तहलका ब्यूरो
सत्य निकेतन हॉस्टल की जर्जर बिल्डिंग के ढहने से सात लोगों की मौत की घटना अफसोसनाक है। इस घटना ने समाजसेवी, बिल्डरों, पुलिस और एमसीडी अधिकारियों की कथित मिलीभगत की तरफ फिर से ध्यान खींचा है। इस मिलीभगत के खेल के चलते ही दिल्ली के अनधिकृत इलाकों में अवैध निर्माण का धंधा खूब फल-फूल रहा है। खतरा वास्तविक है; दिल्ली में एक और सत्य निकेतन जैसी त्रासदी होने की आशंका बनी हुई है। सिर्फ एक-दो जगहों पर नहीं, बल्कि राजधानी के कई इलाकों में। जिस इमारत के ढहने का वीडियो वायरल होकर पूरे शहर में सनसनी और दहशत पैदा कर चुका है, उससे यह उजागर हो चुका है कि राजधानी के अनधिकृत इलाकों में अवैध निर्माण किस तरह लगातार फल-फूल रहा है। अक्सर प्रभावशाली लोग अपने फायदे के लिए ऐसे खतरों की ओर से जानबूझकर आँखें मूंदे रहते हैं।
अब जरा सोचिए, अगर हम आपसे कहें कि अवैध निर्माण के खिलाफ लड़ने का दावा करने वाले लोग ही वास्तव में उसके फलने-फूलने में मदद कर रहे हों तो? आप पूछेंगे- कैसे? तहलका की पड़ताल में सामने आया कि इसका जवाब बिल्डरों, समाजसेवियों और अधिकारियों के बीच
बने एक संदिग्ध गठजोड़ में छिपा है।
तहलका ने इस गठजोड़ की पड़ताल के लिए दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के ऐसे ही एक इलाके का दौरा करने का फैसला किया। यह इलाका कई पेइंग गेस्ट (पीजी) हॉस्टलों का भी केंद्र है, क्योंकि यह एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के नजदीक स्थित है। तहलका को पता चला कि इलाके में कुछ ऐसे समाजसेवी हैं, जो कथित तौर पर जनहित में काम करने वाली छोटी-छोटी गैर-सरकारी संस्थाएँ (एनजीओ) चलाते हैं, लेकिन आरोप है कि वे वास्तव में अपने निजी हितों के लिए काम कर रहे हैं। जब इलाके में कोई बिल्डर अवैध निर्माण करता है, तो ये समाजसेवी उसके खिलाफ अदालत का रुख करते हैं और निर्माण पर रोक लगाने के लिए स्थगन आदेश (स्टे) की माँग करते हैं।
लोगों को लग सकता है कि वे जनहित में काम कर रहे हैं। लेकिन सूत्र बताते हैं कि हकीकत में ऐसा नहीं है। आरोप है कि ये समाजसेवी अवैध निर्माण को रोकने के लिए नहीं, बल्कि ऐसे निर्माण में शामिल बिल्डरों से पैसे ऐंठने के लिए अदालत से निर्माण पर रोक लगाने का आदेश हासिल करने की कोशिश करते हैं। सूत्रों का कहना है कि दक्षिण-पूर्वी दिल्ली समेत राजधानी के कई अन्य हिस्सों में भी ऐसे कई समाजसेवी सक्रिय हैं, जो जनहित में अवैध निर्माण के खिलाफ अदालत का रुख नहीं करते, बल्कि आरोप है कि निर्माण में शामिल बिल्डरों से पैसे वसूलने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं।
आरोप है कि बिल्डर इन समाजसेवियों को पैसे देते हैं, जिसके बाद ये समाजसेवी अदालत से लिए गए स्थगन आदेश वापस ले लेते हैं, जबकि अदालतों को उनके इरादों की जानकारी नहीं होती। इसके परिणामस्वरूप, दिल्ली के अनधिकृत इलाकों में अवैध इमारतें लगातार तेजी से बढ़ती जा रही हैं। जिन समाजसेवियों का घोषित दायित्व अवैध निर्माण को रोकना है, वे कथित तौर पर पैसे के बदले उसे फलने-फूलने में मदद कर रहे हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ पुलिसकर्मी तथा एमसीडी अधिकारी भी इसमें उनकी मदद कर रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि सत्य निकेतन इलाके में हो रहा अवैध निर्माण भी ऐसे ही किसी गठजोड़ का नतीजा हो सकता है।
सत्य निकेतन की घटना से तीन महीने पहले तहलका ने समाजसेवियों और पुलिस के बीच कथित गठजोड़ की पड़ताल की थी। इस पड़ताल में खुलासा हुआ कि कुछ समाजसेवी, कुछ पुलिसकर्मियों और एमसीडी अधिकारियों की मदद से कथित तौर पर बिल्डरों से पैसे ऐंठने के लिए अदालत से हासिल स्थगन आदेशों का इस्तेमाल कर रहे हैं और बटला हाउस में अवैध निर्माण को फलने-फूलने दे रहे हैं। चूंकि इस पड़ताल के बाद कोई कार्रवाई नहीं हुई, इसलिए सत्य निकेतन में हाल ही में हुई इमारत ढहने की घटना और उसमें हुई मौतों को देखते हुए उस रिपोर्ट के कुछ हिस्सों को यहां पुन: प्रकाशित किया जा रहा है।
तहलका एसआईटी ने जिस इलाके का दौरा किया, वह दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के जामिया नगर स्थित बटला हाउस है। यह इलाका 2008 में भारतीय मुजाहिदीन (आईएम) नेटवर्क को निशाना बनाकर चलाए गए आतंकवाद-रोधी अभियान के दौरान हुए विवादास्पद पुलिस मुठभेड़ के बाद देशभर में चर्चित हो गया था। इस घटना ने देश की राजनीति में भारी उथल-पुथल मचा दी थी और जनमत को भी विभाजित कर दिया था।
