क्या केंद्र और यूपी की लड़ाई में फंस गई आज़म खान की रिहाई?

ईडी के एक्शन ने केंद्रीय और राज्य नेतृत्व के बीच सियासी दांवपेंच पर ध्यान खींचा; क्या यह यूपी की चुनावी राजनीति में केंद्र और राज्य के बीच टकराव का नया संकेत है? जमानत के कुछ ही मिनट बाद जेल के गेट से गिरफ्तारी, गाजियाबाद की अदालत से 14 दिन की न्यायिक हिरासत- अब इससे यूपी चुनाव में किसे फायदा और किसे नुकसान?

एम. रियाज़ हाशमी
नई
दिल्ली। करीब 11 महीने बाद रामपुर जेल से बाहर आए समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म खान की आज़ादी महज कुछ मिनटों तक कायम रह सकी। 31 अक्टूबर की शाम इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद जेल से बाहर निकले आज़म खान को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने धनशोधन के एक अलग मामले में गिरफ्तार कर लिया। अगले दिन गाजियाबाद की विशेष अदालत ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। जिस रिहाई को सपा के लिए राजनीतिक राहत और उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा था, वह अब केंद्र और राज्य की सियासत के बीच एक नए सवाल के रूप में खड़ी है- क्या आज़म खान की कानूनी लड़ाई राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन का मैदान बन गई है?

ईडी की कार्रवाई का कानूनी आधार रामपुर जिले की मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट और जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं और धनशोधन की जांच है। एजेंसी की जांच में विश्वविद्यालय के निर्माण पर हुए खर्च और ट्रस्ट की ओर से घोषित पूंजीगत व्यय के बीच अंतर की पड़ताल की जा रही है। इसलिए इस कार्रवाई को केवल राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में देखना अधूरा होगा। लेकिन जिस समय और जिस तरीके से गिरफ्तारी हुई, उसने इसके राजनीतिक अर्थों पर बहस को भी जन्म दिया है।

रिहाई से पहले नरमी, फिर जेल के गेट पर ईडी

आज़म खान और उनके बेटे अब्दुल्ला आज़म को दो पैन कार्ड के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 29 अक्टूबर को जमानत दी थी। अदालत ने आज़म खान की 10 साल और अब्दुल्ला आज़म की 7 साल की सजा निलंबित की, लेकिन दोषसिद्धि पर रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की। दोनों 31 अक्टूबर की शाम रामपुर जेल से बाहर आए। अब्दुल्ला घर पहुंचे, जबकि आज़म खान को ईडी की टीम ने गिरफ्तार कर लिया।

इस घटनाक्रम में दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं एक ही दिन आमने-सामने आईं। हाईकोर्ट ने एक मामले में जेल से रिहाई का रास्ता खोला, जबकि ईडी ने दूसरे मामले में गिरफ्तारी की। आज़म खान की रिहाई को राज्य सरकार की नरमी का परिणाम बताने वाली चर्चाओं के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यूपी सरकार ने उनके बाहर आने का रास्ता आसान किया था और क्या केंद्र की एजेंसी ने उसी राहत को तत्काल निष्प्रभावी कर दिया?

हालांकि, रिहाई का रास्ता हाईकोर्ट के न्यायिक आदेश से खुला था। उपलब्ध तथ्यों से यह साबित नहीं होता कि यूपी सरकार ने आज़म खान की रिहाई के लिए कोई विशेष राजनीतिक पहल की थी। इसलिए रिहाई को सीधे योगी सरकार की मेहरबानी का परिणाम बताना जल्दबाजी होगी। लेकिन चुनाव से ठीक पहले उनकी रिहाई कुछ तो संदेश दे रही थी।

क्या आज़म की रिहाई से ध्रुवीकरण की तैयारी थी?

