महफूज़ नहीं मासूम

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फोटो- विजय पांडेय

जिस तरह सर्दी के मौसम में पुरानी चोट या जख्म की टीस ताजा हो जाती है, उसी तरह दिल्ली में सर्दी की दस्तक 16 दिसंबर 2012 की वीभत्स घटना का दर्द साथ ले आती है. निर्भया के साथ हुए हादसे ने महिलाओं के साथ हो रहे अपराधों के प्रति जागरूकता जगाई और हजारों संवेदनशील लोग उनकी सुरक्षा के लिए सड़कों पर उतर आए. उनका उद्देश्य था कि सरकार इस मुद्दे पर उनकी नाराजगी पर तुरंत संज्ञान ले और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करे.

हालांकि दिल्ली की सड़कें अब भी सुरक्षित नहीं हो पाईं अलबत्ता अब घरों के आंगन भी सुरक्षित नहीं रहे. दरिंदों के वहशीपन की सारी हदें तब पार हो गईं जब चार साल की नेहा (परिवर्तित नाम) के साथ उसके घर से कुछ ही दूरी पर बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को अंजाम दिया गया.

इस दरिंदगी के बाद कूड़े के ढेर पर बुरी तरह से घायल पड़ी वह बच्ची अपने पिता को ही बुला पाने में असमर्थ थी तो अपने साथ हुई उस दर्दनाक घटना के बारे में कैसे बता पाती! इस हादसे के बारे में बच्ची के दादा किशन ने अपना दर्द बयां किया, ‘ब्लेड से यहां काटा (गाल पर), होंठ पर भी ब्लेड मारा. सिर पर पत्थर मार दिया और गला घोंटा.’ सिसकी रोकते हुए कहते हैं, ‘मेरी बच्ची से बलात्कार भी किया.’

ये अक्टूबर की शाम थी और वह बच्ची दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के आईसीयू में भर्ती है. ये वही अस्पताल है जिसने निर्भया के जख्म भी देखे थे, जहां वो अपने जख्मों से लड़ते-लड़ते जिंदगी की जंग हार गई थी. सूत्रों ने ‘तहलका’ को बताया कि नेहा के गुप्तांग के जख्म बहुत गंभीर थे और डॉक्टरों को वहां क्षत-विक्षत त्वचा जोड़ने में दो घंटे का समय लगा. चोटें इतनी गंभीर थीं कि पेशाब और मलत्याग के लिए एक वैकल्पिक रास्ता बनाया गया. डॉक्टरों का कहना है कि बच्ची के शारीरिक रूप से पूरी तरह ठीक होने में करीब तीन महीने का वक्त लगेगा.

इस पीड़ित बच्ची का परिवार उत्तर-पश्चिम दिल्ली के केशवपुरम में रेल की पटरियों से सटी झुग्गियों में रहता है. उस बच्ची के घर पहुंचने में सीवेज से भरी और पानी के पाइपों की भूलभुलैया सरीखी गलियों के बीच से होकर गुजरना पड़ता है. एटीएम के गलियारे के जैसे एक कमरे में नेहा की बड़ी बहन (पांच साल) गुमसुम सी बैठी हुई है और उसका आठ महीने का भाई खेल रहा है. फूट-फूटकर रोते हुए नेहा की दादी रामश्री बताती हैं, ‘यहां जगह कहां है! इधर ही ट्रैक के पास बैठे रहते थे सब शाम में. उ (नेहा) यहीं धुरा-मिट्टी में खेलती रहती थी.’ घटना को याद कर वह बताती हैं कि खून से लथपथ अपनी पोती को पहचानना उनके लिए कितना मुश्किल था, जिसे उस रात बस्ती की एक औरत कूड़े के ढेर से उठाकर लाई थी. नेहा की दादी के अनुसार, ‘हमारे हाथ लग जाता तो यहीं बोटी-बोटी कर के गाड़ देते.’

