संजय गांधी की मौत के पीछे इंदिरा गांधी का हाथ

sanjay_gandhiराजनीति में न कोई मां-बाप होता है, न कोई बेटा-बेटी. बीती सर्दियों में आजमगढ़ के निजामाबाद बाजार में आग ताप रहे आठ-नौ लोगों के एक समूह में यह कहानी संजय गांधी और इंदिरा गांधी के संदर्भ में एकदम नए सिरे से सुनने को मिली. संजय गांधी की मौत एक ट्रेनर विमान दुर्घटना में हुई थी. हादसा दिल्ली के सफदरजंग एयरपोर्ट के पास हुआ था. संजय की मौत के बाद से यह कहानी जितने मुंह उतने तरीके से सुनने को मिलती रही है कि कहीं न कहीं इस हत्या के पीछे उनकी मां इंदिरा गांधी का हाथ था. तो आग ताप रहे झुंड के बीच इस कथा की शुरुआत कुछ इस तरह से हुई कि संजय गांधी मुसलमानों के घनघोर विरोधी थे. आलम यह था उस जमाने में कि कमलनाथ समेत उनके कुछ डॉक्टर साथी खुद हाथों में उस्तरे लेकर दिल्ली के तुर्कमान गेट के इलाके में रात-बिरात घूमा करते थे और अगर ऐसा कोई मुसलमान उन्हें मिल जाता जिसकी नसबंदी नहीं हुई होती थी तो वे उसकी लगे हाथ नसबंदी कर देते थे. उनका मानना था कि कई-कई शादियां करने की वजह से मुसलमानों की आबादी देश में बढ़ती जा रही थी. संजय का जलवा सिर्फ यहीं नहीं था. उस समय इंदिराजी की सरकार में भी उन्हीं की तूती बोलती थी. कांग्रेसी नेता और मंत्री प्रधानमंत्री कार्यालय की बजाय सफदरजंग मार्ग स्थित प्रधानमंत्री आवास, जहां संजय गांधी रहते थे वहां से सारी जरूरी फाइलें पास करवाते थे.

धीरे-धीरे संजय की यह मनमानी इंदिरा गांधी की सियासत और देश की एकता-अखंडता के लिए खतरा बनने लगी. संजय के खिलाफ शिकायतों का अंबार इंदिरा के दरबार में लगने लगा. संजय और उनके साथियों की अजब-गजब करतूतें सामने आती मसलन कभी रात में किसी की कार उठा लेना तो कभी किसी लड़की को छेड़ देना. मतलब यह कि हर दिन के साथ इंदिरा के सामने अपने बेटे की कारगुजारियों का पहाड़ बड़ा ही होता जा रहा था. अंतत: हर दिन की किचकिच से आजिज आकर इंदिरा गांधी ने एक हवाई जहाज दुर्घटना के जरिए अपने ही बेटे की हत्या का षडयंत्र रचा ताकि अपनी राजनीति को जिंदा रख सकें. इस तरह से 23 जून 1980 की वह मनहूस सुबह आ गई जब इस षडयंत्र को अंजाम दिया गया. संजय गांधी के साथ उस ग्लाइडर विमान में एक और साथी था, उसकी भी मौत हो गई.


गौर फरमाएं

संजय गांधी की मौत पर गढ़ी गई ये कहानी उन तमाम कहानियों का एकमात्र संस्करण है. इस दुर्घटना पर कई लेखकों ने जमकर अपनी लेखनी चलाई है. वरिष्ठ पत्रकार और आउटलुक पत्रिका के संपादक रहे विनोद मेहता ने अपनी किताब द संजय स्टोरी में उनकी मौत की घटना की बारीक पड़ताल की है. अगर इस पड़ताल से किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाय तो यह लापरवाही से, बिना किसी जरूरी प्रशिक्षण और योग्यता के विमान चलाने का मामला था. विमान चलाने का जूनून संजय में ताजा-ताजा पैदा हुआ था. यह बात सर्वविदित है कि संजय थोड़ा झक्की और जिद्दी स्वभाव के थे. वे हर बार जरूरी सुरक्षा उपायों की अनदेखी करते थे. जिस दिन उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ उस दिन भी संजय कोल्हापुरी चप्पल और पजामा-कुर्ता पहनकर विमान उड़ा रहे थे. साफ बात है कि विमान उड़ाने जैसी बहुत ही विशेषज्ञता का काम बेहद लापरवाही से करने का नतीजा था संजय गांधी की मौत.