कैसे उत्तर प्रदेश में भाजपा किसी भी कीमत पर जीत को बेकरार है…

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उत्तर प्रदेेश में भाजपा नेताओं के समर्थकों ने मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को लेकर फेसबुक पर अभियान चला रखा है.

मुकुल श्रीवास्तव कहते हैं, ‘भाजपा ने अभी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है. उसे इसका नुकसान होगा. राज्य की जनता ने अखिलेश और मायावती दोनों का राज देखा है. इन दोनों के शासनकाल में कुछ कमियां सामने आईं तो कुछ खूबियां भी रही हैं. मायावती को आज भी लोग कानून व्यवस्था के लिए याद करते हैं. अखिलेश यादव की व्यक्तिगत तौर पर छवि बहुत अच्छी है. पार्टी के बाहर के भी लोग उन्हें पसंद करते हैं. वहीं उत्तर प्रदेश में भाजपा अब भी राम मंदिर के लिए याद की जाती है, जबकि इस मुद्दे को देखते-सुनते एक पूरी पीढ़ी जवान हो गई है. पार्टी के जितने भी चेहरे हैं वे सब गुटबंदी के शिकार हैं. अगर राजनाथ सिंह उम्मीदवार बनते हैं तो खेल पलट सकता है. लेकिन जाति का मसला फंसेगा.’

भाजपा में मुख्यमंत्री पद के लिए चेहरे का सवाल उठते ही अलग-अलग कोनों से अलग-अलग चेहरों की बात सामने आने लगती है. कभी बेहद बुजुर्ग हो चुके राज्यपाल कल्याण सिंह की बात आती है तो कभी तेजतर्रार स्मृति ईरानी की. उमा भारती वाला दांव तो पिछले विधानसभा चुनाव में ही फुस्स हो गया था. हालांकि उनके समर्थक मानते हैं कि उन्हें सही तरीके से जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई थी इसलिए ऐसा हुआ है. इस बार उनके नाम पर माहौल बन सकता है. इसके अलावा गोरखपुर के योगी आदित्यनाथ और सुल्तानपुर के वरुण गांधी को लेकर उनकेे समर्थक बहुत उत्साहित हैं. दावेदारों में केंद्र सरकार में मंत्री मनोज सिन्हा, कलराज मिश्र और महेश शर्मा से लेकर राज्यसभा सांसद विनय कटियार तक का नाम चर्चा में है. लेकिन इनमें से कोई भी चुनावी कुंभ में बसपा और समाजवादी पार्टी के नेतृत्व जितना वजनी नहीं है, ऐसी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व के ही एक वर्ग की राय है.

वैसे मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा में एक बड़ा नाम राजनाथ सिंह का भी है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में और प्रदेश अध्यक्ष के रूप में वे अपना राजनीतिक कौशल दिखा भी चुके हैं. हालांकि राजनाथ सिंह स्वयं इस दावेदारी को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं. इस प्रश्न के उत्तर में अब तक उन्होंने जो कुछ भी कहा है उससे ऐसे ही संकेत मिलते हैं. हाल ही में उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ही काम करना चाहते हैं. जहां-जहां वे जाएंगे वहां-वहां हम भी जाएंगे.
ऐसे में यह माना जा रहा है कि केंद्रीय राजनीति का आनंद ले रहे राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश की राजनीति में वापसी के लिए जरा भी उत्सुक नहीं हैं और शायद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी इस स्थिति में नहीं हैं कि उन्हें इसके लिए निर्देशित कर सकें. इन स्थितियों और भीतरी अंतर्द्वंद्वों के कारण उत्तर प्रदेश में चेहरा चुनने और न चुनने के मुद्दे ने भाजपा के लिए ऊहापोह की स्थिति बना दी है. हालांकि भाजपा नेतृत्व का कहना है कि उत्तर प्रदेश में वह मुद्दों पर आधारित चुनाव लड़ेगी न कि चेहरे पर आधारित. मगर बिहार में चेहरा न चुनने के नुकसान और असम में चेहरा चुन लेने के फायदे देख चुकी भाजपा उत्तर प्रदेश के लिए तो फिलहाल चेहराविहीन ही दिख रही है.