आज यह इलाका अवैध निर्माण का गढ़ बन चुका है। यहां बटला हाउस के नजदीक स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों के लिए कई पीजी भी संचालित हो रहे हैं। कभी कुख्यात पुलिस मुठभेड़ के लिए जाना जाने वाला बटला हाउस अब अवैध निर्माण का केंद्र बन गया है, जहां ब्लैकमेल किए जाने के आरोप आम हैं। इलाके के लगभग हर कोने में छोटे स्तर के ऐसे समाजसेवी नज़र आ जाते हैं, जो कथित तौर पर अदालत के आदेशों का इस्तेमाल अवैध निर्माण में शामिल बिल्डरों पर दबाव बनाने और उनसे पैसे ऐंठने के लिए करते हैं। इससे इलाके में अवैध ढांचों को फलने-फूलने का रास्ता मिल रहा है। सूत्रों के अनुसार, आशंका है कि इसका नतीजा आगे चलकर सत्य निकेतन जैसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के रूप में सामने आ सकता है।
बटला हाउस में अवैध निर्माण से परिचित लोगों ने तहलका को बताया कि समाजसेवियों, पुलिस और एमसीडी अधिकारियों से जुड़ा एक गठजोड़ पूरे दिल्ली में फल-फूल रहा है, जबकि अवैध निर्माण लगातार बढ़ता जा रहा है। सूत्रों ने बताया कि सत्य निकेतन की घटना भी ऐसे ही किसी गठजोड़ का नतीजा हो सकती है।
दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली स्थित सत्य निकेतन भी छात्रों के लिए पेइंग गेस्ट (पीजी) सुविधाओं का एक प्रमुख केंद्र है। हाल ही में यहां इसी तरह की एक इमारत ढहने से कम से कम सात लोगों की मौत हो गई थी और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए थे। यह इलाका दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के नजदीक स्थित है, जिसके कारण यहां छात्रों के लिए बड़ी संख्या में पीजी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
अदालतों के माध्यम से ब्लैकमेल किए जाने के मुद्दे पर भारत की विभिन्न न्यायिक संस्थाओं ने बार-बार चेतावनी दी है कि जनहित याचिका (पीआईएल) जैसे पवित्र मंच का बढ़ते हुए ब्लैकमेल के एक साधन के रूप में दुरुपयोग किया जा रहा है, जिसका इस्तेमाल पैसे ऐंठने या किसी खास व्यक्ति अथवा परियोजना को निशाना बनाने के लिए किया जाता है। न्यायपालिका ने इस दुरुपयोग पर अंकुश लगाने के लिए कई न्यायिक उदाहरण पेश किए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में बुनियादी ढांचे तथा पुनर्विकास परियोजनाओं को निशाना बनाने के लिए अक्सर जनहित याचिकाओं (पीआईएल) का इस्तेमाल किया जाता है। कई बार ऐसा प्रतिस्पर्धियों के इशारे पर या जबरन वसूली के उद्देश्य से भी किया जाता है। अनधिकृत निर्माण से जुड़े मामलों में भी अदालतों के सामने ऐसी जनहित याचिकाएं आई हैं, जो देखने में अवैध निर्माण को चुनौती देने के लिए दायर की गईं, लेकिन कथित तौर पर उनका इस्तेमाल बिल्डरों पर दबाव बनाने और उनसे पैसे ऐंठने के लिए किया गया।
अदालतों ने ऐसे मामलों को जनहित की सेवा के बजाय बिल्डरों से पैसे ऐंठने की कोशिश के रूप में चिह्नित किया है। गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में एक याचिकाकर्ता पर 20 लाख रुपए का जुमार्ना लगाया, जिसने जेल के पास हो रहे निर्माण को गिराने की माँग करते हुए निजी लाभ के लिए जनहित याचिका (पीआईएल) की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया। दिल्ली हाईकोर्ट ने नागरिकों को ब्लैकमेल करने के लिए जनहित याचिका का इस्तेमाल करने वाले एक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) पर 10 लाख रुपए का जुमार्ना लगाया। सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई की एक पुनर्विकास परियोजना के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य से प्रेरित जनहित याचिका दायर करने पर एक सोसायटी पर लगाए गए एक लाख रुपये के जुमार्ने को बरकरार रखा।
ये उन कुछ टिप्पणियों के उदाहरण हैं, जिनमें अदालतों ने जनहित याचिकाओं (पीआईएल) का इस्तेमाल ब्लैकमेल करने और पैसे ऐंठने के लिए किए जाने पर चिंता व्यक्त की है।
जनहित याचिकाओं (पीआईएल) की तरह अदालत के स्थगन आदेशों का भी कुछ लोग ब्लैकमेल करने और पैसे ऐंठने के साधन के रूप में दुरुपयोग कर सकते हैं। अदालत का स्थगन आदेश एक न्यायिक निर्देश होता है, जिसके तहत चल रही कानूनी कार्यवाही को अस्थायी रूप से रोक दिया जाता है या स्थगित कर दिया जाता है। इसका उद्देश्य मामले की सुनवाई के दौरान मौजूदा स्थिति को बनाए रखना या यथास्थिति बरकरार रखना होता है।
बटला हाउस एक अनधिकृत इलाका है, जहां संपत्ति का पंजीकरण नहीं कराया जा सकता और लोग जनरल पावर आॅफ अटॉर्नी (जीपीए) के जरिए मकान खरीदते हैं। इसके बावजूद मुस्लिम आबादी से घना बटला हाउस एक बड़े आवासीय क्षेत्र के रूप में विकसित हो चुका है, जहां अपार्टमेंटों की कीमत करोड़ों रुपए तक पहुंचती है। बटला हाउस में हमारी पड़ताल से पता चलता है कि कुछ गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) और व्यक्ति इलाके में अवैध निर्माण के संबंध में अदालत के स्थगन आदेश का इस्तेमाल बिल्डरों को ब्लैकमेल करने और उनसे पैसे ऐंठने के एक हथियार के रूप में कर रहे हैं। इलाके के किसी भी बिल्डर से बात कर लीजिए, वह आपको इस बारे में बता देगा।
