रामलीला मैदान से राज्यों के चुनाव तक राहुल के नेतृत्व और ‘INDIA’ की एकजुटता का सवाल

दिल्ली में विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन, लेकिन राज्यों में सहयोगियों के अपने-अपने चुनावी हित; पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की भीड़ जुटाने की क्षमता और सपा के साथ सीटों की दावेदारी पर नजर; पंजाब में कांग्रेस-आप की प्रतिस्पर्धा भी गठबंधन की एकजुटता की परीक्षा; सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर की वैधता पर कानूनी लड़ाई जारी; रैली के बाद पांच शहरों में सभाओं और छह यात्राओं की तैयारी

एम. रियाज़ हाशमी
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दिल्ली। राजधानी का ऐतिहासिक रामलीला मैदान हाल ही में भगवान राम की लीलाओं के मंचन का साक्षी बना है, लेकिन अब यह सरकार के खिलाफ विपक्ष की सियासी लीला का गवाह बनने जा रहा है। एक नवंबर को यहां जुटने जा रहे विपक्षी दलों का मकसद केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करना नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक एकजुटता का प्रदर्शन करना भी है। इस सियासी मंच पर निगाहें जितनी विपक्ष की भीड़ और उसके नेताओं पर होंगी, उससे कहीं ज्यादा इस बात पर रहेंगी कि क्या कांग्रेस की अगुवाई में जुटा विपक्ष वास्तव में ‘INDIA’ गठबंधन की साझा ताकत दिखा पाएगा? क्या यह गठबंधन की सामूहिक रैली होगी या कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन? और क्या दिल्ली में एक मंच पर खड़े होने वाले दल आगामी विधानसभा चुनावों में भी एक-दूसरे के साथ खड़े रह पाएंगे?

इन सवालों के साथ चुनाव आयोग के खिलाफ पिछले कुछ महीनों से चल रहे आंदोलन के नतीजों और रामलीला मैदान के बाद विपक्ष की रणनीति पर भी निगाहें रहेंगी। इन सबके केंद्र में कांग्रेस और राहुल गांधी की भूमिका है। कांग्रेस इस अभियान की सबसे बड़ी आयोजक है, लेकिन उसे यह भी साबित करना होगा कि वह दूसरे विपक्षी दलों को साथ लेकर चलने में सक्षम है। दूसरी ओर, क्षेत्रीय दलों के लिए भी यह सवाल अहम है कि साझा मुद्दों पर कांग्रेस के साथ खड़े होने के बावजूद वे राष्ट्रीय नेतृत्व के मामले में राहुल गांधी को कितनी दूर तक स्वीकार करने को तैयार हैं?

इससे भी बड़ा सवाल आगामी विधानसभा चुनावों का है। 2027 में सात राज्यों में चुनाव होने हैं। इनमें उत्तर प्रदेश और पंजाब ऐसे राज्य हैं, जहां विपक्षी दलों के बीच राष्ट्रीय एकजुटता और राज्यस्तरीय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का सीधा टकराव दिखाई दे सकता है। दिल्ली में कांग्रेस जिस भीड़ को जुटाने की कोशिश कर रही है, उसका राजनीतिक लाभ किसे मिलेगा? क्या यह भीड़ कांग्रेस की संगठनात्मक ताकत का प्रदर्शन बनेगी या सहयोगी दल भी इसे अपने राजनीतिक खाते में दर्ज कर सकेंगे? खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीटों की दावेदारी तथा पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की चुनावी प्रतिस्पर्धा इस रैली के राजनीतिक समीकरणों को और दिलचस्प बनाती है।

