मुअनजोदड़ो की जगह अगर मोहेंजो दारो हो गया तो भाई किसके घाव दुख गए : नरेंद्र झा | Tehelka Hindi

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मुअनजोदड़ो की जगह अगर मोहेंजो दारो हो गया तो भाई किसके घाव दुख गए : नरेंद्र झा

नब्बे के दशक के प्रसिद्ध धारावाहिक ‘शांति’ से शुरुआत करने वाले अभिनेता नरेंद्र झा का सफर धारावाहिक ‘बेगूसराय’ से होता हुआ बॉलीवुड तक पहुंच चुका है. इसी साल फरवरी में रिलीज हुई फिल्म ‘घायल वंस अगेन’ में उन्होंने मुख्य खलनायक का किरदार निभाया. हाल ही में हृतिक रोशन के साथ उनकी फिल्म ‘मोहेंजो दारो’ रिलीज हो चुकी है. उनसे बातचीत.

प्रशांत वर्मा 2016-08-31 , Issue 16 Volume 8

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आप छोटे परदे पर लंबे समय तक काम करने के बाद फिल्मों में आए. दोनों माध्यमों में क्या अंतर पाते हैं?

टेलीविजन के लिए काम करते हुए आपको सोचने का मौका नहीं मिलता है. फिल्मों में आपको इसका मौका मिलता है. टेलीविजन का अपना एक गणित होता है जिसके तहत एक दिन के लिए आपका तय काम निर्धारित होता है जो आपको करना ही पड़ता है. फिल्म की बात दूसरी होती है. ये आर्काइवल मटेरियल होती हैं. यहां पर सोचने का वक्त भरपूर होता है. बाकी जब एक्टिंग कर रहे होते हो तो भले ही सोचने का कम वक्त मिला हो लेकिन ऐसा नहीं है कि फिल्मों के लिए 100 फीसदी देते हो और टीवी के लिए 75 फीसदी. दोनों ही माध्यमों में आपको अपना 100 फीसदी देना पड़ता है.

क्या शुरू से तय था कि अभिनय की दुनिया में जाना है?

नहीं, शुरू से ये तय नहीं था कि अभिनय के क्षेत्र में जाना है. बचपन में जरूर मैं नाटकों में भाग लिया करता था. यह मेरे गांव कोइलख की देन थी. कोइलख मधुबनी क्षेत्र का बहुत ही प्रसिद्ध इलाका है. यहां 1922-23 में नाट्य परिषद की नींव पड़ गई थी. इसके तहत गांव में काफी सारे सांस्कृतिक आयोजन हुआ करते थे. संगीत में मेरी रुचि रही है, लेकिन अभिनय के लिए ऐसा कुछ नहीं था. हालांकि नाटक वगैरह किया करता था. गांव में झांसी की रानी पर आधारित एक नाटक में मैं अंग्रेज अधिकारी का किरदार निभाया करता था. इसके बाद पोस्ट ग्रैजुएशन के लिए जब जेएनयू आया तो लगा कि अब अभिनय मुझे पुकार रहा है. आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि जो हुआ अच्छे के लिए हुआ.

गांव की बात आई है तो अपने गांव से मुंबई तक के सफर के बारे में बताइए. ये सफर कैसा और कितना संघर्षों भरा रहा?

मैं बिहार के मधुबनी जिले का रहने वाला हूं. पढ़ाई-लिखाई बिहार और दिल्ली में हुई है. पोस्ट ग्रैजुएशन जेएनयू से किया. फिर तकरीबन साल भर तक सिविल सेवा की तैयारी की. उसके बाद दिल्ली में ही अभिनय में डिप्लोमा किया. इसके बाद निकल पड़ा मुंबई के लिए. ये 1993-94 की बात है. यहां आने के बाद मुझे मॉडलिंग असाइनमेंट्स और ऐड फिल्में मिलने लगीं. लंबा-चौड़ा था और दिखने में भी ठीक-ठाक था इसलिए संघर्ष के नाम पर मुझे ऐसा कुछ करना नहीं पड़ा. इस मामले में मैं भाग्यशाली रहा. उसी दौरान मुझे ‘शांति’ सीरियल में काम करने का मौका मिल गया. वहां से टेलीविजन सीरियलों में काम करने का सिलसिला चला तो वो सफर रुका ही नहीं. 2002-03 में जब आम्रपाली सीरियल कर रहा था तो फिल्म ‘फंटूश’ का ऑफर मिल गया. इसके बाद श्याम बेनेगल की फिल्म ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस : द फॉरगटन हीरो’ मिल गई. इस फिल्म में मैंने हबीब-उर-रहमान का किरदार निभाया था. 2005 में ‘बाहुबली’ फेम निर्देशक एसएस राजमौली की फिल्म ‘छत्रपति’ की, जिसमें मैंने विलेन का किरदार निभाया था. इसके बाद दक्षिण की कई सारी फिल्में कीं. इस बीच टेलीविजन पर अभिनय का सिलसिला भी जारी रहा. टेलीविजन से फिल्म और फिल्म से टेलीविजन चल रहा था. फिर ‘हैदर’ के लिए विशाल भारद्वाज जी का कॉल आया कि आप बहुत अच्छी एक्टिंग करते हैं आपको मुख्यधारा के सिनेमा में आना चाहिए. तब मैंने कहा कि अब निश्चित रूप से आ जाऊंगा. ‘हैदर’ में मैंने शाहिद के पिता का किरदार निभाया, जिसकी काफी तारीफ हुई. फिर सनी देओल की ‘घायल वंस अगेन’ में मुख्य विलेन का किरदार निभाया.

