आत्महत्या की ‘तैयारी’

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‘मम्मी-पापा…प्लीज मुझे माफ कर दीजिएगा… मैं नहीं कर सकी आप लोगों की डॉक्टर बनने की इच्छा पूरी… मैं कितना भी पढ़ लूं लेकिन मेरा चयन नहीं होगा…पिछला साल मेरा खराब हुआ पर इस साल मैं बहुत मेहनत कर रही थी… लेकिन फिर भी कोई अच्छे परिणाम नहीं मिल रहे, इसलिए मुझे माफ कर दीजिएगा मेरी हिम्मत नहीं होगी आप लोगों से नजर मिलाने की इसलिए मैं अपनी जिंदगी खत्म कर रही हूं…’

यह सुसाइड नोट 18 साल की अंजलि आनंद का है जिन्होंने 30 अक्टूबर की रात अपने हॉस्टल के कमरे में फांसी लगाकर जान दे दी. अंजलि कोटा के एक कोचिंग संस्थान से ऑल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट (एआईपीएमटी) की तैयारी कर रही थी. पिछले साल भी उसने एआईपीएमटी की परीक्षा दी थी पर अपेक्षित परिणाम नहीं मिले. इस बार फिर पिता से जिद कर उसने कोचिंग में दाखिला लिया था. पर समय के साथ अंजलि को अब यह एहसास हो चला था कि वह अपना और अपने माता-पिता का उसके डॉक्टर बनने का सपना शायद ही कभी पूरा कर पाए और इसी आत्मग्लानि में बढ़ते तनाव के चलते उसने अपना जीवन खत्म करने का फैसला कर लिया.

यह कहानी सिर्फ अंजलि की हो, ऐसा भी नहीं है. मुजफ्फरपुर (बिहार) के 17 साल के सिद्धार्थ रंजन ने भी पिछले दिनों आत्महत्या कर ली क्योंकि वह घर से इतनी दूर अकेले नहीं रहना चाहता था. आत्महत्या से दो दिन पहले ही उसने अपने माता-पिता को अपने साथ कोटा आकर रहने के लिए कहा था. रंजन भी मेडिकल क्षेत्र में जाने की तैयारी के लिए कोटा गया था, लेकिन मां-बाप से दूर रहना उसे रास नहीं आ रहा था. पढ़ाई में प्रतिस्पर्धा के दबाव और परिवार से दूर अकेले रहने से वह तनाव में था. जिससे बाहर निकलने के लिए उसने आत्महत्या का रास्ता चुना.

कोटा एक समय मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं में बेहतर परिणाम देने के लिए जाना जाता था, पर इन दिनों छात्रों द्वारा आत्महत्या के बढ़ते मामलों को लेकर सुर्खियों में है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, वर्ष 2014 में कोटा में 45 छात्रों ने आत्महत्या की जो 2013 की अपेक्षा लगभग 61.3 प्रतिशत ज्यादा थी. इस साल अक्टूबर तक यह संख्या 30 के करीब पहुंच गई है. अक्टूबर माह में ही ऐसे छह मामले सामने आ चुके हैं. सबसे पहले दो अक्टूबर की दोपहर राजस्थान के ही पाली जिले के रहने वाले ताराचंद ने अपने कमरे में फांसी लगा ली. उसके बाद जैसे आत्महत्या का सिलसिला चल पड़ा. 13 अक्टूबर को सिद्धार्थ चौधरी, 21 अक्टूबर को अमितेश साहू, 27 अक्टूबर को विकास मीणा और 30 अक्टूबर को हर्षदीप कौर और अंजलि आनंद ने भी खुद को मौत के हवाले कर दिया. इससे पहले भी इसी साल जून माह में भी एक हफ्ते के अंदर ऐसे चार मामले सामने आए थे.