आज़म खान उत्तर प्रदेश की राजनीति में केवल एक वरिष्ठ विपक्षी नेता नहीं हैं। रामपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी राजनीतिक मौजूदगी, मुस्लिम मतदाताओं के बीच उनकी पहचान और सपा के साथ उनका लंबा जुड़ाव उन्हें चुनावी विमर्श का महत्वपूर्ण चेहरा बनाते हैं। ऐसे में जेल से उनकी रिहाई का राजनीतिक असर होना स्वाभाविक है।

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि चुनाव से पहले आज़म खान की रिहाई सपा को मुस्लिम मतदाताओं के बीच सहानुभूति और एकजुटता का अवसर दे सकती थी। इसके उलट, भाजपा के लिए यह घटनाक्रम विपक्ष के कथित तुष्टीकरण और कानून-व्यवस्था के सवालों को उठाने का मौका बन सकता था। ऐसे में ध्रुवीकरण का फायदा निश्चित रूप से भाजपा के पक्ष में जाता। क्योंकि आज़म खान की रिहाई के बाद उनकी राजनीतिक सक्रियता बढ़ने की संभावना थी, जिसे केंद्रीय एजेंसी ने फिलहाल खत्म कर दिया है। ऐसे में अब समाजवादी पार्टी विक्टिम कार्ड खेलकर यूपी चुनाव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए सियासी हलचल पैदा कर सकती है।

ईडी की कार्रवाई: जांच का अधिकार या राजनीतिक संदेश?

आज़म खान की गिरफ्तारी का समय राजनीतिक सवालों को और तीखा करता है। जेल से बाहर आने के कुछ ही मिनट बाद ईडी की टीम ने उन्हें गिरफ्तार किया। अगले दिन उन्हें गाजियाबाद की विशेष पीएमएलए अदालत में पेश किया गया, जिसने 14 दिन की न्यायिक हिरासत का आदेश दिया। ईडी ने पूछताछ के लिए रिमांड मांगी थी, लेकिन अदालत का आदेश न्यायिक हिरासत का था। ईडी का मामला जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण और उससे जुड़े धन के स्रोतों की जांच से संबंधित है। एजेंसी की जांच में विश्वविद्यालय के निर्माण पर हुए खर्च और ट्रस्ट की ओर से घोषित पूंजीगत व्यय के बीच अंतर की पड़ताल की जा रही है। यह जांच का वैध विषय है और किसी भी राजनीतिक नेता को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता।

लेकिन जांच एजेंसी की कार्रवाई का समय, गिरफ्तारी की परिस्थितियां और लंबे समय से चल रही जांच की प्रगति सार्वजनिक समीक्षा के विषय भी हैं। यहां मूल प्रश्न केवल यह नहीं है कि ईडी को कार्रवाई का अधिकार था या नहीं? सवाल यह भी है कि क्या इस कार्रवाई की समय-सारणी और सार्वजनिक प्रस्तुति ने इसे एक राजनीतिक संदेश में बदल दिया? जिसे सीधे सियासी विमर्श में केंद्र और राज्य नेतृत्व के बीच टकराव के रूप में पेश करने का मौका मिला है।

वह भी ऐसे समय में जब आज़म खान की रिहाई के बाद उनकी राजनीतिक सक्रियता बढ़ने की संभावना थी। क्योंकि, आज़म रिहा होकर यूपी सरकार को निशाने पर लेते और योगी आदित्यनाथ चुनाव में इसे ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल करते। भले ही यह संभावित राजनीतिक परिदृश्य है, लेकिन योगी आदित्यनाथ के लिए यह खुलकर सियासी बैटिंग करने की मजबूत पिच जरूर तैयार हो जाती।

केंद्र बनाम यूपी: क्या भाजपा के भीतर अलग सियासी प्राथमिकताएं?

उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार और केंद्र में भाजपा नेतृत्व होने के बावजूद राज्य और केंद्र की राजनीतिक प्राथमिकताएं हमेशा एक जैसी हों, यह जरूरी नहीं। आगामी विधानसभा चुनाव के संदर्भ में योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक रणनीति और केंद्रीय नेतृत्व की चुनावी प्राथमिकताओं के बीच संभावित अंतर की चर्चा हो सकती है। लेकिन आज़म खान के मामले को केंद्र और राज्य के बीच किसी प्रमाणित टकराव का उदाहरण मानने से पहले यह देखना होगा कि दोनों सरकारों और संबंधित एजेंसियों ने वास्तव में क्या कदम उठाए।

ईडी की जांच पहले से चल रही थी और आज़म खान की गिरफ्तारी उसी मामले में हुई। इसलिए केवल गिरफ्तारी के समय को केंद्र और राज्य के बीच टकराव का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। फिर भी, राजनीतिक दृष्टि से यह घटनाक्रम एक असहज स्थिति जरूर पैदा करता है। यदि आज़म खान की रिहाई से चुनाव में योगी आदित्यनाथ को राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना थी, तो ईडी की कार्रवाई ने सपा को विक्टिम कार्ड थमाकर उस संभावित लाभ को तत्काल सीमित कर दिया। इससे भाजपा के भीतर केंद्र और राज्य की रणनीतियों के बीच किसी अदृश्य खींचतान की अटकलें तेज हो सकती हैं।

