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‘मकान मालिक को तुमसे दिक्कत है, तुम अपने इलाके में जाओ’

स्नातक की पढ़ाई के दौरान एक न्यूज चैनल में इंटर्नशिप करने दिल्ली आया था. साल 2013 के दिसंबर का सर्द महीना था. मेरा दोस्त नोएडा सेक्टर 12 में रहता था. उसने कह रखा था एक महीने की ही बात है मेरे यहां रह लेना. नई दिल्ली रेलवे स्टेशन उतरकर उसे  

झपसु मियां के बारे में पढ़कर दोनों धर्मों के अतिवादी शर्मसार होंगे

‘की हो झा जी, की मर्दे; आदमी साठा तब पाठा, बियाह कर ले बेटबा-पुतहुआ ठंडा हो जइतौ.’ झपसु मियां हर रोज की तरह अपने दालान में बैठकी लगाने आए और अपने मित्र कपिल झा को ब्याह करने की सलाह दी तो एकबारगी सब ठठाकर हंस पड़े. ऐसे ही थे झपसु  

‘मन की पहली परत वही थी कि कम उमर में शादी ठीक होवे है’

कुछ दिन पहले दो इत्तेफाक एक साथ हुए. पहला इत्तेफाक यह कि दिल्ली से जिस ट्रेन से वर्धा के लिए वापसी थी, उसी ट्रेन में 2 साल पहले बिल्कुल वही कोच और सीट मिली थी. वापसी के लिए जब टिकट कन्फर्म हुआ था तो इस इत्तेफाक को महसूस करना अच्छा  

पर्दे के हीरो धर्मेंद्र असली जिंदगी के बड़े नायक हैं

बचपन से ही मैं सदाबहार अभिनेता धर्मेंद्र की ओर आकर्षित रहा. जब मैंने फिल्म देखनी शुरू की थी तब मेरी उम्र कोई आठ-नौ साल की रही होगी पर सचेत मन की पहली फिल्म ‘सत्यकाम’ थी जिसने मेरे मन-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ी. पिता आदिम जाति कल्याण विभाग में काम करते  

जाति पूछी और मोटर साइकिल से उतरने की रट लगा दी

मैं उस दिन भीगता-भागता स्कूल पहुंचा था. सो सारा दिन गीले-सीले कपड़े में ही पढ़ाना पड़ा. मार्च की इस बेमौसम बरसात ने फसल का ही नहीं स्कूल की पढ़ाई का भी नुकसान कर दिया है. बच्चे भी पढ़ने की बजाए छुट्टी की घंटी का इंतजार ज्यादा करते नजर आ रहे  

बरसात की एक रात !

कर भला तो हो भला! कहने को तो यह महज एक कहावत है, दूसरी कहावतों जैसी लेकिन जीवन में कई वाकये ऐसे होते हैं, जो इन कहावतों पर यकीन पक्का कर देते हैं. करीब 12 साल पुरानी बात है. स्कूल से घर लौटते वक्त गांव में घुसते ही पता चला  

‘एक गिलास कोल्ड ड्रिंक और 10 रुपये  का अपमान!’

किसी भी चीज की कीमत किस चीज से तय होती है? अर्थशास्त्र के मांग और उपलब्धता के सिद्घांत से परे अगर हम थोड़ा दार्शनिक नजरिया अपनाएं तो किसी भी चीज का मोल वही होता है जो हम अपने मन में आंकते हैं. बुज़ुर्गों की भाषा में कहें तो ‘सब मन  

‘मोहल्लों की लड़ाई बन गई सांप्रदायिक दंगा !’

दीवाली का दूसरा दिन था. मैं शाम को नोएडा की तरफ निकल गई. रात के 9 बजते-बजते मेरे पास घर से एक के बाद एक कई फोन आने लगे. पता चला, मेरा घर जो कि त्रिलोकपुरी में है, वहां पथराव हो रहा है. घरवालों ने कहा अभी कहीं बाहर ही  

‘मेरी नाप के जूते लेकिन मेरे नहीं !’

यह करीब 40-42 साल पुरानी बात है. देश को अंग्रेजों से आजाद हुए कुछ वक्त हो गया था लेकिन आंटी और अंकल जैसे अंग्रेजी संबोधन आम नहीं थे. उस वक्त मां की सहेलियां हमेशा मौसी हुआ करती थीं और पिता के मित्र ताऊ जी या चाचाजी. मां स्कूल में पढ़ाती  

‘उस रात मुझे अन्याय के प्रतिरोध की सीख मिली’

रमेश बहुगुणा लेखक सेवानिवृत्त जिला समाज कल्याण अधिकारी हैं और देहरादून में रहते हैं