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‘टैलेंट हंट’ में धोखा खाने के बाद गीतकार बनने का सपना धरा रह गया और हम पत्रकार बन गए…

अपने गांव से 2003 में इलाहाबाद पहुंचा तो सोचा कि गाने और लिखने के अपने शौक को ही अपना पेशा बनाऊंगा. मेरे बड़े भाई पहले से वहां रहते थे. उनके सपोर्ट के बाद मैंने प्रयाग संगीत समिति में एडमिशन ले लिया और संगीत सीखने में लग गया. हालांकि, जब मेरे  

शायद वो पुलिसवाला पैसे के लालच में भूल चुका था कि समाज में उसकी भूमिका और जिम्मेदारी क्या है…

बीते जून महीने में रामपुर अपने घर जाने का प्रोग्राम बना था. मैंने पुरानी दिल्ली से रामपुर के लिए रानीखेत एक्सप्रेस में रिजर्वेशन करवाया था. ट्रेन के आने का समय रात में तकरीबन 9:30 बजे था और डिपार्चर 10:30 बजे. जब मैं स्टेशन पहुंचा तो 10 बज रहे थे. स्टेशन  

रज्जाक भाई! आपका बहुत-बहुत शुक्रिया, मुझे मेरी ईदी देने के लिए…

ईद के दिन छुट्टी होती है लेकिन निजी क्षेत्रों में काम करने वालों को ये सौभाग्य कहां मिलता है. उस दिन मुझे एक जरूरी बिजनेस मीटिंग के लिए गाजियाबाद जाना था. दिन के करीब 11 बजे मैं गाजियाबाद पहुंचा. वहां एक वरिष्ठ साथी अपनी कार से आए. वे कार से  

चंद सेकंड पहले जो वृद्धा मदद की गुहार लगा रही थी, वो अब चंदे के लिए मुझे धमकाए जा रही थी…

ग्वालियर में पारा 47 डिग्री को छू रहा था. इस साल मई के महीने में भीषण गर्मी ने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे. गर्मी के चलते मेरी भी तबीयत गड़बड़ थी. उस दिन चेकअप कराके बाइक से घर वापस आ रहा था. कहने को तो सुबह के 10 बज  

बातचीत के दौरान वर पक्ष को जब ये पता चला कि हमारा कोई बेटा नहीं तो उन्होंने फोन उठाना ही बंद कर दिया…

एक साथ दो तरह की दुनिया में जीने के लिए मैं अभिशप्त हूं. एक विवाह से पहले की दुनिया, जहां मेरा जन्म हुआ, पढ़ाई-लिखाई के साथ मेरा बचपन बीता और दूसरी यानी विवाह के बाद की दुनिया. मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के एक छोटे-से कस्बे बहेड़ी में  

ये कैसी दुनिया है जहां भीख मांगने वालों की जेब पर भी डाका पड़ता है…

ये पिछले साल गर्मियों की बात है. रात के अंधेरे में वीराने को चीरती शिवगंगा एक्सप्रेस पूरी रफ्तार में दौड़ती चली जा रही थी. दिल्ली से इलाहाबाद का मेरा सफर थोड़ा मुश्किल था क्योंकि रिजर्वेशन कन्फर्म नहीं हुआ था. खचाखच भरी बोगी में कहीं भी बैठने की जगह नहीं थी.  

भाई! क्राइम पेट्रोल में दिखाता है लड़का ‘किसी और’ के साथ रहता है, फिर शादी कर लेता है और जुर्म दस्तक देता है

इस महीने की शुरुआत में एक दोस्त की सगाई में जाने का मौका हाथ लग गया. वो दोस्त भी मेरी तरह काफी साल से घर से दूर रहकर नौकरी करता है. मेरे घर जाने का मामला पहले से ही तय था. ऐसे में सगाई के बहाने पुराने दोस्तों से मुलाकात  

बुत को पूजते हैं पर इंसानियत की कीमत  पता नहीं

ये घटना बीते साल की है. हमारे शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर एक छोटा पर प्रसिद्ध प्राचीन शिव मंदिर है, जहां हर महीने की 17 तारीख को मेला लगता है. इस मेले में आसपास के क्षेत्रों के लोग अच्छी-खासी संख्या में जुटते हैं. मंदिर बहुत बड़ा और व्यवस्थित नहीं  

‘मन में बसी महादेव की मूर्ति पूरी तरह से ढह चुकी थी और मैं वापस घर लौट आया’

बात साल 2007 की है. मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में बीए प्रथम वर्ष का छात्र था. सावन के महीने में एक दिन अचानक दोस्त के साथ झारखंड के देवघर में शिवजी को जल चढ़ाने के लिए निकल पड़ा. सफर ऐसा था कि सुल्तानगंज पहुंचते-पहुंचते बदन का हर हिस्सा हिल चुका था.  

‘फैसले की तारीख करीब थी और सब एक-दूसरे के प्रति आशंकित होने लगे थे’

बात उन दिनों की है जब मै रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई कर था, दोस्तों के साथ विभाग के बाहर सामने बरगद पेड़ के पास बने चबूतरे पर रोज ‘छात्र संसद’ लगती थी. यहां हम मित्रों के बीच अंतरंग बातों के अलावा देश की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक हालात