वैसे फिलहाल इस घटनाक्रम को भाजपा के भीतर टकराव के रूप में देखने के बजाय एक ऐसे राजनीतिक सवाल के रूप में देखना अधिक उचित होगा, जिसकी पुष्टि आगे की घटनाओं से ही हो सकती है।

आज़म जेल से बाहर रहते तो क्या बदल जाता यूपी का चुनाव?

यह इस कहानी का दूसरा पहलू है। आज़म खान की गिरफ्तारी का सबसे बड़ा राजनीतिक असर सपा के भीतर और उसके मुस्लिम मतदाता आधार के बीच पड़ सकता है। वह केवल रामपुर के नेता नहीं हैं। पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल आज़म खान लंबे समय तक सपा के सबसे प्रभावशाली मुस्लिम चेहरों में गिने जाते रहे हैं। उनके जेल से बाहर रहने की स्थिति में पार्टी को चुनाव से पहले एक ऐसा नेता मिल सकता था, जिसकी राजनीतिक पहचान और संगठनात्मक पहुंच पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अब भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

अगर आज़म खान 2027 के चुनाव प्रचार के दौरान जेल से बाहर रहते, तो सपा को कम से कम तीन स्तरों पर उनका राजनीतिक लाभ मिल सकता था।

मुस्लिम नेतृत्व का संदेश: आज़म खान की मौजूदगी से सपा यह संदेश दे सकती थी कि पार्टी में मुस्लिम नेताओं की भूमिका केवल चुनावी समर्थन तक सीमित नहीं है।

पश्चिमी यूपी में संगठनात्मक प्रभाव: रामपुर और आसपास के जिलों में आज़म खान के पुराने समर्थकों को सक्रिय करने में उनकी भूमिका हो सकती थी।

अखिलेश के लिए राजनीतिक संवाद: आज़म खान की सभाएं और बयान सपा के मुस्लिम मतदाताओं के बीच संवाद का एक अलग मंच बन सकते थे।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं कि आज़म खान की मौजूदगी से मुस्लिम वोट अपने आप सपा के पक्ष में एकजुट हो जाते। रामपुर की राजनीति में भी पिछले कुछ वर्षों में समीकरण बदले हैं। आज़म खान की राजनीतिक ताकत महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन उसे असीमित नहीं माना जा सकता।

ओवैसी के नैरेटिव को कैसे मिल सकती थी चुनौती?

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी लगातार यह सवाल उठाते रहे हैं कि मुस्लिम मतदाता दूसरे दलों को समर्थन तो देते हैं, लेकिन सत्ता और नेतृत्व में उन्हें अपेक्षित हिस्सेदारी नहीं मिलती। अक्टूबर में ओवैसी की रामपुर यात्रा और अखिलेश यादव पर उनके हमलों ने इस बहस को और तेज किया। यहीं आज़म खान की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि वह जेल से बाहर रहकर सपा के मंच से सक्रिय होते, तो अखिलेश यादव के पास ओवैसी के आरोपों का राजनीतिक जवाब देने के लिए एक बड़ा उदाहरण होता। सपा यह दिखा सकती थी कि आज़म खान जैसे वरिष्ठ मुस्लिम नेता पार्टी के भीतर अहम स्थान रखते हैं और उनकी राय को महत्व दिया जाता है।

लेकिन ओवैसी के नैरेटिव को चुनौती देना सिर्फ आज़म खान को मंच पर लाने से संभव नहीं होता। इसके लिए टिकट वितरण, संगठन में मुस्लिम नेताओं की भागीदारी, विधानसभा और सरकार में प्रतिनिधित्व तथा स्थानीय मुद्दों पर पार्टी की स्पष्ट नीति भी जरूरी होगी। इसलिए आज़म खान की अनुपस्थिति को सपा के लिए एक राजनीतिक चुनौती तो माना जा सकता है, लेकिन इसे ओवैसी के लिए निश्चित चुनावी लाभ कहना भी जल्दबाजी होगी। मुस्लिम मतदाताओं का व्यवहार केवल एक नेता की मौजूदगी या अनुपस्थिति से तय नहीं होता।