तहलका ने इलाके के कुछ ऐसे लोगों से बात की, जिन्होंने दावा किया कि वे कथित ब्लैकमेल के इस रैकेट के शिकार रहे हैं। उन्होंने बताया कि यह रैकेट किस तरह काम करता है।
‘यह 800 वर्ग गज का एक प्लॉट है, जिसे अधिकारियों ने वर्षों पहले सील कर दिया था। लेकिन इसके बावजूद निर्माण जारी रहा, अपार्टमेंट बनाए गए और उन्हें करोड़ों रुपए में बेच दिया गया। अब इस इमारत में लोग वर्षों से रह रहे हैं। कागजों पर यह इमारत सील है, लेकिन हकीकत यह है कि लोग इसी इमारत में रह रहे हैं।’ -पीड़ित जावेद ने तहलका के अंडरकवर रिपोर्टर से कहा।
‘इस 800 वर्ग गज के प्लॉट के मालिक प्रभावशाली लोग हैं, इसलिए अदालत द्वारा उनकी इमारत पर स्थगन आदेश दिए जाने के बावजूद उन्होंने निर्माण कार्य बंद नहीं किया है। उन्होंने उन ब्लैकमेल करने वालों को भी पैसे नहीं दिए, जिन्होंने उनसे 4-5 करोड़ रुपए की माँग की थी। लेकिन अब इतने वर्षों बाद उन्हें एक और अनधिकृत मंजिल बनाने के लिए पैसे देने पड़ेंगे, क्योंकि मौजूदा जज का रुख बहुत सख्त है।’ -जावेद ने कहा।
‘बटला हाउस इलाके में एक इमारत का निर्माण कराते समय मुझे भी ब्लैकमेल किया गया था। उन्होंने मुझे ब्लैकमेल करने के लिए मेरी इमारत के खिलाफ अदालत से स्थगन का आदेश (स्टे) हासिल कर लिया और 17 लाख रुपए की माँग की। लेकिन बाद में 6 लाख रुपए में सौदा तय हो गया, जिसके बाद अदालत का स्थगन-आदेश हटवा लिया गया।’ -जावेद ने जोड़ा।
‘अदालत के स्थगन आदेशों के दुरुपयोग के जरिए ब्लैकमेल के रैकेट में शामिल लोग गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) से जुड़े हुए हैं। इनमें कुछ लोग अपने स्थानीय अखबार चलाते हैं, कुछ झुग्गी-बस्तियों से आते हैं, कुछ पुराने दिल्ली इलाके से हैं। यहां तक कि बिहार में रहने वाले ऐसे लोग भी इस जबरन वसूली के रैकेट में शामिल हैं, जिनके आधार कार्ड पर पता दिल्ली का दर्ज है।’ -जावेद ने समझाया।
‘ब्लैकमेल करने वाला बटला हाउस में किसी भी अनधिकृत इमारत के निर्माण का इंतजार करता है। वह इंतजार करता है कि इमारत की पहली छत पड़ जाए। उसका मकसद यह होता है कि आप निर्माण पर और अधिक पैसा खर्च कर चुके हों। जब दूसरी छत पड़ जाती है, तब तक आप लाखों रुपए खर्च कर चुके होते हैं। इसके बाद ‘स्टे माफिया’ इमारत की तस्वीरें खींचकर अदालत का रुख करता है और यह आरोप लगाते हुए स्थगन आदेश की माँग करता है कि वहां अवैध निर्माण किया जा रहा है। जैसे ही अदालत स्थगन आदेश दे देती है, ब्लैकमेल करने का सिलसिला शुरू हो जाता है।’ -जावेद ने जोड़ा।
‘स्थगन आदेश से जुड़ा मामला दीवानी मुकदमा होता है और इसे निपटने में वर्षों लग सकते हैं। ब्लैकमेल करने वाले अदालत की प्रक्रिया का इस्तेमाल करते हुए बार-बार लंबी तारीखें लेने की कोशिश करते हैं। बिल्डर परेशान हो जाता है, उसकी इमारत का निर्माण लंबे समय तक रुका रहता है। आखिरकार वे समझौते की मेज पर बैठते हैं और ब्लैकमेल करने वाले को पैसे दे देते हैं।’ -एमसीडी इंजीनियर आदिल ने हमारे रिपोर्टर से कहा।
‘यह एक आम चलन है। अनधिकृत इलाकों में हर छत की स्लैब डालकर अवैध निर्माण करने के लिए पुलिस पैसे लेती है। यह रकम प्रति छत 50,000 से 70,000 रुपए तक होती है, जो आपके बीच हुए सौदे पर निर्भर करती है। मैंने अपनी छठी मंजिल के निर्माण के लिए पुलिस को 2.50 लाख रुपए दिए थे।’ -सलीम ने तहलका के रिपोर्टर से कहा।

बटला हाउस इलाके में हम जिस पहले पीड़ित से मिले, उसका नाम जावेद (बदला हुआ नाम) है। जावेद ने बताया कि उनके अनुसार, बटला हाउस में अनधिकृत निर्माण से जुड़ा कथित ब्लैकमेल का रैकेट किस तरह काम करता है। उन्होंने बताया कि कथित ब्लैकमेल करने वाले किस तरह तब तक इंतजार करते हैं, जब तक कोई बिल्डर किसी परियोजना में पर्याप्त रकम निवेश नहीं कर देता और उसके बाद कथित अवैध निर्माण को लेकर अदालत का रुख करते हैं। उनका कहना है कि इसके बाद अदालत का स्थगन आदेश निर्माण कार्य रोक देता है, जिससे बिल्डर पर दबाव बढ़ जाता है। जावेद ने आगे आरोप लगाया कि इसके बाद बिचौलियों के जरिए पैसे की माँग की जाती है, जिनमें गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) से जुड़े लोग और आसपास की झुग्गी-बस्तियों के लोग भी शामिल होते हैं।
रिपोर्टर : ये मामला क्या है स्टे वाला?