कोचिंग संस्थान भले ही दबाव न डालने की बात कहें लेकिन यहां के प्रतिस्पर्धा भरे माहौल में तैयारी करने वाले बच्चे दबाव महसूस न करें ऐसा संभव नहीं

अधिकांश मामलों में देखा गया कि बच्चों पर पढ़ाई का दबाव तो था ही पर उससे ज्यादा दबाव अपने परिवार की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का था. अंजलि के इतर अगर ताराचंद की बात की जाए तो कोटा की प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बनना उसका अपना ही फैसला था. लेकिन जब उसने कोटा की प्रतिस्पर्धा में खुद को पिछड़ता पाया तो वह यह दबाव सह न सका. खेती किसानी कर पेट पालने वाले ताराचंद के पिता सोहनलाल बताते हैं, ‘वह डॉक्टर बनना चाहता था. हमेशा स्कूल में अव्वल आया करता था. एक दिन उसने मुझसे कहा कि वह कोटा जाकर अपने इस सपने को पूरा करना चाहता है तो हमने उसे वहां भेज दिया. हम तो उसकी हर जरूरत का ख्याल रखा करते थे, फिर भी उसने न जाने क्यों ऐसा कदम उठाया.’ ताराचंद पर भले ही अंजलि की तरह अच्छे परिणाम देने के लिए माता-पिता का दबाव नहीं था पर वह कोटा आने के अपने फैसले के कारण अपने परिवार पर जो आर्थिक बोझ डाल चुका था, उसी वजह से दबाव में था. उसने अपने सुसाइड नोट में लिखा भी है ‘आपने मेरी पढ़ाई के लिए सब किया पर मैंने आपका विश्वास तोड़ा.’

डॉ. एमएल अग्रवाल कोटा में मनोचिकित्सक हैं और नियमित रूप से पढ़ाई के तनाव से जूझ रहे छात्रों से मिलते रहते हैं. उनका कहना है कि अभिभावकों को बच्चों के प्रदर्शन के प्रति थोड़ा सहयोगात्मक रवैया रखना चाहिए. वह बताते हैं, ‘अक्सर अभिभावक अपने बच्चे के जन्म से ही उसका भविष्य निर्धारित कर लेते हैं कि उसे बड़ा होकर डॉक्टर बनना है या इंजीनियर? ऐसा अक्सर इसलिए भी होता है क्योंकि अभिभावक अपने कुछ अधूरे सपने जो वे स्वयं पूरे नहीं कर सके, अपने बच्चों से पूरा करवाना चाहते हैं. दबाव का मुख्य कारण यही होता है कि एक बच्चे की रुचि-अरुचि जाने बिना ही उसे डॉक्टर, इंजीनियर बनाने की भट्टी में झोंक दिया जाता है. वह ना-नुकुर करे तो धमकाया जाता है, शादी कराने जैसे अनुचित दबाव बनाए जाते हैं, या फिर बच्चा अपनी मर्जी से भी करिअर के इन क्षेत्रों का रुख करे और बाद में कदम पीछे खींचना चाहे तो मां-बाप उसे फीस के बर्बाद होने की दुहाई देते हैं. एक तरफ बच्चों पर परिवार का यह दबाव होता है तो दूसरी तरफ प्रतिस्पर्धा का, जो तनाव का मुख्य कारण बनता है.’

‘तहलका’ से बातचीत में छात्रों ने भी मनोचिकित्सक की इस बात का समर्थन किया कि बच्चों पर संस्थान की पढ़ाई से ज्यादा, अभिभावकों की उम्मीदों पर खरा उतरने का दबाव होता है. 23 साल के आशीष मिश्रा अपने साथी के साथ हुए एक वाकये को याद करते हुए बताते हैं, ‘उसका चयन आईआईटी के केमिकल इंजीनियरिंग कोर्स में हो गया था, पर उसके माता-पिता चाहते थे कि वह एक और साल ड्रॉप करके कम्प्यूटर इंजीनियरिंग कोर्स के लिए तैयारी करे. आखिर में उसने खुदकुशी कर ली और एक चिट्ठी में अपने मां-बाप से माफी मांगते हुए लिख गया कि वह उनकी सब उम्मीदें पूरी नहीं कर सका.’

