‘हमने तय किया था कि चुनाव लड़ेंगे अगर नहीं भी जीत पाए तो इतिहास बनेगा’

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जिस छात्रसंघ में लड़कियों की मौजूदगी बिल्कुल नहीं थी, वहां पर चुनाव लड़ने का फैसला कैसे किया?

यहां का पूरा चुनाव धनबल और बाहुबल से लड़ा जाता है जैसे विधानसभा या संसद का चुनाव हो. हमारे छात्रसंघ चुनाव का स्वरूप लगातार बदलता जा रहा था. लोग छात्रनेता होकर तुरंत राजनीति में करिअर बनाने की तैयारी करने लग जाते हैं. वे छात्र हितों के लिए काम नहीं करते. हम लोग इसके लिए लगातार चिंतित थे कि क्या किया जा सकता है. हमारा एक फ्रेंड्स यूनियन ग्रुप है. 2012 में मैंने इसे शुरू किया था, जिसके जरिये हम छात्रों की मदद करते हैं. हमारे विश्वविद्यालय के हालात बेहद खराब हैं. यहां टॉयलेट नहीं हैं, हैं तो ताले लगे हैं. सेंट्रल लाइब्रेरी में किताबें नहीं हैं, लाइब्रेरी डिजिटलाइज नहीं है. वाई-फाई कैंपस नहीं है, सब्सिडाइज कैंटीन नहीं है. दो साल से विश्वविद्यालय कार्यवाहक वीसी के सहारे चल रहा है. शिक्षक नहीं हैं. हालात को देखते हुए हमने तय किया कि कुछ करना चाहिए. बाहर से हर चीज को बुरा कहना तो आसान है, अंदर आकर देखते हैं. हमें ये तो नहीं पता था कि हम जीत पाएंगे लेकिन ये पता था अगर कुछ कर पाए तो बहुत फर्क पड़ेगा. अब मैं 1927 के बाद मैं पहली अध्यक्ष हूं.

अकादमिक करिअर छोड़कर पुरुषों के वर्चस्व वाले सियासी अखाड़े में उतरना कितना आसान रहा?

बहुत मुश्किल था. मैं रिसर्च स्कॉलर हूं, मेरा एमफिल हो चुका है, दो विषय में नेट है. अकादमिक करिअर एकदम स्पष्ट था मेरे सामने. ऐसे में यह तय कर पाना बहुत मुश्किल था कि सब छोड़कर छात्र राजनीति में जाना है. लेकिन मैं पिछले पांच साल से महिला आंदोलन से जुड़ी रही हूं. काम करते हुए यह धारणा पक्की हो गई थी कि परिवर्तन के लिए आपको आगे आना पड़ता है. हमने तय किया था कि हम चुनाव लड़ेंगे अगर नहीं भी जीत पाए तो इतिहास बनेगा, सिर्फ महिला इतिहास नहीं, बल्कि इस बात का भी कि बाहुबल या धनबल के बिना भी चुनाव लड़ा जाता है. इससे ये फर्क पड़ेगा कि आम छात्र भी चुनाव में आने की कोशिश करेगा. मैंने पांच साल कैंपस में काम किया था तो पहचान का संकट नहीं था. सभी दलों के लोगों की कोशिश थी कि मैं उनके साथ आ जाऊं. एबीवीपी ने कहा, आप हमारे पैनल से आ जाइए, सारा चुनाव हम मैनेज कर देंगे. सपा ने भी प्रस्ताव दिया, आइसा ने भी, लेकिन हम लोगों का यह मानना था कि हमने पार्टी का साथ लिया तो हमें स्टूडेंट एजेंडा छोड़कर पार्टी एजेंडा फॉलो करना मजबूरी हो जाएगी. हमने किसी पार्टी पैनल से लड़ने का विचार नहीं किया. हमने बहुत ही कम पैसों में चुनाव लड़ा और अपनी स्कॉलरशिप का पूरा पैसा खर्च कर दिया.

दिल्ली जैसे शहर के मुकाबले इलाहाबाद में घर के अंदर से लेकर सड़क तक लड़कियों पर अच्छी खासी पाबंदियां हैं, विश्वविद्यालय में भी. ऐसे में राजनीति में आने के फैसले पर परिवार ने सहयोग किया या विरोध?

शुरू में बहुत मुश्किल हुई. घरवाले नाराज हो गए थे. पिता तो बहुत ज्यादा नाराज हो गए थे तो मैंने उनसे एक ही बात बोली कि नाराज मत होइए. कुछ गलत नहीं करूंगी, करने दीजिए, जो करूंगी, अच्छा करूंगी. उन्होंने न हां कहा, न ही ना. बाद में कहा कि अगर करना चाहती हो तो करो, लेकिन अपने को सुरक्षित कर लो. इसके बाद मैंने चुनाव पर फोकस किया क्योंकि मेरे पास सिर्फ अपनी बात और अपनी क्षमता थी. मुझे हर छात्र से खुद जाकर मिलना था और अपनी बात कहनी थी. मैं विमेन स्टडीज विभाग में बतौर असिस्टेंट काम कर रही हूं. मुझे बीस हजार की फेलोशिप मिलती थी. मैंने इस्तीफा दे दिया, क्योंकि इस्तीफा दिए बिना चुनाव नहीं लड़ सकते थे. मेरे घर वालों ने कहा कि बीस हजार की एक नौकरी है, वह भी छोड़ रही हो, फिर क्या करोगी? लेकिन जिद थी कि इस बार कोशिश करनी है और काम करना है.