जावेद : अब ये जो जगह है, ये जो प्लॉटिंग करी है, ये के खेत थे। उनके वालिद साहब के ये प्लॉट थे, …खेत थे। भैंस पालते थे। तरक्की हुई, मकान बनने शुरू हो गए, बिल्डिंग बन गई। अब ये बिल्डिंग है, ये 800 गज की बिल्डिंग है। अब इस फ्लोर पर स्टे ले आए। लेंटर डाला, पहला लेंटर पड़ गया, दूसरा पड़ गया। तीसरे लेंटर पर कोर्ट चले गए, स्टे ले आए… ”ये बिल्डिंग इल्लीगल है।”
रिपोर्टर : मान लीजिए मैं बिल्डिंग बना रहा हूं?
जावेद : चलो ठीक है, आप बिल्डिंग बना रहे हो, ये प्लॉट है, अब मुझे आपसे पैसे लेने हैं।
रिपोर्टर : आपको मुझे ब्लैकमेल करना है? पैसे लेने हैं?
जावेद : हां, मतलब मैं आपसे लूट रहा हूं, 420 कर रहा हूं… पुलिस के साथ करूंगा, लीगल रूल से करूंगा…।
जावेद : (आगे) मुझे क्या है, पहले बिल्डिंग बनाना शुरू कर दी, पहले लेंटर में मैं कुछ नहीं करूंगा, क्यूंकि मैं चाहूंगा आपके 50-60 लाख और लग जाएं। यानी 100 गज का प्लॉट है, आपने 2 करोड़ का प्लॉट बेचा, …अब जैसे ही दूसरा लेंटर चलेगा, मैं जाऊंगा, इसके फोटो खिंचवाऊंगा. इसके पीछे चेन है पेपर की, जो किसान बैठे हुए हैं- ‘ये प्लॉट हमारा है, ये अवैध तरीके से बना रहे हैं।’ मैं जाके वकील के थ्रू कोर्ट में अर्जी लगा दूंगा। कोर्ट फोन करेगा- ‘फला बिल्डिंग बन रही है, उसको रोको।’ कोर्ट लिखकर दे देगा। पौलिस वाले आएंगे। पुलिस वाले आएंगे बोलेंगे- ‘तेरी बिल्डिंग पर स्टे है।’ पुलिस मिली हुई है, दोनों तरफ से। वो काम रुक गया।
जावेद : अब आप परेशान, ‘किसने स्टे लिया? मेरी बिल्डिंग रुकवाई किसने?’ अब मैं अंदर खाने में अपनी डिमाँड रख के किसी को भेजूंगा कि ‘मुझे 20 लाख चाहिए, 25 लाख चाहिए।’ अब आप जितने भी एनजीओ चला रहे हैं, वो ये काम करते हैं। वो कर रहे है अंदर खाने, झोंपड़-पट्टी वाली जो औरतें हैं, उनके नाम से किसी से डाल देंगे, जो यहां नहीं रहती… बस अब आप ढूंढते रहो, जबकि कराया मैंने है।
जावेद के अनुसार, जो लोग किसी इमारत के खिलाफ अदालत से स्थगन आदेश हासिल करते हैं, वे सामने नहीं आते। वे उस पक्ष से भी मुलाकात नहीं करते, जिसकी इमारत के खिलाफ उन्होंने स्थगन आदेश लिया होता है। उन्हें डर रहता है कि पैसे माँगते समय उनका वीडियो या बातचीत रिकॉर्ड हो सकती है, वे पकड़े जा सकते हैं और उनकी करतूत उजागर हो सकती है।
रिपोर्टर : एक चीज बताइए, जो स्टे लेने जा रहा है उसका नाम, एड्रेस कोर्ट से मिल जाएगा?
जावेद : सब होता है, लेकिन मैं आपसे मिलूंगा नहीं।
रिपोर्टर : पर्सनली नहीं मिलूंगा?
जावेद : नहीं।
रिपोर्टर : ऐसा क्यूं?
जावेद : देखिए, मैं आपसे मिलूंगा नहीं, पुलिस नहीं ढूंढेगी, आप ढूंढोगे।
रिपोर्टर : आप मिलोगे नहीं, ऐसा क्यूं?
जावेद : अगर मैं आपसे पर्सनली मिलूंगा, क्या पता आप मेरी वीडियो बना लो, बैठा लो, एक्सपोज कर दो। मेरा काम ही ये है, चोरी करना लोगों से…।
जावेद ने खुलासा किया कि समाजसेवी ब्लैकमेल करने के लिए अदालत से स्थगन आदेश हासिल करने के अलग-अलग तरीके अपना रहे हैं। कई बार वे झुग्गी-बस्तियों में रहने वाली महिलाओं से संपर्क करते हैं, उन्हें पैसे देते हैं, उनके हस्ताक्षर करवाते हैं और उनके नाम पर स्थगन आदेश हासिल कर लेते हैं। हो सकता है कि उस महिला को स्थगन आदेश के बारे में पता तक न हो। जावेद आगे बताते हैं कि कभी-कभी बिहार में रहने वाला कोई व्यक्ति भी, जिसके आधार कार्ड पर दिल्ली का पता दर्ज है, अदालत से स्थगन आदेश हासिल कर लेता है। जब उनसे बिल्डरों से माँगी जाने वाली रकम के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने यह राशि 20-25 लाख रुपये बताई।
जावेद : अब ये तो मेरा काम हो गया। अब आप समझ लो आगे झोंपड़-पट्टी है, 3-4 लेडीज पड़ी हैं, मैंने 500 देकर उसके साइन करा लिए। अब ढूंढ लो! अब पुलिस आएगी।
रिपोर्टर : अच्छा, उस औरत को 10-20 हजार देकर उसके नाम से स्टे करा दिया?
जावेद : स्टे करा दिया…।
रिपोर्टर : उसको पता भी नहीं है?
जावेद : वो मिलेगी ही नहीं। झोंपड़-पट्टी में कहां ढूंढोगे आप…, ऐसे भी लोग हैं, वो बिहार बैठकर स्टे ले रहे हैं।
रिपोर्टर : बिहार बैठकर स्टे ले रहे हैं?
जावेद : हां, आधार कार्ड यहां का बना हुआ है। बिहार के लोग मिले हुए हैं, व्हाट्सएप पर लिखा।
रिपोर्टर : और डिमाँड कितनी करते हैं- 20-25 लाख?