आशीष खुद भी माता-पिता के दबाव के कारण कोटा आए थे. वे गायक बनना चाहते थे. इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में अंक अच्छे नहीं आए पर एक और साल कोचिंग में न गंवाते हुए उन्होंने देहरादून के एक कॉलेज में एडमिशन ले लिया. फिलहाल वे बेरोजगार हैं पर उनकी परेशानी यह नहीं है. अब उनके माता-पिता उन्हें आईआईएम में देखना चाहते हैं. जिसके लिए आशीष पर अब कैट (कॉमन एडमिशन टेस्ट) पास करने का दबाव है.

लेकिन अंजलि के पिता महेश कुमार अंजलि पर किसी भी प्रकार का दबाव न होने की बात कहते हैं और इसके लिए कोचिंग संस्थान को जिम्मेदार ठहराते हैं. वह कहते हैं, ‘मेरी बेटी ने खुद ही मेडिकल की पढ़ाई करने का फैसला किया था. वह एक बार असफल हुई तो हमने मना भी किया पर वो जिद पर अड़ गई. उसकी जिद के आगे हमने उसे फिर से कोटा भेज दिया. आत्महत्या से पहले उसका फोन आया था. कोचिंग के टेस्ट में उसके नंबर कम आए थे. वो निराशा में कह रही थी कि मैं पूरी मेहनत कर रही हूं फिर भी रिजल्ट सही नहीं आ रहे. तो मैंने उसे समझाया कि सिर्फ टेस्ट ही तो है क्या हुआ, अंतिम परीक्षा में अच्छा करना और नहीं भी हुआ चयन तो आप चाहो तो अगली बार भी तैयारी कर सकती हो, कोई दबाव नहीं है. इसके बाद भी उसने ऐसा कदम उठाया तो इसके लिए सिर्फ कोचिंग संस्थान जिम्मेदार है. वह पढ़ाई का इतना दबाव बना देते हैं कि अपेक्षित परिणाम न मिलने पर छात्र हताशा का शिकार हो जाता है. वहां छात्रों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता जिससे तनाव में आने पर वह आत्महत्या जैसा कदम उठा लेता है. अगर मेरी बेटी की ठीक ढंग से काउंसलिंग की गई होती तो वह कभी ऐसा कदम नहीं उठाती.’

उधर, कोटा के कोचिंग संस्थान इस बात को नकारते हैं कि वे बच्चों पर किसी तरह का दबाव डालते हैं. उनका मानना है कि संस्थान बच्चों पर दबाव नहीं डालते, ये अभिभावकों की उम्मीदें होती हैं जिससे बच्चे दबाव में आ जाते हैं. एक प्रमुख कोचिंग संस्थान के मीडिया और मार्केटिंग हेड नितेश शर्मा बताते हैं, ‘हम छात्रों पर किसी भी तरह का कोई दबाव नहीं डालते. हमारे यहां तो समय-समय पर मोटिवेशनल लेक्चर भी कराए जाते हैं, जिससे छात्र तनाव में न आए. साथ ही हमने अपने शिक्षकों से भी कहा है कि अगर कोई छात्र जल्दी तनावग्रस्त हो जाता है तो उस पर तुरंत ध्यान दें. वे आगे बताते हैं, ‘कोटा में देश के सर्वश्रेष्ठ कोचिंग संस्थान हैं और हर साल देशभर से लाखों बच्चे यहां आते हैं. ऐसे में यदि कोई छात्र किसी असफल निजी रिश्ते या किसी और वजह से भी आत्महत्या करता है, तब भी पढ़ाई के दबाव को ही जिम्मेदार बताया जाता है.’

