नीलेश माथुर
भारत की ब्रिक्स के साथ अधिक सक्रिय भागीदारी ऐसे समय में हो रही है जब वह अमेरिका, यूरोप, रूस, चीन और अन्य शक्ति केंद्रों के साथ अपने संबंध भी बनाए हुए है। विशेषज्ञों का कहना है कि उद्देश्य किसी एक खेमे को चुनना नहीं, बल्कि अधिक विकल्प उपलब्ध रखते हुए
रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना है।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रोफेसर प्रो. राजन कुमार कहते हैं कि युद्धों और बदलती अमेरिकी व्यापार नीतियों, जिनमें कई देशों पर लगाए गए टैरिफ भी शामिल हैं, से पैदा हुई अनिश्चितता के बीच ब्रिक्स को लेकर भारत का रुख अधिक सक्रिय हुआ है।
‘इस समय भारत के अमेरिका के साथ संबंध बाधित हुए हैं। इसलिए भारत के पास बहुत अधिक विकल्प नहीं हैं और उसे विकल्प तलाशने होंगे,’ कुमार कहते हैं। ‘भारत केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं रह सकता। ऐसे में ब्रिक्स एक ऐसा मंच बन गया है, जिसके जरिए भारत दूसरे देशों के साथ मिलकर अमेरिका और सामान्य रूप से पश्चिम को एक मजबूत संदेश दे सकता है।’
लेकिन कुमार भारत की विदेश नीति के संदर्भ में इसका एक महत्वपूर्ण अंतर भी स्पष्ट करते हैं।
‘भारत ब्रिक्स को एक गैर-पश्चिमी संगठन मानता है, पश्चिम-विरोधी संगठन नहीं,’ वे कहते हैं और जोड़ते हैं कि भारत को पश्चिम के साथ भी जुड़ाव जारी रखना होगा।
यह अंतर भारत की ब्रिक्स में भागीदारी को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। नई दिल्ली के लिए ब्रिक्स हर दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंच का विकल्प नहीं, बल्कि उन कई माध्यमों में से एक है, जिनके जरिए वह कई शक्ति केंद्रों के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपने हितों को आगे बढ़ा सकता है।
बदलती दुनिया में सामूहिक शक्ति
ब्रिक्स के विस्तार ने समूह के सामूहिक वजन में उल्लेखनीय वृद्धि की है।
जेएनयू के स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज के पूर्व डीन और सेवानिवृत्त प्रोफेसर प्रो. अजय कुमार पटनायक कहते हैं कि विस्तार के बाद वैश्विक जीडीपी, आबादी और व्यापार में ब्रिक्स की हिस्सेदारी बढ़ी है। सऊदी अरब, रूस और वअए जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों की मौजूदगी ने समूह के ऊर्जा संबंधी वजन को भी बढ़ाया है।
‘ब्रिक्स ने वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण वजन और वैधता हासिल की है। इस समूह को नज़रअंदाज करना मुश्किल है,’ पटनायक कहते हैं।
लेकिन उनके लिए यह वजन केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। बड़ी सदस्यता से व्यक्तिगत देशों को वह सामूहिक गुंजाइश मिलती है, जो अकेले काम करते हुए शायद उनके पास नहीं होती।
‘भले ही कोई देश अपेक्षाकृत कमजोर हो, वह अलग-थलग नहीं है। हम दूसरों से अलग नहीं हैं,’ वे कहते हैं।
वे दक्षिण अफ्रीका का उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि ब्रिक्स की सदस्यता का अर्थ यह है कि किसी विवादास्पद अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर रुख अपनाने वाला देश ज़रूरी नहीं कि अलग-थलग पड़ जाए, क्योंकि दूसरे देश उसके साथ खड़े हो सकते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रिक्स किसी देश की कमजोरियों को खत्म कर देता है। बल्कि सामूहिक सदस्यता देशों को एक अतिरिक्त कूटनीतिक और आर्थिक मंच देती है, जिसके जरिए वे ऐसे रुख अपना सकते हैं जिन्हें अकेले कायम रखना कठिन हो सकता है।
पटनायक अमेरिका के दबाव का सामना कर रहे देशों के संदर्भ में भी इसी तर्क को सामने रखते हैं।
