काकरोच जनता पार्टी से संतुलन के संकट में विपक्ष

मुद्दों पर साथ पर नेतृत्व के खिलाफ

सुजीत ठाकुर, नई दिल्ली।
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सीजेपी के प्रदर्शन ने लंबे अरसे के बाद विपक्ष में जान फूंक दी है। सरकार के खिलाफ एक माहौल बनता दिख तो रहा है लेकिन मुद्दों से आगे काकरोच जनता पार्टी से संतुलन साधने में विपक्ष डगमग है। मुद्दों का नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे हैं, इंडिया ब्लॉक कर रहा है या फिर अन्ना आंदोलन से जैसे आम आदमी पार्टी बनी उसकी की एक बार फिर पुनरावृत्ति होगी! यह स्पष्ट नहीं है।

भाजपा, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं से बाचतीत में सिर्फ एक बात साफ होती है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से हासिल ताकत के बाद सीजेपी के इस आंदोलन ने देश भर में सियासी चर्चा का महौल तो बना दिया है। आगे क्या इस पर सबकी अलग-अलग राय है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि सीजेपी दरअसल आम आदमी पार्टी का ही एक छद्म रूप है। इसके नेता आप से जुड़े रहे हैं। फंडिंग से लेकर बांकी सभी ट्रेंड कमोवेश उसी रूप में हैं जो आम आदमी पार्टी के ट्रेंड रहे हैं। चूंकि आम आदमी पार्टी की विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है। ऐसे में उसके पर्दे के पीछे छिपे लोग काकरोच जनता पार्टी के छद्म रूप से सामने आने लगे हैं। अराजकता फैला कर गुमराह और सरकार को बदनाम करने की कोशिश फिर से की जा रही है।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल के नेताओं का कहना है कि, जो मुद्दे सीजेपी उठा रही है वह सभी मुद्दे कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल लंबे समय से उठा रहे हैं। हां अब उन मुद्दों को छात्र, जेन-जी और युवाओं ने एक आंदोलन बना दिया है जो निर्णायक स्थित में जा रही है। ऐसे में कांग्रेस और विपक्ष इस आंदोलन में हर तरह से समर्थन दे रहे हैं। सिर्फ बयानबाजी से नहीं बल्कि सड़कों पर उतर कर।

तो क्या सीजेपी आने वाले समय में एक अलग सियासी दल के रूप में सामने आएगी? ऐसा होना विपक्ष के लिए अनुकूल होगा? कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि यह तो सीजेपी को तय करना है। इसको लेकर कुछ कहना उचित नहीं होगा। हां इतना जरूर है कि जो मुद्दे सीजेपी उठा रही है, वह विपक्षी दल के उठाए गए मुद्दे को ताकत दे रही है। कांग्रेस या विपक्षी दल के लिए यह मुद्दा नहीं है कि सीजेपी चुनाव में आएगी या नहीं मुद्दा यह है कि, संविधान बचाने, वोट चोरी रोकने में सभी एक साथ आ रहे हैं यह बड़ी बात है। समान विचार वाले दल चुनाव पूर्व और बाद में साथ आते हैं और आते रहे हैं। दिल्ली में कांग्रेस और आप ने मिल कर सरकार बनाई थी। लेफ्ट और भाजपा कांग्रेस को हटाने के लिए साथ आई थी। भाजपा को हटाने के लिए लेफ्ट-कांग्रेस और अन्य दल साथ आए थे। इन सब घटनाओं का केंद्र एक ही है बड़े लक्ष्य के लिए विरोधी साथी बनते हैं।