सरकारें अपनी उपलब्धियों के बखान के लिए विज्ञापनों पर बजट का बड़ा हिस्सा खर्च रही हैं लेकिन यौन अपराधों की रोकथाम के लिए जागरूकता कार्यक्रमों पर ध्यान देने वाला कोई नहीं है 

इतने सब के बाद राहत की बात केवल इतनी है कि जब पुलिस द्वारा आरोपी को अस्पताल में चार और लोगों के साथ लाइन में खड़ा किया तब नेहा ने तुरंत उसे पहचान लिया, ‘राहुल भइया ने चोट लगाई मुझे.’ जिस व्यक्ति को वह मासूमियत से भइया कहकर पुकार रही थी, उसी ने इस दरिंदगी को अंजाम दिया था. हालांकि उसकी प्यारी गुड़िया अब भी कमरे में टंगी हुई है लेकिन उसके दिहाड़ी मजदूर पिता मनोज, उसके लिए अस्पताल में नए खिलौने लेकर आते हैं.

बच्ची के दादा किशन ने ‘तहलका’ को बताया कि आरोपी ने बलात्कार की जगह से ब्लेड लाकर दिया है और उस दिन पहने हुए खून से सने कपड़े अपने घर से लाया है. शराब पीने के लिए इस इलाके में रोज आने वाले राहुल ने अपने मकसद को अंजाम देने के लिए उस दिन बच्ची को चाऊमीन खिलाने और 10 रुपये देने का लालच दिया था.

किशन बताते हैं, ‘इस मामले की जांच जारी है और मुझे इस घिनौने काम में कुछ और लोगों के शामिल होने का पूरा यकीन है.’ वे आगे कहते हैं कि हम नहीं चाहते कि नेहा को उस भयानक पल के बारे में कुछ भी याद रहे. वे फरियाद करते हैं, ‘हम बस उसका बेहतर भविष्य चाहते हैं. मैं दिल्ली के मुख्यमंत्री से यही चाहता हूं कि उसकी आगे की पढ़ाई और बेहतर इलाज का प्रबंध करा दें बस.’

बहरहाल, लोग अभी अखबार में छपी इस घटना की सुर्खियां भूले नहीं थे कि पश्चिमी दिल्ली के निलौठी में एक ढाई साल की नौनिहाल के साथ भी ऐसी ही घटना घट गई. वह बच्ची अपने घर के बाहर दूसरे बच्चों के साथ खेल रही थी. कुछ ही दूर रामलीला चल रही थी. बच्ची की दादी जगवती बताती हैं, ‘रामलीला में उस वक्त गाना चल रहा था. गुडिया (बदला हुआ नाम) पीले कपड़े पहने हुए मेरे धोरे (पास) ही खेल रही थी. मेरा (घर के अंदर) दूध की बोतल धरना है कि इतने में गुड़िया गायब हाे चुकी थी.’

बच्ची की खोज रात में 11:30 बजे शुरू हुई. दुर्भाग्यवश जब तीन घंटे के बाद पुलिस और परिवार को बच्ची एक किलोमीटर दूर स्थित कर्मभूमि पार्क में मिली, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. खून से लथपथ गुड़िया बेहोश पड़ी हुई थी. गुड़िया के साथ सामूहिक दुष्कर्म भी उन्हीं लोगों ने किया था, जिन्हें वह भइया कहती थी. इस मामले में दो नाबालिगों लूची (16) और सनोज (17) को पकड़ा गया है.

दोनों किशोर अपने परिवार के साथ किराये के घर में रहते हैं. नौवीं कक्षा में पढ़ने वाला लूची गुड़िया के घर से पचास मीटर की दूरी पर रहता है और गुड़िया का चचेरा भाई उसे जानता था. दूसरा आरोपी सनोज गुड़िया के घर के पीछे बने नौ छोटे कमरों में से एक में अपनी मां और तीन भाइयों के साथ रहता है. वह कुछ साल पहले ही स्कूल की पढ़ाई छोड़ चुका है.

घटना की श्रृंखलाओं को जोड़ते हुए पुलिस कहती है कि दोनों नाबालिगों ने बच्ची का अपहरण बिजली कटने के दौरान किया. एक पड़ोसी ने ‘तहलका’ को बताया, ‘बिजली जाने के दौरान लूची अपनी मां का इंतजार कर रहा था. इसके बाद वो हमारे साथ वापस रामलीला आ गया था.’ इसका मतलब है कि लूची ने बच्ची का अपहरण कर सनोज को सौंप दिया था और वापस रामलीला में आ गया. फिर वह अपनी मां को घर छोड़ने के बाद सनोज के पास पहुंचा होगा.