इलाहाबाद छात्रसंघ की एक परंपरा हुआ करती थी कि सबसे अच्छे छात्र चुनाव लड़ते थे और यहां से निकलकर भी मुख्यधारा में दखल देते थे. क्या इलाहाबाद अपनी पुरानी गरिमा खो चुका है? 

हां, बिल्कुल. आदित्यनाथ के विरोध को इससे जोड़ना चाहूंगी. हमें कैंपस में नई परंपरा शुरू करनी है. हम लोग एक नई संस्कृति की शुरुआत कर रहे हैं. इलाहाबाद आईएएस और पीसीएस बनाने के लिए जाना जाता था. वह सब खत्म हो गया. यहां के छात्र अंग्रेजी से मात खाते हैं. इसके लिए हम कुछ संस्थाओं के साथ मिलकर कार्यशालाएं चलाने वाले हैं. इलाहाबाद विश्वविद्यालय केंद्रीय संस्था है लेकिन यहां प्लेसमेंट एजेंसियां नहीं आतीं. हमने उसके लिए भी विवि से कहा है कि प्लेसमेंट एजेंसियां बुलाई जाएं. अराजकता इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बहुत बुरी तरह हावी है. इसे खत्म करने के लिए हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है, लेकिन इसका मॉडल है. वह है रचनात्मकता का मॉडल. हम ऐसी रचनात्मक चीजों को आगे बढ़ाएंगे कि अराजकता अपने आप खत्म हो जाए.

प्रशासन कहता है कि पैसे नहीं है, जबकि दौ सौ करोड़ यूजीसी को लौटा दिए. अगर जांच करा लें तो 30 प्रतिशत शिक्षक फंस जाएंगे

इलाहाबाद विश्वविद्यालय परिसर पूरी तरह से पितृसत्तात्मक है. यहां लड़कियां जेएनयू या डीयू के मुकाबले सहज नहीं हैं. इस दिशा में क्या प्रयास होंगे?

इसका कारण है कि यहां का अकादमिक माहौल खराब है. परिसर में रचनात्मक गतिविधियां नहीं होतीं. सेमिनार नहीं होते. महिलाओं के साथ बुरा बर्ताव वे करते हैं जो उन्हें नहीं जानते. आपस में संवाद होगा तो यह सब खत्म हो जाएगा. महिला आजादी की बात करें तो हमारे यहां छह हॉस्टल हैं, उनका दरवाजा शाम नौ बजे बंद हो जाता है. कैंपस के अंदर के हॉस्टल का भी दरवाजा बंद हो जाता है. मैं अपने सामने वाले गर्ल्स हॉस्टल नहीं जा सकती. हम हॉस्टल के अंदर भी सुरक्षित नहीं हैं. हम कोशिश करेंगे कि स्थितियां सुधरें. कैंपस में भी हमने कहा है कि लैंगिक उत्पीड़न को एकदम नकार देना है, अब तक विश्वविद्यालय प्रशासन बेहद ढीला है, लेकिन मैं जानती हूं कि पीछे पड़ जाऊंगी तो इनको करना पड़ेगा. मैं पिछले साल से ही लैंगिक भेदभाव के मसले पर कोशिश कर रही हूं. विवि प्रशासन से दो साल से कह रही हूं प्रॉक्टर के नंबर और विमेन हेल्पलाइन नंबर बोर्ड पर लगा दीजिए, ताकि किसी असहज स्थिति में लड़कियां मदद ले सकें, लेकिन अब तक नहीं हुआ. वे कहते हैं कि हमारे पास पैसे नहीं हैं, जबकि दो सौ करोड़ रुपये विश्वविद्यालय ने यूजीसी को वापस कर दिए. अगर हमारे यहां विजिलेंस की जांच करा लें तो 30 प्रतिशत शिक्षक कदाचार में फंस जाएंगे. यहां का प्रशासन महिलाओं के प्रति उदासीन है. लड़के कमेंट करते हैं तो ये लोग लड़कियों को ही बुलाकर कहते हैं कि बाहर कम निकला करो. क्लास आने की जरूरत नहीं है क्योंकि यहां गुंडे रहते हैं. इस तरह का तो विश्वविद्यालय का रवैया है. हालांकि हमारी कोशिशें तब तक जारी रहेंगी जबकि हालात बदल नहीं जाते.

राष्ट्रीय स्तर पर छात्र राजनीति की जो दशा-दिशा है, उस पर क्या कहना चाहेंगी?

छात्र राजनीति की सबसे बड़ी खासियत थी कि यह प्रेशर ग्रुप (दबाव समूह) का काम करता था. अब यह कास्ट, क्लास और जेंडर के आधार पर बंट चुकी है. अगर छात्र बंटे रहेंगे तो उनकी आवाज बेअसर रहेगी. अभी यूजीसी के खिलाफ चल रहा आंदोलन पूरे छात्र समुदाय का मुद्दा है, पर न तो सब संगठन साथ आए न ही सब छात्र. संगठित होना ही हमारी ताकत है. संगठन शक्ति कमजोर हो गई है जिससे हम दबाव समूह के रूप में काम नहीं कर पा रहे.