‘कई देश जो अमेरिका के दबाव में नहीं रहना चाहते, वे अकेले उसका सामना नहीं कर सकते। ब्रिक्स एक ऐसा मंच है, जो उन्हें इस तरह के दबावों से कुछ हद तक सुरक्षा दे सकता है,’ वे कहते हैं।
बाहरी दबाव से वैकल्पिक आर्थिक तंत्र तक
ब्रिक्स को लेकर बातचीत में एक प्रमुख चिंता आर्थिक और वित्तीय प्रणालियों के इस्तेमाल को भू-राजनीतिक दबाव के साधन के रूप में लेकर है।
पटनायक टैरिफ, प्रतिबंध, विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज किए जाने और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कमजोरी के स्रोत के रूप में देखते हैं।
‘ब्रिक्स के देश अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता से पैदा होने वाली समस्याओं को समझते हैं। अमेरिका व्यापार रोक सकता है, विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज कर सकता है और दबाव डाल सकता है,’ पटनायक कहते हैं।
वे मौजूदा इंटरबैंक व्यवस्थाओं के विकल्प विकसित करने और राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने के प्रयासों का उल्लेख करते हैं।
‘अगर आपको व्यापार के लिए अमेरिकी मुद्रा की ज़रूरत नहीं है, तो अमेरिका के पास आप पर दबाव डालने की क्षमता कम हो जाती है,’ वे कहते हैं। वे भारत और रूस के बीच स्थानीय मुद्रा में व्यापार को इसका एक उदाहरण मानते हैं।
इसका उद्देश्य ज़रूरी नहीं कि मौजूदा वित्तीय व्यवस्था को खत्म करना हो, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि देशों के पास विकल्प मौजूद रहें।
कुमार यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के अनुभव को ग्लोबल साउथ के दूसरे देशों की सोच में आए बदलाव का एक महत्वपूर्ण कारण मानते हैं। रूसी संपत्तियां फ्रीज की गईं और रूस को रहकऋळ वित्तीय संदेश प्रणाली से बाहर कर दिया गया। इससे दूसरे देशों में भी यह चिंता पैदा हुई कि वे भविष्य में इसी तरह की कमजोरियों का सामना कर सकते हैं।
‘ब्रिक्स के किसी भी प्रमुख मूल सदस्य ने रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों में हिस्सा नहीं लिया। आज ज्यादातर ब्रिक्स देश एकतरफा प्रतिबंधों को स्वीकार नहीं किए जाने की बात भी जोरदार तरीके से कहते हैं,’ कुमार कहते हैं। कुमार इसे मौजूदा वैश्विक संस्थाओं को खत्म करने की कोशिश के रूप में नहीं देखते। ब्रिक्स की संस्थाएं अभी कटऋ और विश्व बैंक की तुलना में काफी छोटी हैं। वे इसे ‘समानांतर संस्थागतकरण’ कहते हैं — यानी मौजूदा संस्थाओं में बने रहना, उनमें सुधार की माँग करना और साथ ही वैकल्पिक संस्थाएं विकसित करना।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता: कई दरवाजे खुले रखना
भारत के लिए यह व्यापक आर्थिक और कूटनीतिक गुंजाइश रणनीतिक स्वायत्तता से गहराई से जुड़ी है।
पटनायक का कहना है कि रणनीतिक स्वायत्तता तब प्रदर्शित होती है जब कोई देश किसी बड़ी शक्ति के दबाव से बचने में सक्षम हो। वे ब्रिक्स के भीतर भारत की स्थिति की तुलना अमेरिका और पश्चिम के साथ उसके संबंधों से करते हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि ब्रिक्स के सदस्य देशों के साथ भारत के कोई मतभेद नहीं हैं। सबसे स्पष्ट उदाहरण चीन है।
लेकिन पटनायक का कहना है कि द्विपक्षीय मतभेद उन क्षेत्रों में सहयोग को नहीं रोकते जहां देशों के हित मिलते हैं।
‘अंतत: चीन और भारत को सीमा विवाद का समाधान द्विपक्षीय स्तर पर ही करना होगा। लेकिन बहुपक्षीय मंचों पर उन्हें कई अन्य मुद्दों — जलवायु परिवर्तन, तकनीक, ऊर्जा और संयुक्त राष्ट्र में सुधार सहित — पर सहमति बनाने का अवसर मिलता है,’ वे कहते हैं।