‘भाजपा ने अभी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है. उसे इसका नुकसान होगा. राज्य की जनता ने अखिलेश और मायावती दोनों का राज देखा है. इन दोनों के शासनकाल में कुछ कमियां सामने आईं तो कुछ खूबियां भी रही हैं. मायावती को आज भी लोग कानून व्यवस्था के लिए याद करते हैं. अखिलेश यादव की व्यक्तिगत तौर पर छवि बहुत अच्छी है. पार्टी के बाहर के भी लोग उन्हें पसंद करते हैं’

शरत प्रधान कहते हैं, ‘जहां तक मुख्यमंत्री के चेहरे का सवाल है तो पार्टी इस स्थिति में है ही नहीं कि वह अपने दम पर सरकार बना सके. इसके बाद उसके पास राजनाथ सिंह के अलावा ऐसा कोई विश्वसनीय चेहरा भी नहीं है जो कुछ उम्मीद जगा सके. योगी आदित्यनाथ, स्मृति ईरानी, वरुण गांधी जैसे जो बाकी नाम अभी चल रहे हैं वे सर्वमान्य नहीं हैं. अब राजनाथ सिंह के सामने समस्या यह है कि वे खुद को दिल्ली की राजनीति से बाहर नहीं करना चाहते हैं. शायद दिल्ली में बैठे उनके विरोधी उन्हें वहां से बाहर करने के लिए ये चाल चल रहे हैं. अगर वे मुख्यमंत्री बन भी जाते हैं तो वे उत्तर प्रदेश में ही रह जाएंगे और हार जाते हैं तो फिर भी वह दिल्ली से बाहर हो जाएंगे. उनकी राजनीति खत्म हो जाएगी.’

वे आगे कहते हैं, ‘जहां तक फायदे-नुकसान की बात है तो यह चेहरे पर निर्भर करता है. अगर उन्हें बेहतर चेहरा नहीं मिलता है तो वे बिना किसी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के मैदान में जाएं. खराब उम्मीदवार को चेहरा बनाने से पार्टी का भला नहीं होने वाला है. ऐसा नहीं है कि भाजपा किसी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बनाती है तो रसातल में चली जाएगी या किसी को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बना देगी तो वह बड़ी जीत हासिल कर लेगी.’

हालांकि भाजपा नेतृत्व उत्तर प्रदेश में मिशन 265 प्लस पूरा करने के लिए सुयोग्य चालक की तलाश भले ही नहीं कर पा रहा है लेकिन मुख्यमंत्री उम्मीदवार को लेकर अभी से नेता अपनी-अपनी दावेदारी पेश करते हुए नजर आ रहे हैं. हालांकि, यह दावेदारी नेता सीधे तौर पर पेश नहीं कर रहे, बल्कि उनके समर्थक इस काम में लगे हुए हैं. हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक सुल्तानपुर से भाजपा सांसद वरुण गांधी के समर्थक उन्हें मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाए जाने की मांग कर रहे हैं.

उनके समर्थकों का दावा है कि भाजपा-आरएसएस के सर्वे में वरुण गांधी मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं. वरुण पिछले एक साल से राज्य में दौरा कर रहे हैं और अलग-अलग जिलों के गांवों में बैठक कर रहे हैं. हालांकि उनके सहयोगी आधिकारिक तौर पर इससे इनकार कर रहे हैं कि वे मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी के समर्थन के लिए दौरे कर रहे हैं. कुछ दिन पहले ऐसे ही कुछ पोस्टर इलाहाबाद में भी नजर आए थे. जिनमें लिखा था, ‘स्मृति ईरानी हुई बीमार. उत्तर प्रदेश की यही पुकार, वरुण गांधी अब की बार.’ इतना ही नहीं वरुण के कुछ सहयोगी फेसबुक अकाउंट बनाकर वरुण को भाजपा सीएम उम्मीदवार बनाए जाने के लिए समर्थन भी मांग रहे हैं.

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हालांकि सोशल मीडिया पर सिर्फ वरुण गांधी के समर्थक उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने की मांग नहीं कर रहे हैं बल्कि योगी आदित्यनाथ, स्मृति ईरानी, केशव प्रसाद मौर्य समेत सभी नेताओं के समर्थक ऐसी बातों को हवा दे रहे हैं.