जावेद : हां, मतलब बिल्डर कमाएगा भी और नहीं भी कमाएगा।
अब जावेद बताते हैं कि बटला हाउस इलाके के बिल्डर किस तरह समाजसेवियों के दबाव के आगे झुक रहे हैं और अपनी निर्माणाधीन इमारतों के खिलाफ लिए गए अदालत के स्थगन आदेश को हटवाने के लिए उन्हें ब्लैकमेल के तौर पर पैसे दे रहे हैं, ताकि निर्माण कार्य दोबारा शुरू किया जा सके। उन्होंने बताया कि यह पूरा सौदा पुलिस की मदद से हो रहा है। जावेद ने स्टे माफिया से कथित तौर पर जुड़े कुछ चर्चित लोगों की पहचान भी की और उनके ठिकानों तथा सार्वजनिक गतिविधियों के बारे में जानकारी दी।
जावेद : मैं दबंग आदमी हूं, मेरी बिल्डिंग रुक गई, पुलिस वालों को बुलाया…कहेंगे है।
रिपोर्टर : हैं?
जावेद : यहां पर मशहूर है स्टे माफिया। बहुत सारे नाम हैं, छोटा सा है… वो हाथ नहीं आएगा, वो 6 महीने से गायब है। आप बौखला गए। आपकी 1.5 करोड़ की मा-बी*** एक कर दी… आपने, 2 फ्लैट बेच भी दिए इस बीच में। आप बौखला गए। अब आप कहोगे फैसला करा दो। लास्ट में टूट जाते हो आप।
रिपोर्टर : आप कैसे कहोगे?
जावेद : पुलिस से कहोगे या अपना बंदा भेजूंगा।
रिपोर्टर : का असली नाम क्या है?
जावेद : ही है।
रिपोर्टर : कहां रहता है?
जावेद : छोटा सा है, यहीं रहता है…।
जावेद : और एक है आपका बाल्टी चौक पर … उसका अखबार भी है… बहुत मशहूर है।
रिपोर्टर : ?
जावेद : आईटीओ पर उसका आॅफ़िस है… घर उसका जसोला में है। उसके नाम पर चौक बना रखा है- चौक।
अब जावेद एक सनसनीखेज खुलासा करते हैं; ऐसा दावा, जिसकी स्वतंत्र रूप से तहलका पुष्टि नहीं कर सकता। वह हमें बटला हाउस में 800 वर्ग गज के प्लॉट पर बनी एक इमारत दिखाते हैं। जावेद के अनुसार, इस इमारत को अधिकारियों ने वर्षों पहले कागजों पर सील कर दिया था। लेकिन उनका दावा है कि बिल्डर बहुत प्रभावशाली है और सील किए जाने के बावजूद उसने निर्माण जारी रखा तथा अपार्टमेंट बनाए, जिन्हें बाद में इच्छुक खरीदारों को बेच दिया गया। जावेद के अनुसार, आधिकारिक रिकॉर्ड में यह इमारत अब भी सील है, जबकि उसके अपार्टमेंटों में लोग रह रहे हैं।
उनका यह भी दावा है कि जब भी सरकारी अधिकारी इमारत का निरीक्षण करने आते हैं, बिल्डर उन्हें पैसे देता है, जिसके बाद अधिकारी उसके पक्ष में रिपोर्ट सौंप देते हैं। जावेद का यह भी दावा है कि पुराने दिल्ली इलाके की दो महिलाओं ने इस इमारत के खिलाफ अदालत से स्थगन आदेश हासिल कर लिया था और 4-5 करोड़ रुपए की माँग की थी। उनका कहना है कि बिल्डरों ने पैसे देने से इनकार कर दिया। लेकिन अब उन्हें ऐसा करना पड़ सकता है, क्योंकि अतिरिक्त मंजिलों के निर्माण का मामला एक अधिक सख्त जज के सामने है।
रिपोर्टर : तो अभी कौन-सी बिल्डिंग सील है आपकी?
जावेद : ये पूरी बिल्डिंग, ये 800 गज है पूरी।
रिपोर्टर : 800 गज, और सील कितनी है?
जावेद : पूरी।
रिपोर्टर : 800 गज सील है…?
जावेद : एक ही प्लॉट है ना।
रिपोर्टर : और कब से सील है?
जावेद : जबसे बनी है, 3 साल हो गए।
रिपोर्टर : 2-3 साल से सील है, लोग तो रह रहे हैं यहां पर?
जावेद : वो तो दिखाने के लिए…. क्यूंकि ‘पंक्चर’ (टोकन डिमोलेशन टू अवॉइड एक्शन- कार्रवाई से बचने के लिए सांकेतिक विध्वंस) कर रखा है ना!
जावेद : (आगे) वो आपका ७७७७ सब साथ हैं। थाने में पैसे खिलाए।
रिपोर्टर : मतलब कोर्ट का आदमी नहीं आता चेक करने?
जावेद : आता है।
रिपोर्टर : आप इतने साल से पैसे खिला रहे हो, कितने खिला दिए होंगे?
जावेद : इन लोगों ने बहुत पैसे खिला दिया।
रिपोर्टर : इन लोगों ने, या आपने?
जावेद : मेरा नहीं है इसमें। मेरा सिर्फ है, वो भी किराए पर।
रिपोर्टर : आॅनर कौन है इस बिल्डिंग के?
जावेद : …
रिपोर्टर : अच्छा, ये बिल्डिंग कागजों में तो सील है वैसे, लोग रह रहे हैं इसमें?
जावेद : हां।
रिपोर्टर : तो यहां ब्लैकमेलर कौन था, किसने लगाया था स्टे?
जावेद : पुरानी दिल्ली की 2 लेडीज।
रिपोर्टर : पुरानी दिल्ली की, और ये बना कब था?
जावेद : 5 साल हो गए।
रिपोर्टर : जिन लोगों ने स्टे लिया है, उनको पैसे नहीं खिलाए?
जावेद : एक्चुअली दबंग लोग, पैसे खिलाए नहीं- ‘हम तो निकाल लेंगे।’
रिपोर्टर : और डिमाँड कितनी आई थी?