रामलीला मैदान: कांग्रेस की अगुवाई और ‘INDIA’ का मंच

1 नवंबर की रैली को ‘INDIA’ गठबंधन का संयुक्त कार्यक्रम बताया गया है। इसके बावजूद आयोजन की कमान मुख्य रूप से कांग्रेस के हाथों में है। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल राज्यों में तैयारियों और कार्यकर्ताओं की भागीदारी सुनिश्चित करने में जुटे हैं। कांग्रेस नेतृत्व ने रैली में 10 लाख लोगों को जुटाने का लक्ष्य रखा है। पार्टी सांसद नासिर हुसैन के मुताबिक, समाजवादी पार्टी और वामपंथी दलों को भी आयोजन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं। 30 सितंबर को हुई ‘INDIA’ गठबंधन की बैठक में 19 दलों और एक स्वतंत्र मोर्चे ने चुनाव आयोग के खिलाफ संयुक्त आंदोलन की रणनीति पर सहमति जताई थी। इसमें कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, एनसीपी (शरद पवार), शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे), झारखंड मुक्ति मोर्चा, नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और वामपंथी दल शामिल थे।

हालांकि आम आदमी पार्टी और डीएमके उस बैठक में शामिल नहीं हुए थे। दोनों दलों ने पहले सीजेपी के अलग आंदोलन को समर्थन दिया था। ऐसे में चुनाव आयोग के मुद्दे पर व्यापक विपक्षी समर्थन और ‘INDIA’ गठबंधन की औपचारिक एकजुटता के बीच अंतर भी दिखाई देता है। सीजेपी ने अब 1 नवंबर की रैली को समर्थन दे दिया है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों की भागीदारी और गठबंधन के भीतर साझा निर्णय प्रक्रिया दो अलग-अलग बातें हैं।

आंदोलन से विपक्ष को अब तक क्या हासिल हुआ?

चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष का आंदोलन कई चरणों से गुजरा है। पहले संसद में विरोध और राजनीतिक बयानबाजी हुई। इसके बाद देशव्यापी प्रदर्शन, चुनाव आयोग तक मार्च और सुप्रीम कोर्ट में संयुक्त याचिका दाखिल करने का रास्ता अपनाया गया। 12 अक्टूबर को राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े मुद्दों पर संयुक्त याचिका दाखिल की। इसमें चुनाव आयोग के आंतरिक दस्तावेज सार्वजनिक करने, मतदाता सूची से हटाए गए नामों का स्वतंत्र ऑडिट कराने और मतदाताओं को नाम हटाने से पहले नोटिस तथा सुनवाई का अवसर देने जैसी मांगें की गईं।

इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परिणाम यह रहा कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल और वामपंथी दल एक साझा मुद्दे पर फिर साथ आए। सीजेपी जैसे गैर-दलीय मंच का समर्थन भी विपक्ष को मिला। हालांकि अभी तक चुनाव आयोग के रुख में कोई बड़ा बदलाव या मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा सामने नहीं आया है। लेकिन कानूनी मोर्चे पर विपक्ष के लिए एक महत्वपूर्ण रास्ता खुलता दिखाई दे रहा है। 28 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर में मतदाताओं के नामों की जांच के लिए चुनाव आयोग की ओर से इस्तेमाल की जा रही ‘तार्किक विसंगति’ (लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी) श्रेणी की वैधता पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत ने इस श्रेणी के इस्तेमाल की वैधता पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। बिहार एसआईआर पर आया फैसला भी इस मुद्दे पर अंतिम न्यायिक निर्णय नहीं माना जा सकता, क्योंकि बिहार में आयोग ने इस श्रेणी का इस्तेमाल नहीं किया था। पश्चिम बंगाल में इसकी अनुमति केवल अंतरिम व्यवस्था के तौर पर दी गई थी।

जस्टिस जोयमाल्या बागची ने यह सवाल भी उठाया कि क्या सॉफ्टवेयर के जरिए तैयार किए गए पैटर्न के आधार पर बड़ी संख्या में मतदाताओं को ‘तार्किक विसंगति’ के नोटिस जारी करना मानवीय स्तर पर विवेकपूर्ण जांच का प्रमाण है। अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि 2003 की मतदाता सूची में दर्ज किसी व्यक्ति को इतने वर्षों बाद इस श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है। ये टिप्पणियां विपक्ष के आरोपों को सही साबित नहीं करतीं, लेकिन यह जरूर स्पष्ट करती हैं कि एसआईआर की प्रक्रिया और उसके तहत अपनाए गए तरीकों की न्यायिक समीक्षा का रास्ता अभी खुला है।