कुमार भी भारत-चीन संबंधों को लेन-देन पर आधारित बताते हैं। भारत को अब भी चीनी उत्पादों और कुछ मामलों में चीनी निवेश की ज़रूरत है, जबकि सीमा विवाद भी जारी है।
‘एक समानांतर ट्रैक बना रहेगा, जिसमें भारत सीमा संबंधी मुद्दों से निपटता रहेगा और साथ ही वैश्विक परिस्थितियों के कारण चीन के साथ आर्थिक जुड़ाव भी बनाए रखेगा,’ वे कहते हैं।
इसी समय भारत रूस के साथ अपने संबंध और अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों के साथ अपना जुड़ाव भी जारी रखता है।
यहीं ब्रिक्स भारत की व्यापक रणनीति में फिट होता है: यह उसके दूसरे संबंधों का विकल्प नहीं, बल्कि कई ऐसे मंचों में से एक है, जिनके जरिए वह अपने हितों को आगे बढ़ा सकता है।
चीन का वजन और ब्रिक्स में उसका हित
ब्रिक्स के भीतर चीन का विशाल आर्थिक वजन निर्विवाद है।
कुमार कहते हैं कि चीन आर्थिक रूप से सबसे प्रभावशाली है, लेकिन वे यह नहीं मानते कि इसका अर्थ अपने आप समूह पर चीन का प्रभुत्व हो जाना है।
‘इसमें कोई संदेह नहीं कि चीन आर्थिक रूप से प्रभावशाली है,’ वे कहते हैं।
कुमार के अनुसार, चीन ब्रिक्स का इस्तेमाल राजनीतिक संवाद, दूसरे ब्रिक्स देशों के साथ व्यापार बढ़ाने और पश्चिम तथा ॠ7 के प्रभुत्व को संतुलित करने के लिए करता है।
यह महत्वपूर्ण है क्योंकि अलग-अलग देश एक ही संस्था का समर्थन अलग-अलग कारणों से कर सकते हैं।
भारत का उद्देश्य रणनीतिक स्वायत्तता और ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज़ है। चीन की अपनी प्राथमिकताएं हैं, जिनमें अपना प्रभाव बढ़ाना और पश्चिमी प्रभुत्व को संतुलित करना शामिल है। दूसरे देशों के भी अपने आर्थिक, राजनीतिक और कूटनीतिक हित हैं।
उन्हें ब्रिक्स में साझा जमीन तलाशने के लिए इन सभी उद्देश्यों पर एकमत होने की ज़रूरत नहीं है।
भारत की रणनीतिक समीकरण में रूस
रूस की स्थिति इस जटिल संबंधों के नेटवर्क में एक और परत जोड़ती है।
कुमार कहते हैं कि रूस के चीन के साथ संबंध काफी मजबूत हुए हैं, लेकिन इससे भारत के साथ उसका रणनीतिक संबंध खत्म नहीं हुआ है।
2020 के पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन सीमा संकट के दौरान रूस ने भारत के साथ रक्षा सहयोग जारी रखा। नई दिल्ली ने उस समय र-400 एयर डिफेंस सिस्टम की डिलीवरी जल्द करने का अनुरोध किया था और मॉस्को ने भारत को आश्वासन दिया था कि जारी रक्षा अनुबंधों को तय कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ाया जाएगा।
‘यह दिखाता है कि भले ही रूस चीन के करीब आया है, रूस यह मानता है कि चीन के साथ उसके संबंध भारत के खिलाफ नहीं हैं। उसी तरह अमेरिका के साथ भारत के संबंध भी चीन या रूस के खिलाफ नहीं हैं,’ कुमार कहते हैं।
पटनायक भी रूस को भारत और चीन के बीच संभावित पुल की भूमिका में देखते हैं।
व्यापक बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध ज़रूरी नहीं कि स्थायी खेमों के रूप में काम करें। देश एक क्षेत्र में सहयोग, दूसरे में प्रतिस्पर्धा और साथ ही अलग-अलग द्विपक्षीय संबंध बनाए रख सकते हैं।
ऐसा मंच जहां मतभेदों का खत्म होना ज़रूरी नहीं
अलग-अलग हितों वाले देशों को एक साथ लाने की ब्रिक्स की क्षमता डॉ. मनोज कुमार मिश्रा, प्रोफेसर एवं कोआॅर्डिनेटर, मालवीय सेंटर फॉर पीस रिसर्च, सामाजिक विज्ञान संकाय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी, के आकलन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मिश्रा का कहना है कि विस्तारित समूह की विविधता किसी एक रणनीतिक एजेंडे को बनाना मुश्किल बनाती है। लेकिन वे इसी विविधता को संवाद के अवसर के रूप में देखते हैं।
