यथा नाम तथा अंजाम

BABCOOFIYAN

हबीब फैजल कहानियां मजेदार लिखते हैं. असल जिंदगी के आस-पास. लेकिन उनकी कहानियों के कागज जब यशराज पहुंचते हैं तो पहले स्क्रिप्ट और बाद में फिल्म अलग-अलग प्लास्टिक आवरणों में लपेट कर असल से दूर कर दी जाती हैं. इसके बाद वे फिल्में हमारी जिंदगियों में उतना ही झांक पाती हैं जितना किसी ट्रैफिक सिग्नल पर खड़े होकर गुजरती-रुकती कारों में ताक-झांक कर कोई दुनिया जान पाता है. यही वजह है शायद, कि आज भी हबीब फैजल की लिखी-बनाई सबसे अच्छी फिल्म वह है जो यशराज की नहीं है. दो दूनी चार. और बेवकूफियां में हालांकि फैजल सिर्फ लेखक हैं लेकिन जितनी इज्जत से दो दूनी चार दिल्ली और उसके किरदारों का सर-पैर नापती है उसकी आठ-दस सूत इज्जत भी अगर ‘बेवकूफियां’ की निर्देशक नूपुर दिल्ली को दे इसे थोड़ा नाप लेती तो इस कहानी को परदे पर देखने में मजा जरूर आता.

जाहिर है कहानी कागज पर अच्छी है. सच्ची भी. लड़के के पास नौकरी है, गाड़ी है, विकास है. लड़की के पास भी यह सब कुछ है. क्रेडिट कार्ड प्लेटिनम है और लड़के के पास गोल्ड. लड़की चाहती है कि लड़का उसके पिता को इंप्रेस करे और लड़की के पिता जी नहीं चाहते कि वे इंप्रेस हों. तीनों आपस में खो-खो जैसा कुछ खेल ही रहे होते हैं कि अचानक से हवाई जहाज वालों के लिए रिसेशन आ जाता है, और लड़के के पास कुछ नहीं बचता. लड़की के पास अब भी सब कुछ बचा रहता है और संग पिता भी रहते हैं. लड़के को पिता जी का दिल जीतना है और बिल भी भरना है. ऐसे वक्त में बेरोजगार लड़के के लिए लड़की एटीएम बनती है और कहानी का यही वो हिस्सा है जो फिल्म को बहुत शानदार बना सकता था, अपने अनुभव हमसे बांट सकता था, हमारे अनुभव परदे पर जीवित कर सकता था. अगर आपने अपनी गर्लफ्रेंड के पैसों पर कभी बेरोजगारी के दिन काटे हों, उसके पैसों पर फिल्में देखी हों, शहर घूमा हो, तो आप समझ सकते हैं कि कितनी घटनाएं होती हैं जो बेरोजगारी में भी जीवन को दिलचस्प बना देती हैं. लेकिन ऐसी दिलचस्पी के लिए प्यार चाहिए और सोनम-आयुष्मान जो परदे पर दिख सके, ऐसा प्यार कर नहीं सके. वे लड़ते भी हैं तो इतना जम कर नहीं लड़ते जितना दो दीवाने शहर में लड़ते हैं, प्यार करते हैं तो बचकाने लगते हैं, लगता है कोई इनके बीच खड़ा है जिसे देख इन्हें शर्म आ रही है. आयुष्मान खुराना अपने किरदार के लिए मेहनत भी करते हैं मगर वे धनुष नहीं है जो सोनम के साधारण अभिनय को अपनी तीव्रता में छिपा ले जाएं. सोनम जाहिर है अच्छा अभिनय नहीं करतीं और कपड़े अच्छे पहनती हैं. ऋषि कपूर अभिनय खूब सारा करते हैं लेकिन तारीफ के काबिल कुछ नहीं करते. इसके अलावा किरदारों में कार, इमारतें और क्रेडिट कार्ड हैं जिनका अभिनय पढ़ना अभी हमने नहीं सीखा है.

हमारे यहां की मसाला फिल्में अपने अंत के साथ भी जोखिम नहीं लेती. उसके सभी किरदार आखिर में पाक-साफ हो जाते हैं, कोई किरदार अपनी गलतियों के साथ सारी जिंदगी जीने को तैयार नहीं होता और अभी तक जो सारे सवाल फिल्म ने उठाए थे उसके जवाब अभी नहीं अगले सेमेस्टर की परीक्षा में आप लोगों को देने है का अदृश्य साइनबोर्ड दिखा फिल्म सच में बेवकूफियां करने लगती है. ‘बेवकूफियां’ भी यही करती है.