चौंकाने वाली बात ये है कि दोनों नाबालिग उस रात उन लोगों के साथ थे जो गुड़िया को ढूंढ़ रहे थे. अगले दिन लूची रोज की तरह स्कूल गया और सनोज आस-पड़ोस में ही घूमता रहा. लूची के एक सहपाठी ने बताया कि वह पढ़ाई में कमजोर था और कक्षा 9 में दो बार फेल हो चुका है. जिस पार्क में बच्ची का रेप हुआ उस पार्क में लूची देर रात तक बीड़ी पीता रहता था और सनोज ही उसका इकलौता साथी था.

घटना के कुछ घंटों के अंदर पुलिस ने शक के आधार पर 250 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया. देर रात छापे के दौरान पुलिस ने दोनों आरोपियों को दबोच लिया. पुलिस ने बताया कि कड़ी पूछताछ के दौरान दोनों टूट गए और इस वहशियाना हरकत को करना स्वीकार कर लिया. लेकिन ये भी एक सच्चाई है कि दबाव में किए गए कबूलनामे को अदालत स्वीकार नहीं करती. अदालत कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए ही अपराध में उनकी संलिप्तता मानेगी.

एक हफ्ते के अंदर घटी ये दोनों घटनाएं भी जैसे कम थी क्योंकि फिर राजधानी के दूसरे इलाके से ऐसी ही घटना की खबर आई. पूर्वी दिल्ली के आनंद विहार इलाके में पांच साल की मासूम के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया. आरोपी उस बच्ची को उसी के घर की दूसरी मंजिल पर ले गया. वहां तीन लोगों ने कई बार उसे अपनी हवस का शिकार बनाया. यहां भी वही मामला था. पीड़िता बहुत कम उम्र की थी, अपना दुख भी सही तरह से बयान नहीं कर सकती थी. उन क्रूर अपराधियों ने सोच-समझकर एक आसान शिकार को पकड़ा था. यहां तसल्ली देने वाली बात ये हो सकती है कि दिल्ली पुलिस ने सभी आरोपियों को पकड़ लिया है. लेकिन कहानी क्या यहीं खत्म हो जाती है?

बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों की ऐसी स्थिति में अब इस बात का अंदाजा लगाना बेहद जरूरी है कि देश की राजधानी और पूरा देश किस तरफ बढ़ रहा हैं! ऐसी घटनाओं का बार-बार होना गहरी निराशा से भर देता है. दिल्ली में जिम्मेदार अधिकारियों और चौकन्नी मीडिया की वजह से ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट तत्परता से हो जाती है पर देश के दूसरे हिस्सों में भी ऐसी जघन्य घटनाएं लगातार हो रही हैं लेकिन शर्म, बेबसी और समाज में लांछन लगने के डर से परदे में छुपी रह जाती हैं.

16 दिसंबर 2012 को घटा निर्भया कांड हमेशा एक संदर्भ के तौर पर रहेगा. जब मामला सामने आया तो लोगों में घटना को लेकर सामूहिक क्रोध था. त्वरित न्याय की मांग लिए लोग सड़कों पर उतरे थे. दिल्ली पुलिस पर सुस्त और संवेदनहीन होने के आरोप लगे. तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की ये  कहने पर खिंचाई की गई कि ऐसी घटनाओं को रोका नहीं जा सकता.

आज तीन साल बाद हम ऐसे मोड़ पर हैं जहां हमारे पास सख्त कानून के साधन हैं. जस्टिस जेएस वर्मा समिति की सिफारिशों के आधार पर विधायिका ने सख्त कानून पास किए और सरकारी मशीनरी ने उनको लागू करना शुरू किया. न्यायपालिका ने ऐसे मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का निर्माण किया. लेकिन क्या स्थिति में कोई बदलाव आया है?

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