इन सबसे इतर उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण को सही तरीके से सेट करने में भाजपा बुरी तरह से असफल रही है. हालांकि भाजपा नेताओं को अब भी यह भरोसा है कि उसके साथ प्रदेश में अगड़ी जाति के लोग बने हुए हैं. यह वही वोट बैंक है जिसने 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को एकमुश्त वोट दिया था. इसके अलावा भाजपा को यह भी लगता है कि प्रदेश का बनिया वर्ग भी उसके ही साथ है. भाजपा को यह भरोसा है कि इन सभी वर्गों के लोगों के सामने सपा-बसपा के साथ जाने का विकल्प नहीं है इसलिए यह वोट बैंक तो उसके हाथ में है ही.

लेकिन पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को यह भी एहसास है कि सिर्फ इसी वर्ग के बूते वह सूबे में अपनी सरकार नहीं बना सकती. इसलिए भाजपा अपने लिए नए समर्थक वर्गों की तलाश में भी है. इसका कारण यह है कि 2007 में मायावती ने दलित और ब्राह्मण का मेल बनाकर सफलता पाई तो 2012 में अखिलेश यादव की युवा छवि के साथ पिछड़ा और मुसलमान गठजोड़ ने सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी.

हालांकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इस दिशा में एक कदम भी उठा लिया है. शाह का जोगियापुर में बिंद परिवार के यहां जाकर भोजन करना उसी दिशा में एक अहम कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. बिंद सहित 17 जातियां ऐसी हैं जो उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ा वर्ग में हैं. इन जातियों के बारे में कोई पार्टी यह दावा नहीं कर सकती कि वे उसकी प्रतिबद्ध वोटर हैं. जहां मायावती दलितों के बीच मजबूत हैं तो वहीं मुलायम सिंह की मुस्लिम और यादव समुदाय में गहरी पैठ है. लेकिन 17 जातियों का यह वोट बैंक अभी किसी दल के साथ एकमुश्त नहीं जुड़ा है.

भाजपा को प्रदेश में यहीं अपने लिए एक अवसर दिख रहा है. उसे लगता है कि अगर कोशिश की जाए तो इन 17 जातियों के एक बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़ा जा सकता है और अगर ऐसा हो सका तो 2017 के विधानसभा चुनावों में वह सपा-बसपा को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में रहेगी. संभावना जताई जा रही है कि इस वर्ग को अपने साथ लाने की कोशिश में आने वाले दिनों में भाजपा इन जातियों से जुड़े कुछ मुद्दे प्रमुखता से उठाएगी.

हाल ही में राजनाथ सिंह ने पिछड़ों और दलितों के आरक्षण को दो-दो श्रेणियों पिछड़े व अति पिछड़े और दलित व अति दलित में बांटने के बात कही. मऊ में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा, ‘आरक्षण समाज के सभी वर्गों को मिलना चाहिए बशर्ते वह तार्किक हो. हम सरकार नहीं, समाज बनाने के लिए राजनीति करते हैं. हमारी सरकार गरीबों, दलितों, पिछड़ों को समर्पित है.’

‘भाजपा को सभी वर्गों और जातियों का समर्थन मिल रहा है. प्रदेश ने दलित नेता मायावती का बदतर शासनकाल देख रखा है. भाजपा से ज्यादा अनुसूचित जातियों के हितों के लिए किसी पार्टी ने काम नहीं किया है. इस बार हमारी लहर है, जनता हम पर भरोसा जताएगी. प्रदेश में हम अपनी हार से उबर चुके हैं. हमारी सबसे अच्छी बात यह है कि हमने उत्तर प्रदेश में कभी जातीय राजनीति नहीं की है’

दरअसल गृहमंत्री के इस बयान के पीछे असल मंशा मुलायम और मायावती को कमजोर करने की है. भाजपा को लगता है कि पिछड़े तबके के 27 फीसदी आरक्षण कोटे का असली फायदा यादव उठा रहे हैं जिनकी आबादी करीब 10 फीसदी है. इसी तरह दलित आरक्षण का फायदा मुख्य रूप से जाटव जाति के लोग उठा रहे हैं. वाल्मीकि, मेहतर, डोम, खटीक आदि जातियों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण कोटे का लाभ नहीं मिल पाता है.