यही वह बिंदु है जहां विपक्ष की रणनीति को राजनीतिक प्रदर्शन से आगे कानूनी चुनौती का आधार मिलता दिख रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे या चुनाव आयोग के रुख में बदलाव जैसी राजनीतिक मांगों पर अभी कोई सफलता नहीं मिली है, लेकिन अदालत ने एसआईआर के एक महत्वपूर्ण आधार की वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है। अब विपक्ष के सामने चुनौती इस कानूनी अवसर को ठोस दस्तावेजों, प्रभावित मतदाताओं के मामलों और स्पष्ट दलीलों के साथ अदालत में आगे बढ़ाने की है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश: भीड़ कांग्रेस जुटाएगी, फायदा किसे मिलेगा?

रामलीला मैदान की रैली के राजनीतिक गणित को समझने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर नजर डालना जरूरी है। दिल्ली से सटे होने के कारण इस क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोगों को रैली में लाने की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश कांग्रेस संगठन पर है। प्रदेश कांग्रेस को रैली के लिए कम से कम 50 हजार कार्यकर्ताओं की भागीदारी सुनिश्चित करने का लक्ष्य दिया गया है। सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, बुलंदशहर, अलीगढ़, आगरा और मुरादाबाद जैसे जिलों से कार्यकर्ताओं को जुटाने की तैयारी है।

यह वही क्षेत्र है जहां समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों की अपनी राजनीतिक दावेदारी है। 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए दोनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे पर बातचीत शुरू हो चुकी है। कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी को करीब 170 सीटों की शुरुआती सूची सौंपी है। पार्टी का तर्क है कि जिन सीटों पर उसका संगठन और चुनावी आधार मजबूत है, वहां उसे चुनाव लड़ने का अवसर मिलना चाहिए। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी की ओर से सीटों का बंटवारा जीतने की संभावना और जमीनी ताकत के आधार पर तय करने की बात कही जा रही है।

ऐसे में सवाल उठता है कि अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में लोग रामलीला मैदान पहुंचते हैं, तो इसका राजनीतिक श्रेय किसे मिलेगा? क्योंकि समाजवादी पार्टी की रैली को लेकर तैयारियां उसी के प्रभाव वाले वेस्ट यूपी में कहीं नजर नहीं आ रही हैं। कांग्रेस इसे अपने संगठन की ताकत के रूप में पेश करेगी या समाजवादी पार्टी भी इसे साझा विपक्षी आंदोलन की सफलता मानेगी? रैली में अखिलेश यादव और कांग्रेस नेतृत्व की मौजूदगी से आगे बढ़कर यह देखना भी जरूरी होगा कि क्या दोनों दल इस साझा अभियान को अपने राज्यस्तरीय चुनावी कार्यक्रमों से जोड़ पाते हैं।

कांग्रेस के लिए यह रैली उत्तर प्रदेश में अपनी संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक दावेदारी दिखाने का अवसर है। वहीं समाजवादी पार्टी के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस की यह ताकत उसके साथ चुनावी गठबंधन में कितनी उपयोगी साबित होती है। रैली में भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी मिलने से सीटों के बंटवारे में अपने आप किसी दल की स्थिति मजबूत नहीं हो जाती। लेकिन कांग्रेस इस भागीदारी को अपनी संगठनात्मक सक्रियता और राजनीतिक हैसियत के प्रमाण के रूप में जरूर पेश कर सकती है।