जावेद : 4-5 करोड़।
रिपोर्टर : 4-5 करोड़ की डिमाँड आई थी?
जावेद : अब तो देने पड़ेंगे।
रिपोर्टर : अब क्यूं देंगे? अब तो बिक ही गई बिल्डिंग।
जावेद : अब तो फ्लोर ऊपर और डलेगा… 800 गज पर 2 फ्लोर हैं अभी..।.
रिपोर्टर : जैसे ये बनाए हैं, वैसे ही वो भी बन जाएगा?
जावेद : नहीं सर, अब ये कोर्ट में चला गया है।
रिपोर्टर : लेकिन कोर्ट में तो पहले ही चला गया ये?
जावेद : बन गया था, मगर अब जो जज बैठा है, वो सख्त है।
जावेद बताते हैं कि समाजसेवी किस तरह बिल्डरों के साथ समझौते करते हैं। आखिरकार वे छिपकर बाहर आते हैं, बिल्डर से पैसे लेते हैं और साथ ही लिखित रूप में यह भी देते हैं कि वे स्थगन आदेश वापस ले रहे हैं। जावेद के अनुसार, बटला हाउस में ऐसी कई इमारतें हैं, जहां समाजसेवियों ने अदालत के स्थगन आदेश के नाम पर पैसे ऐंठे हैं। वह यह भी बताते हैं कि कोई भी व्यक्ति, यहां तक कि आपका कोई दोस्त भी, पैसे ऐंठने के लिए अदालत से स्थगन आदेश हासिल कर सकता है।
रिपोर्टर : अब के बारे में बताएं?
जावेद : अब आपने बिल्डिंग बनाई, 2 फ्लोर डाल दिए, 2 करोड़ का प्लॉट लिया 100 गज का, 2 करोड़ का हो गया, 20 लाख का लेंटर डाल दिया, 2 करोड़ 20 लाख हो गए। एक लेंटर और डाल दिया, एक लेंटर डलता है 6-7 लाख का।’ये अवैध तरीके से बना है।’ पुलिस काम रुकवा देगी। पुलिस आएगी- ‘तेरे पर स्टे आ गया।’ वो अब परेशान होगा। उसके बाद मैं यहां का लोकल हूं, मेरी जान-पहचान है। मैं पता लगाऊंगा कि फलां आदमी ने इस पर स्टे लिया है। फिर उसको पकड़ो स*”** को, वो हाथ में आएगा। उसे मारोगे? …मार नहीं सकते। जान से मार देंगे, तब भी आप फंसोगे एंड में आकर लुट जाते हो। अब आता है फैसले का टाइम। मैंने 20 माँगे, आपने 10 करोड़ किए, …8 करे।
रिपोर्टर : जब फाइनल स्टेटमेंट होता है, तो वो लोग आते हैं सामने?
जावेद : पैसा आएगा और लिखकर देगा। वो आएगा और लिखकर देगा, पुलिस भी पैसा खाएगी, वकील ने पैसा खाया है, तो वो भी खाएगा।
रिपोर्टर : तो ऐसा तो बहुत सारी बिल्डिंग्स पर हो चुका होगा?
जावेद : मेरे हिसाब से तो अनलिमिटेड है।
रिपोर्टर : अनलिमिटेड बिल्डिंग पर ऐसा हो चुका है, बाद में स्टे हट जाता है?
जावेद : हट जाता है। ‘पंक्चर’ (टोकन डिमोलेशन टू अवॉइड एक्शन) होते ही बात खत्म। लेटर भी 1 नहीं, 4-5 डलेंगे। उसके बाद ‘पंक्चर’ होना शुरू होगा। एक लेटर में नहीं हटेगा ‘पंक्चर’।
रिपोर्टर : तो ये 2 लोग हैं, जो ये सब कर रहे हैं?
जावेद : इसमें दाढ़ी वाले भी हैं, और जो आपके साथ बैठे हैं, पता नहीं चलता, वो भी होते हैं।
रिपोर्टर : तो ये तो करोर्स कमा लिए होंगे इन्होंने?
जावेद : हां, अब आप को ही देख लो, अखबार निकालता है, एनजीओ चलाता है…।
खुद भी पीड़ित रहे जावेद बताते हैं कि उन्हें भी किस तरह ब्लैकमेल किया गया था। उनसे 17 लाख रुपए की माँग की गई थी, लेकिन बातचीत के बाद उन्होंने 6 लाख रुपए दिए, जिसके बाद स्थगन आदेश हटा लिया गया। इस तरह जावेद खुद भी इस प्रक्रिया में शामिल रहे, क्योंकि उन्होंने भी कभी अवैध निर्माण कराया था।
रिपोर्टर : आपके ऊपर हुई है कोई बिल्डिंग?
जावेद : मेरे साथ तो बहुत बड़ा कांड हुआ है…।
रिपोर्टर : आपने कितने खिलाए थे?
जावेद : मैंने 6 लाख खिलाए, 17 लाख माँगे थे।
रिपोर्टर : मतलब, 17 लाख की डिमाँड थी, 6 लाख खिलाए?
जावेद : हां।
रिपोर्टर : उसके बाद स्टे हट गया?
जावेद : हट गया।
जावेद बताते हैं कि चूंकि बटला हाउस एक अनधिकृत इलाका है, जहां बिल्डरों को निर्धारित ऊंचाई सीमा से अधिक ऊंचाई तक अपार्टमेंट बनाने की अनुमति नहीं है, इसलिए समाजसेवी इसी का फायदा उठाकर बिल्डरों को ब्लैकमेल करते हैं।
रिपोर्टर : और वैसे भी ये एरिया अन-आॅथोराइज्ड है, बना नहीं सकते आप। इसलिए बिल्डर भी कमजोर हो जाता है।
जावेद : जी, जी…, पुलिस भी कमजोर रहती है, फिर मजबूरी में करना पड़ता है। एसएचओ पैसा खाने के बाद भी कहता है- ‘रुक जाओ…।’
रिपोर्टर : ये सारे बिल्डर के साथ होता है?
