
तहलका ब्यूरो।
नई दिल्ली/सोमनाथ, 11 मई। सोमनाथ की पावन धरती से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की वैचारिक दिशा को लेकर एक गंभीर विमर्श छेड़ा है। सोमवार को सोमनाथ अमृत महोत्सव को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि आजादी के इतने दशकों बाद भी देश में कुछ ऐसी शक्तियां सक्रिय हैं, जो राष्ट्रीय स्वाभिमान के ऊपर तुष्टीकरण की राजनीति को तरजीह देती हैं। प्रधानमंत्री का यह वक्तव्य केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना के दमन की ऐतिहासिक कोशिशों और वर्तमान चुनौतियों का एक गहरा विश्लेषण है।

तुष्टीकरण बनाम आत्मसम्मान: सोमनाथ की धरा से प्रधानमंत्री का कड़ा संदेश…Pic Source: Narendra Modi/ Facebook
प्रधानमंत्री ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए स्मरण कराया कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण केवल एक मंदिर का निर्माण नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत की चेतना का उद्घोष था। उन्होंने सरदार वल्लभभाई पटेल और देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के दृढ़ संकल्पों का उल्लेख करते हुए बताया कि किस तरह उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस पावन कार्य का विरोध किया था।
मोदी के अनुसार, जो मानसिकता सोमनाथ के समय बाधा बनी थी, वही संकीर्णता अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के दौरान भी मुखर होकर सामने आई। यह दर्शाता है कि एक विशिष्ट राजनीतिक विचारधारा ने हमेशा से भारत के गौरवशाली प्रतीकों की अनदेखी की है।

विरासत का विजयघोष: सोमनाथ की धरा से ‘आत्मसम्मान’ की नई परिभाषा…Pic Source: Narendra Modi/ Facebook
11 मई की ऐतिहासिक प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए प्रधानमंत्री ने इसे भारत की सामर्थ्य का दिन बताया। 1998 में इसी तिथि को हुए परमाणु परीक्षणों का जिक्र करते हुए उन्होंने संदेश दिया कि भारत अब किसी भी वैश्विक दबाव के सामने झुकने वाला राष्ट्र नहीं है।
उनके संबोधन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि विदेशी आक्रांताओं ने हमेशा भारत की राष्ट्रीय पहचान पर प्रहार किया, लेकिन भारतीय जनमानस ने हर बार अपनी विरासत को बहाल कर अपनी गरिमा को सुरक्षित रखा। प्रधानमंत्री ने सचेत किया कि सांस्कृतिक केंद्रों की उपेक्षा ने ही लंबे समय तक देश की प्रगति की राह रोकी है।

सोमनाथ मंदिर का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि लुटेरे इसे मात्र एक ढांचा समझकर बार-बार ध्वस्त करते रहे, परंतु हर बार यह मंदिर अपनी राख से पुनर्जीवित होकर खड़ा हुआ। मोदी ने जोर देकर कहा कि विरासत और आधुनिकता का संतुलन ही अगले एक हजार वर्षों के भारत की नींव रखेगा। सोमनाथ में किए गए अनुष्ठान और विशेष डाक टिकट जारी करना महज एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि उस मानसिकता के विरुद्ध एक सांस्कृतिक प्रतिरोध है जो राष्ट्र के आत्मसम्मान को तुष्टीकरण की भेंट चढ़ाना चाहती है।