यही इस गठबंधन की एक बड़ी चुनौती है। दिल्ली में दोनों दल साझा मंच पर होंगे, लेकिन उत्तर प्रदेश में सीटों के बंटवारे के समय उन्हें अपने-अपने राजनीतिक हितों और चुनावी दावों का हिसाब करना होगा। राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता और राज्यस्तर पर सीटों की प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा।

पंजाब में कांग्रेस-आप की प्रतिस्पर्धा भी चुनौती

पंजाब में भी राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय राजनीति के बीच यही अंतर दिखाई देता है। वहां आम आदमी पार्टी की सरकार है और कांग्रेस उसके खिलाफ प्रमुख राजनीतिक चुनौती पेश कर रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव में दोनों दल एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी होंगे। ऐसे में चुनाव आयोग के खिलाफ राष्ट्रीय मंच पर विपक्षी एकजुटता का अर्थ यह नहीं है कि पंजाब में दोनों दलों के बीच चुनावी सहयोग भी बन जाएगा।

आम आदमी पार्टी का 30 सितंबर की ‘INDIA’ बैठक में शामिल नहीं होना इसी राजनीतिक जटिलता की ओर संकेत करता है। पार्टी ने सीजेपी के अलग आंदोलन को समर्थन दिया था, लेकिन कांग्रेस की अगुवाई वाले इस अभियान में उसकी औपचारिक भूमिका स्पष्ट नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर साझा मुद्दों पर समर्थन और राज्य में चुनावी गठबंधन के बीच अंतर को समझना जरूरी है।

उत्तर प्रदेश और पंजाब के ये दोनों उदाहरण बताते हैं कि विपक्षी दल चुनाव आयोग के खिलाफ एक साझा आंदोलन तो चला सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उनके बीच राज्यस्तरीय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा खत्म हो गई है। आगामी चुनावों में सीटों का बंटवारा, नेतृत्व और स्थानीय संगठन की भूमिका ही तय करेगी कि यह एकजुटता कितनी व्यावहारिक साबित होती है।

रामलीला मैदान के बाद देशव्यापी आंदोलन और छह यात्राएं

विपक्ष की रणनीति केवल दिल्ली की एक रैली तक सीमित नहीं दिखाई देती। 30 सितंबर की बैठक में देश के विभिन्न हिस्सों में पांच बड़ी रैलियां आयोजित करने पर भी चर्चा हुई थी। दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता और बेंगलुरु के नाम सामने आए थे, जबकि पांचवें शहर का फैसला होना बाकी था। इसका अर्थ है कि रामलीला मैदान की रैली को आंदोलन का समापन नहीं, बल्कि अगले चरण की शुरुआत बनाने की तैयारी है।

इसके अलावा 25-26 नवंबर से ‘चलो दिल्ली’ कार्यक्रम के तहत छह यात्राएं शुरू करने की योजना है। ये यात्राएं अलग-अलग राज्यों और स्थानों से चलकर राष्ट्रीय राजधानी पहुंचेंगी। इस कार्यक्रम का उद्देश्य आंदोलन को दिल्ली के राजनीतिक मंच से निकालकर देश के अलग-अलग हिस्सों तक ले जाना है।

लेकिन इन कार्यक्रमों की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या सहयोगी दल अपने-अपने राज्यों में भी इन्हें समान प्राथमिकता देते हैं। क्या स्थानीय स्तर पर संयुक्त समितियां बनेंगी? क्या कांग्रेस और क्षेत्रीय दल एक-दूसरे के राजनीतिक आधार को स्वीकार करते हुए साझा कार्यक्रम चलाएंगे? और क्या आंदोलन का मुद्दा केवल चुनाव आयोग के विरोध तक सीमित रहेगा या मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और सुधार की प्रक्रिया से जुड़े आम लोगों के सवाल भी इसमें शामिल होंगे?