जावेद : जिसकी जिससे दुश्मनी हो, सबके साथ नहीं होता…।
जावेद के बाद तहलका ने नगर निगम दिल्ली (एमसीडी) के इंजीनियर आदिल (बदला हुआ नाम) से मुलाकात की, जो बटला हाउस इलाके में रहते हैं। दिल्ली में अनधिकृत निर्माण से निपटने में एमसीडी की महत्वपूर्ण भूमिका है। आदिल के अनुसार, स्थगन आदेश से जुड़ा मामला एक दीवानी मुकदमा होता है और अदालत में इसके निपटारे में वर्षों लग सकते हैं। उनका कहना है कि ब्लैकमेल करने वाले बार-बार लंबी तारीखें लेते हैं, जिससे बिल्डर परेशान हो जाता है, क्योंकि निर्माण कार्य लंबे समय तक रुका रहता है। अंतत: उनके अनुसार, बिल्डर समझौते के लिए बैठता है और ब्लैकमेल करने वाले को पैसे दे देता है। आदिल ने बताया कि 10-15 लाख रुपए का भुगतान किए जाने के बाद स्थगन आदेश हटा लिया जाता है।
रिपोर्टर : काम रुक गया, स्टे आ गया? …उसके बंद क्या होता है?
आदिल : उसके बाद स्टे चलेगा। 99.99 पर्सेंट ये हारेंगे। बट टाइम कितना लगेगा, ये आप जानते हो या वो जानते हैं।
रिपोर्टर : 20 साल लगेंगे?
आदिल : भाई, सिविल शूट है। मेरी सेटिंग हो जाए कोर्ट में, मैं जाऊंगा अहमद के पास- ये ले भाई 5000 रुपए. वैसे तो बड़ी रकम होगी। मैं कहूंगा ये 5000 रुपए ले ले, 6 महीने बाद की डेट लगा दे। अब ये 6 महीना किराया भी देंगे। वेट भी करेंगे। ये बोलेंगे- ‘भाई, सेटलमेंट करा दो, मेरी जान छुड़वा दो।’
रिपोर्टर : सेटलमेंट कैसे होता है?
आदिल : सेटलमेंट ऐसे होता कि ये अपने पैसे लेंगे।
आदिल : (आगे) मैंने 10 लाख आपने ले लिए।
रिपोर्टर : 10-15 लाख देकर स्टे हटा दिया?
आदिल : इनका वकील रिट अप्लाई कर देगा, स्टे खत्म हो जाएगा। अब दोबारा कंन्स्ट्रक्शन चालू करेंगे।
रिपोर्टर : उसमें एमसीडी का क्या रोल होता है?
आदिल : एमसीडी का ये रोल होता है कि जिस टाइम पर हमें पार्टी बनाते हैं ना ये लोग- ‘अनाथोराइज्ड बन रहा है, रोक दो।’
रिपोर्टर : ये आपको लिखकर देना होता है?
आदिल : हम तो देंगे।

आदिल के बाद तहलका ने बटला हाउस के निवासी सलीम (बदला हुआ नाम) से मुलाकात की। उन्होंने दावा किया कि अपना मकान बनवाने के लिए उन्होंने पुलिस को पैसे दिए थे। उनके अनुसार, दिल्ली के अनधिकृत इलाकों में जब भी निर्माण होता है, तो यह एक आम चलन है।
सलीम ने कहा- ‘यह एक आम चलन है। अनधिकृत इलाके में हर छत की स्लैब डालने के लिए पुलिस पैसे लेती है। यह रकम प्रति छत 50,000 से 70,000 रुपए तक होती है, जो आपके बीच हुए सौदे पर निर्भर करती है। मैंने अपनी छठी मंजिल के निर्माण के लिए पुलिस को 2.50 लाख रुपए दिए थे।’
रिपोर्टर : आपने कितने पैसे दिए पुलिस को?
सलीम : पुलिस को मैंने 2.5 लाख दिए हैं बस।
रिपोर्टर : वो किस बात के?
सलीम : बिल्डिंग बन रही है।
रिपोर्टर : ये जो आपका घर बन रहा है, इसी में दिए हैं?
सलीम : हम्म।
रिपोर्टर : पूरी बिल्डिंग तुड़वा कर बनवा रहे हो तुम?
सलीम : नहीं, सिर्फ ग्राउंड फ्लोर बना हुआ था उसमें।
रिपोर्टर : पूरी बिल्डिंग बनवा रहे हो?
सलीम : हां, 6 फ्लोर बन रही है।
रिपोर्टर : तो आपको स्टे नहीं आया?
सलीम : हर किसी का थोड़ी आता है स्टे।
रिपोर्टर : 2 लाख तो फिर भी दे दिए आपने?
सलीम : पुलिस वालों को तो जाने ही जाना है…।
रिपोर्टर : 2 लाख किस चीज के दिए तुमने?
सलीम : अलग-अलग।
रिपोर्टर : लेंटर फिक्स होता है- 50 हजार, 60 हजार, 70 हजार। जैसा आपका सौदा फिक्स हो जाए?
रिपोर्टर :_ तुमने कितना दिया?
सलीम : 2.5 लाख।
रिपोर्टर : सस्ते में निपट गए तुम तो?
सलीम : जब लेंटर पड़ता है, तो हजार रुपीज पीसीआर वाला भी ले जाता है।
रिपोर्टर : रजिस्ट्री तो नहीं है, अन-आॅथोराइज्ड है पूरा?
सलीम : पूरा जामिया ही अन-आॅथोराइज्ड है।
सलीम : (आगे) जिस जगह हम बैठे हैं, वहां फ्लैट्स की कीमत 2 करोड़ तक पहुंच गई है।
रिपोर्टर : बिना रजिस्ट्री के?
सलीम : बिना रजिस्ट्री के।
रिपोर्टर :अन-आॅथोराइज्ड?