अमित शाह ने भी इसके संकेत दिए. सिर्फ जोगियापुर जाकर ही नहीं बल्कि इलाहाबाद से लौटकर बनारस में उन्होंने जो बैठकें कीं उनमें भी. इन बैठकों में शामिल भाजपा नेता बताते हैं, ‘उन्होंने साफ तौर पर तो यह नहीं कहा कि हमें किस-किस वर्ग को आधार बनाकर चुनावी रणनीति तैयार करनी है लेकिन इस बारे में स्थानीय नेता उन्हें सुझाव देते रहे और इन सब पर उन्होंने एक तरह से सहमति व्यक्त की. देखने वाले को यह लग सकता है कि वे यही सब सुनना चाहते थे. उन्होंने जो कहा उससे यह तो स्पष्ट है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व यह चाहता है कि पार्टी सिर्फ खास वर्गों में ही सिमटी नहीं रह सकती बल्कि उसे अपने आधार का विस्तार करना होगा. जाहिर है कि पार्टी का आधार तब ही बढ़ेगा जब पार्टी और नेता पार्टी के परंपरागत समर्थक वर्ग के दायरे से बाहर निकलेंगे.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘बिंद समाज लंबे समय से खुद को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग करता रहा है. संभव है भाजपा के बड़े नेताओं की ओर से आने वाले दिनों में यह कहा जाए कि अगर वे सत्ता में आए तो यह काम कर देंगे. ऐसी ही कुछ और कोशिशें आपको आने वाले दिनों में दिख सकती हैं.’

इन संकेतों को आपस में जोड़ें तो पता चलता है कि जिस मकसद से भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष का पद ब्राह्मण समुदाय के लक्ष्मीकांत वाजपेयी से लेकर पिछड़े वर्ग के एक नेता केशव प्रसाद मौर्य को दिया था, उसे अब वह जमीन पर उतारने में लग गई है. जब मौर्य अध्यक्ष बनाए गए थे तब भी कई जानकारों ने संभावना जताई थी कि भाजपा उत्तर प्रदेश का चुनाव सिर्फ अगड़ों के बूते नहीं बल्कि पिछड़ों को साथ लाने की कोशिश करते हुए लड़ेगी. अब अमित शाह के समरसता भोज और इसके बाद पार्टी नेताओं व कार्यकर्ताओं को उनके द्वारा दिए जा रहे निर्देशों ने इस बात की पुष्टि कर दी है.

हालांकि इन कोशिशों से भाजपा को कितना फायदा होगा यह तो वक्त बताएगा लेकिन भाजपा नेताओं से बात करने पर तो ऐसा लगता है कि उन्हें अमित शाह की इन कोशिशों से काफी उम्मीदें हैं. इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रभारी गौतम चौधरी कहते हैं, ‘भाजपा को सभी वर्गों और जातियों का समर्थन मिल रहा है. प्रदेश ने दलित नेता मायावती का बदतर शासनकाल देख रखा है. भाजपा से ज्यादा अनुसूचित जातियों के हितों के लिए किसी पार्टी ने काम नहीं किया है. हमने एक पौधा जनसंघ के जमाने में लगाया था, अब यह बड़ा हो गया है. इस बार हमारी लहर है जनता हम पर भरोसा जताएगी. प्रदेश में हम अपनी हार से उबर चुके हैं. हमारी सबसे अच्छी बात यह है कि हमने उत्तर प्रदेश में कभी जातीय राजनीति नहीं की है. हमारा फोकस विकास और गुड गवर्नेंस पर हमेशा रहा है.’

प्रदीप सिंह कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में भाजपा जीत के लिए सब कुछ झोंक रही है. इसके लिए वह सांप्रदायिकता से लेकर जातीय कार्ड खेल रही है. विकास का नारा दे रही है और गुड गवर्नेंस का वादा कर रही है लेकिन अब भी जनता उसमें विश्वास नहीं जता पा रही है. इसका कारण उसके पास समर्पित कार्यकर्ताओं और सही मुद्दों की कमी है. अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि भाजपा अभी हवाई प्रचार में ही सिमटी दिख रही है. आम आदमी तक उसकी बात पहुंच नहीं पा रही है. यह उसके लिए नुकसानदेह है. भाजपा को अगर मिशन 265 को पूरा करना है तो इन बातों पर गंभीरता से विचार करना होगा. युवाओं को साथ जोड़ना होगा. हमें याद रखना होगा अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है.’