आज़म के साथ-साथ मुस्लिम नेतृत्व को भरोसा

22 अक्टूबर को अखिलेश यादव ने रामपुर जेल में आज़म खान से मुलाकात की थी। मुलाकात के बाद उनका बयान- ‘आजम थे, आजम हैं और आजम रहेंगे’—सिर्फ व्यक्तिगत सम्मान का संदेश नहीं था। चुनाव से पहले इसे पार्टी के मुस्लिम समर्थकों और आज़म के पुराने खेमे को भरोसा देने के प्रयास के रूप में भी देखा गया। इस मुलाकात का संगठनात्मक पहलू भी था। पार्टी के भीतर आज़म खान की भूमिका और उनके समर्थकों की राजनीतिक स्थिति को लेकर पहले से चर्चाएं थीं। ऐसे में अखिलेश की मुलाकात का एक संदेश यह भी था कि आज़म खान को सपा के राजनीतिक ढांचे से अलग नहीं किया गया है।

सपा के सामने अब चुनौती यह होगी कि वह आज़म खान के पुराने समर्थकों को पार्टी के साथ जोड़े रखे और साथ ही नए मुस्लिम नेतृत्व को भी जगह दे। पार्टी को यह संतुलन बनाना होगा कि आज़म खान का राजनीतिक सम्मान बना रहे, लेकिन स्थानीय स्तर पर दूसरे नेताओं की महत्वाकांक्षाएं और संगठन की जरूरतें भी नजरअंदाज न हों।

असली सवाल: आज़म की कानूनी लड़ाई या सियासी?

आज़म खान की रिहाई और तत्काल गिरफ्तारी के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उनकी कानूनी लड़ाई अब राजनीतिक प्रतीक की लड़ाई बन गई है? उनके समर्थक इसे विपक्षी नेता को निशाना बनाने की कार्रवाई बता रहे हैं, जबकि भाजपा के नेताओं का कहना है कि कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है। दोनों पक्षों के दावों की जांच जरूरी है।

आज़म खान ने जेल के बाहर अपनी गिरफ्तारी को मुस्लिम होने और विश्वविद्यालय बनाने की सजा बताया। यह उनका आरोप है। दूसरी ओर, ईडी की कार्रवाई का आधार जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े वित्तीय लेन-देन की जांच है। इन दोनों दावों के बीच अंतर करना जरूरी है- किसी जांच का होना अपने आप में राजनीतिक प्रतिशोध का प्रमाण नहीं, और किसी एजेंसी की कार्रवाई का कानूनी आधार होना अपने आप में उसकी निष्पक्षता का अंतिम प्रमाण भी नहीं।

आज़म खान के मामले में एक साथ तीन स्तरों पर सवाल उठते हैं- न्यायिक प्रक्रिया, केंद्रीय जांच एजेंसी की जवाबदेही और चुनावी राजनीति। यदि ईडी के पास पर्याप्त साक्ष्य हैं, तो उन्हें अदालत में परखा जाना चाहिए। यदि कार्रवाई राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित है, तो उसका प्रमाण भी सामने आना चाहिए। और यदि राज्य सरकार ने रिहाई की प्रक्रिया में कोई विशेष भूमिका निभाई है, तो उसकी प्रकृति और आधार सार्वजनिक होने चाहिए।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि आज़म खान की एक मामले में जमानत ने उन्हें जेल से बाहर निकाला, लेकिन दूसरे मामले में ईडी की गिरफ्तारी ने उनकी स्वतंत्रता फिर सीमित कर दी। यह घटनाक्रम उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में एक नया प्रतीक बन सकता है, जिसकी सहानुभूति समाजवादी पार्टी के पक्ष में जा सकती है। हालांकि, इसका चुनावी असर किस दिशा में जाएगा, यह अभी तय नहीं है।

फिलहाल की स्थिति को देखकर यह सवाल उठ रहा है- क्या आज़म खान केंद्र और यूपी की राजनीति के बीच फंस गए हैं? लेकिन इस सवाल का जवाब केवल सियासी बहस में नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया और जांच एजेंसियों की निष्पक्षता की कसौटी पर भी तलाशना होगा। सियासी पंडितों की नजर में शायद यही बात केंद्र की ढाल और चाल दोनों है- लेकिन इस निष्कर्ष को प्रमाणित तथ्य मानने के बजाय राजनीतिक विश्लेषण के दायरे में ही रखना चाहिए।