कोचिंग संस्थान भले ही बच्चों पर दबाव न डालने की बात कह रहे हों लेकिन कोटा के प्रतिस्पर्धात्मक माहौल में तैयारी करने वाले बच्चे दबाव महसूस न करें ऐसा संभव नहीं. राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग प्रथम वर्ष के छात्र राज ने भी कोटा के एक प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थान में पढ़ाई की है. छात्रों पर कोचिंग द्वारा पड़ने वाले दबाव के बारे में वे बताते हैं, ‘कोचिंग में प्रतिदिन डेढ़-डेढ़ घंटे की तीन क्लास लगती हैं. 5 घंटे कोचिंग में ही चले जाते हैं. कभी-कभी तो सुबह पांच बजे कोचिंग पहुंचना होता है तो कभी कोचिंग वाले अपनी सुविधानुसार दोपहर या शाम को क्लास के लिए बुलाते हैं. एक फिक्स टाइम नहीं होता जिस कारण एक छात्र के लिए अपनी दिनचर्या के साथ तालमेल बिठाना मुश्किल हो जाता है. वह अपने लिए पढ़ाई और मनोरंजन की गतिविधियों के लिए एक निश््चित समय निर्धारित ही नहीं कर पाता, जिससे उस पर तनाव हावी होता है. ऊपर से 500-600 बच्चों का एक बैच होता है, जिसमें शिक्षक और छात्र का तो इंटरेक्शन हो ही नहीं पाता. अगर एक छात्र को कुछ समझ न भी आए तो वह इतनी भीड़ में पूछने में भी संकोच करता है. विषय को लेकर उसकी जिज्ञासाएं शांत नहीं हो पातीं. तब धीरे-धीरे उस पर दबाव बढ़ता जाता है. इस स्थिति में जो अपने परिवार के साथ रहते हैं, उन्हें तो परिजनों के कारण दबाव से उबरने में सहयोग मिल जाता है पर जो परिवार से दूर बाहर से आकर कोटा में तैयारी कर रहे हैं उन पर अकेलेपन के कारण तनाव और नकारात्मकता हावी हो जाती है. ऐसे ही अधिकांश छात्र आत्महत्या करते हैं.’ राज का कहना ठीक जान पड़ता है क्योंकि इस साल कोटा में अब तक 30 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं जिनमें से 25 कोटा से बाहर के हैं.

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डॉ. राजश्री का बेटा कोटा के ही एक कोचिंग संस्थान से आईआईटी की तैयारी कर रहा है. वह बताती हैं, ‘मां-बाप का तो दबाव बच्चों पर रहता ही है पर कोचिंग संस्थानों का पढ़ाने का जो मॉडल है वह एक छात्र के अंदर हीन भावना को बढ़ावा देता है. इन कोचिंग संस्थानों में प्रवेश के लिए सबसे पहले तो एक प्रवेश परीक्षा ली जाती है, जिसमें आए अंकों के आधार पर बैच बनाए जाते हैं. उसके बाद हर महीने कठिन से कठिन पैटर्न पर छात्रों के टेस्ट लिए जाते हैं. दबाव की मूल वजह ये बैच और टेस्ट ही हैं. जिस छात्र के टेस्ट में कम अंक आते हैं उसे नीचे वाले बैच में भेज दिया जाता है. जो उसके मन में हीन भावना को बढ़ावा देता है. मेरे बेटे के साथ भी ऐसा हुआ और वह बहुत ही ज्यादा तनाव में आ गया था, लेकिन तब मैंने उसे समझाया कि टेस्ट नहीं मुख्य परीक्षा पर ध्यान लगाओ.’

डॉ. अग्रवाल कहते हैं, ‘2007 मे जिला प्रशासन की सहायता से हमने छात्रों की काउंसलिंग करने के लिए होप हेल्पलाइन की शुरुआत की थी. हर रोज 5-6 तनावग्रस्त छात्रों के फोन इस पर आया करते थे. जब उनसे बात करते तो अधिकांश समय तनाव की मूल वजह कोचिंग संस्थानों का टेस्ट पैटर्न ही हुआ करता था.’  डॉ. राजश्री कहती हैं, ‘मेरा बच्चा तनाव में था तब मैं तो उसके साथ थी, लेकिन जो छात्र अपने परिवार से दूर रह रहे हैं, समस्या उनके सामने खड़ी होती है.’

