज्य में सत्ता और नेतृत्व के दावेदार हैं। इसलिए बीजेपी के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर किसी मुद्दे पर सहमति का अर्थ यह नहीं कि वे पंजाब में भी एक-दूसरे के लिए राजनीतिक जगह छोड़ देंगे। आम आदमी पार्टी का अलग राजनीतिक रास्ता अपनाना इसी राज्यस्तरीय प्रतिस्पर्धा को दर्शाता है।

तमिलनाडु में कांग्रेस का विजय की तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) के साथ जाना उसके पूर्व सहयोगी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के साथ तनाव का कारण बना। यहां भी सरकार बनाने और सत्ता में हिस्सेदारी के सवाल ने पुराने गठबंधन समीकरणों को प्रभावित किया। केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा और वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चा एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं, भले ही राष्ट्रीय स्तर पर दोनों बीजेपी का विरोध करते हों।

इन उदाहरणों से साफ है कि राष्ट्रीय राजनीति का साझा लक्ष्य राज्यों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को खत्म नहीं करता।

रणनीति या बिखराव, फैसला चुनावी जमीन पर

विपक्षी एकता की असली परीक्षा संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस या विरोध प्रदर्शनों से आगे होगी। सीटों के बंटवारे, नेतृत्व के सवाल, साझा चुनावी कार्यक्रम और राज्यवार राजनीतिक हितों पर सहमति ही बताएगी कि यह गठबंधन रणनीतिक रूप से मजबूत हो रहा है या केवल मुद्दों के आधार पर एकजुट दिखाई दे रहा है।

कांग्रेस के सामने भी दोहरी चुनौती है। उसे विपक्षी एकता बनाए रखने के साथ उन राज्यों में अपना संगठन मजबूत करना है, जहां क्षेत्रीय दल उसके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी हैं। दूसरी ओर, क्षेत्रीय क्षत्रपों को भी यह समझना है कि राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव का दावा तभी टिकाऊ हो सकता है, जब वह चुनावी नतीजों, संगठनात्मक ताकत और सहयोगियों के साथ व्यावहारिक तालमेल पर आधारित हो।

फिलहाल विपक्ष की तस्वीर में रणनीति और बिखराव, दोनों के संकेत हैं। दिल्ली में साझा लड़ाई राजनीतिक जरूरत है, लेकिन राज्यों में आपसी टकराव उसकी सबसे बड़ी कमजोरी। अब देखना यह है कि अखिलेश यादव से ममता बनर्जी तक क्षेत्रीय नेता और कांग्रेस चुनावी नतीजों से पहले ताकत के आकलन की पुरानी गलतियों से सबक लेते हैं या फिर साझा दुश्मनी के बावजूद साझी सियासत आपसी अविश्वास की भेंट चढ़ जाती है।