सलीम : अन-आॅथोराइज्ड ।
तहलका ने इलाके में उन सभी समाजसेवियों से संपर्क करने की कोशिश की, जिन पर पीड़ितों ने ब्लैकमेल करने के आरोप लगाए। लेकिन उन्होंने हमारी टीम से मिलने से इनकार कर दिया। अब तक दिल्ली में अवैध निर्माण के लिए पुलिस और एमसीडी अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है। लेकिन यह पहली बार है, जब तहलका की पड़ताल ने दिल्ली में अवैध निर्माण में समाजसेवियों की संलिप्तता को भी उजागर किया है।
सत्य निकेतन की घटना के बाद तहलका से बातचीत में सलीम ने बताया कि उन्होंने हाल ही में बटला हाउस में बनी अपनी इमारत में अवैध रूप से पांचवीं मंजिल बना ली। उन्होंने कहा कि अब वह अतिरिक्त मंजिल हटा देंगे, क्योंकि एमसीडी ने कहा है कि वह अवैध रूप से निर्मित इस मंजिल को सील कर देगी।
दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में इमारत ढहने से हुई मौतों के बाद नगर निगम दिल्ली (एमसीडी) ने पूरे शहर में चार मंजिल से अधिक ऊंची सभी अनधिकृत इमारतों को तत्काल सील करने का आदेश दिया। सत्य निकेतन में एक इमारत ढहने से सात लोगों की मौत के बाद दिल्ली सरकार ने एमसीडी के पांच अधिकारियों को निलंबित कर दिया और इमारत के मालिक, उसकी पत्नी तथा बेटे को गिरफ्तार कर लिया।
सत्य निकेतन में रहने वाले छात्र अब वहां से बाहर जाने की योजना बना रहे हैं। उनका कहना है कि इमारत ढहने की घटना के बाद वे अब सत्य निकेतन में नहीं रहना चाहते। छात्र अपने घरों को लौट रहे हैं या लौटने के लिए सामान पैक कर रहे हैं। छात्रावास के ढहने से संबंधित एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि इस लापरवाही की जिम्मेदारी पीजी मालिक से आगे बढ़कर दिल्ली विश्वविद्यालय और स्थानीय निकायों के अधिकारियों तक भी जा सकती है।
अगस्त 2025 में प्रकाशित लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत का इस्तेमाल राष्ट्रीय राजधानी में अनधिकृत निर्माण करने वालों से पैसे ऐंठने के एक साधन के रूप में नहीं किया जा सकता। हालांकि यह अदालत इस तथ्य को स्वीकार करती है कि अनधिकृत निर्माण के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई की जानी चाहिए, लेकिन साथ ही इस अदालत का इस्तेमाल ऐसे निर्माण करने वाले लोगों से पैसे ऐंठने के एक साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।
तहलका की पड़ताल में यही बात सामने आई है कि बटला हाउस में अनधिकृत निर्माण करने वालों से पैसे ऐंठने के लिए अदालत की प्रक्रिया का इस्तेमाल एक साधन के रूप में किया जा रहा है। समाजसेवियों का मकसद जनहित में कुछ करना नहीं, बल्कि अदालत को अपने इरादों की जानकारी दिए बिना बिल्डरों से पैसे ऐंठना है। बटला हाउस एक अनधिकृत इलाका है। इस वजह से इलाके के समाजसेवियों को ऐसे बिल्डरों से पैसे ऐंठने का सुनहरा मौका मिल गया है, जो खुद भी अवैध निर्माण में शामिल हैं। इस पड़ताल में उन पुलिसकर्मियों की भूमिका भी सामने आई, जो पैसे लेकर अवैध निर्माण की अनुमति देते हैं। अगर पूरे भारत में अधिकारी अवैध निर्माण की अनुमति ही न दें, तो हमें बुलडोजरों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, जो आज भारत में बेहद ध्रुवीकरण पैदा करने वाला प्रतीक बन चुके हैं। इसके साथ ही, हम सत्य निकेतन जैसी घटनाओं को भी रोक सकते हैं।
जनवरी 2026 में द टाइम्स आॅफ इंडिया ने रिपोर्ट में बताया कि एमसीडी ने दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि राजधानी में आवासीय और व्यावसायिक निर्माण का 80 प्रतिशत हिस्सा अनधिकृत है। एमसीडी ने अदालत से आग्रह किया कि उसे अवैध ढांचों को चरणबद्ध तरीके से गिराने की अनुमति दी जाए।
चाहे दिल्ली के हौज रानी में लगी वह आग हो, जिसमें 21 लोगों की मौत हुई थी। चाहे लखनऊ की एक दुकान में लगी आग हो या हाल ही में सत्य निकेतन में हुई घटना। एक के बाद एक ऐसी घटनाएं होती जा रही हैं, लेकिन हम उनसे कोई सबक नहीं सीख रहे हैं। पिछले 15 वर्षों में सत्य निकेतन में इमारत ढहने की चार घटनाएं होने के बावजूद कुछ नहीं किया गया।
सत्य निकेतन में जानलेवा घटना से तीन महीने पहले जब तहलका ने पड़ताल की थी और यह खुलासा किया था कि कुछ समाजसेवियों, कुछ पुलिसकर्मियों और एमसीडी अधिकारियों की मदद से दिल्ली के कई अनधिकृत इलाकों में वर्षों से अवैध निर्माण को फलने-फूलने दे रहे हैं तथा ऐसी परिस्थितियां पैदा कर रहे हैं, जिनसे सत्य निकेतन जैसी घटनाएं हो सकती हैं, तब भी कुछ नहीं किया गया। हाल में सत्य निकेतन में इमारत ढहने की घटना के बाद इस मुद्दे को रेखांकित करने के लिए उस पड़ताल के कुछ हिस्से यहां पुन: प्रकाशित किए जा रहे हैं।
ये घटनाएं अब राजधानी की शर्मनाक हकीकत का एक आम रूप बन चुकी हैं। बिल्डर कानूनों की धज्जियां उड़ाते हैं, जबकि समाजसेवी, पुलिस और एमसीडी अधिकारियों के साथ मिलकर कथित तौर पर अवैध निर्माण की अनुमति देने के एवज में बिल्डरों से पैसे ऐंठते हैं, और इस पर नज़र रखने वाला कोई नहीं है।