उनके अनुसार, ब्रिक्स की ताकत ‘रणनीतिक एकरूपता में कम और विविध शक्तियों के बीच संवाद के लिए एक स्थान बनाने में अधिक’ हो सकती है।
मिश्रा कहते हैं कि ब्रिक्स से बड़ी शक्तियों के बीच भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा खत्म करने की उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन यह एक अतिरिक्त कूटनीतिक माध्यम उपलब्ध करा सकता है, संवाद को बढ़ावा दे सकता है, संप्रभुता और शांतिपूर्ण समाधान के सम्मान को प्रोत्साहित कर सकता है और अलग-अलग हितों वाले देशों को बातचीत का अवसर दे सकता है।
इसलिए इसका योगदान बड़े शक्ति संघर्षों को सीधे हल करने की तुलना में संघर्ष प्रबंधन और विश्वास निर्माण में अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
‘शांति निर्माण के लिए हमेशा पूर्ण सहमति ज़रूरी नहीं होती,’ मिश्रा कहते हैं। इसकी शुरुआत संवाद बनाए रखने, साझा हितों की पहचान करने, अविश्वास कम करने और शांतिपूर्ण जुड़ाव के तंत्र विकसित करने से हो सकती है।
ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज़
ब्रिक्स का रणनीतिक महत्व केवल बड़ी शक्तियों के आपसी संबंधों तक सीमित नहीं है।
पटनायक के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र, कटऋ, विश्व बैंक और हळड में सुधार जैसे मुद्दों पर ब्रिक्स महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि समूह मौजूदा संस्थाओं को खत्म करना नहीं चाहता, बल्कि ऐसे सुधार चाहता है जो अधिक बहुध्रुवीय दुनिया को प्रतिबिंबित करें और ग्लोबल साउथ को मजबूत आवाज़ दें।
वॉक्सन यूनिवर्सिटी में स्कूल आॅफ लिबरल आर्ट्स एंड ह्यूमैनिटीज की एसोसिएट डीन और प्रोफेसर प्रो. पारिवेलन के.एम. कहते हैं कि ब्रिक्स का विस्तार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे विकासशील देशों को कहीं और बनाए गए नियमों का केवल पालन करने के बजाय उन्हें बनाने में भाग लेने का अधिक अवसर मिलता है।
वे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों के अधिक प्रतिनिधित्व, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार, वैश्विक आर्थिक नियम बनाने में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की अधिक भूमिका और अधिक न्यायपूर्ण वित्तीय व्यवस्थाओं की माँगों का उल्लेख करते हैं।
इस नजरिए से ब्रिक्स केवल आर्थिक समूह या भू-राजनीतिक मंच नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को संचालित करने वाली संस्थाओं में अधिक बड़ी आवाज़ हासिल करने की ग्लोबल साउथ की कोशिश का भी हिस्सा है।
भू–राजनीतिक वजन से विकास तक
हालांकि पारिवेलन के लिए केवल राजनीतिक प्रभाव ब्रिक्स के महत्व का अंतिम पैमाना नहीं हो सकता।
वे जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य, शिक्षा, तकनीक, खाद्य सुरक्षा, आपदा से निपटने की क्षमता और सतत विकास में सहयोग की ओर इशारा करते हैं।
न्यू डेवलपमेंट बैंक इस प्रयास का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जबकि स्वास्थ्य सहयोग और जलवायु वित्त ऐसे क्षेत्र हैं जहां राजनीतिक घोषणाओं को व्यावहारिक सहयोग में बदला जा सकता है।
पारिवेलन कहते हैं, ‘अधिक महत्वपूर्ण पैमाना यह है कि क्या मजबूत भू-राजनीतिक आवाज़ को ठोस विकास कार्रवाई और ऐसे परिणामों में बदला जा सकता है, जिन्हें मापा जा सके।’