पूर्व छात्र नेता और वर्तमान में एक एनजीओ से जुड़े प्रमोद सिंह इन संस्थानों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘कोचिंग वाले एक छात्र से एक से डेढ़ लाख रुपये फीस वसूलते हैं लेकिन इन्हें यह तक पता नहीं होता कि जो छात्र इनके यहां दाखिला ले रहे हैं, वो बैच में उपस्थिति दर्ज करा भी रहे हैं या नहीं? इसका कोई सिस्टम ही नहीं है, जिसका लाभ उठाकर छात्र क्लास बंक कर सिनेमा और मॉल पहुंच जाते हैं. यही छात्र कई बार भटक जाते हैं और गलत संगत में पड़ खुद पर एक अनावश्यक दबाव बना बैठते हैं. पढ़ाई में पिछड़ते हैं वो एक अलग बात है. इसका एक और पक्ष यह है कि जब आपको पता ही नहीं कि कौन आपके यहां छात्र है तो आप काउंसलिंग किसकी और कैसे करेंगे? पैसे कमाना ही इन संस्थानों का ध्येय बन गया है बस.’

जो परिवार से दूर रहकर कोटा में तैयारी कर रहे हैं उन पर अकेलेपन के कारण तनाव हावी हो जाता है. ऐसे ही अधिकांश छात्र आत्महत्या करते हैं

आत्महत्या के अन्य कारणों पर बात करते हुए डॉ. अग्रवाल बताते हैं, ‘छात्रों की आत्महत्या के पीछे कम उम्र में प्रेम संबंध बन जाना या प्रेम संबंध बनाने की इच्छा भी एक बड़ा कारण है. कई बार इन संबंधों की असफलता भी आपको ऐसा कदम उठाने के लिए मजबूर कर देती है. आपका कोई पार्टनर न हो तब भी एक छात्र कुंठित महसूस करता है. मेरे पास ऐसी ही एक छात्रा का फोन आया था जिसने कहा कि मेरा  कोई बॉयफ्रेंड नहीं है. जबकि मेरे सारे दोस्तों के हैं. इसलिए वह खुद से नफरत करती है.’

छात्रों पर दबाव का एक अन्य कारण यह भी देखा गया है कि कोचिंग संस्थान सालभर की एकमुश्त फीस दाखिले के समय ही जमा करा लेते हैं. इसलिए छात्र कदम पीछे खींचना भी चाहे तो नहीं खींच पाते. इनकी रिफंड पॉलिसी होती भी है तो ऐसी कि पैसा वापसी के समय छात्रों का आधे से अधिक पैसा तो ये संस्थान डकार ही जाते हैं.

हालांकि इन सबके बीच राहत की बात यह है कि जिला प्रशासन ने छात्रों की समय-समय पर मनोचिकित्सक द्वारा काउंसलिंग, कोचिंग संस्थान में अनिवार्य मनोचिकित्सक की नियुक्ति, दाखिले के समय छात्र की स्क्रीनिंग, सप्ताह में एक अनिवार्य अवकाश, तनावपूर्ण बैच व्यवस्था और फीस जमा- वापसी आदि कारकों को ध्यान में रख एक 13 बिंदुओं का विस्तृत आदेश कोचिंग संचालकों को जारी किया है. कोचिंग संचालक भी छात्रों की काउंसलिंग को लेकर गंभीर होने का दावा कर रहे हैं. लेकिन प्रशासन और कोचिंग संचालक वाकई गंभीर हैं यह देखना होगा. क्योंकि इससे पहले भी  2007 में ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर प्रशासन ने तत्परता दिखाते हुए डॉ. एमएल अग्रवाल की सहायता से छात्रों की काउंसलिंग के लिए ‘होप’ हेल्पलाइन का शुभारंभ किया था. उस समय सभी कोचिंग संचालकों ने संयुक्त रूप से इस पर आने वाले खर्चे को उठाने की बात कही थी. डॉ. अग्रवाल बताते हैं, ‘लेकिन कुछ ही समय बाद न तो प्रशासन ने इस पर ध्यान दिया और कोचिंग संचालकों ने भी खर्चा देने से इंकार कर दिया. 2013 तक हम इसे अपने खर्च पर चलाते आए. एक दिन में औसतन हमारे पास 5-6 फोन आते थे. इस दौरान कोटा में छात्रों की आत्महत्या की दर एक तिहाई तक कम हो गई थी.’