मैं पूरी तरह से अनसेंसरशिप के पक्ष में नहीं हूं. बहुत सारी ऐसी फिल्में हैं जिनमें दिखाए गए कुछ पक्षों और मुद्दों को वैसे ही छोड़ दिया जाए तो हो सकता है देश में अराजकता या दंगे फैल जाएं

जब अभिनय के क्षेत्र से जुड़ने की बात घरवालों को बताई तो उनकी क्या प्रतिक्रिया थी? क्या वे इस बात के लिए तैयार थे?

इस मामले में मेरा अनुभव अच्छा रहा. मेरे पिता हायर सेकंडरी स्कूल के हेडमास्टर हुआ करते थे. उनको जब मैंने अभिनय करने की बात बताई तो उन्होंने कहा कि बड़ी ही अच्छी बात है. आपको अगर लग रहा है तो आप अभिनेता बनिए. लेकिन उसके लिए कोई कोर्स कर लें ताकि जब मुंबई जाएं तो बता सकें कि आप प्रशिक्षित कलाकार हैं क्योंकि किसी भी विधा में प्रशिक्षित लोगों को ज्यादा तवज्जो मिलती है.

दक्षिण की तमाम फिल्में करने के बाद अब आप बॉलीवुड में सक्रिय हैं. बॉलीवुड और टॉलीवुड में क्या अंतर पाते हैं?

मैंने देखा है टॉलीवुड में शेड्यूल का बहुत ख्याल रखा जाता है. सुबह सात बजे का समय रखा गया है तो ठीक समय पर काम शुरू हो जाता है. बॉलीवुड में थोड़ी-सी छूट ले ली जाती है. बाकी दोनों जगहों पर प्रोफेशनलिज्म है. दोनों जगहों के कलाकार बहुत मेहनती और प्रबुद्ध लोग हैं. तकनीक के लिहाज से भी देखा जाए तो मैं नहीं मानता कि बॉलीवुड पीछे है. हमारे यहां भी एक से बढ़कर एक फिल्में बन रही हैं.

आपकी फिल्म ‘मोहेंजो दारो’ रिलीज हो चुकी है. दर्शकों की प्रतिक्रिया भी ठीक है, हालांकि सोशल मीडिया पर फिल्म के कॉस्टयूम, नाम और कालखंड को लेकर कुछ लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं.

आशुतोष गोवारिकर बहुत ही कमाल के निर्देशक हैं. आप ये देखिए कि इस तरह के प्रोजेक्ट को कितने लोग शुरू कर पाते हैं. मैं जेएनयू से प्राचीन भारतीय इतिहास में पोस्ट ग्रैजुएट हूं. मैं आपको क्या बताऊं जब मैं पहली बार सेट पर पहुंचा तो मुझे वाकई में लगा कि मैं मोहेंजो दारो में खड़ा हूं. सेट इतना सटीक बनाया गया था. इसके बावजूद ये सब (सिनेमा) है तो मनोरंजन ही. अगर थोड़ी-सी छूट लेकर ऐसी फिल्म बनाई गई है तो मुझे लगता है कि लोगों को उसे देखना चाहिए. ये कोई ऐतिहासिक डॉक्यूमेंट्री फिल्म नहीं है. इसे ऐसे नहीं देखा जाना चाहिए कि जी, यहां पर वो चीज रख दी और उसे हटा दिया. ये गलत है. ऐसा करने वाले वे लोग होते हैं जिनका काम ही होता है विवाद पैदा करना. कुछ आलोचना करने वाले होते हैं तो कुछ तारीफ करने वाले. ये सब तो चलता रहता है. ऐसी चीजें एक तरह से फिल्म की मदद ही करती हैं.

जहां तक नाम की बात है तो ‘मोहेंजो दारो’ और ‘मुअनजोदड़ो’ दोनों सही हैं. उदाहरण के तौर पर देखें तो मेरे गांव का नाम है कोइलख. इसका नाम कोकिलाक्षी देवी के नाम पर किसी जमाने में कोकिलाक्षी था, जो बाद में होते-होते कोइलख हो गया. जिन्होंने मुअनजोदड़ो कहा है, उन्होंने बिल्कुल सही कहा है. लेकिन ‘मुअनजोदड़ो’ की जगह अगर ‘मोहेंजो दारो’ हो गया तो भाई किसके घाव दुख गए? क्या हो गया? अगर बॉम्बे से मुंबई हो गया तो ऐसा थोड़े न हुआ कि बांद्रा कांदिवली में चला गया और कांदिवली बांद्रा हो गया.