मिश्रा भी मानव सुरक्षा के नजरिए से इसी तरह का तर्क देते हैं। जलवायु परिवर्तन, खाद्य और ऊर्जा असुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, विस्थापन, सतत विकास और मानवीय संकट राजनीतिक सीमाओं से परे असर डालते हैं।
उनके लिए इन क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग विश्वास पैदा कर सकता है और साझा हितों पर आधारित ऐसी ‘शांति अवसंरचना’ तैयार कर सकता है, जो रणनीतिक गठजोड़ के बजाय साझा हितों पर आधारित हो।
विविधता इसकी चुनौती भी है
जिस विस्तार ने ब्रिक्स को अधिक वजन दिया है, उसने समूह को अधिक जटिल भी बना दिया है।
कुमार इसे एक संतुलन के रूप में देखते हैं।
‘विस्तार के साथ ब्रिक्स निश्चित रूप से अधिक प्रतिनिधित्व वाला और अधिक लोकतांत्रिक बनता है। लेकिन चुनौती यह है कि इन देशों के साथ आने वाले मतभेदों को कैसे संभाला जाए,’ वे कहते हैं।
जब ब्रिक्स में पांच देश थे, तब सहमति बनाना अपेक्षाकृत आसान था। विस्तारित समूह ग्लोबल साउथ का अधिक प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन सदस्यों के बीच मतभेद सहमति बनाना कठिन बना सकते हैं।
पारिवेलन इस विरोधाभास को एक वाक्य में रखते हैं:
‘विविधता’ ब्रिक्स की ताकत भी है और उसकी सीमा भी!’
अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, विकास के स्तरों और विदेश नीति की प्राथमिकताओं के कारण समूह के एकल राजनीतिक या वैचारिक समुदाय बनने की संभावना कम है।
लेकिन विशेषज्ञ इस विविधता को ब्रिक्स के अप्रासंगिक होने का कारण नहीं मानते। बल्कि इससे यह तय होता है कि समूह वास्तव में क्या हासिल कर सकता है।
इसकी भूमिका एकरूपता पैदा करने से अधिक उन क्षेत्रों की पहचान करने में हो सकती है, जहां अलग-अलग देश मिलकर काम कर सकते हैं।
एक नए गठजोड़ के बजाय अधिक विकल्प
चारों विशेषज्ञ अंतत: ऐसे ब्रिक्स की ओर संकेत करते हैं, जिसका भारत के लिए महत्व रणनीतिक विकल्पों के विस्तार में है।
भारत अमेरिका और यूरोप के साथ जुड़ाव बनाए रख सकता है और साथ ही रूस के साथ अपने संबंध भी जारी रख सकता है। वह चीन के साथ मतभेदों को संभालते हुए उन क्षेत्रों में बीजिंग के साथ सहयोग कर सकता है जहां हित समान हैं। वह ॠ20, रउड और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों के साथ ब्रिक्स का भी उपयोग कर सकता है।
जो देश बाहरी आर्थिक या भू-राजनीतिक दबाव का सामना करते हैं, उनके लिए ब्रिक्स सामूहिक कूटनीतिक गुंजाइश और वैकल्पिक आर्थिक व्यवस्थाओं की संभावना उपलब्ध करा सकता है।
ग्लोबल साउथ के लिए यह अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की माँग उठाने का एक बड़ा मंच है। जिन देशों के बीच मतभेद हैं, उनके लिए यह लगातार संवाद बनाए रखने का एक मंच हो सकता है।
भारत के लिए इसका केंद्रीय आधार रणनीतिक स्वायत्तता है।
इस समय ब्रिक्स का मूल्यांकन ज़रूरी नहीं कि इस आधार पर किया जाए कि वह किसी दूसरे समूह की जगह लेता है या कोई नया भू-राजनीतिक खेमा बनाता है। इसका महत्व इस बात में हो सकता है कि क्या यह देशों को किसी एक शक्ति केंद्र पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना अपने विकल्प चुनने की अधिक गुंजाइश देता है।
जैसा कि पटनायक कहते हैं, ‘जैसे-जैसे ब्रिक्स दूसरे देशों तक विस्तार करेगा, उस तरह की सामूहिक शक्ति और बढ़ेगी।’
भारत के लिए यह सामूहिक गुंजाइश किसी एक संबंध को छोड़कर दूसरे को अपनाने के बारे में नहीं है। यह ऐसे समय में अधिक संबंध, अधिक संस्थागत मंच और अधिक आर्थिक तथा कूटनीतिक विकल्प रखने के बारे में है, जब दुनिया लगातार अधिक अनिश्चित होती जा रही है।