देखा यह भी गया है कि कई बार अभिभावक बहुत ही छोटी उम्र से ही बच्चों को कोचिंग के लिए भेजने लगते हैं. यहां कक्षा छह से ही तैयारी करने वाले बच्चे मिल जाएंगे, पर ज्यादातर बच्चे दसवीं या बारहवीं के बाद ही यहां आते हैं. कोचिंग संस्थान ये स्वीकारते तो नहीं हैं पर जो बच्चे दसवीं के बाद कोचिंग शुरू करते हैं उन्हें स्कूल जाने की जरूरत नहीं होती. कुछ छात्रों के मुताबिक बाहर से आए बच्चों को संस्थान की तरफ से स्कूलों की सूची दी जाती है जिससे वे चुन सकें कि उसे किस स्कूल से शैक्षणिक सर्टिफिकेट चाहिए. एक छात्र बताता है, ‘ये सिर्फ एक औपचारिकता है, मुझे तो याद भी नहीं कि मैंने कौन सा स्कूल चुना है. हमें बस सीधे बोर्ड परीक्षाएं देनी होती हैं.’ इस छात्र का कोचिंग में दूसरा साल है और अगले मार्च में ये बोर्ड की परीक्षाएं देगा. हालांकि संस्थानों का कहना है कि बच्चे दिन में स्कूल जाते हैं और शाम को कोचिंग. इस पर विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूल में बच्चे का सम्पूर्ण विकास होता है. स्कूल की दिनचर्या कुछ ऐसी होती है कि बच्चे सुबह मन की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं तो इंटरवल में वह खेलते भी हैं. साथ ही शिक्षक और अपने सहपाठियों से भी उनका जुड़ाव रहता है जिससे नकारात्मक विचार उनके दिमाग में नहीं आते. लेकिन कोचिंग संस्थानों की यह प्रतिस्पर्धा उन्हें इस सबसे अलग कर देती है.

कोटा के ही मोदी कॉलेज के प्रधानाध्यापक डॉ. एलके दधीच कहते हैं, ‘छात्र किसी प्रयोगशाला का कोई प्रयोग नहीं होता, जिसे चाहेे जिस रूप में ढाल लें. अभिभावकों को यह समझना चाहिए और प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने के डर से मौत को गले लगाने वाले छात्रों को भी कि डॉक्टर-इंजीनियर बनना ही जिंदगी बनाने का एकमात्र विकल्प नहीं हैं. विकल्प और भी हैं.’ कोटा में साल के किसी भी समय अंदाजन 1.5 लाख छात्र मेडिकल या इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए मौजूद होते हैं. ये सभी अपने-अपने स्कूल अथवा बोर्ड में टॉप करके आए होते हैं. कोई बूंदी से टॉप करके आता है, कोई पटना से तो कोई मुरैना या जालौन से. टॉपर के बीच होने वाली इस प्रतिस्पर्धा में स्वाभाविक है सभी का तो चयन होना नहीं है, लेकिन हमेशा टॉप करने वाला एक छात्र जब खुद को पिछड़ा पाता है तो उसे यह स्वीकार नहीं होता. डॉ. दधीच कहते हैं, ‘जहां नौकरियां हैं वहां बच्चे नहीं हैं. कई ऐसे पाठ्यक्रम हैं जिनमें डॉक्टर और इंजीनियर के पेशे से ज्यादा पैकेज मिलने की संभावना होती है. जागरूकता के अभाव के चलते कोई उनकी ओर रुख नहीं करता. सरकारी स्तर पर अगर करिअर काउंसलिंग को बढ़ावा दिया जाए तो स्थिति में काफी हद तक सुधार लाया जा सकता है.’

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