‘मोहेंजो दारो’ में नरेंद्र ने जखीरो का किरदार निभाया है, जिसके बाप-दादा ने मोहेंजो दारो की नींव रखी हुई है. जखीरो का दिमागी संतुलन ठीक नहीं होता है. वे इस फिल्म के अलावा शाहरुख खान के साथ ‘रईस’, हृतिक रोशन के साथ ‘काबिल’ और ‘माई फादर इकबाल’ नाम की फिल्मों में नजर आएंगे

‘मोहेंजो दारो’ में नरेंद्र ने जखीरो का किरदार निभाया है, जिसके बाप-दादा ने मोहेंजो दारो की नींव रखी हुई है. जखीरो का दिमागी संतुलन ठीक नहीं होता है. वे इस फिल्म के अलावा शाहरुख खान के साथ ‘रईस’, हृतिक रोशन के साथ ‘काबिल’ और ‘माई फादर इकबाल’ नाम की फिल्मों में नजर आएंगे

आप सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सेंसर बोर्ड) की पूर्व सीईओ पंकजा ठाकुर के पति हैं. क्या कभी ऐसा हुआ कि आपकी कोई फिल्म फंस गई हो? पिछले कुछ समय से सेंसर बोर्ड काफी विवादों में रहा है, इसे किस नजर से देखते हैं?

नहीं-नहीं, ऐसा कभी नहीं हुआ कि मेरी कोई फिल्म सेंसर बोर्ड की वजह से फंसी हो. दूसरी बात मैं पूरी तरह से अनसेंसरशिप के पक्ष में भी नहीं हूं. क्या है कि बहुत सारी ऐसी फिल्में हैं जिनमें दिखाए गए कुछ पक्षों और मुद्दों को वैसे ही छोड़ दिया जाए तो हो सकता है देश में अराजकता फैल जाए, दंगे भड़क जाएं. अगर एक संस्था इन सब चीजों को देख रही है तो उसे देखने दीजिए न.

कोई भी कैंपस हो- जेएनयू, डीयू या कोई और, अगर भारत के खिलाफ कहीं पर नारा लगता है तो वो सख्त कार्रवाई के लायक है. वहां वही कार्रवाई होनी चाहिए जो सीमा पर दुश्मनों के साथ की जाती है

आपका निकनेम ‘कन्हैया’ है और आपने जेएनयू से पढ़ाई भी की है. जेएनयू के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार से जुड़े विवाद और सरकार के रुख पर क्या सोचते हैं?

ये मसला अभी जांच के दायरे में है और इसकी अभी जांच हो रही तो मुझे लगता है कि मुझे कुछ बोलना नहीं चाहिए. वैसे एक बात आप जान लीजिए कोई भी कैंपस हो- जेएनयू, डीयू या कोई और, अगर भारत के खिलाफ कहीं पर नारा लगता है तो वो सख्त कार्रवाई के लायक है. वहां वही कार्रवाई होनी चाहिए जो सीमा पर दुश्मनों के साथ की जाती है. बाकी का जो मसला है उसे किस तरह से हैंडल किया गया है ये अभी जांच के दायरे में है इसलिए मैं इस पर कुछ नहीं बोलना चाहूंगा. बाकी देशद्रोह का जो मामला है उसे कहीं से भी बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए.

सनी देओल की फिल्म ‘घायल वंस अगेन’ में आपने मुख्य खलनायक का किरदार निभाया है. इससे पहले फिल्म ‘घायल’ में ये किरदार अमरीश पुरी ने निभाया था. अमरीश पुरी की तुलना में इस फिल्म में अपनी भूमिका के साथ कितना न्याय कर पाए हैं?

सच पूछिए तो दोनों भूमिकाओं की कोई तुलना नहीं थी, वो समय दूसरा था. वो 1990 की बात थी ये 2016 की बात है. समय, मुद्दा और बहुत सारी बातें अब बिल्कुल अलग-अलग हो चुकी हैं. जहां तक रोल के निर्वाह की बात है तो मेरे दिमाग में तुलना नाम की कोई चीज ही नहीं थी.

फिल्म में जो रोल मुझे दिया गया उसका निर्वाह मैंने उसी तरह से किया जैसा निर्देशक सनी देओल ने मुझसे उम्मीद की थी और मुझे इस बात की खुशी है कि उस रोल को सराहा गया. जब फिल्म का सीक्वल बनता है तो जाहिर-सी बात है कि कहीं न कहीं एक जिम्मेदारी तो रहती ही है, एक नैतिक दबाव बना रहता है कि उस रोल को फलाने ने किया था और अब वो रोल तुम कर रहे हो. समय और मुद्दे बदल गए हैं लेकिन अपेक्षाएं तो जुड़ी ही रहती हैं. मुझे लगता है कि इन सब चीजों से प्रभावित हुए बिना आपको जो काम दिया गया है उसका निर्वहन करें यकीनन आपको सफलता मिलेगी.

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 16, Dated 31 August 2016)

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