राहुल गांधी के लिए नेतृत्व स्थापित करने का अवसर

इस पूरे आंदोलन में राहुल गांधी की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने चुनाव आयोग के मुद्दे को कांग्रेस की सीमाओं से बाहर ले जाकर विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों के साझा अभियान में बदलने की कोशिश की है। राहुल गांधी के लिए यह रैली विपक्षी राजनीति में अपनी समन्वयकारी भूमिका को सामने रखने का अवसर हो सकती है। लेकिन ‘INDIA’ गठबंधन का नेतृत्व केवल किसी एक रैली में दूसरे नेताओं की मौजूदगी से तय नहीं होगा।

गठबंधन में ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, एमके स्टालिन, उद्धव ठाकरे और हेमंत सोरेन जैसे नेताओं की अपनी राजनीतिक पहचान और क्षेत्रीय ताकत है। वे कांग्रेस के साथ साझा मुद्दों पर आंदोलन कर सकते हैं, लेकिन इससे राहुल गांधी को गठबंधन का सर्वमान्य नेता मान लेने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

राहुल गांधी के सामने चुनौती केवल दूसरे दलों के नेताओं को एक मंच पर लाने की नहीं, बल्कि उनके बीच राजनीतिक समन्वय कायम रखने की भी है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की सीटों की दावेदारी तथा पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की प्रतिस्पर्धा इस चुनौती को स्पष्ट करती है। यदि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व की भूमिका चाहती है, तो उसे सहयोगियों के राजनीतिक हितों और क्षेत्रीय परिस्थितियों के बीच संतुलन भी बनाना होगा।

दरअसल, विपक्ष के सामने दोहरी चुनौती है। उसे एक तरफ चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया के मुद्दे पर केंद्रित आंदोलन चलाना है, तो दूसरी तरफ अपने भीतर नेतृत्व, निर्णय प्रक्रिया और राज्यों के स्तर पर समन्वय के सवालों का समाधान भी तलाशना है। साझा मंच पर एकजुट दिखना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन चुनावी रणनीति और सीटों के बंटवारे में एक-दूसरे के लिए जगह बनाना कहीं अधिक कठिन परीक्षा होगी।

रैली की सफलता का पैमाना केवल भीड़ नहीं

रामलीला मैदान में जुटने वाली भीड़ निश्चित रूप से राजनीतिक संदेश देगी। लेकिन इस आंदोलन की वास्तविक सफलता का आकलन कुछ दूसरे आधारों पर भी करना होगा। क्या विपक्ष मतदाता सूची से जुड़े अपने आरोपों के समर्थन में ठोस दस्तावेज और प्रभावित मतदाताओं के मामले सामने ला पाएगा? क्या सुप्रीम कोर्ट में उसकी कानूनी चुनौती आगे बढ़ेगी? क्या क्षेत्रीय दल साझा कार्यक्रमों में नियमित भागीदारी करेंगे? क्या कांग्रेस गठबंधन के भीतर निर्णय प्रक्रिया को अधिक संस्थागत बना पाएगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या दिल्ली में दिखाई देने वाली एकजुटता उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे चुनावी राज्यों में भी व्यावहारिक सहयोग में बदल सकेगी?

कांग्रेस की जुटाई भीड़ का राजनीतिक लाभ केवल कांग्रेस को मिलेगा या सहयोगी दल भी उससे अपने-अपने राज्यों में लाभ उठा पाएंगे, इसका जवाब रैली के मंच से नहीं, बल्कि उसके बाद की राजनीतिक गतिविधियों से मिलेगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस के बीच सीटों की बातचीत और पंजाब में कांग्रेस-आप की प्रतिस्पर्धा इस सवाल की कसौटी होगी।

फिलहाल 1 नवंबर का मंच चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष की लामबंदी के साथ-साथ ‘INDIA’ गठबंधन के भीतर कांग्रेस की भूमिका और राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पड़ाव बनने जा रहा है। रामलीला मैदान में विपक्ष की एकजुटता का प्रदर्शन होगा, लेकिन उसकी असली परीक्षा दिल्ली से बाहर, राज्यों के चुनावी मैदान में होगी।